daily murli 13 december

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 13 DECEMBER 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 13 December 2020

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13-12-20
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 18-03-87 मधुबन

सच्चे रूहानी आशिक की निशानियां

आज रूहानी माशूक अपने रूहानी आशिक आत्माओं से मिलने के लिए आये हैं। सारे कल्प में इस समय ही रूहानी माशूक और आशिकों का मिलन होता है। बापदादा अपने हर एक आशिक आत्मा को देख हर्षित होते हैं – कैसे रूहानी आकर्षण से आकर्षित हो अपने सच्चे माशूक को जान लिया, पा लिया है! खोये हुए आशिक को देख माशूक भी खुश होते हैं कि फिर से अपने यथार्थ ठिकाने पर पहुँच गये। ऐसा सर्व प्राप्ति कराने वाला माशूक और कोई मिल नहीं सकता। रूहानी माशूक सदा अपने आशिकों से मिलने के लिए कहाँ आते हैं? जैसा श्रेष्ठ माशूक और आशिक हैं, ऐसे ही श्रेष्ठ स्थान पर मिलने के लिए आते हैं। यह कौनसा स्थान है जहाँ मिलन मना रहे हो? इसी स्थान को जो भी कहो, सर्व नाम इस स्थान को दे सकते हैं। वैसे मिलने के स्थान जो अति प्रिय लगते हैं वह कौन-से होते हैं? मिलन या फूलों के बगीचे में होता है वा सागर के किनारे पर मिलना होता है, जिसको आप लोग बीच (समुद्र का किनारा) कहते हो। तो अब कहाँ बैठे हो? ज्ञान सागर के किनारे रूहानी मिलन के स्थान पर बैठे हो। रूहानी वा गॉडली गार्डन (अल्लाह का बगीचा) है। और तो अनेक प्रकार के बगीचे देखे हैं लेकिन ऐसा बगीचा जहाँ हरेक एक दो से ज्यादा खिले हुए फूल है, एक-एक श्रेष्ठ सुन्दरता से अपनी खुशबू दे रहे हैं – ऐसा बगीचा है। इसी बीच पर बापदादा वा माशूक मिलने आते हैं। वह अनेक बीच देखीं, लेकिन ऐसी बीच कब देखी जहाँ ज्ञान सागर के स्नेह की लहरें, शक्ति की लहरें, भिन्न-भिन्न लहरें लहराए सदा के लिए रिफ्रेश कर देती हैं? यह स्थान पसन्द है ना? स्वच्छता भी है और रमणीकता भी है। सुन्दरता भी है। इतनी ही प्राप्तियां भी हैं। ऐसा मनोरंजन का विशेष स्थान आप आशिकों के लिए माशूक ने बनाया है जहाँ आने से मुहब्बत की लकीर के अन्दर पहुँचते ही अनेक प्रकार की मेहनत से छूट जाते। सबसे बड़ी मेहनत – नैचुरल याद की, वह सहज अनुभव करते हो और कौनसी मेहनत से छूटते हो? लौकिक जॉब (नौकरी) से भी छूट जाते हो। भोजन बनाने से भी छूट जाते हो। सब बना बनाया मिलता है ना। याद भी स्वत: अनुभव होती। ज्ञान रत्नों की झोली भी भरती रहती। ऐसे स्थान पर जहाँ मेहनत से छूट जाते हो और मुहब्बत में लीन हो जाते हो।

वैसे भी स्नेह की निशानी विशेष यही गाई जाती कि दो, दो न रहें लेकिन दो मिलकर एक हो जाएं। इसको ही समा जाना कहते हैं। भक्तों ने इसी स्नेह की स्थिति को समा जाना वा लीन होना कह दिया है। वो लोग लीन होने का अर्थ नहीं समझते। लव में लीन होना – यह स्थिति है लेकिन स्थिति के बदले उन्होंने आत्मा के अस्तित्व को सदा के लिए समाप्त करना समझ लिया है। समा जाना अर्थात् समान बन जाना। जब बाप के वा रूहानी माशूक के मिलन में मग्न हो जाते हो तो बाप समान बनने अथवा समा जाने अर्थात् समान बनने का अनुभव करते हो। इसी स्थिति को भक्तों ने समा जाना कहा है। लीन भी होते हो, समा भी जाते हो। लेकिन यह मिलन के मुहब्बत के स्थिति की अनुभूति है। समझा! इसलिए बापदादा अपने आशिकों को देख रहे हैं।

सच्चे आशिक अर्थात् सदा आशिक, नैचुरल (स्वत:) आशिक। सच्चे आशिक की विशेषतायें जानते भी हो। फिर भी उसकी मुख्य निशानियां हैं:-

पहली निशानी – एक माशूक द्वारा सर्व सम्बन्धों की समय प्रमाण अनुभूति करना। माशूक एक है लेकिन एक के साथ सर्व सम्बन्ध हैं। जो सम्बन्ध चाहें और जिस समय जिस सम्बन्ध की आवश्यकता है, उस समय उस सम्बन्ध के रूप से प्रीति की रीति द्वारा अनुभव कर सकते हो। तो पहली निशानी है – सर्व सम्बन्धों की अनुभूति। ‘सर्व’ शब्द को अण्डरलाइन करना। सिर्फ सम्बन्ध नहीं। कई ऐसे नटखट आशिक भी हैं जो समझते हैं सम्बन्ध तो जुट गया है। लेकिन सर्व सम्बन्ध जुटे हैं? और दूसरी बात – समय पर सम्बन्ध की अनुभूति होती है? नॉलेज के आधार पर सम्बन्ध है वा दिल की अनुभूति से सम्बन्ध है? बापदादा सच्ची दिल पर राज़ी है। सिर्फ तीव्र दिमाग वालों पर राज़ी नहीं, लेकिन दिलाराम दिल पर राज़ी है इसलिए दिल का अनुभव दिल जाने, दिलाराम जाने। समाने का स्थान दिल कहा जाता है, दिमाग नहीं। नॉलेज को समाने का स्थान दिमाग है, लेकिन माशूक को समाने का स्थान दिल है। माशूक आशिकों की बातें ही सुनायेंगे ना। कोई-कोई आशिक दिमाग ज्यादा चलाते लेकिन दिल से दिमाग की मेहनत आधी हो जाती है। जो दिल से सेवा करते वा याद करते, उन्हों की मेहनत कम और सन्तुष्टता ज्यादा होती और जो दिल के स्नेह से नहीं याद करते, सिर्फ नॉलेज के आधार पर दिमाग से याद करते वा सेवा करते, उन्हों को मेहनत ज्यादा करनी पड़ती, सन्तुष्टता कम होती। चाहे सफलता भी हो जाए, तो भी दिल की सन्तुष्टता कम होगी। यही सोचते रहेंगे – हुआ तो अच्छा, लेकिन फिर, फिर भी… करते रहेंगे और दिल वाले सदा सन्तुष्टता के गीत गाते रहेंगे। दिल की सन्तुष्टता के गीत, मुख की सन्तुष्टता के गीत नहीं। सच्चे आशिक दिल से सर्व सम्बन्धों की समय प्रमाण अनुभूति करते हैं।

दूसरी निशानी – सच्चे आशिक हर परिस्थिति में, हर कर्म में सदा प्राप्ति की खुशी में होंगे। एक है अनुभूति, दूसरी है उससे प्राप्ति। कई अनुभूति भी करते हैं कि हाँ, मेरा बाप भी है, साजन भी है। बच्चा भी है लेकिन प्राप्ति जितनी चाहते उतनी नहीं होती है। बाप है, लेकिन वर्से के प्राप्ति की खुशी नहीं रहती। अनुभूति के साथ सर्व सम्बन्धों द्वारा प्राप्ति का भी अनुभव हो। जैसे – बाप के सम्बन्ध द्वारा सदा वर्से के प्राप्ति की महसूसता हो, भरपूरता हो। सतगुरू द्वारा सदा वरदानों से सम्पन्न स्थिति का वा सदा सम्पन्न स्वरूप का अनुभव हो। तो प्राप्ति का अनुभव भी आवश्यक है। वह है सम्बन्धों का अनुभव, यह है प्राप्तियों का अनुभव। कईयों को सर्व प्राप्तियों का अनुभव नहीं होता। मास्टर सर्वशक्तिवान है लेकिन समय पर शक्तियों की प्राप्ति नहीं होती। प्राप्ति की अनुभूति नहीं तो प्राप्ति में भी कमी है। तो अनुभूति के साथ प्राप्ति स्वरूप भी बनें – यह है सच्चे आशिक की निशानी।

तीसरी निशानी – जिस आशिक को अनुभूति है, प्राप्ति भी है वह सदा तृप्त रहेंगे, किसी भी बात में अप्राप्त आत्मा नहीं लगेगी। तो, ‘तृप्ति’ – यह आशिक की विशेषता है। जहाँ प्राप्ति है, वहाँ तृप्ति जरूर है। अगर तृप्त नहीं तो अवश्य प्राप्ति में कमी है और प्राप्ति नहीं तो सर्व सम्बन्धों की अनुभूति में कमी है। तो 3 निशानियां है – अनुभूति, प्राप्ति और तृप्ति। सदा तृप्त आत्मा। जैसा भी समय हो, जैसा भी वायुमण्डल हो, जैसे भी सेवा के साधन हों, जैसे भी सेवा के संगठन के साथी हों लेकिन हर हाल में, हर चाल में तृप्त हों। ऐसे सच्चे आशिक हो ना? तृप्त आत्मा में कोई हद की इच्छा नहीं होगी। वैसे देखो तो तृप्त आत्मा बहुत मैनारिटी (थोड़ी) रहती है। कोई न कोई बात में चाहे मान की, चाहे शान की भूख होती है। भूख वाला कभी तृप्त नहीं होता। जिसका सदा पेट भरा हुआ होता, वह तृप्त होता है। तो जैसे शरीर के भोजन की भूख है, वैसे मन की भूख है – शान, मान, सैलवेशन, साधन। यह मन की भूख है। तो जैसे शरीर की तृप्ति वाले सदा सन्तुष्ट होंगे, वैसे मन की तृप्ति वाले सदा सन्तुष्ट होंगे। सन्तुष्टता तृप्ति की निशानी है। अगर तृप्त आत्मा नहीं होंगे, चाहे शरीर की भूख, चाहे मन की भूख होगी तो जितना भी मिलेगा, मिलेगा भी ज्यादा लेकिन तृप्त आत्मा न होने कारण सदा ही अतृप्त रहेंगे। असन्तुष्टता रहती है। जो रॉयल होते हैं, वह थोड़े में तृप्त होते हैं। रॉयल आत्माओं की निशानी – सदा ही भरपूर होंगे, एक रोटी में भी तृप्त तो 36 प्रकार के भोजन में भी तृप्त होंगे। और जो अतृप्त होंगे, वह 36 प्रकार के भोजन मिलते भी तृप्त नहीं होंगे क्योंकि मन की भूख है। सच्चे आशिक की निशानी – सदा तृप्त आत्मा होंगे। तो तीनों ही निशानियां चेक करो। सदैव यह सोचो – ‘हम किसके आशिक हैं! जो सदा सम्पन्न है, ऐसे माशूक के आशिक हैं!’ तो सन्तुष्टता कभी नहीं छोड़ो। सेवा छोड़ दो लेकिन सन्तुष्टता नहीं छोड़ो। जो सेवा असन्तुष्ट बनावे वो सेवा, सेवा नहीं। सेवा का अर्थ ही है मेवा देने वाली सेवा। तो सच्चे आशिक सर्व हद की चाहना से परे, सदा ही सम्पन्न और समान होंगे।

आज आशिकों की कहानियां सुना रहे हैं। नाज़, नखरे भी बहुत करते हैं। माशूक भी देख-देख मुस्कराते रहते। नाज़, नखरे भल करो लेकिन माशूक को माशूक समझ उसके सामने करो, दूसरे के सामने नहीं। भिन्न-भिन्न हद के स्वभाव, संस्कार के नखरे और नाज़ करते हैं। जहाँ मेरा स्वभाव, मेरे संस्कार शब्द आता है, वहाँ भी नाज़, नखरे शुरू हो जाते हैं। बाप का स्वभाव सो मेरा स्वभाव हो। मेरा स्वभाव बाप के स्वभाव से भिन्न हो नहीं सकता। वह माया का स्वभाव है, पराया स्वभाव है। उसको मेरा कैसे कहेंगे? माया पराई है, अपनी नहीं है। बाप अपना है। मेरा स्वभाव अर्थात् बाप का स्वभाव। माया के स्वभाव को मेरा कहना भी रांग है। ‘मेरा’ शब्द ही फेरे में लाता है अर्थात् चक्र में लाता है। आशिक माशूक के आगे ऐसे नाज़-नखरे भी दिखाते हैं। जो बाप का सो मेरा। हर बात में भक्ति में भी यही कहते हैं – जो तेरा सो मेरा, और मेरा कुछ नहीं। लेकिन जो तेरा सो मेरा। जो बाप का संकल्प, वह मेरा संकल्प। सेवा के पार्ट बजाने के बाप के संस्कार-स्वभाव, वह मेरे। तो इससे क्या होगा? हद का मेरा, तेरा हो जायेगा। तेरा सो मेरा, अलग मेरा नहीं है। जो भी बाप से भिन्न है, वह मेरा है ही नहीं, वह माया का फेरा है इसलिए इस हद के नाज़-नखरे से निकल रूहानी नाज़ – मैं तेरी और तू मेरा, भिन्न-भिन्न सम्बन्ध की अनुभूति के रूहानी नखरे भल करो। परन्तु यह नहीं करो। सम्बन्ध निभाने में भी रूहानी नखरे कर सकते हो। मुहब्बत की प्रीत के नखरे अच्छे होते हैं। कब सखा के सम्बन्ध से मुहब्बत के नखरे का अनुभव करो। वह नखरा नहीं लेकिन निरालापन है। स्नेह के नखरे प्यारे होते हैं। जैसे छोटे बच्चे बहुत स्नेही और प्युअर (पवित्र) होने कारण उनके नखरे सबको अच्छे लगते हैं। शुद्धता और पवित्रता होती है बच्चों में। और बड़ा कोई नखरा करे तो वह बुरा माना जाता। तो बाप से भिन्न-भिन्न सम्बन्ध के, स्नेह के, पवित्रता के नाज़-नखरे भल करो, अगर करना ही है तो।

‘सदा हाथ और साथ’ ही सच्चे आशिक माशूक की निशानी है। साथ और हाथ नहीं छूटे। सदा बुद्धि का साथ हो और बाप के हर कार्य में सहयोग का हाथ हो। एक दो के सहयोग की निशानी हाथ में हाथ मिलाके दिखाते हैं ना। तो सदा बाप के सहयोगी बनना – यह है सदा हाथ में हाथ और सदा बुद्धि से साथ रहना। मन की लगन, बुद्धि का साथ। इस स्थिति में रहना अर्थात् सच्चे आशिक और माशूक के पोज़ में रहना। समझा? वायदा ही यह है कि सदा साथ रहेंगे। कभी-कभी साथ निभायेंगे – यह वायदा नहीं है। मन का लगाव कभी माशूक से हो और कभी न हो तो वह सदा साथ तो नहीं हुआ ना, इसलिए इसी सच्चे आशिकपन के पोजीशन में रहो। दृष्टि में भी माशूक, वृत्ति में भी माशूक, सृष्टि ही माशूक।

तो यह माशूक और आशिकों की महफिल है। बगीचा भी है तो सागर का किनारा भी है। यह वन्डरफुल ऐसी प्राइवेट बीच (सागर का किनारा) है, जो हजारों के बीच (मध्य) भी प्राइवेट है। हर एक अनुभव करते – मेरे साथ माशूक का पर्सनल प्यार है। हरेक को पर्सनल प्यार की फीलिंग प्राप्त होना – यही वन्डरफुल माशूक और आशिक हैं। है एक माशूक लेकिन है सबका। सभी का अधिकार सबसे ज्यादा है। हरेक का अधिकार है। अधिकार में नम्बर नहीं हैं, अधिकार प्राप्त करने में नम्बर हो जाते हैं। सदा यह स्मृति रखो कि ‘गॉडली गार्डन में हाथ और साथ दे चल रहे हैं या बैठे हैं। रूहानी बीच पर हाथ और साथ दे मौज मना रहे हैं।’ तो सदा ही मनोरंजन में रहेंगे, सदा खुश रहेंगे, सदा सम्पन्न रहेंगे। अच्छा।

यह डबल विदेशी भी डबल लक्की हैं। अच्छा है जो अब तक पहुँच गये। आगे चल क्या परिवर्तन होता है, वह तो ड्रामा। लेकिन डबल लक्की हो जो समय प्रमाण पहुँच गये हो। अच्छा।

सदा अविनाशी आशिक बन रूहानी माशूक से प्रीति की रीति निभाने वाले, सदा स्वयं को सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न अनुभव करने वाले, सदा हर स्थिति वा परिस्थिति में तृप्त रहने वाले, सदा सन्तुष्टता के खजाने से भरपूर बन औरों को भी भरपूर करने वाले, ऐसे सदा के साथ और हाथ मिलाने वाले सच्चे आशिकों को रूहानी माशूक का दिल से यादप्यार और नमस्ते।

वरदान:- सदा श्रेष्ठ और नये प्रकार की सेवा द्वारा वृद्धि करने वाले सहज सेवाधारी भव
संकल्पों द्वारा ईश्वरीय सेवा करना यह भी सेवा का श्रेष्ठ और नया तरीका है, जैसे जवाहरी रोज सुबह अपने हर रत्न को चेक करता है कि साफ हैं, चमक ठीक है, ठीक जगह पर रखें हैं..ऐसे रोज़ अमृतवेले अपने सम्पर्क में आने वाली आत्माओं पर संकल्प द्वारा नज़र दौड़ाओ, जितना आप उन्हों को संकल्प से याद करेंगे उतना वह संकल्प उन्हों के पास पहुंचेंगा..इस प्रकार सेवा का नया तरीका अपनाते वृद्धि करते चलो। आपके सहजयोग की सूक्ष्म शक्ति आत्माओं को आपके तरफ स्वत:आकर्षित करेगी।
स्लोगन:- बहानेबाजी को मर्ज करो और बेहद की वैराग्यवृत्ति को इमर्ज करो।

TODAY MURLI 13 DECEMBER 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 13 December 2020

13/12/20
Madhuban
Avyakt BapDada
Om Shanti
18/03/87

Signs of a true spiritual lover.

Today, the spiritual Beloved has come to meet you souls, His spiritual lovers. It is only at this time in the whole cycle that the meetings of the spiritual Beloved and the spiritual lovers take place. BapDada is pleased to see each and every soul who is His lover and has been attracted by spiritual attraction and has recognised his or her true Beloved and attained Him. Seeing you lovers who were lost, the Beloved is also pleased that you have once again reached your correct destination. You would not be able to find any other beloved who could enable you to experience all attainments. Where does the spiritual Beloved come in order to meet His spiritual lovers? Just as you lovers and the Beloved are elevated, so, He comes to meet you at an elevated place too. What is this place where you are celebrating a meeting? You can call this place by whatever name you want. Generally speaking, what are the best meeting places that are loved by all? A meeting takes place either in a flower garden or on the shore of an ocean, which you call the beach. So, where are you now sitting? You are sitting on the shore of the Ocean of knowledge, at a spiritual meeting place. It is a spiritual and Godly garden. You have all seen the many other types of garden, but this is a garden where every flower is more in bloom than the others and each one is giving its own very beautiful fragrance. It is on this beach that BapDada, the Beloved, comes to meet His lovers. You have seen those beaches, of which there are many, but have you ever seen a beach where the different waves of love, power and many other different waves of the Ocean of Knowledge constantly refresh you? You like this place, do you not? There is cleanliness and also enjoyment. There is also beauty. There are also just as many attainments. The Beloved has created such a special place for the entertainment of you lovers that, as soon as you arrive here within the line (boundary) of love, you are liberated from many types of effort. You experience the greatest effort of natural remembrance to be very easy. What other efforts are you liberated from? You are liberated from your lokik jobs. You are also liberated from cooking. You receive everything ready made, do you not? You also experience remembrance to be natural. Your aprons also continue to become filled with the jewels of knowledge. You come to such a place where you are liberated from making effort and become absorbed in love.

Generally, the special sign of love is that the two no longer remain two, but the two merge and become one. This is called merging. Devotees have taken this stage of becoming absorbed in love as becoming merged or united. Those people do not understand the meaning of being lost in love. There is the stage of becoming merged in love, but they have taken that to mean that the identities of the souls are finished for all time. To become merged means to become equal. When you become lost in love while meeting the Father and the spiritual Beloved, you experience becoming equal to the Father, that is, merging with Him. Devotees have referred to this stage as becoming merged. You become absorbed and you become merged. However, this is to experience the stage of being lost in love whilst meeting Him. Do you understand? So, BapDada is seeing His lovers.

A true lover means one who is a constant lover, a natural lover. You also know the specialities of those who are true lovers. Nevertheless, their main signs are:

First sign: To experience all relationships with the one Beloved according to the time. The Beloved is just one, but you have all relationships with the One. Whatever relationship you want and whatever relationship you need at any particular time, you can experience that relationship by fulfilling the responsibility of love. So, the first sign is the experience of all relationships. Underline the word “all”, not just a relationship. There are also some mischievous lovers who believe that they have forged a relationship, but have all their relationships been forged with Him? Secondly, are you able to experience that relationship at a time of need? Is your relationship on the basis of knowledge or on the basis of the experience in your heart? BapDada is pleased with honest hearts. He is not pleased with those who just have sharp intellects, but the Comforter of Hearts is pleased with their heart. This is why only the heart and the Comforter of Hearts know the experience of the heart. The heart, not the head, is the place of merging. The head is the place to merge knowledge, but the heart, not the head, is the place to merge your Beloved. The place to merge knowledge is the head, but the place to merge the Beloved is the heart. The Beloved would only tell you things about His lovers, would He not? Some lovers use their head a lot, but when working with the heart, that labour of the head is halved. Those who do service and have remembrance in their hearts don’t have to work so hard and have greater contentment than those who do not have remembrance with love in their hearts. Those who simply remember and do service with their heads on the basis of knowledge have to work hard and are less content. Even if there is success, the contentment in their hearts would be less. They would continue to think, “Whatever happened was good, but nevertheless… nevertheless….”, whereas those who work from their hearts constantly sing songs of contentment. They sing songs of contentment from their hearts, not just songs of contentment in words. True lovers experience all relationships with their hearts according to the time.

Second sign: A true lover would always have the happiness of attainment in every situation and in every action. One is the experience and the other is the attainment from that. Some have the experience: “Yes, He is my Father and also my Bridegroom and Child, but I am not able to have as much attainment as I want.” He is the Father, but there isn’t the happiness of attainment of the inheritance. As well as that experience, let there also be the experience of the attainment through having all relationships. For instance, in the relationship of the Father, let there always be the experience of the attainment of the inheritance; let there be the feeling of fullness. Through the Satguru, let there constantly be the experience of a complete and perfect stage and a perfect form through blessings. So the experience of attainment is also essential. One is the experience of relationships and the other is the experience of attainments. Some don’t experience all attainments. You are master almighty authorities, but there isn’t the attainment of powers at the right time. If there isn’t the experience of attainment, then there is also some lack of attainment. So, as well as experience, you also need to become an embodiment of attainment: this is a sign of a true lover.

Third sign: The lovers who have the experience and also the attainment through that relationship are alwayssatisfied; they never feel themselves to be souls who are lacking anything in any situation. So satisfaction is the speciality of these lovers. Where there is attainment, there is definitely satisfaction. If you are not satisfied, something is definitely lacking in your attainment and, where there is no attainment, something is also missing when it comes to experiencing all relationships. So, the three signs are: experience, attainment and satisfaction, a constantly satisfied soul. Whatever the time, atmosphere, facilities for doing service, companions in the gathering of service, in every situation and in every activity, you must always remain satisfied. You are such true lovers, are you not? A satisfied soul will never have any limited desires. If you look, there is a minority of satisfied souls. In one situation or other, there is some hunger for respect or fame. Someone who is hungry can never be satisfied. Those whose stomachs are always full remain satisfied. So, just as the body is hungry for food, similarly, the mind is hungry for name, fame, salvation and facilities: it is hunger of the mind. So, just as those who are physically satisfied will always be content, in the same way, those whose minds are satisfied will remain constantly content. Contentment is a sign of satisfaction. If a soul is not satisfied but is hungry physically or mentally, then no matter how much he receives, even though he may receive a great deal, because of not being satisfied, he would always be dissatisfied; there would be discontentment. Those who are royal are satisfied with just a little. The sign of royal souls is that they will constantly be full, they would be satisfied with even one chapatti or with 36 varieties of food. However, those who are dissatisfied will not be satisfied even if you give them 36 varieties of food because their hunger is in their minds. The sign of a true lover is that he is constantly satisfied. So check all three signs. Always think about whose lovers you are. You are the lovers of the Beloved who is always perfect. So, never let go of contentment. You may let go of service, but do not let go of your contentment. Any service that makes you discontent is not service. Service means service that gives you nourishing fruit. So a true lover is one who is beyond all limited desires, one who is constantly full and equal.

Today, Baba is telling you stories of the lovers. You also play many mischievous games. Seeing those, the Beloved just smiles. You may play your mischievous games, but you have to understand that the Beloved is the Beloved and play those games in front of Him, not in front of others. You play the mischievous games of the different types of limited nature and sanskars. It is when it comes to “my nature”, “my sanskars” that you begin to play those mischievous games. The Father’s nature has to be my nature. My nature cannot be different from the Father’s nature. That is Maya’s nature, a nature that belongs to someone else. How can you say that that is your nature? Maya is foreign; she doesn’t belong to you. The Father belongs to you. “My nature” means the Father’s nature. It is wrong to say Maya’s nature is your nature. The word “my” puts you in a spin. The lovers also show these mischievous games to the Beloved: whatever is the Father’s is mine. In every situation, even on the path of devotion, it is said: Whatever I have is Yours; nothing is mine. However, it is: Whatever is Yours is mine. Whatever is the Father’s thought is my thought. In playing your parts in doing service, the Father’s nature and sanskars are yours. What will happen through that? Any limited mine will become Yours. Whatever is Yours is mine, and I don’t have anything separate. Whatever is different from the Father’s is not mine; that is the spin of Maya. Therefore, leave those limited mischievous games and maintain the spiritual pride, “I am Yours and You are mine”. You may play the spiritual, mischievous games of the experience of different relationships, but don’t play the other kind. You can also play spiritual mischievous games in fulfilling a relationship. The mischievous games of love are good. Sometimes, experience the loving mischievous games with the relationship of the Friend. Those are then not mischievous games, but uniqueness. Loving mischievous games are lovely, just as little children’s mischief is loved by all because they are lovely and pure. Children have cleanliness and purity, whereas when a mature person plays mischievous games, it is considered to be bad. If you must, you may play mischievous games filled with purity and love in different relationships with the Father.

The constant hand and company is the sign of the true lover and Beloved. Never let the company and hand become separated. Always have the company in your intellect and let there always be the Father’s hand of co-operation in every task. The symbol used to portray mutual co-operation is one hand in another. So, always to be co-operative with the Father is always to remain hand-in-hand with the Father and always to keep Him in your intellect. The love of the mind and the company of the intellect. To stay in this stage means to stay in the pose of a true lover and Beloved. Do you understand? The promise you made was that you will always stay with Him. You didn’t promise that you would only stay with Him sometimes. If the attachment of the mind is sometimes with the Beloved but not at other times, then that is not constant company, is it? Therefore, maintain the position of true lovers. Let there be the Beloved in your vision, in your attitude and let Him be your world.

So, this is the happy gathering of the lovers and the Beloved. It is a garden and also the shore of the Ocean. This is such a wonderful and private beach that you remain private in the midst of thousands (beech in Hindi = middle). Each one of you experiences personal love with the Beloved. For each one to have a feeling of personal love– that is being awonderful Beloved and lover. He is just the one Beloved, but He belongs to all. Each one has a greater right than everyone else. Each one has a right. There is no number to your right, but it becomes numberwise in your claiming those rights. Always be aware that you are walking or sitting in the Godly garden, hand-in-hand, and in His company. You are celebrating with pleasure on the spiritual beach by giving Him your hand and company. You will then always remain in pleasure and will remain constantly full. Achcha.

You double foreigners are double lucky. It is good that you have arrived here now. Whatever change takes place in the future is in the drama. However, you are double lucky that you have arrived here according to the time. Achcha.

To the eternal lovers who fulfil the responsibility of love to the spiritual Beloved, to those who experience themselves to be full of all attainments, to those who remain satisfied in every stage and in every situation, to those who become full with the treasure of contentment and who make others full, to the true lovers who are constant companions and who constantly give their hand, love, remembrance and namaste from the heart of the spiritual Beloved.

Blessing: May you be an easy server who brings about growth by constantly doing an elevated and new type of service.
To do Godly service through your thoughts is a new and elevated means of doing service. A jeweller checks his jewels every day as to whether they are clean, whether they are sparkling and are positioned properly. In the same way, in your mind every day at amrit vela, cast your vision with your thoughts on souls who come into connection with you. The more you remember them in your thoughts, the more your thoughts will reach them. By adopting this new type of service in this way, you will continue to bring about growth. The subtle power of your easy yoga will automatically attract souls to you.
Slogan: Merge the game of making excuses and let an attitude of unlimited disinterest emerge.

 

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 13 DECEMBER 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 13 December 2019

13/12/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, first make effort on yourselves to earn a true income and then inspire your friends and relatives to do the same. Charity begins at home.
Question: What is the way to attain happiness and comfort?
Answer: Purity. Where there is purity, there is happiness and comfort. The Father establishes the pure world, the golden age. There are no vices there. Worshippers of the deities can never question how the world could continue without vice. You now have to go to the world of comfort. Therefore, you have to forget this impure world. You have to remember the land of peace and the land of happiness.

Om shanti. The meaning of “Om shanti” has been explained to you children. Shiv Baba can say “Om shanti”, and the saligram children also say “Om shanti”. The soul says “Om shanti”. This means that he is the son of the Silence Father. There is no need to try different means to find silence by going into the jungles etc. Souls are silent anyway, and so what is the point of trying different means? The Father sits here and explains this. It is that Father whom you ask to come and take you away to a world of happiness and comfort. All human beings desire to have comfort and happiness, but you need to have purity before you can have peace and happiness. Pure ones are called pure and impure ones are called impure. Those of the impure world call out: Come and take us to pure world! He is the One who liberates you from the impure world and takes you to the pure world. There is purity in the golden age and impurity in the iron age. That is the viceless world whereas this is the vicious world. You children know that the world population continues to increase. The golden age is the viceless world and so there must definitely be fewer human beings there. Who would those few people be? There must definitely be the kingdom of deities in the golden age. That is called the world of comfort and the land of happiness. This is the land of sorrow. Only the one Supreme Father, the Supreme Soul, can change the land of sorrow into the land of happiness. It is surely the Father who will give you the inheritance of happiness. That Father says: Now forget the land of sorrow and remember the land of peace and the land of happiness. This is called: Manmanabhav. The Father comes and gives you children a vision of the land of happiness. He inspires the destruction of the land of sorrow and takes you to the land of peace. You have to understand this cycle. You have to take 84 births. Those who come first in the land of happiness are the ones who take 84 births. By simply remembering this much, you children can become the masters of the land of happiness. The Father says: Children, remember the land of peace and then remember your inheritance, that is, remember the land of happiness. Firstly, you go to the land of peace and so you should consider yourselves to be the masters of the land of peace, Brahmand. You will continue to forget this world if, while walking and moving around, you consider yourselves to be residents of that place. The golden age is the land of happiness, but not everyone can go to the golden age. Only those who worship the deities will understand these things. This study which the true Father teaches is the true income. All the rest are false incomes. The true income is that of the imperishable jewels of knowledge whereas perishable wealth and property is a false income. Since the copper age onwards, you have been earning false incomes. The reward of this true, imperishable income starts at the beginning of the golden age and finishes at the end of the silver age, that is, you experience the reward for half a cycle. Then, the false income begins through which you experience temporary happiness. Only the Ocean of Knowledge gives you these imperishable jewels of knowledge. The true Father enables you to earn a true income. Bharat was the land of truth and it has now become the land of falsehood. No other land can be called the land of truth and the land of falsehood. God, the Emperor, the Truth, is the Creator of the land of truth. The true one is God, the Father; all others are false fathers. In the golden age, you have true fathers, because there isn’t any falsehood or sin there. This is the world of sinful souls whereas that is the world of charitable souls. Therefore, you should now make a lot of effort to earn this true income. Those who earned this income in the previous cycle will do so again. First, you have to earn this true income yourself and then inspire your family and your in-laws’ family to earn this true income. Charity begins at home. Those with the notion of omnipresence cannot perform devotion: if all are forms of God, who is it that they worship? Therefore, effort has to be made to pull them out of that quicksand. How would sannyasis perform charity at home? Firstly, they are not able to tell you anything of their households. Ask them: Why are you not able to tell us? We should at least know. What harm would there be if they told you: “I belonged to this family and then adopted renunciation.” When someone asks you, you can tell him instantly. Sannyasis have many followers. If a sannyasi were to tell them that there is only one God, his followers would question him and ask: Who gave you this knowledge? If he said that it was the BKs, his business would finish. Why would anyone want to lose his honour in that way? No one would even give them food. This is why it is very difficult for the sannyasis. Firstly, you have to give knowledge to your friends and relatives etc. and inspire them to earn a true income through which they can attain happiness for 21 births. This is a very easy thing. However, it is fixed in the drama for there to be so many scriptures and temples etc. The residents of this impure world say: Come and take us to the pure world. It is now 5000 years since the golden age began to exist. They say that the duration of the iron age is hundreds of thousands of years. Therefore, how can people understand where or when the land of happiness existed? They say that annihilation takes place and that the golden age then comes after that. First of all, Shri Krishna comes sitting on a pipal leaf, floating on the ocean sucking his thumb. They have changed everything around. The Father says: I now tell you the essence of all the Vedas and scriptures through Brahma. This is why they show Brahma emerging from the navel of Vishnu and also show scriptures in his hand. Now, Brahma would surely exist here. Scriptures would not exist in the subtle region; Brahma has to be here. Vishnu, the dual form of Lakshmi and Narayan, also exists here. Brahma becomes Vishnu, and then Vishnu becomes Brahma. Now, whether Brahma emerged from Vishnu or Vishnu emerged from Brahma is a matter to be understood. However, only those who study well will understand these things. The Father says: You have to continue to understand these matters until the moment you leave your bodies. You have become 100%, totally senseless and bankrupt. You were once sensible deities and you are now becoming those deities again. Human beings cannot change anyone into deities. You were those deities and you then completely lost all your celestial degrees while taking 84 births. You were in great comfort in the land of happiness whereas you are now restless. You are able to explain the account of 84 births. It is easy to calculate how many births those of Islam, the Buddhists, Christians, Sikhs and all the other sects and isms take. Only the residents of Bharat become the masters of heaven. The sapling is now being planted. Once you have understood the explanation of this knowledge yourself, you have to give it to your mother, father, sisters and brothers. Whilst living at home with your family you have to live like a lotus flower. Then, let there be “Charity begins at home”. You have to relate this knowledge to those in your parents’ home and also your in-laws’ home. Even in business, they first try to make their own brothers into business partners. Here, too, it is the same. There is the praise that a kumari is one who uplifts her parents home and also her in-laws’ home. Impure ones cannot uplift anyone. So, which kumaris do this? It is you Brahma Kumaris, the daughters of Brahma. There is a temple built here to Adhar Kumaris and unmarried kumaris (half kumaris and virgin kumaris). That is your memorial. We have come in order to make Bharat into heaven once again. The Dilwala Temple is totally accurate. Heaven is portrayed on the ceiling but, in fact, heaven exists down here. The tapasya of Raj Yoga also takes place down here. Those who built the Dilwala Temple should know about the ones whose temple it is. They have shown Jagadpita, Jagadamba, Adi Dev and Adi Devi sitting inside. Achcha, whose child is Adi Dev: Shiv Baba’s. The half-kumaris and unmarried kumaris are all sitting here doing Raj Yoga. The Father says: Manmanabhav. You will then become the masters of Paradise. Remember liberation and the land of liberation. This is your renunciation. The renunciation of the Jains is very difficult. Their system of plucking their hair out is so severe whereas here, it is easy Raj Yoga. This is also a family path. This is fixed in the drama. A Jain sage established his own new religion, but you couldn’t call that the original, eternal, deity religion. That has now disappeared. Someone started the Jain religion and it then continued. That too is in the drama. Adi Dev is called the father and Jagadamba is called the mother. Everyone knows that Brahma is Adi Dev. They are also called Adam and Bibi and Adam and Eve. The Christians do not know that Adam and Eve are now sitting in tapasya. They are the heads of the human genealogical tree. The Father sits here and explains all of these secrets. There are so many temples to Shiva and Lakshmi and Narayan, and so you should know their biographies. The Father, the Ocean of Knowledge, sits here and explains these too. It is the Supreme Father, the Supreme Soul, who is called knowledge-full, the Ocean of Knowledge and the Ocean of Bliss. None of the sages or holy men etc. knows the praise of the Supreme Father, the Supreme Soul. They just say that God is omnipresent, and so whose praise do they sing? Because they don’t know God, they say of themselves, “Shivohum” (I am Shiva). Otherwise, the praise of the Supreme Soul is so great. He is the Seed of the human world tree. The Muslims too say: Khuda (God) created us and we are therefore His creation. The creation cannot give an inheritance to the creation. No one understands that the creation receives the inheritance from the Creator. That Seed is the Truth and the sentient Being. He has the knowledge of the beginning, the middle and the end of the world. The knowledge of the beginning, the middle and the end cannot be in human beings; it can be only in the Seed. The Seed is living and so He must surely have all the knowledge. Only He comes and gives you the knowledge of the beginning, the middle and the end of the whole world cycle. You should also put up a board saying: By knowing this cycle you can become the rulers of the globe in the golden age, that is, you can become kings of heaven. This is such an easy matter! The Father says: Remember Me for as long as you live. I, Myself, give you the mantra that disciplines the mind. You now have to remember the Father. It is by having remembrance that your sins will be absolved. If you continue to spin the discus of self-realisation, you will be able to cut off Maya’s head. I will make you souls pure and take you back home. You will then take satopradhan bodies. There are no vices there. People ask: How can the world continue without vice? Tell them: Perhaps you are not worshippers of the deities, although you do sing praise of Lakshmi and Narayan, saying that they are completely viceless. The world mother and world father are viceless. They become pure from impure by doing the tapasya of Raj Yoga and then become the masters of heaven. You do tapasya in order to become pure, charitable souls. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. In order to remove this old world from your intellect, consider yourself to be a resident of the land of peace as you walk and move along. Earn a true income by remembering the land of peace and the land of happiness and also inspire others to do the same.
  2. Make yourself into a charitable soul by doing the tapasya of Raj Yoga. Constantly continue to spin the discus of self-realisation so that Maya’s head can be cut off.
Blessing: May you be a soul who experiments and easily achieves success in every task by experimenting with the power of peace.
Now, according to the changing times, you should experiment with the facilities of the power of peace and become a soul who experiments. Just as you create feelings of co-operation with words of love in souls, in the same way, stabilise yourself in the stage of having good wishes and feelings of love and create elevated feelings in them. Just as a lamp ignites another lamp, in the same way, your powerful good wishes will create in others the most elevated feelings. With this power, you can very easily achieve success in your physical tasks. Simply experiment and see for yourself.
Slogan: In order to be loved by all, become a rose in bloom, do not wilt.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 13 DECEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 13 December 2019

13-12-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – सच्ची कमाई करने का पुरुषार्थ पहले स्वयं करो फिर अपने मित्र-सम्बन्धियों को भी कराओ चैरिटी बिगेन्स एट होम”
प्रश्नः- सुख अथवा चैन प्राप्त करने की विधि क्या है?
उत्तर:- पवित्रता। जहाँ पवित्रता है वहाँ सुख-चैन है। बाप पवित्र दुनिया सतयुग की स्थापना करते हैं। वहाँ विकार होते नहीं। जो देवताओं के पुजारी हैं वह कभी ऐसा प्रश्न नहीं कर सकते कि विकारों बिगर दुनिया कैसे चलेगी? अभी तुम्हें चैन की दुनिया में चलना है इसलिए इस पतित दुनिया को भूलना है। शान्तिधाम और सुखधाम को याद करना है।

ओम् शान्ति। ओम् शान्ति का अर्थ तो बच्चों को समझाया हुआ है। शिवबाबा भी ओम् शान्ति कह सकते हैं तो सालिग्राम बच्चे भी कह सकते हैं। आत्मा कहती है ओम् शान्ति। सन ऑफ साइलेन्स फादर। शान्ति के लिए जंगल आदि में जाकर कोई उपाय नहीं किया जाता। आत्मा तो है ही साइलेन्स। फिर उपाय क्या करना है? यह बाप बैठ समझाते हैं। उस बाप को ही कहते हैं कि वहाँ ले चल जहाँ सुख चैन पावें। चैन अथवा सुख सभी मनुष्य चाहते हैं। परन्तु सुख और शान्ति के पहले तो चाहिए पवित्रता। पवित्र को पावन, अपवित्र को पतित कहा जाता है। पतित दुनिया वाले पुकारते रहते हैं कि आकर हमको पावन दुनिया में ले चलो। वह है ही पतित दुनिया से लिबरेट कर पावन दुनिया में ले चलने वाला। सतयुग में है पवित्रता, कलियुग में है अपवित्रता। वह वाइसलेस वर्ल्ड, यह विशश वर्ल्ड। यह तो बच्चे जानते हैं दुनिया वृद्धि को पाती रहती है। सतयुग वाइसलेस वर्ल्ड है तो जरूर मनुष्य थोड़े होंगे। वह थोड़े कौन होंगे? बरोबर सतयुग में देवी-देवताओं का ही राज्य है, उसको ही चैन की दुनिया अथवा सुखधाम कहा जाता है। यह है दु:खधाम। दु:खधाम को बदल सुखधाम बनाने वाला एक ही परमपिता परमात्मा है। सुख का वर्सा जरूर बाप ही देंगे। अब वह बाप कहते हैं दु:खधाम को भूलो, शान्तिधाम और सुखधाम को याद करो इसको ही मन्मनाभव कहा जाता है। बाप आकर बच्चों को सुखधाम का साक्षात्कार कराते हैं। दु:खधाम का विनाश कराए शान्तिधाम में ले जाते हैं। इस चक्र को समझना है। 84 जन्म लेने पड़ते हैं। जो पहले सुखधाम में आते हैं, उन्हों के हैं 84 जन्म सिर्फ इतनी बातें याद करने से भी बच्चे सुखधाम के मालिक बन सकते हैं।

बाप कहते हैं बच्चे, शान्तिधाम को याद करो और फिर वर्से को अर्थात् सुखधाम को याद करो। पहले-पहले तुम शान्तिधाम में जाते हो तो अपने को शान्तिधाम, ब्रह्माण्ड का मालिक समझो। चलते-फिरते अपने को वहाँ के वासी समझेंगे तो यह दुनिया भूलती जायेगी। सतयुग है सुखधाम परन्तु सभी तो सतयुग में आ नहीं सकते। यह बातें समझेंगे ही वह जो देवताओं के पुजारी हैं। यह है सच्ची कमाई, जो सच्चा बाप सिखलाते हैं। बाकी सभी हैं झूठी कमाईयाँ। अविनाशी ज्ञान रत्नों की कमाई ही सच्ची कमाई कही जाती है, बाकी विनाशी धन-दौलत वह है झूठी कमाई। द्वापर से लेकर वह झूठी कमाई करते आये हैं। इस अविनाशी सच्ची कमाई की प्रालब्ध सतयुग से शुरू हो त्रेता में पूरी होती है अर्थात् आधाकल्प भोगते हो। फिर बाद में झूठी कमाई शुरू होती है, जिससे अल्पकाल क्षण भंगुर सुख मिलता है। यह अविनाशी ज्ञान रत्न, ज्ञान सागर ही देते हैं। सच्ची कमाई सच्चा बाप कराते हैं। भारत सचखण्ड था, भारत ही अब झूठखण्ड बना है। और खण्डों को सच-खण्ड, झूठ खण्ड नहीं कहा जाता है। सचखण्ड बनाने वाला बादशाह ट्रूथ वह है। सच्चा है एक गॉड फादर, बाकी हैं झूठे फादर। सतयुग में भी सच्चे फादर मिलते हैं क्योंकि वहाँ झूठ पाप होता नहीं। यह है ही पाप आत्माओं की दुनिया, वह है पुण्य आत्माओं की दुनिया। तो अब इस सच्ची कमाई के लिए कितना पुरुषार्थ करना चाहिए। जिन्होंने कल्प पहले कमाई की है, वही करेंगे। पहले खुद सच्ची कमाई कर फिर पियर और ससुरघर को यही सच्ची कमाई करानी है। चैरिटी बिगेन्स एट होम।

सर्वव्यापी के ज्ञान वाले भक्ति कर नहीं सकते। जब सभी भगवान के रूप हैं फिर भक्ति किसकी करते हैं? तो इसी दुबन से निकालने में मेहनत करनी पड़ती है। सन्यासी लोग चैरिटी बिगेन्स एट होम क्या करेंगे? पहले तो वह घरबार का समाचार सुनाते ही नहीं हैं। बोलो, क्यों नहीं सुनाते हो? मालूम तो पड़ना चाहिए ना। बतलाने में क्या है, फलाने घर के थे फिर सन्यास धारण किया! तुमसे पूछें तो तुम झट बतला सकते हो। सन्यासियों के फालोअर्स तो बहुत हैं। वह फिर अगर बैठ कहें कि भगवान एक है तो सभी उनसे पूछेंगे तुमको किसने यह ज्ञान सुनाया? कहें बी.के. ने, तो सारा उनका धंधा ही खलास हो जाए। ऐसे कौन अपनी इज्ज़त गँवायेगा? फिर कोई खाना भी न दे इसलिए सन्यासियों के लिए तो बहुत मुश्किल है। पहले तो अपने मित्र-सम्बन्धियों आदि को ज्ञान दे सच्ची कमाई करानी पड़े जिससे वे 21 जन्म सुख पावें। बात है बहुत सहज। परन्तु ड्रामा में इतने शास्त्र मन्दिर आदि बनने की भी नूँध है।

पतित दुनिया में रहने वाले कहते हैं अब पावन दुनिया में ले चलो। सतयुग को 5000 वर्ष हुए। उन्होंने तो कलियुग की आयु ही लाखों वर्ष कह दी है तो फिर मनुष्य कैसे समझें कि सुखधाम कहाँ है? कब होगा? वह तो कहते हैं महाप्रलय होती है तब फिर सतयुग होता है। पहले-पहले श्रीकृष्ण अंगूठा चूसता सागर में पीपल के पत्ते पर आता है। अब कहाँ की बात कहाँ ले गये हैं! अब बाप कहते हैं ब्रह्मा द्वारा मैं सभी वेदों-शास्त्रों का सार सुनाता हूँ इसलिए विष्णु की नाभी-कमल से ब्रह्मा दिखाते हैं और फिर हाथ में शास्त्र दे दिये हैं। अब ब्रह्मा तो जरूर यहाँ होगा। सूक्ष्मवतन में तो शास्त्र नहीं होंगे ना। ब्रह्मा यहाँ होना चाहिए। विष्णु लक्ष्मी-नारायण के रूप भी तो यहाँ होते हैं। ब्रह्मा ही सो विष्णु बनता है फिर विष्णु सो ब्रह्मा बनता है। अब ब्रह्मा से विष्णु निकलता वा विष्णु से ब्रह्मा निकलता? यह सब समझने की बातें हैं। परन्तु इन बातों को समझेंगे वह जो अच्छी रीति पढ़ेंगे। बाप कहते हैं जब तक तुम्हारा शरीर छूटे तब तक समझते ही रहेंगे। तुम बिल्कुल ही 100 परसेन्ट बेसमझ, कंगाल बन पड़े हो। तुम ही समझदार देवी-देवता थे, अब फिर से तुम देवी-देवता बन रहे हो। मनुष्य तो बना न सकें। तुम सो देवता थे फिर 84 जन्म लेते-लेते एकदम कलाहीन हो गये हो। तुम सुखधाम में बहुत चैन में थे, अब बेचैन हो। तुम 84 जन्मों का हिसाब बता सकते हो। इस्लामी, बौद्धी, सिक्ख, ईसाई मठ-पंथ सब कितना जन्म लेंगे? यह हिसाब निकालना तो सहज है। स्वर्ग के मालिक तो भारतवासी ही बनेंगे। सैपलिंग लगती है ना। यह है समझानी। खुद समझ जाए तो फिर पहले-पहले अपने मात-पिता, बहन-भाइयों को ज्ञान देना पड़े। गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रहना है फिर चैरिटी बिगेन्स एट होम। पियर घर, ससुरघर को नॉलेज सुनानी पड़े। धन्धे में भी पहले अपने भाइयों को ही भागीदार बनाते हैं। यहाँ भी ऐसे है। गायन भी है कन्या वह जो पियर और ससुर घर का उद्धार करे। अपवित्र उद्धार कर नहीं सकते। तब कौन-सी कन्या? यह ब्रह्मा की कन्या, ब्रह्माकुमारी है ना। यहाँ अधर कन्या, कुँवारी कन्या का मन्दिर भी बना हुआ है ना। यहाँ तुम्हारे यादगार बने हुए हैं। हम फिर से आये हैं भारत को स्वर्ग बनाने के लिए। यह देलवाड़ा मन्दिर बिल्कुल एक्यूरेट है, ऊपर में स्वर्ग दिखाया है। स्वर्ग है तो यहाँ ही। राजयोग की तपस्या भी यहाँ ही होती है। जिन्हों का मन्दिर है उन्हों को यह जानना तो चाहिए ना! अब अन्दर जगतपिता जगत अम्बा, आदि देव, आदि देवी बैठे हैं। अच्छा, आदि देव किसका बच्चा है? शिवबाबा का। अधर कुमारी, कुँवारी कन्या सब राजयोग में बैठे हैं। बाप कहते हैं मन्मनाभव, तो तुम बैकुण्ठ के मालिक बनोगे। मुक्ति, जीवनमुक्तिधाम को याद करो। तुम्हारा यह सन्यास है, जैनी लोगों का सन्यास कितना डिफीकल्ट है। बाल आदि निकालने की कितनी कड़ी रस्म है। यहाँ तो है ही सहज राजयोग। यह है भी प्रवृत्ति मार्ग का। यह ड्रामा में नूँध है। कोई जैन मुनी ने बैठ अपना नया धर्म स्थापन किया परन्तु उसको आदि सनातन देवी-देवता धर्म तो नहीं कहेंगे ना। वह तो अब प्राय:लोप है। कोई ने जैन धर्म चलाया और चल पड़ा। यह भी ड्रामा में है। आदि देव को पिता और जगत अम्बा को माता कहेंगे। यह तो सब जानते हैं कि आदि देव ब्रह्मा है। आदम-बीबी, एडम-ईव भी कहते हैं। क्रिश्चियन लोगों को थोड़ेही पता है कि यह एडम ईव अब तपस्या कर रहे हैं। मनुष्य सृष्टि के सिजरे के यह हेड हैं। यह राज़ भी बाप बैठ समझाते हैं। इतने मन्दिर शिव के वा लक्ष्मी-नारायण के बने हैं तो उनकी बायोग्राफी जानना चाहिए ना! यह भी ज्ञान सागर बाप ही बैठ समझाते हैं। परमपिता परमात्मा को ही नॉलेजफुल ज्ञान का सागर, आनन्द का सागर कहा जाता है। यह परमात्मा की महिमा कोई साधू-सन्त आदि नहीं जानते। वह तो कह देते परमात्मा सर्वव्यापी है फिर महिमा किसकी करें? परमात्मा को न जानने के कारण ही फिर अपने को शिवोहम् कह देते हैं। नहीं तो परमात्मा की महिमा कितनी बड़ी है। वह तो मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। मुसलमान लोग भी कहते हैं हमको खुदा ने पैदा किया, तो हम रचना ठहरे। रचना, रचना को वर्सा नहीं दे सकते। क्रियेशन को क्रियेटर से वर्सा मिलता है, इस बात को कोई भी नहीं समझते हैं। वह बीज-रूप सत है, चैतन्य है, सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का उनको ज्ञान है। सिवाए बीज के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान कोई मनुष्यमात्र में हो नहीं सकता। बीज चैतन्य है तो जरूर नॉलेज उनमें ही होगी। वही आकर तुमको सारे सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का नॉलेज देते हैं। यह भी बोर्ड लगा देना चाहिए कि इस चक्र को जानने से तुम सतयुग के चक्रवर्ती राजा अथवा स्वर्ग के राजा बन जायेंगे। कितनी सहज बात है। बाप कहते हैं जब तक जीना है, मुझे याद करना है। मैं खुद तुमको यह वशीकरण मंत्र देता हूँ। अब तुमको याद करना है बाप को। याद से ही विकर्म विनाश होंगे। यह स्वदर्शन चक्र फिरता रहे तो माया का सिर कट जायेगा। हम तुम्हारी आत्मा को पवित्र बनाकर ले जायेंगे फिर तुम सतोप्रधान शरीर लेंगे। वहाँ विकार होता नहीं। कहते हैं विकार बिगर सृष्टि कैसे चलेगी? बोलो, तुम शायद देवताओं के पुजारी नहीं हो। लक्ष्मी-नारायण की तो महिमा गाते हैं सम्पूर्ण निर्विकारी। जगदम्बा, जगतपिता निर्विकारी हैं, राजयोग की तपस्या कर पतित से पावन, स्वर्ग के मालिक बने हैं। तपस्या करते ही हैं पुण्य आत्मा बनने के लिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस पुरानी दुनिया को बुद्धि से भुलाने के लिए चलते-फिरते अपने को शान्तिधाम का वासी समझना है। शान्तिधाम और सुखधाम को याद कर सच्ची कमाई करनी है और दूसरों को भी करानी है।

2) राजयोग की तपस्या कर स्वयं को पुण्य आत्मा बनाना है। माया का सिर काटने के लिए स्वदर्शन चक्र सदा फिरता रहे।

वरदान:- शान्ति की शक्ति के प्रयोग द्वारा हर कार्य में सहज सफलता प्राप्त करने वाले प्रयोगी आत्मा भव
अब समय के परिवर्तन प्रमाण शान्ति की शक्ति के साधन प्रयोग में लाकर प्रयोगी आत्मा बनो। जैसे वाणी द्वारा आत्माओं में स्नेह के सहयोग की भावना उत्पन्न करते हो ऐसे शुभ भावना, स्नेह की भावना की स्थिति में स्थित हो उन्हों में श्रेष्ठ भावनायें उत्पन्न करो। जैसे दीपक, दीपक को जगा देता है ऐसे आपकी शक्तिशाली शुभ भावना औरों में सर्वश्रेष्ठ भावना उत्पन्न करा देगी। इस शक्ति से स्थूल कार्य में भी बहुत सहज सफलता प्राप्त कर सकते हो, सिर्फ प्रयोग करके देखो।
स्लोगन:- सर्व का प्यारा बनना है तो खिले हुए रूहानी गुलाब बनो, मुरझाओ नहीं।

TODAY MURLI 13 DECEMBER 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 13 December 2018

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Read Murli 12 December 2018 :- Click Here

13/12/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, unadulterated love for the one Father can be forged when your intellects’ yoga is broken away from your body and all bodily relations.
Question: What race do you children have? What is the basis of going ahead in this race?
Answer: Your race is to pass with honours. The basis of this race is your intellects’ yoga. The more your intellects’ yoga is connected to the Father, the more your sins will be cut away. You will then attain the unshakeable kingdom of constant peace and happiness for 21 births. For that, the Father advises you: Children, become conquerors of sleep. Stay in remembrance for an hour or half an hour and continue to increase this practice. Keep your record of remembrance.
Song: Neither will He be separated from us, nor will our love (ulfat) for Him be removed from our hearts.

Om shanti. You children heard the song. ‘Ulfat’ is another name for love. The love of you children is now tied to unlimited Father Shiva. You BKs call Him Dada. There is no human being who doesn’t know the occupation s of his father and his grandfather. There is no other organisation where so many of them say that they are Brahma Kumars and Kumaris. Mothers are not kumaris, so why do you call yourselves Brahma Kumaris? You are the mouth-born creation of Brahma. All of you Brahma Kumars and Kumaris are the mouth-born creation of Prajapita Brahma. You are all the daughters of the one father. You also have to know the occupation of Brahma. Whose child is Brahma? Shiva’s. Brahma, Vishnu and Shankar are the three children of Shiva and they are residents of the subtle region. However, Prajapita Brahma has to be a resident of the corporeal world. So many children say that they are the mouth-born creation of Prajapita Brahma. They cannot be a physical creation; they are not a creation born through a womb. People don’t even ask how so many of you can be called Brahma Kumars and Kumaris. Mothers too are called Brahma Kumaris and so the children of Brahma are surely a mouth-born creation. All of them are the children of God. Who is God? He is the Supreme Father, the Supreme Soul, the Creator. What does He create? He creates heaven. Therefore, He would definitely give His grandsons and granddaughters the inheritance of heaven. He needs a body so that He can teach you Raja Yoga. He would not be given this title just like that. Shiv Baba sits here and once again teaches Raja Yoga to the mouth-born creation of Brahma, because He is establishing heaven once again. Otherwise, where would so many Brahma Kumars and Kumaris come from? It is a wonder that no one has the courage to ask. There are so many centres. They should ask: Who are you? Give us your introduction. It is clear that you are the sons and daughters of Prajapita Brahma and the grandsons and granddaughters of Shiva. We have become His children. We love Him. Shiv Baba also says: Remove your love, that is, your intellects’ yoga from everyone else and connect it to Me alone. I am teaching you Raja Yoga through Brahma and you Brahma Kumars and Kumaris are listening to Me. This is something so easy and straightforward. At least ask! Therefore, this is the cowshed. The cowshed of Brahma has been remembered in the scriptures. In fact, it is Shiv Baba’s cowshed. Shiv Baba enters this Nandigan (bull) but because of the word ‘cowshed’, they have shown a cow in the scriptures. Since there is Shiva’s birthday (Jayanti), Shiva must definitely have come. He would definitely have entered the body of someone. You know that this is the school of God, the Father. God Shiva speaks. He is the Ocean of Knowledge and the Purifier. Krishna himself is pure. Why would he be concerned about entering an impure body? It is sung: The Resident of the faraway land came to the foreign land. Even the body is foreign (it doesn’t belong to Him). Therefore, Shiv Baba must surely have created him and that is how the human world was created. So this proves that they are BapDada. Prajapita Brahma is Adi Dev, Mahavir, because he conquers Maya. Jagadamba is also remembered. Shri Lakshmi too is remembered. The world doesn’t know that Jagadamba is Saraswati, the daughter of Brahma. She is a Brahma Kumari. This one is also a Brahma Kumari. Shiv Baba has made her belong to Him through the mouth of Brahma. The love of all your intellects is now with Him. It is said: Love God! Break it away from everyone else and connect it to the One. That One is God, but they don’t know Him. How can they know Him? Only when the Father comes and gives His introduction can there be faith. Nowadays, they have taught everyone that each soul is the Supreme Soul. Because of this, their relationship has broken. You children are now listening to the real story of the true Narayan. He is Sukhdev and you are Vyas. The name ‘Vyas’ is mentioned in the Gita. He was a human being, but you are the true Vyas. The Gita that you create will also be destroyed. It is now that there are the true and false Gitas. There is no mention of falsehood in the land of truth. You are claiming your inheritance from Dada (Grandfather). It is not the property of this Baba. Shiv Baba, not Brahma, is the Creator of heaven. Brahma is the creator of the human world. The Brahmin clan was created through the lotus mouth of Brahma. You are the grandchildren of Shiva, that is, you are the Godly community. He has made you belong to Him. You are called the grandchildren of the Guru. You are now the grandsons and granddaughters of the Satguru. There, there are just grandsons, that is, males. There are no granddaughters. Only the one Shiv Baba is the Satguru. It is said: There is extreme darkness without the Satguru. Your name, Brahma Kumars and Kumaris, is so wonderful. The Father explains so much, but some children just don’t understand. The Father says: By knowing Me, the unlimited Father, you will know everything. In the golden and silver ages, there are the sun and moon dynasty kingdoms. Then, in the kingdom of Ravan, the night of Brahma begins. You are Brahma Kumars and Kumaris in a practical way. Only the golden age is called heaven where rivers of ghee and milk flow. Here, you can’t even obtain ghee. The Father says: Children, this old world is now to end. One day, this haystack will be set on fire and everything will be destroyed. At that time, you won’t be able to receive the inheritance from Me. When I come, I definitely have to take a body on loan ; I need a building. Baba is so good at explaining in such an entertaining way. You now come to know everything from Me. No one knows how this world cycle turns. Who takes 84 births? Not everyone will take them. Surely, the deities who come first will take 84 births. I am now once again teaching them Raja Yoga. I come once again to make Bharat into heaven from hell. I liberate it. Then I become the Guide and take you back home. I am also called the form of a jyoti (flame). Even the form of a jyoti has to come. He Himself says: Children, I am your Father. My light is never extinguished. It is a starthat resides in the centre of the forehead. All other souls shed a body and take another. So, an imperishable part of 84 births is recorded in the soul, the star. Souls take 84 births and then begin from number one again. As are the king and queen, so the subjects. How else would a soul have such a part recorded in him? This is called the most wonderful , deep secret. Each soul of the human world has a part fixed in him. He says: I have this part in Me and that too is imperishable; there cannot be any change in it. The Brahma Kumars and Kumaris know My part. The part is called the biography. Since there is Prajapita Brahma, there must also be Jagadamba. She too has changed from a shudra to a Brahmin. You children know that you love the Father. Your love is only for One. It doesn’t take long for there to be unadulterated love. However, Maya, the cat, is no less. Some women are jealous of each other. When we love Shiv Baba, Maya feels jealous and so she creates storms. You want to throw a double six, but Maya, the cat, interferes in this. You live at home with your family and so you are told: Remove your intellects’ yoga from your bodies and bodily relations and remember Me. I am your most b eloved Father. I will make you into the masters of heaven if you follow My shrimat. The directions of Brahma are very well known. So, surely, the directions of the children of Brahma would also be well known. They would give the same directions too. Only the Father tells you the news of the whole world. You may look after your children etc. but let your intellects yoga be connected to the Father. Consider this to be a graveyard and that you are going to the land of angels. This is something so simple. The Father explains: Do not connect your intellects in yoga to any corporeal or subtle deity. The Father tells you this as the Agent. It is remembered that souls remained separated from the Supreme Soul for a long time. It was the deities who were separated for a long time. They are the ones who come first to play their parts. When you found the Satguru, the Agent, the beautiful meeting took place. As the Agent, He says: Constantly remember Me alone and promise that you will get off the pyre of lust and sit on the pyre of knowledge. You will then claim your fortune of the kingdom. Keep a record with you of how much you remember such a most beloved Father. A woman remembers her husband day and night. The Father says: O children, who are conquerors of sleep, now make effort, for an hour or half an hour. Start with that and then gradually increase it. Have yoga with Me and you will pass with honours. This is a race of intellects. It takes time. Only through the yoga of your intellects will your sins be cut away. You will then rule the unshakeable, constant, peaceful and happy kingdom for 21 births. You ruled it in the previous cycle. Now claim your fortune of the kingdom once again. We are the ones who create heaven every cycle and then we rule there. Then, Maya makes us into residents of hell. We are now in Rama’s community. We love Him. The Father has given us His introduction. The Father is the Creator of heaven. We are His children and so why are we in hell? We were definitely in heaven at some point. The Father created heaven. The Brahma Kumars and Kumaris are those who give the donation of life to everyone. Death would not come unlawfully and take their lives; they would not experience untimely death. It is impossible for there to be untimely death there. There is no crying there either. You have seen in visions how Shri Krishna takes birth. There is light all around at that time. He is the first prince of the golden age. Krishna is the number one satopradhan soul. He then goes through the stages of sato, rajo and tamo. When his body becomes tamo and reaches a state of total decay, he sheds that body and takes another. This is practi s ed here. Baba, I am coming to You and I will then go from there to heaven and take a new body. I now have to return to Baba. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. In order to be saved from untimely death, serve to give everyone the donation of life. Make the community of Ravan into the community of Rama.
  2. Let the love of your heart be for the one Father. Do not allow your intellect’s yoga to wander. Conquer sleep and continue to increase remembrance.
Blessing: May you be a master of the self by becoming rup and basant, that is, by being gyani and yogi according to the time.
Those who are masters of the self can become rup when they want and basant when they want. They can create either of the two stages in a second. Let it not be that you want to be rup but you keep remembering things of knowledge instead. Put a full stop in less than a second. A powerful brake works when it is applied. For this, practise stabilising your mind and intellect in whatever stage you want at whatever time. Let there be such controlling and ruling powers.
Slogan: A messenger of peace is one who gives the gift of peace to those who create upheaval.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 13 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 13 December 2018

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13-12-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – तुम्हारा अव्यभिचारी प्यार एक बाप के साथ तब जुट सकता है जब बुद्धियोग देह सहित देह के सब सम्बन्धों से टूटा हुआ हो”
प्रश्नः- तुम बच्चों की रेस कौन-सी है? उस रेस में आगे जाने का आधार क्या है?
उत्तर:- तुम्हारी रेस है ”पास विद् आनर बनने की” इस रेस का आधार है बुद्धियोग। बुद्धियोग जितना बाप के साथ होगा उतना पाप कटेंगे और अटल, अखण्ड, सुख-शान्तिमय 21 जन्म का राज्य प्राप्त होगा। इसके लिए बाप राय देते हैं – बच्चे, नींद को जीतने वाले बनो। एक घड़ी, आधी घड़ी भी याद में रहते-रहते अभ्यास बढ़ाते जाओ। याद का ही रिकार्ड रखो।
गीत:- न वह हमसे जुदा होंगे, न उलफत दिल से निकलेगी……. 

ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना। उल़फत कहा जाता है प्यार को, अब तुम बच्चों का प्यार बांधा हुआ है बेहद के बाप शिव के साथ। तुम बी.के. उनको दादा कहेंगे। ऐसे कोई मनुष्य नहीं होगा जो अपने बापदादा के आक्यूपेशन को न जानता हो। ऐसी कोई संस्था नहीं जहाँ इतने ढेर के ढेर कहें कि हम ब्रह्माकुमार-कुमारी हैं। मातायें तो कुमारी नहीं हैं फिर ब्रह्माकुमारी क्यों कहलाती हैं? यह तो हैं ब्रह्मा मुख वंशावली। इतने ब्रह्माकुमार-कुमारियां हैं प्रजापिता ब्रह्मा की मुख वंशावली। एक बाप की बच्चियां हैं। ब्रह्मा के आक्यूपेशन को भी जानना है। ब्रह्मा किसका बच्चा है? शिव का। शिव के तीन बच्चे ब्रह्मा, विष्णु, शंकर सूक्ष्मवतन वासी हैं। अब प्रजापिता ब्रह्मा तो स्थूलवतन वासी होना चाहिए। इतने सब कहते हैं प्रजापिता ब्रह्मा के मुख वंशावली हैं। कुख वंशावली तो हो न सकें। यह कोई गर्भ की पैदाइस नहीं है। और फिर तुमसे पूछते भी नहीं कि इतने सब ब्रह्माकुमार-कुमारियां कैसे कहलाते हो? माताएं भी ब्रह्माकुमारियां हैं तो जरूर ब्रह्मा के बच्चे हुए ब्रह्मा के मुख वंशावली। यह सब हैं ईश्वर की सन्तान। ईश्वर कौन है? वह है परमपिता परमात्मा, रचता। किस चीज़ की रचना करते हैं? स्वर्ग की। तो जरूर अपने पोत्रे-पोत्रियों को स्वर्ग का वर्सा देते होंगे। उनको शरीर चाहिए जो राजयोग सिखाये। ऐसे थोड़ेही पाग रख देंगे। शिवबाबा बैठ ब्रह्मा मुख वंशावली को फिर से राजयोग सिखलाते हैं क्योंकि फिर से स्वर्ग की स्थापना करते हैं। नहीं तो फिर इतने ब्रह्माकुमार-कुमारियां कहाँ से आयें? वन्डर है, कोई हिम्मत रख पूछते भी नहीं! कितने सेन्टर्स हैं! पूछना चाहिए आप हैं कौन, अपना परिचय दो? यह तो साफ है प्रजापिता ब्रह्मा के कुमार-कुमारियां और शिव के पोत्रे-पोत्रियां हैं। हम उनके बच्चे बने हैं। उनसे हमारा प्यार है। शिवबाबा भी कहते हैं सबसे प्यार अथवा बुद्धियोग हटाए मुझ एक के साथ रखो। मैं तुमको ब्रह्मा द्वारा राजयोग सिखला रहा हूँ ना और तुम ब्रह्माकुमार-कुमारी सुन रहे हो ना। कितनी सहज सीधी सी बात है। पूछो तो सही। तो यह हो गई गऊशाला। शास्त्रों में ब्रह्मा की गऊशाला भी गाई हुई है। वास्तव में शिवबाबा की गऊशाला है, शिवबाबा इस नंदीगण में आता है तो गऊशाला अक्षर के कारण शास्त्रों में फिर गऊ आदि दिखा दी है। शिव जयन्ती है तो जरूर शिव आया होगा। जरूर किसी तन में आया होगा। तुम जानते हो यह गॉड फादर का स्कूल है। शिव भगवानुवाच। ज्ञान सागर पतित-पावन वह है। कृष्ण तो स्वयं पावन है, उनको क्या पड़ी है जो पतित तन में आये। गाया भी जाता है दूर देश का रहने वाला आया देश पराये……..। शरीर भी पराया है। तो जरूर शिवबाबा ने इनको रचा होगा तब तो मनुष्य सृष्टि रची जाए। तो सिद्ध हुआ कि यह बापदादा है। प्रजापिता ब्रह्मा है आदि देव, महावीर क्योंकि माया पर जीत पाते हैं। जगदम्बा भी गाई हुई है। श्री लक्ष्मी भी गाई हुई है। दुनिया को पता नहीं कि जगदम्बा कोई ब्रह्मा की बेटी सरस्वती है। वह भी ब्रह्माकुमारी है। यह भी ब्रह्माकुमारी है। शिवबाबा ने ब्रह्मा मुख से इनको अपना बनाया है। अब इन सभी के बुद्धि का योग (उल़फत) उनके साथ है। कहा भी जाता है उल़फत परमात्मा के साथ रखो। और सब साथ तोड़ एक साथ जोड़ो। वह एक है भगवान्। परन्तु जानते नहीं। जाने भी कैसे? जब बाप आकर अपना परिचय दे, तब निश्चय हो। आजकल तो सिखला दिया है – आत्मा सो परमात्मा….. जिससे संबंध ही टूट गया है। अब तुम बच्चे वास्तव में सच्ची-सच्ची सत्य नारायण की कथा सुनते हो। वह है सुखदेव और तुम हो व्यास। गीता में भी व्यास का नाम है ना। वह तो मनुष्य ठहरा। परन्तु सच्चे व्यास तुम हो। तुम जो गीता बनाते हो वह भी विनाश हो जायेगी। झूठी और सच्ची गीता अभी है। सचखण्ड में झूठ का नाम नहीं रहता। तुम वर्सा ले रहे हो दादे से। इस बाबा की प्रापर्टी नहीं है। स्वर्ग का रचता है शिवबाबा, न कि ब्रह्मा। ब्रह्मा मनुष्य सृष्टि का रचयिता है। ब्रह्मा मुख कमल से ब्राह्मण वर्ण रचा गया। तुम हो शिव के पोत्रे अर्थात् ईश्वरीय सम्प्रदाय। उनको अपना बनाया है। गुरू पोत्रे कहलाते हैं ना। अब तुम हो सतगुरू पोत्रे और पोत्रियां। वह तो सिर्फ पोत्रे हैं अर्थात् मेल्स हैं। पोत्रियां हैं नहीं। सतगुरू तो एक शिवबाबा है। गाया जाता है सतगुरू बिन घोर अन्धियारा। तुम्हारा ब्रह्माकुमार-कुमारी नाम बड़ा वन्डरफुल है। बाप कितना समझाते हैं परन्तु कई बच्चे समझते नहीं। बाप कहते हैं मुझ बेहद के बाप को जानने से तुम सब कुछ जान जायेंगे। सतयुग-त्रेता में सूर्यवंशी चन्द्रवंशी राज्य था। फिर रावण राज्य में ब्रह्मा की रात शुरू होती है। प्रैक्टिकल में ब्रह्माकुमार-कुमारियां तुम हो। सतयुग को ही स्वर्ग कहा जाता है जहाँ घी दूध की नदी बहती है। यहाँ तो घी मिलता नहीं। बाप कहते हैं बच्चे यह पुरानी दुनिया अब विनाश होनी है। एक दिन इस भंभोर को आग लगेगी, सब खत्म हो जायेंगे फिर मेरे से वर्सा तो पा नहीं सकेंगे।

मैं आऊं तो जरूर शरीर का लोन लेना पड़े। मकान तो चाहिए ना। बाबा कितना अच्छा, रमणीक रीति से समझाते हैं। तुम अब मेरे द्वारा सब कुछ जान गये हो। यह सृष्टि चक्र कैसे चलता है, यह कोई को भी पता नहीं। 84 जन्म कौन लेते हैं? सब तो नहीं लेंगे। जरूर पहले आने वाले देवी-देवता ही 84 जन्म लेंगे। अब उनको फिर से मैं राजयोग सिखाता हूँ। भारत को फिर से नर्क से स्वर्ग बनाने मैं आता हूँ। इनको लिबरेट मैं करता हूँ। फिर गाइड बन वापिस भी ले जाता हूँ। मुझे ज्योति स्वरूप भी कहते हैं। ज्योति स्वरूप को भी आना पड़े, स्वयं कहते बच्चे मैं तुम्हारा बाप हूँ। मेरी ज्योति कभी बुझती नहीं। वह स्टॉर है जो भ्रकुटी के बीच रहते हैं। बाकी सब आत्मायें एक शरीर छोड़ दूसरा लेती हैं। तो आत्मा रूपी स्टॉर में 84 जन्मों का पार्ट अविनाशी नूंधा हुआ है। 84 जन्म भोग फिर पहले नम्बर से शुरू करते हैं। यथा राजा रानी तथा प्रजा। नहीं तो भला बताओ आत्मा में इतना पार्ट कहाँ से भरा हुआ है। इसको कहा जाता है बहुत गुह्य वन्डरफुल बात है। सारी मनुष्य सृष्टि की आत्माओं का पार्ट नूंधा हुआ है। कहते हैं मेरे में यह पार्ट है, वह भी अविनाशी है। उसमें कोई तबदीली (अदली-बदली) नहीं हो सकती। मेरे पार्ट को ब्रह्माकुमारकुमारियां जानते हैं। पार्ट को बायोग्राफी कहा जाता है। प्रजापिता ब्रह्मा है तो जरूर जगदम्बा भी होगी। वह भी शूद्र से ब्राह्मण बनी है। तो तुम बच्चे जानते हो हमारी उल़फत बाप के साथ है और हमारा एक के ही साथ प्यार है। अव्यभिचारी प्यार होने में देरी नहीं लगती है। माया बिल्ली भी कम नहीं है। कई स्त्रियां होती हैं जिनकी आपस में ईर्ष्या हो जाती है। हम भी शिवबाबा से प्यार रखते हैं तो माया को ईर्ष्या हो जाती है इसलिए तूफान लाती है। तुम चाहते हो पऊंबारा डालें (चौपड़ का खेल) परन्तु माया बिल्ली तीन दाने डाल देती है। तुम गृहस्थ व्यवहार में रहते हो सिर्फ तुम्हारा बुद्धियोग देह सहित देह के सब सम्बन्धों से हटाए कहते हैं मेरे को याद करो। मैं तुम्हारा मोस्ट बिलवेड बाप हूँ। मैं तुमको स्वर्ग का मालिक बनाऊंगा, यदि मेरी श्रीमत पर चलेंगे तो। ब्रह्मा की राय भी मशहूर है। तो जरूर ब्रह्मा के बच्चों की भी मशहूर होगी। वे भी ऐसी राय देते होंगे। यह सारे सृष्टि चक्र का समाचार तो बाप ही बतलाते हैं। भल बच्चों आदि को सम्भालो परन्तु बुद्धियोग बाप के साथ हो। समझो यह कब्रिस्तान है, हम परिस्तान में जाते हैं। कितनी सहज बात है।

बाप समझाते हैं कि कोई भी साकारी वा आकारी देवता से बुद्धियोग नहीं लगाओ। बाप दलाल बनकर कहते हैं। गाते हैं ना आत्मायें परमात्मा अलग रहे बहुकाल। अब बहुकाल से अलग तो देवी-देवता हैं। वही पहले-पहले पार्ट बजाने आते हैं। सुन्दर मेला कर दिया जब सतगुरू मिला दलाल। दलाल के रूप में कहते हैं मामेकम् याद करो और प्रतिज्ञा करो कि हम काम चिता से उतर ज्ञान चिता पर बैठेंगे। फिर तुम राज्य भाग्य ले लेंगे। अपने पास रिकार्ड रखो कि हम कितना समय ऐसे मोस्ट बिलवेड बाप को याद करते हैं। कन्या दिन-रात पति को याद करती है ना। बाप कहते हैं – हे नींद को जीतने वाले बच्चे, अब पुरूषार्थ करो। एक घड़ी आधी घड़ी……. शुरू करो फिर धीरे-धीरे बढ़ाते जाओ। मेरे से योग लगायेंगे तो पास विद् आनर हो जायेंगे। यह रेस है बुद्धि की। समय लगता है, बुद्धियोग से ही पाप कटेंगे। और फिर तुम अटल, अखण्ड, सुख-शान्तिमय 21 जन्म राज्य करेंगे। कल्प पहले भी किया था, अब फिर राज्य-भाग्य लो। कल्प-कल्प हम ही स्वर्ग बनाते, राज्य करते हैं। फिर हमको ही माया नर्कवासी बनाती है। अभी हम हैं राम सम्प्रदाय। हमारा उनसे प्रेम है। बाप ने हमको अपनी पहचान दी है। बाप है स्वर्ग का रचयिता। हम उनके बच्चे हैं तो फिर हम नर्क में क्यों पड़े हैं? जरूर स्वर्ग में कभी थे। बाप ने तो स्वर्ग रचा है। ब्रह्माकुमार-कुमारियां हैं सबको प्राण दान देने वाले। उनके प्राणों को कभी काल आकर बेकायदे, अकाले नहीं ले जायेंगे। वहाँ अकाले मृत्यु होना असम्भव है। वहाँ रोना भी होता नहीं। तुमने साक्षात्कार में भी देखा है कि श्रीकृष्ण कैसे जन्म लेते हैं। एकदम बिजली चमक जाती है। सतयुग का फर्स्ट प्रिन्स है ना। कृष्ण है नम्बरवन सतोप्रधान। फिर सतो, रजो, तमो में आते हैं। जब तमो जड़जड़ीभूत शरीर होता है तो फिर एक शरीर छोड़ दूसरा ले लेते हैं। यह प्रैक्टिस यहाँ की जाती है। बाबा, अब हम आपके पास आते हैं फिर वहाँ से हम स्वर्ग में जाकर नया शरीर लेंगे। अब तो वापिस बाबा के पास जाना है ना। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अकाले मृत्यु से बचने के लिए सबको प्राण दान देने की सेवा करनी है। रावण सम्प्रदाय को राम सम्प्रदाय बनाना है।

2) दिल की उल़फत (प्यार) एक बाप से रखना है। बुद्धियोग भटकाना नहीं है, नींद को जीत याद को बढ़ाते जाना है।

वरदान:- समय प्रमाण रूप-बसन्त अर्थात् ज्ञानी व योगी तू आत्मा बनने वाले स्व शासक भव
जो स्व-शासक हैं वह जिस समय चाहें रूप बन जाएं और जिस समय चाहें बसन्त बन जाएं। दोनों स्थिति सेकण्ड में बना सकते हैं। ऐसे नहीं कि बनने चाहें रूप और याद आती रहें ज्ञान की बातें। सेकण्ड से भी कम टाइम में फुलस्टाप लग जाए। पावरफुल ब्रेक का काम है जहाँ लगाओ वहाँ लगे, इसके लिए प्रैक्टिस करो कि जिस समय जिस विधि से जहाँ मन-बुद्धि को लगाना चाहें वहाँ लग जाए। ऐसी कन्ट्रोलिंग वा रूलिंग पावर हो।
स्लोगन:- शान्तिदूत वह है जो तूफान मचाने वालों को भी शान्ति का तोहफा दे।
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