murli 5 december 2017

BRAHMA KUMARIS MURLI 5 DECEMBER 2017 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 5 December 2017

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05/12/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – तुम्हें लौकिक अलौकिक परिवार से तोड़ निभाना है, लेकिन किसी में भी मोह नहीं रखना है, मोह जीत बनना है”
प्रश्नः- कयामत का यह समय है, इसलिए बाप की कौनसी श्रेष्ठ मत सबको सुनाते रहो?
उत्तर:- बाप की श्रेष्ठ मत सुनाओ कि कयामत के पहले अपने पापों का हिसाब-किताब चुक्तू कर लो। अपना भविष्य श्रेष्ठ बनाने के लिए बाप पर पूरा-पूरा बलिहार जाओ। कयामत के पहले ज्ञान और योग से मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा ले लो। सारा पुरुषार्थ अभी ही करना है। बाप पर सब कुछ बलिहार करेंगे तो 21 जन्म के लिए मिल जायेगा। बाप का बनकर हर कदम पर डायरेक्शन लेते रहो।

ओम् शान्ति। बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। अभी तुमको 3 बाप से तोड़ निभाना है। भक्तिमार्ग में दो बाप से तोड़ निभाना होता है। जब सतयुग में हो तो एक बाप से तोड़ निभाना होता है। ठीक है ना? हिसाब बुद्धि में बैठता है? जिसका बनना होता है, उनसे तोड़ भी निभाना होता है इसलिए बाप कहते हैं लौकिक कुटुम्ब परिवार से भी तोड़ निभाना है अन्त तक। कोई लौकिक सम्बन्धी को चिट्ठी लिखते हो तो वाया पोस्ट आफिस जाती है। यहाँ भी बेहद के बाप को चिट्ठी लिखते हो, शिवबाबा केयरआफ ब्रह्मा। इन बातों को सिवाए तुम्हारे और कोई नहीं समझते। यहाँ कोई नया आदमी आकर बैठे और बाबा कहे, तुमको 3 बाप हैं, तो समझ न सके। एक है लौकिक बाप। दूसरा – यह संगमयुगी अलौकिक बाप और तीसरा पारलौकिक बाप तो सबका है ही। भक्ति मार्ग में भी है तो अभी भी है। यह कोई जानते नहीं। सिर्फ उनका गायन पूजन करते हैं। तुम बच्चे तीनों ही बाप की जीवन कहानी जानते हो। कितनी बातें समझानी पड़ती हैं।

सतयुग में सब सद्गति में हैं। सुखी ही सुखी हैं। सभी सुखधाम, शान्तिधाम में हैं। रावणराज्य में सभी दु:खी हैं। देवतायें वाममार्ग में जाते हैं तो गिरने लग पड़ते हैं। दिखलाते हैं सोने की द्वारिका पानी के नीचे चली गयी। यह चक्र फिरता रहता है। नई ऊपर में आयेगी तो पुरानी फिर नीचे चली जायेगी। फिर सतयुग नीचे जायेगा तो कलियुग ऊपर आ जायेगा। फिर सतयुग ऊपर कब आयेगा? 5 हजार वर्ष बाद। बच्चों की बुद्धि में यह सारा नॉलेज आ गया है। नॉलेज तो सहज है। सिर्फ योग की मेहनत करनी पड़ती है। कोई जास्ती याद करते हैं, कोई थोड़ा याद करते हैं। तो मात-पिता बच्चों को समझाते हैं – लौकिक सम्बन्धियों से भी तोड़ निभाना है। आज नहीं तो कल उन्हों की भी बुद्धि में बैठेगा। देखेंगे यह तो ठीक है। एक बाप को याद करना है। कोई भी साधू-सन्त गुरू आदि को याद नहीं करना है। याद चैतन्य को भी करते हैं तो जड़ को भी करते हैं। सतयुग में कोई में भी मोह नहीं रहता। वहाँ मोहजीत रहते हैं। यहाँ सबमें मोह रहता है। फ़र्क है ना। ड्रामा में हर एक युग की रसम-रिवाज अपनी-अपनी है। यह बाप बैठ समझाते हैं क्योंकि बाप ही नॉलेजफुल है। है यह भी बाप, वह भी बाप। वह भी क्रियेटर, यह भी क्रियेटर। ब्रह्मा द्वारा क्रियेट करते हैं। एडाप्ट करते हैं। एडाप्ट करना अर्थात् अपना बनाना। शूद्र धर्म वाले, जिनका बहुत जन्मों के भी अन्त का जन्म है, उनको बाप एडाप्ट करते हैं। तुम बच्चे बाप को जान गये हो और बाप द्वारा सृष्टि चक्र को भी जान चुके हो। बाप द्वारा क्या वर्सा मिलता है, उनको भी जान गये हो। तुम बड़े हो, समझते हो तब तो एडाप्ट हुए हो। बिगर समझ एडाप्ट कैसे होंगे। कोई को अपना बच्चा नहीं होता तो दूसरे को अपना बनाते हैं। साहूकार का ही बच्चा बनेंगे। गरीब का थोड़ेही बच्चा बनेंगे। बाप कहते हैं मुझे बच्चे चाहिए। जरूर एडाप्ट करेंगे। यह भी तुम जानते हो – एडाप्ट उनको करेंगे जिनको कल्प पहले किया है। जो कल्प पहले पार्ट चला है, वही एक्ट रिपीट होती जायेगी। जब मेरे बनेंगे तब उनको पढ़ाऊंगा। बाप को और घर को याद करो। सुखधाम और शान्तिधाम को याद करना – बहुत सहज है। परन्तु बुद्धि बड़ी विशाल चाहिए। छोटे बच्चे समझ नहीं सकेंगे। वह सिर्फ बाबा, बाबा कहेंगे और कोई के पास जायेंगे नहीं। यहाँ तो सब हैं गुप्त बातें। समझ भी है – बुद्धि को ताकत मिलती है। ताकत मिलने से सोने के बन जाते हैं। कोई कमजोर होते हैं तो उनको सोने का सोल्युशन पिलाते हैं। सोने का पानी भी बनाते हैं। यहाँ तो तुमको रूहानी नॉलेज मिल रही है। यह नॉलेज ही इनकम है। नॉलेज तो सबको एक ही मिलती है, फिर जो पुरुषार्थ करे। इसमें मूँझने वा घबराने की कोई बात नहीं। सिर्फ बाबा का बनना है। बाप के वर्से को याद करना है। सारा दिन तो निरन्तर याद कर नहीं सकेंगे। धन्धा आदि भी करना है। कोई को तो धन्धा आदि भी नहीं है, फिर भी याद नहीं कर सकते। जब तक कर्मातीत अवस्था नहीं हुई है, पुरुषार्थ करते रहना है। वह वायुमण्डल दिखाई पड़ेगा। समझेंगे अभी समय नजदीक आता जाता है। जब बहुत दु:ख आयेगा तो फिर भगवान को याद करते रहेंगे। मौत सामने दिखाई पड़ेगा। तुम्हारे में भी सबको अपनी अवस्था का मालूम पड़ जायेगा कि हमारी कमाई कम है। योग होगा तो आत्मा से खाद निकलती जायेगी। फिर बाबा भी बुद्धि का ताला ढीला करेंगे। मनुष्य बीमारी में ईश्वर को याद करते, डर रहता है। सब उनको याद कराते हैं – राम कहो, राम कहो। बाप भी कहते हैं बाप और वर्से को याद करते रहो। एक दो को सावधान कर उन्नति को पाना है। ऐसे नहीं पुरुष चले, स्त्री को न चलाये। यह जोड़ा है हाफ पार्टनर का, परन्तु आजकल हाफ पार्टनर भी समझते नहीं हैं। कोई-कोई इज्जत रखते हैं। नहीं तो आजकल बच्चे ऐसे निकल पड़े हैं जो बाप की मिलकियत को उड़ा देते हैं, माँ को पूछते भी नहीं। वहाँ तो यह सब बातें होती नहीं, कभी दु:ख नहीं होता। यहाँ पहले-पहले दु:ख ही मिलता है, सगाई की और लगी काम कटारी। देवियों को तलवार आदि दिखाते हैं। वास्तव में यह हैं ज्ञान के अलंकार। स्वदर्शन चक्र भी देवताओं को नहीं हैं। यह तुम ब्राह्मणों के हैं। गदा भी तुम्हारी निशानी है। ज्ञान की गदा से तुम माया पर जीत पाते हो। बाकी वहाँ ऐसी चीज़ों की दरकार नहीं रहती। वहाँ बड़ी मौज से रहते हैं। तपस्या करने की भी दरकार नहीं। वह तो तपस्या का फल है। सूक्ष्मवतन में हैं फरिश्ते। वह है फरिश्तों की दुनिया। यहाँ फरिश्ते नहीं रहते। देवताओं को देवता कहेंगे। वह हैं फरिश्ते और यहाँ हैं मनुष्य। सभी का अलग-अलग सेक्शन है। सतयुग में देवतायें राज्य करते हैं। वह है टाकी दुनिया। सूक्ष्मवतन में है मूवी दुनिया। दुनिया भी 3 हैं, मूलवतन, सूक्ष्मवतन और स्थूल वतन। तीन लोक कहते हैं ना। तुम्हारी बुद्धि में यह प्रैक्टिकल में है। मनुष्य तो सुनी-सुनाई पर चलते हैं। तुम अच्छी रीति जानते हो कि यह दुनिया का चक्र कैसे फिरता है। तीनों लोकों को जानते हो। सिवाए बाप के आदि-मध्य-अन्त का राज़ कोई बता नहीं सकते। कोई भी त्रिकालदर्शी है नहीं। यह थोड़ेही कोई जानते हैं कि मूलवतन में आत्मायें कहाँ, कैसे रहती हैं। तुम जानते हो वहाँ आत्माओं का झाड़ है। वहाँ से नम्बरवार आते हैं। हम सब आत्मायें बच्चे शिवबाबा की माला हैं। जैसे सिजरा बनाते हैं। क्रिश्चियन लोग भी झाड़ बनाते हैं। खुशी मनाते हैं। क्राइस्ट का बर्थ डे मनाते हैं। अभी तुम किसका बर्थ डे मनायेंगे? मनुष्यों को यह पता ही नहीं कि हमारा धर्म स्थापक कौन है? और सभी धर्म स्थापन करने वाले का हिसाब-किताब निकालते हैं। देवी-देवता धर्म किसने स्थापन किया, यह किसको पता नहीं है। बाप बैठ समझाते हैं, मैजारिटी माताओं की है। शक्तियों का मान बढ़ाना चाहिए। ऐसे नहीं कि हमको देह-अभिमान आ जाए, हम होशियार हैं। नहीं। फिर भी मान रखना है माता का। नाम ही है ब्रह्माकुमारी विश्वविद्यालय। ज्ञान का कलष माताओं के सिर पर रखते हैं। वह तीखी हैं। सरस्वती के हाथ में सितार दी है। कृष्ण और सरस्वती के कनेक्शन का भी पता नहीं है। सरस्वती ब्रह्मा की बेटी है। यह भी किसको मुश्किल पता होगा। हर एक बात अच्छी रीति समझाई जाती है।

बाप ने समझाया है – इस ज्ञान-योग के सिवाए कोई भी मुक्ति-जीवनमुक्ति पा नहीं सकते। और सब तो यह पढ़ेंगे भी नहीं। हर एक को अपना हिसाब-किताब चुक्तू करना है। पाप का दण्ड तो मिलता ही है। दुनिया वाले यह नहीं समझते कि अब कयामत का समय है। तुम्हारा सब पापों का हिसाब-किताब चुक्तू होता है। भविष्य के लिए इतना जमा करना है जो आधाकल्प चल सके। सारा पुरुषार्थ अभी करना है। बाप कहते हैं सब कुछ बलिहार कर दो तो उनका फल 21 जन्म के लिए मिल जायेगा। गरीब झट सौदा कर सकते हैं। जिनके पास लाख-करोड़ हैं, बुद्धि में बैठ न सके। बाप कुछ लेते नहीं हैं। कहते हैं – तुम ट्रस्टी होकर सम्भालो। श्रीमत पर तुम चलो। मैं तो जीता हूँ। कोई जीते जी भी ट्रस्ट में देते हैं। समझते हैं अचानक मर जाऊं तो झगड़ा पड़ जायेगा। बाबा भी जीते जी बैठा है। कहते हैं – बाप का बन डायरेक्शन लो। यह करूँ वा न करूँ। बाबा राय देंगे भल यह करो – हर एक की अवस्था पर मदार है। कोई विल भी कर लेते हैं। मोह भी बहुतों में है, जो अपने पाँव पर होगा उनको भी दे देंगे। बाप के पास कोई चालाक भी हैं – बच्चों को बांट कर बाकी अपने लिए रखते हैं। बस हम उनसे चलते हैं। ऐसे भी करते हैं। यह तो बेहद का बाप है। हर एक बच्चे को जानते हैं, ड्रामा को भी जानते हैं। समझते हैं इसमें पैसे की दरकार नहीं है। उस मिलेट्री पर गवर्मेन्ट का बहुत खर्चा होता है। तुम्हारा खर्चा कुछ भी नहीं। रात-दिन का फ़र्क है। तुम जानते हो यह सारी मिलकियत आदि खत्म हो जाने वाली है। हमको धरनी ही नई सतोप्रधान चाहिए। अभी तो तमोप्रधान है। लक्ष्मी का आह्वान करते हैं, तो सारे घर की सफाई करते हैं, शुद्ध घर में देवी आये।

बाबा ने समझाया है देवतायें इस धरती पर पैर नहीं रखते। वह सिर्फ साक्षात्कार कराते हैं। साक्षात्कार में पैर थोड़ेही धरनी पर होते हैं। मीरा भी ध्यान में देखती थी। यहाँ कोई देवता आ न सके। देवतायें सतयुग में होते हैं कलियुग में फिर उनके अगेन्स्ट है। देवताओं और असुरों की लड़ाई है नहीं। वास्तव में यह है माया से लड़ाई। योगबल से माया पर जीत पहनाने वाला, सर्व का सद्गति दाता एक बाप है। पहले-पहले है ही रुद्र माला। वहाँ इस माला को कोई जानते ही नहीं। तुम संगमयुग पर ही जानते हो कि ब्राह्मणों की माला तो बन न सके। पीछे है फिर विष्णु की माला। यह सब हैं डिटेल की बातें। कोई कहते हैं हमें धारणा नहीं होती है। अच्छा कोई हर्जा नहीं है। बाप को याद करना तो सहज है ना। तुम बाप को कैसे भूलते हो। जिस बाप से स्वर्ग का वर्सा मिलता है। जबरदस्त आमदनी है। फिर भी माया बुद्धि का योग हटा देती है। साजन जो श्रृंगार कराए महारानी बनाते हैं, ऐसे साजन को भूल जाते हैं। आधाकल्प माया का राज्य चलता है। अभी तुम माया पर जीत पाकर जगतजीत बनते हो।

यह सारी दुनिया कैसे चलती है – तुम आदि से अन्त तक जानते हो। नाटक देखकर आते हैं, उसमें मालूम पड़ता है पिछाड़ी में अब यह सीन होगी। इसमें ऐसे नहीं है। तुम जानते हो सेकण्ड बाई सेकण्ड जो चलता है सो ड्रामा। ड्रामा के पट्टे पर मजबूत रहना है। जो कुछ हो जाता, ड्रामा। नाराज़ होने की कोई बात नहीं। कोई ने शरीर छोड़ा उनको जाए अपना पार्ट बजाना है। एक शरीर छोड़ दूसरा लिया। तुम्हारी बुद्धि में यह स्वदर्शन चक्र फिरता रहना चाहिए। तुमको शंखध्वनि करनी है, बाप का परिचय देना है। हाथ में चित्र हो कि यह लक्ष्मी-नारायण भारत के मालिक थे। अभी कलियुग है। फिर बाप आया है – राज्य भाग्य देने। हम ब्रह्माकुमार-कुमारी पढ़ रहे हैं, दादे से वर्सा ले रहे हैं। तुमको भी लेना हो तो लो। यह है तुम्हारा निमंत्रण फिर बहुत आयेंगे, वृद्धि होती जायेगी। शिव जयन्ती पर भी अच्छा ही आवाज होगा। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) ड्रामा के पट्टे पर मजबूत रहना है। किसी भी बात में नाराज़ नहीं होना है। सदा राज़ी रहना है।

2) एक दो को सावधान कर उन्नति को पाना है। धन्धा आदि करते भी बाप की याद में रहने का पुरुषार्थ करना है।

वरदान:- सेवा के बंधन द्वारा कर्म-बन्धनों को समाप्त करने वाले विश्व सेवाधारी भव 
प्रवृत्ति में रहते हुए कभी यह नहीं समझो कि हिसाब-किताब है, कर्मबन्धन है…लेकिन यह भी सेवा है। सेवा के बन्धन में बंधने से कर्मबन्धन खत्म हो जाता है। जब तक सेवा भाव नहीं होता तो कर्मबन्धन खींचता है। कर्मबन्धन होगा तो दु:ख की लहर आयेगी और सेवा का बन्धन होगा तो खुशी होगी इसलिए कर्मबन्धन को सेवा के बंधन से समाप्त करो। विश्व सेवाधारी विश्व में जहाँ भी हैं, विश्व सेवा अर्थ हैं।
स्लोगन:- अपने दैवी स्वरूप की स्मृति में रहो तो आप पर किसी की व्यर्थ नज़र नहीं जा सकती।

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TODAY MURLI 5 DECEMBER 2017 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 5 DECEMBER 2017

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05/12/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you have to fulfil your responsibilities to your worldly and your spiritual families, but you mustn’t have attachment to anyone. Become conquerors of attachment.
Question: This is the time of settlement. Therefore, what elevated directions should you continue to tell everyone about?
Answer: The Father’s elevated directions that you have to tell everyone are: Settle the karmic accounts of your sins before the time of settlement. In order to make your future elevated, surrender yourself completely to the Father. Claim your inheritance of liberation and liberation-in-life before the time of settlement with knowledge and yoga. Only at this time do you have to make all this effort. If you surrender everything to the Father, everything you receive in return will be for 21 births. For as long as you belong to the Father, continue to take directions at every step.

Om shanti. The Father sits here and explains to you children. You now have to fulfil your responsibilities to three fathers. On the path of devotion you have to fulfil your responsibilities to two fathers. When you are in the golden age, you have to fulfil your responsibility to one father. This is right, is it not? Does this calculation sit in your intellects? You have to fulfil your responsibility to whomever you belong. This is why the Father says: You have to fulfil your responsibilities to your worldly family etc. till the end. When you write a letter to your worldly relatives, it goes via the post office. Here, too, when you write a letter to the unlimited Father you write: Shiv Baba, c/o Brahma. No one, apart from you, understands these things. If a new person comes and sits here while Baba tells you that you have three fathers, he wouldn’t be able to understand it. One is a worldly father; the second is the spiritual, confluence-aged father and the third is the Father from beyond who is the Father of all. He exists on the path of devotion and also now. No one knows this. They simply remember Him and worship Him. You children know the biographies of all three fathers. So many things have to be explained. In the golden age, all are in salvation and there is nothing but happiness. All are in the land of happiness or the land of peace. In the kingdom of Ravan, all are unhappy.

When deities go on to the path of sin they begin to fall. It is shown that the golden Dwaraka went beneath the water. This cycle continues to turn; the new world will come up and the old one will then go down below. The golden age will go down below and the iron age will come up above. So, when will the golden age come up again? After 5000 years. All of this knowledge is now in the intellects of you children. This knowledge is easy. You simply have to make effort for yoga. Some remember Him a great deal whereas others only remember Him a little. Therefore, the Mother and Father explain to the children. You also have to fulfil your responsibilities to your worldly relatives. If not today, then tomorrow, it will sit in their intellects. They will see that this is fine. You have to remember the one Father. You mustn’t remember any sages, holy men or gurus etc. They remember the living and the non-living. Those in the golden age don’t have attachment to anyone. They are all conquerors of attachment there whereas everyone here has attachment. There is this difference. In the drama, the customs and systems of every age are their own. The Father sits here and explains this because the Father is knowledgefull. That One is the Father and this one is also the father. This one is a creator and that One is also the Creator. He creates through Brahma; He adopts you. To adopt means to make you belong to Him. Those who belong to the shudra religion, who are now in the last of many births, are adopted by the Father. You children now know the Father and you have also come to know the world cycle from Him. You also know what inheritance you receive from the Father. You are mature and able to understand and this is why you are adopted. How could you be adopted unless you had understanding? If someone doesn’t have a child of his own, he adopts the child of someone else. They would only be adopted by wealthy parents; they would not be adopted by poor parents. The Father says: I want children. He will definitely adopt you. You also know that He will adopt those whom He adopted in the previous cycle. The part that was enacted in the previous cycle will continue to be enacted now. When you belong to Me, I will teach you. Remember the Father and the home. It is very easy to remember the land of happiness and the land of peace. However, you need a very broad and unlimited intellect. Little children would not be able to understand. They simply say: Baba, Baba! They would not go to anyone else. Here, everything is incognito. You have the understanding that the intellect receives strength. When it receives strength it becomes golden. When some people are weak, they are given a solution of gold to drink. They even make a gold water solution. Here, you are receiving spiritual knowledge. This knowledge is your income. Everyone receives the same knowledge and it then depends on how much effort you make. There is no question of becoming confused or afraid about this. You simply have to belong to Baba. Remember the Father’s inheritance. You would not be able to remember Baba constantly throughout the day; you also have to do your business etc. Some don’t have any business and yet they are unable to remember Baba. Until you reach your karmateet stage, you have to continue to make effort. That atmosphere will be visible. You will also understand that that time is now coming close. When a lot of sorrow comes, they will begin to remember God. Death will be visible just ahead. You, too, will all come to know your stage. You will realise that you are earning very little. When you have yoga, the alloy continues to be removed from you souls. Then, Baba will also loosen the locks on your intellects. People remember God when they are ill because they are afraid. Everyone reminds them to remember God: Say, “Rama, Rama!” The Father also says: Continue to remember the Father and the inheritance. Caution one another and continue to make progress. It shouldn’t be that the husband follows this path but doesn’t allow his wife to do so. Here, you couples are half-partners. However, nowadays, they don’t consider one another to be half-partners. Some maintain that honour. Otherwise, children nowadays are such that they squander their father’s wealth and don’t even care about their mother. None of these things happen there. There is never sorrow there. Here, you first of all receive sorrow. As soon as you get married you are hit by the sword of lust. Goddesses are shown with swords etc. In fact, those ornaments are of knowledge. The discus of self-realisation doesn’t belong to the deities; it belongs to you Brahmins. The mace is also your symbol. You conquer Maya with the mace of knowledge. There is no need for such things there. There, you live in great comfort. You don’t even need to do tapasya. That is the fruit of tapasya. There are angels in the subtle region. That is the world of angels. Angels don’t reside here. Deities are called deities. Those are angels whereas here, there are human beings. Everyone’s section is separate. Deities rule in the golden age. That is the world of ‘talkie . The subtle region is the world of ‘movi e’. There are three worlds: the incorporeal world, the subtle region and the corporeal world. They speak of three worlds. You have this in your intellects in a practical way. People simply continue to move along according to whatever they have heard. You know very clearly how the world cycle turns. You know all three worlds. No one, apart from the Father, can tell you the secrets of the beginning, the middle and the end. No one is trikaldarshi. No one knows how or where souls reside in the incorporeal world. You know that there is the tree of souls in the incorporeal world. Souls continue to come down from there, numberwise. All of us souls, us children, are the rosary of Shiv Baba. That is like a genealogical tree. Christians also have a tree and they celebrate with happiness: they celebrate the birthday of Christ. Whose birthday will you now celebrate? People (of Bharat) don’t know who the founder of their religion is. They have a proper calculation of all the other founders of religions, but no one knows who established the deity religion. The Father sits here and explains. Women are in the majority. Regard for the Shaktis should be increased. Don’t think that you have to have body consciousness and consider yourselves to be clever, no. You have to give regard to the mothers. The very name is Brahma Kumaris World Spiritual University. The urn of knowledge is placed on the heads of the women. They are clever. They have shown Saraswati holding a sitar. They don’t even know the connection between Krishna and Saraswati. Saraswati is the daughter of Brahma. Hardly anyone knows this. Everything is explained very clearly. The Father has explained that without this knowledge and yoga no one can attain liberation and liberation-in-life. Not everyone will study this. Each one has to settle his own accounts. Punishment for sins committed is definitely received. People of the world don’t understand that it is now the time of settlement. The accounts of all your sins are now being settled. You have to accumulate so much for the future that it can last for half the cycle. You have to make all the effort at this time. The Father says: Surrender everything and you will receive the fruit of that for 21 births. Poor ones are able to make this deal quickly. You would not be able to make this sit in the intellects of those who have hundreds of thousands or millions. The Father doesn’t really take anything. It is said: Look after it all as a trustee . Follow shrimat! I am living. Some set up a trust while they are alive because they think that there will be quarrelling if they die suddenly. Baba is alive, sitting here. He says: Belong to the Father and take directions as to whether you should do something or not. Baba will advise you whether you may do something. Everything depends on each one’s stage. Some even make a will. Many have a lot of attachment, so they would even give to those who are standing on their own feet. The father also has some clever children. They distribute everything to their children and then also keep something for themselves. “We will continue to live on this.” There are some who also do this. That is the unlimited Father. He knows each and every child. He also knows the drama. People understand that there is no need for money here. In that military, the Government has a lot of expense. You don’t have any expense. There is the difference of day and night. You know that all of this property etc. is going to be destroyed. We want a new, satopradhan land; it is tamopradhan at present. When people invoke Lakshmi, they clean their whole home thinking that the goddess would come in a clean home. Baba has explained that deities don’t set foot on this land. They simply give a vision. In visions, their feet are not on the ground. Meera also used to see them in visions. None of the deities can come here. Deities exist in the golden age. Everything is against the deities in the iron age. There is no battle between deities and devils. In fact, this is the battle with Maya. The Bestower of Salvation for All, who enables you to conquer Maya with the power of yoga, is only the one Father. First of all, there is the rosary of Rudra. There, no one knows this rosary. Only at the confluence age do you come to know that a rosary of Brahmins cannot be created. Afterwards, there is the rosary of Vishnu. All of these things are the detail. Some say that they are unable to imbibe knowledge. OK, it doesn’t matter. It is easy to remember the Father, is it not? How can you forget the Father? The Father from whom you receive the inheritance of heaven? It is such a great income! Nevertheless, Maya still removes your intellect’s yoga. You forget the Bridegroom who decorates you and makes you into an empress! For half the cycle, the kingdom of Maya continues. You are now conquering Maya and becoming conquerors of the world. How does this whole world continue? You know it from the beginning to the end. When you go home after seeing a play, you are aware of what the scene at the end was. It is not like that here. You know that whatever happens, second by second , is the drama. You have to remain firmly on the rails of the drama. Whatever happens is the drama. There is no question of becoming upset. If someone sheds his body, he has to go and play his part. He sheds a body and takes another. The discus of self-realisation should continue to spin in your intellects. You have to blow the conch shell and give the Father’s introduction. You should have a picture in your hand: This Lakshmi and Narayan were the masters of Bharat and it is now the iron age. The Father has come once again to give you your fortune of the kingdom. We Brahma Kumars and Kumaris are studying. We are claiming our inheritance from our Grandfather. If you want to claim it, you can. This is your invitation. Many will come later; there will continue to be expansion. The sound will spread very well even at Shiva Jayanti. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Remain firmly on the rails of the drama. Don’t become upset about anything. Stay constantly happy.
  2. Caution one another and continue to make progress. While doing your business, make effort to stay in remembrance of the Father.
Blessing: May you be a world server and finish your karmic bondages with the bond of service.
While living at home with your family, never think that it is a karmic account or a karmic bondage, for that too is service. When you are tied in the bond of service, your karmic bondages finish. Until and unless there is the motive to serve, karmic bondages will pull you. When there are karmic bondages, there will be waves of sorrow whereas when there is the bond of service, there will be happiness. Therefore, finish your karmic bondages with the bond of service. Wherever in the world a world server is, it is for world service.
Slogan: Maintain the awareness of your deity form and no one’s wasteful vision will fall on you.

*** Om Shanti ***

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