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Daily Murli Brahma Kumaris 1 June 2017 – Bk Murli Hindi

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01/06/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – यह पाठशाला है नर से नारायण बनने की, पढ़ाने वाला स्वयं सत्य बाप, सत शिक्षक और सतगुरू है, तुम्हें इसी निश्चय में पक्का रहना है”
प्रश्नः- तुम बच्चों को किस बात का जरा भी फिकर नहीं होना चाहिए, क्यों?
उत्तर:- अगर कोई चलते-चलते हार्टफेल हो जाता, शरीर छोड़ देता तो तुम्हें फिकर नहीं होना चाहिए क्योंकि तुम जानते हो हरेक को अपनी एक्ट करना है। तुम्हें खुश होना चाहिए कि आत्मा, ज्ञान और योग के संस्कार लेकर गई तो और ही भारत की अच्छी सेवा करेगी। फिकर की बात नहीं। यह तो ड्रामा की भावी है।
गीत:- तुम्हीं हो माता…

ओम् शान्ति। बाप बच्चों को समझाते हैं, बच्चे जानते हैं बाबा भी बच्चे कह बुलाते हैं और यह बापदादा दोनों कम्बाइन्ड है। पहले बापदादा फिर बच्चे हैं, यह नई रचना हुई ना और बाप राजयोग भी सिखला रहे हैं। हूबहू 5 हजार वर्ष पहले मुआफिक फिर से हमको राजयोग सिखला रहे हैं। भक्ति मार्ग में फिर उनके किताब बनाए उसको गीता कह दिया है। परन्तु इस समय तो गीता की कोई बात नहीं। यह पीछे शास्त्र बनाए उसको कह दिया है श्रीमद्भगवत गीता, सहज राजयोग की पुस्तक। भक्ति मार्ग में पुस्तक पढ़ने से फायदा नहीं होगा। ऐसे ही सिर्फ शिव को याद करने से कोई वर्सा नहीं मिल सकता। वर्सा सिर्फ अभी संगम पर ही मिल सकता है। बाप है ही बेहद का वर्सा देने वाला और वर्सा भी देंगे संगम पर। बाप राजयोग सिखलाते हैं। दूसरे भी जो सन्यासी आदि सिखलाते हैं उनके सिखलाने और इसमें रात-दिन का फर्क है। उन्हों की बुद्धि में गीता रहती है और समझते हैं कृष्ण ने गीता सुनाई। व्यास ने लिखी। परन्तु गीता तो न कृष्ण ने सुनाई थी, न वह समय था। न कृष्ण का रूप हो सकता है। बाप सब बातें क्लीयर कर समझाते हैं और कहते हैं अभी जज करो। उनका नाम भी बाला है। सत्य बताने वाला ही नर से नारायण बना सकते हैं। तुम बच्चे जानते हो हम नर से नारायण बनने के लिए इस पाठशाला वा रूद्र ज्ञान यज्ञ में बैठे हैं। शिवबाबा अक्षर अच्छा लगता है। बरोबर बाप और दादा जरूर हैं। इस निश्चय से तुम आये हो। बाप ब्रह्मा द्वारा सभी वेदों शास्त्रों का सार समझाते हैं और समझा रहे हैं हम तुमको त्रिकालदर्शी बना रहे हैं। ऐसे नहीं कि तुम त्रिलोकीनाथ बनते हो। नहीं, तुम नाथ तो बनते हो सिर्फ एक शिवपुरी के। उनको लोक नहीं कहेंगे। लोक मनुष्य सृष्टि को कहा जाता है। मनुष्य लोक चैतन्य लोक, वह है निराकारी लोक। तुमको सिर्फ त्रिलोकी की नॉलेज सुनाते हैं, त्रिलोकी का नाथ नहीं बनाते। तीनों लोकों का ज्ञान मिला है इसलिए त्रिलोकदर्शी कहा जाता है। लक्ष्मी-नारायण को भी त्रिलोकीनाथ नहीं कहेंगे। विष्णु को भी त्रिलोकीनाथ नहीं कहेंगे। उनको तो तीनों लोकों का ज्ञान ही नहीं है। लक्ष्मी-नारायण जो बचपन में राधे-कृष्ण हैं, उनको त्रिलोकी का ज्ञान नहीं है। तुमको त्रिकालदर्शी बनना है। नॉलेज लेना है। बाकी कृष्ण के लिए कहते हैं – त्रिलोकीनाथ था, परन्तु नहीं। तीनों लोकों का नाथ तो उनको कहेंगे जो राज्य करे। वह तो सिर्फ वैकुण्ठनाथ बनते हैं, सतयुग को वैकुण्ठ कहा जाता है। त्रेता को वैकुण्ठ नहीं कहेंगे। इस लोक के भी हम नाथ नहीं बन सकते। बाबा भी सिर्फ ब्रह्म महतत्व का नाथ है। ब्रहमाण्ड, जिसमें हम आत्मायें अण्डे मिसल रहते हैं, उनका ही मालिक है। ब्रह्मा, विष्णु व शंकर सूक्ष्मवतन में रहने वाले हैं तो वह वहाँ के नाथ कहेंगे। तुम बनते हो वैकुण्ठ नाथ। वह सूक्ष्मवतन की बात, वह मूलवतन की बात। सिर्फ तुम ही त्रिकालदर्शी बन सकते हो। तुम्हारा तीसरा नेत्र खुला है। दिखाते भी हैं भृकुटी के बीच में तीसरा नेत्र है, इसलिए त्रिनेत्री कहते हैं। परन्तु यह निशानी देवताओं को देते हैं क्योंकि तुम्हारी जब कर्मातीत अवस्था हो जाती है तब तुम त्रिनेत्री बनते हो, वह तो इस समय की बात है। बाकी वह तो ज्ञान का शंख नहीं बजाते। उन्होंने फिर वह स्थूल शंख लिख दिया है। यह मुख की बात है। इससे तुम ज्ञान शंख बजाते हो। नॉलेज पढ़ रहे हो। जैसे बड़ी युनिवर्सिटी में नॉलेज पढ़ते हैं। यह है पतित-पावन गॉड फादरली युनिवर्सिटी। कितनी बड़ी युनिवर्सिटी के तुम स्टूडेन्ट हो। साथ-साथ तुम यह भी जानते हो कि हमारा बाबा, बाबा है, टीचर है, सतगुरू है। सब कुछ है। यह मात-पिता हर हालत में सुख देने वाले हैं इसलिए कहते हैं तुम मात पिता…। यह है सैक्रीन, बहुत मीठा है। देवताओं जैसे मीठे कभी कोई हो न सकें। बच्चे जानते हैं भारत बहुत सुखी, एवरहेल्दी, एवरवेल्दी था। बिल्कुल पवित्र था। कहा ही जाता है वाइसलेस भारत। अभी तो नहीं कहेंगे। अभी तो विशश पतित कहेंगे। बाप कितना सहज कर समझा रहे हैं। बाप और वर्से को जान जाते हैं। बाबा कितना मीठा बनाते हैं। तुम भी फील करते हो हमको श्रीमत पर पढ़ना और पढ़ाना है। यही धन्धा है। बाकी कर्मभोग तो जन्म-जन्मान्तर का बहुत है ना। समझो कोई बीमार पड़ते हैं, कल हार्टफेल हो जाता है तो समझा जाता है भावी ड्रामा की। उनको शायद और पार्ट बजाना होगा, इसलिए दु:ख की बात नहीं रहती। ड्रामा अटल है। उनको दूसरा पार्ट बजाना है, फिकर की क्या बात है। और ही भारत की अच्छी सेवा करेंगे क्योंकि संस्कार ही ऐसे ले जाते हैं, कोई के कल्याण अर्थ। तो खुश होना चाहिए ना। समझाते रहते हैं अम्मा मरे तो हलुआ खाना… इसमें समझ चाहिए। तुम जानते हो हम एक्टर्स हैं। हरेक को अपना एक्ट करना है। ड्रामा में नूँध है। एक शरीर छोड़ दूसरा पार्ट बजाना है। यहाँ से जिन संस्कारों से जायेंगे वहाँ गुप्त भी सर्विस ही करेंगे। आत्मा में संस्कार तो रहते हैं ना। जो सर्विसएबुल बच्चे हैं मुख्य, मान भी उनका है। सर्विस करने वाले, भारत का कल्याण करने वाले सिर्फ तुम बच्चे हो। बाकी और सब अकल्याण ही करते हैं। पतित बनाते हैं। समझो कोई फर्स्टक्लास सन्यासी मरता है, वह ऐसे बैठ जाते हैं, हम शरीर छोड़ ब्रह्म में जाकर लीन हो जायेंगे। तो वह जाकर कोई का कल्याण कर नहीं सकते क्योंकि वह कोई कल्याणकारी बाप की सन्तान थोड़ेही हैं। तुम कल्याणकारी की सन्तान हो। तुम किसका अकल्याण कर नहीं सकते। तुम तो जायेंगे कल्याण अर्थ। यह है पतित दुनिया। बाप का आर्डीनेन्स निकला है कि अभी यह भोगबल की रचना नहीं चाहिए। यह तमोप्रधान है। आधाकल्प से तुम एक दो को काम कटारी से दु:ख देते आये हो। यह रावण के 5 भूत हैं जो तुमको दु:ख देते हैं। यह तुम्हारे बड़े दुश्मन हैं। बाकी कोई सोनी लंका आदि थी नहीं। यह सब बातें बैठ बनाई हैं। बाप कहते यह तो बेहद की बात है। सारी मनुष्य सृष्टि इस समय रावण की जंजीरों में बंधी हुई है। मैगजीन में भी चित्र अच्छा निकला है – सब रावण के पिंजड़े में पड़े हैं, सब शोक वाटिका में हैं। अशोक वाटिका नहीं है। अशोका होटल नहीं। यह तो सब शोक की होटलें हैं, बहुत गन्द करते हैं। तुम बच्चे जानते हो स्वच्छ कौन हैं, गन्दे कौन है? अभी तुम फूल बन रहे हो।

तुम बच्चे समझते हो आत्मा के रिकार्ड में कितना बड़ा पार्ट नूँधा हुआ है। यह बड़ी वन्डरफुल बातें हैं। इस छोटी आत्मा में अविनाशी पार्ट 84 जन्मों का भरा हुआ है। कहते भी हैं हम पतित तमोप्रधान हैं। अभी है इन्ड। खूने नाहेक खेल है ना। एक बाम से कितने मर पड़ते हैं। तुम जानते हो अभी पुरानी दुनिया रहनी नहीं है। यह पुराना शरीर, पुरानी दुनिया है। हमको नई दुनिया में नया शरीर मिलना है, इसलिए पुरुषार्थ कर रहे हैं श्रीमत पर। जरूर यह सब बच्चे उनके मददगार हैं। श्री श्री की श्रीमत पर हम श्री लक्ष्मी, श्री नारायण बनते हैं। वाइसप्रेजीडेन्ट को प्रेजीडेन्ट थोड़ेही कहेंगे। यह तो हो ही नहीं सकता। पत्थर-भित्तर में भगवान अवतार कैसे लेंगे। उनके लिए गाते हैं यदा यदाहि.. जब-जब बिल्कुल पतित बन जाते हैं, कलियुग का अन्त समीप आ जाता है तब मुझे आना पड़ता है। अब तुम बच्चे मुझ बाप को याद करो। बाबा पूछते हैं – बाबा की याद रहती है? कहते हैं बाबा घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। क्यों? लौकिक बाप को तो कभी भूलते नहीं। यह बात बिल्कुल नई है। बाप निराकार एक बिन्दी है। यह प्रैक्टिस नहीं है। कहते हैं ना-हमने न तो कभी ऐसा सुना, न उनको ऐसे याद किया। देवताओं को भी यह ज्ञान नहीं रहता। यह ज्ञान प्राय: लोप हो जाता है। उनको स्वदर्शन चक्रधारी भी नहीं कहेंगे। भल कहते हैं विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। प्रवृत्ति मार्ग के लिए दो रूप दिखाते हैं। ब्रह्मा सरस्वती, शंकर पार्वती, लक्ष्मी नारायण। ऊंचे ते ऊंचा है एक, फिर है सेकेण्ड, थर्ड… अब बाप कहते हैं बच्चे देह सहित देह के सभी धर्म छोड़ो, अपने को आत्मा समझो। मैं आत्मा बाप का बच्चा हूँ। मैं सन्यासी नहीं हूँ। बाप को याद करो, इस देह के धर्म को भूल जाओ। बड़ा सहज है। अभी बाप के साथ बैठे हो। बाबा ब्रह्मा द्वारा बैठ बतलाते हैं। बापदादा दोनों कम्बाइन्ड हैं। जैसे दो बच्चे इकट्ठे पैदा होते हैं ना, यह भी दो का पार्ट इकट्ठा चल रहा है। बच्चों को समझाया है अन्त मती सो गती। जब शरीर छोड़ते हैं, उस समय बुद्धि कहाँ चली गई तो वहाँ जाकर जन्म लेना पड़ेगा। अन्तकाल पति का मुंह देखती है तो बुद्धि वहाँ चली जाती है। अन्तकाल जो जैसी स्मृति में रहता है, उसी समय का बड़ा असर रहता है। अगर उस समय की स्मृति रहे कि कृष्ण जैसा बच्चा बनूँ, तो बात मत पूछो। बहुत सुन्दर बच्चा बन जन्म लेते हैं। अब तो अन्त मती एक ही लगन रखनी है ना। इस समय तुम क्या कर रहे हो! जानते हो हम शिवबाबा को याद करते हैं। सबको साक्षात्कार तो होता ही है। मुकुटधारी तो कृष्ण भी है, राधे भी हैं। प्रिन्स-प्रिन्सेज तो होंगे परन्तु कब? सतयुग में वा त्रेता में? वह फिर पुरुषार्थ पर है। जितना पुरुषार्थ करेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। तुम कहते हो हम तो 21 जन्मों के लिए राजाई लेंगे। मम्मा बाबा लेते हैं तो क्यों नहीं हम फालो करें। नॉलेज को धारण कर फिर कराना है, इतनी सर्विस करनी है तब 21जन्मों के लिए प्रालब्ध मिलेगी। स्कूल में जो अच्छी रीति पुरुषार्थ नहीं करते हैं तो कम मार्क्स लेते हैं। तुम अभी 5 विकारों रूपी माया रावण पर विजय पाते हो। तुम्हारी है अहिंसक युद्ध। अगर राम को निशानी न देवें तो सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी कैसे कहा जाए। तो बाप कहते हैं तुम जितना पुरुषार्थ करेंगे तो अन्त मती सो गति होगी। देह का भी ख्याल न हो, सबको भूलना है। बाप कहते हैं तुम नंगे (अशरीरी) आये थे फिर नंगे जाना है। तुम इतनी छोटी बिन्दी इन कानों से सुनती हो, मुख द्वारा बोलती हो। हम आत्मा एक शरीर छोड़ फिर दूसरे में जाते हैं। अभी हम आत्मायें घर जा रही हैं। बाबा बड़ा श्रृंगार कराते हैं, जिससे मनुष्य से देवता बन जाते हैं। तुम जानते हो शिवबाबा को याद करने से हम ऐसे बनते हैं। गीता में भी है मुझे याद करो और वर्से को याद करो तो तुम स्वर्ग के मालिक बनेंगे। बिल्कुल सहज है। समझते भी हैं – बरोबर हम कल्प-कल्प आपसे ब्रह्मा द्वारा वर्सा पाते हैं। गाते भी हैं ना – ब्रह्मा द्वारा स्थापना देवता धर्म की। नापास होने से फिर त्रेता के क्षत्रिय धर्म में चले जाते हैं। ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय.. तीन धर्मों की स्थापना होती है। सतयुग में और कोई धर्म होते नहीं, और सब बाद में आते हैं। उनसे हमारा कोई कनेक्शन नहीं। भारतवासी भूल गये हैं कि हम आदि सनातन देवी-देवता धर्म के हैं। यह भी ड्रामा का पार्ट ऐसा बना हुआ है। अच्छा-

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) श्रीमत पर पढ़ने और पढ़ाने का धन्धा करना है। ड्रामा की भावी पर अटल रहना है। किसी भी बात का फिकर नहीं करना है

2) अन्तकाल में एक बाप के सिवाय और कोई भी याद न आये, इसलिए इस देह को भी भूलने का अभ्यास करना है। अशरीरी बनना है।

वरदान:- एवररेडी बन हर परीक्षा में रूहानी मौज का अनुभव करने वाली विशेष आत्मा भव
संगमयुग रूहानी मौजों में रहने का युग है इसलिए सदा मौज में रहो, कभी भी मूंझना नहीं। कोई भी परिस्थिति या परीक्षा में थोड़े समय के लिए भी मूंझ हुई और उसी घड़ी अन्तिम घड़ी आ जाए तो अन्त मति सो गति क्या होगी! इसलिए सदा एवररेडी रहो। कोई भी समस्या सम्पूर्ण बनने में विघ्न रूप नहीं बनें। सदा यह स्मृति रहे कि मैं दुनिया में सबसे वैल्युबुल, विशेष आत्मा हूँ, मेरा हर संकल्प, बोल और कर्म विशेष हो, एक सेकण्ड भी व्यर्थ न जाए।
स्लोगन:- श्रेष्ठ कर्मो का खाता जमा करते चलो तो विकर्मों का खाता स्वत: समाप्त हो जायेगा।

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Daily Murli Brahma Kumaris 31 may 2017 – Bk Murli Hindi

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31/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – श्रीमत पर पवित्र बनो तो धर्मराज की सज़ाओं से छूट जायेंगे, हीरे जैसा बनना है तो ज्ञान अमृत पियो, विष को छोड़ो”
प्रश्नः- सतयुगी पद का सारा मदार किस बात पर है?
उत्तर:- पवित्रता पर। तुम्हें याद में रह पवित्र जरूर बनना है। पवित्र बनने से ही सद्गति होगी। जो पवित्र नहीं बनते वे सजा खाकर अपने धर्म में चले जाते हैं। तुम भल घर में रहो परन्तु किसी देहधारी को याद नहीं करो, पवित्र रहो तो ऊंच पद मिल जायेगा।
गीत:- तुम्हें पाके हमने जहान पा लिया है…..

 

ओम् शान्ति। शिव भगवानुवाच और कोई को भी भगवान नहीं कहा जाता, एक निराकार परमपिता परमात्मा को ही शिवबाबा कहा जाता है। वह है सभी आत्माओं का बाप। पहले-पहले यह निश्चय होना चाहिए – हम शिवबाबा के बच्चे जरूर हैं। दु:ख के समय कहते हैं परमात्मा सहायता करो, रहम करो। यह भी नहीं जानते हैं कि हमारी आत्मा परमात्मा को याद करती है। अहम् आत्मा का बाप वह है। इस समय सारी दुनिया है पतित आत्माओं की। गाते हैं हम पापी नीच हैं, आप सम्पूर्ण निर्विकारी हैं। परन्तु फिर भी अपने को समझते नहीं हैं। बाप समझाते हैं कि जब तुम कहते हो भगवान बाप एक है तो तुम सब आपस में भाई-भाई हो गये। फिर शरीर के नाते सब भाई बहिन ठहरे। शिवबाबा के बच्चे फिर प्रजापिता ब्रह्मा के भी बच्चे ठहरे। यह तुम्हारा बेहद का बाप, टीचर, गुरू है। यह कहते हैं मैं तुमको पतित नहीं बनाता हूँ। मैं तो आया हूँ पावन बनाने। अगर मेरी मत पर चलेंगे तो। यहाँ तो सब मनुष्य रावण मत पर हैं। सबमें 5 विकार हैं। बाप कहते हैं बच्चे अब निर्विकारी बनो, श्रीमत पर चलो। परन्तु विकारों को छोड़ते ही नहीं हैं। तो स्वर्ग के मालिक बनते नहीं। सब अजामिल जैसे पापी बन गये हैं। रावण सप्रदाय हैं, यह शोक वाटिका है, कितना दु:खी हैं। बाप आकर फिर रामराज्य बनाते हैं। तो तुम बच्चे जानते हो कि यह सच्चा-सच्चा युद्ध का मैदान है। गीता में भगवान कहते हैं काम महाशत्रु है, उन पर जीत पहनो। सो तो पहनते नहीं हैं। अभी बाप बैठ समझाते हैं। तुम्हारी आत्मा इन आरगन्स द्वारा सुनती है फिर सुनाती है, एक्ट आत्मा करती है। हम आत्मा हैं शरीर धारण कर पार्ट बजाते हैं। परन्तु मनुष्य आत्म-अभिमानी के बदले देह-अभिमानी बन पड़े हैं। अब बाप कहते हैं देही-अभिमानी बनो। सतयुग में आत्म-अभिमानी रहते हैं। परमात्मा को नहीं जानते हैं। यहाँ तुम देह-अभिमानी हो और परमात्मा को भी नहीं जानते हो इसलिए तुम्हारी ऐसी दुर्गति हो गई है। दुर्गति को भी समझते नहीं। जिनके पास धन बहुत है वह तो समझते हैं हम स्वर्ग में बैठे हैं। बाप कहते हैं यह सब गरीब बन जाते हैं क्योंकि विनाश होना है। विनाश होना तो अच्छा है ना। हम फिर मुक्तिधाम में चले जायेंगे, इसमें तो खुश होना चाहिए। तुम मरने के लिए तैयारी कर रहे हो। मनुष्य तो मरने से डरते हैं। बाप तुमको वैकुण्ठ ले चलने के लिए लायक बना रहे हैं। पतित तो पतित दुनिया में ही जन्म लेते रहते हैं। स्वर्गवासी कोई भी नहीं होते। मूल बात बाप कहते हैं पवित्र बनो। पवित्र बनने बिगर पवित्र दुनिया में चल नहीं सकेंगे। पवित्रता पर ही अबलाओं पर मार पड़ती है। विष को अमृत समझते हैं। बाप कहते हैं ज्ञान अमृत से तुमको हीरे जैसा बनाता हूँ, फिर तुम विष खाकर कौड़ी जैसे क्यों बनते हो। आधाकल्प तुमने विष खाया अब मेरी आज्ञा मानो। नहीं तो धर्मराज के डण्डे खाने पड़ेंगे। लौकिक बाप भी कहते हैं बच्चे ऐसा काम नहीं करो जो कुल का नाम बदनाम हो। बेहद का बाप कहते हैं श्रीमत पर चलो। पवित्र बनो। अगर काम चिता पर बैठे तो तुम्हारा मुँह काला तो है और ही काला हो जायेगा। अभी तुमको ज्ञान चिता पर बिठाए गोरा बनाते हैं। काम चिता पर बैठने से स्वर्ग का मुंह भी नहीं देख सकेंगे इसलिए बाप कहते हैं अब श्रीमत पर चलो। बाप तो बच्चों से ही बात करेंगे ना। बच्चे ही जानते हैं – बाप हमको स्वर्ग का वर्सा देने आये हैं। कलियुग अब पूरा होना है। जो बाप की श्रीमत पर चलेंगे उनकी ही सद्गति होगी। पवित्र नहीं बनेंगे तो सजा खाकर अपने धर्म में चले जायेंगे। भारतवासी ही स्वर्गवासी थे। अब पतित बन पड़े हैं। स्वर्ग का पता ही नहीं है। तो बाप कहते हैं तुम मेरी श्रीमत पर न चल औरों की मत पर चल विकार में गये तो मरे, फिर भल पिछाड़ी में स्वर्ग में आयेंगे परन्तु पद बहुत हल्का पायेंगे। अभी जो साहूकार हैं वह गरीब बन जाते हैं। जो यहाँ गरीब हैं वह साहूकार बनेंगे। बाप गरीब-निवाज़ है। सारा मदार पवित्रता पर है। बाप के साथ योग लगाने से तुम पावन बनेंगे। बाप बच्चों को समझाते हैं मैं तुमको राजयोग सिखाता हूँ। मैं घरबार नहीं छुड़ाता हूँ। भल घर में रहो परन्तु विकार में मत जाओ और कोई भी देहधारी को याद नहीं करो। इस समय सब पतित हैं। सतयुग में पावन देवता थे। इस समय वह भी पतित बन पड़े हैं। पुनर्जन्म लेते-लेते अब अन्तिम जन्म हो गया है।

तुम सब पार्वतियां हो, तुमको अब अमरनाथ बाप अमरकथा सुना रहे हैं, अमरपुरी का मालिक बनाने। तो अब अमरनाथ बाप को याद करो। याद से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। बाकी शिव, शंकर वा पार्वती कोई पहाड़ों पर नहीं बैठे हैं। यह सब भक्ति मार्ग के धक्के हैं। आधाकल्प बहुत धक्के खाये हैं, अब बाबा कहते हैं मैं तुमको स्वर्ग में ले जाऊंगा। सतयुग में सुख ही सुख है। न धक्के खाते, न गिरते। मुख्य बात है ही पवित्र रहने की। यहाँ जब बहुत अत्याचार करते हैं तो पाप का घड़ा भर जाता है और विनाश होता है। अब एक जन्म पवित्र बनो तो पवित्र दुनिया के मालिक बन जायेंगे। अब जो श्रीमत पर चले। अगर कल्प पहले श्रीमत पर नहीं चले हैं तो अभी भी नहीं चलेंगे, न पद पायेंगे। एक बाप के तुम बच्चे हो। तुम तो आपस में भाई-बहिन हो गये। परन्तु बाप का बनकर अगर गिरे तो और भी रसातल में चले जायेंगे और ही पाप आत्मा बन जायेंगे। यह है ईश्वरीय गवर्मेन्ट। अगर मेरी मत पर पवित्र नहीं बनें तो धर्मराज द्वारा बहुत कड़ी सजा खानी पड़ेगी। जन्म-जन्मान्तर के जो पाप किए हैं उन सबकी सजा खाकर हिसाब-किताब चुक्तू करना होगा। या तो योगबल से विकर्मों को भस्म करना होगा या तो बहुत कड़ी सजा खानी पड़ेगी। कितने ढेर ब्रह्माकुमार और कुमारियां हैं, सब पवित्र रहते हैं, भारत को स्वर्ग बनाते हैं। तुम हो शिव शक्ति पाण्डव सेना, गोप गोपियां, इसमें दोनों आ जाते हैं। भगवान तुमको पढ़ाते हैं। लक्ष्मी-नारायण को भगवती भगवान कहते हैं। उन्हों को जरूर भगवान ने ही वर्सा दिया होगा। भगवान ही आकर तुमको देवता बनाते हैं। सतयुग में यथा राजा रानी तथा प्रजा रहते हैं। सब श्रेष्ठाचारी थे, अब रावण राज्य है। अगर रामराज्य में चलना है तो पवित्र बनो और राम की मत पर चलो। रावण की मत से तो तुम्हारी दुर्गति होती है। गाया हुआ भी है किनकी दबी रहेगी धूल में…. सोना आदि जमीन में, दीवारों में छिपाते हैं। अचानक मरेंगे तो सब कुछ वहाँ ही रह जायेगा। विनाश तो होना ही है। अर्थ क्वेक आदि जब होती है तो चोर लोग भी बहुत निकल पड़ते हैं। अब धनी बाप आया है, तुमको अपना बनाकर विश्व का मालिक बनाने। आजकल वानप्रस्थ अवस्था में भी विकार बिगर रह नहीं सकते, बिल्कुल ही तमोप्रधान हो गये हैं। बाप को पहचानते ही नहीं। बाप कहते हैं मैं पवित्र बनाने आया हूँ। अगर विकार में जायेंगे तो बड़ी कड़ी सजा खानी पड़ेगी। मैं पवित्र बनाए पवित्र दुनिया स्थापन करने आया हूँ। तुम फिर पतित बन विघ्न डालते हो! स्वर्ग की रचना करने में बाधा डालते हो, तो बहुत कड़ी सजा खानी पड़ेगी। मैं आया हूँ तुमको स्वर्गवासी बनाने के लिए। अगर विकार नहीं छोड़गे तो धर्मराज द्वारा बहुत मारे जायेंगे। बहुत त्राहि-त्राहि करनी पड़ेगी। यह इन्द्र सभा है। कहानी है ना – वहाँ ज्ञान परियाँ थीं, किसी पतित को ले आई तो उनका वायब्रेशन आता था। यहाँ सभा में किसी पतित को नहीं बिठाया जाता है। पवित्रता की प्रतिज्ञा करने बिगर बिठाया नहीं जाता, नहीं तो फिर ले आने वाले पर भी दोष पड़ जाता है। बाप तो जानते हैं फिर भी ले आते हैं तो शिक्षा दी जाती है। शिवबाबा को याद करने से आत्मा शुद्ध हो जाती है। वायुमण्डल में साइलेन्स हो जाती है। बाप ही बैठ परिचय देते हैं कि मैं तुम्हारा बाप हूँ। 5 हजार वर्ष पहले मुआफिक तुमको मनुष्य से देवता बनाने आया हूँ। बेहद के बाप से बेहद सुख का वर्सा लेना है। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) योग बल द्वारा विकर्मो के सब हिसाब-किताब चुक्तू कर आत्मा को शुद्ध और वायुमण्डल को शान्त बनाना है।

2) बाप की श्रीमत पर सम्पूर्ण पावन बनने की प्रतिज्ञा करनी है। विकारों के वश होकर स्वर्ग की रचना में विघ्न रूप नहीं बनना है।

वरदान:- विशेषता के संस्कारों को अपनी नेचर बनाए साधारणता को समाप्त करने वाले मरजीवा भव
जैसे किसी की कोई भी नेचर होती है तो वह स्वत: ही अपना काम करती है। सोचना वा करना नहीं पड़ता। ऐसे विशेषता के संस्कार भी नेचर बन जाएं और हर एक के मुख से, मन से यही निकले कि इस विशेष आत्मा की नेचर ही विशेषता की है। साधारण कर्म की समाप्ति हो जाए तब कहेंगे मरजीवा। साधारणता से मर गये, विशेषता में जी रहे हैं। संकल्प में भी साधारणता न हो।
स्लोगन:- समर्थ आत्मा वह है जो किसी न किसी विधि से व्यर्थ को समाप्त कर दे।

साकार मुरलियों से गीता के भगवान को सिद्ध करने की प्वाइंटस (क्रमश: पार्ट 4)

1- मन्मनाभव, मध्याजीभव.. यह गीता के कोई-कोई अक्षर ठीक हैं क्योंकि बाप जो तुमको अभी ज्ञान सुनाते हैं वह फिर प्राय:लोप हो जाता है। कोई को पता ही नहीं रहता कि गीता ज्ञान से श्रीकृष्ण ने यह पद पाया है।

2- जब सतयुग में इन्हों को (देवताओं का) राज्य था तब और कोई धर्म नहीं था। उस समय जनसंख्या भी बहुत थोड़ी थी। तो जरूर गीता ज्ञान के बाद विनाश भी चाहिए। इसलिए महाभारत लड़ाई भी गाई हुई है। इसमें ही सब चेंज होनी है। कलियुग के बाद सतयुग आना है।

3- अभी कहते हैं कि यह महाभारत काल चल रहा है, तो जरूर भगवान भी चाहिए। कृष्ण तो हो न सके। गीता ज्ञान से तो कृष्ण की आत्मा को राजाई मिली। इसलिए गीता है माता, जिससे तुम देवता बनते हो। तो कृष्ण की आत्मा गीता के ज्ञान से राजयोग सीखकर ऐसी बनी है।

4- पतित-पावन एक परमपिता परमात्मा को ही कहा जाता है, उन्हें ही सब पुकारते हैं। कृष्ण को कभी पतित-पावन समझकर याद नहीं करेंगे। अभी तुम जान गये हो कि कृष्ण की आत्मा जो सतयुग में थी वह अनेक रूप धारण करते-करते अभी तमोप्रधान बनी है फिर सतोप्रधान बनती है।

5- शिव भगवानुवाच, भगवान् कहते ही शिव को हैं। भगवान् एक ही होता है। कृष्ण तो बच्चा है। ज्ञान सुनाने वाला है बाप। तो बाप के बजाए बच्चे का नाम डाल देना, यह कितनी बड़ी भूल है। फिर कृष्ण के ही चरित्र आदि बैठ दिखाये हैं। बाप कहते हैं लीला कोई कृष्ण की नहीं है। गाते हैं – हे प्रभू तेरी लीला अपरम-अपार है, तो लीला एक की ही होती है।

6- शिवबाबा की महिमा बड़ी न्यारी है। वह है सदा पावन रहने वाला, परन्तु वह पावन शरीर में आ नहीं सकते। उनको बुलाते ही हैं – पतित दुनिया को आकर पावन बनाओ। तो बाप कहते हैं मुझे पतित दुनिया में, पतित शरीर में आना पड़ता है। इनके (श्रीकृष्ण के) बहुत जन्मों के अन्त में आकर प्रवेश करता हूँ।

7- शास्त्रों में श्रीकृष्ण को स्वदर्शन चक्र दिखाया है कि उसने स्वदर्शन चक्र से अकासुर-बकासुर आदि को मारा फिर राम को बाण दिखाये हैं। दोनों देवताओं को हिंसक बना दिया है। जबकि उनकी महिमा में गाते हैं देवतायें डबल अहिंसक हैं। न तो काम कटारी चलाते हैं, न क्रोध की हिंसा करते हैं। वह हैं ही निर्विकारी देवी देवतायें। इसलिए कृष्ण को मोर-मुकुटधारी दिखाया है।

8- कृष्ण को रूद्र नहीं कहेंगे। विनाश भी कोई कृष्ण नहीं कराते, स्थापना, विनाश और पालना यह तीनों कर्तव्य परमात्मा के हैं, परन्तु वह खुद कुछ नहीं करते, नहीं तो उन पर दोष पड़ जाए। वह है करनकरावनहार।

9- कृष्ण के लिए भगवानुवाच नहीं कह सकते, वह तो है दैवीगुणों वाला मनुष्य, डिटीज्म कहा जाता है। अभी देवी-देवता धर्म नहीं है, उसकी स्थापना हो रही है। अभी तुम ब्राह्मण, देवी देवता धर्म के बन रहे हो।

10- मनुष्य कहते हैं देवताओं का परछाया इस पतित सृष्टि पर नहीं पड़ सकता है, इसमें देवतायें आ न सकें। उनके लिए तो नई दुनिया चाहिए। लक्ष्मी का भी आवाह्न करते हैं तो घर की कितनी सफाई करते हैं। अब इस सृष्टि की जब सफाई होगी अर्थात् पुरानी दुनिया विनाश होगी तब देवी देवतायें इस सृष्टि पर आयेंगे।

 

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