daily murli 8 july

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 8 JULY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 8 July 2020

Murli Pdf for Print : – 

08-07-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम्हारी पढ़ाई का फाउन्डेशन है प्योरिटी, प्योरिटी है तब योग का जौहर भर सकेगा, योग का जौहर है तो वाणी में शक्ति होगी”
प्रश्नः- तुम बच्चों को अभी कौन-सा प्रयत्न पूरा-पूरा करना है?
उत्तर:- सिर पर जो विकर्मों का बोझा है उसे उतारने का पूरा-पूरा प्रयत्न करना है। बाप का बनकर कोई विकर्म किया तो बहुत ज़ोर से गिर पड़ेंगे। बी.के. की अगर निंदा कराई, कोई तकलीफ दी तो बहुत पाप हो जायेगा। फिर ज्ञान सुनने-सुनाने से कोई फायदा नहीं।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप बच्चों को समझा रहे हैं कि तुम पतित से पावन बन पावन दुनिया का मालिक कैसे बन सकते हो! पावन दुनिया को स्वर्ग अथवा विष्णुपुरी, लक्ष्मी-नारायण का राज्य कहा जाता है। विष्णु अर्थात् लक्ष्मी-नारायण का कम्बाइन्ड चित्र ऐसा बनाया है, इसलिए समझाया जाता है। बाकी विष्णु की जब पूजा करते हैं तो समझ नहीं सकते कि यह कौन हैं? महालक्ष्मी की पूजा करते हैं परन्तु समझते नहीं कि यह कौन है? बाबा अभी तुम बच्चों को भिन्न-भिन्न रीति से समझाते हैं। अच्छी रीति धारण करो। कोई-कोई की बुद्धि में रहता है कि परमात्मा तो सब कुछ जानते हैं। हम जो कुछ अच्छा वा बुरा करते हैं वह सब जानते हैं। अब इसको अन्धश्रद्धा का भाव कहा जाता है। भगवान इन बातों को जानते ही नहीं। तुम बच्चे जानते हो भगवान तो है पतितों को पावन बनाने वाला। पावन बनाकर स्वर्ग का मालिक बनाते हैं फिर जो अच्छी रीति पढ़ेंगे वह ऊंच पद पायेंगे। बाकी ऐसे नहीं समझना है कि बाप सबके दिलों को जानते हैं। यह फिर बेसमझी कही जायेगी। मनुष्य जो कर्म करते हैं उनका फिर अच्छा या बुरा ड्रामा अनुसार उनको मिलता ही है। इसमें बाप का कोई कनेक्शन ही नहीं। यह ख्याल कभी नहीं करना है कि बाबा तो सब कुछ जानते ही हैं। बहुत हैं जो विकार में जाते, पाप करते रहते हैं और फिर यहाँ अथवा सेन्टर्स पर आ जाते हैं। समझते हैं बाबा तो जानते हैं। परन्तु बाबा कहते हम यह धंधा ही नहीं करते। जानी जाननहार अक्षर भी रांग है। तुम बाप को बुलाते हो कि आकर पतित से पावन बनाओ, स्वर्ग का मालिक बनाओ क्योंकि जन्म-जन्मान्तर के पाप सिर पर बहुत हैं। इस जन्म के भी हैं। इस जन्म के पाप बतलाते भी हैं। बहुतों ने ऐसे पाप किये हैं जो पावन बनना बड़ा मुश्किल लगता है। मुख्य बात है ही पावन बनने की। पढ़ाई तो बहुत सहज है, परन्तु विकर्मों का बोझा कैसे उतरे उसका प्रयत्न करना चाहिए। ऐसे बहुत हैं अथाह पाप करते हैं, बहुत डिससर्विस करते हैं। बी.के. आश्रम को तकलीफ देने की कोशिश करते हैं। इसका बहुत पाप चढ़ता है। वह पाप आदि कोई ज्ञान देने से नहीं मिट सकेंगे। पाप मिटेंगे फिर भी योग से। पहले तो योग का पूरा पुरुषार्थ करना चाहिए, तब किसको तीर भी लग सकेगा। पहले पवित्र बनें, योग हो तब वाणी में भी जौहर भरेगा। नहीं तो भल किसको कितना भी समझायेंगे, किसको बुद्धि में जँचेगा नहीं, तीर लगेगा नहीं। जन्म-जन्मान्तर के पाप हैं ना। अभी जो पाप करते हैं, वह तो जन्म-जन्मान्तर से भी बहुत हो जाते हैं इसलिए गाया जाता है सतगुरू के निंदक… यह सत बाबा, सत टीचर, सतगुरू है। बाप कहते हैं बी.के. की निंदा कराने वाले का भी पाप बहुत भारी है। पहले खुद तो पावन बनें। किसको समझाने का बहुत शौक रखते हैं। योग पाई का भी नहीं, इससे फायदा क्या? बाप कहते हैं मुख्य बात है ही याद से पावन बनने की। पुकारते भी पावन बनने के लिए हैं। भक्ति मार्ग में एक आदत पड़ गई है, धक्के खाने की, फालतू आवाज़ करने की। प्रार्थना करते हैं परन्तु भगवान को कान कहाँ हैं, बिगर कान, बिगर मुख, सुनेंगे, बोलेंगे कैसे? वह तो अव्यक्त है। यह सब है अन्धश्रद्धा।

तुम बाप को जितना याद करेंगे उतना पाप नाश होंगे। ऐसे नहीं कि बाप जानते हैं – यह बहुत याद करता है, यह कम याद करता है, यह तो अपना चार्ट खुद को ही देखना है। बाप ने कहा है याद से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। बाबा भी तुमसे ही पूछते हैं कि कितना याद करते हो? चलन से भी मालूम पड़ता है। सिवाए याद के पाप कट नहीं सकते। ऐसे नहीं, किसको ज्ञान सुनाते हो तो तुम्हारे वा उनके पाप कट जायेंगे। नहीं, जब खुद याद करें तब पाप कटें। मूल बात है पावन बनने की। बाप कहते हैं मेरे बने हो तो कोई पाप नहीं करो। नहीं तो बहुत ज़ोर से गिर पड़ेंगे। उम्मीद भी नहीं रखनी है कि हम अच्छा पद पा सकेंगे। प्रदर्शनी में बहुतों को समझाते हैं तो बस खुश हो जाते हैं, हमने बहुत सर्विस की। परन्तु बाप कहते हैं पहले तुम तो पावन बनो। बाप को याद करो। याद में बहुत फेल होते हैं। ज्ञान तो बहुत सहज है, सिर्फ 84 के चक्र को जानना है, उस पढ़ाई में कितने हिसाब-किताब पढ़ते हैं, मेहनत करते हैं। कमायेंगे क्या? पढ़ते-पढ़ते मर जाएं तो पढ़ाई खत्म। तुम बच्चे तो जितना याद में रहेंगे उतना धारणा होगी। पवित्र नहीं बनेंगे, पाप नहीं मिटायेंगे तो बहुत सज़ा खानी पड़ेगी। ऐसे नहीं, हमारी याद तो बाबा को पहुँचती ही है। बाबा क्या करेंगे! तुम याद करेंगे तो तुम पावन बनेंगे, बाबा उसमें क्या करेंगे, क्या शाबास देंगे। बहुत बच्चे हैं जो कहते हैं हम तो सदैव बाप को याद करते ही रहते हैं, उनके बिगर हमारा है ही कौन? यह भी गपोड़ा मारते रहते हैं। याद में तो बड़ी मेहनत है। हम याद करते हैं वा नहीं, यह भी समझ नहीं सकते। अनजाने से कह देते हम तो याद करते ही हैं। मेहनत बिगर कोई विश्व का मालिक थोड़ेही बन सकते। ऊंच पद पा न सकें। याद का जौहर जब भरे तब सर्विस कर सकें। फिर देखा जाए कितनी सर्विस कर प्रजा बनाई। हिसाब चाहिए ना। हम कितने को आपसमान बनाते हैं। प्रजा बनानी पड़े ना, तब राजाई पद पा सकते। वह तो अभी कुछ है नहीं। योग में रहें, जौहर भरे तब किसको पूरा तीर लगे। शास्त्रों में भी है ना – पिछाड़ी में भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य आदि को ज्ञान दिया। जब तुम्हारा पतितपना निकल सतोप्रधान तक आत्मा आ जाती है तब जौहर भरता है तो झट तीर लग जाता है। यह कभी ख्याल नहीं करो कि बाबा तो सब कुछ जानते हैं। बाबा को जानने की क्या दरकार है, जो करेंगे सो पायेंगे। बाबा साक्षी हो देखते रहते हैं। बाबा को लिखते हैं हमने फलानी जगह जाकर सर्विस की, बाबा पूछेंगे पहले तुम याद की यात्रा पर तत्पर हो? पहली बात ही यह है – और संग तोड़ एक बाप संग जोड़ो। देही-अभिमानी बनना पड़े। घर में रहते भी समझना है यह तो पुरानी दुनिया, पुरानी देह है। यह सब खलास होना है। हमारा काम है बाप और वर्से से। बाबा ऐसे नहीं कहते कि गृहस्थ व्यवहार में नहीं रहो, कोई से बात न करो। बाबा से पूछते हैं शादी पर जायें? बाबा कहेंगे भल जाओ। वहाँ भी जाकर सर्विस करो। बुद्धि का योग शिवबाबा से हो। जन्म-जन्मान्तर के विकर्म याद बल से ही भस्म होंगे। यहाँ भी अगर विकर्म करते हैं तो बहुत सज़ायें भोगनी पड़ें। पावन बनते-बनते विकार में गिरा तो मरा। एकदम पुर्जा-पुर्जा हो जाते। श्रीमत पर न चल बहुत नुकसान करते हैं। कदम-कदम पर श्रीमत चाहिए। ऐसे-ऐसे पाप करते हैं जो योग लग न सके। याद कर न सकें। कोई को जाकर कहेंगे – भगवान आया है, उनसे वर्सा लो, तो वह मानेंगे नहीं। तीर लगेगा नहीं। बाबा ने कहा है भक्तों को ज्ञान सुनाओ, व्यर्थ किसको न दो, नहीं तो और ही निंदा करायेंगे।

कई बच्चे बाबा से पूछते हैं – बाबा हमको दान करने की आदत है, अब तो ज्ञान में आ गये हैं, अब क्या करें? बाबा राय देते हैं – बच्चे, गरीबों को दान देने वाले तो बहुत हैं। गरीब कोई भूख नहीं मरते हैं, फ़कीरों के पास बहुत पैसे पड़े रहते हैं इसलिए इन सब बातों से तुम्हारी बुद्धि हट जानी चाहिए। दान आदि में भी बहुत खबरदारी चाहिए। बहुत ऐसे-ऐसे काम करते हैं, बात मत पूछो और फिर खुद समझते नहीं कि हमारे सिर पर बोझा बहुत भारी होता जाता है। ज्ञान मार्ग कोई हंसीकुडी का मार्ग नहीं है। बाप के साथ तो फिर धर्मराज भी है। धर्मराज के बड़े-बड़े डन्डे खाने पड़ते हैं। कहते हैं ना जब पिछाड़ी में धर्मराज लेखा लेंगे तब पता पड़ेगा। जन्म-जन्मान्तर की सज़ायें खाने में कोई टाइम नहीं लगता है। बाबा ने काशी कलवट का भी मिसाल समझाया है। वह है भक्ति मार्ग, यह है ज्ञान मार्ग। मनुष्यों की भी बलि चढ़ाते हैं, यह भी ड्रामा में नूँध है। इन सब बातों को समझना है, ऐसे नहीं कि यह ड्रामा बनाया ही क्यों? चक्र में लाया ही क्यों? चक्र में तो आते ही रहेंगे। यह तो अनादि ड्रामा है ना। चक्र में न आओ तो फिर दुनिया ही न रहे। मोक्ष तो होता नहीं। मुख्य का भी मोक्ष नहीं हो सकता। 5 हज़ार वर्ष के बाद फिर ऐसे ही चक्र लगायेंगे। यह तो ड्रामा है ना। सिर्फ कोई को समझाने, वाणी चलाने से पद नहीं मिल जायेगा, पहले तो पतित से पावन बनना है। ऐसे नहीं बाबा तो सब जानते हैं। बाबा जान करके भी क्या करेंगे, पहले तो तुम्हारी आत्मा जानती है श्रीमत पर हम क्या करते हैं, कहाँ तक बाबा को याद करते हैं? बाकी बाबा यह बैठकर जाने, इससे फायदा ही क्या? तुम जो कुछ करते हो सो तुम पायेंगे। बाबा तुम्हारी एक्ट और सर्विस से जानते हैं – यह बच्चा अच्छी सर्विस करते हैं। फलाने ने बाबा का बनकर बहुत विकर्म किये हैं तो उसकी मुरली में जौहर भर न सके। यह ज्ञान तलवार है। उसमें याद बल का जौहर चाहिए। योगबल से तुम विश्व पर विजय प्राप्त करते हो, बाकी ज्ञान से नई दुनिया में ऊंच पद पायेंगे। पहले तो पवित्र बनना है, पवित्र बनने बिगर ऊंच पद मिल न सके। यहाँ आते हैं नर से नारायण बनने के लिए। पतित थोड़ेही नर से नारायण बनेंगे। पावन बनने की पूरी युक्ति चाहिए। अनन्य बच्चे जो सेन्टर्स सम्भालते हैं उनको भी बड़ी मेहनत करनी पड़े, इतनी मेहनत नहीं करते हैं इसलिए वह जौहर नहीं भरता, तीर नहीं लगता, याद की यात्रा कहाँ! सिर्फ प्रदर्शनी में बहुतों को समझाते हैं, पहले याद से पवित्र बनना है फिर है ज्ञान। पावन होंगे तो ज्ञान की धारणा होगी। पतित को धारणा होगी नहीं। मुख्य सब्जेक्ट है याद की। उस पढ़ाई में भी सब्जेक्ट होती हैं ना। तुम्हारे पास भी भल बी.के. बनते हैं परन्तु ब्रह्माकुमार-कुमारी, भाई-बहन बनना मासी का घर नहीं है। सिर्फ कहने मात्र नहीं बनना है। देवता बनने के लिए पहले पवित्र जरूर बनना है। फिर है पढ़ाई। सिर्फ पढ़ाई होगी पवित्र नहीं होंगे तो ऊंच पद नहीं पा सकेंगे। आत्मा पवित्र चाहिए। पवित्र हो तब पवित्र दुनिया में ऊंच पद पा सके। पवित्रता पर ही बाबा ज़ोर देते हैं। बिगर पवित्रता किसको ज्ञान दे न सके। बाकी बाबा देखते कुछ भी नहीं है। खुद बैठे हैं ना, सब बातें समझाते हैं। भक्ति मार्ग में भावना का भाड़ा मिल जाता है। वह भी ड्रामा में नूँध है, शरीर बिगर बाप बात कैसे करेंगे? सुनेंगे कैसे? आत्मा को शरीर है तब सुनती बोलती है। बाबा कहते हैं मुझे आरगन्स ही नहीं तो सुनूँ, जानूँ कैसे? समझते हैं बाबा तो जानते हैं हम विकार में जाते हैं। अगर नहीं जानते हैं तो भगवान ही नहीं मानेंगे। ऐसे भी बहुत होते हैं। बाप कहते हैं मैं आया हूँ तुमको पावन बनाने का रास्ता बताने। साक्षी हो देखता हूँ। बच्चों की चलन से मालूम पड़ जाता है – यह कपूत है वा सपूत है? सर्विस का भी सबूत चाहिए ना। यह भी जानते हैं जो करता है सो पाता है। श्रीमत पर चलेगा तो श्रेष्ठ बनेगा। नहीं चलेगा तो खुद ही गंदा बनकर गिरेगा। कोई भी बात है तो क्लीयर पूछो। अन्धश्रद्धा की बात नहीं। बाबा सिर्फ कहते हैं याद का जौहर नहीं होगा तो पावन कैसे बनेंगे? इस जन्म में भी पाप ऐसे-ऐसे करते हैं बात मत पूछो। यह है ही पाप आत्माओं की दुनिया, सतयुग है पुण्य आत्माओं की दुनिया। यह है संगम। कोई तो डलहेड हैं तो धारणा कर नहीं सकते। बाबा को याद नहीं कर सकते। फिर टू लेट हो जायेंगे, भंभोर को आग लग जायेगी फिर योग में भी रह नहीं सकेंगे। उस समय तो हाहाकार मच जाती है। बहुत दु:ख के पहाड़ गिरने वाले हैं। यही फुरना रहना चाहिए कि हम अपना राज्य-भाग्य तो बाप से ले लेवें। देह-अभिमान छोड़ सर्विस में लग जाना चाहिए। कल्याणकारी बनना है। धन व्यर्थ नहीं गँवाना है। जो लायक ही नहीं ऐसे पतित को कभी दान नहीं देना चाहिए, नहीं तो दान देने वाले पर भी आ जाता है। ऐसे नहीं कि ढिंढोरा पीटना है कि भगवान आया है। ऐसे भगवान कहलाने वाले भारत में बहुत हैं। कोई मानेंगे नहीं। यह तुम जानते हो तुमको रोशनी मिली है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) पढ़ाई के साथ-साथ पवित्र जरूर बनना है। ऐसा लायक वा सपूत बच्चा बन सर्विस का सबूत देना है। श्रीमत पर स्वयं को श्रेष्ठ बनाना है।

2) स्थूल धन भी व्यर्थ नहीं गँवाना है। पतितों को दान नहीं करना है। ज्ञान धन भी पात्र को देखकर देना है।

वरदान:- सदा मोल्ड होने की विशेषता से सम्पर्क और सेवा में सफल होने वाले सफलतामूर्त भव
जिन बच्चों में स्वयं को मोल्ड करने की विशेषता है वह सहज ही गोल्डन एज की स्टेज तक पहुंच सकते हैं। जैसा समय, जैसे सरकमस्टांश हो उसी प्रमाण अपनी धारणाओं को प्रत्यक्ष करने के लिए मोल्ड होना पड़ता है। मोल्ड होने वाले ही रीयल गोल्ड हैं। जैसे साकार बाप की विशेषता देखी – जैसा समय, जैसा व्यक्ति वैसा रूप – ऐसे फालो फादर करो तो सेवा और सम्पर्क सबमें सहज ही सफलतामूर्त बन जायेंगे।
स्लोगन:- जहाँ सर्वशक्तियां हैं वहाँ निर्वि5घ्न सफलता साथ है।

TODAY MURLI 8 JULY 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 8 July 2020

08/07/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, the foundation of your study is purity. Only when there is purity are you able to fill yourself with the power of yoga. Only when there is the power of yoga can that power be carried in your words.
Question: What full effort must you children make?
Answer: Make full effort to remove the burden of sins on your head. If, after belonging to the Father, you commit any sins, you will fall very hard. If you cause the BKs to be defamed or cause them any other difficulty, you will accumulate a lot of sin. There will then be no benefit in your listening to or relating this knowledge.

Om shanti. The spiritual Father explains to you children how you can become pure from impure and become the masters of the pure world. The pure world of heaven is also called the land of Vishnu and the kingdom of Lakshmi and Narayan. Vishnu means the combined form of Lakshmi and Narayan has been made. This is why the explanation is given in that way. However, when they worship Vishnu, they don’t know who he is. They also worship Mahalakshmi, but they don’t know who she is either. Baba now explains to you children in various ways. Imbibe this very well. Some people believe that the Supreme Soul knows everything, that whatever we do, whether good or bad, He knows it all. That is called a feeling of blind faith. God doesn’t know about those things. You children know that God is the Purifier, the One who purifies the impure. He purifies them and then makes them into the masters of heaven. Those who study well will claim a high status, but don’t think that the Father knows what is in each one’s heart. That is called being senseless. Whatever actions human beings perform, they definitely receive the return of them whether good or bad, according to the drama. The Father has no connection with that. You should never think that Baba knows everything anyway. There are many who indulge in vice and continue to commit sin and who still come here or go to the centres. They think, “Baba knows anyway!” However, Baba says: I don’t do that business. Their understanding of the word “Janijananhar” (One who knows the secrets within) is wrong. You call out to the Father to come and make you pure from impure and to make you into the masters of heaven, because of the many sins of many births on your head. There are also the sins of this birth. You have to confess your sins of this birth. Many have committed such sins that they find it very difficult to become pure. The main thing is to become pure. The study is very easy, but you have to make effort as to how to remove the burden of sins. There are many who commit a lot of sin and thereby do a lot of disservice. They try to cause difficulties for the Brahma Kumaris’ ashram. They accumulate a lot of sin by doing that. Sins cannot be erased by giving knowledge to others. Only by having yoga can sins be erased. First of all, make full effort for yoga, for only then will the arrow strike someone. Only when you first become pure and have yoga can there be that power in your words. Otherwise, no matter how much you explain to others, the arrow will not strike them. Therefore, it will not enter their intellects. There are the sins of many births. The sins that are committed now become much greater than the sins of many previous births. This is why it is said: Those who defame the Satguru cannot reach their destination. That One is the true Baba, the true Teacher and the true Guru. The Father says: Those who cause the Brahma Kumaris to be defamed will also accumulate a lot of sin. First of all, you have to become pure yourself. Some have a lot of interest in explaining to others, but there isn’t a penny’s worth of yoga. Therefore, what benefit would there be? The Father says: The main thing is to become pure by having remembrance. People call out in order to become pure. On the path of devotion, they have developed the habit of simply stumbling around and making a lot of unnecessary noise. They pray to God, but God doesn’t have ears. How could He hear or say anything without ears or a mouth? He is avyakt (subtle). All of that is blind faith. The more you remember the Father, the more you will be absolved of your sins. Don’t think that the Father knows everything, that this one is remembering Me a great deal, or that that one is remembering Me very little. Each of you has to look at your own chart. The Father has told you: It is only by having remembrance that you will be absolved of your sins. Baba also asks you how much you remember Him. This can also be seen from your behaviour. You cannot be absolved of sin other than by having remembrance. It isn’t that you and the other person will be absolved of sin by your relating knowledge to him; no. Only when you stay in remembrance yourself can your sins be cut away. The main thing is to become pure. The Father says: Now that you belong to Me, don’t commit any sin. Otherwise, you will fall very badly. You will then have no hope at all of claiming a high status. When you explain to many at an exhibition, you become very happy, thinking that you have done a lot of service. However, the Father says: First of all, you must at least become pure. Remember the Father! Many fail in remembrance. Knowledge is very easy. You simply have to know the cycle of 84 births. In other studies, they have to study mathematics and make plenty of effort. What will they earn? If someone dies while studying, that study is finished. When you stay in remembrance, you are able to imbibe knowledge. By your not becoming pure and having your sins erased, there would be a lot of punishment experienced. Don’t think that your remembrance reaches Baba anyway. What would Baba do with that? If you remember Baba, you become pure. What does Baba have to do with that? Would Baba say “Well done!” to you? Many children say: I constantly remember the Father. “Who else do I have apart from Him?” They continue to tell lies in this way. A lot of effort is required for remembrance. They can’t even understand whether they are remembering Baba or not. Ignorantly, they say that they are always in remembrance. No one can become a master of the world and claim a high status without making effort. Only when you have the power of remembrance are you able to do service. Then, it will be seen how much service you have done and how many subjects you have created. There has to be the account of that. How many have I made equal to myself? You have to create subjects first. Only then can you claim a royal status. There isn’t any of that at the moment. Only when you stay in yoga and fill yourself with that power will the arrow strike someone accurately. It is mentioned in the scripture (Mahabharata) that Bhishampitamai and Dronacharya etc. received knowledge at the end. When all impurity has been removed from a soul and that soul has become satopradhan, there will be power in that soul and the arrow will quickly strike others. Never think that Baba knows everything. Why would Baba need to know anything? Those who do something receive the reward of that. Baba continues to observe everything as the detached Observer. Some write to Baba: Baba, I went to such-and-such a place to do service. Baba asks: First of all, are you on the pilgrimage of remembrance? The first thing you must do is to break away from everyone else and connect yourself to the one Father. You have to become soul conscious. Even while living at home, you have to consider this world and your body to be old. Everything is going to be destroyed. We are only concerned with the Father and His inheritance. Baba is not telling you not to stay at home with your family or not to talk to anyone. Some ask Baba if they can go to someone’s wedding. Baba says: You may go. Go there and do service. Your intellect should be connected in yoga to Shiv Baba. Only with the power of remembrance can the sins of many births be burnt away. If you continue to commit sin here too, there will be a great deal of punishment. If, while becoming pure, someone falls because of vice, he dies. He would be totally crushed. By your not following shrimat, there is a great deal of loss. Shrimat has to be taken at every step. Some commit such sins that they are unable to have yoga. They are unable to have remembrance. If they then go and tell others that God has come and that they should go and claim their inheritance from Him, they wouldn’t believe them. The arrow wouldn’t strike them. Baba has told you to give knowledge to the devotees and not to waste it on those who don’t want it. Otherwise, this will cause more defamation. Some children ask Baba: Baba, I have the habit of donating. What should I do now that I am on the path of knowledge? Baba advises you: Children, there are many others who will continue to donate to the poor. Poor people are not dying of starvation. Even religious beggars (fakirs) have plenty of money. Therefore, your intellects should be removed from all of those things. You need to be very cautious about giving donations. There are many who continue to perform such actions, don’t even ask! They don’t even realise that the burdens of sin on their heads are becoming heavier. The path of knowledge is not just fun and games. Dharamraj is with the Father. A lot of punishment will have to be experienced from Dharamraj. It is said: You will come to know everything when Dharamraj takes the final account. It doesn’t take a long time to experience the punishment of many births. Baba has also explained to you the example of sacrificing oneself at Kashi. That belongs to the path of devotion whereas this is the path of knowledge. Offering human sacrifice too is fixed in the drama. All of those things have to be understood. Don’t ask why this drama was created or why we were brought into the cycle. Everyone has to continue to come into the cycle. This drama is predestined. If you didn’t come into the cycle, there would be no world. There cannot be eternal liberation. Even the principal One cannot have eternal liberation. The cycle will turn in the same way after 5000 years. This is the drama. No one can receive a status just by explaining or giving knowledge to others. First of all, you have to become pure from impure. Don’t think that Baba knows everything. What would Baba do by knowing everything? First of all, you, a soul, know what you do according to shrimat and to what extent you remember Baba. What benefit would there be by Baba knowing all of that? Whatever you do, you receive the reward of that. Baba can tell from how you act and the service you do whether you do good service. So-and-so has performed many sinful acts even after belonging to the Father. Therefore, there is no power in the knowledge that person gives. This sword of knowledge must have the sharpness of the power of remembrance. With the power of yoga you gain victory over the whole world. With knowledge, you claim a high status in the new world. First of all, become pure. Unless you become pure, you cannot claim a high status. You come here to change from ordinary humans into Narayan. Impure ones cannot become Narayan. You have to use the correct method to become pure. Even some specially beloved children, who look after centres, have to make a lot of effort for this. Because they don’t make this effort, there isn’t that power in those souls and the arrow cannot then strike the target. There isn’t the pilgrimage of remembrance; they just explain to many at the exhibitions. First, you must become pure by having remembrance; then there is knowledge. When you become pure, you become able to imbibe knowledge. Impure ones are unable to imbibe knowledge. The main subject is remembrance. There are various subjects in a worldly study. People come to you to become Brahma Kumars and Kumaris. To become a Brahma Kumar or Kumari, a brother or sister, is not like going to your aunty’s home! You mustn’t become this just in name. In order to become a deity you first definitely have to become pure. Then, after that, there is also the study. If you only study but don’t become pure, you cannot claim a high status. Pure souls are needed. Only when you become pure can you claim a high status in the pure world. Baba emphasises purity a great deal. Unless you maintain purity, you cannot give knowledge to anyone. However, Baba doesn’t look at anything. He is sitting here Himself and explaining everything. On the path of devotion, people receive a reward for their devotion. That too is fixed in the drama. How would the Father speak without a body? How would He listen to anyone? It is when a soul has a body that he can speak and hear. The Father says: I don’t have any organs. Therefore, how could I listen to anyone or know anything? Some believe that Baba knows when they indulge in vice, that if He didn’t know, they wouldn’t consider Him to be God. There are many who are like that. The Father says: I have come to show you the way to become pure. I see everything as the detached Observer. It can be seen from a child’s behaviour whether that one is worthy or unworthy. You have to give the proof of service. You also know that you receive the reward of whatever you do. If you follow shrimat you become elevated. If you don’t follow shrimat, you become dirty and fall. If you need to ask something, ask it clearly. There is no question of blind faith. Baba simply asks: If you don’t have the power of remembrance, how would you become pure? Some commit such sins even in this birth, don’t even ask! This is the world of sinful souls whereas the golden age is the world of charitable souls. This is the confluence age. Some have such dull heads that they are unable to imbibe anything; they are unable to remember Baba. Then it will be too late because the haystack will be set on fire and they will be unable to stay in yoga. At that time, there will be very many cries of distress. Mountains of great sorrow are yet to fall. The only concern you should have is how to receive your fortune of the kingdom from the Father. Renounce body consciousness and become engaged in service! Become benevolent! Don’t waste your money! Never give donations to impure ones who are not worthy of receiving them. Otherwise, the one who gives the donation accumulates that burden. It isn’t that you have to go out and beat drums saying that God has come. There are many such people in Bharat who call themselves God. No one would believe you. You know that you have now received enlightenment. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Together with studying, you definitely have to become pure. Become a worthy and obedient child and give the proof of your service. Follow shrimat and make yourself elevated.
  2. Don’t waste your money. Never give donations to the impure. Donate the wealth of knowledge to those who are worthy of it.
Blessing: May you become an embodiment of success with your speciality of constantly moulding yourself in service and your connections.
The children who have the speciality of moulding themselves easily reach the golden-aged stage. In order to reveal your inculcation according to the time and circumstances, you have to mould yourself. Only those who mould themselves are real gold. You saw the speciality of sakar Baba: as was the time, as was the person, so was his form. Follow the Father in the same way and you will easily become an embodiment of success in service and with your connections.
Slogan: When you have all the powers, obstacles-free success is with you.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 8 JULY 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 8 July 2019

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Read Murli 7 July 2019:- Click Here

08/07/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, be soul conscious and you will become cool, the bad odour of vice will be removed, you will become introverted and you will become flowers.
Question: Which two blessings does BapDada give to all of you children? What is the way to put them into practice?
Answer: Baba gives all of you children the blessings of peace and happiness. Baba says: Children, you have to practise staying in silence. If someone says topsy-turvy things, do not answer back; you have to remain silent. Do not gossip or say anything wasteful. Do not cause sorrow for anyone. Put the bead of silence in your mouth and you will be able to put both of these blessings into practice.

Om shanti. Sweetest children are sometimes in front of Him and sometimes they go far away. Those who remember Baba are the ones who are in front of Him because everything is merged in the pilgrimage of remembrance. It has been remembered that a soul goes beyond with a glance. A soul’s vision is drawn to the Supreme Soul. He does not like anything else. By remembering Him, your sins are absolved. Therefore, you should be very cautious about yourself. When you don’t have remembrance, Maya understands that your yoga is broken and so she pulls you to herself. She makes you perform one wrong action or another. By doing this, souls defame the Father. On the path of devotion, you used to sing: Baba, only You and no one else are Mine. This is why the Father says: Children, the destination is very high. You have to remember the Father while working. This is the highest destination. You need to practise this very well. Otherwise, those who perform bad actions will cause defamation. For instance, if some of you become angry or you begin to quarrel amongst yourselves, then, that, too, is defamation. You have to remain very cautious in this. While living at home with your families, link your intellects to the Father. It is not that anyone has become complete yet; no. You should try to become soul conscious. By coming into body consciousness you perform one wrong action or another. In fact, this causes defamation of the Father. The Father says: Those who cause defamation of the Satguru cannot reach the destination of becoming Lakshmi or Narayan. Therefore, continue to make full effort. Through this, you will become very cool. The things of the five vices will be removed from you and you will receive a great deal of power from the Father. You also have to carry on with your work etc. The Father does not say that you should not do anything. There, your actions will be neutral actions. The actions that are performed in the iron age are sinful actions. You now have to learn at the confluence age. There is no question oflearningthere. You will take the teachings that you are given here with you. The Father says to you children: Extroversion is not good. Become introverted! The time will come when you children become introverted; you will not remember anyone except the Father. You also came like this; you did not remember anyone. Only after a baby comes out of the womb does he understand that those are his mother and father, that that is So-and-so. Therefore, you now have to return in the same way. We belong to the one Father. Your intellect should not remember anyone except Him. Although there is still time left, you have to make full effort. You cannot depend on your bodies. Continue to make effort to maintain peace in your homes and not have any conflict. Otherwise, everyone would say that there is a great deal of peacelessness in that one. You children have to remain in total silence. You are claiming your inheritance of peace. You are now living among thorns. You are not in the garden of flowers. You have to become flowers while living among thorns. You must not become thorns yourselves. The more you remember the Father, the more peaceful you will remain. Remain silent when anyone says anything topsy-turvy to you. Souls are peaceful. The original religion of souls is peace. You understand that you have to return to that home. The Father is the Ocean of Peace. He says: You also have to become oceans of peace. Wasteful gossip causes a great deal of damage. The Father gives you directions: You must not speak of such things. You defame the Father’s name through that. When you are in silence no defamation or sinful acts are performed. By continuing to remember the Father, the more your sins will be absolved. You yourself must not become peaceless or make anyone else peaceless. If you cause sorrow for someone, that soul becomes upset. There are many who write a report: Baba, this one creates a great deal of chaos at home. Baba replies: You have to remain in your religion of peace. There is a story about Hatamatai: he was told to put a bead in his mouth so that no sound would emerge and he would not be able to speak. You children have to remain peaceful. People stumble around a great deal for peace. You children understand that your sweet Baba is the Ocean of Peace. By creating peace He establishes peace in the world. You also have to remember your future status. There is only one religion there; there is no other religion. That is called the time of peace in the world. Later, when other religions come, there is a great deal of chaos. You now have so much peace. You understand that that is your home. Our original religion is peace. You would not say that the original religion of the body is peace. Bodies are perishable whereas souls are imperishable. Souls remain in peace for as long as they remain there. Here, there is peacelessness throughout the whole world which is why they keep asking for peace. However, it is not possible for anyone who wants to stay there in constant peace to do so. Even though some stay up there for 63 births, they ultimately have to come here. They will play their parts of happiness and sorrow and return home. Keep the drama very clearly in your awareness. You children should remain aware that Baba is giving you the blessings of peace and happiness. The Brahma soul listens to everything. Of those who listen, his ears are the closest. His mouth is also close to his ears; your ears are a little further away. This one hears very quickly. He understands everything. The Father says: O sweetest children! He calls everyone the sweetest because all are His children. All embodied souls are the imperishable children of the Father. Bodies are perishable. The Father is imperishable. You children, you souls, are imperishable. The Father converses with His children. This is called spiritual knowledge. The Supreme Spirit sits here and explains to you spirits. The Father has love for all. Although all spirits are tamopradhan, they know that when they were in the home, they were satopradhan. I come every cycle and show everyone the path to peace. It is not a question of giving a blessing. He does not say: May you be wealthy! May you have a long lifespan! No; you were like that in the golden age, but Baba does not give you such blessings. You do not have to ask for blessings or mercy. You have to remember that the Father is the Father and that He is also the Teacher. Oho! Shiv Baba is the Father. He is also the Teacherand the Ocean of Knowledge. The Father sits here and speaks the knowledge of Himself and of the beginning, middle and end of creation through which you become emperors, rulers of the globe. This is an all-round cycle. The Father explains that, at this time, the whole world is in the kingdom of Ravan. Ravan does not only exist in Lanka. This is an unlimited Lanka (island); there is water all around. The whole of Lanka belonged to Ravan and it is now going to belong to Rama again. Lanka was made of gold. There was a great deal of gold there. There is the example of someone going into trance and seeing a brick of gold there. Just as there are bricks of clay here, so there will be bricks of gold there. So, he thought that he could bring a gold brick back with him. They have made up many plays. Bharat is very famous. There are not as many diamonds and jewels in other lands. The Father says: I become the Guide and take everyone back home. Come children, you now have to return home. Souls are impure; they cannot return home without becoming pure. Only the one Father can purify the impure. This is why everyone is down here; no one can return home. The law does not allow this. The Father says: Children, Maya will take you into body consciousness with even greater force; she will not let you remember the Father. You have to remain very cautious. Your battle is because of this. It is your eyes that deceive you the most. You have to keep your eyes under control. It is seen that, even in the consciousness of brother and sister, your vision does not remain good. Therefore, it is explained to you: Consider yourselves to be brothers. Everyone says that we are all brothers, but they don’t understand the meaning of that. They are like frogs that keep croaking; they do not understand the meaning at all. You now understand accurately the meaning of every aspect. The Father explains to you sweetest children: When you were on the path of devotion, you were also My lovers at that time; you used to remember your Beloved. People very quickly remember Him at a time of sorrow: O Rama, o God, have mercy on me! You will never say this in heaven. There, there is no kingdom of Ravan. Baba sends you to the kingdom of Rama. Therefore, you should follow His directions. You now receive God’s directions and you will then receive divine directions. No one knows about this benevolent confluence age because everyone has been told that the iron age is still an infant and that hundreds and thousands of years still remain. Baba says that that is the total darkness of the path of devotion whereas knowledge is light. According to the drama, the path of devotion is fixed and it will exist again. You now understand that you have found God and so there is no need to wander around. You say: We are going to Baba. That means you are going to BapDada. Human beings cannot understand these things. Maya still swallows those of you who don’t have full faith. The alligator completely swallows the maharathis. They become amazed as they listen to knowledge. Older ones have left. It is also remembered that Maya defeats very good maharathis. You write to Baba: Baba, don’t send Your Maya to us. Oh! She does not belong to Me. Ravan has his own kingdom and I establish My own kingdom. This has continued since time immemorial. Ravan is your greatest enemy. People know that Ravan is their enemy which is why they burn him every year. In Mysore, they celebrate Dashera a great deal, but they don’t understand the meaning of it. Your name is the Shiv Shakti Army. They have then used the name, “Army of Monkeys”. You understand that you were definitely like monkeys and that you are now taking power from Shiv Baba in order to gain victory over Ravan. The Father comes and teaches you Raj Yoga. They have made up many stories about this. It is also called the story of immortality. You know that Baba is telling you the story of immortality. However, He does not tell you this up on a mountain. They say that Shankar told Parvati the story of immortality. They keep an image of Shiva and Shankar and have made them both into one. All of that is the path of devotion. Day by day, everyone is becoming tamopradhan. When you become sato from satopradhan you lose two degrees. In fact the silver age cannot be called heaven. The Father comes to make you children into residents of heaven. The Father knows that the Brahmin clan as well as both the sun and moon dynasty clans are now being established. Ramachandra has been symbolised as a warrior (shown with a bow and arrow). You are all warriors who gain victory over Maya. Those who pass with fewer marks are known as those who belong to the moon dynasty. This is why Rama has been shown with a bow and arrow; there is no violence in the silver age. The kingdom of Rama, the king, and the subjects have been remembered, but people are confused because he has been portrayed as a warrior. Those weapons do not exist there. The Shaktis too have been portrayed with swords etc. People do not understand anything. You children have now understood that the Father is the Ocean of Knowledge. Therefore, the Father explains the secrets of the beginning, middle and end of the world. A limited father would not have the kind of love that the unlimited Father has for you children. He makes you children happy for 21 births. He is such a lovely Father. The Father is so lovely that He removes all your sorrow and gives you the inheritance of happiness. There, there is no name or trace of sorrow. This should now remain in your intellects. You must not forget this. It is very easy. All you have to do is to study the murli and read it to others. Nevertheless, some still ask for a teacher. They say that they cannot imbibe the knowledge without a teacher. Ah, even little children can remember the story of becoming a true Narayan and relate it to others. I explain to you every day that you must simply remember Alpha. After you take the seven days’ course, this knowledge should sit in your intellects and yet you children forget! Baba is amazed. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Don’t ask the Father for blessings or mercy. Remember the Father, the Teacher and the Guru and have mercy for on your own self. Remain cautious about Maya. Your eyes can deceive you. Therefore, keep them under your control.
  2. Wasteful gossip causes a great deal of harm. Therefore, as much as possible, remain silent. Keep a bead in your mouth. Never say anything topsy-turvy. Do not become peaceless yourself or make others peaceless.
Blessing: May you experience being complete on the basis of imperishable attainments and remain happy-hearted.
At the confluence age you have direct attainment from God. Compared to the present, the future is nothing, and so your song is: I have attained what I wanted to attain… The song of the present time is: Nothing is lacking in the treasure-store of Brahmins. These are imperishable attainments. Remain complete on the basis of these attainments and the speciality of happiness will constantly be visible in your activities and on your face. No matter what happens, those who have all attainments can never let go of their happiness.
Slogan: When you are experienced in God’s love no obstruction will be able to stop you.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 8 JULY 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 8 July 2019

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08-07-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – देही-अभिमानी बनो तो शीतल हो जायेंगे, विकारों की बाँस निकल जायेगी, अन्तर्मुखी हो जायेंगे, फूल बन जायेंगेˮ
प्रश्नः- बापदादा सभी बच्चों को कौन-से दो वरदान देते हैं? उन्हें स्वरूप में लाने की विधि क्या है?
उत्तर:- बाबा सभी बच्चों को शान्ति और सुख का वरदान देते हैं। बाबा कहते – बच्चे, तुम शान्ति में रहने का अभ्यास करो। कोई उल्टा-सुल्टा बोलते हैं तो तुम जवाब न दो। तुम्हें शान्त रहना है। फालतू झरमुई, झगमुई की बातें नहीं करनी है। किसी को भी दु:ख नहीं देना है। मुख में शान्ति का मुहलरा डाल दो तो यह दोनों वरदान स्वरूप में आ जायेंगे।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे बच्चे कभी सम्मुख हैं, कभी दूर चले जाते हैं। सम्मुख फिर वही रहते हैं जो याद करते हैं क्योंकि याद की यात्रा में ही सब कुछ समाया हुआ है। गाया जाता है ना – नज़र से निहाल। आत्मा की नज़र जाती है परमपिता में और कुछ भी उनको अच्छा नहीं लगता। उनको याद करने से विकर्म विनाश होते हैं। तो अपने पर कितनी खबरदारी रखनी चाहिए। याद न करने से माया समझ जाती है – इनका योग टूटा हुआ है तो अपनी तरफ खींचती है। कुछ न कुछ उल्टा कर्म करा देती है। ऐसे बाप की निन्दा कराते हैं। भक्ति मार्ग में गाते हैं – बाबा, मेरे तो एक आप दूसरा न कोई। तब बाप कहते हैं – बच्चे, मंजिल बहुत ऊंची है। काम करते हुए बाप को याद करना – यह है ऊंच ते ऊंच मंज़िल। इसमें प्रैक्टिस बहुत अच्छी चाहिए। नहीं तो निन्दक बन जाते हैं, उल्टा काम करने वाले। समझो कोई में क्रोध आया, आपस में लड़ते-झगड़ते हैं तो भी निन्दा कराई ना, इसमें बड़ी खबरदारी रखनी है। अपने गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए बुद्धि बाप से लगानी है। ऐसे नहीं कि कोई सम्पूर्ण हो गया है। नहीं। कोशिश ऐसी करनी चाहिए – हम देही-अभिमानी बनें। देह-अभिमान में आने से कुछ न कुछ उल्टा काम करते हैं तो गोया बाप की निन्दा कराते हैं। बाप कहते हैं ऐसे सतगुरू की निन्दा कराने वाले लक्ष्मी-नारायण बनने की ठौर पा न सकें इसलिए पूरा पुरूषार्थ करते रहो, इससे तुम बहुत ही शीतल बन जायेंगे। पाँच विकारों की बातें सब निकल जायेंगी। बाप से बहुत ताकत मिल जायेगी। काम-काज भी करना है। बाप ऐसे नहीं कहते कि कर्म न करो। वहाँ तो तुम्हारे कर्म, अकर्म हो जायेंगे। कलियुग में जो कर्म होते हैं, वह विकर्म हो जाते हैं। अभी संगमयुग पर तुमको सीखना होता है। वहाँ सीखने की बात नहीं। यहाँ की शिक्षा ही वहाँ साथ चलेगी। बाप बच्चों को समझाते हैं – बाहरमुखता अच्छी नहीं है। अन्तर्मुखी भव। वह भी समय आयेगा जबकि तुम बच्चे अन्तर्मुख हो जायेंगे। सिवाए बाप के और कुछ याद नहीं आयेगा। तुम आये भी ऐसे थे, कोई की याद नहीं थी। गर्भ से जब बाहर निकले तब पता पड़ा कि यह हमारे माँ-बाप हैं, यह फलाना है। तो फिर अब जाना भी ऐसे है। हम एक बाप के हैं और कोई उनके सिवाए बुद्धि में याद न आये। भल टाइम पड़ा है परन्तु पुरूषार्थ तो पूरी रीति करना है। शरीर पर तो कोई भरोसा नहीं। कोशिश करते रहना चाहिए, घर में भी बहुत शान्ति हो, क्लेश नहीं। नहीं तो सब कहेंगे इनमें कितनी अशान्ति है। तुम बच्चों को तो रहना है बिल्कुल शान्त। तुम शान्ति का वर्सा ले रहे हो ना। अभी तुम रहते हो काँटों के बीच में। फूलों के बीच में नहीं हो। काँटों के बीच रह फूल बनना है। काँटों का काँटा नहीं बनना है। जितना तुम बाप को याद करेंगे उतना शान्त रहेंगे। कोई उल्टा-सुल्टा बोले, तुम शान्ति में रहो। आत्मा है ही शान्त। आत्मा का स्वधर्म है शान्त। तुम जानते हो अभी हमको उस घर में जाना है। बाप भी है शान्ति का सागर। कहते हैं तुमको भी शान्ति का सागर बनना है। फालतू झरमुई-झगमुई बहुत नुकसान करती है। बाप डायरेक्शन देते हैं – ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए, इससे तुम बाप की निन्दा कराते हो। शान्ति में कोई निन्दा वा विकर्म होता नहीं। बाप को याद करते रहने से और ही विकर्म विनाश होंगे। अशान्त न खुद हो, न औरों को करो। किसको दु:ख देने से आत्मा नाराज़ होती है। बहुत हैं जो रिपोर्ट लिखते हैं – बाबा, यह घर में आते हैं तो धमपा मचा देते हैं। बाबा लिखते हैं तुम अपने शान्ति स्वधर्म में रहो। हातमताई की कहानी भी है ना, उनको कहा तुम मुख में मुहलरा डाल दो तो आवाज़ निकलेगा ही नहीं। बोल नहीं सकेंगे।

तुम बच्चों को शान्ति में रहना है। मनुष्य शान्ति के लिए बहुत धक्के खाते हैं। तुम बच्चे जानते हो हमारा मीठा बाबा शान्ति का सागर है। शान्ति कराते-कराते विश्व में शान्ति स्थापन करते हैं। अपने भविष्य मर्तबे को भी याद करो। वहाँ होता ही है एक धर्म, दूसरा कोई धर्म होता नहीं। उनको ही विश्व में शान्ति कहा जाता है। फिर जब दूसरे-दूसरे धर्म आते हैं तो हंगामें होते हैं। अभी कितनी शान्ति रहती है। समझते हो हमारा घर वही है। हमारा स्वधर्म है शान्त। ऐसे तो नहीं कहेंगे शरीर का स्वधर्म शान्त है। शरीर विनाशी चीज़ है, आत्मा अविनाशी चीज़ है। जितना समय आत्मायें वहाँ रहती हैं तो कितना शान्त रहती हैं। यहाँ तो सारी दुनिया में अशान्ति है इसलिए शान्ति माँगते रहते हैं। परन्तु कोई चाहे सदा शान्त में रहें, यह तो हो न सके। भल 63 जन्म वहाँ रहते हैं फिर भी आना जरूर पड़ेगा। अपना पार्ट दु:ख-सुख का बजाकर फिर चले जायेंगे। ड्रामा को अच्छी रीति ध्यान में रखना होता है।

तुम बच्चों को भी ध्यान में रहे कि बाबा हमको वरदान देते हैं – सुख और शान्ति का। ब्रह्मा की आत्मा भी सब सुनती है। सबसे नज़दीक तो इनके कान सुनते हैं। इनका मुख कान के नज़दीक है। तुम्हारा फिर इतना दूर है। यह झट सुन लेते हैं। सब बातें समझ सकते हैं। बाप कहते हैं मीठे-मीठे बच्चों! मीठे-मीठे तो सबको कहते हैं क्योंकि बच्चे तो सब हैं। जो भी जीव आत्मायें हैं वह सब बाप के बच्चे अविनाशी हैं। शरीर तो विनाशी है। बाप अविनाशी है। बच्चे आत्मायें भी अविनाशी हैं। बाप बच्चों से वार्तालाप करते हैं – इसको कहा जाता है रूहानी नॉलेज। सुप्रीम रूह बैठ रूहों को समझाते हैं। बाप का प्यार तो है ही। जो भी सब रूहें हैं, भल तमोप्रधान हैं। जानते हैं यह सब जब घर में थे तो सतोप्रधान थे। सबको कल्प-कल्प हम आकर शान्ति का रास्ता बताता हूँ। वर देने की बात नहीं है। ऐसे नहीं कहते धनवान भव, आयुष्वान भव। नहीं। सतयुग में तुम ऐसे थे परन्तु आशीर्वाद नहीं देते हैं। कृपा वा आशीर्वाद नहीं माँगनी है। बाप, बाप भी है, टीचर भी है – यही बात याद करनी है। ओहो! शिवबाबा बाप भी है, टीचर भी है, ज्ञान का सागर भी है। बाप ही बैठ अपना और रचना के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान सुनाते हैं, जिससे तुम पावर्ती महाराजा बन जाते हो। यह सारा आलराउण्ड चक्र है ना। बाप समझाते हैं इस समय सारी दुनिया रावण राज्य में है। रावण सिर्फ लंका में नहीं है। यह है बेहद की लंका। चारों तरफ पानी है। सारी लंका रावण की थी, अब फिर राम की बनती है। लंका तो सोने की थी। वहाँ सोना बहुत होता है। एक मिसाल भी बताते हैं ध्यान में गया, वहाँ एक सोने की ईट देखी। जैसे यहाँ मिट्टी की हैं, वहाँ सोने की होंगी। तो ख्याल किया सोना ले जायें। कैसे-कैसे नाटक बनाये हैं। भारत तो नामीग्रामी है, और खण्डों में इतने हीरे-जवाहर नहीं होते। बाप कहते हैं मैं सबको वापिस ले जाता हूँ, गाइड बन करके। चलो बच्चे, अब घर जाना है। आत्मायें पतित हैं, पावन होने बिगर घर जा नहीं सकती हैं। पतित को पावन बनाने वाला एक बाप ही है इसलिए सब यहाँ ही हैं। वापिस कोई भी जा नहीं सकते। लॉ नहीं कहता। बाप कहते हैं – बच्चे, माया तुम्हें और ही ज़ोर से देह-अभिमान में लायेगी। बाप को याद करने नहीं देगी। तुमको खबरदार रहना है। इस पर ही युद्ध है। आखें बड़ा धोखा देती हैं। इन ऑखों को कब्जे में (अधिकार में) रखना है। देखा गया भाई-बहन में भी दृष्टि ठीक नहीं रहती है तो अब समझाया जाता है भाई-भाई समझो। यह तो सब कहते हैं हम सब भाई-भाई हैं। परन्तु समझते कुछ भी नहीं। जैसे मेढ़क ट्रॉ-ट्रॉ करते रहते हैं, अर्थ कुछ नहीं समझते। अभी तुम हर एक बात का यथार्थ अर्थ समझ गये हो।

बाप मीठे-मीठे बच्चों को बैठ समझाते हैं कि तुम भक्ति मार्ग में भी आशिक थे, माशुक को याद करते थे। दु:ख में झट उनको याद करते हैं – हाय राम! हे भगवान रहम करो! स्वर्ग में तो ऐसे कभी नहीं कहेंगे। वहाँ रावण राज्य ही नहीं होता है। तुमको रामराज्य में ले जाते हैं तो उनकी मत पर चलना चाहिए। अभी तुमको मिलती है ईश्वरीय मत फिर मिलेगी दैवी मत। इस कल्याणकारी संगमयुग को कोई भी नहीं जानते हैं क्योंकि सबको बताया हुआ है, कलियुग अजुन छोटा बच्चा है। लाखों वर्ष पड़े हैं। बाबा कहते यह है भक्ति का घोर अन्धियारा। ज्ञान है सोझरा। ड्रामा अनुसार भक्ति की भी नूँध है, यह फिर भी होगी। अब तुम समझते हो भगवान् मिल गया तो भटकने की दरकार नहीं रहती। तुम कहते हो हम जाते हैं बाबा के पास अथवा बापदादा के पास। इन बातों को मनुष्य तो समझ न सकें। तुम्हारे में भी जिनको पूरा निश्चय नहीं बैठता तो माया एकदम हप कर लेती है। एकदम गज को ग्राह हप कर लेता है। आश्चर्यवत् सुनन्ती……. पुराने तो चले गये, उनका भी गायन है, अच्छे-अच्छे महारथियों को माया हरा देती है। बाबा को लिखते हैं – बाबा, आप अपनी माया को नहीं भेजो। अरे, यह हमारी थोड़ेही है। रावण अपना राज्य करते हैं, हम अपना राज्य स्थापन कर रहे हैं। यह परमपरा से चला आता है। रावण ही तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है। जानते हैं रावण दुश्मन है, इसलिए उसको हर वर्ष जलाते हैं। मैसूर में तो दशहरा बहुत मनाते हैं, समझते कुछ नहीं। तुम्हारा नाम है शिव शक्ति सेना। उन्होंने फिर नाम बन्दर सेना डाल दिया है। तुम जानते हो बरोबर हम बन्दर मिसल थे, अब शिवबाबा से शक्ति ले रहे हो, रावण पर जीत पाने। बाप ही आकर राजयोग सिखलाते हैं। इस पर कथायें भी अनेक बना दी हैं। अमरकथा भी कहते हैं। तुम जानते हो बाबा हमको अमरकथा सुनाते हैं। बाकी कोई पहाड़ आदि पर नहीं सुनाते। कहते हैं शंकर ने पार्वती को अमरकथा सुनाई। शिव शंकर का चित्र भी रखते हैं। दोनों को मिला दिया है। यह सब है भक्ति मार्ग। दिन-प्रतिदिन सब तमोप्रधान होते गये हैं। सतोप्रधान से सतो होते हैं तो दो कला कम होती हैं। त्रेता को भी वास्तव में स्वर्ग नहीं कहा जाता है। बाप आते हैं तुम बच्चों को स्वर्गवासी बनाने। बाप जानते हैं ब्राह्मणकुल और सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी कुल दोनों स्थापन हो रहे हैं। रामचन्द्र को क्षत्रिय की निशानी दी है। तुम सब क्षत्रिय हो ना, जो माया पर जीत पाते हो। कम मार्क्स से पास होने वाले को चन्द्रवंशी कहा जाता है, इसलिए राम को बाण आदि दे दिया है। हिंसा तो त्रेता में भी होती नहीं। गायन भी है राम राजा, राम प्रजा….. परन्तु यह क्षत्रियपन की निशानी दे दी है तो मनुष्य मूँझते हैं। यह हथियार आदि होते नहीं हैं। शक्तियों के लिए भी कटारी आदि दिखाते हैं। समझते कुछ भी नहीं हैं। तुम बच्चे अभी समझ गये हो कि बाप ज्ञान का सागर है इसलिए बाप ही आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं। बेहद के बाप का जो बच्चों पर लव है, वह हद के बाप का हो न सके। 21 जन्मों के लिए बच्चों को सुखदाई बना देते हैं। तो लवली बाप ठहरा ना! कितना लवली है बाप, जो तुम्हारे सब दु:ख दूर कर देते हैं। सुख का वर्सा मिल जाता है। वहाँ दु:ख का नाम निशान नहीं होता। अभी यह बुद्धि में रहना चाहिए ना। यह भूलना नहीं चाहिए। कितना सहज है, सिर्फ मुरली पढ़कर सुनानी है, फिर भी कहते हैं ब्राह्मणी चाहिए। ब्राह्मणी बिगर धारणा नहीं होती। अरे, सत्य नारायण की कथा तो छोटे बच्चे भी याद कर सुनाते हैं। मैं तुमको रोज़-रोज़ समझाता हूँ सिर्फ अल्फ़ को याद करो। यह ज्ञान तो 7 रोज़ में बुद्धि में बैठ जाना चाहिए। परन्तु बच्चे भूल जाते हैं, बाबा तो वण्डर खाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप से आशीर्वाद वा कृपा नहीं माँगनी है। बाप, टीचर, गुरू को याद कर अपने ऊपर आपेही कृपा करनी है। माया से खबरदार रहना है, आखें धोखा देती हैं, इन्हें अपने अधिकार में रखना है।

2) फालतू झरमुई-झगमुई की बातें बहुत नुकसान करती हैं इसलिए जितना हो सके शान्त रहना है, मुख में मुहलरा डाल देना है। कभी भी उल्टा-सुल्टा नहीं बोलना है। न खुद अशान्त होना है, न किसी को अशान्त करना है।

वरदान:- अविनाशी प्राप्ति के आधार पर सदा सम्पन्नता का अनुभव करने वाले प्रसन्नचित भव
संगमयुग पर डायरेक्ट परमात्म प्राप्ति है, वर्तमान के आगे भविष्य कुछ भी नहीं है इसलिए आपका गीत है जो पाना था वो पा लिया…..इस समय का गायन है अप्राप्त नहीं कोई वस्तु ब्राह्मणों के खजाने में। यह अविनाशी प्राप्तियां हैं। इन प्राप्तियों से सम्पन्न रहो तो चलन और चेहरे से सदा प्रसन्नता की विशेषता दिखाई देगी। कुछ भी हो जाए सर्व प्राप्तिवान अपनी प्रसन्नता छोड़ नहीं सकते।
स्लोगन:- परमात्म प्यार के अनुभवी बनो तो कोई भी रुकावट रोक नहीं सकती।

TODAY MURLI 8 JULY 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 8 July 2018

Read Murli in Hindi :- Click Here

Read Murli 7 July 2018 :- Click Here

08/07/18
Madhuban
Avyakt BapDada
Om Shanti
19/12/83

God’s love  selfless love .

Today, the Father, the Ocean of Love, is seeing His loving children. All children are loving, but they are numberwise. There are those who love the Father. Next are those who fulfil the responsibility of love. Third are those who become embodiments of love and always remain merged in the Ocean of Love and they are called the children who are lost in love. There is a difference in being lovely and “loveleen” (lost in love). To belong to the Father means to be loving and to be lost in love. Throughout the whole cycle, you can never receive God’s love, the love of the Supreme, from anyone else. God’s love means selfless love. God’s love is the basis of this elevated Brahmin birth. God’s love is the visible fruit of your calling out to God for birth after birth. God’s love is the donation of a new life. If there isn’t God’s love, your life is dry, like dry sugar cane. God’s love is the means to bring you close to the Father. God’s love enables you to experience the constant company of BapDada, that is, it makes you feel that God is your Companion. God’s love frees you from labouring and easily and constantly enables you to experience being yogis with a yogyukt stage. God’s love easily enables you to cross the three ‘floors’ (three worlds).

1. Forgetting the consciousness of the body. 2. Forgetting all relationships of the body. 3. The attraction to the body and all the attractive things of the physical world that bring temporary attainment easily finishes. You don’t need to renounce anything, for the fortune of the most elevated attainment automatically makes you renounce everything. So, did you children who have love for God renounce anything or did you claim your fortune? What did you renounce? Clothes that have many patches, the renunciation of a decayed, old body of the final birth – is that renunciation? In fact, you yourself feel compelled to make it function. If, instead of that, you receive an angelic body of light which has no illness, no trace of any old sanskars or nature, no relationships of the body, no mischief of the mind, no habit of the intellect stumbling – if, after receiving such an angelic body of light, you have to shed the old body, is that renunciation? What did you receive and what did you give? Is that renunciation or fortune? In the same way, the selfish relationships of the body – the perishable relatives who snatch the comfort of your happiness and peace, who are brothers one moment and become enemies the next due to selfishness, those who cause you sorrow and deceive you, who bind you with strings of attachment; if you renounce all such relationships and attain all relationships that give you happiness in the One, then what are you actually renouncing? You let go of all relationships with those who are always taking from you, because all souls constantly take; they don’t give you anything. Only the one Father gives you the love of the Bestower; He doesn’t have any desire to take. No matter how much of a righteous soul (dharmatma), a great soul (mahatma), a charitable soul or an incognito donor they may be, they still take; they are not bestowers. They at least desire to receive pure love. The Father is the full Ocean and this is why He is the Bestower. Only God’s love is the love of the Bestower. This is why you don’t give to Him, but you receive from Him. In the same way, using perishable material possessions for yourself means to use things filled with poison. What did you become by repeatedly using perishable material possessions that trap you in the consciousness of “mine”? You became caged birds, did you not? Those possessions are such that they made you into those who only own junk. Instead, you receive the most elevated possessions that make you into multimillionaires. So to receive multimillions and then to renounce things worth straws (worth nothing at all), is that renunciation? God’s love brings you fortune. Renunciation has already taken place automatically. Those who are such easy and constant renunciates are the ones with the most elevated fortune.

Sometimes, some very loving children show their love in front of the Father and say: I have renounced so much! I have renounced so much, and yet why does this happen? BapDada smiles and asks the children: What did you renounce and what did you attain? Make a list. Which side of the scales is heavier? That of renouncing or that of attaining? If not today, then tomorrow, you will have to renounce some things even under compulsion. Therefore, if you become sensible beforehand and attain something before you renounce anything, then is that renunciation? When you speak of fortune, renunciation is worth shells and fortune is worth diamonds. You do believe this, do you not? Or do you feel that you have renounced a lot? Have you renounced a lot? Are you those who renounce something or those who receive something? What would happen if you ever had that thought even in your dreams? By saying, “I did this!” or “I renounced that!”, you become an instrument to erase the line of your fortune. So, never have such thoughts even in your dreams.

God’s love automatically makes you constantly experience a feeling of surrender. The feeling of surrender makes you become equal to the Father. God’s love is the key to all of the Father’s treasures, because love makes you into a soul who has a right. Perishable love and love for the body make you lose the fortune of the kingdom. Many kings have lost the fortune of their kingdoms because of chasing after perishable love. They considered perishable love to be greater than the fortune of the kingdom. God’s love enables you to attain for all time the fortune of the kingdom you had lost. It makes you into someone who has a right to the double kingdom. You attain self-sovereignty and also the kingdom of the world. You are special souls who attain God’s love in this way. So, don’t be those who have love, but become souls who are always merged in love and lost in love. Those who are merged are equal. You do experience this, do you not?

New ones have come; and so, for you new ones to go ahead, simply pay attention to one thing. Don’t just be those who are always thirsty for God’s love, but be those who are worthy of God’s love. To be worthy means to have all rights. This is easy, is it not? So move forward in this way. Achcha.

To such children who are worthy and rightful, to the souls who have a right to God’s love, to the fortunate souls who through God’s love attain the most elevated fortune of the kingdom, to the children who are constantly merged in the Ocean of Love and are equal to the Father, to the souls who are full treasure-stores of all attainments, BapDada’s love, remembrance and namaste.

Now, according to the time, start the service of giving a current of power

The time is such that you now have to perform the task of giving a current of power and vibrations that create an atmosphere through your mind everywhere. There is now a need for this type of service because the times to come are to going be very delicate. This is why you must now become angels and tour around everywhere with your flying stage. Through your angelic form, enable others to experience whatever they want, whether it is peace, happiness or contentment. Let them experience having received peace, power and happiness through you angels. The internal stage, that is, your final stage, the powerfulstage, is your last vehicle. Make this form of yours emerge in front of you and tour around in your angelic form giving a current of power. Only then will the song be sung that the Shaktis have come. Then the Almighty Authority will automatically be revealed through you Shaktis.

You saw the corporeal form: whenever there was a time when there was such a wave, then day and night, he paid special attention to giving those weak souls a current and filling them with power. Even during the night, he would make special time and do the service of filling souls with a current of power. So now, you all especially have to become “light-and-mighthouses” and do the service of giving a current of power so that the impact of light and might can spread everywhere. No matter what happens in this physical world, you angels remain up above and, as detached observers observe everyone’s part and continue to give a current of power. All of you are instruments for unlimited world benefit. Therefore, become detached observers and whilst seeing the whole game, do the service of giving a current of power and your co-operation. You don’t have to get off your seat to give a current of power. Give whilst remaining stable in an elevated stage so that you are not affected by any type of atmosphere.

Just as the Father sits in one place in the subtle region and sustains the children of the whole world, so too, you children should also sit in one place and do unlimited service like the Father. Follow the Father. Give a current of power to the unlimited. Keep yourself busy in doing unlimited service and there will automatically be unlimited disinterest. You can constantly do the service of giving a current of power. All problems with your health and time, etc are easily solved by this. You can engage yourself in this unlimited service day and night. When you give a current of power to the unlimited, those who are close to you will also automatically take that power. By your giving an unlimited current of power, an atmosphere will automatically be created.

You Brahmins are the special trunk, the original jewels. Everyone receives a current of power (sakaash) through the trunk. So give power to those who are weak. Use your time in making effort to give others co-operation. To give others your co-operation means to accumulate for yourself. Now spread such a wave: I have to give. I have to give. I only have to give. I mustn’t seek salvation (favours), but give salvation. Receiving is merged in giving. If you don’t make an elevated plan for the benefit of the self now, then world service will not receive that current of power. Therefore, now give a current of power to do the service of transforming intellects. Then you will see how success automatically bows down in front of you. Remove the curtain of obstacles with the power of your thoughts and words and you will be able to see the scene of benefit behind the curtain.

Along with churning knowledge, also appoint a day for having thoughts of good wishes and pure feelings, for practising giving a current of power, for having silence of the mind and traffic control every now and then. Even if you can’t take a day off, you do have one day off in the week and so fix a programme for this accordingly at your own places. Especially make a programme to be in solitude and to be economical with your treasures. Everywhere, sorrow and peacelessness of the mind and distress of the mind are increasing very quickly. BapDada feels mercy for the souls of the world. Just as waves of sorrow are increasing at a fast speed, so, you children of the Bestower of Happiness must give all souls everywhere the experience of a drop of happiness through your attitude with the power of your minds, by serving through your minds and giving a current of power. O deity souls, o worthy-of-worship souls, give a current of power to your devotees!

Scientists think about creating inventions through which all sorrow can end. However, the facilities they invent cause sorrow as well as giving happiness. They definitely think that there should not be any sorrow; but just the attainment of happiness. However, they themselves don’t experience imperishable happiness and so how could they give it to others? All of you have accumulated a stock of happiness, peace and altruistic, true love and so you have to donate it to them. Pay special attention to spreading powerful vibrations of remembrance everywhere. A high tower can give current everywhere; it spreads light and might. Similarly, stay in a high stage every day for a minimum of four hours and think: I am sitting in a high place and giving light and might to the world. BapDada now wants the children to start fast service. Whatever has happened has been very good. Now, according to the time, give others more chance s to serve through words. Now make others the “mikes” and you become the might and give a current of power to everyone. Your current of power and their words will do double the work.

Question: What is the greatest tapasya, the power of which can transform the world?

Answer: To belong to the one Father and none other is the greatest tapasya. Those who remain stable in such a stage are great tapaswis. The power of tapasya is remembered as the greatest power. Those who maintain the tapasya of belonging to the one Father and none other have a lot of power. The power of this tapasya transforms the world. Hatha yogis do tapasya while standing on one leg. However, you children don’t stand on one leg, but you maintain the awareness of One. You belong to only the One. Such tapasya will transform the world. Therefore, become such world benefactors, that is, become great tapaswis.

Blessing: May you be a h oly swan who increases your account of accumulation with powerful thoughts.
Just as a swan separates stones from jewels, in the same way you are h oly swans who are those able to discern between what is waste and what is powerful. A swan never picks up stones but just separates them and puts them to one side, never taking them. In the same way, you holy swans put waste aside and imbibe powerful thoughts. You heard, spoke and performed waste for a long time and you simply lost everything as a result. However, now, instead of being those who experience loss, become those who increase their accounts of accumulation.
Slogan: If you tie the bracelet of the Godly code of conduct on yourself, all your bondage will finish.

 

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 8 JULY 2018 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 8 July 2018

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08-07-18
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 19-12-83 मधुबन

परमात्म प्यार – नि:स्वार्थ प्यार

आज स्नेह के सागर बाप अपने स्नेही बच्चों को देख रहे हैं। स्नेही सब बच्चे हैं फिर भी नम्बरवार हैं। एक हैं स्नेह करने वाले। दूसरे हैं स्नेह निभाने वाले। तीसरे हैं सदा स्नेह स्वरूप बन स्नेह के सागर में समाए हुए, जिसको लवलीन बच्चे कहते। लवली और लवलीन दोनों में अन्तर है। बाप का बनना अर्थात् स्नेही, लवलीन बनना। सारे कल्प में कभी भी और किस द्वारा भी यह ईश्वरीय स्नेह, परमात्म प्यार प्राप्त हो नहीं सकता। परमात्म प्यार अर्थात् नि:स्वार्थ प्यार। परमात्म प्यार इस श्रेष्ठ ब्राह्मण जन्म का आधार है। परमात्म प्यार जन्म-जन्म की पुकार का प्रत्यक्ष फल है। परमात्म प्यार नये जीवन का जीयदान है। परमात्म प्यार नहीं तो जीवन नीरस, सूखे गन्ने के मुआफिक है। परमात्म प्यार बाप के समीप लाने का साधन है। परमात्म प्यार सदा बापदादा के साथ अर्थात् परमात्मा को साथी अनुभव कराता है। परमात्म प्यार मेहनत से छुड़ाए सहज और सदा के योगी, योगयुक्त स्थिति का अनुभव कराता है। परमात्म प्यार सहज ही तीन मंजिल पार करा देता है।

1. देहभान की विस्मृति। 2. देह के सर्व सम्बन्धों की विस्मृति। 3. देह की, देह के दुनिया की अल्पकाल की प्राप्ति के आकर्षणमय पदार्थों का आकर्षण सहज समाप्त हो जाता है। त्याग करना नहीं पड़ता लेकिन श्रेष्ठ सर्व प्राप्ति का भाग्य स्वत: ही त्याग करा देता है। तो आप प्रभु प्रेमी बच्चों ने त्याग किया वा भाग्य लिया? क्या त्याग किया? अनेक चत्तियां लगा हुआ वस्त्र, जड़जड़ीभूत पुरानी अन्तिम जन्म की देह का त्याग, यह त्याग है? जिसे स्वयं भी चलाने में मजबूर हो, उसके बदले फरिश्ता स्वरूप लाइट का आकार जिसमें कोई व्याधि नहीं, कोई पुराने संस्कार स्वभाव का अंश नहीं, कोई देह का रिश्ता नहीं, कोई मन की चंचलता नहीं, कोई बुद्धि के भटकने की आदत नहीं – ऐसा फरिश्ता स्वरूप, प्रकाशमय काया प्राप्त होने के बाद पुराना छोड़ना, यह छोड़ना हुआ? लिया क्या और दिया क्या? त्याग है वा भाग्य है? ऐसे ही देह के स्वार्थी सम्बन्ध, सुख-शान्ति का चैन छीनने वाले विनाशी सम्बन्धी, अभी भाई है अभी स्वार्थवश दुश्मन हो जाते, दु:ख और धोखा देने वाले हो जाते, मोह की रस्सियों में बांधने वाले, ऐसे अनेक सम्बन्ध छोड़ एक में सर्व सुखदाई सम्बन्ध प्राप्त करते तो क्या त्याग किया? सदा लेने वाले सम्बन्ध छोड़े, क्योंकि सभी आत्मायें लेती ही हैं, देती नहीं। एक बाप ही दातापन का प्यार देने वाला है, लेने की कोई कामना नहीं। चाहे कितनी भी धर्मात्मा, महात्मा, पुण्य आत्मा हो, गुप्त दानी हो, फिर भी लेता है, दाता नहीं है। स्नेह भी शुभ लेने की कामना वाला होगा। बाप तो सम्पन्न सागर है इसलिए वह दाता है, परमात्म प्यार ही दातापन का प्यार है, इसलिए उनको देना नहीं, लेना है। ऐसे ही विनाशी पदार्थ विषय भोग अर्थात् विष भरे भोग हैं। मेरे-मेरे की जाल में फँसाने वाले विनाशी पदार्थ भोग-भोग क्या बन गये? पिंजड़े के पंछी बन गये ना। ऐसे पदार्थ, जिसने कखपति बना दिया, उसके बदले सर्वश्रेष्ठ पदार्थ देते जो पदमापद्मपति बनाने वाले हैं। तो पदम पाकर, कख छोड़ना, क्या यह त्याग हुआ! परमात्म प्यार भाग्य देने वाला है। त्याग स्वत: ही हुआ पड़ा है। ऐसे सहज सदा के त्यागी ही श्रेष्ठ भाग्यवान बनते हैं।

कभी-कभी बाप के आगे कई लाडले ही कहें, लाड-प्यार दिखाते हैं कि हमने इतना त्याग किया, इतना छोड़ा फिर भी ऐसे क्यों! बापदादा मुस्कराते हुए बच्चों को पूछते हैं कि छोड़ा क्या और पाया क्या? इसकी लिस्ट निकालो। कौन सा तरफ भारी है – छोड़ने का वा पाने का? आज नहीं तो कल जो छोड़ना ही है, मजबूरी से भी छोड़ना ही पड़ेगा, अगर पहले से ही समझदार बन प्राप्त कर फिर छोड़ा तो वह छोड़ना हुआ क्या! भाग्य के वर्णन के आगे त्याग कौड़ी है, भाग्य हीरा है। ऐसे समझते हो ना! वा बहुत त्याग किया है? बहुत छोड़ा है? छोड़ने वाले हो या लेने वाले हो? कभी भी स्वप्न में भी ऐसा संकल्प किया तो क्या होगा? अपने भाग्य की रेखा, मैंने किया, मैंने छोड़ा, इससे लकीर को मिटाने के निमित्त बन जाते इसलिए स्वप्न में भी कब ऐसा संकल्प नहीं करना।

प्रभु प्यार सदा समर्पण भाव स्वत: ही अनुभव कराता है। समर्पण भाव बाप समान बनाता। परमात्म प्यार बाप के सर्व खजानों की चाबी है क्योंकि प्यार व स्नेह अधिकारी आत्मा बनाता है। विनाशी स्नेह, देह का स्नेह राज्य भाग्य गंवाता है। अनेक राजाओं ने विनाशी स्नेह के पीछे राज्य भाग्य गंवाया। विनाशी स्नेह भी राज्य भाग्य से श्रेष्ठ माना गया है। परमात्म प्यार, गंवाया हुआ राज्य भाग्य सदाकाल के लिए प्राप्त कराता है। डबल राज्य अधिकारी बनाता है। स्वराज्य और विश्व का राज्य पाते। ऐसे परमात्म प्यार प्राप्त करने वाली विशेष आत्मायें हो। तो प्यार करने वाले नहीं लेकिन प्यार में सदा समाये हुए लवलीन आत्माएं बनो। समाये हुए समान हैं – ऐसे अनुभव करते हो ना!

नये-नये आये हैं तो नये आगे जाने के लिए सिर्फ एक ही बात का ध्यान रखो। सदा प्रभु प्यार के प्यासे नहीं लेकिन प्रभु प्यार के ही पात्र बनो। पात्र बनना ही सुपात्र बनना है। सहज है ना। तो ऐसे आगे बढ़ो। अच्छा!

ऐसे पात्र सो सुपात्र बच्चों को, प्रभु प्रेम की अधिकारी आत्माओं को, प्रभु प्यार द्वारा सर्वश्रेष्ठ भाग्य प्राप्त करने वाली भाग्यवान आत्माओं को, सदा स्नेह के सागर में समाये हुए बाप समान बच्चों को, सर्व प्राप्तियों के भण्डार सम्पन्न आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

अब समय प्रमाण सकाश देने की सेवा करो (अव्यक्त महावाक्य)

समय प्रमाण अब चारों ओर सकाश देने का, वायब्रेशन देने का, मन्सा द्वारा वायुमण्डल बनाने का कार्य करना है। अब इसी सेवा की आवश्यकता है क्योंकि समय बहुत नाज़ुक आना है इसलिए अपनी उड़ती कला द्वारा फरिश्ता बन चारों ओर चक्कर लगाओ और जिसको शान्ति चाहिए, खुशी चाहिए, सन्तुष्टता चाहिए, फरिश्ते रूप में उन्हें अनुभूति कराओ। वह अनुभव करें कि इन फरिश्तों द्वारा शान्ति, शक्ति, खुशी मिल गई। अन्त:वाहक अर्थात् अन्तिम स्थिति, पावरफुल स्थिति ही आपका अन्तिम वाहन है। अपना यह रूप सामने इमर्ज कर फरिश्ते रूप में चक्कर लगाओ, सकाश दो, तब गीत गायेंगे कि शक्तियां आ गई…. फिर शक्तियों द्वारा सर्व-शक्तिवान स्वत: ही सिद्ध हो जायेगा।

जैसे साकार रूप को देखा, कोई भी ऐसी लहर का समय जब आता था तो दिन-रात सकाश देने, निर्बल आत्माओं में बल भरने का विशेष अटेन्शन रहता था, रात-रात को भी समय निकाल आत्माओं में सकाश भरने की सर्विस चलती थी। तो अभी आप सबको लाइट माइट हाउस बनकर यह सकाश देने की सर्विस खास करनी है जो चारों ओर लाइट माइट का प्रभाव फैल जाए। इस देह की दुनिया में कुछ भी होता रहे, लेकिन आप फरिश्ते ऊपर से साक्षी हो सब पार्ट देखते सकाश देते रहो क्योंकि आप सब बेहद विश्व कल्याण के प्रति निमित्त हो, तो साक्षी हो सब खेल देखते सकाश अर्थात् सहयोग देने की सेवा करो। सीट से उतर कर सकाश नहीं देना। ऊंची स्टेज पर स्थित होकर देना तो किसी भी प्रकार के वातावरण का सेक नहीं आयेगा।

जैसे बाप अव्यक्त वतन, एक स्थान पर बैठे चारों ओर के विश्व के बच्चों की पालना कर रहे हैं, ऐसे आप बच्चे भी एक स्थान पर बैठकर बाप समान बेहद की सेवा करो। फालो फादर करो। बेहद में सकाश दो। बेहद की सेवा में अपने को बिजी रखो तो बेहद का वैराग्य स्वत: ही आयेगा। यह सकाश देने की सेवा निरन्तर कर सकते हो, इसमें तबियत की बात, समय की बात.. सब सहज हो जाती है। दिन रात इस बेहद की सेवा में लग सकते हो। जब बेहद को सकाश देंगे तो नजदीक वाले भी ऑटोमेटिक सकाश लेते रहेंगे। इस बेहद की सकाश देने से वायुमण्डल ऑटोमेटिक बनेगा।

आप ब्राह्मण आदि रत्न विशेष तना हो। तना से सबको सकाश पहुंचती है। तो कमजोरों को बल दो। अपने पुरुषार्थ का समय दूसरों को सहयोग देने में लगाओ। दूसरों को सहयोग देना अर्थात् अपना जमा करना। अभी ऐसी लहर फैलाओ – देना है, देना है, देना ही देना है। सैलवेशन लेना नहीं है, सैलवेशन देना है। देने में लेना समाया हुआ है। अगर अभी से स्व कल्याण का श्रेष्ठ प्लैन नहीं बनायेंगे तो विश्व सेवा में सकाश नहीं मिल सकेगी इसलिए अभी सकाश द्वारा सबकी बुद्धियों को परिवर्तन करने की सेवा करो। फिर देखो सफलता आपके सामने स्वयं झुकेगी। मन्सा-वाचा की शक्ति से विघ्नों का पर्दा हटा दो तो अन्दर कल्याण का दृश्य दिखाई देगा।

ज्ञान के मनन के साथ शुभ भावना, शुभ कामना के संकल्प, सकाश देने का अभ्यास, यह मन के मौन का या ट्रैफिक कन्ट्रोल का बीच-बीच में दिन मुकरर करो। अगर किसको छुट्टी नहीं भी मिलती हो, सप्ताह में एक दिन तो छुट्टी मिलती है तो उसी प्रमाण अपने-अपने स्थान के प्रोग्राम फिक्स करो। लेकिन विशेष एकान्तवासी और खजानों के एकानामी का प्रोग्राम अवश्य बनाओ क्योंकि अभी चारों ओर मन का दु:ख और अशान्ति, मन की परेशानियां बहुत तीव्रगति से बढ़ रही हैं। बापदादा को विश्व की आत्माओं के ऊपर रहम आता है। तो जितना तीव्रगति से दु:ख ही लहर बढ़ रही है उतना ही आप सुख दाता के बच्चे अपने मन्सा शक्ति से, मन्सा सेवा व सकाश की सेवा से, वृत्ति से चारों ओर सुख की अंचली का अनुभव कराओ। हे देव आत्मायें, पूज्य आत्मायें अपने भक्तों को सकाश दो।

साइन्स वाले भी सोचते हैं ऐसी इन्वेन्शन निकालें जो दु:ख समाप्त हो जाए, साधन सुख के साथ दु:ख भी देता है, सोचते जरूर हैं कि दु:ख न हो, सिर्फ सुख की प्राप्ति हो लेकिन स्वयं की आत्मा में अविनाशी सुख का अनुभव नहीं है तो दूसरों को कैसे दे सकते हैं। आप सबके पास तो सुख का, शान्ति का, नि:स्वार्थ सच्चे प्यार का स्टॉक जमा है, तो उसका दान दो। स्पेशल अटेन्शन रखो कि हमें चारों ओर पावरफुल याद के वायब्रेशन फैलाने हैं। जैसे ऊंची टावर होती है, वह सकाश देती है, उससे लाइट माइट फैलाते हैं, ऐसे ऊंची स्टेज पर रह रोज़ कम से कम 4 घण्टे ऐसे समझो हम ऊंचे ते ऊंचे स्थान पर बैठ विश्व को लाइट और माइट दे रहा हूँ। बापदादा बच्चों से चाहते हैं कि अभी फास्ट सेवा शुरू करें। जो हुआ वह बहुत अच्छा। अब समय प्रमाण औरों को ज्यादा वाणी का चांस दो। अभी औरों को माइक बनाओ, आप माइट बनकर सकाश दो। तो आपकी सकाश और उन्हों की वाणी, यह डबल काम करेगी।

पार्टियों के साथ

प्रश्न:- महा-तपस्या कौन सी है? जिस तपस्या का बल विश्व को परिवर्तन कर सकता है?

उत्तर:- एक बाप दूसरा न कोई यह है महा-तपस्या। ऐसी स्थिति में स्थित रहने वाले महातपस्वी हुए। तपस्या का बल श्रेष्ठ बल गाया जाता है। जो इस तपस्या में रहते – एक बाप दूसरा न कोई, उनमें बहुत बल है। इस तपस्या का बल विश्व परिवर्तन कर लेता है। हठयोगी एक टांग पर खड़े होकर तपस्या करते हैं लेकिन आप बच्चे एक टांग पर नहीं, एक की स्मृति में रहते हो, बस एक ही एक। ऐसी तपस्या विश्व परिवर्तन कर देगी। तो ऐसे विश्व कल्याणकारी अर्थात् महान तपस्वी बनो। अच्छा।

वरदान:- समर्थ संकल्पों द्वारा जमा का खाता बढ़ाने वाले होलीहंस भव 
जैसे हंस कंकड़ और रत्न को अलग करते हैं, ऐसे आप होलीहंस अर्थात् समर्थ और व्यर्थ को परखने वाले। जैसे हंस कभी कंकड़ को चुग नहीं सकते, अलग करके रख देते, छोड़ देते, ग्रहण नहीं करते। ऐसे आप होलीहंस व्यर्थ को छोड़ समर्थ संकल्पों को धारण करते हो। व्यर्थ तो बहुत समय सुना, बोला किया लेकिन उसके परिणाम में सब कुछ गंवाया। अब गंवाने वाले नहीं, जमा का खाता बढ़ाने वाले हो।
स्लोगन:- स्वयं को ईश्वरीय मार्यादाओं के कंगन में बांध लो तो सर्व बंधन समाप्त हो जायेंगे।
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