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Aaj ki murli October 2019 – Om shanti murli today

ब्रह्माकुमारी मुरली : आज की मुरली (हिंदी मुरली)

Brahma kumaris Om Shanti Murli : Aaj ki Murli October 2019

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31-10-2019

 

आज की मुरली ऑनलाइन पढ़ें  :- TODAY MURLI

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 26 SEPTEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

26-09-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

“मीठे बच्चे – तुम बाप के पास आये हो अपने कैरेक्टर्स सुधारने, तुम्हें अभी दैवी कैरेक्टर्स बनाने हैं”
प्रश्नः- तुम बच्चों को ऑखें बन्द करके बैठने की मना क्यों की जाती है?
उत्तर:- क्योंकि नज़र से निहाल करने वाला बाप तुम्हारे सम्मुख है। अगर ऑखें बन्द होंगी तो निहाल कैसे होंगे। स्कूल में ऑखें बन्द करके नहीं बैठते हैं। ऑखें बन्द होंगी तो सुस्ती आयेगी। तुम बच्चे तो स्कूल में पढ़ाई पढ़ रहे हो, यह सोर्स ऑफ इनकम है। लाखों पद्मों की कमाई हो रही है, कमाई में सुस्ती, उदासी नहीं आ सकती।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों प्रति बाप समझाते हैं। यह तो बच्चे जानते हैं कि रूहानी बाप परमधाम से आकर हमको पढ़ा रहे हैं। क्या पढ़ा रहे हैं? बाप के साथ आत्मा का योग लगाना सिखलाते ह़ैं जिसको याद की यात्रा कहा जाता है। यह भी बताया है – बाप को याद करते-करते मीठे रूहानी बच्चे तुम पवित्र बन अपने पवित्र शान्तिधाम में पहुँच जायेंगे। कितनी सहज समझानी है। अपने को आत्मा समझो और अपने प्रीतम बेहद के बाप को याद करो तो तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप जो हैं, वह भस्म होते जायेंगे। इसको ही योग अग्नि कहा जाता है। यह भारत का प्राचीन राजयोग है, जो बाप ही हर 5 हज़ार वर्ष के बाद आकर सिखलाते हैं। बेहद का बाप ही भारत में, इस साधारण तन में आकर तुम बच्चों को समझाते हैं। इस याद से ही तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप कट जायेंगे क्योंकि बाप पतित-पावन है और सर्वशक्तिमान् है। तुम्हारी आत्मा की बैटरी अभी तमोप्रधान बन गई है। जो सतो-प्रधान थी अब उनको फिर से सतोप्रधान कैसे बनायें, जो तुम सतोप्रधान दुनिया में जा सको वा शान्तिधाम घर में जा सको। बच्चों को यह बहुत अच्छी रीति याद रखना है। बाप बच्चों को यह डोज़ देते हैं। यह याद की यात्रा उठते-बैठते, चलते-फिरते तुम कर सकते हो। जितना हो सके गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल समान पवित्र रहना है। बाप को भी याद करना है और साथ-साथ दैवीगुण भी धारण करने है क्योंकि दुनिया वालों के तो आसुरी कैरेक्टर्स हैं। तुम बच्चे यहाँ आये हो दैवी कैरेक्टर्स बनाने। इन लक्ष्मी-नारायण के कैरेक्टर्स बड़े मीठे थे। भक्ति मार्ग में उन्हों की ही महिमा गाई हुई है। भक्ति मार्ग कब से शुरू होता है, यह भी किसको पता नहीं है। अभी तुमने समझा है और रावण राज्य कब से शुरू हुआ, यह भी अब समझा है। तुम बच्चों को यह सारी नॉलेज बुद्धि में रखनी है। जबकि जानते हो हम ज्ञान सागर रूहानी बाप के बच्चे हैं, अब रूहानी बाप हमको पढ़ाने आते हैं। यह भी जानते हो यह कोई ऑर्डनरी बाप नहीं है। यह है रूहानी बाप, जो हमको पढ़ाने आया है। उनका निवास स्थान सदैव ब्रह्म-लोक में है। लौकिक बाप तो सबके यहाँ हैं। यह बच्चों को अच्छी रीति निश्चय में रखना है – हम आत्माओं को पढ़ाने वाला परमपिता परमात्मा है, जो बेहद का बाप है। भक्ति मार्ग में लौकिक बाप होते हुए भी परमपिता परमात्मा को बुलाते हैं। उनका एक ही नाम यथार्थ शिव है। बाप खुद समझाते हैं – मीठे-मीठे बच्चों, मेरा नाम एक ही शिव है। भल अनेक नाम अनेक मन्दिर बनाये हैं परन्तु वह सब है भक्ति मार्ग की सामग्री। यथार्थ नाम मेरा एक ही शिव है। तुम बच्चों को आत्मा ही कहते हैं, सालिग्राम कहें तो भी हर्जा नहीं। अनेकानेक सालिग्राम हैं। शिव एक ही है। वह है बेहद का बाप, बाकी सब हैं बच्चे। इसके पहले तुम हद के बच्चे, हद के बाप के पास रहते थे। ज्ञान तो था नहीं। बाकी अनेक प्रकार की भक्ति करते रहते थे। आधाकल्प भक्ति की है, द्वापर से लेकर भक्ति शुरू होती है। रावणराज्य भी शुरू हुआ है। यह है बहुत सहज बात। परन्तु इतनी सहज बात भी कोई मुश्किल समझते हैं। रावणराज्य कब से शुरू होता है, यह भी कोई नहीं जानता। तुम मीठे बच्चे जानते हो – बाप ही ज्ञान का सागर है। जो उनके पास है वह आकर बच्चों को देते हैं। शास्त्र तो हैं भक्ति मार्ग के।

अभी तुम समझ गये हो – ज्ञान, भक्ति और फिर है वैराग्य। यह 3 मुख्य हैं। सन्यासी लोग भी जानते हैं – ज्ञान भक्ति और वैराग्य। परन्तु सन्यासियों का है अपना हद का वैराग्य। वह बेहद का वैराग्य सिखला न सकें। दो प्रकार के वैराग्य हैं – एक है हद का, दूसरा है बेहद का। वह है हठयोगी सन्यासियों का वैराग्य। यह है बेहद का। तुम्हारा है राजयोग, वह घरबार छोड़ जंगल में चले जाते हैं तो उन्हों का नाम ही पड़ जाता है सन्यासी। हठयोगी घरबार छोड़ते हैं पवित्र रहने के लिए। यह भी है अच्छा। बाप कहते हैं – भारत तो बहुत पवित्र था। इतना पवित्र खण्ड और कोई होता नहीं। भारत की तो बहुत ऊंची महिमा है जो भारतवासी खुद नहीं जानते हैं। बाप को भूलने कारण सब कुछ भूल जाते हैं अर्थात् नास्तिक निधनके बन पड़ते हैं। सतयुग में कितनी सुख-शान्ति थी। अभी कितनी दु:ख-अशान्ति है! मूलवतन तो है ही शान्तिधाम, जहाँ हम आत्मायें रहती हैं। आत्मायें अपने घर से यहाँ आती हैं बेहद का पार्ट बजाने। अभी यह है पुरूषोत्तम संगमयुग जबकि बेहद का बाप आते हैं नई दुनिया में ले चलने के लिए। बाप आकर उत्तम ते उत्तम बनाते हैं। ऊंच ते ऊंच भगवान कहा जाता है। परन्तु वह कौन है, किसको कहा जाता है, यह कुछ भी समझते नहीं हैं। एक बड़ा लिंग रख दिया है। समझते हैं यह निराकार परमात्मा है। हम आत्माओं का वह बाप है – यह भी नहीं समझते, सिर्फ पूजा करते हैं। हमेशा शिवबाबा कहते हैं, रूद्र बाबा वा बबुलनाथ बाबा नहीं कहेंगे। तुम लिखते भी हो शिवबाबा याद है? वर्सा याद है? यह स्लोगन्स घर-घर में लगाने चाहिए – शिवबाबा को याद करो तो पाप भस्म होंगे क्योंकि पतित-पावन एक ही बाप है। इस पतित दुनिया में तो एक भी पावन हो नहीं सकता। पावन दुनिया में फिर एक भी पतित नहीं हो सकता। शास्त्रों में तो सब जगह पतित लिख दिये हैं। त्रेता में भी कहते रावण था, सीता चुराई गई। कृष्ण के साथ कंस, जरासन्धी, हिरण्यकश्यप आदि दिखाये हैं। कृष्ण पर कलंक लगा दिये हैं। अब सतयुग में यह सब हो नहीं सकते। कितने झूठे कलंक लगाये हैं। बाप पर भी कलंक लगाये हैं तो देवताओं पर भी कलंक लगाये हैं। सबकी ग्लानि करते रहते हैं। तो अब बाप कहते हैं यह याद की यात्रा है आत्मा को पवित्र बनाने की। पावन बन फिर पावन दुनिया में जाना है। बाप 84 का चक्र भी समझाते हैं। अभी तुम्हारा यह अन्तिम जन्म है फिर घर जाना है। घर में शरीर तो नहीं जायेगा। सब आत्मायें जानी हैं इसलिए मीठे-मीठे रूहानी बच्चों, अपने को आत्मा समझकर बैठो, देह नहीं समझो। और सतसंगों में तो तुम देह-अभिमानी हो बैठते हो। यहाँ बाप कहते हैं देही-अभिमानी होकर बैठो। जैसे मेरे में यह संस्कार हैं, मैं ज्ञान का सागर हूँ……. तुम बच्चों को भी ऐसा बनना है। बेहद के बाप और हद के बाप का कान्ट्रास्ट भी बतलाते हैं। बेहद का बाप बैठ तुमको सारा ज्ञान समझाते हैं। आगे नहीं जानते थे। अभी सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है, उनका आदि-मध्य-अन्त और चक्र की आयु कितनी है, सब बतलाते हैं। भक्ति मार्ग में तो कल्प की आयु लाखों वर्ष सुनाकर घोर अन्धियारे में डाल दिया है। नीचे ही उतरते आये हैं। कहते भी हैं ना जितना हम भक्ति करेंगे उतना बाप को नीचे खींचेंगे। बाप आकर हमको पावन बनायेंगे। बाप को खींचते हैं क्योंकि पतित हैं, बड़े दु:खी बन जाते हैं। फिर कहते हैं हम बाप को बुलाते हैं। बाप भी देखते हैं बिल्कुल दु:खी तमोप्रधान बन गये हैं, 5 हज़ार वर्ष पूरे हुए हैं तब फिर आते हैं। यह पढ़ाई कोई इस पुरानी दुनिया के लिए नहीं है। तुम्हारी आत्मा धारण कर साथ ले जायेगी। जैसे मैं ज्ञान का सागर हूँ, तुम भी ज्ञान की नदियां हो। यह नॉलेज कोई इस दुनिया के लिए नहीं है। यह तो छी-छी दुनिया, छी-छी शरीर है, इनको तो छोड़ना है। शरीर तो यहाँ पवित्र हो नहीं सकता। मैं आत्माओं का बाप हूँ। आत्माओं को ही पवित्र बनाने आया हूँ। इन बातों को मनुष्य तो कुछ भी समझ नहीं सकते हैं, बिल्कुल ही पत्थरबुद्धि, पतित हैं इसलिए गाते हैं पतित-पावन….. आत्मा ही पतित बनी है। आत्मा ही सब कुछ करती है। भक्ति भी आत्मा करती है, शरीर भी आत्मा लेती है।

अब बाप कहते हैं मैं तुम आत्माओं को ले जाने आया हूँ। मैं बेहद का बाप तुम आत्माओं के बुलावे पर आया हूँ। तुमने कितना पुकारा है। अभी तक भी बुलाते रहते हैं – हे पतित-पावन, ओ गॉड फादर आकर इस पुरानी दुनिया के दु:खों से, डेविल से लिबरेट करो तो हम सब घर में चले जावें। और तो कोई को पता ही नहीं है – हमारा घर कहाँ है, घर में कैसे, कब जायेंगे। मुक्ति में जाने के लिए कितना माथा मारते हैं, कितने गुरू करते हैं। जन्म-जन्मान्तर माथा मारते चले आये हैं। वे गुरू लोग जीवनमुक्ति के सुख को तो जानते ही नहीं। वे चाहते हैं मुक्ति। कहते भी हैं विश्व में शान्ति कैसे हो? सन्यासी भी मुक्ति को ही जानते हैं। जीवनमुक्ति को तो जानते नहीं। परन्तु मुक्ति-जीवन-मुक्ति दोनों वर्सा बाप ही देते हैं। तुम जब जीवनमुक्ति में रहते हो तो बाकी सब मुक्ति में चले जाते हैं। अभी तुम बच्चे नॉलेज ले रहे हो, यह बनने के लिए। तुमने ही सबसे जास्ती सुख देखा है फिर सबसे जास्ती दु:ख भी तुमने देखा है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले तुम ही फिर धर्म-भ्रष्ट, कर्म-भ्रष्ट हो गये हो। तुम पवित्र प्रवृत्ति मार्ग वाले थे, यह लक्ष्मी-नारायण पवित्र प्रवृत्ति मार्ग के हैं। घरबार छोड़ना यह सन्यासियों का धर्म है। सन्यासी भी पहले अच्छे थे। तुम भी पहले बहुत अच्छे थे, अभी तमोप्रधान बने हो। बाप कहते हैं यह ड्रामा का खेल है। बाप समझाते हैं – यह पढ़ाई है ही नई दुनिया के लिए। पतित शरीर, पतित दुनिया में ड्रामा अनुसार हमको फिर 5 हज़ार वर्ष के बाद आना पड़ता है। न कल्प लाखों वर्ष का है, न मैं सर्वव्यापी हूँ। यह तो तुम मेरी ग्लानि करते आये हो। मैं फिर भी तुम पर कितना उपकार करता हूँ। जितनी शिवबाबा की ग्लानि की है, उतना और कोई की नहीं की है। जो बाप तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं उनके लिए तुम कहते रहते हो सर्वव्यापी है। जब ग्लानि की भी हद हो जाती है, तब फिर मैं आकर उपकार करता हूँ। यह है पुरूषोत्तम संगमयुग, कल्याणकारी युग। जबकि तुमको पवित्र बनाने आता हूँ। कितनी सहज युक्ति पावन बनाने की बतलाते हैं। तुमने भक्तिमार्ग में बहुत धक्के खाये हैं, तलाव में भी स्नान करने जाते हैं, समझते हैं इससे पावन बन जायेंगे। अब कहाँ वह पानी और कहाँ पतित-पावन बाप। वह सब है भक्तिमार्ग, यह है ज्ञान मार्ग। मनुष्य कितने घोर अन्धियारे में हैं। कुम्भकरण की नींद में सोये हुए हैं। यह तो तुम जानते हो – गाया भी जाता है विनाशकाले विपरीत बुद्धि विनशयन्ति। अभी तुम्हारी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार प्रीत बुद्धि है। पूरी नहीं है, क्योंकि माया घड़ी-घड़ी भुला देती है। यह है 5 विकारों की लड़ाई। पाँच विकारों को रावण कहा जाता है। रावण पर गधे का शीश दिखाते हैं।

बाबा ने यह भी समझाया है – स्कूल में कब ऑखें बन्द करके नहीं बैठना होता है। वह तो भक्तिमार्ग में भगवान को याद करने की शिक्षा देते हैं कि ऑखें बन्द करके बैठो। यहाँ तो बाप कहते हैं यह स्कूल है। सुना भी है नज़र से निहाल……. कहते हैं यह जादूगर है। अरे, वह तो गायन भी है। देवतायें भी नज़र से निहाल होते हैं। नज़र से मनुष्य को देवता बनाने वाला जादूगर हुआ ना। बाप बैठ बैटरी चार्ज करे और बच्चे ऑखें बन्द कर बैठें तो क्या कहेंगे! स्कूल में ऑखें बन्द कर नहीं बैठते। नहीं तो सुस्ती आती है। पढ़ाई तो है सोर्स ऑफ इनकम। लाखों पद्मों की कमाई है। कमाई में कभी उबासी नहीं लेंगे। यहाँ आत्माओं को सुधारना है। यह एम आब्जेक्ट खड़ी है। उन्हों की राजधानी देखनी हो तो जाओ देलवाड़ा में। वह है जड़, यह है चेतन्य देलवाड़ा मन्दिर। देवतायें भी हैं, स्वर्ग भी है। सर्व का सद्गति दाता आबू में ही आते हैं, इसलिए बड़े ते बड़ा तीर्थ आबू ठहरा। जो भी धर्म स्थापक अथवा गुरू लोग हैं, सबकी सद्गति बाप यहाँ आकर करते हैं। यह सबसे बड़ा तीर्थ है, परन्तु गुप्त है। इनको कोई जानते नहीं हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) जो संस्कार बाप में हैं, वही संस्कार धारण करने हैं। बाप समान ज्ञान का सागर बनना है। देही-अभि-मानी होकर रहने का अभ्यास करना है।

2) आत्मा रूपी बैटरी को सतोप्रधान बनाने के लिए चलते-फिरते याद की यात्रा में रहना है। दैवी कैरेक्टर्स धारण करने हैं। बहुत-बहुत मीठा बनना है।
वरदान:- ज्ञान धन द्वारा प्रकृति के सब साधन प्राप्त करने वाले पदमा-पदमपति भव
ज्ञान धन स्थूल धन की प्राप्ति स्वत: कराता है। जहाँ ज्ञान धन है वहाँ प्रकृति स्वत: दासी बन जाती है। ज्ञान धन से प्रकृति के सब साधन स्वत: प्राप्त हो जाते हैं इसलिए ज्ञान धन सब धन का राजा है। जहाँ राजा है वहाँ सर्व पदार्थ स्वत: प्राप्त होते हैं। यह ज्ञान धन ही पदमा-पदमपति बनाने वाला है, परमार्थ और व्यवहार को स्वत: सिद्ध करता है। ज्ञान धन में इतनी शक्ति है जो अनेक जन्मों के लिए राजाओं का राजा बना देती है।
स्लोगन:- “कल्प-कल्प का विजयी हूँ” – यह रूहानी नशा इमर्ज हो तो मायाजीत बन जायेंगे।

 

Daily Murli Brahma Kumaris 30 may 2017 – Bk Murli Hindi

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30/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम्हें बाप समान मीठा बनना है, किसी को दु:ख नहीं देना है, कभी क्रोध नहीं करना है
प्रश्नः-कर्मो की गुह्य गति को जानते हुए तुम बच्चे कौन सा पाप कर्म नहीं कर सकते?
उत्तर:-आज दिन तक दान को पुण्य कर्म समझते थे, लेकिन अब समझते हो दान करने से भी कई बार पाप बनता है क्योंकि अगर किसी ऐसे को पैसा दिया जो पैसे से पाप करे, उसका असर भी तुम्हारी अवस्था पर अवश्य ही पड़ेगा इसलिए दान भी समझकर करना है।
गीत:-इस पाप की दुनिया से…..

ओम् शान्ति। अभी तुम बच्चे सामने बैठे हो। बाप कहते हैं हे जीव की आत्मायें सुनती हो। आत्माओं से बात करते हैं। आत्मायें जानती हैं – हमारा बेहद का बाप हमको ले चलते हैं, जहाँ दु:ख का नाम नहीं। गीत में भी कहते हैं इस पाप की दुनिया से पावन दुनिया में ले चलो। पतित दुनिया किसको कहा जाता है, यह दुनिया नहीं जानती। देखो, आजकल मनुष्यों में काम, क्रोध कितना तीखा है। क्रोध के वशीभूत होकर कहते हैं हम इसके देश को नाश करेंगे। कहते भी हैं हे भगवान हमको घोर अन्धियारे से घोर सोझरे में ले चलो क्योंकि पुरानी दुनिया है। कलियुग को पुराना युग, सतयुग को नया युग कहा जाता है। बाप बिगर नया युग कोई बना न सके। हमारा मीठा बाबा हमको अब दु:खधाम से सुखधाम में ले चलते हैं। बाबा आपके सिवाए हमको कोई भी स्वर्ग में ले जा नहीं सकते। बाबा कितना अच्छी रीति समझाते हैं। फिर भी किसकी बुद्धि में बैठता नहीं है। इस समय बाबा की श्रेष्ठ मत मिलती है। श्रेष्ठ मत से हम श्रेष्ठ बनते हैं। यहाँ श्रेष्ठ बनेंगे तो श्रेष्ठ दुनिया में ऊंच पद पायेंगे। यह तो है भ्रष्टाचारी रावण की दुनिया। अपनी मत पर चलने को मनमत कहा जाता है। बाप कहते हैं श्रीमत पर चलो। तुमको फिर घड़ी-घड़ी आसुरी मत नर्क में ढकेलती है। क्रोध करना आसुरी मत है। बाबा कहते हैं एक दो पर क्रोध नहीं करो। प्रेम से चलो। हर एक को अपने लिए राय लेनी है। बाप कहते हैं बच्चे पाप क्यों करते हो, पुण्य से काम चलाओ। अपना खर्चा कम कर दो। तीर्थो पर धक्का खाना, सन्यासियों के पास धक्का खाना, इन सब कर्मकाण्ड पर कितना खर्चा करते हैं। वह सब छुड़ा देते हैं। शादी में मनुष्य कितना शादमाना करते हैं, कर्जा लेकर भी शादी कराते हैं। एक तो कर्जा उठाते, दूसरा पतित बनते। सो भी जो पतित बनने चाहते हैं जाकर बनें। जो श्रीमत पर चल पवित्र बनते हैं उनको क्यों रोकना चाहिए। मित्र सम्बन्धी आदि झगड़ा करेंगे तो सहन करना ही पड़ेगा। मीरा ने भी सब कुछ सहन किया ना। बेहद का बाप आया है राजयोग सिखलाए भगवान भगवती पद प्राप्त कराते हैं। लक्ष्मी भगवती, नारायण भगवान कहा जाता है। कलियुग अन्त में तो सभी पतित हैं फिर उन्हों को किसने चेन्ज किया। अब तुम बच्चे जानते हो बाबा कैसे आकर स्वर्ग अथवा रामराज्य की स्थापना कराते हैं। हम सूर्यवंशी अथवा चन्द्रवंशी पद पाने के लिए यहाँ आये हैं। जो सूर्यवंशी सपूत बच्चे होंगे वह तो अच्छी तरह पढ़ाई पढ़ेंगे।

बाप सबको समझाते हैं – पुरुषार्थ कर तुम माँ बाप को फालो करो। ऐसा पुरुषार्थ करो जो इनके वारिस बनकर दिखाओ। मम्मा बाबा कहते हो तो भविष्य तख्तनशीन होकर दिखाओ। बाप तो कहते हैं इतना पढ़ो जो हमसे ऊंच जाओ। ऐसे बहुत बच्चे होते हैं जो बाप से ऊंच चले जाते हैं। बेहद का बाप कहते हैं हम तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ। मैं थोड़ेही बनता हूँ। कितना मीठा बाप है। उनकी श्रीमत मशहूर है। तुम श्रेष्ठ देवी-देवता थे फिर 84 जन्म लेते-लेते अभी पतित बन पड़े हो। हार और जीत का खेल है। माया से हारे हार, माया से जीते जीत। मन अक्षर कहना रांग है। मन, अमन थोड़ेही हो सकता है। मन तो संकल्प करेगा। हम चाहें संकल्प रहित होकर बैठ जाएं परन्तु कब तक? कर्म तो करना है ना। वह समझते हैं गृहस्थ धर्म में रहना, यह कर्म नहीं करना है। इन हठयोग सन्यासियों का भी पार्ट है। उनका भी एक यह निवृत्ति मार्ग वालों का धर्म है और कोई धर्म में घर-घाट छोड़ जंगल में नहीं जाते हैं। अगर कोई ने छोड़ा भी है तो भी सन्यासियों को देखकर। बाबा कोई घर से वैराग्य नहीं दिलाते। बाप कहते हैं भल घर में रहो परन्तु पवित्र बनो। पुरानी दुनिया को भूलते जाओ। तुम्हारे लिए नई दुनिया बना रहा हूँ। शंकराचार्य सन्यासियों को ऐसे नहीं कहते कि तुम्हारे लिए नई दुनिया बनाता हूँ, उनका है हद का सन्यास, जिससे अल्पकाल का सुख मिलता है। अपवित्र लोग जाकर माथा टेकते हैं। पवित्रता का देखो कितना मान है। अभी तो देखो कितने बड़े-बड़े फ्लैट आदि बनाते हैं। मनुष्य दान करते हैं अब इसमें पुण्य तो कुछ हुआ नहीं। मनुष्य समझते हैं हम जो कुछ ईश्वर अर्थ करते हैं वह पुण्य है। बाप कहते हैं मेरे अर्थ तुम किस-किस कार्य में लगाते हो! दान उनको देना चाहिए – जो पाप न करें। अगर पाप किया तो तुम्हारे ऊपर उनका असर पड़ जायेगा क्योंकि तुमने पैसे दिये। पतितों को देते-देते तुम कंगाल हो गये हो। पैसे ही सब बरबाद हो गये हैं। करके अल्पकाल का सुख मिल जाता है, यह भी ड्रामा। अभी तुम बाप की श्रीमत पर पावन बन रहे हो – पैसे भी तुम्हारे पास वहाँ ढेर होंगे। वहाँ कोई पतित होते नहीं हैं। यह बड़ी समझने की बातें हैं। तुम हो ईश्वरीय औलाद। तुम्हारे में बड़ी रॉयल्टी होनी चाहिए। कहते हैं गुरू के निंदक ठौर न पायें। उन्हों में बाप टीचर गुरू अलग है। यहाँ तो बाप टीचर सतगुरू एक ही है। अगर तुम कोई उल्टी चलन चले तो तीनों के निंदक बन पड़ेंगे। सत बाप, सत टीचर, सतगुरू की मत पर चलने से ही तुम श्रेष्ठ बन जाते हो। शरीर तो छोड़ना ही है तो क्यों न इसे ईश्वरीय, अलौकिक सेवा में लगाकर बाप से वर्सा ले लेवें। बाप कहते हैं मैं इसे लेकर क्या करूंगा। मैं तुमको स्वर्ग की बादशाही देता हूँ। वहाँ भी मैं महलों में नहीं रहता, यहाँ भी मैं महलों में नहीं रहता हूँ। गाते हैं बम बम महादेव.. भर दे मेरी झोली। परन्तु वह कब और कैसे झोली भरते, यह कोई भी नहीं जानते हैं। झोली भरी थी तो जरूर चैतन्य में थे। 21 जन्म के लिए तुम बड़े सुखी, साहूकार बन जाते हो। ऐसे बाप की मत पर कदम-कदम चलना चाहिए। बड़ी मंजिल है। अगर कोई कहे मैं नहीं चल सकता। बाबा कहेंगे – तुम फिर बाबा क्यों कहते हो! श्रीमत पर नहीं चलेंगे तो बहुत डन्डे खायेंगे। पद भी भ्रष्ट होगा। गीत में भी सुना – कहते हैं मुझे ऐसी दुनिया में ले चलो जहाँ सुख और शान्ति हो। सो तो बाप दे सकता है। बाप की मत पर नहीं चलेंगे तो अपने को ही घाटा डालेंगे। यहाँ कोई खर्चे आदि की बात नहीं है। ऐसे थोड़ेही कहते गुरू के आगे नारियल बताशे आदि ले आओ वा स्कूल में फी भरो। कुछ भी नहीं। पैसे भल अपने पास रखो। तुम सिर्फ नॉलेज पढ़ो। भविष्य सुधार करने में कोई नुकसान तो नहीं है। यहाँ माथा भी नहीं टेकना सिखाया जाता। आधाकल्प तो तुम पैसा रखते, माथा झुकाते-झुकाते कंगाल बन पड़े हो। अब बाप फिर तुमको ले जाते हैं शान्तिधाम। वहाँ से सुखधाम में भेज देंगे। अब नवयुग, नई दुनिया आने वाली है। नवयुग सतयुग को कहेंगे फिर कलायें कमती होती जाती हैं। अभी बाप तुमको लायक बना रहे हैं। नारद का मिसाल….। अगर कोई भी भूत होगा तो तुम लक्ष्मी को वर नहीं सकेंगे। यह तो बच्चे तुम्हें अपना घर बार भी सम्भालना है और सर्विस भी करनी है। पहले यह भागे इसीलिए क्योंकि इन्हों पर बहुत मार पड़ी। बहुत अत्याचार हुए। मार की भी इन्हों को परवाह नहीं थी। भट्ठी में कोई पक्के, कोई कच्चे निकल गये। ड्रामा की भावी ऐसी थी। जो हुआ सो हुआ फिर भी होगा। गालियाँ भी देंगे। सबसे बड़े ते बड़ी गाली खाते हैं परमपिता परमात्मा शिव। कह देते हैं परमात्मा सर्वव्यापी है, कुत्ते, बिल्ली, कच्छ-मच्छ सबमें है। बाप कहते हैं मैं तो परोपकारी हूँ। तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ। श्रीकृष्ण स्वर्ग का प्रिन्स है ना। उनके लिए फिर कहते हैं सर्प ने डसा, काला हो गया। अब वहाँ सर्प कैसे डसेगा। कृष्णपुरी में भला कंस कहाँ से आया? यह सब हैं दन्त कथायें। भक्ति मार्ग की यह सामग्री है, जिससे तुम नीचे उतरते आये हो। बाबा तो तुमको गुल-गुल (फूल) बनाते हैं। कोई-कोई तो बहुत बड़े कांटे हैं। ओ गॉड फादर कहते हैं, परन्तु जानते कुछ भी नहीं हैं। फादर तो है परन्तु फादर से क्या वर्सा मिलेगा, कुछ भी मालूम नहीं है। बेहद का बाप कहते हैं मैं तुमको बेहद का वर्सा देने आया हूँ। तुम्हारा एक है लौकिक फादर, दूसरा है अलौकिक प्रजापिता ब्रह्मा, तीसरा है पारलौकिक शिव। तुमको 3 फादर हुए। तुम जानते हो हम दादे से ब्रह्मा द्वारा वर्सा लेते हैं, तो श्रीमत पर चलना पड़े, तब ही श्रेष्ठ बनेंगे। सतयुग में तुम प्रालब्ध भोगते हो। वहाँ न प्रजापिता ब्रह्मा को, न शिव को जानते हो। वहाँ सिर्फ लौकिक फादर को जानते हो। सतयुग में एक बाप है। भक्ति में हैं दो बाप। लौकिक और पारलौकिक बाप। इस संगम पर 3 बाप हैं। यह बातें और कोई समझा न सके। तो निश्चय बैठना चाहिए। ऐसे नहीं अभी-अभी निश्चय फिर अभी-अभी संशय। अभी-अभी जन्म लिया फिर अभी-अभी मर जाना। मर गया तो वर्सा खत्म। ऐसे बाप को फारकती नहीं देना चाहिए। जितना निरन्तर याद करेंगे, सर्विस करेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। बाप यह भी बतलाते हैं मेरी मत पर चलो तो बच जायेंगे। नहीं तो खूब सजा खानी पड़ेगी। सब साक्षात्कार करायेंगे, यह तुमने पाप किया। श्रीमत पर नहीं चले। सूक्ष्म शरीर धारण कराए सजा दी जाती है। गर्भ जेल में भी साक्षात्कार कराते हैं। यह पाप कर्म किया है अब खाओ सजा। झाड़ वृद्धि को पाता जायेगा। जो इस धर्म के थे और-और धर्म में घुस गये हैं, वह सब निकल आयेंगे। बाकी अपने-अपने सेक्शन में चले जायेंगे। अलग-अलग सेक्शन हैं। झाड़ देखो कैसे बढ़ता है। छोटी-छोटी टालियां निकलती जायेंगी।

तुम जानते हो मीठा बाबा आया हुआ है हमको वापिस ले जाने, इसलिए उनको लिबरेटर कहते हैं। दु:ख हर्ता सुख कर्ता है। गाइड बन फिर सुखधाम में ले जायेंगे। कहते भी हैं 5 हजार वर्ष पहले तुमको सुख के सम्बन्ध में भेजा था। तुमने 84 जन्म लिए। अब बाप से वर्सा ले लो। श्रीकृष्ण के साथ तो सबकी प्रीत है। लक्ष्मी-नारायण से इतनी नहीं, जितनी कृष्ण के साथ है। मनुष्यों को यह मालूम नहीं है। राधे-कृष्ण ही लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। कोई भी इस बात को नहीं जानते हैं। अब तुम जानते हो कि राधे कृष्ण अलग-अलग राजधानी के थे फिर स्वयंवर के बाद लक्ष्मी-नारायण बने। वह तो कृष्ण को द्वापर में ले गये हैं। कृष्ण को पतित-पावन कोई कह न सके। रेग्युलर पढ़ने बिगर ऊंच पद कोई पा न सके। अच्छा –

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपनी चलन बहुत रॉयल रखनी है, बहुत कम और मीठा बोलना है। सजाओं से बचने के लिए कदम-कदम पर बाप की श्रीमत पर चलना है।

2) पढ़ाई बहुत ध्यान से अच्छी तरह पढ़नी है। माँ बाप को फालो कर तख्तनशीन, वारिस बनना है। क्रोध के वश होकर दु:ख नहीं देना है।

वरदान:-ब्रह्मा बाप के संस्कारों को स्वयं में धारण करने वाले स्व परिवर्तक सो विश्व परिवर्तक भव
जैसे ब्रह्मा बाप ने जो अपने संस्कार बनायें वह सभी बच्चों को अन्त समय में याद दिलाये – निराकारी, निर्विकारी और निरंहकारी – तो यह ब्रह्मा बाप के संस्कार ही ब्राह्मणों के संस्कार नेचुरल हों। सदा इन्हीं श्रेष्ठ संस्कारों को सामने रखो। सारे दिन में हर कर्म के समय चेक करो कि तीनों ही संस्कार इमर्ज रूप में हैं। इन्हीं संस्कारों को धारण करने से स्व परिवर्तक सो विश्व परिवर्तक बन जायेंगे।
स्लोगन:-अव्यक्त स्थिति बनानी है तो चित्र (देह) को न देख चैतन्य और चरित्र को देखो।

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Daily Murli Brahma Kumaris 28 may 2017 – Bk Murli Hindi

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28/05/17
मधुबन
“अव्यक्त-बापदाद”‘
ओम् शान्ति
03-04-82

सर्वप्रथम त्याग है – देह-भान का त्याग

बापदादा अपने त्यागमूर्त बच्चों को देख रहे हैं। हर एक ब्राह्मण आत्मा त्याग स्वरूप है – लेकिन जैसे भाग्य का सुनाया ना कि एक बाप के बच्चे होते, एक जैसा भाग्य का वर्सा मिलते, सम्भालने और बढ़ाने के आधार पर नम्बर बन जाते हैं। ऐसे त्याग मूर्त तो सभी बनें हैं, इसमें भी नम्बरवार हैं। त्याग किया और ब्राह्मण बनें लेकिन त्याग की परिभाषा बड़ी गुह्य है। कहने में तो सभी एक बात कहते कि तन-मन-धन, सम्बन्ध सबका त्याग कर लिया। लेकिन तन का त्याग अर्थात् देह के भान का त्याग। तो देह के भान का त्याग हो गया है वा हो रहा है? त्याग का अर्थ है किसी भी चीज़ को वा बात को छोड़ दिया, अपने पन से किनारा कर लिया, अपना अधिकार समाप्त हुआ। जिसके प्रति त्याग किया वह वस्तु उसकी हो गई। जिस बात का त्याग किया उसका फिर संकल्प भी नहीं कर सकते क्योंकि त्याग की हुई बात, संकल्प द्वारा प्रतिज्ञा की हुई बात फिर से वापिस नहीं ले सकते हो। जैसे हद के सन्यासी अपने घर का, सम्बन्ध का त्याग करके जाते हैं और अगर फिर वापिस आ जाएं तो उसको क्या कहा जायेगा! नियम प्रमाण वापिस नहीं आ सकते। ऐसे आप ब्राह्मण बेहद के सन्यासी वा त्यागी हो। आप त्याग मूर्तियों ने अपने इस पुराने घर अर्थात् पुराने शरीर, पुराने देह का भान त्याग किया, संकल्प किया कि बुद्धि द्वारा फिर से कब इस पुराने घर में आकर्षित नहीं होंगे। संकल्प द्वारा भी फिर से वापिस नहीं आयेंगे। पहला-पहला यह त्याग किया इसलिए तो कहते हो देह सहित देह के सम्बन्ध का त्याग। देह के भान का त्याग। तो त्याग किए हुए पुराने घर में फिर से वापिस तो नहीं आ जाते हो! वायदा क्या किया है? तन भी तेरा कहा वा सिर्फ मन तेरा कहा? पहला शब्द “तन” आता है। जैसे तन-मन-धन कहते हो, देह और देह के सम्बन्ध कहते हो। तो पहला त्याग क्या हुआ? इस पुराने देह के भान से विस्मृति अर्थात् किनारा। यह पहला कदम है त्याग का। जैसे घर में घर की सामग्री (सामान) होती है, ऐसे इस देह रूपी घर में भिन्न-भिन्न कर्मेन्द्रियां ही सामग्री हैं। तो घर का त्याग अर्थात् सर्व का त्याग। घर को छोड़ा लेकिन कोई एक चीज़ में ममता रह गई तो उसको त्याग कहेंगे? ऐसे कोई भी कर्मेन्द्रिय अगर अपने तरफ आकर्षित करती है तो क्या उसको सम्पूर्ण त्याग कहेंगे? इसी प्रकार अपनी चेंकिग करो। ऐसे अलबेले नहीं बनना कि और तो सब छोड़ दिया बाकी कोई एक कर्मेन्द्रिय विचलित होती है वह भी समय पर ठीक हो जायेगी। लेकिन कोई एक कर्मेन्द्रिय की आकर्षण भी एक बाप का बनने नहीं देगी। एकरस स्थिति में स्थित होने नहीं देगी। नम्बरवन में जाने नहीं देगी। अगर कोई हीरे-जवाहर, महल-माड़ियां छोड़ दे और सिर्फ कोई मिट्टी के फूटे हुए बर्तन में भी मोह रह जाए तो क्या होगा? जैसे हीरा अपनी तरफ आकर्षित करता, वैसे हीरे से भी ज्यादा वह फूटा हुआ बर्तन उसको अपनी तरफ बार-बार आकर्षित करेगा। न चाहते भी बुद्धि बार-बार वहाँ भटकती रहेगी। ऐसे अगर कोई भी कर्मेन्द्रिय की आकर्षण रही हुई है तो श्रेष्ठ पद पाने से बार-बार नीचे ले आयेगी। तो पुराने घर और पुरानी सामग्री सबका त्याग चाहिए। ऐसे नहीं समझो यह तो बहुत थोड़ा है, लेकिन यह थोड़ा भी बहुत कुछ गंवाने वाला है, सम्पूर्ण त्याग चाहिए। इस पुरानी देह को बापदादा द्वारा मिली हुई अमानत समझो। सेवा अर्थ कार्य में लगाना है। यह मेरी देह नहीं लेकिन सेवा अर्थ अमानत है। जैसे मेहमान बन देह में रह रहे हैं। थोड़े समय के लिए बापदादा ने कार्य के लिए आपको यह तन दिया है। तो आप क्या बन गये? मेहमान! मेरे-पन का त्याग और मेहमान समझ महान कार्य में लगाओ। मेहमान को क्या याद रहता है? असली घर याद रहता है या उसी में ही फंस जाते हो! तो आप सबका यह शरीर रूपी घर भी यह फरिश्ता स्वरूप है, फिर देवता स्वरूप है। उसको याद करो। इस पुराने शरीर में ऐसे ही निवास करो जैसे बापदादा पुराने शरीर का आधार लेते हैं लेकिन शरीर में फंस नहीं जाते हैं। कर्म के लिए आधार लिया और फिर अपने फरिश्ते स्वरूप में स्थित हो जाओ। अपने निराकारी स्वरूप में स्थित हो जाओ। न्यारेपन की ऊपर की ऊंची स्थिति से नीचे साकार कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करने लिए आओ, इसको कहा जाता है मेहमान अर्थात् महान। ऐसे रहते हो? त्याग का पहला कदम पूरा किया है?

बापदादा हंसी की बात यह सुनते हैं कि वर्तमान समय कोई भी अपने को कम नहीं समझते। अगर किसी को भी कहा जाए कि दो में से एक छोटा, एक बड़ा बन जाए तो क्या करते हैं! अपने को कम समझते हैं? क्यों, क्या के शस्त्र लेकर उल्टा शक्ति स्वरूप दिखाते हैं। यह भी अलंकार कोई कम नहीं हैं। जैसे सर्व शक्तियों के अलंकार हैं, वैसे माया वा रावण की भुजायें भी कोई कम नहीं हैं। शक्तियों को भुजायें धारी दिखाया है। अष्ट भुजाधारी, 16 भुजाधारी भी दिखाते हैं लेकिन रावण के सिर ज्यादा दिखाते हैं। यह क्यों? क्योंकि रावण माया की शक्ति पहले दिमाग को ही हलचल में लाती है। जिस समय कोई भी माया आती है तो सेकेण्ड में उसके कितने रूप होते हैं? क्यों, क्या, ऐसे, वैसे, जैसे कितने क्वेश्चन के सिर पैदा हो जाते हैं। एक काटते हैं तो दूसरा पैदा हो जाता है। एक ही समय में 10 बातें बुद्धि में फौरन आ जाती हैं। तो एक बात को 10 सिर लग गये ना! इन बातों का तो अनुभव है ना? फिर एक-एक सिर अपना रूप दिखाता है। यही 10 शीश के शस्त्रधारी बन जाते हैं।

शक्ति अर्थात् सहयोगी। अभिमान के सिर वाली शक्ति नहीं लेकिन सदा सर्व भुजाधारी अर्थात् सर्व परिस्थिति में सहयोगी। रावण के 10 सिर वाली आत्मायें हर छोटी-सी परिस्थिति में भी कभी सहयोगी नहीं बनेंगी। क्यों, क्या, कैसे के सिर द्वारा अपना उल्टा अभिमान प्रत्यक्ष करती रहेंगी। क्यों का क्वेश्चन हल करेंगी तो फिर कैसे का सिर ऊंचा हो जायेगा अर्थात् एक बात को सुलझायेंगी तो फिर दूसरी बात शुरू कर देंगी। दूसरी बात को ठीक करेंगी तो तीसरा सिर पैदा हो जायेगा। बार-बार कहेंगे यह बात तो ठीक है लेकिन यह क्यों? वह क्यों? इसको कहा जाता है कि एक बात के 10 शीश लगाने वाली शक्ति। सहयोगी कभी नहीं बनेंगे, सदा हर बात में अपोजीशन करेंगे। तो अपोजीशन करने वाले रावण सप्रदाय हो गये ना। चाहे ब्राह्मण बन गये लेकिन उस समय के लिए आसुरी शक्ति का प्रभाव होता है, वशीभूत होते हैं। और शक्ति स्वरूप हर परिस्थिति में, हर कार्य में सदा सहयोगी होंगे। सहयोग की निशानी भुजायें हैं, इसलिए कभी भी कोई संगठित कार्य होता है तो क्या शब्द बोलते हो? अपनी-अपनी अंगुली दो, तो यह सहयोग देना हुआ ना। अंगुली भी भुजा में है ना। तो भुजायें सहयोग की ही निशानी हैं। तो समझा शक्ति की भुजायें और रावण के सिर। तो अपने को देखो कि सदा के सहयोगी मूर्त बने हैं? त्याग मूर्त बनने का पहला कदम फालो फादर के समान किया है? ब्रह्मा बाप को देखा, सुना – संकल्प में, मुख में सदैव क्या रहा? यह बाप का रथ है। तो आपका रथ किसका है? क्या सिर्फ ब्रह्मा ने रथ दिया वा आप लोगों ने भी रथ दिया? ब्रह्मा का प्रवेशता का पार्ट अलग है लेकिन आप सबने भी तन तेरा कहा – न कि तन मेरा। आप सबका भी वायदा है जैसे चलाओ, जहाँ बिठाओ… यह वायदा है ना? वा आंख को मैं चलाऊंगा, बाकी को बाप चलायें? कुछ मनमत पर चलेंगे, कुछ श्रीमत पर चलेंगे। ऐसा वायदा तो नहीं है ना? तो कोई भी कर्मेन्द्रिय के वशीभूत होना – यह श्रीमत है वा मनमत है? तो समझा, त्याग की परिभाषा कितनी गुह्य है! इसलिए नम्बर बन गये हैं। अभी तो सिर्फ देह के त्याग की बात सुनाई है। आगे और बहुत हैं। अभी तो त्याग की सीढ़ियां भी बहुत हैं, यह पहली सीढ़ी की बात कर रहे हैं। त्याग मुश्किल तो नहीं लगता? सबको छोड़ना पड़ेगा। अगर पुराने के बदले नया मिल जाए तो मुश्किल है क्या! अभी-अभी मिलता है। भविष्य मिलना तो कोई बड़ी नहीं लेकिन अभी-अभी पुराना भान छोड़ो, फरिश्ता स्वरूप लो। जब पुरानी दुनिया के देह का भान छोड़ देते हो तो क्या बन जाते हो? डबल लाइट। अभी ही बनते हो। परन्तु अगर न यहाँ के न वहाँ के रहते हो तो मुश्किल लगता है। न पूरा छोड़ते हो, न पूरा लेते हो तो अधमरे हो जाते हो, इसलिए बार-बार लम्बा श्वास उठाते हो। कोई भी बात मुश्किल होती तो लम्बा श्वास उठता है। मरने में तो मजा है – लेकिन पूरा मरो तो। लेने में कहते हो पूरा लेंगे और छोड़ने में मिट्टी के बर्तन भी नहीं छोड़ेंगे इसलिए मुश्किल हो जाता है। वैसे तो अगर कोई मिट्टी का बर्तन रखता है तो बापदादा रखने भी दें, बाप को क्या परवाह है, भले रखो। लेकिन स्वयं ही परेशान होते हो इसलिए बापदादा कहते हैं छोड़ो। अगर कोई भी पुरानी चीज़ रखते हो तो रिजल्ट क्या होती है? बार-बार बुद्धि भी उन्हों की ही भटकती है। फरिश्ता बन नहीं सकते इसलिए बापदादा तो और भी हजारों मिट्टी के बर्तन दे सकते हैं – कितने भी इकट्ठे कर लो लेकिन जहाँ किचड़ा होगा वहाँ क्या पैदा होंगे? मच्छर! और मच्छर किसको काटेंगे? तो बापदादा बच्चों के कल्याण के लिए ही कहते हैं पुराना छोड़ दो। अधमरे नहीं बनो। मरना है तो पूरा मरो, नहीं तो भले ही जिंदा रहो। मुश्किल है नहीं लेकिन मुश्किल बना देते हो। कभी-कभी मुश्किल हो जाता है। जब रावण के सिर लग जाते हैं तो मुश्किल होता है। जब भुजाधारी शक्ति बन जाते हो तो सहज हो जाता है। सिर्फ एक कदम सहयोग देना और पदम कदमों का सहयोग मिलना हो जाता। लेकिन पहले जो एक कदम देना पड़ता है उसमें घबरा जाते हो। मिलना भूल जाता है, देना याद आ जाता है इसलिए मुश्किल अनुभव होता है। अच्छा।

ऐसे सदा सहयोग मूर्त, सदा त्याग द्वारा श्रेष्ठ भाग्य अनुभव करने वाले, कदम-कदम में फालो फादर करने वाले सदा अपने को मेहमान अर्थात् महान आत्मा समझने वाले, ऐसे बेहद के सन्यास करने वाले श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों के साथ – अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

1- परिस्थिति रूपी पहाड़ को स्वस्थिति से जम्प देकर पार करो:-

अपने को सदा समर्थ आत्मायें समझते हो! समर्थ आत्मा अर्थात् सदा माया को चेलेन्ज कर विजय प्राप्त करने वाले। सदा समर्थ बाप के संग में रहने वाले। जैसे बाप सर्वशक्तिमान है वैसे हम भी मास्टर सर्वशक्तिमान हैं। सर्व शक्तियां शस्त्र हैं, अलंकार हैं, ऐसे अलंकारधारी आत्मा समझते हो? जो सदा समर्थ हैं वे कभी परिस्थितियों में डगमग नहीं होंगे। परिस्थिति को पार कर सकते हो। जैसे विमान द्वारा उड़ते हुए कितने पहाड़, कितने समुद्र पार कर लेते हैं, क्योंकि ऊंचाई पर उड़ते हैं। तो ऊंची स्थिति से सेकेण्ड में पार कर लेंगे। ऐसे लगेगा जैसे पहाड़ को वा समुद्र को भी जम्प दे दिया। मेहनत का अनुभव नहीं होगा।

2- रोब को त्याग रूहाब को धारण करने वाले सच्चे सेवाधारी बनो:-

सभी कुमार सदा रूहानियत में रहते हो, रोब में तो नहीं आते? यूथ को रोब जल्दी आ जाता है। यह समझते हैं हम सब कुछ जानते हैं, सब कर सकते हैं। जवानी का जोश रहता है। लेकिन रूहानी यूथ अर्थात् सदा रूहाब में रहने वाले। सदा नम्रचित क्योंकि जितना नम्रचित होंगे उतना निर्माण करेंगे। जहाँ निर्माण होंगे वहाँ रोब नहीं होगा, रूहानियत होगी। जैसे बाप कितना नम्रचित बनकर आते हैं, ऐसे फालो फादर। अगर जरा भी सेवा में रोब आया तो वह सेवा समाप्त हो जाती है। अच्छा – ओम् शान्ति।

वरदान:-बाप की समीपता के अनुभव द्वारा स्वप्न में भी विजयी बनने वाले समान साथी भव
भक्ति मार्ग में समीप रहने के लिए सतसंग का महत्व बताते हैं। संग अर्थात् समीप वही रह सकता है जो समान है। जो संकल्प में भी सदा साथ रहते हैं वह इतने विजयी होते हैं जो संकल्प में तो क्या लेकिन स्वप्न मात्र भी माया वार नहीं कर सकती। सदा मायाजीत अर्थात् सदा बाप के समीप संग में रहने वाले। कोई की ताकत नहीं जो बाप के संग से अलग कर सके।
स्लोगन:-सदा निर्विघ्न रहना और सर्व को निर्विघ्न बनाना – यही यथार्थ सेवा है।

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Daily Murli 21 May 2017 : Bk Dainik Gyan Murli (Hindi)

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21/05/17
मधुबन
“अव्यक्त-बापदाद”‘
ओम् शान्ति
01-04-82

भाग्य का आधार त्याग

आज भाग्य विधाता बापदादा अपने सर्व बच्चों के त्याग और भाग्य दोनों को देख रहे हैं। त्याग क्या किया है और भाग्य क्या पाया है – यह तो जानते ही हो कि एक गुणा त्याग उसके रिटर्न में पदमगुणा भाग्य मिलता है। त्याग की गुह्य परिभाषा जानते हुए भी जो बच्चे थोड़ा भी त्याग करते हैं तो भाग्य की लकीर स्पष्ट और बहुत बड़ी हो जाती है। त्याग की भी भिन्न-भिन्न स्टेज हैं। वैसे तो ब्रह्माकुमार वा ब्रह्माकुमारी बने तो यह भी त्याग का भाग्य ब्राह्मण जीवन मिली। इस हिसाब से जैसे ब्राह्मण सभी कहलाते हो वैसे त्याग करने वाली आत्मा भी सब हो गये। लेकिन त्याग में भी नम्बर हैं, इसलिए भाग्य पाने में भी नम्बर हैं। ब्राह्मकुमार वा ब्रह्माकुमारी तो सब कहलाते हो लेकिन ब्रह्माकुमार-कुमारियों में से ही कोई माला का नम्बरवन दाना बना, कोई लास्ट दाना बना लेकिन हैं दोनों ही ब्रह्माकुमार-कुमारी। शूद्र जीवन सबने त्याग की फिर भी नम्बरवन और लास्ट का अन्तर क्यों? चाहे प्रवृत्ति में रह ट्रस्टी बन चल रहे हो, चाहे प्रवृत्ति से निवृत्त हो सेवाधारी बन सदा सेवाकेन्द्र पर रहे हुए हो लेकिन दोनों ही प्रकार की ब्राह्मण आत्मायें चाहे ट्रस्टी, चाहे सेवाधारी, दोनों ही ब्रह्माकुमार-कुमारी कहलाते हो। सरनेम दोनों का एक ही है लेकिन दोनों का त्याग के आधार पर भाग्य बना हुआ है। ऐसे नहीं कह सकते कि सेवाधारी बन सेवाकेन्द्र पर रहना – यही श्रेष्ठ त्याग वा भाग्य है। ट्रस्टी आत्मायें भी त्याग वृत्ति द्वारा माला में अच्छा नम्बर ले सकती हैं। लेकिन सच्चे और साफ दिल वाला ट्रस्टी हो। भाग्य प्राप्त करने का अधिकार दोनों को है। लेकिन श्रेष्ठ भाग्य की लकीर खींचने का आधार है “श्रेष्ठ संकल्प और श्रेष्ठ कर्म।” चाहे ट्रस्टी आत्मा हो, चाहे सेवाधारी आत्मा हो दोनों इसी आधार द्वारा नम्बर ले सकते हैं। दोनों को फुल अथॉरिटी है भाग्य बनाने की। जो बनाने चाहें, जितना बनाना चाहें बना सकते हैं। संगमयुग पर वरदाता द्वारा ड्रामा अनुसार समय को वरदान मिला हुआ है। जो चाहे वह श्रेष्ठ भाग्यवान बन सकता है। ब्रह्माकुमार-कुमारी बनना अर्थात् जन्म से भाग्य ले ही आते हो। जन्मते ही भाग्य का सितारा सर्व के मस्तक पर चमकता हुआ है। यह तो जन्म-सिद्ध अधिकार हो गया। ब्राह्मण माना ही भाग्यवान। लेकिन प्राप्त हुए जन्म सिद्ध अधिकार को वा चमकते हुए भाग्य के सितारे को कहाँ तक आगे बढ़ाते, कितना श्रेष्ठ बनाते जाते हैं वह हरेक के पुरूषार्थ पर है। मिले हुए भाग्य के अधिकार को जीवन में धारण कर कर्म में लाना अर्थात् मिली हुई बाप की प्रॉपर्टी को कमाई द्वारा बढ़ाते रहना वा खा के खत्म कर देना, वह हरेक के ऊपर है। जन्मते ही बापदादा सबको एक जैसा श्रेष्ठ ‘भाग्यवान भव का’ वरदान कहो वा भाग्य की प्रापर्टी कहो, एक जैसी ही देते हैं। सब बच्चों को एक जैसा ही टाइटल देते हैं – सिकीलधे बच्चे, लाडले बच्चे, कोई को सिकीलधे, कोई को न सिकीलधे नहीं कहते हैं। लेकिन प्रापर्टी को सम्भालना और बढ़ाना इसमें नम्बर बन जाते हैं। ऐसे नहीं कि सेवाधारियों को 10 पदम देते और ट्रस्टियों को 2 पदम देते हैं। सबको पदमापदमपति कहते हैं। लेकिन भाग्य रूपी खज़ाने को सम्भालना अर्थात् स्व में धारण करना और भाग्य के खजाने को बढ़ाना अर्थात् मन-वाणी-कर्म द्वारा सेवा में लगाना। इसमें नम्बर बन जाते हैं। सेवाधारी भी सब हो, धारणा मूर्त भी सब हो, परन्तु धारणा स्वरूप में नम्बरवार हो। कोई सर्वगुण सम्पन्न बने हैं, कोई गुण सम्पन्न बने हैं। कोई सदा धारणा स्वरूप हैं, कोई कभी धारणा स्वरूप, कभी डगमग स्वरूप। एक गुण को धारण करेंगे तो दूसरा समय पर कर्तव्य में ले नहीं सकेंगे। जैसे एक ही समय पर सहनशक्ति भी चाहिए और साथ-साथ समाने की शक्ति भी चाहिए। अगर एक शक्ति वा एक सहनशीलता के गुण को धारण कर लेंगे और समाने की शक्ति वा गुण को साथ-साथ यूज़ नहीं कर सकेंगे और कहेंगे कि इतना सहन तो किया ना। यह कोई कम किया क्या! यह भी मुझे मालूम है मैंने कितना सहन किया, लेकिन सहन करने के बाद अगर समाया नहीं, समाने की शक्ति को यूज़ नहीं किया तो क्या होगा? यहाँ-वहाँ वर्णन होगा इसने यह किया, मैंने यह किया, तो सहन किया, यह कमाल जरूर की लेकिन कमाल का वर्णन कर कमाल को धमाल में चेन्ज कर लिया क्योंकि वर्णन करने से एक तो देह-अभिमान और दूसरा परचिन्तन दोनों ही स्वरूप कर्म में आ जाते हैं। इसी प्रकार से एक गुण को धारण किया दूसरे को नहीं किया तो जो धारणा स्वरूप होना चाहिए वह नहीं बन पाते। इस कारण मिले हुए खजाने को सदा धारण नहीं कर सकते अर्थात् सम्भाल नहीं सकते। सम्भाला नहीं अर्थात् गंवा दिया ना! कोई सम्भालता है कोई गंवा देता है। नम्बर तो होंगे ही ना! ऐसे सेवा में लगाना अर्थात् भाग्य की प्रापर्टी को बढ़ाना। इसमें भी सेवा तो सभी करते ही हो लेकिन सच्चे दिल से, लगन से सेवा करना, सेवाधारी बन करके सेवा करना इसमें भी अन्तर हो जाता है। कोई सच्चे दिल से सेवा करते हैं और कोई दिमाग के आधार पर सेवा करते हैं। अन्तर तो होगा ना।

दिमाग तेज है, प्वांइन्ट्स बहुत हैं, उसके आधार पर सेवा करना और सच्चे दिल से सेवा करना इसमें रात दिन का अन्तर है। दिल से सेवा करने वाला दिलाराम का बनायेगा। और दिमाग द्वारा सेवा करने वाला सिर्फ बोलना और बुलवाना सिखायेगा। वह मनन करता, वह वर्णन करता। एक हैं सेवाधारी बन सेवा करने वाले और दूसरे हैं नामधारी बनने के लिए सेवा करने वाले। फ़र्क हो गया ना। सच्चे सेवाधारी जिन आत्माओं की सेवा करेंगे उन्हों को प्राप्ति के प्रत्यक्षफल का अनुभव करायेंगे। नामधारी बनने वाले सेवाधारी उसी समय नामाचार को पायेंगे – बहुत अच्छा सुनाया, बहुत अच्छा बोला, लेकिन प्राप्ति के फल की अनुभूति नहीं करा सकेंगे। तो अन्तर हो गया ना! ऐसे एक है लगन से सेवा करना, एक है डियुटी के प्रमाण सेवा करना। लगन वाले हर आत्मा की लगन लगाने के बिना रह नहीं सकेंगे। डियुटी वाला अपना काम पूरा कर लेगा, सप्ताह कोर्स करा लेगा, योगशिविर भी करा लेगा, धारणा शिविर भी करा लेगा, मुरली सुनाने तक भी पहुंचा लेगा, लेकिन आत्मा की लगन लग जाए इसकी जिम्मेवारी अपनी नहीं समझेंगे। कोर्स के ऊपर कोर्स करा लेंगे लेकिन आत्मा में फोर्स नहीं भर सकेंगे। और सोचेंगे मैंने बहुत मेहनत कर ली। लेकिन यह नियम है कि सेवा की लगन वाला ही लगन लगा सकता है। तो अन्तर समझा? यह है मिली हुई प्रापर्टी को बढ़ाना। इस कारण जितना सम्भालते हैं, जितना बढ़ाते हैं उतना नम्बर आगे ले लेते हैं। भाग्यविधाता ने भाग्य सबको एक जैसा बांटा लेकिन कोई कमाने वाले कोई गंवाने वाले बन जाते। कोई खाके खत्म करने वाले बन जाते इसलिए दो प्रकार की माला बन गई है और माला में भी नम्बर बन गये हैं। समझा नम्बर क्यों बने? तो बापदादा त्याग के भाग्य को देख रहे थे। त्याग की भी लीला अपरमअपार है। वह फिर सुनायेंगे। अच्छा।

ऐसे श्रेष्ठ तकदीरवान, सदा श्रेष्ठ संकल्प और श्रेष्ठ कर्म द्वारा भाग्य की लकीर बढ़ाते रहने वाले सदा सच्चे सेवाधारी, सदा सर्व गुणों, सर्व शक्तियों को जीवन में लाने वाले, हर आत्मा को प्रत्यक्षफल अर्थात् प्राप्ति स्वरूप बनाने वाले, ऐसे श्रेष्ठ त्यागी और श्रेष्ठ भागी सदा बाप द्वारा मिले हुए अधिकार को, खजाने को सम्भालने और बढ़ाने वाले, ऐसे धारणा स्वरूप सदा सेवाधारी बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों के साथ

1- ब्राह्मण सो फरिश्ता और फरिश्ता सो देवता – यह लक्ष्य सदा स्मृति में रखो:-

सभी अपने को ब्राह्मण सो फरिश्ता समझते हो? अभी ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण से फरिश्ता बनने वाले हैं फिर फरिश्ता सो देवता बनेंगे – वह याद रहता है? फरिश्ता बनना अर्थात् साकार शरीरधारी होते हुए लाइट रूप में रहना अर्थात् सदा बुद्धि द्वारा ऊपर की स्टेज पर रहना। फरिश्ते के पांव धरनी पर नहीं रहते। ऊपर कैसे रहेंगे? बुद्धि द्वारा। बुद्धि रूपी पांव सदा ऊंची स्टेज पर। ऐसे फरिश्ते बन रहे हो या बन गये हो? ब्राह्मण तो हो ही – अगर ब्राह्मण न होते तो यहाँ आने की छुट्टी भी नहीं मिलती। लेकिन ब्राह्मणों ने फरिश्तेपन की स्टेज कहाँ तक अपनाई है? फरिश्तों को ज्योति की काया दिखाते हैं। तो जितना अपने को प्रकाश स्वरूप आत्मा समझेंगे, प्रकाशमय तो चलते फिरते अनुभव करेंगे जैसे प्रकाश की काया वाले फरिश्ते बनकर चल रहे हैं। फरिश्ता अर्थात् अपनी देह के भान का भी रिश्ता नहीं, देहभान से रिश्ता टूटना अर्थात् फरिश्ता। देह से नहीं, देह के भान से। देह से रिश्ता खत्म होगा तब तो चले जायेंगे लेकिन देहभान का रिश्ता खत्म हो। तो यह जीवन बहुत प्यारी लगेगी। फिर कोई माया भी आकर्षण नहीं करेगी। अच्छा।

2- हम अल्लाह के बगीचे के पुष्प हैं – इस स्वमान में रहो – सदा अपने को बापदादा के अर्थात् अल्लाह के बगीचे के फूल समझकर चलते हो? सदा अपने आप से पूछो कि मैं रूहानी गुलाब बन सदा रूहानी खुशबू फैलाता हूँ? जैसे गुलाब की खुशबू सबको मीठी लगती है, चारों ओर फैल जाती है, तो वह है स्थूल, विनाशी चीज़ और आप सब अविनाशी सच्चे गुलाब हो। तो सदा अविनाशी रूहानियत की खुशबू फैलाते रहते हो? सदा इसी स्वमान में रहो कि हम अल्लाह के बगीचे के पुष्प बन गये – इससे बड़ा स्वमान और कोई हो नहीं सकता। ‘वाह मेरा श्रेष्ठ भाग्य’ – यही गीत गाते रहो। भोलानाथ से सौदा कर लिया तो चतुर हो गये ना! किसको अपना बनाया है? किससे सौदा किया है? कितना बड़ा सौदा किया है? तीनों लोक ही सौदे में ले लिए। आज की दुनिया में सबसे बड़े ते बड़ा कोई भी धनवान हो लेकिन इतना बड़ा सौदा कोई नहीं कर सकता, इतनी महान आत्मायें हो – इस महानता को स्मृति में रखकर चलते चलो।

3- ब्राह्मणों का कर्तव्य है – खुशी का दान कर महादानी बनना – सबसे बड़े से बड़ा खज़ाना, खुशी का खज़ाना है, जो खज़ाना अपने पास होता है उसे दान किया जाता है। आप खुशी के खज़ाने का दान करते रहो। जिसको खुशी देंगे वह बार-बार आपको धन्यवाद देगा। दु:खी आत्माओं को खुशी का दान दे दिया तो आपके गुण गायेंगे। महादानी बनो, खुशी के खज़ाने बांटो। अपने हमजिन्स को जगाओ। रास्ता दिखाओ। सेवा के बिना ब्राह्मण जीवन नहीं। सेवा नहीं तो खुशी नहीं इसलिए सेवा में तत्पर रहो। रोज़ किसी न किसी को दान ज़रूर करो। दान करने के बिना नींद ही नहीं आनी चाहिए।

प्रश्न:- बापदादा के गले में कौन से बच्चे माला के रूप में पिरोये रहते हैं?

उत्तर:- जिनके गले अर्थात् मुख द्वारा बाप के गुण, बाप का दिया हुआ ज्ञान वा बाप की महिमा निकलती रहती, जो बाप ने सुनाया वही मुख से आवाज़ निकलता, ऐसे बच्चे बापदादा के गले का हार बन गले में पिरोये रहते हैं। अच्छा – ओम् शान्ति।

वरदान:-शान्ति की शक्ति से, संस्कार मिलन द्वारा सर्व कार्य सफल करने वाले सदा निर्विघ्न भव
सदा निर्विघ्न वही रह सकता है जो सी फादर, फालो फादर करता है। सी सिस्टर, सी ब्रदर करने से ही हलचल होती है इसलिए अब बाप को फालो करते हुए बाप समान संस्कार बनाओ तो संस्कार मिलन की रास करते हुए सदा निर्विघ्न रहेंगे। शान्ति की शक्ति से अथवा शान्त रहने से कितना भी बड़ा विघ्न सहज समाप्त हो जाता है और सर्व कार्य स्वत: सम्पन्न हो जाते हैं।
स्लोगन:-त्रिकालदर्शी वह है जो किसी भी बात को एक काल की दृष्टि से नहीं देखते, हर बात में कल्याण समझते हैं।

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