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BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 26 SEPTEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

26-09-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

“मीठे बच्चे – तुम बाप के पास आये हो अपने कैरेक्टर्स सुधारने, तुम्हें अभी दैवी कैरेक्टर्स बनाने हैं”
प्रश्नः- तुम बच्चों को ऑखें बन्द करके बैठने की मना क्यों की जाती है?
उत्तर:- क्योंकि नज़र से निहाल करने वाला बाप तुम्हारे सम्मुख है। अगर ऑखें बन्द होंगी तो निहाल कैसे होंगे। स्कूल में ऑखें बन्द करके नहीं बैठते हैं। ऑखें बन्द होंगी तो सुस्ती आयेगी। तुम बच्चे तो स्कूल में पढ़ाई पढ़ रहे हो, यह सोर्स ऑफ इनकम है। लाखों पद्मों की कमाई हो रही है, कमाई में सुस्ती, उदासी नहीं आ सकती।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों प्रति बाप समझाते हैं। यह तो बच्चे जानते हैं कि रूहानी बाप परमधाम से आकर हमको पढ़ा रहे हैं। क्या पढ़ा रहे हैं? बाप के साथ आत्मा का योग लगाना सिखलाते ह़ैं जिसको याद की यात्रा कहा जाता है। यह भी बताया है – बाप को याद करते-करते मीठे रूहानी बच्चे तुम पवित्र बन अपने पवित्र शान्तिधाम में पहुँच जायेंगे। कितनी सहज समझानी है। अपने को आत्मा समझो और अपने प्रीतम बेहद के बाप को याद करो तो तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप जो हैं, वह भस्म होते जायेंगे। इसको ही योग अग्नि कहा जाता है। यह भारत का प्राचीन राजयोग है, जो बाप ही हर 5 हज़ार वर्ष के बाद आकर सिखलाते हैं। बेहद का बाप ही भारत में, इस साधारण तन में आकर तुम बच्चों को समझाते हैं। इस याद से ही तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर के पाप कट जायेंगे क्योंकि बाप पतित-पावन है और सर्वशक्तिमान् है। तुम्हारी आत्मा की बैटरी अभी तमोप्रधान बन गई है। जो सतो-प्रधान थी अब उनको फिर से सतोप्रधान कैसे बनायें, जो तुम सतोप्रधान दुनिया में जा सको वा शान्तिधाम घर में जा सको। बच्चों को यह बहुत अच्छी रीति याद रखना है। बाप बच्चों को यह डोज़ देते हैं। यह याद की यात्रा उठते-बैठते, चलते-फिरते तुम कर सकते हो। जितना हो सके गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल समान पवित्र रहना है। बाप को भी याद करना है और साथ-साथ दैवीगुण भी धारण करने है क्योंकि दुनिया वालों के तो आसुरी कैरेक्टर्स हैं। तुम बच्चे यहाँ आये हो दैवी कैरेक्टर्स बनाने। इन लक्ष्मी-नारायण के कैरेक्टर्स बड़े मीठे थे। भक्ति मार्ग में उन्हों की ही महिमा गाई हुई है। भक्ति मार्ग कब से शुरू होता है, यह भी किसको पता नहीं है। अभी तुमने समझा है और रावण राज्य कब से शुरू हुआ, यह भी अब समझा है। तुम बच्चों को यह सारी नॉलेज बुद्धि में रखनी है। जबकि जानते हो हम ज्ञान सागर रूहानी बाप के बच्चे हैं, अब रूहानी बाप हमको पढ़ाने आते हैं। यह भी जानते हो यह कोई ऑर्डनरी बाप नहीं है। यह है रूहानी बाप, जो हमको पढ़ाने आया है। उनका निवास स्थान सदैव ब्रह्म-लोक में है। लौकिक बाप तो सबके यहाँ हैं। यह बच्चों को अच्छी रीति निश्चय में रखना है – हम आत्माओं को पढ़ाने वाला परमपिता परमात्मा है, जो बेहद का बाप है। भक्ति मार्ग में लौकिक बाप होते हुए भी परमपिता परमात्मा को बुलाते हैं। उनका एक ही नाम यथार्थ शिव है। बाप खुद समझाते हैं – मीठे-मीठे बच्चों, मेरा नाम एक ही शिव है। भल अनेक नाम अनेक मन्दिर बनाये हैं परन्तु वह सब है भक्ति मार्ग की सामग्री। यथार्थ नाम मेरा एक ही शिव है। तुम बच्चों को आत्मा ही कहते हैं, सालिग्राम कहें तो भी हर्जा नहीं। अनेकानेक सालिग्राम हैं। शिव एक ही है। वह है बेहद का बाप, बाकी सब हैं बच्चे। इसके पहले तुम हद के बच्चे, हद के बाप के पास रहते थे। ज्ञान तो था नहीं। बाकी अनेक प्रकार की भक्ति करते रहते थे। आधाकल्प भक्ति की है, द्वापर से लेकर भक्ति शुरू होती है। रावणराज्य भी शुरू हुआ है। यह है बहुत सहज बात। परन्तु इतनी सहज बात भी कोई मुश्किल समझते हैं। रावणराज्य कब से शुरू होता है, यह भी कोई नहीं जानता। तुम मीठे बच्चे जानते हो – बाप ही ज्ञान का सागर है। जो उनके पास है वह आकर बच्चों को देते हैं। शास्त्र तो हैं भक्ति मार्ग के।

अभी तुम समझ गये हो – ज्ञान, भक्ति और फिर है वैराग्य। यह 3 मुख्य हैं। सन्यासी लोग भी जानते हैं – ज्ञान भक्ति और वैराग्य। परन्तु सन्यासियों का है अपना हद का वैराग्य। वह बेहद का वैराग्य सिखला न सकें। दो प्रकार के वैराग्य हैं – एक है हद का, दूसरा है बेहद का। वह है हठयोगी सन्यासियों का वैराग्य। यह है बेहद का। तुम्हारा है राजयोग, वह घरबार छोड़ जंगल में चले जाते हैं तो उन्हों का नाम ही पड़ जाता है सन्यासी। हठयोगी घरबार छोड़ते हैं पवित्र रहने के लिए। यह भी है अच्छा। बाप कहते हैं – भारत तो बहुत पवित्र था। इतना पवित्र खण्ड और कोई होता नहीं। भारत की तो बहुत ऊंची महिमा है जो भारतवासी खुद नहीं जानते हैं। बाप को भूलने कारण सब कुछ भूल जाते हैं अर्थात् नास्तिक निधनके बन पड़ते हैं। सतयुग में कितनी सुख-शान्ति थी। अभी कितनी दु:ख-अशान्ति है! मूलवतन तो है ही शान्तिधाम, जहाँ हम आत्मायें रहती हैं। आत्मायें अपने घर से यहाँ आती हैं बेहद का पार्ट बजाने। अभी यह है पुरूषोत्तम संगमयुग जबकि बेहद का बाप आते हैं नई दुनिया में ले चलने के लिए। बाप आकर उत्तम ते उत्तम बनाते हैं। ऊंच ते ऊंच भगवान कहा जाता है। परन्तु वह कौन है, किसको कहा जाता है, यह कुछ भी समझते नहीं हैं। एक बड़ा लिंग रख दिया है। समझते हैं यह निराकार परमात्मा है। हम आत्माओं का वह बाप है – यह भी नहीं समझते, सिर्फ पूजा करते हैं। हमेशा शिवबाबा कहते हैं, रूद्र बाबा वा बबुलनाथ बाबा नहीं कहेंगे। तुम लिखते भी हो शिवबाबा याद है? वर्सा याद है? यह स्लोगन्स घर-घर में लगाने चाहिए – शिवबाबा को याद करो तो पाप भस्म होंगे क्योंकि पतित-पावन एक ही बाप है। इस पतित दुनिया में तो एक भी पावन हो नहीं सकता। पावन दुनिया में फिर एक भी पतित नहीं हो सकता। शास्त्रों में तो सब जगह पतित लिख दिये हैं। त्रेता में भी कहते रावण था, सीता चुराई गई। कृष्ण के साथ कंस, जरासन्धी, हिरण्यकश्यप आदि दिखाये हैं। कृष्ण पर कलंक लगा दिये हैं। अब सतयुग में यह सब हो नहीं सकते। कितने झूठे कलंक लगाये हैं। बाप पर भी कलंक लगाये हैं तो देवताओं पर भी कलंक लगाये हैं। सबकी ग्लानि करते रहते हैं। तो अब बाप कहते हैं यह याद की यात्रा है आत्मा को पवित्र बनाने की। पावन बन फिर पावन दुनिया में जाना है। बाप 84 का चक्र भी समझाते हैं। अभी तुम्हारा यह अन्तिम जन्म है फिर घर जाना है। घर में शरीर तो नहीं जायेगा। सब आत्मायें जानी हैं इसलिए मीठे-मीठे रूहानी बच्चों, अपने को आत्मा समझकर बैठो, देह नहीं समझो। और सतसंगों में तो तुम देह-अभिमानी हो बैठते हो। यहाँ बाप कहते हैं देही-अभिमानी होकर बैठो। जैसे मेरे में यह संस्कार हैं, मैं ज्ञान का सागर हूँ……. तुम बच्चों को भी ऐसा बनना है। बेहद के बाप और हद के बाप का कान्ट्रास्ट भी बतलाते हैं। बेहद का बाप बैठ तुमको सारा ज्ञान समझाते हैं। आगे नहीं जानते थे। अभी सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है, उनका आदि-मध्य-अन्त और चक्र की आयु कितनी है, सब बतलाते हैं। भक्ति मार्ग में तो कल्प की आयु लाखों वर्ष सुनाकर घोर अन्धियारे में डाल दिया है। नीचे ही उतरते आये हैं। कहते भी हैं ना जितना हम भक्ति करेंगे उतना बाप को नीचे खींचेंगे। बाप आकर हमको पावन बनायेंगे। बाप को खींचते हैं क्योंकि पतित हैं, बड़े दु:खी बन जाते हैं। फिर कहते हैं हम बाप को बुलाते हैं। बाप भी देखते हैं बिल्कुल दु:खी तमोप्रधान बन गये हैं, 5 हज़ार वर्ष पूरे हुए हैं तब फिर आते हैं। यह पढ़ाई कोई इस पुरानी दुनिया के लिए नहीं है। तुम्हारी आत्मा धारण कर साथ ले जायेगी। जैसे मैं ज्ञान का सागर हूँ, तुम भी ज्ञान की नदियां हो। यह नॉलेज कोई इस दुनिया के लिए नहीं है। यह तो छी-छी दुनिया, छी-छी शरीर है, इनको तो छोड़ना है। शरीर तो यहाँ पवित्र हो नहीं सकता। मैं आत्माओं का बाप हूँ। आत्माओं को ही पवित्र बनाने आया हूँ। इन बातों को मनुष्य तो कुछ भी समझ नहीं सकते हैं, बिल्कुल ही पत्थरबुद्धि, पतित हैं इसलिए गाते हैं पतित-पावन….. आत्मा ही पतित बनी है। आत्मा ही सब कुछ करती है। भक्ति भी आत्मा करती है, शरीर भी आत्मा लेती है।

अब बाप कहते हैं मैं तुम आत्माओं को ले जाने आया हूँ। मैं बेहद का बाप तुम आत्माओं के बुलावे पर आया हूँ। तुमने कितना पुकारा है। अभी तक भी बुलाते रहते हैं – हे पतित-पावन, ओ गॉड फादर आकर इस पुरानी दुनिया के दु:खों से, डेविल से लिबरेट करो तो हम सब घर में चले जावें। और तो कोई को पता ही नहीं है – हमारा घर कहाँ है, घर में कैसे, कब जायेंगे। मुक्ति में जाने के लिए कितना माथा मारते हैं, कितने गुरू करते हैं। जन्म-जन्मान्तर माथा मारते चले आये हैं। वे गुरू लोग जीवनमुक्ति के सुख को तो जानते ही नहीं। वे चाहते हैं मुक्ति। कहते भी हैं विश्व में शान्ति कैसे हो? सन्यासी भी मुक्ति को ही जानते हैं। जीवनमुक्ति को तो जानते नहीं। परन्तु मुक्ति-जीवन-मुक्ति दोनों वर्सा बाप ही देते हैं। तुम जब जीवनमुक्ति में रहते हो तो बाकी सब मुक्ति में चले जाते हैं। अभी तुम बच्चे नॉलेज ले रहे हो, यह बनने के लिए। तुमने ही सबसे जास्ती सुख देखा है फिर सबसे जास्ती दु:ख भी तुमने देखा है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले तुम ही फिर धर्म-भ्रष्ट, कर्म-भ्रष्ट हो गये हो। तुम पवित्र प्रवृत्ति मार्ग वाले थे, यह लक्ष्मी-नारायण पवित्र प्रवृत्ति मार्ग के हैं। घरबार छोड़ना यह सन्यासियों का धर्म है। सन्यासी भी पहले अच्छे थे। तुम भी पहले बहुत अच्छे थे, अभी तमोप्रधान बने हो। बाप कहते हैं यह ड्रामा का खेल है। बाप समझाते हैं – यह पढ़ाई है ही नई दुनिया के लिए। पतित शरीर, पतित दुनिया में ड्रामा अनुसार हमको फिर 5 हज़ार वर्ष के बाद आना पड़ता है। न कल्प लाखों वर्ष का है, न मैं सर्वव्यापी हूँ। यह तो तुम मेरी ग्लानि करते आये हो। मैं फिर भी तुम पर कितना उपकार करता हूँ। जितनी शिवबाबा की ग्लानि की है, उतना और कोई की नहीं की है। जो बाप तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं उनके लिए तुम कहते रहते हो सर्वव्यापी है। जब ग्लानि की भी हद हो जाती है, तब फिर मैं आकर उपकार करता हूँ। यह है पुरूषोत्तम संगमयुग, कल्याणकारी युग। जबकि तुमको पवित्र बनाने आता हूँ। कितनी सहज युक्ति पावन बनाने की बतलाते हैं। तुमने भक्तिमार्ग में बहुत धक्के खाये हैं, तलाव में भी स्नान करने जाते हैं, समझते हैं इससे पावन बन जायेंगे। अब कहाँ वह पानी और कहाँ पतित-पावन बाप। वह सब है भक्तिमार्ग, यह है ज्ञान मार्ग। मनुष्य कितने घोर अन्धियारे में हैं। कुम्भकरण की नींद में सोये हुए हैं। यह तो तुम जानते हो – गाया भी जाता है विनाशकाले विपरीत बुद्धि विनशयन्ति। अभी तुम्हारी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार प्रीत बुद्धि है। पूरी नहीं है, क्योंकि माया घड़ी-घड़ी भुला देती है। यह है 5 विकारों की लड़ाई। पाँच विकारों को रावण कहा जाता है। रावण पर गधे का शीश दिखाते हैं।

बाबा ने यह भी समझाया है – स्कूल में कब ऑखें बन्द करके नहीं बैठना होता है। वह तो भक्तिमार्ग में भगवान को याद करने की शिक्षा देते हैं कि ऑखें बन्द करके बैठो। यहाँ तो बाप कहते हैं यह स्कूल है। सुना भी है नज़र से निहाल……. कहते हैं यह जादूगर है। अरे, वह तो गायन भी है। देवतायें भी नज़र से निहाल होते हैं। नज़र से मनुष्य को देवता बनाने वाला जादूगर हुआ ना। बाप बैठ बैटरी चार्ज करे और बच्चे ऑखें बन्द कर बैठें तो क्या कहेंगे! स्कूल में ऑखें बन्द कर नहीं बैठते। नहीं तो सुस्ती आती है। पढ़ाई तो है सोर्स ऑफ इनकम। लाखों पद्मों की कमाई है। कमाई में कभी उबासी नहीं लेंगे। यहाँ आत्माओं को सुधारना है। यह एम आब्जेक्ट खड़ी है। उन्हों की राजधानी देखनी हो तो जाओ देलवाड़ा में। वह है जड़, यह है चेतन्य देलवाड़ा मन्दिर। देवतायें भी हैं, स्वर्ग भी है। सर्व का सद्गति दाता आबू में ही आते हैं, इसलिए बड़े ते बड़ा तीर्थ आबू ठहरा। जो भी धर्म स्थापक अथवा गुरू लोग हैं, सबकी सद्गति बाप यहाँ आकर करते हैं। यह सबसे बड़ा तीर्थ है, परन्तु गुप्त है। इनको कोई जानते नहीं हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) जो संस्कार बाप में हैं, वही संस्कार धारण करने हैं। बाप समान ज्ञान का सागर बनना है। देही-अभि-मानी होकर रहने का अभ्यास करना है।

2) आत्मा रूपी बैटरी को सतोप्रधान बनाने के लिए चलते-फिरते याद की यात्रा में रहना है। दैवी कैरेक्टर्स धारण करने हैं। बहुत-बहुत मीठा बनना है।
वरदान:- ज्ञान धन द्वारा प्रकृति के सब साधन प्राप्त करने वाले पदमा-पदमपति भव
ज्ञान धन स्थूल धन की प्राप्ति स्वत: कराता है। जहाँ ज्ञान धन है वहाँ प्रकृति स्वत: दासी बन जाती है। ज्ञान धन से प्रकृति के सब साधन स्वत: प्राप्त हो जाते हैं इसलिए ज्ञान धन सब धन का राजा है। जहाँ राजा है वहाँ सर्व पदार्थ स्वत: प्राप्त होते हैं। यह ज्ञान धन ही पदमा-पदमपति बनाने वाला है, परमार्थ और व्यवहार को स्वत: सिद्ध करता है। ज्ञान धन में इतनी शक्ति है जो अनेक जन्मों के लिए राजाओं का राजा बना देती है।
स्लोगन:- “कल्प-कल्प का विजयी हूँ” – यह रूहानी नशा इमर्ज हो तो मायाजीत बन जायेंगे।

 

Brahma kumaris murli 3 July 2017 : Daily Murli (Hindi)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 2 July 2017

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03/07/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – किसी देहधारी से दैहिक लव न रख, एक बाप से लव रखो, अशरीरी बनने का पूरा-पूरा अभ्यास करो”
प्रश्नः- रहमदिल बच्चों का कर्तव्य क्या है?
उत्तर:- जब कोई फालतू बात करे तो उसकी फालतू बात न सुन उनके कल्याण अर्थ बड़ों को सुनाना – यह रहमदिल बच्चों का कर्तव्य है। जिनमें कोई पुरानी आदतें हैं उन्हें मिटाने में सहयोगी बनना ही रहमदिल बनना है।
प्रश्नः- कौन सा टाइटिल किसी देहधारी को नहीं दे सकते लेकिन ब्रह्मा बाप को दे सकते हैं?
उत्तर:- श्री का टाइटिल क्योंकि श्री अर्थात् श्रेष्ठ पवित्र को कहा जाता है। किसी देहधारी मनुष्य को यह टाइटिल दे नहीं सकते क्योंकि भ्रष्टाचार से जन्म लेते हैं। ब्रह्मा बाप को श्री कहते क्योंकि इनका यह अलौकिक जन्म है।
गीत:- इस पाप की दुनिया से….

ओम् शान्ति। बच्चे अब समझ गये हैं अर्थात् समझदार बन गये हैं, तो जरूर पहले बेसमझ थे। यह भी नहीं समझ में आता है कि यह पतित दुनिया है और इस भारत में ही देवी देवताओं का राज्य था, उसमें पावन सुखी थे। उसमें दु:ख की बात नहीं थी। परन्तु शास्त्रों में कई बातें सुनने के कारण यह भी समझ में नहीं आता है कि स्वर्ग में सदैव सुख था। स्वर्ग का किसको पता नहीं। समझते हैं वहाँ भी दु:ख था, यह है बेसमझी। अब तुम बच्चे समझदार बने हो। बाप ने आकर समझाया है, उनकी श्रीमत पर चल रहे हो। यह पतित दुनिया है, स्वर्ग पावन दुनिया थी। पावन दुनिया में भी दु:ख हो फिर तो दु:ख की दुनिया ही कहेंगे। फिर गीत भी रांग हो जाता है। कहते भी हैं हे बाबा ऐसी जगह ले चलो जहाँ आराम सुख चैन हो। बच्चे यह भी जानते हैं कि स्वर्ग सोने की चिड़िया थी। देवी-देवतायें थे। कभी भी किसको दु:ख नहीं देते थे। गाते भी हैं फिर भी शास्त्रों में ऐसी बातें लिखी हैं जो समझते हैं यह परम्परा से चला आता है। कृष्ण पर भी झूठे कलंक लगा दिये हैं। कहा जाता है जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। समझते हैं सारी सृष्टि ही पतित है। इस समय उन्हों की दृष्टि ही पतित है तो सारी सृष्टि को ही पतित समझते हैं। समझते हैं परम्परा से पतितपना चला आया है। अभी तुम बच्चों में समझ आती जा रही है, सो भी नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। परमपिता परमात्मा के बच्चों को डायरेक्शन मिलते हैं। आत्माओं को बैठ बाप समझाते हैं। सभी आत्मायें पतित हैं इसलिए पतित आत्मा, पुण्य आत्मा कहा जाता है। बाप आत्माओं से बैठ बात करते हैं। तुम हमारे अविनाशी बच्चे हो, फिर मम्मा बाबा भी कहते हो। इस दुनिया में किसी को भी पिताश्री नहीं कह सकते। श्री माना श्रेष्ठ। एक भी मनुष्य श्रेष्ठ है नहीं। यह तो एक की ही महिमा हो सकती है। यहाँ तो सब भ्रष्टाचार से ही पैदा होते हैं, इसलिए श्री कह नहीं सकते। भल तुम इनको इस समय कहते हो क्योंकि सन्यास किया हुआ है – श्रेष्ठ बनने के लिए। तुम जानते हो कि अभी हम फरिश्ते बनने वाले हैं। भ्रष्ट को श्री कह नहीं सकते। श्री लक्ष्मी, श्री नारायण, श्री राधे, श्री कृष्ण कहते हैं। मन्दिरों में भी उन्हों की महिमा गाते हैं। अपने को श्रेष्ठ कह नहीं सकते। अब तुम बच्चों ने समझा है भारत श्रेष्ठ था, शुद्ध सृष्टि थी। अभी पतित सृष्टि है, पतित को ही भ्रष्टाचारी कहेंगे। वे लोग भ्रष्टाचारियों को श्रेष्ठ बनाने के लिए सभायें करते हैं। परन्तु दुनिया ही भ्रष्टाचारी है तो कोई किसी को श्रेष्टाचारी बना कैसे सकते।

बरोबर यह रावण राज्य है। जिस कारण रावण को वर्ष-वर्ष जलाते हैं। जलता ही नहीं, फिर खड़ा हो जाता है। यह भी मनुष्यों को समझ में नहीं आता, जिसे जला दिया उसे फिर हम नया क्यों बनाते हैं। इससे सिद्ध होता है कि रावणराज्य गया नहीं है। स्वर्ग में जब रामराज्य होता है वहाँ तो एफीजी निकालेंगे नहीं। कहते हैं रावण को जलाया फिर लंका को लूटा। रावण की लंका सोनी बताते हैं। परन्तु ऐसा है नहीं। यह तो सारी दुनिया लंका है। रावणराज्य में तो सब हैं, वह श्रीलंका तो आइलैण्ड है ना। दिखलाया भी है – भारत की पुछड़ी है। परन्तु सिर्फ उसमें रावण राज्य तो नहीं है ना। रावणराज्य तो सारे विश्व पर है, यह भी तुम समझते हो। कॉलेज में कोई बेसमझ जाकर बैठे तो क्या समझ सकेंगे! कुछ भी नहीं। वेस्ट ऑफ टाइम करेंगे। यह ईश्वरीय कॉलेज है, इसमें नया आदमी कुछ समझ नहीं सकेंगे। 7 दिन क्वारनटाइन में बिठाना पड़े, जब तक लायक बनें। फिर भी अच्छा आदमी रिलीजस माइन्डेड हो तो उनसे पूछना है – परमपिता परमात्मा तुम्हारा क्या लगता है? वह तो है आत्माओं का पिता और प्रजापिता भी तो बाप है। यह प्वाइंट्स बड़ी अच्छी हैं परन्तु बच्चे अजुन इतना हर्षित नहीं होते हैं। बाप कहते हैं तुमको नई-नई प्वाइंट्स सुनाता हूँ जिससे तुमको नशा चढ़े। किसको समझाने की युक्ति आये। फार्म भराने की कॉपी में पहले यह प्रश्न लिखाना है – कहेंगे परमपिता, तो पिता हुआ ना। फिर उस समय सर्वव्यापी का ज्ञान उड़ जायेगा। तुम जब प्रश्न पूछेंगे तो कहेंगे वह तो बाप है। हम सब बच्चे हैं। इतना मान जायें तो झट लिखा लेना चाहिए। प्रजापिता के भी बच्चे ठहरे। शिव हो गया दादा और वह बाप। शिवबाबा तो स्वर्ग की स्थापना करने वाला है तो जरूर उनसे ही वर्सा मिलेगा। सहज से सहज बातें निकालनी पड़ती हैं। बहुत सहज है। मित्र सम्बन्धियों के पास भी जाओ उनको भी यह समझाओ। यह तो नशा है ना – हम बाबा द्वारा दादे से वर्सा पाते हैं। बापदादा से वर्सा पाते हैं, माता से वर्सा नहीं मिलेगा। बाप को ही स्वर्ग की स्थापना करनी है ना। वही मालिक है। जैसे उनको दादे से वर्से का हक है, वैसे पोत्रे पोत्रियों को भी हक है। बाप कहते हैं मुझे याद करो। मैं तो कहता नहीं हूँ कि इस देहधारी को याद करो। बाप सम्मुख बात कर रहे हैं। कल्प पहले भी ऐसे ही समझाया था। वर्सा भी तुमको बापदादा द्वारा मिलता है। ऐसे नहीं कि मम्मा से मिलता है। तुमको देह-अभिमान बहुत आ जाता है। देहधारियों से लव हो जाता है। हे आत्मायें तुम नंगी आई थी फिर पार्ट बजाते-बजाते अब 84 जन्म पूरे किये हैं। अभी मैं कहता हूँ तुमको वापिस चलना है। मामेकम् याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। देहधारी को याद करने से विकर्म विनाश नहीं होंगे। तुम अन्जाम करते हो बाबा हम आपको ही याद करेंगे। तुमको इस पुरानी दुनिया में अब रहना ही नहीं है, इसमें कोई चैन नहीं इसलिए कहते हो-ऐसी जगह ले चलो जहाँ सुख चैन मिले। तुम कहते हो हम पहले जायेंगे शान्तिधाम, जहाँ शान्ति ही शान्ति होगी। फिर जायेंगे वहाँ से सुखधाम में, जहाँ शान्ति-सुख दोनों हैं। जब दु:ख है तो अशान्ति है। सुख में तो शान्ति है ही। परन्तु वह शान्ति नहीं। शान्तिधाम है आत्माओं का स्वीट होम। बाप सारे आदि-मध्य-अन्त को जानने वाला है।

अब तुम बच्चों का धन्धा ही है पढ़ना और पढ़ाना और अपने शरीर निर्वाह अर्थ कर्म भी करना है। तुम जानते हो हम इस मृत्युलोक से अमरलोक में चले जायेंगे वाया शान्तिधाम। यह बुद्धि में याद रखना है। जब तक मृत्यु नहीं हुआ है, पढ़ना ही है। यह तो याद कर सकते हो ना। अब हमको जाना है अपने घर। यह दुनिया, यह सब कुछ छोड़ना है, खुशी होनी चाहिए। यह बेहद के नाटक का राज़ भी समझ गये हो। हद का नाटक पूरा होता है तो कपड़े बदली कर घर चले जाते हैं। वैसे अब हमको भी जाना है। 84 जन्मों का चक्र पूरा होता है। याद भी करते हैं हे पतित-पावन आओ। याद शिवबाबा को ही करेंगे। एक तरफ कहते पतित-पावन आओ, दूसरे तरफ कह देते परमात्मा सर्वव्यापी है। कोई अर्थ ही नहीं निकलता। बच्चों को कितनी अच्छी रीति समझाते हैं कि शान्तिधाम को याद करो यह दु:खधाम है। और गुरू गोसाई को यह कहना आयेगा नहीं, सिवाए तुम ब्राह्मण ब्राह्मणियों के। इस दु:खधाम का विनाश भी सामने खड़ा है। यह वही महाभारत की लड़ाई है। यूरोपवासी यादव भी हैं और कौरव पाण्डव भाई-भाई भी हैं। एक ही घर के हैं ना। भाई-भाई में युद्ध हो नहीं सकती। यहाँ युद्ध की बात ही नहीं। यह भी वन्डर है ना। मनुष्य क्या नहीं कर सकता है। जो बातें हुई ही नहीं, वह भी बना-बना कर एक दो की दिल को खराब कर देते हैं। व्यास भगवान का धन्धा भी देखो कैसा है। मनुष्यों का धन्धा है एक दो को लड़ाना। यह तो एक रसम है। सब एक दो के दुश्मन बनते हैं। बच्चे भी बाप का दुश्मन बन पड़ते हैं। अब तुम्हारी बुद्धि में देखो क्या है और शास्त्रों में देखो क्या-क्या लिख दिया है। उनका फिर मान कितना रखते हैं। बड़ी परिक्रमा दिलाते हैं। देवताओं की मूर्तियों को भी रथ पर बिठाए बड़ी परिक्रमा दिलाते हैं। फिर सबको समुद्र में डाल देते हैं। मृत्युलोक की रसम-रिवाज सबकी अपनी-अपनी है। बाप का प्लैन देखो कितना बड़ा है। सबके प्लैन खत्म कर देते और सुखधाम की स्थापना करते हैं। बाकी सबको शान्तिधाम में भेज देते हैं। तुम बच्चे देखो किसके सामने बैठे हो। निश्चय है – परमपिता परमात्मा ज्ञान का सागर है। इन आरगन्स द्वारा हमको नॉलेज दे रहे हैं। और कोई ऐसा सतसंग होगा क्या? अभी बाप सामने बैठ समझाते हैं। जानते हो बाप हम आत्माओं से बात करते हैं, हम कानों से सुनते हैं। बाबा इस दादा के मुख द्वारा बोलते हैं। जो रत्न बाबा के मुख से निकलते हैं, वही तुम बच्चों के मुख से निकलने चाहिए। फालतू बातें सुनते भी नहीं सुननी हैं। कोई तो बैठ खुशी से सुनते हैं। बाबा कहते ऐसी बातें सुनो मत। रहमदिल बन किसमें कोई पुरानी आदत है तो मिटानी चाहिए। हाँ जी कर सुनना नहीं चाहिए। जो बाबा सुखधाम का मालिक बनाते हैं, ऐसे बाबा की ग्लानी तो हम सुनेंगे नहीं। हमको तो शिवबाबा से वर्सा लेना चाहिए। और बातों से हमारा क्या तैलुक। कोई सुने या न सुने हम तो ज्ञान का शुर्मा पहन लेवें। कोई ज्ञान अंजन लगाते, कोई धूल अंजन लगा लेते हैं। उससे तीसरा नेत्र खुलता नहीं। बाबा कितना सहज कर समझाते हैं। जो कैसे भी रोगी, अन्धा कुब्जा है वह भी समझ जाये। अल्फ और बे दो अक्षर हैं। सिर्फ पूछो परमपिता और प्रजापिता ब्रह्मा से आपका क्या सम्बन्ध है? यह प्रश्न सबसे अच्छा है। तो सर्वव्यापी का ज्ञान एकदम बाहर निकल जाए। मित्र सम्बन्धियों से दोस्ती कर उन्हें समझाओ। बहुत मीठा बनो। तुम्हारा काम है परिचय देना। भल दुश्मन हो परन्तु उनसे भी मित्रता रखनी है। बाप कहते हैं तुमने आसुरी मत पर चल मुझे गाली दी है। तुमने ईश्वर पर अपकार किया है फिर भी ईश्वर तुम पर कितना उपकार करते हैं। ईश्वर का अपकार होना भी ड्रामा में नूँध है, तब तो कहते हैं यदा यदाहि धर्मस्य… आया भी भारत में है। समझा भी रहे हैं बच्चों को। हर एक बात अच्छी रीति समझने की है। किसकी तकदीर में नहीं है फिर भी वही धन्धा करते हैं। यहाँ से बाहर गये तो यह बातें भी भूल जायेंगी। निंदा करते-करते तो यह हाल हो गया है। अब निंदा करना बन्द करो, सिर्फ पण्डित भी नहीं बनना है।

तुम पक्के राजयोगी हो। ऐसे-ऐसे समझाओ तो तीर भी लगे। खुद में खामी होगी तो दूसरे को बोल नहीं सकेंगे। पाप अन्दर खाता रहेगा। बाबा हर बात बहुत अच्छी रीति समझाते हैं। कल्प पहले भी ऐसे ही समझाया था, भूलो मत। सिमरण करते-करते अन्त मती सो गति हो जायेगी। सवेरे उठ बाप को याद करो जो अन्त में देह भी याद न पड़े। हम आत्मा हैं। अच्छा-

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) जो रत्न बाप के मुख से निकलते हैं वही अपने मुख से निकालने हैं। व्यर्थ बातें नहीं बोलनी हैं, न सुननी है। ज्ञान का ही शुर्मा पहनना है।

2) सभी से सच्ची मित्रता रखनी है। बहुत मीठे रूप में, हर्षितमुख हो बाप का परिचय देना है। अपकारी पर भी बाप समान उपकारी बनना है।

वरदान:- विश्व कल्याणकारी बन अशान्त आत्माओं को शान्ति का दान देने वाले मास्टर दाता भव 
दुनिया में हंगामा हो, झगड़े हो रहे हो, ऐसे अशान्ति के समय पर आप मास्टर शान्ति दाता बन औरों को भी शान्ति दो, घबराओ नहीं क्योंकि जानते हो जो हो रहा है वो भी अच्छा और जो होना है वह और अच्छा। विकारों के वशीभूत मनुष्य तो लड़ते ही रहेंगे। उनका काम ही यह है लेकिन आप विश्व कल्याणकारी आत्मायें सदा मास्टर दाता बन शान्ति का दान देते रहो। यही आपकी सेवा है।
स्लोगन:- अपनी सर्व प्राप्तियों को सामने रखो तो कमजोरियाँ सहज समाप्त हो जायेंगी।

 

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TODAY MURLI 7 June 2017 DAILY MURLI (English)

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Read Daily Murli 6 june 2017 :- Click Here

07/06/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, in order to claim the tilak of self-sovereignty for 21 births, forget the consciousness of bodies including your own body and remember the one Father.
Question: Which aspect of the poor children’s wisdom please the Father, and what advice does He give to such children?
Answer: The poor children who think that they should use all their worthless possessions in a worthwhile way for Baba’s service and accumulate their fortune for the future 21 births; Baba is very pleased on seeing the wisdom of such children. Baba gives them first-class advice: Children, become trustee s. Do not consider things to be your own. Look after your children; look after everything as a trustee. Improve your life with knowledge and become kings of kings.
Song: My fortune having awakened I have come.

Om shanti. You children heard two lines. You children have understood that you have come here to make your fortune for the new world. In order to make a fortune, one has to make effort. You children understand that, here, we receive shrimat, that we receive the great mantra of “Manmanabhav”. There are these words. Who gives you this mantra? It is the Highest on High, the One who is the Ocean, who gives directions. Only once do we receive directions from Him. Whatever has already happened in the drama will repeat after 5000 years. Your boat can go across through just this one great mantra. The Purifier Father only comes once and gives shrimat. Who is the Purifier? The Supreme Father, the Supreme Soul, makes impure ones pure and takes them to the pure world. Only He can be called the Purifier and the Bestower of Salvation. You are sitting in front of Him. You know that He is everything for you. The Highest on High is the One who makes our fortune. You have the faith that we receive this great mantra from the unlimited Father. He is the Father. One is incorporeal and the other is corporeal. The children remember Him and the Father also remembers the children. Cycle after cycle, Baba only speaks to His children. The Father says: There is only one mantra for the salvation of all; and there is only the One who gives it. Only the Satguru gives the true mantra. You know that you have come here in order to make your fortune for your land of happiness. The golden age is called the land of happiness, whereas this is the land of sorrow. Shiv Baba only gives the mantra to those who become Brahmins through the mouth of Brahma, and so He definitely has to come into the corporeal. How else would He give the mantra? He says: Cycle after cycle, I give you this great mantra: Remember Me constantly, renounce all bodily religions and forget your body and all bodily relationships. If you consider yourself to be a body, all the relations of the body, that is, paternal uncles, maternal uncles, and all the gurus and holy men etc. are remembered. This one says: When you die, the whole world is dead to you. The Father also says: I give you souls a mantra: Consider yourself to be a soul and become bodiless. Renounce the consciousness of the body. Here, everyone is body conscious, whereas everyone in the golden age is soul conscious. At this confluence age, you become soul conscious and you also become theists, the ones who know God. A theist is one who knows the Supreme Father, the Supreme Soul, and His creation. There are no theists in the golden age or in the iron age; they only exist at the confluence age. You receive the inheritance from the Father, and you then go and rule in the golden age. The question of theist and atheist only arises here; it doesn’t arise there. Brahmins who were previously atheists have become theists. At present, the whole world is atheist: no one knows the Father or His creation. They simply say that He is omnipresent. You children only have a connection with the unlimited Father. You receive shrimat from Him, that is, He inspires you to make effort. He says: Children, forget the consciousness of bodies, including your own body, and do not remember anyone else. Consider yourself to be a soul and remember Me, your Father. This is called the great mantra through which you make your fortune. You receive the tilak of self-sovereignty for 21 births. That is the reward. The Gita is for changing from an ordinary man into Narayan, that is, for becoming a deity from an ordinary human being. You children know that this world is changing. You are making your fortune for the new world. This is the land of death. Just look what the fortune of people here is! The very name is the land of sorrow. Who said this? The soul. You have now become soul conscious. The soul says: This is the land of sorrow. Our supreme region is the place where Baba lives. The Father now gives knowledge and creates our fortune. He gives one great mantra: Remember Me! You may listen to it from a bodily being, but remember Me, the bodiless One. You would definitely have to listen to Him through a bodily being. Brahma Kumars and Kumaris would also speak through their mouths and tell impure ones to remember the Purifier. You have to burn the burdens of sin that are on your heads with the power of remembrance. You have to become free from disease. You children are personally sitting in front of the Father. You know that Baba has come to make your fortune, and that He shows you a very easy path. They say: Baba, I forget to remember You. You should be ashamed! You remember that worldly father who makes you impure, whereas to this Father from beyond who makes you pure, who tells you to stay in constant remembrance so that your sins are absolved, you say: Baba, I forgot You! The Father says: I have come to make you worthy to be in a temple. You know that Bharat was Shivalaya (Temple of Shiva) where we used to rule, and that, later on, we started worshipping our non-living images in the temples. We forgot that we too had been deities. Your Mama and Baba were also worthy-of-worship deities and then they became worshippers. This knowledge is in your intellects. The main point is shown in the tree: the foundation was the original eternal deity religion. It doesn’t exist any more. Five thousand years ago, it became the golden age and it is now the iron age. After the iron age, the golden age will come again. The One who gives shrimat definitely has to come. The world definitely has to change. You keep beating the drums (announcing to everyone) but the tree cannot grow any quicker. Many obstacles come in the way. They get trapped in various names and forms. The Father says: Do not get trapped. You may stay in your households and also remember the Father and remain pure. God speaks: Lust is the greatest enemy. The God of the Gita previously said this and He is saying it once again. The God of the Gita must definitely have enabled you to gain victory over lust. One is the kingdom of Ravan and the other is the kingdom of Rama. The kingdom of Rama is the day, and the kingdom of Ravan is the night. The Father says: This kingdom of Ravan is now to come to an end. Everything is being prepared for this. The Father will teach you and then take you back home and you will then need a kingdom. You would not rule in this impure world, would you? Shiv Baba does not have any feet that He would put on the ground. The deities cannot set foot on this impure world. You know that you are becoming deities, and that you will come into Bharat, but the world will have changed from the iron age into the golden age. You are now becoming elevated. Many children say: Baba, many storms come. The Father says: You forget the Father. You do not follow His shrimat. You receive the most elevated directions from the Father: Children, do not become corrupt. There is only the One who teaches you and He says: Constantly remember Me alone. Do not even remember this one’s chariot. There are the Chariot Rider and the chariot owner. It is not a question of a horse chariot. Would one sit in that and give knowledge? These days, people travel in aeroplanes. Science is in full force. The pomp of Maya is also in full force. At present, they give so much honour to everyone. A prime minister of a particular country may be given a lot of honour and then, 15 days later, that honour would be taken away. Even kings have this problem: they remain in constant fear. You receive such easy knowledge. You are so poor that you do not even have a shell. You make Baba the T rustee and say: Baba, all of this belongs to You; and Baba says: Achcha, you live as a trustee as well. If you still consider everything to belong to you, that is not being wise. You have to follow shrimat. Those who are trustees will follow shrimat. You are poor, and so you think that you should give all your worthless possessions to Baba. Baba gives you first-class advice. He says: You have to look after your children. At this time, you are now receiving knowledge through which your future is reformed and you become kings of kings. It is the Father’s duty to give advice. Remember the Father. You should have the mercy to save everyone from falling into the pit. You have to move with great tact. There are Supnakha and Putna (female devils). Ajamil and Duryodhan also apply to the present time. This present scene will emerge again after a cycle. That same Father comes personally to give knowledge. He enables you to attain the status of a deity from a human being. You have come to claim the inheritance as you did 5000 years ago. Previously, too, there was the great war. That is connected with this. The Father explains everything accurately and enables you to claim the status of deities from ordinary human beings. You have come to claim the inheritance from the Father. You are not going to receive the inheritance from Brahma or Jagadamba or from any other Brahma Kumari. They also claim their inheritance from the Father. They explain to others too. You become the children of Jagadpita (World Father) and claim your inheritance through him. He (Shiva) tells each one of you individually: Child, remember Me! This arrow is shot directly at you. The Father says: Children, you have to claim the inheritance from Me. Even if a friend or relative dies, the inheritance still has to be claimed from the Father. One needs to have a lot of happiness in this, since you have come to make your fortune. You know that Baba is once again making you into the masters of heaven, and so you have to imbibe manners accordingly. You have to save yourself from the vices. We are becoming pure and viceless. You have understood the drama and the tree. There is no other difficulty. It is very simple. Still, you say: Baba, I forgot You. An evil spirit came. Baba says: Chase away the evil spirits. Look in the mirror of your heart and see whether you have become worthy. We have to become Narayan from ordinary beings. The Father sits here and explains: Sweet children, one hundred times fortunate children, you have come here to become one hundred times fortunate. At present, all are very unfortunate. Only the residents of Bharat were very fortunate; they were so wealthy. It is a matter of Bharat. The Father says: Now consider yourself to be a soul, because you have to come to Me, and then your final thoughts will lead you to your destination. The drama is now about to end and we will go back home at any moment. He shows you the way: become free from all sin and you will become a pure charitable soul. It was the world of pure charitable souls and it is being established once again. The old world has to change and become new. They believe that Bharat was the ancient land and that it was heaven. Heavenly God , the Father , created heaven. When did He come? He only comes at this time. This is known as the time of the coming of the benevolent Father. The community of Ravan is so big whereas the community of Rama is so small. Expansion continues to take place here. Children will continue to come to claim the inheritance from the Father once again. They continue to explain using exhibitions and projectors. You now have to do a lot of service. Baba keeps saying: Beloved children, this is the drama. However, whatever has happened until now would be said to be the accurate drama. The Father says: Even I am predestined in the drama. Children, I too have to come into the impure world. See how I leave the supreme region and come here for you children. Doctors would not run away from the plague; they would have to go there. People sing: Purifier, come! Come and purify us of the five vices, that is, liberate us from them. Take us from the world of sorrow to the world of happiness. God is the Liberator. He is the Liberator of all. He becomes the Guide and takes us back home and we then come down, numberwise. There is the sun dynasty, the moon dynasty and then, when the copper age begins, you become worshippers. It is sung that the deities started to follow the path of sin. They show pictures of the path of sin. You now understand practically that you were the deities. These points are so easy to understand. Your intellects should imbibe them accurately. You children have now come to make your fortune. Here, the Father is personally sitting in front of you, but teachers are numberwise. Here, God has told you the essence of all the Vedas and scriptures through the mouth of Prajapita Brahma. Brahma would hear it first. They have shown Brahma, Vishnu and Shankar in the subtle region, but Vishnu is the master of the golden age and Brahma is the master of the confluence age. Brahma is needed here so that the Brahmins can then become deities. This is the sacrificial fire of the knowledge of Rudra (the incorporeal One). The sacrificial fire was created previously as well. The entire world will be sacrificed into this yagya. Everything will be destroyed. You children will then go to rule in the new world. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Remove the evil spirits that are in you and become worthy of changing from an ordinary man into Narayan. Check in the mirror of your heart and see to what extent you have become worthy.
  2. Consider yourself to be a soul and become bodiless and remember the Father. Practise forgetting the consciousness of bodies.
Blessing: May you be a master bestower and experience yourself to be full by claiming a right to all treasures.
It is said: Give one fold and receive one thousand fold. Perishable treasures decrease when you give them, whereas imperishable treasures increase when you give them. However, only those who are full themselves are able to give to others. So, to be master bestowers means to be those who are full and complete. They have the intoxication that the Father’s treasure is their own treasure. Those who have true remembrance receive all attainments automatically. They do not need to ask for anything or to complain about anything.
Slogan: Make your stage unshakeable and immovable and you will then be able to watch the final scenes.

*** Om Shanti ***

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TODAY MURLI 27 May 2017 DAILY MURLI (English)

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27/05/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you should have the pure intoxication that, by following shrimat, you are using your mind, body and wealth to serve Bharat in particular, and the world in general, to make it into heaven.
Question: Even among you children, who is considered to be the most fortunate?
Answer: Those who imbibe knowledge accurately and inspire others to do the same are very, very fortunate. What fortune you children of Bharat have! God, Himself, is sitting here andteaching you Raja Yoga! You children have become true mouth-born Brahmins. Your tree will continue to grow gradually. You have to do the service of changing each home into heaven.

 

Om shanti. You children understand that you are an army. You are the most powerful, because you are the Shiv Shakti Army of the Almighty Authority. You should have such great intoxication! Baba makes you very intoxicated here, but, as soon as you go home, you forget it. What are you, the Shiv Shakti Army, doing? You are liberating the world from Ravan’s chains in which they are trapped. Everyone is in the cottage of sorrow. Although people travel in aeroplanes and have big houses, all of that is to end. It is called the kingdom that is like a mirage. Externally, there is a lot of splendour, but internally, it is completely empty. There is the example of Draupadi. Baba says: When I came, everything that you see now existed. P artition has now taken place and you also see that. However, it is not a question of being on a battlefield. This is the chariot in which Shiv Baba is at present sitting here giving children knowledge. You are now serving Bharat. All the festivals that are celebrated in Bharat are of this present time. The story of the third eye, the story of the Gita, the Shiv Purana and the Ramayana are all about this present time. There is no question of them in the golden and silver ages. All of those scriptures were made later on and they will be made again. You children have now understood everything. Previously, you were in total darkness. At this time, no one knows the world cycle accurately. You children should now have the pure pride that you are serving Bharat in particular and the world in general with your bodies, minds and wealth. With the help of the Father we are showing the path to liberation and liberation-in-life. We do this service according to shrimat. Shrimat is from Shiv Baba, but they have lost Shiva’s name and have instead shown that the instructions came from Brahma and Krishna; and, in that, too, they have shown Krishna in the copper age. Although you are changing Bharat into heaven, that is, into a diamond, you are so simple; you do not have any arrogance. Here, you have to surrender everything to Baba, that is, you have to sacrifice yourself completely to Shiv Baba. Then Shiv Baba surrenders everything to you for 21 births. Baba doesn’t tell you not to look after your household. That too has to be looked after, but according to shrimat. You must not hide anything from the eternal Surgeon. It is also sung: Without a guru there is extreme darkness. This Brahma Dada also says: Without Shiv Baba, you and I were in extreme darkness. They have mixed up Shiva and Shankar. Who is Brahma? When does he come? What does he do when he comes? All of these points have to be understood. Animals will not understand this. You children now understand, numberwise, according to the effort you make. Scholars and pundits do not know how there is extreme darkness without the Satguru. There are many gurus, but only one Satguru for everyone and He is known as the Father of the Tree (Vrakshpati). You children should be very intoxicated. This world that your eyes see is not going to remain, but the world that you know with your intellect will remain. Therefore, finish all your attachment to this old world. However, you also have to look after your children. Baba has countless children. Some say: Baba, I am Your child of two months and others say: I am Your child of one month. A child of one month can imbibe very quickly and become mature, whereas, even after 20 years, others still have midget intellects. You know that this is a new tree and that it will continue to grow slowly. The leaves definitely emerge first and then the flowers. It is here that you have to become flowers. There, everyone is a flower. Here, some are roses and some are other flowers with less fragrance. However much they imbibe, so the status they receive. There, it is not a question of flowers, it is a question of status. You should have the intoxication that you will see the pure Shiva Temple, heaven, with your eyes. For half a cycle, they have just been saying that such-and-such a person has gone to heaven. The Father is now fulfilling that desire practically. Now that you have become children of the Father, Bharat will become prosperous. It is remembered that there were three hundred and thirty three million deities, but there aren’t that many deities in the golden and silver ages. That is the entire population of the deity religion of Bharat. Just look outside and see how much fr i ction there is! Chinese and Japanese people would say that they are Buddhists, yet there is so much fr i ction between them. Here, in Bharat, they have made Shiv Baba disappear. They do not know Him at all. They have His image, they sing His praise, they show Nandigan (a bull, symbol of Brahma) and yet they don’t know anything. Now you children know. The Father has explained: We came from the supreme abode, adopted these bodies and are playing our part s. You now know the cycle. When the Satguru gives the ointment of knowledge, the darkness of ignorance is dispelled. Previously, you did not know anything but you now know the unlimited Father who is the Creator, Director and principal Actor. You now know which ones should take 84 births and which ones actually take 84 births. Now that your third eye is open you should remain intoxicated. When human beings get drunk, then, even if they are bankrupt, they have so much intoxication that they think that they are the richest. Baba was a Vaishnav, he never even touched alcohol, but he heard that anyone who gets drunk becomes very intoxicated. They say that the Yadavas drank alcohol, created missiles and destroyed each other’s clan. Here, too, people in the military are given alcohol to drink so that they are not so conscious of killing and dying; they become intoxicated. You children should always have the intoxication of becoming Narayan. We are the same Shakti Army of a cycle ago. We have made Bharat like a diamond many times. This is nothing to be confused about. An intellect full of doubt is led to destruction; an intellect with faith is led to victory. Those with doubtful intellects will not claim a high status; they will claim a low status among the subjects. There, in your palaces, there will be music playing constantly. There is no question of any sorrow. Previously, in the palaces of the kings, musical instruments would be played on the threshold. Now that the pomp of the kings has ended, it has become government by the people. You children now know that by becoming pure, staying in yoga and spinning the cycle you will make Bharat into heaven. However, many children forget this. Baba advises: The most elevated task is to serve the poor. These days there are many poor people. People build hospitals so that the patients can receive happiness. Those who build hospitals receive healthy bodies in their next birth; they will not have any illness. If a person is very healthy and very rarely ill, he must definitely have given the donation of health in his previous birth, that is, have opened a hospital. If a person is clever in studying, then he must definitely have given the donation of knowledge. Some sannyasis memorize scriptures in their childhood, and so it would be said that the soul brought the sanskars of his past birth. Here, too, one can take three square feet of land and open a spiritual hospital and write: Come and claim your inheritance of health for 21 births from the Father. It is so easy! They ask: Who gave this inheritance to Lakshmi and Narayan? Those who ask the question definitely have to know the answer. The Father is the Creator of heaven. If you take a seat, I’ll explain how He creates heaven. We are also claiming our inheritance from Him. Shiv Baba is establishing it through Brahma, who, later on, will also sustain it. There also has to be destruction through Shankar. It is definitely hell that is to be destroyed; the new world is still being created. You can even explain with the small badge that establishment is taking place through Brahma. This Raja Yoga is for changing humans into deities. This will very quickly touch the hearts of those who belong to your clan. Their faces will light up very quickly and they will make effort to claim their inheritance. Those who belong to the Brahmin clan will definitely change from the shudra clan. This is fixed in the drama. You do a lot of service for Bharat, but in an incognito way. You did it previously too. You have to understand the drama accurately. It is sung: When you die, the whole world is dead for you. However, the soul still remains; the soul does not die. When a soul separates from his body, there is no world for him. Then, when he enters another body, he has new relationships with his new mother and father. Here, too, you have to become bodiless. This world is now going to be finished practically. The Father says: Continue to remember Me and your burden of sins will end and you will become complete. You children should have very good manners while speaking, walking, eating and drinking. You should speak very little. Royal people speak very little and very softly; they remain silent. You too should have very good manners. Deities had very good manners. Here, humans are like monkeys; they are without manners. They do not have any sense. They have put the unlimited Father, who changes the world into heaven, into pebbles and stones, cats and dogs. Maya has completely locked their intellects with Godrej locks. Baba now comes and opens the locks. You children have now become so wise. You know the biography of Shiv Baba, Brahma, Vishnu, Shankar, Lakshmi, Narayan and Jagadamba, etc. You have now received full understanding from Shiv Baba, the Satguru. Baba is knowledge-full. If each of you truly asks your heart, you can see that you really didn’t know anything. The activity was like that of monkeys. Now we know everything: how Baba comes and creates the new creation and how He makes the Brahmin clan the most elevated. An image worthy of worship doesn’t say anything. You now understand that you were worthy of being worshipped and that you then became worshippers. You are now Brahmins, the real mouth-born creation of Brahma. You know how the golden age is created at the confluence age. No one else knows this. If a barrister teaches someone, what would he make that person? God comes and teaches easy Raja Yoga. It is the great fortune of you children of Bharat. Even among you, those who imbibe well and also make others imbibe are one hundred times fortunate. As you make progress, many homes will become like heaven. The tree continues to grow slowly; it takes effort. The more progress you make, the more strongly the storms of Maya will come. The higher you climb up a mountain, the more you have to face the obstacles of cold and wind. The more time you get for service, the better it is. You can then advertise. Whatever ideas emerge in your heart, tell Baba that you wish to fulfil them. Baba will say: You may do it. Poor human beings are very unhappy. At the present time, everyone is tamopradhan. Nothing that remains is true. Maya is false, the body is false, the whole world is false. You children are now becoming residents of heaven. (Song: The buds of the new age.) There is the praise of Sita in this song. The country in which Sita lived was pure. How could Ravan have been in that country? The wonder of it all is that they say Rama took an army of monkeys. Where did an army of monkeys come from? Here, there is the army of humans. The G overnment doesn’t take an army of monkeys. So, how did the army of monkeys come to exist there? People do not even understand this much. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. In order to become complete, remove your burden of sin by staying on the pilgrimage of remembrance. Imbibe good manners. You have to interact with everyone with good manners. Speak very little.
  2. Do not become someone whose intellect has doubt in any aspect. Use everything you have in a worthwhile way to serve Bharat to make it into heaven. Sacrifice everything completely to Shiv Baba.
Blessing: May you be a world benefactor who puts all four subjects into your practical form.
All the four subjects of this study are connected with one another. Those who are knowledgeable souls will definitely be yogi souls and the actions of those who have made knowledge and yoga their nature will be naturally full of wisdom and elevated. They will be embodiments of virtue in their nature and sanskars. Those who have the treasure of the experience of these three subjects will be master bestowers, that is, they will automatically become servers. Those who claim number one in these four subjects are called world benefactors.
Slogan: Make knowledge and yoga your nature and your actions will naturally be elevated and full of wisdom.

*** Om Shanti ***

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Daily Murli Brahma Kumaris 27 may 2017 – Bk Murli Hindi

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27/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम्हें शुद्ध नशा होना चाहिए कि हम श्रीमत पर अपने ही तन-मन-धन से खास भारत आम सारी दुनिया को स्वर्ग बनाने की सेवा कर रहे हैं”
प्रश्नः- तुम बच्चों में भी सबसे अधिक सौभाग्यशाली किसको कहें?
उत्तर:- जो ज्ञान को अच्छी रीति धारण करते और दूसरों को भी कराते हैं, वे बहुत-बहुत सौभाग्यशाली हैं। अहो सौभाग्य तुम भारतवासी बच्चों का, जिन्हें स्वयं भगवान बैठकर राजयोग सिखला रहे हैं। तुम सच्चे-सच्चे मुख वंशावली ब्राह्मण बने हो। तुम्हारा यह झाड़ धीरे-धीरे बढ़ता जायेगा। घर-घर को स्वर्ग बनाने की सेवा तुम्हें करनी है।

 

ओम् शान्ति। तुम बच्चे समझते हो कि हम सेना हैं। तुम हो सबसे पावरफुल क्योंकि सर्वशक्तिमान् के तुम शिव शक्ति सेना हो। इतना नशा चढ़ना चाहिए। बाबा यहाँ नशा चढ़ाते हैं, घर में जाने से भूल जाते हैं। तुम शिव शक्ति सेना क्या कर रहे हो? सारी दुनिया जो रावण की जंजीरों में बंधी हुई है, उनको छुड़ाते हो। यह शोकवाटिका में हैं। भल एरोप्लेन में घूमते हैं। बड़े-बड़े मकान हैं, परन्तु यह तो सब खत्म होने वाले हैं। इनको रुण्य के पानी (मृगतृष्णा) मिसल राज्य कहा जाता है। बाहर से देखने में भभका बहुत है, अन्दर पोलमपोल लगा हुआ है। द्रोपदी का मिसाल भी है। बाबा कहते हैं कि मैं जब आया था तो यही सब था जो अभी तुम देख रहे हो। पार्टीशन भी अब हुआ जो तुम देख रहे हो। बाकी लड़ाई के मैदान आदि की तो बात है नहीं। यह रथ है जिसमें शिवबाबा विराजमान हो बैठकर बच्चों को ज्ञान देते हैं। तुम भारत की सेवा कर रहे हो। जो भी त्योहार हैं, इस भारत में मनाये जाते हैं – वह सब अभी के हैं। तीजरी की कथा, गीता की कथा, शिव पुराण, रामायण आदि सभी इस समय के लिए बैठ बनाये हैं। सतयुग, त्रेता में तो यह बात नहीं है। बाद में शास्त्र बनाने शुरू किये हैं। वह तो फिर भी बनेंगे। तुम बच्चों ने सब समझ लिया है। आगे तो बिल्कुल घोर अंधियारे में थे। इस समय कोई भी सृष्टि चक्र को यथार्थ रीति नहीं जानते हैं। अभी तुम बच्चों को शुद्ध अंहकार होना चाहिए। तुम तन-मन-धन से भारत की सेवा कर रहे हो, खास भारत की आम सारी दुनिया की। बाप की मदद से हम मुक्ति जीवनमुक्ति का रास्ता बतलाते हैं। तुम श्रीमत पर ये सेवा करते हो। श्रीमत है शिवबाबा की। परन्तु शिव का नाम गुम कर दिया है। बाकी ब्रह्मा की मत और श्रीकृष्ण की मत दिखाई है। सो भी कृष्ण को द्वापर में ले गये हैं। तुम भारत को स्वर्ग अर्थात् हीरे मिसल बनाते हो। परन्तु हो कितने साधारण, कोई घमण्ड नहीं। तुमको यहाँ अपना सब कुछ स्वाहा करना है, गोया शिवबाबा पर पूरा-पूरा बलि चढ़ना है। तो शिवबाबा फिर 21 जन्म बलि चढ़ते हैं। बाबा ऐसे नहीं कहते कि गृहस्थ व्यवहार नहीं सम्भालना है। वह भी सम्भालना है, परन्तु श्रीमत पर। अविनाशी सर्जन से कुछ छिपाना नहीं। गाया भी जाता है गुरू बिगर घोर अंधियारा। यह ब्रह्मा दादा भी कहते हैं कि शिवबाबा बिगर हम और तुम बिल्कुल घोर अंधियारे में थे। वह तो शिव शंकर को मिला देते हैं। ब्रह्मा कौन है? कब आते हैं? क्या आकर करते हैं? हर एक बात समझना चाहिए ना। जानवर तो नहीं समझेंगे। अभी तुम बच्चे नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार जान गये हो। विद्वान, पण्डित आदि कोई नहीं जानते हैं कि सतगुरू बिगर घोर अन्धियारा है। गुरू लोग तो बहुत हैं। सभी का सतगुरू एक है, जिसको वृक्षपति कहते हैं। तो तुम बच्चों को नशा चढ़ना चाहिए। यह दुनिया जो इन ऑखों से देख रहे हो, वह नहीं रहेगी। जो अब बुद्धि से जानते हो वही रहना है। तो इस पुरानी दुनिया से ममत्व मिटा देना चाहिए। बच्चों को भी सम्भालना है। बाबा को कितने ढेर बाल-बच्चे हैं। कोई तो कहते हैं बाबा हम आपका दो मास का बच्चा हूँ। कोई कहते एक मास का बच्चा हूँ। एक मास के बच्चे भी झट धारणा कर एकदम जवान बन जाते हैं और कोई तो 20 वर्ष वाले भी जामड़े (बौने) बन जाते हैं। यह तो तुम जानते हो कि नया झाड़ है, धीरे-धीरे वृद्धि को पायेंगे। पहले जरूर पत्ते निकलेंगे। बाद में फूल निकलेंगे। यहाँ ही फूल बनना है। वहाँ सब फूल ही फूल हैं। यहाँ तो कोई गुलाब के, कोई चम्पा के बनते हैं। जैसी-जैसी धारणा ऐसा पद मिल जाता है। वहाँ फूल की बात नहीं। मर्तबे की बात है। तो यह नशा रहना चाहिए कि हम इन ऑखों से पवित्र शिवालय स्वर्ग को देखेंगे। आधाकल्प सिर्फ कहते थे कि फलाना स्वर्ग पधारा। वह कामना प्रैक्टिकल में बाप ही अब पूरी करते हैं।

अभी तुम बाप के बच्चे बन जाते हो तो भारत का खाना आबाद हो जाता है। 33 करोड़ देवता गाये जाते हैं, वह इतने कोई सतयुग त्रेता में नहीं रहते हैं। यह तो सारे भारत के देवी-देवता धर्म की आदमशुमारी है। बाहर की तरफ देखो तो कितने फ्रैक्शन पड़ गये हैं। चीन-जापान है तो बौद्धी, नाम फिर भी बौद्ध का लेंगे लेकिन फ्रैक्शन (मतभेद) कितनी है। यहाँ भारत में तो शिवबाबा को उड़ा दिया है, उनको बिल्कुल जानते ही नहीं। चित्र हैं, गाते भी हैं, नंदीगण भी है परन्तु जानते नहीं। अभी तुम बच्चे जानते हो, बाप ने बताया है कि हम परमधाम से आकर यहाँ यह शरीर ले पार्ट बजा रहे हैं। तुम चक्र को जान गये हो। ज्ञान-अंजन सतगुरू दिया, अज्ञान अंधेर विनाश। आगे तो कुछ भी पता नहीं था। अभी बेहद के बाप क्रियेटर, डायरेक्टर, मुख्य एक्टर को तुम जान गये हो। 84 जन्म किसको लेने चाहिए! कौन लेते होंगे, तो तुम जानते हो। तुम्हारा अब तीसरा नेत्र खुला है तो इतना नशा रहना चाहिए। मनुष्य जब शराब पीते हैं तो भल दीवाला मारा हुआ हो तो भी नशे में समझते हैं कि सबसे साहूकार मैं हूँ। बाबा तो वैष्णव थे, कभी टच नहीं किया। बाकी सुना है कि शराब पिया और नशा चढ़ा। कहते हैं कि यादवों ने भी शराब पी, मूसल निकाल एक दो के कुल का नाश किया। यहाँ भी मिलेट्री को शराब पिलाते हैं तो मरने, मारने का ख्याल नहीं रहता। नशा चढ़ जाता है। तो तुम बच्चों को भी सदैव नारायणी नशा रहना चाहिए। हम वही कल्प पहले वाले शक्ति सेना हैं। अनेक बार हमने भारत को हीरे जैसा बनाया है, इसमें मूँझने की बात नहीं है। संशयबुद्धि विनशन्ती, निश्चयबुद्धि विजयन्ती। संशय बुद्धि ऊंच पद नहीं पायेंगे। प्रजा में कम पद पा लेंगे। वहाँ तो तुम्हारे महलों में सदैव बाजे बजते रहेंगे। दु:ख की बात ही नहीं। आगे राजाओं के महलों के दरवाजे के बाहर चबूतरे पर शहनाईयां बजती थी। अभी तो वह राजाओं का ठाठ खत्म हो गया है। प्रजा का राज्य हो गया है।

अभी तुम बच्चे जानते हो कि हम पवित्र बन योग में रह और चक्र को याद करते-करते भारत को स्वर्ग बना देंगे, परन्तु बहुत बच्चे भूल जाते हैं। बाबा राय देते हैं कि सबसे अच्छा कर्तव्य है गरीबों की सेवा करना। आजकल गरीब तो बहुत हैं। मनुष्य हॉस्पिटल बहुत बनाते हैं तो मरीज़ों को सुख मिले, जो हॉस्पिटल खोलेंगे उनको दूसरे जन्म में कुछ अच्छी काया मिलेगी, रोगी नहीं बनेंगे। कोई-कोई अच्छा तन्दरूस्त होते हैं, मुश्किल कभी बीमार होते हैं। तो जरूर आगे जन्म में तन्दरूस्ती का दान दिया होगा। वह है हॉस्पिटल खोलना। कोई एज्यूकेशन में बहुत होशियार होते हैं तो जरूर विद्या का दान किया होगा। कोई-कोई सन्यासियों को छोटेपन में ही शास्त्र कण्ठ हो जाते हैं तो कहेंगे पास्ट जन्म के आत्मा संस्कार ले आई है। तो यहाँ भी कोई 3 पैर पृथ्वी का लेकर यह रूहानी हॉस्पिटल खोले और लिख दे कि आकर 21 जन्मों के लिए हेल्थ का वर्सा लो बाप से। कितनी सहज बात है। तुम पूछते हो बताओ लक्ष्मी-नारायण को यह वर्सा किसने दिया, तो जरूर पूछने वाला खुद जानता होगा। बाप ही स्वर्ग का रचयिता है। कैसे रचता है, वह बैठो तो हम समझायें। हम भी उनसे वर्सा ले रहे हैं। शिवबाबा, ब्रह्मा बाबा द्वारा स्थापना करा रहे हैं फिर पालना भी वही करेंगे। शंकर द्वारा विनाश भी होना है। विनाश जरूर नर्क का होगा ना। नई दुनिया तो अब बन रही है। छोटे से बैज पर तुम समझा सकते हो कि ब्रह्मा द्वारा स्थापना हो रही है। यही राजयोग है। मनुष्य से देवता बनना है, जो अपने कुल का होगा उसको झट दिल में लग जायेगा। उसका चेहरा ही चमक जायेगा और पुरुषार्थ से अपना वर्सा ले लेंगे। अपने ब्राह्मण कुल के जो हैं – वह शुद्र कुल से बदलने जरूर हैं, यह ड्रामा में नूँध है। तुम भारत की बहुत सेवा करते हो परन्तु गुप्त। आगे भी ऐसे-ऐसे की थी। ड्रामा को अभी अच्छी रीति जानना है। गाया जाता है आप मुये मर गई दुनिया। बाकी आत्मा रह जाती है। आत्मा तो मरती नहीं। आत्मा शरीर से अलग हो जाती है तो उनके लिए दुनिया ही नहीं रही। फिर जब शरीर में जायेगी तब माँ-बाप का सम्बन्ध आदि नया होगा। यहाँ भी तुमको अशरीरी बनना है। अभी तो यह दुनिया प्रैक्टिकल में खत्म होनी है।

बाप कहते हैं मुझे याद करते रहो तो विकर्मो का जो बोझा है वह उतर जायेगा और तुम सम्पूर्ण बन जायेंगे। बच्चों के मैनर्स बहुत अच्छे होने चाहिए। बोलना, चलना, खाना, पीना…। बहुत थोड़ा बोलना चाहिए। राजायें लोग बहुत थोड़ा और आहिस्ते बोलते हैं, चुप रहते हैं। तुम्हारे में तो बहुत फज़ीलत (सभ्यता) होनी चाहिए। देवताओं में फजीलत थी। यहाँ तो मनुष्य बन्दर मिसल हैं तो बदफज़ीलत हैं। कुछ भी अक्ल नहीं। बेहद का बाप जो सृष्टि को स्वर्ग बनाते हैं, उनको पत्थर ठिक्कर कुत्ते बिल्ली सबमें ढकेल दिया है। माया ने एकदम बुद्धि को गॉडरेज का ताला लगा दिया है। अब बाबा आकर ताला खोलते हैं। अभी तुम बच्चे कितने बुद्धिवान बन गये हो। शिवबाबा, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, लक्ष्मी-नारायण, जगदम्बा आदि सबकी बायोग्राफी को तुम जान गये हो।। अब तुमको सतगुरू शिवबाबा से पूरी समझ मिली है। बाबा नॉलेजफुल है ना। हर एक अपने दिल से पूछे तो बरोबर हम कुछ नहीं जानते थे। बन्दर जैसी चलन थी। अब हम सब जान गये हैं। बाबा नई रचना कैसे रचते हैं। ऊंचे ते ऊंचा ब्राह्मण कुल बनाते हैं सो तुम जानते हो। मूर्ति जो पूज्य है वह कुछ बोलती नहीं है। अभी तुम समझते हो कि हम ही पूज्य फिर पुजारी बनते हैं।

अभी तुम सच्चे-सच्चे ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण हो। तुम जानते हो कि संगम युग पर सतयुग की रचना कैसे होती है, यह और कोई नहीं जानते। बैरिस्टर पढ़ायेगा तो क्या बनायेगा? भगवान भी आकर सहज राजयोग सिखलाते हैं। अहो सौभाग्य भारतवासी बच्चों का… तुम्हारे में भी सौभाग्यशाली वह जो अच्छी रीति धारणा करके दूसरों को कराते रहते हैं। आगे चल बहुत घर स्वर्ग बनेंगे। झाड़ धीरे-धीरे बढ़ता है। मेहनत है। जितना ऊंच जायेंगे उतना माया के तूफान ज़ोर से आयेंगे। पहाड़ी पर जितना ऊंच जायेंगे उतना तूफान ठण्डी आदि का सामना भी होगा। सर्विस में जितना टाइम मिले उतना अच्छा है, एडवरटाइज़ करो। जो दिल में राय आवे वह बताओ कि ऐसे-ऐसे करना चाहिए। बाबा कहेंगे कि भल करो। बिचारे मनुष्य बहुत दु:खी हैं। इस समय सब तमोप्रधान बन पड़े हैं। कोई भी चीज़ सच्ची नहीं रही है। झूठी माया, झूठी काया… अब तुम बच्चे स्वर्गवासी बनते हो।

(गीत:- नई उमर की कलियां) इस गीत में सीता की महिमा करते हैं। जिस देश में सीता थी, वह देश पवित्र था। उस देश में फिर रावण कहाँ से आया? वन्डर तो यह है कि फिर कहते कि बन्दरों की सेना ली। अब बन्दरों की सेना कहाँ से आई! यहाँ भी मनुष्यों का लश्कर है। गवर्मेन्ट बन्दरों का लश्कर थोड़ेही लेती है। फिर वहाँ बन्दरों की सेना कैसे आई? यह भी समझते नहीं हैं। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) सम्पूर्ण बनने के लिए याद की यात्रा से अपने विकर्मों का बोझ उतारना है, अच्छे मैनर्स धारण करना है। सभ्यता (फज़ीलत) से व्यवहार करना है। बहुत कम बोलना है।

2) किसी भी बात में संशय बुद्धि नहीं बनना है। भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा में अपना सब कुछ सफल करना है। शिवबाबा पर पूरा-पूरा बलि चढ़ना है।

वरदान:- चारों ही सबजेक्ट को अपने स्वरूप में लाने वाले विश्व कल्याणकारी भव
पढ़ाई की जो चार सबजेक्ट हैं, उन सबका एक दो के साथ सम्बन्ध है। जो ज्ञानी तू आत्मा है, वह योगी तू आत्मा भी अवश्य होगा और जिसने ज्ञान-योग को अपनी नेचर बना लिया उसके कर्म नेचुरल युक्तियुक्त वा श्रेष्ठ होंगे। स्वभाव – संस्कार धारणा स्वरूप होंगे। जिनके पास इन तीनों सबजेक्ट की अनुभूतियों का खजाना है वह मास्टर दाता अर्थात् सेवाधारी स्वत: बन जाते हैं। जो इन चारों सबजेक्ट में नम्बरवन लेते हैं उन्हें ही कहा जाता है विश्व कल्याणकारी।
स्लोगन:- ज्ञान-योग को अपनी नेचर बनाओ तो कर्म नेचुरल श्रेष्ठ और युक्तियुक्त होंगे।

 

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Daily Murli Brahma Kumaris 26 may 2017 – Bk Murli Hindi

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26/05/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – बाप आया है तुम्हारी सब शुद्ध कामनायें पूरी करने, रावण अशुद्ध कामना पूरी करता और बाप शुद्ध कामना पूरी करता”
प्रश्नः- जो बाप की श्रीमत का उल्लंघन करते हैं – उनकी अन्तिम गति क्या होगी?
उत्तर:- श्रीमत का उल्लंघन करने वालों को माया के भूत अन्त में राम-राम संग है… करके घर ले जायेंगे। फिर बहुत कड़ी सजा खानी पड़ेगी। श्रीमत पर न चले तो यह मरे। धर्मराज पूरा हिसाब लेता है, इसलिए बाप बच्चों को अच्छी मत देते, बच्चे माया की बुरी मत से सावधान रहो। ऐसा न हो बाप का बनकर फिर कोई विकर्म हो जाए और 100 गुणा दण्ड भोगना पड़े। श्रीमत पर न चलना, पढ़ाई छोड़ना ही अपने ऊपर बददुआ, अकृपा करना है।
गीत:- ओम् नमो शिवाए…

 

ओम् शान्ति। यह परमपिता परमात्मा की महिमा भक्त लोग गाते हैं। कहते भी हैं हे भगवान हे शिवबाबा, यह किसने कहा? आत्मा ने अपने बाबा को याद किया क्योंकि आत्मा जानती है हमारा लौकिक बाप भी है और यह है पारलौकिक बाप, शिवबाबा। वह आते भी हैं भारत में और एक ही बार अवतार लेते हैं। गाते भी हैं हे पतित-पावन आओ, भ्रष्टाचारी पतितों को श्रेष्ठाचारी पावन बनाने के लिए। परन्तु सब अपने को पतित भ्रष्टाचारी समझते नहीं हैं। सब एक किसम के भी नहीं होते हैं। हर एक का पद अपना-अपना होता है। हर एक के कर्मों की गति न्यारी होती है, एक न मिले दूसरे से। बाप बैठ समझाते हैं – तुम बाप को न जानने के कारण इतने आरफन पतित बन गये हो। कहते भी हैं पतित-पावन, सर्व के सद्गति दाता आप हो। फिर गीता वा गंगा पतित-पावनी कैसे हुई। तुमको इतना बेसमझ किसने बनाया है? इन पांच विकारों रूपी रावण ने। अभी सभी रावण राज्य अथवा शोक वाटिका में हैं। हेड जो हैं उन्हों को तो बहुत फिकरात रहती है। सब दु:खी हैं, इसलिए पुकारते हैं हे बाबा आप आओ, हमको स्वर्ग में ले चलो। सदैव निरोगी, बड़ी आयु वाले, शान्ति सम्पन्न, धनवान बनाओ। बाप तो सुख शान्ति का सागर है ना। मनुष्य की यह महिमा नहीं हो सकती। भल मनुष्य अपने को शिवोहम् भी कहलाते हैं, परन्तु हैं पतित। बाप समझाते हैं – तुम बाप को सर्वव्यापी कहते हो, इससे तो कोई भी बात ठहरती नहीं। भक्ति भी चल नहीं सकती क्योंकि भगत भगवान को याद करते हैं। भगवान एक है, भक्तियां अनेक हैं। जब सब मुझ भगवान को पत्थर ठिक्कर में ठोक खुद भी पत्थरबुद्धि बन जाते हैं, तब मुझे आना पड़ता है। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा पावन दुनिया की स्थापना कराते हैं। यह प्रजापिता ब्रह्मा के एडाप्टेड बच्चे हैं, कितने ढेर बच्चे हैं। अभी भी वृद्धि को पायेंगे। जो ब्राह्मण बनेंगे वही फिर देवता बनेंगे। पहले तुम शूद्र थे। फिर ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण बने फिर देवता क्षत्रिय बनेंगे। यह चक्र फिरता है। यह बाप ही समझाते हैं। यह मनुष्य सृष्टि है, सूक्ष्मवतन में हैं फरिश्ते। वहाँ कोई झाड़ नहीं है। यह मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ यहाँ है। तो बाप आकर इस ज्ञान अमृत का कलष माताओं के सिर पर रखते हैं। वास्तव में कोई अमृत नहीं है। यह है नॉलेज। बाप आकर सहज राजयोग की शिक्षा देते हैं। बाप कहते हैं मैं तो निराकार हूँ, नम्बरवन मनुष्य के तन में प्रवेश करता हूँ। खुद कहते हैं जब मैं ब्रह्मा तन में प्रवेश करूँ तब तो ब्राह्मण सप्रदाय हो। ब्रह्मा यहाँ ही चाहिए। वह सूक्ष्मवतन वासी तो अव्यक्त ब्रह्मा है। मैं इस व्यक्त में प्रवेश करता हूँ, इनको फरिश्ता बनाने के लिए। तुम भी अन्त में फरिश्ते बन जाते हो। तुम ब्राह्मणों को यहाँ ही पवित्र बनना है। फिर पवित्र दुनिया में जाकर जन्म लेंगे। तुम दोनों हिंसा नहीं करते हो। काम कटारी चलाना सबसे तीखी हिंसा है, जिससे मनुष्य आदि मध्य अन्त दु:ख पाते हैं। द्वापर से लेकर काम कटारी चलाते आये हैं, तब ही गिरना शुरू होता है। मनुष्य के पास है भक्ति की नॉलेज। वेद शास्त्र पढ़ना, भक्ति करना। गाते भी हैं ज्ञान, भक्ति, वैराग्य। भक्ति के बाद ही बाबा सारी दुनिया से वैराग्य दिलाते हैं क्योंकि इस पतित दुनिया का विनाश होना है इसलिए देह सहित देह के सभी सम्बन्धियों आदि को भूल जाओ। मुझ एक के साथ बुद्धियोग लगाओ। ऐसी प्रैक्टिस हो जो अन्त समय कोई भी याद न पड़े। इस पुरानी दुनिया का त्याग कराया जाता है। बेहद का सन्यास बेहद का बाप ही कराते हैं। पुनर्जन्म तो सबको लेना है, नहीं तो इतनी वृद्धि कैसे होती। हद के सन्यासियों द्वारा पवित्रता का बल भारतवासियों को मिलता है। भारत जैसा पवित्र खण्ड और कोई होता नहीं, बाप की यह बर्थ प्लेस है। परन्तु मनुष्य जानते नहीं, बाप कैसे अवतार लेते हैं, क्या करते हैं। कुछ भी जानते नहीं। ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात भी कहते हैं। दिन अर्थात् स्वर्ग, रात अर्थात् नर्क। जानते नहीं। ब्रह्मा की रात तो तुम बच्चों की भी रात। ब्रह्मा का दिन तो तुम बच्चों का भी दिन हो जाता है। रावण राज्य में सब दुर्गति को पाये हुए हैं। अभी तुम बच्चे बाप द्वारा सद्गति को पा रहे हो। तुम इस समय हो ईश्वरीय औलाद। परमपिता परमात्मा का बच्चा ब्रह्मा उनके तुम एडाप्टेड बच्चे, तो शिवबाबा के पोत्रे ठहरे। यह पुत्र ब्रह्मा भी सुनते तो तुम पोत्रे पोत्रियां भी सुनते हो। अभी फिर यह ज्ञान प्राय: लोप हो जायेगा। यह राजयोग बाप ही आकर सिखलाते हैं। सन्यासियों का पार्ट ही अलग है और तुम आदि सनातन देवी-देवता धर्म वालों का पार्ट ही अलग है। वहाँ देवताओं की आयु भी बड़ी रहती है। अकाले मृत्यु नहीं होती है। वहाँ देवतायें आत्म-अभिमानी होते हैं। परमात्म-अभिमानी नहीं। फिर माया की प्रवेशता होने से देह-अभिमानी बन जाते हैं। इस समय तुम आत्म-अभिमानी भी हो तो परमात्म-अभिमानी भी हो। इस समय तुम जानते हो हम परमात्मा की सन्तान हैं, परमात्मा के आक्यूपेशन को जानते हैं। यह शुद्ध अभिमान हुआ। अपने को शिवोहम् या परमात्मा कहना यह अशुद्ध अभिमान है। तुम अभी अपने को भी और परमात्मा को भी जान गये परमात्मा द्वारा। तुम जानते हो परमपिता परमात्मा कल्प-कल्प आते हैं। भक्ति मार्ग में भी अल्पकाल का सुख वह देते हैं। बाकी वह चित्र तो जड़ हैं। तुम जिस मनोकामना से पूजा आदि करते हो तो मैं तुम्हारी सब शुद्ध कामनायें पूरी करता हूँ। अशुद्ध कामना तो रावण पूरी करता है। बहुत रिद्धि सिद्धि आदि सीखते हैं। वह है रावण मत। मैं हूँ ही सुख दाता। मैं किसको दु:ख नहीं देता हूँ। कहते हैं दु:ख सुख ईश्वर ही देते हैं। यह भी मेरे ऊपर कलंक लगाते हैं। अगर ऐसा है तो बुलाते ही क्यों हो। परमात्मा रहम करो, क्षमा करो। जानते हैं, धर्मराज के द्वारा बहुत दण्ड खिलायेंगे।

बाप समझाते हैं बच्चे भक्ति मार्ग के इन शास्त्रों आदि में कोई सार नहीं है। अभी तुमको भक्ति अच्छी नहीं लगती। ऐसे भी नहीं कहते हो कि हे भगवान। आत्मा दिल अन्दर याद करती है। बस यह है अजपाजाप। आत्माओं से निराकार बाप बात करते हैं। आत्मा सुनती है। अगर कहे सर्वव्यापी है फिर तो सब परमात्मा हो गये। बाप कहते हैं कितने पत्थरबुद्धि बन गये हैं। मनुष्यों को तो बड़ा डर रहता है, कहाँ गुरू बद्दुआ न दे। बाप तो है सुखदाता। बद्दुआ अथवा अकृपा तो बाप बच्चों के ऊपर करते ही नहीं। बच्चे श्रीमत पर नहीं चलते, पढ़ते नहीं तो अकृपा अपने ऊपर करते हैं। बाप कहते हैं बच्चे मुझ एक बाप को याद करो। सतयुग त्रेता में भक्ति होती नहीं। अब रात है तो मनुष्य धक्का खाते रहते हैं, तब कहा जाता है सतगुरू बिगर घोर अन्धियारा। सतगुरू ही आकर सारे चक्र का राज़ समझाते हैं कि तुम देवता थे फिर क्षत्रिय बने, फिर वैश्य शूद्र बनें। ऐसे 84 जन्म पूरे किये। 8 पुनर्जन्म सतयुग में, 12 पुनर्जन्म त्रेता में, फिर 63 जन्म द्वापर कलियुग में। चक्र को फिरना ही है। यह बातें मनुष्य नहीं जानते। यही भारत विश्व का मालिक था और कोई खण्ड नहीं था। जब झूठ खण्ड शुरू होता है तो फिर और-और खण्ड भी होते हैं। अब तो देखो लड़ाई झगड़ा कितना है। यह है ही आरफन्स की दुनिया, बाप को नहीं जानते। रड़ियाँ मारते रहते हैं हे परमात्मा… बाप कहते हैं मैं एक ही बार आता हूँ, पतित दुनिया को पावन बनाने। बापू के लिए समझते थे कि रामराज्य स्थापन करते हैं, उनको बहुत पैसे देते थे। परन्तु वह पैसा कभी अपने काम में नहीं लगाते थे। फिर भी रामराज्य तो हुआ नहीं। यह तो है शिवबाबा, दाता है ना। सिर्फ समझाते हैं विनाश तो होना ही है, इससे तुम पैसे को सफल करो। यह सेन्टर आदि खोलो। बोर्ड लगा दो एक बाप से आकर स्वर्ग का वर्सा ले लो सेकेण्ड में। बाप कहते हैं मेरी याद से ही तुम पावन बनेंगे। तुम्हारी बुद्धि में यह चक्र फिरना चाहिए। ब्राह्मण ही यज्ञ के रक्षक बनते हैं। यह है रुद्र ज्ञान यज्ञ, कृष्ण का यज्ञ नहीं। सतयुग में यज्ञ होते नहीं। यह है ज्ञान यज्ञ। बाकी सब हैं भक्ति के यज्ञ। अनेक प्रकार के शास्त्र यज्ञ में रखते हैं। चौं-चौं का मुरब्बा बना देते हैं, उसको ज्ञान यज्ञ नहीं कहेंगे। बाबा कहते हैं मुझ, रूद्र का ज्ञान यज्ञ रचा हुआ है। जो मेरी मत पर चलेंगे उनको बड़ा इनाम मिलेगा, विश्व की बादशाही। तुम बच्चों को मुक्ति, जीवन मुक्ति की सौगात देता हूँ। बाबा कहते हैं मनुष्यों की तो 84 लाख योनियां रखी, और मुझे तो कण-कण में डाल दिया है फिर भी मैं पर-उपकारी सेवाधारी हूँ। तुम रावण की मत पर मुझे गाली देते आये हो। यह भी ड्रामा बना हुआ है। अभी तुम बच्चों को कदम-कदम श्रीमत पर चलना है। बाप अच्छी मत देंगे, माया बुरी मत देगी इसलिए खबरदार रहना। मेरा बनकर फिर कोई विकर्म किया तो सौगुणा दण्ड पड़ जायेगा। योगबल से फिर शरीर भी पवित्र मिलेगा। सन्यासी लोग तो कह देते हैं आत्मा निर्लेप है बाकी शरीर पतित है इसलिए गंगा स्नान करते हैं। अरे आत्मा सच्चा सोना नहीं होगी तो जेवर सच्चे सोने का कैसे बनेगा। इस समय 5 तत्व भी तमोप्रधान हैं।

यह तुम्हारी रूहानी गवर्मेन्ट बड़े ते बड़ी है, परन्तु देखो तुमको सर्विस करने के लिए 3 पैर पृथ्वी के भी नहीं मिलते हैं, फिर तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ। विश्व की बादशाही ऐसी देता हूँ जो वहाँ कोई खिटपिट नहीं कर सकते। आसमान, सागर आदि सबके मालिक बन जाते हो। कोई भी हद नहीं रहती। अभी तो बिल्कुल कंगाल बन पड़े हैं। अभी फिर तुम विश्व के मालिक बन रहे हो तो श्रीमत पर चलना पड़े। श्रीमत पर न चला तो यह मरा। माया के भूत राम-राम संग है करके घर ले जायेंगे। सजा बड़ी कड़ी खायेंगे। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) यज्ञ की प्यार से सेवा कर, कदम-कदम पर श्रीमत पर चलते बाप से मन-इच्छित फल अर्थात् विश्व की बादशाही लेनी है।

2) विनाश तो होना ही है – इसलिए अपना सब कुछ सफल कर लेना है। पैसा है तो सेन्टर खोल अनेको के कल्याण के निमित्त बनना है।

वरदान:- परमात्म प्यार में धरती की आकर्षण से ऊपर उड़ने वाले मायाप्रूफ भव
परमात्म प्यार धरनी की आकर्षण से ऊपर उड़ने का साधन है। जो धरनी अर्थात् देह-अभिमान की आकर्षण से ऊपर रहते हैं उन्हें माया अपनी ओर खींच नहीं सकती। कितना भी कोई आकर्षित रूप हो लेकिन माया की आकर्षण आप उड़ती कला वालों के पास पहुंच नहीं सकती। जैसे राकेट धरनी की आकर्षण से परे हो जाता है। ऐसे आप भी परे हो जाओ, इसकी विधि है न्यारा बनना वा एक बाप के प्यार में समाये रहना – इससे मायाप्रूफ बन जायेंगे।
स्लोगन:- स्व स्थिति को ऐसा शक्तिशाली बनाओ जो परिस्थितियां उसे नीचे ऊपर न कर सकें।

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