daily murli 18 december

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 18 DECEMBER 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 18 December 2020

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18-12-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – रोज़ विचार सागर मंथन करो तो खुशी का पारा चढ़ेगा, चलते-फिरते याद रहे कि हम स्वदर्शन चक्रधारी हैं”
प्रश्नः- अपनी उन्नति करने का सहज साधन कौन-सा है?
उत्तर:- अपनी उन्नति के लिए रोज़ पोतामेल रखो। चेक करो – आज सारा दिन कोई आसुरी काम तो नहीं किया? जैसे स्टूडेन्ट अपना रजिस्टर रखते हैं, ऐसे तुम बच्चे भी दैवी गुणों का रजिस्टर रखो तो उन्नति होती रहेगी।
गीत:- दूर देश के रहने वाला……..

ओम् शान्ति। बच्चे जानते हैं दूर देश किसको कहा जाता है। दुनिया में एक भी मनुष्य नहीं जानता। भल कितना भी बड़ा विद्वान हो, पण्डित हो इनका अर्थ नहीं समझते। तुम बच्चे समझते हो। बाप, जिसको सब मनुष्यमात्र याद करते हैं कि हे भगवान… वह जरूर ऊपर मूलवतन में है, और किसको भी यह पता नहीं है। इस ड्रामा के राज़ को भी अभी तुम बच्चे समझते हो। शुरू से लेकर अभी तक जो हुआ है, जो होने का है, सब बुद्धि में है। यह सृष्टि चक्र कैसे फिरता है, वह बुद्धि में रहना चाहिए ना। तुम बच्चों में भी नम्बरवार समझते हैं। विचार सागर मंथन नहीं करते हैं इसलिए खुशी का पारा भी नहीं चढ़ता है। उठते-बैठते बुद्धि में रहना चाहिए कि हम स्वदर्शन चक्रधारी हैं। आदि से अन्त तक मुझ आत्मा को सारे सृष्टि के चक्र का मालूम है। भल तुम यहाँ बैठे हो, बुद्धि में मूलवतन याद आता है। वह है स्वीट साइलेन्स होम, निर्वाणधाम, साइलेन्स धाम, जहाँ आत्मायें रहती हैं। तुम बच्चों की बुद्धि में झट आ जाता है, और कोई को पता नहीं। भल कितने भी शास्त्र आदि पढ़ते सुनते रहे, फायदा कुछ भी नहीं। वह सब हैं उतरती कला में। तुम अभी चढ़ रहे हो। वापिस जाने के लिए खुद तैयारी कर रहे हो। यह पुराना कपड़ा छोड़ हमको घर जाना है। खुशी रहती है ना! घर जाने के लिए आधाकल्प भक्ति की है। सीढ़ी नीचे उतरते ही गये। अभी बाबा हमको सहज समझाते हैं। तुम बच्चों को खुशी होनी चाहिए। बाबा भगवान हमको पढ़ाते हैं – यह खुशी बहुत रहनी चाहिए। बाप सम्मुख पढ़ा रहे हैं। बाबा जो सभी का बाप है, वह हमको फिर से पढ़ा रहे हैं। अनेक बार पढ़ाया है। जब तुम चक्र लगाकर पूरा करते हो तो फिर बाप आते हैं। इस समय तुम हो स्वदर्शन चक्रधारी। तुम विष्णुपुरी के देवता बनने के लिए पुरूषार्थ कर रहे हो। दुनिया में और कोई भी यह नॉलेज दे न सके। शिवबाबा हमको पढ़ा रहे हैं, यह खुशी कितनी रहनी चाहिए। बच्चे जानते हैं यह शास्त्र आदि सब भक्ति मार्ग के हैं, यह सद्गति के लिए नहीं। भक्ति मार्ग की सामग्री भी चाहिए ना। अथाह सामग्री है। बाप कहते हैं इससे तुम गिरते आये हो। कितना दर-दर भटकते हैं। अभी तुम शान्त होकर बैठे हो। तुम्हारा धक्का खाना सब छूट गया। जानते हो बाकी थोड़ा समय है, आत्मा को पवित्र बनाने के लिए बाप वही रास्ता बता रहे हैं। कहते हैं मुझे याद करो तो तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेंगे फिर सतोप्रधान दुनिया में आकर राज्य करेंगे। यह रास्ता कल्प-कल्प अनेक बार बाप ने बताया है। फिर अपनी अवस्था को भी देखना है, स्टूडेन्ट पुरूषार्थ कर अपने को होशियार बनाते हैं ना। पढ़ाई का भी रजिस्टर होता है और चलन का भी रजिस्टर होता है। यहाँ तुम्हें भी दैवीगुण धारण करने हैं। रोज़ अपना पोतामेल रखने से बहुत उन्नति होगी – आज सारा दिन कोई आसुरी काम तो नहीं किया? हमको तो देवता बनना है। लक्ष्मी-नारायण का चित्र सामने रखा है। कितना सिम्पुल चित्र है। ऊपर में शिवबाबा है। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा यह वर्सा देते हैं तो जरूर संगम पर ब्राह्मण-ब्राह्मणियां होंगे ना। देवतायें होते हैं सतयुग में। ब्राह्मण हैं संगम पर। कलियुग में हैं शूद्र वर्ण वाले। विराट रूप भी बुद्धि में धारण करो। हम अभी हैं ब्राह्मण चोटी, फिर देवता बनेंगे। बाप ब्राह्मणों को पढ़ा रहे हैं देवता बनाने के लिए। तो दैवी गुण भी धारण करने हैं, इतना मीठा बनना है। कोई को दु:ख नहीं देना है। जैसे शरीर निर्वाह के लिए कुछ न कुछ काम किया जाता है, वैसे यहाँ भी यज्ञ सर्विस करनी है। कोई बीमार है, सर्विस नहीं करते हैं तो उनकी फिर सर्विस करनी पड़ती है। समझो कोई बीमार है, शरीर छोड़ देते हैं, तुमको दु:खी होने की वा रोने की बात नहीं। तुमको तो बिल्कुल ही शान्ति में बाबा की याद में रहना है। कोई आवाज़ नहीं। वह तो शमशान में ले जाते हैं तो आवाज़ करते जाते हैं राम नाम संग है। तुमको कुछ भी कहना नहीं है। तुम साइलेन्स से विश्व पर जीत पाते हो। उन्हों की है साइंस, तुम्हारी है साइलेन्स।

तुम बच्चे ज्ञान और विज्ञान का भी यथार्थ अर्थ जानते हो। ज्ञान है समझ और विज्ञान है सब कुछ भूल जाना, ज्ञान से भी परे। तो ज्ञान भी है, विज्ञान भी है। आत्मा जानती है हम शान्तिधाम के रहने वाले हैं फिर ज्ञान भी है। रूप और बसन्त। बाबा भी रूप-बसन्त है ना। रूप भी है और उनमें सारे सृष्टि चक्र का ज्ञान भी है। उन्होंने विज्ञान भवन नाम रखा है। अर्थ कुछ नहीं समझते। तुम बच्चे समझते हो इस समय साइंस से दु:ख भी है तो सुख भी है। वहाँ सुख ही सुख है। यहाँ है अल्पकाल का सुख। बाकी तो दु:ख ही दु:ख है। घर में मनुष्य कितने दु:खी रहते हैं। समझते हैं कहाँ मरें तो इस दु:ख की दुनिया से छूटें। तुम बच्चे तो जानते हो बाबा आया हुआ है हमको स्वर्गवासी बनाने। कितना गद्गद् होना चाहिए। कल्प-कल्प बाबा हमको स्वर्गवासी बनाने आते हैं। तो ऐसे बाप की मत पर चलना चाहिए ना।

बाप कहते हैं – मीठे बच्चे, कभी कोई को दु:ख न दो। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनो। हम भाई-बहन हैं, यह है प्यार का नाता। और कोई दृष्टि जा नहीं सकती। हर एक की बीमारी अपनी-अपनी है, उस अनुसार राय भी देते रहते हैं। पूछते हैं बाबा यह-यह हालत होती है, इस हालत में क्या करें? बाबा समझाते हैं भाई-बहन की दृष्टि खराब नहीं होनी चाहिए। कोई भी झगड़ा न हो। मैं तुम आत्माओं का बाप हूँ ना। शिवबाबा ब्रह्मा तन से बोल रहे हैं। प्रजापिता ब्रह्मा बच्चा हुआ शिवबाबा का, साधारण तन में ही आते हैं ना। विष्णु तो हुआ सतयुग का। बाप कहते हैं मैं इनमें प्रवेश कर नई दुनिया रचने आया हूँ। बाबा पूछते हैं तुम विश्व के महाराजा-महारानी बनेंगे? हाँ बाबा, क्यों नहीं बनेंगे। हाँ, इसमें पवित्र रहना पड़ेगा। यह तो मुश्किल है। अरे, तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं, तुम पवित्र नहीं रह सकते हो? लज्जा नहीं आती है? लौकिक बाप भी समझाते हैं ना – गंदा काम मत करो। इस विकार पर ही विघ्न पड़ते हैं। शुरू से लेकर इस पर हंगामा चलता आया है। बाप कहते हैं – मीठे बच्चों, इस पर जीत पानी है। मैं आया हूँ पवित्र बनाने। तुम बच्चों को राइट-रांग, अच्छा-बुरा सोचने की बुद्धि मिली है। यह लक्ष्मी-नारायण है एम ऑब्जेक्ट। स्वर्गवासियों में दैवीगुण हैं, नर्कवासियों में अवगुण हैं। अभी रावणराज्य है, यह भी कोई समझ नहीं सकते। रावण को हर वर्ष जलाते हैं। दुश्मन है ना। जलाते ही आते हैं। समझते नहीं कि यह है कौन? हम सब रावण राज्य के हैं ना, तो जरूर हम असुर ठहरे। परन्तु अपने को कोई असुर समझते नहीं। बहुत कहते भी हैं यह राक्षस राज्य है। यथा राजा-रानी तथा प्रजा। परन्तु इतनी भी समझ नहीं। बाप बैठ समझाते हैं रामराज्य अलग होता है, रावणराज्य अलग होता है। अभी तुम सर्वगुण सम्पन्न बन रहे हो। बाप कहते हैं मेरे भक्तों को ज्ञान सुनाओ, जो मन्दिरों में जाकर देवताओं की पूजा करते हैं। बाकी ऐसे-ऐसे आदमियों से माथा नहीं मारो। मन्दिरों में तुमको बहुत भक्त मिलेंगे। नब्ज भी देखनी होती है। डॉक्टर लोग देखने से ही झट बता देते हैं कि इनको क्या बीमारी है। देहली में एक अजमलखाँ वैद्य मशहूर था। बाप तो तुमको 21 जन्मों के लिए एवर हेल्दी, वेल्दी बनाते हैं। यहाँ तो हैं ही सब रोगी, अनहेल्दी। वहाँ तो कभी रोग होता नहीं। तुम एवरहेल्दी, एवरवेल्दी बनते हो। तुम अपने योगबल से कर्मेन्द्रियों पर विजय पा लेते हो। तुम्हें यह कर्मेन्द्रियाँ कभी धोखा नहीं दे सकती हैं। बाबा ने समझाया है याद में अच्छी रीति रहो, देही-अभिमानी रहो तो कर्मेन्द्रियाँ धोखा नहीं देंगी। यहाँ ही तुम विकारों पर जीत पाते हो। वहाँ कुदृष्टि होती नहीं। रावण राज्य ही नहीं। वह है ही अहिंसक देवी-देवताओं का धर्म। लड़ाई आदि की कोई बात नहीं। यह लड़ाई भी अन्तिम लगनी है, इनसे स्वर्ग का द्वार खुलना है। फिर कभी लड़ाई लगती ही नहीं। यज्ञ भी यह लास्ट है। फिर आधाकल्प कोई यज्ञ होगा ही नहीं। इसमें सारा किचड़ा स्वाहा हो जाता है। इस यज्ञ से ही विनाश ज्वाला निकली है, सारी सफाई हो जायेगी। फिर तुम बच्चों को साक्षात्कार भी कराया गया है, वहाँ के शूबीरस आदि भी बहुत स्वादिष्ट फर्स्टक्लास चीजें होती हैं। उस राज्य की अभी तुम स्थापना कर रहे हो तो कितनी खुशी होनी चाहिए।

तुम्हारा नाम भी है शिव शक्ति भारत मातायें। शिव से तुम शक्ति लेते हो सिर्फ याद से। धक्के खाने की कोई बात नहीं। वह समझते हैं जो भक्ति नहीं करते हैं वह नास्तिक हैं। तुम कहते हो जो बाप और रचना को नहीं जानते हैं वह नास्तिक हैं, तुम अभी आस्तिक बने हो। त्रिकालदर्शी भी बने हो। तीनों लोकों, तीनों कालों को जान गये हो। इन लक्ष्मी-नारायण को बाप से यह वर्सा मिला है। अभी तुम वह बनते हो। यह सब बातें बाप ही समझाते हैं। शिव-बाबा खुद कहते हैं कि मैं इनमें प्रवेश कर समझाता हूँ। नहीं तो मैं निराकार कैसे समझाऊं। प्रेरणा से पढ़ाई होती है क्या? पढ़ाने लिए तो मुख चाहिए ना। गऊ मुख तो यह है ना। यह बड़ी मम्मा है ना, ह्युमन माता है। बाप कहते हैं मैं इन द्वारा तुम बच्चों को सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाता हूँ, युक्ति बतलाता हूँ। इसमें आशीर्वाद की कोई बात नहीं। डायरेक्शन पर चलना है। श्रीमत मिलती है। कृपा की बात नहीं। कहते हैं – बाबा घड़ी-घड़ी भूल जाता है, कृपा करो। अरे, यह तो तुम्हारा काम है याद करना। मैं क्या कृपा करूँगा। हमारे लिए तो सब बच्चे हैं। कृपा करूँ तो सभी तख्त पर बैठ जाएं। पद तो पढ़ाई अनुसार पायेंगे। पढ़ना तो तुमको है ना। पुरूषार्थ करते रहो। मोस्ट बिलवेड बाप को याद करना है। पतित आत्मा वापिस जा न सके। बाप कहते हैं जितना तुम याद करेंगे तो याद करते-करते पावन बन जायेंगे। पावन आत्मा यहाँ रह नहीं सकेगी। पवित्र बने तो शरीर नया चाहिए। पवित्र आत्मा को शरीर इमप्योर मिले, यह लॉ नहीं। सन्यासी भी विकार से जन्म लेते हैं ना। यह देवतायें विकार से जन्म नहीं लेते, जो फिर सन्यास करना पड़े। यह तो ऊंच ठहरे ना। सच्चे-सच्चे महात्मा यह हैं जो सदैव सम्पूर्ण निर्विकारी हैं। वहाँ रावण राज्य है नहीं। है ही सतोप्रधान रामराज्य। वास्तव में राम भी कहना नहीं चाहिए। शिवबाबा है ना। इसको कहा जाता है राजस्व अश्वमेध अविनाशी रूद्र ज्ञान यज्ञ। रूद्र वा शिव एक ही है। कृष्ण का तो नाम नहीं है। शिवबाबा आकर ज्ञान सुनाते हैं वह फिर रूद्र यज्ञ रचते हैं तो मिट्टी का लिंग और सालिग्राम बनाते हैं। पूजा कर फिर तोड़ देते हैं। जैसे बाबा देवियों का मिसाल बताते हैं। देवियों को सजाकर खिलाए पिलाए पूजा कर फिर डुबो देते हैं। वैसे शिवबाबा और सालिग्रामों की बड़े प्रेम और शुद्धि से पूजा कर फिर खलास कर देते हैं। यह है सारा भक्ति का विस्तार। अभी बाप बच्चों को समझाते हैं – जितना बाप की याद में रहेंगे उतना खुशी में रहेंगे। रात्रि को रोज़ अपना पोतामेल देखना चाहिए। कुछ भूल तो नहीं की? अपना कान पकड़ लेना चाहिए – बाबा आज हमसे यह भूल हुई, क्षमा करना। बाबा कहते हैं सच लिखेंगे तो आधा पाप कट जायेगा। बाप तो बैठा है ना। अपना कल्याण करना चाहते हो तो श्रीमत पर चलो। पोतामेल रखने से बहुत उन्नति होगी। खर्चा तो कुछ है नहीं। ऊंच पद पाना है तो मन्सा-वाचा-कर्मणा कोई को भी दु:ख नहीं देना है। कोई कुछ कहता है तो सुना-अनसुना कर देना है। यह मेहनत करनी है। बाप आते ही हैं तुम बच्चों का दु:ख दूर कर सदा के लिए सुख देने। तो बच्चों को भी ऐसा बनना है। मन्दिरों में सबसे अच्छी सर्विस होगी। वहाँ रिलीज़स माइन्डेड तुमको बहुत मिलेंगे। प्रदर्शनी में बहुत आते हैं। प्रोजेक्टर से भी प्रदर्शनी मेले में सर्विस अच्छी होती है। मेले में खर्चा होता है तो जरूर फायदा भी है ना। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप ने राइट-रांग को समझने की बुद्धि दी है, उसी बुद्धि के आधार पर दैवीगुण धारण करने हैं, किसी को दु:ख नहीं देना है, आपस में भाई-बहन का सच्चा प्यार हो, कभी कुदृष्टि न जाए।

2) बाप के हर डायरेक्शन पर चल अच्छी तरह पढ़कर अपने आप पर आपेही कृपा करनी है। अपनी उन्नति के लिए पोतामेल रखना है, कोई दु:ख देने वाली बातें करता है तो सुनी-अनसुनी कर देना है।

वरदान:- सर्व सम्बन्धों का अनुभव एक बाप से करने वाले अथक और विघ्न विनाशक भव
जिन बच्चों के सर्व सम्बन्ध एक बाप के साथ हैं उनको और सब सम्बन्ध निमित्त मात्र अनुभव होंगे, वह सदा खुशी में नाचने वाले होंगे, कभी थकावट का अनुभव नहीं करेंगे, अथक होंगे। बाप और सेवा इसी लगन में मगन होंगे। विघ्नों के कारण रुकने के बजाए सदा विघ्न विनाशक होंगे। सर्व सम्बन्धों की अनुभूति एक बाप से होने के कारण डबल लाइट रहेंगे, कोई बोझ नहीं होगा। सर्व कम्पलेन समाप्त होंगी। कम्पलीट स्थिति का अनुभव होगा। सहजयोगी होंगे।
स्लोगन:- संकल्प में भी किसी देहधारी तरफ आकर्षित होना अर्थात् बेवफा बनना।

TODAY MURLI 18 DECEMBER 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 18 December 2020

18/12/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, churn the ocean of knowledge every day and your mercury of happiness will rise. Whilst walking and moving around, remember that you are spinners of the discus of self-realisation.
Question: What is the easy way to make self-progress?
Answer: In order to make self-progress, keep a daily chart. Check yourself: Throughout the day, did I perform any devilish actions? Just as students keep their register, in the same way, you children should keep a register of your divine virtues and you will then continue to make self-progress.
Song: The Resident of the faraway land has come into the foreign land.

Om shanti. You children know what the faraway land is. Not a single human being in the outside world knows this. No matter how great a scholar or pundit someone may be, he would not know the meaning of this. You children know that the Father, whom all human beings remember as God, is definitely up above in the incorporeal world. No one else knows this. You children now understand the secrets of this drama. Everything that has happened from the beginning and all that is still to happen is in your intellects. Your intellects have to keep the knowledge of how this world cycle continues to turn. Amongst you children, all of you understand, numberwise. It is because you don’t churn the ocean of knowledge that your mercury of happiness doesn’t rise. Whilst you are sitting and walking, let your intellects remember that you are spinners of the discus of self-realisation. I, a soul, know the whole world cycle from the beginning to the end. You are sitting here, but your intellects remember the incorporeal world. That is the sweet silence home, the land of nirvana, the land of silence, where souls reside. This enters the intellects of you children very quickly. No one else knows this. Although they study and listen to so many scriptures, they do not benefit from that at all. All of them are on the path that goes down whereas you are now climbing up. You are making your preparations to return home. We have to leave these old clothes and return home. There is happiness in this. For half a cycle you have been performing devotion in order to return home. You have been continuing to come down the ladder. Baba now explains everything to you very easily. You children should have the happiness that God, the Father, is teaching you. You should have a great deal of happiness about this. The Father is personally teaching you. Baba, the Father of all, is now teaching us once again! He has taught us many times. It is when you have been around the full cycle that the Father then comes. At present, you are spinners of the discus of self-realisation. You are making effort to become deities of the land of Vishnu. No one in the whole world can give you this knowledge. Shiv Baba is teaching us. You should have so much happiness! You children know that all of those scriptures etc. belong to the path of devotion; they are not for salvation. All the paraphernalia of the path of devotion is also needed. There is limitless paraphernalia. The Father says: You have continued to come down through all of that. You have been wandering around for so long and you are now sitting here in silence. All of your stumbling is now over. You souls know that very little time remains to purify yourselves. The Father is now showing you the way to do this. He says: Remember Me and, from tamopradhan, you will become satopradhan. You will then go and rule in the satopradhan world. The Father has shown you this path every cycle, many times. You also have to examine your own stage. Students make effort to make themselves clever. There are registers of their studies and their behaviour. Here, too, you have to imbibe divine virtues. By keeping a daily chart of yourself, you will make a lot of self-progress. Did I perform any devilish actions today? I have to become a deity. The picture of Lakshmi and Narayan is in front of you. It is such a simple picture! Shiv Baba is at the top. He gives you this inheritance through Prajapita Brahma, and so there must definitely be the Brahmins at the confluence age. The deities exist in the golden age, the Brahmins exist at the confluence age and the ones who belong to the shudra clan exist in the iron age. You should also keep the variety-form image in your intellects. We are now Brahmins, the topknots, and we will then be deities. The Father is teaching us Brahmins in order to make us into deities. Therefore, you also have to imbibe divine virtues. Become very sweet. Do not cause sorrow for anyone. Just as you do one type of work or another for the livelihood of your body, in the same way, here, too, you need to serve the yagya. When someone is ill and is unable to do any service, others have to serve him. When someone becomes ill and leaves his body, there is no question of experiencing sorrow or crying. You have to remain totally silent, in remembrance of Baba. There shouldn’t be any noise. When they take a corpse to the cremation ground, they make a lot of noise, saying, “The one whose name is Rama is with you.” You don’t have to say anything. You gain victory over the world through silence. Theirs is science whereas yours is silence. You children also know the accurate meaning of gyan and vigyan; gyan is understanding and vigyan is to forget everything, to go even beyond gyan. So, there is gyan as well as vigyan. You souls know that you are residents of the land of silence. Then, there is also gyan. You are rup and basant (embodiment of silence who showers jewels of knowledge). Baba too is Rup and Basant. He is Rup and He also has the whole knowledge of the world cycle. They have named a building “Vigyan Bhavan”, but they do not understand the meaning of that at all. You children understand that, at present, science causes sorrow as well as happiness. There, there is happiness and only happiness. Here, happiness is temporary. All the rest is sorrow and only sorrow. People are so unhappy in their own homes. They feel that the sooner they die, the sooner they can be liberated from this world of sorrow. You children know that Baba has come to make you into residents of heaven. You should have so much internal happiness. Baba comes every cycle to make us into residents of heaven. Therefore, you should definitely follow the directions of such a Father. The Father says: Sweet children, never cause sorrow for anyone. Become pure whilst living in your household. We are all brothers and sisters. This is a relationship of love. There mustn’t be any other type of vision. Each one’s illness is unique to that soul. Therefore, each one receives advice according to that. Some ask: Baba, such and such a situation has come up. What should I do in this situation? Baba explains: The vision between a brother and sister must never become bad. There shouldn’t be any fighting. I am the Father of you souls. Shiv Baba is speaking through the body of Brahma. Therefore, Prajapita Brahma is the son of Shiv Baba. He enters an ordinary body. Vishnu belongs to the golden age. The Father says: I have come and entered this one in order to make the world new. Baba asks: Will you become the emperors and empresses of the world? “Yes Baba, why not?” Yes, but you then also have to remain pure. This is difficult. Oh! But God is making you into the masters of the world! Can you not remain pure? Are you not ashamed of yourself? Even your physical fathers tell you not to perform any dirty actions. It’s due to that vice that there are obstacles. From the very start, it has only been because of that vice that there has been so much upheaval. The Father says: Sweet children, you have to gain victory over that vice. I have come to make you pure. You children have now been given intellects to judge for yourselves whether something is right or wrong, whether it is good or bad. Lakshmi and Narayan are your aim and objective. The people of heaven have divine virtues. The people of the iron age have defects. No one understands that it is now the kingdom of Ravan. They burn an effigy of Ravan every year; he is the enemy. They continue to burn an effigy of him, yet they do not know who he is. All of us belong to the kingdom of Ravan, and so we are all definitely devilish. However, no one considers himself to be a devil. Many say that this is a kingdom of devils: as are the rulers, so the subjects. However, they don’t even understand this much. The Father sits here and explains that the kingdom of Rama is separate from the kingdom of Ravan. You are now becoming full of all virtues. The Father says: Give this knowledge to the devotees who worship Me and to those who worship the deities in the temples, but do not beat your heads with such people. You will find many devotees in the temples. You also have to feel each one’s pulse. Some doctors can instantly tell what illness you have just by feeling your pulse; there was a very well-known homeopath in Delhi called Ajmal Khan. The Father makes you everhealthy and wealthy for 21 births. Everyone here is diseased, unhealthy. There, there is never any illness. You are becoming ever healthy and everwealthy. You conquer your sense organs with the power of yoga. Your sense organs must never deceive you. Baba has said: Stay in remembrance accurately. Remain soul conscious and your sense organs will not deceive you. It is here that you gain victory over those vices. You never have bad vision there. Ravan’s kingdom doesn’t exist there. That is the non-violent deity religion. There is no question of war etc. there. This will be the final war and the gates to heaven will then open through this. Then there will be no more war. This is the last sacrificial fire and there will then not be any sacrificial fires for half a cycle. All the rubbish is to be sacrificed into this. The flames of destruction will emerge from this sacrificial fire and everything will be cleansed. You children have had visions. The fruit juice there is very delicious and first class. You are now establishing that kingdom and so you should have so much happiness. Your name is Shiv Shaktis, the mothers of Bharat. It is only by having remembrance that you take power from Shiva. There is no question of stumbling around. Those people think that anyone who doesn’t perform devotion is an atheist, whereas you say that those who do not know the Father and creation are atheists. You have now become theists and you have also become seers of the three aspects of time. You now know the three worlds and the three aspects of time. Lakshmi and Narayan received their inheritance from the Father. You are now becoming like them. Only the Father explains all of these things. Shiv Baba Himself says: I enter this one and explain to you. How else could I, the incorporeal One, explain? Can a study take place through inspiration? One needs a mouth in order to teach. This one is the Gaumukh (mouth of a cow). This one is the senior mother; he is a human mother. The Father says: I explain to you children the secrets of the beginning, the middle and the end of the world through this one. I show you clever methods. There is no question of blessings in this. You have to follow My directions. You are given shrimat. It is not a question of mercy. Some of you say: Baba, I forget You again and again, so grant me mercy. Oh! But it is your task to remember the Father. What mercy would I have for you? For Me, all of you are My children. If I were to have mercy, everyone would then be seated on the throne. However, all of you claim a status according to how much you study. You are the ones who have to study. Continue to make effort. Remember the most beloved Father. Souls cannot return home impure. The Father says: To the extent that you souls remember Me, you will accordingly become pure through that remembrance. A pure soul cannot remain here. Once you become pure, you need a new body. It’s against the law for a pure soul to receive an impure body. Sannyasis too take birth through vice. Deities do not take birth through vice that they would then have to take up renunciation. They are elevated ones. They are the true mahatmas who are constantly completely viceless. The kingdom of Ravan doesn’t exist there. That is the satopradhan kingdom of Rama (God). In fact, you shouldn’t even say Rama. It is Shiv Baba, is it not? This is called the imperishable, sacrificial fire of the knowledge of Rudra in which the horse is sacrificed. Whether you say Rudra or Shiva, they are one and the same. Krishna’s name is not mentioned. Shiv Baba comes and speaks the knowledge. When people create a sacrificial fire, they create a lingam and saligrams of clay. They worship them and then break them up. Baba gives the example of the deity idols. They adorn the idols of the deities, they offer them food and water, they worship them and then they sink them! Similarly, they worship the images of Shiv Baba and the saligrams with a lot of love and cleanliness, and then they break them up. All of that is the expansion of devotion. The Father now explains to you children that, to the extent you stay in remembrance of the Father, you will accordingly have that much happiness. Check your chart every night to see whether you have made any mistakes. Pull your own ears. “Baba, I made this mistake today. Please forgive me!” Baba says: If you write the truth, half of the sin will be forgiven. The Father is sitting here. If you want to benefit yourself, continue to follow His shrimat. You will make a lot of progress by keeping a chart. There is no expense in this. If you want to claim a high status, do not cause anyone sorrow through your thoughts, words or deeds. If someone says something wrong to you, listen but do not hear it. Make this effort. The Father comes in order to remove all the sorrow from you children and to give you constant happiness. Therefore, you children, too, have to become like this. The best service can be done in the temples. You will find many religious-minded people there. There are many who come to the exhibitions. The service done at the fairs and exhibitions is better than that done with projectors (slide-shows). The fairs require expenditure, and so there would definitely also be benefit. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. The Father has given each of you an intellect to understand the difference between right and wrong. Therefore, imbibe divine virtues on the basis of understanding with your intellect. Do not cause sorrow for anyone. Let there be true love of brother and sister amongst you. Never have bad vision for one another.
  2. Follow every direction the Father gives you, study well and have mercy for yourself. Keep a chart for your self-progress. If someone says anything that could cause sorrow, listen but do not hear it.
Blessing: May you be tireless and a destroyer of obstacles who experiences all relationships with the one Father.
The children who have all relationships with the one Father experience all other relationships just in name. They constantly dance in happiness and never experience tiredness; they are tireless. They would be lost in the love for the Father and service. Instead of being stopped by obstacles, they are destroyers of obstacles. Because they experience all relationships with the one Father, they remain doublelight and do not have any burdens. All their complaints have finished and they experience the complete stage. They have become easy yogis.
Slogan: To be attracted to any bodily being even in your thoughts is to be unfaithful.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 18 DECEMBER 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 18 December 2019

18/12/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, Maya is very powerful. Therefore, you must remain cautious. Never have any thought of not believing in Brahma or that you have a direct connection with Shiv Baba.
Question: Which children automatically draw everyone’s love?
Answer: Those who first put everything into practice before telling others to do something are the ones who are automatically loved by everyone. You must first imbibe this knowledge yourself and then serve many others. Only then will you receive everyone’s love. If you tell others to do something but you don’t do it yourself, who would believe you? You would just be like a pundit.

Om shanti. The Father asks you children, that is, the Supreme Father asks you souls: Do you know that you are sitting in front of the Supreme Father, the Supreme Soul? Baba doesn’t have a chariot of His own. You have the faith that the Father resides in the centre of this forehead. The Father Himself has said: I am sitting in the centre of this one’s forehead. I have taken his body on loan. The soul of this one is sitting in the centre of this forehead, and so the Father comes and also sits here. Brahma is here and so is Shiv Baba. If this Brahma weren’t here, Shiv Baba wouldn’t be here either. If someone says that he only remembers Shiv Baba and not Brahma Baba, how could Shiv Baba talk to him? You have been remembering Shiv Baba as being up above. You children know that you are now sitting here with the Father. You don’t think that Shiv Baba is up above now. On the path of devotion, you used to say that Shiv Baba was up above, but His form is worshipped here. These matters have to be understood well. You know that the Father is the Ocean of Knowledge, the knowledge-full One. So, from where does He speak this knowledge? He speaks it through the body of Brahma. Many say that they do not believe in Brahma. However, Shiv Baba says: I tell you through this mouth to remember Me alone. This is a matter of understanding. Brahma himself says: Remember Shiv Baba. He doesn’t say that you have to remember him. Shiv Baba says through him: Remember Me! I give you this mantra through his mouth. If Brahma were not here, how could I give you this mantra? If Brahma were not here, how could you meet Shiv Baba? How could He sit next to me? Maya puts such thoughts into even good maharathis that they turn their faces away from Me. What would be the state of those who say that they don’t believe in Brahma? Maya is so powerful that she completely turns your faces away from Baba. You are now facing Shiv Baba. You are personally sitting in front of Him. So, if some of you say that Brahma is nothing, what would your state become? You would experience degradation. When people call out to God, the Father, does God, the Father, listen to them? They say: O Liberator, come! Would He liberate you from up there? The Father comes at the most auspicious confluence age of every cycle. If you reject the one in whom He comes, what would you call this? Maya has so much power that she makes you number one in being not worth a penny. There are such children at some centres. This is why the Father says that you must remain cautious. Although they tell others the knowledge that Baba has given them, it is as though they are pundits. Baba often relates the story of the pundit. At present, you are going across the ocean of poison to the ocean of milk by having remembrance of the Father. They have made up many stories on the path of devotion. There was once a pundit who told his followers that they would be able to cross a certain river by chanting the name of Rama. However, he himself had not accumulated anything in his account by chanting that name. What effect would those who indulge in vice themselves have on others when they tell them to remain viceless? In some places, there are also some who listen and quickly move ahead of the ones who give knowledge. It is those who do a lot of service of others who will definitely be most loved by everyone. That pundit was false. Therefore, who would have loved him? Love goes to those who remember Baba in practice. Maya swallows even good maharathis. Baba explains: You have not yet made your stage karmateet. It will not be created until all preparations for the war have been made. On the one side, they will be making preparations for war, and, on the other side, you will have reached your karmateet stage; the two are connected. Then the war will end and you will be transferred. First of all, the rosary of Rudra is created. No one else knows about these things. You understand that this world has to change. They think that the world still has to continue for another 40,000 years, whereas you know that destruction is just in front of you. You are in the minority and they are in the majority, and so who would believe you? When the number of you has grown, many will then be pulled by your power of yoga. The more rust you remove from yourselves, the more you will be filled with power. It isn’t that Baba is the One who knows everything; no. He does know the stage of you all. Would the Father not know of the stage of His children? He knows everyone’s stage. You cannot reach the karmateet stage now. It is still possible for you to make many serious mistakes. Even some maharathis make mistakes. The way you speak, the way you act and behave etc. are all visible. You now have to make your behaviour divine. Deities are full of all virtues, and so you have to become like them. However, Maya doesn’t leave anyone alone. She makes everyone like a “touch-me-not” plant. There are the five floors. When you become body conscious, you fall from the very top floor; you fall and die. Nowadays, people try to kill themselves in so many different ways. When they fall from the twentieth floor, they are totally finished. They shouldn’t end up in hospital and continue to experience pain. There are some who set themselves on fire. If someone saves them, they experience so much pain. When the bodies are burnt, the souls run away. This is why they commit suicide. People think that they will be liberated from pain and suffering by committing suicide. When they feel forced to do this, everything is finished for them. Some experience so much pain in hospital. The doctors know that they cannot be freed from that pain and that it would be better to give them a pill for them to die. However, they also realise that it would be a very great sin to give a pill in that way. That soul himself says: It would be better to leave my body than have to endure this pain. However, who would let them leave that body? This is the world of infinite sorrow. There, it is the world of infinite happiness. You children understand that you are now returning to the land of happiness from the land of sorrow. Therefore, you should remember Him. The Father only comes at the confluence age when the world has to change. The Father says: I have come to liberate you children from all kinds of sorrow and to send you to the pure new world. There are very few people in the pure world, whereas there are very many here. You have become impure and this is why you call out: “O Purifier!” You don’t realise that you are calling out for the Great Death to come and take you back home, away from this dirty world. Baba will definitely come. Only when everyone has died will there be peace. People continue to ask for peace. Only in the land of peace is there peace. How could there be peace in this world of so many human beings? In the golden age, there was peace and happiness. In the iron age, there are now many religions. Only when they are destroyed and the one religion is established can there be peace and happiness. After the cries of sorrow, there will be cries of victory. As you go forward, you will see just how hot the market of death becomes! Just look how they are killed! Fires are created by bombs! As they move along and see the things that are happening, many will say that there will definitely be destruction in the future. You children know how this world cycle has to continue to turn and that destruction has to take place. The Father teaches you Raj Yoga and also enables the one religion to be established. All the other innumerable religions are to be destroyed. This wasn’t shown in the Gita. So what was the result of studying the Gita? They show that annihilation take place and almost everywhere was covered with water. However, the whole world was not covered. Bharat is the pure and imperishable land and, in that too, Abu is the purest pilgrimage place where the Father comes and grants everyone salvation. The Dilwala Temple is a very good memorial. It has so much significance, but those who built it did not know that. At least, they were sensible. In the copper age, there must have been some very sensible people. In the iron age, everyone is tamopradhan. This is the most elevated temple of all, where you are sitting. You know that you are in the living form and that that is your non-living memorial. However, such temples etc. will continue to be built for a little longer and it will then be the time for them to collapse. All the temples will collapse and fall; there will be wholesale death. The great Mahabharat War in which everyone was destroyed has been remembered. You also understand that the Father comes at the confluence age and that He needs a chariot. Only when a soul enters a body can there be movement in it. Then, when he leaves his body, the body becomes non-living. The Father says: You are now going home. You have to become like Lakshmi and Narayan. Therefore, you also need the virtues that they had. You children now know this play. This play is so wonderful! The Father sits here and explains the significance of this play. The Father is the knowledgefull One, the Seed. The Father alone comes to give you the knowledge of the whole tree: what happens in it and for how long you have been playing your parts in it. For half a cycle, there is the divine kingdom and for the other half, there is the devilish kingdom. Good children keep all of this knowledge in their intellects. The Father makes you teachers similar to Himself. Teachers, too, are numberwise. Some become teachers and then they get spoilt. Having taught many children, they themselves are finished. Young children have a variety of sanskars. The Father explains: Those who don’t understand this knowledge accurately and who don’t reform their behaviour become instruments to make many unhappy. It is shown in the scriptures how devils came secretly into the gathering. They then went away, became traitors and created a lot of trouble. All of these things continue to happen. They obstruct the Father, the Highest on High, the One who establishes heaven. The Father explains: You children are towers of peace and happiness. You are very royal. There is no one at present more royal than you. Since you are the children of the unlimited Father, you should interact with so much sweetness! You must not cause sorrow for anyone. Otherwise, you will remember that at the end and then have to experience punishment for it. The Father says: You now have to return home. Some children have visions of Brahma in the subtle region. You, too, have to become residents of the subtle region. You have to practise being in “movie“. You have to speak very little and very sweetly. By making effort in this way, you will become towers of peace. The Father is the One who is teaching you. You then have to teach others. The path of devotion is the path of “talkie“. You now have to maintain silenceAchcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. You have to interact with a lot of sweetness and royalty. In order to become towers of peace and happiness, you must speak very little and sweetly. You have to practisebeing in “movie” and not indulge in talking.
  2. Make your behaviour divine. You must not become like a “touchmenot” plant. You have to reach your karmateet stage before the war starts. Become viceless and also do the service of making others viceless.
Blessing: May you be karmateet, like the Father, and remain free from any selfish feeling in both your deeds and your relationships.
The service of you children is to liberate everyone. So, while liberating others, do not tie yourself in any bondage. When you become free from any limited “mine”, you will then be able to experience the avyakt stage. The children who are free from any selfish motives in the lokik and alokik lives, in their deeds and their relationships, are the ones who are able to experience the karmateet stage like the Father. So, check to what extent you have become free from any bondage of karma. Have you become free from being influenced by any wasteful nature or sanskars? Do the sanskars or nature of the past influence you in any way?
Slogan: In order to become equal and complete, merge yourself in the Ocean of Love.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 18 DECEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 18 December 2019

18-12-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – माया बड़ी जबरदस्त है, इससे खबरदार रहना, कभी यह ख्याल न आये कि हम ब्रह्मा को नहीं मानते, हमारा तो डायरेक्ट शिवबाबा से कनेक्शन है”
प्रश्नः- किन बच्चों पर सभी का प्यार स्वत: जाता है?
उत्तर:- जो पहले हर बात को स्वयं प्रैक्टिकल में लाते फिर दूसरों को कहते हैं – उन पर सबका प्यार स्वत: जाता है। ज्ञान को स्वयं में धारण कर फिर बहुतों की सेवा करनी है, तब सबका प्यार मिलेगा। अगर खुद नहीं करते सिर्फ दूसरों को कहते तो उन्हें कौन मानेगा? वह तो जैसे पण्डित हो जाते।

ओम् शान्ति। बच्चों से बाप पूछते हैं, आत्माओं से परमात्मा पूछते हैं-यह तो जानते हो कि हम परमपिता परमात्मा के सामने बैठे हैं। बाबा को अपना रथ नहीं है, यह तो निश्चय है ना? इस भृकुटी के बीच में बाप का निवास स्थान है। बाप ने खुद कहा है-मैं इनकी भृकुटी के बीच में बैठता हूँ। इनका शरीर लोन पर लेता हूँ। आत्मा भृकुटी के बीच में बैठती है तो बाप भी यहाँ ही आकर बैठते हैं। ब्रह्मा भी है तो शिवबाबा भी है। अगर यह ब्रह्मा नहीं होता तो शिवबाबा भी नहीं होता। अगर कोई कहे कि हम तो शिवबाबा को ही याद करते हैं, ब्रह्मा को नहीं, परन्तु शिवबाबा बोलेंगे कैसे? ऊपर में तो सदैव शिवबाबा को याद करते आये। अभी तुम बच्चों को पता है हम बाप के पास यहाँ बैठे हैं। ऐसे तो नहीं समझेंगे कि शिवबाबा ऊपर में है। जैसे भक्तिमार्ग में कहते थे शिवबाबा ऊपर में है, उनकी प्रतिमा यहाँ पूजी जाती है। यह बातें बहुत समझने की हैं। जानते हो बाप ज्ञान का सागर, नॉलेजफुल है तो कहाँ से नॉलेज सुनाते हैं? ब्रह्मा के तन से सुनाते हैं। कई कहते हैं हम ब्रह्मा को नहीं मानते, परन्तु शिवबाबा कहते हैं मैं इस मुख द्वारा ही तुम्हें कहता हूँ, मुझे याद करो। यह समझ की बात है ना। ब्रह्मा तो खुद कहते हैं-शिवबाबा को याद करो। यह कहाँ कहते मुझे याद करो? इनके द्वारा शिवबाबा कहते हैं मुझे याद करो। यह मंत्र मैं इनके मुख से देता हूँ। ब्रह्मा नहीं होता तो मैं मंत्र कैसे देता? ब्रह्मा नहीं होता तो तुम शिवबाबा से कैसे मिलते? कैसे मेरे पास बैठते? अच्छे-अच्छे महारथियों को भी ऐसे-ऐसे ख्यालात आ जाते हैं जो माया मेरे से मुख मोड़ देती है। कहते हैं हम ब्रह्मा को नहीं मानते तो उनकी क्या गति होगी? माया कितनी बड़ी जबरदस्त है जो एकदम मुँह ही फिरा देती है। अभी तुम्हारा मुँह शिवबाबा ने सामने किया है। तुम सम्मुख बैठे हो। फिर जो ऐसे समझते हैं ब्रह्मा तो कुछ नहीं, तो उनकी क्या गति होगी? दुर्गति को पा लेते हैं। मनुष्य तो पुकारते हैं-ओ गॉड फादर! फिर गॉड फादर सुनता है क्या? कहते हैं-ओ लिबरेटर आओ। क्या वहाँ से ही लिबरेट करेंगे? कल्प-कल्प के पुरूषोत्तम संगमयुग पर ही बाप आते हैं। जिसमें आते हैं उनको ही उड़ा दें तो क्या कहेंगे? माया में इतना बल है जो नम्बरवन वर्थ नाट ए पेनी बना देती है। ऐसे-ऐसे भी कोई-कोई सेन्टर्स पर हैं, तब तो बाप कहते हैं खबरदार रहना। भल बाबा के सुनाये हुए ज्ञान को दूसरों को सुनाते भी रहते हैं परन्तु जैसे पण्डित मिसल। जैसे बाबा पण्डित की कहानी सुनाते हैं… इस समय तुम बाप की याद से विषय सागर को पार कर क्षीरसागर में जाते हो ना! भक्ति मार्ग में ढेर कथायें बना दी हैं। पण्डित औरों को कहता था राम नाम कहने से पार हो जायेंगे, लेकिन खुद बिल्कुल चट खाते में था। खुद विकारों में जाते रहना और दूसरों को कहना निर्विकारी बनो। उनका क्या असर होगा? यहाँ भी कहाँ-कहाँ सुनाने वालों से सुनने वाले तीखे चले जाते हैं। जो बहुतों की सेवा करते हैं वह जरूर सबको प्यारे लगते हैं। पण्डित झूठा निकल पड़ा तो उसे कौन प्यार करेगा? फिर प्यार उन पर चला जायेगा जो प्रैक्टिकल में याद करते हैं। अच्छे-अच्छे महारथियों को भी माया हप कर जाती है।

बाबा समझाते हैं-अभी तो कर्मातीत अवस्था नहीं बनी है, जब तक लड़ाई की तैयारी न हो। एक तरफ लड़ाई की तैयारी होगी, दूसरे तरफ कर्मातीत अवस्था होगी। पूरा कनेक्शन है फिर लड़ाई पूरी हो जाती है, ट्रांसफर हो जायेंगे। पहले रूद्र माला बनती है। यह बातें और कोई नहीं जानते। तुम समझते हो इस दुनिया को बदलना है। वह समझते हैं दुनिया के अजुन 40 हजार वर्ष पड़े हैं। तुम समझते हो विनाश तो सामने खड़ा है। तुम हो मैनारिटी, वह हैं मैजारिटी। तो तुम्हारा कौन मानेगा? जब तुम्हारी वृद्धि हो जायेगी फिर तुम्हारे योग-बल से बहुत खींचकर आयेंगे, जितना तुम्हारे से कट निकलती जायेगी, उतना बल भरता जायेगा। ऐसे नहीं कि बाबा जानी-जाननहार है। नहीं, सभी की अवस्थाओं को जानते हैं। बाप बच्चों की अवस्था को नहीं जानेंगे? सब कुछ मालूम रहता है। अभी तो कर्मातीत अवस्था हो न सके। कड़ी-कड़ी भूलें होना भी सम्भव है, महारथियों से भी होती हैं। बातचीत, चाल-चलन आदि सभी प्रसिद्ध हो जाती है। अभी तो दैवी चलन बनानी है। देवता, सर्वगुण सम्पन्न हैं ना। अभी तुमको ऐसा बनना है। परन्तु माया किसको भी नहीं छोड़ती। छुईमुई बना देती है। 5 सीढ़ी हैं ना। देह-अभिमान आने से ऊपर से एकदम गिरते हैं। गिरा और मरा। आजकल अपने को मारने लिए कैसे-कैसे उपाय करते हैं! 20 मंजिल से गिरकर एकदम खत्म हो जाते हैं। ऐसे भी न हो कि हॉस्पिटल में पड़े रहें, दु:ख भोगें। फिर कोई अपने को आग लगा देते हैं, किसने बचा लिया तो कितना दु:ख भोगते हैं। जल जायें तो आत्मा भाग जाए इसलिए जीवघात करते हैं। समझते हैं जीवघात करने से दु:ख से छूट जायेंगे। जोश आता है तो बस। कई तो हॉस्पिटल में कितना दु:ख भोगते हैं। डॉक्टर समझते हैं कि यह दु:ख से छूट नहीं सकता, इनसे तो अच्छा गोली दे दें तो यह खत्म हो जाएं। परन्तु वह समझते हैं ऐसे गोली देना महापाप है। आत्मा खुद कहती है इस पीड़ा भोगने से अच्छा है शरीर छोड़ दें। अभी शरीर कौन छुड़ावे? यह है अपार दु:खों की दुनिया। वहाँ हैं अपार सुख।

तुम बच्चे समझते हो-हम अभी रिटर्न होते हैं, दु:खधाम से सुखधाम जाते हैं तो उनको याद करना है। बाप भी संगमयुग पर आते हैं जबकि दुनिया को बदलना होता है। बाप कहते हैं मैं आया हूँ तुम बच्चों को सर्व दु:खों से छुड़ाकर नई पावन दुनिया में ले जाने। पावन दुनिया में थोड़े रहते हैं। यहाँ तो बहुत हैं, पतित बने हैं इसलिए बुलाते हैं हे पतित-पावन… यह थोड़ेही समझते हैं कि हम महाकाल को बुलाते हैं कि हमें इस छी-छी दुनिया से घर ले चलो। जरूर बाबा आयेगा, सब मरेंगे तब तो पीस होगी ना। शान्ति-शान्ति करते रहते हैं। शान्ति तो शान्तिधाम में होगी। परन्तु इस दुनिया में शान्ति कैसे हो? जब तक कि इतने ढेर मनुष्य हैं। सतयुग में तो सुख-शान्ति थी। अभी तो कलियुग में अनेक धर्म हैं। वह जब खत्म हों, एक धर्म की स्थापना हो, तब तो सुख-शान्ति हो। हाहाकार के बाद फिर जयजयकार होती है। आगे चल देखना मौत का बाजार कितना गर्म होता है! कैसे मरते हैं! बॉम्बस से भी आग लगती है। आगे चल देखेंगे तो बहुत कहेंगे कि बरोबर विनाश तो होगा ही।

तुम बच्चे जानते हो कि यह सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है? विनाश तो होना ही है। एक धर्म की स्थापना बाप कराते हैं, राजयोग भी सिखलाते हैं। बाकी सभी अनेक धर्म ख़लास हो जायेंगे। गीता में कुछ दिखाया नहीं है। फिर गीता पढ़ने की रिजल्ट क्या? दिखाते हैं प्रलय हो गई। भल जलमई होती है परन्तु सारी दुनिया जल-मई नहीं होती। भारत तो अविनाशी पवित्र खण्ड है। उसमें भी आबू सबसे पवित्र तीर्थ स्थान है, जहाँ बाप आकर सर्व की सद्गति करते हैं। देलवाड़ा मन्दिर कैसा अच्छा यादगार है। कितना अर्थ सहित है। परन्तु जिन्होंने बनवाया है, वह यह नहीं जानते। फिर भी अच्छे समझदार तो थे ना। द्वापर में जरूर अच्छे समझदार होंगे। कलियुग में तो हैं सभी तमोप्रधान। सभी मन्दिरों से यह ऊंच है, जहाँ तुम बैठे हो। तुम जानते हो हम हैं चैतन्य, वह हमारा ही जड़ यादगार है। बाकी कुछ समय यह मन्दिर आदि और भी बनते रहेंगे। फिर तो टूटने का समय आयेगा। सब मन्दिर आदि टूट-फूट जायेंगे। होलसेल मौत होगा। महाभारी महाभारत लड़ाई गाई हुई है ना, जिसमें सब खलास हो जाते हैं। यह भी तुम समझते हो-बाप संगम पर ही आते हैं। बाप को रथ तो चाहिए ना। आत्मा जब शरीर में आती है तब ही चुरपुर होती है। आत्मा शरीर से निकलती है तो शरीर जड़ हो जाता है। तो बाप समझाते हैं अभी तुम घर जाते हो। तुम्हें लक्ष्मी-नारायण जैसा बनना है। तो ऐसे गुण भी चाहिए ना। तुम बच्चे इस खेल को भी जानते हो। यह खेल कितना वन्डरफुल बना हुआ है। इस खेल का राज़ बाप बैठ समझाते हैं। बाप नॉलेजफुल, बीजरूप है ना। बाप ही आकर सारे वृक्ष की नॉलेज देते हैं-इसमें क्या-क्या होता है, तुमने इसमें कितना पार्ट बजाया? आधाकल्प है दैवी राज्य, आधा कल्प है आसुरी राज्य। जो अच्छे-अच्छे बच्चे हैं उनकी बुद्धि में सारी नॉलेज रहती है। बाप आप समान टीचर बनाते हैं। टीचर भी नम्बरवार तो होते हैं। कई तो टीचर होकर फिर बिगड़ पड़ते हैं। बहुतों को सिखलाकर खुद खत्म हो जाते हैं। छोटे-छोटे बच्चों में भिन्न-भिन्न संस्कार होते हैं। बाप समझाते हैं यहाँ भी जो ज्ञान ठीक रीति नहीं उठाते हैं, चलन नहीं सुधारते हैं वो बहुतों को दु:ख देने के निमित्त बन जाते हैं। यह भी शास्त्रों में दिखाया है-असुर छिपकर बैठते थे फिर बाहर जाकर ट्रेटर बन कितना तंग करते थे। यह तो सभी होता ही रहता है। ऊंच ते ऊंच बाप जो स्वर्ग की स्थापना करते हैं तो कितने विघ्न रूप बन पड़ते हैं।

बाप समझाते हैं तुम बच्चे सुख-शान्ति के टॉवर हो। तुम बहुत रॉयल हो। तुमसे रॉयल इस समय कोई होता नहीं। बेहद के बाप के बच्चे हो तो कितना मीठा होकर चलना चाहिए। किसको दु:ख नहीं देना है। नहीं तो वह अन्त में याद आयेगा। फिर सजायें खानी होंगी। बाप कहते हैं अभी तो घर चलना है। सूक्ष्मवतन में बच्चों को ब्रह्मा का साक्षात्कार होता है इसलिए तुम भी ऐसे सूक्ष्मवतनवासी बनो। मूवी की प्रैक्टिस करनी है। बहुत कम बोलना है, मीठा बोलना है। ऐसा पुरुषार्थ करते-करते तुम शान्ति के टॉवर बन जायेंगे। तुमको सिखलाने वाला बाप है। फिर तुम्हें औरों को सिखलाना है। भक्ति मार्ग टॉकी मार्ग है। अभी तुमको बनना है साइलेन्स। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बहुत रॉयल्टी से मीठा होकर चलना है। शान्ति और सुख का टॉवर बनने के लिए बहुत कम और मीठा बोलना है। मूवी की प्रैक्टिस करनी है। टॉकी में नहीं आना है।

2) स्वयं की दैवी चलन बनानी है। छुईमुई नहीं बनना है। लड़ाई के पहले कर्मातीत अवस्था तक पहुँचना है। निर्विकारी बन निर्विकारी बनाने की सेवा करनी है।

वरदान:- कर्म और संबंध दोनों में स्वार्थ भाव से मुक्त रहने वाले बाप समान कर्मातीत भव
आप बच्चों की सेवा है सबको मुक्त बनाने की। तो औरों को मुक्त बनाते स्वयं को बंधन में बांध नहीं देना। जब हद के मेरे-मेरे से मुक्त होंगे तब अव्यक्त स्थिति का अनुभव कर सकेंगे। जो बच्चे लौकिक और अलौकिक, कर्म और संबंध दोनों में स्वार्थ भाव से मुक्त हैं वही बाप समान कर्मातीत स्थिति का अनुभव कर सकते हैं। तो चेक करो कहाँ तक कर्मो के बंधन से न्यारे बने हैं? व्यर्थ स्वभाव-संस्कार के वश होने से मुक्त बने हैं? कभी कोई पिछला संस्कार स्वभाव वशीभूत तो नहीं बनाता है?
स्लोगन:- समान और सम्पूर्ण बनना है तो स्नेह के सागर में समा जाओ।

TODAY MURLI 18 DECEMBER 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 18 December 2018

Read Murli in Hindi :- Click Here

Read Murli 17 December 2018 :- Click Here

18/12/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, the births of you Brahmins are even more elevated and beneficial than those of the deities because only you Brahmins become the Father’s helpers.
Question: How do you children help Baba at this time? What prize does the Father give to His helper children?
Answer: Baba is establishing the kingdom of purity and peace and we are helping Him with purity. We are looking after the sacrificial fire that Baba has created, and so Baba would definitely give us a prize. It is only at the confluence age that we receive a very big prize. We now become trikaldarshi, those who know the beginning, middle and end of the world and we become seated on a throne in the future. This is the prize.
Song: As the Father, Mother, Support, Lord and Friend, You are the Protector for everyone!

Om shanti. Whose praise is this? This is the praise of the supremely beloved, Supreme Father, the Supreme Soul, whose name is Shiva. His name is the highest of all and His place of residence is also the highest of all. The meaning of the Supreme Father, the Supreme Soul, is that He is the highest soul of all. No one else can be called the Supreme Father, the Supreme Soul. His praise is limitless. It is said that there is so much praise of Him that you cannot reach the end of it. Even the rishis and munis used to say that you cannot reach His end. They have been saying: Neither this nor that (Neti neti). Now, Baba Himself has come and given His own introduction. Why? There should be Baba’s introduction, should there not? So, how can children receive His introduction? No one else can give His introduction until He Himself comes onto this earth. When Father shows son , son then shows Father. The Father explains: My part too is fixed. I alone have to come and make the impure ones pure. Because this is the kingdom of Ravan, sages and holy men continue to sing: The Purifier is Rama who belongs to Sita. Come! Ravan is no less. Who made the whole world tamopradhan and impure? Ravan. Then, powerful Rama comes to make it pure. For half the cycle there is the kingdom of Rama and for half the cycle the kingdom of Ravan continues. No one knows who Ravan is. They continue to burn his effigy every year. In spite of that, the kingdom of Ravan still continues; he doesn’t get burnt. People say that if God is all-powerful, why does He allow Ravan to rule? The Father explains: This is a play of victory and defeat, of hell and heaven. The whole play is based on Bharat. This drama is predestined. It isn’t that because the Supreme Father is the Almighty Authority He would come before the end of the play or that He could stop the play half-way through. The Father says: I come when the whole world has become impure. That is why people celebrate Shiv Ratri. They also say: Salutations to Shiva. They say: Salutations to the deities Brahma, Vishnu and Shankar. However, they would say to Shiva: Salutations to the Supreme Soul. Is Shiva like they have shown in the temples to Babulnath and Somnath? Does the Supreme Father, the Supreme Soul, have such a large form? Or, is it that souls have a tiny form and the Father has a large form? There would be this question, would there not? Just as, here, a small one is called a child and a senior is called a father, is it that, in the same way, the Supreme Father, the Supreme Soul, is bigger and we souls are smaller? No. The Father explains: Children, you sing My praise. You say that the praise of the Supreme Soul is limitless. He is the Seed of the human world tree. Therefore, the Father would be called the Seed, would He not? He is the Creator. All the rest – the Vedas, Upanishads, Gita, sacrificial fires, tapasya, donations and charity etc. – are the paraphernalia of devotion. They have their own time. There is half the cycle for devotion and half the cycle for knowledge. Devotion is the night of Brahma and knowledge is the day of Brahma. Shiv Baba explains to you. He doesn’t have a body of His own. He says: I once again teach you Raja Yoga in order to give you your fortune of the kingdom. The night of Brahma is now coming to an end. That same time of defamation of religion has now come. Whom do they defame the most? The Supreme Father, the Supreme Soul, Shiva. It is written: Whenever there is extreme irreligiousness, I come. It isn’t that I gave knowledge in Sanskrit in the previous cycle. It is the same language. When there is defamation in Bharat of the One who establishes the deity religion, when they put Me into pebbles and stones, I come. They have defamed so much the One who makes Bharat into heaven and impure ones pure. You children know that Bharat is the oldest land of all and that it is never destroyed. The kingdom of Lakshmi and Narayan also exists here in the golden age. It was the Creator of heaven who gave them that kingdom. Now that same Bharat is impure and this is why I have come once again. This is why they sing His praise: Salutations to Shiva. In this unlimited drama, the part of every soul is fixed and it continues to repeat. Some extract small parts of it and make limited drama s. We are now Brahmins and will then become deities. This is God’s clan. This is the end of your 84th birth. At this time, you have knowledge of all four clans. This is why the Brahmin clan is the highest of all. However, it is the deities who are praised and worshipped. There is also the Brahma Temple, but no one knows that God enters this one and makes Bharat into heaven. Since establishment is taking place, destruction must also take place and this is why it is said: The flames of destruction emerged from the sacrificial fire of the knowledge of Rudra. That same Father now explains to you children: Sweet children, this is now your final birth. I have come once again to give you your inheritance of heaven. It is your right, but I will give the prize of heaven to those who follow My shrimat. Others too receive peace prize s etc., but the Father gives all of you the prize of heaven. He says: I do not take it. I inspire the establishment of it to take place through you, and so I would give it to you. You are the grandchildren of Shiv Baba, the children of Brahma. Only Prajapita Brahma would adopt so many children. This Brahmin birth is your highest birth. This is the benevolent birth. The births of deities and shudras are not benevolent. This is your most benevolent birth because you become the Father’s helpers and establish peace and purityin the world. Those people who give prizes do not know this. They give them to Americans etc. The Father says: I give a prize to those who become My helpers. When there is purity in the world, there is also peace and prosperity. This is the brothel. The golden age is Shivalaya, the temple. Shiv Baba established it. Sages and sannyasis are hatha yogis. They cannot teach easy Raja Yoga to those who follow the household religion, even if they were to read the Gita and the Mahabharata a thousand times. That One is everyone’s Baba. He says to those of all religions: Connect your intellects in yoga to Me alone. I too am a tiny point. I am not that big. As is a soul, so the Supreme Soul. Each soul resides here in the centre of the forehead. If it were so big, how could it reside in the centre of the forehead? I am like a soul. It is just that I am also beyond birth and death. I am ever pure whereas all the rest of the souls come into birth and death. They become impure from pure and pure from impure. The Father has once again created this sacrificial fire of Rudra to make impure ones pure. After this, there won’t be any sacrificial fires in the golden age. Then, from the copper age they, will continue to create many types of sacrificial fire. This sacrificial fire of Rudra is only created once in the whole cycle. The offering of everyone is put into it. Then, no other sacrificial fires will be created. Sacrificial fires are created when there are calamities. When there is no rain or there is some other calamity, they create a sacrificial fire. There are no calamities in the golden and silver ages. At this time, there are many types of calamity. This is why the greatest Merchant, Shiv Baba, has had this sacrificial fire created, and so He grants you a vision in advance of how all the offerings will be put into the fire, how destruction is to take place and how the old world is to become a graveyard. So then, why should you attach your heart to this old world? This is why you children have unlimited renunciation of the old world. Those sannyasis simply renounce their homes and families. You mustn’t renounce your homes and families. While looking after your homes and families, you have to break your attachment away from them. All of them are already dead. Why should you attach your hearts to them? This is the world of corpses. This is why it is said: Remember the land of angels. Why do you remember the graveyard? Baba has become the Agent and He connects your intellects in yoga to Him. They say: Souls and the Supreme Soul remained separated for a long time. This praise also belongs to Him. Iron-aged gurus cannot be called the Purifier. They cannot grant salvation. Yes, they can relate scriptures and perform rituals. Shiv Baba doesn’t have a teacher or guru. Baba says: I have come to give you the inheritance of heaven. Then, you may become part of the sun dynasty or the moon dynasty. How do you become that? Is it through war? No; neither Lakshmi and Narayan nor Rama and Sita claimed their kingdom through war. They battled with Maya at this time. You are incognito warriors. This is why no one knows you, the Shakti Army. You become the masters of the whole world with the power of yoga. You lost the kingdom of the world and you are now claiming it back once again. It is the Father who gives you that prize. Those who now become the Father’s helpers are the ones who will receive the prize of peace and prosperity for half the cycle. Those who remain bodiless and remember the Father, who spin the discus of self-realisation, who remember the land of peace, their sweet home and their sweet kingdom and become pure, Baba calls helpers. It is so easy! I, the soul, am a star. My Father, the Supreme Soul, is also a star. He is not as big as that but how can a s tar be worshipped? Therefore, they have made Him large so that they can worship Him. It is the Father who is worshipped first and then others are later worshipped. Lakshmi and Narayan are worshipped so much but who was it who made them become like that? The Bestower of Salvation for All is the one Father. The greatness is of that One. His birthday is worth diamonds whereas the birthday s of the rest are worth shells. Salutations to Shiva. This is His sacrificial fire. It has been created through you Brahmins. He says: I will give this much fruit to those who help Me establish purity and peace. He has had this sacrificial fire created through you Brahmins and so He would definitely give you alms. He has created such a big sacrificial fire. No other sacrificial fire continues for this long. He says: For however long someone helps Me, I will give them a prize accordingly. I am the One who gives everyone a prize. I do not take anything. I give you everything. Those who do something will receive the return of it. If you do little, you will end up among the subjects. Those who helped Gandhiji then became the President or a Minister etc. That is happiness for a temporary period. The Father gives you all the knowledge of the beginning, the middle and the end and makes you trikaldarshi, the same as He is. He says: By knowing My biography, you will come to know everything. Sannyasis cannot give this knowledge. What inheritance would you receive from them? They would give a throne to only one, so what would the rest receive? Baba gives all of you a throne. He does such altruistic service, and yet you have put Me into pebbles and stones and have defamed Me so much! This drama is predestined. When you have become like shells, I then make you become like diamonds. I have made Bharat into heaven countless times, and then Maya turned it into hell. If you now want attainment, then become the Father’s helpers and claim the real prize. It is purity first in this. Baba also praises sannyasis. They too are good because they remain pure. They support Bharat and prevent it from becoming degraded. There is no telling what would have become of it otherwise. However, Bharat now has to be made into heaven, and so you definitely have to live at home with your families and remain pure. Both Bap and Dada explain to you children. Shiv Baba also gives you children advice through this old shoe. He cannot take a new one. He doesn’t enter a mother’s womb. He comes into the impure world and enters an impure body. There is extreme darkness in this iron age. He has to make extreme darkness into total light. Achcha.

To the sweetest beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Remove this unlimited world from your heart and break your attachments. Don’t attach your heart to it.
  2. Become a helper of the Father and, in order to claim a prize : 1. Remain bodiless. 2. Become pure. 3. Spin the discus of self-realisation. 4. Remember your sweet home and your sweet kingdom.
Blessing: May you be ever happy and experience happiness in the garden of the flowers of divine virtues in your life.
To be constantly in a state of happiness means to be full and complete. Previously, your life was in a jungle of thorns and you have now come into the happiness of flowers. The flowers of divine virtues are constantly in the garden of your life, and so whoever comes into contact with you will continue to receive the fragrance from the flowers of divine virtues and will be happy on seeing this happiness. They will experience power. This happiness makes others powerful and brings them into happiness and this is why you say that you are ever happy.
Slogan: master almighty authority is one who plays with the bubbles of Maya instead of being afraid of them.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 18 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 18 December 2018

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18-12-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – देवताओं से भी उत्तम कल्याणकारी जन्म तुम ब्राह्मणों का है क्योंकि तुम ब्राह्मण ही बाप के मददगार बनते हो”
प्रश्नः- अभी तुम बच्चे बाबा को कौन-सी मदद करते हो? मददगार बच्चों को बाप क्या प्राइज़ देते हैं?
उत्तर:- बाबा प्योरिटी पीस का राज्य स्थापन कर रहे हैं, हम उन्हें प्योरिटी की मदद करते हैं। बाबा ने जो यज्ञ रचा है उसकी हम सम्भाल करते हैं तो जरूर बाबा हमें प्राइज़ देगा। संगम पर भी हमें बहुत बड़ी प्राइज़ मिलती है, हम सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को जानने वाले त्रिकालदर्शी बन जाते हैं और भविष्य में गद्दी नशीन बन जाते हैं, यही प्राइज़ है।
गीत:- पितु मात सहायक स्वामी सखा……..

ओम् शान्ति। यह किसकी महिमा है? यह है परमप्रिय परमपिता परमात्मा जिनका नाम शिव है, उनकी महिमा। उनका ऊंच ते ऊंच नाम भी है तो ऊंचे ते ऊंचा धाम भी है। परमपिता परम आत्मा का भी अर्थ है – सबसे ऊंचे ते ऊंची आत्मा। और किसको भी परमपिता परमात्मा नहीं कहा जाता। उसकी महिमा अपरम्पार है। ऐसे कहते हैं कि इतनी तो महिमा है जो उसका पार नहीं पा सकते। ऋषि-मुनि भी ऐसे कहते थे कि उसका पार नहीं पा सकते। वो भी नेती-नेती कहते आये हैं। अब बाबा स्वयं आकर अपना परिचय देते हैं। क्यों? बाबा का परिचय तो होना चाहिए ना। तो बच्चों को परिचय मिले कैसे? जब तक वह इस भूमि पर न आये तब तक और कोई उनका परिचय दे न सके। जब फादर शोज़ सन, तब सन शोज़ फादर। बाप समझाते हैं मेरा भी पार्ट नूंधा हुआ है। मुझे ही आकर पतितों को पावन करना है। साधू-सन्त भी गाते रहते हैं – पतित-पावन सीताराम आओ क्योंकि रावण का राज्य है, रावण कोई कम नहीं है। सारी दुनिया को तमोप्रधान पतित किसने बनाया? रावण ने। फिर पावन बनाने वाला समर्थ राम है ना। आधाकल्प राम राज्य है तो आधाकल्प रावण का भी राज्य चलता है। रावण क्या है, यह कोई नहीं जानते। वर्ष-वर्ष जलाते रहते हैं। तो भी रावण का राज्य चलता रहता है। जलता थोड़ेही है। मनुष्य कहते हैं परमात्मा समर्थ है, तो रावण को राज्य करने क्यों देते हैं। बाप समझाते हैं यह नाटक है हार जीत का, हेल और हेविन का। भारत पर ही सारा खेल बना हुआ है। यही बना बनाया ड्रामा है। ऐसे नहीं परमपिता सर्वशक्तिमान् है तो खेल पूरा होने के पहले ही आयेगा या आधे में खेल को बन्द कर सकता है। बाप कहते हैं जब सारी दुनिया पतित हो जाती है तब मैं आता हूँ इसलिए शिवरात्रि भी मनाते हैं। शिवाए नम: भी कहते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को फिर भी देवता नम: कहेंगे। शिव को परमात्मा नम: कहेंगे। शिव क्या ऐसा ही है जैसा बबुलनाथ में या सोमनाथ के मन्दिर में है? क्या परमपिता परमात्मा का इतना बड़ा रूप है? वा आत्मा का छोटा, बाप का बड़ा है? क्वेश्चन आयेगा ना? जैसे यहाँ छोटे को बच्चा, बड़े को बाप कहा जाता है, वैसे परमपिता परमात्मा अन्य आत्माओं से बड़ा है और हम आत्मायें छोटी हैं? नहीं। बाप समझाते हैं – बच्चे, मेरी महिमा गाते हो, कहते हो परमात्मा की महिमा अपरमपार है। मनुष्य सृष्टि का बीज है, तो पिता को बीज कहेंगे ना। वह क्रियेटर है। बाकी जो इतने वेद, उपनिषद, गीता, यज्ञ, तप, दान, पुण्य…. यह सब है भक्ति की सामग्री। इनका भी अपना टाइम है। आधा कल्प भक्ति का, आधा कल्प ज्ञान का। भक्ति है ब्रह्मा की रात, ज्ञान है ब्रह्मा का दिन। यह शिवबाबा तुमको समझाते हैं, इनको अपना तन तो है नहीं। कहते हैं मैं तुमको फिर से राजयोग सिखलाता हूँ राज्य-भाग्य दिलाने लिए। अब ब्रह्मा की रात पूरी होती है, वही धर्म ग्लानि का समय आ पहुँचा है। सबसे जास्ती ग्लानी किसकी करते हैं? परमपिता परमात्मा शिव की। लिखा है ना यदा यदाहि…….. ऐसे नहीं, मैंने कल्प पहले कोई संस्कृत में ज्ञान दिया है। भाषा तो यही है। तो जब भारत में देवी-देवता धर्म स्थापन करने वाले की ग्लानी होती है, मुझे ठिक्कर-भित्तर में ठोक देते हैं, तब मैं आता हूँ। जो भारत को स्वर्ग बनाते हैं, पतितों को पावन बनाते हैं, उसकी कितनी ग्लानी की है।

तुम बच्चे जानते हो भारत है सबसे पुराना खण्ड, जो कभी विनाश नहीं होता है। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य भी यहाँ ही होता है। यह राज्य भी स्वर्ग के रचयिता ने दिया है। अब तो वही भारत पतित है तब फिर मैं आता हूँ, तब तो उनकी महिमा गाते हैं शिवाए नम:। इस बेहद के ड्रामा में हर एक आत्मा का पार्ट नूंधा हुआ है, जो रिपीट होता है। जिससे ही कोई टुकड़ा निकाल हद का ड्रामा बनाते हैं। अभी हम ब्राह्मण हैं फिर देवता बनेंगे। यह है ईश्वरीय वर्ण। यह है तुम्हारा 84वें जन्म का भी अन्त। इसमें चारों वर्णों का तुमको ज्ञान है इसलिए ब्राह्मण वर्ण सबसे ऊंच है। परन्तु महिमा व पूजा देवताओं की होती है। ब्रह्मा का मन्दिर भी है परन्तु कोई को पता नहीं कि इसमें परमात्मा आकर भारत को स्वर्ग बनाते हैं। जब स्थापना हो रही है तो विनाश भी चाहिए इसलिए कहते हैं कि रूद्र ज्ञान यज्ञ से विनाश ज्वाला निकली।

अब वही बाप बच्चों को समझा रहे हैं – मीठे बच्चे, अब यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है मैं तुमको फिर से स्वर्ग का वर्सा देने आया हूँ। तुम्हारा हक है, परन्तु जो मेरी श्रीमत पर चलेंगे उनको मैं स्वर्ग की प्राइज़ दूँगा। उन्हें भी पीस प्राइज़ आदि मिलती है। परन्तु बाप तो तुम सबको स्वर्ग की प्राइज़ देते हैं। कहते हैं मैं नहीं लूंगा। मैं तुम्हारे द्वारा स्थापना कराता हूँ तो तुमको ही दूंगा। तुम हो शिवबाबा के पोत्रे, ब्रह्मा के बच्चे। इतने बच्चे तो प्रजापिता ब्रह्मा ही एडाप्ट करते होंगे ना। यह ब्राह्मण जन्म तुम्हारा सबसे उत्तम है। यह कल्याणकारी जन्म है। देवताओं का जन्म या शूद्रों का जन्म कल्याणकारी नहीं है। यह तुम्हारा जन्म बहुत कल्याणकारी है क्योंकि बाप का मददगार बन सृष्टि पर प्योरिटी, पीस स्थापन करते हो। वह इनाम देने वाले थोड़ेही जानते हैं। वो तो कोई अमेरिकन आदि को दे देते हैं। बाप फिर कहते हैं जो मेरे मददगार बनेंगे मैं उनको प्राइज़ दूंगा। प्योरिटी है तो सृष्टि में पीस, प्रासपर्टी भी है। यह तो वेश्यालय है। सतयुग है शिवालय। शिवबाबा ने स्थापन किया है। साधू सन्यासी हैं हठयोगी, गृहस्थ धर्म वालों को सहज राजयोग तो सिखा नहीं सकते। भल हजार बार गीता महाभारत पढ़ें। यह तो सबका बाबा है। सभी धर्म वालों को कहते हैं कि अपना बुद्धियोग एक मेरे से लगाओ। मैं भी छोटा-सा बिन्दू हूँ, इतना बड़ा नहीं हूँ। जैसी आत्मा वैसा ही मैं परमात्मा हूँ। आत्मा भी यहाँ भ्रकुटी के बीच में रहती है। इतनी बड़ी होती तो यहाँ कैसे बैठ सकती। मैं भी आत्मा जैसा ही हूँ। सिर्फ मैं जन्म-मरण रहित सदा पावन हूँ और आत्मायें जन्म-मरण में आती हैं। पावन से पतित और पतित से पावन होती हैं। अब फिर से पतितों को पावन बनाने के लिए बाप ने यह रूद्र यज्ञ रचा है। इसके बाद सतयुग में कोई यज्ञ नहीं होता। फिर द्वापर से अनेक प्रकार के यज्ञ रचते रहते हैं। यह रूद्र ज्ञान यज्ञ सारे कल्प में एक ही बार रचा जाता है, इसमें सबकी आहुति पड़ जाती है। फिर कोई यज्ञ नहीं रचा जाता। यज्ञ रचते तब हैं जब कोई आफतें आती हैं। बरसात नहीं पड़ती है वा अन्य कोई आफतें आती हैं तो यज्ञ करते हैं। सतयुग-त्रेता में तो कोई आफतें आती नहीं। इस समय अनेक प्रकार की आफतें आती हैं इसलिए सबसे बड़े सेठ शिवबाबा ने यज्ञ रचवाया है तो पहले से ही साक्षात्कार कराते हैं। कैसे सब आहुति पड़नी है, कैसे विनाश होना है, पुरानी दुनिया कब्रिस्तान बननी है। तो फिर इस पुरानी दुनिया से क्या दिल लगानी है इसलिए तुम बच्चे बेहद पुरानी दुनिया का सन्यास करते हो। वह सन्यासी तो सिर्फ घरबार का सन्यास करते हैं। तुमको तो घरबार नहीं छोड़ना है। यहाँ गृहस्थ व्यवहार सम्भालते भी इससे सिर्फ ममत्व तोड़ना है। यह सब मरे पड़े हैं, इनसे क्या दिल लगाना। यह तो मुर्दों की दुनिया है, इसलिए कहते हैं कि परिस्तान को याद करो, कब्रिस्तान को क्यों याद करते हो।

बाबा भी दलाल बन तुम्हारी बुद्धि का योग अपने साथ लगाते हैं। कहते हैं ना आत्मा-परमात्मा अलग रहे बहुकाल…… यह महिमा भी उनकी है। कलियुगी गुरू को पतित-पावन कह नहीं सकते। वह सद्गति तो कर नहीं सकते। हाँ शास्त्र सुनाते हैं, क्रिया-कर्म कराते हैं। शिवबाबा का कोई टीचर, गुरू नहीं। बाबा तो कहते मैं तो तुमको स्वर्ग का वर्सा देने आया हूँ। फिर सूर्यवंशी बनो, चाहे चन्द्रवंशी बनो। वह कैसे बनते हैं, लड़ाई से? नहीं। न लक्ष्मी-नारायण ने लड़ाई से राज्य लिया, न राम-सीता ने। इन्होंने इस समय माया से लड़ाई की है। तुम इनकागनीटो वारियर्स हो इसलिए तुम शक्ति सेना को कोई जानते नहीं। तुम योगबल से सारे विश्व के मालिक बनते हो। तुमने ही विश्व का राज्य गंवाया है फिर तुम ही पा रहे हो। तुमको प्राइज़ देने वाला बाप है। अब जो बाप के मददगार बनेंगे उनको ही आधाकल्प के लिए पीस, प्रासपर्टी की प्राइज़ मिलेगी। बाबा मददगार उन्हें कहते हैं जो अशरीरी होकर बाप को याद करते हैं, स्वदर्शन चक्र फिराते हैं, शान्तिधाम, स्वीट होम और स्वीट राजधानी को याद कर पवित्र बनते हैं। कितना सहज है। हम आत्मा भी स्टार हैं। हमारा बाप परमात्मा भी स्टार है। वह इतना कोई बड़ा नहीं है परन्तु स्टार की पूजा कैसे हो इसलिए पूजा के लिए इतना बड़ा बना दिया है। पूजा तो पहले बाप की होती है, पीछे दूसरों की होती है। लक्ष्मी-नारायण की कितनी पूजा होती है। परन्तु उनको ऐसा बनाने वाला कौन? सबका सद्गति दाता बाप। बलिहारी उस एक की है ना। उनकी जयन्ती (बर्थ) डायमन्ड तुल्य है। बाकी सबके बर्थ कौड़ी तुल्य हैं। शिवाए नम: – यह उनका यज्ञ है, तुम ब्राह्मणों से रचवाया है। कहते हैं जो मुझे प्योरिटी पीस स्थापन करने में मदद करेंगे उनको इतना फल दूंगा। ब्राह्मणों से यज्ञ रचवाया है तो दक्षिणा तो देंगे ना। इतना बड़ा यज्ञ रचा है। और कोई भी यज्ञ इतना समय नहीं चलता है। कहते हैं जो जितना मुझे मदद करेंगे उतनी प्राइज़ दूंगा। सबको प्राइज़ देने वाला मैं हूँ। मैं कुछ नहीं लेता हूँ, सब तुमको देता हूँ। अब जो करेगा सो पायेगा। थोड़ा करेगा तो प्रजा में चला जायेगा। गांधी को भी जिन्होंने मदद की तो प्रेज़ीडेंट, मिनिस्टर आदि बने ना। यह तो है अल्पकाल का सुख। बाप तो तुमको सारे आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान दे आप समान त्रिकालदर्शी बनाते हैं। कहते हैं मेरी बायोग्राफी को जानने से तुम सब कुछ जान जायेंगे। सन्यासी थोड़ेही यह ज्ञान दे सकते हैं। उनसे वर्सा क्या मिलेगा। वह तो गद्दी भी एक को देंगे। बाकी को क्या मिलता है? बाबा तो तुम सबको गद्दी देते हैं। कितनी निष्काम सेवा करते हैं और तुमने तो मुझे ठिक्कर-भित्तर में डाल कितनी ग्लानी की है। यह भी ड्रामा बना हुआ है। जब कौड़ी जैसे बन जाते हो तब तुमको हीरे जैसा बनाता हूँ। मैंने तो अनगिनत बार भारत को स्वर्ग बनाया है फिर माया ने नर्क बनाया है। अब अगर प्राप्ति करनी है तो बाप के मददगार बन सच्ची प्राइज़ ले लो। इसमें प्योरिटी फर्स्ट है।

बाबा सन्यासियों की भी महिमा करते हैं – वह भी अच्छे हैं, जो पवित्र रहते हैं। यह भी भारत को थामते (गिरने से बचाते) हैं। नहीं तो पता नहीं क्या हो जाता। परन्तु अब तो भारत को स्वर्ग बनाना है तो जरूर घर गृहस्थ में रहते पवित्र बनना पड़े। बाप-दादा दोनों बच्चों को समझाते हैं। शिवबाबा भी इस पुरानी जुत्ती द्वारा बच्चों को राय देते हैं। नई ले नहीं सकते। माता के गर्भ में तो आते नहीं। पतित दुनिया, पतित शरीर में ही आते हैं, इस कलियुग में है घोर अन्धियारा। घोर अन्धियारे को ही सोझरा बनाना है। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस बेहद की दुनिया का दिल से सन्यास कर अपना ममत्व मिटा देना है, इससे दिल नहीं लगानी है।

2) बाप का मददगार बन प्राइज़ लेने के लिए – 1. अशरीरी बनना है, 2. पवित्र रहना है, 3. स्वदर्शन चक्र फिराना है, 4. स्वीट होम और स्वीट राजधानी को याद करना है।

वरदान:- जीवन में दिव्यगुणों के फूलों की फुलवाड़ी द्वारा खुशहाली का अनुभव करने वाले एवरहैप्पी भव
सदा खुशहाल अर्थात् भरपूर, सम्पन्न। पहले कांटों के जंगल में जीवन थी अभी फूलों की खुशहाली में आ गये। सदा जीवन में दिव्यगुणों के फूलों की फुलवाड़ी लगी हुई है, इसलिए जो भी आपके सम्पर्क में आयेगा उसे दिव्यगुणों के फूलों की खुशबू आती रहेगी और खुशहाली देख करके खुश होंगे, शक्ति का अनुभव करेंगे। खुशहाली औरों को भी शक्तिशाली बनाती और खुशी में लाती है इसलिए आप कहते हो कि हम एवरहैप्पी हैं।
स्लोगन:- मास्टर सर्वाशक्तिमान् वह हैं जो माया के बुदबुदों से डरने के बजाए उनसे खेलने वाले हैं।
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