brahma kumris murli

Daily Murli Brahma Kumaris 6 June 2017 – Bk Murli Hindi

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06/06/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – याद में रह अपने विकर्मों की प्रायश्चित करो तो विकर्माजीत बन जायेंगे, पुराने सब हिसाब-किताब चुक्तू हो जायेंगे”
प्रश्नः- किन बच्चों से हर बात का त्याग सहज हो जाता है?
उत्तर:- जिन बच्चों को अन्दर से वैराग्य आता है – वह हर बात का त्याग सहज ही कर लेते हैं, तुम बच्चों के अन्दर अब यह इच्छायें नहीं होनी चाहिए कि यह पहनूं, यह खाऊं, यह करूं… देह सहित सारी पुरानी दुनिया का ही त्याग करना है। बाप आये हैं तुम्हें हथेली पर बहिस्त देने तो इस पुरानी दुनिया से बुद्धियोग हट जाना चाहिए।
गीत:- माता ओ माता….

 

ओम् शान्ति। बच्चों ने अपने माँ की महिमा सुनी। बच्चे तो बहुत हैं समझा जाता है बरोबर बाप है तो जरूर माँ भी है। रचना के लिए माता जरूर होती है। भारत में माता के लिए बहुत अच्छी महिमा गाई जाती है। बड़ा मेला लगता है जगत अम्बा का, कोई न कोई प्रकार से माँ की पूजा होती है। बाप की भी होती होगी। वह जगत अम्बा है तो वह जगत पिता है। जगत अम्बा साकार में है तो जगत पिता भी साकार में है। इन दोनों को रचयिता ही कहेंगे। यहाँ तो साकार है ना। निराकार को ही कहा जाता है गॉड फादर। मदर फादर का राज़ तो समझाया गया है। छोटी माँ भी है, बड़ी माँ भी है। महिमा छोटी माँ की है, भल एडाप्ट करते हैं, माँ को भी एडाप्ट किया है, तो यह बड़ी माँ हो गई। परन्तु महिमा सारी छोटी माँ की है।

यह भी बच्चे जानते हैं हरेक को अपने कर्मभोग का हिसाब-किताब चुक्तू करना है क्योंकि विकर्माजीत थे फिर रावण ने विकर्मी बना दिया है। विक्रम संवत भी है तो विकर्माजीत संवत भी है। पहला आधाकल्प विकर्माजीत कहेंगे फिर आधाकल्प विक्रम संवत शुरू होता है। अभी तुम बच्चे विकर्मों पर जीत पाकर विकर्माजीत बनते हो। पाप जो हैं उनको योगबल से प्रायश्चित करते हैं। प्राश्चित होता ही है याद से। जो बाप समझाते हैं कि बच्चे याद करो तो पापों का प्राश्चित हो जायेगा अर्थात् कट उतर जायेगी। सिर पर पापों का बोझा बहुत है, जन्म-जन्मान्तर का। समझाया गया है कि जो नम्बरवन में पुण्य आत्मा बनता है वही फिर नम्बरवन पाप आत्मा भी बनता है। उनको बहुत मेहनत करनी पड़ेगी क्योंकि शिक्षक बनते हैं सिखाने के लिए तो जरूर मेहनत करनी पड़ेगी। बीमारी आदि होती है तो अपने ही कर्म कहे जाते हैं। अनेक जन्मों के विकर्म किये हैं, इस कारण भोगना होती है इसलिए कभी भी इससे डरना नहीं है। खुशी से पास करना है क्योंकि अपना ही किया हुआ हिसाब-किताब है। प्राश्चित होना ही है, एक बाप की याद से। जब तक जीना है तब तक तुम बच्चों को ज्ञान अमृत पीना है। योग में रहना है, विकर्म हैं तब तो खांसी आदि होती है। खुशी होती है, यहाँ ही सब हिसाब खत्म हो जाएं, रह जायेंगे तो पास विद ऑनर नहीं होगे। मोचरा खाकर मानी मिले तो भी बेइज्जती है ना। अनेक प्रकार के दु:ख की भोगना होती है। यहाँ अनेक प्रकार के दु:ख का पारावार नहीं। वहाँ सुख का पारावार नहीं रहता। नाम ही है स्वर्ग। क्रिश्चियन लोग कहते हैं हेविन। हेविनली गॉड फादर, इन बातों को तुम जानते हो। निवृत्ति मार्ग वाले सन्यासी तो कह देते हैं कि यह सब काग बिष्टा समान सुख है। इस दुनिया में बरोबर ऐसा है। भल कितना भी किसको सुख हो परन्तु वह है अल्पकाल का सुख। स्थाई सुख तो बिल्कुल नहीं है। बैठे-बैठे आपदायें आ जाती हैं, हार्टफेल हो जाती है। आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरे में जाकर प्रवेश करती है तो शरीर आपेही मिट्टी हो जाता। जानवरों के शरीर फिर भी काम में आते हैं, मनुष्य का काम नहीं आता है। तमोप्रधान पतित शरीर कोई काम का नहीं, कौड़ियों मिसल है। देवताओं के शरीर हीरे मिसल हैं। तो देखो उन्हों की कितनी पूजा होती है। यह समझ अभी तुम बच्चों को मिली है।

यह है बेहद का बाप, जो मोस्ट बिलवेड है, जिसको फिर आधाकल्प याद किया है। जो ब्राह्मण बनते हैं – वही बाप से वर्सा लेने के हकदार होते हैं। सच्चे ब्राह्मण बहुत प्युअर होने चाहिए। सच्चे गीता पाठी को पवित्र तो रहना ही है। वह झूठे गीता पाठी पवित्र नहीं रहते। अब गीता में तो लिखा हुआ है काम महाशत्रु है। फिर खुद गीता सुनाने वाले पवित्र कहाँ रहते हैं। गीता है सर्व शास्त्रमई शिरोमणी, जिससे बाप ने कौड़ी से हीरे तुल्य बनाया है। यह भी तुम समझते हो, गीतापाठी नहीं समझ सकते। वह तो तोते मुआफिक पढ़ते रहते हैं। महिमा सारी है ही एक की और किसी चीज़ की महिमा है नहीं। ब्रह्मा विष्णु शंकर की भी नहीं। तुम उनके आगे कितना भी माथा टेको, उनके आगे बलि चढ़ो तो भी वर्सा नहीं मिलेगा। काशी में काशी कलवट खाते हैं ना। अभी गवर्मेन्ट ने बन्द करा दिया है। नहीं तो बहुत काशी कलवट खाते थे। कुएं में जाकर कूदते थे। कोई देवी पर बलि चढ़ते थे, कोई शिव पर। देवताओं पर बलि चढ़ने का कोई फायदा नहीं। काली पर बलि चढ़ते, काली को कितना काला-काला बना दिया है। अभी तो हैं सभी आयरन एजड, जो पहले गोल्डन एजड थे। अम्बा एक को ही कहा जाता है। पिता को कभी अम्बा नहीं कहेंगे। अब यह कोई भी नहीं जानते। जगत अम्बा सरस्वती ब्रह्मा की बेटी है। ब्रह्मा जरूर प्रजापिता ही होगा। सूक्ष्मवतन में तो नहीं होगा। समझते भी हैं सरस्वती ब्रह्मा की बेटी है। ब्रह्मा की स्त्री तो बताते नहीं। बाप समझाते हैं, मैंने इस ब्रह्मा द्वारा बेटी सरस्वती को एडाप्ट किया है। बेटी भी समझती है, बाप एडाप्ट करते हैं। ब्रह्मा को भी एडाप्ट किया है। यह बहुत गुह्य बात है, जो कोई की भी बुद्धि में नहीं है। बाप तुमको अपना भी अन्त बैठकर देते हैं, सो तो जरूर सम्मुख ही देंगे ना। प्रेरणा से थोड़ेही देंगे। भगवानुवाच हे बच्चे… सो जरूर साकार में आवे तब तो कहेंगे ना, निराकार बाप इन द्वारा बैठ पढ़ाते हैं, ब्रह्मा नहीं पढ़ाते। ब्रह्मा को ज्ञान सागर नहीं कहा जाता है, एक ही बाप को कहा जाता है। आत्मा समझती है यह लौकिक बाप नहीं पढ़ाते, पारलौकिक बाप बैठ पढ़ाते हैं, जिससे वर्सा ले रहे हैं। वैकुण्ठ को परलोक नहीं कहा जाता। वह है अमरलोक, यह है मृत्युलोक। परलोक अर्थात् जहाँ हम आत्मायें रहती हैं, यह परलोक नहीं है। हम आत्मायें आती हैं इस लोक में। परलोक है हम आत्माओं का लोक। तुमने राज्य इस भारत में किया है, परलोक पर नहीं। परलोक का राजा नहीं कहेंगे। कहते हैं लोक परलोक सुहाले हो। यह है स्थूल लोक और फिर परलोक सुहाले बन जाते हैं। वही भारत वैकुण्ठ था फिर बनेगा। यह है मृत्युलोक, लोक में मनुष्य रहते हैं। कहते हैं वैकुण्ठ लोक में जावें। दिलवाला मन्दिर में भी नीचे तपस्या में बैठे हैं। ऊपर में वैकुण्ठ के चित्र बनाये हैं। समझते हैं फलाना वैकुण्ठ पधारा। परन्तु वैकुण्ठ तो यहाँ ही होता है, ऊपर में नहीं। आज जो यह पतित लोक है, वह फिर पावन लोक हो जायेगा। पावन लोक था अभी पास्ट हो गया है, इसलिए कहा जाता है परलोक। परे हो गया ना। भारत स्वर्ग था, अभी नर्क है तो स्वर्ग अभी परे हो गया ना। फिर ड्रामा अनुसार वाम मार्ग में जाते हैं तो स्वर्ग परे हो जाता है इसलिए परलोक कहते हैं।

अभी तुम कहते हो हम यहाँ आकर नई दुनिया में फिर से अपना राज्य भाग्य करेंगे। हर एक अपने लिए पुरूषार्थ करते हैं। जो करेगा सो पायेगा। सब तो नहीं करेंगे। जो पढ़ेगा लिखेगा वह होगा वैकुण्ठ का नवाब अर्थात् मालिक बनेंगे। तुम इस सृष्टि को सोने का बनाते हो। कहते हैं ना – द्वारिका सोने की थी फिर समुद्र के नीचे चली गई। कोई बैठी तो नहीं है जो निकालेंगे। भारत स्वर्ग था, देवतायें राज्य करते थे। अभी तो कुछ नहीं है। फिर सब कुछ सोने का बनाना पड़ेगा। ऐसे नहीं वहाँ सोने के महल निकालने से निकल आयेंगे, सब कुछ बनाने पड़ेंगे। नशा होना चाहिए हम प्रिन्स प्रिन्सेज बन रहे हैं। यह प्रिन्स-प्रिन्सेज बनने की कॉलेज है। वह है प्रिन्स प्रिन्सेज के पढ़ने की कॉलेज। तुम राजाई लेने के लिए पढ़ रहे हो। वह पास्ट जन्म में दान पुण्य करने से राजा के घर में जन्म ले प्रिन्स बने हैं। वह कॉलेज कितनी अच्छी होगी। कितने अच्छे कोच आदि होंगे। टीचर के लिए भी अच्छा कोच होगा। सतयुग त्रेता में जो प्रिन्स प्रिन्सेज होंगे उन्हों का कॉलेज कितना अच्छा होगा। कॉलेज में तो जाते होंगे ना। भाषा तो सीखेंगे ना। उन सतयुगी प्रिन्स प्रिन्सेज का कॉलेज और द्वापर के विकारी प्रिन्स प्रिन्सेज का कॉलेज देखो और तुम प्रिन्स प्रिन्सेज बनने वालों का कॉलेज देखो, कैसा साधारण है। तीन पैर पृथ्वी भी नहीं मिलती है। तुम जानते हो वहाँ प्रिन्स कैसे जाते हैं, कॉलेजेज़ में। वहाँ पैदल भी नहीं करना पड़ता। महल से निकले और यह एरोप्लैन उड़ा। वहाँ की कैसी अच्छी कॉलेजेज़ होंगी। कैसे सुन्दर बगीचे महल आदि होंगे। वहाँ की हर चीज नई सबसे ऊंच नम्बरवन होती है। 5 तत्व ही सतोप्रधान हो जाते हैं। तुम्हारी सेवा कौन करेंगे? यह 5 तत्व अच्छे ते अच्छी चीज़ तुम्हारे लिए पैदा करेंगे। जब कोई फल बहुत अच्छा कहाँ से निकलता है तो वह राजा रानी को सौगात भेजते हैं। यहाँ तो तुम्हारा बाप शिवबाबा है सबसे ऊंच, उनको तुम क्या खिलायेंगे! यह कोई भी चीज़ की इच्छा नहीं रखते, यह पहनूँ, यह खाऊं, यह करूँ,… तुम बच्चों को भी यह इच्छायें नहीं होनी चाहिए। यहाँ यह सब किया तो वहाँ वह कम हो जायेगा। अभी तो सारी दुनिया का त्याग करना है। देह सहित सब कुछ त्याग। वैराग्य आता है तो त्याग हो जाता है।

बाबा कहते हैं मैं तुम बच्चों को हथेली पर बहिश्त देने आया हूँ। तुम जानते हो बाबा हमारा है, तो जरूर उनको याद करना पड़े। जैसे कन्या की सगाई होती या लगन जुटती है तो कभी नहीं कहेगी कि हम पति को याद नहीं करती, क्योंकि वह लाईफ का मेल हो जाता है। वैसे ही बाप और बच्चों का मेल होता है। परन्तु माया भुला देती है। बाप कहते हैं मुझे याद करो और वर्से को याद करो। इसमें मुक्ति जीवन-मुक्ति आ जाती है। फिर तुमसे यह भूल क्यों जाता है! इसमें है बुद्धि का काम, जबान से भी कुछ बोलना नहीं होता है और निश्चय करना है। हम जानते हैं, पवित्र रह पवित्र दुनिया का वर्सा लेंगे। इसमें समझने की बात है, बोलने की बात नहीं। हम बाबा के बने हैं। शिवबाबा पतितों को पावन बनाने वाला है। कहते हैं मुझे याद करते रहो। इसका अर्थ ही है मनमनाभव। उन्होंने फिर कृष्ण भगवानुवाच लिख दिया है। पतित-पावन तो एक ही है। सर्व का सद्गति दाता एक, एक को ही याद करना है। कहते हैं मुझ एक बाप को भूलने के कारण कितनों को याद करते रहते हो। अभी तुम मुझे याद करो तो विकर्माजीत राजा बन जायेंगे। विकर्माजीत राजा और विक्रमी राजा का फ़र्क भी बताया ना। पूज्य से पुजारी बन जाते। नीचे आना ही है। वैश्य वंश, फिर शूद्र वंश। वैश्य वंशी बनना माना वाम मार्ग में आना। हिस्ट्री-जॉग्राफी तो सारी बुद्धि में है, इस पर कहानियां भी बहुत हैं। वहाँ मोह की भी बात नहीं रहती। बच्चे आदि बहुत मौज में रहते हैं, आटोमेटिक अच्छी रीति पलते हैं। दास दासियां तो आगे रहते ही हैं। तो अपनी तकदीर को देखो कि हम ऐसी कॉलेज में बैठे हैं जहाँ से हम भविष्य में प्रिन्स प्रिन्सेज बनते हैं। फ़र्क तो जानते हो ना। वह कलियुगी प्रिन्स प्रिन्सेज, वह सतयुगी प्रिन्स प्रिन्सेज… वह महारानी महाराजा, वह राजा-रानी। बहुतों के नाम भी हैं लक्ष्मी-नारायण, राधे-कृष्ण। फिर उन लक्ष्मी-नारायण और राधे-कृष्ण की पूजा क्यों करते हैं! नाम तो एक ही है ना। हाँ वह स्वर्ग के मालिक थे। अभी तुम जानते हो कि यह नॉलेज, शास्त्रों में नहीं है। अभी तुम समझ गये हो यज्ञ तप दान पुण्य आदि में कोई सार नहीं है। ड्रामा अनुसार दुनिया को पुराना होना ही है। मनुष्य मात्र को तमोप्रधान बनना ही है। हर बात में तमोप्रधान, क्रोध, लोभ सबमें तमोप्रधान। हमारे टुकड़े पर इनका दखल क्यों, मारो गोली। कितनी मारामारी करते हैं, आपस में कितना लड़ते हैं। एक दो का खून करने में भी देरी नहीं करते हैं। बच्चा समझता कहाँ बाप मरे वर्सा मिले… ऐसी तमोप्रधान दुनिया का अब विनाश होना ही है। फिर सतोप्रधान दुनिया आयेगी। अच्छा-

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद प्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) पुण्य आत्मा बनने के लिए याद की मेहनत करनी है। सब हिसाब-किताब समाप्त कर पास विद ऑनर हो इज्जत से जाना है इसलिए कर्मभोग से डरना नहीं है, खुशी-खुशी चुक्तू करना है।

2) सदा इसी नशे में रहना है कि हम भविष्य प्रिन्स-प्रिन्सेज बन रहे हैं। यह है प्रिन्स-प्रिन्सेज बनने की कॉलेज।

वरदान:- पुरूषार्थ की यथार्थ विधि द्वारा सदा आगे बढ़ने वाले सर्व सिद्धि स्वरूप भव
पुरूषार्थ की यथार्थ विधि है-अनेक मेरे को परिवर्तन कर एक “मेरा बाबा”-इस स्मृति में रहना और कुछ भी भूल जाए लेकिन यह बात कभी नहीं भूले कि “मेरा बाबा”। मेरे को याद नहीं करना पड़ता, उसकी याद स्वत: आती है। “मेरा बाबा” दिल से कहते हो तो योग शक्तिशाली हो जाता है। तो इस सहज विधि से सदा आगे बढ़ते हुए सिद्धि स्वरूप बनो।
स्लोगन:- मायाजीत बनना है तो स्नेह के साथ-साथ ज्ञान का भी फाउण्डेशन मजबूत करो।

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Read Murli 4 June 2017 :- Click Here

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Daily Murli Brahma Kumaris 29 may 2017 – Bk Murli Hindi

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Read Murli 28/05/2017 :- Click Here

June 2017 Murli :- Click Here

29/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – शान्ति तुम्हारे गले का हार है, आत्मा का स्वधर्म है, इसलिए शान्ति के लिए भटकने की दरकार नहीं, तुम अपने स्वधर्म में स्थित हो जाओ”
प्रश्नः- मनुष्य किसी भी चीज़ को शुद्ध बनाने के लिए कौन सी युक्ति रचते हैं और बाप ने कौन सी युक्ति रची है?
उत्तर:- मनुष्य किसी भी चीज़ को शुद्ध बनाने के लिए उसे आग में डालते हैं। यज्ञ भी रचते हैं तो उसमें भी आग जलाते हैं। यहाँ भी बाप ने रूद्र यज्ञ रचा है लेकिन यह ज्ञान यज्ञ है, इसमें सबकी आहुति पड़नी है। तुम बच्चे देह सहित सब कुछ इसमें स्वाहा करते हो। तुम्हें योग लगाना है। योग की ही रेस है। इसी से तुम पहले रुद्र के गले का हार बनेंगे फिर विष्णु के गले की माला में पिरोये जायेंगे।
गीत:- ओम् नमो शिवाए..

 

ओम् शान्ति। यह महिमा किसकी सुनी? पारलौकिक परमपिता परम आत्मा अर्थात् परमात्मा की। सभी भक्त अथवा साधना करने वाले उनको याद करते हैं। उनका नाम फिर पतित-पावन भी है। बच्चे जानते हैं भारत पावन था। लक्ष्मी-नारायण आदि का पवित्र प्रवृत्ति मार्ग का धर्म था, जिसको आदि सनातन देवी-देवता धर्म कहा जाता है। भारत में पवित्रता सुख शान्ति सम्पत्ति सब कुछ था। पवित्रता नहीं है तो न शान्ति है, न सुख है। शान्ति के लिए भटकते रहते हैं। जंगल में फिरते रहते हैं। एक को भी शान्ति नहीं है क्योंकि न बाप को जानते हैं, न अपने को समझते कि मैं आत्मा हूँ, यह मेरा शरीर है। इन द्वारा कर्म करना होता है। मेरा तो स्वधर्म ही शान्त है। यह शरीर के आरगन्स हैं। आत्मा को यह भी पता नहीं है कि हम आत्मायें निर्वाण वा परमधाम की वासी हैं। इस कर्मक्षेत्र पर हम शरीर का आधार ले पार्ट बजाते हैं। शान्ति का हार गले में पड़ा है और धक्का खाते रहते हैं बाहर। पूछते रहते मन को शान्ति कैसे मिले? उनको यह पता नहीं है कि आत्मा मन – बुद्धि सहित है। आत्मा परमपिता परमात्मा की सन्तान है। वह शान्ति का सागर है, हम उनकी सन्तान हैं। अब अशान्ति तो सारी दुनिया को है ना। सब कहते हैं पीस हो। अब सारी दुनिया का मालिक तो एक है जिसको शिवाए नम: कहते हैं। ऊंच ते ऊंच भगवान, शिव कौन है? यह भी कोई मनुष्य नहीं जानते हैं। पूजा भी करते हैं, कई तो फिर अपने को शिवोहम् कह देते हैं। अरे शिव तो एक ही बाप है ना। मनुष्य अपने को शिव कहलायें, यह तो बड़ा पाप हो गया। शिव को ही पतित-पावन कहा जाता है। ब्रह्मा विष्णु शंकर को अथवा कोई मनुष्य को पतित-पावन नहीं कह सकते। पतित-पावन सद्गति दाता है ही एक। मनुष्य, मनुष्य को पावन बना न सकें क्योंकि सारी दुनिया का प्रश्न है ना। बाप समझाते हैं जब सतयुग था – भारत पावन था, अब पतित है। तो जो सारी सृष्टि को पावन बनाने वाला है उनको ही याद करना चाहिए। बाकी यह तो है ही पतित दुनिया। यह जो कहते हैं महान आत्मा, यह कोई है नहीं। पारलौकिक बाप को ही जानते नहीं हैं। भारत में शिव जयन्ती गाई जाती है तो जरूर भारत में आया होगा – पतितों को पावन बनाने। कहते हैं मैं संगम पर आता हूँ, जिसको कुम्भ कहा जाता है। वह पानी के सागर और नदियों का कुम्भ नहीं। कुम्भ इनको कहा जाता है जबकि ज्ञान सागर पतित-पावन बाप आकर सभी आत्माओं को पावन बनाते हैं। यह भी जानते हो भारत जब स्वर्ग था तो एक ही धर्म था। सतयुग में सूर्यवंशी राज्य था फिर त्रेता में चन्द्रवंशी, जिसकी महिमा है – राम राजा, राम प्रजा.. त्रेता की इतनी महिमा है तो सतयुग की उससे भी जास्ती होगी। भारत ही स्वर्ग था, पवित्र जीव आत्मायें थीं बाकी और सभी धर्म की आत्मायें निर्वाणधाम में थी। आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है – यह भी कोई मनुष्य मात्र नहीं जानते। आत्मा इतनी छोटी सी बिन्दी है, उनमें 84 जन्मों का पार्ट भरा हुआ है। 84 लाख जन्म तो हो न सके। 84 लाख जन्मों में कल्प – कल्पान्तर फिरते रहें, यह तो हो नहीं सकता। है ही 84 जन्मों का पा, सो भी सभी का नहीं है। जो पहले थे वह अब पीछे पड़ गये हैं, फिर वह पहले जायेंगे। पीछे आने वाली सभी आत्मायें निर्वाणधाम में रहती हैं। यह सब बातें बाप समझाते हैं। उनको ही वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी कहा जाता है।

बाप कहते हैं मैं आकर ब्रह्मा द्वारा सभी वेदों शास्त्रों गीता आदि का सार समझाता हूँ। यह सब भक्ति मार्ग के कर्मकाण्ड के शास्त्र बनाये हुए हैं। मैंने आकर कैसे यज्ञ रचा, यह बातें तो शास्त्रों में हैं नहीं। इनका नाम ही है राजस्व अश्वमेध रूद्र ज्ञान यज्ञ। रूद्र है शिव, इसमें सबको स्वाहा होना है। बाप कहते हैं देह सहित जो भी मित्र-सम्बन्धी आदि हैं, उन सबको भूल जाओ। एक ही बाप को याद करो। मैं सन्यासी, उदासी हूँ, क्रिश्चियन हूँ… यह सब देह के धर्म हैं इनको छोड़ मामेकम् याद करो। निराकार आयेंगे तो जरूर शरीर में ना। कहते हैं मुझे प्रकृति का आधार लेना पड़ता है। मैं ही आकर इस तन द्वारा नई दुनिया स्थापन करता हूँ। पुरानी दुनिया का विनाश सामने खड़ा है। गाया भी जाता है प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा स्थापना, सूक्ष्मवतन है ही फरिश्तों की दुनिया। वहाँ हड्डी मांस नहीं होता है। वहाँ सूक्ष्म शरीर होता है सफेद-सफेद जैसे घोस्ट होते हैं ना। आत्मा, जिसको शरीर नहीं मिलता है, तो वह भटकती रहती है। छाया रूपी शरीर दिखाई पड़ता है, उनको पकड़ नहीं सकते हैं। अब बाप कहते हैं बच्चे याद करो तो याद से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। गाया भी जाता है बहुत गई, थोड़ी रही.. अब बाकी थोड़ा समय है। जितना हो सके बाप को याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी। गीता में कोई एक दो अक्षर राइट लिखे हैं। जैसे आटे में लून (नमक) कोई-कोई अक्षर सही हैं। पहले तो भगवान निराकार है यह मालूम होना चाहिए। वह निराकार भगवान फिर वाच कैसे करते हैं? कहते हैं साधारण ब्रह्मा तन में प्रवेश कर राजयोग सिखलाता हूँ। बच्चे मुझे याद करो। मैं आता ही हूँ एक धर्म की स्थापना कर बाकी सब धर्मो का विनाश कराने। अभी तो अनेक धर्म हैं। आज से 5 हजार वर्ष पहले सतयुग में एक ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। सभी आत्मायें अपना-अपना हिसाब-किताब चुक्तू कर जाती हैं, उनको कयामत का समय कहा जाता है। सभी के दु:खों का हिसाब-किताब चुक्तू होता है। दु:ख मिलता ही है पापों के कारण। पाप का हिसाब चुक्तू होने के बाद फिर पुण्य का शुरू हो जाता है। हरेक चीज़ शुद्ध बनाने के लिए आग जलाई जाती है। यज्ञ रचते हैं, उसमें भी आग जलाते हैं। यह तो मैटेरियल यज्ञ नहीं है। यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ। ऐसे नहीं कहते कृष्ण ज्ञान यज्ञ। कृष्ण ने कोई यज्ञ नहीं रचा, कृष्ण तो प्रिन्स था। यज्ञ रचा जाता है आफतों के समय। इस समय सब तरफ आफतें हैं ना, बहुत मनुष्य रूद्र यज्ञ भी रचते हैं। रूद्र ज्ञान यज्ञ नहीं रचते हैं। वह तो रूद्र परमपिता परमात्मा ही आकर रचते हैं। कहते हैं यह जो रूद्र ज्ञान यज्ञ है, इसमें सबकी आहुति हो जायेगी। बाबा आया हुआ है – यज्ञ भी रचा हुआ है। जब तक राजाई स्थापन हो जाए और सब पावन बन जाएं। फट से सब तो पावन नहीं बनते। योग लगाते रहो अन्त तक। यह है ही योग की रेस। बाप को जितना जास्ती याद करते हैं, उतना दौड़ी लगाकर जाए रूद्र के गले का हार बनते हैं। फिर विष्णु के गले की माला बनेंगे। पहले रूद्र की माला फिर विष्णु की माला। पहले बाप सबको घर ले जाते हैं, जो जितना पुरूषार्थ करेंगे वही नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बन राज्य करते हैं। गोया यह आदि सनातन देवी-देवता धर्म स्थापन हो रहा है। तुमको बाप राजयोग सिखला रहे हैं। जैसे 5 हजार वर्ष पहले सिखलाया था फिर कल्प बाद सिखलाने आये हैं। शिव जयन्ती अथवा शिवरात्रि भी मनाते हैं। रात अर्थात् कलियुगी पुरानी दुनिया का अन्त, नई दुनिया का आदि। सतयुग त्रेता है दिन, द्वापर कलियुग है रात। बेहद का दिन ब्रह्मा का, फिर बेहद की रात ब्रह्मा की। कृष्ण का दिन – रात नहीं गाया जाता है। कृष्ण को ज्ञान ही नहीं रहता। ब्रह्मा को ज्ञान मिलता है शिवबाबा से। फिर तुम बच्चों को मिलता है इनसे। गोया शिवबाबा तुमको ब्रह्मा तन से ज्ञान दे रहा है। तुमको त्रिकालदर्शी बनाते हैं। मनुष्य सृष्टि में एक भी त्रिकालदर्शी कोई हो न सके। अगर होवे तो नॉलेज दे ना। यह सृष्टि चक्र कैसे फिरता है? कभी भी कोई नॉलेज दे न सके।

भगवान तो सभी का एक ही है। कृष्ण को थोड़ेही सब भगवान मानेंगे। वह तो राजकुमार है। राजकुमार भगवान होता है क्या? अगर वह राज्य करे तो फिर गँवाना भी पड़े। बाप कहते हैं तुमको विश्व का मालिक बनाए मैं फिर निर्वाणधाम में जाकर रहता हूँ। फिर जब दु:ख शुरू होता है तब मेरा पार्ट भी शुरू होता है। मैं सुनवाई करता हूँ, मुझे कहते भी हैं हे रहमदिल। भक्ति भी पहले अव्यभिचारी अर्थात् एक शिव की करते हैं फिर देवताओं की शुरू करते हैं। अभी तो व्यभिचारी भक्ति बन गई है। पुजारी भी यह नहीं जानते कि कब से पूजा शुरू होती है। शिव वा सोमनाथ एक ही बात है। शिव है निराकार। सोमनाथ क्यों कहते हैं? क्योंकि सोमनाथ बाप ने बच्चों को ज्ञान-अमृत पिलाया है। नाम तो ढेर हैं बबुलनाथ भी कहते हैं क्योंकि बबुल के जो कांटे थे उनको फूल बनाने वाला, सर्व का सद्गति दाता बाप है। उनको फिर सर्वव्यापी कहना.. यह तो ग्लानि हुई ना। बाप कहते हैं जब संगम का समय होता है तब एक ही बार मैं आता हूँ, जब भक्ति पूरी होती है तब ही मैं आता हूँ। यह नियम है। मैं आता ही एक बार हूँ। बाप एक है, अवतार भी एक है। एक ही बार आकर सबको पवित्र राजयोगी बनाता हूँ। तुम्हारा राजयोग है, सन्यासियों का है हठयोग, राजयोग सिखला न सकें। यह हठयोगियों का भी एक धर्म है भारत को थमाने के लिए। पवित्रता तो चाहिए ना। भारत 100 परसेन्ट पावन था, अभी पतित है, तब कहते हैं आकर पावन बनाओ। सतयुग है पावन जीव आत्माओं की दुनिया। अभी तो गृहस्थ धर्म पतित है। सतयुग में गृहस्थ धर्म पावन था। अब फिर से वही पावन गृहस्थ धर्म की स्थापना हो रही है। एक बाप ही सर्व का मुक्ति, जीवनमुक्ति दाता है। मनुष्य, मनुष्य को मुक्ति, जीवनमुक्ति दे न सके।

तुम हो ज्ञान सागर बाप के बच्चे। तुम ब्राह्मण सच्ची-सच्ची यात्रा करायेंगे। बाकी सब हैं झूठी यात्रा कराने वाले। तुम हो डबल अहिंसक। कोई हिंसा नहीं करते हो – न लड़ते हो, न काम कटारी चलाते हो। काम पर जीत पाने में मेहनत लगती है। विकारों को जीतना है, तुम ब्रह्माकुमार कुमारियां शिवबाबा से वर्सा लेते हो, तुम आपस में भाई-बहन ठहरे। हम अभी निराकार भगवान के बच्चे आपस में भाई-भाई हैं फिर ब्रह्मा बाबा के बच्चे हैं – तो जरूर निर्विकारी बनना चाहिए ना अर्थात् विश्व की बादशाही तुमको मिलती है। यह है बहुत जन्मों के अन्त का जन्म। कमल फूल समान पवित्र बनो, तब ऊंच पद मिलता है। अभी बाप द्वारा तुम बहुत समझदार बनते हो। सृष्टि की नॉलेज तुम्हारी बुद्धि में है। तुम हो गये स्वदर्शन चक्रधारी। स्व आत्मा को दर्शन होता है अर्थात् नॉलेज मिलती है परमपिता परमात्मा से, जिसको ही नॉलेजफुल कहते हैं। मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, चैतन्य है। अब आये हैं नॉलेज देने। एक ही बीज है, यह भी जानते हैं। बीज से झाड़ कैसे निकलता है, यह उल्टा वृक्ष है। बीज ऊपर है। पहले-पहले निकलता है दैवी झाड़, फिर इस्लामी, बौद्धी.. वृद्धि होती जाती है। यह ज्ञान अभी तुमको मिला है और कोई भी दे न सके। तुम जो सुनते हो, वह तुम्हारी ही बुद्धि में रहा। सतयुग आदि में तो शास्त्र होते नहीं। कितनी सहज 5 हजार वर्ष की कहानी है ना। अच्छा –

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) समय कम है, बहुत गई थोड़ी रही.. इसलिए जो भी श्वांस बची है – बाप की याद में सफल करना है। पुराने पाप के हिसाब-किताब को चुक्तू करना है।

2) शान्ति स्वधर्म में स्थित होने के लिए पवित्र जरूर बनना है। जहाँ पवित्रता है वहाँ शान्ति है। मेरा स्वधर्म ही शान्ति है, मैं शान्ति के सागर बाप की सन्तान हूँ.. यह अनुभव करना है।

वरदान:- अकल्याण की सीन में भी कल्याण का अनुभव कर सदा अचल-अटल रहने वाले निश्चयबुद्धि भव
ड्रामा में जो भी होता है – वह कल्याणकारी युग के कारण सब कल्याणकारी है, अकल्याण में भी कल्याण दिखाई दे तब कहेंगे निश्चयबुद्धि। परिस्थिति के समय ही निश्चय के स्थिति की परख होती है। निश्चय का अर्थ है – संशय का नाम-निशान न हो। कुछ भी हो जाए लेकिन निश्चयबुद्धि को कोई भी परिस्थिति हलचल में ला नहीं सकती। हलचल में आना माना कमजोर होना।
स्लोगन:- परमात्म प्यार के पात्र बनो तो सहज ही मायाजीत बन जायेंगे।

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