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Aaj ki murli November 2019 – Om shanti murli today

ब्रह्माकुमारी मुरली : आज की मुरली (हिंदी मुरली)

Brahma kumaris Om Shanti Murli : Aaj ki Murli November 2019

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आज की मुरली ऑनलाइन पढ़ें  :- TODAY MURLI

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 22 OCTOBER 2019 : AAJ KI MURLI

22-10-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – रावण का कायदा है आसुरी मत, झूठ बोलना, बाप का कायदा है श्रीमत, सच बोलना”
प्रश्नः- किन बातों का विचार कर बच्चों को आश्चर्य खाना चाहिए?
उत्तर:- 1. कैसा यह बेहद का वन्डरफुल नाटक है, जो फीचर्स, जो एक्ट सेकण्ड बाई सेकण्ड पास हुआ वह फिर हूबहू रिपीट होगा। कितना वन्डर है, जो एक का फीचर न मिले दूसरे से। 2. कैसे बेहद का बाप आकरके सारे विश्व की सद्गति करते हैं, पढ़ाते हैं, यह भी वन्डर है।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप शिव बैठकर अपने रूहानी बच्चों सालिग्रामों को समझा रहे हैं, क्या समझा रहे हैं? सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं और यह समझाने वाला एक ही बाप है और तो जो भी आत्मायें अथवा सालिग्राम हैं सबके शरीर का नाम है। बाकी एक ही परम आत्मा है, जिसको शरीर नहीं है। उस परम आत्मा का नाम है शिव। उनको ही पतित-पावन परमात्मा कहा जाता है। वही तुम बच्चों को इस सारे विश्व के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझा रहे हैं। पार्ट बजाने के लिए तो सब यहाँ आते हैं। यह भी समझाया है विष्णु के दो रूप हैं। शंकर का तो कोई पार्ट है नहीं। यह सब बाप बैठ समझाते हैं। बाप कब आते हैं? जबकि नई सृष्टि की स्थापना और पुरानी का विनाश होना है। बच्चे जानते हैं नई दुनिया में एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना होती है। वह तो सिवाए परमपिता परमात्मा के और कोई कर ही नहीं सकते। वही एक परम आत्मा है जिसको परमात्मा कहा जाता है। उनका नाम है शिव। उनके शरीर का नाम नहीं पड़ता है। और जो भी हैं सबके शरीर का नाम पड़ता है। यह भी समझते हो मुख्य-मुख्य जो हैं वह तो सब आ गये हैं। ड्रामा का चक्र फिरते-फिरते अभी अन्त आकर हुई है। अन्त में बाप ही चाहिए। उनकी जयन्ती भी मनाते हैं। शिवजयन्ती भी इस समय मनाते हैं जबकि दुनिया बदलनी है। घोर अन्धियारे से घोर रोशनी होती है अर्थात् दु:खधाम से सुखधाम होना है। बच्चे जानते हैं परमपिता परमात्मा शिव एक ही बार पुरूषोत्तम संगमयुग पर आते हैं, पुरानी दुनिया का विनाश, नई दुनिया की स्थापना करने। पहले नई दुनिया की स्थापना, पीछे पुरानी दुनिया का विनाश होता है। बच्चे समझते हैं पढ़कर हमको होशियार होना है और दैवीगुण भी धारण करने है। आसुरी गुण पलटने हैं। दैवी गुणों और आसुरी गुणों का वर्णन चार्ट में दिखाना होता है। अपने को देखना है हम किसको तंग तो नहीं करते हैं? झूठ तो नहीं बोलते हैं? श्रीमत के खिलाफ तो नहीं चलते हैं? झूठ बोलना, किसको दु:ख देना, तंग करना – यह है रावण के कायदे और वह है राम के कायदे। श्रीमत और आसुरी मत का गायन भी है। आधाकल्प चलती है आसुरी मत, जिससे मनुष्य असुर, दु:खी, रोगी बन जाते हैं। पांच विकार प्रवेश हो जाते हैं। बाप आकर श्रीमत देते हैं। बच्चे जानते हैं श्रीमत से हमको दैवीगुण मिलते हैं। आसुरी गुणों को बदलना है। अगर आसुरी गुण रह जायेंगे तो पद कम हो पड़ेगा। जन्म-जन्मान्तर के पापों का बोझा जो सिर पर है, नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार हल्का हो जायेगा। यह भी समझते हो कि अभी यह है पुरूषोत्तम संगमयुग। बाप द्वारा अभी दैवीगुण धारण कर नई दुनिया के मालिक बनते हैं। तो सिद्ध होता है पुरानी दुनिया जरूर खलास होनी ही है। नई दुनिया की स्थापना ब्रह्माकुमार, कुमा-रियों द्वारा होनी है। यह भी पक्का निश्चय है इसलिए सर्विस पर लगे हुए हैं। कोई न कोई का कल्याण करने की मेहनत करते रहते हैं।

तुम जानते हो हमारे भाई-बहन कितनी सर्विस करते हैं। सबको बाप का परिचय देते रहते हैं। बाप आये हैं जरूर पहले-पहले थोड़ों को ही मिलेगा। फिर वृद्धि को पाते जायेंगे। एक ब्रह्मा द्वारा कितने ब्रह्माकुमार बनते हैं। ब्राह्मण कुल तो जरूर चाहिए ना। तुम जानते हो हम सभी ब्रह्माकुमार-कुमारियां हैं शिवबाबा के बच्चे, सब भाई-भाई हैं। असुल में भाई-भाई हैं फिर प्रजापिता ब्रह्मा के बनने से भाई-बहन बनते हैं। फिर देवता कुल में जायेंगे तो सम्बन्ध की वृद्धि होती जायेगी। इस समय ब्रह्मा के बच्चे और बच्चियां हैं तो एक ही कुल हुआ, इनको डिनायस्टी नहीं कहेंगे। राजाई न कौरवों की है, न पाण्डवों की। डिनायस्टी तब होती है जब राजा-रानी नम्बरवार गद्दी पर बैठते हैं। अभी तो है ही प्रजा का प्रजा पर राज्य। शुरू से लेकर पवित्र डिनायस्टी और अपवित्र डिनायस्टी चली आई है। पवित्र डिनायस्टी देवताओं की ही चली है। बच्चे जानते हैं 5 हज़ार वर्ष पहले हेविन था तो पवित्र डिनायस्टी थी। उन्हों के चित्र भी हैं, मन्दिर कितने आलीशान बने हुए हैं। और कोई के मन्दिर नहीं हैं। इन देवताओं के ही बहुत मन्दिर हैं।

बच्चों को समझाया है कि और सबके शरीर के नाम बदलते हैं। इनका ही नाम शिव चला आया है। शिव भगवानुवाच, कोई भी देहधारी को भगवान नहीं कहा जाता। बाप बिगर और कोई बाप का परिचय दे न सके क्योंकि वह तो बाप को जानते ही नहीं। यहाँ भी बहुत हैं जिनकी बुद्धि में नहीं आता है – बाप को कैसे याद करें। मूँझते हैं। इतनी छोटी बिन्दी उनको कैसे याद करें। शरीर तो बड़ा है, उनको ही याद करते रहते हैं। यह भी गायन है भ्रकुटी के बीच चमकता है सितारा अर्थात् आत्मा सितारे मिसल है। आत्मा को सालिग्राम कहा जाता है। शिवलिंग की भी बड़े रूप में पूजा होती है। जैसे आत्मा को देख नहीं सकते, शिवबाबा भी किसको देखने में तो आ न सके। भक्ति मार्ग में बिन्दी की पूजा कैसे करें क्योंकि पहले-पहले शिवबाबा की अव्यभिचारी पूजा शुरू होती है ना। तो पूजा के लिए जरूर बड़ी चीज़ चाहिए। सालिग्राम भी बड़े अण्डे मिसल बनाते हैं। एक तरफ अंगुष्ठे मिसल भी कहते और फिर सितारा भी कहते हैं। अभी तुमको तो एक बात पर ठहरना है। आधाकल्प बड़ी चीज की पूजा की है। अब फिर बिन्दी समझना इसमें मेहनत भी है, देख नहीं सकते। यह बुद्धि से जाना जाता है। शरीर में आत्मा प्रवेश करती है जो फिर निकलती है, कोई देख तो नहीं सकता। बड़ी चीज हो तो देखने में भी आये। बाप भी ऐसे बिन्दी है परन्तु वह ज्ञान का सागर है, और कोई को ज्ञान का सागर नहीं कहेंगे। शास्त्र तो हैं भक्ति मार्ग के। इतने सब वेद-शास्त्र आदि किसने बनाये? कहते हैं व्यास ने बनाये। क्राइस्ट की आत्मा ने कोई शास्त्र बनाया नहीं। यह तो बाद में मनुष्य बैठ बनाते हैं। ज्ञान तो उनमें है नहीं। ज्ञान सागर है ही एक बाप। शास्त्रों में ज्ञान की, सद्गति की बातें हैं नहीं। हरेक धर्म वाला अपने-अपने धर्म स्थापक को याद करते हैं। देहधारी को याद करते हैं। क्राइस्ट का भी चित्र है ना। सबके चित्र हैं। शिवबाबा तो है ही परम आत्मा। अभी तुम समझते हो आत्मायें सब हैं ब्रदर्स। ब्रदर्स में ज्ञान हो न सके, जो किसको ज्ञान देकर और सद्गति करें। सद्गति करने वाला है ही एक बाप। इस समय ब्रदर्स भी हैं और बाप भी है। बाप आकर सारे विश्व की आत्माओं को सद्गति देते हैं। विश्व का सद्गति दाता है ही एक। श्री श्री 108 जगतगुरू कहो अथवा विश्व का गुरू कहो, बात एक ही है। अभी तो है आसुरी राज्य। संगम पर ही बाप आकर यह सब बातें समझाते हैं।

तुम जानते हो बरोबर अब नई दुनिया की स्थापना हो रही है और पुरानी दुनिया का विनाश होता है। यह भी समझाया है पतित-पावन एक ही निराकार बाप है। कोई देहधारी पतित-पावन हो न सके। पतित-पावन पर-मात्मा ही है। अगर पतित-पावन सीताराम भी कहें तो भी बाप ने समझाया है भक्ति का फल देने भगवान आता है। तो सभी सीतायें ठहरी ब्राइड्स और ब्राइडग्रुम एक राम, जो सभी को सद्गति देने वाला है। यह सब बातें बाप ही बैठ समझाते हैं। ड्रामा अनुसार तुम ही फिर 5 हज़ार वर्ष बाद यह बातें सुनेंगे। अभी तुम सब पढ़ रहे हो। स्कूल में कितने ढेर पढ़ते हैं। यह सब ड्रामा बना हुआ है। जिस समय जो पढ़ते हैं, जो एक्ट चलती है वही एक्ट फिर कल्प बाद हूबहू होगी, हूबहू 5 हज़ार वर्ष बाद फिर पढ़ेंगे। यह अनादि ड्रामा बना हुआ है। जो भी देखेंगे सेकण्ड बाई सेकण्ड नई चीज दिखाई पड़ेगी। चक्र फिरता रहेगा। नई-नई बातें तुम देखते रहेंगे। अभी तुम जानते हो यह 5 हज़ार वर्ष का ड्रामा है जो चलता रहता है। इनकी डीटेल तो बहुत है। मुख्य-मुख्य बातें समझाई जाती है। जैसे कहते हैं परमात्मा सर्वव्यापी है, बाप समझाते हैं मैं सर्वव्यापी नहीं हूँ। बाप आकर अपना और रचना के आदि-मध्य-अन्त का परिचय देते हैं। तुम अभी जानते हो बाप कल्प-कल्प आते हैं हमको वर्सा देने। यह भी गायन है ब्रह्मा द्वारा स्थापना। इसमें समझानी बहुत अच्छी है। विराट रूप का भी जरूर अर्थ होगा ना। परन्तु सिवाए बाप के कब कोई समझा न सके। चित्र तो बहुत हैं परन्तु एक की भी सम-झानी कोई के पास है नहीं। ऊंच ते ऊंच शिवबाबा है, उनका भी चित्र है परन्तु जानते कोई नहीं। अच्छा फिर सूक्ष्मवतन है उनको छोड़ दो, उनकी दरकार ही नहीं। हिस्ट्री-जॉग्राफी यहाँ की समझनी होती है, वह तो है साक्षात्कार की बात। जैसे यहाँ इसमें बाप बैठ समझाते हैं वैसे सूक्ष्मवतन में कर्मातीत शरीर में बैठकर इनसे मिलते हैं अथवा बोलते हैं। बाकी वहाँ तो वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी है नहीं। हिस्ट्री-जॉग्राफी यहाँ की है। बच्चों की बुद्धि में बैठा हुआ है सतयुग में देवी-देवता थे, जिनको 5 हज़ार वर्ष हुआ। इस आदि सनातन देवता धर्म की स्थापना कैसे हुई – यह भी कोई जानते नहीं। और धर्मों की स्थापना के बारे में तो सब जानते हैं। किताब आदि भी हैं। लाखों वर्ष की तो बात ही नहीं हो सकती। यह तो बिल्कुल रांग है परन्तु मनुष्यों की बुद्धि कुछ काम नहीं करती। हर बात बाप समझाते हैं – मीठे-मीठे बच्चों, अच्छी रीति धारण करो। मुख्य बात है बाप की याद। यह याद की ही दौड़ी है। रेस होती है ना। कोई अकेले-अकेले दौड़ते हैं। कोई जोड़ी को इकट्ठा बांध फिर दौड़ते हैं। यहाँ जो जोड़ी है वह इकट्ठे दौड़ी लगाने की प्रैक्टिस करते हैं। सोचते हैं सतयुग में भी ऐसे इकट्ठे जोड़ी बन जायें। भल नाम-रूप तो बदल जाता है, वही शरीर थोड़ेही मिलता है। शरीर तो बदलता रहता है। समझते हैं आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। फीचर्स तो दूसरा होगा। परन्तु बच्चों को वन्डर लगना चाहिए जो फीचर्स, जो एक्ट सेकण्ड बाई सेकण्ड पास्ट हुई वह फिर हूबहू 5000 वर्ष के बाद रिपीट होनी है। कितना वन्डरफुल यह नाटक है, और कोई समझा नहीं सकते। तुम जानते हो हम सब पुरू-षार्थ करते हैं। नम्बरवार तो बनेंगे ही। सब तो कृष्ण नहीं बनेंगे। फीचर्स सबके डिफरेन्ट होंगे। कितना बड़ा वन्डरफुल नाटक है। एक का फीचर न मिले दूसरे से। वही हूबहू खेल रिपीट होता है। यह सब विचार कर आश्चर्य खाना होता है। कैसे बेहद का बाप आकर पढ़ाते हैं। जन्म-जन्मान्तर तो भक्ति मार्ग के शास्त्र आदि पढ़ते आये, साधुओं की कथायें आदि भी सुनी। अब बाप कहते हैं भक्ति का समय पूरा हुआ। अब भक्तों को भगवान द्वारा फल मिलता है। यह नहीं जानते भगवान कब किस रूप में आयेगा? कभी कहते हैं शास्त्र पढ़ने से भगवान मिलेगा? कभी कहते यहाँ आयेंगे। शास्त्रों से ही अगर काम हो जाता तो फिर बाप को क्यों आना पड़े। शास्त्र पढ़ने से ही भगवान मिल जाए तो बाकी भगवान आकर क्या करेंगे। आधाकल्प तुम यह शास्त्र पढ़ते-पढ़ते तमोप्रधान ही बनते आये हो। तो बच्चों को सृष्टि का चक्र भी समझाते रहते हैं और दैवी चलन भी चाहिए। एक तो किसको दु:ख नहीं देना है। ऐसे नहीं, कोई को विष चाहिए, वह नहीं देते हो तो यह कोई दु:ख देना है। ऐसे तो बाप कहते नहीं हैं। कई ऐसे भी बुद्धू निकलते हैं जो कहते हैं बाबा कहते हैं ना – किसको दु:ख नहीं देना है। अब यह विष मांगते हैं तो उनको देना चाहिए, नहीं तो यह भी किसको दु:ख देना हुआ ना। ऐसे समझने वाले मूढ़मती भी हैं। बाप तो कहते हैं “पवित्र जरूर बनना है”। आसुरी चलन और दैवी चलन की भी समझ चाहिए। मनुष्य तो यह भी नहीं समझते, वह तो कह देते आत्मा निर्लेप है। कुछ भी करो, कुछ भी खाओ-पियो, विकार में जाओ, कोई हर्जा नहीं। ऐसे भी सिखलाते हैं। कितनों को पकड़-कर ले आते हैं। बाहर में भी वेजीटेरियन बहुत रहते हैं। जरूर अच्छा है तब तो वेजीटेरियन बनते हैं। सब जातियों में वैष्णव होते हैं। छी-छी चीज़ नहीं खाते हैं। मैनारिटी होते हैं। तुम भी मैनारिटी हो। इस समय तुम कितने थोड़े हो। आहिस्ते-आहिस्ते वृद्धि को पाते रहेंगे। बच्चों को यही शिक्षा मिलती है – दैवीगुण धारण करो। छी-छी वस्तु ऐसी कोई के हाथ की बनाई हुई नहीं खानी चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपने चार्ट में देखना है – (1) हम श्रीमत के खिलाफ तो नहीं चलते हैं? (2) झूठ तो नहीं बोलते हैं? (3) किसको तंग तो नहीं करते हैं? दैवीगुण धारण किये हैं?

2) पढ़ाई के साथ-साथ दैवी चलन धारण करनी है। “पवित्र जरूर बनना है”। कोई भी छी-छी वस्तुएं नहीं खानी हैं। पूरा वैष्णव बनना है। रेस करनी है।

वरदान:- सेवा द्वारा खुशी, शक्ति और सर्व की आशीर्वाद प्राप्त करने वाली पुण्य आत्मा भव
सेवा का प्रत्यक्षफल – खुशी और शक्ति मिलती है। सेवा करते आत्माओं को बाप के वर्से का अधिकारी बना देना – यह पुण्य का काम है। जो पुण्य करता है उसको आशीर्वाद जरूर मिलती है। सभी आत्माओं के दिल में जो खुशी के संकल्प पैदा होते, वह शुभ संकल्प आशीर्वाद बन जाते हैं और भविष्य भी जमा हो जाता है इसलिए सदा अपने को सेवाधारी समझ सेवा का अविनाशी फल खुशी और शक्ति सदा लेते रहो।
स्लोगन:- मन्सा-वाचा की शक्ति से विघ्न का पर्दा हटा दो तो अन्दर कल्याण का दृश्य दिखाई दे।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 26 SEPTEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

26-09-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

“मीठे बच्चे – तुम बाप के पास आये हो अपने कैरेक्टर्स सुधारने, तुम्हें अभी दैवी कैरेक्टर्स बनाने हैं”
प्रश्नः- तुम बच्चों को ऑखें बन्द करके बैठने की मना क्यों की जाती है?
उत्तर:- क्योंकि नज़र से निहाल करने वाला बाप तुम्हारे सम्मुख है। अगर ऑखें बन्द होंगी तो निहाल कैसे होंगे। स्कूल में ऑखें बन्द करके नहीं बैठते हैं। ऑखें बन्द होंगी तो सुस्ती आयेगी। तुम बच्चे तो स्कूल में पढ़ाई पढ़ रहे हो, यह सोर्स ऑफ इनकम है। लाखों पद्मों की कमाई हो रही है, कमाई में सुस्ती, उदासी नहीं आ सकती।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों प्रति बाप समझाते हैं। यह तो बच्चे जानते हैं कि रूहानी बाप परमधाम से आकर हमको पढ़ा रहे हैं। क्या पढ़ा रहे हैं? बाप के साथ आत्मा का योग लगाना सिखलाते ह़ैं जिसको याद की यात्रा कहा जाता है। यह भी बताया है – बाप को याद करते-करते मीठे रूहानी बच्चे तुम पवित्र बन अपने पवित्र शान्तिधाम में पहुँच जायेंगे। कितनी सहज समझानी है। अपने को आत्मा समझो और अपने प्रीतम बेहद के बाप को याद करो तो तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप जो हैं, वह भस्म होते जायेंगे। इसको ही योग अग्नि कहा जाता है। यह भारत का प्राचीन राजयोग है, जो बाप ही हर 5 हज़ार वर्ष के बाद आकर सिखलाते हैं। बेहद का बाप ही भारत में, इस साधारण तन में आकर तुम बच्चों को समझाते हैं। इस याद से ही तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप कट जायेंगे क्योंकि बाप पतित-पावन है और सर्वशक्तिमान् है। तुम्हारी आत्मा की बैटरी अभी तमोप्रधान बन गई है। जो सतो-प्रधान थी अब उनको फिर से सतोप्रधान कैसे बनायें, जो तुम सतोप्रधान दुनिया में जा सको वा शान्तिधाम घर में जा सको। बच्चों को यह बहुत अच्छी रीति याद रखना है। बाप बच्चों को यह डोज़ देते हैं। यह याद की यात्रा उठते-बैठते, चलते-फिरते तुम कर सकते हो। जितना हो सके गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल समान पवित्र रहना है। बाप को भी याद करना है और साथ-साथ दैवीगुण भी धारण करने है क्योंकि दुनिया वालों के तो आसुरी कैरेक्टर्स हैं। तुम बच्चे यहाँ आये हो दैवी कैरेक्टर्स बनाने। इन लक्ष्मी-नारायण के कैरेक्टर्स बड़े मीठे थे। भक्ति मार्ग में उन्हों की ही महिमा गाई हुई है। भक्ति मार्ग कब से शुरू होता है, यह भी किसको पता नहीं है। अभी तुमने समझा है और रावण राज्य कब से शुरू हुआ, यह भी अब समझा है। तुम बच्चों को यह सारी नॉलेज बुद्धि में रखनी है। जबकि जानते हो हम ज्ञान सागर रूहानी बाप के बच्चे हैं, अब रूहानी बाप हमको पढ़ाने आते हैं। यह भी जानते हो यह कोई ऑर्डनरी बाप नहीं है। यह है रूहानी बाप, जो हमको पढ़ाने आया है। उनका निवास स्थान सदैव ब्रह्म-लोक में है। लौकिक बाप तो सबके यहाँ हैं। यह बच्चों को अच्छी रीति निश्चय में रखना है – हम आत्माओं को पढ़ाने वाला परमपिता परमात्मा है, जो बेहद का बाप है। भक्ति मार्ग में लौकिक बाप होते हुए भी परमपिता परमात्मा को बुलाते हैं। उनका एक ही नाम यथार्थ शिव है। बाप खुद समझाते हैं – मीठे-मीठे बच्चों, मेरा नाम एक ही शिव है। भल अनेक नाम अनेक मन्दिर बनाये हैं परन्तु वह सब है भक्ति मार्ग की सामग्री। यथार्थ नाम मेरा एक ही शिव है। तुम बच्चों को आत्मा ही कहते हैं, सालिग्राम कहें तो भी हर्जा नहीं। अनेकानेक सालिग्राम हैं। शिव एक ही है। वह है बेहद का बाप, बाकी सब हैं बच्चे। इसके पहले तुम हद के बच्चे, हद के बाप के पास रहते थे। ज्ञान तो था नहीं। बाकी अनेक प्रकार की भक्ति करते रहते थे। आधाकल्प भक्ति की है, द्वापर से लेकर भक्ति शुरू होती है। रावणराज्य भी शुरू हुआ है। यह है बहुत सहज बात। परन्तु इतनी सहज बात भी कोई मुश्किल समझते हैं। रावणराज्य कब से शुरू होता है, यह भी कोई नहीं जानता। तुम मीठे बच्चे जानते हो – बाप ही ज्ञान का सागर है। जो उनके पास है वह आकर बच्चों को देते हैं। शास्त्र तो हैं भक्ति मार्ग के।

अभी तुम समझ गये हो – ज्ञान, भक्ति और फिर है वैराग्य। यह 3 मुख्य हैं। सन्यासी लोग भी जानते हैं – ज्ञान भक्ति और वैराग्य। परन्तु सन्यासियों का है अपना हद का वैराग्य। वह बेहद का वैराग्य सिखला न सकें। दो प्रकार के वैराग्य हैं – एक है हद का, दूसरा है बेहद का। वह है हठयोगी सन्यासियों का वैराग्य। यह है बेहद का। तुम्हारा है राजयोग, वह घरबार छोड़ जंगल में चले जाते हैं तो उन्हों का नाम ही पड़ जाता है सन्यासी। हठयोगी घरबार छोड़ते हैं पवित्र रहने के लिए। यह भी है अच्छा। बाप कहते हैं – भारत तो बहुत पवित्र था। इतना पवित्र खण्ड और कोई होता नहीं। भारत की तो बहुत ऊंची महिमा है जो भारतवासी खुद नहीं जानते हैं। बाप को भूलने कारण सब कुछ भूल जाते हैं अर्थात् नास्तिक निधनके बन पड़ते हैं। सतयुग में कितनी सुख-शान्ति थी। अभी कितनी दु:ख-अशान्ति है! मूलवतन तो है ही शान्तिधाम, जहाँ हम आत्मायें रहती हैं। आत्मायें अपने घर से यहाँ आती हैं बेहद का पार्ट बजाने। अभी यह है पुरूषोत्तम संगमयुग जबकि बेहद का बाप आते हैं नई दुनिया में ले चलने के लिए। बाप आकर उत्तम ते उत्तम बनाते हैं। ऊंच ते ऊंच भगवान कहा जाता है। परन्तु वह कौन है, किसको कहा जाता है, यह कुछ भी समझते नहीं हैं। एक बड़ा लिंग रख दिया है। समझते हैं यह निराकार परमात्मा है। हम आत्माओं का वह बाप है – यह भी नहीं समझते, सिर्फ पूजा करते हैं। हमेशा शिवबाबा कहते हैं, रूद्र बाबा वा बबुलनाथ बाबा नहीं कहेंगे। तुम लिखते भी हो शिवबाबा याद है? वर्सा याद है? यह स्लोगन्स घर-घर में लगाने चाहिए – शिवबाबा को याद करो तो पाप भस्म होंगे क्योंकि पतित-पावन एक ही बाप है। इस पतित दुनिया में तो एक भी पावन हो नहीं सकता। पावन दुनिया में फिर एक भी पतित नहीं हो सकता। शास्त्रों में तो सब जगह पतित लिख दिये हैं। त्रेता में भी कहते रावण था, सीता चुराई गई। कृष्ण के साथ कंस, जरासन्धी, हिरण्यकश्यप आदि दिखाये हैं। कृष्ण पर कलंक लगा दिये हैं। अब सतयुग में यह सब हो नहीं सकते। कितने झूठे कलंक लगाये हैं। बाप पर भी कलंक लगाये हैं तो देवताओं पर भी कलंक लगाये हैं। सबकी ग्लानि करते रहते हैं। तो अब बाप कहते हैं यह याद की यात्रा है आत्मा को पवित्र बनाने की। पावन बन फिर पावन दुनिया में जाना है। बाप 84 का चक्र भी समझाते हैं। अभी तुम्हारा यह अन्तिम जन्म है फिर घर जाना है। घर में शरीर तो नहीं जायेगा। सब आत्मायें जानी हैं इसलिए मीठे-मीठे रूहानी बच्चों, अपने को आत्मा समझकर बैठो, देह नहीं समझो। और सतसंगों में तो तुम देह-अभिमानी हो बैठते हो। यहाँ बाप कहते हैं देही-अभिमानी होकर बैठो। जैसे मेरे में यह संस्कार हैं, मैं ज्ञान का सागर हूँ……. तुम बच्चों को भी ऐसा बनना है। बेहद के बाप और हद के बाप का कान्ट्रास्ट भी बतलाते हैं। बेहद का बाप बैठ तुमको सारा ज्ञान समझाते हैं। आगे नहीं जानते थे। अभी सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है, उनका आदि-मध्य-अन्त और चक्र की आयु कितनी है, सब बतलाते हैं। भक्ति मार्ग में तो कल्प की आयु लाखों वर्ष सुनाकर घोर अन्धियारे में डाल दिया है। नीचे ही उतरते आये हैं। कहते भी हैं ना जितना हम भक्ति करेंगे उतना बाप को नीचे खींचेंगे। बाप आकर हमको पावन बनायेंगे। बाप को खींचते हैं क्योंकि पतित हैं, बड़े दु:खी बन जाते हैं। फिर कहते हैं हम बाप को बुलाते हैं। बाप भी देखते हैं बिल्कुल दु:खी तमोप्रधान बन गये हैं, 5 हज़ार वर्ष पूरे हुए हैं तब फिर आते हैं। यह पढ़ाई कोई इस पुरानी दुनिया के लिए नहीं है। तुम्हारी आत्मा धारण कर साथ ले जायेगी। जैसे मैं ज्ञान का सागर हूँ, तुम भी ज्ञान की नदियां हो। यह नॉलेज कोई इस दुनिया के लिए नहीं है। यह तो छी-छी दुनिया, छी-छी शरीर है, इनको तो छोड़ना है। शरीर तो यहाँ पवित्र हो नहीं सकता। मैं आत्माओं का बाप हूँ। आत्माओं को ही पवित्र बनाने आया हूँ। इन बातों को मनुष्य तो कुछ भी समझ नहीं सकते हैं, बिल्कुल ही पत्थरबुद्धि, पतित हैं इसलिए गाते हैं पतित-पावन….. आत्मा ही पतित बनी है। आत्मा ही सब कुछ करती है। भक्ति भी आत्मा करती है, शरीर भी आत्मा लेती है।

अब बाप कहते हैं मैं तुम आत्माओं को ले जाने आया हूँ। मैं बेहद का बाप तुम आत्माओं के बुलावे पर आया हूँ। तुमने कितना पुकारा है। अभी तक भी बुलाते रहते हैं – हे पतित-पावन, ओ गॉड फादर आकर इस पुरानी दुनिया के दु:खों से, डेविल से लिबरेट करो तो हम सब घर में चले जावें। और तो कोई को पता ही नहीं है – हमारा घर कहाँ है, घर में कैसे, कब जायेंगे। मुक्ति में जाने के लिए कितना माथा मारते हैं, कितने गुरू करते हैं। जन्म-जन्मान्तर माथा मारते चले आये हैं। वे गुरू लोग जीवनमुक्ति के सुख को तो जानते ही नहीं। वे चाहते हैं मुक्ति। कहते भी हैं विश्व में शान्ति कैसे हो? सन्यासी भी मुक्ति को ही जानते हैं। जीवनमुक्ति को तो जानते नहीं। परन्तु मुक्ति-जीवन-मुक्ति दोनों वर्सा बाप ही देते हैं। तुम जब जीवनमुक्ति में रहते हो तो बाकी सब मुक्ति में चले जाते हैं। अभी तुम बच्चे नॉलेज ले रहे हो, यह बनने के लिए। तुमने ही सबसे जास्ती सुख देखा है फिर सबसे जास्ती दु:ख भी तुमने देखा है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले तुम ही फिर धर्म-भ्रष्ट, कर्म-भ्रष्ट हो गये हो। तुम पवित्र प्रवृत्ति मार्ग वाले थे, यह लक्ष्मी-नारायण पवित्र प्रवृत्ति मार्ग के हैं। घरबार छोड़ना यह सन्यासियों का धर्म है। सन्यासी भी पहले अच्छे थे। तुम भी पहले बहुत अच्छे थे, अभी तमोप्रधान बने हो। बाप कहते हैं यह ड्रामा का खेल है। बाप समझाते हैं – यह पढ़ाई है ही नई दुनिया के लिए। पतित शरीर, पतित दुनिया में ड्रामा अनुसार हमको फिर 5 हज़ार वर्ष के बाद आना पड़ता है। न कल्प लाखों वर्ष का है, न मैं सर्वव्यापी हूँ। यह तो तुम मेरी ग्लानि करते आये हो। मैं फिर भी तुम पर कितना उपकार करता हूँ। जितनी शिवबाबा की ग्लानि की है, उतना और कोई की नहीं की है। जो बाप तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं उनके लिए तुम कहते रहते हो सर्वव्यापी है। जब ग्लानि की भी हद हो जाती है, तब फिर मैं आकर उपकार करता हूँ। यह है पुरूषोत्तम संगमयुग, कल्याणकारी युग। जबकि तुमको पवित्र बनाने आता हूँ। कितनी सहज युक्ति पावन बनाने की बतलाते हैं। तुमने भक्तिमार्ग में बहुत धक्के खाये हैं, तलाव में भी स्नान करने जाते हैं, समझते हैं इससे पावन बन जायेंगे। अब कहाँ वह पानी और कहाँ पतित-पावन बाप। वह सब है भक्तिमार्ग, यह है ज्ञान मार्ग। मनुष्य कितने घोर अन्धियारे में हैं। कुम्भकरण की नींद में सोये हुए हैं। यह तो तुम जानते हो – गाया भी जाता है विनाशकाले विपरीत बुद्धि विनशयन्ति। अभी तुम्हारी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार प्रीत बुद्धि है। पूरी नहीं है, क्योंकि माया घड़ी-घड़ी भुला देती है। यह है 5 विकारों की लड़ाई। पाँच विकारों को रावण कहा जाता है। रावण पर गधे का शीश दिखाते हैं।

बाबा ने यह भी समझाया है – स्कूल में कब ऑखें बन्द करके नहीं बैठना होता है। वह तो भक्तिमार्ग में भगवान को याद करने की शिक्षा देते हैं कि ऑखें बन्द करके बैठो। यहाँ तो बाप कहते हैं यह स्कूल है। सुना भी है नज़र से निहाल……. कहते हैं यह जादूगर है। अरे, वह तो गायन भी है। देवतायें भी नज़र से निहाल होते हैं। नज़र से मनुष्य को देवता बनाने वाला जादूगर हुआ ना। बाप बैठ बैटरी चार्ज करे और बच्चे ऑखें बन्द कर बैठें तो क्या कहेंगे! स्कूल में ऑखें बन्द कर नहीं बैठते। नहीं तो सुस्ती आती है। पढ़ाई तो है सोर्स ऑफ इनकम। लाखों पद्मों की कमाई है। कमाई में कभी उबासी नहीं लेंगे। यहाँ आत्माओं को सुधारना है। यह एम आब्जेक्ट खड़ी है। उन्हों की राजधानी देखनी हो तो जाओ देलवाड़ा में। वह है जड़, यह है चेतन्य देलवाड़ा मन्दिर। देवतायें भी हैं, स्वर्ग भी है। सर्व का सद्गति दाता आबू में ही आते हैं, इसलिए बड़े ते बड़ा तीर्थ आबू ठहरा। जो भी धर्म स्थापक अथवा गुरू लोग हैं, सबकी सद्गति बाप यहाँ आकर करते हैं। यह सबसे बड़ा तीर्थ है, परन्तु गुप्त है। इनको कोई जानते नहीं हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) जो संस्कार बाप में हैं, वही संस्कार धारण करने हैं। बाप समान ज्ञान का सागर बनना है। देही-अभि-मानी होकर रहने का अभ्यास करना है।

2) आत्मा रूपी बैटरी को सतोप्रधान बनाने के लिए चलते-फिरते याद की यात्रा में रहना है। दैवी कैरेक्टर्स धारण करने हैं। बहुत-बहुत मीठा बनना है।
वरदान:- ज्ञान धन द्वारा प्रकृति के सब साधन प्राप्त करने वाले पदमा-पदमपति भव
ज्ञान धन स्थूल धन की प्राप्ति स्वत: कराता है। जहाँ ज्ञान धन है वहाँ प्रकृति स्वत: दासी बन जाती है। ज्ञान धन से प्रकृति के सब साधन स्वत: प्राप्त हो जाते हैं इसलिए ज्ञान धन सब धन का राजा है। जहाँ राजा है वहाँ सर्व पदार्थ स्वत: प्राप्त होते हैं। यह ज्ञान धन ही पदमा-पदमपति बनाने वाला है, परमार्थ और व्यवहार को स्वत: सिद्ध करता है। ज्ञान धन में इतनी शक्ति है जो अनेक जन्मों के लिए राजाओं का राजा बना देती है।
स्लोगन:- “कल्प-कल्प का विजयी हूँ” – यह रूहानी नशा इमर्ज हो तो मायाजीत बन जायेंगे।

 

Aaj ki murli September 2019 – Om shanti murli today

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