brahma kumaris murli 16 november 2017

BRAHMA KUMARIS MURLI 16 NOVEMBER 2017 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 16 November 2017

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16/11/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – तुम्हें मनुष्य से देवता बनना है, इसलिए दैवी फज़ीलत (मैनर्स) धारण करो, आसुरी अवगुणों को छोड़ते जाओ, पावन बनो”
प्रश्नः- दैवी मैनर्स धारण करने वालों की परख किस एक बात से हो सकती है?
उत्तर:- सर्विस से। कहाँ तक पतित से पावन बने हैं और कितनों को पावन बनाने की सेवा करते हैं! अच्छे पुरुषार्थी हैं या अभी तक आसुरी अवगुण हैं? यह सब सर्विस से पता चलता है। तुम्हारी यह ईश्वरीय मिशन है ही दैवी फ़जीलत सिखलाने की। तुम श्रीमत पर पतित मनुष्य को पावन बनाने की सेवा करते हो।
गीत:- ओम नमो शिवाए……

ओम् शान्ति। भक्ति मार्ग में महिमा करते हैं – शिवाए नम: . ….. ऊंच ते ऊंच शिव, उनको ही शिव परमात्माए नम: कहा जाता है। ब्रह्मा देवताए नम:, विष्णु देवताए नम: कहा जाता है और शिव परमात्माए नम: ….. फ़र्क हुआ ना। परमात्मा एक है, वह ऊंच ते ऊंच है। उनकी महिमा भी ऊंच है। इस समय ऊंचे ते ऊंचा कर्तव्य करते हैं। उनका धाम भी ऊंचे ते ऊंचा है। नाम भी ऊंच है और किसको परमात्मा नहीं कहते। परमात्मा के लिए ही गायन है – हे पतित-पावन, आते भी हैं पतित दुनिया और पतित शरीर में। पतित शरीर का नाम है प्रजापिता ब्रह्मा। इसमें प्रवेश कर कहते हैं मैं बहुत जन्मों के अन्त वाले साधारण मनुष्य तन में प्रवेश करता हूँ। सूक्ष्मवतन वासी सम्पूर्ण ब्रह्मा में नहीं आते हैं। खुद कहते हैं इनके बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में आता हूँ। बहुत जन्म लेते ही हैं राधे-कृष्ण। उनके बहुत जन्मों के अन्त का जन्म साधारण है। ऐसे तो कहते नहीं हैं कि मैं पावन शरीर में प्रवेश करता हूँ। भगवानुवाच मैं साधारण तन में आता हूँ। अब भगवान जरूर आकरके इस साधारण तन द्वारा आत्माओं को बैठ समझाते हैं कि मैं परमपिता परमात्मा हूँ। मैं कृष्ण की आत्मा नहीं हूँ, न ब्रह्मा, विष्णु, शंकर की आत्मा हूँ। मैं परमपिता परमात्मा हूँ, जिसको शिव परमात्माए नम: कहा जाता है। मैं इसमें आया हूँ। मैं सूक्ष्मवतन वासी ब्रह्मा में प्रवेश नहीं करता हूँ। मुझे तो यहाँ पतितों को पावन बनाना है। मेरे द्वारा ही वह सूक्ष्मवतन वासी ब्रह्मा पावन बना है, इसलिए उनको सूक्ष्म में दिखाया है। कितना अच्छी रीति समझाते हैं। परन्तु मनुष्य सुनी अनसुनी कर उल्टी बातों पर चलते रहते हैं। आसुरी बुद्धि से सुनते हैं। ईश्वरीय बुद्धि से सुनें तो संशय सब मिट जायें। त्रिमूर्ति का चित्र दिखाने बिगर समझाना मुश्किल है। उन्होंने त्रिमूर्ति ब्रह्मा नाम रख दिया है क्योंकि शिवबाबा प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा नई दुनिया की रचना रचते हैं। तुम बच्चे अभी सम्मुख बैठे हो। सब पतित से पावन बन रहे हैं। जितना जो बनेगा वह सर्विस से दिखाई पड़ेगा। यह अच्छा पुरुषार्थी है, इनमें अजुन अवगुण हैं। देवताओं में दैवीगुण थे। हर एक अपने आसुरी गुण और उन्हों के दैवीगुण वर्णन करते हैं। अभी आसुरी अवगुणों को छोड़ना है। नहीं तो ऊंच पद नहीं पा सकेंगे।

बाप समझाते हैं – बच्चे दैवीगुण धारण करो। खान-पान, चलन में फ़ज़ीलत चाहिए। पतित मनुष्यों को बदफज़ीलत कहेंगे। देवतायें फ़ज़ीलत (मैनर्स) वाले हैं, तब तो उन्हों का गायन है। हर एक को पुरुषार्थ करना है – जो करेगा, सो पायेगा। अब भगवान तुमको सहज राजयोग और ज्ञान सिखला रहे हैं। ज्ञान सागर एक बाप है, जो तुम्हें ज्ञान देकर सद्गति में ले जाते हैं। उन्हें ही सुखदेव भी कहा जाता है। तो यहाँ की सब बातें न्यारी हैं। जो ब्राह्मण बनने वाले होंगे उन्हों की ही बुद्धि में यह ज्ञान बैठेगा। बहुत करके पूछते हैं – दादा को ब्रह्मा क्यों बनाया है? बोलो, इन बातों को बैठकर समझो। हम तुमको इनके 84 जन्मों की कहानी सुनायें। सब ब्रह्माकुमार ब्रह्माकुमारियाँ पावन बन देवता बन जायेंगे। पावन बनने बिगर वर्सा मिल नहीं सकता। भगवान ऊंच ते ऊंच निराकार शिवबाबा है। वर्सा देने के लिए जरूर ब्रह्मा तन में आयेगा। यह प्रजापिता ब्रह्मा है, सूक्ष्मवतन वासी ब्रह्मा को प्रजापिता नहीं कहेंगे। वहाँ थोड़ेही प्रजा रचेंगे। हम ब्रह्माकुमार कुमारियाँ साकार में हैं तो प्रजापिता ब्रह्मा भी साकार में है। यह राज़ आकर समझो। हम इस दादा को भगवान नहीं कहते। यह प्रजापिता है, इनके तन में शिवबाबा आते हैं, पावन बनाने। यहाँ कोई पावन है नहीं। त्रिमूर्ति शिव के बदले त्रिमूर्ति ब्रह्मा कह दिया है। परन्तु त्रिमूर्ति ब्रह्मा का कोई अर्थ नहीं है। ब्रह्मा को मनुष्यों का रचयिता भी कहते हैं इसलिए प्रजापिता कहा जाता है। इसमें वह निराकार प्रवेश कर वर्सा देते हैं। सूक्ष्मवतन वासी ब्रह्मा पावन है। वह पतित से पावन बनते हैं। हम ब्राह्मण भी पतित से पावन देवता बनते हैं। शिव परमात्माए नम: कहा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को देवता कहा जाता है। भगवान ही भक्तों का रक्षक है। वही सबको सद्गति देंगे। पतित-पावन हैं तो जरूर आकर पतितों को पावन बनायेंगे। पहले-पहले पावन हैं लक्ष्मी-नारायण। वे जरूर पुनर्जन्म लेते होंगे। 84 जन्म पूरे होने से फिर साधारण मनुष्य बन जाते हैं। उनमें फिर बाप प्रवेश करते हैं। तो यह व्यक्त ब्रह्मा, वह अव्यक्त ब्रह्मा। सूक्ष्मवतन में सृष्टि नहीं रची जाती है। अक्सर करके लोग इस बात पर मूँझते हैं तो तुमको समझाना है, बाप कहते हैं मैं बहुत जन्मों अर्थात् 84 जन्मों के अन्त के जन्म में प्रवेश करता हूँ। भारत में पहले देवी-देवता आये, वह फिर पिछाड़ी में हो जायेंगे। फिर पहले वही जाकर देवी-देवता बनेंगे। विराट रूप का चित्र भी जरूर होना चाहिए। बच्चों ने अर्थ सहित बनाया है। ब्राह्मण चोटी, देवता सिर, क्षत्रिय भुजायें, वैश्य पेट, शूद्र पैर। शूद्र के बाद फिर ब्राह्मण। वर्णों का भी चक्र हुआ ना। यह भी समझना और समझाना है।

बाबा ने बहुत बार समझाया है कि अखबार में पड़ता है फलाना स्वर्गवासी हुआ, तो उनको चिट्ठी लिखनी चाहिए कि स्वर्गवासी हुआ तो जरूर नर्क में था। और अब है ही नर्क तो जरूर पुनर्जन्म नर्क में लेंगे। अगर स्वर्ग में गया फिर तुम उनको बुलाकर नर्क का भोजन क्यों खिलाते हो? तुम रोते क्यों हो? परन्तु इतनी बुद्धि नहीं है जो समझें कि स्वर्ग की स्थापना तो बाप ही आकर करते हैं। राजयोग सिखलाते हैं। तुम ब्राह्मण संगम पर बाप से वर्सा ले रहे हो, बाकी सब हैं कलियुग में। संगम पर आत्मा परमात्मा मिल रहे हैं, इनको कुम्भ का मेला कहा जाता है। तुम ज्ञान गंगायें ज्ञान सागर से निकली हो। भक्ति में समझते हैं – गंगा में स्नान करने से पावन बन जायेंगे। पावन बनाना तो तुम्हारी मिशन का कर्तव्य है। यह है ईश्वरीय मिशन। तुम ही पतित मनुष्य को पावन देवता बनाते हो श्रीमत पर। श्रीकृष्ण पतित-पावन नहीं है। वह पूरे 84 जन्म लेते हैं। पहले हैं लक्ष्मी-नारायण फिर अन्त में ब्रह्मा सरस्वती। आदि देव, आदि देवी बनते हैं, अभी यह बातें किसने समझाई? शिव परमात्माए नम: गाते भी हैं – हे परमपिता परमात्मा आपकी गत मत सबसे न्यारी है। वह श्रीमत देते हैं गति के लिए। गति और सद्गति। दुगर्ति वालों की सद्गति करने वाला। उनकी श्रीमत सब मनुष्यों से न्यारी है। बाकी भक्ति मार्ग है घोर रात्रि, आधाकल्प है ज्ञान दिन। शिवबाबा कहते हैं मैं अन्धियारी रात में आता हूँ, रात को दिन बनाने। यह ज्ञान एक ही ज्ञान सागर शिवबाबा के पास है। ऋषि मुनि आदि सब कहते आये हैं कि परमात्मा बेअन्त है। बाप को नहीं जानते तो गोया नास्तिक ठहरे। आधाकल्प है नास्तिक, आधाकल्प है आस्तिक। तुम अब बाप को, बाप की रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानते हो और कोई नहीं जानते इसलिए कहा जाता है – निधन के। अनेक धर्म अनेक मतें हो गई हैं। अब बाप कहते हैं इस पुरानी दुनिया का सन्यास करना है। याद करना है शान्तिधाम और सुखधाम को। जितना याद करेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। गृहस्थ व्यवहार में भल रहो सिर्फ पवित्र बनो। धन्धे बिगर गृहस्थ कैसे चलेगा। सिर्फ पवित्र बनना है और बाप को याद करना है। बाप कहते हैं मैं सोनार भी हूँ। तुम्हारी आत्मा और शरीर दोनों ही पतित हैं इसलिए तुम्हारी आत्मा जब पावन बनें तब फिर शरीर भी पावन मिले। सच्चे सोने का जेवर भी ऐसा बनेगा ना। अब तो आत्मा और शरीर दोनों ही आइरन एजड हैं। फिर पावन बनाने की युक्ति बाप बताते हैं इसलिए कहते हैं तुम्हारी गत मत, श्रीमत सबसे न्यारी है। अभी तुम जानते हो यह सद्गति का रास्ता कोई बतला नहीं सकते हैं। गायन होता है तो जरूर कुछ करके गये हैं। अभी कलियुग है फिर सतयुग होना है। संगम पर तुम बैठे हो। तुम ब्रह्मा वंशी ब्राह्मण हो। कमल फूल सम पवित्र रहते हो। तुम्हारी माया के साथ युद्ध है। माया से ही कई फेल हो जाते हैं। काम का घूँसा जोर से लगता है। बाबा कहते हैं खबरदार रहो। अगर गिरा तो फिर किसी को कह नहीं सकेंगे कि काम महाशत्रु है। बाप कहते हैं फिर भी पुरुषार्थ करो, एक बार हराया, दूसरी बार हराया फिर अगर तीसरी बार हराया तो खत्म। पद भ्रष्ट हो जायेगा। प्रतिज्ञा की है तो उस पर पूरा रहना है। प्रतिज्ञा कर फिर पतित नहीं बनना चाहिए। परन्तु सब तो प्रतिज्ञा पर कायम नहीं रहते हैं। गिरते भी रहते हैं। कोई फिर बाप को छोड़ भी देते हैं। बहुत भागने वाले भी हैं। अन्त में तुमको पूरा साक्षात्कार होगा कि कौन क्या बनेंगे! पुरुषार्थ पूरा करना चाहिए। जो दु:ख देते हैं वह दु:खी होकर मरते हैं। बाप तो सबको सुख देने वाला है। तुम्हारा भी काम है सबको सुख देना। कर्मणा में भी किसको दु:ख दिया तो दु:खी होकर मरेंगे। पद भी भ्रष्ट हो जायेगा। बेहद के बाप के साथ पूरा फरमानबरदार, व़फादार होकर रहना है । अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप के साथ व़फादार, फरमानबरदार होकर रहना है। कभी किसी को दु:ख नहीं देना है।

2) बाप से पूरा वर्सा लेने के लिए पवित्र बनने का पुरुषार्थ करना है। काम की चोट कभी नहीं खानी है। इससे बहुत सावधान रहना है।

वरदान:- अपनी श्रेष्ठ दृष्टि, वृत्ति द्वारा सृष्टि का परिवर्तन करने वाले विश्व के आधारमूर्त भव 
आप बच्चे विश्व की सर्व आत्माओं के आधारमूर्त हो। आपकी श्रेष्ठ वृत्ति से विश्व का वातावरण परिवर्तन हो रहा है, आपकी पवित्र दृष्टि से विश्व की आत्मायें और प्रकृति दोनों पवित्र बन रही हैं। आपकी दृष्टि से सृष्टि बदल रही है। आपके श्रेष्ठ कर्मो से श्रेष्ठाचारी दुनिया बन रही है, ऐसी जिम्मेवारी का ताज पहनने वाले आप बच्चे ही भविष्य के ताजधारी बनते हो।
स्लोगन:- न्यारे और अधिकारी बनकर कर्म करो तो कोई भी बंधन अपने बंधन में बांध नहीं सकता।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य

अब यह जो हम कहते हैं कि प्रभु हम बच्चों को उस पार ले चलो, उस पार का मतलब क्या है? लोग समझते हैं उस पार का मतलब है जन्म मरण के चक्र में न आना अर्थात् मुक्त हो जाना। अब यह तो हुआ मनुष्यों का कहना परन्तु वो कहता है बच्चों, सचमुच जहाँ सुख शान्ति है, दु:ख अशान्ति से दूर है उसको कोई दुनिया नहीं कहते। जब मनुष्य सुख चाहते हैं तो वो भी इस जीवन में होना चाहिए, अब वो तो सतयुगी वैकुण्ठ देवताओं की दुनिया थी जहाँ सर्वदा सुखी जीवन थी, उसी देवताओं को अमर कहते थे। अब अमर का भी कोई अर्थ नहीं है, ऐसे तो नहीं देवताओं की आयु इतनी बड़ी थी जो कभी मरते नहीं थे, अब यह कहना उन्हों का रांग है क्योंकि ऐसे है नहीं। उनकी आयु कोई सतयुग त्रेता तक नहीं चलती है, परन्तु देवी देवताओं के जन्म सतयुग त्रेता में बहुत हुए हैं, 21 जन्म तो उन्होंने अच्छा राज्य चलाया है और फिर 63 जन्म द्वापर से कलियुग के अन्त तक टोटल उन्हों के जन्म चढ़ती कला वाले 21 हुए और उतरती कला वाले 63 हुए, टोटल मनुष्य 84 जन्म लेते हैं। बाकी यह जो मनुष्य समझते हैं कि मनुष्य 84 लाख योनियां भोगते हैं, यह कहना भूल है। अगर मनुष्य अपनी योनी में सुख दु:ख दोनों पार्ट भोग सकते हैं तो फिर जानवर योनी में भोगने की जरूरत ही क्या है। अब मनुष्यों को यह नॉलेज ही नहीं, मनुष्य तो 84 जन्म लेते हैं, बाकी टोटल सृष्टि पर जानवर पशु, पंछी आदि टोटल 84 लाख योनियां अवश्य हैं। अनेक किस्म की जैसे पैदाइश है, उसमें भी मनुष्य, मनुष्य योनी में ही अपना पाप पुण्य भोग रहे हैं। और जानवर अपनी योनियों में भोग रहे हैं। न मनुष्य जानवर की योनी लेता और न जानवर मनुष्य योनी में आता है। मनुष्य को अपनी योनी में (जन्म में) भोगना भोगनी पड़ती है तो दु:ख सुख की महसूसता आती है। ऐसे ही जानवर को भी अपनी योनी में सुख दु:ख भोगना है। मगर उन्हों में यह बुद्धि नहीं कि यह भोगना किस कर्म से हुई है? उन्हों की भोगना को भी मनुष्य फील करता है क्योंकि मनुष्य है बुद्धिवान, बाकी ऐसे नहीं मनुष्य कोई 84 लाख योनियां भोगते हैं। जड़ झाड़ भी योनी लेते हैं, यह तो सहज और विवेक की बात है कि जड़ झाड़ ने क्या कर्म अकर्म किया है जो उन्हों का हिसाब-किताब बनेगा, जैसे देखो गुरुनानक साहब ने ऐसे महावाक्य उच्चारण किये हैं – अन्तकाल में जो पुत्र सिमरे ऐसी चिंता में जो मरे सुअर की योनी में वल वल उतरे .. परन्तु इस कहने का मतलब यह नहीं है कि मनुष्य कोई सूकर की योनि लेता है परन्तु सूकर का मतलब यह है कि मनुष्यों का कार्य भी ऐसा होता है जैसे जानवरों का कार्य होता है। बाकी ऐसे नहीं कि मनुष्य कोई जानवर बनते हैं। अब यह तो मनुष्यों को डराने के लिये शिक्षा देते हैं। तो अपने को इस संगम समय पर अपनी जीवन को पलटाए पापात्मा से पुण्यात्मा बनना है। अच्छा – ओम् शान्ति।

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TODAY MURLI 16 NOVEMBER 2017 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 16 NOVEMBER 2017

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16/11/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you have to change from human beings into deities. Therefore, imbibe divine manners. Continue to renounce devilish traits, become pure.
Question: Through which activity of theirs can you recognise those who imbibe divine manners?
Answer: Through their service. You can recognise to what the extent they have become pure from impure and how many they have served to make them pure. Are you a good effort-maker or do you still have devilish traits? All of this can be known from the service you do. This Godly mission of yours is to teach divine manners. By following shrimat you serve to make impure human beings pure.
Song: Salutations to Shiva.

Om shanti. On the path of devotion, they sing the praise: Salutations to Shiva. The Highest on High is Shiva and it is to Him that people say: Salutations to the Supreme Soul Shiva. It is said: Salutations to the deity Brahma, salutations to the deity Vishnu and salutations to the Supreme Soul Shiva. So, there is a difference. God is One and He is the Highest on High. His praise is also the highest. At this time, He is carrying out the highest task of all. His place of residence is also the highest of all. His name too is the highest of all. No one else can be called the Supreme Soul, God. This praise “Oh Purifier!” is only of God. He comes into the impure world and enters an impure body. The name of the impure body is Prajapita Brahma. He enters this one and says: I enter the body of an ordinary human being at the end of the last of his many births. He doesn’t enter the perfect Brahma who is a resident of the subtle region. He Himself says: I come at the end of the last of this one’s many births. It is Radhe and Krishna who take many births. The last of their many births is an ordinary birth. He doesn’t say that He enters a pure body. God speaks: I enter an ordinary body. God definitely comes in this ordinary body and sits and explains to souls: I am the Supreme Father, the Supreme Soul. I am not the Krishna soul nor am I the soul of Brahma, Vishnu or Shankar. I am the Supreme Father, the Supreme Soul, to whom you say: Salutations to the Supreme Soul Shiva. I have entered this one. I don’t enter the body of Brahma, the resident of the subtle region. I have to come here to purify the impure. It was through Me that the Brahma who resides in the subtle region became pure and this is why he has been shown in a subtle form. Baba explains so well. However, people ignore what they hear and continue to follow wrong things. They listen to everything with devilish (impure) intellects. If they were to listen with Godly intellects, all their doubts would end. It is difficult to explain without the picture of the Trimurti. They have put the name “Trimurti Brahma” because Shiv Baba creates the creation of the new world through Prajapita Brahma. You children are now sitting personally in front of Baba. You are all becoming pure from impure. How much you become that is revealed through the service you do: this one is a good effort-maker, this one still has defects. Deities had divine virtues. Everyone speaks of their own defects and of the virtues of the deities. You now have to renounce devilish defects. Otherwise, you won’t be able to claim a high status. The Father explains: Children, imbibe divine virtues! You need to be careful with your food and drink and you also need manners in the way you behave. Impure human beings are said to be those who have bad manners. Deities are those who have good manners and that is why they are praised. Each one has to make effort. Whoever does something will receive the reward of it. God is now teaching you easy Raja Yoga and knowledge. Only the one Father is the Ocean of Knowledge who gives you knowledge and takes you into salvation. He alone is called Sukhdev (Deity of Happiness). All of these things are unique. This knowledge will only sit in the intellects of those who are to become Brahmins. Generally, many people ask: Why was Dada made Brahma? Tell them: Come and sit and understand these things. We will tell you the story of this one’s 84 births. All the Brahma Kumars and Kumaris will become pure and then become deities. You cannot receive the inheritance without becoming pure. God is the highest-on-high incorporeal Shiv Baba. He definitely enters the body of Brahma to give you the inheritance. This one is Prajapita Brahma. The Brahma who resides in the subtle region would not be called Prajapita (Father of Humanity). People would not be created there. We Brahma Kumars and Kumaris exist in corporeal forms and, therefore, Prajapita Brahma, too, has to be in a corporeal form. Come and understand the significance of this. We don’t call this Dada God. This one is Prajapita, the Father of People, and Shiv Baba enters his body in order to purify everyone. No one here is pure. Instead of saying “Trimurti Shiva”, they have said “Trimurti Brahma”. However, there is no meaning to “Trimurti Brahma”. Brahma is also called the creator of human beings. That is why he is called Prajapita. The incorporeal One enters this one and gives you your inheritance. The Brahma who resides in the subtle region is pure. This corporeal one is becoming pure from impure. From being impure, we Brahmins are also becoming pure deities. It is said: Salutations to the Supreme Soul Shiva. Brahma, Vishnu and Shankar are called deities. God alone is the Protector of Devotees. Only He grants salvation to everyone. He is the Purifier and so He would definitely come and make impure ones pure. The first pure beings are Lakshmi and Narayan. They would definitely take rebirth. While completing their 84 births, they become ordinary human beings. The Father then enters this one. Therefore, this one is the corporeal Brahma and the other one is the subtle Brahma. A world is not created in the subtle region. Generally, people are confused about this and so you have to explain: The Father says: I enter this one at the end of his many births, that is, at the end of his 84th birth. First the deities came into Bharat and they will then move back. They are then the first ones to become deities once again. You should definitely also have the picture of the variety-form image. Children have made it so that it has a meaning. Brahmins are the topknot, deities are the head, warriors are the arms, merchants are the stomach and shudras are the feet. After shudras, there are the Brahmins. This is a cycle of the castes. This also has to be understood and explained. Baba has told you many times that when they print in the newspapers that So-and-so has become a resident of heaven; you should write them a letter saying that, since he has gone to heaven, he must definitely have been living in hell. This is now hell, and so he would definitely take rebirth in hell. If he went to heaven, why do you invoke him and feed him the food of hell? Why are you crying? However, none of them has enough of an intellect to understand that only the Father comes and establishes heaven and that He teaches Raja Yoga. You Brahmins are claiming your inheritance from the Father at the confluence age and all the rest are in the iron age. At the confluence age, souls meet the Supreme Soul and this is called the Kumbha mela. You Ganges of knowledge have emerged from the Ocean of Knowledge. On the path of devotion they believe that by bathing in the Ganges they will become pure. It is the task of your mission to make everyone pure. This is the Godly mission. You make impure human beings into pure deities by following shrimat. Shri Krishna is not the Purifier. He takes the full 84 births. First are Lakshmi and Narayan and then, at the end, they become Brahma and Saraswati. They become Adi Dev and Adi Devi. Who explains all of these things? They sing: Salutations to the Supreme Soul Shiva. O Supreme Father, Supreme Soul, Your ways and means are unique. He gives you shrimat for salvation; liberation and salvation. He is the One who brings salvation to those who are in degradation. His shrimat is absolutely distinct from that of all human beings. The path of devotion is the extreme night. For half the cycle, it is knowledge, the day. Shiv Baba says: I come in the dark night to change night into day. Only one Shiv Baba, the Ocean of Knowledge, has this knowledge. All the rishis and munis have been saying: God is infinite. They don’t know the Father, which means that they are atheists. For half the cycle you are atheists and for half the cycle you are theists. You now know the Father and the beginning, the middle and the end of the Father’s creation. No one else knows it. This is why they are called orphans. There are innumerable religions and innumerable opinions. The Father says: You now have to renounce this old world. You have to remember the land of peace and the land of happiness. The more you remember Him, the higher the status you will claim. You may live at home with your family, but remain pure. How would your household continue without a business? You simply have to become pure and remember the Father. The Father says: I am the Goldsmith. You souls and your bodies are both impure. Therefore, when you souls become pure you will receive pure bodies. Jewellery made of real gold would also be real. Now, both the soul and the body are iron aged. The Father is telling you the method with which you can make yourself pure. This is why it is said: Your ways and means (shrimat) are unique. You now know that no one else can show you the path to salvation. Since He is praised, He must definitely have done something before He went away. It is now the iron age and the golden age is to come. You are sitting at the confluence age. You are Brahmins who belong to the clan of Brahma. You remain as pure as a lotus. Your war is with Maya. It is because of Maya that some fail; they are punched very hard by lust. Baba says: Remain cautious. If you fall, you won’t be able to tell anyone that lust is the greatest enemy. The Father says: Nevertheless, make effort. You are defeated once, you are defeated twice but if you are defeated a third time, everything is over: the status is destroyed. You made a promise and so you have to follow it fully. Having made this promise, you mustn’t become impure. However, not everyone remains firm on his or her promise; they still continue to fall. Some even leave the Father; there are many who run away. At the end, you will all have visions of who will become what. You should make full effort. Those who cause sorrow will die in sorrow. The Father is the One who gives everyone happiness. It is also your duty to give everyone happiness. If you cause anyone sorrow through your actions, you will die in sorrow and your status will be destroyed. You have to remain completely obedient and faithful to the unlimited Father. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Remain faithful and obedient to the Father. Don’t cause anyone sorrow.
  2. In order to claim your full inheritance from the Father, make effort to become pure. Never allow yourself to be hurt by lust. Remain very cautious about that.
Blessing: May you be an image of support for the world and transform the world with your elevated drishti and attitude.
You children are images of support for all souls of the world. The atmosphere of the world is being transformed with your elevated attitude. Souls of the world and matter are both being transformed with your pure drishti. The world is changing through your drishti. The world is becoming an elevated world with your elevated actions. The children who wear such a crown of responsibility are the ones who will be crowned in the future.
Slogan: Perform actions while detached and with a right and no bondage will be able to bind you.

*** Om Shanti ***

Invaluable versions of Mateshwari

When we say: God, take us children across to the other side, what does “to the other side” mean? People believe that to go to the other side means to become free from the cycle of birth and death, that is, to be liberated. This is what people say, but that One says: Children, the place where there is true happiness and peace, which is far away from sorrow and peacelessness, cannot be called a world. When people want happiness, that should be in this birth. That was the golden-aged world of deities where they always had a life of total happiness. Those deities were said to be immortal. “Immortal” also has no meaning. It doesn’t mean that the deities had such long lifespan that they never died. Their saying this is wrong because it is not like that. Their lifespan was not as long as the golden and silver ages, for the deities had many births in the golden and silver ages. They ruled the kingdom very well for 21 births and then they took 63 births from the copper age to the end of the iron age. In all, they had 21 births in the stage of ascent and 63 births in the descending stage. In total, human beings take 84 births. When people think that human beings go through 8.4 million species, that is a mistake. If human beings experience both happiness and sorrow in their human lives, then what would be the need for them to suffer as animal species? People do not have this knowledge. Human beings take 84 births, but there must definitely be 8.4 million species of animals, birds, etc.in this world. There is the creation of many types, and human beings experience within that their sin and charity in the human birth and animals experience it in their birth. Human beings cannot take birth as animals and animals cannot take birth as human beings. Human beings have to experience everything in their human lives, and so there is the feeling of happiness or sorrow. In the same way, animals also have to experience happiness and sorrow in their own species. However, they do not have the intellect to understand which action caused them to suffer. Human beings feel their suffering (of the animals) because human beings are intelligent, but it isn’t that human beings take birth in 8.4 million species. The tree is said to be non-living and it has its own species. This is easy and it is a matter of common sense to understand what actions or neutral actions a non-living tree would have performed for it to create karmic accounts. For instance, look at the elevated versions that Guru Nanak spoke: Whoever remembers their son, whoever dies with that worry in their final moments would take rebirth as a boar. However, saying this does not mean that a human being would take birth as a boar, but a boar means that the actions of human beings are like that of animals; it isn’t that human beings become animals. These teachings are given to make people afraid. So, we have to transform our lives at the confluence age and become charitable souls from sinful souls. Achcha. Om shanti

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