daily murli 28 september

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 28 SEPTEMBER 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 28 September 2020

Murli Pdf for Print : – 

28-09-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
”मीठे बच्चे – तुम सारी दुनिया के सच्चे-सच्चे मित्र हो, तुम्हारी किसी से भी शत्रुता नहीं होनी चाहिए”
प्रश्नः- तुम रूहानी मिलेट्री हो, तुम्हें बाप का कौन-सा डायरेक्शन मिला हुआ है, जिसे अमल में लाना है?
उत्तर:- तुम्हें डायरेक्शन है कि बैज सदा लगाकर रखो। कोई भी पूछे यह क्या है? तुम कौन हो? तो बोलो, हम हैं सारी दुनिया से काम की अग्नि को बुझाने वाले फायर ब्रिगेड। इस समय सारी दुनिया में काम अग्नि लगी हुई है, हम सबको सन्देश देते हैं अब पवित्र बनो, दैवीगुण धारण करो तो बेड़ा पार हो जायेगा।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चे सहज याद में बैठे हैं। कोई-कोई को डिफीकल्ट लगता है। बहुत मूंझते हैं – हम टाइट अथवा स्ट्रिक होकर बैठें। बाप कहते हैं ऐसी कोई बात नहीं है, कैसे भी बैठो। बाप को सिर्फ याद करना है। इसमें मुश्किलात की कोई बात नहीं। वह हठयोगी ऐसे टाइट होकर बैठते हैं। टांग, टांग पर चढ़ाते हैं। यहाँ तो बाप कहते हैं आराम से बैठो। बाप को और 84 के चक्र को याद करो। यह है ही सहज याद। उठते-बैठते बुद्धि में रहे। जैसे देखो यह छोटा बच्चा बाप के बाजू में बैठा है, इनको बुद्धि में माँ-बाप ही याद होंगे। तुम भी बच्चे हो ना। बाप को याद करना तो बहुत सहज है। हम बाबा के बच्चे हैं। बाबा से ही वर्सा लेना है। शरीर निर्वाह अर्थ गृहस्थ व्यवहार में भल रहो। सिर्फ औरों की याद बुद्धि से निकाल दो। कोई हनूमान को, कोई किसको, साधू आदि को याद करते थे, वह याद छोड़ देनी है। याद तो करते हैं ना, पूजा के लिए पुजारी को मंदिर में जाना पड़ता है, इसमें कहाँ जाने की भी दरकार नहीं है। कोई भी मिले बोलो, शिवबाबा का कहना है मुझ एक बाप को याद करो। शिवबाबा तो है निराकार। जरूर वह साकार में ही आकर कहते हैं मामेकम् याद करो। मैं पतित-पावन हूँ। यह तो राइट अक्षर है ना। बाबा कहते हैं मुझे याद करो। तुम सब पतित हो। यह पतित तमोप्रधान दुनिया है ना इसलिए बाबा कहते हैं कोई भी देहधारी को याद नहीं करो। यह तो अच्छी बात है ना। कोई गुरू आदि की महिमा नहीं करते हैं। बाप सिर्फ कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे पाप कट जायेंगे। यह है योगबल अथवा योग अग्नि। बेहद का बाप तो सच कहते हैं ना – गीता का भगवान निराकार ही है। कृष्ण की बात नहीं। भगवान कहते हैं सिर्फ मुझे याद करो और कोई उपाय नहीं। पावन होकर जाने से ऊंच पद पायेंगे। नहीं तो कम पद हो जायेगा। हम तुमको बाप का सन्देश देते हैं। मैं सन्देशी हूँ। इस समझाने में कोई तकलीफ नहीं है। मातायें, अहिल्यायें, कुब्जायें भी ऊंच पद पा सकती हैं। चाहे यहाँ रहने वाले हों, चाहे घर गृहस्थ में रहने वाले हों, ऐसे नहीं कि यहाँ रहने वाले जास्ती याद कर सकते हैं। बाबा कहते हैं बाहर में रहने वाले भी बहुत याद में रह सकते हैं। बहुत सर्विस कर सकते हैं। यहाँ भी बाप से रिफ्रेश होकर फिर जाते हैं तो अन्दर में कितनी खुशी रहनी चाहिए। इस छी-छी दुनिया में तो बाकी थोड़े रोज़ हैं। फिर चलेंगे कृष्ण पुरी में। कृष्ण के मन्दिर को भी सुखधाम कहते हैं। तो बच्चों को अपार खुशी होनी चाहिए। जबकि तुम बेहद के बाप के बने हो। तुमको ही स्वर्ग का मालिक बनाया था। तुम भी कहते हो बाबा 5 हज़ार वर्ष पहले भी हम आपसे मिले थे और फिर मिलेंगे। अब बाप को याद करने से माया पर जीत पानी है। अब इस दु:खधाम में तो रहना नहीं है। तुम पढ़ते ही हो सुखधाम में जाने के लिए। सबको हिसाब किताब चुक्तु कर वापिस जाना है। मैं आया ही हूँ नई दुनिया स्थापन करने। बाकी सब आत्मायें चली जायेंगी मुक्तिधाम। बाप कहते हैं – मैं कालों का काल हूँ। सबको शरीर से छुड़ाए और आत्माओं को ले जाऊंगा। सब कहते भी हैं हम जल्दी जायें। यहाँ तो रहने का नहीं है। यह तो पुरानी दुनिया, पुराना शरीर है। अब बाप कहते हैं मैं सबको ले जाऊंगा। छोडूँगा किसको भी नहीं। तुम सबने बुलाया ही है-हे पतित-पावन आओ। भल याद करते रहते हैं परन्तु अर्थ कुछ भी नहीं समझते हैं। पतित-पावन की कितनी धुन लगाते हैं। फिर कहते हैं रघुपति राघव राजा राम। अब शिवबाबा तो राजा बनते नहीं, राजाई करते नहीं। उनको राजा राम कहना रांग हो गया। माला जब सिमरते हैं तो राम-राम कहते हैं। उसमें भगवान की याद आती है। भगवान तो है ही शिव। मनुष्यों के नाम बहुत रख दिये हैं। कृष्ण को भी श्याम सुन्दर, वैकुण्ठ नाथ, मक्खन चोर आदि-आदि बहुत नाम देते हैं। तुम अभी कृष्ण को मक्खनचोर कहेंगे? बिल्कुल नहीं। तुम अभी समझते हो भगवान तो एक निराकार है, कोई भी देहधारी को भगवान कह नहीं सकते। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को भी नहीं कह सकते तो फिर मनुष्य अपने को भगवान कैसे कह सकते। वैजयन्ती माला सिर्फ 108 की गाई जाती है। शिवबाबा ने स्वर्ग स्थापन किया, उनके यह मालिक हैं। जरूर उससे पहले उन्होंने यह पुरूषार्थ किया होगा। उसको कहा जाता है कलियुग अन्त सतयुग आदि का संगमयुग। यह है कल्प का संगमयुग। मनुष्यों ने फिर युगे-युगे कह दिया है, अवतार नाम भी भूल फिर उनको ठिक्कर-भित्तर में, कण-कण में कह दिया है। यह भी है ड्रामा। जो बात पास्ट हो जाती है उसको कहा जाता है ड्रामा। कोई से झगड़ा आदि हुआ, पास हुआ, उनका चिंतन नहीं करना है। अच्छा कोई ने कम जास्ती बोला, तुम उनको भूल जाओ। कल्प पहले भी ऐसे बोला था। याद रहने से फिर बिगड़ते रहेंगे। वह बात फिर कभी बोलो, भी नहीं। तुम बच्चों को सर्विस तो करनी है ना। सर्विस में कोई विघ्न नहीं पड़ना चाहिए। सर्विस में कमजोरी नहीं दिखानी चाहिए। शिवबाबा की सर्विस है ना। उनमें कभी ज़रा भी ना नहीं करना चाहिए। नहीं तो अपना पद भ्रष्ट कर देंगे। बाप के मददगार बने हो तो पूरी मदद देनी है। बाप की सर्विस करने में ज़रा भी धोखा नहीं देना है। पैगाम सबको पहुँचाना ही है। बाप कहते रहते हैं म्युजियम का नाम ऐसा रखो जो मनुष्य देख अन्दर घुसें और आकर समझें क्योंकि यह नई चीज़ है ना। मनुष्य नई चीज़ देख अन्दर घुसते हैं। आजकल बाहर से आते हैं, भारत का प्राचीन योग सीखने। अब प्राचीन अर्थात् पुराने ते पुराना, वह तो भगवान का ही सिखाया हुआ है, जिसको 5 हज़ार वर्ष हुए। सतयुग-त्रेता में योग होता नहीं, जिसने सिखाया वह तो चला गया फिर जब 5 हज़ार वर्ष बाद आये तब ही आकर राजयोग सिखाये। प्राचीन अर्थात् 5 हज़ार वर्ष पहले भगवान ने सिखाया था। वही भगवान फिर संगम पर ही आकर राजयोग सिखलायेंगे, जिससे पावन बन सकते हैं। इस समय तो तत्व भी तमोप्रधान हैं। पानी भी कितना नुकसान कर देता है। उपद्रव होते रहते हैं, पुरानी दुनिया में। सतयुग में उपद्रव की बात ही नहीं। वहाँ तो प्रकृति दासी बन जाती है। यहाँ प्रकृति दुश्मन बनकर दु:ख देती है। इन लक्ष्मी-नारायण के राज्य में दु:ख की बात नहीं थी। सतयुग था। अभी फिर वह स्थापन हो रहा है। बाप प्राचीन राजयोग सिखा रहे हैं। फिर 5 हज़ार वर्ष बाद सिखायेंगे, जिसका पार्ट है वही बजायेंगे। बेहद का बाप भी पार्ट बजा रहे हैं। बाप कहते हैं मैं इनमें प्रवेश कर, स्थापना कर चला जाता हूँ। हाहाकार के बाद फिर जय जयकार हो जाती है। पुरानी दुनिया खत्म हो जायेगी। इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था तो पुरानी दुनिया नहीं थी। 5 हज़ार वर्ष की बात है। लाखों वर्ष की बात हो नहीं सकती। तो बाप कहते हैं और सब बातों को छोड़ इस सर्विस में लग जाओ, अपना कल्याण करने। रूठ कर सर्विस में धोखा नहीं देना चाहिए। यह है ईश्वरीय सर्विस। माया के तूफान बहुत आयेंगे। परन्तु बाप की ईश्वरीय सर्विस में धोखा नहीं देना है। बाप सर्विस अर्थ डायरेक्शन तो देते रहते हैं। मित्र-सम्बन्धी आदि जो भी आयें, सबके सच्चे मित्र तो तुम हो। तुम ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ तो सारी दुनिया के मित्र हो क्योंकि तुम बाप के मददगार हो। मित्रों में कोई शत्रुता नहीं होनी चाहिए। कोई भी बात निकले बोलो, शिवबाबा को याद करो। बाप की श्रीमत पर लग जाना है। नहीं तो अपना नुकसान कर देंगे। ट्रेन में तुम आते हो वहाँ तो सब फ्री हैं। सर्विस का बहुत अच्छा चांस है। बैज तो बहुत अच्छी चीज़ है। हर एक को लगाकर रखना है। कोई पूछे आप कौन हो तो बोलो, हम हैं फायर ब्रिगेड, जैसे वह फायर ब्रिगेड होते हैं, आग को बुझाने के लिए। तो इस समय सारी सृष्टि में काम अग्नि में सब जले हुए हैं। अब बाप कहते हैं काम महाशत्रु पर जीत पहनो। बाप को याद करो, पवित्र बनो, दैवी गुण धारण करो तो बेड़ा पार है। यह बैज श्रीमत से ही तो बने हैं। बहुत थोड़े बच्चे हैं जो बैज पर सर्विस करते हैं। बाबा मुरलियों में कितना समझाते रहते हैं। हर एक ब्राह्मण के पास यह बैज होना चाहिए, कोई भी मिले उनको इस पर समझाना है, यह है बाबा, इनको याद करना है। हम साकार की महिमा नहीं करते। सर्व का सद्गति दाता एक ही निराकार बाप है, उनको याद करना है। याद के बल से ही तुम्हारे पाप कट जायेंगे। फिर अन्त मती सो गति हो जायेगी। दु:खधाम से छूट जायेंगे। फिर तुम विष्णुपुरी में आ जायेंगे। कितनी बड़ी खुशखबरी है। लिटरेचर भी दे सकते हो। बोलो, तुम गरीब हो तो फ्री दे सकते हैं। साहूकारों को तो पैसा देना ही चाहिए क्योंकि यह तो बहुत छपाने होते हैं। यह चीज़ ऐसी है जिससे तुम फकीर से विश्व का मालिक बन जायेंगे। समझानी तो मिलती रहती है। कोई भी धर्म वाला हो, बोलो, वास्तव में तुम आत्मा हो, अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। अब विनाश सामने खड़ा है, यह दुनिया बदलने वाली है। शिवबाबा को याद करेंगे तो विष्णुपुरी में आ जायेंगे। बोलो, यह आपको करोड़ों पदमों की चीज़ देते हैं। बाबा ने कितना समझाया है – बैज पर सर्विस करनी है परन्तु बैज लगाते नहीं। लज्जा आती है। ब्राह्मणियाँ जो पार्टी लेकर आती हैं अथवा कहाँ ऑफिस आदि में अकेली जाती हैं, तो यह बैज जरूर लगा रहना चाहिए, जिसको तुम इन पर समझायेंगे वह बहुत खुश होंगे। बोलो, हम एक बाप को ही मानते हैं, वही सबको सुख-शान्ति देने वाला है, उनको याद करो। पतित आत्मा तो जा न सके। अभी यह पुरानी दुनिया बदल रही है। ऐसे-ऐसे रास्ते में सर्विस करते आना चाहिए। तुम्हारा नाम बहुत होगा, बाबा समझते हैं शायद लज्जा आती है जो बैज पहन सर्विस नहीं करते हैं। एक तो बैज, सीढ़ी का चित्र अथवा त्रिमूर्ति, गोला और झाड़ का चित्र साथ में हो, आपस में बैठ एक-दो को समझाओ तो सब इकट्ठे हो जायेंगे। पूछेंगे यह क्या है? बोलो, शिवबाबा इनके द्वारा यह नई दुनिया स्थापन कर रहे हैं। अब बाप कहते हैं मुझे याद करो, पवित्र बनो। अपवित्र तो वापस जा नहीं सकेंगे। ऐसी मीठी-मीठी बातें सुनानी चाहिए। तो खुशी से सब सुनेंगे। परन्तु कोई की बुद्धि में बैठता नहीं है। सेन्टर पर क्लास में जाते हो तो भी बैज लगा रहे। मिलेट्री वालों को यहाँ बिल्ला (बैज) लगा रहता है। उनको कभी लज्जा आती है क्या? तुम भी रूहानी मिलेट्री हो ना। बाप डायरेक्शन देते हैं फिर अमल में क्यों नहीं लाते। बैज लगा रहे तो शिवबाबा की याद भी रहेगी-हम शिवबाबा के बच्चे हैं। दिन-प्रतिदिन सेन्टर्स भी खुलते जायेंगे। कोई न कोई निकल आयेंगे। कहेंगे फलाने शहर में आपकी ब्रान्च नहीं है। बोलो, कोई प्रबन्ध करे मकान आदि का, निमंत्रण दे तो हम आकर सर्विस कर सकते हैं। हिम्मते बच्चे मददे बाप, बाप तो बच्चों को ही कहेंगे सेन्टर खोलो, सर्विस करो। यह सब शिवबाबा की दुकान है ना। बच्चों द्वारा चला रहे हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कभी आपस में रूठ कर सर्विस में धोखा नहीं देना है। विघ्न रूप नहीं बनना है। अपनी कमजोरी नहीं दिखानी है। बाप का पूरा-पूरा मददगार बनना है।

2) कभी कोई से झगड़ा आदि हुआ, पास हुआ, उनका चिंतन नहीं करना है। कोई ने कम जास्ती बोला, तुम उनको भूल जाओ। कल्प पहले भी ऐसे बोला था। वह बात फिर कभी बोलो भी नहीं।

वरदान:- बीती हुई बातों को रहमदिल बन समाने वाले शुभचिंतक भव
यदि किसी की बीती हुई कमजोरी की बातें कोई सुनाये तो शुभ भावना से किनारा कर लो। व्यर्थ चिंतन या कमजोरी की बातें आपस में नहीं चलनी चाहिए। बीती हुई बातों को रहमदिल बनकर समा लो। समाकर शुभ भावना से उस आत्मा के प्रति मन्सा सेवा करते रहो। भले संस्कारों के वश कोई उल्टा कहता, करता या सुनता है तो उसे परिवर्तन करो। एक से दो तक, दो से तीन तक ऐसे व्यर्थ बातों की माला न हो जाए। ऐसा अटेन्शन रखना अर्थात् शुभ चिंतक बनना।
स्लोगन:- सन्तुष्टमणि बनो तो प्रभु प्रिय, लोकप्रिय और स्वयंप्रिय बन जायेंगे।

TODAY MURLI 28 SEPTEMBER 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 28 September 2020

28/09/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you are true friends with the whole world; you should have no enmity with anyone.
Question: You are the spiritual military. What direction has the Father given you which you have to put into practice?
Answer: You have been given the direction: Always wear your badge. Whenever anyone asks you what it is or who you are, tell him: We are the fire brigade who puts out the fire of lust of the whole world. At this time, the whole world is ablaze with the fire of lust. We are giving everyone the message: Now become pure and imbibe divine virtues and your boat will go across.

Om shanti. Sweetest, spiritual children are sitting in easy remembrance. Some find it difficult. Many are confused because they think that they have to sit in a very tight or strict manner. The Father says: There is nothing like that here. You may sit how you like; you simply have to remember the Father. There is no question of difficulty in this. Hatha yogis sit in a very tight position, crossing one leg over the other. Here, the Father tells you to sit comfortably. Remember the Father and the cycle of 84 births. This is easy remembrance. While sitting and walking around, this should remain in your intellects. Just as this little boy is sitting next to his father and he is only aware of his parents, so you too are children, and it is therefore easy to remember the Father. We are Baba’s children. We have to claim our inheritance from Baba. You may live at home with your families and carry on working for your livelihoods, but simply remove the remembrance of others from your intellects. Some of you used to remember Hanuman, and others used to remember sages etc. That remembrance has to be forgotten. Everyone remembers someone. Worshippers go to temples in order to carry out their worship. Here, there is no need to go anywhere. Tell anyone you meet: Shiv Baba says: Remember Me, the one Father. Shiv Baba is incorporeal. He definitely has to come into the corporeal world to say: Constantly remember Me alone! I am the Purifier. This word is right. Baba says: Remember Me. All of you are impure. This is the impure and tamopradhan world. This is why Baba says: Don’t remember any bodily being. It is a good thing, is it not, that no guru etc. is praised here? The Father says: Simply remember Me and your sins will be cut away. This is the power of the fire of yoga. The unlimited Father is telling the truth, is He not, when He says that the God of the Gita is the incorporeal One? It is not a question of Krishna being this. God says: Simply remember Me alone! There is no other method. By returning home pure, you will claim a high status. Otherwise, your status will be reduced. I am giving you the Father’s message; I am a messenger. There is no difficulty in explaining this. Women, stone intellects, hunchbacks can also claim a high status, whether you live here or at home with your family. It isn’t that those who live here stay in remembrance more. Baba says: Those who live outside can also stay in remembrance a great deal and do a lot of service. Some come here and become refreshed by the Father and then return home. Therefore, they should have so much happiness inside. There are only a few more days in this dirty world and we will then go to the land of Krishna. Even Krishna’s temple is called the land of happiness (Sukhdham). Therefore, since you children now belong to the unlimited Father, you should experience limitless happiness. You were made into the masters of heaven. You also say: Baba, I met You 5000 years ago and I will meet You again. You have to be victorious over Maya by remembering the Father. You no longer want to stay in this land of sorrow. You are studying in order to go to the land of happiness. Everyone has to settle his or her accounts and return home. I have come to establish the new world. All the rest of the souls will go and stay in the land of liberation. The Father says: I am the Death of all Deaths. I free all souls from their bodies and take them all back home with Me. Everyone asks to go back soon because they don’t want to live here. This is an old world and an old body. The Father now says: I will take everyone back with Me. I will not leave anyone behind. All of you called out to Me: O Purifier, come! People don’t understand the meaning of that, although they continue to remember Me. They chant the name of the Purifier, referring to King Rama of the warrior clan of the silver age. Shiv Baba neither becomes a king nor rules a kingdom. It is wrong to call Him “King Rama”. When they turn the beads of a rosary, they say Rama’s name. This is how they remember God. God is Shiva. Human beings have given Him many names. They even call Krishna by many names: “Shyam Sundar”, “Vaikunthnath” (the Lord of Paradise), “Makhan Chor” (the one who stole butter) etc. Would you say Krishna was someone who stole butter? Not at all! You now understand that God is incorporeal. No bodily being can be God. If even Brahma, Vishnu and Shankar cannot be called God, how can human beings call themselves God? The rosary of victory of 108 of the Father is remembered. Shiv Baba established heaven. They (Lakshmi and Narayan) were the masters of that heaven. They must definitely have made effort prior to that. That is called the confluence age, between the end of the iron age and the beginning of the golden age. It is the confluence of the cycles. However, those people then spoke of a confluence of every age. They forgot that they called Him the Incarnation and said that He was in the pebbles and stones and in every speck of dust. That too is in the drama. Anything that becomes the past is called the drama. After there has been a quarrel with someone, that has become the past. Therefore, you mustn’t think about it. Achcha, if someone said something or other, just forget it. He said the same thing in the previous cycle too. If you remember it, you continue to become upset. Don’t even speak about it again. You children have to do service, do you not? There shouldn’t be any obstacles to service. You mustn’t show any weakness in service. It is Shiv Baba’s service, is it not? You must never refuse to do it. Otherwise, you will destroy your own status. You have become the Father’s helpers. Therefore, you have to give Him complete help. You mustn’t even slightly deceive the Father in doing His service. The message has to be given to everyone. The Father continues to say: Give the museum such a name that, when people see it, they will be pulled to enter it and can thereby come to understand. This is something new and when people see something new they immediately enter. Nowadays, people come from abroad to learn the ancient yoga of Bharat. “Ancient” means the oldest of all. That can only be the yoga taught by God which He taught 5000 years ago. There is no yoga in the golden and silver ages. The One who taught you went away. Only when He comes again after 5000 years does He teach Raj Yoga. “Ancient” means 5000 years ago, when God taught it. That same God will then come at the confluence age once again and teach you Raj Yoga through which you can become pure. At this time even the elements are tamopradhan. Even water causes so much damage. Calamities continue to happen in the old world. In the golden age, there is no question of calamities. There, nature becomes your servant. Here, nature becomes your enemy and causes sorrow. There was no question of sorrow in the kingdom of Lakshmi and Narayan. That was the golden age, the age of truth. It is now being established once again. The Father is teaching you ancient Raj Yoga and He will teach it again after 5000 years. Whatever part someone has, he will play that same part again. The unlimited Father is also playing His part. The Father says: I enter this one, carry out establishment and return home. After the cries of distress, there will be cries of victory. The old world will be destroyed. When it was the kingdom of Lakshmi and Narayan, the old world didn’t exist. It is a matter of 5000 years ago. It cannot be a matter of hundreds of thousands of years. The Father says: In order to benefit yourself, forget everything else and engage yourself in this service. Don’t sulk and then become deceitful in the service you do. This is God’s service. There will be many storms of Maya, but don’t deceive anyone in God, the Father’s, service. The Father continues to give you directions for the sake of service. You are true friends of anyone who comes, even your friends and relatives. You Brahma Kumars and Kumaris are friends with the whole world because you are the Father’s helpers. There should be no enmity among friends. If something happens, just say: Remember Shiv Baba. Engage yourself in following the Father’s shrimat. Otherwise, you will cause yourself a loss. When you come here by train, you are all free. You have a very good chance to do service. The badge is a very good thing. Each one of you definitely has to wear it. When someone asks who you are, tell him: We are the firebrigade. That fire brigade puts out fires. The whole world is now burning in the fire of lust. The Father now says: Conquer lust, the greatest enemy! Remember the Father and become pure. Imbibe divine virtues and your boat will go across. These badges have been created according to shrimat. Very few children do service using their badge. Baba explains to you so many times in the murlis. Every Brahmin should have a badge. Explain the badge to whomever you meet: This is Baba. You have to remember Him. We are not praising the corporeal one. The Bestower of Salvation for All is the one incorporeal Father and it is He who has to be remembered. Your sins will be cut away with the power of yoga and your final thoughts will then lead you to your destination. You will be liberated from the land of sorrow and you will then go to the land of Vishnu. This is such good news! You can also give them some literature. Tell them: Because you are poor we will give it to you free of charge. Wealthy ones should give some money because plenty have to be printed. This is such that you can change from a beggar and become a master of the world. You continue to receive these explanations. Tell anyone of any religion: In fact, you are a soul. Consider yourself to be a soul and remember the Father. Destruction is now just ahead. This world is going to change. If you remember Shiv Baba you will go to the land of Vishnu. Tell them: We are giving you something that is worth millions and billions. Baba has told you so many times that you have to serve using your badge, but some of you don’t even wear your badge because you are too embarrassed. When Brahmin teachers come here with a group or when they go to work on their own, they should definitely be wearing this badge. When you explain this badge to people, they will become very happy. Tell them: We only believe in the one Father. Only He can give everyone peace and happiness. Therefore, remember Him. Souls cannot return home impure. This old world is now going to change. While you are coming here you should do service in this manner along the way. Your name will be glorified a great deal. Baba understands that you are perhaps too embarrassed to wear your badge and that is why you don’t do any service. Firstly, you should have the badge. Then, together with this, you should have pictures of the Trimurti, the cycle and the tree. Sit amongst yourselves and explain to one another and many will gather round you. When they ask, “What is this?” tell them: Shiv Baba is establishing the new world through this one (Brahma). The Father says: Now remember Me and become pure! Impure souls cannot return home. Tell them such sweet things that everyone listens in great happiness. However, this doesn’t sit in anyone’s intellect. When you go to your centre for class, you should always wear your badgeMilitary people always wear their badge. Are they ever too embarrassed to wear it? You are the spiritual military. The Father is giving you directions. So, why don’t you put them into practice? When you wear your badge you will be able to remember Shiv Baba. I am a child of Shiv Baba. Day by day, centres will continue to open. Someone or other will emerge. They will say: You don’t have a branch in this town. Tell them: If someone makes arrangements and invites us to come and offers us accommodation, we can come and do service here. When children have courage, the Father helps. The Father only tells you children to open centres and do service. All of these are Shiv Baba’s shops. They are being run by the children. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Never sulk among yourselves and be deceitful in service. Don’t become an obstacle. Don’t show your weaknesses, but become the Father’s complete helpers.
  2. After there has been a quarrel with someone, that has become the past. Therefore, you mustn’t think about it. Someone may have said something or other, but you should forget it. He said the same thing in the previous cycle, so never mention it again.
Blessing: May you have pure and positive thoughts for others and by being merciful, merge the things of the past.
When someone comes to you to tell you about someone’s weaknesses of the past, then with good wishes, just step aside. Let there not be any wasteful thinking or any talk about weaknesses among yourselves. Be merciful and merge the things of the past. Merge those things and with good wishes, continue to serve that soul with your mind. Even if someone is saying, doing or listening to something wrong due to the influence of their sanskars, transform that one. Do not allow a rosary of such wasteful matters to be created of spreading from one to two to three in this way. To pay such attention means to have pure and positive thoughts.
Slogan: Be a jewel of contentment and you will be loved by God, by the people and by the self.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 28 SEPTEMBER 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 28 September 2018

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Read Murli 27 September 2018 :- Click Here

28/09/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you should not hold any grudges against anyone, because you are benefactors for everyone. Those who hold grudges against anyone are said to be half-caste Brahmins.
Question: Which awareness should your intellects always have so that you become fearless?
Answer: Always have the awareness that you are becoming deities, the masters of the land of truth. Someone can kill a body, but no one can kill a soul. A bullet would hit the body. I, the soul, am going to Baba. Why should I have any fear? While I am sitting here, if the ceiling falls on me, I will go to Baba. There is nothing to be afraid of in this. Become fearless to this extent.
Song: Mother, o mother, you are bestower of fortune for the world. 

Om shanti. You children heard the praise of Jagadamba. People simply sing this and there are melas to Jagadamba. This is the confluence age; this is the meeting of the children and the Father. Since there is the Father, there is surely also the mother. No one in Bharat knows the life story of Jagadamba, the one who creates the world, that is, the World Mother (Jagadamba). There are also temples to Jagadamba. You children have now received understanding; you have each received a third eye of knowledge. You children know that the one whose memorial is built would definitely have come on to this earth at the confluence age. That one is called Jagadamba. Prajapita is Jagadpita (World Father). No one knows the beginning, middle or end of this unlimited drama or who the main actors are. The hero and heroine are also actors. There wouldn’t just be two of them; there would definitely be their army. There would also be the army of Jagadamba; they are called Shaktis. The Shakti Army is well known. Where did they receive power from? They would surely have taken power from the Almighty Authority, the Supreme Father, the Supreme Soul. Everyone believes this. The Highest on High is God. He is called Sat Shri Akal. Akaali people (Sikhs) believe in the incorporeal One. Sikhs study the Granth and believe in Guru Nanak. They say that Guru Nanak is a deity. The names of each generation of their ten successive gurus are all different. Some are called Singh, some are calls Das, and some are called Chand. The names of all of them are different and the Akaalis believe in the Immortal Image. Whose praise is Sat Shri Akal (Truth, Elevated, Immortal)? That of the Supreme Father, the Supreme Soul. So, this proves that the Truth is only One, Shri Shri God, the Immortal Image. You can say: Sat Shri Akal. You know Him. Those people simply say these words but they don’t know the meaning of them. You know the One who is Sat Shri Akal. You know His biography. It is you children who have to churn the ocean of knowledge. The Father is the Ocean of Knowledge anyway and He has given the urn to the mothers. This one is the senior mother and then there are you innumerable mothers, you innumerable daughters and sons of Jagadamba. That one is Jagadamba and there is definitely the father as well. You know who Jagadamba is and whose daughter she is. She too is a human being; she doesn’t have eight or ten arms. No one knows why she has been shown with so many arms. So the Highest on High is God, the Truth. It has been explained to you children that the Supreme Father, the Supreme Soul, whom we call Rup Basant, is Rup and also Basant, the Ocean of Knowledge. Such a tiny s tar and yet He is the Ocean of Knowledge! It is a wonder ! It has been explained to you children that the Father is a point and that He truly has a whole part in Him. He fulfils the desires of the devotees on the path of devotion. All of this is fixed in the drama. Whatever feelings someone has at whatever time, that is fixed in the drama in advance. This study of yours is also fixed in the drama and this part is now being repeated. This is something to be understood. You can explain very clearly: Everyone says that God is the Highest on High. He is the incorporeal One, the fearless One and the One with no grudges. He doesn’t hold any grudges against anyone. You too don’t hold grudges against anyone. You are benefactors for everyone. If someone holds a grudge, he would be called a halfcast e: half a shudra and half a Brahmin. When this alloy of the vices is completely removed, you will be called true Brahmins. Now you are half and half. Souls are still filled with iron-aged, tamopradhan sanskars and those now have to be removed. At present, you are neither deities nor shudras; you are said to be Brahmins in the middle, and you haven’t become complete in that either. Jagadamba cannot be called a deity. When Jagadamba becomes complete she will then become a deity. She is now a Brahmin, the daughter of Brahma: Saraswati. However, no one knows this. When did Brahma come and create the mouth-born creation? They are called the Shiv Shakti Army. You know that He is the highest-on-high Father, the Supreme Father, the Resident of the supreme abode. Then there are Brahma, Vishnu and Shankar in the subtle region. Because of it being the family path, the form of a couple is shown. They show Vishnu as a complete couple. All of this should remain in your intellect. Human beings say that they are actors. So, human beings should know the beginning, the middle and the end of the drama. Who is God, the Highest on High? Who are Brahma, Vishnu and Shankar? Is there anyone else who has eight, ten or a hundred arms? No, all of those pictures are useless. They show Brahma with a hundred arms. This one is the Father of People; there is no question of a hundred arms. All of that is wrong. In fact, you should understand what is truly right. God, the Highest on High, who resides in the supreme abode is a s tar. Vishnu has been shown with four arms – two arms of Lakshmi and two of Narayan – just as they also show ten heads of Ravan: five vices of woman and five vices of man. The first and foremost vice is body consciousness. Then the other vices enter, numberwise. Brahma, the resident of the subtle region, is avyakt (subtle). Prajapita Brahma (the Father of People) has to be here. When this one becomes perfect, he becomes an angel, a resident of the subtle region. You too become angels. There, your bodies are not of flesh and bone. They are called angels. Brahma is the Father of People here. Then Vishnu will carry out the sustenance through the two forms. Shankar is in the subtle region. These deep matters have to be understood. No one has that far-sighted an intellect. Your intellects have gone right to the incorporeal world and the subtle region. The subtle region where you can go up and come down from has now been created. There has also been the creation of Brahma, Vishnu and Shankar. So the Highest on High is God and then there are Brahma, Vishnu and Shankar and then there are the deities of the human world. However, there aren’t any human beings with eight to ten arms or goddesses such as Chandika (cremator goddess). Where did all of those pictures come from? You don’t have any weapons. They have sat and created all of those violent weapons. Deities are doubly non-violent. There are no weapons etc. in the subtle region. They have shown so many weapons in those pictures. That is called the worship of dolls. No one knows the occupation of any of them. Baba comes and creates the new creation through Brahma and so He Himself is the Senior. You are his children, grandsons and granddaughters. Those who are to understand, will understand this, but they don’t then understand that everyone is to die. Even now, so many continue to die, but no one puts this in the newspapers because, otherwise, their names would be spoilt. So many starve to death. They are hardly able to get two chapattis to eat for a meal. You children know that the kingdom of Lakshmi and Narayan continues in the golden age. They are beings with two arms each. It isn’t that there are goddesses with eight or ten arms in the golden age. Rama and Sita are the second number. They too are claiming their status here through Raja Yoga. This is such an easy matter to understand! The Father says: You have studied many Vedas and scriptures. Now, listen to Me and judge for yourself whether I am telling the truth or they tell the truth. If they tell the truth, why have you not become true Narayan by listening to the story of the true Narayan? You are now listening to the true story from the true Baba in a practical way. This story is for you to become Lakshmi from an ordinary woman and Narayan from an ordinary man. Subjects too will definitely be created. Or, is it that just Lakshmi and Narayan will go and sit on the throne? A kingdom of deities is being established. Then, you will go and rule in the golden age. The kings there don’t have armies etc. Armies are part of vicious, unholy kings. Those others are holy kings. The golden age is called the holy land and this is called the unholy land ; it has become very old and impure. The new definitely has to become old. The body too is new at first and it then becomes old. This should sit in your intellects. Although they are human beings, they don’t know the beginning, the middle or the end of the drama. You know that the Highest on High, Shiv Baba, resides in the supreme abode. That is called the incorporeal world. Souls, points also reside there. However, if just the point form is shown, how could anyone understand? How would they worship a point? How would they worship Shiv Baba, a point? How would they apply a tilak? Baba has been to Amarnath. Baba went and saw how they make the Shivalingam there. They say that Shankar told the story to Parvati up on the mountains. What state of degradation did she reach that he sat and told her the story? In fact, all of you are Parvatis. You come into the cycle of birth and death and are listening to the story in order to attain salvation. So, there, he (Brahma) asked: Where is the Shivalingam? He was told: The Shivalingam is self-creating. Oh! but how is that possible? They also show pigeons there. Pigeons never learn how to speak. Parrots are taught how to speak and so they speak. They are able to memorize and repeat things they hear. You wear bead necklaces of knowledge. Baba has explained that the Highest on High is Shiv Baba and that there are then Brahma, Vishnu and Shankar. They show Vishnu with four arms in order to portray the family path. Here, in the human world, the highest on high are Lakshmi and Narayan and their kingdom, and then there is the dynasty of Rama and Sita. That holy dynasty comes to an end and then the kingdom of Ravan begins. Then, everyone has to become impure. However, there is some influence of the new souls that come down at the end. Some have satopradhan parts, some have rajo parts and others tamo parts. This is an unlimited drama. Human beings are human beings. All the rest is the worship of dolls. You are actors. You are now changing from human beings into deities. Human beings attain such a high status by studying. This too is a study through which you attain a royal status. There is no other study like this one. Those princes and princesses brought their reward with them. You are creating your reward here for the future golden age. This is such elevated and easy knowledge: liberation-in-life in a second. We are the children of the unlimited Father and we are sitting in God’s lap. Who would leave God’s lap? So, the beginning, middle and end of this drama have to be understood. The Father sits here and explains everything correctly to you. He is remembered as the Seed of the human world tree. He is also called the Truth, the Living Being and the Embodiment of Bliss. He would definitely give you the inheritance when He comes. You are becoming deities, the masters of the land of truth. There is no question of fear. Here, there is so much fear that someone may attack you. You have to remain completely fearless. Someone can kill a body, but no one can kill a soul that you should be afraid. Very good understanding is required in order to be fearless. The Father is fearless and the children are also fearless. The bullet would hit the body and I, the soul, would go to Baba. I am not afraid. I am sitting here and, if the ceiling falls in, I will go to Baba. It takes time to become fearless. You are the Shiv Shakti Army, the children of Jagadamba. There isn’t praise of just one. You are also with her. That One is the Commander. He teaches you spiritual drill. You are His children. You are luckystars. This Saraswati is also a lucky star. She is the daughter of Brahma. This one (Brahma) is the moon of the Sun of Knowledge but, because he is male, the urn is placed on the mother. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found, mouth-born creation of Brahma, the decoration of the Brahmin clan, the children who are spinners of the discus of self-realisation, love, remembrance and good morning from the depths of the heart with deep love from the Mother, the Father, BapDada, numberwise, according to the efforts you make, the spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Remove the iron-aged, tamopradhan sanskars and become true Brahmins. Don’t hold grudges against anyone.
  2. In order to become fearless, practise being soul conscious. Maintain the intoxication: We are the Shiv Shakti Army and we have to become masters of the land of truth.
Blessing: Like a sunflower facing the sun, may you always be facing and be close to the Father by shinning like the sun of knowledge.
A sunflower is always surrounded by the light of the sun, and it always faces the sun with its petals in a circle like rays of the sun. In the same way, the children who always remain close and facing the sun of knowledge like a sunflower and are never distant shine constantly like a sunflower with the light of the sun of knowledge, and also enable others to shine.
Slogan: Be constantly courageous and give courage to everyone and you will continue to receive God’s help.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 28 SEPTEMBER 2018 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 28 September 2018

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28-09-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – तुम्हारा किसी से भी वैर नहीं होना चाहिए क्योंकि तुम हो सबके कल्याणकारी, वैर रखने वाले को हाफ कास्ट ब्राह्मण कहेंगे”
प्रश्नः- कौन सी स्मृति बुद्धि में सदा रहे तो निर्भय बन जायेंगे?
उत्तर:- सदा स्मृति में रहे कि हम सचखण्ड के मालिक देवी-देवता बन रहे हैं, शरीर को कोई मारता भी है लेकिन आत्मा को मार नहीं सकता। गोली शरीर को लगती है। मैं आत्मा तो जा रही हूँ बाबा के पास, हमको क्या डर है। हम बैठे हैं, छत गिर जाती है, हम बाबा के पास चले जायेंगे। इसमें डरने की कोई बात नहीं। ऐसा निर्भय बनना है।
गीत:- माता ओ माता……..

ओम् शान्ति। बच्चों ने जगत अम्बा की महिमा सुनी। अब मनुष्य तो सिर्फ गाते रहते हैं जगत अम्बा के मेले लग रहे हैं। यह फिर है संगम। बच्चों का बाप के साथ मेला। बाप है तो माँ जरूर है। भारत में जगत अम्बा की जीवन कहानी कोई भी जानते नहीं। जगत को रचने वाली अर्थात् जगत अम्बा। जगत अम्बा के मन्दिर भी हैं। अभी तुम बच्चों को समझ मिली है, ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। अभी तुम बच्चे जानते हो, जिसका यादगार बना हुआ है वह जरूर सृष्टि के संगम पर आये होंगे। इनको जगत अम्बा कहा जाता है। जगतपिता, प्रजापिता भी है ना।

इस बेहद ड्रामा का आदि-मध्य-अन्त क्या है और मुख्य एक्टर्स कौन-से हैं – यह कोई नहीं जानते। हीरो-हीरोइन भी एक्टर होते हैं ना। सिर्फ दो नहीं होंगे। जरूर उनकी सेना होगी। जगत अम्बा की भी सेना होगी। उनको शक्तियां भी कहा जाता है। शक्ति सेना नामीग्रामी है। शक्ति कहाँ से आई? जरूर सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा से ही शक्ति ली होगी – यह तो सब मानते हैं। ऊंच ते ऊंच भगवान् है। उनको ही सत श्री अकाल कहते हैं। अकाली जो होते हैं वह निराकार को मानने वाले होते हैं। सिक्ख ग्रन्थी गुरुनानक को मानते हैं। कहते हैं गुरुनानक देव हैं। उनकी जो पीढ़ी होती है उनके 10 बादशाहों के नाम भी भिन्न-भिन्न हैं। कोई का सिंह, कोई का दास, कोई का चन्द भी नाम होगा। सबके नाम भिन्न-भिन्न हैं और अकाली जो हैं वह अकालमूर्त को मानते हैं। सत श्री अकाल – यह किसकी महिमा की? परमपिता परमात्मा की। तो सिद्ध करते हैं सत सिर्फ एक श्री श्री अकालमूर्त परमात्मा ही है। तुम कह सकते हो सत श्री अकाल। तुम उनको जानते हो। वह सिर्फ अक्षर कह देते, अर्थ कुछ भी नहीं जानते। तुम तो जानते हो सत श्री अकाल को। उनकी बायोग्राफी को भी तुम जानते हो। विचार सागर मंथन भी तुम बच्चों को करना है। बाप तो ज्ञान का सागर है। उसने कलष माताओं को दिया है। यह है बड़ी मम्मा और फिर तुम अनेक मातायें हो। जगत अम्बा की अनेक बच्चियां और बच्चे हैं। यह जगत अम्बा है फिर पिता भी जरूर है। तुम जानते हो यह जगत अम्बा कौन है, किसकी बच्ची है? हैं तो मनुष्य, 8-10 भुजायें तो नहीं हैं। इतनी भुजायें क्यों दी हैं – यह किसको पता नहीं। तो ऊंच ते ऊंच वह सत परमात्मा है। तुम बच्चों को समझाया गया है – परमपिता परमात्मा जिसको हम रूप-बसन्त कहते हैं, रूप भी है और फिर बसन्त, ज्ञान सागर है। इतना छोटा-सा स्टॉर, वह ज्ञान सागर है। वन्डर है ना। बच्चों को समझाया है – बाप है बिन्दी रूप, उसमें बरोबर सारा पार्ट है। भक्ति मार्ग में भक्तों की भावना पूरी करते हैं। यह सारी ड्रामा में नूँध है। जिस समय जिसकी जो भावना है वह ड्रामा में पहले से ही नूँधी हुई है। तुम्हारी यह पढ़ाई भी ड्रामा में नूँध है, जो पार्ट रिपीट हो रहा है। समझने की बात है ना। तुम अच्छी रीति समझा सकते हो – ऊंच ते ऊंच भगवान् सब कहते हैं। वह है निराकार, निर्भय, निर्वैर…. उनका कोई के साथ वैर नहीं है। तुम्हारा भी कोई के साथ वैर नहीं है। तुम सबके कल्याणकारी हो। अगर किसका वैर है तो उनको हाफ कास्ट कहेंगे। आधा शूद्र, आधा ब्राह्मण। यह विकारों की खाद कम्पलीट निकल जायेगी तब सच्चा ब्राह्मण कहेंगे। अभी तो आधा-आधा है। कलियुगी तमोप्रधान संस्कार भरे हुए हैं, वह निकलने हैं। अभी तुमको न देवता, न शूद्र, बीच का ब्राह्मण कहेंगे। वह भी सम्पूर्ण नहीं बने हो। जगत अम्बा को देवता नहीं कहेंगे। जगत अम्बा जब सम्पूर्ण बन जाती है, उसके बाद देवता बनती है। अभी ब्राह्मण है। ब्रह्मा की बेटी सरस्वती है। परन्तु यह कोई नहीं जानते। ब्रह्मा कब आया जो मुख-वंशावली रचना रची? उसको ही शिवशक्ति सेना कहा जाता है। तो तुम जानते हो वह ऊंच ते ऊंच बाप परमपिता, परमधाम में रहने वाले हैं। फिर सूक्ष्मवतन में हैं ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। प्रवृत्ति मार्ग होने कारण वह भी युगल दिखाते हैं। विष्णु को पूरा युगल दिखाते हैं। यह सब बुद्धि में रहना चाहिए। मनुष्य कहेंगे हम एक्टर हैं। तो मनुष्यों को ड्रामा के आदि, मध्य, अन्त का मालूम होना चाहिए ना। ऊंच ते ऊंच भगवान् कौन है? ब्रह्मा, विष्णु, शंकर कौन हैं? क्या और भी 8-10-100 भुजा वाला कोई है? नहीं, यह सब चित्र फालतू हैं। ब्रह्मा की 100 भुजा दिखाते हैं। अब यह तो प्रजापिता है, 100 भुजा की तो बात ही नहीं। यह सब रांग है। राइट वास्तव में क्या है, वह भी समझना चाहिए। ऊंच ते ऊंच भगवान् जो परमधाम में रहते हैं, है स्टॉर। विष्णु को भी 4 भुजा दिखाई हैं – दो भुजा लक्ष्मी की, दो भुजा नारायण की। जैसे रावण के 10 शीश दिखाते हैं, 5 स्त्री के विकार और 5 पुरुष के। पहले-पहले मुख्य विकार है देह-अभिमान। फिर और विकार नम्बरवार आते हैं। सूक्ष्मवतनवासी ब्रह्मा तो है अव्यक्त। प्रजापिता ब्रह्मा तो यहाँ चाहिए ना। यह जब सम्पूर्ण बन जाते हैं तो सूक्ष्मवतन में फरिश्ते बन जाते हैं। तुम भी फरिश्ते बन जाते हो। वहाँ तुम्हारा शरीर हड्डी-मास का नहीं होता है। उनको फरिश्ता कहा जाता है। ब्रह्मा तो प्रजापिता यहाँ है। फिर विष्णु दो रूप से पालना करेंगे। शंकर तो है सूक्ष्मवतन में। यह बड़ी समझने की बातें हैं। इतनी दूरांदेशी बुद्धि कोई की है नहीं। तुम्हारी बुद्धि एकदम मूलवतन, सूक्ष्मवतन तक चली गई है। सूक्ष्मवतन अब रचा हुआ है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर की भी रचना हुई है, जहाँ तक आ-जा सकते हो। तो ऊंच ते ऊंच भगवान् फिर ब्रह्मा, विष्णु, शंकर फिर यह मनुष्य सृष्टि में देवी-देवतायें। बाकी 8-10 भुजा वाले वा चण्डिका देवी आदि तो हैं नहीं। इतने सब चित्र कहाँ से आये? तुम्हारे पास कोई हथियार थोड़ेही हैं। यह सब हिंसक हथियार बैठ बनाये हैं। देवता तो होते हैं डबल अहिंसक। सूक्ष्मवतन में कोई हथियार आदि होते नहीं। चित्रों में कितने हथियार दिये हैं। इसको कहा जाता है गुड़ियों की पूजा। आक्यूपेशन को कोई जानते नहीं। बाबा आकर ब्रह्मा द्वारा नई रचना रचते हैं। तो खुद बड़ा हो गया ना। तुम हो उनकी सन्तान पोत्रे और पोत्रियां। समझने वाले समझते भी हैं परन्तु फिर यह नहीं समझते कि सबकी मौत होनी है। अभी भी कितने मरते रहते हैं। अ़खबारों आदि में कोई दिखलाते थोड़ेही है, नहीं तो नाम बदनाम हो जाये। भूख बहुत मरते हैं। एक समय मुश्किल से दो रोटी मिलती है। तुम बच्चे जान गये हो सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य चलता है। दो भुजा वाले ही मनुष्य हैं। बाकी सतयुग में कोई 8-10 भुजा वाली देवियाँ नहीं होती हैं। सेकेण्ड नम्बर में हैं राम-सीता। वह भी यहाँ राजयोग से पद पा रहे हैं। कितनी सहज बात है समझने की। बाप कहते हैं तुमने बहुत वेद-शास्त्र पढ़े हैं, अब तुम मेरे से सुनो और जज करो – मैं तुम्हें सत्य सुनाता हूँ या वह सत्य सुनाते हैं? अगर वह सत्य सुनाते हैं तो तुम सत्य नारायण की कथा से सत्य नारायण क्यों नहीं बने हो?

अभी तुम प्रैक्टिकल में सत्य बाबा से सत्य कथा सुन रहे हो – नारी से लक्ष्मी, नर से नारायण बनने की यह कथा है। जरूर प्रजा भी बनेगी कि सिर्फ लक्ष्मी-नारायण जाकर तख्त पर बैठेंगे? यह देवी-देवताओं की राजधानी स्थापन हो रही है। फिर सतयुग में आकर राज्य करेंगे। वहाँ राजाओं को लश्कर आदि कोई होते नहीं। लश्कर विकारी अनहोली राजाओं को होते हैं। वह तो हैं होली राजायें। सतयुग को होली लैण्ड कहा जाता है, इसको अनहोलीलैण्ड कहते हैं। बहुत पुराने पतित हो गये हैं। नये को पुराना बनना ही है। शरीर भी पहले नया फिर पुराना होता है। यह तो बुद्धि में बैठना चाहिए ना। मनुष्य होते हुए भी ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को नहीं जानते। तुम जानते हो ऊंच ते ऊंच शिवबाबा मूलवतन में रहते हैं। उसको निराकारी दुनिया कहा जाता है। आत्मायें बिन्दियां भी वहाँ रहती हैं। परन्तु बिन्दी रूप ही दें तो कोई समझ कैसे सके? बिन्दी की पूजा कैसे करेंगे? शिवबाबा के बिन्दी रूप की पूजा कैसे करें? तिलक कैसे लगायें? बाबा अमरनाथ पर भी गये हुए हैं। बाबा सारा देखकर आये थे कि कैसे शिवलिंग बनाते हैं। कहते हैं वहाँ पार्वती को शंकर ने कथा सुनाई। अब पार्वती ने किस दुर्गति को पाया था जो उनको बैठ कथा सुनाई? वास्तव में तुम सब पार्वतियाँ हों। तुम जन्म-मरण में आते हो और सद्गति को पाने के लिये कथा सुन रहे हो। तो वहाँ पूछा शिवलिंग कहाँ है? तो बोला शिवलिंग तो आपेही निकल आता है। अरे, यह कैसे होगा! वहाँ कबूतर भी दिखाते हैं। कबूतर (पिज़न) बात करना कभी सीखते नहीं। तोते को बात करना सिखलाते हैं तो वह बोलते हैं। कण्ठी पड़ जाती है। तुम ज्ञान की कण्ठी पहनते हो। तो बाबा ने समझाया है ऊंच ते ऊंच तो है शिवबाबा फिर ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। प्रवृत्ति मार्ग दिखाने लिये विष्णु को 4 भुजायें दिखाते हैं। यहाँ मनुष्य सृष्टि में ऊंच ते ऊंच लक्ष्मी-नारायण और उनकी राजधानी फिर राम-सीता की डिनायस्टी। यह होली डिनायस्टी पूरी होती है। फिर रावण राज्य शुरू होता है। फिर सबको पतित बनना ही है। बाकी हाँ, पिछाड़ी में जो नई आत्मायें आती हैं उनका कुछ प्रभाव निकलता है। किसका सतोप्रधानता का, किसका रजो-तमो का पार्ट है। यह बेहद का ड्रामा है। मनुष्य तो मनुष्य ही हैं। बाकी सब है गुड़ियों की पूजा। तुम एक्टर्स हो ना। अभी तुम मनुष्य से देवता बन रहे हो। पढ़ाई से मनुष्य कितना ऊंच पद पाते हैं। यह भी पढ़ाई है, जिससे तुम राज्य पद पाते हो। ऐसी पढ़ाई कोई होती नहीं। वह प्रिन्स-प्रिन्सेज तो प्रालब्ध ले आते हैं। तुम यहाँ प्रालब्ध बना रहे हो। भविष्य सतयुग के लिये कितनी ऊंच और फिर सहज नॉलेज है – सेकेण्ड में जीवनमुक्ति। हम बेहद बाप के बच्चे हैं, ईश्वरीय गोद में बैठे हैं। ईश्वरीय गोद कौन छोड़ेंगे?

तो इस ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को समझना है। बाप तो यथार्थ रीति बैठ समझाते हैं। जो मनुष्य सृष्टि का बीजरूप गाया जाता है। सत-चित-आनन्द स्वरूप कहा जाता है। जरूर जब आयेंगे तब तो वर्सा देंगे ना। तुम सचखण्ड के मालिक देवी-देवता बनते हो। कोई डर की बात नहीं है। यहाँ तो कितना डर रहता है – कोई चढ़ाई न करे। तुमको तो बिल्कुल निर्भय रहना है। शरीर को कोई मारता है, आत्मा को थोड़ेही मार सकते हैं जो डरना चाहिए। निर्भय होने की बड़ी समझ चाहिए। बाप भी निर्भय तो बच्चे भी निर्भय। गोली शरीर को लगती है, मैं आत्मा तो जा रहा हूँ बाबा के पास, हमको क्या डर है। हम बैठे हैं, छत गिर जाती है, हम बाबा के पास चले जायेंगे। निर्भय होने में टाइम लगता है। तुम हो जगत अम्बा के बच्चे शिव शक्ति सेना। एक की तो महिमा नहीं है। तुम भी साथ हो। यह कमान्डर है। तुमको रूहानी ड्रिल सिखलाते हैं। तुम उनके बच्चे हो। तुम हो लक्की सितारे। यह सरस्वती भी लक्की सितारा है। ब्रह्मा की बेटी है ना। उस ज्ञान सूर्य का चन्द्रमा तो यह (ब्रह्मा) है ना। परन्तु यह मेल होने कारण माता पर कलष रखा जाता है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण कुल भूषण स्वदर्शन चक्रधारी बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का दिल व जान, सिक व प्रेम से नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कलियुगी तमोप्रधान संस्कारों को निकाल सच्चा ब्राह्मण बनना है। किसी से भी वैर नहीं रखना है।

2) निर्भय बनने के लिये आत्म-अभिमानी रहने का अभ्यास करना है। हम शिव शक्ति सेना हैं, हमें तो सचखण्ड का मालिक बनना है – इसी नशे में रहना है।

वरदान:- सूर्यमुखी पुष्प के समान ज्ञान सूर्य के प्रकाश से चमकने वाले सदा सम्मुख और समीप भव
जैसे सूर्यमुखी पुष्प सदा सूर्य की सकाश से घिरा हुआ रहता है। उसका मुख सूर्य की तरफ होता है, पंखुड़ियां सूर्य की किरणों के समान सर्किल में होती हैं। ऐसे जो बच्चे सदा ज्ञान सूर्य के समीप और सम्मुख रहते हैं, कभी दूर नहीं होते – वे सूर्यमुखी पुष्प के समान ज्ञान सूर्य के प्रकाश से स्वयं भी चमकते और दूसरों को भी चमकाते हैं।
स्लोगन:- सदा हिम्मतवान बनो और सर्व को हिम्मत दिलाओ तो परमात्म मदद मिलती रहेगी।

TODAY MURLI 28 SEPTEMBER 2017 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 28 SEPTEMBER 2017

Read Murli in Hindi :- Click Here

Read Bk Murli 27 September 2017 :- Click Here

28/09/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, your old enemy is Ravan. Your war is very dangerous. The more yoga you have with the One, the more power you will receive to conquer the enemy.
Question: How is the department of you Brahmins completely separate from that of human beings and which department is it?
Answer: The department of you Brahmins is to become pure and make others pure by following shrimat. You burn your sins away with the power of yoga. The Father fulfils all your desires. Whatever people do, it continues to bring them down. They learn all the occult powers etc. and yet continue to become impure.
Song: Our pilgrimage is unique.

Om shanti. While living in this old world, you children have no more connection with the old world. You are making effort to claim your inheritance from the unlimited Father for the new world. Until establishment takes place, although you are sitting in the old world, all your attention is on earning a true income for heaven. You can see signs of the destruction that has to take place. You know that the flames of destruction emerged from this sacrificial fire of the knowledge of Rudra. This Mahabharat War definitely has to take place for our own benefit, that is, for the benefit of our Bharat. In fact, you are not battling with anyone now. You are doubly non-violent: you neither have the violence of lust nor of anger. The main violence is lust. This is the impure world. How did you become impure? Because of vice: the vice of lust has caused you sorrow from its beginning through the middle to the end. This is not said of anger. There is the question of purity and impurity. It is lust that deceives everyone. It is because of this vice that innocent ones are assaulted. If someone becomes pure and their partner does not, they fight. The Father says: Both have to promise to sit on the pyre of knowledge. They make you sit on the pyre of lust. The Father cancels that deal. The pure world is now being established and so that deal has to be cancelled. By sitting on the pyre of knowledge, you will become pure and the masters of the pure world. You too have a war. In fact, your war is more dangerous than any physical war because Ravan is your very old enemy; you have to conquer him. The more your intellect’s yoga is connected to the One, the more power you will receive. Everything depends on following shrimat. Shrimat says: While living at home with your family, become full of all virtues, 16 degrees full. It is souls that have to become this. Souls were 16 celestial degrees full and, while taking 84 births, they have continued to come down. You children know that there definitely was the kingdom of deities. The kingdom of Rama was established. They have given the name of Rama but, in fact, the name is Shiva’s. They say: Salutations to Shiva. They don’t say: Salutations to Rama. The name ‘Shiv Baba’ is absolutely right. No one calls Rama ‘Baba’. They call Shiva ‘Baba’. Rama means the Supreme Father, the Supreme Soul, not the King Rama of the warrior caste. People continue to repeat whatever they hear. Now, apart from you children, no one has accurate yoga with the Supreme Father, the Supreme Soul. They believe that the Supreme Soul is the form of light or the brahm element and that He is beyond name and form. If they speak of brahm, they think that that too is His name. They don’t understand anything at all. The Father says: I am the Ocean of Knowledge. I am extremely subtle. There is nothing more subtle than He is. He is extremely subtle. Just as the seed of a tree is very subtle, it is tiny to look at, so the Seed of the human world tree is the most subtle of all. Poppy seeds are the tiniest of all; they are very fine. Their plants are very big. The Supreme Father, the Supreme Soul, is an even subtler point than that seed. The Father says: Among you too, you know Me, numberwise, who I am and what I am. Only a handful out of multimillions understand this secret. No human soul can have the praise of Shiv Baba. See how He comes and purifies the impure world! He personally comes here and teaches you children. They don’t know anything at all. They neither know Me nor the cycle. You now know, numberwise, according to your efforts. You don’t have any connection with the things of this old world. People are in extreme darkness. They have their own business and you have your own business. You are the incognito army with the power of yoga. That army is one of physical power. You know them, but no one knows you. Scientists try to go to the stars. They have seen them and so they think: Why can’t we go there? Why can’t we reach the bottom of the sea? This is why they continue to make effort. However, they cannot make effort for something that cannot be seen with these eyes. They only have physical things in their intellects and they continue to make effort for those things. They don’t know the most subtle One, the Supreme Soul, at all. He Himself comes and gives you children His introduction. You made a large image of an oval form of light and so that enters your intellects. The Father continues to explain to you children. Just as the ways and directions of the Father are unique, in the same way, your directions for salvation on the whole are unique. You don’t have any connection with anything else. You have become true Brahmins. There is no expansion of those brahmins. Those brahmins say: We are the children of Brahma. Brahma is Prajapita (Father of Humanity). Who is his father? No one knows this. They speak of Trimurti Brahma. How can there be three forms of Brahma? They are just three deities and the activity of each one is separate. The Creator is only the one Shiva. All of us are His creation and we reside there. The highest-on-high Father is the Supreme Soul. Only the one incorporeal Father is called the Supreme Soul. It isn’t that, because He is the incorporeal Supreme Soul and we souls are also incorporeal, that all are one, that all are His form; no. The Father is separate from the children. The Father has given you knowledge. It is not mentioned in the scriptures that the Supreme Father, the Supreme Soul, sits and teaches Brahmins, the mouth-born creation of Brahma. God came and created the mouth-born creation of Brahma. When the cycle ends at the confluence age, the Father comes and brings about the end of the impure world and the beginning of the pure world. Therefore, He definitely has to come at the confluence age. It takes time to become pure. For half the cycle, there is a burden of sin on your heads. The alloy that is mixed in souls will be removed with the fire of yoga. You have to become satopradhan. We have become impure and will continue to become pure through remembrance alone. This is so easy! We have to go around the cycle of 84 births once again. You children have received this knowledge. The Father says: I have come to teach you Raja Yoga once again. The Father gives you the inheritance whereas Ravan curses you. Only the Father sits here and explains this. The Father comes at this time and fulfils all your desires. It is Maya who fulfils all impure desires. Those with occult powers earn a lot of money nowadays. Maya fulfils those desires of theirs. They have books about that too. You don’t have any books. You don’t have to study any scriptures etc. You have received the Father’s shrimat: Children, become pure and make others pure. You must never become impure. This department of yours is separate. Those who became Brahmins in the previous cycle will come and make effort. Look how the sapling of the deities is being planted. People continue to become Brahmins. Those who listen to even a little bit of knowledge will become part of the subjects; they will come into the kingdom. Death is just ahead. Conflict can become more intense or it can even stop. The intellect says that there is still some time left. The kingdom has not yet been established. You have not yet given knowledge to the kings or sannyasis. The intellect says that there is still time left before destruction. However, rehearsals will continue to take place. It is a wonder ! Those people have sacrificial fires to end wars, whereas God has created the sacrificial fire to transform the whole world. There will be a little peace and people will say: It is because we created a sacrificial fire. Once a sacrificial fire becomes successful, they would continue to have them. They create a sacrificial fire for it to rain and they become happy if it does rain. If it doesn’t rain, they would say that that is God’s will! When someone sheds his or her body, they say that he or she has become a resident of heaven. In that case, there is no need to mourn for that person. If that person has gone to heaven, then consider it to be his great fortune. Maya, Ravan, has locked everyone’s intellect. You know that you are making effort once again exactly as you did in the previous cycle. Bharat is the imperishable land and there are no other religions at that time. They were all created later on. This is also said to be the destiny of the drama. Rivers of blood flow here. They continue to fight with one another. Although they have been living as brothers for a long time, Hindus and Muslims still have separate religions. They came later and so they fight among themselves. You don’t have any connection with that. You have to remain engaged in your service. Simply take three feet of land and open this spiritual hospital. Then expansion will gradually continue to take place. The lake will be created drop by drop in this way. Also keep this picture in your home. Come and we will explain how you can claim your inheritance from the unlimited Father for 21 births. Death is just ahead. Now, simply remember the unlimited Father and the inheritance. This is called the land of death. The Father says: Remember Me and I will take you back with Me. This is why He says: I am the Death of all deaths; I am the Great Death. There is the immortal throne. You are immortal souls. You children understand that you are completely unique in this world. The One who is teaching you here is unique. He speaks to souls. It is souls that listen and souls that speak through their mouths. This soul is listening through these ears. I, the soul, am doing this through this body. It is the soul that experiences taste. It is the soul that says: This is sweet or this is sour. Sanskars are in the soul. The Father says to souls: You now have to return home. You have taken 84 births and you now have to shed those bodies and remove your attachment from them. A snake doesn’t have attachment to its skin. It sheds its old skin and takes a new one. Those are your old skins. They have to be shed in the same way. The example of the buzzing moth also applies to you. In fact, sannyasis cannot give this example. Everyone in this impure world is like a vicious insect. You Brahmins buzz this knowledge to them and purify them. You say: Remember Shiv Baba. This is the magic to change human beings into deities. All these are His names: The Magician, the Businessman and the Jewel Merchant. Achcha, I explain a great deal to you children. Nevertheless, you are told to remember the Father and the inheritance. The Father says: If you surrender yourselves to Me once, I will surrender Myself to you 21 times. This deal is very good, is it not? Shiv Baba is the Bestower. He shows you the way to remove attachment. While living at home with your family, continue to follow shrimat. Purity is first in this. This is a spiritual pilgrimage. Everything depends on this pilgrimage. Human beings go on so many physical pilgrimages. Yours is only the one spiritual pilgrimage. That soul sits here and teaches all souls this. All of this is a matter of the intellect. Sorrow cannot come to you children. You know that such great destruction is to take place for us. Therefore, you cannot feel sorrow inside. If you do feel sorrow, it means that you are weak or that you don’t have that full stage of knowledge. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Remove your attachment from the old skin of your body. Keep your intellect engaged in the spiritual pilgrimage.
  2. Don’t have any connection with anything of the old world. Sit on the pyre of knowledge, become pure and claim your full inheritance from the Father.
Blessing: May you be liberated in life and always maintain spiritual intoxication by having the awareness of your worthy-of-worship form.
The pleasure of Brahmin life is in the stage of liberation in life. The vision of those who constantly have the awareness of their worthy-of-worship forms cannot be drawn to anything except the Father. All persons and possessions bow down in front of worthy-of-worship souls. Those who are worthy of worship are not attracted by anything. Their minds and intellects are not subservient to bodies, relationships, possessions or sanskars. They can never be bound by any bondage. They constantly experience the stage of being liberated in life.
Slogan: A true server is one who is an instrument with humility.

*** Om Shanti ***

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BRAHMA KUMARIS MURLI 28 SEPTEMBER 2017 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 28 September 2017

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BK murli today ~ 28/09/2017 (Hindi) Brahma Kumaris प्रातः मुरली
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28/09/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – तुम्हारा पुराना दुश्मन रावण है, तुम्हारी लड़ाई बड़ी खौफनाक है, तुम जितना एक के साथ योग लगायेंगे उतना दुश्मन पर जीत पाने का बल मिलेगा”
प्रश्नः- तुम ब्राह्मणों की डिपार्टमेंट दुनिया के मनुष्यों से बिल्कुल ही भिन्न है, कैसे और कौन सी?
उत्तर:- तुम ब्राह्मणों की डिपार्टमेंट है श्रीमत पर पावन बनना और बनाना – तुम योगबल से अपने पापों को भस्म करते हो। तुम्हारी सब मनोकामनायें बाप पूरी करते हैं। मनुष्य तो जो कुछ करते उससे नीचे ही उतरते आते। रिद्धि-सिद्धि आदि सीख लेते हैं परन्तु पतित तो बनते ही जाते हैं।
गीत:- हमारे तीर्थ न्यारे हैं…….

ओम् शान्ति। इस पुरानी दुनिया में रहते हुए तुम बच्चों का इस पुरानी दुनिया से कोई नाता नहीं रहा है। तुम नई दुनिया के लिए पुरूषार्थ कर रहे हो – बेहद के बाप से वर्सा लेने। जब तक स्थापना हो तब तक भल पुरानी दुनिया में बैठे हैं परन्तु तुम्हारा सारा ध्यान स्वर्ग की सच्ची कमाई तरफ है। विनाश तो होना ही है, आसार ऐसे देखने में आते हैं। यह भी जानते हो कि इस रूद्र ज्ञान यज्ञ से विनाश ज्वाला निकली है। जरूर हमारे अथवा भारत के कल्याण के लिए यह महाभारत लड़ाई लगनी है। अभी वास्तव में तुम किससे लड़ाई नहीं करते हो। तुम तो डबल अहिंसक हो। तुम्हारे पास न काम की, न क्रोध की हिंसा है। मुख्य हिंसा काम की कही जाती है। यह तो है ही पतित दुनिया। किस कारण पतित बने हो? विकार के कारण। यह काम विकार आदि-मध्य-अन्त दु:ख देता है। क्रोध के लिए नहीं कहा जाता। अपवित्रता और पवित्रता की बात है। काम ही सबको धोखा देता है। इस काम पर ही अबलाओं पर अत्याचार होते हैं। एक पवित्र बने दूसरा न बने तो झगड़ा हो पड़ता है। बाप कहते हैं दोनों को प्रतिज्ञा करनी है, ज्ञान चिता पर बैठने की। वह काम चिता पर बिठाते हैं। बाप वह सौदा कैन्सिल कराते हैं। अब पवित्र दुनिया स्थापन होती है तो वह सौदा कैन्सिल करना पड़े। ज्ञान चिता पर बैठने से पवित्र बन पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। तुम्हारी भी लड़ाई है। उस बाहुबल की लड़ाई से वास्तव में तुम्हारी लड़ाई बड़ी खौफनाक है क्योंकि रावण तुम्हारा बहुत पुराना दुश्मन है, उस पर जीत पानी है। जितना एक के साथ बुद्धियोग लगायेंगे तो बल मिलेगा। सारा मदार है श्रीमत पर चलने का। श्रीमत कहती है कि गृहस्थ व्यवहार में रहते सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण बनना है। आत्मा को ही बनना है। आत्मा 16 कला सम्पूर्ण थी, अब वह 84 जन्म लेते-लेते नीचे उतरती है। जरूर बच्चे जानते हैं देवी-देवताओं का राज्य था। रामराज्य स्थापन हुआ। राम नाम रख दिया है। वास्तव में नाम शिव है। शिवाए नम: कहते हैं। रामाए नम: नहीं कहते हैं। शिवबाबा अक्षर बहुत राइट है। राम को बाबा कोई कहते नहीं। शिव को बाबा कहते हैं। राम यानी परमपिता परमात्मा, न कि रघुपति राघव राजा राम। मनुष्य जो सुनते वह बोलते जाते हैं। अब सिवाए तुम बच्चों के और कोई भी परमपिता परमात्मा के साथ यथार्थ योग नहीं लगाते हैं। वह तो समझते हैं कि परमात्मा तो ब्रह्म ज्योति स्वरूप है, नाम रूप से न्यारा है। अगर ब्रह्म कहते तो भी नाम हो गया ना। कुछ भी समझते नहीं। बाप कहते हैं मैं ज्ञान का सागर हूँ। मैं अति सूक्ष्म हूँ, इससे सूक्ष्म कोई चीज़ होती नहीं, अति सूक्ष्म है। जैसे झाड़ का बीज सूक्ष्म होता है। देखने में कितना छोटा है। मनुष्य सृष्टि का बीज तो सबसे सूक्ष्म है। सबसे छोटी खस-खस होती है। बहुत पतली होती है। उनके झाड़ बहुत बड़े-बड़े होते हैं। तो परमपिता परमात्मा तो उनसे भी अति सूक्ष्म बिन्दी है।

बाप कहते हैं मैं जो हूँ, जैसा हूँ, इस रीति तुम्हारे में भी नम्बरवार जानते हैं। कोटों में कोई ही इस राज़ को समझते हैं। शिवबाबा जैसी महिमा और कोई भी मनुष्य आत्मा की नहीं हो सकती। कैसे आकर पतित दुनिया को पावन बनाते हैं। सम्मुख आकर बच्चों को पढ़ाते हैं, कुछ भी जानते नहीं हैं। न मुझे जानते, न पा को जानते हैं। अभी तुम नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार जानते हो। तुम्हारा इस पुरानी दुनिया की बातों से तैलुक नहीं है। मनुष्य तो घोर अन्धियारे में हैं। उनका तो धन्धा ही है अपना। तुम्हारा धन्धा अपना है। तुम हो गये गुप्त योगबल की सेना। वह है बाहुबल की सेना। उनको तुम जानते हो, तुमको कोई नहीं जानते। वो लोग (साइंसदान) स्टॉर पर जाने की कोशिश करते हैं। देखा है तो समझते हैं हम क्यों नहीं जा सकते! हम समुद्र का अन्त क्यों नहीं पा सकते! इसलिए पुरूषार्थ करते हैं। बाकी जो इन आंखों से नहीं देखा जा सकता, उनका पुरूषार्थ कर नहीं सकते। उनकी बुद्धि में तो स्थूल चीजें आती हैं, उनके लिए पुरूषार्थ करते हैं। सूक्ष्म से सूक्ष्म परमात्मा को तो जानते ही नहीं है। खुद ही आकर बच्चों को अपना परिचय देते हैं। तुमने चित्र बड़ा ज्योर्तिलिंगम् बनाया है तो तुम्हारी बुद्धि में भी वह आता है। बाप बच्चों को समझाते रहते हैं कि जैसे बाप की गत मत न्यारी है वैसे तुम्हारी सद्गति की मत सारी दुनिया से न्यारी है। तुम्हारा और कोई बात से तैलुक नहीं है। तुम सच्चे ब्राह्मण बने हो। ब्राह्मणों का विस्तार तो कुछ है नहीं। वो ब्राह्मण लोग कहेंगे – हम ब्रह्मा की औलाद हैं। ब्रह्मा तो हुआ प्रजापिता। उनका बाप कौन? वह तो कोई जानते नहीं। वह तो त्रिमूर्ति ब्रह्मा कह देते हैं। ब्रह्मा के तीन रूप कैसे हो सकते। यह तो तीन देवतायें हैं। तीनों की एक्टिविटी अलग है। रचयिता तो एक ही शिव है। हम सब उनकी रचना वहाँ रहने वाली हैं। ऊंच ते ऊंच बाप ही सुप्रीम सोल है। सुप्रीम सोल एक निराकार बाप को कहा जाता है। ऐसे नहीं कि वह भी निराकार परमात्मा और हम आत्मायें भी निराकार, सब एक ही हैं, सब उनके ही रूप हैं। नहीं। बाप अलग है बच्चे अलग हैं। तुमको बाप ने नॉलेज दी है। शास्त्रों में तो यह बातें हैं नहीं कि ब्रह्मा-वंशी ब्राह्मणों को परमपिता परमात्मा बैठ पढ़ाते हैं। परमात्मा ने आकर यह ब्रह्मा मुख वंशावली रची है। जब चक्र पूरा हो संगम होता है तो बाप आकर पतित दुनिया की अन्त और पावन दुनिया की आदि करते हैं। तो जरूर संगम पर ही आना पड़े। पावन बनने में टाइम लगता है। आधाकल्प से सिर पर पापों का बोझा है। योग अग्नि से जो आत्मा में खाद पड़ी है वह निकलती है। तुमको सतोप्रधान बनना है। हम जो पतित बने हैं, याद से ही हम पावन बनते जायेंगे। कितना सहज है। हमको फिर से 84 जन्मों का चक्र लगाना है। बच्चों को यह नॉलेज मिली है। बाप भी कहते हैं हम तुमको फिर से राजयोग सिखलाने आये हैं। बाप वर्सा देते हैं, रावण श्राप देते हैं। यह बाप ही बैठ समझाते हैं। इस समय बाप आकर सब मनोकामनायें पूरी करते हैं। अशुभ कामनायें तो माया पूरी करती है। आजकल रिद्धि सिद्धि वाले बहुत पैसा कमाते हैं। वह कामनायें माया पूरी करती है, उनकी भी किताब आदि होती है। तुमको तो कोई किताब नहीं, शास्त्र आदि नहीं पढ़ना है। तुम्हें बाप की श्रीमत है-बच्चे पावन बनो और पावन बनाओ, तुम्हें कभी पतित नहीं बनना है। तुम्हारी यह डिपार्टमेंट ही अलग है। कल्प पहले जो आकर ब्राह्मण बने होंगे वही पुरूषार्थ करेंगे। देवताओं का देखो कैसे सैपलिंग लग रहा है। ब्राह्मण बनते जाते हैं। जो थोड़ा भी सुनकर जाते तो प्रजा में आ जायेंगे। राजधानी में आ जायेंगे ना। मौत सामने खड़ा है। खिटपिट थोड़ा जोर भी भर सकती है, बन्द भी हो सकती है। बुद्धि कहती है कि अजुन अभी थोड़ा देरी है। राजधानी अभी कहाँ स्थापन हुई है। राजाओं, सन्यासियों आदि को अजुन ज्ञान कहाँ दिया है। विवेक कहता है – विनाश में थोड़ा देरी है। बाकी रिहर्सल होती रहेगी। वन्डर है ना। वह यज्ञ रचते हैं – लड़ाई बन्द करने के लिए और भगवान ने यज्ञ रचा है सारी दुनिया का परिवर्तन करने के लिए (विनाश के लिए) थोड़ा शान्ति होगी तो कहेंगे हमने यज्ञ रचा इसलिए शान्ति हो गई। एक बार यज्ञ सफल हुआ तो चलता रहेगा। बरसात के लिए यज्ञ रचा, बारिष हुई तो खुशी होगी। बारिष नहीं होगी तो कहेंगे ईश्वर की भावी। जैसे कोई शरीर छोड़ता है तो कहते हैं स्वर्गवासी हुआ। फिर तो शोक करने की दरकार ही नहीं है। स्वर्ग पधारा तो अहो सौभाग्य समझो ना। माया रावण ने सबकी बुद्धि को ताला लगा दिया है। तुम जानते हो – हम कल्प पहले मुआफिक फिर से पुरूषार्थ कर रहे हैं।

भारत अविनाशी खण्ड है और कोई दूसरा धर्म नहीं था। यह तो बाद में इन्हों ने निकाले हैं। यह भी ड्रामा की भावी कहेंगे। रक्त की नदियां यहाँ ही बहती हैं। एक दो में लड़ते रहते हैं। भल भाई-भाई होकर बहुत समय से रहे पड़े हैं। परन्तु हिन्दू और मुसलमान धर्म तो अलग-अलग है ना। वह आये ही बाद में हैं तो लड़ाई इन्हों की आपस में है। तुम्हारा इससे कोई तैलुक नहीं है। तुमको अपनी सर्विस में तत्पर रहना है। सिर्फ तीन पैर पृथ्वी ले यह रूहानी हॉस्पिटल खोलना है। फिर धीरे-धीरे वृद्धि होती जायेगी। बूँद बूँद से तलाव ऐसे होगा ना। घर में भी यह चित्र रखो। बेहद के बाप से 21 जन्मों का वर्सा कैसे पा सकते हो – आओ तो समझायें। मौत तो सामने खड़ा है। अब सिर्फ बेहद के बाप और वर्से को याद करो, इनको मृत्युलोक कहा जाता है। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो मैं तुमको साथ ले जाऊंगा। तब तो कहते हैं ना – मैं कालों का काल महाकाल हूँ। अकाल तख्त है ना। तुम अकाल आत्मा हो। बच्चे समझते हैं कि हम इस दुनिया से बिल्कुल न्यारे हैं। यहाँ पढ़ाने वाला विचित्र है। आत्माओं से बात करते हैं। आत्मा ही सुनती है, आत्मा ही इस मुख द्वारा सुना रही है। आत्मा इन कानों द्वारा सुन रही है। हम आत्मा इस शरीर से यह करते हैं। आत्मा को रसना मिलती है। आत्मा ही कहती है – यह मीठा है, यह खट्टा है। आत्मा में ही संस्कार रहते हैं। आत्माओं को बाप कहते हैं – अब घर वापिस जाना है। तुमने 84 जन्म लिए हैं, अब यह शरीर छोड़ना है, इनसे ममत्व निकालना है। सर्प भी ममत्व नहीं रखता है। पुरानी खल छोड़ नई ले लेते हैं। तुम्हारी भी यह पुरानी खल है, इसको ऐसे ही छोड़ देना है। भ्रमरी का भी मिसाल तुम्हारे से लगता है। वास्तव में सन्यासी यह मिसाल दे नहीं सकते। इस पतित दुनिया में सब विकारी कीड़े हैं। तुम ब्राह्मणियां उन्हों को भूँ भूँ कर पतित से पावन बनाती हो। कहती हो शिवबाबा को याद करो। मनुष्य को देवता बनाने की जादूगरी है। जादूगर, सौदागर, रतनागर यह सब उनके नाम हैं।

अच्छा बच्चों को समझाते तो बहुत हैं। फिर भी कहते हैं बाप और वर्से को याद करो। बाप कहते हैं अगर तुम एक बार मुझ पर बलिहार जायेंगे तो मैं 21 बार तुम पर बलिहार जाऊंगा। यह सौदा तो अच्छा है ना। शिवबाबा तो दाता है। तुमको युक्ति बतलायेंगे कि ममत्व कैसे निकालो। गृहस्थ व्यवहार में रहते श्रीमत पर चलो, इसमें पवित्रता है फर्स्ट। यह रूहानी यात्रा है। सारा मदार यात्रा पर है। मनुष्य तो ढ़ेर के ढ़ेर जिस्मानी यात्रायें करते रहते हैं। तुम्हारी एक ही रूहानी यात्रा है, जो रूह बैठ रूहों को सिखलाते हैं। इसमें सारी बुद्धि की बात है। तुम बच्चों के पास दु:ख आ नहीं सकता। तुम जानते हो इतना बड़ा विनाश हमारे लिए हो रहा है। तो तुम्हें अन्दर में ह्रास (दु:ख) नहीं आ सकता। अगर आता है तो कच्चे हैं, ज्ञान की पूरी अवस्था नहीं है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) शरीर रूपी पुरानी खाल से ममत्व निकाल देना है। बुद्धि से रूहानी यात्रा पर तत्पर रहना है।

2) पुरानी दुनिया की किसी भी बात से तैलुक न रख, ज्ञान चिता पर बैठ पावन बन बाप से पूरा वर्सा लेना है।

वरदान:- अपने पूज्य स्वरूप की स्मृति से सदा रूहानी नशे में रहने वाले जीवनमुक्त भव 
ब्राह्मण जीवन का मजा जीवनमुक्त स्थिति में है। जिन्हें अपने पूज्य स्वरूप की सदा स्मृति रहती है उनकी आंख सिवाए बाप के और कहाँ भी डूब नहीं सकती। पूज्य आत्माओं के आगे स्वयं सब व्यक्ति और वैभव झुकते हैं। पूज्य किसी के पीछे आकर्षित नहीं हो सकते। देह, सम्बन्ध, पदार्थ वा संस्कारों में भी उनके मन-बुद्धि का झुकाव नहीं रहता। वे कभी किसी बंधन में बंध नहीं सकते। सदा जीवनमुक्त स्थिति का अनुभव करते हैं।
स्लोगन:- सच्चा सेवाधारी वह है जो निमित्त और निर्माण है।

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