murli 30 November 2020

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 30 NOVEMBER 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 30 November 2020

Murli Pdf for Print : – 

30-11-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
मीठे बच्चे – “तन-मन-धन अथवा मन्सा-वाचा-कर्मणा ऐसी सर्विस करो जो 21 जन्मों का बाप से एवज़ा मिले परन्तु सर्विस में कभी आपस में अनबनी नहीं होनी चाहिए”
प्रश्नः- ड्रामा अनुसार बाबा जो सर्विस करा रहे हैं उसमें और तीव्रता लाने की विधि क्या है?
उत्तर:- आपस में एकमत हो, कभी कोई खिट-खिट न हो। अगर खिट-खिट होगी तो सर्विस क्या करेंगे इसलिए आपस में मिलकर संगठन बनाए राय करो, एक दो के मददगार बनो। बाबा तो मददगार है ही परन्तु “हिम्मते बच्चे मददे बाप….” इसके अर्थ को यथार्थ समझकर बड़े कार्य में मददगार बनो।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे बच्चे यहाँ आते हैं रूहानी बाप के पास रिफ्रेश होने। जब रिफ्रेश होकर वापिस जाते हैं तो जरूर जाकर कुछ करके दिखलाना है। एक-एक बच्चे को सर्विस का सबूत देना है। जैसे कोई-कोई बच्चे कहते हैं हमारी सेन्टर खोलने की दिल है। गांवड़ों में भी सर्विस करते हैं ना। तो बच्चों को सदैव यह ख्याल रहना चाहिए कि हम मन्सा-वाचा-कर्मणा, तन-मन-धन से ऐसी सर्विस करें जो भविष्य 21 जन्मों का एवज़ा बाप से मिले। यही ओना है। हम कुछ करते हैं? कोई को ज्ञान देते हैं? सारा दिन यह ख्यालात आने चाहिए। भल सेन्टर खोलें परन्तु घर में स्त्री-पुरूष की अनबनी नहीं होनी चाहिए। कोई घमसान नहीं चाहिए। संन्यासी लोग घर के घमसान से निकल जाते हैं। डोंटकेयर कर चले जाते हैं। फिर गवर्मेन्ट उनको रोकती है क्या? वह तो सिर्फ पुरुष ही निकलते हैं। अभी कोई-कोई मातायें निकलती हैं, जिनका कोई धणी-धोणी नहीं होता या वैराग्य आ जाता है, उन्हों को भी वो संन्यासी पुरूष लोग बैठ सिखलाते हैं। उन द्वारा अपना धंधा करते हैं। पैसे आदि सारे उनके पास रहते हैं। वास्तव में घरबार छोड़ा तो फिर पैसे रखने की दरकार नहीं रहती। तो अब बाप तुम बच्चों को समझा रहे हैं। हर एक की बुद्धि में आना चाहिए – हमको बाप का परिचय देना है। मनुष्य तो कुछ नहीं जानते, बेसमझ हैं। तुम बच्चों के लिए बाप का फरमान है-मीठे-मीठे बच्चों, तुम अपने को आत्मा समझो, सिर्फ पण्डित नहीं बनना है। अपना भी कल्याण करना है। याद से सतोप्रधान बनना है। बहुत पुरूषार्थ करना है। नहीं तो बहुत पछताना पड़ेगा। कहते हैं बाबा हम घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। संकल्प आ जाते हैं। बाबा कहते हैं वह तो आयेंगे ही। तुमको बाप की याद में रह सतोप्रधान बनना है। आत्मा जो अपवित्र है, उनको परमपिता परमात्मा को ही याद कर पवित्र बनना है। बाप ही बच्चों को डायरेक्शन देते हैं – हे फरमानबरदार बच्चों – तुमको फरमान करता हूँ, मुझे याद करो तो तुम्हारे पाप कटेंगे। पहली-पहली बात ही यह सुनाओ कि निराकार शिवबाबा कहते हैं मुझे याद करो – मैं पतित-पावन हूँ। मेरी याद से ही विकर्म विनाश होंगे और कोई उपाय नहीं। न कोई बता सकते हैं। ढेर के ढेर संन्यासी आदि हैं, निमंत्रण देते हैं-योग कान्फ्रेन्स में आकर शामिल हो। अब उनके हठयोग से किसका कल्याण तो होना नहीं है। ढेर योग आश्रम हैं जिनको इस राजयोग का बिल्कुल पता ही नहीं है। बाप को ही नहीं जानते। बेहद का बाप ही आकर सच्चा-सच्चा योग सिखलाते हैं। बाप तुम बच्चों को आपसमान बनाते हैं। जैसे मैं निराकार हूँ। टेप्रेरी इस तन में आया हूँ। भाग्यशाली रथ तो जरूर मनुष्य का होगा। बैल को तो नहीं कहेंगे। बाकी कोई घोड़ेगाड़ी आदि की बात नहीं है। न लड़ाई की कोई बात है। तुम जानते हो हमको माया से ही लड़ाई करनी है। गाया भी जाता है माया ते हारे हार…….. तुम बहुत अच्छी रीति समझा सकते हो – परन्तु अब सीख रहे हो। कोई सीखते-सीखते भी एकदम धरनी पर गिर जाते हैं। कोई खिटखिट हो पड़ती है। दो बहनों की भी आपस में नहीं बनती, लून-पानी हो जाते हैं। तुम्हारी आपस में कोई भी खिट-खिट नहीं होनी चाहिए। खिट-खिट होगी तो बाप कहेंगे यह क्या सर्विस करेंगे। बहुत अच्छे-अच्छे का भी ऐसा हाल हो जाता है। अभी माला बनाई जाए तो कहेंगे डिफेक्टेड माला है। इनमें अजुन यह-यह अवगुण हैं। ड्रामा प्लैन अनुसार बाबा सर्विस भी कराते रहते हैं। डायरेक्शन देते रहते हैं। देहली में चारों ओर सेवा का घेराव डालो। यह सिर्फ एक को थोड़ेही करना है, आपस में मिलकर राय करनी है। सब एक मत होने चाहिए। बाबा एक है परन्तु मददगार बच्चों बिगर काम थोड़ेही करेंगे। तुम सेन्टर्स खोलते हो, मत लेते हो। बाबा पूछते हैं मदद करने वाले हो? कहते हैं-हाँ बाबा, अगर मदद देने वाले नहीं होंगे तो कुछ कर नहीं सकेंगे। घर में भी मित्र-सम्बन्धी आदि आते हैं ना। भल गाली दें, वह तुमको काटते रहेंगे। तुम्हें उसकी परवाह नहीं करनी है।

तुम बच्चों को आपस में बैठकर राय करनी चाहिए। जैसे सेन्टर्स खोलते हैं तो भी सब मिलकर लिखते हैं-बाबा हम ब्राह्मणी की राय से यह काम करते हैं। सिन्धी भाषा में कहते हैं – ब त बारा (एक के साथ 2 मिलने से 12 हो जाते) 12 होंगे तो और ही अच्छी राय निकलेगी। कहाँ-कहाँ एक-दो से राय नहीं लेते हैं। अब ऐसे कोई काम हो सकता है क्या? बाबा कहेंगे जब तक तुम्हारा आपस में संगठन ही नहीं तो तुम इतना बड़ा कार्य कैसे कर सकेंगे। छोटी दुकान, बड़ी दुकान भी होती है ना। आपस में मिलकर संगठन करते हैं। ऐसे कोई नहीं कहते बाबा आप मदद करो। पहले तो मददगार बनाने चाहिए। फिर बाबा कहते हैं – हिम्मते बच्चे मददे बाप। पहले तो अपने मददगार बनाओ। बाबा हम इतना करते हैं बाकी आप मदद दो। ऐसे नहीं, पहले आप मदद करो। हिम्मते मर्दा…… उनका भी अर्थ नहीं समझते। पहले तो बच्चों की हिम्मत चाहिए। कौन-कौन क्या मदद देते हैं? पोतामेल सारा लिखेंगे – फलाने-फलाने यह मदद देते हैं। कायदेसिर लिखकर देंगे। बाकी ऐसे थोड़ेही एक-एक कहेंगे हम सेन्टर खोलते हैं मदद दो। ऐसे तो बाबा नहीं खोल सकता है क्या? लेकिन ऐसे तो हो नहीं सकता। कमेटी को आपस में मिलना होता है। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं ना। कोई तो बिल्कुल कुछ भी नहीं समझते। कोई बहुत हर्षित होते रहते हैं। बाबा तो समझते हैं इस ज्ञान में बहुत खुशी रहनी चाहिए। एक ही बाप, टीचर, गुरू मिलता है तो खुशी होनी चाहिए ना। दुनिया में यह बातें कोई नहीं जानते। शिवबाबा ही ज्ञान सागर, पतित-पावन, सर्व का सद्गति दाता है। सबका फादर भी एक है। यह और कोई की बुद्धि में नहीं है। अभी तुम बच्चे जानते हो वही नॉलेजफुल, लिबरेटर, गाइड है। तो बाप की मत पर चलना पड़े। आपस में मिलकर राय करनी है। खर्चा करना है। एक की मत पर तो नहीं चल सकते। मददगार सब चाहिए। यह भी बुद्धि चाहिए ना। तुम बच्चों को घर-घर में मैसेज देना है। पूछते हैं – शादी में निमंत्रण मिलता है, जायें? बाबा कहते हैं-क्यों नहीं, जाओ, जाकर अपनी सर्विस करो। बहुतों का कल्याण करो। भाषण भी कर सकते हो। मौत सामने खड़ा है, बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। यहाँ सब पाप आत्मायें हैं। बाप को ही गाली देते रहते हैं। बाप से तुमको बेमुख कर देते हैं। गायन भी है विनाश काले विपरीत बुद्धि। किसने कहा? बाप ने खुद कहा है – मेरे से प्रीत बुद्धि नहीं हैं। विनाश काले विपरीत बुद्धि हैं। मुझे जानते ही नहीं। जिनकी प्रीत बुद्धि है, जो मुझे याद करते हैं, वही विजय पायेंगे। भल प्रीत है परन्तु याद नहीं करते हैं तो भी कम पद पा लेंगे। बाप बच्चों को डायरेक्शन देते हैं। मूल बात सबको मैसेज देना है। बाप को याद करो तो पावन बन, पावन दुनिया का मालिक बनो। ड्रामा अनुसार बाबा को लेना भी बूढ़ा शरीर पड़ता है। वानप्रस्थ में प्रवेश करते हैं। मनुष्य वानप्रस्थ अवस्था में ही भगवान से मिलने के लिए मेहनत करते हैं। भक्ति में तो समझते हैं – जप-तप आदि करना यह सब भगवान से मिलने के रास्ते हैं। कब मिलेगा वह कुछ पता नहीं। जन्म-जन्मान्तर भक्ति करते आये हैं। भगवान तो कोई को मिलता ही नहीं। यह नहीं समझते बाबा आयेंगे ही तब, जब पुरानी दुनिया को नया बनाना होगा। रचयिता बाप ही है, चित्र तो हैं परन्तु त्रिमूर्ति में शिव को नहीं दिखाते हैं। शिवबाबा बिगर ब्रह्मा-विष्णु-शंकर दिखाये हैं, जैसे गला कटा हुआ है। बाप के बिगर निधनके बन पड़ते हैं। बाप कहते हैं मैं आकर तुमको धनका बनाता हूँ। 21 जन्म तुम धनके बन जाते हो। कोई तकलीफ नहीं रहती। तुम भी कहेंगे – जब तक बाप नहीं मिला है, तो हम भी बिल्कुल निधनके तुच्छ बुद्धि थे। पतित-पावन कहते हैं – परन्तु वह कब आयेंगे, यह नहीं जानते। पावन दुनिया है ही नई दुनिया। बाप कितना सिम्पुल समझाते हैं। तुमको भी समझ में आता है, हम बाप के बने हैं, स्वर्ग के मालिक जरूर बनेंगे। शिवबाबा है बेहद का मालिक। बाप ने ही आकर सुख-शान्ति का वर्सा दिया था। सतयुग में सुख था – बाकी सब आत्मायें शान्तिधाम में थी। अभी इन बातों को तुम समझते हो। शिवबाबा क्यों आया होगा? जरूर नई दुनिया रचने। पतित को पावन बनाने आये होंगे। ऊंच कार्य किया होगा, मनुष्य बिल्कुल घोर अन्धियारे में हैं। बाप कहते हैं यह भी ड्रामा में नूँध है। तुम बच्चों को बाप बैठ जगाते हैं। तुमको अब इस सारे ड्रामा का पता है – कैसे नई दुनिया फिर पुरानी होती है। बाप कहते हैं और सब कुछ छोड़ एक बाप को याद करो। हमको कोई से ऩफरत नहीं आती। यह समझाना पड़ता है। ड्रामा अनुसार माया का राज्य भी होना है। अब फिर बाप कहते हैं – मीठे-मीठे बच्चों, अब यह चक्र पूरा होता है। अब तुमको ईश्वरीय मत मिलती है, उस पर चलना है। अब 5 विकारों की मत पर नहीं चलना है। आधाकल्प तुम माया की मत पर चल तमोप्रधान बने हो। अब मैं तुमको सतोप्रधान बनाने आया हूँ। सतोप्रधान, तमोप्रधान का यह खेल है। ग्लानि की कोई बात नहीं। कहते हैं भगवान ने यह आवागमन का नाटक ही क्यों रचा? क्यों का सवाल ही नहीं उठता। यह तो ड्रामा का पा है, जो फिर रिपीट होता रहता है। ड्रामा अनादि है। अभी है कलियुग, सतयुग पास्ट हो गया है। अब फिर बाप आये हैं। बाबा-बाबा कहते रहो तो कल्याण होता रहेगा। बाप कहते हैं यह अति गुह्य रमणीक बातें हैं। कहते हैं शेरनी के दूध लिये सोने का बर्तन चाहिए। सोने की बुद्धि कैसे बनेगी? आत्मा में ही बुद्धि है ना। आत्मा कहती है – मेरी बुद्धि अब बाबा तरफ है। मैं बाबा को बहुत याद करता हूँ। बैठे-बैठे बुद्धि और तरफ चली जाती है ना। बुद्धि में धन्धाधोरी याद आता रहेगा। तो तुम्हारी बात जैसे सुनेंगे नहीं। मेहनत है। जितना-जितना मौत नज़दीक आता जायेगा – तुम याद में बहुत रहेंगे। मरने समय सब कहते हैं भगवान को याद करो। अब बाप खुद कहते हैं मुझे याद करो। तुम सबकी वानप्रस्थ अवस्था है। वापिस जाना है इसलिए अब मुझे याद करो। दूसरी कोई बात नहीं सुनो। जन्म-जन्मान्तर के पापों का बोझा तुम्हारे सिर पर है। शिवबाबा कहते हैं इस समय सब अजामिल हैं। मूल बात है याद की यात्रा जिससे तुम पावन बनेंगे फिर आपस में प्रेम भी होना चाहिए। एक-दो से राय लेनी चाहिए। बाप प्रेम का सागर है ना। तो तुम भी आपस में बहुत प्यारे होने चाहिए। देही-अभिमानी बन बाप को याद करना है। बहन-भाई का संबंध भी तोड़ना पड़ता है। भाई-बहन से भी योग नहीं रखो। एक बाप से ही योग रखो। बाप आत्माओं को कहते हैं – मुझे याद करो तो तुम्हारी विकारी दृष्टि खलास हो जाए। कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म नहीं करना चाहिए। मन्सा में तूफान जरूर आयेंगे। यह बड़ी मंजिल है। बाबा कहते हैं देखो कर्मेन्द्रियां धोखा देती हैं तो खबरदार हो जाओ। अगर उल्टा काम कर लिया तो खलास। चढ़े तो चाखे बैकुण्ठ का मालिक….. मेहनत के सिवाए थोड़ेही कुछ होता है। बहुत मेहनत है। देह सहित देह के…. कोई-कोई को तो बन्धन नहीं है तो भी फँसे रहते हैं। बाप की श्रीमत पर नहीं चलते हैं। लाख दो हैं, भल बड़ा कुटुम्ब है तो भी बाबा कहेंगे जास्ती धन्धे आदि में नहीं फंसो। वानप्रस्थी बन जाओ। खर्चा आदि कम कर लो। गरीब लोग कितना साधारण चलते हैं। अभी क्या-क्या चीजें निकली हैं, बात मत पूछो। खर्चा ही खर्चा साहूकारों का चलता है। नहीं तो पेट को क्या चाहिए? एक पाव आटा। बस। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) आपस में बहुत-बहुत प्यारे बनना है लेकिन भाई-बहन से योग नहीं रखना है। कर्मेन्द्रियों से कोई भी विकर्म नहीं करना है

2) एक ईश्वरीय मत पर चलकर सतोप्रधान बनना है। माया की मत छोड़ देनी है। आपस में संगठन मजबूत करना है, एक-दो के मददगार बनना है।

वरदान:- अमृतवेले का महत्व जानकर खुले भण्डार से अपनी झोली भरपूर करने वाले तकदीरवान भव
अमृतवेले वरदाता, भाग्य विधाता से जो तकदीर की रेखा खिंचवाने चाहो खिंचवा लो क्योंकि उस समय भोले भगवान के रूप में लवफुल हैं इसलिए मालिक बनो और अधिकार लो। खजाने पर कोई भी ताला-चाबी नहीं है। उस समय सिर्फ माया के बहाने बाज़ी को छोड़ एक संकल्प करो कि जो भी हूँ, जैसी भी हूँ, आपकी हूँ। मन बुद्धि बाप के हवाले कर तख्तनशीन बन जाओ तो बाप के सर्व खजाने अपने खजाने अनुभव होंगे।
स्लोगन:- सेवा में यदि स्वार्थ मिक्स है तो सफलता भी मिक्स हो जायेगी इसलिए नि:स्वार्थ सेवाधारी बनो।

TODAY MURLI 30 NOVEMBER 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 30 November 2020

30/11/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, do such service with your body, mind and wealth, that is, with your thoughts, words and deeds, that you receive the return of it from the Father for 21 births. However, while serving, let there not be any disagreements with one another.
Question: What is the way to put intensity into the service that Baba inspires you to do according to the drama?
Answer: There should be unity and no conflict among yourselves. If there is any conflict, what service would you do? This is why you should all meet together and discuss everything among yourselves and help one another. Baba is your Helper anyway, but you have to understand the accurate meaning of “Children who maintain courage receive help from the Father”, and become helpers in this big task.

Om shanti. You sweetest children come here to the spiritual Father in order to be refreshed. Having been refreshed, you must definitely do something and show everyone when you get back. Each and every child has to give the proof of service. For instance, some children say that they want to open a centreService is also done in the villages. You children should always be thinking about serving through your thoughts, words, deeds, body, mind and wealth in such a way that you receive the return of that from the Father for your future 21 births. You should have this concern: Do I do anything? Do I give any knowledge to others? You should have these thoughts throughout the day. You may open a centre, but there shouldn’t be any disagreements between husband and wife at home; there shouldn’t be any chaos. Sannyasis run away from the chaos at home; they don’t care and simply go away. Does the Government try to stop them? It is just men who go away. Nowadays, some women who don’t have anyone or who have disinterest have emerged; sannyasis teach them too. They (sannyasis) carry out their business through them. They (the sannyasis) keep all the money. In fact, once they have left their homes, there is no need for them to keep any money. So the Father is now explaining to you children. It should enter the intellect of each one of you that you have to give the Father’s introduction. Human beings don’t understand anything; they are senseless. The Father’s order for you children is: Sweetest children, consider yourselves to be souls; don’t just be pundits. Also benefit yourselves; become satopradhan by having remembrance. You have to make a lot of effort. Otherwise, you will have to repent a great deal. Some say: Baba, I forget You again and again. I have many other thoughts. Baba says: They will come. You have to stay in remembrance of the Father and become satopradhan. Souls who have become impure have to become pure by remembering the Supreme Father, the Supreme Soul. The Father gives directions to the children: O obedient children, I instruct you to remember Me so that your sins will be cut away. The first thing you have to tell them is that incorporeal Shiv Baba says: Remember Me. I am the Purifier. It is by remembering Me that your sins will be absolved; there is no other method, nor can anyone show you any other method. There are so many sannyasis; they invite you to participate in yoga conferences. You know that no one is going to benefit through their hatha yoga. There are many yoga ashrams where they don’t know anything about Raja Yoga; they don’t even know the Father. The unlimited Father comes and teaches you true yoga. The Father makes you children the same as Himself. I am incorporeal and I take this body temporarily. “The Lucky Chariot” is definitely that of a human being; a bull would not be called that. It is not a question of a horse or chariot. There is no question of a battle either. You know that you only have to battle with Maya. It is remembered: Those who conquer Maya conquer the whole world. You can explain very well, but you are still learning. While learning, some fall down completely. There is a lot of conflict. Sometimes, even two sisters don’t get on well; they become like salt water. There shouldn’t be any conflict among yourselves. If there is any conflict, the Father would say: What service would you do? This is the condition of many good children. If the rosary were to be created now, it would be said to be a defective rosary. There are still certain defects in the children. According to the drama plan, Baba inspires you to do serviceHe continues to give directions. Go and lay siege to (encircle) Delhi. It isn’t just one who has to do this. Discuss this among yourselves. All of you should be in agreement. Baba is alone, but He is not going to carry out this task without His children who are His helpers. You open centres and take people’s opinions. Baba asks: Are you helpers? You reply: Yes Baba. If there were no helpers, nothing could be achieved. Friends and relatives come to your home. Even if they insult you or taunt you, you mustn’t be concerned about that. You children have to sit and have discussions among yourselves. When a centre is opened, they all sit together and write to Baba: Baba, we are doing all of this with the advice of the teacher. In the Sindhi language, they say, “Put 1 and 2 together and it becomes 12”. If there are 12 together, then very good advice will emerge. In some places they don’t even ask one another for advice. Can anything be done in that way? Baba would say: Until you have unity in your gathering, how can you carry out such a big task? There are small shops and big shops. They all gather together. No one says: Baba, You help us! First of all, you have to create your helpers. Then Baba says: When the children maintain courage, the Father gives help. First of all, create your own helpers. Baba, we are doing this much and You have to help with the rest. It isn’t that you first have to ask Baba for help. First, maintain courage and then… They don’t understand the meaning of this. First of all, you children have to have courage. Which children give help and in what form? Write the whole chart: This one gives this help. Everything has to be given in writing officially. It isn’t that each one would say: I am opening a centre and so help me! In that case, could Baba not open them? However, that is not possible. A committee has to get together. It is numberwise among you too; some don’t understand anything at all. Some remain very happy. Baba feels that you should remain very happy in this knowledge. You should have the happiness that you have now found the Father, Teacher and Guru in One. No one in the world knows these things. Shiv Baba alone is the Ocean of Knowledge, the Purifier and Bestower of Salvation for All. The Father of all is One. This is not in the intellect of anyone else. You children now know that He is the knowledge-full One, the Liberator and the Guide. So, you have to follow the Father’s directions. Get together and have a discussion among yourselves. When you have to spend money, you can’t just follow the directions of one person. Everyone has to help. You need to have that much wisdom. You children have to give this message to every home. Some ask: We have received a wedding invitation; should we go there? Baba says: Why not? Go and do service. Bring benefit to many. You can also give a lecture: “Death is just ahead. The Father says: Constantly remember Me alone.” Here, all are sinful souls. They continue to insult the Father. They turn you away from the Father. It is remembered that there are those with non-loving, divorced intellects at the time of destruction. Who said this? The Father, Himself, says: Their intellects don’t have love for Me; their intellects have no love at the time of destruction. They don’t know Me at all. Only those who have loving intellects and who remember Me will gain victory. Even if they do have love but don’t remember Me, they will claim a low status. The Father gives directions to the children. The main thing is to give everyone the message. Remember the Father and you will become pure and a master of the pure world. According to the drama, Baba has to take an old body on loan. He enters this one in his age of retirement. It is only in their age of retirement that people make effort to search for God. In devotion they believe that they will find the path to meet God by chanting and doing tapasya etc. They don’t know when they will find Him. They have been performing devotion for birth after birth. No one has found God. They don’t understand that Baba will come when the old world has to be made new again. Only the Father is the Creator. There is the picture, but they don’t show Shiva in the picture of the Trimurti. They have shown Brahma, Vishnu and Shankar without Shiv Baba; this is as though the head has been chopped off. Without the Father, they have become orphans. The Father says: I come and make you belong to the Lord and Master. You belong to the Lord and Master for 21 births. You don’t have any difficulty. You also say: Until we met the Father we were orphans and had degraded intellects. They speak of the Purifier, but they don’t know when He will come. The pure world is the new world. The Father explains everything so simply. You also understand that you now belong to the Father, and so you will definitely become the masters of heaven. Shiv Baba is the Master of the Unlimited. It was the Father who came and gave you the inheritance of peace and happiness. In the golden age, there was happiness and all the rest of the souls were in the land of peace. You now understand all of these things. Why would Shiv Baba have come? He would surely have come to make the world new and to purify the impure. He carries out an elevated task. Human beings are in total darkness. The Father says: This too is fixed in the drama. The Father sits here and awakens you children. You now know this whole drama of how the new world becomes old. The Father says: Now renounce everything and remember the one Father. We don’t dislike anyone. You have to explain this. According to the drama, there has to be the kingdom of Maya. The Father says: Sweetest children, this cycle is now coming to an end. You are now receiving God’s directions and you have to follow them. You must no longer follow the directions of the five vices. You have been following the directions of Maya for half the cycle and have become tamopradhan. I have now come to make you satopradhan. This is a play about becoming satopradhan and tamopradhan. It isn’t a question of defamation. Some ask: Why did God create this play of coming and going? The question of “Why” does not arise. This is the cycle of the drama and it continues to repeat. The drama is eternal. The golden age has passed and it is now the iron age. The Father has now come once again. Continue to say, “Baba, Baba” and you will continue to benefit. The Father says: These things are extremely deep and entertaining. It is said: A golden vessel is needed for the milk of a lioness. How will your intellects become golden? The intellect is in the soul. The soul says: My intellect now goes to Baba. I remember Baba a great deal. The intellect goes in other directions while just sitting somewhere. Your intellects continually remember your business etc. Then, it is as though your intellects don’t listen to you. This takes effort. As death comes closer, you will continue to stay in remembrance. At a time of death, everyone says: Remember God! The Father, Himself, now says: Remember Me! It is now the stage of retirement for all of you. You have to return home and this is why you have to remember Me. Don’t listen to anything else. Burdens of the sins of many births are on your heads. Shiv Baba says: At this time, all are like Ajamil. The main thing is the pilgrimage of remembrance through which you will become pure. There has to be a lot of love among yourselves. Take advice from one another. The Father is the Ocean of Love. Therefore, among yourselves, you should have a lot of love for one another. Be soul conscious and remember the Father. You even have to go beyond the relationship of brother and sister. Don’t have yoga with brothers or sisters. Have yoga with the one Father alone. The Father says to souls: Remember Me and your vicious vision will end. Don’t perform any sinful actions through your physical senses. Storms will definitely come into your minds. The destination is very high. Baba says: When you see that your physical senses are deceiving you, become very cautious. If you do something wrong, everything is finished. It is said: Those who ascend become the masters of heaven. Nothing can happen without your making effort. A lot of effort is required. Break all bodily relations, including that of your body. Some don’t have any bondage and yet they remain trapped; they don’t follow the Father’s shrimat. You may have 100,000 to 200,000 rupees and you may belong to a big family, but Baba still says: Don’t become trapped in your business too much. Become one who is in the stage of retirement. Reduce your expenses. Poor people live in such a simple way. Look at the inventions that have emerged now. Don’t even ask! Wealthy people have nothing but expenses. Otherwise, what does your stomach need? Just a quarter pound of flour, that’s all. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Be very loving to one another, but don’t have yoga with brothers or sisters. Don’t perform any sinful actions through the physical senses.
  2. Follow the directions of God and become satopradhan. Renounce the directions of Maya. Make the gathering among yourselves very strong and become one another’s helpers.
Blessing: May you be greatly fortunate and fill your apron from the open treasure-store by knowing the importance of amrit vela.
At amrit vela, you can get any line of fortune you want drawn by the Bestower of Blessings and the Bestower of Fortune because at that time, in the form of the Innocent Lord, He is full of love so, become a master and claim your right. There is no lock and key for this treasure. At that time, simply let go of making excuses of Maya and just have the one thought: Whoever I am, however I am, I am Yours. Surrender your mind and intellect to the Father and be seated on the heart-throne and you will experience all the Father’s treasures to be yours.
Slogan: If there is any selfishness mixed in service, success will then also be mixed and so become an altruistic server.

*** Om Shanti ***

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