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Daily Murli Brahma Kumaris 6 June 2017 – Bk Murli Hindi

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06/06/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – याद में रह अपने विकर्मों की प्रायश्चित करो तो विकर्माजीत बन जायेंगे, पुराने सब हिसाब-किताब चुक्तू हो जायेंगे”
प्रश्नः- किन बच्चों से हर बात का त्याग सहज हो जाता है?
उत्तर:- जिन बच्चों को अन्दर से वैराग्य आता है – वह हर बात का त्याग सहज ही कर लेते हैं, तुम बच्चों के अन्दर अब यह इच्छायें नहीं होनी चाहिए कि यह पहनूं, यह खाऊं, यह करूं… देह सहित सारी पुरानी दुनिया का ही त्याग करना है। बाप आये हैं तुम्हें हथेली पर बहिस्त देने तो इस पुरानी दुनिया से बुद्धियोग हट जाना चाहिए।
गीत:- माता ओ माता….

 

ओम् शान्ति। बच्चों ने अपने माँ की महिमा सुनी। बच्चे तो बहुत हैं समझा जाता है बरोबर बाप है तो जरूर माँ भी है। रचना के लिए माता जरूर होती है। भारत में माता के लिए बहुत अच्छी महिमा गाई जाती है। बड़ा मेला लगता है जगत अम्बा का, कोई न कोई प्रकार से माँ की पूजा होती है। बाप की भी होती होगी। वह जगत अम्बा है तो वह जगत पिता है। जगत अम्बा साकार में है तो जगत पिता भी साकार में है। इन दोनों को रचयिता ही कहेंगे। यहाँ तो साकार है ना। निराकार को ही कहा जाता है गॉड फादर। मदर फादर का राज़ तो समझाया गया है। छोटी माँ भी है, बड़ी माँ भी है। महिमा छोटी माँ की है, भल एडाप्ट करते हैं, माँ को भी एडाप्ट किया है, तो यह बड़ी माँ हो गई। परन्तु महिमा सारी छोटी माँ की है।

यह भी बच्चे जानते हैं हरेक को अपने कर्मभोग का हिसाब-किताब चुक्तू करना है क्योंकि विकर्माजीत थे फिर रावण ने विकर्मी बना दिया है। विक्रम संवत भी है तो विकर्माजीत संवत भी है। पहला आधाकल्प विकर्माजीत कहेंगे फिर आधाकल्प विक्रम संवत शुरू होता है। अभी तुम बच्चे विकर्मों पर जीत पाकर विकर्माजीत बनते हो। पाप जो हैं उनको योगबल से प्रायश्चित करते हैं। प्राश्चित होता ही है याद से। जो बाप समझाते हैं कि बच्चे याद करो तो पापों का प्राश्चित हो जायेगा अर्थात् कट उतर जायेगी। सिर पर पापों का बोझा बहुत है, जन्म-जन्मान्तर का। समझाया गया है कि जो नम्बरवन में पुण्य आत्मा बनता है वही फिर नम्बरवन पाप आत्मा भी बनता है। उनको बहुत मेहनत करनी पड़ेगी क्योंकि शिक्षक बनते हैं सिखाने के लिए तो जरूर मेहनत करनी पड़ेगी। बीमारी आदि होती है तो अपने ही कर्म कहे जाते हैं। अनेक जन्मों के विकर्म किये हैं, इस कारण भोगना होती है इसलिए कभी भी इससे डरना नहीं है। खुशी से पास करना है क्योंकि अपना ही किया हुआ हिसाब-किताब है। प्राश्चित होना ही है, एक बाप की याद से। जब तक जीना है तब तक तुम बच्चों को ज्ञान अमृत पीना है। योग में रहना है, विकर्म हैं तब तो खांसी आदि होती है। खुशी होती है, यहाँ ही सब हिसाब खत्म हो जाएं, रह जायेंगे तो पास विद ऑनर नहीं होगे। मोचरा खाकर मानी मिले तो भी बेइज्जती है ना। अनेक प्रकार के दु:ख की भोगना होती है। यहाँ अनेक प्रकार के दु:ख का पारावार नहीं। वहाँ सुख का पारावार नहीं रहता। नाम ही है स्वर्ग। क्रिश्चियन लोग कहते हैं हेविन। हेविनली गॉड फादर, इन बातों को तुम जानते हो। निवृत्ति मार्ग वाले सन्यासी तो कह देते हैं कि यह सब काग बिष्टा समान सुख है। इस दुनिया में बरोबर ऐसा है। भल कितना भी किसको सुख हो परन्तु वह है अल्पकाल का सुख। स्थाई सुख तो बिल्कुल नहीं है। बैठे-बैठे आपदायें आ जाती हैं, हार्टफेल हो जाती है। आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरे में जाकर प्रवेश करती है तो शरीर आपेही मिट्टी हो जाता। जानवरों के शरीर फिर भी काम में आते हैं, मनुष्य का काम नहीं आता है। तमोप्रधान पतित शरीर कोई काम का नहीं, कौड़ियों मिसल है। देवताओं के शरीर हीरे मिसल हैं। तो देखो उन्हों की कितनी पूजा होती है। यह समझ अभी तुम बच्चों को मिली है।

यह है बेहद का बाप, जो मोस्ट बिलवेड है, जिसको फिर आधाकल्प याद किया है। जो ब्राह्मण बनते हैं – वही बाप से वर्सा लेने के हकदार होते हैं। सच्चे ब्राह्मण बहुत प्युअर होने चाहिए। सच्चे गीता पाठी को पवित्र तो रहना ही है। वह झूठे गीता पाठी पवित्र नहीं रहते। अब गीता में तो लिखा हुआ है काम महाशत्रु है। फिर खुद गीता सुनाने वाले पवित्र कहाँ रहते हैं। गीता है सर्व शास्त्रमई शिरोमणी, जिससे बाप ने कौड़ी से हीरे तुल्य बनाया है। यह भी तुम समझते हो, गीतापाठी नहीं समझ सकते। वह तो तोते मुआफिक पढ़ते रहते हैं। महिमा सारी है ही एक की और किसी चीज़ की महिमा है नहीं। ब्रह्मा विष्णु शंकर की भी नहीं। तुम उनके आगे कितना भी माथा टेको, उनके आगे बलि चढ़ो तो भी वर्सा नहीं मिलेगा। काशी में काशी कलवट खाते हैं ना। अभी गवर्मेन्ट ने बन्द करा दिया है। नहीं तो बहुत काशी कलवट खाते थे। कुएं में जाकर कूदते थे। कोई देवी पर बलि चढ़ते थे, कोई शिव पर। देवताओं पर बलि चढ़ने का कोई फायदा नहीं। काली पर बलि चढ़ते, काली को कितना काला-काला बना दिया है। अभी तो हैं सभी आयरन एजड, जो पहले गोल्डन एजड थे। अम्बा एक को ही कहा जाता है। पिता को कभी अम्बा नहीं कहेंगे। अब यह कोई भी नहीं जानते। जगत अम्बा सरस्वती ब्रह्मा की बेटी है। ब्रह्मा जरूर प्रजापिता ही होगा। सूक्ष्मवतन में तो नहीं होगा। समझते भी हैं सरस्वती ब्रह्मा की बेटी है। ब्रह्मा की स्त्री तो बताते नहीं। बाप समझाते हैं, मैंने इस ब्रह्मा द्वारा बेटी सरस्वती को एडाप्ट किया है। बेटी भी समझती है, बाप एडाप्ट करते हैं। ब्रह्मा को भी एडाप्ट किया है। यह बहुत गुह्य बात है, जो कोई की भी बुद्धि में नहीं है। बाप तुमको अपना भी अन्त बैठकर देते हैं, सो तो जरूर सम्मुख ही देंगे ना। प्रेरणा से थोड़ेही देंगे। भगवानुवाच हे बच्चे… सो जरूर साकार में आवे तब तो कहेंगे ना, निराकार बाप इन द्वारा बैठ पढ़ाते हैं, ब्रह्मा नहीं पढ़ाते। ब्रह्मा को ज्ञान सागर नहीं कहा जाता है, एक ही बाप को कहा जाता है। आत्मा समझती है यह लौकिक बाप नहीं पढ़ाते, पारलौकिक बाप बैठ पढ़ाते हैं, जिससे वर्सा ले रहे हैं। वैकुण्ठ को परलोक नहीं कहा जाता। वह है अमरलोक, यह है मृत्युलोक। परलोक अर्थात् जहाँ हम आत्मायें रहती हैं, यह परलोक नहीं है। हम आत्मायें आती हैं इस लोक में। परलोक है हम आत्माओं का लोक। तुमने राज्य इस भारत में किया है, परलोक पर नहीं। परलोक का राजा नहीं कहेंगे। कहते हैं लोक परलोक सुहाले हो। यह है स्थूल लोक और फिर परलोक सुहाले बन जाते हैं। वही भारत वैकुण्ठ था फिर बनेगा। यह है मृत्युलोक, लोक में मनुष्य रहते हैं। कहते हैं वैकुण्ठ लोक में जावें। दिलवाला मन्दिर में भी नीचे तपस्या में बैठे हैं। ऊपर में वैकुण्ठ के चित्र बनाये हैं। समझते हैं फलाना वैकुण्ठ पधारा। परन्तु वैकुण्ठ तो यहाँ ही होता है, ऊपर में नहीं। आज जो यह पतित लोक है, वह फिर पावन लोक हो जायेगा। पावन लोक था अभी पास्ट हो गया है, इसलिए कहा जाता है परलोक। परे हो गया ना। भारत स्वर्ग था, अभी नर्क है तो स्वर्ग अभी परे हो गया ना। फिर ड्रामा अनुसार वाम मार्ग में जाते हैं तो स्वर्ग परे हो जाता है इसलिए परलोक कहते हैं।

अभी तुम कहते हो हम यहाँ आकर नई दुनिया में फिर से अपना राज्य भाग्य करेंगे। हर एक अपने लिए पुरूषार्थ करते हैं। जो करेगा सो पायेगा। सब तो नहीं करेंगे। जो पढ़ेगा लिखेगा वह होगा वैकुण्ठ का नवाब अर्थात् मालिक बनेंगे। तुम इस सृष्टि को सोने का बनाते हो। कहते हैं ना – द्वारिका सोने की थी फिर समुद्र के नीचे चली गई। कोई बैठी तो नहीं है जो निकालेंगे। भारत स्वर्ग था, देवतायें राज्य करते थे। अभी तो कुछ नहीं है। फिर सब कुछ सोने का बनाना पड़ेगा। ऐसे नहीं वहाँ सोने के महल निकालने से निकल आयेंगे, सब कुछ बनाने पड़ेंगे। नशा होना चाहिए हम प्रिन्स प्रिन्सेज बन रहे हैं। यह प्रिन्स-प्रिन्सेज बनने की कॉलेज है। वह है प्रिन्स प्रिन्सेज के पढ़ने की कॉलेज। तुम राजाई लेने के लिए पढ़ रहे हो। वह पास्ट जन्म में दान पुण्य करने से राजा के घर में जन्म ले प्रिन्स बने हैं। वह कॉलेज कितनी अच्छी होगी। कितने अच्छे कोच आदि होंगे। टीचर के लिए भी अच्छा कोच होगा। सतयुग त्रेता में जो प्रिन्स प्रिन्सेज होंगे उन्हों का कॉलेज कितना अच्छा होगा। कॉलेज में तो जाते होंगे ना। भाषा तो सीखेंगे ना। उन सतयुगी प्रिन्स प्रिन्सेज का कॉलेज और द्वापर के विकारी प्रिन्स प्रिन्सेज का कॉलेज देखो और तुम प्रिन्स प्रिन्सेज बनने वालों का कॉलेज देखो, कैसा साधारण है। तीन पैर पृथ्वी भी नहीं मिलती है। तुम जानते हो वहाँ प्रिन्स कैसे जाते हैं, कॉलेजेज़ में। वहाँ पैदल भी नहीं करना पड़ता। महल से निकले और यह एरोप्लैन उड़ा। वहाँ की कैसी अच्छी कॉलेजेज़ होंगी। कैसे सुन्दर बगीचे महल आदि होंगे। वहाँ की हर चीज नई सबसे ऊंच नम्बरवन होती है। 5 तत्व ही सतोप्रधान हो जाते हैं। तुम्हारी सेवा कौन करेंगे? यह 5 तत्व अच्छे ते अच्छी चीज़ तुम्हारे लिए पैदा करेंगे। जब कोई फल बहुत अच्छा कहाँ से निकलता है तो वह राजा रानी को सौगात भेजते हैं। यहाँ तो तुम्हारा बाप शिवबाबा है सबसे ऊंच, उनको तुम क्या खिलायेंगे! यह कोई भी चीज़ की इच्छा नहीं रखते, यह पहनूँ, यह खाऊं, यह करूँ,… तुम बच्चों को भी यह इच्छायें नहीं होनी चाहिए। यहाँ यह सब किया तो वहाँ वह कम हो जायेगा। अभी तो सारी दुनिया का त्याग करना है। देह सहित सब कुछ त्याग। वैराग्य आता है तो त्याग हो जाता है।

बाबा कहते हैं मैं तुम बच्चों को हथेली पर बहिश्त देने आया हूँ। तुम जानते हो बाबा हमारा है, तो जरूर उनको याद करना पड़े। जैसे कन्या की सगाई होती या लगन जुटती है तो कभी नहीं कहेगी कि हम पति को याद नहीं करती, क्योंकि वह लाईफ का मेल हो जाता है। वैसे ही बाप और बच्चों का मेल होता है। परन्तु माया भुला देती है। बाप कहते हैं मुझे याद करो और वर्से को याद करो। इसमें मुक्ति जीवन-मुक्ति आ जाती है। फिर तुमसे यह भूल क्यों जाता है! इसमें है बुद्धि का काम, जबान से भी कुछ बोलना नहीं होता है और निश्चय करना है। हम जानते हैं, पवित्र रह पवित्र दुनिया का वर्सा लेंगे। इसमें समझने की बात है, बोलने की बात नहीं। हम बाबा के बने हैं। शिवबाबा पतितों को पावन बनाने वाला है। कहते हैं मुझे याद करते रहो। इसका अर्थ ही है मनमनाभव। उन्होंने फिर कृष्ण भगवानुवाच लिख दिया है। पतित-पावन तो एक ही है। सर्व का सद्गति दाता एक, एक को ही याद करना है। कहते हैं मुझ एक बाप को भूलने के कारण कितनों को याद करते रहते हो। अभी तुम मुझे याद करो तो विकर्माजीत राजा बन जायेंगे। विकर्माजीत राजा और विक्रमी राजा का फ़र्क भी बताया ना। पूज्य से पुजारी बन जाते। नीचे आना ही है। वैश्य वंश, फिर शूद्र वंश। वैश्य वंशी बनना माना वाम मार्ग में आना। हिस्ट्री-जॉग्राफी तो सारी बुद्धि में है, इस पर कहानियां भी बहुत हैं। वहाँ मोह की भी बात नहीं रहती। बच्चे आदि बहुत मौज में रहते हैं, आटोमेटिक अच्छी रीति पलते हैं। दास दासियां तो आगे रहते ही हैं। तो अपनी तकदीर को देखो कि हम ऐसी कॉलेज में बैठे हैं जहाँ से हम भविष्य में प्रिन्स प्रिन्सेज बनते हैं। फ़र्क तो जानते हो ना। वह कलियुगी प्रिन्स प्रिन्सेज, वह सतयुगी प्रिन्स प्रिन्सेज… वह महारानी महाराजा, वह राजा-रानी। बहुतों के नाम भी हैं लक्ष्मी-नारायण, राधे-कृष्ण। फिर उन लक्ष्मी-नारायण और राधे-कृष्ण की पूजा क्यों करते हैं! नाम तो एक ही है ना। हाँ वह स्वर्ग के मालिक थे। अभी तुम जानते हो कि यह नॉलेज, शास्त्रों में नहीं है। अभी तुम समझ गये हो यज्ञ तप दान पुण्य आदि में कोई सार नहीं है। ड्रामा अनुसार दुनिया को पुराना होना ही है। मनुष्य मात्र को तमोप्रधान बनना ही है। हर बात में तमोप्रधान, क्रोध, लोभ सबमें तमोप्रधान। हमारे टुकड़े पर इनका दखल क्यों, मारो गोली। कितनी मारामारी करते हैं, आपस में कितना लड़ते हैं। एक दो का खून करने में भी देरी नहीं करते हैं। बच्चा समझता कहाँ बाप मरे वर्सा मिले… ऐसी तमोप्रधान दुनिया का अब विनाश होना ही है। फिर सतोप्रधान दुनिया आयेगी। अच्छा-

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद प्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) पुण्य आत्मा बनने के लिए याद की मेहनत करनी है। सब हिसाब-किताब समाप्त कर पास विद ऑनर हो इज्जत से जाना है इसलिए कर्मभोग से डरना नहीं है, खुशी-खुशी चुक्तू करना है।

2) सदा इसी नशे में रहना है कि हम भविष्य प्रिन्स-प्रिन्सेज बन रहे हैं। यह है प्रिन्स-प्रिन्सेज बनने की कॉलेज।

वरदान:- पुरूषार्थ की यथार्थ विधि द्वारा सदा आगे बढ़ने वाले सर्व सिद्धि स्वरूप भव
पुरूषार्थ की यथार्थ विधि है-अनेक मेरे को परिवर्तन कर एक “मेरा बाबा”-इस स्मृति में रहना और कुछ भी भूल जाए लेकिन यह बात कभी नहीं भूले कि “मेरा बाबा”। मेरे को याद नहीं करना पड़ता, उसकी याद स्वत: आती है। “मेरा बाबा” दिल से कहते हो तो योग शक्तिशाली हो जाता है। तो इस सहज विधि से सदा आगे बढ़ते हुए सिद्धि स्वरूप बनो।
स्लोगन:- मायाजीत बनना है तो स्नेह के साथ-साथ ज्ञान का भी फाउण्डेशन मजबूत करो।

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Daily Murli Brahma Kumaris 3 June 2017 – Bk Murli Hindi

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03/06/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – यह तुम सबकी वानप्रस्थ अवस्था है, वापस घर जाना है इसलिए बाप और घर को याद करो, पावन बनो, सब खाते खलास करो”
प्रश्नः- बाप ही बच्चों को कौन सा धीरज देते हैं?
उत्तर:- बच्चे, अभी इस रुद्र ज्ञान यज्ञ में अनेक प्रकार के विघ्न पड़ते हैं, परन्तु धीरज धरो, जब तुम्हारा प्रभाव निकलेगा, ढेर के ढेर आने लगेंगे फिर सब तुम्हारे आगे आकर माथा झुकायेंगे। बांधेलियों के बन्धन खलास हो जायेंगे। जितना तुम बाप को याद करेंगे, बंधन टूटते जायेंगे। तुम विकर्माजीत बनते जायेंगे।
गीत:- भोलेनाथ से निराला…

 

ओम् शान्ति। भोलानाथ सदैव शिव को ही कहते हैं, शिव-शंकर का भेद तो अच्छी तरह से समझा ही है। शिव तो ऊंच ते ऊंच मूलवतन में रहते हैं। शंकर तो है सूक्ष्मवतनवासी, उनको भगवान कैसे कह सकते हैं। ऊंच ते ऊंच रहने वाला है एक बाप। फिर दूसरे तबके में हैं 3 देवतायें। वह है बाप, ऊंच ते ऊंच निराकार। शंकर तो आकारी है। शिव है भोलानाथ, ज्ञान का सागर। शंकर को ज्ञान का सागर कह नहीं सकते। तुम बच्चे जानते हो शिवबाबा भोलानाथ आकर हमारी झोली भरते हैं। आदि मध्य अन्त का राज़ बता रहे हैं। रचता और रचना का राज़ बहुत सिम्पल है। बड़े-बड़े ऋषि मुनि आदि भी इन सहज बातों को जान नहीं सकते हैं। जब वह रजोगुणी ही नहीं जानते थे तो तमोगुणी फिर कैसे जानेंगे। तो अभी तुम बच्चे बाप के सम्मुख बैठे हो। बाप अमरकथा सुना रहे हैं। यह तो बच्चों को निश्चय है बरोबर हमारा बाबा (शिवबाबा) सच्ची-सच्ची अमरकथा सुना रहे हैं, इसमें कोई संशय नहीं होना चाहिए। कोई भी मनुष्य हमको यह नहीं सुना रहे हैं। भोलानाथ है शिवबाबा, कहते हैं मुझे अपना शरीर नहीं है। मैं हूँ निराकार, पूजा भी मुझ निराकार की ही करते हैं। शिव जयन्ती भी मनाते हैं, अब बाप तो जन्म मरण रहित है। वह है भोलानाथ। जरूर आकर सभी की झोली भरेगा। कैसे भरेगा, यह तुम बच्चे ही समझते हो। अविनाशी ज्ञान रत्नों की झोली भरते हैं। यही नॉलेज है, ज्ञान सागर आकर ज्ञान देते हैं। गीता तो वही एक ही है परन्तु संस्कृत श्लोक तो हैं नहीं। भोली मातायें संस्कृत आदि से क्या जानें! उन्हों के लिए ही भोलानाथ बाबा आते हैं। यह मातायें तो बिचारी घर के काम में ही रहती हैं। यह तो अभी फैशन पड़ा है जो नौकरी करती हैं। तो बाबा अब बच्चों को ऊंच ते ऊंच पढ़ाई पढ़ा रहे हैं, जो बिल्कुल कुछ भी नहीं पढ़े थे उन्हों पर पहले-पहले कलष रखते हैं पढ़ाई का। यूँ तो भक्तियां, सीतायें सब हैं। राम आये हैं रावण की लंका से मुक्त करने अर्थात् दु:ख से मुक्त करने। फिर तो बाप के साथ घर ही जायेंगे और कहाँ जायेंगे। याद भी घर को करते हैं, हम दु:ख से मुक्ति पावें। बच्चे जानते हैं बीच में किसको मुक्ति मिल नहीं सकती। सबको तमोप्रधान बनना ही है। मुख्य जो फाउन्डेशन है वह जल जाता है, वह धर्म ही प्राय: लोप हो जाता है। बाकी कुछ प्राय: चित्र आदि जाकर रहते हैं। लक्ष्मी-नारायण का चित्र भी गुम हो जाए तो यादगार कैसे मिलेगा? बरोबर जानते हैं देवी-देवतायें राज्य करते थे। उन्हों के चित्र भी अभी तक हैं। बच्चों को इस पर समझाना है। तुम जानते हो लक्ष्मी-नारायण बचपन में प्रिन्स प्रिन्सेज, राधे कृष्ण थे। फिर महाराजा महारानी बने हैं। वह हैं ही सतयुग के मालिक। देवतायें कभी पतित दुनिया में पैर नहीं धर सकते। श्रीकृष्ण तो है ही वैकुण्ठ का प्रिन्स। वह तो गीता सुना न सके। भूल भी कितनी भारी कर दी है। कृष्ण को भगवान कहा नहीं जा सकता। वह तो मनुष्य है, देवी-देवता धर्म का है। वास्तव में देवतायें ब्रह्मा विष्णु शंकर तो सूक्ष्मवतन में ही रहते हैं, यहाँ मनुष्य रहते हैं। मनुष्य को सूक्ष्मवतन वासी नहीं कह सकते हैं, ब्रह्मा देवताए नम:, विष्णु देवताए नम: कह देते हैं ना। वह है देवी-देवता धर्म। श्री लक्ष्मी देवी, श्री नारायण देवता। मनुष्य को ही 84 जन्म लेने पड़ते हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो असुल में हम देवता धर्म के थे, वह धर्म बहुत सुख देने वाला है। यह कोई कह न सके – वहाँ हम क्यों नहीं! यह तो जानते हो ना कि वहाँ एक ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म था फिर बाकी और धर्म नम्बरवार आते हैं। यह तुम बच्चे समझा सकते हो। यह अनादि बना बनाया खेल है। उसमें फिर सतयुग होगा। भारत में ही होना है क्योंकि भारत ही अविनाशी खण्ड है। इसका विनाश नहीं होता है।

यह भी समझाना पड़ता है। बाप का जन्म भी यहाँ होता है, उनका है दिव्य जन्म जो मनुष्यों सदृश्य नहीं है। बाप आये हैं निकालने। अभी तुम सिर्फ बाप और घर को याद करो। फिर तुम राजधानी में आ जायेगे। यह तो आसुरी राजस्थान है, बाप ले जाते हैं दैवी राजस्थान में। और कोई तकलीफ नहीं देते सिर्फ बाप और वर्से को याद करना है। यह है अजपाजाप… मुख से कुछ भी कहना नहीं है। सूक्ष्म में भी कुछ कहना नहीं है। साइलेन्स में बाप को याद करना है, घर बैठे। बांधेलियां भी घर बैठे सुनती हैं। छुट्टी नहीं मिलती है। हाँ घर बैठे सिर्फ पवित्र रहने की कोशिश करो। बोलो, हमको स्वप्न में डायरेक्शन मिलते हैं पवित्र बनो। अभी मौत सामने खड़ा है। तुम अभी वानप्रस्थ अवस्था में हो। वानप्रस्थ में कभी विकार का ख्याल थोड़ेही होता है। अभी बाप सारी दुनिया के लिए कहते हैं, सभी की वानप्रस्थ अवस्था है। सभी को वापस जाना है तो घर को याद करना है। फिर आना भी भारत में है। मुख तो घर की तरफ ही होगा ना। बच्चों को और कोई तकलीफ नहीं दी जाती है, बड़ा सहज है। घर में बैठ भल भोजन बनाओ, शिवबाबा की याद में। घर में भोजन बनाते हो तो पति याद रहता है ना। बाप कहते हैं यह तो पतियों का पति है। उनको याद करो जिससे 21 जन्मों के लिए वर्सा मिलता है। अच्छा कोई को छुट्टी नहीं मिलती है। वहाँ भी रह बाप और वर्से को याद करो। अपना तो तुम छुटकारा कर लो। बाप से पूरा वर्सा ले सकते हो। धीरे-धीरे तो छुटकारा मिलना ही है। हाँ रूद्र ज्ञान यज्ञ में विघ्न भी जरूर पड़ने हैं। आखरीन जब तुम्हारा प्रभाव निकलेगा तो तुम्हारे चरणों में माथा टेकते रहेंगे। विघ्न तो पड़ते ही रहेंगे। इसमें धैर्य धरना है, उतावला नहीं होना है। घर बैठे पति आदि मित्र सम्बन्धियों को एक ही बात समझाओ कि बाप का फरमान है मुझे याद करो, वर्सा लो। कृष्ण तो हो नहीं सकता। बाप को ही याद करना है। बाप का ही परिचय देना है, जो सब जान जाएं कि हमारा बाबा शिवबाबा है। वह भी अभी याद अच्छी रह सकती है। थोड़े समय के लिए यह बन्धन मारपीट आदि है। आगे चल यह सब बन्द हो जायेंगे। कोई-कोई बीमारी होती है जो झट छूट जाती है। कोई वर्ष दो तक भी चलती है। इसमें भी उपाय यही है, बाबा को याद करते-करते बन्धन छूट जायेंगे इसलिए हर बात में धीरज चाहिए। बाप कहते हैं जितना तुम याद करेंगे उतना विकर्म विनाश होंगे। बुद्धि टूटती जायेगी। यह विकर्मो के भी बन्धन हैं। विकार को ही नम्बरवन विकर्म कहा जाता है।

अभी तुम विकर्माजीत बनते हो। विकर्माजीत याद से ही बना जाता है। सभी खाते खलास हो जायेंगे, फिर सुख का खाता शुरू होगा। व्यापारियों के लिए तो बहुत सहज है। समझते हैं कि पुराना खाता खलास कर फिर नया शुरू करना है। याद करते रहेंगे तो जमा होता जायेगा। याद नहीं करेंगे तो जमा कैसे होगा? यह भी व्यापार है ना। बाप तो कोई तकलीफ नहीं देते हैं। धक्का आदि कुछ भी खाने का नहीं है। वो तो जन्म-जन्मान्तर खाते ही आये हैं। अभी सत्य बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं। गॉड ही सत्य बतलाते हैं। बाकी तो सब है झूठ। कान्ट्रास्ट देखो – बाबा क्या समझाते हैं और मनुष्य क्या समझाते हैं। यह है ड्रामा। फिर भी ऐसे ही होगा। अभी तुम जानते हो हम सद्गति को पाते हैं – श्रीमत पर चलने से। नहीं तो इतना ऊंच पद नहीं मिलेगा। तुम निमित्त बनते हो स्वर्ग में जानें, वहाँ कोई विकर्म होता नहीं। यहाँ विकर्म होता है तो सजा भी भोगनी पड़ती है। जो श्रीमत पर नहीं चलते हैं उनको भी क्या कहा जाए? नास्तिक। भल जानते हैं बाबा आस्तिक बनाते हैं। परन्तु फिर भी अगर उनकी मत पर न चले तो नास्तिक ठहरे ना। जानते भी हैं शिवबाबा की श्रीमत पर ही चलना है, परन्तु जानते हुए भी न चलें तो उनको क्या कहेंगे! श्रीमत है श्रेष्ठ बनने की। सबसे ऊंच ते ऊंच वह सतगुरू है। बाप बैठ बच्चों को सम्मुख समझाते हैं। कल्प-कल्प समझाया था। बाकी शास्त्र तो सब भक्ति मार्ग के हैं। अनेक ढेर के ढेर शास्त्र हैं। शास्त्रों की भी बहुत इज्जत रखते हैं। जैसे शास्त्रों को परिक्रमा देते हैं, वैसे चित्रों को भी परिक्रमा दिलाते हैं। अब बाबा कहते हैं इन सभी को भूल जाओ। एकदम बिन्दू (ज़ीरो) बन जाओ। बिन्दी लगा दो, और कोई बातें सुनो नहीं। हियर नो ईविल, सी नो ईविल, टॉक नो इविल। एक बाप के सिवाए दूसरे कोई की बात मत सुनो। अशरीरी बन जाओ, और सब कुछ भूल जाओ। तुम आत्मायें शरीर साथ सुनती हो। बाप आकर ब्रह्मा द्वारा समझाते हैं। बच्चों को सद्गति का मार्ग बतलाते हैं। भल पहले भी कितने यत्न किये, परन्तु मुक्ति जीवनमुक्ति कोई पा नहीं सके। कल्प की आयु ही लम्बी कर दी है। जिनकी तकदीर में होगा तो सुनेगा। तकदीर में नहीं है तो आ न सके। यहाँ भी तकदीर की बात है। बाप समझाते कितना सहज है, कोई कहते हैं हमारा मुख नहीं खुलता है। अरे इतनी सहज बात है बाप और वर्से को याद करो। उनको ही संस्कृत में कहते हैं मनमनाभव। शिवबाबा है सभी आत्माओं का बाप। कृष्ण को बाप नहीं कह सकते। ब्रह्मा भी बाप है सारी प्रजा का। आत्माओं का बाप बड़ा या प्रजा का बाप बड़ा? बड़े बाबा को याद करने से प्रालब्ध स्वर्ग का वर्सा मिलेगा। आगे तुम्हारे पास बहुत आयेंगे। जायेंगे कहाँ? आते रहेंगे। जहाँ बहुत लोग जाते हैं तो एक दो को देख बहुत घुस पड़ते हैं। तुम्हारे में भी वृद्धि को पाते रहेंगे। विघ्न कितने भी आयें, उन खिटपिट से पास होकर अपनी राजधानी तो स्थापन करनी ही है। रामराज्य स्थापन कर रहे हैं। रामराज्य है नई दुनिया।

तुम जानते हो हम अपने ही तन-मन-धन से भारत को स्वर्ग बना रहे हैं श्रीमत पर। कोई से पहले तुम यह पूछो परमपिता परमात्मा से तुम्हारा क्या सम्बन्ध है? प्रजापिता ब्रह्मा से क्या सम्बन्ध है? यह है बेहद का बाप। फिर हैं बिरादरियां। एक से ही निकली हुई हैं ना। परमपिता परमात्मा ने प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रची है अर्थात् पतित से पावन बनाया है। दुनिया कुछ भी नहीं जानती हम सो पूज्य, हम सो पुजारी .. गाते हैं परन्तु वह फिर भगवान के लिए कह देते हैं। अगर भगवान ही पुजारी बने तो फिर कौन पूज्य बनावे.. यह पूछना चाहिए। बच्चों को हम सो का अर्थ समझाया है। हम सो शूद्र थे, अब हम सो देवता बन रहे हैं। चक्र को तो याद कर सकते हो ना! गाया भी जाता है फादर शोज़ सन, फिर सन शोज़ फादर। अच्छा –

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) होशियार व्यापारी बन पुराने सब खाते खलास कर सुख का खाता शुरू करना है। याद में रह विकर्मो के बन्धन काटने हैं। धीरज धरना है, उतावला नहीं होना है।

2) घर में बैठ भोजन बनाते, हर कर्म करते बाप की याद में रहना है। बाप जो अविनाशी ज्ञान रत्न देते हैं। उनसे अपनी झोली भर दूसरों को दान करना है।

वरदान:- अपने भाग्य की स्मृति से सदा खुशी में डांस करने वाले खुशनसीब भव
अमृतवेले से रात तक आप ब्राह्मण बच्चों को जो श्रेष्ठ भाग्य मिला है, उस भाग्य की लिस्ट सदा सामने रखो और यही गीत गाते रहो – वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य, जो भाग्य-विधाता ही अपना हो गया। इसी नशे में सदा खुशी की डांस करते रहो। कुछ भी हो जाए, मरने तक की बात भी आ जाए लेकिन खुशी नहीं जाए। शरीर चला जाए कोई हर्जा नहीं लेकिन खुशी नहीं जाए।
स्लोगन:- हर्षितमुख रहना है तो साक्षीपन की सीट पर बैठ, दृष्टा बनकर हर खेल को देखते चलो।

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Daily Murli Brahma Kumaris 31 may 2017 – Bk Murli Hindi

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31/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – श्रीमत पर पवित्र बनो तो धर्मराज की सज़ाओं से छूट जायेंगे, हीरे जैसा बनना है तो ज्ञान अमृत पियो, विष को छोड़ो”
प्रश्नः- सतयुगी पद का सारा मदार किस बात पर है?
उत्तर:- पवित्रता पर। तुम्हें याद में रह पवित्र जरूर बनना है। पवित्र बनने से ही सद्गति होगी। जो पवित्र नहीं बनते वे सजा खाकर अपने धर्म में चले जाते हैं। तुम भल घर में रहो परन्तु किसी देहधारी को याद नहीं करो, पवित्र रहो तो ऊंच पद मिल जायेगा।
गीत:- तुम्हें पाके हमने जहान पा लिया है…..

 

ओम् शान्ति। शिव भगवानुवाच और कोई को भी भगवान नहीं कहा जाता, एक निराकार परमपिता परमात्मा को ही शिवबाबा कहा जाता है। वह है सभी आत्माओं का बाप। पहले-पहले यह निश्चय होना चाहिए – हम शिवबाबा के बच्चे जरूर हैं। दु:ख के समय कहते हैं परमात्मा सहायता करो, रहम करो। यह भी नहीं जानते हैं कि हमारी आत्मा परमात्मा को याद करती है। अहम् आत्मा का बाप वह है। इस समय सारी दुनिया है पतित आत्माओं की। गाते हैं हम पापी नीच हैं, आप सम्पूर्ण निर्विकारी हैं। परन्तु फिर भी अपने को समझते नहीं हैं। बाप समझाते हैं कि जब तुम कहते हो भगवान बाप एक है तो तुम सब आपस में भाई-भाई हो गये। फिर शरीर के नाते सब भाई बहिन ठहरे। शिवबाबा के बच्चे फिर प्रजापिता ब्रह्मा के भी बच्चे ठहरे। यह तुम्हारा बेहद का बाप, टीचर, गुरू है। यह कहते हैं मैं तुमको पतित नहीं बनाता हूँ। मैं तो आया हूँ पावन बनाने। अगर मेरी मत पर चलेंगे तो। यहाँ तो सब मनुष्य रावण मत पर हैं। सबमें 5 विकार हैं। बाप कहते हैं बच्चे अब निर्विकारी बनो, श्रीमत पर चलो। परन्तु विकारों को छोड़ते ही नहीं हैं। तो स्वर्ग के मालिक बनते नहीं। सब अजामिल जैसे पापी बन गये हैं। रावण सप्रदाय हैं, यह शोक वाटिका है, कितना दु:खी हैं। बाप आकर फिर रामराज्य बनाते हैं। तो तुम बच्चे जानते हो कि यह सच्चा-सच्चा युद्ध का मैदान है। गीता में भगवान कहते हैं काम महाशत्रु है, उन पर जीत पहनो। सो तो पहनते नहीं हैं। अभी बाप बैठ समझाते हैं। तुम्हारी आत्मा इन आरगन्स द्वारा सुनती है फिर सुनाती है, एक्ट आत्मा करती है। हम आत्मा हैं शरीर धारण कर पार्ट बजाते हैं। परन्तु मनुष्य आत्म-अभिमानी के बदले देह-अभिमानी बन पड़े हैं। अब बाप कहते हैं देही-अभिमानी बनो। सतयुग में आत्म-अभिमानी रहते हैं। परमात्मा को नहीं जानते हैं। यहाँ तुम देह-अभिमानी हो और परमात्मा को भी नहीं जानते हो इसलिए तुम्हारी ऐसी दुर्गति हो गई है। दुर्गति को भी समझते नहीं। जिनके पास धन बहुत है वह तो समझते हैं हम स्वर्ग में बैठे हैं। बाप कहते हैं यह सब गरीब बन जाते हैं क्योंकि विनाश होना है। विनाश होना तो अच्छा है ना। हम फिर मुक्तिधाम में चले जायेंगे, इसमें तो खुश होना चाहिए। तुम मरने के लिए तैयारी कर रहे हो। मनुष्य तो मरने से डरते हैं। बाप तुमको वैकुण्ठ ले चलने के लिए लायक बना रहे हैं। पतित तो पतित दुनिया में ही जन्म लेते रहते हैं। स्वर्गवासी कोई भी नहीं होते। मूल बात बाप कहते हैं पवित्र बनो। पवित्र बनने बिगर पवित्र दुनिया में चल नहीं सकेंगे। पवित्रता पर ही अबलाओं पर मार पड़ती है। विष को अमृत समझते हैं। बाप कहते हैं ज्ञान अमृत से तुमको हीरे जैसा बनाता हूँ, फिर तुम विष खाकर कौड़ी जैसे क्यों बनते हो। आधाकल्प तुमने विष खाया अब मेरी आज्ञा मानो। नहीं तो धर्मराज के डण्डे खाने पड़ेंगे। लौकिक बाप भी कहते हैं बच्चे ऐसा काम नहीं करो जो कुल का नाम बदनाम हो। बेहद का बाप कहते हैं श्रीमत पर चलो। पवित्र बनो। अगर काम चिता पर बैठे तो तुम्हारा मुँह काला तो है और ही काला हो जायेगा। अभी तुमको ज्ञान चिता पर बिठाए गोरा बनाते हैं। काम चिता पर बैठने से स्वर्ग का मुंह भी नहीं देख सकेंगे इसलिए बाप कहते हैं अब श्रीमत पर चलो। बाप तो बच्चों से ही बात करेंगे ना। बच्चे ही जानते हैं – बाप हमको स्वर्ग का वर्सा देने आये हैं। कलियुग अब पूरा होना है। जो बाप की श्रीमत पर चलेंगे उनकी ही सद्गति होगी। पवित्र नहीं बनेंगे तो सजा खाकर अपने धर्म में चले जायेंगे। भारतवासी ही स्वर्गवासी थे। अब पतित बन पड़े हैं। स्वर्ग का पता ही नहीं है। तो बाप कहते हैं तुम मेरी श्रीमत पर न चल औरों की मत पर चल विकार में गये तो मरे, फिर भल पिछाड़ी में स्वर्ग में आयेंगे परन्तु पद बहुत हल्का पायेंगे। अभी जो साहूकार हैं वह गरीब बन जाते हैं। जो यहाँ गरीब हैं वह साहूकार बनेंगे। बाप गरीब-निवाज़ है। सारा मदार पवित्रता पर है। बाप के साथ योग लगाने से तुम पावन बनेंगे। बाप बच्चों को समझाते हैं मैं तुमको राजयोग सिखाता हूँ। मैं घरबार नहीं छुड़ाता हूँ। भल घर में रहो परन्तु विकार में मत जाओ और कोई भी देहधारी को याद नहीं करो। इस समय सब पतित हैं। सतयुग में पावन देवता थे। इस समय वह भी पतित बन पड़े हैं। पुनर्जन्म लेते-लेते अब अन्तिम जन्म हो गया है।

तुम सब पार्वतियां हो, तुमको अब अमरनाथ बाप अमरकथा सुना रहे हैं, अमरपुरी का मालिक बनाने। तो अब अमरनाथ बाप को याद करो। याद से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। बाकी शिव, शंकर वा पार्वती कोई पहाड़ों पर नहीं बैठे हैं। यह सब भक्ति मार्ग के धक्के हैं। आधाकल्प बहुत धक्के खाये हैं, अब बाबा कहते हैं मैं तुमको स्वर्ग में ले जाऊंगा। सतयुग में सुख ही सुख है। न धक्के खाते, न गिरते। मुख्य बात है ही पवित्र रहने की। यहाँ जब बहुत अत्याचार करते हैं तो पाप का घड़ा भर जाता है और विनाश होता है। अब एक जन्म पवित्र बनो तो पवित्र दुनिया के मालिक बन जायेंगे। अब जो श्रीमत पर चले। अगर कल्प पहले श्रीमत पर नहीं चले हैं तो अभी भी नहीं चलेंगे, न पद पायेंगे। एक बाप के तुम बच्चे हो। तुम तो आपस में भाई-बहिन हो गये। परन्तु बाप का बनकर अगर गिरे तो और भी रसातल में चले जायेंगे और ही पाप आत्मा बन जायेंगे। यह है ईश्वरीय गवर्मेन्ट। अगर मेरी मत पर पवित्र नहीं बनें तो धर्मराज द्वारा बहुत कड़ी सजा खानी पड़ेगी। जन्म-जन्मान्तर के जो पाप किए हैं उन सबकी सजा खाकर हिसाब-किताब चुक्तू करना होगा। या तो योगबल से विकर्मों को भस्म करना होगा या तो बहुत कड़ी सजा खानी पड़ेगी। कितने ढेर ब्रह्माकुमार और कुमारियां हैं, सब पवित्र रहते हैं, भारत को स्वर्ग बनाते हैं। तुम हो शिव शक्ति पाण्डव सेना, गोप गोपियां, इसमें दोनों आ जाते हैं। भगवान तुमको पढ़ाते हैं। लक्ष्मी-नारायण को भगवती भगवान कहते हैं। उन्हों को जरूर भगवान ने ही वर्सा दिया होगा। भगवान ही आकर तुमको देवता बनाते हैं। सतयुग में यथा राजा रानी तथा प्रजा रहते हैं। सब श्रेष्ठाचारी थे, अब रावण राज्य है। अगर रामराज्य में चलना है तो पवित्र बनो और राम की मत पर चलो। रावण की मत से तो तुम्हारी दुर्गति होती है। गाया हुआ भी है किनकी दबी रहेगी धूल में…. सोना आदि जमीन में, दीवारों में छिपाते हैं। अचानक मरेंगे तो सब कुछ वहाँ ही रह जायेगा। विनाश तो होना ही है। अर्थ क्वेक आदि जब होती है तो चोर लोग भी बहुत निकल पड़ते हैं। अब धनी बाप आया है, तुमको अपना बनाकर विश्व का मालिक बनाने। आजकल वानप्रस्थ अवस्था में भी विकार बिगर रह नहीं सकते, बिल्कुल ही तमोप्रधान हो गये हैं। बाप को पहचानते ही नहीं। बाप कहते हैं मैं पवित्र बनाने आया हूँ। अगर विकार में जायेंगे तो बड़ी कड़ी सजा खानी पड़ेगी। मैं पवित्र बनाए पवित्र दुनिया स्थापन करने आया हूँ। तुम फिर पतित बन विघ्न डालते हो! स्वर्ग की रचना करने में बाधा डालते हो, तो बहुत कड़ी सजा खानी पड़ेगी। मैं आया हूँ तुमको स्वर्गवासी बनाने के लिए। अगर विकार नहीं छोड़गे तो धर्मराज द्वारा बहुत मारे जायेंगे। बहुत त्राहि-त्राहि करनी पड़ेगी। यह इन्द्र सभा है। कहानी है ना – वहाँ ज्ञान परियाँ थीं, किसी पतित को ले आई तो उनका वायब्रेशन आता था। यहाँ सभा में किसी पतित को नहीं बिठाया जाता है। पवित्रता की प्रतिज्ञा करने बिगर बिठाया नहीं जाता, नहीं तो फिर ले आने वाले पर भी दोष पड़ जाता है। बाप तो जानते हैं फिर भी ले आते हैं तो शिक्षा दी जाती है। शिवबाबा को याद करने से आत्मा शुद्ध हो जाती है। वायुमण्डल में साइलेन्स हो जाती है। बाप ही बैठ परिचय देते हैं कि मैं तुम्हारा बाप हूँ। 5 हजार वर्ष पहले मुआफिक तुमको मनुष्य से देवता बनाने आया हूँ। बेहद के बाप से बेहद सुख का वर्सा लेना है। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) योग बल द्वारा विकर्मो के सब हिसाब-किताब चुक्तू कर आत्मा को शुद्ध और वायुमण्डल को शान्त बनाना है।

2) बाप की श्रीमत पर सम्पूर्ण पावन बनने की प्रतिज्ञा करनी है। विकारों के वश होकर स्वर्ग की रचना में विघ्न रूप नहीं बनना है।

वरदान:- विशेषता के संस्कारों को अपनी नेचर बनाए साधारणता को समाप्त करने वाले मरजीवा भव
जैसे किसी की कोई भी नेचर होती है तो वह स्वत: ही अपना काम करती है। सोचना वा करना नहीं पड़ता। ऐसे विशेषता के संस्कार भी नेचर बन जाएं और हर एक के मुख से, मन से यही निकले कि इस विशेष आत्मा की नेचर ही विशेषता की है। साधारण कर्म की समाप्ति हो जाए तब कहेंगे मरजीवा। साधारणता से मर गये, विशेषता में जी रहे हैं। संकल्प में भी साधारणता न हो।
स्लोगन:- समर्थ आत्मा वह है जो किसी न किसी विधि से व्यर्थ को समाप्त कर दे।

साकार मुरलियों से गीता के भगवान को सिद्ध करने की प्वाइंटस (क्रमश: पार्ट 4)

1- मन्मनाभव, मध्याजीभव.. यह गीता के कोई-कोई अक्षर ठीक हैं क्योंकि बाप जो तुमको अभी ज्ञान सुनाते हैं वह फिर प्राय:लोप हो जाता है। कोई को पता ही नहीं रहता कि गीता ज्ञान से श्रीकृष्ण ने यह पद पाया है।

2- जब सतयुग में इन्हों को (देवताओं का) राज्य था तब और कोई धर्म नहीं था। उस समय जनसंख्या भी बहुत थोड़ी थी। तो जरूर गीता ज्ञान के बाद विनाश भी चाहिए। इसलिए महाभारत लड़ाई भी गाई हुई है। इसमें ही सब चेंज होनी है। कलियुग के बाद सतयुग आना है।

3- अभी कहते हैं कि यह महाभारत काल चल रहा है, तो जरूर भगवान भी चाहिए। कृष्ण तो हो न सके। गीता ज्ञान से तो कृष्ण की आत्मा को राजाई मिली। इसलिए गीता है माता, जिससे तुम देवता बनते हो। तो कृष्ण की आत्मा गीता के ज्ञान से राजयोग सीखकर ऐसी बनी है।

4- पतित-पावन एक परमपिता परमात्मा को ही कहा जाता है, उन्हें ही सब पुकारते हैं। कृष्ण को कभी पतित-पावन समझकर याद नहीं करेंगे। अभी तुम जान गये हो कि कृष्ण की आत्मा जो सतयुग में थी वह अनेक रूप धारण करते-करते अभी तमोप्रधान बनी है फिर सतोप्रधान बनती है।

5- शिव भगवानुवाच, भगवान् कहते ही शिव को हैं। भगवान् एक ही होता है। कृष्ण तो बच्चा है। ज्ञान सुनाने वाला है बाप। तो बाप के बजाए बच्चे का नाम डाल देना, यह कितनी बड़ी भूल है। फिर कृष्ण के ही चरित्र आदि बैठ दिखाये हैं। बाप कहते हैं लीला कोई कृष्ण की नहीं है। गाते हैं – हे प्रभू तेरी लीला अपरम-अपार है, तो लीला एक की ही होती है।

6- शिवबाबा की महिमा बड़ी न्यारी है। वह है सदा पावन रहने वाला, परन्तु वह पावन शरीर में आ नहीं सकते। उनको बुलाते ही हैं – पतित दुनिया को आकर पावन बनाओ। तो बाप कहते हैं मुझे पतित दुनिया में, पतित शरीर में आना पड़ता है। इनके (श्रीकृष्ण के) बहुत जन्मों के अन्त में आकर प्रवेश करता हूँ।

7- शास्त्रों में श्रीकृष्ण को स्वदर्शन चक्र दिखाया है कि उसने स्वदर्शन चक्र से अकासुर-बकासुर आदि को मारा फिर राम को बाण दिखाये हैं। दोनों देवताओं को हिंसक बना दिया है। जबकि उनकी महिमा में गाते हैं देवतायें डबल अहिंसक हैं। न तो काम कटारी चलाते हैं, न क्रोध की हिंसा करते हैं। वह हैं ही निर्विकारी देवी देवतायें। इसलिए कृष्ण को मोर-मुकुटधारी दिखाया है।

8- कृष्ण को रूद्र नहीं कहेंगे। विनाश भी कोई कृष्ण नहीं कराते, स्थापना, विनाश और पालना यह तीनों कर्तव्य परमात्मा के हैं, परन्तु वह खुद कुछ नहीं करते, नहीं तो उन पर दोष पड़ जाए। वह है करनकरावनहार।

9- कृष्ण के लिए भगवानुवाच नहीं कह सकते, वह तो है दैवीगुणों वाला मनुष्य, डिटीज्म कहा जाता है। अभी देवी-देवता धर्म नहीं है, उसकी स्थापना हो रही है। अभी तुम ब्राह्मण, देवी देवता धर्म के बन रहे हो।

10- मनुष्य कहते हैं देवताओं का परछाया इस पतित सृष्टि पर नहीं पड़ सकता है, इसमें देवतायें आ न सकें। उनके लिए तो नई दुनिया चाहिए। लक्ष्मी का भी आवाह्न करते हैं तो घर की कितनी सफाई करते हैं। अब इस सृष्टि की जब सफाई होगी अर्थात् पुरानी दुनिया विनाश होगी तब देवी देवतायें इस सृष्टि पर आयेंगे।

 

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Daily Murli Brahma Kumaris 30 may 2017 – Bk Murli Hindi

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30/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम्हें बाप समान मीठा बनना है, किसी को दु:ख नहीं देना है, कभी क्रोध नहीं करना है
प्रश्नः- कर्मो की गुह्य गति को जानते हुए तुम बच्चे कौन सा पाप कर्म नहीं कर सकते?
उत्तर:- आज दिन तक दान को पुण्य कर्म समझते थे, लेकिन अब समझते हो दान करने से भी कई बार पाप बनता है क्योंकि अगर किसी ऐसे को पैसा दिया जो पैसे से पाप करे, उसका असर भी तुम्हारी अवस्था पर अवश्य ही पड़ेगा इसलिए दान भी समझकर करना है।
गीत:- इस पाप की दुनिया से…..

ओम् शान्ति। अभी तुम बच्चे सामने बैठे हो। बाप कहते हैं हे जीव की आत्मायें सुनती हो। आत्माओं से बात करते हैं। आत्मायें जानती हैं – हमारा बेहद का बाप हमको ले चलते हैं, जहाँ दु:ख का नाम नहीं। गीत में भी कहते हैं इस पाप की दुनिया से पावन दुनिया में ले चलो। पतित दुनिया किसको कहा जाता है, यह दुनिया नहीं जानती। देखो, आजकल मनुष्यों में काम, क्रोध कितना तीखा है। क्रोध के वशीभूत होकर कहते हैं हम इसके देश को नाश करेंगे। कहते भी हैं हे भगवान हमको घोर अन्धियारे से घोर सोझरे में ले चलो क्योंकि पुरानी दुनिया है। कलियुग को पुराना युग, सतयुग को नया युग कहा जाता है। बाप बिगर नया युग कोई बना न सके। हमारा मीठा बाबा हमको अब दु:खधाम से सुखधाम में ले चलते हैं। बाबा आपके सिवाए हमको कोई भी स्वर्ग में ले जा नहीं सकते। बाबा कितना अच्छी रीति समझाते हैं। फिर भी किसकी बुद्धि में बैठता नहीं है। इस समय बाबा की श्रेष्ठ मत मिलती है। श्रेष्ठ मत से हम श्रेष्ठ बनते हैं। यहाँ श्रेष्ठ बनेंगे तो श्रेष्ठ दुनिया में ऊंच पद पायेंगे। यह तो है भ्रष्टाचारी रावण की दुनिया। अपनी मत पर चलने को मनमत कहा जाता है। बाप कहते हैं श्रीमत पर चलो। तुमको फिर घड़ी-घड़ी आसुरी मत नर्क में ढकेलती है। क्रोध करना आसुरी मत है। बाबा कहते हैं एक दो पर क्रोध नहीं करो। प्रेम से चलो। हर एक को अपने लिए राय लेनी है। बाप कहते हैं बच्चे पाप क्यों करते हो, पुण्य से काम चलाओ। अपना खर्चा कम कर दो। तीर्थो पर धक्का खाना, सन्यासियों के पास धक्का खाना, इन सब कर्मकाण्ड पर कितना खर्चा करते हैं। वह सब छुड़ा देते हैं। शादी में मनुष्य कितना शादमाना करते हैं, कर्जा लेकर भी शादी कराते हैं। एक तो कर्जा उठाते, दूसरा पतित बनते। सो भी जो पतित बनने चाहते हैं जाकर बनें। जो श्रीमत पर चल पवित्र बनते हैं उनको क्यों रोकना चाहिए। मित्र सम्बन्धी आदि झगड़ा करेंगे तो सहन करना ही पड़ेगा। मीरा ने भी सब कुछ सहन किया ना। बेहद का बाप आया है राजयोग सिखलाए भगवान भगवती पद प्राप्त कराते हैं। लक्ष्मी भगवती, नारायण भगवान कहा जाता है। कलियुग अन्त में तो सभी पतित हैं फिर उन्हों को किसने चेन्ज किया। अब तुम बच्चे जानते हो बाबा कैसे आकर स्वर्ग अथवा रामराज्य की स्थापना कराते हैं। हम सूर्यवंशी अथवा चन्द्रवंशी पद पाने के लिए यहाँ आये हैं। जो सूर्यवंशी सपूत बच्चे होंगे वह तो अच्छी तरह पढ़ाई पढ़ेंगे।

बाप सबको समझाते हैं – पुरुषार्थ कर तुम माँ बाप को फालो करो। ऐसा पुरुषार्थ करो जो इनके वारिस बनकर दिखाओ। मम्मा बाबा कहते हो तो भविष्य तख्तनशीन होकर दिखाओ। बाप तो कहते हैं इतना पढ़ो जो हमसे ऊंच जाओ। ऐसे बहुत बच्चे होते हैं जो बाप से ऊंच चले जाते हैं। बेहद का बाप कहते हैं हम तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ। मैं थोड़ेही बनता हूँ। कितना मीठा बाप है। उनकी श्रीमत मशहूर है। तुम श्रेष्ठ देवी-देवता थे फिर 84 जन्म लेते-लेते अभी पतित बन पड़े हो। हार और जीत का खेल है। माया से हारे हार, माया से जीते जीत। मन अक्षर कहना रांग है। मन, अमन थोड़ेही हो सकता है। मन तो संकल्प करेगा। हम चाहें संकल्प रहित होकर बैठ जाएं परन्तु कब तक? कर्म तो करना है ना। वह समझते हैं गृहस्थ धर्म में रहना, यह कर्म नहीं करना है। इन हठयोग सन्यासियों का भी पार्ट है। उनका भी एक यह निवृत्ति मार्ग वालों का धर्म है और कोई धर्म में घर-घाट छोड़ जंगल में नहीं जाते हैं। अगर कोई ने छोड़ा भी है तो भी सन्यासियों को देखकर। बाबा कोई घर से वैराग्य नहीं दिलाते। बाप कहते हैं भल घर में रहो परन्तु पवित्र बनो। पुरानी दुनिया को भूलते जाओ। तुम्हारे लिए नई दुनिया बना रहा हूँ। शंकराचार्य सन्यासियों को ऐसे नहीं कहते कि तुम्हारे लिए नई दुनिया बनाता हूँ, उनका है हद का सन्यास, जिससे अल्पकाल का सुख मिलता है। अपवित्र लोग जाकर माथा टेकते हैं। पवित्रता का देखो कितना मान है। अभी तो देखो कितने बड़े-बड़े फ्लैट आदि बनाते हैं। मनुष्य दान करते हैं अब इसमें पुण्य तो कुछ हुआ नहीं। मनुष्य समझते हैं हम जो कुछ ईश्वर अर्थ करते हैं वह पुण्य है। बाप कहते हैं मेरे अर्थ तुम किस-किस कार्य में लगाते हो! दान उनको देना चाहिए – जो पाप न करें। अगर पाप किया तो तुम्हारे ऊपर उनका असर पड़ जायेगा क्योंकि तुमने पैसे दिये। पतितों को देते-देते तुम कंगाल हो गये हो। पैसे ही सब बरबाद हो गये हैं। करके अल्पकाल का सुख मिल जाता है, यह भी ड्रामा। अभी तुम बाप की श्रीमत पर पावन बन रहे हो – पैसे भी तुम्हारे पास वहाँ ढेर होंगे। वहाँ कोई पतित होते नहीं हैं। यह बड़ी समझने की बातें हैं। तुम हो ईश्वरीय औलाद। तुम्हारे में बड़ी रॉयल्टी होनी चाहिए। कहते हैं गुरू के निंदक ठौर न पायें। उन्हों में बाप टीचर गुरू अलग है। यहाँ तो बाप टीचर सतगुरू एक ही है। अगर तुम कोई उल्टी चलन चले तो तीनों के निंदक बन पड़ेंगे। सत बाप, सत टीचर, सतगुरू की मत पर चलने से ही तुम श्रेष्ठ बन जाते हो। शरीर तो छोड़ना ही है तो क्यों न इसे ईश्वरीय, अलौकिक सेवा में लगाकर बाप से वर्सा ले लेवें। बाप कहते हैं मैं इसे लेकर क्या करूंगा। मैं तुमको स्वर्ग की बादशाही देता हूँ। वहाँ भी मैं महलों में नहीं रहता, यहाँ भी मैं महलों में नहीं रहता हूँ। गाते हैं बम बम महादेव.. भर दे मेरी झोली। परन्तु वह कब और कैसे झोली भरते, यह कोई भी नहीं जानते हैं। झोली भरी थी तो जरूर चैतन्य में थे। 21 जन्म के लिए तुम बड़े सुखी, साहूकार बन जाते हो। ऐसे बाप की मत पर कदम-कदम चलना चाहिए। बड़ी मंजिल है। अगर कोई कहे मैं नहीं चल सकता। बाबा कहेंगे – तुम फिर बाबा क्यों कहते हो! श्रीमत पर नहीं चलेंगे तो बहुत डन्डे खायेंगे। पद भी भ्रष्ट होगा। गीत में भी सुना – कहते हैं मुझे ऐसी दुनिया में ले चलो जहाँ सुख और शान्ति हो। सो तो बाप दे सकता है। बाप की मत पर नहीं चलेंगे तो अपने को ही घाटा डालेंगे। यहाँ कोई खर्चे आदि की बात नहीं है। ऐसे थोड़ेही कहते गुरू के आगे नारियल बताशे आदि ले आओ वा स्कूल में फी भरो। कुछ भी नहीं। पैसे भल अपने पास रखो। तुम सिर्फ नॉलेज पढ़ो। भविष्य सुधार करने में कोई नुकसान तो नहीं है। यहाँ माथा भी नहीं टेकना सिखाया जाता। आधाकल्प तो तुम पैसा रखते, माथा झुकाते-झुकाते कंगाल बन पड़े हो। अब बाप फिर तुमको ले जाते हैं शान्तिधाम। वहाँ से सुखधाम में भेज देंगे। अब नवयुग, नई दुनिया आने वाली है। नवयुग सतयुग को कहेंगे फिर कलायें कमती होती जाती हैं। अभी बाप तुमको लायक बना रहे हैं। नारद का मिसाल….। अगर कोई भी भूत होगा तो तुम लक्ष्मी को वर नहीं सकेंगे। यह तो बच्चे तुम्हें अपना घर बार भी सम्भालना है और सर्विस भी करनी है। पहले यह भागे इसीलिए क्योंकि इन्हों पर बहुत मार पड़ी। बहुत अत्याचार हुए। मार की भी इन्हों को परवाह नहीं थी। भट्ठी में कोई पक्के, कोई कच्चे निकल गये। ड्रामा की भावी ऐसी थी। जो हुआ सो हुआ फिर भी होगा। गालियाँ भी देंगे। सबसे बड़े ते बड़ी गाली खाते हैं परमपिता परमात्मा शिव। कह देते हैं परमात्मा सर्वव्यापी है, कुत्ते, बिल्ली, कच्छ-मच्छ सबमें है। बाप कहते हैं मैं तो परोपकारी हूँ। तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ। श्रीकृष्ण स्वर्ग का प्रिन्स है ना। उनके लिए फिर कहते हैं सर्प ने डसा, काला हो गया। अब वहाँ सर्प कैसे डसेगा। कृष्णपुरी में भला कंस कहाँ से आया? यह सब हैं दन्त कथायें। भक्ति मार्ग की यह सामग्री है, जिससे तुम नीचे उतरते आये हो। बाबा तो तुमको गुल-गुल (फूल) बनाते हैं। कोई-कोई तो बहुत बड़े कांटे हैं। ओ गॉड फादर कहते हैं, परन्तु जानते कुछ भी नहीं हैं। फादर तो है परन्तु फादर से क्या वर्सा मिलेगा, कुछ भी मालूम नहीं है। बेहद का बाप कहते हैं मैं तुमको बेहद का वर्सा देने आया हूँ। तुम्हारा एक है लौकिक फादर, दूसरा है अलौकिक प्रजापिता ब्रह्मा, तीसरा है पारलौकिक शिव। तुमको 3 फादर हुए। तुम जानते हो हम दादे से ब्रह्मा द्वारा वर्सा लेते हैं, तो श्रीमत पर चलना पड़े, तब ही श्रेष्ठ बनेंगे। सतयुग में तुम प्रालब्ध भोगते हो। वहाँ न प्रजापिता ब्रह्मा को, न शिव को जानते हो। वहाँ सिर्फ लौकिक फादर को जानते हो। सतयुग में एक बाप है। भक्ति में हैं दो बाप। लौकिक और पारलौकिक बाप। इस संगम पर 3 बाप हैं। यह बातें और कोई समझा न सके। तो निश्चय बैठना चाहिए। ऐसे नहीं अभी-अभी निश्चय फिर अभी-अभी संशय। अभी-अभी जन्म लिया फिर अभी-अभी मर जाना। मर गया तो वर्सा खत्म। ऐसे बाप को फारकती नहीं देना चाहिए। जितना निरन्तर याद करेंगे, सर्विस करेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। बाप यह भी बतलाते हैं मेरी मत पर चलो तो बच जायेंगे। नहीं तो खूब सजा खानी पड़ेगी। सब साक्षात्कार करायेंगे, यह तुमने पाप किया। श्रीमत पर नहीं चले। सूक्ष्म शरीर धारण कराए सजा दी जाती है। गर्भ जेल में भी साक्षात्कार कराते हैं। यह पाप कर्म किया है अब खाओ सजा। झाड़ वृद्धि को पाता जायेगा। जो इस धर्म के थे और-और धर्म में घुस गये हैं, वह सब निकल आयेंगे। बाकी अपने-अपने सेक्शन में चले जायेंगे। अलग-अलग सेक्शन हैं। झाड़ देखो कैसे बढ़ता है। छोटी-छोटी टालियां निकलती जायेंगी।

तुम जानते हो मीठा बाबा आया हुआ है हमको वापिस ले जाने, इसलिए उनको लिबरेटर कहते हैं। दु:ख हर्ता सुख कर्ता है। गाइड बन फिर सुखधाम में ले जायेंगे। कहते भी हैं 5 हजार वर्ष पहले तुमको सुख के सम्बन्ध में भेजा था। तुमने 84 जन्म लिए। अब बाप से वर्सा ले लो। श्रीकृष्ण के साथ तो सबकी प्रीत है। लक्ष्मी-नारायण से इतनी नहीं, जितनी कृष्ण के साथ है। मनुष्यों को यह मालूम नहीं है। राधे-कृष्ण ही लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। कोई भी इस बात को नहीं जानते हैं। अब तुम जानते हो कि राधे कृष्ण अलग-अलग राजधानी के थे फिर स्वयंवर के बाद लक्ष्मी-नारायण बने। वह तो कृष्ण को द्वापर में ले गये हैं। कृष्ण को पतित-पावन कोई कह न सके। रेग्युलर पढ़ने बिगर ऊंच पद कोई पा न सके। अच्छा –

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपनी चलन बहुत रॉयल रखनी है, बहुत कम और मीठा बोलना है। सजाओं से बचने के लिए कदम-कदम पर बाप की श्रीमत पर चलना है।

2) पढ़ाई बहुत ध्यान से अच्छी तरह पढ़नी है। माँ बाप को फालो कर तख्तनशीन, वारिस बनना है। क्रोध के वश होकर दु:ख नहीं देना है।

वरदान:- ब्रह्मा बाप के संस्कारों को स्वयं में धारण करने वाले स्व परिवर्तक सो विश्व परिवर्तक भव
जैसे ब्रह्मा बाप ने जो अपने संस्कार बनायें वह सभी बच्चों को अन्त समय में याद दिलाये – निराकारी, निर्विकारी और निरंहकारी – तो यह ब्रह्मा बाप के संस्कार ही ब्राह्मणों के संस्कार नेचुरल हों। सदा इन्हीं श्रेष्ठ संस्कारों को सामने रखो। सारे दिन में हर कर्म के समय चेक करो कि तीनों ही संस्कार इमर्ज रूप में हैं। इन्हीं संस्कारों को धारण करने से स्व परिवर्तक सो विश्व परिवर्तक बन जायेंगे।
स्लोगन:- अव्यक्त स्थिति बनानी है तो चित्र (देह) को न देख चैतन्य और चरित्र को देखो।

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Read Murli 28/05/2017 :- Click Here

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Daily Murli Brahma Kumaris 29 may 2017 – Bk Murli Hindi

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29/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – शान्ति तुम्हारे गले का हार है, आत्मा का स्वधर्म है, इसलिए शान्ति के लिए भटकने की दरकार नहीं, तुम अपने स्वधर्म में स्थित हो जाओ”
प्रश्नः- मनुष्य किसी भी चीज़ को शुद्ध बनाने के लिए कौन सी युक्ति रचते हैं और बाप ने कौन सी युक्ति रची है?
उत्तर:- मनुष्य किसी भी चीज़ को शुद्ध बनाने के लिए उसे आग में डालते हैं। यज्ञ भी रचते हैं तो उसमें भी आग जलाते हैं। यहाँ भी बाप ने रूद्र यज्ञ रचा है लेकिन यह ज्ञान यज्ञ है, इसमें सबकी आहुति पड़नी है। तुम बच्चे देह सहित सब कुछ इसमें स्वाहा करते हो। तुम्हें योग लगाना है। योग की ही रेस है। इसी से तुम पहले रुद्र के गले का हार बनेंगे फिर विष्णु के गले की माला में पिरोये जायेंगे।
गीत:- ओम् नमो शिवाए..

 

ओम् शान्ति। यह महिमा किसकी सुनी? पारलौकिक परमपिता परम आत्मा अर्थात् परमात्मा की। सभी भक्त अथवा साधना करने वाले उनको याद करते हैं। उनका नाम फिर पतित-पावन भी है। बच्चे जानते हैं भारत पावन था। लक्ष्मी-नारायण आदि का पवित्र प्रवृत्ति मार्ग का धर्म था, जिसको आदि सनातन देवी-देवता धर्म कहा जाता है। भारत में पवित्रता सुख शान्ति सम्पत्ति सब कुछ था। पवित्रता नहीं है तो न शान्ति है, न सुख है। शान्ति के लिए भटकते रहते हैं। जंगल में फिरते रहते हैं। एक को भी शान्ति नहीं है क्योंकि न बाप को जानते हैं, न अपने को समझते कि मैं आत्मा हूँ, यह मेरा शरीर है। इन द्वारा कर्म करना होता है। मेरा तो स्वधर्म ही शान्त है। यह शरीर के आरगन्स हैं। आत्मा को यह भी पता नहीं है कि हम आत्मायें निर्वाण वा परमधाम की वासी हैं। इस कर्मक्षेत्र पर हम शरीर का आधार ले पार्ट बजाते हैं। शान्ति का हार गले में पड़ा है और धक्का खाते रहते हैं बाहर। पूछते रहते मन को शान्ति कैसे मिले? उनको यह पता नहीं है कि आत्मा मन – बुद्धि सहित है। आत्मा परमपिता परमात्मा की सन्तान है। वह शान्ति का सागर है, हम उनकी सन्तान हैं। अब अशान्ति तो सारी दुनिया को है ना। सब कहते हैं पीस हो। अब सारी दुनिया का मालिक तो एक है जिसको शिवाए नम: कहते हैं। ऊंच ते ऊंच भगवान, शिव कौन है? यह भी कोई मनुष्य नहीं जानते हैं। पूजा भी करते हैं, कई तो फिर अपने को शिवोहम् कह देते हैं। अरे शिव तो एक ही बाप है ना। मनुष्य अपने को शिव कहलायें, यह तो बड़ा पाप हो गया। शिव को ही पतित-पावन कहा जाता है। ब्रह्मा विष्णु शंकर को अथवा कोई मनुष्य को पतित-पावन नहीं कह सकते। पतित-पावन सद्गति दाता है ही एक। मनुष्य, मनुष्य को पावन बना न सकें क्योंकि सारी दुनिया का प्रश्न है ना। बाप समझाते हैं जब सतयुग था – भारत पावन था, अब पतित है। तो जो सारी सृष्टि को पावन बनाने वाला है उनको ही याद करना चाहिए। बाकी यह तो है ही पतित दुनिया। यह जो कहते हैं महान आत्मा, यह कोई है नहीं। पारलौकिक बाप को ही जानते नहीं हैं। भारत में शिव जयन्ती गाई जाती है तो जरूर भारत में आया होगा – पतितों को पावन बनाने। कहते हैं मैं संगम पर आता हूँ, जिसको कुम्भ कहा जाता है। वह पानी के सागर और नदियों का कुम्भ नहीं। कुम्भ इनको कहा जाता है जबकि ज्ञान सागर पतित-पावन बाप आकर सभी आत्माओं को पावन बनाते हैं। यह भी जानते हो भारत जब स्वर्ग था तो एक ही धर्म था। सतयुग में सूर्यवंशी राज्य था फिर त्रेता में चन्द्रवंशी, जिसकी महिमा है – राम राजा, राम प्रजा.. त्रेता की इतनी महिमा है तो सतयुग की उससे भी जास्ती होगी। भारत ही स्वर्ग था, पवित्र जीव आत्मायें थीं बाकी और सभी धर्म की आत्मायें निर्वाणधाम में थी। आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है – यह भी कोई मनुष्य मात्र नहीं जानते। आत्मा इतनी छोटी सी बिन्दी है, उनमें 84 जन्मों का पार्ट भरा हुआ है। 84 लाख जन्म तो हो न सके। 84 लाख जन्मों में कल्प – कल्पान्तर फिरते रहें, यह तो हो नहीं सकता। है ही 84 जन्मों का पा, सो भी सभी का नहीं है। जो पहले थे वह अब पीछे पड़ गये हैं, फिर वह पहले जायेंगे। पीछे आने वाली सभी आत्मायें निर्वाणधाम में रहती हैं। यह सब बातें बाप समझाते हैं। उनको ही वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी कहा जाता है।

बाप कहते हैं मैं आकर ब्रह्मा द्वारा सभी वेदों शास्त्रों गीता आदि का सार समझाता हूँ। यह सब भक्ति मार्ग के कर्मकाण्ड के शास्त्र बनाये हुए हैं। मैंने आकर कैसे यज्ञ रचा, यह बातें तो शास्त्रों में हैं नहीं। इनका नाम ही है राजस्व अश्वमेध रूद्र ज्ञान यज्ञ। रूद्र है शिव, इसमें सबको स्वाहा होना है। बाप कहते हैं देह सहित जो भी मित्र-सम्बन्धी आदि हैं, उन सबको भूल जाओ। एक ही बाप को याद करो। मैं सन्यासी, उदासी हूँ, क्रिश्चियन हूँ… यह सब देह के धर्म हैं इनको छोड़ मामेकम् याद करो। निराकार आयेंगे तो जरूर शरीर में ना। कहते हैं मुझे प्रकृति का आधार लेना पड़ता है। मैं ही आकर इस तन द्वारा नई दुनिया स्थापन करता हूँ। पुरानी दुनिया का विनाश सामने खड़ा है। गाया भी जाता है प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा स्थापना, सूक्ष्मवतन है ही फरिश्तों की दुनिया। वहाँ हड्डी मांस नहीं होता है। वहाँ सूक्ष्म शरीर होता है सफेद-सफेद जैसे घोस्ट होते हैं ना। आत्मा, जिसको शरीर नहीं मिलता है, तो वह भटकती रहती है। छाया रूपी शरीर दिखाई पड़ता है, उनको पकड़ नहीं सकते हैं। अब बाप कहते हैं बच्चे याद करो तो याद से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। गाया भी जाता है बहुत गई, थोड़ी रही.. अब बाकी थोड़ा समय है। जितना हो सके बाप को याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी। गीता में कोई एक दो अक्षर राइट लिखे हैं। जैसे आटे में लून (नमक) कोई-कोई अक्षर सही हैं। पहले तो भगवान निराकार है यह मालूम होना चाहिए। वह निराकार भगवान फिर वाच कैसे करते हैं? कहते हैं साधारण ब्रह्मा तन में प्रवेश कर राजयोग सिखलाता हूँ। बच्चे मुझे याद करो। मैं आता ही हूँ एक धर्म की स्थापना कर बाकी सब धर्मो का विनाश कराने। अभी तो अनेक धर्म हैं। आज से 5 हजार वर्ष पहले सतयुग में एक ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। सभी आत्मायें अपना-अपना हिसाब-किताब चुक्तू कर जाती हैं, उनको कयामत का समय कहा जाता है। सभी के दु:खों का हिसाब-किताब चुक्तू होता है। दु:ख मिलता ही है पापों के कारण। पाप का हिसाब चुक्तू होने के बाद फिर पुण्य का शुरू हो जाता है। हरेक चीज़ शुद्ध बनाने के लिए आग जलाई जाती है। यज्ञ रचते हैं, उसमें भी आग जलाते हैं। यह तो मैटेरियल यज्ञ नहीं है। यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ। ऐसे नहीं कहते कृष्ण ज्ञान यज्ञ। कृष्ण ने कोई यज्ञ नहीं रचा, कृष्ण तो प्रिन्स था। यज्ञ रचा जाता है आफतों के समय। इस समय सब तरफ आफतें हैं ना, बहुत मनुष्य रूद्र यज्ञ भी रचते हैं। रूद्र ज्ञान यज्ञ नहीं रचते हैं। वह तो रूद्र परमपिता परमात्मा ही आकर रचते हैं। कहते हैं यह जो रूद्र ज्ञान यज्ञ है, इसमें सबकी आहुति हो जायेगी। बाबा आया हुआ है – यज्ञ भी रचा हुआ है। जब तक राजाई स्थापन हो जाए और सब पावन बन जाएं। फट से सब तो पावन नहीं बनते। योग लगाते रहो अन्त तक। यह है ही योग की रेस। बाप को जितना जास्ती याद करते हैं, उतना दौड़ी लगाकर जाए रूद्र के गले का हार बनते हैं। फिर विष्णु के गले की माला बनेंगे। पहले रूद्र की माला फिर विष्णु की माला। पहले बाप सबको घर ले जाते हैं, जो जितना पुरूषार्थ करेंगे वही नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बन राज्य करते हैं। गोया यह आदि सनातन देवी-देवता धर्म स्थापन हो रहा है। तुमको बाप राजयोग सिखला रहे हैं। जैसे 5 हजार वर्ष पहले सिखलाया था फिर कल्प बाद सिखलाने आये हैं। शिव जयन्ती अथवा शिवरात्रि भी मनाते हैं। रात अर्थात् कलियुगी पुरानी दुनिया का अन्त, नई दुनिया का आदि। सतयुग त्रेता है दिन, द्वापर कलियुग है रात। बेहद का दिन ब्रह्मा का, फिर बेहद की रात ब्रह्मा की। कृष्ण का दिन – रात नहीं गाया जाता है। कृष्ण को ज्ञान ही नहीं रहता। ब्रह्मा को ज्ञान मिलता है शिवबाबा से। फिर तुम बच्चों को मिलता है इनसे। गोया शिवबाबा तुमको ब्रह्मा तन से ज्ञान दे रहा है। तुमको त्रिकालदर्शी बनाते हैं। मनुष्य सृष्टि में एक भी त्रिकालदर्शी कोई हो न सके। अगर होवे तो नॉलेज दे ना। यह सृष्टि चक्र कैसे फिरता है? कभी भी कोई नॉलेज दे न सके।

भगवान तो सभी का एक ही है। कृष्ण को थोड़ेही सब भगवान मानेंगे। वह तो राजकुमार है। राजकुमार भगवान होता है क्या? अगर वह राज्य करे तो फिर गँवाना भी पड़े। बाप कहते हैं तुमको विश्व का मालिक बनाए मैं फिर निर्वाणधाम में जाकर रहता हूँ। फिर जब दु:ख शुरू होता है तब मेरा पार्ट भी शुरू होता है। मैं सुनवाई करता हूँ, मुझे कहते भी हैं हे रहमदिल। भक्ति भी पहले अव्यभिचारी अर्थात् एक शिव की करते हैं फिर देवताओं की शुरू करते हैं। अभी तो व्यभिचारी भक्ति बन गई है। पुजारी भी यह नहीं जानते कि कब से पूजा शुरू होती है। शिव वा सोमनाथ एक ही बात है। शिव है निराकार। सोमनाथ क्यों कहते हैं? क्योंकि सोमनाथ बाप ने बच्चों को ज्ञान-अमृत पिलाया है। नाम तो ढेर हैं बबुलनाथ भी कहते हैं क्योंकि बबुल के जो कांटे थे उनको फूल बनाने वाला, सर्व का सद्गति दाता बाप है। उनको फिर सर्वव्यापी कहना.. यह तो ग्लानि हुई ना। बाप कहते हैं जब संगम का समय होता है तब एक ही बार मैं आता हूँ, जब भक्ति पूरी होती है तब ही मैं आता हूँ। यह नियम है। मैं आता ही एक बार हूँ। बाप एक है, अवतार भी एक है। एक ही बार आकर सबको पवित्र राजयोगी बनाता हूँ। तुम्हारा राजयोग है, सन्यासियों का है हठयोग, राजयोग सिखला न सकें। यह हठयोगियों का भी एक धर्म है भारत को थमाने के लिए। पवित्रता तो चाहिए ना। भारत 100 परसेन्ट पावन था, अभी पतित है, तब कहते हैं आकर पावन बनाओ। सतयुग है पावन जीव आत्माओं की दुनिया। अभी तो गृहस्थ धर्म पतित है। सतयुग में गृहस्थ धर्म पावन था। अब फिर से वही पावन गृहस्थ धर्म की स्थापना हो रही है। एक बाप ही सर्व का मुक्ति, जीवनमुक्ति दाता है। मनुष्य, मनुष्य को मुक्ति, जीवनमुक्ति दे न सके।

तुम हो ज्ञान सागर बाप के बच्चे। तुम ब्राह्मण सच्ची-सच्ची यात्रा करायेंगे। बाकी सब हैं झूठी यात्रा कराने वाले। तुम हो डबल अहिंसक। कोई हिंसा नहीं करते हो – न लड़ते हो, न काम कटारी चलाते हो। काम पर जीत पाने में मेहनत लगती है। विकारों को जीतना है, तुम ब्रह्माकुमार कुमारियां शिवबाबा से वर्सा लेते हो, तुम आपस में भाई-बहन ठहरे। हम अभी निराकार भगवान के बच्चे आपस में भाई-भाई हैं फिर ब्रह्मा बाबा के बच्चे हैं – तो जरूर निर्विकारी बनना चाहिए ना अर्थात् विश्व की बादशाही तुमको मिलती है। यह है बहुत जन्मों के अन्त का जन्म। कमल फूल समान पवित्र बनो, तब ऊंच पद मिलता है। अभी बाप द्वारा तुम बहुत समझदार बनते हो। सृष्टि की नॉलेज तुम्हारी बुद्धि में है। तुम हो गये स्वदर्शन चक्रधारी। स्व आत्मा को दर्शन होता है अर्थात् नॉलेज मिलती है परमपिता परमात्मा से, जिसको ही नॉलेजफुल कहते हैं। मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, चैतन्य है। अब आये हैं नॉलेज देने। एक ही बीज है, यह भी जानते हैं। बीज से झाड़ कैसे निकलता है, यह उल्टा वृक्ष है। बीज ऊपर है। पहले-पहले निकलता है दैवी झाड़, फिर इस्लामी, बौद्धी.. वृद्धि होती जाती है। यह ज्ञान अभी तुमको मिला है और कोई भी दे न सके। तुम जो सुनते हो, वह तुम्हारी ही बुद्धि में रहा। सतयुग आदि में तो शास्त्र होते नहीं। कितनी सहज 5 हजार वर्ष की कहानी है ना। अच्छा –

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) समय कम है, बहुत गई थोड़ी रही.. इसलिए जो भी श्वांस बची है – बाप की याद में सफल करना है। पुराने पाप के हिसाब-किताब को चुक्तू करना है।

2) शान्ति स्वधर्म में स्थित होने के लिए पवित्र जरूर बनना है। जहाँ पवित्रता है वहाँ शान्ति है। मेरा स्वधर्म ही शान्ति है, मैं शान्ति के सागर बाप की सन्तान हूँ.. यह अनुभव करना है।

वरदान:- अकल्याण की सीन में भी कल्याण का अनुभव कर सदा अचल-अटल रहने वाले निश्चयबुद्धि भव
ड्रामा में जो भी होता है – वह कल्याणकारी युग के कारण सब कल्याणकारी है, अकल्याण में भी कल्याण दिखाई दे तब कहेंगे निश्चयबुद्धि। परिस्थिति के समय ही निश्चय के स्थिति की परख होती है। निश्चय का अर्थ है – संशय का नाम-निशान न हो। कुछ भी हो जाए लेकिन निश्चयबुद्धि को कोई भी परिस्थिति हलचल में ला नहीं सकती। हलचल में आना माना कमजोर होना।
स्लोगन:- परमात्म प्यार के पात्र बनो तो सहज ही मायाजीत बन जायेंगे।

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Daily Murli Brahma Kumaris 28 may 2017 – Bk Murli Hindi

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28/05/17
मधुबन
“अव्यक्त-बापदाद”‘
ओम् शान्ति
03-04-82

सर्वप्रथम त्याग है – देह-भान का त्याग

बापदादा अपने त्यागमूर्त बच्चों को देख रहे हैं। हर एक ब्राह्मण आत्मा त्याग स्वरूप है – लेकिन जैसे भाग्य का सुनाया ना कि एक बाप के बच्चे होते, एक जैसा भाग्य का वर्सा मिलते, सम्भालने और बढ़ाने के आधार पर नम्बर बन जाते हैं। ऐसे त्याग मूर्त तो सभी बनें हैं, इसमें भी नम्बरवार हैं। त्याग किया और ब्राह्मण बनें लेकिन त्याग की परिभाषा बड़ी गुह्य है। कहने में तो सभी एक बात कहते कि तन-मन-धन, सम्बन्ध सबका त्याग कर लिया। लेकिन तन का त्याग अर्थात् देह के भान का त्याग। तो देह के भान का त्याग हो गया है वा हो रहा है? त्याग का अर्थ है किसी भी चीज़ को वा बात को छोड़ दिया, अपने पन से किनारा कर लिया, अपना अधिकार समाप्त हुआ। जिसके प्रति त्याग किया वह वस्तु उसकी हो गई। जिस बात का त्याग किया उसका फिर संकल्प भी नहीं कर सकते क्योंकि त्याग की हुई बात, संकल्प द्वारा प्रतिज्ञा की हुई बात फिर से वापिस नहीं ले सकते हो। जैसे हद के सन्यासी अपने घर का, सम्बन्ध का त्याग करके जाते हैं और अगर फिर वापिस आ जाएं तो उसको क्या कहा जायेगा! नियम प्रमाण वापिस नहीं आ सकते। ऐसे आप ब्राह्मण बेहद के सन्यासी वा त्यागी हो। आप त्याग मूर्तियों ने अपने इस पुराने घर अर्थात् पुराने शरीर, पुराने देह का भान त्याग किया, संकल्प किया कि बुद्धि द्वारा फिर से कब इस पुराने घर में आकर्षित नहीं होंगे। संकल्प द्वारा भी फिर से वापिस नहीं आयेंगे। पहला-पहला यह त्याग किया इसलिए तो कहते हो देह सहित देह के सम्बन्ध का त्याग। देह के भान का त्याग। तो त्याग किए हुए पुराने घर में फिर से वापिस तो नहीं आ जाते हो! वायदा क्या किया है? तन भी तेरा कहा वा सिर्फ मन तेरा कहा? पहला शब्द “तन” आता है। जैसे तन-मन-धन कहते हो, देह और देह के सम्बन्ध कहते हो। तो पहला त्याग क्या हुआ? इस पुराने देह के भान से विस्मृति अर्थात् किनारा। यह पहला कदम है त्याग का। जैसे घर में घर की सामग्री (सामान) होती है, ऐसे इस देह रूपी घर में भिन्न-भिन्न कर्मेन्द्रियां ही सामग्री हैं। तो घर का त्याग अर्थात् सर्व का त्याग। घर को छोड़ा लेकिन कोई एक चीज़ में ममता रह गई तो उसको त्याग कहेंगे? ऐसे कोई भी कर्मेन्द्रिय अगर अपने तरफ आकर्षित करती है तो क्या उसको सम्पूर्ण त्याग कहेंगे? इसी प्रकार अपनी चेंकिग करो। ऐसे अलबेले नहीं बनना कि और तो सब छोड़ दिया बाकी कोई एक कर्मेन्द्रिय विचलित होती है वह भी समय पर ठीक हो जायेगी। लेकिन कोई एक कर्मेन्द्रिय की आकर्षण भी एक बाप का बनने नहीं देगी। एकरस स्थिति में स्थित होने नहीं देगी। नम्बरवन में जाने नहीं देगी। अगर कोई हीरे-जवाहर, महल-माड़ियां छोड़ दे और सिर्फ कोई मिट्टी के फूटे हुए बर्तन में भी मोह रह जाए तो क्या होगा? जैसे हीरा अपनी तरफ आकर्षित करता, वैसे हीरे से भी ज्यादा वह फूटा हुआ बर्तन उसको अपनी तरफ बार-बार आकर्षित करेगा। न चाहते भी बुद्धि बार-बार वहाँ भटकती रहेगी। ऐसे अगर कोई भी कर्मेन्द्रिय की आकर्षण रही हुई है तो श्रेष्ठ पद पाने से बार-बार नीचे ले आयेगी। तो पुराने घर और पुरानी सामग्री सबका त्याग चाहिए। ऐसे नहीं समझो यह तो बहुत थोड़ा है, लेकिन यह थोड़ा भी बहुत कुछ गंवाने वाला है, सम्पूर्ण त्याग चाहिए। इस पुरानी देह को बापदादा द्वारा मिली हुई अमानत समझो। सेवा अर्थ कार्य में लगाना है। यह मेरी देह नहीं लेकिन सेवा अर्थ अमानत है। जैसे मेहमान बन देह में रह रहे हैं। थोड़े समय के लिए बापदादा ने कार्य के लिए आपको यह तन दिया है। तो आप क्या बन गये? मेहमान! मेरे-पन का त्याग और मेहमान समझ महान कार्य में लगाओ। मेहमान को क्या याद रहता है? असली घर याद रहता है या उसी में ही फंस जाते हो! तो आप सबका यह शरीर रूपी घर भी यह फरिश्ता स्वरूप है, फिर देवता स्वरूप है। उसको याद करो। इस पुराने शरीर में ऐसे ही निवास करो जैसे बापदादा पुराने शरीर का आधार लेते हैं लेकिन शरीर में फंस नहीं जाते हैं। कर्म के लिए आधार लिया और फिर अपने फरिश्ते स्वरूप में स्थित हो जाओ। अपने निराकारी स्वरूप में स्थित हो जाओ। न्यारेपन की ऊपर की ऊंची स्थिति से नीचे साकार कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करने लिए आओ, इसको कहा जाता है मेहमान अर्थात् महान। ऐसे रहते हो? त्याग का पहला कदम पूरा किया है?

बापदादा हंसी की बात यह सुनते हैं कि वर्तमान समय कोई भी अपने को कम नहीं समझते। अगर किसी को भी कहा जाए कि दो में से एक छोटा, एक बड़ा बन जाए तो क्या करते हैं! अपने को कम समझते हैं? क्यों, क्या के शस्त्र लेकर उल्टा शक्ति स्वरूप दिखाते हैं। यह भी अलंकार कोई कम नहीं हैं। जैसे सर्व शक्तियों के अलंकार हैं, वैसे माया वा रावण की भुजायें भी कोई कम नहीं हैं। शक्तियों को भुजायें धारी दिखाया है। अष्ट भुजाधारी, 16 भुजाधारी भी दिखाते हैं लेकिन रावण के सिर ज्यादा दिखाते हैं। यह क्यों? क्योंकि रावण माया की शक्ति पहले दिमाग को ही हलचल में लाती है। जिस समय कोई भी माया आती है तो सेकेण्ड में उसके कितने रूप होते हैं? क्यों, क्या, ऐसे, वैसे, जैसे कितने क्वेश्चन के सिर पैदा हो जाते हैं। एक काटते हैं तो दूसरा पैदा हो जाता है। एक ही समय में 10 बातें बुद्धि में फौरन आ जाती हैं। तो एक बात को 10 सिर लग गये ना! इन बातों का तो अनुभव है ना? फिर एक-एक सिर अपना रूप दिखाता है। यही 10 शीश के शस्त्रधारी बन जाते हैं।

शक्ति अर्थात् सहयोगी। अभिमान के सिर वाली शक्ति नहीं लेकिन सदा सर्व भुजाधारी अर्थात् सर्व परिस्थिति में सहयोगी। रावण के 10 सिर वाली आत्मायें हर छोटी-सी परिस्थिति में भी कभी सहयोगी नहीं बनेंगी। क्यों, क्या, कैसे के सिर द्वारा अपना उल्टा अभिमान प्रत्यक्ष करती रहेंगी। क्यों का क्वेश्चन हल करेंगी तो फिर कैसे का सिर ऊंचा हो जायेगा अर्थात् एक बात को सुलझायेंगी तो फिर दूसरी बात शुरू कर देंगी। दूसरी बात को ठीक करेंगी तो तीसरा सिर पैदा हो जायेगा। बार-बार कहेंगे यह बात तो ठीक है लेकिन यह क्यों? वह क्यों? इसको कहा जाता है कि एक बात के 10 शीश लगाने वाली शक्ति। सहयोगी कभी नहीं बनेंगे, सदा हर बात में अपोजीशन करेंगे। तो अपोजीशन करने वाले रावण सप्रदाय हो गये ना। चाहे ब्राह्मण बन गये लेकिन उस समय के लिए आसुरी शक्ति का प्रभाव होता है, वशीभूत होते हैं। और शक्ति स्वरूप हर परिस्थिति में, हर कार्य में सदा सहयोगी होंगे। सहयोग की निशानी भुजायें हैं, इसलिए कभी भी कोई संगठित कार्य होता है तो क्या शब्द बोलते हो? अपनी-अपनी अंगुली दो, तो यह सहयोग देना हुआ ना। अंगुली भी भुजा में है ना। तो भुजायें सहयोग की ही निशानी हैं। तो समझा शक्ति की भुजायें और रावण के सिर। तो अपने को देखो कि सदा के सहयोगी मूर्त बने हैं? त्याग मूर्त बनने का पहला कदम फालो फादर के समान किया है? ब्रह्मा बाप को देखा, सुना – संकल्प में, मुख में सदैव क्या रहा? यह बाप का रथ है। तो आपका रथ किसका है? क्या सिर्फ ब्रह्मा ने रथ दिया वा आप लोगों ने भी रथ दिया? ब्रह्मा का प्रवेशता का पार्ट अलग है लेकिन आप सबने भी तन तेरा कहा – न कि तन मेरा। आप सबका भी वायदा है जैसे चलाओ, जहाँ बिठाओ… यह वायदा है ना? वा आंख को मैं चलाऊंगा, बाकी को बाप चलायें? कुछ मनमत पर चलेंगे, कुछ श्रीमत पर चलेंगे। ऐसा वायदा तो नहीं है ना? तो कोई भी कर्मेन्द्रिय के वशीभूत होना – यह श्रीमत है वा मनमत है? तो समझा, त्याग की परिभाषा कितनी गुह्य है! इसलिए नम्बर बन गये हैं। अभी तो सिर्फ देह के त्याग की बात सुनाई है। आगे और बहुत हैं। अभी तो त्याग की सीढ़ियां भी बहुत हैं, यह पहली सीढ़ी की बात कर रहे हैं। त्याग मुश्किल तो नहीं लगता? सबको छोड़ना पड़ेगा। अगर पुराने के बदले नया मिल जाए तो मुश्किल है क्या! अभी-अभी मिलता है। भविष्य मिलना तो कोई बड़ी नहीं लेकिन अभी-अभी पुराना भान छोड़ो, फरिश्ता स्वरूप लो। जब पुरानी दुनिया के देह का भान छोड़ देते हो तो क्या बन जाते हो? डबल लाइट। अभी ही बनते हो। परन्तु अगर न यहाँ के न वहाँ के रहते हो तो मुश्किल लगता है। न पूरा छोड़ते हो, न पूरा लेते हो तो अधमरे हो जाते हो, इसलिए बार-बार लम्बा श्वास उठाते हो। कोई भी बात मुश्किल होती तो लम्बा श्वास उठता है। मरने में तो मजा है – लेकिन पूरा मरो तो। लेने में कहते हो पूरा लेंगे और छोड़ने में मिट्टी के बर्तन भी नहीं छोड़ेंगे इसलिए मुश्किल हो जाता है। वैसे तो अगर कोई मिट्टी का बर्तन रखता है तो बापदादा रखने भी दें, बाप को क्या परवाह है, भले रखो। लेकिन स्वयं ही परेशान होते हो इसलिए बापदादा कहते हैं छोड़ो। अगर कोई भी पुरानी चीज़ रखते हो तो रिजल्ट क्या होती है? बार-बार बुद्धि भी उन्हों की ही भटकती है। फरिश्ता बन नहीं सकते इसलिए बापदादा तो और भी हजारों मिट्टी के बर्तन दे सकते हैं – कितने भी इकट्ठे कर लो लेकिन जहाँ किचड़ा होगा वहाँ क्या पैदा होंगे? मच्छर! और मच्छर किसको काटेंगे? तो बापदादा बच्चों के कल्याण के लिए ही कहते हैं पुराना छोड़ दो। अधमरे नहीं बनो। मरना है तो पूरा मरो, नहीं तो भले ही जिंदा रहो। मुश्किल है नहीं लेकिन मुश्किल बना देते हो। कभी-कभी मुश्किल हो जाता है। जब रावण के सिर लग जाते हैं तो मुश्किल होता है। जब भुजाधारी शक्ति बन जाते हो तो सहज हो जाता है। सिर्फ एक कदम सहयोग देना और पदम कदमों का सहयोग मिलना हो जाता। लेकिन पहले जो एक कदम देना पड़ता है उसमें घबरा जाते हो। मिलना भूल जाता है, देना याद आ जाता है इसलिए मुश्किल अनुभव होता है। अच्छा।

ऐसे सदा सहयोग मूर्त, सदा त्याग द्वारा श्रेष्ठ भाग्य अनुभव करने वाले, कदम-कदम में फालो फादर करने वाले सदा अपने को मेहमान अर्थात् महान आत्मा समझने वाले, ऐसे बेहद के सन्यास करने वाले श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों के साथ – अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

1- परिस्थिति रूपी पहाड़ को स्वस्थिति से जम्प देकर पार करो:-

अपने को सदा समर्थ आत्मायें समझते हो! समर्थ आत्मा अर्थात् सदा माया को चेलेन्ज कर विजय प्राप्त करने वाले। सदा समर्थ बाप के संग में रहने वाले। जैसे बाप सर्वशक्तिमान है वैसे हम भी मास्टर सर्वशक्तिमान हैं। सर्व शक्तियां शस्त्र हैं, अलंकार हैं, ऐसे अलंकारधारी आत्मा समझते हो? जो सदा समर्थ हैं वे कभी परिस्थितियों में डगमग नहीं होंगे। परिस्थिति को पार कर सकते हो। जैसे विमान द्वारा उड़ते हुए कितने पहाड़, कितने समुद्र पार कर लेते हैं, क्योंकि ऊंचाई पर उड़ते हैं। तो ऊंची स्थिति से सेकेण्ड में पार कर लेंगे। ऐसे लगेगा जैसे पहाड़ को वा समुद्र को भी जम्प दे दिया। मेहनत का अनुभव नहीं होगा।

2- रोब को त्याग रूहाब को धारण करने वाले सच्चे सेवाधारी बनो:-

सभी कुमार सदा रूहानियत में रहते हो, रोब में तो नहीं आते? यूथ को रोब जल्दी आ जाता है। यह समझते हैं हम सब कुछ जानते हैं, सब कर सकते हैं। जवानी का जोश रहता है। लेकिन रूहानी यूथ अर्थात् सदा रूहाब में रहने वाले। सदा नम्रचित क्योंकि जितना नम्रचित होंगे उतना निर्माण करेंगे। जहाँ निर्माण होंगे वहाँ रोब नहीं होगा, रूहानियत होगी। जैसे बाप कितना नम्रचित बनकर आते हैं, ऐसे फालो फादर। अगर जरा भी सेवा में रोब आया तो वह सेवा समाप्त हो जाती है। अच्छा – ओम् शान्ति।

वरदान:- बाप की समीपता के अनुभव द्वारा स्वप्न में भी विजयी बनने वाले समान साथी भव
भक्ति मार्ग में समीप रहने के लिए सतसंग का महत्व बताते हैं। संग अर्थात् समीप वही रह सकता है जो समान है। जो संकल्प में भी सदा साथ रहते हैं वह इतने विजयी होते हैं जो संकल्प में तो क्या लेकिन स्वप्न मात्र भी माया वार नहीं कर सकती। सदा मायाजीत अर्थात् सदा बाप के समीप संग में रहने वाले। कोई की ताकत नहीं जो बाप के संग से अलग कर सके।
स्लोगन:- सदा निर्विघ्न रहना और सर्व को निर्विघ्न बनाना – यही यथार्थ सेवा है।

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