daily murli 1 january

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 1 JANUARY 2021 : AAJ KI MURLI

01-01-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम्हें पावन दुनिया में चलना है इसलिए काम महाशत्रु पर जीत पानी है, कामजीत, जगतजीत बनना है”
प्रश्नः- हर एक अपनी एक्टिविटी से कौन-सा साक्षात्कार सबको करा सकते हैं?
उत्तर:- मैं हंस हूँ या बगुला हूँ? यह हर एक अपनी एक्टिविटी से सबको साक्षात्कार करा सकते हैं क्योंकि हंस कभी किसी को दु:ख नहीं देंगे। बगुले दु:ख देते हैं, वह विकारी होते हैं। तुम बच्चे अभी बगुले से हंस बने हो। तुम पारसबुद्धि बनने वाले बच्चों का कर्तव्य है सबको पारसबुद्धि बनाना।

ओम् शान्ति। जब ओम् शान्ति कहा जाता है तो अपना स्वधर्म याद पड़ता है। घर की भी याद आती है। परन्तु घर में बैठ तो नहीं जाना है। बाप के बच्चे हैं तो जरूर अपना स्वर्ग भी याद करना पड़े। तो ओम् शान्ति कहने से यह सारा ज्ञान बुद्धि में आ जाता है। मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ, शान्ति के सागर बाप का बच्चा हूँ। जो बाप स्वर्ग स्थापन करते हैं वह बाप ही हमको पवित्र शान्त स्वरूप बनाते हैं। मुख्य बात है पवित्रता की। दुनिया ही पवित्र और अपवित्र बनती है। पवित्र दुनिया में एक भी विकारी नहीं है। अपवित्र दुनिया में 5 विकार हैं, इसलिए कहा जाता है विकारी दुनिया। वह है निर्विकारी दुनिया। निर्विकारी दुनिया से सीढ़ी उतरते-उतरते फिर नीचे विकारी दुनिया में आते हैं। वह है पावन दुनिया, यह है पतित दुनिया। वह है दिन, सुख। यह है भटकने की रात। यूँ तो रात में कोई भटकता नहीं है। परन्तु भक्ति को भटकना कहा जाता है।

तुम बच्चे अब यहाँ आये हो सद्गति पाने। तुम्हारी आत्मा में सब पाप थे, 5 विकार थे। उनमें भी मुख्य है काम विकार, जिससे ही मनुष्य पाप आत्मा बनते हैं। यह तो हर एक जानते हैं हम पतित हैं और पाप आत्मा भी हैं। एक काम विकार के कारण सब क्वालिफिकेशन बिगड़ पड़ती हैं इसलिए बाप कहते हैं काम को जीतो तो तुम जगतजीत अर्थात् नये विश्व के मालिक बनेंगे। तो अन्दर में इतनी खुशी रहनी चाहिए। मनुष्य पतित बनते हैं तो कुछ भी समझते नहीं। बाप समझाते हैं – कोई भी विकार नहीं होना चाहिए। मुख्य है काम विकार, इस पर कितने हंगामें होते हैं। घर-घर में कितनी अशान्ति, हाहाकार हो जाता है। इस समय दुनिया में हाहाकार क्यों है? क्योंकि पाप आत्मायें हैं। विकारों के कारण ही असुर कहा जाता है। अभी तुम समझते हो इस समय दुनिया में कोई भी काम की चीज़ नहीं, भंभोर को आग लगनी है। जो कुछ इन आंखों से देखा जाता है, सबको आग लग जायेगी। आत्मा को तो आग लगती नहीं। आत्मा तो सदैव जैसे इन्श्योर है, सदैव जीती रहती। आत्मा को कभी इन्श्योर कराते हैं क्या? शरीर को इन्श्योर कराया जाता है। आत्मा अविनाशी है। बच्चों को समझाया गया है – यह खेल है। आत्मा तो ऊपर रहने वाली 5 तत्वों से बिल्कुल अलग है। 5 तत्वों से सारी दुनिया की सामग्री बनती है। आत्मा तो नहीं बनती है। आत्मा सदैव है ही। सिर्फ पुण्य आत्मा, पाप आत्मा बनती है। आत्मा पर ही नाम पड़ता है पुण्य आत्मा, पाप आत्मा। 5 विकारों से कितने गन्दे बन जाते हैं। अब बाप आये हैं पापों से छुड़ाने। विकार ही सारा कैरेक्टर बिगाड़ते हैं। कैरेक्टर किसको कहा जाता है, यह भी समझते नहीं। यह है ऊंच ते ऊंच रूहानी गवर्नमेन्ट। पाण्डव गवर्नमेन्ट न कह तुमको ईश्वरीय गवर्नमेन्ट कह सकते हैं। तुम समझते हो हम ईश्वरीय गवर्नमेन्ट हैं। ईश्वरीय गवर्नमेन्ट क्या करती है? आत्माओं को पवित्र बनाकर देवता बनाती है। नहीं तो देवता कहाँ से आये? यह कोई भी नहीं जानते, हैं तो यह भी मनुष्य परन्तु देवता कैसे थे, किसने बनाया? देवतायें तो होते ही हैं स्वर्ग में। तो उन्हों को स्वर्गवासी किसने बनाया? स्वर्गवासी फिर जरूर नर्कवासी बनते हैं फिर स्वर्गवासी। यह भी तुम नहीं जानते थे तो और फिर कैसे जानेंगे! अब तुम समझते हो कि ड्रामा बना हुआ है, इतने सब एक्टर्स हैं। यह सब बातें बुद्धि में होनी चाहिए। पढ़ाई तो बुद्धि में होनी चाहिए ना और पवित्र भी जरूर बनना है। पतित बनना बहुत खराब बात है। आत्मा ही पतित बनती है। एक-दो में पतित बनते हैं। पतितों को पावन बनाना यह तुम्हारा धन्धा है। पावन बनो तो पावन दुनिया में चलेंगे। यह आत्मा समझती है। आत्मा न हो तो शरीर भी ठहर न सके, रेसपान्ड मिल न सके। आत्मा जानती है हम असुल पावन दुनिया के रहवासी हैं। अभी बाप ने समझाया है तुम बिल्कुल ही बेसमझ थे, इसलिए पतित दुनिया के लायक बन पड़े हो। अब जब तक पावन नहीं बनेंगे तब तक स्वर्ग के लायक नहीं बन सकेंगे। स्वर्ग की भेंट भी संगम पर की जाती है। वहाँ थोड़ेही भेंट कर सकेंगे। इस संगमयुग पर ही तुमको सारा ज्ञान मिलता है। पवित्र बनने का हथियार मिलता है। एक को ही कहा जाता है पतित-पावन बाबा, हमको ऐसा पावन बनाओ। यह स्वर्ग के मालिक हैं ना। तुम जानते हो हम ही स्वर्ग के मालिक थे फिर 84 जन्म लेकर पतित बने हैं। श्याम और सुन्दर, इनका नाम भी ऐसा रखा है। कृष्ण का चित्र श्याम बना देते हैं परन्तु अर्थ थोड़ेही समझते हैं। कृष्ण की भी तुमको कितनी क्लीयर समझानी मिलती है। इनमें दो दुनियायें कर दी हैं। वास्तव में दो दुनियायें तो हैं नहीं। दुनिया एक ही है। वह नई और पुरानी होती है। पहले छोटे बच्चे नये होते हैं फिर बड़े बन बूढ़े होते हैं। तो तुम कितना माथा मारते हो समझाने के लिए, अपनी राजधानी स्थापन कर रहे हो ना। लक्ष्मी-नारायण ने समझा है ना। समझ से कितने मीठे बने हैं। किसने समझाया? भगवान ने। लड़ाई आदि की तो बात ही नहीं। भगवान कितना समझदार, नॉलेजफुल है। कितना पवित्र है। शिव के चित्र आगे सब मनुष्य जाकर नमन करते हैं परन्तु वह कौन है, क्या करते हैं, यह कोई नहीं जानते। शिव काशी विश्वनाथ गंगा…. बस सिर्फ कहते रहते हैं। अर्थ ज़रा भी नहीं समझते। समझाओ तो कहेंगे तुम क्या हमको समझायेंगे। हम तो वेद-शास्त्र आदि सब पढ़े हैं। परन्तु राम राज्य किसको कहा जाता है, यह भी कोई जानते नहीं। राम राज्य सतयुग नई दुनिया को कहा जाता है। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं, जिनको धारणा होती है। कई तो भूल भी जाते हैं क्योंकि बिल्कुल ही पत्थरबुद्धि बन गये हैं। तो अब पारसबुद्धि जो बने हैं उनका काम है औरों को पारसबुद्धि बनाना। पत्थरबुद्धि की एक्टिविटी वही चलती रहेगी क्योंकि हंस और बगुले हो गये ना। हंस कभी किसको दु:ख नहीं देते। बगुले दु:ख देते हैं। कई हैं जिनकी चाल ही बगुले मिसल होती है, उनमें सब विकार होते हैं। यहाँ भी ऐसे बहुत विकारी आ जाते हैं, जिनको असुर कहा जाता है। पहचान नहीं रहती। बहुत सेन्टर्स पर भी विकारी आते हैं, बहाना बनाते हैं, हम ब्राह्मण हैं, परन्तु है झूठ। इसको कहा ही जाता है झूठी दुनिया। वह नई दुनिया सच्ची दुनिया है। अभी है संगम। कितना फ़र्क रहता है। जो झूठ बोलने वाले, झूठा काम करने वाले हैं, वह थर्ड ग्रेड बनते हैं। फर्स्ट ग्रेड, सेकेण्ड ग्रेड तो होते हैं ना।

बाप कहते हैं पवित्रता का भी पूरा सबूत देना है। कई कहते हैं यह दोनों इकट्ठे रहकर पवित्र रहते, यह तो इम्पासिबुल है। तो बच्चों को समझाना चाहिए। योगबल न होने कारण इतनी सहज बात भी पूरी रीति समझा नहीं सकते हैं। उनको यह बात कोई नहीं समझाते कि यहाँ हमको भगवान पढ़ाते हैं। वह कहते पवित्र बनने से तुम 21 जन्म स्वर्ग के मालिक बनेंगे। वह है पवित्र दुनिया। पवित्र दुनिया में पतित कोई हो न सके। 5 विकार ही नहीं हैं। वह है वाइसलेस वर्ल्ड। यह है विशश वर्ल्ड। हमको सतयुग की बादशाही मिलती है तो हम एक जन्म के लिए क्यों नहीं पावन बनेंगे! जबरदस्त लॉटरी मिलती है हमको। तो खुशी होती है। देवी-देवता पवित्र हैं ना। अपवित्र से पवित्र भी बाप ही बनायेंगे। तो बताना चाहिए हमको यह टैम्पटेशन है। बाप ही ऐसा बनाते हैं। बाप बिगर तो नई दुनिया कोई बना न सके। मनुष्य से देवता बनाने भगवान ही आते हैं, जिसकी रात्रि गाई जाती है। यह भी समझाया है ज्ञान, भक्ति, वैराग्य। ज्ञान और भक्ति आधा-आधा है। भक्ति के बाद है वैराग्य। अब घर जाना है, यह शरीर रूपी कपड़े उतार देने हैं। इस छी-छी दुनिया में नहीं रहना है। 84 का चक्र अब पूरा हुआ। अब वाया शान्तिधाम जाना है। पहले-पहले अल्फ की बात नहीं भूलनी है। यह भी बच्चे समझते हैं यह पुरानी दुनिया खत्म होनी है। बाप नई दुनिया स्थापन करते हैं। बाप अनेक बार आये हैं स्वर्ग की स्थापना करने। नर्क का विनाश हो जाना है। नर्क कितना बड़ा है, स्वर्ग कितना छोटा है। नई दुनिया में एक ही धर्म होता है। यहाँ हैं अनेक धर्म। एक धर्म किसने स्थापन किया? ब्रह्मा ने तो नहीं किया। ब्रह्मा ही पतित सो फिर पावन बनता है। मेरे लिए तो नहीं कहेंगे पतित सो पावन। पावन हैं तो लक्ष्मी-नारायण नाम है। ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात। यह प्रजापिता है ना। शिवबाबा को अनादि क्रियेटर कहा जाता है। अनादि अक्षर बाप के लिए है। बाप अनादि तो आत्मायें भी अनादि हैं। खेल भी अनादि है। बना बनाया ड्रामा है। स्व आत्मा को सृष्टि चक्र के आदि-मध्य-अन्त, ड्यूरेशन का ज्ञान मिलता है। यह किसने दिया? बाप ने। तुम 21 जन्मों के लिए धनके बन जाते हो फिर रावण के राज्य में निधनके बन जाते हो। यहाँ से ही कैरेक्टर बिगड़ते हैं, विकार हैं ना। बाकी दो दुनियायें नहीं हैं। मनुष्य तो फिर समझते हैं नर्क-स्वर्ग सब इकट्ठे ही चलते हैं। अभी तुम बच्चों को कितना क्लीयर समझाया जाता है। अभी तुम गुप्त हो। शास्त्रों में तो क्या-क्या लिख दिया है। सूत कितना मूँझा हुआ है। सिवाए बाप के कोई सुलझा न सके। उन्हें ही पुकारते हैं – हम कोई काम के नहीं रहे हैं, आकर पावन बनाए हमारे कैरेक्टर सुधारो। तुम्हारे कितने कैरेक्टर सुधरते हैं। कोई-कोई के तो सुधरने बदले और ही बिगड़ते हैं। चलन से भी मालूम पड़ जाता है। आज महारथी हंस कहलाते हैं, कल बगुला बन पड़ते। देरी नहीं लगती है। माया भी गुप्त है ना। क्रोध कोई देखने में थोड़ेही आता है। भौं-भौं करते हैं तो फिर वह बाहर निकलने से दिखाई पड़ता है। फिर आश्चर्यवत् सुनन्ती…. कथन्ती भागन्ती हो जाते हैं। कितना गिरते हैं। एकदम पत्थर बन जाते हैं। इन्द्रप्रस्थ की भी बात है ना। मालूम तो पड़ ही जाता है। ऐसा फिर सभा में नहीं आना चाहिए। थोड़ा-बहुत ज्ञान सुना है तो स्वर्ग में आ ही जाते हैं। ज्ञान का विनाश नहीं हो सकता।

अब बाप कहते हैं – तुमको पुरुषार्थ कर ऊंच पद पाना है। अगर विकार में गये तो पद भ्रष्ट कर देंगे। सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी बनेंगे फिर वैश्य वंशी, शूद्र वंशी। अभी तुम समझते हो यह चक्र कैसे फिरता है। वह तो कलियुग की आयु ही 40 हज़ार वर्ष कह देते हैं। सीढ़ी तो नीचे उतरनी होती है ना। 40 हज़ार वर्ष हों तो मनुष्य ढेर हो जाएं। 5 हज़ार वर्ष में ही इतने मनुष्य हैं, जो खाने को नहीं मिलता। तो इतने हज़ार वर्षों में कितनी वृद्धि हो जाए। तो बाप आकर धीरज देते हैं। पतित मनुष्यों को तो लड़ना ही है। उन्हों की बुद्धि इस तरफ आ न सके। अब तुम्हारी बुद्धि देखो कितनी बदलती है फिर भी माया धोखा जरूर देती है। इच्छा मात्रम् अविद्या। कोई इच्छा की तो गया। वर्थ नाट ए पेनी बन जाते हैं। अच्छे-अच्छे महारथियों को भी माया कोई न कोई प्रकार से कभी धोखा देती रहती हैं। फिर वह दिल पर चढ़ नहीं सकते। जैसे लौकिक माँ-बाप के दिल पर नहीं चढ़ते हैं। कोई तो बच्चे ऐसे होते हैं जो बाप को भी खत्म कर देते हैं। परिवार को खत्म कर देते हैं। महान पाप आत्मायें हैं। रावण क्या कर देते, बहुत डर्टी दुनिया है। इनसे कभी दिल नहीं लगानी चाहिए। पवित्र बनने की बड़ी हिम्मत चाहिए। विश्व के बादशाही की प्राइज़ लेने के लिए पवित्रता मुख्य है इसलिए बाप को कहते हैं कि आकर पावन बनाओ। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) माया के धोखों से बचने के लिए इच्छा मात्रम् अविद्या बनना है। इस डर्टी दुनिया से दिल नहीं लगानी है।

2) पवित्रता का पूरा-पूरा सबूत देना है। सबसे ऊंचा कैरेक्टर ही पवित्रता है। अपने आपको सुधारने के लिए पवित्र जरूर बनना है।

वरदान:- अपने एकाग्र स्वरूप द्वारा सूक्ष्म शक्ति की लीलाओं का अनुभव करने वाले अन्तर्मुखी भव
एकाग्रता का आधार अन्तर्मुखता है। जो अन्तर्मुखी हैं वे अन्दर ही अन्दर सूक्ष्म शक्ति की लीलाओं का अनुभव करते हैं। आत्माओं का आह्वान करना, आत्माओं से रूहरिहान करना, आत्माओं के संस्कार स्वभाव को परिवर्तन करना, बाप से कनेक्शन जुड़वाना – ऐसे रूहों की दुनिया में रूहानी सेवा करने के लिए एकाग्रता की शक्ति को बढ़ाओ, इससे सर्व प्रकार के विघ्न स्वत: समाप्त हो जायेंगे।
स्लोगन:- सर्व प्राप्तियों को स्वयं में धारण कर विश्व की स्टेज पर प्रत्यक्ष होना ही प्रत्यक्षता का आधार है।

 

विशेष नोट:- यह जनवरी मास मीठे साकार बाबा की स्मृतियों का मास है, स्वयं को समर्थ बनाने के लिए विशेष अन्तर्मुखी बन सूक्ष्म शक्तियों की लीलाओं का अनुभव करना है। पूरा ही मास अपनी अव्यक्त स्थिति में रहना है। मन और मुख का मौन रखना है।

TODAY MURLI 1 JANUARY 2021 DAILY MURLI (English)

01/01/21
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you have to go to the pure world. Therefore, conquer lust, the great enemy. Become conquerors of lust and thereby conquerors of the world.
Question: What vision can you give everyone through your activity?
Answer: Each one of you can give a vision as to whether you are a swan or a stork through your activity.Swans never cause anyone sorrow. Storks cause sorrow because they are vicious. You children are now becoming swans from storks. The duty of you children who are becoming those with divine intellects is to make everyone else into one with a divine intellect.

Om shanti. When you say “Om shanti” you remember your original religion. You also remember your home, but you mustn’t just sit at home. You are the children of the Father and so you definitely have to remember your heaven. So, by saying “Om shanti” all of this knowledge enters your intellect. I, a soul, am an embodiment of peace. I am a child of the Father, the Ocean of Peace. The Father, who establishes heaven, is making us into embodiments of purity and peace. The main aspect is purity. It is the world that becomes pure and impure. Not a single vicious person exists in the pure world. The five vices exist in the impure world and that is why this world is called a vicious world. That is the viceless world. While coming down the ladder from the viceless world, you come into the vicious world. That is the pure world and this is the impure world. That is the day, happiness. This is the night of wandering. In fact, no one wanders at night, but devotion is said to be like wandering. You children have now come here to attain salvation. You souls were full of all those sins; you had the five vices. Of those, the main vice is lust. It is through this that human beings become sinful souls. Everyone knows that he or she is an impure and sinful soul. Because of the one vice of lust, all qualifications are ruined. This is why the Father says: Conquer lust and you will become conquerors of the world, which means, the masters of the new world. Therefore, you should have that much happiness in you. When human beings become impure, they don’t understand anything. The Father says: You shouldn’t have any of the vices. The main vice is lust and it is because of this vice that there is so much upheaval. There is so much peacelessness in every home. There are cries of distress everywhere. Why are there cries of distress in this world? Because they are sinful souls. It is because of the vices that they are called devils. You now understand that nothing in this world is useful; the haystack has to be set on fire. Whatever you can see with your physical eyes is going to be set ablaze. Souls cannot be set on fire. It is as though souls are always insured; they are always alive. Does anyone ever insure a soul? Bodies can be insured. Souls are imperishable. It is has been explained to you children that this is a play. Souls reside up above and are completely separate from the five elements. All the things of the world are created from the five elements. Souls are never created; they always exist. It is just that they become charitable souls and sinful souls. These names are given to souls: charitable soul or sinful soul. Souls become so dirty because of the five vices! The Father has now come to liberate you from all sins. It is the vices that ruin the whole character. People don’t even understand what a good character is. This is the highest-on-high spiritual Government. Instead of you being called the Pandava Government, you can be called the Godly Government. You understand that you are the Godly Government. What does the Godly Government do? It makes souls pure and changes them into deities. Where else would deities come from? No one knows this. Deities are also human beings but how did they become deities and who made them that? Deities only exist in heaven. Residents of heaven definitely become residents of hell and then they become residents of heaven once again. You didn’t know this, and so how could anyone else know it? You now understand that the drama is predestined and that all of these souls are actors. Keep all of these aspects in your intellects. You should have the study in your intellects and you also definitely have to become pure. It is very bad to become impure. It is souls that become impure. They continue to become impure with one another. It is your business to make the impure pure. Become pure and you will go to the pure world. You souls understand this. If there is no soul, the body cannot remain and cannot respond. You souls understand that, originally, you resided in the pure world. The Father has now explained how you became completely senseless and that this is why you became worthy of the impure world. Now, until you become pure, you cannot become worthy of heaven. Comparison with heaven is made at the confluence age. There is no comparison made there. It is only at this confluence age that you receive all the knowledge. You receive the weapons with which to become pure. Only the One is called the Purifier Baba. You tell Him: Make us pure like them; they are the masters of heaven. You know that you were the masters of heaven, and then, while taking 84 births, you became impure. This one has been named “Shyam Sundar”. They make dark blue images of Krishna but they don’t understand the meaning of that. You receive such a clear understanding of Krishna. They have shown two worlds but, in fact, there aren’t two worlds; there is just the one world. It becomes new and then old. At first, a baby is new and then, as he grows up, he becomes old. You beat your heads so much to explain to them. You are establishing your own kingdom. Lakshmi and Narayan also understood this, did they not? They became so sweet by understanding this. Who explained to them? God! There is no question of a war. God is so sensible and knowledge-full! He is so pure! All human beings go and bow down in front of an image of Shiva, but they don’t know who He is or what He does. They simply continue to say, “Shiv Kashi Vishwanath Ganga…” (Temple of Shiva at Kashi where the Ganges emerged from the Lord of the World). They don’t understand the meaning of that at all! When you explain to them, they say: What can you explain to us? We have studied all the Vedas and scriptures. However, no one knows what the kingdom of Rama is. The golden age, the new world, is called the kingdom of Rama. Those of you who imbibe this are also numberwise. Some of you even forget this because your intellects are completely like stone. So, it is the duty of those with divine intellects to make others the same. Those with stone intellects will continue with the same activity. This is because there are swans and storks. Swans never cause anyone sorrow. Storks cause sorrow. Some behave completely like storks and they have all the vices. Many very vicious ones come here too. They are called devils. They cannot be recognised. Many vicious ones go to the various centres. They make excuses saying that they are Brahmins, but that is a lie. This is called the world of lies. The new world is the world of truth. It is now the confluence age. There is so much difference! Those who tell lies and do everything false become third grade. There are first grade and second grade too. The Father says: You have to give the complete proof of purity. Some say that it is impossible to live together and remain pure. Therefore, you children have to explain to them. Because some don’t have any power of yoga, they aren’t fully able to explain something as easy as this. No one explains to them that it is God who is teaching us here. He says: By becoming pure you will become the masters of heaven for 21 births. That is the pure world. There cannot be anyone impure in the pure world. The five vices don’t exist there. That is the viceless world and this is the vicious world. We are receiving the sovereignty of the golden age. Therefore, why should we not become pure for one birth? We are winning such a huge lottery! This is why there is so much happiness. Deities are pure. Only the Father makes you pure from impure. Therefore, you should tell them that you are given this temptation. Only the Father makes you become like them. No one but the Father can make the world new. Only God comes to change humans into deities. This night of His is remembered. It is said: Knowledge, devotion and disinterest. Knowledge and devotion are each for half the time. After devotion, there is disinterest. You now have to return home. Therefore, you have to shed your costumes, your bodies. You must no longer live in this dirty world. The cycle of 84 births has now come to an end. We now have to return to the pure world via the abode of peace. First of all, you mustn’t forget the aspect of Alpha. You children also understand that the old world is to be destroyed. The Father is establishing the new world. The Father has come many times to establish heaven. Hell is to be destroyed. Hell is so big and heaven is so small! In the new world there is just one religion, whereas there are innumerable religions here. Who established the one religion? It wasn’t Brahma who did that. Brahma becomes impure and then pure. You wouldn’t say of Me: The impure One who becomes pure. When they are pure, they are called Lakshmi and Narayan. There is the day of Brahma and the night of Brahma. This one is Prajapita. Shiv Baba is called the eternal Creator. The word “eternal” refers to the Father. The Father is eternal and therefore souls too are eternal. The play is also eternal. The drama is predestined. The self, the soul, receives the knowledge of the beginning, the middle and the end of the whole duration of the world cycle. Who gives this? The Father. You belong to the Lord and Master for 21 births, and you then become orphans in the kingdom of Ravan. It is then that everyone’s character is spoilt because the vices enter. However, it isn’t that there are two worlds. People believe that hell and heaven exist at the same time. Everything is now being explained to you children so clearly! You are now incognito. Look at what has been written in the scriptures! They have completely tangled everything up. No one but the Father can untangle everything that is tangled. People call out to Him: I am of no use, so come and purify me and reform my character! Your characterarebeing reformed so much! However, when it comes to others, instead of being reformed, they are becoming even more spoilt. Everything can be known from one’s behaviour. Today, someone may be called a maharathi or a swan, whereas tomorrow he becomes like a stork. It doesn’t take long! Maya is incognito. Anger is not visible either. When someone starts barking, it emerges and it is then visible. Then, those who were amazed by listening to the knowledge and relating it to others run away. They fall so far! They become completely like stone. There is the story of the Court of Indra. Such ones can be recognised; they should not come into this gathering. Anyone who has received even a little knowledge will go to heaven, because knowledge is never destroyed. The Father says: You now have to make effort and claim a high status. If you indulge in vice, your status will become degraded. You first become part of the sun dynasty, then the moon dynasty and then the merchant dynasty and then the shudra dynasty. You now understand how the cycle turns. They say that there are still 40,000 years of the iron age to go. You have to come down the ladder. If it were another 40,000 years, there would be so many human beings! In just 5000 years, there are so many human beings that there isn’t even enough to eat. Therefore, if there were that many thousands of years more, the population would expand so much! So, the Father comes and gives you patience. Impure human beings continue to fight one another. Their intellects cannot turn towards this side. Look how much your intellects have changed. In spite of that, Maya definitely deceives you. You have to become completely ignorant of the knowledge of all desires. If there are any desires, everything is lost. You become completely worth not a penny. Maya continues to deceive even very good maharathis in one way or another. They cannot then climb into the heart, just as some cannot climb into their parents’ hearts. Some children are such that they even kill their lokik parents! They even kill their family! They are very sinful souls. Look at what Ravan does! This world is very dirty. You mustn’t attach your heart to it. A lot of courage is needed to become pure. Purity is the main thing needed to claim the prize of the sovereignty of the world and that is why you tell the Father to come and purify you. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. In order to be saved from being deceived by Maya, become completely ignorant of the knowledge of all desires. Don’t attach your heart to this dirty world.
  2. Give the complete proof of purity. The highest character is that of purity. In order to reform yourself, you definitely have to become pure.
Blessing: May you be introverted and experience the divine activities of the subtle powers with your concentrated form.
The basis of concentration is introverted. Those who are introverted experience the power of divine activities within themselves. To invoke souls, to have heart-to-heart conversations with souls, to transform the sanskars and nature of souls, to have a connection with the Father; in order to do such spiritual service in the world of souls, increase your power of concentration. By doing this, all types of obstacles will automatically finish.
Slogan: To imbibe all attainments in the self and be revealed on the world stage is the basis of revelation.

*** Om Shanti ***

 

Special note: This month of January is the month of memories of sweet sakar Baba.In order to makeyourselves powerful, you especially have to become introverted and experience the divine activities of the subtle powers. Maintain your avyakt stage for the whole month. Maintain silence of the mind and the mouth.

TODAY MURLI 1 JANUARY 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 1 January 2020

01/01/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, let there be a lot of love for the Father who purifies you. Wake up early in the morning and say: “Shiv Baba, good morning.”
Question: What virtues do you need to inculcate in order to have accurate remembrance? What are the signs that your remembrance is accurate?
Answer: For accurate remembrance, you need 1) Patience 2) Maturity 3) Understanding. Remembrance begets remembrance for those whose have remembrance. On the basis of these virtues, you become able to receive a current from the Father. By receiving this current your lifespan increases and you become healthy,your heart becomes cool and you will continue to become satopradhan.

Om shanti. The Father says: Sweet children, the same applies to you, that is, you souls are also embodiments of peace. The original religion of all of you souls is peace. You come here from the land of peace and then come into ‘talkie’. You receive those physical organs in order to play your parts. Souls don’t become larger or smaller. It is the bodies that become larger or smaller. The Father says: I am not a bodily being. I have to come to meet you children personally, face to face. For instance, children created by a father would not say that they have come from the supreme abode, taken birth and have come to meet the mother and father. Even though a new soul enters someone else’s body and an older soul enters someone’s body, it would not be said that that soul has come to meet the mother and father. The soul automatically receives a mother and father. Here, this is something new. The Father says: I have come from the supreme abode and am now personally in front of you children. I give you children knowledge once again because I am knowledge-full, the Ocean of Knowledge. I come to teach you children Raj Yoga. It is God alone who teaches Raj Yoga. This Godly part is not that of the Krishna soul. Each one’s part is his own; God’s part is His own. The Father explains: Sweet children, consider yourselves to be souls. It feels so sweet to consider oneself to be this. What were we and what have we now become. Only now do you explain to others how wonderfully this drama has been created. If you just remember that this is the confluence-age, it becomes firm that you are going to go to the golden age. You are now at the confluence age and you are going to go to your home. Therefore, you definitely have to become pure. Internally, you should have a lot of happiness. Oho! The unlimited Father says: Sweetest children, remember Me and you will become satopradhan; you will become the masters of the world. The Father gives so much love to you children. It is not that He simply teaches you in the form of the Teacher and then goes back home. He is the Father and also the Teacher. He is educating you and also teaching you the pilgrimage of remembrance. You should have a lot of love for the Father who purifies you and makes you into the masters of the world. As soon as you wake up early in the morning, you should first of all say “Good morning” to Shiv Baba. When you say “Good morning”, that is, when you remember Him, you will remain very happy. You children have to ask your hearts: How much do I remember the unlimited Father after waking up in the morning? People perform devotion in the morning. They perform worship with so much love. However, Baba knows that some children don’t remember the Father from deep within their hearts with that much love. If you wake up early in the morning and say “Good morning” to Baba and churn knowledge, the mercury of your happiness can rise. If you don’t say “Good morning” to the Father, how would the burden of sin be removed? The main thing is remembrance. Through this, you earn a very important income for the future; this income will be useful to you for cycle after cycle. You have to have remembrance with a lot of patience, maturity and understanding. In general terms, although you say that you remember Baba a great deal, it requires effort to have accurate remembrance. Those who remember the Father more receive more current because remembrance begets remembrance. There are the two things: yoga and knowledge. The subject of yoga is separate. It is a very important subject. It is with yoga that souls become satopradhan. Without having remembrance, it is impossible to become satopradhan. If you remember the Father very well with a lot of love, you automatically receive a current and become healthy. Your lifespan also increases through that current. When children remember Baba, He gives them a searchlight. The Father gives you children such a great treasure. Sweet children have to remember this firmly: “Shiv Baba is teaching us.” Shiv Baba is the Purifier and also the Bestower of Salvation. Salvation means He gives you the sovereignty of heaven. Baba is so sweet. He sits and teaches you children with so much love. The Father is teaching us through Dada. Baba is so sweet and He gives us so much love. He doesn’t give us any difficulty. He simply says: Remember Me and remember the cycle. Your hearts should become cool in remembrance of the Father. You should be harassed by remembrance of only the one Father because you receive such a huge inheritance from the Father. Each of you should check yourself: How much love do I have for the Father? To what extent do I have the divine virtues in me? You children are now changing from thorns into flowers. To the extent that you stay in yoga, you will accordingly continue to change from thorns into flowers and become satopradhan. Once you have become flowers you will not be able to stay here. The garden of flowers is heaven. Those who change many thorns into flowers are said to be truly fragrant flowers; they never prick anyone. Anger is a big thorn; it too causes sorrow for many. You children have now stepped away from the world of thorns. You are now at the confluence age. Just as a gardener puts flowers in separate pots, in the same way you flowers of the confluence age have been placed into separate pots. You flowers will then go to heaven and the iron-aged thorns will be burnt. You sweet children know that you are receiving an imperishable inheritance from the parlokik Father. Those who are true children, who have full love for BapDada, will have a lot of happiness: We are becoming the masters of the world. Yes, it is by making effort that you become a master of the world, not just by saying it. Those who are special, beloved children will always remember that they are once again establishing those same sun and moon dynasty kingdoms for themselves. The Father says: Sweet children, the more you benefit many others, the more return you will receive. If you show the path to many others, you will receive blessings from many. You have to fill your aprons with the jewels of knowledge and then donate them. The Ocean of Knowledge is giving you platefuls of jewels. Those who donate those jewels are loved by everyone. Children should have so much happiness in themselves. Sensible children would say: We will claim the full inheritance from Baba. They cling to the Father completely. They have a lot of love for the Father because they know that they have found the Father who gives them life. He gives you such a blessing of knowledge that you completely change from what you were. You become solvent from insolvent. He fills your treasure-store to this extent. To the extent that you remember the Father, accordingly, there will be that much love and there will be a pull. When a needle is clean, it is pulled by a magnet. The rust will continue to be removed by your having remembrance of the Father. Remember no one except the one Father. Just as a wife has so much love for her husband, so you too are now engaged. Is the happiness of being engaged any less? Shiv Baba says: Sweet children, you are engaged to Me, not to Brahma. Once your engagement has become firm, you should be harassed by remembrance of that One. The Father explains: Sweet children, do not become careless and make mistakes. Become spinners of the discus of self-realisation and lighthouses. When you have very good practice of being a spinner of the discus of self-realisation, it is as though you will become an ocean of knowledge. Just as students study and become teachers, so this is also your business. Make everyone into a spinner of the discus of self-realisation for only then will you become a king and queen and rule the globe. This is why Baba constantly asks you children: Children, are you sitting here as spinners of the discus of self-realisation? The Father is also the Spinner of the discus of self-realisation. The Father has come to take you children back home. Without you children, even I feel restless. When the time comes, I become restless: I should now go! Children are calling out a lot and are very unhappy. Baba has mercy. You children now have to return home. Then, from there, you will go to the land of happiness by yourselves. I will not be your Companion there. You souls will go back according to your own stage. You children should have the intoxication that you are studying in this spiritual university. We are Godly students. We are studying in order to change from human beings into deities, that is, to become the masters of the world. Through this, we pass through all ministries. We receive all degrees of health, of education; we study this knowledge to reform our characterHealth Ministry, Food Ministry, Land Ministry and Building Ministry are all included in this. The Father sits here and explains to you sweetest children: When you are giving a lecture or explaining to people in a gathering, repeatedly say: Consider yourselves to be souls and remember the Supreme Father, the Supreme Soul. Only by having this remembrance will your sins be absolved and you will become pure. You have to remember this again and again. However, you can only tell others this when you yourself are in remembrance. Children are very weak in this aspect. When you children experience internal happiness and stay in remembrance, what you then explain to others will be effective. You should not speak too much. If you explain even a little in a state of soul consciousness, the arrow will strike the target. The Father says: Children, the past is the past. Now, first of all, reform yourselves. If you yourselves do not have remembrance but you continue to tell others to have it, this cheating cannot continue. Your conscience would definitely bite you within. If you don’t have full love for the Father, you don’t follow shrimat. No one else can give the teachings that the unlimited Father gives. The Father says: Sweet children, now forget this old world. At the end, you have to forget all of these things. Your intellects are then connected to your land of peace and land of happiness. You have to go to the Father by remembering the Father. Impure souls cannot go back because that is the home of pure souls. These bodies are made of the five elements. So, the five elements pull you to stay here because it is as though souls have taken that property and this is why there is attachment to bodies. You now have to remove that attachment and return home. These five elements do not exist there. In the golden age, bodies are created with the power of yoga and matter is satopradhan, and this is why there is no pull or any sorrow. These are very refined things to understand. Here, the power of the five elements pulls souls and this is why souls do not have the heart to leave their bodies. Otherwise, there should be even greater happiness. Having become pure, you will leave your bodies just as a hair is pulled out of butter. So, you have to finish completely your attachment to bodies and everything else as though you have no connection with any of it. Simply: I am now going to Baba. You have prepared your bags and baggage in advance to send on. They cannot go with you, because souls have to return home and the bodies have to be shed here. Baba has already given you visions of the new bodies. You will receive palaces studded with diamonds and jewels. You should make so much effort to go to such a land of happiness. You must never become tired. Day and night, you have to earn a lot of income. This is why Baba says: Children who are conquerors of sleep, constantly remember Me alone and churn the ocean of knowledge. By keeping the secrets of the drama in your intellects, your intellects become completely cool and serene. Maharathi children would never fluctuate. If you remember Shiv Baba, He will look after you. The Father liberates you children from sorrow and gives you the donation of peace. You too have to give the donation of peace. This unlimited peace of yours, that is, the power of yoga will completely silence others. You will instantly know whether someone belongs to your home or not: That soul would quickly be pulled: This is our Baba. You also have to feel the pulse. Stay in remembrance of the Father and then see whether that soul belongs to your clan or not. If he does, the soul will become completely quiet. Only those who belong to this clan will experience the sweetness of these things. When you children remember the Father, He loves you. It is souls that are loved. You also know that only those who have done a lot of devotion will study the most. You will continue to see from their faces how much love they have for the Father. Souls see the Father and the Father is teaching us souls. The Father too understands: I am teaching such tiny souls, points. As you progress further, your stage will become like that. You will understand that you are teaching your brothers. Even though the face may be that of a sister, your vision should go to the soul. For your vision not to go to the body at all requires a lot of effort. These are very refined things and the study is very elevated. If you weigh it, the side of this study would be very heavy. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and Good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Fill your aprons with jewels of knowledge and then donate them. Those who donate are loved by everyone and they experience limitless happiness.
  2. 2. Remember the Father who gives you life with a lot of love and donate peace to everyone. Spin the discus of self-realisation and become an ocean of knowledge.
Blessing: May you be one who performs pure and elevated acts and thereby reveals the highest-on-high Father.
Just as you always perform pure and elevated acts with your right hand, in the same way, become the children who are right hands, the ones who always perform pure and elevated acts. Let every act of yours be one that reveals the highest-on-high Father because it is your practical activity that reveals the proof of your thoughts and words. Everyone can see your activity and they can have an experience through your activity. So, with your spiritual drishti and the happiness on your spiritual face, reveal the Father, this too is karma.
Slogan: The meaning of spirituality is to have a sparkle of purity in your eyes and a smile of purity on your lips.

*** Om Shanti ***

Notice: In order for all Brahmin children to experience the avyakt stage especially from the 1st January to 31st January 2020, note down these points and churn them throughout the day. Become images of experience and stay introspective and continue to tour around the subtle region.

Special homework to experience the avyakt stage in this avyakt month.

Just as Father Brahma in the sakar form, while having many other responsibilities, gave the experience of the subtle and the incorporeal stages, similarly, you children while being in the corporeal form, experience and give others the experience of the angelic form. Souls who come into connection now are able to glimpse Godly love, elevated knowledge and the elevated activities, but now let them have a vision of the avyakt stage.

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 1 JANUARY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 1 January 2020

01-01-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – पतित से पावन बनाने वाले बाप के साथ तुम्हारा बहुत-बहुत लव होना चाहिए, सवेरे-सवेरे उठकर पहले-पहले कहो शिवबाबा गुडमार्निंग”
प्रश्नः- एक्यूरेट याद के लिए कौन सी धारणायें चाहिए? एक्यूरेट याद वाले की निशानी क्या होगी?
उत्तर:- एक्यूरेट याद के लिए धैर्यता, गम्भीरता और समझ चाहिए। इस धारणा के आधार से जो याद करते हैं उनकी याद, याद से मिलती है और बाप की करेन्ट आने लगती है। उस करेन्ट से आयु बढ़ेगी, हेल्दी बनते जायेंगे। दिल एकदम ठर जायेगी (शीतल हो जायेगी), आत्मा सतोप्रधान बनती जायेगी।

ओम् शान्ति। बाप कहते हैं मीठे बच्चे ततत्वम् अर्थात् तुम आत्मायें भी शान्त स्वरूप हो। तुम सर्व आत्माओं का स्वधर्म है ही शान्ति। शान्तिधाम से फिर यहाँ आकर टाकी बनते हो। यह कर्मेन्द्रियां तुमको मिलती है पार्ट बजाने के लिए। आत्मा छोटी-बड़ी नहीं होती है। शरीर छोटा बड़ा होता है। बाप कहते हैं मैं तो शरीरधारी नहीं हूँ। मुझे बच्चों से सन्मुख मिलने आना होता है। समझो जैसे बाप है, उनसे बच्चे पैदा होते हैं, तो वह बच्चा ऐसे नहीं कहेगा कि मैं परमधाम से जन्म ले मात-पिता से मिलने आया हूँ। भल कोई नई आत्मा आती है किसके भी शरीर में, वा कोई पुरानी आत्मा किसके शरीर में प्रवेश करती है तो ऐसे नहीं कहेंगे कि मात-पिता से मिलने आया हूँ। उनको आटोमेटिकली मात-पिता मिल जाते हैं। यहाँ यह है नई बात। बाप कहते हैं मैं परमधाम से आकर तुम बच्चों के सम्मुख हुआ हूँ। बच्चों को फिर से नॉलेज देता हूँ क्योंकि मैं हूँ नॉलेजफुल, ज्ञान का सागर.. मैं आता हूँ तुम बच्चों को पढ़ाने, राजयोग सिखाने। राजयोग सिखाने वाला भगवान ही है। कृष्ण की आत्मा को यह ईश्वरीय पार्ट नहीं है। हर एक का पार्ट अपना। ईश्वर का पार्ट अपना है। तो बाप समझाते हैं मीठे बच्चे अपने को आत्मा समझो। ऐसा अपने को समझना कितना मीठा लगता है। हम क्या थे! अब क्या बन रहे हैं!

यह ड्रामा कैसा वन्डरफुल बना हुआ है यह भी तुम अभी समझाते हो। यह पुरुषोत्तम संगमयुग है इतना सिर्फ याद रहे तो भी पक्का हो जाता है कि हम सतयुग में जाने वाले हैं। अभी संगम पर हैं फिर जाना है अपने घर इसलिए पावन तो जरूर बनना है। अन्दर में बहुत खुशी होनी चाहिए। ओहो! बेहद का बाप कहते हैं मीठे-मीठे बच्चों मुझे याद करो तो तुम सतोप्रधान बनेंगे। विश्व का मालिक बनेंगे। बाप कितना बच्चों को प्यार करते हैं। ऐसे नहीं कि सिर्फ टीचर के रूप में पढ़ाकर और घर चले जाते हैं। यह तो बाप भी टीचर भी है। तुमको पढ़ाते भी है। याद की यात्रा भी सिखलाते हैं।

ऐसा विश्व का मालिक बनाने वाले, पतित से पावन बनाने वाले बाप के साथ बहुत लव होना चाहिए। सवेरे-सवेरे उठने से ही पहले-पहले शिवबाबा से गुडमार्निंग करना चाहिए। गुडमार्निंग अर्थात् याद करेंगे तो बहुत खुशी में रहेंगे। बच्चों को अपने दिल से पूछना है हम सवेरे उठकर कितना बेहद के बाप को याद करते हैं? मनुष्य भक्ति भी सवेरे करते हैं ना! भक्ति कितना प्यार से करते हैं। परन्तु बाबा जानते हैं कई बच्चे दिल व जान, सिक व प्रेम से याद नहीं करते हैं। सवेरे उठ बाबा से गुडमार्निंग करें, ज्ञान के चिन्तन में रहें तो खुशी का पारा चढ़े। बाप से गुडमार्निंग नहीं करेंगे तो पापों का बोझा कैसे उतरेगा। मुख्य है ही याद, इससे भविष्य के लिए तुम्हारी बहुत भारी कमाई होती है। कल्प-कल्पान्तर यह कमाई काम आयेगी। बड़ा धैर्य, गम्भीरता, समझ से याद करना होता है। मोटे हिसाब में तो भल करके यह कह देते हैं कि हम बाबा को बहुत याद करते हैं परन्तु एक्यूरेट याद करने में मेहनत है। जो बाप को जास्ती याद करते हैं उनको करेन्ट जास्ती मिलती है क्योंकि याद से याद मिलती है। योग और ज्ञान दो चीज़े हैं। योग की सबजेक्ट अलग है, बहुत भारी सबजेक्ट है। योग से ही आत्मा सतोप्रधान बनती है। याद बिना सतोप्रधान होना, असम्भव है। अच्छी रीति प्यार से बाप को याद करेंगे तो आटोमेटिकली करेन्ट मिलेगी, हेल्दी बन जायेंगे। करेन्ट से आयु भी बढ़ती है। बच्चे याद करते हैं तो बाबा भी सर्चलाइट देते हैं। बाप कितना बड़ा भारी खजाना तुम बच्चों को देते हैं।

मीठे बच्चों को यह पक्का याद रखना है, शिवबाबा हमको पढ़ाते हैं। शिवबाबा पतित-पावन भी है। सद्गति दाता भी हैं। सद्गति माना स्वर्ग की राजाई देते हैं। बाबा कितना मीठा है। कितना प्यार से बच्चों को बैठ पढ़ाते हैं। बाप, दादा द्वारा हमको पढ़ाते हैं। बाबा कितना मीठा है। कितना प्यार करते हैं। कोई तकलीफ नहीं देते। सिर्फ कहते हैं मुझे याद करो और चक्र को याद करो। बाप की याद में दिल एकदम ठर जानी चाहिए। एक बाप की ही याद सतानी चाहिए क्योंकि बाप से वर्सा कितना भारी मिलता है। अपने को देखना चाहिए हमारा बाप के साथ कितना लव है? कहाँ तक हमारे में दैवीगुण हैं? क्योंकि तुम बच्चे अब कांटों से फूल बन रहे हो। जितना-जितना योग में रहेंगे उतना कांटों से फूल, सतोप्रधान बनते जायेंगे। फूल बन गये फिर यहाँ रह नहीं सकेंगे। फूलों का बगीचा है ही स्वर्ग। जो बहुत कांटों को फूल बनाते हैं उन्हें ही सच्चा खुशबूदार फूल कहेंगे। कभी किसको कांटा नहीं लगायेंगे। क्रोध भी बड़ा कांटा है, बहुतों को दु:ख देते हैं। अभी तुम बच्चे कांटों की दुनिया से किनारे पर आ गये हो, तुम हो संगम पर। जैसे माली फूलों को अलग पाट (बर्तन) में निकालकर रखते हैं वैसे ही तुम फूलों को भी अब संगमयुगी पाट में अलग रखा हुआ है। फिर तुम फूल स्वर्ग में चले जायेंगे, कलियुगी कांटें भस्म हो जायेंगे।

मीठे बच्चे जानते हैं पारलौकिक बाप से हमको अविनाशी वर्सा मिलता है। जो सच्चे-सच्चे बच्चे हैं, जिनका बापदादा से पूरा लव है उनको बड़ी खुशी रहेगी। हम विश्व का मालिक बनते हैं। हाँ पुरुषार्थ से ही विश्व का मालिक बना जाता है, सिर्फ कहने से नहीं। जो अनन्य बच्चे हैं उन्हों को सदैव यह याद रहेगा कि हम अपने लिए फिर से वही सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी राजधानी स्थापन कर रहे हैं। बाप कहते हैं मीठे बच्चे जितना तुम बहुतों का कल्याण करेंगे उतना ही तुमको उजूरा मिलेगा। बहुतों को रास्ता बतायेंगे तो बहुतों की आशीर्वाद मिलेगी। ज्ञान रत्नों से झोली भरकर फिर दान करना है। ज्ञान सागर तुमको रत्नों की थालियाँ भर-भर कर देते हैं। जो फिर दान करते हैं वही सबको प्यारे लगते हैं। बच्चों के अन्दर में कितनी खुशी होनी चाहिए। सेन्सीबुल बच्चे जो होंगे वह तो कहेंगे हम बाबा से पूरा ही वर्सा लेंगे, एकदम चटक पड़ेंगे। बाप से बहुत लव रहेगा क्योंकि जानते हैं प्राण देने वाला बाप मिला है। नॉलेज का वरदान ऐसा देते हैं जिससे हम क्या से क्या बन जाते हैं। इनसालवेन्ट से सालवेन्ट बन जाते हैं, इतना भण्डारा भरपूर कर देते हैं। जितना बाप को याद करेंगे उतना लव रहेगा, कशिश होगी। सुई साफ होती है तो चकमक (चुम्बक) तरफ खैच जाती है ना। बाप की याद से कट निकलती जायेगी। एक बाप के सिवाए और कोई याद न आये। जैसे स्त्री का पति के साथ कितना लव होता है। तुम्हारी भी सगाई हुई है ना। सगाई की खुशी कम होती है क्या? शिवबाबा कहते हैं मीठे बच्चे तुम्हारी हमारे साथ सगाई है, ब्रह्मा के साथ सगाई नहीं है। सगाई पक्की हो गई फिर तो उनकी ही याद सतानी चाहिए।

बाप समझाते हैं मीठे बच्चे गफलत मत करो। स्वदर्शन चक्रधारी बनो, लाइट हाउस बनो। स्वदर्शन चक्रधारी बनने की प्रैक्टिस अच्छी हो जायेगी तो फिर तुम जैसे ज्ञान का सागर हो जायेंगे। जैसे स्टूडेन्ट पढ़कर टीचर बन जाते हैं ना। तुम्हारा धन्धा ही यह है। सबको स्वदर्शन चक्रधारी बनाओ तब ही चक्रवर्ती राजा-रानी बनेंगे इसलिए बाबा सदैव बच्चों से पूछते हैं स्वदर्शन चक्रधारी हो बैठे हो? बाप भी स्वदर्शन चक्रधारी है ना। बाप आये हैं तुम मीठे बच्चों को वापिस ले जाने। तुम बच्चों बिगर हमको भी जैसे बेआरामी होती है। जब समय होता है तो बेआरामी हो जाती है। बस अभी हम जाऊं, बच्चे बहुत पुकारते हैं, बहुत दु:खी हैं। तरस पड़ता है। अब तुम बच्चों को चलना है घर। फिर वहाँ से तुम आपेही चले जायेंगे सुखधाम। वहाँ मैं तुम्हारा साथी नहीं बनूँगा। अपनी अवस्था अनुसार तुम्हारी आत्मा चली जायेगी।

तुम बच्चों को यह नशा रहना चाहिए हम रूहानी युनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं। हम गॉडली स्टूडेन्ट हैं। हम मनुष्य से देवता अथवा विश्व का मालिक बनने के लिए पढ़ रहे हैं। इससे हम सारी मिनिस्टरी पास कर लेते हैं। हेल्थ की एज्यूकेशन भी पढ़ते हैं, कैरेक्टर सुधारने की भी नॉलेज पढ़ते हैं। हेल्थ मिनिस्टरी, फूड मिनिस्टरी, लैन्ड मिनिस्टरी, बिल्डिंग मिनिस्टरी सब इसमें आ जाती है।

मीठे-मीठे बच्चों को बाप बैठ समझाते हैं जब कोई सभा में भाषण करते हो वा किसको समझाते हो तो घड़ी-घड़ी बोलो अपने को आत्मा समझ परमपिता परमात्मा को याद करो। इस याद से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। तुम पावन बन जायेंगे। घड़ी-घड़ी यह याद करना है। परन्तु यह भी तुम तभी कह सकेंगे जब खुद याद में होंगे। इस बात की बच्चों में बहुत कमजोरी है। अन्दरूनी तुम बच्चों को खुशी होगी, याद में रहेंगे तब दूसरों को समझाने का असर होगा। तुम्हारा बोलना जास्ती नहीं होना चाहिए। आत्म-अभिमानी हो थोड़ा भी समझायेंगे तो तीर भी लगेगा। बाप कहते हैं बच्चे बीती सो बीती। अब पहले अपने को सुधारो। खुद याद करेंगे नहीं, दूसरों को कहते रहेंगे, यह ठगी चल न सके। अन्दर दिल जरूर खाती होगी। बाप के साथ पूरा लव नहीं है तो श्रीमत पर चलते नहीं हैं। बेहद के बाप जैसी शिक्षा तो और कोई दे न सके। बाप कहते हैं मीठे बच्चे इस पुरानी दुनिया को अब भूल जाओ। पिछाड़ी में तो यह सब भूल ही जाना है। बुद्धि लग जाती है अपने शान्तिधाम और सुखधाम में। बाप को याद करते-करते बाप के पास चले जाना है। पतित आत्मा तो जा न सके। वह है ही पावन आत्माओं का घर। यह शरीर 5 तत्वों से बना हुआ है। तो 5 तत्व यहाँ रहने लिए खींचते हैं क्योंकि आत्मा ने यह जैसे प्रापटी ली हुई है, इसलिए शरीर में ममत्व हो गया है। अब इनसे ममत्व निकाल जाना है अपने घर। वहाँ तो यह 5 तत्व हैं नहीं। सतयुग में भी शरीर योगबल से बनता है। सतोप्रधान प्रकृति होती है इसलिए खींचती नहीं। दु:ख नहीं होता। यह बड़ी महीन बातें हैं समझने की। यहाँ 5 तत्वों का बल आत्मा को खींचता है इसलिए शरीर छोड़ने की दिल नहीं होती है। नहीं तो इसमें और ही खुश होना चाहिए। पावन बन शरीर ऐसे छोड़ेंगे जैसे मक्खन से बाल। तो शरीर से, सब चीज़ों से ममत्व एकदम मिटा देना है, इससे हमारा कोई कनेक्शन नहीं। बस हम जाते हैं बाबा के पास। इस दुनिया में अपना बैग बैगेज तैयार कर पहले से ही भेज दिया है। साथ में तो चल न सके। बाकी आत्माओं को जाना है। शरीर को भी यहाँ छोड़ दिया है। बाबा ने नये शरीर का साक्षात्कार करा दिया है। हीरे जवाहरों के महल मिल जायेंगे। ऐसे सुखधाम में जाने लिए कितनी मेहनत करनी चाहिए। थकना नहीं चाहिए। दिनरात बहुत कमाई करनी है इसलिए बाबा कहते हैं नींद को जीतने वाले बच्चे मामेकम् याद करो और विचार सागर मन्थन करो। ड्रामा के राज़ को बुद्धि में रखने से बुद्धि एकदम शीतल हो जाती है। जो महारथी बच्चे होंगे वह कब हिलेंगे नहीं। शिवबाबा को याद करेंगे तो वह सम्भाल भी करेंगे।

बाप तुम बच्चों को दु:ख से छुड़ाकर शान्ति का दान देते हैं। तुमको भी शान्ति का दान देना है। तुम्हारी यह बेहद की शान्ति अर्थात् योगबल दूसरों को भी एकदम शान्त कर देंगे। झट मालूम पड़ जायेगा, यह हमारे घर का है वा नहीं। आत्मा को झट कशिश होगी यह हमारा बाबा है। नब्ज भी देखनी होती है। बाप की याद में रह फिर देखो यह आत्मा हमारे कुल की है। अगर होगी तो एकदम शान्त हो जायेगी। जो इस कुल के होंगे उन्हों को ही इन बातों में रस बैठेगा। बच्चे याद करते हैं तो बाप भी प्यार करते हैं। आत्मा को प्यार किया जाता है। यह भी जानते हैं जिन्होंने बहुत भक्ति की है वह ही जास्ती पढ़ेंगे। उनके चेहरे से मालूम पड़ता जायेगा कि बाप में कितना लव है। आत्मा बाप को देखती है। बाप हम आत्माओं को पढ़ा रहे हैं। बाप भी समझते हैं हम इतनी छोटी बिन्दी आत्मा को पढ़ाता हूँ। आगे चल तुम्हारी यह अवस्था हो जायेगी। समझेंगे हम भाई-भाई को पढ़ाते हैं। शक्ल बहन की होते भी दृष्टि आत्मा तरफ जाए। शरीर पर दृष्टि बिल्कुल न जाये, इसमें बड़ी मेहनत है। यह बड़ी महीन बातें हैं। बड़ी ऊंच पढ़ाई है। वज़न करो तो इस पढ़ाई का तरफ बहुत भारी हो जायेगा। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपनी झोली ज्ञान रत्नों से भरकर फिर दान भी करना है। जो दान करते हैं वो सबको प्यारे लगते हैं, उन्हें अपार खुशी रहती है।

2) प्राणदान देने वाले बाप को बहुत प्यार से याद करते सबको शान्ति का दान देना है। स्वदर्शन चक्र फिराते ज्ञान का सागर बनना है।

वरदान:- ऊंचे ते ऊंचे बाप को प्रत्यक्ष करने वाले शुभ और श्रेष्ठ कर्मधारी भव
जैसे राइट हैण्ड से सदा शुभ और श्रेष्ठ कर्म करते हैं। ऐसे आप राइट हैण्ड बच्चे सदा शुभ वा श्रेष्ठ कर्मधारी बनो, आपका हर कर्म ऊंचे ते ऊचे बाप को प्रत्यक्ष करने वाला हो क्योंकि कर्म ही संकल्प वा बोल को प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में स्पष्ट करने वाला होता है। कर्म को सभी देख सकते हैं, कर्म द्वारा अनुभव कर सकते हैं इसलिए चाहे रूहानी दृष्टि द्वारा, चाहे अपने खुशी के, रूहानियत के चेहरे द्वारा बाप को प्रत्यक्ष करो-यह भी कर्म ही है।
स्लोगन:- रूहानियत का अर्थ है-नयनों में पवित्रता की झलक और मुख पर पवित्रता की मुस्कराहट हो।

सूचना :- सभी ब्रह्मा वत्स 1 जनवरी से 31 जनवरी 2020 तक विशेष अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए यह प्वाइंटस अपने पास नोट करें तथा पूरा दिन इस पर मनन चिंतन करते हुए अनुभवी मूर्त बनें और अन्तर्मुखी रह अव्यक्त वतन की सैर करते रहें।

अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क

जैसे साकार में ब्रह्मा बाप अन्य सब जिम्मेवारियाँ होते हुए भी आकारी और निराकारी स्थिति का अनुभव कराते रहे, ऐसे आप बच्चे भी साकार रूप में रहते फरिश्तेपन का अनुभव करो और कराओ। जो भी सम्पर्क में आते हैं उन्हें ईश्वरीय स्नेह, श्रेष्ठ ज्ञान और श्रेष्ठ चरित्रों का साक्षात्कार तो होता है लेकिन अभी अव्यक्त स्थिति का साक्षात्कार कराओ।

TODAY MURLI 1 JANUARY 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 1 January 2019

Today Murli in Hindi :- Click Here

Read Murli 31 December 2018 :- Click Here

01/01/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, here, you are in exile. You children should have no interest in eating good food or wearing good clothes. Pay full attention to the study and to your character.
Question: What is the way to remain constantly full of the jewels of knowledge?
Answer: Donation: the more jewels you donate to others, the more you will remain full. Sensible ones are those who listen and imbibe them and then donate them to others. If there is a hole in the apron of the intellect, they flow away and you aren’t able to imbibe. Therefore, study with discipline. Remain distant from the five vices. Become rup and basant.

Om shanti. The spiritual Father explains to you spiritual children. The spiritual Father speaks through the physical organs and the spiritual children listen through the physical organs. This is something new. No human being in the world can say this. You, too, explain this, numberwise, according to the effort you make. It is just as when a teacher teaches, the register of the students shows everything. From their register, you can tell about their behaviour and how they study. The main thing is the study and character. This is God’s study which no one else can teach. This is the knowledge of the Creator and the beginning, the middle and the end of creation, of the world cycle. No human being in the whole world knows this. Even the ancient rishis and munis, who were such well-educated authorities , used to say that they didn’t know the Creator or creation. The Father Himself came and gave His own introduction. It is remembered that this is a forest of thorns. A forest would definitely catch fire. A garden of flowers never catches fire because a garden is green. The whole forest is dry. A green and luscious garden would never catch fire; a dry forest would quickly catch fire. This is the unlimited forest that caught fire and the garden was also established. Your garden is being established in an incognito way. You know that we are becoming fragrant deities, the flowers of the garden. That is called heaven. Heaven is now being established. It is a wonder that, no matter how much you explain to people, it doesn’t sit in anyone’s intellect. It will not sit in the intellects of those who don’t belong to this religion. They listen through one ear and let it out through the other. There are so few people in Bharat in the golden and silver ages. Then, there is so much growth in the copper and iron ages. There, they have one or two children, whereas here, they have four or five children. Therefore, there would definitely be growth. The people of Bharat are now called Hindus. In fact, they belonged to the deity religion. None of those of other religions forget their religion. It is the people of Bharat who have forgotten this. Look, there are so many human beings at this time. Not all of them could come here and take knowledge. Each one of you can understand your births. Those who have taken the full 84 births would definitely be the oldest devotees. You can understand how much devotion you have performed. If you have performed less devotion, you will take less knowledge and explain to fewer people. If you have performed a lot of devotion, you will take a lot of knowledge and explain knowledge to many others. If you don’t take that much knowledge, you can’t explain that much either. Therefore, you receive less fruit. There is an account. A child calculated how many births those of Islam will take and how many births Buddhists will take and sent that to the Father. Buddha too was the founder of a religion. There wasn’t anyone of the Buddhist religion before him. The Buddha soul entered someone and established the Buddhist religion and expansion then took place from that one. He too was a father of people (Prajapita). So much expansion took place from one. You have to become kings in the new world. Here, you are in exile. You must not have any interest in anything. “I want to wear good clothes.” That too is body consciousness. Whatever you receive is fine. This world is only going to last for a short time. If you wear good clothes here, that would be reduced there. You have to renounce that interest. As you children make further progress, you will automatically continue to have visions. You yourselves will say: This one is doing a lot of service. It is a wonder. He will definitely claim a high number. Then you will continue to make others similar to yourselves. Day by day, the garden will grow. However many deities there are in the golden and silver ages, they are all sitting here in an incognito form and they will later be revealed. You are now claiming an incognito status. You know that you are studying in the land of death and that you will receive your status in the land of immortality. Have you ever seen such a study? It is a wonder how you study in the old world and receive your status in the new world. The One who is teaching you is the One who inspires establishment of the land of immortality and the destruction of the land of death. This most auspicious confluence age of yours is very short. It is in this age that the Father comes to teach you. Your study begins as soon as He comes. This is why the Father says: Write that the birthday of Shiva is also the birthday of the Gita. People don’t know that One. They have mentioned Krishna’s name. Now, someone should at least understand this mistake! So many eminent people come to visit the museum. It isn’t that they know the Father; not at all! This is why Baba says: Ask them to fill in a form so that you can tell whether they have learnt anything or not. Otherwise, what else would they do when they come here? Here, it isn’t the same as when they go to sages, holy men and great souls. This one has the same ordinary form. There is no change in his costume. This is why no one is able to understand. They understand that he was a jeweller. He was first a jeweller of perishable jewels and now he is a jeweller of imperishable jewels. You are making a deal with the unlimited Father who is the great Businessman, Magician and Jewel Merchant. Therefore, each one of you should consider yourself to be rup and basant. We have jewels of knowledge in us worth hundreds of thousands. Through these jewels of knowledge you become those with divine intellects. This too is something to understand. There are some good sensible children who imbibe these things. If someone is unable to imbibe, he is of no use. Consider that one to have a hole in his apron through which everything flows away. The Father says: I give you the donation of the imperishable jewels of knowledge. If you continue to make donations, you will remain full. Otherwise you don’t have anything; you are empty. You don’t study and you don’t move along with discipline. The subjects here are very good. You have to move completely away from the five vices. The Father has explained that the celebration of Raksha Bandhan also refers to this time. However, people don’t understand why a rakhi is tied. They continue to be impure and yet they still have a rakhi tied. Previously, brahmin priests used to tie the rakhis. Now, sisters tie them on their brothers in exchange for a gift (generally money). There is no question of purity there. They make very fashionable rakhis. This Diwali and Dashera etc. are all festivals of the confluence age. The act s that the Father performed then continue on the path of devotion. The Father tells you the true Gita and makes you into Lakshmi and Narayan. You are now going to go into the first grade. After listening to the story of the true Narayan, you change from an ordinary man into Narayan. You children now have to awaken the whole world. You need so much power of yoga. It is only with the power of yoga that you establish heaven every cycle. Establishment takes place with the power of yoga and destruction takes place through physical power. There are just the two words: Alpha and beta. You become the masters of the world with the power of yoga. Your knowledge is completely incognito. You were satopradhan and have now become tamopradhan. You have to become satopradhan once again. Everything definitely becomes old from new. What would there not be in the new world? There is nothing in the old world; it is like an empty box. Previously, Bharat was heaven and now, Bharat is hell; there is the difference of day and night. They make effigies of Ravan and burn them but they don’t know the meaning of that. You now understand what those people are doing. Yesterday you too had ignorance, whereas today you have knowledge. Yesterday you were in hell and today you really are going to heaven. It isn’t as people of the world say, that so-and-so became a resident of heaven. If you went to heaven now, hell would no longer remain. These matters have to be understood. This is a matter of just a second . Remember the Father and your sins will be absolved. Continue to tell this to everyone. Tell them: You were like them (Lakshmi and Narayan) and then, having taken 84 births, you have become that. From satopradhan, you have become tamopradhan and you have to become satopradhan once again. Souls are never destroyed, but they definitely do have to become satopradhan from tamopradhan once again. Baba continues to explain to you in many different ways. My battery never becomes old. Baba simply says: Consider yourself to be a point, a soul. They say: This one’s soul has departed. Therefore, a soul sheds one body and takes another according to his sanskars. Souls now have to go back home. This too is the drama. The world cycle continues to repeat. Now, at the end, they calculate the population and say: There are this many people in the world. Why do they not say “There are this many souls”? The Father says: Children have forgotten Me so much. I then have to come and benefit everyone and this is why they call out to the Father. You forget the Father but the Father doesn’t forget you children. The Father comes to make the impure ones pure. This one is Gaumukh (Cow’s mouth). There is no question of a bull etc. This is the lucky chariot. Baba says to you children: Shiv Baba is decorating you. Remember this firmly. There is a lot of benefit in remembering Shiv Baba. Baba is teaching you through this one (Brahma), but you mustn’t remember this one. Only the one Shiv Baba is the Satguru. You have to surrender yourself to Him. This one also surrendered himself to Him. The Father says: Constantly remember Me alone. You children are going to the golden-aged world of flowers. So why should you have attachment to thorns? For 63 births you have been studying the scriptures of devotion and worshipping; you first worshipped Shiv Baba. This is why you built the temple to Somnath. There were temples in the palaces of all the kings; there were so many diamonds and jewels. It was later that they were attacked. They took away so much gold etc. from the one temple. You are becoming the masters of such a wealthy world. They were wealthy and the masters of the world, but no one knows how long it has been since their kingdom was established. The Father says: It has been 5000 years. They ruled for 2500 years and during the remaining 2500, all the sects and cults continued to grow. You children should be very happy that the unlimited Father is teaching you. You receive a lot of wealth. They have portrayed deities emerging from the ocean with platefuls of jewels. You are now receiving platefuls of the jewels of knowledge. The Father is the Ocean of Knowledge. Some fill their plates very well, whereas everything flows away from the plates of others. Those who study well and teach others will definitely become very wealthy. A kingdom is being established; this is fixed in the drama. Only those who study well receive a scholarship. This is the imperishable Godly scholarship, whereas others are perishable. The ladder is very wonderful. It is the story of 84 births. The Father says: Make such a large ‘tran s light picture of the ladder that it can be seen clearly from a distance. The people who see it will be amazed and your name will continue to be glorified. Those who circle around now will come back again at the end. They circle around two to four times, and then, if it is in their fortune, they stay. There is just the one Flame; where else can they go? You children have to become very sweet. Only when you stay in yoga will you become sweet. Only by having yoga will you be pulled. Until their rust is removed, no one will be pulled. Tell all souls the secrets of this ladder. Gradually, everyone will come to know, numberwise. This is the drama. The history and geography of the world continue to repeat. You should remember the One who explained this. They call the Father omnipresent, but it is Maya that is omnipresent out there. Here, you have the Father because He can come here in a second. You should understand that Baba always sits in this one. He is Karankaravanhar. He does everything and also inspires everything to be done. He gives you children directions and He also continues to act Himself. Judge what He can do and what He cannot do while sitting in this body. Baba doesn’t eat; He just takes the fragrance. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Become rup and basant and keep the apron of your intellect constantly full of the imperishable jewels of knowledge. Let there be no hole in the apron of your intellect. Imbibe the jewels of knowledge and donate them to others.
  2. In order to claim a scholarship, study very well. Stay in complete exile. Don’t have any type of interest. Become a fragrant flower and make others the same.
Blessing: May you have pure and positive thoughts for others and receive everyone’s co-operation by being loved by all.
Everyone has love in their hearts for the souls who have pure and positive thoughts for others, for it is such love that makes them co-operative. Where there is love, people are always ready to surrender their time, wealth and co-operation. So, your having pure and positive thoughts for others will make others loving to you and love will enable all types of co-operation to be surrendered to you. Therefore, remain constantly filled with pure and positive thoughts for the self and for others and make everyone loving and co-operative.
Slogan: Become bestowers at this time and every soul in your kingdom will remain full for every birth.

*** Om Shanti ***

Notice:

This avyakt month is a special month of blessings for all of us Brahmin children. During this month, we will remain introverted and keep the aim of becoming like Father Brahma and make intense effort. For this, we are writing a special point for making special effort at the end of each day’s murli. Please pay attention to this point, churn it throughout the day and tour around the subtle region.

Special effort to become equal to Father Brahma.

According to the time, always remember three words – introverted (antarmukhi), avyakt and alokik. Until now, there is some “lokik-ness” (worldliness) mixed, but when you become completely alokik and introverted, then you will be seen as an avyakt angel. In order to stay in the spiritual and alokik stage, become introverted.

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 1 JANUARY 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 1 January 2019

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01-01-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – यहाँ तुम वनवाह में हो, अच्छा-अच्छा पहनना, खाना.. यह शौक तुम बच्चों में नहीं होना चाहिए, पढ़ाई और कैरेक्टर पर पूरा-पूरा ध्यान दो”
प्रश्नः- ज्ञान रत्नों से सदा भरपूर रहने का साधन क्या है?
उत्तर:- दान। जितना-जितना दूसरों को दान करेंगे उतना स्वयं भरपूर रहेंगे। सयाने वह जो सुनकर धारण करे और फिर दूसरों को दान करे। बुद्धि रूपी झोली में अगर छेद होगा तो बह जायेगा, धारणा नहीं होगी इसलिए कायदे अनुसार पढ़ाई पढ़नी है। 5विकारों से दूर रहना है। रूप-बसन्त बनना है।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप रूहानी बच्चों को समझाते हैं। रूहानी बाप भी कर्मेन्द्रियों से बोलते हैं, रूहानी बच्चे भी कर्मेन्द्रियों से सुनते हैं। यह है नई बात। दुनिया में कोई मनुष्य ऐसे कह न सके। तुम्हारे में भी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार समझाते हैं। जैसे टीचर पढ़ाते हैं तो स्टूडेन्ट का रजिस्टर शो करता है। रजिस्टर से उनकी पढ़ाई और चलन का पता पड़ जाता है। मूल है ही पढ़ाई और कैरेक्टर, यह है ईश्वरीय पढ़ाई जो कोई पढ़ा न सके। रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त की, सृष्टि चक्र की नॉलेज है, यह कोई भी मनुष्य सारी दुनिया में नहीं जानते। ऋषि मुनि जो इतने पढ़े लिखे अथॉरिटी हैं, वह प्राचीन ऋषि मुनि खुद कहते थे कि हम रचता और रचना को नहीं जानते। बाप ने ही आकर पहचान दी है। गाया भी जाता है – यह है काँटों का जंगल। जंगल को आग ज़रूर लगती है। फूलों के बगीचे को कभी आग नहीं लगती क्योंकि जंगल सारा सूखा हुआ है। बगीचा हरा होता है। हरे बगीचे को आग नहीं लगती। सूखे को आग झट लग जाती है। यह है बेहद का जंगल, इनको भी आग लगी थी। बगीचा भी स्थापन हुआ था। तुम्हारा बगीचा अब गुप्त स्थापन हो रहा है। तुम जानते हो हम बगीचे के फूल खुशबूदार देवता बन रहे हैं, उसका नाम है ही स्वर्ग। अब स्वर्ग स्थापन हो रहा है। वन्डर है, तुम कितना भी लोगों को समझाते हो परन्तु किसकी बुद्धि में बैठता नहीं है, जो इस धर्म के नहीं होंगे उनकी बुद्धि में बैठेगा भी नहीं। एक कान से सुनेंगे दूसरे से निकाल देंगे। सतयुग त्रेता में भारतवासी कितने थोड़े होंगे। फिर द्वापर कलियुग में कितनी वृद्धि हो जाती है। वहाँ एक दो बच्चे यहाँ 4-5 बच्चे तो ज़रूर वृद्धि हो गई। भारतवासी ही अब हिन्दू कहलाते हैं। वास्तव में देवता धर्म के थे और कोई भी धर्म वाला अपने धर्म को नहीं भूलता। यह भारतवासी ही भूले हुए हैं। देखो इस समय कितने ढेर मनुष्य हैं। इतने सब तो ज्ञान आकर नहीं लेंगे। हर एक अपने जन्मों को भी समझ सकते हैं। जिसने पूरे 84 जन्म लिए होंगे, वह जरूर पुराने भक्त होंगे। तुम समझ सकते हो कि हमने कितनी भक्ति की है। थोड़ी की होगी तो ज्ञान भी थोड़ा ही उठायेंगे और थोड़ों को समझायेंगे। बहुत भक्ति की होगी तो ज्ञान भी बहुत उठायेंगे और बहुतों को समझायेंगे। ज्ञान नहीं उठाते तो समझा भी कम सकते, इसलिए उन्हें फल भी थोड़ा मिलता है। हिसाब है ना। बाप को एक बच्चे ने हिसाब निकाल भेजा तो इस्लामियों के इतने जन्म, बौद्धियों के इतने जन्म होने चाहिए। बुद्ध भी धर्म स्थापक है। उनके पहले कोई बुद्ध धर्म का था नहीं। बुद्ध की सोल ने प्रवेश किया। उसने बुद्ध धर्म स्थापन किया। फिर एक से वृद्धि होती है। वह भी एक प्रजापिता है। एक से कितनी वृद्धि होती है। तुमको तो राजा बनना है-नई दुनिया में। यहाँ तो वनवाह में हो। किसी चीज़ का शौक नहीं रहना चाहिए। हम अच्छे कपड़े आदि पहनें, यह भी देह-अभिमान है। जो मिला सो अच्छा। यह दुनिया ही थोड़ा समय है। यहाँ अच्छा कपड़ा पहना, वहाँ फिर कम हो जायेगा। यह शौक भी छोड़ना है। आगे चलकर तुम बच्चों को आपेही साक्षात्कार होते रहेंगे। तुम खुद कहेंगे यह तो बहुत सर्विस करते हैं, कमाल है। यह ज़रूर ऊंच नम्बर लेंगे। फिर आप समान बनाते रहेंगे। दिन प्रतिदिन बगीचा तो बड़ा होने का है। जितने देवी-देवता सतयुग के वा त्रेता के हैं, वह सब गुप्त यहाँ ही बैठे हैं फिर प्रत्यक्ष हो जायेंगे। अभी तुम गुप्त पद पा रहे हो। तुम जानते हो हम पढ़ रहे हैं – मृत्युलोक में, पद अमरलोक में पायेंगे। ऐसी पढ़ाई कभी देखी। यह वन्डर है। पढ़ना पुरानी दुनिया में, पद पाना नई दुनिया में। पढ़ाने वाला भी वही है जो अमरलोक की स्थापना और मृत्युलोक का विनाश कराने वाला है। तुम्हारा यह पुरूषोत्तम संगमयुग बहुत छोटा है, इनमें ही बाप आते हैं-पढ़ाने के लिए। आने से ही पढ़ाई शुरू हो जाती है। तब बाप कहते हैं लिखो – शिव जयन्ती सो गीता जयन्ती। इनको मनुष्य नहीं जानते। उन्होंने कृष्ण का नाम रख दिया है। अब यह भूल जब कोई समझे। कितने बड़े-बड़े आदमी म्यूज़ियम में आते हैं, ऐसे नहीं कि वह बाप को जानते हैं, कुछ नहीं इसलिए बाबा कहते हैं फार्म भराओ तो पता लगे कि कुछ सीखा है। बाकी यहाँ आकर क्या करेंगे। जैसे साधू सन्त महात्मा के पास जाते हैं, यहाँ वह बात नहीं। इनका तो वही साधारण रूप है। ड्रेस में भी कुछ फ़र्क नहीं इसलिए कोई समझ नहीं सकते हैं। समझते हैं यह तो जौहरी था। पहले था विनाशी रत्नों का जौहरी। अभी बने हैं अविनाशी रत्नों का जौहरी। तुम सौदा भी बेहद के बाप से करते हो। जो बड़ा सौदागर, जादूगर, रत्नागर है। तो हर एक अपने को समझे कि हम रूप बसन्त हैं। हमारे अन्दर ज्ञान रत्न लाखों रूपये के हैं। इन ज्ञान रत्नों से तुम पारसबुद्धि बन जाते हो। यह भी समझने की बात है। कोई अच्छे सयाने हैं जो इन बातों को धारण करते हैं। अगर धारणा नहीं होती तो कोई काम के नहीं। समझो उसकी झोली में छेद है, बह जाता है। बाप कहते हैं मैं तुमको अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान देता हूँ। अगर तुम दान देते रहेंगे तो भरतू रहेंगे। नहीं तो कुछ भी नहीं, खाली हैं। पढ़ते नहीं, कायदे अनुसार चलते नहीं। इसमें सबजेक्ट बड़ी अच्छी हैं। 5 विकारों से तुमको बिल्कुल दूर जाना है।

बाप ने समझाया है यह जो राखी बन्धन मनाते हैं वह भी इस समय का है। परन्तु मनुष्य अर्थ नहीं जानते तो राखी क्यों बाँधी जाती है। वो तो अपवित्र होते रहते राखी बाँधते रहते। आगे ब्राह्मण लोग बाँधते थे। अब बहनें भाई को बाँधती हैं – खर्ची के लिए। वहाँ पवित्रता की बात नहीं। बड़ी फैशन वाली राखियाँ बनाते हैं। यह दीवाली दशहरा सब संगम के हैं। जो बाप ने एक्ट की है वह फिर भक्ति मार्ग में चलती है। बाप तुमको सच्ची गीता सुनाए यह लक्ष्मी-नारायण बनाते हैं। अभी तुम फर्स्ट ग्रेड में जाते हो। सत्य नारायण की कथा सुनकर तुम नर से नारायण बनते हो। अब तुम बच्चों को सारी दुनिया को जगाना है। कितनी योग की ताकत चाहिए। योग की ताकत से ही तुम कल्प-कल्प स्वर्ग की स्थापना करते हो। योगबल से होती है स्थापना, बाहुबल से होता है विनाश। अक्षर ही दो हैं – अल्फ और बे। योगबल से तुम विश्व के मालिक बनते हो। तुम्हारा ज्ञान बिल्कुल ही गुप्त है। तुम जो सतोप्रधान थे, वह अब तमोप्रधान बने हो। फिर सतोप्रधान बनना है। हर एक चीज़ नई से पुरानी ज़रूर होती है। नई दुनिया में क्या नहीं होगा। पुरानी दुनिया में तो कुछ भी नहीं है। जैसे खोखा। कहाँ भारत स्वर्ग था, कहाँ भारत अब नर्क है। रात दिन का फ़र्क है। रावण का बुत बनाकर जलाते हैं, परन्तु अर्थ नहीं जानते। तुम अब समझते हो यह क्या-क्या कर रहे हैं। तुम्हारे में भी कल अज्ञान था, आज ज्ञान है। कल नर्क में थे, आज स्वर्ग में जा रहे हो – रीयल। ऐसे नहीं जैसे दुनिया वाले लोग कहते हैं स्वर्गवासी हुआ। तुम अब स्वर्ग में जायेंगे तो फिर नर्क होगा ही नहीं। कितनी समझने की बात है। है भी सेकेण्ड की बात। बाप को याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। यह सबको बताते रहो। बोलो, तुम इन (लक्ष्मी-नारायण) जैसे थे फिर 84 जन्म लेकर यह बने हो। सतोप्रधान से तमोप्रधान बने हो फिर सतोप्रधान बनना है। आत्मा तो विनाश नहीं होती। बाकी उनको तमोप्रधान से सतोप्रधान फिर बनना ही पड़े। बाबा किसम-किसम से समझाते रहते हैं। मेरी बैटरी कभी पुरानी होती नहीं। बाबा सिर्फ कहते हैं अपने को बिन्दू आत्मा समझो। कहते हैं इनकी आत्मा निकल गई। तो आत्मा संस्कारों अनुसार एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। अब आत्माओं को घर जाना है। यह भी ड्रामा है। सृष्टि चक्र रिपीट होता ही रहता है। पिछाड़ी में हिसाब निकाल कहते हैं दुनिया में इतने मनुष्य हैं। ऐसे क्यों नहीं कहते इतनी आत्मायें हैं। बाप कहते हैं बच्चे मुझे कितना भूल गये हैं। फिर सबका मुझे ही कल्याण करना है, तब तो बाप को पुकारते हैं। तुम बाप को भूल जाते हो, बाप बच्चों को नहीं भूलते। बाप आते हैं पतितों को पावन बनाने। यह है गऊमुख। बाकी बैल आदि की बात नहीं। यह भाग्यशाली रथ है। बाबा तुम बच्चों को कहते हैं शिवबाबा हमको श्रृंगारते हैं। यह पक्का याद रहे। शिवबाबा को याद करने से बहुत फायदा है। बाबा हमें इनके द्वारा (ब्रह्मा द्वारा) पढ़ाते हैं, तो इनको नहीं याद करना है। सतगुरू एक शिवबाबा है, उस पर तुम्हें बलिहार जाना है। यह भी उन पर बलिहार गया ना। बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। बच्चे जाते हैं सतयुगी फूलों की दुनिया में, फिर काँटों में मोह क्यों होना चाहिए। 63 जन्म तो भक्ति मार्ग के शास्त्र पढ़ते पूजा करते आये हो। तुमने पूजा भी पहले शिवबाबा की की है, तब तो सोमनाथ का मन्दिर बनाया है। मन्दिर तो सभी राजाओं के घर में थे, कितने हीरे जवाहर थे। पीछे आकर चढ़ाई की। एक मन्दिर से कितना सोना आदि ले गये। तुम ऐसे धनवान विश्व के मालिक बनते हो। यह धनवान थे, विश्व के मालिक थे परन्तु इनके राज्य को कितना समय हो गया है, कोई को पता नहीं है। बाप कहते हैं 5 हज़ार वर्ष हुए। 2500 वर्ष राज्य किया, बाकी 2500 वर्ष में इतने मठ पंथ आदि वृद्धि को पाते हैं।

तुम बच्चों को बहुत खुशी होनी चाहिए कि हमको बेहद का बाप पढ़ाते हैं। अथाह मिलकियत मिलती है। दिखाते हैं सागर से देवता निकले रत्नों की थालियाँ भरकर आये। अब तुमको ज्ञान रत्नों की थालियाँ भर भरकर मिलती हैं। बाप तो ज्ञान का सागर है। कोई अच्छी रीति थाली भरते हैं, कोई की बह जाती है। जो अच्छी रीति पढ़ेंगे, पढ़ायेंगे वह ज़रूर अच्छा धनवान बनेंगे। राजधानी स्थापन हो रही है। यह ड्रामा में नूँध है। जो अच्छी रीति पढ़ते हैं उनको ही स्कालरशिप मिलती है। यह है ईश्वरीय स्कॉलरशिप, अविनाशी। वह है विनाशी। सीढ़ी बड़ी वन्डरफुल है। 84 जन्मों की कहानी है ना। बाप कहते हैं सीढ़ी की इतनी बड़ी ट्रांसलाइट बनाओ जो दूर से बिल्कुल साफ दिखाई दे। मनुष्य देखकर वन्डर खायेंगे। फिर तुम्हारा नाम भी बाला होता जायेगा। अभी जो फेरी पहनकर (पा लगाकर) जाते हैं वह पिछाड़ी में आयेंगे। दो चार बार फेरी पहनी, तकदीर में होगा तो जम जायेंगे। शमा तो एक ही है, कहाँ जायेंगे। बच्चों को बहुत मीठा बनना है। मीठा तब बनेंगे जब योग में रहेंगे। योग से ही कशिश होगी। जब तक कट (जंक) नहीं निकली होगी तो किसको कशिश भी नहीं होगी। यह सीढ़ी का राज़ सब आत्माओं को बताना है। धीरे-धीरे नम्बरवार सब जानते जायेंगे। यह है ड्रामा। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होती रहती है। जिसने यह समझाया, उसको याद करना चाहिए ना। बाप को ओमनी प्रेजन्ट कहते हैं लेकिन वहाँ तो ओमनी प्रेजन्ट है माया, यहाँ है बाप क्योंकि सेकेण्ड में आ सकता है। तुमको समझना चाहिए कि बाबा इसमें बैठा ही है। करन-करावनहार है ना। करता भी है, कराता भी है, बच्चों को डायरेक्शन देते हैं। खुद भी करते रहते हैं। क्या कर सकते हैं, क्या नहीं कर सकते हैं – इस शरीर में, वह हिसाब करो। बाबा खाते नहीं वासना लेते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) रूप-बसन्त बन अपनी बुद्धि रूपी झोली अविनाशी ज्ञान रत्नों से सदा भरपूर रखनी है। बुद्धि रूपी झोली में कोई छेद न हो। ज्ञान रत्न धारण कर दूसरों को दान करना है।

2) स्कालरशिप लेने के लिए पढ़ाई अच्छी तरह पढ़नी है। पूरा वनवाह में रहना है। किसी भी प्रकार का शौक नहीं रखना है। खुशबूदार फूल बनकर दूसरों को बनाना है।

वरदान:- शुभचिंतक स्थिति द्वारा सर्व का सहयोग प्राप्त करने वाले सर्व के स्नेही भव
शुभचिंतक आत्माओं के प्रति हर एक के दिल में स्नेह उत्पन्न होता है और वह स्नेह ही सहयोगी बना देता है। जहाँ स्नेह होता है, वहाँ समय, सम्पत्ति, सहयोग सदा न्यौछावर करने के लिए तैयार हो जाते हैं। तो शुभचिंतक, स्नेही बनायेगा और स्नेह सब प्रकार के सहयोग में न्यौछावर बनायेगा इसलिए सदा शुभचिंतन से सम्पन्न रहो और शुभचिंतक बन सर्व को स्नेही, सहयोगी बनाओ।
स्लोगन:- इस समय दाता बनो तो आपके राज्य में जन्म-जन्म हर आत्मा भरपूर रहेगी।

सूचना

यह अव्यक्ति मास हम सभी ब्रह्मा वत्सों के लिए विशेष वरदानी मास है, इसमें हम अन्तर्मुखी बन साकार ब्रह्मा बाप के समान बनने का लक्ष्य रख तीव्र पुरुषार्थ करते हैं, इसके लिए इस जनवरी मास में रोज़ की मुरली के नीचे विशेष पुरुषार्थ की एक प्वाइंट लिख रहे हैं, कृपया सभी इसी अनुसार अटेन्शन रख पूरा दिन इस पर मनन चिंतन करते अव्यक्त वतन की सैर करें

ब्रह्मा बाप समान बनने के लिए विशेष पुरुषार्थ

समय प्रमाण तीन शब्द सदा याद रखो – अन्तर्मुख, अव्यक्त और अलौकिक, अभी तक कुछ लौकिकपन मिक्स है लेकिन जब बिल्कुल अलौकिक अन्तर्मुखी बन जायेंगे तो अव्यक्त फरिश्ते नज़र आयेंगे। रूहानी वा अलौकिक स्थिति में रहने के लिए अन्तर्मुखी बनो।

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