daily murli 12 JANUARY

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 12 JANUARY 2021 : AAJ KI MURLI

12-01-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – पढ़ाई और दैवी कैरेक्टर्स का रजिस्टर रखो, रोज़ चेक करो कि हमसे कोई भूल तो नहीं हुई”
प्रश्नः- प्रश्‍न:- तुम बच्चे किस पुरूषार्थ से राजाई का तिलक प्राप्त कर सकते हो?
उत्तर:- 1. सदा आज्ञाकारी रहने का पुरूषार्थ करो। संगम पर फ़रमानबरदार का टीका दो तो राजाई का तिलक मिल जायेगा। बेव़फादार अर्थात् आज्ञा को न मानने वाले राजाई का तिलक नहीं प्राप्त कर सकते। 2. कोई भी बीमारी सर्जन से छिपाओ नहीं। छिपायेंगे तो पद कम हो जायेगा। बाप जैसा प्यार का सागर बनो तो राजाई का तिलक मिल जायेगा।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप रूहानी बच्चों को समझा रहे हैं, पढ़ाई माना समझ। तुम बच्चे समझते हो यह पढ़ाई बहुत सहज और बहुत ऊंची है और बहुत ऊंच पद देने वाली है। यह सिर्फ तुम बच्चे ही जानते हो कि यह पढ़ाई हम विश्व का मालिक बनने के लिए पढ़ रहे हैं। तो पढ़ने वालों को बहुत खुशी होनी चाहिए। कितनी ऊंची पढ़ाई है! यह वही गीता एपीसोड भी है। संगमयुग भी है। तुम बच्चे अब जगे हो, बाकी सब सोये पड़े हैं। गायन भी है माया की नींद में सोये पड़े हैं। तुमको बाबा ने आकर जगाया है। सिर्फ एक बात पर समझाते हैं – मीठे बच्चे, याद की यात्रा के बल से तुम सारे विश्व पर राज्य करो। जैसे कल्प पहले किया था। यह स्मृति बाप दिलाते हैं। बच्चे भी समझते हैं हमें स्मृति आई – कल्प-कल्प हम इस योगबल से विश्व का मालिक बनते हैं और फिर दैवीगुण भी धारण किये हैं। योग पर ही पूरा ध्यान देना है। इस योगबल से तुम बच्चों में ऑटोमेटिकली दैवीगुण आ जाते हैं। बरोबर यह इम्तहान है ही मनुष्य से देवता बनने का। तुम यहाँ आये हो योगबल से मनुष्य से देवता बनने के लिए। और यह भी जानते हो कि हमारे योगबल से सारा विश्व पवित्र होना है। पवित्र था, अब अपवित्र बना है। सारे चक्र के राज़ को तुम बच्चों ने समझा है और दिल में भी है। भल कोई नया हो तो भी यह बातें बहुत सहज हैं समझने की। तुम देवता पूज्य थे, फिर पुजारी तमोप्रधान बने और कोई ऐसे बतला भी न सके। बाप क्लीयर बताते हैं वह है भक्ति मार्ग, यह है ज्ञान मार्ग। भक्ति पास्ट हो गई। पास्ट की बात चितवो नहीं। वो तो गिरने की बात है। बाप अब चढ़ने की बातें सुना रहे हैं। बच्चे भी जानते हैं – हमको दैवीगुण धारण करने है जरूर। रोज़ चार्ट लिखना चाहिए – हम कितना समय याद में रहते हैं? हमारे से क्या क्या भूलें हुई? भूल की भारी चोट भी लगती है, उस पढ़ाई में भी कैरेक्टर्स देखे जाते हैं। इसमें भी कैरेक्टर देखा जाता है। बाप तो तुम्हारे कल्याण के लिए ही कहते हैं। उसमें भी रजिस्टर रखते हैं – पढ़ाई का और कैरेक्टर का। यहाँ भी बच्चों का दैवी कैरेक्टर बनाना है। भूल न हो, यह सम्भाल करनी है। मेरे से कोई भूल तो नहीं हुई? इसलिए कचहरी भी करते हैं। और कोई स्कूल आदि में कचहरी नहीं होती। अपने दिल से पूछना है। बाप ने समझाया है माया के कारण कुछ-न-कुछ अवज्ञायें होती रहती हैं। शुरू में भी कचहरी होती थी। बच्चे सच बताते थे। बाप समझाते रहते हैं – अगर सच न बताया तो वह भूलें वृद्धि को पाती रहेंगी। उल्टा और भूल का दण्ड मिल जाता है। भूल न बताने से फिर ऩाफरमानबरदार का टीका लग जाता है। फिर राजाई का तिलक मिल न सके। आज्ञा नहीं मानते हैं, बेव़फादार बनते हैं तो राजाई पा नहीं सकते। सर्जन भिन्न-भिन्न प्रकार से समझाते रहते हैं। सर्जन से अगर बीमारी छिपायेंगे तो पद भी कम हो जायेगा। सर्जन को बताने से कोई मार तो नहीं पड़ती है ना। बाप सिर्फ कहेंगे सावधान। फिर अगर ऐसी भूल करेंगे तो नुकसान को पायेंगे। पद बहुत कम हो जायेगा। वहाँ तो नैचुरल दैवी चलन होगी। यहाँ पुरूषार्थ करना है। घड़ी-घड़ी फेल नहीं होना है। बाप कहते हैं – बच्चे, जास्ती भूल न करो। बाप बहुत प्यार का सागर है। बच्चों को भी बनना है। यथा बाप तथा बच्चे। यथा राजा रानी तथा प्रजा। बाबा तो राजा है नहीं। तुम जानते हो बाबा हमको आप समान बनाते हैं। बाप की जो महिमा करते हैं, वह तुम्हारी भी होनी चाहिए। बाबा समान बनना है। माया बड़ी प्रबल है, तुमको रजिस्टर रखने नहीं देती है। माया के फँदे में तो पूरे फँसे हुए हो। माया की जेल से तुम निकल नहीं सकते हो। सच बताते नहीं हो। तो बाप कहते हैं एक्यूरेट याद का चार्ट रखो। सुबह को उठ बाबा को याद करो। बाप की ही महिमा करो। बाबा, आप हमको विश्व का मालिक बनाते हो तो हम आपकी महिमा करेंगे। भक्ति मार्ग में कितनी महिमा गाते हैं, उनको तो कुछ भी पता नहीं। देवताओं की महिमा है नहीं। महिमा है तुम ब्राह्मणों की। सबको सद्गति देने वाला भी एक बाप है। वह क्रियेटर भी है, डायरेक्टर भी है। सर्विस भी करते हैं और बच्चों को समझाते भी हैं। प्रैक्टिकल में कहते हैं। वो तो सिर्फ भगवानुवाच सुनते रहते हैं शास्त्रों से। गीता पढ़ते आते हैं फिर उनसे मिलता क्या है? कितना प्रेम से बैठ पढ़ते हैं, भक्ति करते हैं, पता नहीं पड़ता कि इनसे क्या होगा! यह नहीं जानते कि हम नीचे ही सीढ़ी उतर रहे हैं। दिन-प्रतिदिन तमोप्रधान बनना ही है। ड्रामा में नूँध ही ऐसी है। इस सीढ़ी का राज़ सिवाए बाप के कोई समझा न सके। शिवबाबा ही ब्रह्मा द्वारा समझाते हैं। यह भी इनसे समझकर फिर तुमको समझाते हैं। मूल बड़ा टीचर, बड़ा सर्जन तो बाप ही है। उनको ही याद करना है। ऐसे नहीं कहते कि ब्राह्मणी को याद करो। याद तो एक की रखनी है। कभी भी किसी के साथ मोह नहीं रखना है। एक बाप से ही शिक्षा लेनी है। निर्मोही भी बनना है। इसमें बड़ी मेहनत चाहिए। सारी पुरानी दुनिया से वैराग्य। यह तो ख़त्म हुई पड़ी है। इसमें लव वा आसक्ति कुछ भी नहीं। कितने बड़े-बड़े मकान आदि बनाते रहते हैं। उन्हों को यह भी पता नहीं कि यह पुरानी दुनिया बाकी कितना समय है। तुम बच्चे अब जगे हो औरों को भी जगाते हो। बाप आत्माओं को ही जगाते हैं, घड़ी-घड़ी कहते हैं अपने को आत्मा समझो। शरीर समझते हो तो जैसे सोये पड़े हो। अपने को आत्मा समझो और बाप को भी याद करो। आत्मा पतित है तो शरीर भी पतित मिलता है। आत्मा पावन तो शरीर भी पावन मिलता है।

बाप समझाते हैं तुम ही इस देवी-देवता घराने के थे। फिर तुम ही बन जायेंगे। कितना सहज है। ऐसे बेहद के बाप को हम क्यों नहीं याद करेंगे। सुबह उठकर भी बाप को याद करो। बाबा आपकी तो कमाल है, आप हमको कितना ऊंच देवी-देवता बनाकर फिर निर्वाणधाम में बैठ जाते हो। इतना ऊंच तो कोई बना न सके। आप कितना सहज कर बतलाते हो। बाप कहते हैं – जितना टाइम मिले, कामकाज करते हुए भी बाप को याद कर सकते हो। याद ही तुम्हारा बेड़ा पार करने वाली है अर्थात् कलियुग से उस पार शिवालय में ले जाने वाली है। शिवालय को भी याद करना है, शिवबाबा का स्थापन किया हुआ स्वर्ग – तो दोनों की याद आती है। शिवबाबा को याद करने से हम स्वर्ग के मालिक बनेंगे। यह पढ़ाई है ही नई दुनिया के लिए। बाप भी नई दुनिया स्थापन करने आते हैं। जरूर बाप आकर कोई तो कर्तव्य करेंगे ना। तुम देखते भी हो मैं पार्ट बजा रहा हूँ, ड्रामा के प्लैन अनुसार। तुम बच्चों को 5 हज़ार वर्ष पहले वाली याद की यात्रा और आदि-मध्य-अन्त का राज़ बताता हूँ। तुम जानते हो हर 5 हज़ार वर्ष के बाद बाबा हमारे सम्मुख आता है। आत्मा ही बोलती है, शरीर नहीं बोलेगा। बाप बच्चों को शिक्षा देते हैं – आत्मा को ही प्योर बनाना है। आत्मा को एक बार ही प्योर होना होता है। बाबा कहते हैं मैंने अनेक बार तुमको पढ़ाया फिर भी पढ़ाऊंगा। ऐसे कोई सन्यासी कह न सके। बाप ही कहते हैं – बच्चे, मैं ड्रामा के प्लैन अनुसार पढ़ाने आया हूँ। फिर 5 हज़ार वर्ष के बाद ऐसे ही आकर पढ़ाऊंगा, जैसे कल्प पहले तुमको पढ़ाकर राजधानी स्थापन की थी, अनेक बार तुमको पढ़ाकर राजाई स्थापन की है। यह कितनी वण्‍डरफुल बातें बाप समझाते हैं। श्रीमत कितनी श्रेष्ठ है। श्रीमत से ही हम विश्व के मालिक बनते हैं। बहुत-बहुत बड़ा मर्तबा है! कोई को बड़ी लॉटरी मिलती है तो माथा खराब हो जाता है। कोई चलते-चलते होपलेस हो जाते हैं। हम पढ़ नहीं सकते। हम विश्व की बादशाही कैसे लेंगे। तुम बच्चों को बहुत खुशी होनी चाहिए। बाबा कहते हैं अतीन्द्रिय सुख और खुशी की बातें मेरे बच्चों से पूछो। तुम जाते हो सबको खुशी की बातें सुनाने। तुम ही विश्व के मालिक थे फिर 84 जन्म भोग गुलाम बने हो। गाते भी हैं मैं गुलाम, मैं गुलाम तेरा। समझते हैं अपने को नीच कहना, छोटा होकर चलना अच्छा है। देखो, बाप कौन है! उनको कोई जानते नहीं। उनको भी सिर्फ तुमने जाना है। बाबा कैसे आकर सबको बच्चा-बच्चा कह समझाते हैं। यह आत्मा और परमात्मा का मेला है। उनसे हमको स्वर्ग की बादशाही मिलती है। बाकी गंगा स्नान आदि करने से कोई स्वर्ग की राजाई नहीं मिलती। गंगा स्नान तो बहुत बार किया। यूँ तो पानी सागर से आता है परन्तु यह बरसात कैसे पड़ती है, इनको भी कुदरत कहेंगे। इस समय बाप तुमको सब कुछ समझाते हैं। धारणा भी आत्मा ही करती है, न कि शरीर। तुम फील करते हो बरोबर बाबा ने हमको क्या से क्या बना दिया है! अब बाप कहते हैं – बच्चे, अपने पर रहम करो। कोई अवज्ञा न करो। देह-अभिमानी मत बनो। मुफ्त अपना पद कम कर देंगे। टीचर तो समझायेंगे ना। तुम जानते हो बाप बेहद का टीचर है। दुनिया में कितनी ढेर भाषायें हैं। कोई भी चीज छपती है तो सब भाषाओं में छपानी चाहिए। कोई लिटरेचर छपाते हो तो सबको एक-एक कापी भेज दो। एक-एक कॉपी लाइब्रेरी में भेज देनी चाहिए। खर्चे की बात नहीं। बाबा का भण्डारा बहुत भर जायेगा। पैसा अपने पास रखकर क्या करेंगे। घर तो नहीं ले जायेंगे। अगर कुछ घर ले जायें तो परमात्मा के यज्ञ की चोरी हो जाये। तोबां-तोबां, ऐसी बुद्धि शल किसकी न हो। परमात्मा के यज्ञ की चोरी! उन जैसा महान् पाप आत्मा कोई हो न सके। कितनी अधमगति हो जाती है। बाप कहते हैं यह सब ड्रामा में पार्ट है। तुम राजाई करेंगे वह तुम्हारे सर्वेन्ट बनेंगे। सर्वेन्ट बिगर राजाई कैसे चलेगी! कल्प पहले भी ऐसे ही स्थापना हुई थी।

अब बाप कहते हैं – अपना कल्याण करना चाहते हो तो श्रीमत पर चलो। दैवीगुण धारण करो। क्रोध करना दैवीगुण नहीं है। वह आसुरी गुण हो जाता है। कोई क्रोध करे तो चुप कर देना चाहिए। रेसपान्स नहीं करना चाहिए। हर एक की चलन से समझ सकते हैं, अवगुण तो सबमें हैं। जब कोई क्रोध करते हैं तो उनकी शक्ल तांबे जैसी हो जाती है। मुख से बाम चलाते हैं। अपना ही नुकसान कर देते हैं। पद भ्रष्ट हो जायेगा। समझ होनी चाहिए। बाप कहते हैं जो पाप कर्म करते हो, वह लिख दो। बाबा को बताने से माफ हो जायेगा। बोझ हल्का हो जायेगा। जन्म-जन्मान्तर से तुम विकार में जाने लगे हो। इस समय तुम कोई पाप कर्म करेंगे तो सौगुणा हो जायेगा। बाप के आगे भूल की तो सौगुणा दण्ड पड़ जायेगा। किया और बताया नहीं तो और ही वृद्धि हो जायेगी। बाप तो समझायेंगे कि अपने को नुकसान नहीं पहुँचाओ। बाप बच्चों की बुद्धि सालिम (अच्छी) बनाने आये हैं। जानते हैं यह कैसा पद पायेंगे। वह भी 21 जन्मों की बात है। जो सर्विसएबुल बच्चे हैं, उनका स्वभाव बहुत मीठा चाहिए। कोई झट बाप को बतलाते हैं – बाबा यह भूल हुई। बाबा खुश होते हैं। भगवान् खुश हुआ तो और क्या चाहिए। यह तो बाप टीचर गुरू तीनों ही है। नहीं तो तीनों ही नाराज़ होंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) श्रीमत पर चल अपनी बुद्धि सालिम (अच्छी) रखनी है। कोई भी अवज्ञा नहीं करनी है। क्रोध में आकर मुख से बाम नहीं निकालना है, चुप रहना है।

2) दिल से एक बाप की महिमा करनी है। इस पुरानी दुनिया से आसक्ति वा प्यार नहीं रखना है। बेहद का वैरागी और निर्मोही बनना है।

वरदान:- अपने अव्यक्त शान्त स्वरूप द्वारा वातावरण को अव्यक्त बनाने वाले साक्षात मूर्त भव
जैसे सेवाओं के और प्रोग्राम बनाते हो ऐसे सवेरे से रात तक याद की यात्रा में कैसे और कब रहेंगे यह भी प्रोग्राम बनाओ और बीच-बीच में दो तीन मिनट के लिए संकल्पों की ट्रैफिक को स्टॉप कर लो, जब कोई व्यक्त भाव में ज्यादा दिखाई दे तो उनको बिना कहे अपना अव्यक्ति शान्त रूप ऐसा धारण करो जो वह भी इशारे से समझ जाये, इससे वातावरण अव्यक्त रहेगा। अनोखापन दिखाई देगा और आप साक्षात्कार कराने वाले साक्षात मूर्त बन जायेंगे।
स्लोगन:- सम्पूर्ण सत्यता ही पवित्रता का आधार है।

TODAY MURLI 12 JANUARY 2021 DAILY MURLI (English)

12/01/21
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, keep a register of both your study and your divine character. Check every day whether you have made a mistake.
Question: By making which effort do you children claim a tilak for the kingdom?* Words that Baba spoke in English are shown in italics.
Answer: 1. Make effort to remain constantly obedient. At the confluence age, if you give the tilak of being one who obeys orders, you will receive the tilak for the kingdom. To be unfaithful means to be one who doesn’t obey orders. Such ones cannot receive the tilak for the kingdom. 2. Do not hide any illness from the Surgeon. If you hide anything, your status will be reduced. Become an ocean of love, the same as the Father and you will receive a tilak for the kingdom.

Om shanti. The spiritual Father explains to you spiritual children: To study means to understand. You children understand that this study is very easy, very high and gives you a high status. Only you children know that you are studying this study to become the masters of the world. So, those who are studying should have a lot of happiness. It is such an elevated study. This is that same episode of the Gita. It is also the confluence age. You children have now awakened whereas all the rest are still sleeping. There is the praise that people are still sleeping in the sleep of Maya. Baba has come and awakened you. He explains to you just one thing: Sweet children, with the power of the pilgrimage of remembrance you can rule the whole world, just as you did in the previous cycle. The Father reminds you of this. You children understand that you have now remembered: every cycle we become the masters of the world with this power of yoga and we also imbibe divine virtues. You have to pay full attention to yoga. With this power of yoga, you children automatically develop divine virtues. This is truly the examination to change from human beings into deities. You have come here to change from human beings into deities with the power of yoga. You also know that the whole world is to become pure through your power of yoga. It was pure and it has now become impure. You children have understood the secret of the whole cycle and it is also in your hearts. Even if a new person comes, these are very easy things to understand. You deities were worthy of worship and you then become tamopradhan worshippers. No one else can tell you this. The Father tells you clearly: That is the path of devotion and this is the path of knowledge. Devotion is now in the past. Do not remember things of the past. Those are things to make you fall. The Father is now telling you things for ascending. You children know that you definitely have to imbibe divine virtues. You should write your chart every day: For how long did I stay in remembrance? What mistakes did I make? One is very badly hurt by the mistake one makes. In those studies, one’s character is also considered. Here, too, your character is seen. The Father is only telling you this for your benefit. Here, too, a register is kept of the study and your character. Here too, the children’s character has to be made divine. You have to be careful that you don’t make a mistake. I didn’t make any mistakes, did I? This is why a court is held. A court is not held in any other school. You have to ask your heart. The Father has explained that, because of Maya, there is one or another form of disobedience. A court used to be held in the beginning too. Children would tell the truth. The Father continues to explain to you: If you don’t tell the truth, those mistakes will then continue to grow, and you will receive even more punishment for your mistakes for no reason. By not telling Baba about your mistakes, you receive the tilak of being disobedient. You cannot then receive the tilak for the kingdom. If you don’t obey orders and you are unfaithful, you cannot claim the kingdom. The Surgeon continues to explain to you in different ways. If you hide your illness from the Surgeon, your status will be reduced. You won’t be beaten if you tell the Surgeon. The Father would simply say: Be careful! If you make such a mistake again, you will incur a loss; your status will become very low. There, they will naturally have divine activities. Here, you have to make effort. You must not repeatedly fail. The Father says: Children, do not make any mistakes. The Father is the Ocean of a lot of love. Children, you too also have to become that. As is the Father, so are the children. As are king and queen, so are the subjects. Baba is not a king. You know that Baba is making you the same as He is. The praise that is sung of the Father should also be your praise. You have to become equal to Baba. Maya is very powerful: she doesn’t allow you to keep your register. You are totally trapped in Maya’s claws. You cannot come out of Maya’s jail. You don’t tell the truth. So, the Father says: Keep an accurate chart of remembrance. Wake up early in the morning and remember Baba. Praise only the Father. Baba, You make us into the masters of the world, and so we will praise You. People sing so much praise on the path of devotion; they don’t know anything. There is no praise of the deities. The praise is of you Brahmins. It is the one Father who grants everyone salvation. He is the Creator and also the Director. He does service and also explains to you children. He tells you everything practically. Those people simply continue to listen to the versions of God from the scriptures. They have been reading the Gita, but what do they receive from that? They sit and study that with so much love; they perform devotion and yet they don’t know what they will receive from it. They don’t know that they are continuing to come down the ladder. Day by day, they have to become tamopradhan; it is fixed in the drama. No one, except the Father, can tell you the secret of this ladder. Only Shiv Baba explains to you through Brahma. This one also understands from that One and he then explains to you. The Father is the main, senior Teacher and the Surgeon. You have to remember Him alone. He doesn’t tell you to remember your Brahmin teacher. You have to remember just the One. Do not have attachment to anyone. Take teachings from only the one Father. You also have to become free from attachment. This requires a lot of effort. You have disinterest in the whole of the old world. This world is already finished. You don’t have any love or attraction to it. They continue to build so many big buildings etc. They don’t know how much longer this old world will remain. You children have now awakened and you also awaken others. The Father only awakens souls. He repeatedly tells you: Consider yourself to be a soul. By considering yourself to be a body, it is as though you are still asleep. Consider yourself to be a soul and also remember the Father. When a soul is impure, he receives an impure body. When a soul is pure, he receives a pure body. The Father explains: You belonged to that deity clan and you will then become that again. It is so easy! Why would we not remember such an unlimited Father? Wake up in the morning and remember the Father. Baba, it is Your wonder. You make us into such elevated deities and you then go and sit in the land of nirvana. No one else can make us as elevated. You tell us everything so easily. The Father says: Whatever time you have, even whilst doing your work, you can remember the Father. It is only remembrance that will make your boat go across, that is, it will take you from this iron age to the land of Shiva. You also have to remember the land of Shiva, the heaven that Shiv Baba established. So, you remember both. We will become the masters of heaven by remembering Shiv Baba. This study is for the new world. The Father comes here to establish the new world. The Father would definitely come and perform some task too. You can see that I am playing My part according to the drama plan. I am telling you children the secret of the pilgrimage of remembrance and the beginning, the middle and the end of 5000 years. You know that Baba comes personally in front of you every 5000 years. It is the soul that speaks, the body doesn’t speak. The Father gives teachings to you children: It is the soul that has to be made pure. It is only once that the soul has to become pure. Baba says: I have taught you many times and will teach you again. None of the sannyasis can say this. Only the Father says: Children, I have come to teach you according to the drama plan and then I will come and teach you in the same way in 5000 years’ time, just as I taught you in the previous cycle and established the kingdom. I have taught you many times and established the kingdom. These things, which the Father explains are so wonderful. Shrimat is so elevated. It is only through shrimat that you become the masters of the world. It is a very high status. When someone wins a huge lottery, his head is spoilt. Some become hopeless whilst moving along: I cannot study anymore. How can I claim the sovereignty of the world? You children should have a lot of happiness. Baba says: Ask My children about supersensuous joy and happiness! You go to tell everyone things of happiness. You were the masters of the world and then, after taking 84 births, you have become slaves. They sing, “I am Your slave. I am Your slave.” They believe that to call themselves degraded and to consider themselves to be small is good. Look who the Father is! No one knows Him. Only you now know Him. Baba comes and explains to all of you and calls you, “Child, child!” This is the meeting of souls with the Supreme Soul. We receive the sovereignty of heaven from Him. No one can receive the kingdom of heaven by bathing in the River Ganges. You have bathed in the Ganges many times. In fact, water comes from the ocean, but how this rain falls is also a wonder of nature. At this time, the Father explains everything to you. It is the soul that imbibes, not the body. You can feel, “Truly, look at what Baba has made me from what I was!” The Father now says: Children, have mercy on yourselves. Do not be disobedient. Do not become body conscious. You will lose your status for no reason. The Teacher would explain to you. You know that the Father is the unlimited Teacher. There are so many languages in the world. If anything is printed, it should be printed in all languages. When you have literature printed, send everyone a copy. One copy should also be sent to the library. There is no question of expense in this. Baba’s treasure box will become very full. What would you do by keeping the money with you? You would not take it with you to your home. If you take anything home with you, that would be stealing from Shiv Baba’s sacrificial fire. That would be a great mistake. Let no one have an intellect like that. There cannot be any greater sinful soul than one who steals from God’s sacrificial fire. He would reach the completely degraded stage. The Father says: All of this is part of the drama. You will then rule and they will become servants. How would the kingdom continue without servants? Establishment had taken place in the same way. The Father now says: If you want to benefit yourself, follow shrimat! Imbibe divine virtues! To get angry is not a divine virtue; it is a devilish trait. If someone is getting angry, you should quieten that one down. You should not respond to that one. You can understand from each one’s activities. Everyone has devilish traits. When someone is angry, his face becomes as red as copper. They drop bombs through their words; they cause a loss for themselves and their status is destroyed. You should have understanding. The Father says: Write down the sins you have committed. By telling Baba about it, you will be forgiven and your burden will be lightened. You have been indulging in vice for birth after birth. If you commit any sin at this time, one hundred-fold punishment will be accumulated. If you make a mistake in front of the Father, there will be one hundred-fold punishment. If you do something and don’t tell Baba about it, it will increase. The Father would explain: Do not cause yourself a loss. The Father has come to make the intellects of you children very good. He knows what status you will claim; and that is also a matter for 21 births. The nature of serviceable children has to be very sweet. Some instantly tell the Father: Baba, I made this mistake. Baba is pleased with them. That One is the Father, Teacher and Guru, all three. When God is happy with you, what more could you want? Otherwise, all three will get upset. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Follow shrimat and let your intellect remain good. Do not disobey any orders. Do not get angry and drop bombs through your words. Remain silent.
  2. Praise the one Father from your heart. Do not have any attraction or love for this old world. Be one who has unlimited disinterest and remain free from attachment.
Blessing: May you become an image that grants visions who makes the atmosphere avyakt with your avyakt and peaceful form.
Just as you make other programmes for service, in the same way, also make a programme for staying on the pilgrimage of remembrance from morning till night, and every now and then stop the traffic of your thoughts for two to three minutes. When someone is seen in a lot of gross consciousness, then, without saying anything to that one, adopt such an avyakt and peaceful form yourself that that one understands from a signal. By your doing this, the atmosphere will remain avyakt. Something unique will be visible and you will become an image that grants visions.
Slogan: Complete truth is the basis of purity.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 12 JANUARY 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 12 January 2020

12/01/20
Madhuban
Avyakt BapDada
Om Shanti
11/04/85

Generosity is the speciality of a gathering of thosewho are images of support.

Today, Baba has come to meet the special souls who are special images of support for world transformation, support for unlimited service of the world, the images who, on the basis of their elevated awareness, their unlimited attitude and their sweet words, give zeal and enthusiasm to others and who are humble instruments. Does each one of you experience yourself to be an image of support in this way? The gathering of souls who are images of support has such an unlimited responsibility. To be the image of support means constantly to consider oneself to be responsible at every moment, in every thought and action as you move along. To come into this gathering means to wear a crown of unlimited responsibility. This gathering, which you call a meeting, to come to this meeting means to be always tied to the Father, to service and to the family with the thread of elevated thoughts of love and to tie others too. You are supports for this. To come into this gathering that is especially for this purpose means to make yourself an example for everyone else. This is not a meeting, but it is constantly tying yourself in the bond of the pure thought of becoming an elevated being who follows the highest code of conduct. All the specially selected jewels from everywhere have gathered together in this gathering of those who are supports. Selected means those who have become equal to the Father. The basis of support for service means an image who uplifts the self and uplifts everyone else. To the extent that you are an image who uplifts yourself, you will become an instrument to uplift everyone else. BapDada saw in this gathering the children who are images of support and images of upliftment and He especially saw your specialities. You have become images of support and you have also become images of upliftment. In order to achieve success in both of these things, what third thing do you need? It is because you are images of support that you come here on this invitation and it is because you are images of upliftment that you have made plans. To uplift means to do service. What third thing did Baba see? To the extent that you are part of this special gathering, so you are generous-hearted. To what extent do you have words of generosity and feelings of generosity? Because, to be generous-hearted means constantly to have a generous and big heart for every task. In which aspect should you have a generous and big heart? Be generous-hearted in making everyone move forward with your good wishes for everyone. “Whatever is Yours is mine and whatever is mine is Yours” because everything belongs to the one Father. Be generous-hearted and big hearted in having this unlimited attitude. Have a generous heart, that is, have a heart that has the feelings of a bestower. Have a generous heart in being a great donor of the virtues, powers and specialities you have attained. To donate the wealth of knowledge with words is not a big thing, but you have to donate virtues and become co-operative in giving virtues. To use the word “donation” is not worthy of Brahmins. To make someone virtuous with your own virtues, to be co-operative in filling souls with specialities is what it is to be a great donor and generous-hearted. To be so generous-hearted, to have such a generous heart is called “following Father Brahma. What are the signs of those who are generous-hearted to this extent?

Baba saw three particular signs. Such a soul will always be free from having these three – jealousy, dislike and criticizing anyone (which you call taunting). This is what it means to be generous-hearted. Jealousy distresses you and also distresses others. Just as you refer to anger as a fire, similarly, jealousy works like a fire too. Anger is a big fire and this is a small fire. Dislike will not allow you to experience the stage of having pure and positive thoughts for others or that of constantly having pure and positive thoughts for yourself. Dislike means to make oneself fall and also make others fall. In the same way, to criticize whether it is just as a joke or whether you are being serious – causes sorrow in such a way that it is as though you push them as they move along. It means to kick them. When someone trips you up and you fall, then, because you are hurt, either lightly or seriously, you lose courage. You continually keep thinking about your hurt, and, while you are still hurt, you definitely continue to remember in one way or another the one who caused you that hurt. This is not an ordinary thing. It is very easy to say something about someone, to hurt someone, even just joking, which causes great sorrow. This too is in the list of causing sorrow. So, do you understand? To the extent that you are an image of support, so you are an image of upliftment and an instrument who is generous hearted, one with a generous heart. You understood the signs, did you not? Someone with a generous heart will have this generosity.

The gathering is very good. All the well-known ones have come. You have also made very good plans. You are instruments to put the plans into a practical form. You yourselves are just as good as the good plans you have made. The Father likes you. You have a lot of love for service. The basis of succeeding in service all the time is generosity. The aim and the pure thoughts of all of you are very good and all of you have the same thought. You simply have to add one word. You have to reveal the one Father. You have to be one (united) and reveal the One. You simply have to make this addition. People on the path of ignorance signal upwards with one finger in order to give the introduction of the one Father. They do not signal with two fingers. The symbol of co-operating is also shown as one finger. That symbol of the speciality of you special souls has continued.

So, in order to celebrate and to make plans for the golden jubilee, constantly remember two things: “Unity (ekta) and concentration (ekagrata)”. These two are the elevated arms of success with which to carry out the task. Concentration means to be constantly free from waste and negative thoughts. Where there is unity and concentration, success is the garland around your neck. You have to carry out the task of the golden jubilee with these two special arms. All of you have two arms. So then, also add these two arms and you will become four-armed images. The true Narayan and Mahalakshmi have been shown with four arms. All of you are true Narayans, Mahalakshmis. Carry out every task while being four-armed, that is, become an image that grants visions. Don’t do anything with just two arms, do everything with four arms. You have just inaugurated the golden jubilee (marked with the ceremonial worship of Ganesh). Ganesh is also shown with four arms. BapDada comes to your meeting every day. He gets to know all the news just by going around here once. BapDada takes a photo of how all of you sit. Not physically. Baba takes a photo of the seat of the stage of your mind. Someone could be saying something with words, but Baba tapes the words of the mind, of what you are saying with your mind. BapDada has taped cassettes of everyone. He also has pictures; He has both. Whatever you want – VideoTV – He has. All of you have your own cassette, do you not? However, some are not able to tell the sound of their minds or of their thoughts. Achcha.

Everyone loves the youth plans. This is also a matter of zeal and enthusiasm. It is not a matter of force. Whatever is the enthusiasm in your heart, that automatically creates an atmosphere of enthusiasm in others. So, this is not a rally, but a rally of enthusiasm. It is just in name. Whatever task you carry out as an instrument, let it have the speciality of zeal and enthusiasm. Everyone likes the plans. In the future too, as you continue to put the plans into a practical form while being one with four arms, further additions will continue to take place. The thing that BapDada liked most of all was that everyone had the one thought of zeal and enthusiasm to celebrate the golden jubilee with a lot of pomp and splendour. This foundation of the thought of everyone filled with zeal and enthusiasm is the same. Constantly underline this word one and continue to move forward. You are one, and this is the task of the One. No matter in which corner the task is being carried out, whether it is in this land or abroad, it may be in any zone, it may be the East or the West, but you are all one and it is the task of the One. This is everyone’s thought, is it not? You have already made this promise, have you not? Not a promise in words, but a promise in your minds, that is, to have this undeterrable thought. No matter what happens, it cannot be deterred – undeterrable. Have all of you made such a promise? Whenever there is an auspicious task, then, in order to make a promise, everyone first has a thought and the symbol of that is to have a bracelet tied. They may tie a thread around the wrist or tie a bracelet made of something else on those who are going to carry out that task. So, this is the bracelet of elevated thoughts, is it not? Just as everyone inaugurated the bhandari (kitchen)with a lot of zeal and enthusiasm today, so, now also have this bhandari in which everyone writes this note considering it to be an undeterred promise. There will be success when both the bhandaris are together (kitchen and Baba’s box); and, let it be from your heart, not just superficially for show. This is the foundation. This is the basis of becoming golden and celebrating the golden jubilee. For this, simply remember one slogan: “Neither will I become a problem nor will I fluctuate on seeing a problem.” I will be an embodiment of solutions who gives solutions to others. This awareness will automatically make the golden jubilee successful. When the final golden jubilee takes place, everyone will experience your golden form. You will see the golden world in you. You won’t just say that the golden world is coming, but you will show it to them practically. Just as magicians continue to say: “Look at this”, while showing it to you at the same time, so too, let your golden faces, your sparkling foreheads, your sparkling eyes and your sparkling lips all give a vision of the golden age. You make those pictures, do you not? In one picture, one minute you see Brahma, and the next minute you see Krishna or Vishnu. In the same way, let them have a vision of you. One minute an angel, one moment a world emperor, world empress, one moment wearing an ordinary white costume. Let all these different forms be visible in your golden image. Do you understand?

Since a bouquet of the selected spiritual roses has gathered together, and one spiritual rose has so much fragrance, then such a big bouquet would do such wonders! And each star has a world in it. You are not alone. Those stars do not have a world in it, whereas you stars have a world in you. A wonder has to happen! It has already happened. It is just that someone has to take the initiative and become Arjuna, and victory is already guaranteed. It is fixed. However, you have to become Arjuna. Arjuna means number one. Now, give a prize on this basis. In the whole golden jubilee, do not become a problem, do not look at problems. Let there be all three specialities: free from obstacles, free from negative thoughts and viceless. Give a prize to those who have such a golden stage. BapDada is also pleased. There would be happiness seeing the children who have broad and unlimited intellects. Just as you have unlimited intellects, so too, have unlimited hearts. All of you have unlimited intellects and this is why you have come here to make plans. Achcha.

To those who are constant images of support, images of upliftment, to those who are constantly generous with their generous hearts, to those who remain constantly stable in the constant stage of being united in carrying out the task of the One, to those who remain constantly stable in unity and concentration, BapDada’s love, remembrance and namaste to those who have such unlimited intellects, unlimited hearts and an unlimited chit (subconscious).

BapDada speaking to the senior brothers and sisters:All of you had a meeting. There is success in elevated thoughts. The speciality is to move constantly forward with zeal and enthusiasm. Especially try and experiment by serving through the mind. Serving through the mind is like a magnet. A magnet can pull a needle from so far away. In the same way, by serving through your mind, souls will come close to you whilst you are sitting at home. At the moment, you are busy outside a lot more. Now use the service of the mind. The success of all the big tasks that has taken place have been through service of the mind. When those people perform the divine activities of Rama (Rama Leela) or they carry out a task, then, before carrying out that task, they make a vow to keep their stage according to that task. So, all of you also have to make a vow to serve through the mind. Because of not making this vow, you are in upheaval a lot more. This is why the result is sometimes one thing and sometimes another thing. Greater practice of serving through the mind is needed. In order to serve through the mind, the stage of being a light-and-might-house is needed. Both light and might are needed together. Be mighty and speak in front of a mike. Let there be might and let there be a mike. Your mouth is also a mike.

So, be the might and speak through the mike. It is as though you have come down from up above with a powerful stage and that, as an incarnation, you are giving everyone this message. I am an incarnation speaking. I have just incarnated. The stage of an incarnation is powerful. One who comes down from up above has a goldenaged stage. So, when you consider yourself to be an incarnation, it is a powerful stage. Achcha.

Blessing: May you become an avyakt angel, like the Father by giving sakaash to all souls with your highest stage and as a detached observer.
While walking and moving around, always consider yourself to be an incorporeal soul and while performing actions, consider yourself to be an avyakt angel and you will continue to fly up above. An angel means one who stays in the highest stage. No matter what continues to happen in the physical world, be a detached observer and continue to observe everyone’s part and continue to give them sakaash. Sakaash is not given by getting off your seat. Remain stable in the highest stage and, with the help of your attitude and drishti, give the sakaash of benevolence, not while in a mixed state of mind. Only then will you be able to remain safe from any type of atmosphere and receive blessings to become an avyakt angel, like the Father.
Slogan: With the power of remembrance, transform sorrow into happiness and peacelessness into peace.

 

*** Om Shanti ***

Special homework to experience the avyakt stage in this avyakt month.

If you have love for Father Brahma, show the signs of that love in a practical way. Father Brahma had number one love for the murli through which he became Murlidhar. Whatever Father Brahma had love for and still has love for now, your love for that also has to be constantly visible. Study every murli with a lot of love and become an embodiment of it.

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 12 JANUARY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 12 January 2020

12-01-20
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 11-04-85 मधुबन

“उदारता ही आधार स्वरूप संगठन की विशेषता है”

आज विशेष विश्व परिवर्तन के आधार स्वरूप, विश्व के बेहद सेवा के आधार स्वरूप, श्रेष्ठ स्मृति, बेहद की वृत्ति, मधुर अमूल्य बोल बोलने के आधार द्वारा औरों को भी ऐसे उमंग-उत्साह दिलाने के आधार स्वरूप निमित्त और निर्माण स्वरूप ऐसी विशेष आत्माओं से मिलने के लिए आये हैं। हर एक अपने को ऐसा आधार स्वरूप अनुभव करते हो? आधार रूप आत्माओं के इस संगठन पर इतनी बेहद की जिम्मेवारी है। आधार रूप अर्थात् सदा स्वयं को हर समय, हर संकल्प, हर कर्म में जिम्मेवार समझ चलने वाले। इस संगठन में आना अर्थात् बेहद के जिम्मेवारी के ताजधारी बनना। यह संगठन जिसको मीटिंग कहते हो, मीटिंग में आना अर्थात् सदा बाप से, सेवा से, परिवार से, स्नेह के श्रेष्ठ संकल्प के धागे में बंधना और बांधना, इसके आधार रूप हो। इस निमित्त संगठन में आना अर्थात् स्वयं को सर्व के प्रति एग्जैम्पुल बनाना। यह मीटिंग नहीं लेकिन सदा मर्यादा पुरूषोत्तम बनने के शुभ संकल्प के बंधन में बंधना है। इन सब बातों के आधार स्वरूप बनना, इसको कहा जाता है – आधार स्वरूप संगठन। चारों ओर के विशेष चुने हुए रत्न इकट्ठे हुए हो। चुने हुए अर्थात् बाप समान बने हुए। सेवा का आधार स्वरूप अर्थात् स्व उद्धार और सर्व के उद्धार स्वरूप। जितना स्व के उद्धार स्वरूप होंगे उतना ही सर्व के उद्धार स्वरूप निमित्त बनेंगे। बापदादा इस संगठन के आधार रूप और उद्धार रूप बच्चों को देख रहे थे और विशेष एक विशेषता देख रहे थे आधार रूप भी बन गये, उद्धार रूप भी बने। इन दोनों बातों में सफलता पाने के लिए तीसरी क्या बात चाहिए? आधार रूप हैं तभी तो निमंत्रण पर आये हैं ना और उद्धार रूप हैं तब तो प्लैन्स बनाये हैं। उद्धार करना अर्थात् सेवा करना। तीसरी बात क्या देखी? जितने विशेष संगठन के हैं उतने उदारचित। उदारदिल वा उदारचित्त के बोल, उदारचित की भावना कहाँ तक है? क्योंकि उदारचित अर्थात् सदा हर कार्य में फ्राखदिल, बड़ी दिल वाले। किस बात में फ्राखदिल वा बड़ी दिल हो? सर्व प्रति शुभ भावना द्वारा आगे बढ़ाने में फ्राखदिल। तेरा सो मेरा, मेरा सो तेरा क्योंकि एक ही बाप का है। इस बेहद की वृत्ति में फ्राखदिल, बड़ी दिल हो। उदार दिल हो अर्थात् दातापन की भावना की दिल। अपने प्राप्त किये हुए गुण, शक्तियाँ, विशेषतायें सबमें महादानी बनने में फ्राखदिल। वाणी द्वारा ज्ञान धन दान करना, यह कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन गुण दान वा गुण देने के सहयोगी बनना। यह दान शब्द ब्राह्मणों के लिए योग्य नहीं है। अपने गुण से दूसरे को गुणवान, विशेषता भरने में सहयोगी बनना इसको कहा जाता है महादानी, फ्राखदिल। ऐसा उदारचित बनना, उदार दिल बनना – यह है ब्रह्मा बाप को फालो फादर करना। ऐसे उदारचित की निशानी क्या होगी?

तीन निशानियाँ विशेष होंगी। ऐसी आत्मा ईर्ष्या, घृणा और क्रिटिसाइज करना (जिसको टोन्ट मारना कहते हो) इन तीनों बातों से सदा मुक्त होगी। इसको कहा जाता उदारचित। ईर्ष्या स्वयं को भी परेशान करती, दूसरे को भी परे-शान करती है। जैसे क्रोध को अग्नि कहते हैं, ऐसे ईर्ष्या भी अग्नि जैसा ही काम करती है। क्रोध महा अग्नि है, ईष्या छोटी अग्नि है। घृणा कभी भी शुभ चिन्तक, शुभ चिन्तन स्थिति का अनुभव नहीं करायेगी। घृणा अर्थात् खुद भी गिरना और दूसरे को भी गिराना। ऐसे क्रिटिसाइज करना चाहे हँसी में करो, चाहे सीरियस होकर करो लेकिन यह ऐसा दु:ख देता है जैसे कोई चल रहा हो, उसको धक्का देकर गिराना। ठोकर देना। जैसे कोई को गिरा देते तो छोटी चोट वा बड़ी चोट लगने से वह हिम्मतहीन हो जाता है। उसी चोट को ही सोचते रहते हैं, जब तक वो चोट होगी तब तक चोट देने वाले को किसी भी रूप में याद जरूर करता रहेगा, यह साधारण बात नहीं है। किसके लिए कह देना बहुत सहज है। लेकिन हँसी की चोट भी दु:ख रूप बन जाती है। यह दु:ख देने की लिस्ट में आता है। तो समझा! जितने आधार स्वरूप हो उतने उद्धार स्वरूप, उदारदिल, उदारचित्त बनने के निमित्त स्वरूप। निशा-नियाँ समझ ली ना। उदारचित्त फ्राखदिल होगा।

संगठन तो बहुत अच्छा है। सभी नामीग्रामी आये हुए हैं। प्लैन्स भी अच्छे-अच्छे बनाये हैं। प्लैन को प्रैक्टिकल में लाने के निमित्त हो। जितने अच्छे प्लैन बनाये हैं उतने स्वयं भी अच्छे हो। बाप को अच्छे लगते हो। सेवा की लगन बहुत अच्छी है। सेवा में सदाकाल की सफलता का आधार उदारता है। सभी का लक्ष्य, शुभ संकल्प बहुत अच्छा है और एक ही है। सिर्फ एक शब्द एड करना है। एक बाप को प्रत्यक्ष करना है – एक बनकर एक को प्रत्यक्ष करना है। सिर्फ यह एडीशन करनी है। एक बाप का परिचय देने के लिए अज्ञानी लोग भी एक अंगुली का इशारा करेंगे। दो अंगुली नहीं दिखायेंगे। सहयोगी बनने की निशानी भी एक अंगुली दिखायेंगे। आप विशेष आत्माओं की यही विशेषता की निशानी चली आ रही है।

तो इस गोल्डन जुबली को मनाने के लिए वा प्लैन बनाने के लिए सदा दो बातें याद रहें – “एकता और एका-ग्रता”। यह दोनों श्रेष्ठ भुजायें हैं, कार्य करने की सफलता की। एकाग्रता अर्थात् सदा निरव्यर्थ संकल्प, निर्वि-कल्प। जहाँ एकता और एकाग्रता है वहाँ सफलता गले का हार है। गोल्डन जुबली का कार्य इन विशेष दो भुजाओं से करना। दो भुजायें तो सभी को हैं। दो यह लगाना तो चतुर्भुज हो जायेंगे, सत्यनारायण और महालक्ष्मी को चार भुजायें दिखाई हैं। आप सभी सत्यनारायण, महालक्ष्मियाँ हो। चतुर्भुजधारी बन हर कार्य करना अर्थात् साक्षात्कार स्वरूप बनना। सिर्फ दो भुजाओं से काम नहीं करना। 4 भुजाओं से करना। अभी गोल्डन जुबली का श्री गणेश किया है ना। गणेश को भी 4 भुजा दिखाते हैं। बापदादा रोज़ मीटिंग में आते हैं। एक चक्र में ही सारा समाचार मालूम हो जाता है। बापदादा सभी का चित्र खींच जाते हैं। कैसे-कैसे बैठे हैं। शरीर रूप में नहीं। मन की स्थिति के आसन का फोटो निकालते हैं। मुख से कोई क्या भी बोल रहा हो लेकिन मन से क्या बोल रहे हैं, वह मन के बोल टेप करते हैं। बापदादा के पास भी सबके टेप किये हुए कैसेटस हैं। चित्र भी हैं, दोनों हैं। वीडियो, टी.वी.आदि जो चाहो वह है। आप लोगों के पास अपना कैसेट तो है ना। लेकिन कोई-कोई को अपने मन की आवाज, संकल्प का पता नहीं चलता है। अच्छा!

यूथ प्लैन सभी को अच्छा लगता है। यह भी उमंग-उत्साह की बात है। हठ की बात नहीं है। जो दिल का उमंग होता है, वह स्वत: ही औरों में भी उमंग का वातावरण बनाते हैं। तो यह पद यात्रा नहीं लेकिन उमंग की यात्रा है। यह तो निमित्त मात्र है। जो भी निमित्त मात्र कार्य करते हो उसमें उमंग-उत्साह की विशेषता हो। सभी को प्लैन पसन्द है। आगे भी जैसे चार भुजाधारी बन करके प्लैन प्रैक्टिकल में लाते रहेंगे तो और भी एडीशन होती रहेगी। बापदादा को सबसे अच्छे ते अच्छी बात यह लगी कि सभी को गोल्डन जुबली धूमधाम से मनाने का उमंग-उत्साह वाला संकल्प एक है। यह फाउन्डेशन सभी के उमंग-उत्साह के संकल्प का एक ही है। इसी एक शब्द को सदा अन्डरलाइन लगाते आगे बढ़ना। एक हैं, एक का कार्य है। चाहे किस भी कोने में हो रहा है, चाहे देश में हो वा विदेश में हो। चाहे किसी भी ज़ोन में हो इस्ट में हो वेस्ट में हो लेकिन एक हैं, एक का कार्य है। ऐसे ही सभी का संकल्प है ना। पहले यह प्रतिज्ञा की है ना। मुख की प्रतिज्ञा नहीं, मन में यह प्रतिज्ञा अर्थात् अटल संकल्प। कुछ भी हो जाये लेकिन टल नहीं सकते, अटल। ऐसे प्रतिज्ञा सभी ने की? जैसे कोई भी शुभ कार्य करते हैं तो प्रतिज्ञा करने के लिए सभी पहले मन में संकल्प करने की निशानी कंगन बांधते हैं। कार्यकर्ताओं को चाहे धागे का, चाहे किसका भी कंगन बांधते हैं। तो यह श्रेष्ठ संकल्प का कंगन है ना। और जैसे आज सभी ने भण्डारी में बहुत उमंग-उत्साह से श्री गणेश किया। ऐसे ही अभी यह भी भण्डारी रखो, जिसमें सभी यह अटल प्रतिज्ञा समझ यह भी चिटकी डालें। दोनों भण्डारी साथ-साथ होंगी तब सफलता होगी। और मन से हो, दिखावे से नहीं। यही फाउन्डेशन है। गोल्डन बन गोल्डन जुबली मनाने का यह आधार है। इसमें सिर्फ एक स्लोगन याद रखना “न समस्या बनेंगे, न समस्या को देख डगमग होंगे” स्वयं भी समाधान स्वरूप होंगे और दूसरों को भी समाधान देने वाले बनेंगे। यह स्मृति स्वत: ही गोल्डन जुबली को सफलता स्वरूप बनाती रहेगी। जब फाइनल गोल्डन जुबली होगी तो सभी को आपके गोल्डन स्वरूप अनुभव होंगे। आप में गोल्डन वर्ल्ड देखेंगे। सिर्फ कहेंगे नहीं गोल्डन दुनिया आ रही है लेकिन प्रैक्टिल दिखायेंगे। जैसे जादूगर लोग दिखाते जाते, बोलते जाते यह देखो… तो आपका यह गोल्डन चेहरा, चमकता हुआ मस्तक, चमकती हुई आंखे, चमकते हुए ओंठ यह सब गोल्डन एज का साक्षात्कार करावें। जैसे चित्र बनाते हैं ना – एक ही चित्र में अभी-अभी ब्रह्मा देखो, अभी-अभी कृष्ण देखो, विष्णु देखो। ऐसे आपका साक्षात्कार हो। अभी-अभी फरिश्ता, अभी-अभी विश्व महाराजन, विश्व महारानी रूप। अभी-अभी साधारण सफेद वस्त्रधारी। यह भिन्न-भिन्न स्वरूप आपके इस गोल्डन मूर्त से दिखाई दें। समझा!

जब इतने चुने हुए रूहानी गुलाब का गुलदस्ता इकट्ठा हुआ है। एक रूहानी गुलाब की खुशबू कितनी होती है, तो यह इतना बड़ा गुलदस्ता कितनी कमाल करेगा! और एक-एक सितारे में संसार भी है। अकेले नहीं हो। उन सितारों में दुनिया नहीं है। आप सितारों में तो दुनिया है ना! कमाल तो होनी ही है। हुई पड़ी है। सिर्फ जो ओटे सो अर्जुन बने। बाकी विजय तो हुई पड़ी है वह अटल है लेकिन अर्जुन बनना है। अर्जुन अर्थात् नम्बरवन। अभी इस पर इनाम देना। पूरी गोल्डन जुबली में न समस्या बना, न समस्या को देखा। निर्विघ्न, निर्विकल्प, निर्विकारी तीनों ही विशेषता हों। ऐसी गोल्डन स्थिति में रहने वालों को इनाम देना। बापदादा को भी खुशी है। विशाल बुद्धि वाले बच्चों को देख खुशी तो होगी ना। जैसे विशाल बुद्धि वैसे विशाल दिल। सभी विशाल बुद्धि वाले हो तब तो प्लैन बनाने आये हो। अच्छा!

सदा स्वयं को आधार स्वरूप, उद्धार करने वाले स्वरूप, सदा उदारता वाले उदार दिल, उदारचित, सदा एक हैं, एक का ही कार्य है, ऐसे एकरस स्थिति में स्थित रहने वाले सदा एकता और एकाग्रता में स्थित रहने वाले, ऐसे विशाल बुद्धि, विशाल दिल, विशाल चित बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

मुख्य भाई-बहनों से:- सभी ने मीटिंग की। श्रेष्ठ संकल्पों की सिद्धि होती ही है। सदा उमंग-उत्साह से आगे बढ़ना यही विशेषता है। मंसा सेवा की विशेष ट्रायल करो। मंसा सेवा जैसे एक चुम्बक है। जैसे चुम्बक कितनी भी दूर की सुई को खींच सकता है, ऐसे मंसा सेवा द्वारा घर बैठे समीप पहुँच जायेगा। अभी आप लोग बाहर ज्यादा बिजी रहते हो, मंसा सेवा को यूज़ करो। स्थापना में जो भी बड़े कार्य हुए हैं तो सफलता मंसा सेवा की हुई है। जैसे वो लोग रामलीला या कुछ भी कार्य करते हैं तो कार्य के पहले अपनी स्थिति को उसी कार्य के अनुसार व्रत में रखते हैं। तो आप सभी भी मंसा सेवा का व्रत लो। व्रत न धारण करने से हलचल में ज्यादा रहते हो इसलिए रिजल्ट में कभी कैसा, कभी कैसा। मंसा सेवा का अभ्यास ज्यादा चाहिए। मंसा सेवा करने के लिए लाइट हाउस और माइट हाउस स्थिति चाहिए। लाइट और माइट दोनों इकट्ठा हो। माइक के आगे माइट होकर बोलना है। माइक भी हो माइट भी हो। मुख भी माइक है।

तो माइट होकर माइक से बोले। जैसे पावरफुल स्टेज में ऊपर से उतरा हूँ, अवतार होकर सबके प्रति यह सन्देश दे रहा हूँ। अवतार बोल रहा हूँ। अवतरित हुआ हूँ। अवतार की स्टेज पावरफुल होगी ना। ऊपर से जो उतरता है, उसकी गोल्डन एज स्थिति होती है ना! तो जिस समय आप अपने को अवतार समझेंगे तो वही पावरफुल स्टेज है। अच्छा!

वरदान:- साक्षी हो ऊंची स्टेज द्वारा सर्व आत्माओं को सकाश देने वाले बाप समान अव्यक्त फरिश्ता भव
चलते फिरते सदैव अपने को निराकारी आत्मा और कर्म करते अव्यक्त फरिश्ता समझो तो सदा खुशी में ऊपर उड़ते रहेंगे। फरिश्ता अर्थात् ऊंची स्टेज पर रहने वाला। इस देह की दुनिया में कुछ भी होता रहे लेकिन साक्षी हो सब पार्ट देखते रहो और सकाश देते रहो। सीट से उतरकर सकाश नहीं दी जाती। ऊंची स्टेज पर स्थित होकर वृत्ति, दृष्टि से सहयोग की, कल्याण की सकाश दो, मिक्स होकर नहीं तब किसी भी प्रकार के वातावरण से सेफ रह बाप समान अव्यक्त फरिश्ता भव के वरदानी बनेंगे।
स्लोगन:- याद बल द्वारा दुख को सुख में और अशान्ति को शान्ति में परिवर्तन करो।

 

अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क

ब्रह्मा बाप से प्यार है तो प्यार की निशानियां प्रैक्टिकल में दिखानी है। जैसे ब्रह्मा बाप का नम्बरवन प्यार मुरली से रहा जिससे मुरलीधर बना। तो जिससे ब्रह्मा बाप का प्यार था और अभी भी है उससे सदा प्यार दिखाई दे। हर मुरली को बहुत प्यार से पढ़कर उसका स्वरूप बनना है।

TODAY MURLI 12 JANUARY 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 12 January 2019

Today Murli in Hindi :- Click Here

Read Murli 11 January 2019 :- Click Here

12/01/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, the task of you children of the Benefactor Father is to benefit everyone. Remind everyone of the Father and donate knowledge to them.
Question: Which children does Baba call maharathis? What are their signs?
Answer: Those who study well and teach others, who constantly have the omens of Jupiter over them, who are always concerned for their own progress as well as the progress of others, who give their bones in serving the yagya and who are helpers in Baba’s task are maharathis. Baba says of such maharathi children: These are My worthy children.

Om shanti. Nowadays, you children are making preparations for Shiv Jayanti. Cards etc. are also being printed. The Father has explained many times. Everything mainly depends on the Gita. By studying the Gita written by human beings, you have continued to come down for half the cycle. Only you children understand that for half the cycle it is the day and that for half the cycle it is the night. Baba is now giving you topics which you have to churn. You can write: Brothers and sisters, come and understand! The one Gita scripture is the scripture of knowledge whereas all the rest are scriptures of devotion. There is just the one scripture of knowledge which the unlimited Father, the Supreme Father, the Supreme Soul, Trimurti Shiva, speaks at the most auspicious confluence age. Or, you could write: Which He relates through Brahma through which there is salvation for 21 births. Through the Gita of knowledge you receive the inheritance for 21 births and then the Gita of devotion, spoken by human beings, continues for 63 births. The Father teaches you Raja Yoga and grants you salvation. There is then no need to listen to it again. Through the Gita of knowledge it becomes the day. Only the Father, the Ocean of Knowledge, speaks it, and through that there is salvation and liberation for 21 births, that is, you receive 100% purity, happiness and peace in the unshakeable and immovable golden-aged deity sovereignty. There is the stage of ascent for 21 births. There is the descending stage through the Gita written by human beings. You have to churn very well the differences between the Gita of devotion and the Gita of knowledge. This is the main thing people don’t know. You write: Trimurti Shiva Jayanti is also the Shrimad Bhagawad Gita Jayanti and also the Jayanti of the salvation of everyone: You can also tell them: Shiva Jayanti brings peace throughout the whole world. The main words are very essential and everything depends on this. You can tell everyone that human beings cannot grant salvation to human beings. God comes to grant salvation at the most auspicious confluence age and this is taking place now. These are the two or three main points. There is of course the contrast between the Gita of Shiva and that of Krishna. By listening to the Gita from Trimurti God Shiva at the confluence age there is salvation. Only when someone churns such points can there be an impact on others. Human beings can never grant salvation to human beings. Only the Trimurti Supreme Father, the Supreme Soul, Shiva, who is also the Teacher and the Satguru, grants salvation to everyone at this most auspicious confluence age. Let there also be a little writing on the cards. Write on the card: A Godly invitation to change from an impure, iron-aged human being like a shell to a golden-aged, diamond-like, pure deity. When you write this, people will come happily understand that it is the Shiv Jayanti of the Father, the Bestower of Salvation, that is being celebrated. The writing should be in very clear words. On the path of devotion, people study so many scriptures and beat their heads. Here, you receive liberation and salvation from the Father in a second. When you belong to the Father and take knowledge from Him, you definitely receive liberation-in-life. You will first go into liberation and then, however much effort you have made, accordingly, you will definitely go into liberation-in-life. You definitely receive liberation-in-life, but it is whether you come at the beginning or at the end. First, you go into liberation-in-life and then you have bondage-in-life. If you imbibe such main points, you can do a lot of service. If you know the Father, give others His introduction too. When you don’t give the introduction to others it means you don’t have any knowledge. You give an explanation, but it is not in their fortune. You are children of the Benefactor Father and so you have to bring benefit. Otherwise, the Father would think that you just say for the sake of it that you are children of Shiv Baba, but that you don’t bring benefit to anyone. Whether they are wealthy or poor, you have to benefit everyone. However, the poor will first take this knowledge because they have time. It is fixed like that in the drama. If one wealthy person were to come now, many others would follow him. If such praise were to emerge now, many would come here. Yours is a Godly status. You benefit yourselves and others too. Those who don’t benefit themselves cannot benefit others. The Father is the Benefactor. He is the Bestower of Salvation for All. You are also His helpers. You know that those are the omens of the path of devotion. There is just the one type of omen for the path of salvation. There are the omens of Jupiter over those who study well and teach others. Such ones are called maharathis. Ask your heart: Am I a maharathi? Am I doing service like so-and-so? The infantry can never give knowledge to anyone. If you don’t benefit anyone, why should you call yourself a child of the Benefactor Father? The Father would inspire you to make effort. You should give your bones in serving this yagya. However, simply to eat, drink and sleep; is that doing service? Such ones will become maids and servants of the subjects. The Father says: Make effort and become Narayan from an ordinary man. The Father is pleased to see the worthy and obedient children. When a physical father sees that his child is attaining a very good status, he becomes very pleased. The parlokik Father also says the same thing. The unlimited Father says: I have come to make you into the masters of the world. You now have to make others that too. What is the benefit of just looking after yourself? Tell everyone: Remember Shiv Baba. Remind others at meal times of the Father and everyone will say: This one has a lot of love for Shiv Baba. This is easy, is it not? What loss is there in this? When you have instilled this habit, you will continue to remember Baba even when you eat. You also definitely have to imbibe divine virtues. Now, everyone calls out: O Purifier, come! Therefore, surely, they are impure. Even Shankaracharya remembers Shiva because only He is the Purifier. People perform devotion for half the cycle and then God comes. No one knows about this account. The Father explains: No one can meet Me through sacrificial fires, tapasya, donations etc. The Gita is also included in that. No one receives salvation by reading those scriptures. The Gita, Vedas and Upanishads all belong to the path of devotion. The Father is teaching you children easy Raja Yoga and knowledge through which He enables you to attain the kingdom. This is called Raja Yoga. There is no question in this of religious books. The Teacher inspires you to study to enable you to receive a status and so you should follow Him. Tell everyone: Remember Shiv Baba. He is the Father of all of us souls. By remembering Shiv Baba your sins will be absolved. Continue to caution one another and make progress. The more you stay in remembrance, the more you benefit yourself. You will make the whole world pure through the pilgrimage of remembrance. Prepare food while staying in remembrance and it will be filled with power. This is why there is a lot of praise of your Brahma bhojan. When those devotees offer bhog, they continue to chant Rama’s name. They make donations in Rama’s name. You should repeatedly have remembrance of the Father in your intellects. Knowledge should remain in your intellects throughout the day. The Father has the knowledge of the beginning, the middle and the end of the whole of creation. God is the Highest on High. When you remember Him, you will claim a high status. So, why should you remember anyone else? The Father says: Simply remember Me alone. Therefore, you have to renounce everyone else. This is unadulterated remembrance. If you are unable to remember, then tie a knot. You definitely have to make effort for your own progress and to attain a high stage. Shiv Baba is our Teacher who makes us into teachers. All of you are guides. It is the duty of guides to show the path. You didn’t have any of this knowledge in you before. Everyone says: Previously, study was only worth a few pennies. That would definitely be so. According to the drama, you continue to study as you did in the previous cycle, and you will do the same after a cycle. At the end, you will have visions of everything. It doesn’t take long to have a vision. Baba received visions very quickly. So-and-so will become a king and this will be his costume. In the beginning you children had many visions and you will have many visions at the end, too. Then, you will remember. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Remind one another of the Father at meal times. Eat your food while in remembrance. Have true love for only one Shiv Baba.
  2. Give your bones in serving the yagya. Become the Father’s complete helpers.
Blessing: May you be full of success by having faith in the intellect and finish any web of weak thoughts.
Until now, weak thoughts emerge in the majority of children. They think: I don’t know whether something will happen or not, or what will happen. These weak thoughts become a wall and success gets hidden behind that wall. Maya spins a web of waste thoughts and you become trapped in that web. Therefore, with the awareness of having faith in the intellect, being victorious and having the birthright of success, finish weak thoughts.
Slogan: Keep your third eye, your volcanic eye open and Maya will become powerless.

*** Om Shanti ***

Letter of remembrance to all Gopes and Gopis written by Mateshwari (1961)

Deep love and remembrance to all the Gopes and Gopis.

While living at home with your family, leading a life like a lotus, you continue to move along with success, are you not? The beloved Gopes are engaged in making effort to uplift service very well; this is very good. Eventually, everyone is definitely going to receive the introduction of our Supremely worthy of worship Father. You know that only a handful out of multimillions will be able to attain this elevated attainment. However, such flowers will also definitely emerge, will they not? Achcha. Continue to increase service at a fast speed. The treasure of the imperishable wealth of knowledge is absolutely unique and unending and all the children continue to receive it from the Father. When someone attains it, he becomes full of all treasures for birth after birth. This thing is like that. Tell me, beloved Gopes and Gopis, this is all right, is it not?

All of you Gopes and Gopis, continue to move along with the experience of a life filled with happiness beyond the senses. Look, beloved Gopes and Gopis, only when the Brahmin clan grows will there be benefit for everyone. Then, you Brahmins will definitely become deities. Some are moving along in their family life and moving along as a member of the Brahmin clan, that is, while living at home with their families, they are leading pure lives. Both husband and wife, are the children of the one Father and they maintain such pure dharna. However, all have to follow the directions of the Supreme Father, the Supreme Soul. This is known as following shrimat. Those who have such dharna are said to be members of the Brahmin clan. Since He has now become our Father, Teacher and Satguru and also Dharamraj, why should we not become His adopted children and claim the full right of purity through which we will be able to attain the full right to peace and happiness in the future.

Tell me, beloved Gopes and Gopis, you have understood this secret easily, have you not? You are not afraid of dying alive, are you? Each one of you should please accept this letter personally by your name and read or listen to it considering it to be a letter to you, for each one should receive the mother’s love personally by your name. The mother’s deep unending love is personally by name for each Gope and Gopi. Achcha. To remain engaged in the effort of making your fortune so high at a fast speed is to be a benefactor. Since you now know that the Supreme Father Himself has come to give you the highest inheritance, you definitely have to take it. Achcha. I am now taking leave. Om shanti.

Special effort to become equal to Father Brahma.

Father Brahma has merged all the “mine, mine” in the one “mine”. Mine is the one Father and none other. Follow the father in this way and in this way, your power of concentration will increase. Then your mind will become concentrated wherever you want, as you want, for however long you want in whichever way. With this power of concentration you will automatically experience the constant and stable angelic stage.

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 12 JANUARY 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 12 January 2019

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12-01-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम कल्याणकरी बाप के बच्चों का कर्तव्य है सर्व का कल्याण करना, सबको बाप की याद दिलाना और ज्ञान दान देना”
प्रश्नः- बाबा महारथी किन बच्चों को कहते हैं, उनकी निशानी क्या होगी?
उत्तर:- जो अच्छी रीति पढ़ते और पढ़ाते हैं, जिन पर सदा ब्रहस्पति की दशा है, जो अपनी और सर्व की उन्नति का सदा ख्याल रखते हैं, जो यज्ञ सेवा में हड्डियां देते हैं, जो बाबा के कार्य में मददगार रहते हैं-वह हैं महारथी। ऐसे महारथी बच्चों को बाबा कहते -यह हैं मेरे सपूत बच्चे।

ओम् शान्ति। आजकल बच्चे शिव जयन्ती के लिए तैयारियाँ कर रहे हैं। कार्ड आदि भी छपाते हैं। बाप ने समझाया तो बहुत बारी है। सारी मुख्य बात गीता पर है। मनुष्यों की बनाई हुई गीता को पढ़ते-पढ़ते आधाकल्प नीचे उतरते आये हैं। यह भी तुम बच्चे समझते हो – आधाकल्प है दिन, आधाकल्प है रात। अब बाबा टापिक देते हैं उस पर मंथन करना पड़े। तुम लिख सकते हो भाई और बहनों आकर समझो – एक गीता शास्त्र है ज्ञान का, बाकी सब शास्त्र हैं भक्ति के। ज्ञान का शास्त्र एक ही है जो पुरुषोत्तम संगमयुग पर बेहद का बाप परमपिता परमात्मा त्रिमूर्ति शिव सुनाते हैं या तो लिखना है ब्रह्मा द्वारा सुना रहे हैं, जिससे 21 जन्म सद्गति होगी। ज्ञान की गीता से 21 जन्म का वर्सा मिलता है फिर 63 जन्म भक्ति की गीता चलती है जो मनुष्यों की सुनाई हुई है। बाप तो राजयोग सिखलाकर सद्गति कर देते हैं। फिर सुनने की दरकार नहीं रहती इस ज्ञान की गीता से दिन हो जाता है। यह ज्ञान का सागर बाप ही सुनाते है, जिससे 21 जन्म गति सद्गति होती है अर्थात् 100 परसेन्ट पवित्रता सुख शान्ति का अटल अखण्ड सतयुगी दैवी स्वराज्य मिलता है। 21 जन्मों के लिए चढ़ती कला होती है। मनुष्यों की बनाई हुई गीता से उतरती कला होती है। भक्ति की गीता और ज्ञान की गीता पर अच्छी तरह विचार सागर मंथन करना है। यह मूल बात है जो मनुष्य नहीं जानते। तुम लिखते हो त्रिमूर्ति शिव जयन्ती सो श्रीमत भगवत गीता जयन्ती सो सर्व की सद्गति भवन्ती। यह भी सुना सकते हो कि शिव जयन्ती सो विश्व में शान्ति भवन्ती। मुख्य अक्षर बहुत जरूरी है, जिस पर ही सारा मदार है। तुम सबको बतला सकते हो कि मनुष्य, मनुष्य की सद्गति कर नहीं सकते। भगवान सद्गति करने आते हैं-पुरुषोत्तम संगमयुग पर, जो अब हो रही है। यह 2-3 प्वाइंट्स मुख्य हैं। शिव और कृष्ण की गीता का कान्ट्रास्ट तो है ही। त्रिमूर्ति शिव भगवान से संगम पर गीता सुनने से सद्गति होती है। ऐसी-ऐसी प्वाइंट्स पर जब कोई विचार सागर मंथन करे तब औरों पर भी असर पड़े। मनुष्य, मनुष्य की सद्गति कभी कर नहीं सकते। सिर्फ एक ही त्रिमूर्ति परमपिता परमात्मा शिव जो टीचर भी है, सतगुरू भी है वह इस पुरुषोत्तम संगमयुग पर सर्व की सद्गति कर रहे हैं। कार्ड में थोड़ी लिखत ही हो। ऊपर में लिख देना चाहिए कलियुगी कौड़ी जैसे पतित मनुष्य से सतयुगी हीरे जैसा पावन देवी देवता बनने का ईश्वरीय निमंत्रण। ऐसे लिखने से मनुष्य खुशी से आयेंगे – समझने के लिए। सद्गति दाता बाप की ही शिव जयन्ती मनाई जाती है। एकदम क्लीयर अक्षर हो, मनुष्य तो भक्ति मार्ग में कितने ढेर शास्त्र पढ़ते हैं। माथा मारते हैं। यहाँ एक सेकेण्ड में बेहद के बाप से मुक्ति जीवनमुक्ति मिलती है। जब बाप का बनकर उनसे नॉलेज लेते हैं तो जीवनमुक्ति अवश्य ही मिलेगी। पहले मुक्ति में जाकर जैसा पुरुषार्थ किया होगा, ऐसे जीवनमुक्ति में जरूर आयेंगे। जीवनमुक्ति मिलती जरूर है फिर शुरू में आये वा पिछाड़ी में आये। पहले जीवनमुक्ति में आते फिर जीवनबन्ध में। ऐसी-ऐसी मुख्य प्वाइंट्स अगर धारण करें तो भी बहुत सर्विस कर सकते हैं। अगर बाप को जानते हो तो दूसरों को भी परिचय दो। किसको परिचय नहीं देते तो गोया ज्ञान नहीं है। समझानी तो दी जाती है परन्तु तकदीर में नहीं है, कल्याणकारी बाप के बच्चे तो कल्याण करना चाहिए। नहीं तो बाप समझेंगे यह कहने मात्र कहते हैं कि हम शिवबाबा के बच्चे हैं। कल्याण तो करते नहीं। साहूकार अथवा गरीब कल्याण तो सबका करना है। परन्तु पहले गरीब उठायेंगे क्योंकि उन्हों को फुर्सत है। ड्रामा में नूँध ही ऐसी है। एक साहूकार अगर अभी आ जाए तो उनके पिछाड़ी ढेर आ जायें। अब अगर महिमा निकले तो ढेरों के ढेर आ जायें।

तुम्हारा है ईश्वरीय मर्तबा। तुम अपना भी और औरों का भी कल्याण करते हो। जो अपना ही कल्याण नहीं करते तो औरों का भी कर नहीं सकते। बाप तो है कल्याणकारी, सर्व का सद्गति दाता। तुम भी मददगार हो ना। तुम जानते हो वह है भक्तिमार्ग की दशा। सद्गति मार्ग की दशा एक ही है जो अच्छी रीति पढ़ते और पढ़ाते हैं उन पर है ब्रहस्पति की दशा। उनको महारथी कहेंगे। अपनी दिल से पूछो हम महारथी हैं। फलाने-फलाने मिसल सर्विस करते हैं। प्यादे कभी किसको ज्ञान सुना न सकें। अगर किसका कल्याण नहीं करते तो अपने को कल्याणकारी बाप का बच्चा क्यों कहलाना चाहिए। बाप तो पुरुषार्थ करायेगा। इस यज्ञ सेवा में हड्डियाँ भी देनी चाहिए। बाकी सिर्फ खाना पीना सोना वह सर्विस हुई क्या। ऐसे तो जाकर प्रजा में दास दासी बनेंगे। बाप तो कहते हैं पुरुषार्थ कर नर से नारायण बनो। सपूत बच्चों को देख बाप भी खुश होंगे। लौकिक बाप भी देखते हैं यह तो बहुत अच्छा मर्तबा पाने वाला है तो देखकर खुश होंगे। पारलौकिक बाप भी ऐसे कहते हैं। बेहद का बाप भी कहते हैं हम तुमको विश्व का मालिक बनाने आये हैं। अब तुम औरों को भी बनाओ। बाकी सिर्फ पेट की पूजा करने से क्या फायदा होगा। सबको सिर्फ यही बताओ कि शिवबाबा को याद करो। भोजन पर भी एक दो को बाप की याद दिलाओ तो सब कहेंगे इनकी शिवबाबा से बहुत प्रीत है। यह तो सहज है ना। इसमें क्या नुकसान है। टेव (आदत) पड़ जायेगी तो खाते रहेंगे और बाबा को भी याद करते रहेंगे। दैवी गुण भी जरूर धारण करने हैं। अभी तो सब पुकारते हैं हे पतित-पावन आओ तो जरूर पतित हैं। शंकराचार्य भी शिव को याद करते हैं क्योंकि वही पतित-पावन है। आधाकल्प भक्ति करते हैं फिर भगवान आते हैं, कोई को हिसाब का थोड़ेही पता है। बाप समझाते हैं – यज्ञ, तप, दान से मैं नहीं मिलता हूँ, इसमें गीता भी आ जाती है। यह शास्त्र आदि पढ़ने से कोई की सद्गति नहीं होती है। गीता, वेद, उपनिषद सब हैं भक्ति मार्ग के। बाप तो बच्चों को सहज राजयोग और ज्ञान सिखलाते हैं, जिससे राजाई प्राप्त कराते हैं। इनका नाम ही है राजयोग। इसमें पुस्तक की कोई बात नहीं। टीचर स्टडी कराते हैं – पद प्राप्त कराने के लिए, तो फालो करना चाहिए।

सबको बोलो शिवबाबा को याद करो। वह हम सब आत्माओं का बाप है। शिवबाबा को याद करने से विकर्म विनाश होंगे। एक दो को सावधान कर उन्नति को पाना है। जितना याद करेंगे उतना अपना ही कल्याण है। याद की यात्रा से सारे विश्व को पवित्र बनायेंगे। याद में रहकर भोजन बनाओ तो उसमें भी ताकत आ जायेगी इसलिए तुम्हारे ब्रह्मा भोजन की बहुत महिमा है। वह भक्त लोग भोग लगाते हैं तो भी राम-राम कहते रहते हैं। राम नाम का दान देते हैं। तुमको तो बुद्धि में घड़ी-घड़ी बाप की याद रहनी चाहिए। बुद्धि में सारा दिन ज्ञान रहना चाहिए। बाप के पास सारी रचना के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान है ना। ऊंचे ते ऊंचा भगवान है तुम उनको याद करेंगे तो ऊंच पद प्राप्त करेंगे। फिर दूसरे किसको याद ही क्यों करें। बाप कहते हैं सिर्फ मुझे याद करो तो दूसरे सब छोड़ने पड़ते हैं। यह है अव्यभिचारी याद। अगर याद नहीं पड़ती तो गाँठ बाँध लो। अपनी उन्नति के लिए, ऊंच पद पाने के लिए पुरुषार्थ जरूर करना है। हमको भी टीचर बनाने वाला शिवबाबा हमारा टीचर है। तुम सब पण्डे हो ना। पण्डों का काम है रास्ता बताना। इतना सारा ज्ञान पहले थोड़ेही तुम्हारे में था। सब कहते हैं पहले तो जैसे पाई पैसे की पढ़ाई थी। सो तो जरूर होगा। ड्रामा अनुसार कल्प पहले मिसल पढ़ते रहते हैं। फिर कल्प के बाद भी ऐसे ही पढ़ेंगे। पिछाड़ी में तुमको सब साक्षात्कार होंगे। साक्षात्कार होने में देरी नहीं लगती है। बाबा को जल्दी-जल्दी साक्षात्कार होते गये। फलाना-फलाना राजा बनेंगे, यह ड्रेस होगी। शुरू में बच्चों को बहुत साक्षात्कार होते थे फिर अन्त में बहुत होंगे, फिर याद करेंगे। अच्छा-

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) भोजन पर एक दो को बाप की याद दिलाओ, याद में भोजन खाओ। एक शिव बाबा से ही सच्ची प्रीत रखो।

2) यज्ञ सेवा में हड्डियाँ देनी है। बाप का पूरा मददगार बनना है।

वरदान:- निश्चयबुद्धि बन कमजोर संकल्पों की जाल को समाप्त करने वाले सफलता सम्पन्न भव
अभी तक मैजारिटी बच्चे कमजोर संकल्पों को स्वयं ही इमर्ज करते हैं – सोचते हैं पता नहीं होगा या नहीं होगा, क्या होगा..यह कमजोर संकल्प ही दीवार बन जाते हैं और सफलता उस दीवार के अन्दर छिप जाती है। माया कमजोर संकल्पों की जाल बिछा देती है, उसी जाल में फंस जाते हैं इसलिए मैं निश्चयबुद्धि विजयी हूँ, सफलता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है – इस स्मृति से कमजोर संकल्पों को समाप्त करो।
स्लोगन:- स्लोगन:- तीसरा, ज्वालामुखी नेत्र खुला रहे तो माया शक्तिहीन बन जायेगी।

सभी गोप गोपियों प्रति मातेश्वरी जी के हस्तों से लिखा हुआ याद पत्र (1961)

सभी गोप-गोपियों प्रति अति यादप्यार।

बाद समाचार कि आप सब गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान अपनी जीवन में सफलता को पाते रहते हो ना! लाडले गोप तो अब सर्विस को अच्छी रीति उठाने के पुरुषार्थ में लग गये हैं, बहुत अच्छा है। आखिर भी अपने परम पूज्य बाप का परिचय सबको मिलना ही है। यह तो जानते हो कि इस ऊंच प्राप्ति को कोटों में कोई ही पा सकेंगे, परन्तु ऐसे फूल जरूर निकलेंगे तो ना! अच्छा, तेज रफ्तार से सर्विस को बढ़ाते चलो। खजाना अविनाशी ज्ञान धन का तो बहुत अनोखा है, अखुट है, जो बाप द्वारा सभी बच्चों को मिलता ही रहता है। कोई इसे प्राप्त कर ले तो जन्म-जन्मान्तर के लिये मालामाल बन जाये, यह चीज़ ही ऐसी है। कहो लाडले गोप-गोपियाँ ठीक बात है ना!

आप सभी गोप गोपियां अतीन्द्रिय सुखमय जीवन के अनुभव से जीवन बिताते चलते चलो। देखो लाडले गोप, गोपियाँ अब इस ब्राह्मण कुल की वृद्धि होने में ही सबका कल्याण है। फिर तो ब्राह्मण सो देवता अवश्य बनेंगे। जैसे कई अपने गृहस्थ व्यवहार में रहते भी ब्राह्मण कुल वंशी बनकर चल रहे हैं अर्थात् गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र रहते हैं और पति पत्नि एक बाप के बच्चे हैं, ऐसी पवित्र धारणा में रहते हैं। बाकी सभी को उस परमपिता बाप के डायरेक्शन पर ही चलना है, इसको ही श्रीमत पर चलना कहा जाता है। ऐसी धारणा में चलने वालों को ही ब्राह्मण कुल वंशी कहा जाता है। जबकि अब वही बाप, टीचर, सतगुरु बना है, धर्मराज भी है, तो क्यों न उनकी गोद का बच्चा बन अपना पूर्ण पवित्रता का अधिकार ले लेना चाहिए। जिससे ही भविष्य में सुख शान्ति का पूरा अधिकार प्रालब्ध रूप में प्राप्त हो जाता है।

कहो, लाडले गोप-गोपियाँ ऐसे सहज राज़ को समझ गये हो ना! जीते जी मरने अथवा मरजीवा बनने में डरते तो नहीं हो ना! आज यह पत्र हर एक अपने-अपने नाम से समझे और अपना पत्र समझकर पढ़े अथवा सुनें और माँ का प्यार भी हर एक अपने नाम से पाये। हर एक गोप-गोपी प्रति नाम सहित माँ का अत्यंत प्यार। अच्छा, अपना सौभाग्य ऊंच बनाने के पुरुषार्थ में तीव्र वेग से लगे रहना ही कल्याणकारी बनना है, जबकि अभी पता चला है कि स्वयं परमपिता ऊंच वर्सा देने आया है तो लेकर ही रहना है। अच्छा, छुट्टी लेते हैं। ओम् शान्ति।

ब्रह्मा बाप समान बनने के लिए विशेष पुरुषार्थ

जैसे ब्रह्मा बाप ने अनेक मेरे मेरे को एक मेरे में समा दिया। मेरा तो एक बाबा दूसरा न कोई। ऐसे फालो फादर करो। इससे एकाग्रता की शक्ति बढ़ेगी। फिर जहाँ चाहो, जैसे चाहो, जितना समय चाहो उतना और ऐसा मन एकाग्र हो जायेगा। इस एकाग्रता की शक्ति से स्वत: ही एकरस फरिश्ता स्वरूप की अनुभूति होगी।

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