daily murli 29 september

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 29 SEPTEMBER 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 29 September 2020

Murli Pdf for Print : – 

29-09-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
”मीठे बच्चे – तुम्हारी पढ़ाई का सारा मदार है योग पर, योग से ही आत्मा पवित्र बनती है, विकर्म विनाश होते हैं”
प्रश्नः- कई बच्चे बाप का बनकर फिर हाथ छोड़ देते हैं, कारण क्या होता है?
उत्तर:- बाप को पूरी रीति न पहचानने के कारण, पूरा निश्चयबुद्धि न होने के कारण 8-10 वर्ष के बाद भी बाप को फारकती दे देते हैं, हाथ छोड़ देते हैं। पद भ्रष्ट हो जाता है। 2- क्रिमिनल आई होने से माया की ग्रहचारी बैठ जाती है, अवस्था नीचे ऊपर होती रहती है तो भी पढ़ाई छूट जाती है।

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप समझा रहे हैं। अभी समझते हो कि हम सब रूहानी बेहद के बाप के बच्चे हैं, इनको बापदादा कहा जाता है। जैसे तुम रूहानी बच्चे हो वैसे यह (ब्रह्मा) भी रूहानी बच्चा है शिवबाबा का। शिवबाबा को रथ तो जरूर चाहिए ना इसलिए जैसे तुम आत्माओं को आरगन्स मिले हुए हैं कर्म करने के लिए, वैसे शिवबाबा का भी यह रथ है क्योंकि यह कर्मक्षेत्र है जहाँ कर्म करना होता है। वह है घर जहाँ आत्मायें रहती हैं। आत्मा ने जाना है हमारा घर शान्तिधाम है, वहाँ यह खेल नहीं होता। बत्तियाँ आदि कुछ नहीं होती, सिर्फ आत्मायें रहती हैं। यहाँ आती हैं पार्ट बजाने। तुम्हारी बुद्धि में है-यह बेहद का ड्रामा है। जो एक्टर्स हैं, उन्हों की एक्ट शुरू से लेकर अन्त तक तुम बच्चे नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार जानते हो। यहाँ कोई साधू-सन्त आदि नहीं समझाते हैं। यहाँ हम बच्चे बेहद के बाप पास बैठे हैं, अब हमको वापिस जाना है, पवित्र तो जरूर बनना है आत्मा को। ऐसे नहीं कि शरीर भी यहाँ पवित्र बनना है, नहीं। आत्मा पवित्र बनती है। शरीर तो पवित्र तब बनें जब 5 तत्व भी सतोप्रधान हों। अब तुम्हारी आत्मा पुरूषार्थ कर पावन बन रही है। वहाँ आत्मा और शरीर दोनों पवित्र होते हैं। यहाँ नहीं हो सकते। आत्मा पवित्र बन जाती है तो फिर पुराना शरीर छोड़ती है, फिर नये तत्वों से नये शरीर बनते हैं। तुम जानते हो हमारी आत्मा बेहद के बाप को याद करती है वा नहीं करती है? यह तो हर एक को अपने से पूछना है। पढ़ाई का सारा मदार है योग पर। पढ़ाई तो सहज है, समझ गये हैं कि चक्र कैसे फिरता है, मुख्य है ही याद की यात्रा। यह अन्दर गुप्त है। देखने में थोड़ेही आता है। बाबा नहीं कह सकते कि यह बहुत याद करते हैं वा कम। हाँ, ज्ञान के लिए बता सकेंगे कि यह ज्ञान में बहुत तीखा है। याद का तो कुछ देखने में नहीं आता है। ज्ञान मुख से बोला जाता है। याद तो है अजपाजाप। जाप अक्षर भक्ति मार्ग का है, जाप माना कोई का नाम जपना। यहाँ तो आत्मा को अपने बाप को याद करना है।

तुम जानते हो हम बाप को याद करते-करते पवित्र बनते-बनते मुक्तिधाम-शान्तिधाम में जाकर पहुँचेंगे। ऐसे नहीं कि ड्रामा से मुक्त हो जायेंगे। मुक्ति का अर्थ है – दु:ख से मुक्त हो, शान्तिधाम जाए फिर सुखधाम में आयेंगे। पवित्र जो बनते हैं वह सुख भोगते हैं। अपवित्र मनुष्य उन्हों की खिदमत करते हैं। पवित्र की महिमा है, इसमें ही मेहनत है। ऑखें बड़ा धोखा देती हैं, गिर पड़ते हैं। नीचे-ऊपर तो सबको होना पड़ता है। ग्रहचारी सबको लगती है। भल बाबा कहते, बच्चे भी समझा सकते हैं। फिर कहते हैं माता गुरू चाहिए क्योंकि अब माता गुरू का सिस्टम चलता है। आगे पिताओं का था। अभी पहले-पहले कलष माताओं को मिलता है। मातायें मैजारटी में हैं, कुमारियाँ राखी बाँधती हैं, पवित्रता के लिए। भगवान कहते हैं काम महाशत्रु है, इस पर जीत पहनो। रक्षा बंधन पवित्रता की निशानी है, वो लोग राखी बाँधते हैं। पवित्र तो बनते नहीं हैं। वह सब हैं आर्टीफीशियल राखी, कोई पावन बनाने वाले नहीं हैं इसमें तो ज्ञान चाहिए। अभी तुम राखी बाँधते हो। अर्थ भी समझाते हो। यह प्रतिज्ञा कराते हैं। जैसे सिक्ख लोगों को कंगन निशानी होती है परन्तु पवित्र तो बनते नहीं। पतित को पावन बनाने वाला, सर्व का सद्गति दाता एक है, वह भी देहधारी नहीं है। पानी की गंगा तो इन आंखों से देखने में आती है। बाप जो सद्गति दाता है, उनको इन आंखों से नहीं देखा जाता। आत्मा को कोई भी देख नहीं सकते कि वह क्या चीज़ है। कहते भी हैं हमारे शरीर में आत्मा है, उनको देखा है? कहेंगे नहीं। और सब चीज़ें जिसका नाम है वह देखने में जरूर आती हैं। आत्मा का भी नाम तो है। कहते भी हैं भ्रकुटी के बीच चमकता है अजब सितारा। परन्तु देखने में नहीं आते हैं। परमात्मा को भी याद करते हैं, देखने में कुछ नहीं आयेगा। लक्ष्मी-नारायण को देखा जाता है इन ऑखों से। लिंग की भल पूजा करते हैं परन्तु वह कोई यथार्थ रीति तो नहीं है ना। देखते हुए भी जानते नहीं हैं, परमात्मा क्या? यह कोई नहीं जान सकते। आत्मा तो बहुत छोटी बिन्दी है। देखने में नहीं आती है। न आत्मा को, न परमात्मा को देखा जा सकता है, जाना जाता है। अभी तुम जानते हो हमारा बाबा आया हुआ है इनमें। इस शरीर की अपनी आत्मा भी है, फिर परमपिता परमात्मा कहते हैं-मैं इनके रथ पर विराजमान हूँ इसलिए बापदादा कहते हो। अब दादा को तो इन ऑखों से देखते हो, बाप को नहीं देखते हो। जानते हो बाबा ज्ञान का सागर है, वह इस शरीर द्वारा हमको ज्ञान सुना रहे हैं। वह ज्ञान का सागर पतित-पावन है। निराकार रास्ता कैसे बतायेंगे? प्रेरणा से तो कोई काम नहीं होता। भगवान आते हैं यह किसको भी पता नहीं है। शिव जयन्ती भी मनाते हैं तो जरूर यहाँ आता होगा ना। तुम जानते हो अभी वह हमको पढ़ा रहे हैं। बाबा इसमें आकर पढ़ाते हैं। बाप को पूरी रीति न पहचानने कारण, निश्चयबुद्धि न होने कारण 8-10 वर्ष के बाद भी फारकती दे देते हैं। माया बिल्कुल ही अंधा बना देती है। बाप का बनकर फिर छोड़ देते हैं तो पद भ्रष्ट हो जाता है। अब तुम बच्चों को बाप का परिचय मिला है तो औरों को भी देना है। ऋषि-मुनि आदि सब नेती-नेती करते गये। आगे तुम भी जानते नहीं थे। अभी तुम कहेंगे हाँ हम जानते हैं तो आस्तिक हो गये। सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है, यह भी तुम जानते हो। सारी दुनिया और तुम खुद इस पढ़ाई के पहले नास्तिक थे। अब बाप ने समझाया है तो तुम कहते हो हमको परमपिता परमात्मा बाप ने समझाया है, आस्तिक बनाया है। हम रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त को नहीं जानते थे। बाप है रचता, बाप ही संगम पर आकर नई दुनिया की स्थापना भी करते हैं और पुरानी दुनिया का विनाश भी करते हैं। पुरानी दुनिया के विनाश के लिए यह महाभारत लड़ाई है, जिसके लिए समझते हैं, उस समय कृष्ण था। अभी तुम समझते हो-निराकार बाप था, उनको देखा नहीं जाता है। कृष्ण का तो चित्र है, देखा जाता है। शिव को देख नहीं सकते। कृष्ण तो है सतयुग का प्रिन्स। वही फीचर्स फिर हो न सकें। कृष्ण भी कब कैसे आया, यह भी कोई नहीं जानते। कृष्ण को कंस की जेल में दिखाते हैं। कंस सतयुग में था क्या? यह हो कैसे सकता। कंस असुर को कहा जाता है। इस समय सारी आसुरी सम्प्रदाय है ना। एक-दो को मारते-काटते रहते हैं। दैवी दुनिया थी, यह भूल गये हैं। ईश्वरीय दैवी दुनिया ईश्वर ने स्थापन की। यह भी तुम्हारी बुद्धि में है – नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। अभी तुम हो ईश्वरीय परिवार, फिर वहाँ होंगे दैवी परिवार। इस समय ईश्वर तुमको लायक बना रहे हैं स्वर्ग का देवी-देवता बनाने। बाप पढ़ा रहे हैं। इस संगमयुग को कोई भी नहीं जानते। कोई भी शास्त्र में इस पुरूषोत्तम युग की बात नहीं है। पुरूषोत्तम युग अर्थात् जहाँ पुरूषोत्तम बनना होता है। सतयुग को कहेंगे पुरूषोत्तम युग। इस समय तो मनुष्य पुरूषोत्तम नहीं है। इनको तो कनिष्ट तमोप्रधान कहेंगे, यह सब बातें सिवाए तुम ब्राह्मणों के और कोई नहीं समझ सकते। बाप कहते हैं यह है आसुरी भ्रष्टाचारी दुनिया। सतयुग में ऐसा कोई वातावरण नहीं होता। वह थी श्रेष्ठाचारी दुनिया। उन्हों के चित्र हैं। बरोबर यह श्रेष्ठाचारी दुनिया के मालिक थे। भारत के राजायें होकर गये हैं जो पूजे जाते हैं। पूज्य पवित्र थे, जो ही फिर पुजारी बने। पुजारी भक्ति मार्ग को, पूज्य ज्ञान मार्ग को कहा जाता है। पूज्य सो पुजारी, पुजारी फिर पूज्य कैसे बनते हैं। यह भी तुम जानते हो इस दुनिया में पूज्य एक भी हो न सके। पूज्य परमपिता परमात्मा और देवताओं को ही कहा जाता है। परमपिता परमात्मा है सबका पूज्य। सब धर्म वाले उनकी पूजा करते हैं। ऐसे बाप का जन्म यहाँ ही गाया जाता है। शिव जयन्ती है ना। परन्तु मनुष्यों को कुछ पता नहीं कि उनका जन्म भारत में होता है, आजकल तो शिवजयन्ती की हॉली डे भी नहीं करते। जयन्ती मनाओ, न मनाओ, तुम्हारी मर्जी। आफिशियल हॉली डे नहीं है। जो शिवजयन्ती को नहीं मानते हैं, वह तो अपने काम पर चले जाते हैं। बहुत धर्म हैं ना। सतयुग में ऐसी बातें होती नहीं। वहाँ यह वातावरण ही नहीं। सतयुग है ही नई दुनिया, एक धर्म। वहाँ यह पता नहीं पड़ता कि हमारे पीछे चन्द्रवंशी राज्य होगा। यहाँ तुम सब जानते हो-यह-यह पास्ट हो गया है। सतयुग में तुम होंगे, वहाँ किस पास्ट को याद करेंगे? पास्ट तो हुआ कलियुग। उनकी हिस्ट्री-जॉग्राफी सुनने से क्या फायदा।

यहाँ तुम जानते हो हम बाबा के पास बैठे हैं। बाबा टीचर भी है, सतगुरू भी है। बाप आये हैं सबकी सद्गति करने। सभी आत्माओं को जरूर ले जायेंगे। मनुष्य तो देह-अभिमान में आकर कहते हैं, सब मिट्टी में मिल जाना है। यह नहीं समझते आत्मायें तो चली जायेंगी, बाकी यह शरीर मिट्टी के बने हुए हैं, यह पुराना शरीर खत्म हो जाता। हम आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा जाए लेती हैं। यह इस दुनिया में हमारा अन्तिम जन्म है, सब पतित हैं, सदैव पावन तो कोई रह नहीं सकते। सतोप्रधान, सतो, रजो, तमो होते ही हैं। वो लोग तो कह देते सब ईश्वर के ही रूप हैं, ईश्वर ने अपने अनेक रूप बनाये हैं, खेलपाल करने के लिए। हिसाब-किताब कुछ नहीं जानते। न खेलपाल करने वाले को जानते हैं। बाप ही बैठकर वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझाते हैं। खेल में हर एक का पार्ट अलग-अलग है। सबका पोज़ीशन अलग-अलग है, जो जैसा पोजीशन वाला होता है, उनकी महिमा होती है। यह सब बातें बाप संगम पर ही समझाते हैं। सतयुग में फिर सतयुग का पार्ट चलेगा। वहाँ यह बातें नहीं होगी। यहाँ तुमको सृष्टि चक्र का ज्ञान बुद्धि में फिरता रहता है। तुम्हारा नाम ही है स्वदर्शन चक्रधारी। लक्ष्मी-नारायण को थोड़ेही स्वदर्शन चक्र दिया जाता है। यह हैं ही यहाँ के। मूलवतन में सिर्फ आत्मायें रहती हैं, सूक्ष्मवतन में कुछ नहीं। मनुष्य, जानवर, पशु पक्षी आदि सब यहाँ होते हैं। सतयुग में मोर आदि दिखाते हैं। ऐसे नहीं कि वहाँ मोर के पंख निकाल पहनते हैं, मोर को थोड़ेही दु:ख देंगे। ऐसे भी नहीं मोर का गिरा हुआ पंख ताज में लगायेंगे। नहीं, ताज में भी झूठी निशानी दे दी है। वहाँ सब खूबसूरत चीजें होती हैं। गन्दी कोई चीज़ का नाम-निशान नहीं। ऐसी कोई चीज़ नहीं होती जिसको देखकर घृणा आये। यहाँ तो घृणा आती है ना। वहाँ जानवरों को भी दु:ख नहीं होता है। सतयुग कितना फर्स्टक्लास होगा। नाम ही है स्वर्ग, हेविन, नई दुनिया। यहाँ तो पुरानी दुनिया में देखो बरसात के कारण मकान गिरते रहते हैं। मनुष्य मर जाते हैं। अर्थक्वेक होगी सब दबकर मर जायेंगे। सतयुग में बहुत थोड़े होगे फिर बाद में वृद्धि को पाते रहेंगे। पहले सूर्यवंशी होंगे। जब दुनिया 25 परसेन्ट पुरानी होगी तो पीछे चन्द्रवंशी होंगे। सतयुग 1250 वर्ष है, वह है 100 परसेन्ट नई दुनिया। जहाँ देवी-देवता राज्य करते हैं। तुम्हारे में भी बहुत इन बातों को भूल जाते हैं। राजधानी तो स्थापन होनी ही है। हार्टफेल नहीं होना है। पुरूषार्थ की बात है। बाप सभी बच्चों से एक समान तदबीर (पुरुषार्थ) कराते हैं। तुम अपने लिए विश्व पर स्वर्ग की बादशाही स्थापन करते हो। अपने को देखना है हम क्या बनेंगे? अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस पुरुषोत्तम युग में स्वर्ग के देवी-देवता बनने की पढ़ाई पढ़कर स्वयं को लायक बनाना है। पुरूषार्थ में हार्टफेल (दिलशिकस्त) नहीं होना है।

2) इस बेहद के खेल में हर एक्टर का पार्ट और पोजीशन अलग-अलग है, जैसी जिसकी पोजीशन वैसा उसे मान मिलता है, यह सब राज़ समझ वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी का सिमरण कर स्वदर्शन चक्रधारी बनना है।

वरदान:- श्रीमत से मनमत और जनमत की मिलावट को समाप्त करने वाले सच्चे स्व कल्याणी भव
बाप ने बच्चों को सभी खजाने स्व कल्याण और विश्व कल्याण के प्रति दिये हैं लेकिन उन्हें व्यर्थ तरफ लगाना, अकल्याण के कार्य में लगाना, श्रीमत में मनमत और जनमत की मिलावट करना-यह अमानत में ख्यानत है। अब इस ख्यानत और मिलावट को समाप्त कर रूहानियत और रहम को धारण करो। अपने ऊपर और सर्व के ऊपर रहम कर स्व कल्याणी बनो। स्व को देखो, बाप को देखो औरों को नहीं देखो।
स्लोगन:- सदा हर्षित वही रह सकते हैं जो कहीं भी आकर्षित नहीं होते हैं।

TODAY MURLI 29 SEPTEMBER 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 29 September 2020

29/09/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, everything in your study depends on yoga. It is by having yoga that you souls become pure and you are absolved your sins.
Question: Some children belong to the Father and then let go of His hand. What is the reason for this?
Answer: Some children divorce the Father and let go of His hand even after belonging to Him for eight to ten years. This is because they do not fully recognize the Father and don’t have faithful intellects; their status is destroyed. When children have criminal eyes, there are bad omens of Maya and their stage fluctuates and they then stop studying.

Om shanti. The spiritual Father explains to the spiritual children. You now understand that all of you are the spiritual children of the unlimited Father. You call us BapDada. Just as you are spiritual children, so this one (Brahma) is also a spiritual child of Shiv Baba. Shiv Baba definitely needs a chariot. Therefore, just as you souls have received organs in order to acts, similarly, Shiv Baba has taken this chariot. This is the field of action where actions are to be performed. That is the home where souls reside. You souls know that your home is the land of peace where no play is performed. There are no lights etc. there; souls just reside there. They come here to play their parts. It is in your intellects that this is an unlimited drama. You children know, numberwise, according to the efforts you make, all the acts that the actors perform from the beginning through the middle to the end. It is not a sage or holy man etc. here explaining to you. You children are sitting here with the unlimited Father. We now have to return home. Souls definitely have to become pure. It isn’t that the bodies will also become pure here; no. It is souls that become pure. The bodies will only be pure when the five elements have become satopradhan. You souls are now making effort to become pure. There, both the souls and the bodies are pure. It cannot be like that here. When you souls become pure, you will leave your old bodies. Then, new bodies will be created out of the new elements. You know whether you, a soul, remember the unlimited Father or not. Each of you has to ask yourself this question. Everything in this study depends on yoga. The study is very easy. You understand how the cycle turns. The main thing is the pilgrimage of remembrance which is internal and incognito. It is not possible to see it. Baba cannot say whether someone has a lot or a little remembrance. Yes, for knowledge, you can say that someone is very clever in that subject. Nothing about remembrance is visible. Knowledge is spoken with the mouth. Remembrance is the unchantable mantra. The word “chant” belongs to the path of devotion. To chant means to chant the name of someone. Here, you souls have to remember your Father. You know that, by continuing to remember your Father and by continuing to become pure, you will reach the land of liberation and peace. It isn’t that you will be liberated from the drama. “Liberation” means to be liberated from sorrow. You will go to the land of peace and then go to the land of happiness. Those who become pure experience happiness. Impure human beings serve them. There is praise of those who are pure. It is this that takes effort. The eyes deceive you a great deal and you fall. Everyone has to fluctuate. Everyone experiences bad omens. Although Baba says that children can also explain, He also says: Mother gurus are required because there is a system nowadays of mother gurus. Previously, it used to be fathers. Now it is the mothers who are first given the urn. The majority is of mothers. Kumaris tie a rakhi for purity. God says: Lust is the greatest enemy. Conquer it! Raksha Bandhan is the festival of purity. Those people tie a rakhi but they don’t become pure. All of those rakhis are artificial. None of them makes you pure. You need knowledge for that. You now tie a rakhi. You also explain the meaning of it and have them make a promise. The Sikhs wear a steel bangle as their symbol, but they don’t become pure either. The Purifier of the impure and the Bestower of Salvation for All is only the One. He is not a bodily being. The water of the Ganges is visible with these eyes. The Father, who is the Bestower of Salvation, cannot be seen with these eyes. No one can see what a soul is. It is said that there is a soul in each body, but has anyone seen one? They say, “No.” Everything that has a name is definitely visible. The soul too has a name. It is said that a wonderful star shines in the centre of the forehead. However, it is not visible. They remember the Supreme Soul, but He is not visible. Lakshmi and Narayan can be seen with these eyes. Although people worship a lingam, that is not accurate. Although they can see that, they don’t know who the Supreme Soul is. No one can know this. Souls are very tiny points. They are not visible. Neither is a soul visible nor is the Supreme Soul visible, but they can be understood. You now understand that your Baba has entered this one. This soul has his own body and then the Supreme Father, the Supreme Soul, says: I am present in this one’s chariot. This is why you call us BapDada. You can see Dada with your eyes, but you can’t see the Father. You know that Baba is the Ocean of Knowledge and that He is giving you knowledge through this body. He is the Ocean of Knowledge and the Purifier. How else could the incorporeal One show you the path? Nothing happens through inspiration. No one knows that God comes. People also celebrate the birthday of Shiva. Therefore, He must definitely have come here. You know that He is now teaching you. Baba enters this one and teaches you. Because of not fully recognizing the Father and not having faithful intellects, some divorce the Father even after eight to ten years. Maya completely blinds them. When you leave the Father after belonging to Him, your status is destroyed. You children have now received the Father’s introduction. Therefore, you have to give it to others. Rishis and munis have been saying, “Neti, neti” (neither this nor that). Previously, you didn’t know either. You now say that you know everything about Him, and so you have become theists. You also know how the world cycle turns. As well as the whole world, you too, were atheists before you studied this. Now that the Father has explained to you, you say that the Supreme Father, the Supreme Soul, has explained to you and made you into theists. We didn’t know the Creator or the beginning, the middle or the end of creation. The Father is the Creator. He comes at the confluence age to establish the new world and destroy the old world. There is this Mahabharat War for the destruction of the old world for which they believe that Krishna existed at that time. You now understand that it was the incorporeal Father who came. He cannot be seen. There is the picture of Krishna; he can be seen. Shiva cannot be seen. Krishna was a prince of the golden age. He cannot have those same features again. No one knows how or when Krishna came. They show Krishna in the jail of Kans (devil). Did Kans exist in the golden age? How could that be possible? Kans is a devil. At this time, the whole world is the community of devils; they continue to kill one another. They have forgotten that there used to be the divine world. God established the divine world of God. This is in your intellects, numberwise, according to the efforts you make. At present, you are God’s family and you will then become the deity family there. At this time, God is making you worthy of becoming the deities of heaven. The Father is teaching you. No one knows this confluence age. None of the scriptures mention this most elevated confluence age. The most elevated confluence age means the time when people become elevated beings. The golden age is called the most elevated age. Human beings are not elevated at this time. This world is called the lowest tamopradhan world. No one, except you Brahmins, can understand these things. The Father says: This is the corrupt world of devils. There won’t be this type of atmosphere in the golden age. That was the elevated world. Their pictures do exist. Truly, they were the masters of the elevated world. Those kings of Bharat who existed are worshipped. They were pure and worthy of worship but have now become worshippers. Worshippers are on the path of devotion whereas worthy-of-worship ones are on the path of knowledge. You now understand how those who are worthy of worship become worshippers and how those who are worshippers become worthy of worship. There cannot be a single worthy-of-worship person in this world. Only the Supreme Father, the Supreme Soul, and the deities can be worthy of worship. The Supreme Father, the Supreme Soul, is worthy of being worshipped by everyone. Those of all religions worship Him. The birth of such a Father is remembered here. There is the birthday of Shiva, but people don’t know that He takes birth in Bharat. Nowadays, they don’t even have a holiday for the birthday of Shiva. Whether or not you celebrate the birthday is up to you, but it is not an official holiday. Those who don’t believe in Shiv Jayanti go to work. There are many religions. Such things do not exist in the golden age. There isn’t this type of atmosphere there. The golden age is the new world where there is only one religion. There, they are not aware that the moon-dynasty kingdom will follow them. Here, you know that so-and-so existed in the past and that you will be in the golden age. What past will you remember there? For the golden age, the past is the iron age. What would be the benefit of listening to the history and geography of that? You know that you are sitting here with Baba. Baba is the Teacher and also the Satguru. The Father has come to grant everyone salvation. He will definitely take all souls back with Him. Human beings say out of body consciousness that everything is going to turn to dust. They don’t understand that the souls will depart and that the old bodies made of clay will then be destroyed. I, a soul, leave a body and take another one. This is my last birth in this world. Everyone is impure. No one can be eternally pure; there are definitely the stages of satopradhan, sato, rajo and tamo. Those people say that all are forms of God, that God created His many forms for entertainment. Neither do they understand the account of anything, nor do they know the One who entertains. The Father sits here and explains to you the world history and geography. Each one’s part in a play is separate. Each one’s position is separate. Whatever position someone has, that is praised. The Father explains all of these things at the confluence age. In the golden age it is the part of the golden age that is performed. These things will not exist there. The knowledge of the world cycle turns around in your intellects here. Your name is: Spinners of the discus of self-realisation. Lakshmi and Narayan are not given the discus of self-realisation. The discus belongs to this time. Only souls reside in the incorporeal world; there is nothing in the subtle region. Animals, birds etc. and human beings all exist here. They show peacocks etc. in the golden age. There, they don’t pull out the feathers of a peacock and wear them. They don’t cause a peacock any pain there. They don’t even pick up the feathers that have fallen off a peacock and put them in their crowns, no. Those have been shown in the crown falsely. There, everything is beautiful. There is no name or trace of anything dirty. There is nothing there at the sight of which you would feel dislike. Here, you feel dislike, do you not? There, even animals don’t experience pain. The golden age is first-class; the very name is heaven, the new world. Here, in the old world, even buildings collapse in the rains and people die. When earthquakes take place, everyone gets buried under the ground and dies. In the golden age there will be very few people and then the number of them will grow. First, there will be the sun dynasty. When the world becomes 25percent old, it will be called the moon dynasty. The golden age lasts for 1250 years; it is a one hundred percentnew world. The deities rule there. Many of you forget these things. The kingdom has to be established. You mustn’t have heart failure. It is a matter of making effort. The Father inspires all the children equally to make effort. You are establishing heaven on earth for yourselves. Examine yourself to see what you will become. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and Good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. At this most elevated age, study the study to become deities of heaven and make yourself worthy. Do not have heart failure (become disheartened) with your efforts.
  2. Each actor in this unlimited play has his own individual part and position. Each one receives respect according to his position. Understand all of these secrets, churn the world history and geography and become a spinner of the discus of self-realisation.
Blessing: May you be a true benefactor of yourself by following shrimat and stop following the dictates of yourself and the dictates of others.
The Father has given you children all the treasures for benefitting yourself and the world. To use them wastefully or for a non-benevolent task, or to mix shrimat with your own dictates or the dictates of others is being dishonest in looking after what you have been entrusted with. Now, finish this dishonesty and mixture and imbibe spirituality and mercy. Have mercy and benefit yourself and everyone else. Look at yourself and look at the Father. Do not look at others.
Slogan: Only those who are not attracted anywhere else can be constantly cheerful.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 29 SEPTEMBER 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 29 September 2018

Read Murli in Hindi :- Click Here

Read Murli 28 September 2018 :- Click Here

29/09/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you have to become 100% full of all virtues. Look in the mirror of your heart and see to what extent you have become pure.
Question: What ceremony do you children celebrate every day and what ceremony do people of the world celebrate every day?
Answer: Every day you celebrate the festival of establishing the deity religion, that is, of making Bharat into heaven. Every day you have to plant the saplingof changing human beings into deities. Those people plant saplings of thorns in a forest and call it a tree-planting ceremony. You celebrate the festival of changing thorns into flowers every day. No one else can celebrate a festival in the same way as you.
Song: See your face in the mirror of your heart. 

Om shanti. Who said this? Here, it is a personal meeting of the Father and children. You children have now received the divine eye, the third eye of knowledge, with which you can see because all souls are impure and sinful. The Father gives shrimat to make impure ones pure. You have to understand who it is who is giving you shrimat. He is the one who speaks to you souls. Souls know whether they have performed good or bad actions through their bodies. Baba is now giving you children this understanding. It is definite that all of you were impure. You can now see to what extent you have become pure and how many divine virtues you have imbibed. The one who inspires you to imbibe divine virtues is the Father, the Ocean of all Virtues. He sits here and explains to you. People sing: I am without virtue. We have no virtues. They say of themselves that they don’t have any virtues. You children now have to become 100% full of all virtues. He says: Look in the mirror of your heart. Only when you become full of virtues will you be able to marry Shri Lakshmi or Shri Narayan. First of all you have to give the Father’s introduction. He is the unlimited Father and it is to Him that you sing: You are the Mother and Father. There is great praise of that Supreme Father. People say: Salutations to Shiva. He is the Creator of heaven. We definitely have the right to claim the inheritance from the Father. The inheritance from the unlimited Father is the sovereignty of heaven, which He gives to us. Bharat did have the sovereignty of heaven but doesn’t have it now. It definitely did receive it from the Father. Bharat becomes the land of truth. No one knows that this is the birthplace of Shiv Baba, the Truth. Shiv Ratri is remembered. What night is it? They show the night of Krishna and also the night of Shiva. Krishna took birth from his mother’s womb. You wouldn’t say that there is Janamashtmi for Shiv Baba. Shiv Baba comes when it is the night of Brahma. After the night, the day comes, that is, it is the end of the iron age and the beginning of the golden age. This is called the extremely dark night. This is an unlimited aspect. There are limited nights, but the end of the iron age is called extreme darkness, when the Satguru gives the ointment of knowledge. The Satguru, the Father is called the Sun of Knowledge. First of all, you have to give the introduction of the Father and the inheritance. For instance, when an emperor doesn’t have a son, he would adopt the son of a poor person and the child would know in his heart that he was poor and that he has now become the son of an emperor. You too know that you became very poor and poverty-stricken by belonging to Ravan. You now belong to the unlimited Father. You are receiving the inheritance of heaven from Him. You have to give this introduction very clearly and also get them to put it in writing: We are receiving the unlimited inheritance from our unlimited Father. No one else can give this knowledge. Sannyasis leave their homes and families and go away. They have become free from being called father or uncle etc. Here, it is a matter of the household path. They renounce the household path. The Father explains to you children: You were deities on the household path. You were full of all virtues and were viceless and you were also the masters of the world. Then, from being worthy of worship, you became worshippers and also worshipped yourselves. When you are worthy-of-worship deities, you don’t need to worship there. In the same way, Bharat was the worthy-of-worship clan of deities. From being worthy of worship you became worshippers. Now, once again, you children have to become worthy-of-worship deities from worshippers. This is why it is remembered: You are worthy of worship and you are worshippers. The Father doesn’t become worthy of worship or a worshipper. The Father is always worthy of worship. On the path of devotion, brahmin priests place a Shivalingam in a temple and they sit and worship the Father. We are His children. We would say: O Supreme Father, Supreme Soul! He is incorporeal and souls are also incorporeal. When people go to Shiva, they say: Supreme Father, Supreme Soul, incorporeal Shiva. The soul says this through these organs. You children now know that those who pass away having performed good actions are praised. You only say “Mother and Father” to that incorporeal One. With your easy Raja Yoga and the teachings of knowledge, we will have an abundance of happiness through the teachings of Your Raja Yoga and easy knowledge. You are making effort for that. This is so easy. You are BKs, children of Prajapita Brahma, in a practical way. You are sitting personally in front of Him. You are personally in front of both Shiv Baba and Brahma Baba. Shiv Baba doesn’t have a body of His own. You know that Shiv Baba is teaching you Raja Yoga through the mouth of this one. Krishna is a small child. How could he say: Forget your body and bodily relationships and consider yourself to be a soul? Krishna cannot say this. Only the Father can say this. So this is a big mistake that they have made. Everyone, from Lakshmi and Narayan to all the subjects, received happiness. They are the ones who took 84 births and became tamopradhan. The main ones are Lakshmi and Narayan. As are the king and queen, so the subjects. You have now become Brahmins from shudras. This is your leap birth. The leap birth is said to be the righteous birth. You know that this is your Godly birth. Day by day, Baba continues to explain new points to you. You have to study as long as you live, till the end. Points will continue to emerge and will continue to be added. The sacrificial fire of knowledge has to continue till the end. When people create a sacrificial fire of Rudra, they create saligrams of clay and worship them. The souls are worshipped. You embodied souls have made Bharat into the crown on the head. Therefore, you souls are worshipped. You do service with the Supreme Father, the Supreme Soul, and so, along with a Shivalingam, they also create saligrams. So, first of all, the main thing is to give the Father’s introduction. Shiv Baba took birth, but He doesn’t take birth from the womb of a mother. He is incorporeal. For instance, when someone sheds his body, they invoke that soul to eat special food made for the departed spirit. Therefore, they feed the soul; it is the soul that tastes the food. It is the soul that feels happiness or sorrow and whether something is bitter or sweet. Sanskars are in the soul. A soul experiences happiness or sorrow when he is in a body. Baba has explained to you how punishment is received. It isn’t a subtle body; you are made to adopt a physical body and are then punished. Punishment is experienced in the jail of a womb. That soul cries out in distress: “That’s enough! Let me out!” There is the example of the palace of a womb. The soul didn’t want to come out. That is just an example. In the golden age, the womb becomes a palace. There is no sin there. You now know how you became impure. The very saying is: As sinful as Ajamil. He committed a lot of sin. Pure means viceless. The main thing is vice. This is why sannyasis leave their homes and families in order to become pure and why they are called great souls. All human beings are impure and this is why they continue to sing: Rama, who belongs to Sita, is the Purifier. King Rama is the one who belonged to the Raghav (elevated) clan. Shiv Baba would not be called King Rama. The Supreme Father, the Supreme Soul, is called Rama, not King Rama. I do not become a king or an emperor. You become Shri Lakshmi, the empress, and Shri Narayan, the emperor; I don’t become that. I am incorporeal, beyond rebirth. All bodily beings continue to take rebirth. The Father says: I am incorporeal. I too have to take the support of matter. I do not enter a womb. I enter this one. This one doesn’t know about his own births. The Father sits here and explains: You were deities and you then became shudras and have now become Brahmins. I explain this to you. You do not know your own births. Only those who become Brahmins will come and understand. The Father says: You have completed 84 births in this way. It is said: The inheritance of 21 generations. The unlimited Father would give you the inheritance of unlimited happiness. You receive temporary happiness from physical fathers. In the land of immortality, you have happiness from the beginning through the middle to the end. Here, there is sorrow from the beginning through the middle to the end. Shiv Baba, the Lord of Immortality, is telling you Parvatis the story of immortality. He is also the One who tells you the story of the true Narayan. This is the story of giving you the third eye of knowledge. The people of Bharat were constantly happy. They were very pure. They had purity, health and wealth. No one was ever ill. The very name is heaven. Ancient Bharat was heaven and there were no other religions or lands there. The tree would definitely have a trunk. Who used to be the trunk? There are in fact images of the deities. That was the foundation, but they didn’t call themselves those who belong to the deity religion. Their kingdom is now being established. You can become a couple like Radhe and Krishna of the golden age. Come and we will explain to you how you can truly become princesof heaven. At this time, all are impure. You can write this tactfully. They say that all religions should unite and become one, but how is that possible? Only in the golden age was there just the one religion. There was one direction and one language. There wasn’t any conflict there. They were the masters of the world. There was no other religion. No one uses his intellect to find out how they became that or how the other religions came into existence. When the pure souls of other religions have come down from up above and have become completely impure, it is then that the Purifier Father comes. First of all, the founders of religions come and then they ask others to come. They have to go through the stages of sato, rajo and tamo. Everyone who comes has to become tamo by passing through the sato and rajo stages. However, you are now becoming pure from impure. Everyone calls out: God, the Father, come! Come and take us to heaven. Some consider liberation to be heaven and others consider liberation-in-life to be heaven. You understand that heaven is liberation-in-life. Your sapling is being planted. Those people are now planting saplings of thorns in forests. There is the difference of day and night. They have ceremonies of that too, they have tree planting ceremonies. Every day you celebrate the ceremony of establishing the deity religion, that is, of making Bharat into heaven. You make effort every day to change human beings into deities. It is your everyday ceremony to change thorns into flowers. The Master of the Garden will then definitely give you such a reward too. You children heard in the song: O soul, look in the mirror of your heart! Have you become worthy of becoming a deity of heaven, that is, of marrying Lakshmi or Narayan? You don’t have any defects, do you? Many storms will come; Maya doesn’t leave anyone alone. She even extinguishes the big lamps. Wrong types of thought will attack you a great deal. You have to remain strong. There is no question of wilting in this. You mustn’t break your intellect’s yoga away from the Father. That Father is everyone’s Boatman. This is a big canal of poison. You cross it with the power of yoga. You go across the ocean of poison and go to the ocean of milk. The kingdom of Vishnu is in the ocean of milk, that is, rivers of ghee flow there. Here, rivers of kerosene and blood flow. You children know that by following Shiv Baba’s shrimat, you are going to Shivalaya where you will remain constantly happy. You were constantly happy and then Maya made you unhappy. The household path has been made unrighteous. There, the household path is righteous. The Father is now making you into beings who belong to the elevated divine household path. First of all, the main thing is to give the Father’s introduction. By belonging to the Father you can become the masters of heaven. This is the land of sorrow. You go to heaven via the land of liberation and this is why you have to remember the land of Shiva and the land of Vishnu. By remembering them, your final thoughts will lead you to your destination. Remember that your 84 births are now coming to an end. Then, tomorrow, we will come and rule. Continue to look at your face in the mirror of your heart: Do I have any defects in me? Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Cross the big channel of poison with the power of yoga. Don’t wilt with wrong thoughts. Remain strong.
  2. In order to become worthy of worship, serve with the Father to make Bharat into the crown.
Blessing: May you be a master bestower of happiness and constantly give the experience of happiness to all souls who come into connection with you.
You are master bestowers of happiness, children of the Bestower of Happiness, and so you have to continue to accumulate in your account of happiness. Do not just check whether you caused anyone sorrow throughout the day, but check as to how many you gave happiness to. Let whoever comes into connection with you master bestowers of happiness experience happiness at every step. This is known as divinity and spirituality. Let there be the awareness at every step that you have to accumulate enough for 21 births in this one birth.
Slogan: Make the one Father your world and you will continue to have imperishable attainments.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 29 SEPTEMBER 2018 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 29 September 2018

To Read Murli 28 September 2018 :- Click Here
29-09-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – तुम्हें 100 परसेन्ट सर्वगुणों में सम्पन्न बनना है, दिल दर्पण में देखना है कि हम कहाँ तक पावन बने हैं”
प्रश्नः- तुम बच्चे कौनसा उत्सव रोज़ मनाते हो और मनुष्य कौनसा उत्सव मनाते हैं?
उत्तर:- तुम दैवी धर्म की स्थापना का अर्थात् भारत को स्वर्ग बनाने का उत्सव रोज़ मनाते हो। रोज़ तुम्हें मनुष्य को देवता बनाने की सैपलिंग लगानी है। वे मनुष्य तो जंगल के कांटों की सैपलिंग लगाते और नाम देते हैं वनोत्सव। तुम कांटों से फूल बनाने का उत्सव रोज़ मनाते हो। तुम्हारे जैसा उत्सव और कोई मना नहीं सकता।
गीत:- मुखड़ा देख ले प्राणी…….. 

ओम् शान्ति। यह किसने कहा? यहाँ तो है ही बाप और बच्चों का सम्मुख मिलन। बच्चों को अब दिव्य चक्षु, ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है – देखने के लिए क्योंकि पतित अथवा पाप आत्मायें तो सब थे। पतितों को पावन बनाने के लिए बाप श्रीमत देते हैं। यह श्रीमत देने वाला कौन है, उनको भी समझना चाहिए। वही बोलते हैं आत्माओं को। आत्मा जानती है मैंने इस शरीर से अच्छे कर्म किये हैं या बुरे कर्म किये हैं। बाबा तुम बच्चों को समझ देते हैं। यह तो जरूर है सब पतित थे। अभी तुम देखो हम कहाँ तक पावन बने हैं और दैवी गुण धारण किये हैं? दैवी गुण धारण कराने वाला है सर्वगुणों का सागर बाप, वह बैठ समझाते हैं। मनुष्य तो गाते हैं मुझ निर्गुण हारे में कोई गुण नाही। खुद कहते हैं हमारे में गुण नहीं हैं। अब तुम बच्चों को फिर 100 प्रतिशत सर्वगुण सम्पन्न बनना है। कहते हैं अपने दिल दर्पण में देखो। जब सर्वगुण सम्पन्न बनेंगे तब ही तुम श्री लक्ष्मी वा श्री नारायण को वर सकेंगे। पहले-पहले तो बाप का परिचय देना चाहिए। ऐसा जो बेहद का बाप है जिसके लिए गाते हैं तुम मात-पिता…… उस परमपिता की बड़ी महिमा है। कहते हैं शिवाए नम:, अब वह तो स्वर्ग का रचयिता है। जरूर हमको बाप से स्वर्ग का वर्सा लेने का हक है। बेहद के बाप का वर्सा स्वर्ग की बादशाही है जो हमको देते हैं। भारत को स्वर्ग की बादशाही थी, अभी नहीं है। जरूर बाप से ही मिली थी। भारत ही सचखण्ड बनता है। सच शिवबाबा का यह जन्म स्थान है – यह कोई नहीं जानते। शिव रात्रि गाई जाती है वह कौनसी? कृष्ण की भी रात्रि, शिव की भी रात्रि दिखाते हैं। कृष्ण का तो माँ के गर्भ से जन्म हुआ है। शिवबाबा के लिए जन्माष्टमी तो वास्तव में नहीं कहेंगे। शिवबाबा आते ही तब हैं जब ब्रह्मा की रात होती है। रात के बाद दिन अर्थात् कलियुग का अन्त और सतयुग की आदि होती है। इसको कहा जाता है घोर अन्धियारी रात। यह बेहद की बात हो गई। हद की रात तो होती ही है परन्तु कलियुग अन्त को घोर अन्धियारा कहा जाता है। ज्ञान अंजन सतगुरू दिया……। सतगुरू ज्ञान सूर्य बाप को कहा जाता है। पहले-पहले तो बाप और वर्से का परिचय देना है। समझो कोई बादशाह को बच्चा नहीं है, किसी गरीब के बच्चे को गोद में लेता है तो बच्चा दिल में जानता है ना कि मैं गरीब था, अब मैं बादशाह का बच्चा हूँ। तुम भी जानते हो हम रावण का बनने से बहुत गरीब, कंगाल बन गये थे। अभी हम बेहद के बाप के बने हैं। उनसे हमें स्वर्ग का वर्सा मिलता है। यह अच्छी तरह परिचय देना है और फिर लिखाकर लेना है हमको बेहद बाप से बेहद का वर्सा मिलता है। यह ज्ञान और कोई दे नहीं सकता। सन्यासी तो घरबार छोड़ जाते हैं। वह फिर माँ, बाप, चाचा, मामा आदि कहलाने से निकल गये, ख़लास। यहाँ तो गृहस्थ धर्म की बात है। वह गृहस्थ धर्म का त्याग करते हैं।

तुम बच्चों को बाप समझाते हैं – तुम सो देवी-देवता गृहस्थ धर्म में थे, सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी थे और तुम स्वर्ग के मालिक भी थे। फिर पूज्य से तुम पुजारी बन अपनी पूजा भी करते हो। जब तुम पूज्य सो देवी-देवता हो तो तुमको वहाँ पूजा करने की दरकार नहीं है। वैसे ही भारत देवी-देवताओं का पूज्य कुल था। अभी पूज्य से पुजारी बने हो। फिर तुम बच्चों को पुजारी से पूज्य देवी-देवता बनना है इसलिए ही गाया जाता है आपेही पूज्य, आपेही पुजारी। बाप पूज्य और पुजारी नहीं बनते। बाप तो सदा पूज्य है ही। भक्ति मार्ग में ब्राह्मण लोग मन्दिर में शिवलिंग रखते हैं फिर बाप की बैठ पूजा करते हैं। हम उनके बच्चे हैं। हे परमपिता परमात्मा, ऐसे कहेंगे ना। वह तो है निराकार, आत्मा भी है निराकार। शिव के पास जाते हैं तो कहते हैं परमपिता परमात्मा निराकार शिव। यह आत्मा ने कहा इन आरगन्स द्वारा। अभी तुम बच्चे यह भी जान गये हो कि जो अच्छे कर्तव्य करके जाते हैं तो उन्हों की महिमा की जाती है। अभी तुम मात-पिता उस निराकार को ही कहते हो। तुम्हारे सहज राजयोग और ज्ञान की शिक्षा से हम सुख घनेरे पायेंगे। उसके लिए तुम पुरुषार्थ कर रहे हो। कितनी सहज बात है। तुम प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे बी.के. प्रैक्टिकल में हो, सम्मुख बैठे हो। शिवबाबा और ब्रह्मा बाबा दोनों के सम्मुख हो। शिवबाबा को अपना शरीर तो है नहीं। तुम जानते हो शिवबाबा इनके मुख द्वारा राजयोग सिखला रहे हैं। कृष्ण तो छोटा बच्चा है, वह कैसे कहेगा कि देह सहित देह के सभी सम्बन्धों को भूलो, अपने को आत्मा समझो। यह कृष्ण तो कह न सके। यह तो बाप ही कह सकते हैं। तो यह बड़ी भूल हुई है ना। लक्ष्मी-नारायण से लेकर यथा राजा-रानी तथा प्रजा उन सबको तो सुख मिला हुआ था। वही सब 84 जन्म ले तमोप्रधान बने हैं। मूल लक्ष्मी-नारायण हुए ना। यथा राजा रानी तथा प्रजा। अभी फिर तुम आकर शूद्र से ब्राह्मण बने हो। यह तुम्हारा लीप जन्म है। लीप कहा जाता है धर्माऊ को। तुम जानते हो हमारा यह ईश्वरीय जन्म है।

दिन-प्रतिदिन बाबा नई-नई प्वाइन्ट्स समझाते रहते हैं। जहाँ तक जीना है अन्त तक तुमको पढ़ना है। प्वाइंट्स निकलती रहेंगी, एड होती जायेंगी। ज्ञान यज्ञ भी अन्त तक चलना है। रूद्र यज्ञ रचते हैं, मिट्टी के सालिग्राम बनाकर उनकी बैठ पूजा करते हैं। आत्मा की पूजा होती है। तुम जीव आत्माओं ने ही भारत को सिरताज बनाया है, तो आत्माओं की पूजा करते हैं। परमपिता परमात्मा बाप के साथ तुम भी सर्विस कर रहे हो तो शिवलिंग के साथ सालिग्राम भी बनाते हैं। तो मुख्य पहले-पहले बाप का परिचय देना है। शिवबाबा ने जन्म लिया परन्तु माता के गर्भ से थोड़ेही जन्म लेते हैं। वह है ही निराकार।

जैसे कोई शरीर छोड़ देता है फिर उनकी आत्मा को बुलाते हैं – श्राध खाने के लिए। तो आत्मा को खिलाते हैं ना। आत्मा ही स्वाद लेती है। कडुवा, मीठा, दु:ख-सुख यह आत्मा को भासता है। आत्मा में ही संस्कार हैं। आत्मा को सुख वा दु:ख तब भासता है जबकि शरीर है। बाबा ने समझाया है सज़ा कैसे मिलती है। सूक्ष्म शरीर भी नहीं, स्थूल शरीर धारण कराए सजा देते हैं। गर्भजेल में सज़ा खाते हैं। त्राहि-त्राहि करते हैं। बस, मुझे बाहर निकालो। गर्भ महल का भी मिसाल दिया हुआ है। बाहर निकलने नहीं चाहते थे। यह दृष्टान्त है। सतयुग में गर्भ भी महल बन जाता है। वहाँ कोई पाप होता नहीं।

अभी तुम जानते हो पतित कैसे हुए हैं। नाम ही है अजामिल जैसे पतित। बहुत पाप करते हैं। पावन माना निर्विकारी। मूल बात ही विकार की है इसलिए पावन बनने के लिए सन्यासी घरबार छोड़ देते हैं तो उनको महात्मा कहते हैं। मनुष्य सब पतित हैं इसलिए गाते रहते हैं पतित-पावन सीताराम, रघुपति राघव राजा राम…… अब राजा राम तो शिवबाबा को नहीं कहेंगे। राम परमपिता परमात्मा को कहा जाता है। राजा राम नहीं। मैं तो राजा-महाराजा बनता नहीं हूँ। श्री लक्ष्मी महारानी, नारायण महाराजा तुम बनते हो, हम नहीं। मैं तो निराकार पुनर्जन्म रहित हूँ। शरीरधारी जो हैं वह सब पुनर्जन्म लेते रहते हैं। बाप कहते हैं मैं हूँ निराकार। मुझे भी प्रकृति का आधार लेना पड़ता है। मैं गर्भ में प्रवेश नहीं करता हूँ, मैं इनमें प्रवेश करता हूँ। यह अपने जन्मों को नहीं जानते हैं।

बाप बैठ समझाते हैं तुम सो देवी-देवता थे, फिर शूद्र बने, अभी तुम सो ब्राह्मण बने हो। मैं तुमको समझाता हूँ। तुम अपने जन्मों को नहीं जानते। जो ब्राह्मण बनेंगे वही आकर समझेंगे। बाप कहते हैं इस प्रकार तुमने 84 जन्म पूरे किये हैं। कहा जाता है 21 पीढ़ी का वर्सा। बेहद का बाप, बेहद सुख का वर्सा देंगे ना। लौकिक बाप से तो अल्पकाल का सुख मिलता है। अमरलोक में आदि-मध्य-अन्त सुख है। यहाँ आदि-मध्य-अन्त दु:ख है। तुम पार्वतियों को अमरनाथ शिवबाबा अमरकथा सुनाते हैं। सत्य नारायण की कथा भी वह सुनाते हैं। ज्ञान का तीसरा नेत्र देने की कथा है। भारतवासी सदा सुखी थे, बहुत पवित्र थे। पवित्रता, हेल्थ, वेल्थ थी। कभी कोई बीमार नहीं पड़ते थे। नाम ही है स्वर्ग। भारत प्राचीन स्वर्ग था और कोई धर्म खण्ड आदि वहाँ नहीं थे। झाड़ का थुर तो होगा ना। थुर में कौन रहते थे? बरोबर देवी-देवताओं के चित्र हैं। वह था फाउन्डेशन। परन्तु अपने को देवी-देवता धर्म वाले कहलाते नहीं। अभी उन्हों की राजधानी स्थापन हो रही है। तुम सतयुग का, राधे कृष्ण का जोड़ा बन सकते हो। आओ तो हम आपको समझायें – तुम सच-सच स्वर्ग का प्रिन्स कैसे बन सकते हो! इस समय तो सब पतित हैं, कोई भी युक्ति से लिख सकते हो। कहते हैं सब धर्म मिलकर एक हो जाएं परन्तु यह कैसे हो सकता? एक धर्म तो सतयुग में ही था, एक मत एक भाषा थी। ताली नहीं बजती थी। विश्व के मालिक थे, और कोई धर्म नहीं था। वह कैसे बने, फिर और धर्म कैसे आये – यह कोई भी बुद्धि नहीं चलाते हैं। जब बिल्कुल ही पतित बन जाते हैं तब ही पतित-पावन बाप आते हैं और धर्मों की पावन आत्मायें ऊपर से आती है। पहले धर्म स्थापक खुद आते हैं फिर अपने पिछाड़ी औरों को बुलाते हैं, आओ। उनको तो सतो, रजो, तमो में आना है। जो भी आते हैं सबको सतो, रजो से फिर तमो बनना ही है। परन्तु अभी तुम पतित से पावन बनते हो। सब बुलाते हैं – गॉड फादर आओ, आकरके हमको हेविन में ले जाओ। वह हेविन कोई मुक्ति को, कोई जीवनमुक्ति को समझते हैं। तुम समझते हो हेविन जीवनमुक्ति को कहा जाता है। तुम्हारा सैपलिंग लग रहा है। वह फिर जंगल के कांटों का सैपलिंग लगा रहे हैं। रात-दिन का फ़र्क है। उनका भी उत्सव मनाते हैं। वनोत्सव, झाड़ उगाने के लिए उत्सव मनाते हैं। तुम दैवी धर्म स्थापना का अर्थात् भारत को स्वर्ग बनाने का रोज़ उत्सव मनाते हो। रोज़ मनुष्य से देवता बनाने का पुरुषार्थ करते हो। कांटों से फूल बनाना – यह तुम्हारा रोज़ का उत्सव होता है। बागवान फिर जरूर इतना इनाम भी देंगे।

बच्चों ने गीत सुना – हे प्राणी अपने दिल दर्पण में देखो – तुम स्वर्ग के देवी-देवता बनने अथवा लक्ष्मी को वरने लायक बने हो? कोई अवगुण तो नहीं है? भल त़ूफान तो खूब आयेंगे। माया छोड़ती कोई को नहीं है। बड़े-बड़े दीपकों को भी बुझा देती है। उल्टे-सुल्टे संकल्प तो खूब वार करेंगे। मजबूत रहना है। इसमें मुरझाने की बात नहीं है। बाप से योग तोड़ नहीं देना है। सबका खिवैया वह बाप है। विषय वैतरणी की बड़ी खाड़ी है। उसे तुम योगबल से पार करते हो। विषय सागर से पार होकर तुम क्षीरसागर में चले जायेंगे। विष्णु का राज्य क्षीरसागर में है अर्थात् घी की नदी बहती है। यहाँ तो घासलेट की, रक्त की नदियां बहती हैं।

तुम बच्चे जानते हो शिवबाबा की श्रीमत से हम शिवालय में जा रहे हैं, जहाँ हम सदैव सुखी रहेंगे। तुम सदा सुखी थे, माया ने दु:खी बनाया है। गृहस्थ व्यवहार को अधर्मी बना दिया है। वहाँ है गृहस्थ व्यवहार धर्मी। अभी तुमको बाप श्रेष्ठाचारी दैवी गृहस्थ धर्म वाला बना रहे हैं। पहले-पहले मुख्य है बाप का परिचय। तुम बाप का बनने से स्वर्ग का मालिक बन सकते हो। यह तो दु:खधाम है। तुम स्वर्ग में जाते हो वाया मुक्तिधाम इसलिए शिवपुरी, विष्णुपुरी को याद करो। याद करते-करते अन्त मती सो गति हो जायेगी। यह याद रखो – हमारे 84 जन्म पूरे हुए। फिर हम कल आकर राज्य करेंगे, दिल दर्पण में अपनी शक्ल देखते रहो, कोई अवगुण तो हमारे में नहीं है? अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) योगबल से विषय वैतरणी की बड़ी खाड़ी को पार करना है। उल्टे संकल्पों में मुरझाना नहीं है। मजबूत रहना है।

2) पूज्यनीय बनने के लिए बाप के साथ भारत को सिरताज बनाने की सेवा करनी है।

वरदान:- सम्पर्क में आने वाली आत्माओं को सदा सुख की अनुभूति कराने वाले मास्टर सुखदाता भव
आप सुखदाता के बच्चे मास्टर सुखदाता हो इसलिए सुख का खाता जमा करते रहो। सिर्फ यह चेक नहीं करो कि आज सारे दिन में किसी को दु:ख तो नहीं दिया? लेकिन चेक करो कि सुख कितनों को दिया? जो भी सम्पर्क में आये आप मास्टर सुखदाता द्वारा हर कदम में सुख की अनुभूति करे, इसको कहा जाता है दिव्यता वा अलौकिकता। हर समय स्मृति रहे कि इस एक जन्म में 21 जन्मों का खाता जमा करना है।
स्लोगन:- एक बाप को अपना संसार बना लो तो अविनाशी प्राप्तियाँ होती रहेंगी।

BRAHMA KUMARIS MURLI 29 SEPTEMBER 2017 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 29 September 2017

September 2017 Bk Murli :- Click Here
To Read Murli 28 September 2017 :- Click Here
BK murli today ~ 29/09/2017 (Hindi) Brahma Kumaris प्रातः मुरली
29/09/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – जब तक जीना है तब तक पढ़ना है, सीखना है, तुम्हारी पढ़ाई है ही पावन दुनिया के लिए, पावन बनने के लिए”
प्रश्नः- बाप किस गुण में बच्चों को आप समान बनाने की शिक्षा देते हैं?
उत्तर:- बाबा कहते बच्चे जैसे मैं निरहंकारी हूँ, ऐसे तुम बच्चे भी मेरे समान निरहंकारी बनो। बाप ही तुम्हें पावन बनने की शिक्षा देते हैं। पावन बनने से ही बाप समान बनेंगे।
प्रश्नः- जब बुद्धि अच्छी बनती है तो कौन से राज़ बुद्धि में स्वत: बैठ जाते हैं?
उत्तर:- मैं आत्मा क्या हूँ, मेरा बाप परमात्मा क्या है, उनका क्या पार्ट है। आत्मा में कैसे अनादि पार्ट भरा हुआ है जो बजाती ही रहती है। यह सब बातें अच्छी बुद्धि वाले ही समझ सकते हैं।
गीत:- धीरज धर मनुआ…

ओम् शान्ति। बेहद का माँ-बाप मिला तो धीरज मिला। किसको? आत्माओं को वा जीव आत्मा बच्चों को? आत्मा एक छोटी सी बिन्दी है। दुनिया में एक भी मनुष्य नहीं जिसकी बुद्धि में हो कि आत्मा एक बिन्दी मिसल स्टार है। तुम जानते हो कि हमारी इतनी छोटी सी आत्मा में 84 जन्मों का, 5 हजार वर्ष का पार्ट है। दूसरी आत्माओं में तो इतना पार्ट भरा हुआ नहीं है। मनुष्यों की बुद्धि कितनी कमजोर हो गई है जो समझती नहीं है। परमात्मा के लिए तो नहीं कहेंगे कि वह 84 जन्म वा 84 लाख जन्म लेते हैं। नहीं। तुम बच्चे जानते हो इतनी छोटी सी आत्मा में 84 जन्मों का अविनाशी पार्ट नूँधा हुआ है। उसको कुदरत कहेंगे ना। कितनी छोटी सी बिन्दी आत्मा है, जिसमें सब जन्मों का अविनाशी पार्ट नूँधा हुआ है, वह कभी मिटता नहीं है, मिटने वाला भी नहीं है। कितना भारी वन्डर है। तुम्हारे में भी कोई हैं जो इन बातों को जानते हैं – फिर भूल जाते हैं। यह धारण करना है औरों को समझाने के लिए। बाप परमपिता परमात्मा को करनकरावनहार कहा जाता है, वह भी करते हैं सिखलाने के लिए। उनको निराकार – निरहंकारी कहा जाता है। उनका अर्थ भी कोई समझ न सके। यह गुण बच्चों को ही सिखलाते हैं। बच्चों को भी ऐसा निरहंकारी बनना है। ज्ञान सागर है तो ज्ञान भी सुनाना पड़े ना। पतित-पावन है तो जरूर आकर पतितों को ही शिक्षा देंगे, पावन बनने की। जैसे सन्यासी शिक्षा देते हैं सन्यास करवाने लिए। यह भी 5 विकारों का सन्यास करना है। पतित-पावन ही आकर शिक्षा देंगे। नहीं तो हम पावन कैसे बने। गाया भी जाता है – जब तक जीना है तब तक सीखना है, पढ़ना है। स्कूलों में तो ऐसे नहीं कहा जाता है। उसमें तो इस ही जन्म में पढ़ाई की प्रालब्ध भोगनी है। यहाँ तो कहा जाता है जब तक जीना है तब तक पढ़ना है। अन्त तक कर्मातीत अवस्था को पाना है। आत्मा को योग से ही पवित्र बनाना है। जितना योग में रहेंगे तो तुम्हारी आत्मा गोल्डन एज में जायेगी फिर आइरन एज में न आत्मा को, न शरीर को रहना है। हम पढ़ते ही हैं पावन दुनिया में आने के लिए। यह ऐसी गुह्य बातें हैं जो कोई कब समझा न सकें। और तो मनुष्य क्या-क्या करते रहते हैं। साइंस घमण्डी कैसी-कैसी चीजें बनाते हैं। स्टॉर, मून पर भी जाने का पुरूषार्थ करते हैं। तुम समझते हो इनसे कोई जीवनमुक्ति नहीं मिलती है। करके अल्पकाल क्षण भंगुर सुख मिलता है। एरोप्लेन से सुख भी मिलता है तो दु:ख भी मिलता है। कल एक्सीडेंट हो जाए तो दु:ख होगा। स्टीम्बर डूब जाता है, ट्रेन का एक्सीडेंट हो जाता है। बैठे-बैठे भी मनुष्य हार्टफेल हो जाते हैं। सुखधाम तो है ही अलग। वहाँ सदैव सुख ही सुख है। इस दुनिया में जो भी सुख है वह है ही अल्पकाल काग विष्टा के समान।

तुम बच्चों को अभी बहुत अच्छी बुद्धि मिली है। मैं आत्मा क्या हूँ, मेरा बाप परमात्मा क्या है। उनका पार्ट क्या है, हमारा क्या पार्ट है – सारा बुद्धि में राज़ है। तुम बच्चों में भी सबके 84 जन्म नहीं कहेंगे। सब थोड़ेही सतयुग में इकट्ठे हो जाते हैं इसलिए सबके पूरे 84 जन्म नहीं कहेंगे। चन्द्रवंशी में भी पिछाड़ी तक आते रहते हैं। वृद्धि होती जायेगी। जन्म थोड़े होते जायेंगे। यह विस्तार की बातें हैं। बुढ़ियों को पहले अल्फ बे पक्का कराना है। अल्फ माना बाबा, बे माना बादशाही। यह तो बिल्कुल राइट बात है ना। स्वर्ग की बादशाही थी, भारत सारे विश्व का मालिक था, और कोई का राज्य नहीं था। जो रूद्र की माला बनती है वही फिर विष्णु की माला बन जाती है। यह ज्ञान तुम बच्चों को मिला है। आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है, उनका रूप क्या है, क्या साइज है – यह सब बातें अभी तुम्हारी ही बुद्धि में हैं। कितनी छोटी सी आत्मा है, परमात्मा को भी भक्तिमार्ग में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। द्वापर से कलियुग अन्त तक अथवा संगम के अन्त तक कहेंगे, उनका पार्ट चलता है। यह सब तुम जानते हो। तुम कहेंगे यह सब कल्प पहले भी हुआ था। आज से 5 हजार वर्ष पहले भी हुआ था। एक अखबार में रोज़ डालते हैं – 100 वर्ष पहले क्या हुआ, 100 वर्ष की बात तो सहज है। अखबारों से झट निकाल बतायेंगे। वह है टाइम्स आफ इन्डिया अखबार। तुम्हारी अखबार है टाइम्स आफ वर्ल्ड। यह अक्षर बड़ा अच्छा है। रोज़ लिख सकते हो। आज से 5 हजार वर्ष पहले क्या हुआ था। 5 हजार वर्ष पहले जो हुआ था वही अब हुआ। ऐसे-ऐसे लिखने से मनुष्यों को ड्रामा का पता तो पड़ जाये। मैगजीन में भी लिख सकते हैं। तुम बच्चों की बुद्धि में तो सारा राज़ है। आत्मा और परमात्मा का ज्ञान तो कोई भी मनुष्य में नहीं है। तो वह मनुष्य क्या काम का। तुम जानते हो मनुष्य ही 84 जन्म लेते हैं। पहले-पहले ब्राह्मण वर्ण फिर देवता…. वर्णों में आते हैं। वर्ण तो यहाँ ही हैं। सूक्ष्मवतन में तो वर्णों की बात ही नहीं है। ब्रह्मा को प्रजापिता कहते हैं। विष्णु को प्रजापिता नहीं कहेंगे। ब्रह्मा द्वारा तो एडाप्ट किया जाता है। विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण के तो बच्चे पैदा होते हैं, जो तख्त पर बैठते हैं। शंकर को भी प्रजापिता नहीं कहेंगे। यह भी जानते हो जैसी-जैसी भावना है वैसे-वैसे साक्षात्कार हो जाता है। बाकी वहाँ कोई सर्प आदि की बात नहीं है। बैल भी वहाँ हो न सके। सूक्ष्मवतन में तो है ही देवता। सूक्ष्मवतन में जाते हो – बगीचा, फल आदि देखते हो। क्या वहाँ बगीचा है? बाबा साक्षात्कार कराते हैं। बाकी है नहीं। बुद्धि कहती है वहाँ सूक्ष्मवतन में झाड़ आदि हो न सके। यह जरूर साक्षात्कार होता है। साक्षात्कार भी यहाँ का करायेंगे। यह सब हैं साक्षात्कार इसको जादूगरी का खेल कहते हैं। यह कोई ज्ञान नहीं है। मनुष्य-मनुष्य को बैरिस्टर बनाते हैं, वह कोई जादू नहीं कहेंगे। वह विद्या देते हैं। यह तुम्हारे को मनुष्य से देवता बनाते हैं नई दुनिया के लिए, इसलिए जादूगरी कहा जाता है। दिव्य दृष्टि की चाबी बाबा के पास होने कारण उनको जादूगर भी कहा जाता है। वह कहते हैं गुरू की कृपा है, मूर्ति से साक्षात्कार हुआ। उससे तो फायदा कुछ भी नहीं। यहाँ तो मेहनत कर स्वयं वह लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम बन रहे हो। यहाँ तुम आये हो सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी डिनायस्टी के रजवाड़े बनने।

पहली मुख्य बात है कोई नया आता है उसको बाप का परिचय दो। ब्रह्म तत्व, महतत्व है। शिवबाबा निराकार को कोई ब्रह्म तत्व नहीं कहेंगे। एक-एक अक्षर का अर्थ है। तुम ईश्वरीय बच्चे हो। ऐसे नहीं कि सब ईश्वर के रूप हैं। यह बाप बैठ समझाते हैं। बाकी साक्षात्कार आदि की तो चिटचैट है, इनकी आश नहीं रहनी चाहिए। समझते हैं अब खुद बाबा आया है, तो साक्षात्कार करा देवे, परन्तु यह सब है फालतू। फिर साक्षात्कार न होने से नाउम्मीद हो पढ़ाई छोड़ देते हैं। साक्षात्कार में प्रिन्स को देखते हैं तो समझते हैं हमको यह बनना है। खुशी हो जाती है। बहुत करके प्रिन्स का ही साक्षात्कार होता है। अगर विचार किया जाए तो मुकुटधारी तो सब बनते हैं। मेल-फीमेल में फर्क नहीं रहता है। सिर्फ फीमेल को लम्बे बाल हैं, थोड़ा शक्ल में फर्क है। आत्मायें कितनी हैं, एक का नाम रूप न मिले दूसरे से। आत्मा में अविनाशी पार्ट है जो कभी बदल नहीं सकता। कैसे वन्डरफुल खेल बना हुआ है। आत्मा को अनादि पार्ट मिला हुआ है। बाबा कितना सहज कर समझाते हैं। सिर्फ त्रिमूर्ति चित्र के सामने जाकर बैठो तो बुद्धि में सारा चक्र आ जायेगा। यह शिवबाबा है, यह ब्रह्मा है, जिससे ब्राह्मण रचते हैं। अभी कलियुग है फिर सतयुग आना है। चित्र सामने खड़ा होने से जैसे कि सारे विश्व का खेल बुद्धि में आ जाता है। कैसे चक्र फिरता है, खेल में कौन-कौन हैं, सब मालूम पड़ जाता है। रोज़ चित्रों को देखते रहो। विचार सागर मंथन करते रहो। यह नर्क है, यह स्वर्ग है, यह संगम है। कितना सहज है। रोज़ प्रैक्टिस करने से बुद्धि में रोशनी आ जायेगी। लक्ष्मी-नारायण, राधे-कृष्ण के लिए भी लिखो। ब्रह्मा द्वारा सतयुग का वर्सा मिलता है। लक्ष्मी-नारायण को यह प्रालब्ध कैसे मिली? जरूर संगमयुग ही होगा, जब ऐसे कर्म किये हैं। अन्तिम जन्म में पुरूषार्थ से उन्होंने यह प्रालब्ध पाई है। ऐसे-ऐसे ख्याल बुद्धि में आना चाहिए। फिर चित्रों की भी दरकार नहीं रहेगी। बुद्धि में सारा राज़ आ जायेगा। इन चित्रों से फिर दिल रूपी कागज पर उतारना है। बाबा सेन्टर्स के बच्चों का मुख खोलने की युक्ति बता रहे हैं। चित्रों को देखते रहो। अन्दर में बोलते रहो। रचना के आदि-मध्य-अन्त का राज़ जानना है। झाड़ में क्लीयर है। तपस्या यहाँ कर रहे हैं राजयोग की। यह मनुष्य से देवता बनते हैं। फिर भक्ति मार्ग कैसे शुरू होता है। जो-जो, जिस-जिस धर्म के हैं, उसमें ही फिर आयेंगे। कितना सहज है। उन पर ही समझाना है। आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है, उनमें अनादि पार्ट नूँधा हुआ है। सतयुग में हम सुख का पार्ट बजायेंगे, इतने जन्म लेंगे। शमशान में भी जाकर किसको समझा सकते हो। जब तक मुर्दा जल जाये तब तक बैठ सतसंग करते हैं। तुमको कोई रोकेगा नहीं। बोलो आओ तुमको हम समझाये। सुनकर बहुत खुश होंगे। बात करने वाले बहुत समझदार, सयाने चाहिए कहाँ भी जाकर तुम समझा सकते हो। समझाते तो बाबा बहुत अच्छी तरह हैं। तुम्हारे कच्छ (बगल) में सच है। मनुष्यों के कच्छ में झूठी गीता है। तुम्हारे बगल में सारे विश्व की हिस्ट्री-जॉग्राफी है। श्रीकृष्ण के चित्र पर भी तुम अच्छी तरह समझा सकते हो। इनको श्याम-सुन्दर क्यों कहते हैं, आओ तो हम आपको कहानी सुनायें। सुनकर बड़े खुश हो जायेंगे। भारत गोल्डन एज था। अब पत्थर एज है। सांवरा हो गया है। काम चिता पर बैठने से काला मुँह हो जाता है। तो ऐसे-ऐसे समझाने से तुम बहुत कमाल कर दिखा सकते हो। तीनों चित्र भल साथ में हो। एक चित्र पर समझाकर फिर दूसरे चित्र पर समझाना चाहिए। बहुत सहज है। सिर्फ पुरूषार्थ की बात है। टाइम तो बहुत है। सवेरे मन्दिरों में चले जाओ। आओ तो हम तुमको लक्ष्मी-नारायण की जीवन कहानी सुनायें। भक्ति मार्ग में यज्ञ, तप, तीर्थ आदि करते-करते तुम एकदम कौड़ी मिसल बन पड़े हो, फिर शास्त्रों ने क्या सहायता की? हम आपको सच बतलाते हैं, सच ही सहायता करते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) पढ़ाई पर पूरा-पूरा ध्यान देना है। बाकी साक्षात्कार आदि की आश नहीं रखनी है। नाउम्मीद बन पढ़ाई नहीं छोड़नी है।

2) चित्रों को देखते विचार सागर मंथन कर हर बात को दिल में उतारना है। राजयोग की तपस्या करनी है।

वरदान:- संगठन में न्यारे और प्यारे बनने के बैलेन्स द्वारा अचल रहने वाले निर्विघ्न भव 
जैसे बाप बड़े से बड़े परिवार वाला है लेकिन जितना बड़ा परिवार है, उतना ही न्यारा और सर्व का प्यारा है, ऐसे फालो फादर करो। संगठन में रहते सदा निर्विघ्न और सन्तुष्ट रहने के लिए जितनी सेवा उतना ही न्यारा पन हो। कितना भी कोई हिलावे, एक तरफ एक डिस्टर्ब करे, दूसरे तरफ दूसरा। कोई सैलवेशन नहीं मिले, कोई इनसल्ट कर दे, लेकिन संकल्प में भी अचल रहें तब कहेंगे निर्विघ्न आत्मा।
स्लोगन:- देही-अभिमानी स्थिति द्वारा तन-मन की हलचल को समाप्त करने वाले ही अचल अडोल रहते हैं।

[wp_ad_camp_5]

 

To Read Murli 27 September 2017 :- Click Here

TODAY MURLI 29 SEPTEMBER 2017 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 29 SEPTEMBER 2017

Read Murli in Hindi :- Click Here

Read Bk Murli 28 September 2017 :- Click Here

29/09/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, continue to study and learn for as long as you live. You study in order to become pure for the pure world.
Question: The Father gives you teachings in order to make you equal to Him in which virtue?
Answer: Baba says: Children, just as I am egoless, so you children must become just as egoless as I am. Only the Father gives you teachings to become pure. Only by becoming pure will you become equal to the Father.
Question: When your intellect becomes good, what secrets will automatically sit within it?
Answer: Who I, the soul, am. Who the Supreme Father, the Supreme Soul is. What His part is. What the eternal part recorded in the soul is and which continues to be played. All of these things can only be understood by those who have good intellects.
Song: Have patience O mind! Your days of happiness are about to come.

Om shanti. You have found the unlimited Mother and Father and have thereby received patience. Who? Souls, that is, living souls, His children. A soul is a tiny point. The intellect of not a single person in the world is aware that a soul is a tiny point, like a star. You know that you are tiny souls and have part s of 84 births, of 5000 years, within you. Such big part s are not recorded in other souls. The intellects of people have become so weak that they don’t understand anything. You wouldn’t say of God that He takes 84 births or 8.4 million births; no. You children know that such a tiny soul has an imperishable part of 84 births recorded in him. This is called nature. A soul is such a tiny point and an imperishable part of all his births is recorded within him. It is never erased and never will be erased. It is such a great wonder!Among you, too, there are some who know these things, but who then forget. These things have to be imbibed in order for you to explain to others. The Father, the Supreme Father, the Supreme Soul, is called Karankaravanhar. He does everything to teach you. He is called the incorporeal and egoless One. No one can understand the meaning of this. Only you children are taught these virtues. You children too have to become as egoless. He is the Ocean of Knowledge and so He has to speak knowledge. He is the Purifier and so He would definitely come and give teachings to impure ones to become pure. Just as sannyasis give teachings to inspire renunciation, so here, too, you have to renounce the five vices. Only the Purifier comes and gives you these teachings. How else would we become pure? It is remembered that you have to study, to learn, for as long as you live. This is not said in schools. There, you have to experience the reward of your study in just this birth. Here, you are told: You have to study for as long as you live. You have to reach your karmateet stage by the end. Souls have to be made pure with yoga. To the extent that you stay in yoga, accordingly you souls will go to the golden age and then neither souls nor bodies will remain in the iron age. We are studying to go to the pure world. These are such deep matters that no one else can ever explain them to you. Look at what other people continue to do! Those with the arrogance of science continue to invent so many things. They even make effort to go to the stars and the moon. You understand that liberation-in-life cannot be received through that. Perhaps they receive temporary or momentary happiness. As well as giving happiness, aeroplanes also cause sorrow. If an accident takes place tomorrow, there would be sorrow. Steamers sink and trains have accidents. People have heart failure even while just sitting doing nothing. The land of happiness is separate. There, there is constant happiness. All the happiness in this world is temporary, like the droppings of a crow. You children have now received very good intellects. What am I, the soul and what is my Father, the Supreme Soul? What is His part and what is my part ? You have all of these secrets in your intellects. Among you children too, not everyone is said to take 84 births. Not everyone will collect together in the golden age. This is why you cannot say that everyone takes the full 84 births. They continue to come into the moon dynasty till the end. Expansion continues to take place and there continues to be fewer births. These are matters of detail. First have the old mothers make Alpha and beta firm. Alpha means Baba and beta means the sovereignty. This is something absolutely right. There was the sovereignty of heaven. Bharat was the master of the whole world; there were no other kingdoms. The rosary of Rudra then becomes the rosary of Vishnu. You children have received this knowledge; what a soul is; what the Supreme Soul is, what His form is, what His size is. You have all of these things in your intellects at this time. A soul is so tiny. Even God has to make so much effort on the path of devotion. You would say that His part continues from the copper age till the end of the iron age, or even till the end of the confluence age. You know all of these things. You say that all of this happened in the previous cycle. It also happened 5000 years ago. In a newspaper, they print everything that happened 100 years ago. It is easy to write about 100 years. They would quickly find these things in the newspapers and show you. That is the newspaper “Times of India“. Your newspaper is the “Times of the World“. These words are very good. You can write in this every day what happened 5000 years ago. Whatever happened 5000 years ago is what is happening now. When you write in this way, people will come to know the drama. You can also write in magazines. You children have all the secrets in your intellects. No human being has the knowledge of souls or the Supreme Soul. So, of what use are those human beings? You know that only human beings take 84 births. First of all, there is the Brahmin clan and then the deity clan; you go through the clans. The clans exist here. There is no question of clans in the subtle region. Brahma is called Prajapita (Father of Humanity). Vishnu cannot be called Prajapita. You are adopted through Brahma. Lakshmi and Narayan, the dual form of Vishnu, have their own children who sit on the throne. Even Shankar cannot be called the Father of Humanity. You also know that people receive visions according to their devotion. However, there is no question of a snake etc. there. There cannot be a bull there either. In the subtle region, there are only deities. When you go to the subtle region and you see a garden and flowers etc., is there really a garden there? Baba just gives you a vision, for those things don’t exist there. The intellect says that there cannot be trees etc. in the subtle region. You definitely have visions. Visions of the things here would be granted. All of those are visions and they are called games of magic. It is not knowledge. Human beings make human beings into barristers etc. That is not called magic. They simply give knowledge. Changing you from human beings into deities for the new world is called magic. Because Baba has the key to divine vision, He is called the Magician. Those people say that they had a vision of an idol due to the blessings of their guru. There is no benefit in that. Here, effort is made and you become Lakshmi and Narayan or Rama and Sita etc. You have come here to become the royal family of the sun and moon dynasties. The first and foremost thing is to give the Father’s introduction to any new person who comes. The element of brahm is the great element. Incorporeal Shiv Baba cannot be called the brahm element. Every word has a meaning. You are the children of God. It isn’t that all are a form of God. The Father sits here and explains to you. However, visions etc. are just chit-chat, so you mustn’t have any desire for them. Some think that Baba Himself has come now, and so He can grant a vision. However, all of that is useless. Then, because some don’t have visions they become disheartened and stop studying. When you see a prince in your visions, you understand that you are to become that and you become happy. Generally, many people have visions of princes. If you think about it, all would be wearing crowns. There is no difference between males and femalesFemales have longer hair and their features are slightly different. There are so many souls. No two souls have the same name or form. A soul has an imperishable part recorded within him and it can never change. This is such a wonderful play that has been created! Souls have received eternal part s. Baba explains to you so easily. Simply go and sit in front of the picture of the Trimurti and the whole cycle will enter your intellect. This is Shiv Baba and this is Brahma through whom Brahmins are created. It is now the iron age and then the golden age has to come. By having the picture in front of you, it is as though the play of the whole world enters your intellect. You know everything about how the cycle turns, who is in the play etc. Continue to look at the pictures every day. Continue to churn the ocean of knowledge. This is hell and that is heaven; this is the confluence age. It is so easy! By practisingthis every day, your intellects will become enlightened. Also write about Lakshmi and Narayan and Radhe and Krishna. You receive the inheritance of the golden age through Brahma. How did Lakshmi and Narayan receive their reward? It would definitely be at the confluence age that they performed such deeds. They received that reward of theirs by making effort in their final birth. You should have such thoughts in your intellects and there will then be no need for pictures. All the secrets will be in your intellects. These pictures have to become imprinted on the paper of your hearts. Baba shows children at the centres methods to make them open their mouths and speak knowledge. Continue to look at the pictures and speak about them in your mind. You have to know the secrets of the beginning, the middle and the end of creation. The picture of the tree is also very clear. You are doing tapasya of Raja Yoga here. You change from human beings into deities. Then, how does the path of devotion begin? Whatever religion everyone belongs to, that is the religion they will enter. It is so easy! It also has to be explained what a soul is and what the Supreme Soul is. An eternal part is recorded in them. In the golden age, we will play our part s of happiness and take this many births. You can even go to the cremation grounds and explain to people there. They continue to have a satsang (spiritual gathering) until the corpse is completely burnt. No one will stop you. Tell them: Come and we will explain to you. They will be very happy to hear this. The one who speaks should be very sensible and clever. Go anywhere and explain. Baba explains to you children very well. You have the truth under your arms whereas people have a false Gita under their arms. You have the history and geography of the whole world under your arms. You can explain very well using the picture of Shri Krishna: “Why is he called Shyam Sundar? Come and we will tell you the story.” They will become very happy when they hear it. Bharat was the golden age. It is now the stone age ; it has become dark. By sitting on the pyre of lust, the face becomes ugly. By explaining in this way, you can show many wonders. You can have all three pictures with you. Explain one picture and then explain a second picture. It is very easy. It is simply a matter of making effort. You have a lot of time. Go to the temples in the morning. “Come and we will tell you the life story of Lakshmi and Narayan. By having sacrificial fires, doing tapasya and going on pilgrimages on the path of devotion, you have become completely like shells. Therefore, how have the scriptures helped? We are telling you the truth. It is only the truth that helps you.” Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Pay full attention to the study. Don’t have any desires for visions etc. Never become disheartened and stop studying.
  2. While looking at the pictures, churn the ocean of knowledge and imprint everything on your heart. You have to do the tapasya of Raja Yoga.
Blessing: May you remain free from obstacles and be unshakeable with the balance of being detached and loving in a gathering.
The Father has the biggest family of all and yet, however big the family is, He is detached and also loving to all to that extent. Follow the Father in the same way. While being in a gathering, in order to remain constantly free from obstacles and content, to the extent that you serve, remain just as detached. No matter how much someone may try to shake you, or someone may disturb you from one side and another person from another side, even if you don’t receive any salvation (facilities), even if someone insults you, remain unshakeable in your thoughts, and you would then be said to be a soul who is free from obstacles.
Slogan: Only those who finish all upheaval of the body and mind with the stage of soul consciousness can remain unshakeable and immovable.

*** Om Shanti ***

[wp_ad_camp_5]

 

Read Bk Murli 27 September 2017 :- Click Here

Font Resize