omshanti murli

Daily Murli Brahma Kumaris 26 may 2017 – Bk Murli Hindi

[wp_ad_camp_5]

Read Murli 25 May 2017 :- Click Here

26/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – बाप आया है तुम्हारी सब शुद्ध कामनायें पूरी करने, रावण अशुद्ध कामना पूरी करता और बाप शुद्ध कामना पूरी करता”
प्रश्नः- जो बाप की श्रीमत का उल्लंघन करते हैं – उनकी अन्तिम गति क्या होगी?
उत्तर:- श्रीमत का उल्लंघन करने वालों को माया के भूत अन्त में राम-राम संग है… करके घर ले जायेंगे। फिर बहुत कड़ी सजा खानी पड़ेगी। श्रीमत पर न चले तो यह मरे। धर्मराज पूरा हिसाब लेता है, इसलिए बाप बच्चों को अच्छी मत देते, बच्चे माया की बुरी मत से सावधान रहो। ऐसा न हो बाप का बनकर फिर कोई विकर्म हो जाए और 100 गुणा दण्ड भोगना पड़े। श्रीमत पर न चलना, पढ़ाई छोड़ना ही अपने ऊपर बददुआ, अकृपा करना है।
गीत:- ओम् नमो शिवाए…

 

ओम् शान्ति। यह परमपिता परमात्मा की महिमा भक्त लोग गाते हैं। कहते भी हैं हे भगवान हे शिवबाबा, यह किसने कहा? आत्मा ने अपने बाबा को याद किया क्योंकि आत्मा जानती है हमारा लौकिक बाप भी है और यह है पारलौकिक बाप, शिवबाबा। वह आते भी हैं भारत में और एक ही बार अवतार लेते हैं। गाते भी हैं हे पतित-पावन आओ, भ्रष्टाचारी पतितों को श्रेष्ठाचारी पावन बनाने के लिए। परन्तु सब अपने को पतित भ्रष्टाचारी समझते नहीं हैं। सब एक किसम के भी नहीं होते हैं। हर एक का पद अपना-अपना होता है। हर एक के कर्मों की गति न्यारी होती है, एक न मिले दूसरे से। बाप बैठ समझाते हैं – तुम बाप को न जानने के कारण इतने आरफन पतित बन गये हो। कहते भी हैं पतित-पावन, सर्व के सद्गति दाता आप हो। फिर गीता वा गंगा पतित-पावनी कैसे हुई। तुमको इतना बेसमझ किसने बनाया है? इन पांच विकारों रूपी रावण ने। अभी सभी रावण राज्य अथवा शोक वाटिका में हैं। हेड जो हैं उन्हों को तो बहुत फिकरात रहती है। सब दु:खी हैं, इसलिए पुकारते हैं हे बाबा आप आओ, हमको स्वर्ग में ले चलो। सदैव निरोगी, बड़ी आयु वाले, शान्ति सम्पन्न, धनवान बनाओ। बाप तो सुख शान्ति का सागर है ना। मनुष्य की यह महिमा नहीं हो सकती। भल मनुष्य अपने को शिवोहम् भी कहलाते हैं, परन्तु हैं पतित। बाप समझाते हैं – तुम बाप को सर्वव्यापी कहते हो, इससे तो कोई भी बात ठहरती नहीं। भक्ति भी चल नहीं सकती क्योंकि भगत भगवान को याद करते हैं। भगवान एक है, भक्तियां अनेक हैं। जब सब मुझ भगवान को पत्थर ठिक्कर में ठोक खुद भी पत्थरबुद्धि बन जाते हैं, तब मुझे आना पड़ता है। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा पावन दुनिया की स्थापना कराते हैं। यह प्रजापिता ब्रह्मा के एडाप्टेड बच्चे हैं, कितने ढेर बच्चे हैं। अभी भी वृद्धि को पायेंगे। जो ब्राह्मण बनेंगे वही फिर देवता बनेंगे। पहले तुम शूद्र थे। फिर ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण बने फिर देवता क्षत्रिय बनेंगे। यह चक्र फिरता है। यह बाप ही समझाते हैं। यह मनुष्य सृष्टि है, सूक्ष्मवतन में हैं फरिश्ते। वहाँ कोई झाड़ नहीं है। यह मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ यहाँ है। तो बाप आकर इस ज्ञान अमृत का कलष माताओं के सिर पर रखते हैं। वास्तव में कोई अमृत नहीं है। यह है नॉलेज। बाप आकर सहज राजयोग की शिक्षा देते हैं। बाप कहते हैं मैं तो निराकार हूँ, नम्बरवन मनुष्य के तन में प्रवेश करता हूँ। खुद कहते हैं जब मैं ब्रह्मा तन में प्रवेश करूँ तब तो ब्राह्मण सप्रदाय हो। ब्रह्मा यहाँ ही चाहिए। वह सूक्ष्मवतन वासी तो अव्यक्त ब्रह्मा है। मैं इस व्यक्त में प्रवेश करता हूँ, इनको फरिश्ता बनाने के लिए। तुम भी अन्त में फरिश्ते बन जाते हो। तुम ब्राह्मणों को यहाँ ही पवित्र बनना है। फिर पवित्र दुनिया में जाकर जन्म लेंगे। तुम दोनों हिंसा नहीं करते हो। काम कटारी चलाना सबसे तीखी हिंसा है, जिससे मनुष्य आदि मध्य अन्त दु:ख पाते हैं। द्वापर से लेकर काम कटारी चलाते आये हैं, तब ही गिरना शुरू होता है। मनुष्य के पास है भक्ति की नॉलेज। वेद शास्त्र पढ़ना, भक्ति करना। गाते भी हैं ज्ञान, भक्ति, वैराग्य। भक्ति के बाद ही बाबा सारी दुनिया से वैराग्य दिलाते हैं क्योंकि इस पतित दुनिया का विनाश होना है इसलिए देह सहित देह के सभी सम्बन्धियों आदि को भूल जाओ। मुझ एक के साथ बुद्धियोग लगाओ। ऐसी प्रैक्टिस हो जो अन्त समय कोई भी याद न पड़े। इस पुरानी दुनिया का त्याग कराया जाता है। बेहद का सन्यास बेहद का बाप ही कराते हैं। पुनर्जन्म तो सबको लेना है, नहीं तो इतनी वृद्धि कैसे होती। हद के सन्यासियों द्वारा पवित्रता का बल भारतवासियों को मिलता है। भारत जैसा पवित्र खण्ड और कोई होता नहीं, बाप की यह बर्थ प्लेस है। परन्तु मनुष्य जानते नहीं, बाप कैसे अवतार लेते हैं, क्या करते हैं। कुछ भी जानते नहीं। ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात भी कहते हैं। दिन अर्थात् स्वर्ग, रात अर्थात् नर्क। जानते नहीं। ब्रह्मा की रात तो तुम बच्चों की भी रात। ब्रह्मा का दिन तो तुम बच्चों का भी दिन हो जाता है। रावण राज्य में सब दुर्गति को पाये हुए हैं। अभी तुम बच्चे बाप द्वारा सद्गति को पा रहे हो। तुम इस समय हो ईश्वरीय औलाद। परमपिता परमात्मा का बच्चा ब्रह्मा उनके तुम एडाप्टेड बच्चे, तो शिवबाबा के पोत्रे ठहरे। यह पुत्र ब्रह्मा भी सुनते तो तुम पोत्रे पोत्रियां भी सुनते हो। अभी फिर यह ज्ञान प्राय: लोप हो जायेगा। यह राजयोग बाप ही आकर सिखलाते हैं। सन्यासियों का पार्ट ही अलग है और तुम आदि सनातन देवी-देवता धर्म वालों का पार्ट ही अलग है। वहाँ देवताओं की आयु भी बड़ी रहती है। अकाले मृत्यु नहीं होती है। वहाँ देवतायें आत्म-अभिमानी होते हैं। परमात्म-अभिमानी नहीं। फिर माया की प्रवेशता होने से देह-अभिमानी बन जाते हैं। इस समय तुम आत्म-अभिमानी भी हो तो परमात्म-अभिमानी भी हो। इस समय तुम जानते हो हम परमात्मा की सन्तान हैं, परमात्मा के आक्यूपेशन को जानते हैं। यह शुद्ध अभिमान हुआ। अपने को शिवोहम् या परमात्मा कहना यह अशुद्ध अभिमान है। तुम अभी अपने को भी और परमात्मा को भी जान गये परमात्मा द्वारा। तुम जानते हो परमपिता परमात्मा कल्प-कल्प आते हैं। भक्ति मार्ग में भी अल्पकाल का सुख वह देते हैं। बाकी वह चित्र तो जड़ हैं। तुम जिस मनोकामना से पूजा आदि करते हो तो मैं तुम्हारी सब शुद्ध कामनायें पूरी करता हूँ। अशुद्ध कामना तो रावण पूरी करता है। बहुत रिद्धि सिद्धि आदि सीखते हैं। वह है रावण मत। मैं हूँ ही सुख दाता। मैं किसको दु:ख नहीं देता हूँ। कहते हैं दु:ख सुख ईश्वर ही देते हैं। यह भी मेरे ऊपर कलंक लगाते हैं। अगर ऐसा है तो बुलाते ही क्यों हो। परमात्मा रहम करो, क्षमा करो। जानते हैं, धर्मराज के द्वारा बहुत दण्ड खिलायेंगे।

बाप समझाते हैं बच्चे भक्ति मार्ग के इन शास्त्रों आदि में कोई सार नहीं है। अभी तुमको भक्ति अच्छी नहीं लगती। ऐसे भी नहीं कहते हो कि हे भगवान। आत्मा दिल अन्दर याद करती है। बस यह है अजपाजाप। आत्माओं से निराकार बाप बात करते हैं। आत्मा सुनती है। अगर कहे सर्वव्यापी है फिर तो सब परमात्मा हो गये। बाप कहते हैं कितने पत्थरबुद्धि बन गये हैं। मनुष्यों को तो बड़ा डर रहता है, कहाँ गुरू बद्दुआ न दे। बाप तो है सुखदाता। बद्दुआ अथवा अकृपा तो बाप बच्चों के ऊपर करते ही नहीं। बच्चे श्रीमत पर नहीं चलते, पढ़ते नहीं तो अकृपा अपने ऊपर करते हैं। बाप कहते हैं बच्चे मुझ एक बाप को याद करो। सतयुग त्रेता में भक्ति होती नहीं। अब रात है तो मनुष्य धक्का खाते रहते हैं, तब कहा जाता है सतगुरू बिगर घोर अन्धियारा। सतगुरू ही आकर सारे चक्र का राज़ समझाते हैं कि तुम देवता थे फिर क्षत्रिय बने, फिर वैश्य शूद्र बनें। ऐसे 84 जन्म पूरे किये। 8 पुनर्जन्म सतयुग में, 12 पुनर्जन्म त्रेता में, फिर 63 जन्म द्वापर कलियुग में। चक्र को फिरना ही है। यह बातें मनुष्य नहीं जानते। यही भारत विश्व का मालिक था और कोई खण्ड नहीं था। जब झूठ खण्ड शुरू होता है तो फिर और-और खण्ड भी होते हैं। अब तो देखो लड़ाई झगड़ा कितना है। यह है ही आरफन्स की दुनिया, बाप को नहीं जानते। रड़ियाँ मारते रहते हैं हे परमात्मा… बाप कहते हैं मैं एक ही बार आता हूँ, पतित दुनिया को पावन बनाने। बापू के लिए समझते थे कि रामराज्य स्थापन करते हैं, उनको बहुत पैसे देते थे। परन्तु वह पैसा कभी अपने काम में नहीं लगाते थे। फिर भी रामराज्य तो हुआ नहीं। यह तो है शिवबाबा, दाता है ना। सिर्फ समझाते हैं विनाश तो होना ही है, इससे तुम पैसे को सफल करो। यह सेन्टर आदि खोलो। बोर्ड लगा दो एक बाप से आकर स्वर्ग का वर्सा ले लो सेकेण्ड में। बाप कहते हैं मेरी याद से ही तुम पावन बनेंगे। तुम्हारी बुद्धि में यह चक्र फिरना चाहिए। ब्राह्मण ही यज्ञ के रक्षक बनते हैं। यह है रुद्र ज्ञान यज्ञ, कृष्ण का यज्ञ नहीं। सतयुग में यज्ञ होते नहीं। यह है ज्ञान यज्ञ। बाकी सब हैं भक्ति के यज्ञ। अनेक प्रकार के शास्त्र यज्ञ में रखते हैं। चौं-चौं का मुरब्बा बना देते हैं, उसको ज्ञान यज्ञ नहीं कहेंगे। बाबा कहते हैं मुझ, रूद्र का ज्ञान यज्ञ रचा हुआ है। जो मेरी मत पर चलेंगे उनको बड़ा इनाम मिलेगा, विश्व की बादशाही। तुम बच्चों को मुक्ति, जीवन मुक्ति की सौगात देता हूँ। बाबा कहते हैं मनुष्यों की तो 84 लाख योनियां रखी, और मुझे तो कण-कण में डाल दिया है फिर भी मैं पर-उपकारी सेवाधारी हूँ। तुम रावण की मत पर मुझे गाली देते आये हो। यह भी ड्रामा बना हुआ है। अभी तुम बच्चों को कदम-कदम श्रीमत पर चलना है। बाप अच्छी मत देंगे, माया बुरी मत देगी इसलिए खबरदार रहना। मेरा बनकर फिर कोई विकर्म किया तो सौगुणा दण्ड पड़ जायेगा। योगबल से फिर शरीर भी पवित्र मिलेगा। सन्यासी लोग तो कह देते हैं आत्मा निर्लेप है बाकी शरीर पतित है इसलिए गंगा स्नान करते हैं। अरे आत्मा सच्चा सोना नहीं होगी तो जेवर सच्चे सोने का कैसे बनेगा। इस समय 5 तत्व भी तमोप्रधान हैं।

यह तुम्हारी रूहानी गवर्मेन्ट बड़े ते बड़ी है, परन्तु देखो तुमको सर्विस करने के लिए 3 पैर पृथ्वी के भी नहीं मिलते हैं, फिर तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ। विश्व की बादशाही ऐसी देता हूँ जो वहाँ कोई खिटपिट नहीं कर सकते। आसमान, सागर आदि सबके मालिक बन जाते हो। कोई भी हद नहीं रहती। अभी तो बिल्कुल कंगाल बन पड़े हैं। अभी फिर तुम विश्व के मालिक बन रहे हो तो श्रीमत पर चलना पड़े। श्रीमत पर न चला तो यह मरा। माया के भूत राम-राम संग है करके घर ले जायेंगे। सजा बड़ी कड़ी खायेंगे। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) यज्ञ की प्यार से सेवा कर, कदम-कदम पर श्रीमत पर चलते बाप से मन-इच्छित फल अर्थात् विश्व की बादशाही लेनी है।

2) विनाश तो होना ही है – इसलिए अपना सब कुछ सफल कर लेना है। पैसा है तो सेन्टर खोल अनेको के कल्याण के निमित्त बनना है।

वरदान:- परमात्म प्यार में धरती की आकर्षण से ऊपर उड़ने वाले मायाप्रूफ भव
परमात्म प्यार धरनी की आकर्षण से ऊपर उड़ने का साधन है। जो धरनी अर्थात् देह-अभिमान की आकर्षण से ऊपर रहते हैं उन्हें माया अपनी ओर खींच नहीं सकती। कितना भी कोई आकर्षित रूप हो लेकिन माया की आकर्षण आप उड़ती कला वालों के पास पहुंच नहीं सकती। जैसे राकेट धरनी की आकर्षण से परे हो जाता है। ऐसे आप भी परे हो जाओ, इसकी विधि है न्यारा बनना वा एक बाप के प्यार में समाये रहना – इससे मायाप्रूफ बन जायेंगे।
स्लोगन:- स्व स्थिति को ऐसा शक्तिशाली बनाओ जो परिस्थितियां उसे नीचे ऊपर न कर सकें।

[wp_ad_camp_1]

 

Read Murli 24 May 2017 :-  Click Here

Read Murli 23 May 2017 :- Click Here

Daily Murli 12 May 2017 BK DAINIK GYAN MURLI (Hindi)

[wp_ad_camp_1]

To Read Murli 11/05/2017 :- Click Here

12/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

मीठे बच्चे – अपने इस जीवन को कौड़ी से हीरे जैसा बनाना है तो समय को सफल करो, अवगुणों को निकालो, खाने-पीने, सोने में समय बरबाद मत करो
प्रश्नः- मनुष्यों ने किस एक शब्द से सबको भगवान का रूप समझ लिया है?
उत्तर:- बाबा कहता इस समय मैं बहुरूपी हूँ, ऐसे नहीं यहाँ जब मुरली चलाता तो परमधाम खाली हो जाता है, मुझे तो इस समय बहुत काम करने पड़ते हैं, बहुत सर्विस चलती है। बच्चों को, भक्तों को साक्षात्कार कराना पड़ता है। इस समय मैं बहुरूपी हूँ, इसी एक शब्द से मनुष्यों ने कहा है यह सब भगवान के रूप हैं।
प्रश्नः- बाप की किस श्रीमत को पालन करने वाले बच्चे सपूत हैं?
उत्तर:- बाबा कहते बच्चे कभी भी डिस सर्विस न करो, टाइम बहुत वैल्युबुल है, इसे सोने में न गँवाओ। कम से कम 8 घण्टा मेरे खातिर दो। यह श्रीमत पालन करने वाले सपूत हैं।
गीत:- तूने रात गँवाई सोके…

 

ओम् शान्ति। बच्चों को बाप समझा रहे हैं। बच्चे जानते हैं – हम सब बच्चे हैं बाप के। हमारे शरीर का बाप तो है ही शारीरिक लेकिन आत्मा जो अशरीरी है उसका बाप भी अशरीरी है। बाप ने समझाया है बेहद के बाप से बेहद सुख का वर्सा मिलता है। अभी शुरू होता है जो त्रेता अन्त तक चलता है। तुम अभी पुरूषार्थ कर रहे हो, भविष्य 21 जन्मों की प्रालब्ध लिए। फिर बाद में हद का शुरू होता है, बेहद का पूरा हो जाता है। यह गुह्य बातें हैं ना। जानते हैं आधाकल्प हम हद के बाप से वर्सा लेते और बेहद के बाप को याद करते आये हैं। आत्मा के सम्बन्ध में सभी ब्रदर्स हैं। वह है बाप। कहते भी हैं हम आत्मायें भाई-भाई हैं फिर जब मनुष्य सृष्टि की रचना रची जाती है तो भाई बहन हो जाते हैं। यह नई रचना है ना। पीछे फिर परिवार बढ़ता है। काका, चाचा, मामा सब पीछे होते हैं। इस समय बाप रचना रच रहे हैं। बच्चे और बच्चियाँ हैं, दूसरा कोई सम्बन्ध नहीं है। अब तुम जीते जी भाई बहन बन जाते हो। दूसरे कोई सम्बन्ध से तैलुक नहीं है। अभी तुमको नया जन्म मिल गया है। जानते हो हम अभी ईश्वरीय सन्तान हैं। शिव वंशी ब्रह्माकुमार कुमारियाँ हैं। ब्रह्माकुमार कुमारियों का और कोई सम्बन्ध नहीं। इस समय सारी दुनिया पतित है, इनको पावन बनाना पड़े। कहते हैं बाबा हम आपके हैं। बाप कहते हैं बच्चे भविष्य के लिए पुरूषार्थ करके अपना जीवन हीरे जैसा बनाना है। सारा दिन सिर्फ खाना पीना, रात को सोना और बाप को याद न करना…इससे कोई हीरे जैसा जन्म नहीं मिलेगा। बाप कहते हैं – शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करते, गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान बनना है। समझते हैं हम कौड़ी से हीरे जैसा अर्थात् मनुष्य से देवता बन रहे हैं। मनुष्यों में तो बहुत अवगुण हैं। देवताओं में गुण होते हैं तब तो मनुष्य देवताओं के आगे जाकर अपने अवगुण बताते हैं ना। आप सर्वगुण सम्पन्न… हम पापी नींच हैं। अब बाप कहते हैं अपने से आसुरी गुणों को निकाल ईश्वरीय दैवी गुण धारण करने हैं। बाप तो है निराकार, मनुष्य सृष्टि का बीजरूप। वह सत है, चैतन्य है, ज्ञान का सागर है। यह ज्ञान तो बुद्धि में बैठा हुआ है ना। यह है नया ज्ञान। कोई वेद शास्त्रों में यह ज्ञान नहीं है। अभी जो तुम सुनते हो यह फिर प्राय: लोप हो जायेगा। अभी तुम जानते हो हम आसुरी गुण वाले मनुष्य से दैवीगुण धारण कर बाप द्वारा देवता बन रहे हैं। पापों का बोझा जो सिर पर है वह बाप की याद से हम भस्म करते हैं। भक्ति मार्ग में तो यही सुनाते आये हैं कि पानी में स्नान करने से पाप भस्म हो जायेंगे। परन्तु पानी से तो पावन बन नहीं सकते। अगर ऐसा होता तो फिर पतित-पावन बाप को क्यों याद करते। कुछ भी समझते नहीं हैं। समझदार और बेसमझ यह भी एक नाटक बना हुआ है। अभी तुम कितने समझदार बन रहे हो। सारे सृष्टि चक्र को जानते हो। हिस्ट्री-जॉग्राफी को जानना यह भी समझ है ना। अगर नहीं जानते हैं तो उनको बेसमझ कहेंगे ना।

अभी तुम बच्चे जानते हो। बाबा ने अपना परिचय अपने बच्चों को दिया है कि मैं आया हूँ तुमको हीरे जैसा बनाने। ऐसे नहीं यहाँ से सुनकर गये खाया पिया, जैसे आगे चलते थे .. वह तो कौड़ी जैसी लाइफ थी। देवताओं की हीरे जैसी लाइफ है। वह तो स्वर्ग में सुख भोगते थे। चित्र भी हैं ना। आगे तुम नहीं जानते थे कि हम ही सुखी थे, हम दु:खी हुए। हमने 84 जन्म कैसे लिए – यह नहीं जानते थे। अब मैं बताता हूँ। अभी तुम औरों को भी समझाने लायक बने हो। बाप समझदार बनाते हैं तो फिर औरों को समझानी देनी चाहिए। ऐसे नहीं घर में जाने से फिर वही पुरानी चाल हो जाए। शिक्षा पाकर फिर औरों को शिक्षा दो। बाप का परिचय देने जाना पड़ता है। बेहद का बाप तो सबका एक ही है। सभी धर्म वाले उनको ही पुकारते हैं, हे परमपिता परमात्मा वा हे प्रभू। ऐसे कोई नहीं होगा जो परमात्मा को याद नहीं करता होगा। सभी धर्म वालों का बाप एक ही है। एक को सभी याद करते हैं। बाप से वर्सा पाने के सभी हकदार हैं। वर्से पर भी समझाना पड़े। बाप कौन सा वर्सा देते हैं? मुक्ति और जीवनमुक्ति। यहाँ तो सब जीवन बन्ध हैं। बाप आकर सबको रावण के बन्धन से छुड़ाते हैं। इस समय कोई भी जीवनमुक्त है नहीं क्योंकि रावण राज्य है। देह-अभिमानी हैं। देवतायें देही-अभिमानी होने से जानते हैं हम आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेते हैं। सिर्फ परमात्मा को नहीं जानते हैं। परमात्मा को जानें तो फिर सारे सृष्टि चक्र को जान जाएं। त्रिकालदर्शी सिर्फ तुम ही हो। ब्राह्मणों को ही बाप बैठ त्रिकालदर्शी बनाते हैं। जब देवतायें भी त्रिकालदर्शी नहीं तो उनकी जो वंशावली आती है उनमें भी यह ज्ञान नहीं रहता, तो फिर दूसरों में यह कहाँ से आयेगा। देने वाला भी एक ही है। यह सहज राजयोग की नॉलेज और कोई को हो नहीं सकती। देवी-देवता धर्म का शास्त्र भी तो होना चाहिए। तो ड्रामा अनुसार उन्हों को फिर शास्त्र बनाने पड़ते हैं। गीता भागवत आदि सब ऐसे ही फिर बनेंगे। ग्रंथ भी ऐसे बनेंगे। अभी ग्रंथ कितना बड़ा हो गया है। नहीं तो इतना छोटा था – हाथ से लिखा हुआ था। फिर वृद्धि में लाया है। यह भी ऐसे है। इनका अगर ग्रंथ बैठ बनाओ तो बहुत बड़ा हो जाए। परन्तु फिर उनको शार्ट किया जाता है। पिछाड़ी में बाप दो अक्षर कहते हैं – मनमनाभव। मैं तुमको सब वेदों शास्त्रों का सार समझाता हूँ। तो जरूर नाम तो लेना पड़ेगा ना। फलाने शास्त्र में यह-यह है। वह कोई धर्म का शास्त्र नहीं। भारत का धर्म एक ही है। बाकी वह किस धर्म के शास्त्र हैं, कब सिद्ध नहीं कर सकते। भारत का शास्त्र है ही एक गीता। गीता भी सर्व शास्त्र शिरोमणी गाई हुई है। गीता की महिमा तुम एक्यूरेट जानते हो। जिस गीता से बाप आकर भारत को स्वर्ग बनाते हैं। भारत के शास्त्र को मान बहुत मिलता है। परन्तु गीता का भगवान कौन था, उनको न जानने कारण झूठा कसम उठाते हैं। अब उनको करेक्ट करो। भगवान ने तो ऐसे कहा नहीं है कि मैं सर्वव्यापी हूँ।

बच्चे ने प्रश्न पूछा – शिवबाबा जब इधर आते हैं, मुरली चलाते हैं तो क्या परमधाम में भी हैं? बाबा कहते हैं इस समय तो हमको बहुत काम करने पड़ते हैं। बहुत सर्विस चलती है। कितने बच्चों को, भक्तों आदि को भी साक्षात्कार कराता हूँ। इस समय मैं बहुरूपी हूँ। बहुरूपी अक्षर से भी मनुष्यों ने समझा है – सब रूप उनके हैं। माया उल्टा लटका देती है, फिर बाप सुल्टा बनाते हैं। तुम बच्चे अभी मुक्तिधाम में जाने का पुरूषार्थ करते हो। तुम्हारी बुद्धि है मुक्तिधाम तरफ। ऐसा कोई मनुष्य पुरूषार्थ करा न सके जो तुमको बाप करा रहे हैं। अब अपना बुद्धियोग वहाँ लगाओ। जीते जी इस शरीर को भूलते जाओ। मनुष्य मरते हैं तो कहते हैं स्वर्ग पधारा फिर भी रोते रहते हैं। बाप के जो सपूत बच्चे होंगे वही बाप के मददगार बन सर्विस करेंगे। वह कभी डिससर्विस नहीं करेंगे। अगर कोई डिससर्विस करते हैं तो गोया अपनी करते हैं। बाबा कहते हैं मीठे बच्चे यह टाइम बहुत वैल्युबुल है। भविष्य 21 जन्म के लिए तुम कमाई करते हो। तुम जानते हो हमको विश्व की बादशाही मिलती है, कितनी भारी कमाई है तो उसमें लग जाना चाहिए। बाप को याद करना है। जैसे गवर्मेन्ट की सर्विस में 8 घण्टा रहते हैं। बाबा भी कहते हैं मेरे खातिर 8 घण्टा दो। रात को सोकर अपना समय बरबाद मत करो। दिन रात कमाई करनी है। यह तो बड़ी सहज सिर्फ बुद्धि की बात है। मनुष्य जब धन्धे पर जाते हैं तो पहले मन्दिर के सामने हाथ जोड़कर फिर दुकान पर जाते हैं। लौटते समय फिर भूल जाते हैं, घर याद आ जाता है। वह भी अच्छा है। परन्तु अर्थ कुछ भी नहीं जानते।

तुम बच्चों को कलकत्ते में तो बहुत अच्छी रीति समझाना चाहिए – काली माता का वहाँ बड़ा मान है। बंगाली लोगों की रसम-रिवाज अपनी होती है। ब्राह्मणों को मछली जरूर खिलाते हैं। बड़े आदमी अपने तलाव बनाए फिर उसमें मछलियाँ पालते हैं तो ब्राह्मणों को भी वह खिलायेंगे। अभी तुम पक्के वैष्णव बनते हो। प्रैक्टिकल में तुम विष्णु की पुरी में चलते हो। ऐसे नहीं कि वहाँ 4 भुजा वाले मनुष्य होंगे। लक्ष्मी-नारायण को विष्णु कहा जाता है। दो भुजा उनकी, दो उनकी। तुम लक्ष्मी की पूजा करते हो, वास्तव में विष्णु की करते हो। दोनों हैं ना। परन्तु इस समय महिमा माताओं की है। जगत अम्बा का गायन है। लक्ष्मी का भी नाम गाया हुआ है। बाप आकर माताओं द्वारा सबको सद्गति देते हैं। जगत अम्बा वही फिर राज राजेश्वरी बनती है। माँ की पूजा होती है। वास्तव में जगत अम्बा तो एक है ना। जैसे शिव का एक लिंग बनाते हैं वैसे फिर छोटे-छोटे सालिग्राम भी बनाते हैं। वैसे काली के भी छोटे मन्दिर बहुत हैं। वह जैसे माँ की सन्तान हैं। अभी बाप तुमको अपना बनाते हैं, इसको ही बलि चढ़ना कहा जाता है। तुम बलि चढ़ते हो उन पर, इस ब्रह्मा पर नहीं।

तो बाप समझाते हैं – अभी टाइम वेस्ट नहीं करना चाहिए। धन्धा आदि भल करो। अगर पैसा काफी है खाने के लिए तो फिर जास्ती माथा क्यों मारते हो। हाँ शिवबाबा के यज्ञ में देते हो तो जैसे विश्व की सेवा में लगाते हो। बाबा कहेंगे सेन्टर्स बनाओ, जहाँ यह बच्चियाँ मनुष्य को देवता बनाने का रास्ता बतावें। यह पढ़ाई कितनी फर्स्टक्लास है। बहुतों का कल्याण हो जायेगा। बाप कहते हैं लाख करोड़ कमाओ, परन्तु काम ऐसा करो जिससे भारत पावन बने, एवर हेल्दी बने। तुम भविष्य के लिए अभी पूरा वर्सा लेते हो। वहाँ गरीब तो कोई होते नहीं। वहाँ भी अभी की प्रालब्ध भोगते हो तो इतनी धारणा करनी चाहिए। तुम्हारा एक-एक पैसा हीरे समान है, इनसे भारत स्वर्ग बनता है। बाकी जो बचेगा वह तो खत्म हो जायेगा। जो कुछ पैसा बचे इस सर्विस में लगाओ। यह बड़े ते बड़ी हॉस्पिटल है। कई गरीब बच्चे कहते हैं हम 8 आना देते, मकान में ईट लगा दो। हम जानते हैं यहाँ से मनुष्य एवरहेल्दी बनेंगे। यहाँ तो ढेर आयेंगे। क्यू ऐसी लगेगी जो कब नहीं देखी हो। तो कितनी खुशी रहनी चाहिए, हम क्या से क्या बनते हैं। हम शिवबाबा से बेहद का वर्सा लेते हैं। बाप है निराकार ज्ञान का सागर। वह इस रथ में प्रवेश करते हैं। तो बच्चों को बहुत रहमदिल बनना चाहिए। अपने पर भी और दूसरों पर भी रहम करना चाहिए। अच्छा –

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) भारत को पावन बनाने की सेवा में अपना तन-मन-धन सफल करना है। पैसे को हीरा समझ स्वर्ग बनाने की सेवा में लगाना है, व्यर्थ नहीं गँवाना है।

2) भविष्य 21 जन्मों की प्रालब्ध बनाने के लिए दिन-रात कमाई जमा करनी है, समय बरबाद नहीं करना है। शरीर को भूलने का पुरूषार्थ करना है।

वरदान:- ज्ञान, गुण और शक्तियों रूपी खजाने द्वारा सम्पन्नता का अनुभव करने वाले सम्पत्तिवान भव
जिन बच्चों के पास ज्ञान, गुण और शक्तियों का खजाना है वे सदा सम्पन्न अर्थात् सन्तुष्ट रहते हैं, उनके पास अप्राप्ति का नाम-निशान नहीं रहता। हद के इच्छाओं की अविद्या हो जाती है। वह दाता होते हैं। उनके पास हद की इच्छा वा प्राप्ति की उत्पत्ति नहीं होती। वह कभी मांगने वाले मंगता नहीं बन सकते। ऐसे सदा सम्पन्न और सन्तुष्ट बच्चों को ही सम्पत्तिवान कहा जाता है।
स्लोगन:- मोहब्बत में सदा लवलीन रहो तो मेहनत का अनुभव नहीं होगा।

[wp_ad_camp_1]

To read Murli 10/05/2017 :- Click Here

To Read Murli 9/05/2017 :- Click Here

Font Resize