daily gyan murli 5 january 2019

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 5 JANUARY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 5 January 2020

05-01-20
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 30-03-85 मधुबन

तीन-तीन बातों का पाठ

आज बापदादा अपने सदा के साथी बच्चों से मिलने आये हैं। बच्चे ही बाप के सदा साथी हैं, सहयोगी हैं, क्योंकि अति स्नेही हैं। जहाँ स्नेह होता है उसके ही सदा सहयोगी साथी बनते हैं। तो स्नेही बच्चे होने कारण बाप बच्चों के बिना कोई कार्य कर नहीं सकते। और बच्चे बाप के सिवाए कोई कार्य कर नहीं सकते। इसलिए स्थापना के आदि से बाप ने ब्रह्मा के साथ ब्राह्मण बच्चे रचे। अकेला ब्रह्मा नहीं। ब्रह्मा के साथ ब्राह्मण बच्चे भी पैदा हुए। क्यों? बच्चे सहयोगी साथी हैं इसलिए जब बाप की जयन्ती मनाते हो तो साथ में क्या कहते हो? शिव जयन्ती सो ब्रह्मा की जयन्ती, ब्राह्मणों की जयन्ती। तो साथ-साथ बापदादा और बच्चे सभी की आदि रचना हुई और आदि से ही बाप के सहयोगी साथी बने। तो बाप अपने सहयोगी साथियों से मिल रहे हैं। साथी अर्थात् हर कदम में, हर संकल्प में, बोल में साथ निभाने वाले। फालो करना अर्थात् साथ निभाना। ऐसे हर कदम में साथ निभाने वाले अर्थात् फालो फादर करने वाले सच्चे साथी हैं। अविनाशी साथी हैं। जो सच्चे साथी हैं उन्हों का हर एक कदम स्वत: ही बाप समान चलता रहता है। यहाँ वहाँ हो नहीं सकता। सच्चे साथी को मेहनत नहीं करनी पड़ती। यह कदम ऐसे उठाऊं वा वैसे उठाऊं। स्वत: ही बाप के कदम ऊपर कदम रखने के सिवाए जरा भी यहाँ वहाँ हो नहीं सकता। ऐसे सच्चे साथी बच्चों के मन में, बुद्धि में, दिल में क्या समाया हुआ है? मैं बाप का, बाप मेरा। बुद्धि में है जो बाप का बेहद के खजानों का वर्सा है वह मेरा। दिल में दिलाराम और दिल, और कुछ हो नहीं सकता। तो जब बाप ही याद रूप में समाया हुआ है तो जैसी स्मृति वैसी स्थिति और वैसे ही कर्म स्वत: ही होते हैं। जैसे भक्ति मार्ग में भी भक्त निश्चय दिखाने के लिए यही कहते हैं कि देखो हमारे दिल में कौन है! आप कहते नहीं हो लेकिन स्वत: ही आपके दिल से दिलाराम ही सभी को अनुभव होता अर्थात् दिखाई देता है। तो सच्चे साथी हर कदम में बाप समान मास्टर सर्वशक्तिवान हैं।

आज बापदादा बच्चों को बधाई देने आये हैं। सभी सहयोगी साथी बच्चे अपने-अपने उमंग उत्साह से याद में, सेवा में आगे बढ़ते जा रहे हैं। हरेक के मन में एक ही दृढ़ संकल्प है कि विजय का झण्डा लहराना ही है। सारे विश्व में एक रूहानी बाप की प्रत्यक्षता का झण्डा लहरने वाला ही है। जिस ऊंचे झण्डे के नीचे सारे विश्व की आत्मायें यह गीत गायेंगी कि एक बाप आ गया। जैसे अभी आप लोग झण्डा लहराते हो तो सभी झण्डे के नीचे गीत गाते हो और फिर क्या होता है! झण्डा लहराने से सभी के ऊपर फूलों की वर्षा होती है। ऐसे सभी की दिल से यह गीत स्वत: ही निकलेगा। सर्व का एक बाप। गति सद्गति दाता एक बाप। ऐसे गीत गाते ही अविनाशी सुख शान्ति का वर्सा, पुष्पों की वर्षा समान अनुभव करेंगे। बाप कहा और वर्से का अनुभव किया। तो सबके मन में यह एक ही उमंग उत्साह है इसलिए बापदादा बच्चों के उमंग उत्साह पर बच्चों को बधाई देते हैं। विदाई तो नहीं देंगे ना। बधाई। संगमयुग का हर समय बधाई का समय है। तो मन की लगन पर, सेवा की लगन पर बापदादा सभी बच्चों को बधाई दे रहे हैं। सेवा में सदा आगे बढ़ने का सभी का उमंग है। ऐसा कोई नहीं होगा जिसको सेवा में आगे बढ़ने का उमंग न हो। अगर उमंग नहीं होता तो यहाँ कैसे आते! यह भी उमंग की निशानी है ना! उमंग-उत्साह है और सदा रहेगा। साथ-साथ उमंग-उत्साह से आगे बढ़ते हुए सेवा में सदा निर्विघ्न हैं? उमंग उत्साह तो बहुत अच्छा है, लेकिन निर्विघ्न सेवा और विघ्न पार करते-करते सेवा करना, इसमें अन्तर है। निर्विघ्न अर्थात् न किसी के लिए विघ्न रूप बनते और न किसी विघ्न स्वरूप से घबराते। यह विशेषता उमंग-उत्साह के साथ-साथ अनुभव करते हो? या विघ्न आते हैं? एक हैं विघ्न पाठ पढ़ाने आते, दूसरा है विघ्न हिलाने आते हैं। अगर पाठ पढ़कर पक्के हो गये तो वह विघ्न लगन में परिवर्तन हो जाते। अगर विघ्न में घबरा जाते हैं तो रजिस्टर में दाग पड़ जाता है। फर्क हुआ ना।

ब्राह्मण बनना माना माया को चैलेन्ज करना है कि विघ्न भले आओ। हम विजयी हैं। तुम कुछ कर नहीं सकते। पहले माया के फ्रेन्ड्स थे। अब चैलेन्ज करते हो कि मायाजीत बनेंगे। चैलेन्ज करते हो ना। नहीं तो विजयी किस पर बनते हो? अपने ऊपर? विजयी रत्न बनते हो तो विजय माया पर ही प्राप्त करते हो ना! विजय माला में पिराये जाते हो, पूजे जाते हो। तो मायाजीत बनना अर्थात् विजयी बनना है। ब्राह्मण बनना अर्थात् माया को चैलेन्ज करना। चैलेन्ज करने वाले खेल करते हैं। आया और गया। दूर से ही जान लेते हैं, दूर से ही भगा देते हैं। टाइम वेस्ट नहीं करते हैं। सेवा में तो सभी बहुत अच्छे हो। सेवा के साथ-साथ निर्विघ्न सेवा का रिकार्ड हो। जैसे पवित्रता का आदि से रिकार्ड रखते हो ना। ऐसा कौन है जो संकल्प में भी आदि से अब तक अपवित्र नहीं बना है? तो यह विशेषता देखते हो ना। सिर्फ इस एक पवित्रता की बात से पास विथ आनर तो नहीं होंगे। लेकिन सेवा में, स्व स्थिति में, सम्पर्क, सम्बन्ध में, याद में, सभी में जो आदि से अब तक अचल हैं, हलचल में नहीं आये हैं, विघ्नों के वशीभूत नहीं हुए हैं। सुनाया ना कि न विघ्नों के वश होना है न स्वयं किसके आगे विघ्न रूप बनना है। इसकी भी मार्क्स जमा होती हैं। एक प्युरिटी, दूसरा अव्यभिचारी याद। याद के बीच में जरा भी कोई विघ्न न हो। इसी रीति से सेवा में सदा निर्विघ्न हो और गुणों में सदा सन्तुष्ट हो और सन्तुष्ट करने वाले हो। सन्तुष्टता का गुण सभी गुणों की धारणा का दर्पण है। तो गुणों में सन्तुष्टता का स्व प्रति और दूसरों से सर्टीफिकेट लेना होता। यह है पास विथ आनर की निशानी, अष्ट रत्नों की निशानी। सबमें नम्बर लेने वाले हो ना कि बस एक में ही ठीक हैं। सेवा में अच्छा हूँ। बधाई तो बापदादा दे ही रहे हैं। अष्ट बनना है, इष्ट बनना है। अष्ट बनेंगे तो इष्ट भी इतना ही महान बनेंगे। उसके लिए तीन बातें सारा वर्ष याद रखना और चेक करना। और यह तीनों ही बातें अगर जरा भी संकल्प मात्र में रही हुई हों तो विदाई दे देना। आज बधाई का दिन है ना। जब छुट्टी देते हो तो विदाई में क्या करते हो? (मिश्री, बादामी, इलायची देते हैं) उसमें तीन चीजें होती हैं। तो बापदादा को भी तीन चीजें देंगे ना। विदाई नहीं बधाई है तब तो मुख मीठा कराते हो। तो जैसे यहाँ तीन चीजें किसलिए देते हो? फिर जल्दी आने की याद रहेगी। बापदादा भी आज तीन बातें बता रहे हैं, जो सेवा में कभी-कभी विघ्न रूप भी बन जाती हैं। तो तीन बातों के ऊपर विशेष फिर से बापदादा अटेन्शन दिला रहे हैं, जिस अटेन्शन से स्वत: ही पास विद आनर बन ही जायेंगे।

एक बात- किसी भी प्रकार का हद का लगाव न हो। बाप का लगाव और चीज है लेकिन हद का लगाव न हो। दूसरा- किसी भी प्रकार का स्वयं का स्वयं से वा किसी दूसरे से तनाव अर्थात् खींचातान नहीं हो। लगाव नहीं हो, माया से युद्ध के बजाए आपस में खींचातान न हो। तीसरा- किसी भी प्रकार का कमजोर स्वभाव न हो। लगाव, तनाव और कमजोर स्वभाव। वास्तव में स्वभाव शब्द बहुत अच्छा है। स्वभाव अर्थात् स्व का भाव। स्व श्रेष्ठ को कहा जाता है। श्रेष्ठ भाव है, स्व का भाव है, आत्म-अभिमान है। लेकिन भाव-स्वभाव, भाव-स्वभाव शब्द बहुत बोलते हो ना। तो यह कमजोर स्वभाव है। जो समय प्रति समय उड़ती कला में विघ्न रूप बन जाता है। जिसको आप लोग रॉयल रूप में कहते हो मेरी नेचर ऐसी है। नेचर श्रेष्ठ है तो बाप समान हैं। विघ्न रूप बनती है तो कमजोर स्वभाव है। तो तीनों शब्दों का अर्थ जानते हो ना। कई प्रकार के तनाव हैं, तनाव का कारण है “ मैं-पन”। मैंने यह किया। मैं यह कर सकती हूँ! मैं ही करूँगा! यह जो मैं-पन है, यह तनाव पैदा करता है। “मैं” यह देह-अभिमान का है। एक है मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ। एक है मैं फलानी हूँ, मैं समझदार हूँ, मैं योगी हूँ, मैं ज्ञानी हूँ। मैं सेवा में नम्बर आगे हूँ। यह मैं-पन तनाव पैदा करता है। इसी कारण सेवा में कहाँ-कहाँ जो तीव्रगति होनी चाहिए वह तीव्र के बजाए धीमी गति हो जाती है। चलते रहते हैं लेकिन स्पीड नहीं हो सकती। स्पीड तीव्र करने का आधार है-दूसरे को आगे बढ़ता हुआ देख सदा दूसरे को बढ़ाना ही अपना बढ़ना है। समझते हो ना सेवा में क्या मैं-पन आता है? यह मैं-पन ही तीव्रगति को समाप्त कर देता है। समझा!

यह तीन बातें तो देंगे ना कि फिर साथ में ले जायेंगे। इसको कहा जाता है त्याग से मिला हुआ भाग्य। सदा बांटके खाओ और बढ़ाओ। यह त्याग का भाग्य मिला है। सेवा का साधन यह त्याग का भाग्य है। लेकिन इस भाग्य को मैं-पन में सीमित रखेंगे तो बढ़ेगा नहीं। सदा त्याग के भाग्य के फल को औरों को भी सहयोगी बनाए बांटके आगे बढ़ो। सिर्फ मैं, मैं नहीं करो, आप भी खाओ। बांटकर एक दो में हाथ मिलाते हुए आगे बढ़ो। अभी सेवा के बीच में यह वायब्रेशन दिखाई देते हैं। तो इसमें फराखदिल हो जाओ। इसको कहते हैं जो ओटे सो अर्जुन। एक दो को नहीं देखो। यह भी तो ऐसे करते हैं ना! यह तो होता ही है, लेकिन मैं विशेषता दिखाने के लिए निमित्त बन जाऊं। ब्रह्मा बाप की विशेषता क्या रही! सदा बच्चों को आगे रखा। मेरे से बच्चे होशियार हैं। बच्चे करेंगे! इतने तक त्याग के भाग्य का त्याग किया। अगर कोई प्यार के कारण, प्राप्ति के कारण ब्रह्मा की महिमा करते थे तो उसको भी बाप की याद दिलाते थे। ब्रह्मा से वर्सा नहीं मिलेगा। ब्रह्मा का फोटो नहीं रखना है। ब्रह्मा को सब कुछ नहीं समझना। तो इसको कहा है त्याग के भाग्य का भी त्याग कर सेवा में लग जाना। इसमें डबल महादानी हो जाते। दूसरा आफर करे, स्वयं अपनी तरफ न खींचे। अगर स्वयं अपनी महिमा करते, अपनी तरफ खींचते हैं तो उसको क्या शब्द कहते हैं! मुरलियों में सुना है ना। ऐसा नहीं बनना। कोई भी बात को स्वयं अपनी तरफ खींचने की खैंचातान कभी नहीं करो। सहज मिले वह श्रेष्ठ भाग्य है। खींच के लेने वाला इसको श्रेष्ठ भाग्य नहीं कहेंगे। उसमें सिद्धि नहीं होती। मेहनत ज्यादा सफलता कम क्योंकि सभी की आशीर्वाद नहीं मिलती है। जो सहज मिलता है उसमें सभी की आशीर्वाद भरी हुई है। समझा!

तनाव क्या है! लगाव को तो उस दिन स्पष्ट किया था। कोई भी कमजोर स्वभाव न हो। ऐसे भी नहीं समझो मैं तो इस देश का रहने वाला हूँ इसलिए मेरा स्वभाव, मेरा चलना, मेरा रहना ऐसा है, नहीं। देश के कारण, धर्म के कारण, संग के कारण ऐसा मेरा स्वभाव है। यह नहीं। आप कौन से देश वाले हो! यह तो सेवा के लिए निमित्त स्थान मिले हैं। न कोई विदेशी है, न यह नशा हो कि मैं भारतवासी हूँ। सभी एक बाप के हैं। भारतवासी भी ब्राह्मण आत्मायें हैं। विदेश में रहने वाले भी ब्राह्मण आत्मायें हैं। अन्तर नहीं है। ऐसे नहीं भारतवासी ऐसे हैं, विदेशी ऐसे हैं। यह शब्द भी कभी नहीं बोलो। सब ब्राह्मण आत्मायें हैं। यह तो सेवा के लिए स्थान है। सुनाया था ना कि आप विदेश में क्यों पहुँचे हो? वहाँ क्यों जन्म लिया? भारत में क्यों नहीं लिया? वहाँ गये हो सेवा स्थान खोलने के लिए। नहीं तो भारतवासियों को वीसा का कितना प्राबलम है। आप सब तो सहज रहे पड़े हो। कितने देशों में सेवा हो रही है! तो सेवा के लिए विदेश में गये हो। बाकी हो सभी ब्राह्मण आत्मायें इसलिए कोई भी किसी आधार में स्वभाव नहीं बनाना। जो बाप का स्वभाव वह बच्चों का स्वभाव। बाप का स्वभाव क्या है? सदा हर आत्मा के प्रति कल्याण वा रहम की भावना का स्वभाव। हर एक को ऊंचा उठाने का स्वभाव, मधुरता का स्वभाव, निर्माणता का स्वभाव। मेरा स्वभाव ऐसा है यह कभी नहीं बोलना। मेरा कहाँ से आया। मेरा तेज़ बोलने का स्वभाव है, मेरा आवेश में आने का स्वभाव है। स्वभाव के कारण हो जाता है। यह माया है। कईयों का अभिमान का स्वभाव, ईर्ष्या का, आवेश में आने का स्वभाव होता है, दिलशिकस्त होने का स्वभाव होता है। अच्छा होते भी अपने को अच्छा नहीं समझते। सदैव अपने को कमजोर ही समझेंगे। मैं आगे जा नहीं सकती। कर नहीं सकती। यह दिलशिकस्त स्वभाव यह भी रांग है। अभिमान में नहीं आओ। लेकिन स्वमान में रहो तो इसी प्रकार के स्वभाव को कहा जाता है कमजोर स्वभाव। तो तीनों बातों का अटेन्शन सारा वर्ष रखना। इन तीनों बातों से सेफ रहना है। मुश्किल तो नहीं है ना। साथी आदि से अन्त तक सहयोगी साथी है। साथी तो समान चाहिए ना। अगर साथियों में समानता नहीं होगी तो साथी प्रीत की रीति निभा नहीं सकते। अच्छा यह तो 3 बातें अटेन्शन में रखेंगे। लेकिन इन तीन बातों से सदा किनारा करने के लिए और 3 बातें याद रखनी हैं। आज तीन का पाठ पढ़ा रहे हैं। सदा अपने जीवन में एक बैलेन्स रखना है। सब बातों में बैलेन्स हो। याद और सेवा में बैलेन्स। स्वमान, अभिमान को समाप्त करता। स्वमान में स्थित रहना। यह सब बातें स्मृति में रहें। ज्यादा रमणीक भी नहीं, ज्यादा गम्भीर भी नहीं, बैलेन्स हो। समय पर रमणीक, समय पर गम्भीर। तो एक है – बैलेन्स। दूसरा – सदा अमृतवेले बाप से विशेष ब्लैसिंग लेनी है! रोज़ अमृतवेले बापदादा बच्चों प्रति ब्लैसिंग की झोली खोलते हैं। उससे जितना लेने चाहो उतना ले सकते हो। तो बैलेन्स, ब्लैसिंग तीसरा ब्लिसफुल लाइफ।। तीनों बातें स्मृति में रहने से वह तीनों बातें जो अटेन्शन देने की हैं, वह स्वत: ही समाप्त हो जायेंगी। समझा! अच्छा और तीन बातें सुनो!

लक्ष्य रूप में वा धारणा के रूप में विशेष तीन बातें ध्यान में रखनी हैं। वह छोड़नी हैं और वह धारण करनी है। छोड़ने वाली तो छोड़ दी ना सदा के लिए, उसको याद करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन यह तीन बातें जो सुनाई यह स्मृति में रखना और धारणा स्वरूप में विशेष याद रखना। एक – सब बातों में रीयल्टी हो, मिक्स नहीं। इसको कहते हैं – रीयल्टी। संकल्प में, बोल में, सब बात में रीयल। सच्ची दिल पर साहेब राज़ी। सच की निशानी क्या होगी? सच तो बिठो नच। जो सच्चा होगा वह सदा खुशी में नाचता रहेगा। तो एक रीयल्टी, दूसरा – रॉयल्टी। छोटी-छोटी बात में कभी भी बुद्धि झुकाव में न आये। जैसे रॉयल बच्चे होते हैं तो उन्हों की कब छोटी-सी चीज़ पर नज़र नहीं जायेगी। अगर नज़र गई तो उसको रॉयल नहीं कहा जाता। किसी भी छोटी-छोटी बातों में बुद्धि का झुकाव हो जाए तो उसको रॉयल्टी नहीं कहा जाता। जो रॉयल होता है वह सदा प्राप्ति स्वरूप होता है। कहाँ ऑख वा बुद्धि नहीं जाती। तो यह है रूहानी रॉयल्टी। कपड़ों की रॉयल्टी नहीं। तो रीयल्टी, रॉयल्टी और तीसरा युनिटी। हर बात में, संकल्प में, बोल में, कर्म में भी सदा एक दो में युनिटी दिखाई दे। ब्राह्मण माना ही एक। लाख नहीं, एक। इसको कहा जाता है युनिटी। वहाँ अनेक स्थिति के कारण एक भी अनेक हो जाते और यहाँ अनेक होते भी एक हैं। इसको कहा जाता है युनिटी। दूसरे को नहीं देखना है। हम चाहते हैं युनिटी करें लेकिन यह नहीं करते हैं। अगर आप करते रहेंगे तो उसको डिसयुनिटी का चांस ही नहीं मिलेगा। कोई हाथ ऐसे करता, दूसरा न करे तो आवाज नहीं होगा। अगर कोई डिसयुनिटी का कोई भी कार्य करता है, आप युनिटी में रहो तो डिसयुनिटी वाले कब डिसयुनिटी का काम कर नहीं सकेंगे। युनिटी में आना ही पड़ेगा इसलिए तीन बातें – रीयल्टी, रॉयल्टी और युनिटी। यह तीनों ही बातें सदा बाप समान बनने में सहयोगी बनेंगी। समझा – आज तीन का पाठ पढ़ लिया ना। बाप को तो बच्चों पर नाज़ है। इतने योग्य बच्चे और योगी बच्चे किसी बाप के हो ही नहीं सकते। योग्य भी हो, योगी भी हो और एक-एक पदमापदम भाग्यवान हो। सारे कल्प में इतने और ऐसे बच्चे हो ही नहीं सकते। इसलिए विशेष अमृतवेले का टाइम बापदादा ने ब्राह्मण बच्चों के लिए क्यों रखा है? क्योंकि विशेष बापदादा हर बच्चे की विशेषता को, सेवा को, गुणों को सदा सामने लाते हैं। और क्या करते हैं? जो हर बच्चे की विशेषता है, गुण है, सेवा है, उसको विशेष वरदान से अविनाशी बनाते हैं इसलिए खास यह समय बच्चों के लिए रखा है। अमृतवेले की विशेष पालना है। हर एक को बापदादा स्नेह के सहयोग की, वरदान की पालना देते हैं। समझा – क्या करते हैं और आप लोग क्या करते हो? शिवबाबा सुखदाता है, शान्ति दाता है… ऐसे कहते हो ना। और बाप पालना देते हैं। जैसे माँ बाप बच्चों को सवेरे तैयार करते, साफ सुथरा करके फिर कहते अब सारा दिन खाओ पियो पढ़ो। बापदादा भी अमृतवेले यह पालना देते अर्थात् सारे दिन के लिए शक्ति भर देते हैं। विशेष पालना का यह समय है। यह एकस्ट्रा वरदान का, पालना का समय है। अमृतवेले वरदानों की झोली खुलती है। जितना जो वरदान लेने चाहे सच्ची दिल से, मतलब से नहीं। जब मतलब होगा तब कहेंगे हमको यह दो, जो मतलब से मांगता है तो बापदादा क्या करते हैं! उनका मतलब सिद्ध करने के लिए उतनी शक्ति देता है, मतलब पूरा हुआ और खत्म। फिर भी बच्चे हैं, ना तो नहीं करेंगे। लेकिन सदा ही वरदानों से पलते रहो, चलते रहो, उड़ते रहो उसके लिए जितना अमृतवेला शक्तिशाली बनायेंगे उतना सारा दिन सहज होगा। समझा।

सदा स्वयं को पास विद आनर बनने के लक्ष्य और लक्षण में चलाने वाले, सदा स्वयं को ब्रह्मा बाप समान त्याग का भाग्य बांटने वाले, नम्बरवन त्यागी श्रेष्ठ भाग्य बनाने वाले, सदा सहज प्राप्ति के अधिकारी बन स्व उन्नति और सेवा की उन्नति करने वाले, सदा हर कदम में सहयोगी, साथी बन आगे बढ़ने वाले, स्मृति, स्थिति शक्तिशाली बनाने से सदा बाप को फालो करने वाले, ऐसे सदा सहयोगी साथी, फरमानबरदार, आज्ञाकारी, सन्तुष्ट रहने वाले, सर्व को राजी करने के राज़ को जानने वाले, ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं को, महान पुण्य आत्माओं को, डबल महादानी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

वरदान:- मन्सा बन्धनों से मुक्त, अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति करने वाले मुक्ति दाता भव
अतीन्द्रिय सुख में झूलना-यह संगमयुगी ब्राह्मणों की विशेषता है। लेकिन मन्सा संकल्पों के बंधन आन्तरिक खुशी वा अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करने नहीं देते। व्यर्थ संकल्पों, ईर्ष्या, अलबेलेपन वा आलस्य के संकल्पों के बंधन में बंधना ही मन्सा बंधन है, ऐसी आत्मा अभिमान के वश दूसरों का ही दोष सोचती रहती है, उनकी महसूसता शक्ति समाप्त हो जाती है इसलिए इस सूक्ष्म बंधन से मुक्त बनो तब मुक्ति दाता बन सकेंगे।
स्लोगन:- ऐसा खुशियों की खान से सम्पन्न रहो जो आपके पास दु:ख की लहर भी न आये।

 

अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क

आपके सामने कोई कितना भी व्यर्थ बोले लेकिन आप व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन कर दो। व्यर्थ को अपनी बुद्धि में स्वीकार नहीं करो। अगर एक भी व्यर्थ बोल स्वीकार कर लिया तो एक व्यर्थ अनेक व्यर्थ को जन्म देगा। अपने बोल पर भी पूरा ध्यान दो, “कम बोलो, धीरे बोलो और मीठा बोलो” तो अव्यक्त स्थिति सहज बन जायेगी।

TODAY MURLI 5 JANUARY 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 5 January 2020

05/01/20
Madhuban
Avyakt BapDada
Om Shanti
30/03/85

The lesson of threes.

Today, BapDada has come to meet His children who are His constant companions. It is only because they are extremely loving that the children are constant companions and co-operative with the Father. Where there is love, you become constantly co-operative companions of the one you love. So, because the children are loving, the Father cannot carry out any task without the children and the children cannot carry out any task without the Father. This is why, from the beginning of establishment, along with with creating Brahma, the Father also created Brahmins. He didn’t create Brahma alone; along with Brahma, the Brahmin children were also created. Why? You children are co-operative companions and so what happens at the same time as the celebration of the Father’s birthday? The birthday of Shiva is also the birthday of Brahma and the birthday of Brahmins. So, BapDada and the children are all together the original creation and you therefore became the co-operative companions of the Father from the beginning. So, today, Baba is meeting His co-operative companions. A companion is someone who fulfils the responsibility of companionship at every step, with every thought and every word. To follow means to fulfil the responsibility of companionship. Those who fulfil the responsibility of companionship at every step, that is, those who follow the Father are true companions; they are eternal companions. Every step of those who are true companions is automatically like those of the Father. There cannot be any upheaval in them. True companions do not need to make effort over whether they should take a step in this way or that way. By placing your steps in the footsteps of the Father, you automatically cannot place your steps anywhere else. What is merged in the minds, intellects and hearts of the children who are true companions? I belong to the Father and the Father belongs to me. In your intellects you are aware that: Whatever is the inheritance of the Father’s unlimited treasures is mine. In your hearts, there is just the Comforter of Hearts. There cannot be anything else – just the heart and the Comforter of Hearts. So, since the Father is merged in your remembrance, then, as is your awareness, so is your stage, and your actions are automatically according to that. On the path of devotion, in order to show their faith, devotees say: Look who I have in my heart! You don’t say that, but everyone automatically experiences, that is, sees, the Comforter of Hearts through your hearts. So, true companions are master almighty authorities like the Father.

Today, BapDada has come to congratulate you children. Now, you children who are co-operative companions, through your own zeal and enthusiasm, are continuing to move forward in remembrance and service. In each one’s mind is the one determined thought: The flag of victory has to be hoisted. The flag of revelation of the one spiritual Father is to be hoisted throughout the whole world. Under this high flag, souls of the whole world will sing the song that the Father has come. When you hoist the flag now, all of you also stand under the flag and sing songs, and what happens then? When the flag is hoisted, everyone is showered with flowers. In the same way, this song will automatically emerge in everyone’s heart: The Father of all is One. The Bestower of Liberation and Salvation is the one Father. When you sing such songs, you will experience the shower of imperishable peace and happiness like a shower of flowers. As soon as you say “Father” you experience the inheritance. So, all of you have this one zeal and enthusiasm in your minds. This is why, seeing the zeal and enthusiasm in the hearts of you children, BapDada congratulates you (vadhaai). He would not bid you farewell (bidaai). Congratulations! Every moment of the confluence age is a time for congratulations. So, BapDada congratulates each of you children for the love in your heart and for your love of service. All of you have the enthusiasm to move constantly forward in service. There wouldn’t be anyone who doesn’t have enthusiasm to move forward in service. If you didn’t have zeal and enthusiasm, how would you have come here? This too is a sign of enthusiasm. You have zeal and enthusiasm and it will remain all the time. Whilst moving forward together, with zeal and enthusiasm, are you all constantly free from obstacles? Zeal and enthusiasm is very good, but there is a difference between doing service free from obstacles and doing service in which you are constantly overcoming obstacles. To be free from obstacles means that you neither become an obstacle for others nor become afraid of any type of obstacle. Do you experience this speciality along with zeal and enthusiasm? Or, do you have obstacles? One is when obstacles come to teach you a lesson. The other is when obstacles come to shake you. If you have learnt your lesson and become firm, that obstacle will then be transformed into love. If you become afraid of the obstacle, then the register gets marked with a stain. So, there is a difference.

To be a Brahmin means to challenge Maya: Just let the obstacles come! I am victorious. You cannot do anything. Previously you were friendsof Maya. Now you issue a challenge and say that you will become conquerors of Maya. You issue this challenge, do you not? Otherwise, over whom do you become victorious? Over yourselves? When you become victorious jewels, it is because you attain victory over Maya, is it not? You become threaded in the rosary of victory and you are worshipped. So, to become a conqueror of Maya means to be victorious. To become a Brahmin means to challenge Maya. However, those who challenge her experience it to be a game; so that she comes and goes. You are able to recognize her from a distance and chase her away from a distance. You do not waste your time. All of you are very good at doing service. Along with doing service, let there be a record of doing service free from obstacles. You keep a record of purity from the beginning. Who is it who hasn’t become impure even in thoughts from the beginning until now? You look for this speciality, do you not? None will pass with honoursin just this one aspect of purity, so you look to see who has been unshakable, who hasn’t experienced any type of upheaval and hasn’t been influenced by any obstacles in service, in their own stage, in their connections and relationships, and in remembrance. You were told that you must neither be influenced by obstacles nor become an obstacle for others. Marks are accumulated on the basis of this too. One is purity and the other is unadulterated remembrance. Let there not be the slightest obstacle in your remembrance. In this way, always keep yourself free from obstacles in service, be content with your virtues and make others content. The virtue of contentment is a mirror for imbibing all virtues. So, in your virtues, you have to receive a certificate of contentment from yourself and also from others. This is a sign of passing with honours, a sign of being one of the eight jewels. You are those who will claim a number in everything; you are not those who are fine in just one subject, are you – that I am ok in service? Of course BapDada is giving congratulations. You have to become part of the eight and one of the specially beloved deities. If you become one of the eight, you will also become just as great in being one of the specially beloved deities. For this, remember three things throughout the whole year and check yourselves. If any of these three things still remain in you, even in your thoughts, then bid farewell to them. Today is the day for congratulations. When you take leave, what do you do at the time of taking leave? (Go soon, come soon toli – sugar cubes, almonds and cardamom seeds are given.) There are three things. So, you will also give three things to BapDada, will you not? It isn’t farewell, but congratulations and this is why your mouths are sweetened. So, what are the three things here given for? So that you remember to come back soon. Today, BapDada is also going to tell you about three things which sometimes become an obstacle in service. So, BapDada is especially drawing your attention to three things once again and, by paying attention to these, you will automatically pass with honours.

  • Let there be no type of attachment to anything limited. To have attachment to the Father is something else but let there not be any limited attachment.

Let there not be any type of tension with yourself or with others. Let there be no attachment. Instead of battling with Maya, let there not be any type of conflict with one another.

Let there not be any type of weak nature.

Attachment, tension and weak nature. In fact, the word nature (swabhav) is very good. “Swa bhav” means feelings of the self. The self is said to be elevated. There are elevated feelings, there are feelings of the self, there is soul consciousness. However, you use the words “bhav-swabhav” (conflict of feelings and nature) a lot. So that is a weak nature which, from time to time, becomes an obstacle to your flying stage. In royal words you say, “My nature is like that.” When your nature is elevated, it is like the Father’s. If it becomes an obstacle, then it is a weak nature. So, you know the meaning of all three words. There are many types of tension and the reason for tension is the consciousness of “I”. “I did this. I can do this. I alone will do this.” This consciousness of “I” creates tension. This “I” is body consciousness. One thing is, “I am an elevated soul”. Another is, “I am So-and-so. I am sensible. I am yogi, I am gyani. I am ahead in service.” This consciousness of “I” creates tension. This is why, in some cases, where there needs to be a fast speed in service, it becomes a slow speed. You continue to move, but you can’t speed up. The basis of speeding up is to help others move forward. To help them move forward constantly is to move forward yourself. You do understand what the consciousness of “I” is in service, do you not? It is this consciousness of “I” that finishes the fast speed. Do you understand?

You will give away these three things, will you not? Or, will you take them with you? This is called the fortune you have received by having renunciation. Constantly eat by sharing with everyone and increase it. You have received this fortune of renunciation. The facilities for service are the fortune of your renunciation. However, if you keep this fortune limited by having the consciousness of “I”, it won’t increase. Make others co-operative and constantly share the fruit of the fortune of renunciation with others and move forward. Don’t just say, “I, I”. Share it with others too. Share it with one another, work in harmony and continue to move forward. These vibrations are visible in the midst of service now. So, become generous-hearted in this. This is called: The one who takes the initiative is Arjuna. Do not look at one another. “This one also does this. This happens all the time.” Instead, “Let me become an instrument to show the specialities of others.” What was Father Brahma’s speciality? He always kept the children ahead. “The children are cleverer than me. The children will do this.” He had so much renunciation that he even renounced the fortune he received through his renunciation. If anyone praised Brahma because of the love they received or the attainment they had, he would remind them of the Father. You will not receive the inheritance from Brahma. You mustn’t keep a picture of Brahma. Do not consider Brahma to be everything. This is called renouncing the fortune received through renunciation and becoming engaged in service. By doing this you become doubly great donors. Secondly, let others offer themselves, let them not pull you. If you praise yourself and pull others to yourself, what would you call that? You have heard it in the murlis, have you not? Do not become like that. Never have a tug of war of pulling someone to yourself. Anything received easily is elevated fortune. To take something by pulling it to you is not called elevated fortune. There is no success in that. There would be greater effort and less success because you wouldn’t receive everyone’s blessings. Whatever you receive easily is filled with everyone’s blessings. Do you understand?

What is tension? Baba clarified about attachment the other day. Let there not be any type of weak nature. Do not think: I am a resident of this land and this is why my nature, my way of moving and living is like this; no. It is not that my nature is what it is because of the land, the religion or the company. Which land do you belong to? You have been given that place just in name for doing service. No one is a foreigner nor should anyone have the intoxication: I am a resident of Bharat. All of you belong to the one Father. The residents of Bharat are Brahmin souls and the residents abroad are also Brahmin souls. There is no difference. It is not that the people of Bharat are like this and the people abroad are like that. Never speak these words. All of you are Brahmin souls. Those places are just for service. You have been told why you went abroad, why you took birth there and why you didn’t take birth in Bharat. You went there to open service places. Otherwise, the people of Bharat would have so many problems with visas. All of you live there easily. Service is taking place in so many countries. So, you went abroad to do service. However, you are all Brahmin souls. Therefore, let none of you make your nature be dependent on anything. The Father’s nature is the children’s nature. What is the Father’s nature? His nature is constantly to have benevolent and merciful feelings for every soul. His nature is of uplifting everyone. It is a sweet nature, a nature of humility. Never say, “My nature is like that.” Where did “mine” come from? Speaking harshly is my nature. Being forceful is my nature. This happens because of my nature. This is Maya! Some have a nature of arrogance, jealousy or of becoming forceful. Some have a nature of being disheartened. Even though they may be good, they don’t consider themselves to be good. They would always consider themselves to be weak. “I cannot move forward. I cannot do this.” To have the nature of being disheartened is also wrong. Do not have arrogance, but keep your self-respect. So, those types of nature is called a weak nature. Therefore, pay attention to all these three things throughout the year. Remain safe from all these three things. It is not difficult, is it? Your Companion will be the co-operative Companion from the beginning till the end. A companion has to be equal. If there isn’t equality in the companions, the companions cannot fulfil the responsibility of love. OK, you will pay attention to these three things. However, in order to stay away from these three things constantly, remember three other things. Today, Baba is teaching you the lesson of threes. Constantly keep your balance in life. Let there be a balance in everything. The balance of remembrance and service. Self-respect finishes arrogance. Remain stable in your self-respect. Let all these things remain in your awareness. Not too entertaining, not too serious; let there be a balance. Be entertaining when you have to be entertaining and be serious when there is a need to be serious. So, first is balance. Secondly, always claim special blessings from the Father at amrit vela. Every day at amrit vela, BapDada opens His apron of blessings for you children. You can take as many as you want from that. So, balanceblessings and thirdly, a blissful life. By having these three things in your awareness, the three things you have to pay attention to will automatically end. Do you understand? Achcha, now listen to three other things.

You especially have to keep the aim and imbibe three other things. You have to renounce those and the others have to be imbibed. You have let go, for all time, of the things you have to let go of, have you not? You won’t even need to remember these but you do have to keep in your awareness the three things that Baba has told you about and especially remember them in order to become an embodiment of dharna too. 1. Let there be reality in everything, nothing mixed. This is called reality. To be real in your thoughts, words and everything. The Lord is pleased with an honest heart. What is the sign of truth? The soul dances when there is truth. Those who are honest will always continue to dance in happiness. So, one is reality, the next is royalty. Let your intellects not become subservient over trivial matters. The eyes of royal children are never drawn to little things. If their eyes are pulled, that is not called royal. If their intellects become subservient to little things, that is not called royalty. Those who are royal are always embodiments of attainment. Neither their eyes nor their intellects are ever pulled anywhere. So, this is spiritual royalty; not royalty of clothes (sartorial royalty). So, reality, royalty and thirdly, unity. Let unity be visible amongst you in every situation, in your thoughts, words and deeds. Brahmin means one; not one hundred thousand, but one. This is called unity. There, because of having many different stages, one becomes many, whereas here, whilst there are many, you become one. This is called unity. You mustn’t look at others. “I wish to be in unity, but this one isn’t becoming united.” If you continue to remain in unity, others won’t have a chance to become disunited. If one person raises his hand to clap and the other one doesn’t give his hand, there won’t be any sound. If someone does anything to bring about disunity, you just maintain your unityThen, those who have disunity will not be able to carry out any work of disunity. They will have to come into that unity. Therefore, remember the three things: reality, royalty and unity. All these three things will constantly co-operate with you in your becoming equal to the Father. Do you understand? Today, you have learnt the lesson of threes. The Father is proud of you children. No other Father can have such worthy and yogi children. You are worthy and you are also yogi, and each one of you is multimillion times fortunate. No one throughout the whole cycle could have so many children such as you. So, why has BapDada especially kept the time of amrit vela for you Brahmin children? Because, at that time, BapDada especially brings the speciality, the service and virtues of every child in front of Him. And what else does He do? He makes the speciality, virtues and service of every child imperishable by giving them a special blessing. This is why that time is especially kept for you children. That is the special sustenance of amrit vela. BapDada gives each one the sustenance of the blessing of love and co-operation. Do you understand what He does and what you do? Shiv Baba is the Bestower of Happiness and the Bestower of Peace. This is what you say, is it not? And the Father gives you sustenance. Just as parents get their children ready in the morning, they freshen them up and say: Now, go and eat, drink and study all day long, so BapDada also gives this sustenance at amrit vela, that is, He fills you with power for the whole day. This is the time for special sustenance. This is the time for extra blessings and sustenance. The apron of blessings opens at amrit vela. Any of you can take as many blessings as you want with an honest heart, not with selfish motives. When it is with selfish motives, you would say: Give me this! What does BapDada do when you ask with selfish motives? He gives you just that much power to fulfil your intentions. However, as soon as your intention is fulfilled, everything is finished. Nevertheless you are His children and so He would not say no. Therefore, constantly continue to be sustained with blessings. Continue to move along, continue to fly. For this, to the extent that you make your amrit vela powerful, to that extent your whole day will be easy. Do you understand?

To those who constantly keep themselves moving along with the aim and qualifications of those who are to pass with honours, to those who constantly share the elevated fortune they receive by having renunciation like Father Brahma, to the number one renunciates who make their fortune elevated, to those who easily claim a right to attainment and who make progress themselves and also make service progress, to those who constantly become co-operative companions at every step and move forward, to those who make their awareness and stage powerful and who constantly follow the Father, to such co-operative companions who obey orders, to the obedient children who remain content, to those who know the secrets of making everyone happy, to such elevated souls, to such great charitable souls, to the doubly great donor children, BapDada’s love, remembrance and namaste.

Blessing: May you experience supersensuous joy by remaining free from any bondage of the mind and become a bestower of liberation.
To swing in supersensuous joy is the speciality of the confluence-aged Brahmins. However, any bondage of thoughts in your mind will not allow you to experience inner happiness or supersensuous joy. To be tied by some bondage of waste thoughts, jealousy, carelessness or thought of laziness is a bondage of the mind. Out of ego, such souls will always continue to think of blaming others. Their power of realization finishes and this is why they have to be liberated from these subtle bondages for only then will they be able to become bestowers of liberation.
Slogan: Let your mine of happiness remain so full that no waves of sorrow can come to you.

 

*** Om Shanti ***

Special homework to experience the avyakt stage in this avyakt month.

No matter how much waste someone speaks in front of you, just transform that waste and make it powerful. Do not take any waste into your intellect. If you accept even one wasteful word, then that one wasteful word will give birth to many wasteful words. Pay full attention to your words. “Speak less, speak softly and speak sweetly” and you will easily make your stage avyakt.

TODAY MURLI 5 JANUARY 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 5 January 2019

Today Murli in Hindi :- Click Here

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05/01/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, consider yourselves to be souls and speak to your brother souls. Make your vision so firm that no evil spirits enter you. When you see that there is an evil spirit in someone, step away from that person.
Question: How do children become atheists and theists even after belonging to the Father?
Answer: 1) Theists are those who follow the Godly disciplines and who make effort to remain soul conscious. Atheists are those who are influenced by evil spirits against the Godly disciplines and fight and quarrel amongst themselves. 2) Theist children break their intellects’ yoga away from their bodies and bodily relations, including friends and relatives, and consider themselves to be brothers. Atheist children remain body conscious.

Om shanti. First of all, the Father explains to you children: O children, your intellects should always remember that Shiv Baba is your Supreme Father, SupremeTeacher and Supreme Satguru. This should definitely enter your intellects first. Each of you can know whether this has entered your intellect or not. If there is remembrance in your intellect you are a theist and if it doesn’t enter your intellect you are an atheist. It would instantly enter the intellects of students that their teacher has come. When you live at home, you forget this. Hardly anyone understands with that spiritual intoxication that their Supreme Baba has come. He is the Teacher and also the Satguru who takes you back home. When you remember this, the mercury of your happiness rises. Otherwise, you remain sitting in the various thoughts of the dirty world of pain and sorrow. Secondly, people ask you how long it is before destruction is to take place. Tell them: This is not a question to ask. First of all, know the One who explains this to us. First of all, give them the Father’s introduction. If you have this habit instilled in you, you will explain to them, otherwise you forget. The Father tells you so much to consider yourselves to be souls and to look at others with soul-conscious vision. However, you are unable to maintain that vision. This hardly sits in your intellects; not even a pennyworth out of a pound. It is as though it just doesn’t sit in your intellects. It is not that the Father is cursing you. The Father is explaining to you that this knowledge is very elevated. A kingdom is being established; from poor you are becoming wealthy. Only a few become wealthy, and the poor are numberwise. Nothing would ever sit in the intellects of those who are the last number. So, first of all, when you explain to anyone, first explain to them using the picture that shows the 32 virtues of Shiv Baba. It is also written on that, that the Supreme Father is also the Supreme Teacher and the Satguru. When you first have the faith that the One who is explaining to you is the Supreme Father, you won’t have any doubts. No one except the Father can carry out this establishment. When you explain that establishment is taking place, it should definitely enter their intellects that there is someone who is explaining all of this to you. No human being can say that a kingdom is being established. So, first of all, make them have firm faith in the Father. God, the Father, is teaching us. These are not human dictates; these are God’s directions. The new world would definitely be established by the Father. To bring about destruction of the old world is also the Father’s task. Until they have this faith, they will continue to ask: How does this take place? This is why you must first make the aspect of shrimat sit in their intellects, for only then can they understand anything further. Otherwise, they consider these to be the dictates of human beings. The dictates of every human being are different. There cannot be only one direction from human beings. At this time, it is only the One who gives you directions. It is very difficult to follow His shrimat accurately. The Father says: Become soul conscious. Consider yourself to be speaking to your brothers and there won’t then be any fighting or quarrelling. When someone becomes body conscious, consider that one to be an atheist. If someone isn’t soul conscious, he is an atheist. If someone becomes soul conscious, consider that one to be a theist. Body consciousness is very damaging. If there is the slightest fighting or quarrelling, consider that one to be an atheist. They don’t know the Father at all. If there is the evil spirit of anger, that one is an atheist. How could the children of the Father have evil spirits in them? They are not theists. No matter how much they say that they love the Father, if they speak in a way which is against the Godly disciplines, they should be considered to belong to the community of Ravan; they are body conscious. If you see an evil spirit in anyone, or if someone’s vision is evil, you should move away from that one. If you stand in front of an evil spirit, that evil spirit will enter you. Evil spirits fight amongst themselves. If an evil spirit enters someone, that one becomes a complete atheist. Deities are full of all virtues, whereas those who don’t have those virtues are atheists. Atheists will not claim the inheritance. There should not be the slightest defect, otherwise a lot of punishment will have to be experienced and you will have to become part of the subjects. You should remain distant from evil spirits. If you stand there facing the evil spirits, the evil spirits will come. You should never oppose an evil spirit. You mustn’t talk to them too much either. The Father says: This is the world of evil spirits. If the evil spirits haven’t left you, punishment will have to be experienced and you won’t be able to claim a status. There is just the one war. Some become wealthy and others become poor. There was the world of wealthy ones and it is now the world of poor ones. There is an evil spirit in everyone. You should make full effort to remove the evil spirits. Baba explains to you a great deal in the murli. There are all types of nature, don’t even ask! So, in the exhibition, you first of all have to give the Father’s introduction. The Father is so lovely. He is making us into such deities. It is sung: It didn’t take God long to change humans into deities. The deities existed in the golden age and so, surely, there was the iron age before that. You children now have the knowledge of the world cycle in your intellects. The deities there won’t have this knowledge. You are now becoming knowledge-full and then, when you have received a status, there will be no need for this knowledge. This is the unlimited Father from whom you receive the inheritance of heaven for 21 generations. So, you should remember such a Father so much. Baba always explains: Always think that it is Shiv Baba who is explaining to you. Shiv Baba is teaching us through this chariot. He is our Father, Teacher and Guru. This is an unlimited study. You understand that you previously had degraded intellects. No one knows about this college at all. Therefore, when you explain to others, explain it very clearly by grinding it into them. There is no question of Krishna in this. The Father has explained that there are no divine activities of Krishna. These are only Shiv Baba’s. There cannot be any divine activities of even Brahma, Vishnu or Shankar. The divine activities are those of only the One who changes human beings into deities. He makes the world into heaven. You are following the elevated directions of that Father; you are the Father’s helpers. If it weren’t for the Father you would not be able to do anything. You are now becoming worth a poundfrom being not worth a penny. You have now come to know everything, numberwise, according to the effort you make. So, first of all, there is the Father’s introduction. Krishna was a small child. In the golden age, there was his unlimited sovereignty. There was no one else or no other religion in his kingdom. It is now the iron age and there are so many religions. It is in no one else’s intellect when this one original eternal deity religion was established. This too is in the intellects of you children, numberwise, according to your efforts. So, first of all, you should explain the Father’s praise very clearly. We know that we have definitely received this recognition from the Father. The Father says: I am also the Bestower of Salvation for All. I advise you children every cycle: Consider yourselves to be souls and remember Me and you souls will become pure from impure. May you be soul conscious! By considering others to be souls, you will not have a criminal eye. It is the soul that performs actions through the body: I am a soul, that one is a soul. You have to make this firm. You know that you were 100% pure in the beginning and that you then became impure. It is souls that call out: O Baba, come! The awareness of the soul has to be firm and you should forget all other relations. I, the soul, am a resident of the sweet home. I have come here to play a part. Only you children understand this. You too are numberwise in remembering Him. God is teaching you and so there should be so much happiness. God is our Father, Teacher and also our Satguru. You say that you don’t remember anyone except Him. The Father says: Break away from your body and your bodily relations and constantly remember Me alone. All of you are brothers. Some believe this whereas others don’t. So, consider them to be atheists. We are Shiv Baba’s children and so we should be pure. You call out to the Father: Baba, come and make us into the masters of the pure world. In the golden age, there is no question of becoming pure. First of all, understand that that One is Shiv Baba and that the new world is being established through Him. If people ask when destruction is to take place, tell them: First of all, understand Alpha. If you don’t understand Alpha, how would anything else enter your intellect? We children of the true Father speak the truth. We are not children of human beings; we are Shiv Baba’s children. God speaks. God is the One who is the Father of all brothers. Human beings cannot call themselves God. God is incorporeal. He is the Father, Teacher and Satguru. No human being can be the Father, T eacher and Satguru. No human being can grant salvation to anyone. Human beings cannot be God. Baba is the Purifier. It is Ravan who makes you impure. All the rest of them are gurus of the path of devotion. You understand that those who come here become theists. They come to the unlimited Father and have the faith that that One is our Father, Teacher and Guru. When you have developed all the divine virtues completely, the war will begin. According to the time, you yourselves will understand that you are reaching the karmateet stage. You have not reached your karmateet stage yet. There is now a lot of work to do. You have to give the message to many. Everyone has the right to claim the inheritance from the Father. The war will begin very forcefully. Then these hospital s and doctors etc. will not remain at all. The Father is personally explaining to you children: You souls play your parts of 84 births through bodies. Some will take 70 or 80 births. Everyone has to go back. Destruction has to take place. Impure souls cannot return home. In order to become pure, you definitely have to remember the Father. This requires effort. You have to become residents of heaven for 21 births. This is not a small thing. People say that so-and-so has become a resident of heaven. Oh, really? But where is heaven? They don’t understand anything at all. You children should remain very happy: God is teaching us and making us into the masters of the world. One is permanent happiness and the other is temporary happiness. If you don’t study or teach others, how can there be happiness? You have to chase away the devilish traits. The Father explains so much. There is so much suffering of karma. For as long as there is the suffering of karma, it indicates that you haven’t yet reached your karmateet stage. You now have to make effort. No storms of Maya should come. You children have the faith that the Father has changed you from human beings into deities many times. Even if this much enters your intellect, it is great fortune. This is an unlimited school. Those other schools are small limited schools. The Father feels a lot of mercy: How can I explain to them? The evil spirits haven’t yet been removed from some. Instead of climbing on to the heart throne, they fall. Many daughters are becoming ready to bring benefit to many. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Don’t do anything against the Godly disciplines. If there is an evil spirit in someone, or if he has evil vision, move away from that person. Don’t talk to that person too much.
  2. In order to experience permanent happiness, pay full attention to the study. Remove devilish traits, imbibe divine virtues and become theists.
Blessing: May you be a powerful soul who knows the importance of every second and every thought and thereby fills your account of accumulation.
At the confluence age, you have imperishable attainments from the imperishable Father at every moment. It is only at this one time out of the whole cycle that you receive such fortune and this is why your slogan is: “If not now, then never”. Whatever elevated tasks you have to carry out, you have to do those now. When you have this awareness, you will never waste your time, thoughts or actions. Through your powerful thoughts, your account of accumulation will become full and the soul will become powerful.
Slogan: The uniqueness of every word and every act is purity. Transform ordinariness into uniqueness.

*** Om Shanti ***

Special effort to become equal to Father Brahma.

Let there be the awareness of being alokik in the lokik. While living with the lokiks, we are different from others. In your soul-conscious form, consider yourself to be different. It is easy to be different in your actions – you will not be loved by the world through that, but when you become detached from the body and perform actions in soul-consciousness you will be loved by everyone. This is known as the alokik stage.

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 5 JANUARY 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 5 January 2019

To Read Murli 4 January 2019 :- Click Here
05-01-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – अपने को आत्मा समझ, आत्मा भाई से बात करो, ऐसी दृष्टि पक्की करो तो भूत प्रवेश नहीं करेंगे, जब कोई में भूत देखो तो उससे किनारा कर लो”
प्रश्नः- बाप का बनने के बाद भी आस्तिक और नास्तिक बच्चे हैं, वह कैसे?
उत्तर:- आस्तिक वह हैं जो ईश्वरीय कायदों का पालन करते, देही-अभिमानी रहने का पुरुषार्थ करते और नास्तिक वह हैं जो ईश्वरीय कायदों के खिलाफ भूतों के वश हो आपस में लड़ते झगड़ते हैं। 2- आस्तिक बच्चे देह सहित देह के सब सम्बन्धों से बुद्धियोग तोड़ अपने को भाई-भाई समझते हैं। नास्तिक देह-अभिमान में रहते हैं।

ओम् शान्ति। पहले-पहले बाप बच्चों को समझाते हैं कि हे बच्चे बुद्धि में सदा यह याद रखो कि शिवबाबा हमारा सुप्रीम बाप भी है, सुप्रीम शिक्षक भी है, सुप्रीम सतगुरू भी है। यह पहले-पहले बुद्धि में ज़रूर आना चाहिए। हर एक अपने को जान सकते हैं कि हमारी बुद्धि में आया वा नहीं। अगर बुद्धि में याद आता तो आस्तिक हैं, नहीं आता है तो नास्तिक हैं। स्टूडेन्ट की बुद्धि में फट से आना चाहिए कि टीचर आया है। घर में रहते हैं तो वह भूल जाता है। उस रूहाब से बहुत कोई मुश्किल समझते हैं कि हमारा सुप्रीम बाबा आया हुआ है। वह टीचर भी है और वापिस ले जाने वाला सतगुरू भी है। याद आने से खुशी का पारा चढ़ेगा। नहीं तो अपने ही दु:ख दर्द दुनिया की छी-छी बातों में, भिन्न-भिन्न ख्यालात में बैठे रहते हैं। दूसरी बात बहुत करके बच्चों से पूछते हैं कि विनाश में बाकी कितना समय है। बोलो, यह पूछने की बात नहीं है। पहले तो यह हमको किसने समझाया है, उनको जानो। पहले बाप का परिचय दो। आदत पड़ी हुई होगी तो समझायेंगे, नहीं तो भूल जायेंगे। बाप कितना कहते हैं अपने को आत्मा समझो। दूसरे को आत्मा की दृष्टि से देखो, परन्तु वह दृष्टि नहीं ठहरती। रूपये से एक आना भी मुश्किल बैठता। जैसे बुद्धि में ठहरता ही नहीं है। यह कोई बाप श्राप नहीं देते। यह तो बाप समझाते हैं कि ज्ञान बहुत ऊंचा है। राजाई स्थापन होती है। रंक से लेकर राव बनते हैं। राव थोड़े बनते हैं। बाकी रंक नम्बरवार होते हैं। लास्ट नम्बर वाले की बुद्धि में कभी कोई बात बैठ न सके। तो पहले जब किसको भी समझाते हो तो शिवबाबा का जो 32 गुणों वाला चित्र बनाया है उस पर समझाना चाहिए। उसमें भी लिखा हुआ है सुप्रीम फादर, सुप्रीम टीचर, सतगुरू है।

पहले जब यह निश्चय होगा कि समझाने वाला सुप्रीम फादर है तो फिर संशय नहीं लायेंगे। बाप बिगर यह स्थापना कोई कर न सके। तुम जब समझाते हो कि यह स्थापना हो रही है तो उन्हों की बुद्धि में यह जरूर आना चाहिए कि इन्हों को समझाने वाला कोई है। कोई मनुष्य मात्र तो ऐसे कह न सके कि यह राज्य स्थापन हो रहा है। तो पहले-पहले बाप का निश्चय पक्का कराना है। हमको परमात्मा बाप पढ़ाते हैं। यह कोई मनुष्य मत नहीं है, यह ईश्वरीय मत है। नई दुनिया तो ज़रूर बाप द्वारा ही स्थापन होगी। पुरानी दुनिया का विनाश, यह भी बाप का ही काम है। यह निश्चय जब तक नहीं होगा तो पूछते ही रहेंगे कि कैसे होता है इसलिए पहले-पहले तो श्रीमत की बात बुद्धि में बिठानी पड़े तब आगे समझ सकें। नहीं तो मनुष्य मत समझ लेते हैं। हर एक मनुष्य की मत अलग है। मनुष्यों की मत एक हो न सके। इस समय तुमको मत देने वाला एक ही है। उनकी श्रीमत पर कायदेसिर चलना वह भी बड़ा मुश्किल है। बाप कहते हैं देही-अभिमानी बनो। ऐसा समझो कि हम भाई-भाई से बात करते हैं तो फिर लड़ना झगड़ना कभी हो न सके। देह-अभिमान में आया समझो नास्तिक। देही-अभिमानी नहीं है तो वह नास्तिक है। देही-अभिमानी बनें तो समझो आस्तिक है। देह-अभिमान बहुत नुकसान कारक है। जरा भी लड़ते झगड़ते हैं तो समझो नास्तिक हैं। बाप को जानते ही नहीं। क्रोध का भूत है तो नास्तिक ठहरा। बाप के बच्चों में भूत कहाँ से आया। वह आस्तिक नहीं ठहरा। भल कितना भी कहे हमारा बाप में प्यार है। परन्तु ईश्वरीय कायदे के खिलाफ बात करते तो उन्हें रावण सम्प्रदाय का समझना चाहिए। देह-अभिमान में हैं। कोई में भूत देखो वा दृष्टि खराब देखो तो हट जाना चाहिए। भूत के आगे खड़ा रहने से भूत की प्रवेशता हो जायेगी। भूत, भूत में लड़ पड़ते हैं। भूत आये तो पूरा नास्तिक है। देवतायें तो सर्वगुण सम्पन्न होते हैं वह गुण नहीं हैं तो नास्तिक है। नास्तिक वर्सा थोड़ेही लेंगे। जरा भी खामी नहीं होनी चाहिए। नहीं तो बहुत सजा खाकर प्रजा में जाना पड़ेगा। भूत से दूर रहना चाहिए। भूत का सामना किया तो भूत आ जायेगा। भूत से कभी सामना नहीं किया जाता है। उनसे जास्ती बात भी नहीं करनी चाहिए। बाप कहते हैं – यह है भूतों की दुनिया। भूत जब तक निकले नहीं हैं तो सजायें भी खानी पड़ेंगी। पद भी पा नहीं सकेंगे। लड़ाई तो एक ही है। कोई राव बन जाते हैं, कोई रंक बन जाते हैं। राव की दुनिया थी, अभी रंकों की दुनिया है। सबमें भूत हैं। भूत निकालने का पूरा पुरुषार्थ करना चाहिए। बाबा मुरली में बहुत समझाते हैं। किसम-किसम के स्वभाव होते हैं। बात मत पूछो।

तो प्रदर्शनी आदि में पहले-पहले बाप का परिचय देना है। बाप कितना लवली है। वह हमको ऐसा देवता बनाते हैं। गायन भी है मनुष्य से देवता किये.. देवतायें थे सतयुग में तो ज़रूर उनसे पहले कलियुग था। यह सृष्टि चक्र का ज्ञान भी तुम बच्चों की बुद्धि में अब है। वहाँ यह ज्ञान इन देवताओं में नहीं रहेगा। अब तुम नॉलेजफुल बनते हो फिर पद मिल गया तो नॉलेज की दरकार नहीं। यह है बेहद का बाप, जिससे 21 पीढ़ी तुमको स्वर्ग का वर्सा मिलता है। तो ऐसे बाप को कितना याद करना चाहिए। बाबा सदैव समझाते हैं कि हमेशा समझो कि शिवबाबा हमको समझा रहे हैं। शिवबाबा इस रथ द्वारा हमको पढ़ा रहे हैं। वह हमारा बाप टीचर गुरू है। यह है बेहद की पढ़ाई। तुम समझते हो पहले हम तुच्छ बुद्धि थे। इस कालेज का कोई को ज़रा भी पता नहीं है इसलिए समझाने के समय अच्छी तरह से घोट-घोट कर समझाओ। कृष्ण की तो बात ही नहीं। बाप ने समझाया है कृष्ण का कोई चरित्र है ही नहीं। सिवाए शिवबाबा के। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर के भी चरित्र हो न सकें। चरित्र है ही एक का जो मनुष्य से देवता बनाते हैं। विश्व को हेविन बनाते हैं। तुम उस बाप की श्रीमत पर चलते हो। बाप के मददगार हो। बाप नहीं होता तो तुम कुछ भी कर नहीं सकते। तुम अभी वर्थ नाट ए पेनी से वर्थ पाउण्ड बन रहे हो। अब नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार तुम सब जान गये हो। तो पहले-पहले है बाप का परिचय। कृष्ण तो छोटा बच्चा है। सतयुग में उनकी बेहद की बादशाही है। उनके राज्य में और कोई था नहीं। अभी तो कलियुग है, कितने ढेर धर्म हैं। यह एक ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म कब स्थापन हुआ, यह कोई की बुद्धि में नहीं है। तुम बच्चों की भी बुद्धि में नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार है। तो पहले बाप की महिमा पर अच्छी तरह से समझाना चाहिए। हम जानते हैं ज़रूर बाप से हमको पहचान मिली है। बाप कहते हैं सर्व का सद्गति दाता भी मैं हूँ। कल्प-कल्प मैं तुम बच्चों को राय देता हूँ कि अपने को आत्मा समझो और मुझे याद करो। तो आत्मा पतित से पावन बन जायेगी। आत्म-अभिमानी भव। दूसरे को भी आत्मा समझने से तुम्हारी क्रिमिनल आई नहीं होगी। आत्मा ही शरीर द्वारा कर्म करती है – हम आत्मा हैं, यह आत्मा है – यह पक्का करना है। तुम जानते हो पहले-पहले हम 100 परसेन्ट पावन थे, फिर पतित बने। आत्मा ही बुलाती है कि बाबा आओ। आत्मा का अभिमान पक्का रहना चाहिए और सम्बन्ध सब भूल जाने चाहिए। हम आत्मा स्वीट होम में रहने वाली हैं। यहाँ पार्ट बजाने आये हैं। यह भी तुम बच्चे ही समझते हो। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं जिनको याद रहती है। भगवान पढ़ाते हैं, कितनी खुशी रहनी चाहिए। भगवान हमारा बाप भी है, टीचर भी है, सतगुरू भी है। तुम कहेंगे हम उनके सिवाए और कोई को याद नहीं करते। बाप कहते हैं देह सहित देह के सभी सम्बन्ध तोड़ मामेकम् याद करो। तुम सब ब्रदर्स हो। कोई मानते हैं, कोई नहीं मानते हैं तो समझो नास्तिक हैं। हम शिवबाबा के बच्चे हैं तो पावन होने चाहिए। बाप को बुलाते ही हैं बाबा आकर हमको पावन विश्व का मालिक बनाओ। सतयुग में तो पावन होने की बात ही नहीं है। पहले तो यह समझो कि यह शिवबाबा है, इनसे नई दुनिया स्थापन होती है। अगर पूछे कि विनाश कब होगा, तो बोलो पहले अल्फ को समझो। अल्फ को नहीं समझा तो पीछे की बात बुद्धि में कैसे आयेगी। हम सत्य बाप के बच्चे सत्य बोलते हैं। हम कोई मनुष्य के बच्चे नहीं हैं। हम शिवबाबा के बच्चे हैं। भगवानुवाच, भगवान उनको कहा जाता है जो सभी ब्रदर्स का बाप है। मनुष्य अपने को भगवान कहला न सकें। भगवान तो निराकार है। वह बाप टीचर सतगुरू है। कोई मनुष्य बाप, टीचर, सतगुरू हो न सके। कोई भी मनुष्य किसकी सद्गति कर नहीं सकते। भगवान हो न सकें।

बाबा है पतित-पावन। पतित बनाता है रावण। बाकी यह सब हैं भक्ति के गुरू। यह भी तुम समझते हो जो यहाँ आते हैं वह आस्तिक तो बनते हैं। बेहद के बाप पास आकर निश्चय करते हैं यह हमारा बाप टीचर गुरू है। जब कम्पलीट दैवीगुण आ जायेंगे तो लड़ाई भी लगेगी। समय अनुसार तुम खुद समझेंगे कि अब कर्मातीत अवस्था को पहुँच रहे हैं। अभी कर्मातीत अवस्था हुई कहाँ है। अभी बहुत काम है। बहुतों को पैगाम देना है। बाप से वर्सा लेने का तो सबको हक है। अब तो लड़ाई जोर से होगी। फिर यह हॉस्पिटल डाक्टर आदि कुछ नहीं रहेंगे। बाप बच्चों को सम्मुख समझा रहे हैं कि तुम आत्मायें 84 जन्म शरीर धारण कर अपना पार्ट बजाती हो। किसी के 70-80 जन्म भी होंगे। अभी जाना तो सबको है, विनाश होना ही है। अपवित्र आत्मा जा न सके। पावन होने लिए बाप को ज़रूर याद करना है, मेहनत है। 21 जन्मों के लिए स्वर्गवासी बनना है। कोई कम बात है क्या। मनुष्य तो कह देते फलाना स्वर्गवासी हुआ। अरे स्वर्ग है कहाँ? कुछ भी समझते नहीं। तुम बच्चों को बड़ी खुशी रहनी चाहिए कि भगवान हमको पढ़ाते हैं, विश्व का मालिक बनाते हैं। खुशी एक होती है स्थाई दूसरी होती है अल्पकाल की। पढ़ेंगे पढ़ायेंगे नहीं तो खुशी क्या होगी? आसुरी गुणों को भगाना है। बाप कितना समझाते हैं, कर्मभोग कितना है। जब तक कर्मभोग है तो यह निशानी है अभी तक कर्मातीत अवस्था हुई नहीं है। अभी मेहनत करनी है। कोई भी माया के तूफान न आयें। बच्चों को यह निश्चय है कि बाप ने हमको अनेक बार मनुष्य से देवता बनाया है। यह बुद्धि में आये तो भी अहो सौभाग्य। यह बेहद का बड़ा स्कूल है। वह होता है हद का छोटा। बाप को तो बहुत तरस पड़ता है, कैसे समझाऊं – कोई से तो अब तक भी भूत निकले नहीं हैं। दिल पर चढ़ने बदले गिर पड़ते हैं। कई बच्चियाँ तो तैयार हो रही हैं, अनेकों का कल्याण करने के लिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कोई भी बात ईश्वरीय कायदे के खिलाफ नहीं करनी है। किसी में भी अगर भूत की प्रवेशता है या दृष्टि खराब है तो उसके सामने से हट जाना है, उनसे जास्ती बात नहीं करनी है।

2) स्थाई खुशी में रहने के लिए पढ़ाई पर पूरा ध्यान देना है। आसुरी गुणों को निकाल दैवीगुण धारण कर आस्तिक बनना है।

वरदान:- हर सेकण्ड के हर संकल्प का महत्व जानकर जमा का खाता भरपूर करने वाली समर्थ आत्मा भव
स्लोगन:- संगमयुग पर अविनाशी बाप द्वारा हर समय अविनाशी प्राप्तियां होती हैं। सारे कल्प में ऐसा भाग्य प्राप्त करने का यह एक ही समय है – इसलिए आपका स्लोगन है “अब नहीं तो कभी नहीं”। जो भी श्रेष्ठ कार्य करना है वह अभी करना है। इस स्मृति से कभी भी समय, संकल्प वा कर्म व्यर्थ नहीं गंवायेंगे, समर्थ संकल्पों से जमा का खाता भरपूर हो जायेगा और आत्मा समर्थ बन जायेगी।

स्लोगन:- हर बोल, हर कर्म की अलौकिकता ही पवित्रता है, साधारणता को अलौकिकता में परिवर्तन कर दो।

ब्रह्मा बाप समान बनने के लिए विशेष पुरुषार्थ

लौकिक में अलौकिकता की स्मृति रहे। लौकिक में रहते हुए भी हम लोगों से न्यारे हैं। अपने को आत्मिक रूप में न्यारा समझना है। कर्तव्य से न्यारा होना तो सहज है, उससे दुनिया को प्यारे नहीं लगेंगे, लेकिन जब शरीर से न्यारी आत्मा रूप में कार्य करेंगे तो सबको प्यारे लगेंगे, इसे ही अलौकिक स्थिति कहा जाता है।

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