today murli 14 may 2017

Daily Murli 14 May 2017 : Bk Dainik Gyan Murli (Hindi)

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14/05/17
मधुबन
“अव्यक्त-बापदाद”‘
ओम् शान्ति
29-03-82

सच्चे वैष्णव अर्थात् सदा गुण ग्राहक

आज बापदादा माला बना रहे थे। कौन सी माला? हरेक श्रेष्ठ आत्मा के श्रेष्ठ गुण की माला बना रहे थे – क्योंकि बापदादा जानते हैं कि श्रेष्ठ बाप के हरेक श्रेष्ठ बच्चे की अपनी-अपनी विशेषता है। अपने-अपने गुण के आधार से संगमयुग में श्रेष्ठ प्रालब्ध पा रहे हैं। बापदादा आज विशेष प्यादे ग्रुप के गुणों को देख रहे थे। चाहे पुरुषार्थ में लास्ट ग्रुप कहा जायेगा लेकिन उन्हों में भी विशेष गुण जरूर है और वही विशेष गुण उन आत्माओं को बाप का बनने में विशेष आधार है। तो बापदादा पहले नम्बर में लास्ट नम्बर तक नहीं गये। लेकिन लास्ट से फर्स्ट तक गुण देखा। बिल्कुल लास्ट नम्बर में भी गुणवान थे। परमात्म-सन्तान और कोई गुण न हो, यह हो नहीं सकता। उसी गुण के आधार से ही ब्राह्मण जन्म में जी रहे हैं अर्थात् जिन्दा हैं। ड्रामा अनुसार उसी गुण ने ही ऊंचे ते ऊंचे बाप का बच्चा बनाया है। उसी गुण के कारण ही प्रभु पसन्द बने हैं, इसलिए गुणों की माला बना रहे थे। ऐसे ही हर ब्राह्मण आत्मा के गुण को देखने से श्रेष्ठ आत्मा का भाव सहज और स्वत: ही होगा क्योंकि गुण का आधार है ही श्रेष्ठ आत्मा। कई आत्मायें गुण को जानते हुए भी जन्म-जन्म की गन्दगी को देखने के अभ्यासी होने कारण गुण को न देख अवगुण ही देखती हैं। लेकिन अवगुण को देखना, अवगुण को धारण करना ऐसी ही भूल है जैसे स्थूल में अशुद्ध भोजन पान करना। स्थूल भोजन में अगर कोई अशुद्ध भोजन स्वीकार करता है तो भूल महसूस करते हो ना। लिखते हो ना कि खान-पान की धारणा में कमजोर हूँ। तो भूल समझते हो ना! ऐसे अगर किसी का अवगुण अथवा कमजोरी स्वयं में धारण करते हो तो समझो अशुद्ध भोजन खाने वाले हो। सच्चे वैष्णव नहीं, विष्णु वंशी नहीं, लेकिन राम की सेना हो जायेंगे इसलिए सदा गुण ग्रहण करने वाले गुण मूर्त बनो।

बापदादा आज बच्चों की चतुराई के खेल देख रहे थे। याद आ रहे हैं ना – अपने खेल! सबसे बड़ी बात दूसरे के अवगुण को देखना, जानना इसको बहुत होशियारी समझते हैं, इसको ही नॉलेजफुल समझ लेते हैं। लेकिन जानना अर्थात् बदलना। अगर जाना भी, दो घड़ी के लिए नॉलेजफुल भी बन गये, लेकिन नॉलेजफुल बनकर क्या किया? नॉलेज को लाइट और माइट कहा जाता है, जान तो लिया कि यह अवगुण है लेकिन नॉलेज की शक्ति से अपने वा दूसरे के अवगुण को भस्म किया? परिवर्तन किया? बदल के वा बदला के दिखाया वा बदला लिया? अगर नॉलेज की लाइट माइट को कार्य में नहीं लाया तो क्या उसको जानना कहेंगे, नॉलेजफुल कहेंगे? सिवाए नॉलेज के लाइट माइट को यूज़ करने के वह जानना ऐसे ही है जैसे द्वापरयुगी शास्त्रवादियों को शास्त्रों की नॉलेज है। ऐसे जानने वाले से अवगुण को न जानने वाले बहुत अच्छे हैं। ब्राह्मण परिवार में आपस में ऐसी आत्माओं को हंसी में बुद्धू समझ लेते हैं। आपस में कहते हो ना कि तुम तो बुद्धू हो, कुछ जानते नहीं हो। लेकिन इस बात में बुद्धू बनना अच्छा है। ना अवगुण देखेंगे, न धारण करेंगे, न वाणी द्वारा वर्णन कर परचिन्तन करने की लिस्ट में आयेंगे। अवगुण तो किचड़ा है ना। अगर देखते भी हो तो मास्टर ज्ञान सूर्य बन किचड़े को जलाने की शक्ति है, तो शुभ-चिन्तक बनो। बुद्धि में ज़रा भी किचड़ा होगा तो शुद्ध बाप की याद टिक नहीं सकेगी। प्राप्ति कर नहीं सकेंगे। गन्दगी को धारण करने की एक बार आदत डाल दी तो बार-बार बुद्धि गन्दगी की तरफ न चाहते भी जाती रहेगी। और रिजल्ट क्या होगी? वह नैचुरल संस्कार बन जायेंगे। फिर उन संस्कारों को परिवर्तन करने में मेहनत और समय लग जाता है। दूसरे का अवगुण वर्णन करना अर्थात् स्वयं भी परचिन्तन के अवगुण के वशीभूत होना है। लेकिन यह समझते नहीं हो – दूसरे की कमजोरी वर्णन करना, अपने समाने की शक्ति की कमजोरी जाहिर करना है। किसी भी आत्मा को सदा गुण-मूर्त से देखो। अगर किसकी कोई कमजोरी है भी, मर्यादा के विपरीत कार्य है भी तो बापदादा की निमित्त बनाई हुई सुप्रीम कोर्ट में लाओ। खुद ही वकील और जज नहीं बन जाओ। भाई-भाई का नाता भूल वकील जज बन जाते हो इसलिए भाई-भाई की दृष्टि टिक नहीं सकती। केस दाखिल करने की मना नहीं है लेकिन मिलावट और खयानत नहीं करो। जितना हो सके शुभ भावना से इशारा दे दो। न अपने मन में रखो और न औरों को मनमनाभव होने में विघ्न रुप बनो। तो चतुराई का खेल क्या करते हैं? जिस बात को समाना चाहिए उसको फैलाते हैं और जिस बात को फैलाना चाहिए उसको समा देते हैं कि यह तो सबमें है। तो सदा स्वयं को अशुद्धि से दूर रखो। मंसा में, चाहे वाणी में, कर्म में वा सम्बन्ध-सम्पर्क में अशुद्धि, संगमयुग की श्रेष्ठ प्राप्ति से वंचित बना देगी। समय बीत जायेगा। फिर “पाना था” इस लिस्ट में खड़ा होना पड़ेगा। प्राप्ति स्वरूप की लिस्ट में नहीं होंगे। सर्व खजानों के मालिक के बालक और अप्राप्ति वालों की लिस्ट में हों, यह अच्छा लगेगा? इसलिए अपनी प्राप्ति में लग जाओ। शुभचिंतक बनो। किसी भी प्रकार के विकारों के वशीभूत हो अपनी उल्टी होशियारी नहीं दिखाओ। यह उल्टी होशियारी अब अल्पकाल के लिए अपने को खुश कर लेगी वा ऐसे साथी भी आपकी होशियारी के गीत गाते रहेंगे लेकिन कर्म की गति को भी स्मृति में रखो। उल्टी होशियारी उल्टा लटकायेगी। अभी अल्काल के लिए काम चलाने की होशियारी दिखायेंगे, इतना ही चलाने के बजाए चिल्लाना भी पड़ेगा। कई ऐसी होशियारी दिखाते हैं कि बापदादा दीदी दादी को भी चला लेंगे। यह सब तरीके आते हैं। अल्पकाल की उल्टी प्राप्ति के लिए मना भी लिया, चला भी लिया लेकिन पाया क्या और गंवाया क्या। दो तीन वर्ष नाम भी पा लिया लेकिन अनेक जन्मों के लिए श्रेष्ठ पद से नाम गंवा लिया। तो पाना हुआ या गंवाना हुआ?

और चतुराई सुनावें? ऐसे समय पर फिर ज्ञान की प्वाइन्ट यूज़ करते हैं कि अभी प्रत्यक्ष फल तो पा लो भविष्य में देखा जायेगा। लेकिन प्रत्यक्षफल अतीन्द्रिय सुख सदा का है, अल्पकाल का नहीं। कितना भी प्रत्यक्षफल खाने का चैलेन्ज करे लेकिन अल्पकाल के नाम से और खुशी के साथ-साथ बीच में असन्तुष्टता का कांटा फल के साथ जरूर खाते रहेंगे। मन की प्रसन्नता वा सन्तुष्टता अनुभव नहीं कर सकेंगे इसलिए ऐसे गिरती कला की कलाबाजी नहीं करो। बापदादा को ऐसी आत्माओं पर तरस होता है – बनने क्या आये और बन क्या रहे हैं! सदा यह लक्ष्य रखो कि जो कर्म कर रहा हूँ, यह प्रभु पसन्द कर्म है? बाप ने अपको पसन्द किया तो बच्चों का काम है हर कर्म बाप पसन्द, प्रभु पसन्द करना। जैसे बाप गुण मालायें गले में पहनाते हैं वैसे गुण माला पहनो, कंकड़ो की माला नहीं पहनो। रत्नों की पहनो। अच्छा-

ऐसे सदा गुण मूर्त सदा प्रभु पसन्द, सदा सच्चे वैष्णव, विष्णु के राज्य अधिकारी, सदा शुभ भावना द्वारा भाई-भाई की दृष्टि में सहज स्थित होने वाले, सदा गुण ग्राहक दृष्टि वाले, ऐसे सदा बाप के समान बनने वाले, समीप रत्नों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों के साथ

1. ऊंचे ते ऊंचे बाप के बच्चे, मिट्टी में खेलने के बजाए अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलो –

सदा अपने को सर्व प्राप्ति स्वरूप अनुभव करते हो? प्राप्ति स्वरूप अर्थात् अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूलने वाले। सदा एक बाप दूसरा न कोई… ऐसे साथ का अनुभव करेंगे। जब बाप सर्व सम्बन्धों से अपना बन गया तो सदा बाप का साथ चाहिए ना। कितनी भी बड़ी परिस्थिति हो, पहाड़ हो लेकिन आप बाप के साथ-साथ ऊपर उड़ते रहो तो कभी भी रूकेंगे नहीं। जैसे प्लेन को पहाड़ नहीं रोक सकते, पहाड़ पर चढ़ने वालों को बहुत मेहनत करनी पड़ती लेकिन उड़ने वाले उसे सहज ही पार कर लेते हैं। ऐसे कैसी भी बड़ी परिस्थिति हो, बाप के साथ उड़ते रहो तो सेकण्ड में पार हो जायेंगे। कभी भी झूले से नीचे नहीं आओ, नहीं तो मैले हो जायेंगे। मैले, फिर बाप से कैसे मिल सकते। बहुतकाल अलग रहे अभी मेला हुआ तो मेला मनाने वाले मैले कैसे होंगे। बापदादा हर एक बच्चे को कुल का दीपक, नम्बरवन बच्चा देखना चाहते हैं। अगर बार-बार मैले होंगे तो स्वच्छ होने में कितना टाइम वेस्ट होगा इसलिए सदा मेले में रहो। मिट्टी में पांव क्यों रखते हो! इतने श्रेष्ठ बाप के बच्चे और मैले, तो कौन मानेगा कि यह उस ऊंचे बाप के बच्चे हैं इसलिए बीती सो बीती। जो दूसरे सेकण्ड बीता वह समाप्त। कोई भी प्रकार की उलझन में नहीं आओ। स्वचिन्तन करो, परचिन्तन न सुनो, न करो, यही मैला करता है। अभी से क्वेश्चन मार्क समाप्त कर बिन्दी लगा दो। बिन्दी बन बिन्दी बाप के साथ उड़ जाओ। अच्छा!

2. फुर्सत में रहने वाली आत्माओं की सेवा भी फुर्सत से करो तो सफलता मिलेगी:

वानप्रस्थी जिन्हों को सदा फुर्सत है, जो रिटायर्ड हैं, उनकी सेवा के लिए थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी – वे सिर्फ कार्ड बांटने से नहीं आयेंगे। फुर्सत वालों की सेवा भी फुर्सत अर्थात् समय देकर करनी पड़ेगी क्योंकि वे अपने को वानप्रस्थी होने के कारण अनुभवी समझते हैं। उन्हें अनुभव का अभिमान होता है इसलिए उनकी सेवा के लिए थोड़ा ज्यादा समय देना पड़े और तरीका भी मित्रता का, स्नेह मिलन का हो। समझाने का नहीं। मित्रता के नाते से उन्हों को मिलो। ऐसे नहीं सुनाओ कि यह बात आप नहीं जानते हो, मैं जानता हूँ। अनुभव की लेन-देन करो। उनकी बात को सुनो तो समझेंगे यह हमें रिगार्ड देते हैं। किसी को भी समीप लाने के लिए उनकी विशेषता का वर्णन करो फिर उन्हें अपना अनुभव सुनाकर समीप ले आओ। अगर कहेंगे कोर्स करो, ज्ञान सुनो तो नहीं सुनेंगे इसलिए अनुभव सुनाओ। बापदादा को अभी ऐसे वानप्रस्थियों का गुलदस्ता भेंट करो। उन्हें मित्रता के नाते से सहयोगी बनाकर बुलाओ।

3- निर्मान बनो तो नव निर्माण का कर्तव्य आगे बढ़ता रहेगा:

सदा अपने को सेवा के निमित्त बने हुए सेवा का श्रृंगार समझकर चलते हो? सेवाधारी की मुख्य विशेषता कौन-सी है? सेवाधारी अर्थात् निर्माण करने वाले सदा निर्मान। निर्माण करने वाले और निर्मान रहने वाले। निर्मानता ही सेवा की सफलता का साधन है। निर्माण बनने से सदा सेवा में हल्के रहेंगे। निर्मान नहीं, मान की इच्छा है तो बोझ हो जायेगा। बोझ वाला सदा रूकेगा। तीव्र नहीं जा सकता इसलिए निर्मान हैं या नहीं हैं उसकी निशानी हल्का होगा। अगर कोई भी बोझ अनुभव होता है तो समझो निर्मान नहीं हैं।

4- सच्चे रूहानी सेवाधारी अर्थात् सर्व सम्बन्धों की अनुभूति एक बाप से करने और कराने वाले:

सर्व सम्बन्ध एक बाप से हैं, बाप सदा सम्मुख में हाज़िर-नाज़िर हैं, ऐसा अनुभव होता है? तुम्हीं से खाऊं, तुम्हीं से बैठूं, तुम्हीं से सुनूं… इसका अनुभव होता है ना? बाप ही सच्चा मित्र बन गया तो औरों को मित्र बनाने की जरूरत ही नहीं। जो सम्बन्ध चाहिए उस सम्बन्ध से बापदादा सदा सम्मुख में हाज़िर-नाज़िर हैं। तो शिक्षक अर्थात् सर्व सम्बन्धों का रस एक बाप से अनुभव करने वाली। इसको कहा जाता है सच्चे सेवाधारी। स्वयं में होगा तो औरों को भी अनुभूति करा सकेंगी। अगर निमित्त बनी हुई आत्माओं में कोई भी रसना की कमी है तो आने वाली आत्माओं में भी वह कमी रह जायेगी। तो सर्व रसनाओं का अनुभव करो और कराओ। अच्छा। ओम् शान्ति।

वरदान:- ज्ञान खजाने द्वारा मुक्ति-जीवनमुक्ति का अनुभव करने वाले सर्व बंधनमुक्त भव
ज्ञान रत्नों का खजाना सबसे श्रेष्ठ खजाना है, इस खजाने द्वारा इस समय ही मुक्ति-जीवनमुक्ति की अनुभूति कर सकते हो। ज्ञानी तू आत्मा वह है जो दु:ख और अशान्ति के सब कारण समाप्त कर, अनेकानेक बन्धनों की रस्सियों को काटकर मुक्ति वा जीवनमुक्ति का अनुभव करे। अनेक व्यर्थ संकल्पों से, विकल्पों से और विकर्मो से सदा मुक्त रहना – यही मुक्त और जीवनमुक्त अवस्था है।
स्लोगन:- विश्व परिवर्तक वह है जो अपनी शक्तिशाली वृत्तियों से वायुमण्डल को परिवर्तन कर दे।

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Daily Murli 13 May 2017 : Bk Dainik Gyan Murli (Hindi)

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13/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – श्रीमत में कभी मनमत मिक्स नहीं करना, मनमत पर चलना माना अपनी तकदीर को लकीर लगाना”
प्रश्नः- बच्चों को बाप से कौन सी उम्मींद नहीं रखनी चाहिए?
उत्तर:- कई बच्चे कहते हैं बाबा हमारी बीमारी को ठीक कर दो, कुछ कृपा करो। बाबा कहते यह तो तुम्हारे पुराने आरगन्स हैं। थोड़ी बहुत तकलीफ तो होगी ही, इसमें बाबा क्या करें। कोई मर गया, देवाला निकल गया तो इसमें बाबा से कृपा क्या मांगते हो, यह तो तुम्हारा हिसाब-किताब है। हाँ योगबल से तुम्हारी आयु बढ़ सकती है, जितना हो सके योगबल से काम लो।
गीत:- तूने रात गॅवाई…..

 

ओम् शान्ति। बच्चों को ओम् का अर्थ तो बताया है। ऐसे नहीं ओम् माना भगवान। ओम् अर्थात् अहम् अर्थात् मैं। मैं कौन? मेरे यह आरगन्स। बाप भी कहते हैं अहम् आत्मा, परन्तु मैं परम आत्मा हूँ माना परमात्मा हूँ। वह है परमधाम निवासी परमपिता परमात्मा। कहते हैं मैं इस शरीर का मालिक नहीं हूँ। मैं क्रियेटर, डायरेक्टर, एक्टर कैसे हूँ – यह समझने की बातें हैं। मैं स्वर्ग का रचयिता जरूर हूँ। सतयुग को रचकर कलियुग का विनाश जरूर कराना ही है। मैं करनकरावनहार होने कारण मैं कराता हूँ। यह कौन कहते हैं? परमपिता परमात्मा। फिर कहते हैं मैं ब्रह्माण्ड का मालिक हूँ। ब्रह्माण्ड के मालिक तुम बच्चे भी हो, जब बाप के साथ रहते हो। उनको स्वीट होम भी कहते हैं। फिर जब सृष्टि रची जाती है तो पहले ब्राह्मण रचते हैं जो फिर देवता बनते हैं। वह पूरे 84 जन्म लेते हैं। शिवबाबा एवर पूज्य है। आत्मा को तो पुर्नजन्म लेना ही है। बाकी 84 लाख तो हो नहीं सकते। बाप कहते हैं तुम अपने जन्मों को नहीं जानते, मैं बताता हूँ। 84 का चक्र कहा जाता है। 84 लाख का नहीं। इस चक्र को याद करने से तुम चक्रवर्ती राजा बनते हो। अब बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। देह सहित देह के सभी सम्बन्धों को भूल जाओ। अब तुम्हारा यह अन्तिम जन्म है। जब तक यह बात बुद्धि में नहीं आई है तब तक समझेंगे नहीं। यह पुराना शरीर, पुरानी दुनिया है। यह देह तो खलास हो जानी है। कहावत भी है आप मुये मर गई दुनिया। यह पुरुषार्थ का थोड़ा सा संगम का समय है। बच्चे पूछते हैं बाबा यह ज्ञान कब तक चलेगा? जब तक भविष्य दैवी राजधानी स्थापन हो जाये तब तक सुनाते ही रहेंगे। इम्तिहान पूरा होगा फिर ट्रांसफर होंगे नई दुनिया में। जब तक शरीर को कुछ न कुछ होता रहता है। यह शारीरिक रोग भी कर्मभोग है। बाबा का यह शरीर कितना प्रिय है। तो भी खाँसी आदि होती है तो बाबा कहते हैं यह तुम्हारे आरगन्स पुराने हो गये हैं इसलिए तकलीफ होती है। इसमें बाबा मदद करे, यह उम्मींद नहीं रखनी चाहिए। देवाला निकला, बीमार हुआ बाप कहेंगे यह तुम्हारा ही हिसाब-किताब है। हाँ, फिर भी योग से आयु बढ़ेगी, तुमको ही फायदा है। अपनी मेहनत करो, कृपा नहीं मांगो। बाप की याद में कल्याण है। जितना हो सके योगबल से काम लो। गाते हैं ना – मुझे पलकों में छिपा लो.. प्रिय चीज़ को नूरे रत्न, प्राण प्यारी कहते हैं। यह बाप तो बहुत प्रिय है, परन्तु है गुप्त इसलिए लव पूरा ठहरता नहीं। नहीं तो उनके लिए लव ऐसा होना चाहिए जो बात मत पूछो। बच्चों को तो बाप पलकों में छिपा लेते हैं। पलकें कोई यह ऑखें नहीं, यह तो बुद्धि में याद रखना है कि यह ज्ञान हमको कौन दे रहे हैं? मोस्ट बिलवेड निराकार बाप, जिसकी ही महिमा है – पतित-पावन, ज्ञान का सागर, सुख का सागर, उनको फिर सर्वव्यापी कह देते हैं। तो फिर हर एक मनुष्य ज्ञान का सागर, सुख का सागर होना चाहिए। परन्तु नहीं, हर आत्मा को अपना अविनाशी पार्ट मिला हुआ है। यह हैं बहुत गुप्त बातें। पहले तो बाप का परिचय देना है। पारलौकिक बाप स्वर्ग की रचना रचते हैं। सतयुग सचखण्ड में देवी-देवताओं का राज्य होता है, जो नई दुनिया बाप रचते हैं। कैसे रचते हैं सो तुम बच्चे जानते हो। कहते हैं मैं आता ही हूँ पतितों को पावन बनाने। तो पतित सृष्टि में आकर पावन बनाना पड़े ना। गाते भी हैं ब्रह्मा द्वारा स्थापना। तो उनके मुख द्वारा ज्ञान सुनाते और श्रेष्ठ कर्म सिखलाते हैं। बच्चों को कहते मैं तुमको ऐसे कर्म सिखलाता हूँ जो वहाँ तुम्हारे कर्म विकर्म नहीं होंगे क्योंकि वहाँ माया है ही नहीं इसलिए तुम्हारे कर्म अकर्म बन जाते हैं। यहाँ माया है इसलिए तुम्हारे कर्म विकर्म ही बनेंगे। माया के राज्य में जो कुछ करेंगे उल्टा ही करेंगे।

अब बाप कहते हैं मेरे द्वारा तुम सब कुछ जान जाते हो। वह लोग साधना आदि करते हैं – परमात्मा से मिलने के लिए, अनेक प्रकार के हठयोग आदि सिखाते हैं। यहाँ तो बस एक बाप को याद करना है। मुख से शिव-शिव भी नहीं कहना है। यह बुद्धि की यात्रा है। जितना याद करेंगे उतना रूद्र माला का दाना बनेंगे, बाप के नजदीक आयेंगे। शिवबाबा के गले का हार बनना या रूद्र माला में नजदीक आना, उसकी है रेस। चार्ट रखना है तो अन्त मती सो गति हो जाए। देह भी याद न पड़े, ऐसी अवस्था चाहिए।

बाप कहते हैं अब तुमको हीरे जैसा जन्म मिला है। तो मेरे लाडले बच्चे, नींद को जीतने वाले बच्चे, कम से कम 8 घण्टे मेरी याद में रहो। अभी वह अवस्था आई नहीं है। चार्ट रखो हम सारे दिन में कितना समय याद की यात्रा पर चलते हैं। कहाँ खड़े तो नहीं हो जाते हैं। बाप को याद करने से वर्सा भी बुद्धि में रहेगा। प्रवृत्ति मार्ग है ना। नम्बरवन है बाप का स्थापन किया हुआ – स्वर्ग का देवी-देवता धर्म। बाप राजयोग सिखलाकर स्वर्ग का मालिक बनाते हैं, फिर यह ज्ञान प्राय:लोप हो जाता है। तो फिर यह ज्ञान शास्त्रों में कहाँ से आया? रामायण आदि तो पीछे बनाई है। सारी दुनिया ही लंका है। रावण का राज्य है ना। बन्दर जैसे मनुष्यों को पवित्र मन्दिर लायक बनाकर रावण राज्य को खत्म कर देते हैं। सद्गति दाता बाप ज्ञान देते हैं सद्गति के लिए। उनको सद्गति करनी है अन्त में।

अब बाप कहते हैं बच्चे और सबको छोड़ एक मेरे से सुनो। मैं कौन हूँ, पहले यह निश्चय चाहिए। मैं तुम्हारा वही बाप हूँ। मैं तुमको फिर से सभी वेदों शास्त्रों का सार सुनाता हूँ। यह ज्ञान तो बाप सम्मुख देते हैं। फिर तो विनाश हो जाता है। फिर जब द्वापर में खोजते हैं तो वही गीता आदि शास्त्र निकल आते हैं। भक्ति मार्ग के लिए जरूर वही सामग्री चाहिए। जो अभी तुम देखते हो, औरों का ज्ञान तो परम्परा से चला आता है। यह ज्ञान तो यहाँ ही खत्म हो जाता है। बाद में जब खोजते हैं तो यही शास्त्र आदि हाथ में आते हैं, इसलिए इनको अनादि कह देते हैं। द्वापर में सब वही शास्त्र निकलते हैं। तब तो मैं आकर फिर से सभी का सार सुनाता हूँ, फिर वही रिपीटीशन होगी। कोई रिपीटीशन को मानते हैं, कोई क्या कहते। अनेक मतें हैं। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी तो तुम बच्चे ही जानते हो, और कोई जान न सके। उन्होंने तो कल्प की आयु लाखों वर्ष कर दी है। ऐसे भी बहुत लोग कहते हैं कि महाभारत युद्ध को 5 हजार वर्ष हुए। यह फिर से वही लड़ाई है। तो जरूर गीता का भगवान भी होगा! अगर कृष्ण हो तो वह फिर मोर मुकुटधारी चाहिए। कृष्ण तो सतयुग में ही होता है। वही कृष्ण तो अब हो न सके। इनके दूसरे जन्म में भी वही कला नहीं रहती। 16 कला से 14 कला बनना है तो जन्म बाई जन्म थोड़ा-थोड़ा फ़र्क पड़ता जायेगा ना। ऐसे तो मोर मुकुटधारी बहुत हैं। कृष्ण जो पहला नम्बर 16 कला सम्पूर्ण है, उनकी तो पुनर्जन्म से थोड़ी-थोड़ी कला कमती होती जाती है। यह बहुत गुह्य राज़ है।

बाप कहते हैं ऐसे नहीं चलते-फिरते, घूमते समय गंवाओ। यही कमाई का समय है। जिनके पास धन बहुत है वह तो समझते हैं हमारे लिए यहीं स्वर्ग है, बाप कहते भल यह स्वर्ग तुमको मुबारक हो। बाप तो गरीब निवाज़ है। गरीबों को दान देना है। गरीबों को सरेण्डर होना सहज होता है। हाँ, कोई बिरला साहूकार भी निकलता है। यह बहुत समझने की बातें हैं। देह का भान भी छोड़ना है। यह दुनिया ही खत्म होनी है, फिर हम बाबा के पास चले जायेंगे। सृष्टि नई बन जायेगी। कोई तो एडवान्स में भी जायेंगे। श्रीकृष्ण के माँ बाप भी तो एडवान्स में जाने चाहिए, जो फिर कृष्ण को गोद में लेंगे। कृष्ण से ही सतयुग शुरू होता है। यह बड़ी गुह्य बातें हैं। यह तो समझ की बात है – कौन माँ बाप बनेंगे? कौन सेकेण्ड नम्बर में आने लायक हैं। सर्विस से भी तुम समझ सकते हो। लक से भी कोई गैलप कर आगे आ जाते हैं। ऐसे हो रहा है, पिछाड़ी वाले बहुत फर्स्टक्लास सर्विस कर रहे हैं। रूप बसन्त तुम बच्चे हो। बाप को भी बसन्त कहा जाता है। है तो स्टार। इतना बड़ा तो है नहीं। परम आत्मा माना परमात्मा। आत्मा का रूप कोई बड़ा नहीं है। लेकिन मनुष्य कहाँ मूझें नहीं इसलिए बड़ा रूप दिखाया है। ऊंचे ते ऊंचा है शिवबाबा। फिर है-ब्रह्मा विष्णु शंकर। ब्रह्मा भी व्यक्त से अव्यक्त बनता है और कोई चित्र है नहीं। विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। शंकर का पार्ट सूक्ष्मवतन तक है। यहाँ स्थूल सृष्टि पर आकर पार्ट बजाने का नहीं है, न पार्वती को अमरकथा सुनाते हैं। यह सब भक्ति मार्ग की कथायें हैं। यह शास्त्र फिर भी निकलेंगे। उनमें कुछ आटे में नमक जितना सच है। जैसे श्रीमत भगवत गीता अक्षर राइट है। फिर कह देते श्रीकृष्ण भगवान.. यह बिल्कुल रांग। देवताओं की महिमा अलग, ऊंच ते ऊंच है ही परमपिता परमात्मा। जिसको सब याद करते हैं, उनकी महिमा अलग है। सब एक कैसे हो सकते हैं। सर्वव्यापी का अर्थ ही नहीं निकलता।

तुम हो रूहानी सैलवेशन आर्मी, परन्तु गुप्त हो। स्थूल हथियार आदि तो हो न सकें। यह ज्ञान के बाण, ज्ञान कटारी की बात है। मेहनत है, पवित्रता में। बाप से पूरी प्रतिज्ञा करनी है। बाबा हम पवित्र बन स्वर्ग का वर्सा जरूर लेंगे। वर्सा बच्चों को ही मिलता है। बाप आकर आशीर्वाद करते हैं, माया रावण तो श्रापित करती है। तो ऐसे मोस्ट बिलवेड बाप के साथ कितना प्यार चाहिए। बच्चों की निष्काम सेवा करते हैं। पतित दुनिया, पतित शरीर में आकर तुम बच्चों को हीरे जैसा बनाए खुद निर्वाणधाम में बैठ जाते हैं। इस समय तुम सबकी वानप्रस्थ अवस्था है इसलिए बाबा आया है सबकी ज्योति जग जाती है तो सब मीठे बन जाते हैं। बाबा जैसा मीठा बनना है। गाते हैं ना – कितना मीठा कितना प्यारा.. लेकिन बाबा कितना निरहंकार से तुम बच्चों की सेवा करते हैं। तुम बच्चों को भी इतनी रिटर्न सर्विस करनी चाहिए। यह हॉस्पिटल कम युनिवर्सिटी तो घर-घर में होनी चाहिए। जैसे घर-घर में मन्दिर बनाते हैं। तुम बच्चियां 21 जन्म के लिए हेल्थ वेल्थ देती हो श्रीमत पर। तुम बच्चों को भी श्रीमत पर चलना है। कहाँ अपनी मत दिखाई तो तकदीर को लकीर लग जायेगी। किसको दु:ख मत दो। जैसे महारथी बच्चे सर्विस कर रहे हैं वैसे फालो करना है। तख्तनशीन बनने का पुरूषार्थ करना है। अच्छा –

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप समान निरहंकारी बन सेवा करनी है। बाप की जो सेवा ले रहे हैं उसका दिल से रिटर्न देना है, बहुत मीठा बनना है।

2) चलते फिरते अपना समय नहीं गंवाना है.. शिवबाबा के गले का हार बनने के लिए रेस करनी है। देह भी याद न पड़े….. इसका अभ्यास करना है।

वरदान:- परमात्म चिंतन के आधार पर सदा बेफिक्र रहने वाले निश्चयबुद्धि, निश्चिंत भव
दुनिया वालों को हर कदम में चिंता है और आप बच्चों के हर संकल्प में परमात्म चिंतन है इसलिए बेफिक्र हो। करावनहार करा रहा है आप निमित्त बन करने वाले हो, सर्व के सहयोग की अंगुली है इसलिए हर कार्य सहज और सफल हो रहा है, सब ठीक चल रहा है और चलना ही है। कराने वाला करा रहा है हमें सिर्फ निमित्त बन तन-मन-धन सफल करना है। यही है बेफिक्र, निश्चिंत स्थिति।
स्लोगन:- सदा सन्तुष्टता का अनुभव करना है तो सबकी दुआयें लेते रहो।

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