daily murli 28 november

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 28 NOVEMBER 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 28 November 2020

Murli Pdf for Print : – 

28-11-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम दिल से बाबा-बाबा कहो तो खुशी में रोमांच खड़े हो जायेंगे, खुशी में रहो तो मायाजीत बन जायेंगे”
प्रश्नः- बच्चों को किस एक बात में मेहनत लगती है लेकिन खुशी और याद का वही आधार है?
उत्तर:- आत्म-अभिमानी बनने में ही मेहनत लगती है लेकिन इसी से खुशी का पारा चढ़ता है, मीठा बाबा याद आता है। माया तुम्हें देह-अभिमान में लाती रहेगी, रूसतम से रूसतम होकर लड़ेगी, इसमें मूंझना नहीं। बाबा कहते बच्चे माया के तूफानों से डरो मत, सिर्फ कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म नहीं करो।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप रूहानी बच्चों को समझा रहे हैं वा शिक्षा दे रहे हैं, पढ़ा रहे हैं। बच्चे जानते हैं पढ़ाने वाला बाप सदैव देही-अभिमानी है। वह है ही निराकार, देह लेता ही नहीं है। पुनर्जन्म में नहीं आते हैं। बाप समझाते हैं तुम बच्चों को मेरे समान अपने को आत्मा समझना है। मैं हूँ परमपिता। परमपिता को देह होती नहीं। उनको देही-अभिमानी भी नहीं कहेंगे। वह तो है ही निराकार। बाप कहते हैं मुझे अपनी देह नहीं हैं। तुमको तो देह मिलती आई है। अब मेरे समान देह से न्यारा हो अपने को आत्मा समझो। अगर विश्व का मालिक बनना है तो और कोई डिफीकल्ट बात है नहीं। बाप कहते हैं देह-अभिमान को छोड़ मेरे समान बनो। सदैव बुद्धि में याद रहे हम आत्मा हैं, हमको बाबा पढ़ा रहे हैं। बाप तो निराकार है, परन्तु हमको पढ़ाये कैसे? इसलिए बाबा इस तन से आकर पढ़ाते हैं। गऊ मुख दिखाते हैं ना। अब गऊ के मुख से तो गंगा नहीं निकल सकती। माता को भी गऊ माता कहा जाता है। तुम सब गऊ हो। यह (ब्रह्मा) तो गऊ नहीं है। मुख द्वारा ज्ञान मिलता है। बाप की गऊ तो नहीं है ना – बैल पर भी सवारी दिखाते हैं। वह तो शिव-शंकर एक कह देते हैं। तुम बच्चे अभी समझते हो शिव-शंकर एक नहीं है। शिव तो है ऊंच ते ऊंच फिर ब्रह्मा-विष्णु-शंकर। ब्रह्मा है सूक्ष्मवतनवासी। तुम बच्चों को विचार सागर मंथन कर प्वाइंट निकाल समझाना पड़ता है, और निडर भी बनना है। तुम बच्चों को ही खुशी है। तुम कहेंगे हम ईश्वर के स्टूडेण्ट हैं, हमको बाबा पढ़ाते हैं। भगवानुवाच भी है-हे बच्चे, मैं तुमको राजाओं का राजा बनाने के लिए पढ़ाता हूँ। भल कहाँ भी जाते हो, सेन्टर्स पर जाते हो, बुद्धि में है कि बाबा हमको पढ़ाते हैं। जो अभी हम सेन्टर्स पर सुनते हैं, बाबा मुरली चलाते हैं। बाबा, बाबा करते रहो। यह भी तुम्हारी यात्रा हुई। योग अक्षर शोभता नहीं। मनुष्य अमरनाथ, बद्रीनाथ यात्रा करने पैदल जाते हैं। अभी तुम बच्चों को तो जाना है अपने घर। तुम जानते हो अब यह बेहद का नाटक पूरा होता है। बाबा आया हुआ है, हमको लायक बनाकर ले जाने के लिए। तुम खुद कहते हो हम पतित हैं। पतित थोड़ेही मुक्ति को पायेंगे। बाप कहते हैं-हे आत्माओं, तुम पतित बने हो। वह शरीर को पतित समझ गंगा में स्नान करने जाते हैं। आत्मा को तो वह निर्लेप समझ लेते हैं। बाप समझाते हैं – मूल बात है ही आत्मा की। कहते भी हैं पाप आत्मा, पुण्य आत्मा। यह अक्षर अच्छी रीति याद करो। समझना और समझाना है। तुमको ही भाषण आदि करना है। बाप तो गांव-गांव में, गली-गली में नहीं जायेंगे। तुम घर-घर में यह चित्र रख दो। 84 का चक्र कैसे फिरता है। सीढ़ी में बड़ा क्लीयर है। अब बाप कहते हैं – सतोप्रधान बनो। अपने घर जाना है, पवित्र बनने बिगर तो घर जायेंगे नहीं। यही फुरना लगा रहे। बहुत बच्चे लिखते हैं, बाबा हमको बहुत तूफान आते हैं। मन्सा में बहुत खराब ख्यालात आते हैं। आगे नहीं आते थे।

बाप कहते हैं तुम यह ख्याल नहीं करो। आगे कोई तुम युद्ध के मैदान में थोड़ेही थे। अभी तुमको बाप की याद में रह माया पर जीत पानी है। यह घड़ी-घड़ी याद करते रहो। गांठ बांध लो। जैसे मातायें गांठ बांध लेती हैं, पुरूष लोग फिर नोट बुक में लिखते हैं। तुम्हारा तो यह बैज अच्छी निशानी है। हम प्रिन्स बनते हैं, यह है ही बेगर टू प्रिन्स बनने की गॉडली युनिवर्सिटी। तुम प्रिन्स थे ना। श्रीकृष्ण वर्ल्ड का प्रिन्स था। जैसे इंगलैण्ड का भी प्रिन्स ऑफ वेल्स कहा जाता है। वह हैं हद की बातें, राधे-कृष्ण तो बहुत नामीग्रामी है। स्वर्ग के प्रिन्स-प्रिन्सेज थे ना इसलिए उन्हों को सभी प्यार करते हैं। श्रीकृष्ण को तो बहुत प्यार करते हैं। करना तो दोनों को चाहिए। पहले तो राधे को करना चाहिए। परन्तु बच्चे पर जास्ती प्यार रहता है क्योंकि वह वारिस बनता है। स्त्री का भी पति पर प्यार रहता है। पति के लिए ही कहते हैं यह तुम्हारा गुरू ईश्वर है। स्त्री के लिए ऐसे नहीं कहेंगे। सतयुग में तो माताओं की महिमा है। पहले लक्ष्मी फिर नारायण। अम्बा का कितना रिगार्ड रखते हैं। ब्रह्मा की बेटी है। ब्रह्मा का इतना नहीं है, ब्रह्मा का मन्दिर अजमेर में हैं। जहाँ मेले आदि लगते हैं। अम्बा के मन्दिर में भी मेला लगता है। वास्तव में यह सब मेले मैला बनाने के लिए ही हैं। तुम्हारा यह मेला है स्वच्छ बनने का। स्वच्छ बनने के लिए तुमको स्वच्छ बाप को याद करना है। पानी से कोई पाप नाश नहीं होते हैं। गीता में भी भगवानुवाच है मनमनाभव। आदि और अन्त में यह अक्षर हैं। तुम बच्चे जानते हो हमने ही पहले-पहले भक्ति शुरू की है। सतोप्रधान भक्ति फिर सतो-रजो-तमो भक्ति होती है। अभी तो देखो मिट्टी पत्थर आदि सबकी करते हैं। यह सब है अन्धश्रद्धा। इस समय तुम संगम पर बैठे हो। यह उल्टा झाड़ है ना। ऊपर में है बीज। बाप कहते हैं इस मनुष्य सृष्टि का बीज रचता मैं हूँ। अभी नई दुनिया की स्थापना कर रहे हैं। सैपलिंग लगाते हैं ना। झाड़ के पुराने पत्ते झड़ जाते हैं। नये-नये पत्ते निकलते हैं। अभी बाप देवी-देवता धर्म की स्थापना कर रहे हैं। बहुत पत्ते हैं जो मिक्स हो गये हैं। अपने को हिन्दू कहलाते हैं। वास्तव में हिन्दू हैं ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले। हिन्दुस्तान का वास्तव में नाम ही है भारत, जहाँ देवतायें रहते थे। और किसी देश का नाम नहीं बदलता, इनका नाम बदल दिया है। हिन्दुस्तान कह देते हैं। बौद्धी लोग ऐसे नहीं कहेंगे कि हमारा धर्म जापानी वा चीनी है। वह तो अपने धर्म को बौद्धी ही कहेंगे। तुम्हारे में कोई भी अपने को आदि सनातन देवी-देवता धर्म का नहीं कहते हैं। अगर कोई कहे भी तो बोलो वह धर्म कब और किसने स्थापन किया? कुछ भी बता नहीं सकेंगे। कल्प की आयु ही लम्बी-चौड़ी कर दी है, इसको कहा जाता है अज्ञान अन्धेरा। एक तो अपने धर्म का पता नहीं, दूसरा लक्ष्मी-नारायण के राज्य को बड़ा दूर ले गये हैं इसलिए घोर अन्धियारा कहा जाता है। ज्ञान और अज्ञान में कितना फर्क है। ज्ञान सागर है ही एक शिवबाबा। उनसे जैसे एक लोटा देते हैं। सिर्फ किसको यह सुनाओ कि शिवबाबा को याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। यह जैसे चुल्लु पानी हुआ ना। कोई तो स्नान करते हैं, कोई घड़ा भर ले जाते हैं। कोई छोटी-छोटी लोटी ले जाते हैं। रोज़ एक-एक बूंद मटके में डाल उसको ज्ञान जल समझ पीते हैं। विलायत में भी वैष्णव लोग गंगा जल के घड़े भरकर ले जाते हैं। फिर मंगाते रहते हैं। अब यह तो सारा पानी पहाड़ों से ही आता है। ऊपर से भी पानी गिराते हैं। आजकल देखो मकान भी कितने ऊंचे 100 मंजिल तक के बनाते हैं। सतयुग में तो ऐसे नहीं होगा। वहाँ तो तुमको जमीन इतनी मिलती है बात मत पूछो। यहाँ रहने के लिए जमीन नहीं है, तब इतने मंजिल बनाते हैं। वहाँ अनाज भी अथाह पैदा होता है। जैसे अमेरिका में बहुत अनाज होता है तो जला देते हैं। यह है मृत्युलोक। वह है अमरलोक। आधाकल्प वहाँ तुम सुख में रहते हो। काल अन्दर घुस न सके। इस पर एक कथा भी है। यह है बेहद की बात। बेहद की बातों से फिर हद की कथायें बैठ बनाई हैं। ग्रंथ पहले कितना छोटा था। अब तो कितना बड़ा कर दिया है। शिवबाबा कितना छोटा है, उनकी भी कितनी बड़ी प्रतिमा बना दी है। बुद्ध के चित्र, पाण्डवों के चित्र बड़े-बड़े लम्बे बनाये हैं। ऐसे तो कोई होते नहीं। तुम बच्चों को तो यह एम ऑब्जेक्ट का चित्र घर-घर में रखना चाहिए। हम पढ़कर यह बन रहे हैं। फिर रोना थोड़ेही चाहिए। जो रोते हैं वह खोते हैं। देह-अभिमान में आ जाते हैं। तुम बच्चों को आत्म-अभिमानी बनना है, इसमें ही मेहनत लगती है। आत्म-अभिमानी बनने से ही खुशी का पारा चढ़ता है। मीठा बाबा याद आता है। बाबा से हम स्वर्ग का वर्सा ले रहे हैं। बाबा हमको इस भाग्यशाली रथ में आकर पढ़ाते हैं। रात-दिन बाबा-बाबा याद करते रहो। तुम आधाकल्प के आशिक हो। भक्त भगवान को याद करते हैं। भक्त हैं अनेक। ज्ञान में सब एक बाप को याद करते हैं। वही सबका बाप है। ज्ञान सागर बाप हमको पढ़ाते हैं, तुम बच्चों के तो रोमांच खड़े हो जाने चाहिए। तूफान तो माया के आयेंगे ही। बाबा कहते हैं – सबसे जास्ती तूफान तो मुझे आते हैं क्योंकि सबसे आगे मैं हूँ। हमारे पास आते हैं तब तो मैं समझता हूँ – बच्चों के पास कितने आते होंगे। मूँझते होंगे। अनेक प्रकार के तूफान आते हैं जो अज्ञान काल में भी कभी नहीं आते होंगे, वह भी आते हैं। पहले मुझे आने चाहिए, नहीं तो मैं बच्चों को समझाऊंगा कैसे। यह है फ्रन्ट में। रूसतम है तो माया भी रूसतम से रूसतम होकर लड़ती है। मल्लयुद्ध में सब एक जैसे नहीं होते हैं। फर्स्ट, सेकण्ड, थर्ड ग्रेड होती है। बाबा के पास सबसे जास्ती तूफान आते हैं, इसलिए बाबा कहते हैं इन तूफानों से डरो मत। सिर्फ कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म नहीं करो। कई कहते हैं – ज्ञान में आये हैं तो यह क्यों होता है, इससे तो ज्ञान नहीं लेते तो अच्छा था। संकल्प ही नहीं आते। अरे यह तो युद्ध है ना। स्त्री के सामने होते भी पवित्र दृष्टि रहे, समझना है शिवबाबा के बच्चे हम भाई-भाई हैं फिर प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान होने से भाई-बहन हो गये। फिर विकार कहाँ से आया। ब्राह्मण हैं ऊंच चोटी। जो ही फिर देवता बनते हैं तो हम बहन-भाई हैं। एक बाप के बच्चे कुमार-कुमारी। अगर दोनों कुमार-कुमारी होकर नहीं रहते तो फिर झगड़ा होता है। अबलाओं पर अत्याचार होते हैं। पुरूष भी लिखते हैं हमारी स्त्री तो जैसे पूतना है। बड़ी मेहनत है। जवानों को तो बहुत मेहनत होती है। और जो गन्धर्वी विवाह कर इकट्ठे रहते, कमाल है उन्हों की। उन्हों का बहुत ऊंच पद हो सकता है। परन्तु जब ऐसी अवस्था धारण करें। ज्ञान में तीखे हो जाएं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) माया के तूफानों से डरना वा मूँझना नहीं हैं। सिर्फ ध्यान रखना है कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म न हो। ज्ञान सागर बाबा हमको पढ़ाते हैं – इसी खुशी में रहना है।

2) सतोप्रधान बनने के लिए आत्म अभिमानी बनने की मेहनत करनी है, ज्ञान का विचार सागर मंथन करना है, याद की यात्रा में रहना है।

वरदान:- श्रेष्ठ पुरूषार्थ द्वारा फाइनल रिजल्ट में फर्स्ट नम्बर लेने वाले उड़ता पंछी भव
फाइनल रिजल्ट में फर्स्ट नम्बर लेने के लिए :-1- दिल के अविनाशी वैराग्य द्वारा बीती हुई बातों को, संस्कार रूपी बीज को जला दो। 2-अमृतवेले से रात तक ईश्वरीय नियमों और मर्यादाओं का सदा पालन करने का व्रत लो और 3-मन्सा द्वारा, वाणी द्वारा या सम्बन्ध सम्पर्क द्वारा निरन्तर महादानी बन, पुण्य आत्मा बन दान पुण्य करते रहो। जब ऐसा श्रेष्ठ हाई जम्प देने वाला पुरूषार्थ हो तब उड़ता पंछी बन फाइनल रिजल्ट में नम्बर वन बन सकेंगे।
स्लोगन:- वृत्ति द्वारा वायुमण्डल को पावरफुल बनाना यही लास्ट का पुरूषार्थ व सर्विस है।

TODAY MURLI 28 NOVEMBER 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 28 November 2020

28/11/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, say “Baba, Baba” from your hearts and you will have goose pimples of happiness. Stay in happiness and you will become conquerors of Maya.
Question: What one thing, which is the basis of happiness and remembrance, do children find hard work?
Answer: It takes effort to become soul conscious, but it is by becoming this that your mercury of happiness rises and you remember sweet Baba. Maya continues to make you body conscious. Maya becomes powerful with the powerful ones and fights them. However, you mustn’t be confused by this. Baba says: Children, don’t be afraid of the storms of Maya. Just don’t perform any sinful actions with your physical senses.

Om shanti. The spiritual Father explains to you spiritual children, that is, He gives you teachings and educates you. You children know that the Father who is teaching you is always soul conscious. He is incorporeal. He doesn’t take a body. He doesn’t come into rebirth. The Father explains: You children have to consider yourselves to be souls like Me. I am the Supreme Father. The Supreme Soul doesn’t have a body. You cannot say that He is soul conscious; He is incorporeal. The Father says: I do not have a body of My own. You have been continuously receiving bodies. Now, become like Me, detached from the body, and consider yourself to be a soul. If you want to become a master of the world, there is nothing more difficult than that. The Father says: Renounce body consciousness and become like Me. Always keep it in your intellects that you are souls and that Baba is teaching us. The Father is incorporeal, so how would He teach us? This is why Baba comes and teaches us through this body. They show Gaumukh (cow’s mouth). Now, how could the Ganges emerge from the mouth of a cow? Mothers are also called mother cows. You are all cows. This one (Brahma Baba) isn’t a cow. You receive knowledge through the mouth. The Father doesn’t have a cow; they show Him riding a bull. They also say: Shiva and Shankar are one. You children now understand that Shiva and Shankar are not the same. Shiva is the Highest on High; then there are Brahma, Vishnu and Shankar. That Brahma is a resident of the subtle region. You children have to churn the ocean of knowledge and extract points to explain and you also have to become fearless. Only you children have happiness. You say: We are students of God; Baba is teaching us. God speaks: O children, I teach you in order to make you into kings of kings. No matter where you go, to the centres or anywhere else, it is in your intellects that Baba is teaching you. Whatever you listen to at a centre is the murli spoken by Baba. Continue to say “Baba, Baba”. This is also your pilgrimage. The word “yoga” is not really appropriate. Human beings go on foot to pilgrimage places like Amarnath and Badrinath. You children now have to go back to your home. You know that this unlimited play is now coming to an end. Baba has come to make us worthy and to take us back. You yourselves say: We are impure. Impure beings cannot attain liberation. The Father says: O souls, you have become impure. They consider their bodies to be impure and go and bathe in the Ganges. They say that souls are immune to the effect of action. The Father explains: The main thing is the soul. It is said: Charitable soul and sinful soul. Remember these words very well. You have to understand this yourself and then make others understand. It is you who have to give lectures. The Father is not going to go from village to village and street to street. You should have these pictures in every home. How does the cycle of 84 births turn? It is very clear in the picture of the ladder. The Father says: Now become satopradhan. You have to go back home and you cannot go back without becoming pure. You should just have this one concern. Many children write to Baba: So many storms of Maya come to me. Very dirty thoughts come into my mind; they did not come before. The Father says: Don’t worry about it. Previously, you were not on a battlefield. You now have to stay in remembrance of the Father and gain victory over Maya. Remember this again and again. Tie a knot, just as mothers tie a knot and men write it in their notebooks. This badge of yours is a good symbol. We are becoming princes. This is the Godly university for changing from a beggar to a prince. You were prince, were you not? Shri Krishna was the prince of the world, just as in England there is the Prince of Wales. That is a limited matter. Radhe and Krishna are very famous. Because they were the prince and princess of heaven, everyone loves them. Shri Krishna is loved a great deal. Both of them should be loved. It should first be Radhe, but it is the male child who is loved more because he becomes the heir. A wife has love for her husband. It is of the husband that they say: He is your guru and your god. This is not said of the wife. In the golden age, the mothers are praised. First it is Lakshmi and then Narayan. There is so much regard for the goddess Amba; she is the daughter of Brahma. There is not as much regard for Brahma. There is a temple to Brahma in Ajmer where melas etc. take place. There are also melas in the temples to Amba. In fact, all of those melas are to make you dirty (mehla). This mela of yours is to make you clean. In order to become clean, you have to remember the clean (pure) Father. You cannot be absolved of your sins with water. The word of God, “Manmanabhav”, is mentioned in the Gita. It is mentioned at the beginning as well as at the end. You children know that it was we who started worshipping. There is satopradhan devotion, then sato, rajo and then tamo devotion. Look, they now even worship mud and stones! All of that is blind faith. At this time, you are sitting at the confluence. This is the inverted tree: the Seed is at the top. The Father says: I am the Creator and Seed of this human world tree. I am now establishing the new world. The sapling is being planted. Old leaves of a tree fall off and new leaves start to appear. The Father is now establishing the original, eternal, deity religion. There are many leaves who have become mixed (converted). They call themselves Hindus. In reality, Hindus belong to the original, eternal, deity religion. The original name of Hindustan is Bharat where the deities used to live. No other country’s name is changed, but they have changed this country’s name. They call it Hindustan. Buddhists do not say that their religion is Japanese or Chinese. They call their religion Buddhism. Here, too, none of them consider themselves to be part of the original, eternal, deity religion. If someone says that he is part of that religion, ask him: When was that religion established and who established it? He will not be able to tell you anything. The duration of the cycle has been elongated. That is said to be the darkness of ignorance. Firstly, they do not know about their religion. Secondly, the kingdom of Lakshmi and Narayan has been placed far away. That is why it is said to be extreme darkness. There is so much difference between knowledge and ignorance. The Ocean of Knowledge is Shiv Baba alone. It is just like giving an urn of water; simply to tell someone to remember Shiv Baba and his sins will be absolved is just like offering a handful of water. Some bathe in it (Ganges), and some take a pot of water. Some take small urns and some take even smaller urns. They pour a drop of water into a pot and consider it to be the water of knowledge and drink it. Vaishnavs also take this water of the Ganges in a container when they go abroad and they keep asking for more to be sent to them. Now, all of that water comes from the mountains. Water also falls from above. These days, buildings are built with 100 floors. It will not be like that in the golden age. There, you will have so much land, don’t even ask! Here, land is scarce and that is why they have to build so many floors. There, there is an abundance of grain as well. In America, when there is an abundance of grain, they have to burn it. This is the land of death. That is the land of immortality. For half the cycle, you remain happy there. Death cannot force itself in there. There is a story about this. These are unlimited matters. From these unlimited matters they have made up limited stories. Originally, the Granth was so small. It has now been made so big. Shiv Baba is so tiny and yet they have made such a big symbol of Him. Images of Buddha and the Pandavas have been made very large. There is no one like that. You children should keep a picture of the aim and objective in every house. We are becoming this by studying. Why then should you cry? Those who cry lose out. You become body conscious. You children have to become soul conscious; it is this that requires effort. Only by becoming soul conscious does the mercury of your happiness rise and sweet Baba is remembered. We are claiming our inheritance of heaven from Baba. Baba comes in this Lucky Chariot to teach us. Remember Baba day and night. You are lovers for half the cycle. Devotees remember God. There are many devotees. Everyone in knowledge remembers the one Father; He is the Father of all. You should have goose pimples that the Father, the Ocean of Knowledge, is teaching us. Storms of Maya will definitely come. Baba says: I have to face the maximum number of storms as I am in the forefront. Because storms come to me, I can understand how many storms must come to the children, how confused you must be. Many types of storm come, even those you never had in your days of ignorance. These storms first have to come to me. Otherwise, how would I be able to explain them to you children? This one is in the front. He is powerful and hence Maya also fights back in a powerful way. In wrestling, not all are the same. There are the firstsecond and third grades. Baba has the maximum number of storms and this is why he says: Do not be afraid of these storms. Just do not perform any sinful actions through your physical senses. Some say: Why do such things happen after we have come into knowledge? It would have been better if we had not taken knowledge; we wouldn’t have then had such thoughts. However, this is a war. Even when you are in front of a woman you should have pure vision. Understand that, as Shiv Baba’s children, you are brothers and then, as the children of Prajapita Brahma, you become brothers and sisters. So, where do the vices come from? Brahmins are the topknot who become deities and you are therefore brothers and sisters. Since you are both children of one father (Brahma), if you do not stay as a kumar and kumari, there will be fights. Innocent ones are assaulted. Men also write: My wife is like Putna (female devil). There is a lot of effort involved. Young ones have to make a lot of effort. Those who live together in a pure marriage – this is a wonder! They can attain a very high status. However, that can only happen when they adopt such a stage and become clever in knowledge. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Do not become afraid or confused because of the storms of Maya. Just pay attention not to perform sinful actions with your physical senses. Maintain the happiness that Baba, the Ocean of Knowledge, is teaching us.
  2. In order to become satopradhan, make effort to become soul conscious. Churn the ocean of knowledge and stay on the pilgrimage of remembrance.
Blessing: May you become a flying bird who claims a first number in the final result by making elevated effort.
In order to claim a first number in the final result: 1) With imperishable disinterest from the heart, burn away the things of the past and the seed of sanskars. 2) Make a vow always to observe the Godly disciplines and codes of conduct from amrit vela till night time. 3) Be a constantly great donor with your thoughts, your words and your relationships and connections, be a charitable soul and continue to give donations and perform charity. When you make such elevated effort to take such a high jump, you will then be able to become a flying bird and claim number one in the final result.
Slogan: To make the atmosphere powerful with your attitude is the last effort for service.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 28 NOVEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 28 November 2019

28-11-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – शिवबाबा आया है तुम्हारे सब भण्डारे भरपूर करने, कहा भी जाता है भण्डारा भरपूर काल कंटक दूर”
प्रश्नः- ज्ञानवान बच्चों की बुद्धि में किस एक बात का निश्चय पक्का होगा?
उत्तर:- उन्हें दृढ़ निश्चय होगा कि हमारा जो पार्ट है वह कभी घिसता-मिटता नहीं। मुझ आत्मा में 84 जन्मों का अविनाशी पार्ट नूँधा हुआ है, यही बुद्धि में ज्ञान है तो ज्ञानवान है। नहीं तो सारा ज्ञान बुद्धि से उड़ जाता है।

ओम् शान्ति। बाप आकर रूहानी बच्चों प्रति क्या कहते हैं? क्या सेवा करते हैं? इस समय बाप यह रूहानी पढ़ाई पढ़ाने की सेवा करते हैं। यह भी तुम जानते हो। बाप का भी पार्ट है, टीचर का भी पार्ट है और गुरू का भी पार्ट है। तीनों पार्ट अच्छे बजा रहे हैं। तुम जानते हो वह बाप भी है, सद्गति देने वाला गुरू भी है और सबके लिए है। छोटे, बड़े, बूढ़े, जवान सबके लिए एक ही है। सुप्रीम बाप, सुप्रीम टीचर है। बेहद की शिक्षा देते हैं। तुम कॉन्फ्रेन्स में भी समझा सकते हो कि हम सबकी बायोग्राफी को जानते हैं। परमपिता परमात्मा शिवबाबा की जीवन-कहानी को भी जानते हैं। नम्बरवार सब बुद्धि में याद होना चाहिए। सारा विराट रूप जरूर बुद्धि में रहता होगा। हम अभी ब्राह्मण बने हैं, फिर हम देवता बनेंगे फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बनेंगे। यह तो बच्चों को याद है ना। सिवाए तुम बच्चों के और किसको यह बातें याद नहीं होंगी। उत्थान और पतन का सारा राज़ बुद्धि में रहे। हम उत्थान में थे फिर पतन में आये, अब बीच में हैं। शूद्र भी नहीं हैं, पूरे ब्राह्मण भी नहीं बने हैं। अगर अभी पक्के ब्राह्मण हो तो फिर शूद्रपने की एक्ट न हो। ब्राह्मणों में भी फिर शूद्रपना आ जाता है। यह भी तुम जानते हो-कब से पाप शुरू किये हैं? जब से काम चिता पर चढ़े हो, तो तुम्हारी बुद्धि में सारा चक्र है। ऊपर में है परमपिता परमात्मा बाप, फिर तुम हो आत्मायें। यह बातें तुम बच्चों की बुद्धि में जरूर याद रहनी चाहिए। अभी हम ब्राह्मण हैं, देवता बन रहे हैं फिर वैश्य, शूद्र डिनायस्टी में आयेंगे। बाप आकरके हमको शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं फिर हम ब्राह्मण से देवता बनेंगे। ब्राह्मण बन कर्मातीत अवस्था को प्राप्त कर फिर वापिस जायेंगे। तुम बाप को भी जानते हो। बाजोली वा 84 के चक्र को भी तुम जानते हो। बाजोली से तुमको बहुत इज़ी कर समझाते हैं। तुमको बहुत हल्का बनाते हैं ताकि अपने को बिन्दी समझ और झट भागेंगे। स्टूडेन्ट क्लास में बैठे रहते हैं तो बुद्धि में स्टडी ही याद रहती है। तुमको भी यह पढ़ाई याद रहनी चाहिए। अभी हम संगमयुग पर हैं फिर ऐसे चक्र लगायेंगे। यह चक्र सदैव बुद्धि में फिरता रहना चाहिए। यह चक्र आदि का नॉलेज तुम ब्राह्मणों के पास ही है, न कि शूद्रों के पास। देवताओं के पास भी यह ज्ञान नहीं है। अभी तुम समझते हो भक्ति मार्ग में जो चित्र बने हैं सब डिफेक्टेड हैं। तुम्हारे पास हैं एक्यूरेट क्योंकि तुम एक्यूरेट बनते हो। अभी तुमको ज्ञान मिला है तब समझते हो भक्ति किसको कहा जाता है, ज्ञान किसको कहा जाता है? ज्ञान देने वाला बाप ज्ञान का सागर अभी मिला है। स्कूल में पढ़ते हैं एम ऑबजेक्ट का मालूम तो पड़ता है ना। भक्ति मार्ग में तो एम ऑबजेक्ट होती नहीं। यह थोड़ेही तुमको मालूम था कि हम ऊंच देवी-देवता थे फिर नीचे गिरे हैं। अब जब ब्राह्मण बने हो तब पता पड़ा है। ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ जरूर आगे भी बने थे। प्रजापिता ब्रह्मा का नाम तो बाला है। प्रजापिता तो मनुष्य है ना। उनके इतने ढेर बच्चे हैं जरूर एडाप्टेड होने चाहिए। कितने एडाप्टेड हैं। आत्मा के रूप में तो सब भाई-भाई हो। अभी तुम्हारी बुद्धि कितनी दूर जाती है। तुम जानते हो जैसे ऊपर में स्टॉर्स खड़े हैं। दूर से कितने छोटे दिखाई पड़ते हैं। तुम भी बहुत छोटी-सी आत्मा हो। आत्मा कभी छोटी-बड़ी नहीं होती है। हाँ, तुम्हारा मर्तबा बहुत ऊंच है। उनको भी सूर्य देवता, चन्द्रमा देवता कहते हैं। सूर्य बाप, चन्द्रमा माँ कहेंगे। बाकी आत्मायें सब हैं नक्षत्र सितारे। तो आत्मायें सब एक जैसी छोटी हैं। यहाँ आकर पार्टधारी बनती हैं। देवतायें तो तुम ही बनते हो।

हम बहुत पावरफुल बन रहे हैं। बाप को याद करने से हम सतोप्रधान देवता बन जायेंगे। नम्बरवार थोड़ा-थोड़ा फ़र्क तो रहता है। कोई आत्मा पवित्र बन सतोप्रधान देवता बन जाती है, कोई आत्मा पूरा पवित्र नहीं बनती है। ज्ञान को ज़रा भी नहीं जानती है। बाप ने समझाया है बाप का परिचय तो जरूर सबको मिलना चाहिए। पिछाड़ी में बाप को तो जानेंगे ना। विनाश के समय सभी को पता पड़ता है बाप आया हुआ है। अभी भी कोई-कोई कहते हैं भगवान जरूर कहाँ आया हुआ है परन्तु पता नहीं पड़ता। समझते कोई भी रूप में आ जायेगा। मनुष्य मत तो बहुत है ना, तुम्हारी है एक ही ईश्वरीय मत। तुम ईश्वरीय मत से क्या बनते हो? एक है मनुष्य मत, दूसरी है ईश्वरीय मत और तीसरी है देवता मत। देवताओं को भी मत किसने दी? बाप ने। बाप की श्रीमत है ही श्रेष्ठ बनाने वाली। श्री श्री बाप को ही कहेंगे, न कि मनुष्य को। श्री श्री ही आकर श्री बनाते हैं। देवताओं को श्रेष्ठ बनाने वाला बाप ही है, उनको श्री श्री कहेंगे। बाप कहते हैं मैं तुमको ऐसा लायक बनाता हूँ। उन लोगों ने फिर अपने पर श्री श्री का टाइटिल रख दिया है। कॉन्फ्रेन्स में भी तुम समझा सकते हो। तुम ही समझाने लिए निमित्त बने हुए हो। श्री श्री तो है ही एक शिवबाबा जो ऐसा श्री देवता बनाते हैं। वो लोग शास्त्रों आदि की पढ़ाई पढ़कर टाइटिल ले आते हैं। तुमको तो श्री श्री बाप ही श्री अर्थात् श्रेष्ठ बना रहे हैं। यह है ही तमोप्रधान भ्रष्टाचारी दुनिया। भ्रष्टाचार से जन्म लेते हैं। कहाँ बाप का टाइटिल, कहाँ यह पतित मनुष्य अपने पर रखाते हैं। सच्ची-सच्ची श्रेष्ठ महान आत्मायें तो देवी-देवता हैं ना। सतोप्रधान दुनिया में कोई भी तमोप्रधान मनुष्य हो न सके। रजो में रजो मनुष्य ही रहेंगे, न कि तमो-गुणी। वर्ण भी गाये जाते हैं ना। अभी तुम समझते हो, आगे तो हम कुछ नहीं समझते थे। अब बाप कितना समझदार बनाते हैं। तुम कितना धनवान बनते हो। शिवबाबा का भण्डारा भरपूर है। शिवबाबा का भण्डारा कौन-सा है? (अविनाशी ज्ञान रत्नों का) शिवबाबा का भण्डारा भरपूर काल कंटक दूर। बाप तुम बच्चों को ज्ञान रत्न देते हैं। खुद है सागर। ज्ञान रत्नों का सागर है। बच्चों की बुद्धि बेहद में जानी चाहिए। इतनी करोड़ आत्मायें सब अपने-अपने शरीर रूपी तख्त पर विराजमान हैं। यह बेहद का नाटक है। आत्मा इस तख्त पर विराजमान होती है। तख्त एक न मिले दूसरे से। सबके फीचर्स अलग-अलग हैं, इनको कहा जाता है कुदरत। हर एक का कैसा अविनाशी पार्ट है। इतनी छोटी-सी आत्मा में 84 का रिकॉर्ड भरा हुआ रहता है। अति सूक्ष्म है। इससे सूक्ष्म वन्डर कोई हो नहीं सकता। इतनी छोटी आत्मा में सारा पार्ट भरा हुआ है, जो यहाँ ही पार्ट बजाती है। सूक्ष्मवतन में तो कोई पार्ट बजाती नहीं है। बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं। बाप द्वारा तुम सब-कुछ जान जाते हो। यही नॉलेज है। ऐसे नहीं कि सबके अन्दर को जानने वाला है। यह नॉलेज जानते हैं, जो नॉलेज तुम्हारे में भी इमर्ज हो रही है। जिस नॉलेज से ही तुम इतना ऊंच पद पाते हो। यह भी समझ रहती है ना। बाप है बीजरूप। उनमें झाड़ के आदि, मध्य, अन्त की नॉलेज है। मनुष्यों ने तो लाखों वर्ष आयु दे दी है, तो ज्ञान आ न सके। अभी तुमको संगम पर यह सारा ज्ञान मिल रहा है। बाप द्वारा तुम सारे चक्र को जान जाते हो। इनके पहले तुम कुछ नहीं जानते थे। अभी तुम संगम पर हो। यह है तुम्हारा अन्त का जन्म। पुरूषार्थ करते-करते फिर तुम पूरा ब्राह्मण बन जायेंगे। अभी नहीं हो। अभी तो अच्छे-अच्छे बच्चे भी ब्राह्मण से फिर शूद्र बन जाते हैं। इसको कहा जाता है माया से हार खाना। बाबा की गोद से हारकर रावण की गोद में चले जाते हैं। कहाँ बाप की श्रेष्ठ बनने की गोद, कहाँ भ्रष्ट बनने की गोद। सेकण्ड में जीवनमुक्ति। सेकण्ड में पूरी दुर्दशा हो जाती है। ब्राह्मण बच्चे अच्छी रीति जानते हैं-कैसे दुर्दशा हो जाती है। आज बाप के बनते, कल फिर माया के पंजे में आकर रावण के बन जाते हैं। फिर तुम बचाने की कोशिश करते हो तो कोई-कोई बच भी जाते हैं। तुम देखते हो डूबते हैं तो बचाने की कोशिश करते रहो। कितनी खिटखिट होती है।

बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। यहाँ स्कूल में तुम पढ़ते हो ना। तुमको मालूम है कैसे हम यह चक्र लगाते हैं। तुम बच्चों को श्रीमत मिलती है ऐसे-ऐसे करो। भगवानुवाच तो जरूर है। उनकी श्रीमत हुई ना। मैं तुम बच्चों को अब शूद्र से देवता बनाने आया हूँ। अभी कलियुग में हैं शूद्र सम्प्रदाय। तुम जानते हो कलियुग पूरा हो रहा है। तुम संगम पर बैठे हो। यह बाप द्वारा तुमको नॉलेज मिली है। शास्त्र जो भी बनाये हैं उन सबमें है मनुष्य मत। ईश्वर तो शास्त्र बनाते नहीं। एक गीता के ऊपर ही कितने नाम रख दिये हैं। गांधी गीता, टैगोर गीता आदि-आदि। ढेर नाम हैं। गीता को मनुष्य इतना क्यों पढ़ते हैं? समझते तो कुछ भी नहीं। अध्याय वही उठाकर अर्थ अपना-अपना करते रहते हैं। वह तो सब मनुष्यों के बनाये हुए हो गये ना। तुम कह सकते हो मनुष्य मत की बनाई हुई गीता पढ़ने से आज यह हाल हुआ है। गीता ही पहला नम्बर का शास्त्र है ना। वह है देवी-देवता धर्म का शास्त्र। यह तुम्हारा ब्राह्मण कुल है। यह भी ब्राह्मण धर्म है ना। कितने धर्म हैं, जिस-जिस ने जो धर्म रचा है उनका वह नाम चलता है। जैनी लोग महावीर कहते हैं। तुम बच्चे सब महावीर-महावीरनियां हो। तुम्हारा मन्दिर में यादगार है। राजयोग है ना। नीचे योग तपस्या में बैठे हैं, ऊपर में राजाई का चित्र है। राजयोग का एक्यूरेट मन्दिर है। फिर कोई ने क्या नाम रख दिया है, कोई ने क्या। यादगार है बिल्कुल एक्यूरेट, बुद्धि से काम ले ठीक बनाया है फिर जिसने जो नाम कहा वह रख दिया है। यह मॉडल रूप में बनाया है। स्वर्ग और राजयोग संगमयुग का बनाया हुआ है। तुम आदि, मध्य, अन्त को जानते हो। आदि को भी तुमने देखा है। आदि संगमयुग को कहो या सतयुग को कहो। संगमयुग की सीन नीचे दिखाते हैं फिर राजाई ऊपर में दिखाई है। तो सतयुग है आदि फिर मध्य में है द्वापर। अन्त को तुम देखते ही हो। यह सब खत्म हो जाना है। पूरा यादगार बना हुआ है। देवी-देवता ही फिर वाम मार्ग में जाते हैं। द्वापर से वाम मार्ग शुरू होता है। यादगार पूरा एक्यूरेट है। यादगार में बहुत मन्दिर बनाये हैं। यहाँ ही सब निशानियाँ हैं। मन्दिर भी यहाँ ही बनते हैं। देवी-देवता भारतवासी ही राज्य करके गये हैं ना। फिर बाद में कितने मन्दिर बनाते हैं। सिक्ख लोग बहुत होंगे तो वह अपना मन्दिर बना देंगे। मिलेट्री वाले भी अपना मन्दिर बना देते हैं। भारतवासी अपने कृष्ण का वा लक्ष्मी-नारायण का मन्दिर बनायेंगे। हनूमान, गणेश का बनायेंगे। यह सारा सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है, कैसे स्थापना, विनाश, पालना होती है-यह तुम ही जानते हो। इसको कहा जाता है अन्धियारी रात। ब्रह्मा का दिन और रात ही गाई जाती है क्योंकि ब्रह्मा ही चक्र में आते हैं। अभी तुम ब्राह्मण हो फिर देवता बनेंगे। मुख्य तो ब्रह्मा हुआ ना। ब्रह्मा को रखें या विष्णु को रखें! ब्रह्मा है रात का और विष्णु है दिन का। वही रात से फिर दिन में आते हैं। दिन से फिर 84 जन्मों के बाद रात में आते हैं। कितना सहज समझानी है। यह भी पूरा याद नहीं कर सकते। पूरी रीति नहीं पढ़ते हैं तो नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार पद पाते हैं। जितना याद करेंगे सतोप्रधान बनेंगे। सतोप्रधान सो भारत तमोप्रधान। बच्चों में कितना ज्ञान है। यह नॉलेज सिमरण करनी है। यह ज्ञान है ही नई दुनिया के लिए, जो बेहद का बाप आकर देते हैं। सब मनुष्य बेहद के बाप को याद करते हैं। अंग्रेज लोग भी कहते हैं ओ गॉड फादर लिब्रेटर, गाइड अर्थ तो तुम बच्चों की बुद्धि में है। बाप आकरके दु:ख की दुनिया आइरन एज से निकाल गोल्डन एज में ले जाते हैं। गोल्डन एज जरूर पास होकर गया है तब तो याद करते हैं ना। तुम बच्चों को अन्दर में बहुत खुशी रहनी चाहिए और दैवी कर्म भी करने चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप से जो अविनाशी ज्ञान रत्नों का अखुट खजाना मिल रहा है-उसे स्मृति में रख बुद्धि को बेहद में ले जाना है। इस बेहद नाटक में कैसे आत्मायें अपने-अपने तख्त पर विराजमान हैं-इस कुदरत को साक्षी हो देखना है।

2) सदा बुद्धि में याद रहे कि हम संगमयुगी ब्राह्मण हैं, हमें बाप की श्रेष्ठ गोद मिली है। हम रावण की गोद में जा नहीं सकते। हमारा कर्तव्य है-डूबने वालों को भी बचाना।

वरदान:- सेवा-भाव से सेवा करते हुए आगे बढ़ने और बढ़ाने वाले निर्विघ्न सेवाधारी भव
सेवा-भाव सफलता दिलाता है, सेवा में अगर अहम् भाव आ गया तो उसको सेवा-भाव नहीं कहेंगे। किसी भी सेवा में अगर अहम्-भाव मिक्स होता है तो मेहनत भी ज्यादा, समय भी ज्यादा लगता और स्वयं की सन्तुष्टी भी नहीं होती। सेवा-भाव वाले बच्चे स्वयं भी आगे बढ़ते और दूसरों को भी आगे बढ़ाते हैं। वे सदा उड़ती कला का अनुभव करते हैं। उनका उमंग-उत्साह स्वयं को निर्विघ्न बनाता और दूसरों का कल्याण करता है।
स्लोगन:- ज्ञानी तू आत्मा वह है जो महीन और आकर्षण करने वाले धागों से भी मुक्त है।

TODAY MURLI 28 NOVEMBER 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 28 November 2019

28/11/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, Shiv Baba has come to make all your treasure-stores completely full. It is said: When your treasure-stores are full, all sorrow is removed.
Question: What one faith is very firm in the intellects of knowledgeable children?
Answer: They have the firm faith that their parts will never be erased or wiped out. “I, the soul, have an imperishable part of 84 births fixed in me”. If you have this knowledge in your intellects, you are knowledgeable. Otherwise, all the knowledge disappears from your intellects.

Om shanti. What does the Father come and say to you spiritual children? What service does He do? At this time, the Father does the service of teaching you the spiritual study. You know this. He plays the part of the Father, the part of the Teacher and also the part of the Guru. He plays all three parts very well. You know that He is the Father and also the Guru who grants salvation to everyone. He is for everyone; for the young, the mature, the old and the adolescent, there is just the One. He is the Supreme Father and the Supreme Teacher. He gives unlimited teachings. You can explain at the conferences that you know the biography of everyone. You also know the biography of the Supreme Father, the Supreme Soul, Shiv Baba. Your intellects remember all of this, numberwise. The whole unlimited, variety-form image must surely be in your intellects. You have now become Brahmins and you will become deities, warriors, merchants and then shudras. You children remember this, do you not? Apart from you children, no one else would remember these things. Let the whole significance of the rise and fall, remain in your intellects. We were in the stage of rising and then went into the falling stage and we are now in the middle. We are no longer shudras but have not yet become complete Brahmins either. If we were firm Brahmins, we wouldn’t perform any shudra acts. Even Brahmins have some shudra traces. You know when you began committing sin: from the time you climbed onto the pyre of lust. You also have the whole cycle in your intellects. Up above is the Father, the Supreme Father, the Supreme Soul, and then there are you souls. You children should definitely keep these things in your intellects. We are now Brahmins and are becoming deities and we will then go into the merchant dynasty and the shudra dynasty. The Father comes and changes us from shudras to Brahmins and we then change from Brahmins to deities. We become Brahmins, attain our karmateet stage and then return home. You know the Father. You also know the somersault and the cycle of 84 births. Baba explains to you very easily using the example of the somersault. He makes you very light so that you can consider yourselves to be points and quickly run home. When students are sitting in class, they just have their studies in their intellects. You too should remember this study. We are now at the confluence age; we will then go around in this way. This cycle should constantly rotate in your intellects. Only you Brahmins have the knowledge of this cycle etc. Shudras do not have it. Even deities do not have this knowledge. You now understand that all the pictures that have been made on the path of devotion are defective. You have accurate pictures because you are becoming accurate. You have now received knowledge and this is why you understand what is referred to as devotion and what is referred to as knowledge. You have now found the Father, the Ocean of Knowledge, who gives you knowledge. When studying at school, you are aware of your aim and objective. On the path of devotion, there is no aim or objective. You didn’t know that you were elevated deities and that you then fell down. It is now you have become Brahmins that you know this. You definitely became Brahma Kumars and Kumaris previously too. The name of Prajapita Brahma is glorified. Prajapita is a human being. He has so many children, and so they must surely be adopted. So many are adopted. As souls, all are brothers. Your intellects now go so far. You know that just as there are stars up above, and they appear to be so small from a distance, so, you too are very tiny souls. A soul never becomes larger or smaller. Yes, your status is very high. They call them the sun deity and the moon deity. The Sun is said to be the Father and the moon is said to be the mother and all the other souls are stars of the sky. So, all souls are tiny and the same. Souls come here and become actors. Only you become deities. We are becoming very powerful. By remembering the Father, we will become satopradhan deities. There is a little difference, numberwise. Some souls become pure and become satopradhan deities, whereas other souls don’t become completely pure. They don’t have any knowledge at all. The Father has explained: Everyone definitely has to receive the Father’s introduction. At the end, they will know the Father. At the time of destruction, everyone will realise that the Father has come. Even now, some people say: “God has definitely come somewhere”, but they can’t tell where. They think that He could come in any form. There are many human dictates. Yours are only one – God’s directions. What are you becoming by following God’s directions? One are human dictates and next are God’s directions and third are the directions from the deities. Who gave directions to the deities? The Father. It is the Father’s shrimat that makes you elevated. Only the Father, and not human beings, is called Shri Shri. Shri Shri comes and makes you shri (elevated). It is only the Father who makes elevated deities. He is called Shri Shri. The Father says: I make you so worthy. Those people have then given themselves the title Shri Shri. You can explain at conferences. Only you have become the instruments to explain to them. Only the one Shiv Baba is Shri Shri who is making us into shri deities. Those people study the scriptures or other studies and receive a title. The Father who is Shri Shri is Himself making you shri, which means elevated. This is the tamopradhan, corrupt world. People take birth through corruption. There is such a great difference between the Father’s title and that title which those impure human beings give themselves. Truly elevated and great souls are deities. In the satopradhan world, there cannot be any tamopradhan human beings. In the rajo stage, there would only be human beings with the rajo stage, not tamoguni human beings. The clans are also remembered. You now understand this, but, previously, you didn’t understand anything. The Father is now making you so sensible. You are becoming so wealthy. Shiv Baba’s treasure-store is completely full. What is Shiv Baba’s treasure-store? (That of the imperishable jewels of knowledge.) Shiv Baba’s treasure store is completely full and all sorrow is removed. The Father is giving you children the jewels of knowledge. He Himself is the Ocean. He is the Ocean of the jewels of knowledge. The intellects of you children should go into the unlimited. All of those billions of souls are seated on the thrones of their bodies. This is an unlimited play. Souls are seated on those thrones. No two thrones are the same; each one’s features are different. This is called the wonder of nature. Each one has an imperishable part. Such tiny souls have parts of 84 births recorded within them. They are extremely subtle. There cannot be any wonder more subtle than this. Such tiny souls are filled with whole parts and those parts are played here. No part is played in the subtle region. The Father explains to you so well. You come to know everything from the Father. This is knowledge. It isn’t that He is the One who knows what is inside each one. He knows this knowledge and this knowledge is now emerging in you too; and, it is through this knowledge that you claim such a high status! You have this understanding, do you not? The Father is the Seed. He has the knowledge of the beginning, middle and end of the tree. Human beings have given it a duration of hundreds of thousands of years, and so they cannot have any knowledge. You are receiving all of this knowledge now at the confluence age. You have now come to know the whole cycle from the Father. Before this, you didn’t know anything. You are now at the confluence age and this is your final birth. By making effort, you will eventually become complete Brahmins. You are not that now. Now from Brahmins, even very good children become shudras once again. This is called being defeated by Maya. You become defeated in Baba’s lap and go into Ravan’s lap. There is such a difference between the Father’s lap in which you become elevated and the other lap in which you become corrupt. You receive liberation-in-life in a second and you reach a stage of complete degradation in a second. Brahmin children know very well how there is degradation. Today, you belong to the Father, and tomorrow, you are caught in the claws of Maya and belong to Ravan. Then, when you try to save them, some of them are saved. When you see that someone is drowning, you continue to try and save him. There is so much conflict. The Father sits here and explains to you children. You are studying here in school, are you not? You know how you go around this cycle. You children receive shrimat: Do this and this. There are definitely the versions of God. These are His elevated directions: I have now come to make you children into deities from shudras. Now, in the iron age, there is the shudra community. You know that the iron age is coming to an end and that you are sitting at the confluence age. You have received this knowledge from the Father. All the scriptures that have been created have human dictates in them. God does not write any scriptures. They have given so many names to just the one Gita: the Gandhi Gita, the Tagore Gita etc. There are so many names. Why do people study the Gita so much? They don’t understand anything at all. They just take up a few chapters and extract their own meanings from them. All of that is created by human beings. You can tell them: By your studying the Gita written by human beings, this has become the condition of today. The Gita is the number one scripture. This is the scripture of the deity religion. This is your Brahmin clan. This is also the Brahmin religion, is it not? There are so many religions. Whoever creates a religion, his name continues. The Jains speak of Mahavir. All of you children are mahavirs. Your memorial is in the Dilwala Temple. There is Raj Yoga, is there not? Down below, you are sitting in tapasya or yoga and, up on the ceiling, there are the pictures of the kingdom. That is an accurate temple of Raj Yoga. Then, some gave it one name and others gave it another name. The memorial is absolutely accurate. They have used their intellects and made it very well. Then, whatever name someone gave, they kept that name. That is a model that they have created. Heaven and Raj Yoga are created at the confluence age. You know the beginning, middle and end. You have also seen the beginning. You can call either the confluence age or the golden age the beginning. The scene of the confluence age is shown down below and the kingdom is shown up above. So, the golden age is the beginning and the copper age is the middle period. You are now seeing the end. All of this is to end. An accurate memorial has been created. The deities themselves go onto the path of sin. The path of sin begins with the copper age. The memorial is very accurate. They have created many temples as memorials. All the signs are here. Temples are created here too. The deities, the residents of Bharat, ruled and went away. Then, later, they built so many temples. When there are many Sikhs, they build their own temple. Those of the military also build their own temple. The people of Bharat build temples to Krishna, Lakshmi and Narayan, Hanuman and Ganesh. Look how the world cycle turns! How establishment, destruction and sustenance take place! Only you know this. This is called the dark night. The day and night of Brahma are remembered because it is Brahma who goes around the cycle. You are now Brahmins and will then become deities. The main one is Brahma. Should it be Brahma’s name or Vishnu’s name? Brahma exists in the night and Vishnu exists in the day. That same one goes from the night into the day. Then, from the day, after 84 births, he goes into the night. The explanation is so easy. Even that cannot be remembered fully. If you don’t study well, the status you claim is numberwise, according to your efforts. The more remembrance you have, the more satopradhan you will become. Satopradhan Bharat then becomes tamopradhan. You children have so much knowledge: you have to churn this knowledge. This knowledge is for the new world. The unlimited Father comes and gives it to you. All human beings remember the unlimited Father. English people say: O God, the Father, Liberator, Guide! You children have the meaning of these words in your intellects. The Father comes and removes you from the iron age, the world of sorrow, and takes you to the golden age. The golden age definitely passed,which is why they remember it. You children should have a lot of happiness inside you. You should also perform divine acts. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Keep in your awareness the infinite treasures of the imperishable jewels of knowledge that you receive from the Father and take your intellect into the unlimited. See as a detached observer the wonder of nature and how souls are seated on their own thrones in this unlimited play.
  2. Your intellect should always remember that we are confluence-aged Brahmins. We have received the elevated lap of the Father. We cannot go into Ravan’s lap. Our duty is to save those who are drowning.
Blessing: May you be an obstacle-free server who moves forward and enables others to move forward by doing service with the consciousness of serving.
The consciousness of serving brings you success. If there is any arrogant consciousness in your doing service, then that would not be said to be the consciousness of serving. If there is any arrogance mixed in service it then takes a lot of effort and a lot of time and you won’t have any contentment in yourself. The children who have the consciousness of serving move forward and also enable others to move forward. They constantly experience the flying stage. Their zeal and enthusiasm makes them free from obstacles and it also benefits others.
Slogan: Knowledgeable souls are those who are also free from fine and attractive threads.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 28 NOVEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 28 November 2018

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28-11-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – मनुष्य को देवता बनाने की सर्विस का तुम्हें बहुत-बहुत शौक होना चाहिए लेकिन इस सर्विस के लिए स्वयं में हड्डी धारणा चाहिए”
प्रश्नः- आत्मा मैली कैसे बनती है? आत्मा पर कौन सी मैल चढ़ती है?
उत्तर:- मित्र-सम्बन्धियों की याद से आत्मा मैली बन जाती है। पहले नम्बर का किचड़ा है देह-अभिमान का, फिर लोभ मोह का किचड़ा शुरू होता है, यह विकारों की मैल आत्मा पर चढ़ती है। फिर बाप की याद भूल जाती है, सर्विस नहीं कर सकते हैं।
गीत:- तुम्हारे बुलाने को जी चाहता है……. 

ओम् शान्ति। यह गीत बड़ा अच्छा है। बच्चे गैरन्टी भी करते हैं कि आपका सुन करके फिर यह ज्ञान सुनाने की दिल होती है। याद तो बच्चे करते हैं, यह भी जरूर है, कोई याद करते होंगे और मिले भी होंगे। कहा जाता है कोटों में कोई आकरके यह वर्सा लेते हैं। अभी तो बुद्धि बहुत विशाल हो गई है। जरूर पांच हजार वर्ष पहले भी बाप राजयोग सिखाने आया होगा। पहले-पहले तो यह समझाना है कि नॉलेज किसने सुनाई थी क्योंकि यही बड़ी भूल है। बाप ने समझाया है सर्व शास्त्रमई शिरोमणी गीता है भारतवासियों का शास्त्र। सिर्फ मनुष्य यह भूल गए हैं सर्व शास्त्रमई गीता किसने गाई और उससे कौन-सा धर्म स्थापन हुआ? बाकी गाते जरूर हैं – हे भगवान् आप आओ। भगवान् तो जरूर आते ही हैं – नई पावन दुनिया की रचना रचने। दुनिया का ही तो फादर है ना। भक्त गाते भी हैं – आप आओ तो सुख मिले या शान्ति मिले। सुख और शान्ति दो चीजें हैं। सतयुग में जरूर सुख भी है बाकी सब आत्माएं शान्ति देश में हैं। यह परिचय देना पड़े। नई दुनिया में नया भारत, राम राज्य था। उसमें सुख है, तब तो राम राज्य की महिमा है। उसको राम राज्य कहते हैं तो इनको रावण राज्य कहना पड़े क्योंकि यहाँ दु:ख है। वहाँ सुख है, बाप आकर सुख देते हैं। बाकी सबको शान्तिधाम में शान्ति मिल जाती है। शान्ति और सुख का दाता तो बाप है ना। यहाँ है अशान्ति, दु:ख। तो बुद्धि में यह ज्ञान टपकना चाहिए, इसमें अवस्था बड़ी अच्छी चाहिए। ऐसे तो छोटे बच्चों को भी सिखलाया जाता है परन्तु अर्थ तो समझा ना सकें, इसमें हड्डी धारणा चाहिए। जो कोई फिर प्रश्न पूछे तो समझा भी सकें। अवस्था अच्छी चाहिए। नहीं तो कभी देह-अभिमान में, कभी क्रोध, मोह में गिरते रहते हैं। लिखते भी हैं – बाबा, आज हम क्रोध में गिरा, आज हम लोभ में गिरा। अवस्था मजबूत हो जाती है तो गिरने की बात ही नहीं रहती। बहुत शौक रहता है – मनुष्य को देवता बनाने की सर्विस करें। गीत भी बड़ा अच्छा है – बाबा, आप आयेंगे तो हम बहुत सुखी हो जायेंगे। बाप को आना तो जरूर है। नहीं तो पतित सृष्टि को पावन कौन बनाए? कृष्ण तो देहधारी है। उनका वा ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का नाम नहीं ले सकते। गाते भी हैं पतित-पावन आओ तो उनसे पूछना चाहिए यह तुमने किसके लिए कहा? पतित-पावन कौन है और वह कब आयेगा? पतित-पावन वह है, उनको बुलाते हो तो जरूर यह पतित दुनिया है। पावन दुनिया सतयुग को कहा जाता है। पतित दुनिया को पावन कौन बनायेंगे? गीता में भी है बरोबर भगवान् ने ही राजयोग सिखाया और इन विकारों पर ही जीत पाई। काम महाशत्रु है। पूछना पड़ता है कि यह किसने कहा कि मैं राजयोग सिखाता हूँ, काम महाशत्रु है? यह किसने कहा कि मैं सर्वव्यापी हूँ? किस शास्त्र में लिखा हुआ है? किसके लिए कहा जाता है पतित-पावन? क्या पतित-पावनी गंगा है या और कोई है? गांधी जी भी कहते थे पतित-पावन आओ, गंगा तो हमेशा है ही। वह कोई नई नहीं है। गंगा को तो अविनाशी कहेंगे बाकी सिर्फ तमोगुणी तत्व बन जाते हैं तो उनमें चंचलता आ जाती है। बाढ़ कर देते हैं, अपना रास्ता छोड़ देते हैं। सतयुग में तो बड़ा रेग्युलर सब चलता है। कम जास्ती बारिश आदि नहीं पड़ सकती। वहाँ दु:ख की बात नहीं। तो बुद्धि में यह रहना चाहिए कि पतित-पावन हमारा बाबा ही है। पतित-पावन को जब याद करते हैं तो कहते हैं – हे भगवान्, हे बाबा। यह किसने कहा? आत्मा ने। तुम जानते हो पतित-पावन शिवबाबा आया हुआ है। निराकार अक्षर जरूर डालना है। नहीं तो साकार को मान लेते हैं। आत्मा पतित बनी हुई है, यह कह नहीं सकते कि सब ईश्वर हैं। अहम् ब्रह्मस्मि या शिवोहम् कहना बात एक ही है। लेकिन रचना का मालिक तो एक ही रचता है। भल मनुष्य और कोई लम्बा-चौड़ा अर्थ करेंगे, हमारी बात तो है ही सेकेण्ड की। सेकेण्ड में बाप का वर्सा मिलता है। बाप का वर्सा है स्वर्ग की राजाई। उनको जीवनमुक्ति कहा जाता है। यह है जीवनबंध। समझाना चाहिए – बरोबर जब आप आयेंगे तो जरूर हमको स्वर्ग का, मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा देंगे। तब ही लिखते हैं मुक्ति-जीवनमुक्ति दाता एक है। यह भी समझाना पड़े। सतयुग में है ही एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म। वहाँ दु:ख का नाम नहीं। वह है ही सुखधाम। सूर्यवंशी राज्य चलता है। फिर त्रेता में है चन्द्रवंशी राज्य। फिर द्वापर में ही इस्लामी, बौद्धी आयेंगे। सारा पार्ट नूंधा हुआ है। एक बिन्दी जैसी आत्मा में और परमात्मा में कितना पार्ट नूंधा हुआ है। शिव के चित्र में भी यह लिखना पड़ता है कि मैं ज्योतिर्लिंगम जितना बड़ा नहीं हूँ। मैं तो स्टॉर मिसल हूँ। आत्मा भी स्टॉर है, गाते भी हैं भृकुटी के बीच में चमकता है अजब सितारा…….. तो वह आत्मा ही ठहरी। मैं भी परमपिता परम आत्मा हूँ। परन्तु मैं सुप्रीम, पतित-पावन हूँ। मेरे गुण अलग हैं। तो गुण भी सब लिखने पड़ें। एक तरफ शिव की महिमा, दूसरे तरफ श्रीकृष्ण की महिमा। अपोजिट बातें हैं, अक्षर अच्छी रीति लिखना पड़े। जो मनुष्य अच्छी रीति से पढ़कर समझ सकें। स्वर्ग और नर्क, सुख और दु:ख, चाहे कृष्ण का दिन और रात कहो, चाहे ब्रह्मा का कहो। सुख और दु:ख कैसे चलता – यह तो तुम जानते हो। सूर्यवंशी हैं 16 कला, चन्द्रवंशी हैं 14 कला। वह सम्पूर्ण सतोप्रधान, वह सतो। सूर्यवंशी ही फिर चन्द्रवंशी बन जाते हैं। सूर्यवंशी फिर त्रेता में आयेंगे तो जरूर चन्द्रवंशी कुल में जन्म लेंगे। भल राजाई पद लेते हैं। यह बातें बुद्धि में अच्छी रीति बैठानी चाहिए। जो जितना याद में रहेगा, देही-अभिमानी होगा तो धारणा होगी। वह सर्विस भी अच्छी करेंगे। स्पष्ट कर किसको सुनायेंगे हम ऐसे बैठते हैं, ऐसे धारणा करते हैं, ऐसे समझाते हैं, ऐसे-ऐसे विचार सागर मंथन करते हैं – औरों को समझाने के लिए। सारा समय विचार सागर मंथन चलता रहेगा। जिनमें ज्ञान नहीं उनकी बात तो अलग है, धारणा नहीं होगी। धारणा होती है तो सर्विस करनी पड़े। अभी तो सर्विस बहुत बढ़ती जाती है। दिन-प्रतिदिन महिमा बढ़ती जायेगी। फिर तुम्हारी प्रदर्शनी में भी कितने आयेंगे। कितने चित्र बनाने पड़ेंगे। बहुत बड़ा मंडप बनाना पड़े। यूँ तो इसमें समझाने के लिए एकान्त चाहिए। हमारे मुख्य चित्र हैं ही झाड़, गोला और यह लक्ष्मी-नारायण का चित्र। राधे-कृष्ण के चित्र से इतना समझ नहीं सकते कि यह कौन हैं? इस समय तुम जानते हो कि हमको अब बाप ऐसा पावन बना रहे हैं। सब तो एक जैसे सम्पूर्ण नहीं बनेंगे। आत्मा पवित्र होगी बाकी ज्ञान थोड़ेही सब धारण करेंगे। धारणा नहीं होती तो समझा जाता है यह कम पद पायेंगे।

अभी तुम्हारी बुद्धि कितनी तीक्ष्ण हो गई है, नम्बरवार तो हर क्लास में होते ही हैं। कोई तीखे, कोई ढीले, यह भी नम्बरवार हैं। अगर कोई अच्छे आदमी को थर्ड ग्रेड समझाने वाले मिल जाएं तो वह समझेंगे यहाँ तो कुछ है ही नहीं इसलिए पुरुषार्थ किया जाता है कि अच्छे आदमी को समझाने वाला भी अच्छा दिया जाए। सब तो एक जैसे पास नहीं होंगे। बाबा के पास तो लिमिट है। कल्प-कल्प इस पढ़ाई की भी रिजल्ट निकलती है। मुख्य 8 पास होते हैं, फिर 100, फिर हैं 16 हजार, फिर प्रजा। उनमें भी साहूकार, गरीब, सब होते हैं। समझा जाता है – इस समय यह किस पुरुषार्थ में है? किस पद को पाने लायक है? टीचर को पता तो पड़ता है। टीचर्स में भी नम्बरवार होते हैं। कोई टीचर अच्छा है तो सब खुश हो जाते हैं कि यह पढ़ाते भी अच्छा हैं, प्यार भी अच्छा करते हैं। छोटे सेन्टर को बड़ा तो कोई बड़ा टीचर ही बनायेगा ना। कितना बुद्धि से काम लेना पड़ता है। ज्ञान मार्ग में अति मीठा बनना है। स्वीट तब बनेंगे, जब मीठे बाप के साथ पूरा योग होगा तो धारणा भी होगी। ऐसे मीठे बाबा से बहुतों का योग नहीं है। समझते ही नहीं – गृहस्थ व्यवहार में रहते बाप से पूरा योग लगाना है। माया के तूफान तो आयेंगे ही। कोई को पुराने मित्र-सम्बन्धी याद आयेंगे, कोई को क्या याद पड़ता रहेगा। तो मित्र-सम्बन्धियों आदि की याद आत्मा को मैला कर देती है। किचड़ा पड़ने से फिर घबरा जाते हैं, इसमें घबराना नहीं है। यह तो माया करेगी, किचड़ा पड़ेगा ही हमारे ऊपर। होली में किचड़ा पड़ता है ना। हम बाबा की याद में रहें तो किचड़ा नहीं रहेगा। बाप को भूले तो पहला नम्बर देह-अभिमान का किचड़ा पड़ेगा। फिर लोभ, मोह आदि सब आयेंगे। अपने लिए मेहनत करनी है, कमाई करनी है और फिर आप समान बनाने की मेहनत करनी है। सेन्टर्स पर सर्विस अच्छी होती है। यहाँ आते हैं तो कहते हैं हम जाकर प्रबन्ध करेंगे, सेन्टर खोलेंगे, यहाँ से गये ख़लास। बाबा खुद भी कह देते हैं तुम यह सब बातें भूल जायेंगे। यहाँ तो भट्टी में रहना पड़े, जब तक समझाने लायक हो जाएं। शिवबाबा का तो सबसे मीठा कनेक्शन है ना। समझ सकते हैं, किस प्रकार की सर्विस करते हैं। स्थूल सर्विस का इज़ाफा मिलता अवश्य है। बहुत हड्डी सर्विस करते हैं। परन्तु सब्जेक्ट तो हैं ना। उस पढ़ाई में भी सब्जेक्ट होते हैं। तो इस रूहानी पढ़ाई के भी सब्जेक्ट हैं। पहले नम्बर की सब्जेक्ट है याद, पीछे पढ़ाई। बाकी सब है गुप्त। इस ड्रामा को भी समझना पड़ता है। यह भी कोई को पता नहीं है कि 1250 वर्ष हर एक युग में हैं। सतयुग कितना समय था, अच्छा वहाँ कौन सा धर्म था? सबसे जास्ती जन्म यहाँ किसके होने चाहिए? बौद्धी, इस्लामी आदि इतने जन्म थोड़ेही लेंगे। किसकी बुद्धि में यह बातें नहीं हैं। शास्त्रवादियों से पूछना चाहिए कि तुम भगवानुवाच किसको कहते हो? सर्व शास्त्रमई शिरोमणी तो गीता है। भारत में पहले-पहले तो देवी-देवता धर्म था। उनका शास्त्र कौन-सा? गीता किसने गाई? कृष्ण भगवानुवाच तो हो ना सके। स्थापना और विनाश कराना तो भगवान् का ही काम है। कृष्ण को भगवान् नहीं कहेंगे। वह भला कब आया? अभी किस रूप में है? शिवबाबा के अपोजिट कृष्ण की महिमा जरूर लिखनी पड़ेगी। शिव है गीता का भगवान, उनसे श्रीकृष्ण को पद मिला। कृष्ण के 84 जन्म भी दिखाते हैं। पिछाड़ी में फिर ब्रह्मा का एडाप्टेड चित्र भी दिखाना पड़े। हमारी बुद्धि में जैसे 84 जन्मों की माला पड़ी हुई है। लक्ष्मी-नारायण के भी 84 जन्म जरूर दिखाने पड़े। रात को विचार सागर मंथन कर और ख्याल चलाना पड़ता है। सेकेण्ड में जीवनमुक्ति मिलती है। इसके लिए हम क्या लिखें? जीवनमुक्ति माना स्वर्ग में जाना। सो तो जब बाप स्वर्ग का रचयिता आये, उनके बच्चे बनें तब स्वर्ग के मालिक बनें। सतयुग है पुण्य आत्माओं की दुनिया। यह कलियुग है पाप आत्माओं की दुनिया। वह है निर्विकारी दुनिया। वहाँ माया रावण का राज्य ही नहीं है। भल वहाँ यह सारा ज्ञान नहीं रहता लेकिन हम आत्मा हैं, यह शरीर बूढ़ा हुआ, इसको अब छोड़ना है – यह तो ख्यालात रहते हैं ना। यहाँ तो आत्मा का भी ज्ञान कोई में नहीं है। बाप से जीवनमुक्ति का वर्सा मिलता है। तो याद भी उनको करना चाहिए ना। बाप फ़रमान करते हैं मनमनाभव। गीता में यह किसने कहा कि मनमनाभव? मुझे याद करो और विष्णुपुरी को याद करो – यह कौन कह सकता है? कृष्ण को तो पतित-पावन कह न सकें। 84 जन्मों का राज़ भी कोई थोड़ेही जानते हैं। तो तुम्हें सबको समझाना चाहिए। तुम इन बातों को समझकर अपना और सबका कल्याण करो तो तुम्हारा मान बहुत होगा। निडर हो जहाँ-तहाँ फिरते रहो। तुम हो बहुत गुप्त। भल ड्रेस बदल कर सर्विस करो। चित्र सदैव पास में हो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों का नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) मीठे बाप से पूरा योग लगाकर अति मीठा और देही-अभिमानी बनना है। विचार सागर मंथन कर पहले स्वयं धारणा करनी है फिर दूसरों को समझाना है।

2) अपनी अवस्था मजबूत बनानी है। निडर बनना है। मनुष्य को देवता बनाने की सर्विस का शौक रखना है।

वरदान:- स्वराज्य की सत्ता द्वारा विश्व राज्य की सत्ता प्राप्त करने वाले मास्टर सर्वशक्तिमान भव
जो इस समय स्वराज्य सत्ताधारी अर्थात् कर्मेन्द्रिय-जीत हैं वही विश्व की राज्य सत्ता प्राप्त करते हैं। स्वराज्य अधिकारी ही विश्व राज्य अधिकारी बनते हैं। तो चेक करो मन-बुद्धि और संस्कार जो आत्मा की शक्तियां हैं, आत्मा इन तीनों की मालिक है? मन आपको चलाता है या आप मन को चलाते हैं? कभी संस्कार अपनी तरफ खींच तो नहीं लेते हैं? स्वराज्य अधिकारी की स्थिति सदा मास्टर सर्वशक्तिमान है, जिसमें कोई भी शक्ति की कमी नहीं।
स्लोगन:- सर्व खजानों की चाबी – “मेरा बाबा” साथ हो तो कोई भी आकर्षण आकर्षित कर नहीं सकती।

BRAHMA KUMARIS MURLI 28 NOVEMBER 2017 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 28 November 2017

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28/11/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – तुम्हें इस रुद्र ज्ञान यज्ञ का बड़ा कदर होना चाहिए क्योंकि इस यज्ञ से ही भारत स्वर्ग बनता है, तुम इस यज्ञ के रक्षक हो”
प्रश्नः- बच्चे, बाप वा टीचर को तलाक अथवा फारकती कैसे और कब देते हैं?
उत्तर:- जब बाप अथवा टीचर को भूल जाते हैं, मुरली मिस करते हैं, पढ़ते वा सुनते नहीं हैं तो गोया बाप को फारकती वा तलाक दे देते हैं। बाबा कहते बच्चे तुम मुझे तलाक कभी नहीं देना।
प्रश्नः- तुम्हारा सत्य ज्ञान मनुष्यों को मुश्किल समझ में आता है, क्यों?
उत्तर:- क्योंकि यह ज्ञान परम्परा नहीं चलता है। अभी ही प्राय:लोप हो जाता है। इस ज्ञान का किसको पता ही नहीं है। यह नया ज्ञान है इसलिए उन्हें समझने में मुश्किल लगता है।
गीत:- पितु मात सहायक …..

ओम् शान्ति। जिसके साथ बच्चों का अभी योग है उनकी बाहर मनुष्य महिमा गाते रहते हैं। तुम उनकी याद में बैठे हो। अपने को आत्मा समझ देह का अभिमान छोड़ एक की ही याद में रहना है। अभी तुम आत्म-अभिमानी बने हो। पहले थे देह-अभिमानी। सतयुग में तुम बाप को नहीं जानते क्योंकि सुख में होते हो तो बाप याद नहीं रहता। यहाँ दु:खों में हो तब पुकारते हो। गायन भी है दु:ख हर्ता – सुखकर्ता। वास्तव में सच्चा-सच्चा हरिद्वार यह है। मनुष्य हरी कहते हैं कृष्ण को, बैकुण्ठ को कृष्ण का हरी द्वार कहते हैं। तुम जानते हो वास्तव में हरी कृष्ण को नहीं कहेंगे। दु:ख हरने वाले को हरी कहेंगे। तुम जानते हो शिवबाबा कृष्ण का द्वार अथवा बैकुण्ठ, सतयुग का द्वार खोलने आया है। कोई मकान बनाते हैं तो कोई ओपनिंग सेरीमनी करते हैं ना। तो बाबा आया है हरी द्वार की सेरीमनी करने। कृष्ण की राजधानी में कंस तो होता नहीं है। बाप द्वारा हम स्वर्ग का वर्सा ले रहे हैं। बाप ही आकर स्वर्ग के स्थापना की सेरीमनी कर रहे हैं। स्थापना को सेरीमनी कहा जाता है। मकान का पहला फाउन्डेशन लगाया जाता है फिर मकान बनकर पूरा होता है फिर सेरीमनी की जाती है। तो बाप फाउन्डेशन लगाने आया है। 1937 में फाउन्डेशन लगाया, अब फिर तुम स्थापना कर रहे हो। तुमको खुशी है कि बाबा आया है नई दुनिया स्थापन करने और हम नई दुनिया में जा रहे हैं। इस पृथ्वी पर स्वर्ग था, अब फिर स्थापन कर रहे हैं। हर एक को पैगाम दे रहे हैं। धर्म स्थापक को पैगम्बर कहा जाता है ना। सच्चा-सच्चा पैगाम मैं ही देता हूँ। मैं ही राजयोग सिखला कर स्वर्ग की स्थापना करा रहा हूँ। बाप समझाते हैं कि मैं वेद-शास्त्रों से नहीं मिलता हूँ। यह सब भक्ति मार्ग के शास्त्र हैं। भक्तिमार्ग की बहुत सामग्री है। जन्म-जन्मान्तर से तुम भक्ति करते आये हो। अब ज्ञान सुनो फिर सतयुग में ज्ञान नहीं सुनेंगे। कहा जाता है ज्ञान अंजन सतगुरू दिया। सतयुग में अंधकार है नहीं जो भक्ति करें। बाप से ज्ञान लो फिर भक्ति नहीं रहेगी।

तुम जानते हो रावण राज्य किसको कहा जाता है, रामराज्य किसको कहा जाता है। तुमको सारी रोशनी मिली है क्योंकि बाप जगाते हैं। अब देखो दीपावली मनाते हैं, उसमें दीपक कोई छोटे, कोई बड़े बनाते हैं। अब यह छोटे बड़े दीपक जग रहे हैं ना, ज्ञान का घृत मिल रहा है। मनुष्य मरते हैं तो दीपक में घृत डालते रहते हैं कि प्राणी अन्धियारे में ठोकरे न खाये। वह हैं हद की बातें, तुम्हारी हैं बेहद की बातें। जब रावणराज्य शुरू होता है तो ठोकरें खाना शुरू होती हैं। अभी दिन प्रतिदिन अधिक ही ठोकरें खाते रहते हैं। पहले एक की भक्ति करते अब तो मनुष्यों की, टिवाटे की भक्ति करते हैं। भक्ति की बहुत सामग्री है, जितनी वृक्ष की सामग्री है। बीज से कितना बड़ा वृक्ष निकलता है, भक्ति भी इतनी है। ज्ञान है बीज, यह सृष्टि तो अनादि अविनाशी है। इनका कब विनाश नहीं होता। यह सृष्टि चक्र लगाती रहती है। बीज भी एक है तो झाड़ भी एक है। ऐसे नहीं आकाश में, पाताल में, सूर्य में, चांद में दुनिया है। यह तो साइंस वाले चन्द्रमा में जाकर रहने की कोशिश करते हैं। परन्तु यह नहीं जानते कि साइंस से सारी दुनिया का विनाश होना है और राज्य तुम ले लेंगे। तुम कहेंगे यह भी ड्रामा में नूंध है। दूसरे इन बातों को समझेंगे नहीं। राजाई तुमको मिलनी है क्योंकि कनेक्शन है कृष्णपुरी और क्रिश्चियनपुरी का। इन्होंने भारतवासियों को आपस में लड़ाकर कृष्णपुरी को क्रिश्चियनपुरी बनाया। अब बाप कहते हैं हिसाब लेना है, इनको आपस में लड़ाकर माखन तुमको देते हैं अथवा तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं। यह आपस में लड़ेंगे जरूर। वह समझते हैं हम पहलवान, वह कहते हैं हम पहलवान, हम जीतेंगे लेकिन सबसे पहलवान तो तुम निकल पड़े हो। जीत तुम्हारी होनी है। महावीर और महावीरनी कहा जाता है। बाप कहते हैं माया के तूफान तो आयेंगे परन्तु कर्म में नहीं आना। योगबल से स्थापना हो रही है और बाहुबल से विनाश हो रहा है। उठते-बैठते, चलते-फिरते बाप को याद करना है, इसको कहा जाता है योगबल। फिर ज्ञान बल कहा जाता है। ज्ञान बल क्यों कहा जाता है? क्योंकि शास्त्रों में बल नहीं हैं। उनसे कोई को मुक्ति-जीवनमुक्ति नहीं मिल सकती, इसलिए उनको ज्ञान नहीं कहा जाता। भक्ति के शास्त्र कहेंगे। ज्ञान का कोई शास्त्र होता नहीं। अब जो राम के पुस्तक बने हैं वा जो भी शास्त्र आदि हैं, सब लड़ाई में खत्म हो जायेंगे। झूठी गीता, सच्ची गीता सब खत्म हो जायेगी क्योंकि सद्गति मिल जाती है। सब कामनायें पूरी हो जाती हैं। कोई कामना रहेगी नहीं। अब तुम 84 के चक्र को जानते हो। तुम अभी बेअन्त नहीं कहेंगे। बेअन्त कहते हैं नास्तिक। कहते हैं गॉड फादर परन्तु नाम रूप देश काल कर्तव्य को नहीं जानते। तुम उनके नई दुनिया की स्थापना, पतितों को पावन करने के कर्तव्य को जान गये हो। मनुष्य तो रावण को जलाते हैं। तुमको तो अब हंसी आती है। जन्म-जन्मान्तर तुम भी रावण को जलाते थे। अभी तो रावणराज्य का विनाश होना है फिर आती है दीपावली। वहाँ घोर सोझरा है, उसको रामराज्य कहते हैं। कहते तो सब हैं कि रामराज्य चाहिए। परन्तु रामराज्य को जानते नहीं। अभी तुमको ज्ञान मिल रहा है और रावणराज्य ट्रांसफर होना है रामराज्य में। उससे पहले तुम जायेंगे रूद्रमाला में। और यह जो इस्लामी, बौद्धियों की आत्मायें हैं, वह आधाकल्प मुक्ति में रहेंगी। जब हमारी सतयुग की प्रालब्ध पूरी होगी तब भक्ति शुरू होगी। फिर द्वापर को रावणराज्य कहा जाता है क्योंकि अपने देवता धर्म को भूल गये हैं। यह होना है जरूर। मिसाल बड़ के झाड़ का देते हैं। बच्चे जानते हैं कि आदि सनातन देवी-देवता धर्म का फाउन्डेशन प्राय:लोप हो चुका है। सब धर्म भ्रष्ट, कर्म भ्रष्ट हो गये हैं। जब देवी देवता धर्म स्थापन हो तब यह सब धर्म विनाश हो जाएं। कहते भी हैं अनेक अधर्म विनाश, एक सत धर्म की स्थापना हो। यहाँ वर्सा पाने का तुम पुरूषार्थ कर रहे हो। जो धारणा करेंगे करायेंगे, वह ऊंच पद पायेंगे। बाप कहते हैं मुख्य बात जरूर धारण करो कि हमको निराकार बाप पढ़ाते हैं। कृष्ण नहीं पढ़ाते हैं। चित्र भी बनाया है – एक तरफ कृष्ण का चित्र, दूसरे तरफ शिव का। पूछना है अब बताओ गीता का भगवान कौन? जज करो तुमको समझाने में बहुत सहज होगा कि गीता का भगवान कृष्ण नहीं शिव है। तुमको मालूम है गीता का ज्ञान फिर से बाप दे रहे हैं। गीत में भी है गीता का ज्ञान फिर से सुनाना पड़े। गीत तो तुमने नहीं बनाये हैं। बनाने वाले तो मनुष्य ही हैं, परन्तु अर्थ को नहीं जानते। कहते हैं गीता के भगवान ने ज्ञान घोड़े गाड़ी में बैठकर दिया। कृष्ण के लिए कोई घोड़े गाड़ी थोड़ेही आयेगी। अगर कृष्ण होता तो उनके लिए अच्छे से अच्छी गाड़ी ले आयें। बड़े-बड़े धनवान आ जायें। यहाँ तो देखो अपनी मोटर (शरीर) भी नहीं है। आता ही हूँ पतित शरीर में। तो गुप्त है ना। कृष्ण की तो बात नहीं। फिर तुम भक्ति मार्ग में मेरा कितना मान रखते हो। सोमनाथ का मन्दिर बनाते हो। कोई एक मन्दिर थोड़ेही होगा, अनेक होंगे फिर उन्हें लूटा भी होगा। तो सारी बेहद की हिस्ट्री-जॉग्राफी को तुम जान गये हो। बाप को कहते हैं नॉलेजफुल। तो यहाँ ज्ञान भी दिया जाता है, पढ़ाई भी पढ़ाई जाती है। ज्ञान है मनमनाभव, इससे सद्गति होती है। फिर मध्याजीभव की पढ़ाई पढ़ाते हैं। टीचर और गुरू का पार्ट इकट्ठा चलता है। सारे वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी तुमको पढ़ाते हैं।

सच्ची-सच्ची नन्स तुम हो क्योंकि तुम एक को याद करती हो। नन्स को गले में क्रास पड़ा रहता है। क्राइस्ट को याद करती हैं, समझती हैं क्राइस्ट गॉड का बच्चा था। तुम जानते हो कि क्राइस्ट कोई गॉड का बच्चा नहीं था, क्राइस्ट की आत्मा गॉड का बच्चा थी। ऐसे तो हम सभी हैं। बाप आकर 3 धर्म स्थापन करते हैं। तुम ऊंचे ते ऊंची चोटी ब्राह्मण हो क्योंकि तुम ऊंच ते ऊंच विश्व की सेवा करते हो। मनुष्य को आत्मा का ज्ञान देते हो। तुम आत्मा को बाप से वर्सा मिलता है। बरोबर बाप कल्प-कल्प के संगमयुगे वर्सा देने आते हैं। शास्त्रों में तो युगे-युगे लिख दिया है। कल्प अक्षर बीच से निकाल दिया है। उनका नाम ही है पतित-पावन। तो युगे-युगे आकर क्या करेंगे। कल्प में एक बार आकर पावन बनाकर चले जाते हैं। तो बाप कहते हैं मुझे तलाक मत देना। आजकल स्त्रियाँ पति को तलाक दे देती हैं वैसे हिन्दू नारी पति को कभी तलाक नहीं देती थी। तुमको मुरली सुननी है जरूर। मुरली नहीं सुनते हो तो गोया बाप टीचर को भूल जाते हो, यह भी जैसे तलाक हो गया। तुमको भी कितना अटेन्शन देना है। अब नापास होंगे तो कल्प-कल्पान्तर नापास होंगे। अन्त में सबको मालूम पड़ जायेगा कि किस-किस ने कितनी पढ़ाई पढ़ी थी। सब कहते हैं कि शान्ति चाहिए। गोया मुक्ति चाहते हैं। कहते हैं कि दु:ख में सिमरण सब करें… तो आधाकल्प सुख और आधाकल्प दु:ख है। सुख दु:ख का खेल भारत पर ही है। तुम तो कहेंगे हम ही देवता, हम ही क्षत्रिय….. तो हम सो का अर्थ भी तो कोई नहीं जानते हैं। तो बाप कहते हैं मनमनाभव, मध्याजीभव। खुद धारण कर औरों को धारण करायें तो अहो सौभाग्य। याद से ही विकर्म विनाश होंगे। कहाँ गंगा में स्नान करना, कहाँ योग में रह पावन बनना।

बच्चों को यज्ञ के पैसे की बहुत कदर होनी चाहिए क्योंकि इससे भारत स्वर्ग बनता है। बाप है गरीब निवाज। गरीबों की पाई-पाई पड़ेगी तब वह साहूकार बनेंगे। स्वर्ग में हेल्थ, वेल्थ, हैपीनेस है। अगर हेल्थ वेल्थ है तो हैपीनेस भी है। अगर हेल्थ हो वेल्थ न हो तो हैपीनेस हो नहीं सकती। सतयुग में हेल्थ वेल्थ है तो सदैव हैपी रहते हैं। वहाँ कभी रोते नहीं हैं। तो तुमको भी यहाँ रोना नहीं है। परन्तु माया के तूफान मुरझा देते हैं। हेल्थ मिलती है हॉस्पिटल से और वेल्थ मिलती है पढ़ाई से। तो देखो मेरे बच्चे कितने गरीब हैं। तीन पैर पृथ्वी में हॉस्पिटल खोल देते हैं। जहाँ से ही सबको हेल्थ वेल्थ मिलती है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) माया के तूफानों में कभी मुरझाना नहीं है। सदैव खुशी में रहना है।

2) हमको निराकार बाप पढ़ाते हैं, इस नशे में रहना है। इस झूठी दुनिया में कोई भी कामना नहीं रखनी है।

वरदान:- डबल लाइट स्थिति द्वारा उड़ती कला का अनुभव करने वाले सर्व आकर्षण मुक्त भव 
अभी चढ़ती कला का समय समाप्त हुआ, अभी उड़ती कला का समय है। उड़ती कला की निशानी है डबल लाइट। थोड़ा भी बोझ होगा तो नीचे ले आयेगा। चाहे अपने संस्कारों का बोझ हो, वायुमण्डल का हो, किसी आत्मा के सम्बन्ध-सम्पर्क का हो, कोई भी बोझ हलचल में लायेगा इसलिए कहीं भी लगाव न हो, जरा भी कोई आकर्षण आकर्षित न करे। जब ऐसे आकर्षण मुक्त, डबल लाइट बनो तब सम्पूर्ण बन सकेंगे।
स्लोगन:- स्नेह का चुम्बक बनो तो ग्लानि करने वाले भी समीप आकर स्नेह के पुष्पों की वर्षा करेंगे।

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