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Aaj ki murli October 2019 – Om shanti murli today

ब्रह्माकुमारी मुरली : आज की मुरली (हिंदी मुरली)

Brahma kumaris Om Shanti Murli : Aaj ki Murli October 2019

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आज की मुरली ऑनलाइन पढ़ें  :- TODAY MURLI

Aaj ki murli July 2019 – Om shanti murli today

ब्रह्माकुमारी मुरली : आज की मुरली (हिंदी मुरली)

Brahma kumaris Om Shanti Murli : Aaj ki Murli July 2019

 

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आज की मुरली ऑनलाइन पढ़ें
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Daily Murli 20 May 2017 : Bk Dainik Gyan Murli (Hindi)

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20/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम ब्राह्मणों को ईश्वर की गोद मिली है, तुम्हें नशा रहना चाहिए बाप ने इस तन द्वारा हमें अपना बनाया है”
प्रश्नः- बाप ने कौन सा दिव्य कर्तव्य किया है? जिस कारण उनकी इतनी महिमा गाई हुई है?
उत्तर:- पतितों को पावन बनाना। सभी मनुष्यों को माया रावण की जंजीरों से छुड़ाना – यह दिव्य कर्तव्य एक बाप ही करते हैं। बेहद के बाप से ही बेहद सुख का वर्सा मिलता है, जो फिर आधाकल्प तक चलता है। सतयुग में है गोल्डन जुबली, त्रेता में है सिल्वर जुबली। वह सतोप्रधान, वह सतो। दोनों को ही सुखधाम कहा जाता है। ऐसे सुखधाम की स्थापना बाप ने की है, इसलिए उनकी महिमा गाई जाती है।
गीत:- इन्साफ का मन्दिर है यह….

 

ओम् शान्ति। बाप और दादा मिलकर के बच्चों को समझाते हैं। कभी बाप समझाते हैं, कभी दादा भी समझाते हैं क्योंकि यह शरीर दादा का भी घर है। परमपिता परमात्मा तो रहते हैं परमधाम में। जरूर कोई समय में उनका यह भारत ही घर होता है तब तो शिवरात्रि मनाई जाती है। शिव के बहुत मन्दिर भी हैं। तो सिद्ध होता है कि भारत खण्ड में ही उनका आना होता है, पतित को पावन बनाने वा सभी मनुष्यों को माया रावण की जंजीरों से छुड़ाने क्योंकि अब रावण का राज्य है। रावण को जलाते भी भारत में हैं। शिवरात्रि और कृष्ण जयन्ती भी भारत में ही मनाते हैं। रावण का राज्य भी आधाकल्प चलता है। फिर बाप आते हैं पतितों को पावन बनाने। बस एक ही बार पावन बना देते हैं फिर आते ही नहीं। बाप का नाम भारत में प्रसिद्ध है। जरूर कोई दिव्य कर्तव्य किया है तब तो उनका नाम है। मनुष्य, मनुष्य को तो पावन बना न सकें। पतित-पावन एक ही बाप को कहा जाता है। स्वर्ग नर्क यह नाम भी भारत पर ही पड़ा है। भारत 5 हजार वर्ष पहले स्वर्ग था, उनको परिस्तान भी कहा जाता है, तो जरूर बाप से वर्सा मिला है। बाप अक्षर बहुत मीठा लगता है। उनसे ही बेहद सुख का वर्सा मिलता है जो सुख आधाकल्प चलता है। जिसकी गोल्डन जुबली, सिल्वर जुबली मनाते हैं। सतयुग को गोल्डन जुबली, त्रेता को सिलवर जुबली कहते हैं। वह सतोप्रधान, वह सतो, दोनों को मिलाकर सुखधाम कहा जाता है। नम्बरवन हैं सूर्यवंशी, सेकेण्ड नम्बर चन्द्रवंशी। बाप जब इस भारत खण्ड में आते हैं तो भारत को पावन बनाते हैं फिर जब भक्ति शुरू होती है तो कलायें कमती होती जाती हैं। झाड़ जड़जड़ीभूत तमोप्रधान बन जाता है। सब भक्त बन जाते हैं। साधू भी साधना करते हैं बाप को पाने के लिए अर्थात् मुक्ति जीवनमुक्तिधाम जाने के लिए। आधाकल्प भक्ति करते हैं बाप को पाने के लिए। जब वह समय पूरा होता है तो फिर बाप आता है भक्तों को सुखी बनाने। सतयुग में तो सुख-शान्ति, सम्पत्ति सब है। वहाँ कभी अकाले मृत्यु नहीं होती है। कभी रोते, पीटते नहीं। यह कौन समझाते हैं? बेहद का बाप, उनका नाम भी चाहिए ना। कलियुग में है ही अन्धियारा। भक्ति मार्ग की ठोकरें खाते रहते हैं। स्वर्ग में तो दु:ख की बात होती नहीं, सब सुखी रहते हैं इसलिए भगवान को पुकारते नहीं। सतयुग को सुखधाम, कलियुग को दु:खधाम कहा जाता है। वल्लभाचारी वैष्णव लोग समझते हैं कि सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। यथा राजा रानी तथा प्रजा सुखी थे, उसको गोल्डन एज कहा जाता है। सतयुग से लेकर जो चक्र में आते हैं उनके ही 84 जन्म होंगे। बच्चों को समझाया है कि यह झाड़ है। सब पत्ते इकट्ठे नहीं आयेंगे। सतयुग में एक ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म था, उनको हिन्दू नहीं कहेंगे। देवी-देवतायें तो सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण गाये जाते हैं.. जो उन्हों के पुजारी हैं तो वह जरूर उसी धर्म के होने चाहिए। क्रिश्चियन क्राइस्ट को याद करते तो उस धर्म के हैं ना। फिर भारतवासियों ने अपने देवी-देवता धर्म का नाम क्यों गुम कर दिया है?

तुम जानते हो हम सो देवता थे। हम ही जन्म-मरण में आते हैं। हम सो देवता, क्षत्रिय बनते हैं। 84 जन्म लेते-लेते अन्त में आकर शूद्र बनते हैं। शूद्र से फिर ब्राह्मण बनना पड़े। ब्राह्मण बनते हैं ब्रह्मा की औलाद। सभी आत्मायें वास्तव में शिव की औलाद तो हैं ही। वह है बेहद का बाप। उनको परमपिता परमात्मा, ओ गॉड फादर अथवा हेविनली गॉड फादर कहा जाता है। वह है स्वर्ग का रचयिता। अब बुद्धि से बच्चों को काम लेना है। जबकि बाप स्वर्ग स्थापन करते हैं तो हम क्यों न नई दुनिया का वारिस बनें। अब वह नई दुनिया पुरानी हो गई है फिर नई दुनिया कैसे बनेंगी? गांधी भी गाते थे ना कि नया रामराज्य, नया भारत हो। हम जानते हैं कि अब वह स्थापन हो रहा है। अभी तुम ब्राह्मणों को ईश्वरीय गोद मिली है, बेहद के बाप को अपना बनाया है – प्रैक्टिकल में। ऐसे तो सब कहते रहते हैं ओ गॉड फादर रहम करो। परन्तु इस समय बाप ने आकर इस तन द्वारा तुमको अपना बनाया है। वह कलियुगी ब्राह्मण हैं कुख की सन्तान, हम हैं ब्रह्मा मुख वंशावली। प्रजापिता ब्रह्मा ठहरा तब तो इतने बच्चे पैदा करेंगे ना। तो यह है मुख वंशावली। परमपिता परमात्मा ने एडाप्ट किया है – ब्रह्मा मुख द्वारा, तो गोया माता भी हो गई। तुम मात-पिता… ओ बाबा आपने हमको ब्रह्मा मुख द्वारा अपना बनाया है। यह भी समझने की बातें हैं। ज्ञान सागर एक ही बाप है। ज्ञान से ही सद्गति अर्थात् दिन होता है। अज्ञान से रात होती है। कलियुग तो रात है ना, इनको भक्तिमार्ग कहा जाता है। शास्त्र सब भक्तिमार्ग के हैं। उनसे कोई बाप के पास पहुंचने का रास्ता नहीं मिलता है। बाप आते ही हैं कल्प-कल्प। शिवरात्रि मनाते हैं तो जरूर वह आते हैं। उनको अपना शरीर नहीं है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को भी देवता कहा जाता है। ब्रह्मा देवता नम:, विष्णु देवता नम: फिर शिव परमात्मा नम:। ब्रह्मा है इस साकार सिज़रे का बड़ा। अभी प्रैक्टिकल में है। बाप आते ही हैं संगमयुग पर। अभी यादव भी हैं, कौरव भी हैं और पाण्डव तो हैं योगबल वाले शक्ति सेना। तो अभी तुम बच्चे जानते हो शिवबाबा प्रैक्टिकल में ब्रह्मा तन में पधारा है। उस निराकार शिव का मन्दिर भी है। शिवरात्रि मनाई जाती है। परन्तु गवर्मेन्ट ने शिव जयन्ती की छुट्टी भी निकाल दी है। औरों की जयन्तियां मनाते रहते हैं। धर्म की ताकत तो है नहीं इसलिए अनराइटियस, अनलॉफुल, इनसालवेन्ट बन पड़े हैं। नो प्योरिटी, नो पीस, नो प्रासपर्टी। इस ही भारत में 5 हजार वर्ष पहले जब गोल्डन जुबली थी तो प्योरिटी, पीस, प्रासपर्टी थी। कभी अकाले मृत्यु नहीं होता था। भारत जैसा ऊंच सम्पतिवान और कोई हो नहीं सकता। भारत खण्ड है सबसे ऊंच। उनकी हिस्ट्री भी बनी हुई है। पावन भी यह भारत तो पतित भी यह भारत बनता है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले ही यह चक्कर लगाकर शूद्र वर्ण में आये। फिर शूद्र वर्ण से अब ब्राह्मण वर्ण में आये हो। देवताओं से भी ब्राह्मण वर्ण ऊंच चोटी पर है। सतयुगी देवताओं की जो महिमा है, वह बाप की महिमा से अलग है। बाप को कहते हैं ज्ञान का सागर, आनंद का सागर, फिर देवताओं को कहेंगे सर्वगुण सम्पन्न.. वहाँ विकार की बात नहीं। शास्त्रों में तो बहुत गपोड़े लगा दिये हैं कि कृष्णपुरी में भी कंस, रावण आदि थे। वास्तव में तो इस समय कंसपुरी है। फिर सतयुग में होगी कृष्णपुरी। यह है संगम इसलिए ही उन्होंने कंस, जरासन्धी, रावण आदि को सतयुगी देवताओं से मिला दिया है। यह है ही आसुरी रावण सप्रदाय। अभी तुम ईश्वरीय सप्रदाय बने हो। ईश्वरीय गोद में आकर पवित्र बन फिर 21जन्मों के लिए दैवी गोद में जाते हो। 8 जन्म दैवी गोद फिर 12 जन्म क्षत्रिय गोद। भारत में ही यह गाया हुआ है कि कन्या वह जो 21 कुल का उद्धार करे। सो तुम ही वह कुमारियां हो।

अभी तुम हो ईश्वरीय कुल के। दादा है शिवबाबा, बाप है ब्रह्मा। तुम हो ब्रह्माकुमार कुमारियां। वर्सा उस बेहद के बाप से मिलता है। देने वाला वह है। वह तो निराकार है। वह राजयोग अब कैसे सिखलावे। नर से नारायण बनाने लिए जरूर साकार शरीर चाहिए। तो इस पतित तन में आते हैं जिसने 84 जन्म लिए हैं। यह बड़े से बड़ी युनिवर्सिटी है। जहाँ स्वयं गॉड बैठ राजयोग सिखलाते हैं, राजाओं का राजा बनाने। गीता का रचयिता कृष्ण नहीं। गीता माता ने कृष्ण को जन्म दिया। जो देवता बनें उन्हों को जन्म मिला शिवबाबा से। क्रिश्चियन को जन्म मिला बाइबिल से क्राइस्ट द्वारा। तुमको भी ब्राह्मण से देवता किसने बनाया? शिवबाबा ने ब्रह्मा मुख द्वारा। यह तुम्हारा है बेहद का सन्यास। वह है हद का रजोगुणी सन्यास। वह निवृत्तिमार्ग का सन्यास। तुमको वैराग्य आया है इस पुरानी छी-छी दुनिया से। तुम जानते हो कि यह तो अब खत्म होने वाली है। इससे तो क्यों न हम स्वर्ग के रचयिता बाप को याद करें। बाप कहते हैं लाडले बच्चे, तुम बहुत जन्मों के बाद आकर मिले हो। तुमने 84 जन्म पूरे लिए हैं। अब तुमको फिर देवता वर्ण में जाना है। इसमें परहेज भी बहुत है, अशुद्ध चीज़ खा न सकें। बाप कहते हैं मैं संगम पर आता ही हूँ मूत पलीती कपड़ों को पावन बनाने। अब मौत सामने खड़ा है। यादव, कौरव और पाण्डव भी हैं तो जरूर पाण्डवपति भी होगा। पाण्डव-पति/पिता परमात्मा को कहेंगे। तुम फिर हो पण्डे। राह बताते हो सुखधाम, शान्तिधाम की, इसलिए तुमको पाण्डव शिव शक्ति सेना कहा जाता है। यादव यूरोपवासी तो अपने ही कुल का नाश करते हैं। भारत में हैं पाण्डव और कौरव – जिनके लिए कहते हैं कि असुर और देवताओं की युद्ध चली। तुम अभी तो देवता नहीं हो, बनना है। श्रीमत से तुम स्वर्ग के मालिक बनते हो। बाकी सबकी है आसुरी रावण मत। आधाकल्प रावण की मत चलती है। अभी तो सारी दुनिया तमोप्रधान है। यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ, जहाँ बाप बैठ राजयोग सिखलाते हैं। जब राजाई स्थापन हो जाती है तो यह विनाश ज्वाला प्रज्जवलित होती है, यह ज्ञान प्राय: लोप हो जाता है। फिर ड्रामा अनुसार जो भी शास्त्र हैं भक्ति मार्ग के, वही निकलेंगे। सन्यासियों के फालोअर्स बहुत होंगे। सभी पाप धोने गंगा पर जाते हैं। अब गंगा नदी तो किसी को पावन कर नहीं सकती। वह तो पानी के सागर से निकली हुई है। ज्ञान गंगायें तुम हो, जो ज्ञान सागर से निकली हो। बाकी गंगा कोई पतित-पावनी होती नहीं है। बच्चों को फिर से भक्ति का फल बेहद सुख का वर्सा देने आया हूँ। जो बाप से आकर पढ़ेंगे वही स्वर्ग में आयेंगे, बाकी सब अपने-अपने सेक्शन में चले जायेंगे। इस ड्रामा-पा को भी समझना है। चक्र को जानने से तुम चक्रवर्ती राजा बनते हो। गवर्मेन्ट ने भी चक्र निकाला है। 3 शेर दिखाकर फिर नीचे लिखते हैं सत्यमेव जयते।

अब शिवबाबा तुम सब पार्वतियों को आकर अमर कथा सुना रहे हैं – अमरपुरी का मालिक बनाने। इसको ही सत्य नारायण की कथा वा अमर कथा कहा जाता है। यह कथा एक ही बार सुनकर तुम स्वर्ग के मालिक बनते हो। बाकी सब हैं दन्त कथायें। अच्छा –

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) देवता वर्ण में जाने के लिए भोजन की बहुत परहेज रखनी है। कोई भी अशुद्ध चीज़ नहीं खानी है।

2) इस पुरानी छी-छी दुनिया, जो कि अब खत्म होने वाली है, इससे बेहद का वैराग्य रख स्वर्ग के रचयिता बाप को याद करना है।

वरदान:- सर्व प्राप्तियों की स्मृति से उदासी को तलाक देने वाले खुशियों के खजाने से सम्पन्न भव
संगमयुग पर सभी ब्राह्मण बच्चों को बाप द्वारा खुशी का खजाना मिलता है, इसलिए कुछ भी हो जाए – भल यह शरीर भी चला जाए लेकिन खुशी के खजाने को नहीं छोड़ना। सदा सर्व प्राप्तियों की स्मृति में रहना तो उदासी को तलाक मिल जायेगी। धन्धेधोरी में भल नुकसान भी हो जाए तो भी मन में उदासी की लहर न आये क्योंकि अखुट प्राप्तियों के आगे यह क्या बड़ी बात है! अगर खुशी है तो सब कुछ है, खुशी नहीं तो कुछ भी नहीं।
स्लोगन:- मास्टर दु:ख हर्ता, सुख कर्ता का पार्ट बजाने के लिए सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न बनो।

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TODAY MURLI 19 May 2017 DAILY MURLI (English)

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19/05/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, churn the ocean of knowledge and prove the history and geography of Bharat and then the era of the new world and the duration of the cycle will automatically be proved.
Question: What deep concern do you children have which is different from those of other human beings?
Answer: Your deep concern is to salvage the sunken boat of the world and to relate the true story of becoming Narayan and the story of immortality to everyone so that they can all progress. Although there are big palaces and electricity etc., people do not realise that that is all false, artificialprogress. Real progress was in the golden age which the Father is now bringing about.
Song: At last the day we had been waiting for has come.

 

Om shanti. The Lord of the Poor has surely come, but there is no mention of the accurate date or time. There must be a date and time period, just as it is said that today is such-and-such a day, month and year. However, when did the Lord of the Poor come? They have not mentioned that. Lakshmi and Narayan existed at the beginning of the golden age, and so there must be their era: their kingdom existed in such and such an era. There is the era of Lakshmi and Narayan, and all the others have their own eras too. It must also be written in which era Guru Nanak took birth. Without the era being shown, you cannot know anything. Lakshmi and Narayan ruled in Bharat, so there must surely be an era for them. Their era is the era of the golden age. Lakshmi and Narayan ruled in the golden age, but from when till when did they rule? It would be said that it was 5000 years ago. There has to be a different time for the birth of the Gita. There is no difference in time between Shiva’s birth and the Gita’s birth. The time of Krishna’s birth would be different. You would have to write that the era of Lakshmi and Narayan is also the same. You have to churn the ocean of knowledge about how to explain to the public. Why don’t they show the era of Lakshmi and Narayan? They show the era of Vikram (the time of the sinful ones), but what about the era of Vikarmajeet (those who conquered sinful actions)? You children understand very well, and so you should mention the history and geography of Bharat and the era of the new world. There was the kingdom of the original, eternal deities in the new world, and you can also call it their era. If you calculate this, it is 5000 years ago. By your proving this, the duration of the cycle will automatically be proved and the thousands of years that they have mentioned will be proved wrong. The Father, the Seed of the Human World Tree, comes and explains all of these things. He knows the beginning, the middle and the end of the world. The dynasty of Lakshmi and Narayan existed 5000 years ago, then the dynasty of Rama and Sita came into existence 3750 years ago, and then their dynasty continued. Then the era of King Vikram started. Even the era of King Vikram is not accurate; there are some years missing in the middle. It should be 2500 years ago. The Islam and Buddhist religions started a little later. Their era has been shown as starting 2000 years ago. You know that you were all deities and that, after going through the cycle, you have become Brahmins. You have to explain this history and geography very clearly. From Brahmins, you once again become deities. If you understand this history and geography, you also have to understand the era. The era is also mentioned in the picture of the ladder. The era of Bharat has disappeared. They have lost the era of those who were worthy of worship. Then the era of worshippers began. They talk about the Ashok pillar (Ashok – without sorrow). In the copper age, there is no one without sorrow. The Ashok p illar lasted through the golden and silver ages for half a cycle. It is this that is praised; there is no praise of the shok pillar (with sorrow). There is nothing but sorrow here. They keep the name, Ashoka Hotel, but it is not so. For half the cycle, they call momentary happiness a time without sorrow, but there is no such thing as ashok (without sorrow). They eat meat, drink alcohol and impure things etc., and don’t understand the reason for experiencing sorrow. You understand that only those who were happy in heaven a cycle ago will listen to these things. Those who were not there will not even listen. Those who have finished doing devotion are the ones who will come and listen to some of these teachings. People will be happy to hear this knowledge. The pictures are clear and the era is mentioned. The births of Brahma and Vishnu have to be here but, as for Shankar, he exists in the subtle region. Shiva is in the incorporeal world. They do not know about the subtle region or the incorporeal world, and this is why they have combined Shiva and Shankar. Shiva is the Supreme Father, the Supreme Soul, whereas Shankar is a deity. The two cannot be combined. You children are now given so much understanding; you have such great intoxication. Day and night, the only concern should be about how to explain to others. One only explains to those who are senseless. You understand what Bharat was before and how the downfall came about. The world thinks it has progressed a great deal. Previously, they didn’t have so many big palaces or electricity. There is great progress at this time, but they don’t know that this great progress is artificial and false. True progress was in the golden age. You have to explain that they have their own concern and that your concern is different. You are happy that you are salvaging the sunken boat of the world with Baba’s knowledge. Baba is once again telling the true story of becoming Narayan and the story of immortality. On the path of devotion, people tell many stories. You understand that they are false stories that don’t bring any benefit. Even though you have been listening to the scriptures, the world has continued to become tamopradhan. You have been descending the ladder. What was the benefit? The Sikhs have a gathering where they bathe in a lake. They do not believe in the River Ganges or the River Jamuna. The Sikhs do not go to the kumbha mela, they go to their own lake. They have a special programme for that. Sometimes, they go to clean the pool. Such things don’t exist in the golden age. In the golden age, all the rivers etc., are absolutely clean. There will be no rubbish in the River Ganges or the River Jamuna. There is the difference of day and night between the water of the Ganges there and the water here. They put a lot of rubbish into it here. There (in the golden age), everything will be first-class. You children now have great happiness that your future kingdom is going to be like that. After 5000 years, we are once again establishing heaven by following shrimat. It is called heaven, Paradise, and was ruled by Lakshmi and Narayan. The land of peace and the land of nirvana are the same. You know how we reside in the land of peace. Shiv Baba is at the top, then there are Brahma, Vishnu and Shankar, then the rosary of deities. They are followed by the warriors, merchants and shudras. Souls keep coming down, numberwise, from the incorporeal tree. Those who do not come into the golden age will never come to study. Even the Hindu religion has become disunited. No one knows that the original deity religion used to exist. No one knows how or when that religion was established. You have now been given this knowledge so that you can explain it to others. These pictures are very easy to understand. You can make anyone understand when and how they claimed the kingdom and for how long they ruled. There also has to be the era of when till when Rama and Sita ruled. Later on, impure kings begin to rule. Deities are the main ones who are worshipped. In fact, all praise should be of the One who is worthy of worship. On the path of devotion, they continue to worship everyone. Each one is praised at his own time. They do not even know those whom they worship in the temples. You feel happy when you now explain to them. This is why they open centres. They know that they become deities through this knowledge. The Father came and made the poor ones wealthy. The Father comes and explains to you children, and you, in turn, explain to others in order to awaken their fortune. At this time you are listening to the Father telling the history and geography of the world. By understanding this, you come to know everything. It is the Creator of the world, the Seed, who would speak about the history and geography of the world. He is k nowledge-full. He is incorporeal Shiva. A bodily being cannot be called God, the Creator. The incorporeal One is the Father of all souls. He sits here and explains to souls: I reside in the supreme abode. I have entered this body; I too am a soul. Because I am the Seed-form and knowledge-full, I make you children understand. The question of blessings or mercy does not arise. It is not a question of temporary happiness either; others can give temporary happiness. If someone receives some benefit, the name of the person he or she received benefit from becomes famous. Your attainment is for 21 births. No one but the Father can give you this attainment. No one can make your body free from disease for 21 births. On the path of devotion, people are happy if they experience even a little happiness. Here, you receive a reward for 21 births. In spite of that, there are many who do not make effort; it is not in their fortune. Everyone is inspired to make the same effort. In other kinds of education, you have different teachers. Here, you only have one Teacher. Maybe you would sit with someone separately, but it is the same knowledge. It all depends on how much knowledge each one takes. The whole significance is merged in this one story. Baba is telling you the true story of becoming Narayan. You can tell them specific dates. There are some famous people who can relate the true story of becoming Narayan because they have memorised the whole story. You too can memorise the true story of becoming Narayan. It is very easy! First of all, the Father says: Manmanabhav! Then sit and explain the history. You can show the era of Lakshmi and Narayan. Come, let us explain to you how the Father comes at the confluence age. He enters the body of Brahma and explains. To whom? To those who are the mouth-born creation of Brahma, who then become deities. It is the story of 84 births, of becoming deities from Brahmins. This is the full knowledge which you must listen to and then repeat. It will then enter your intellects that you were deities and that this is how you came into the cycle. This is the true story of becoming Narayan. How easy it is! How did we claim the kingdom and how did we lose it? For how long did we rule? There was the clan of Lakshmi and Narayan and their dynasty. There were the clans of the sun dynasty and the moon dynasty. The Father comes now at the confluence age, and makes the clan of shudras into the clan of Brahmins. It is you who listen to the true story. In the golden age, Lakshmi and Narayan had palaces that were studded with diamonds and jewels. What is there now? The Father has already told you this story. The Father says: Remember Me and the alloy will be removed. The more alloy you remove, the higher your status will be. Everyone understands, numberwise. Baba knows the ones whose intellects are able to imbibe well. There is no difficulty in explaining this; it is very easy. It is well known that human beings become deities. Keep relating this true story of becoming Narayan. The other story is false; this is the true story. It is easy to relate the true story of becoming Narayan and to read the murli at the centre. Anyone can run a centre, but you also need very good manners. You should not be like salt water with each other. You lose your honour if you are not sweet to each other. The Father says: You cannot claim a high status if you defame Me. Gurus have said that of themselves. They do not show a destination. There is only the One who can show you your destination. There is a loss and your status is destroyed if you defame Him. If you dirty your face, you destroy yourself completely. There are some who experience defeat. Some write with honesty, yet there are others who tell lies. All falsehood is removed from the intellect if you continue to relate the true story. Do not perform such actions that the Father is defamed. Those who have such a stage will behave the same no matter where they go. They do realise that they cannot improve; therefore, they are given the advice: Stay at home with your family and do service when you have imbibed the knowledge. You will not accumulate sin while staying at home. Here, you cause defamation when you behave in a common way. It is better to live like a lotus at home with your family. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. In order to remove falsehood from within you, constantly listen to the true story of becoming Narayan and inspire others to do the same. Do not perform such activity that the Father would be defamed.
  2. Be sweet in your interaction with each other. Never be like salt water. Imbibe good qualities and then do service.
Blessing: May you be an easy effort-maker who gives and receives blessings on the basis of contentment.
Those who stay content and make everyone else content receive everyone’s blessings. Where there is contentment, there are blessings. If you find it an effort to imbibe all virtues and control all powers, then let go of that, but simply do the one task of giving and receiving blessings from amrit vela till night for everything will be included in that. Even if someone causes you sorrow, you simply give that one blessings and you will become an easy effort-maker.
Slogan: Everyone’s co-operation is surrendered to those who stay in the surrendered stage.

*** Om Shanti ***

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Daily Murli 19 May 2017 : Bk Dainik Gyan Murli (Hindi)

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19/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – विचार सागर मंथन कर भारत की हिस्ट्री-जाग्रॉफी और नई दुनिया का संवत सिद्ध कर बताओ तो कल्प की आयु सिद्ध हो जायेगी”
प्रश्नः- तुम बच्चों को अभी कौन सी धुन लगी हुई है जो मनुष्यों से भिन्न है?
उत्तर:- तुम्हें धुन है कि विश्व का बेड़ा जो डूबा हुआ है उसे हम सैलवेज करें। सबको सच्ची-सच्ची सत्य नारायण की कथा वा अमरकथा सुनायें जिससे सबकी उन्नति हो। इतने बड़े-बड़े महल, बिजली आदि सब कुछ है परन्तु उन्हें यह पता नहीं है कि यह सब आर्टीफिशल झूठी उन्नति है। सच्ची उन्नति तो सतयुग में थी, जो अब बाप आकर करते हैं।
गीत:- गीत:- आखिर वह दिन आया आज…..

 

ओम् शान्ति। गरीबनिवाज़ आया तो सही, परन्तु कोई सही तिथि तारीख नहीं लिखते हैं। कोई डेट, संवत तो होना चाहिए ना। जैसे बताते हैं कि आज फलानी तारीख, फलाना मास, फलाना संवत है। गरीब निवाज़ कब आया? यह लिखा नहीं है। जैसे लक्ष्मी-नारायण सतयुग आदि में थे तो उनका भी संवत होना चाहिए। इनका फलाने सवंत में राज्य था। लक्ष्मी-नारायण का भी संवत है और भी सबके अपने-अपने संवत हैं। गुरूनानक का भी लिखा होगा कि फलाने संवत में जन्म लिया। संवत बिगर पता नहीं पड़ता। यह लक्ष्मी-नारायण भारत में राज्य करते थे, तो जरूर संवत होना चाहिए, इनका संवत माना स्वर्ग का संवत। लक्ष्मी-नारायण ने सतयुग में राज्य किया, किस संवत से किस संवत तक कहें, तो भी 5 हजार वर्ष ही कहेंगे। गीता जयन्ती का थोड़ा फ़र्क करना पड़ता है। शिव जयन्ती और गीता जयन्ती में फ़र्क नहीं है। कृष्ण जयन्ती का फ़र्क पड़ेगा। लक्ष्मी-नारायण का वही संवत लिखना होगा। यह भी विचार सागर मंथन करना होता है। पब्लिक को यह कैसे बतायें। लक्ष्मी-नारायण का क्यों नहीं संवत दिखाते हैं। पाम संवत दिखाते हैं, बाकी विकर्माजीत संवत कहाँ! अभी तुम बच्चों को अच्छी तरह मालूम है। भारत की हिस्ट्री-जॉग्राफी नई दुनिया का संवत भी दिखाना चाहिए। नई दुनिया में राज्य था आदि सनातन देवी-देवताओं का, तो उनका संवत भी कहेंगे। हिसाब करेंगे तो उनको 5 हजार वर्ष हुआ। यह सिद्ध कर बताने से कल्प की आयु सिद्ध हो जायेगी और लाखों वर्ष जो लिखा है वह झूठा हो जायेगा। यह बातें बाप आकर समझाते हैं। जो मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, सृष्टि के आदि मध्य अन्त को जानने वाला है। लक्ष्मी-नारायण की डिनायस्टी को 5 हजार वर्ष हुआ और 3750 वर्ष हुए राम- सीता को, फिर आगे उनकी डिनायस्टी चली। फिर पाम संवत शुरू होता है। पाम राजा का जो संवत है वह भी राइट नहीं है, बीच में कुछ वर्ष गुम हैं। होना चाहिए 2500 वर्ष। इस्लामी, बौद्धी का भी थोड़ा समय पीछे शुरू होता है। इन्होंने दो हजार वर्ष से अपना संवत दिया है।

तुम जानते हो हम सभी देवी-देवता थे, जो चक्र लगाकर अब ब्राह्मण बने हैं। यह हिस्ट्री-जॉग्राफी अच्छी तरह समझानी है। ब्राह्मण से फिर देवता बनते हैं। हिस्ट्री-जॉग्राफी समझते हो तो संवत भी समझना पड़े। सीढ़ी के चित्र में संवत लिखा हुआ है। भारत का संवत ही गुम हो गया है। जो पूज्य थे, उनका संवत ही गुम कर दिया है। पुजारियों का संवत शुरू हो गया है। देखो, अशोक पिल्लर कहते हैं। द्वापर में अशोक (शोक रहित) तो कोई है नहीं। अशोक पिल्लर तो आधाकल्प सतयुग त्रेता तक चलता है। उनकी यह महिमा है। शोक पिल्लर की महिमा नहीं है। यहाँ तो दु:ख ही दु:ख है। अशोका होटल नाम रखा है, परन्तु है नहीं। आधाकल्प क्षणभंगुर सुख को अशोक कह देते हैं। यहाँ अशोक कुछ है नहीं। मास-मदिरा, गन्द खाते रहते हैं। कुछ भी समझते नहीं कि हम दु:खी कैसे हुए? कारण क्या है?

अभी तुम समझते हो यह बातें सुनेंगे वही जो कल्प पहले स्वर्ग में सुखी थे। जो वहाँ थे नहीं, वह सुनेंगे भी नहीं। जिन्होंने भक्ति पूरी की होगी वह कुछ न कुछ आकर शिक्षा लेंगे। नॉलेज को सुनकर लोग खुश होंगे। चित्र भी क्लीयर हैं। संवत भी लिखा हुआ है। ब्रह्मा विष्णु का जन्म भी तो यहाँ होना चाहिए। बाकी शंकर तो सूक्ष्मवतन का है और शिव है मूलवतन में। सूक्ष्म, मूल को भी जानते नहीं, इसलिए शिव शंकर को मिला दिया है। शिव है परमपिता परमात्मा, शंकर है देवता। दोनों को मिला न सकें। अभी तुम बच्चों को कितनी समझ मिली है। कितना नशा चढ़ता है। रात-दिन यही तात लगी रहे कि लोगों को कैसे समझावें। बेसमझ को ही समझाया जाता है। तुम समझते हो कि भारत पहले क्या था फिर डाउनफाल कैसे हुआ है। दुनिया तो समझती हमने बहुत उन्नति की है। आगे तो इतने बड़े महल, बिजली आदि कुछ नहीं था। अभी तो बहुत उन्नति में जा रहा है क्योंकि उन्हों को तो यह पता ही नहीं है कि यह आर्टीफीशियल झूठी है। सच्ची उन्नति तो सतयुग में थी। यह समझाना है, वे अपनी धुन में हैं, तुम्हारी धुन अपनी ही है। तुमको खुशी है तो विश्व का बेड़ा जो डूबा हुआ था, उनको हम बाबा की नॉलेज द्वारा सैलवेज कर रहे हैं। बाबा हमें सत्य नारायण की कथा वा अमर कथा फिर से सुनाते हैं। भक्ति मार्ग में तो अनेक कथायें सुनाते हैं। तुम समझते हो कि वे सब झूठी कथायें हैं जिससे कोई फायदा नहीं। यह शास्त्र आदि पढ़ते आये हैं फिर भी सृष्टि तो तमोप्रधान होती ही जाती है। सीढ़ी उतरते आये फायदा क्या हुआ? सिक्ख लोगों का भी मेला लगता है। वहाँ तालाब में स्नान करते हैं। वह गंगा जमुना आदि को नहीं मानते हैं। कुम्भ के मेले पर सिक्ख लोग नहीं जाते हैं। वह अपने तालाब पर जाते होंगे। उनका फिर खास प्रोग्राम होता है। कभी उनको साफ करने भी जाते हैं। सतयुग में तो यह बातें होती नहीं। सतयुग में तो नदियां आदि बिल्कुल साफ हो जायेंगी। वहाँ कभी गंगा, जमुना में गन्द, किचड़ा नहीं पड़ता। वहाँ के गंगा जल और यहाँ के गंगा जल में रात-दिन का फ़र्क है। यहाँ तो बहुत किचड़ा पड़ता है। वहाँ तो हर एक चीज़ फर्स्टक्लास होती है।

तुम बच्चों को अब बहुत खुशी है कि हमारी राजधानी ऐसी होगी। हम फिर से 5 हजार वर्ष बाद श्रीमत पर स्वर्ग की स्थापना कर रहे हैं। नाम ही है स्वर्ग, बैकुण्ठ, जिसमें लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। शान्तिधाम अथवा निर्वाणधाम एक ही है। तुम जानते हो कि हम शान्तिधाम में कैसे रहते हैं। ऊपर में है शिवबाबा फिर ब्रह्मा-विष्णु-शंकर, फिर देवताओं की माला फिर क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र। निराकारी झाड़ से आत्मायें नम्बरवार आती रहती हैं। जो सतयुग में आने वाले नहीं हैं, वे पढ़ने के लिए कभी आयेंगे नहीं। हिन्दू धर्म ही जैसे अलग हो पड़ा है। किसको पता नहीं कि आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। वह धर्म कैसे और कब स्थापन हुआ, किसको पता नहीं है। तुमको यह नॉलेज अब दी गई है कि दूसरों को भी समझाओ। चित्र तो बहुत सहज हैं। कोई को भी समझा सकते हो कि इन्होंने यह राज्य कब और कैसे लिया? और कितना समय तक राज्य किया? राम-सीता का भी होना चाहिए कि फलाने संवत से फलाने संवत तक इन्होंने राज्य किया। पीछे फिर पतित राजायें शुरू हो जाते हैं। यह देवतायें हैं मुख्य, जिनकी पूजा होती है। वास्तव में महिमा सारी एक पूज्य की होनी चाहिए। भक्ति मार्ग में तो सबको पूजते रहते हैं। अपने-अपने समय पर हर एक की महिमा होती है। मन्दिरों में जाकर पूजा आदि करते हैं, परन्तु उनको जानते बिल्कुल ही नहीं। अभी तुम समझाते हो तो सुनकर खुश होते हैं, तब तो सेन्टर्स खोलते हैं। समझते हैं कि इस नॉलेज से हम सो देवता बनेंगे। बाप ने गरीबों को आकर साहूकार बनाया है। बाप आकर बच्चों को समझाते हैं, बच्चे फिर औरों को समझाकर उन्हों का भाग्य खोलें। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी अभी तुम बाप द्वारा सुनते हो। वह समझने से तुम सब कुछ जान जाते हो। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी तो जरूर वर्ल्ड का रचयिता बीजरूप ही सुनायेंगे। वही नॉलेजफुल है। वह है निराकार शिव। देहधारी को भगवान रचयिता कह नहीं सकते। निराकार ही सभी आत्माओं का पिता है। वह बैठ आत्माओं को समझाते हैं। मैं परमधाम में रहने वाला हूँ। अभी मैं इस शरीर में आया हूँ। मैं भी आत्मा हूँ। मैं बीजरूप, नॉलेजफुल होने कारण तुम बच्चों को समझाता हूँ। इसमे आशीर्वाद, कृपा आदि की कोई बात नहीं है। न अल्पकाल सुख की बात है। अल्पकाल का सुख तो लोग दे देते हैं। एक को कुछ फायदा हुआ तो बस नाम चढ़ जाता है। तुम्हारी प्राप्ति तो 21 जन्म के लिए है। सो तो सिवाए बाप के ऐसी प्राप्ति कोई करा न सके। 21 जन्मों के लिए निरोगी काया कोई बना न सके। भक्ति मार्ग में मनुष्यों को थोड़ा भी सुख मिलता है तो खुश हो जाते हैं। यहाँ तो 21 जन्म के लिए प्रालब्ध पाते हैं। तो भी बहुत हैं जो पुरुषार्थ नहीं करते। उन्हों की तकदीर में नहीं है। तदबीर तो सभी को एक समान ही कराते हैं। उस पढ़ाई में तो कभी अलग टीचर भी मिल जाते हैं। यह तो एक ही टीचर है। भल तुम खास बैठ समझाते होंगे। लेकिन नॉलेज तो एक है, सिर्फ हर एक के उठाने पर मदार है। यह भी एक कहानी है, जिसमें सारा राज़ आ जाता है। बाबा सत्य नारायण की कथा सुनाते हैं। तुम अंगे अखरे (तिथि-तारीख) सब सुना सकते हो। कोई-कोई सत्य नारायण की कथा सुनाने वाले नामीग्रामी होंगे। उनको सारी कथा कण्ठ हो जाती है। तुम फिर यह सच्ची सत्य नारायण की कथा कण्ठ कर लो। बहुत सहज है। बाप पहले तो कहते हैं मन्मनाभव, फिर बैठ हिस्ट्री समझाओ। इन लक्ष्मी-नारायण का तो संवत बता सकते हो ना। आओ तो हम आपको समझावें कि बाप कैसे संगमयुग पर आता है। ब्रह्मा तन में आकर सुनाते हैं। किसको? ब्रह्मा मुखवंशावली को। जो फिर देवता बनते हैं, 84 जन्म की कहानी है। ब्राह्मण सो देवता बनते हैं। पूरी नॉलेज है, यह सुनकर फिर बैठकर रिपीट करो तो बुद्धि में सब आ जायेगा कि हम देवता थे फिर ऐसे चक्र लगाया। यह है सत्य नारायण की कथा। कितनी सहज है, कैसे राज्य लिया फिर कैसे गवॉया .. कितना समय राज्य किया। लक्ष्मी-नारायण और उनका कुल, घराना था ना। सूर्यवंशी घराना, फिर चन्द्रवंशी घराना फिर संगम पर बाप आकर शूद्रवंशियों को ब्राह्मण वंशी बनाते हैं। यह सच्ची-सच्ची कथा तुम सुन रहे हो। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण के हीरे जवाहरों के महल थे। अभी तो क्या है। बाप ने यह तो कथा सुनाई है ना।

अब बाप कहते हैं कि मुझे याद करो तो खाद निकल जायेगी। जितना खाद निकलेगी उतना ऊंच पद पायेंगे। नम्बरवार समझते हैं। बाबा जानते हैं कि कौन-कौन अच्छी रीति बुद्धि में धारण कर सकते हैं। समझाने में कोई तकलीफ नहीं है। बिल्कुल सहज है। मनुष्य से देवता बनना तो मशहूर है। घड़ी-घड़ी यही सत्य नारायण की कथा सुनाते रहो। वह है झूठी, यह है सच्ची। सेन्टर पर भी सत्य-नारायण की कथा सुनाते रहो वा मुरली सुनाते रहो तो बहुत सहज है। कोई भी सेन्टर चला सकते हैं। परन्तु फिर लक्षण भी अच्छे चाहिए। एक दो में लूनपानी नहीं होना चाहिए। आपस में मीठे होकर नहीं चलते हैं तो आबरू (इज्जत) गंवाते हैं। बाप कहते हैं कि मेरी निंदा करायेंगे तो ऊंच पद नहीं पा सकेंगे। उन गुरूओं ने फिर अपने लिए कह दिया है। अब तो वह कोई ठौर बताते नहीं। ठौर बताने वाला तो एक ही है, उसकी निन्दा करायेंगे तो नुकसान के भागी बन जायेंगे। फिर पद भी भ्रष्ट हो पड़ता है। काला मुंह करते हैं तो अपनी सत्यानाश करते हैं। ऐसे भी हैं जो हार खा लेते हैं फिर कोई तो सच्चाई से लिखते हैं, कोई झूठ भी बोलते हैं। अगर सच्ची कथा सुनाते रहें तो बुद्धि से झूठ निकल जाये। ऐसी चलन नहीं चलनी चाहिए जिससे बाप की निन्दा हो। जिनकी ऐसी अवस्था है वह जहाँ भी जाते हैं तो ऐसी ही चलन चलते हैं। खुद भी समझते हैं कि हम सुधर नहीं सकेंगे तो फिर राय दी जाती है – घर गृहस्थ में रहो। जब धारणा हो जाये तब फिर सर्विस करना। घर में रहेंगे तो तुम्हारे ऊपर इतना पाप नहीं चढ़ेगा। यहाँ फिर ऐसी कामन चलन चलते हैं तो निन्दा करा देते हैं, इससे तो गृहस्थ व्यवहार में कमल फूल समान रहना अच्छा है। अच्छा –

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अन्दर से झूठ निकल जाये उसके लिए सदा सत्य नारायण की कथा सुननी और सुनानी है। कभी ऐसी चलन नहीं चलनी है जो बाप की निन्दा हो।

2) आपस में बहुत मीठा होकर रहना है, कभी लूनपानी नहीं होना है। अच्छे लक्षण धारण कर फिर सेवा करनी है।

वरदान:- सन्तुष्टता के आधार पर दुआयें देने और लेने वाले सहज पुरूषार्थी भव
सर्व की दुआयें उन्हें मिलती हैं जो स्वयं सन्तुष्ट रहकर सबको सन्तुष्ट करते हैं। जहाँ सन्तुष्टता है वहाँ दुआयें हैं। यदि सर्व गुण धारण करने वा सर्व शक्तियों को कन्ट्रोल करने में मेहनत लगती हो, तो उसे भी छोड़ दो, सिर्फ अमृतवेले से लेकर रात तक दुआयें देने और दुआयें लेने का एक ही कार्य करो तो इसमें सब कुछ आ जायेगा। कोई दु:ख भी दे तो भी आप दुआयें दो तो सहज पुरूषार्थी बन जायेंगे।
स्लोगन:- जो समर्पित स्थिति में रहते हैं उनके आगे सर्व का सहयोग स्वत: समर्पित हो जाता है।

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TODAY MURLI 18 May 2017 DAILY MURLI (English)

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18/05/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, if you want to be part of the rosary of victory, become those whose intellects have the faith that the incorporeal Father is teaching us and that He will take us back with Him. Do not allow any doubt about this to come.
Question: What are the main signs of the children who are to become victorious jewels?
Answer: They never have doubt about any aspect; their intellects have faith. They have the faith that 1). This is the time of the confluence, when the land of sorrow is to end and the land of happiness is to come. 2). The Father is teaching us Raja Yoga. He will make us soul conscious and take us back with Him. He is speaking to us souls and we are sitting personally in front of Him. 3). God is our Father; because He is teaching us Raja Yoga, He is therefore our Teacher and because He takes us to the land of peace, He is also our Satguru. Those whose intellects have such faith will become victorious in every way.
Song: Having found You we have found everything. The earth and sky all belong to us.

 

Om shanti. The Father has already explained the meaning of ‘Om shanti’ to the children. Everything has to be understood in a second. Just as you children say “Om”, that is, “I am a soul and this is my body”, in the same way, the Father says: I am the Supreme Father, the Supreme Soul, the Resident of the supreme region. The Father and the children can both say: Om; the original religion of myself, this soul, as well as of the Supreme Soul, is peace. You know that souls are residents of the land of peace. You come down from there onto the field of action to play your parts. You also know what the form of a soul is and what the Father’s form is. No one else in the human world knows this. The Father comes and explains this. You children explain that your Father is the Supreme Father, the Supreme Soul; He is the Teacher and He is also your true Supreme Satguru. He will take us back with Him. Many people adopt gurus. You children now have the faith that the Supreme Father, the Supreme Soul, is also the Father, that He is giving us the knowledge of easy Raja Yoga, and that He will afterwards take us home with Him. Only when there is faith will you children have victory. You will be part of the rosary of victory, the rosary of Rudra and the rosary of Vishnu. God speaks: I teach you children Raja Yoga, and so I am also the Teacher. You have to receive instructions. The instructions of a father, teacher and guru are all different. Many different instructions are given. The instructions here are for everyone; there is no doubt about this. You understand: We are a family, the clan of God. God, the Father, is the Creator. They even sing: You are the Mother and Father and we are Your children. Therefore, this is definitely a family. Only in Bharat do they sing about this. That is a thing of the past. Now, at present, you have become His children and you receive instructions from Him. Baba, we follow Your shrimat so that our sins will be cut away with the power of yoga. The Father is called the Purifier, the Almighty Authority. There is only one Father. Definitely, He is called the Mother and the Father. You are studying Raja Yoga with Him. You claim such an inheritance from Him that there is no trace of sorrow for half a cycle. That is the land of happiness. The Father comes when it is the time for the land of sorrow to end, which is the time of the confluence. You know that Baba is teaching us Raja Yoga. He makes us soul conscious and then takes us back with Him. It is not a human being that is teaching you; the incorporeal Father is teaching you. He is talking to you souls. There is nothing to doubt or be confused about in this. You are sitting in front of Him. You know that you were deities and on the pure family path at that time. You have completed your part s of 84 births. You have taken 84 births. It is also said: Souls were separated from the Supreme Soul for a long period of time. At the beginning of the golden age, there are only deities and, by the end of the iron age, they have become impure; They have taken the full 84 births. The Father shows the account. The religion of sannyasis is separate. There is a variety of religions in the tree. The first, the foundation, is the deity religion. The deity religion cannot be established by a human being. The deity religion has now disappeared but it is being established once again and you experience the reward of that in the golden age. It is a very great income. You children earn a true income from the Father in return for which you receive constant happiness in the land of truth. So you have to pay attention. The Father doesn’t ask you to leave your home and family; that is for sannyasis who have disinterest. The Father says: That would be wrong because the world cannot benefit from that. Nevertheless, the religion of sannyasis in Bharat is good. The sannyas religion is established in order to sustain Bharat, because the deities fall onto the path of sin. When a building becomes half old, it is renovated. After a year or two it is repainted etc. Some think that they will invoke Lakshmi. However, it is only when everything is pure that she will come. They worship Mahalakshmi on the path of devotion in order to receive wealth from her. They never ask Jagadamba (World Mother) for wealth; they ask Lakshmi for wealth. At the time of Deepmala (festival of lights), business people worship money, because they think that by doing so it will increase, or that the desires of their hearts will be fulfilled. They simply hold a gathering for Jagadamba. The gatherings are held in order to meet this Jagadpita and Jagadamba. This is the true gathering through which there is benefit, whereas at those gatherings they wander around a lot. Sometimes their boat sinks and sometimes their bus has an accident; they stumble a lot. There is a lot of interest in the gatherings of devotion, because they have heard that a meeting between souls and God takes place at the gathering. Therefore, this meeting is famous, and it is later celebrated on the path of devotion. This is a competition between Rama and Ravan, and so the Father explains very well: You mustn’t become unconscious. Rama and Ravan are both almighty authorities. You are on a battlefield. Some are defeated by Maya again and again. The Father says: If you remember Me, the Master, you will never be defeated. You gain victory by having remembrance of the Father. Knowledge is understood within a second, but the Father also explains the details of how the world cycle turns. You children are know the Seed and the tree in a nutshell. This is called the kalpa tree. Its lifespan cannot be hundreds of thousands of years. This is the tree of the variety of religions. One religion is not the same as any other; they are all completely different. The people of Islam are also different. Among them too, there is a great deal of wealth. Everyone chases after wealth. The features of the people of Bharat are completely different. This is the tree of the variety of religions. You understand how expansion takes place. It is compared to a banyan tree, for you can see in a practical way that its foundation has gone. The other religions remain but there is no deity religion. In Calcutta, you can see a tree that is fully grown and full of leaves, but it has no foundation. This one doesn’t have a foundation either. This is why establishment is now taking place. You children understand that the play is about to end. We now have to return home to Baba. You will come to Me. You also know that no land except Bharat can become heaven. They even speak of ancient Bharat. However, they have put Krishna’s name in the Gita. The Father says: No one can call Krishna the Purifier. They only accept the incorporeal One to be that. Krishna is the prince of the golden age. Krishna will only exist with that name and form in the golden age; he cannot have the same features again. Each one’s features are different. Each one’s actions are also different. This is an eternal drama. Each soul has his own part. Souls are imperishable, but bodies are perishable. I, the soul, shed a body and take the next. No one has knowledge of the soul. The Father comes and speaks new things. He says: You are My long-lost and now-found children. The children also say: Baba, it has been 5000 years since we last met You. Through the power of yoga, you became the masters of the whole world. The first violence is the use of the sword of lust on one another. It has also been explained that no one can become a master of the world through physical strength, but that you become that through the power of yoga. However, in the scriptures, they have shown a battle between the deities and the devils. There is no such thing. Here, you gain victory with the power of yoga which you received from the Father. The Father is the Creator of the world, so He definitely establishes a new world. Lakshmi and Narayan were the masters of the new world. We too were the masters of heaven, and then, while taking 84 births, we became impure, worth not a penny. We are now the ones who have to become pure. There are many devotees, but which of them have done the most devotion? Those who become Brahmins must have performed devotion from its beginning. They are the ones who become Brahmins. Prajapita (Father of People) cannot exist in the subtle region, because Brahma, whom Baba enters, is needed here. You understand that the Mama and Baba here are also up there. These things have to be understood very clearly. Baba continues to give directions about different ways of doing service. Children invent new things. If someone invents something new, it is said that it must have been invented a cycle ago as well. Then improvements are made to it. The globe of heaven and hell which has been created is very good. Krishna is loved by everyone, but they do not know that he becomes Narayan. You now have to explain this tactfully. The picture of this globe of yours should be very large. It should reach from the floor to the ceiling, and it should include a picture of Narayan as well as Krishna. People can see large things easily. They have created huge images of the Pandavas. You are the Pandavas but there isn’t anyone here as huge as that. They are the same as six foot tall human beings. Don’t think that, because the lifespan in the golden age is long, people there will have tall bodies. That would not suit human beings. So, large pictures are needed in order to explain. Create a first-class picture of the golden age and include the picture of Lakshmi and Narayan and also Radhe and Krishna beneath them. They are a prince and princess. This cycle continues to turn. Brahma and Saraswati become Lakshmi and Narayan. We Brahmins become deities. We now know that we will become Lakshmi and Narayan and that we will later become Rama and Sita. We will rule the kingdom. Anyone to whom you children explain such pictures will experience great pleasure and say: This knowledge is first-class. Hatha yogis definitely cannot give this knowledge. In the golden age, there was the pure household path, whereas it is now impure. No one except the Father can give the unlimited inheritance. You understand that Baba is teaching us to make us into the masters of the world. You should imbibe this well. People become very elevated by studying. You too are at present those with stone intellects and hunchbacked, but the Father is now teaching you and you will become the masters of the world again through this study. Baba is the Ocean of Knowledge. The Father now says: Consider yourself to be bodiless. You came bodiless and you have to return bodiless. You know that your cycle of 84 births is coming to an end. It is so wonderful! A tiny soul contains such a huge part which can never be erased. The part has no beginning or end. These are such wonderful things! I, the soul, continue to go around the cycle of 84 births; this never comes to an end. We are once again making effort. All the knowledge is in the soul. People place value on a star (cut of diamond); the better the star, the more its value. This one star has so much knowledge in it. It is also said: A sparkling star shines in the centre of the forehead. You understand this wonder. The Father says: I too am a s tar. You can also receive visions of this. However, if Baba were to reveal His form as that of a star, they would not accept it because they have heard that God is a very bright, eternal light, like the sun. There were many who used to go into trance, and because they had heard that God is a bright light, they had a vision of that. You now understand that the Supreme Father, the Supreme Soul, is like a star. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. In order to become the masters of the land of truth, earn a true income from the Father. Stay in remembrance of the Father, the Master, and become a conqueror of Maya.
  2. In order to claim the unlimited inheritance from the Father, pay full attention to the Father’s teachings. Imbibe these teachings very well.
Blessing: May you be free from all attractions and experience constant safety by staying under the canopy of the Father’s protection.
In the physical world, you take the support of an umbrella to protect yourself from rain and sun. That is a physical canopy whereas this is the Father’s canopy of protection which keeps souls safe at every moment. No attraction can attract such souls to it. When you say “Baba” from your heart, you are safe. No matter what type of adverse situation comes in front of you, if you remain under the canopy of protection, you experience constant safety. There cannot be even the slightest effect of the influence of Maya.
Slogan: Become such masters of the self that all dependency finishes.

*** Om Shanti ***

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