9 october ki murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 9 OCTOBER 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 9 October 2020

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09-10-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – सवेरे-सवेरे उठ बाबा से मीठी-मीठी बातें करो, विचार सागर मंथन करने के लिए सवेरे का टाइम बहुत अच्छा है”
प्रश्नः- भक्त भी भगवान को सर्वशक्तिमान् कहते हैं और तुम बच्चे भी, लेकिन दोनों में अन्तर क्या है?
उत्तर:- वह कहते भगवान तो जो चाहे वह कर सकता है। सब कुछ उसके हाथ में है। लेकिन तुम जानते हो बाबा ने कहा है मैं भी ड्रामा के बंधन में बांधा हुआ हूँ। ड्रामा सर्वशक्तिमान् है। बाप को सर्वशक्तिमान् इसलिए कहा जाता क्योंकि उनके पास सर्व को सद्गति देने की शक्ति है। ऐसा राज्य स्थापन करता जिसे कभी कोई छीन नहीं सकता।

ओम् शान्ति। किसने कहा? बाबा ने। ओम् शान्ति – यह किसने कहा? दादा ने। अब तुम बच्चों ने यह पहचाना है। ऊंच ते ऊंच की महिमा तो बहुत भारी है। कहते हैं सर्वशक्तिमान् है तो क्या नहीं कर सकते। अब यह भक्ति मार्ग वाले तो सर्वशक्तिमान् का अर्थ बहुत भारी निकालते होंगे। बाप कहते हैं ड्रामा अनुसार सब कुछ होता है, मैं कुछ भी करता नहीं हूँ। मैं भी ड्रामा के बंधन में बांधा हुआ हूँ। सिर्फ तुम बाप को याद करने से सर्वशक्तिमान् बन जाते हो। पवित्र बनने से तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जाते हो। बाप सर्वशक्तिमान् है, उनको सिखलाना होता है। बच्चे, मुझे याद करो तो विकर्म विनाश हो जायेंगे फिर सर्वशक्तिमान् बन विश्व पर राज्य करेंगे। शक्ति नहीं होगी तो राज्य कैसे करेंगे। शक्ति मिलती है योग से इसलिए भारत का प्राचीन योग बहुत गाया जाता है। तुम बच्चे नम्बरवार याद कर और खुशी में आते हो। तुम जानते हो हम आत्मायें बाप को याद करने से विश्व पर राज्य प्राप्त कर सकते हैं। कोई की ताकत नहीं जो छीन सके। ऊंच ते ऊंच बाप की महिमा सब करते हैं परन्तु समझते कुछ नहीं। एक भी मनुष्य नहीं जिसको यह पता हो कि यह नाटक है। अगर समझते हो कि नाटक है तो शुरू से अन्त तक वह याद आना चाहिए। नहीं तो नाटक कहना ही रांग हो जाता है। कहते भी हैं यह नाटक है, हम पार्ट बजाने आये हैं। तो उस नाटक के आदि-मध्य-अन्त को भी जानना चाहिए ना। यह भी कहते हैं हम ऊपर से आते हैं तब तो वृद्धि होती रहती है ना। सतयुग में तो थोड़े मनुष्य थे। इतनी सब आत्मायें कहाँ से आई, यह कोई समझते नहीं कि यह अनादि बना-बनाया अविनाशी ड्रामा है। जो आदि से अन्त तक रिपीट होता रहता है। तुम बाइसकोप शुरू से अन्त तक देखो फिर दुबारा रिपीट करके अगर देखेंगे तो चक्र जरूर हूबहू रिपीट होगा। ज़रा भी फ़र्क नहीं होगा।

बाप मीठे-मीठे बच्चों को कैसे बैठ समझाते हैं। कितना मीठा बाप है। बाबा आप कितने मीठे हो। बाबा बस, अभी तो हम चलते हैं अपने सुखधाम में। अभी यह मालूम पड़ा है कि आत्मा पावन बन जायेगी तो दूध भी वहाँ पावन मिलेगा। श्रेष्ठाचारी मातायें बहुत मीठी होती हैं, समय पर बच्चे को आपेही दूध पिलाती हैं। बच्चे को रोने की दरकार नहीं होती। ऐसे-ऐसे यह भी विचार सागर मंथन करना होता है। सुबह को बाबा से बातें करने से बड़ा मजा आता है। बाबा आप कितनी अच्छी युक्ति बताते हो, श्रेष्ठाचारी राज्य स्थापन करने की। फिर हम श्रेष्ठाचारी माताओं की गोद में जायेंगे। अनेक बार हम ही उस नई सृष्टि में गये हैं। अभी हमारे खुशी के दिन आते हैं। यह खुशी की खुराक है इसलिए गायन भी है अतीन्द्रिय सुख पूछना हो तो गोप-गोपियों से पूछो। अब हमको बेहद का बाप मिला है। हमको फिर से स्वर्ग का मालिक श्रेष्ठाचारी बनाते हैं। कल्प-कल्प हम अपना राज्य-भाग्य लेते हैं। हार खाते हैं फिर जीत पाते हैं। अभी बाप को याद करने से ही रावण पर जीत पानी है फिर हम पावन बन जायेंगे। वहाँ लड़ाई दु:ख आदि का नाम नहीं, कोई खर्चा नहीं। भक्ति मार्ग में जन्म-जन्मान्तर कितना खर्च किया, कितने धक्के खाये, कितने गुरू किये हैं। अब फिर आधाकल्प हम कोई गुरू नहीं करेंगे। शान्तिधाम, सुखधाम जायेंगे। बाप कहते हैं तुम सुखधाम के राही हो। अब दु:खधाम से सुखधाम में जाना है। वाह हमारा बाबा, कैसे हमको पढ़ा रहे हैं। हमारा यादगार भी यहाँ है। यह तो बड़ा वण्डर है। इस देलवाड़ा मन्दिर की तो अपरमअपार महिमा है। अभी हम राजयोग सीखते हैं। उसका यादगार तो जरूर बनेगा ना। यह हूबहू हमारा यादगार है। बाबा, मम्मा और बच्चे बैठे हैं। नीचे योग सीख रहे हैं, ऊपर में स्वर्ग की राजाई है। झाड़ में भी कितना क्लीयर है। बाबा ने कैसे साक्षात्कार कराए फिर चित्र बैठ बनवाये हैं। बाबा ने ही साक्षात्कार कराया और फिर करेक्ट भी किया। कितना वण्डर है। सारी नई नॉलेज है। किसको भी इस नॉलेज का पता नहीं है। बाप ही बैठ समझाते हैं, मनुष्य कितना तमोप्रधान बनते जाते हैं। मनुष्य सृष्टि बढ़ती जाती है। भक्ति भी वृद्धि को पाते-पाते तमोप्रधान बनती जाती है। यहाँ अब तुम सतोप्रधान बनने का पुरूषार्थ करते हो। गीता में भी अक्षर है मन-मनाभव। सिर्फ यह नहीं जानते कि भगवान कौन है। अब तुम बच्चों को सवेरे-सवेरे उठकर विचार सागर मंथन करना है कि मनुष्यों को भगवान का परिचय कैसे दें। भक्ति में भी मनुष्य सवेरे-सवेरे उठकर कोठी में बैठ भक्ति करते हैं। वह भी विचार सागर मंथन हुआ ना। अभी तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र मिलता है। बाप तीसरा नेत्र देने की कथा सुनाते हैं। इसको ही फिर तीजरी की कथा कह दिया है। तीजरी की कथा, अमरकथा, सत्य नारायण की कथा भी मशहूर है। सुनाने वाला एक ही बाप है जो फिर भक्ति मार्ग में चलती है। ज्ञान से तुम बच्चे सालवेन्ट बनते हो, इसलिए देवताओं को पद्मपति कहते हैं। देवतायें बहुत धनवान, पद्मपति बनते हैं। कलियुग को भी देखो और सतयुग को भी देखो – रात-दिन का फ़र्क है। सारी दुनिया की सफाई होने में टाइम लगता है ना। यह बेहद की दुनिया है। भारत है ही अविनाशी खण्ड। यह कभी प्राय: लोप होता नहीं। एक ही खण्ड रहता है – आधाकल्प। फिर और खण्ड इमर्ज होंगे नम्बरवार। तुम बच्चों को कितना ज्ञान मिलता है। बोलो – वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी कैसे चक्र लगाती है – आकर समझो। प्राचीन ऋषि मुनियों का कितना मान है, परन्तु वह भी सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को नहीं जानते। वह हठयोगी हैं। हाँ बाकी उनमें पवित्रता की ताकत है जिससे भारत को थमाते हैं। नहीं तो भारत पता नहीं क्या हो जाता। मकान को पोची आदि लगाई जाती है ना – तो शोभा होती है। भारत महान् पवित्र था, अब वही पतित बना है। वहाँ तुम्हारा सुख भी बहुत समय चलता है। तुम्हारे पास बहुत धन रहता है। तुम भारत में ही रहते थे। तुम्हारा राज्य था, कल की बात है। फिर बाद में अन्य धर्म आये हैं। उन्होंने आकर कुछ सुधार कर अपना नाम बाला किया है। अब वह भी सब तमोप्रधान बन गये हैं। अब तुम बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। यह सब बातें नये को नहीं सुनानी हैं। पहले-पहले तो बाप की पहचान देनी है। बाप का नाम, रूप, देश, काल जानते हो? ऊंच ते ऊंच बाप का पार्ट तो मशहूर होता है ना। अभी तुम जानते हो – वह बाप ही हमको डायरेक्शन दे रहे हैं। तुम फिर से अपनी राजधानी स्थापन कर रहे हो। तुम बच्चे मेरे मददगार हो। तुम पवित्र बनते हो। तुम्हारे लिए पवित्र दुनिया जरूर स्थापन होनी है। तुम यह लिख सकते हो कि पुरानी दुनिया बदल रही है। फिर यह सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी राज्य होगा। फिर रावण राज्य होगा। चित्रों पर समझाना बहुत मीठा लगता है, इनमें तिथि-तारीख सब लिखा हुआ है। भारत का प्राचीन राजयोग माना याद। याद से विकर्म विनाश होते हैं और पढ़ाई से स्टेट्स मिलती है। दैवीगुण धारण करने हैं। हाँ, इतना जरूर है माया के तूफान आयेंगे। सवेरे उठकर बाबा से बातें करना बड़ा अच्छा है। भक्ति और ज्ञान दोनों के लिए यह टाइम अच्छा है। मीठी-मीठी बातें करनी चाहिए। अभी हम श्रेष्ठाचारी दुनिया में जायेंगे। बूढ़ों के दिल में तो यह रहता है ना कि हम शरीर छोड़ गर्भ में जायेंगे। बाबा कितना नशा चढ़ाते हैं। ऐसी-ऐसी बातें बैठ करो तो भी तुम्हारा जमा हो जाए। शिवबाबा हमको नर्कवासी से स्वर्गवासी बना रहे हैं। पहले-पहले हम आते हैं, सारा आलराउन्ड पार्ट हमने बजाया है। अब बाबा कहते हैं इस छी-छी चोले को छोड़ दो। देह सहित सारी दुनिया को भूल जाओ। यह है बेहद का संन्यास। वहाँ भी तुम बूढ़े होंगे तो साक्षात्कार होगा – हम बच्चा बनते हैं। खुशी होती है। बचपन तो सबसे अच्छा है। ऐसे-ऐसे सवेरे बैठ विचार सागर मंथन करना है। प्वाइंट्स निकलेंगी तो तुमको खुशी होगी। खुशी में घण्टा डेढ़ घण्टा बीत जाता है। जितनी प्रैक्टिस होती जायेगी उतनी खुशी बढ़ती जायेगी। बहुत मज़ा आयेगा और फिर घूमते-फिरते याद करना है। फुर्सत बहुत है, हाँ विघ्न पड़ेंगे, उसमें कोई शक्य नहीं। धन्धे में मनुष्य को नींद नहीं आती। सुस्त लोग नींद करते हैं। तुम जितना हो सके शिवबाबा को ही याद करते रहो। तुमको बुद्धि में रहता है शिवबाबा के लिए हम भोजन बनाते हैं। शिवबाबा के लिए हम यह करते हैं। भोजन भी शुद्धि से बनाना है। ऐसी चीज़ न हो जिससे खिटपिट हो जाए। बाबा खुद भी याद करते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सवेरे-सवेरे उठकर बाबा से मीठी-मीठी बातें करनी हैं। रोज़ खुशी की खुराक खाते हुए अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करना है।

2) सतयुगी राजधानी स्थापन करने में बाप का पूरा मददगार बनने के लिए पावन बनना है, याद से विकर्म विनाश करने हैं, भोजन भी शुद्धि से बनाना है।

वरदान:- स्व स्थिति द्वारा परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करने वाले संगमयुगी विजयी रत्न भव
परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करने का साधन है स्व-स्थिति। यह देह भी पर है, स्व नहीं। स्व स्थिति व स्वधर्म सदा सुख का अनुभव कराता है और प्रकृति-धर्म अर्थात् पर धर्म या देह की स्मृति किसी न किसी प्रकार के दु:ख का अनुभव कराती है। तो जो सदा स्व स्थिति में रहता है वह सदा सुख का अनुभव करता है, उसके पास दु:ख की लहर आ नहीं सकती। वह संगमयुगी विजयी रत्न बन जाते हैं।
स्लोगन:- परिवर्तन शक्ति द्वारा व्यर्थ संकल्पों के बहाव का फोर्स समाप्त करो।

 

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य

“इस अविनाशी ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करने के लिये कोई भी भाषा सीखनी नहीं पड़ती”

अपना जो ईश्वरीय ज्ञान है, वो बड़ा ही सहज और मीठा है, इससे जन्म-जन्मान्तर के लिये कमाई जमा होती है। यह ज्ञान इतना सहज है जो कोई भी महान आत्मा, अहिल्या जैसी पत्थरबुद्धि, कोई भी धर्म वाला बालक से लेकर वृद्ध तक कोई भी प्राप्त कर सकता है। देखो, इतना सहज होते भी दुनिया वाले इस ज्ञान को बहुत भारी समझते हैं। कोई समझते हैं जब हम बहुत वेद, शास्त्र, उपनिषद पढ़कर बड़े-बड़े विद्वान बनें, उसके लिये फिर भाषा सीखनी पड़े। बहुत हठयोग करें तब ही प्राप्ति हो सकेगी लेकिन यह तो हम अपने अनुभव से जान चुके हैं कि यह ज्ञान बड़ा ही सहज और सरल है क्योंकि स्वयं परमात्मा पढ़ा रहा है, इसमें न कोई हठािढया, न जप तप, न शास्त्रवादी पण्डित बनना, न कोई इसके लिये संस्कृत भाषा सीखने की जरुरत है, यह तो नेचुरल आत्मा को अपने परमपिता परमात्मा के साथ योग लगाना है। भल कोई इस ज्ञान को न भी धारण कर सके तो भी सिर्फ योग से भी बहुत फायदा होगा। इससे एक तो पवित्र बनते हैं, दूसरा फिर कर्मबन्धन भस्मीभूत होते हैं और कर्मातीत बनते हैं, इतनी ताकत है इस सर्वशक्ति-वान परमात्मा की याद में। भल वो अपने साकार ब्रह्मा तन द्वारा हमें योग सिखला रहे हैं परन्तु याद फिर भी डायरेक्ट उस ज्योति स्वरूप शिव परमात्मा को करना है, उस याद से ही कर्मबन्धन की मैल उतरेगी। अच्छा। ओम् शान्ति

TODAY MURLI 9 OCTOBER 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 9 October 2020

09/10/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, wake up early in the morning and have sweet conversations with Baba. The early morning is a very good time to churn the ocean of knowledge.
Question: What is the difference between devotees calling God “The Almighty Authority” and you children calling Him that?
Answer: They say that God can do whatever He wants, that everything is in His hands. However, you know that Baba has said: I too am bound by the drama. The drama is the almighty authority. The Father is called the Almighty Authority because He has the power to grant salvation to everyone. He establishes such a kingdom that no one can snatch it away from you.

Om shanti. Who said that? Baba. Om shanti. Who said that? Dada. You children have now recognised the praise of the Highest on High to be very great. They say: Since He is the Almighty Authority, what can He not do? People on the path of devotion give a much greater meaning to the term “Almighty Authority”. The Father says: Everything happens according to the drama. I don’t do anything. I, too, am bound by the drama. It is just by remembering the Father that you become almighty authorities. By remaining pure, you become satopradhan from tamopradhan. The Father is the Almighty Authority. He has to teach you. He says: Children, remember Me and your sins will be absolved. You will then become almighty authorities and rule the world. If you don’t have power, how would you rule? You receive power by having yoga, for this is why the ancient yoga of Bharat has been remembered. You children have remembrance, numberwise, and you experience happiness accordingly. You souls know that you can attain the kingdom of the world by remembering the Father. No one has the strength to snatch that away from you. Everyone praises the highest-on-high-Father, but no one understands anything. Not a single human being knows that this is a play. If they understood that this is a play, they would also remember everything from the beginning to the end. Otherwise, it would be wrong to call it a play. They say that it is a play and that we have come to play our parts. Therefore, they should know the beginning, middle and end of this play. They even say that they come from up above and that this is why the population grows. In the golden age there were very few human beings. Where did all these souls come from? No one understands that this drama is eternally predestined and everlasting and that it continues to repeat from the beginning to the end. When you watch a film from the beginning to the end and then watch it again, it definitely repeats identically the second time; there won’t be the slightest difference. Look how the Father explains to you sweetest children! The Father is so sweet! Baba, You are so sweet! Baba, we are now going to go to our land of happiness. We now know that when souls become pure they will even receive pure milk there. Those elevated mothers are very sweet. They feed their babies themselves at the right time. Their babies don’t have to cry for it. You have to churn the ocean of knowledge in this way. You will enjoy yourself a great deal by talking to Baba early in the morning. Baba, You are showing us such good ways to establish the elevated kingdom. Then we will go into the laps of elevated mothers. We are the ones who have been to that new world innumerable times. Our days of happiness are about to come. This is the nourishment of happiness of which it is said: If you want to know about supersensuous joy, ask the gopes and gopis. We have now found the unlimited Father. He is making us into the elevated masters of heaven. We receive our fortune of the kingdom every cycle. We experience defeat and then gain victory. We now have to conquer Ravan by remembering the Father. Then we will become pure. There is no mention of any war or suffering there. There are no expenses there. We spent so much on the path of devotion for birth after birth. We stumbled so much and adopted so many gurus! We now won’t adopt any gurus for half a cycle. We will go to the abode of peace and then to the land of happiness. The Father says: You are travellers to the land of happiness. You now have to go from the land of sorrow to the land of happiness. Our wonderful Baba! Look how He is teaching us! It is a great wonder that our memorial exists here. There is limitless praise of the Dilwala Temple. We are now studying Raj Yoga. Therefore, a memorial of this would definitely be created. It is our identical memorial. Baba, Mama and the children are sitting there. On the ground they are shown practising yoga and the kingdom of heaven is shown above them. This knowledge is so clear in the picture of the tree. Look how Baba granted visions and had the pictures made. Baba granted those visions and also gave corrections. It was such a wonder! All of this knowledge is new. No one knows of this knowledge. Only the Father sits and explains how human beings continue to become tamopradhan. The human world population continues to grow. Devotion also continues to become tamopradhan as it progresses. You are now making effort here to become satopradhan. The term “Manmanabhav” is also mentioned in the Gita. It’s just that they don’t know who God is. You children have to wake up early in the morning and churn the ocean of knowledge about how to give people God’s introduction. In devotion, too, people wake up early in the morning and perform their devotions while sitting in their little alcoves. This is also churning the ocean of knowledge, is it not? Each of you is now receiving a third eye of knowledge. The Father is telling you the story of the third eye. The story of the third eye, the story of immortality and the story of becoming true Narayan are all well known. The one Father tells them. They then continue to be told on the path of devotion. You children become solvent with knowledge, and this is why deities are said to be multimillionaires. The deities become very wealthy, multimillionaires. Look at the iron age and then look at the golden age! There is the difference of day and night! It takes time for the whole world to be cleansed. This world is unlimited. Bharat is the imperishable land that never disappears. For half the cycle, only this one land is here. Then, all the other lands emerge, numberwise. You children are receiving so much knowledge! Tell them: Come and understand how the world history and geography repeat. Ancient rishis and munis are given so much respect, but they too don’t know the beginning, middle or end of the world. They are hatha yogis. However, they do have the power of purity through which they support Bharat. Otherwise, you never know what Bharat would have become! When a building is whitewashed, it looks beautiful. Bharat was very pure, whereas that same Bharat has now become impure. Your happiness there lasts for a long period of time. You have a lot of wealth there. You lived in Bharat alone. It used to be your kingdom. This is a matter of yesterday. Then, all the other religions came. They came and reformed the world a little and had their names glorified. Now, they too have all become tamopradhan. You children should now experience so much happiness! You mustn’t tell all these things to new ones. First of all, enable them to recognise the Father. Do you know the name, form, place and time of the Father? The part of the highest-on-high Father is very well known. You now know that that Father is giving us directions. You are once again establishing your own kingdom. You children are My helpers. You are becoming pure. Therefore, a pure world definitely has to be established for you. You can write that the old world is now changing and that there will then be the kingdom of the sun and moon dynasties. After that, the kingdom of Ravan will continue. It is very sweet to explain using the pictures. All the times and dates are written on them. “Ancient Raj Yoga of Bharat” means remembrance. By having remembrance your sins are absolved and by studying this you receive a status. You also have to imbibe divine virtues. Yes, there will definitely be storms of Maya. It is very good to wake up early in the morning and talk to Baba. This is a very good time for both devotion and knowledge. Have a very sweet conversation. We are now to go to the elevated world. It enters the hearts of the elderly that they are now to leave their bodies and enter a womb. Baba makes them all so intoxicated! Sit and talk in this way and you will accumulate a great deal. Shiv Baba is changing us from the residents of hell into the residents of heaven. We are the ones who come first. We play allround parts. The Father says: Renounce those dirty costumes. Forget the whole world, including your own bodies. This is unlimited renunciation. There, when you become old, you will have a vision of how you are to become a baby again. There is great happiness. Childhood is best of all. Sit and churn the ocean of knowledge in this way early in the morning. When points emerge, you feel great happiness. An hour to an hour and a half passes in happiness. The more practice you have, the more your happiness will increase and the more you will enjoy yourself. You have to remember Baba while walking and moving around. You have a lot of time. There’s no doubt that obstacles will come. People never fall asleep while doing business. It is lazy people who fall asleep. Just continue to remember Shiv Baba as much as possible. Keep Shiv Baba in your intellects when you are preparing food. “I’m doing this for Shiv Baba”. Food must be prepared with great cleanliness. It should not be anything that creates complications. Baba Himself (Brahma Baba) also stays in remembrance. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost, now-found children, love, remembrance and Good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Wake up early in the morning and have a sweet conversation with Baba. By having the nourishment of happiness every day, you experience supersensuous joy.
  2. In order to become a complete helper of the Father in establishing the golden-aged kingdom, become pure. Become absolved of your sins by having remembrance. Prepare food with great cleanliness.
Blessing: May you gains victory over adverse situations with your original stage and become a confluence-aged victorious jewel.
The way to gain victory over adverse situations is to adopt your original stage. Even that body is not yours, it is not you. Your original stage, or your original religion enables you to experience happiness. Any religion of matter, that is, any external religion or awareness of the body makes you experience one type of sorrow or other. Those who constantly maintain their original stage always experience happiness; no wave of sorrow can come to them. They become confluence-aged victorious jewels.
Slogan: With the power of transformation, finish the forceful flow of waste thoughts.

*** Om Shanti ***

 

Invaluable versions of Mateshwari

 

 

In order to receive this imperishable Godly knowledge, you don’t need to learn any language.

 

 

Our Godly knowledge is very easy and very sweet, and with it you can accumulate an income for birth after birth. This knowledge is so easy that anyone, from a great soul to someone like Ahilya (a person turned to stone – character remembered in the Ramayana), from a child of any religion to an elderly person, can receive it. Look, even though it is so easy, people of the world consider this knowledge to be very difficult. Some believe that they can become great scholars when they study many Vedas, scriptures, Upanishads etc. but for these, they need to learn a language. It is only when they have a lot of hatha yoga that they would attain something, but we know from our experience that this knowledge is very simple and easy because God Himself is teaching us. There is no physical force, chanting or doing penance, no becoming pundits of great scriptures, or any need to learn the Sanskrit language. Here, souls have to have yoga with the Supreme Father, the Supreme Soul in a natural way. Even if someone is not able to imbibe this knowledge, there can still be a lot of benefit just by having yoga. With this, firstly, you become pure and secondly, your karmic bondages are burnt away and you become karmateet. There is so much power gained by having remembrance of the Almighty Authority, God. Although He is teaching us yoga through the physical body of Brahma, we still have to remember that form of light, Shiva, the Supreme Soul, Himself, directly. It is only with this remembrance that the dirt on souls will be removed. Achcha.

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 9 OCTOBER 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 9 October 2019

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09-10-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – बाप तुम्हें जो नॉलेज पढ़ाते हैं, इसमें रिद्धि सिद्धि की बात नहीं, पढ़ाई में कोई छू मंत्र से काम नहीं चलता है”
प्रश्नः- देवताओं को अक्लमंद कहेंगे, मनुष्यों को नहीं – क्यों?
उत्तर:- क्योंकि देवतायें हैं सर्वगुण सम्पन्न और मनुष्यों में कोई भी गुण नहीं हैं। देवतायें अक्लमंद हैं तब तो मनुष्य उनकी पूजा करते हैं। उनकी बैटरी चार्ज है इसलिए उन्हें वर्थ पाउण्ड कहा जाता है। जब बैटरी डिस्चार्ज होती है, वर्थ पेनी बन जाते हैं तब कहेंगे बेअक्ल।

ओम् शान्ति। बाप ने बच्चों को समझाया है कि यह पाठशाला है। यह पढ़ाई है। इस पढ़ाई से यह पद प्राप्त होता है, इनको स्कूल वा युनिवर्सिटी समझना चाहिए। यहाँ दूर-दूर से पढ़ने के लिए आते हैं। क्या पढ़ने आते हैं? यह एम ऑबजेक्ट बुद्धि में है। हम पढ़ाई पढ़ने के लिए आते हैं, पढ़ाने वाले को टीचर कहा जाता है। भगवानुवाच है भी गीता। दूसरी कोई बात नहीं है। गीता पढ़ाने वाले का पुस्तक है, परन्तु पुस्तक आदि कोई पढ़ाते नहीं हैं। गीता कोई हाथ में नहीं है। यह तो भगवानुवाच है। मनुष्य को भगवान नहीं कहा जाता। भगवान ऊंच ते ऊंच है एक। मूलवतन, सूक्ष्मवतन, स्थूल वतन – यह है सारी युनिवर्स। खेल कोई सूक्ष्मवतन वा मूल-वतन में नहीं चलता है, नाटक यहाँ ही चलता है। 84 का चक्र भी यहाँ है। इनको ही कहा जाता है 84 के चक्र का नाटक। यह बना-बनाया खेल है। यह बड़ी समझने की बातें हैं क्योंकि ऊंच ते ऊंच भगवान उनकी तुमको मत मिलती है। दूसरी तो कोई वस्तु है नहीं। एक को ही कहा जाता है सर्व शक्तिमान्, वर्ल्ड ऑलमा-इटी अथॉरिटी। अथॉरिटी का भी अर्थ खुद समझाते हैं। यह मनुष्य नहीं समझते क्योंकि वह सब हैं तमोप्र-धान, इसको कहा ही जाता है कलियुग। ऐसे नहीं कि कोई के लिए कलियुग है, कोई के लिए सतयुग है, कोई के लिए त्रेता है। नहीं, जबकि अभी है ही नर्क तो कोई भी मनुष्य ऐसे नहीं कह सकता कि हमारे लिए स्वर्ग है क्योंकि हमारे पास धन दौलत बहुत है। यह हो नहीं सकता। यह तो बना-बनाया खेल है। सतयुग पास्ट हो गया, इस समय तो हो भी नहीं सकता। यह सब समझने की बातें हैं। बाप बैठ सब बातें समझाते हैं। सतयुग में इनका राज्य था। भारतवासी उस समय सतयुगी कहलाते थे। अभी जरूर कलियुगी कहलायेंगे। सतयुगी थे तो उसको स्वर्ग कहा जाता था। ऐसे नहीं कि नर्क को भी स्वर्ग कहेंगे। मनुष्यों की तो अपनी-अपनी मत है। धन का सुख है तो अपने को स्वर्ग में समझते हैं। मेरे पास तो बहुत सम्पत्ति है इसलिए मैं स्वर्ग में हूँ। परन्तु विवेक कहता है कि नहीं। यह तो है ही नर्क। भल किसके पास 10-20 लाख हों परन्तु यह है ही रोगी दुनिया। सतयुग को कहेंगे निरोगी दुनिया। दुनिया यही है। सतयुग में इनको योगी दुनिया कहेंगे, कलियुग को भोगी दुनिया कहा जाता है। वहाँ हैं योगी क्योंकि विकार का भोग-विलास नहीं होता है। तो यह स्कूल है इसमें शक्ति की बात नहीं। टीचर शक्ति दिखलाते हैं क्या? एम ऑबजेक्ट रहता है, हम फलाना बनेंगे। तुम इस पढ़ाई से मनुष्य से देवता बनते हो। ऐसे नहीं कि कोई जादू, छू मंत्र वा रिद्वि-सिद्धि की बात है। यह तो स्कूल है। स्कूल में रिद्धि सिद्धि की बात होती है क्या? पढ़कर कोई डॉक्टर, कोई बैरिस्टर बनता है। यह लक्ष्मी-नारायण भी मनुष्य थे, परन्तु पवित्र थे इसलिए उन्हों को देवी-देवता कहा जाता है। पवित्र जरूर बनना है। यह है ही पतित पुरानी दुनिया।

मनुष्य तो समझते हैं पुरानी दुनिया होने में लाखों वर्ष पड़े हैं। कलियुग के बाद ही सतयुग आयेगा। अभी तुम हो संगम पर। इस संगम का किसको भी पता नहीं है। सतयुग को लाखों वर्ष दे देते हैं। यह बातें बाप आकर समझाते हैं। उनको कहा जाता है सुप्रीम सोल। आत्माओं के बाप को बाबा कहेंगे। दूसरा कोई नाम होता नहीं। बाबा का नाम है शिव। शिव के मन्दिर में भी जाते हैं। परमात्मा शिव को निराकार ही कहा जाता है। उनका मनुष्य शरीर नहीं है। तुम आत्मायें यहाँ पार्ट बजाने आती हो तब तुमको मनुष्य शरीर मिलता है। वह है शिव, तुम हो सालिग्राम। शिव और सालिग्रामों की पूजा भी होती है क्योंकि चैतन्य में होकर गये हैं। कुछ करके गये हैं तब उनका नामाचार गाया जाता है अथवा पूजे जाते हैं। आगे जन्म का तो किसको पता नहीं है। इस जन्म में तो गायन करते हैं, देवी-देवताओं को पूजते हैं। इस जन्म में तो बहुत लीडर्स भी बन गये हैं। जो अच्छे-अच्छे साधू-सन्त आदि होकर गये हैं, उनकी स्टैम्प भी बनाते हैं नामाचार के लिए। यहाँ फिर सबसे बड़ा नाम किसका गाया जाए? सबसे बड़े ते बड़ा कौन है? ऊंच ते ऊंच तो एक भगवान ही है। वह है निरा-कार और उनकी महिमा बिल्कुल अलग है। देवताओं की महिमा अलग है, मनुष्यों की अलग है। मनुष्य को देवता नहीं कह सकते। देवताओं में सर्वगुण थे, लक्ष्मी-नारायण होकर गये हैं ना। वे पवित्र थे, विश्व के मालिक थे, उनकी पूजा भी करते हैं क्योंकि पवित्र पूज्य हैं, अपवित्र को पूज्य नहीं कहेंगे, अपवित्र सदैव पवित्र को पूजते हैं। कन्या पवित्र है तो पूजी जाती है, पतित बनती है तो सबको पांव पड़ना पड़ता है। इस समय सब हैं पतित, सतयुग में सब पावन थे। वह है ही पवित्र दुनिया, कलियुग है पतित दुनिया तब ही पतित-पावन बाप को बुलाते हैं। जब पवित्र हैं तब नहीं बुलाते हैं। बाप खुद कहते हैं मुझे सुख में कोई भी याद नहीं करते हैं। भारत की ही बात है। बाप आते ही भारत में हैं। भारत ही इस समय पतित बना है, भारत ही पावन था। पावन देवताओं को देखना हो तो जाकर मन्दिर में देखो। देवतायें सब हैं पावन, उनमें जो मुख्य-मुख्य हेड हैं, उन्हों को मन्दिरों में दिखाते हैं। इन लक्ष्मी-नारायण के राज्य में सब पावन थे, यथा राजा-रानी तथा प्रजा, इस समय सब पतित हैं। सब पुकारते रहते हैं – हे पतित-पावन आओ। सन्यासी कभी कृष्ण को भगवान वा ब्रह्म नहीं मानेंगे। वह समझते हैं भगवान तो निराकार है, उनका चित्र भी निराकार तरीके से पूजा जाता है। उनका एक्यूरेट नाम शिव है। तुम आत्मा जब यहाँ आकर शरीर धारण करती हो तो तुम्हारा नाम रखा जाता है। आत्मा अविनाशी है, शरीर विनाशी है। आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा जाकर लेती है। 84 जन्म तो चाहिए ना। 84 लाख नहीं होते। तो बाप समझाते हैं यही दुनिया सतयुग में नई थी, राइटियस थी। यही दुनिया फिर अनराइटियस बन जाती है। वह है सचखण्ड, सब सच बोलने वाले होते हैं। भारत को सचखण्ड कहा जाता है। झूठखण्ड ही फिर सचखण्ड बनता है। सच्चा बाप ही आकर सचखण्ड बनाते हैं। उनको सच्चा पातशाह, ट्रूथ कहा जाता है, यह है ही झूठ खण्ड। मनुष्य जो कहते हैं वह है झूठ। सेन्सीबुल बुद्धि हैं देवतायें, उन्हों को मनुष्य पूजते हैं। अक्लमंद और बेअक्ल कहा जाता है। अक्लमंद कौन बनाते हैं फिर बेअक्ल कौन बनाते हैं? यह भी बाप बताते हैं। अक्लमंद सर्वगुण सम्पन्न बनाने वाला है बाप। वह खुद आकर अपना परिचय देते हैं। जैसे तुम आत्मा हो फिर यहाँ शरीर में प्रवेश कर पार्ट बजाते हो। मैं भी एक ही बार इनमें प्रवेश करता हूँ। तुम जानते हो वह है ही एक। उनको ही सर्वशक्तिमान कहा जाता है। दूसरा कोई मनुष्य नहीं जिसको हम सर्वश-क्तिमान कहें। लक्ष्मी-नारायण को भी नहीं कह सकते क्योंकि उन्हों को भी शक्ति देने वाला कोई है। पतित मनुष्य में शक्ति हो न सके। आत्मा में जो शक्ति रहती है वह फिर आहिस्ते-आहिस्ते डिग्रेड होती जाती है अर्थात् आत्मा में जो सतोप्रधान शक्ति थी वह तमोप्रधान शक्ति हो जाती है। जैसे मोटर का तेल खलास होने से मोटर खड़ी हो जाती है। यह बैटरी घड़ी-घड़ी डिस्चार्ज नहीं होती है, इनको पूरा टाइम मिला हुआ है। कलियुग अन्त में बैटरी ठण्डी हो जाती है। पहले जो सतोप्रधान विश्व के मालिक थे, अभी तमोप्रधान हैं तो ताकत कम हो गई है। शक्ति नहीं रही है। वर्थ नाट पेनी बन जाते हैं। भारत में देवी-देवता धर्म था तो वर्थ पाउण्ड थे। रिलीजन इज माइट कहा जाता है। देवता धर्म में ताकत है। विश्व के मालिक हैं। क्या ताकत थी? कोई लड़ने आदि की ताकत नहीं थी। ताकत मिलती है सर्वशक्तिमान बाप से। ताकत क्या चीज़ है?

बाप समझाते हैं – मीठे-मीठे बच्चों, तुम्हारी आत्मा सतोप्रधान थी, अब तमोप्रधान है। विश्व के मालिक बदले विश्व के गुलाम बन गये हो। बाप समझाते हैं – यह 5 विकार रूपी रावण तुम्हारी सारी ताकत छीन लेते हैं इसलिए भारतवासी कंगाल बन पड़े हैं। ऐसे मत समझो साइन्स वालों में बहुत ताकत है, वह ताकत नहीं है। यह रूहानी ताकत है। जो सर्वशक्तिमान बाप से योग लगाने से मिलती है। साइंस और साइलेन्स की इस समय जैसे लड़ाई है। तुम साइलेन्स में जाते हो, उसका तुमको बल मिल रहा है। साइलेन्स का बल लेकर तुम साइलेन्स दुनिया में चले जायेंगे। बाप को याद कर अपने को शरीर से डिटैच कर देते हो। भक्ति मार्ग में भगवान के पास जाने के लिए तुमने बहुत माथा मारा है। परन्तु सर्वव्यापी कहने के कारण रास्ता मिलता ही नहीं। तमोप्रधान बन गये हैं। तो यह पढ़ाई है, पढाई को शक्ति नहीं कहेंगे। बाप कहते हैं पहले तो पवित्र बनो और फिर सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है उनकी नॉलेज समझो। नॉलेजफुल तो बाप ही है, इसमें शक्ति की बात नहीं। बच्चों को यह पता नहीं है कि सृष्टि चक्र कैसे फिरता है, तुम एक्टर्स पार्टधारी हो ना। यह बेहद का ड्रामा है। आगे मनुष्यों का नाटक चलता था, उसमें अदली बदली हो सकती है। अभी तो फिर बाइसकोप बने हैं। बाप को भी बाइसकोप का मिसाल दे समझाना सहज होता है। वह छोटा बाइसकोप, यह है बड़ा। नाटक में एक्टर्स आदि को चेन्ज कर सकते हैं। यह तो अनादि ड्रामा है। एक बार जो शूट हुआ है वह फिर बदल नहीं सकता। यह सारी दुनिया बेहद का बाइसकोप है। शक्ति की कोई बात ही नहीं। अम्बा को शक्ति कहते हैं परन्तु फिर भी नाम तो है। उनको अम्बा क्यों कहते हैं? क्या करके गई है? अभी तुम समझते हो कि ऊंच ते ऊंच है अम्बा और लक्ष्मी। अम्बा ही फिर लक्ष्मी बनती है। यह भी तुम बच्चे ही समझते हो। तुम नॉलेज-फुल भी बनते हो और तुमको पवित्रता भी सिखलाते हैं। वह पवित्रता आधाकल्प चलती है। फिर बाप ही आकर पवित्रता का रास्ता बताते हैं। उनको बुलाते ही इस समय के लिए हैं कि आकर रास्ता बताओ और फिर गाइड भी बनो। वह है परम आत्मा, सुप्रीम की पढ़ाई से आत्मा सुप्रीम बनती है। सुप्रीम पवित्र को कहा जाता है। अभी तो पतित हो, बाप तो एवर पावन है। फर्क है ना। वह एवर पावन ही जब आकर सबको वर्सा दे और सिखलाये। इसमें खुद आकर बतलाते हैं कि मैं तुम्हारा बाप हूँ। मुझे रथ तो जरूर चाहिए, नहीं तो आत्मा बोले कैसे। रथ भी मशहूर है। गाते हैं भाग्यशाली रथ। तो भाग्यशाली रथ है मनुष्य का, घोड़े-गाड़ी की बात नहीं है। मनुष्य का ही रथ चाहिए, जो मनुष्यों को बैठ समझाये। उन्होंने फिर घोड़े गाड़ी बैठ दिखा दी है। भाग्यशाली रथ मनुष्य को कहा जाता है। यहाँ तो कोई-कोई जानवर की भी बहुत अच्छी सेवा होती है, जो मनुष्य की भी नहीं होती। कुत्ते को कितना प्यार करते हैं। घोड़े को, गाय को भी प्यार करते हैं। कुत्तों की एग्जीवीशन लगती है। यह सब वहाँ होते नहीं। लक्ष्मी-नारायण कुत्ते पालते होंगे क्या?

अभी तुम बच्चे जानते हो कि इस समय के मनुष्य सब तमोप्रधान बुद्धि हैं, उन्हें सतोप्रधान बनाना है। वहाँ तो घोड़े आदि ऐसे नहीं होते जो मनुष्य कोई उनकी सेवा करें। तो बाप समझाते हैं – तुम्हारी हालत देखो क्या हो गई है। रावण ने यह हालत कर दी है, यह तुम्हारा दुश्मन है। परन्तु तुमको पता नहीं है कि इस दुश्मन का जन्म कब होता है। शिव के जन्म का भी पता नहीं है तो रावण के जन्म का भी पता नहीं है। बाप बतलाते हैं त्रेता के अन्त और द्वापर के आदि में रावण आते हैं। उनको 10 शीश क्यों दिये हैं? हर वर्ष क्यों जलाते हैं? यह भी कोई जानते नहीं। अभी तुम मनुष्य से देवता बनने के लिए पढ़ते हो, जो पढ़ते नहीं वह देवता बन न सकें। वह फिर आयेंगे तब जब रावणराज्य शुरू होगा। अभी तुम जानते हो हम देवता धर्म के थे अब फिर सैपलिंग लग रहा है। बाप कहते है मैं हर 5 हज़ार वर्ष बाद तुमको आकर ऐसा पढ़ाता हूँ। इस समय सारे सृष्टि का झाड़ पुराना है। नया जब था तो एक ही देवता धर्म था फिर धीरे-धीरे नीचे उतरते हैं। बाप तुम्हें 84 जन्मों का हिसाब बताते हैं क्योंकि बाप नॉलेजफुल है ना। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रुहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) साइलेन्स का बल जमा करना है। साइलेन्स बल से साइलेन्स दुनिया में जाना है। बाप की याद से ताकत लेकर गुलामी से छूटना है, मालिक बनना है।

2) सुप्रीम की पढ़ाई पढ़कर आत्मा को सुप्रीम बनाना है। पवित्रता के ही रास्ते पर चल पवित्र बनकर दूसरों को बनाना है। गाइड बनना है।

वरदान:- विघ्नकारी आत्मा को शिक्षक समझ उनसे पाठ पढ़ने वाले अनुभवी-मूर्त भव
जो आत्मायें विघ्न डालने के निमित्त बनती हैं उन्हें विघ्नकारी आत्मा नहीं देखो, उनको सदा पाठ पढ़ाने वाली, आगे बढ़ाने वाली निमित्त आत्मा समझो। अनुभवी बनाने वाले शिक्षक समझो। जब कहते हो निंदा करने वाले मित्र हैं, तो विघ्नों को पास कराके अनुभवी बनाने वाले शिक्षक हुए इसलिए विघ्नकारी आत्मा को उस दृष्टि से देखने के बजाए सदा के लिए विघ्नों से पार कराने के निमित्त, अचल बनाने के निमित्त समझो, इससे और भी अनुभवों की अथॉरिटी बढ़ती जायेगी।
स्लोगन:- कम्पलेन्ट के फाइल खत्म कर फाइन और रिफाइन बनो।

TODAY MURLI 9 OCTOBER 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 9 October 2019

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09/10/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, the knowledge that the Father teaches you has nothing to do with occult power. A magic mantra doesn’t work for studying.
Question: Why are deities said to be wise whereas human beings are not?
Answer: Because deities were full of all virtues whereas human beings have no virtues. It is because deities were wise that people worship them. Their batteries were charged and this is why they are said to be worth a pound. When their batteries become discharged, they are worth only a penny and they would be called senseless.

Om shanti. The Father has explained to you children that this is a place of study (pathshala). This is a study. You attain that status (deity) through this study. This should be considered to be a school or university. People come here from far away to study. What do they come here to study? They have that aim and objective in their intellects. We come here to study and the One teaching us is called the Teacher. The versions of God is the Gita. There is no other matter. The Gita is the book of the One who teaches, but He doesn’t actually read a book. He doesn’t hold the Gita in His hand. These are the versions of God. Human beings cannot be called God. God is One, the Highest on High. The incorporeal world, the subtle region and the corporeal world are the whole universe. The play is not performed in the incorporeal world or the subtle region; it is acted out here. The cycle of 84 births is also here. This is called the play of the cycle of 84. This is a predestined play. These matters have to be understood because you are receiving the directions of God, the Highest on High. There is nothing else. Only the One is called the One with all powers, the World Almighty Authority. He Himself explains the meaning of the word “Authority“. People do not understand this because all of them are tamopradhan. This is called the iron age. It is not that it is the iron age for some, the golden age for some and the silver age for others; no. Since it is now hell, human beings can’t say that this is heaven for them just because they have a lot of wealth and property; that is not possible. This play is predestined. The golden age is now the past; it cannot exist at this time. All of these matters have to be understood. The Father sits here and explains all of these things. It used to be their kingdom in the golden age. The people of Bharat of that time are called golden aged. Now, they would surely be called iron aged. When they were golden aged, that was called heaven. It isn’t that hell would also be called heaven. People have their own dictates. When they have the happiness of wealth, they consider themselves to be in heaven. “I have a lot of wealth and so I am in heaven.” However, reasoning says that that is not possible. This is hell. Even though someone may have one to two million, this world is diseased. The golden age is called the world that is free from disease. It is the same world. In the golden age, it is called the yogi world whereas in the iron age, it is called the bhogi world (those who indulge in sensual pleasures). There, they are yogi because there are no vices there. So, this is a school and there is no question of having power. Would a teacher show his power? You have the aim and objective of becoming so-and-so. Through this study, you change from human beings into deities. This is not a matter of a magic mantra or occult power; this is a school. Is there anything to do with occult power in a school? They study and become doctors or barristers. Lakshmi and Narayan too were human beings, but they were pure. This is why they are called deities. You definitely do have to become pure. This is the impure old world. People think that it takes hundreds of thousands of years for the world to become old. Only after the iron age will the golden age come. You are now at the confluence age. No one knows about this confluence age. They have shown the golden age to be hundreds of thousands of years. The Father comes and explains these things. He is called the Supreme Soul. The Father of souls is called Baba. He doesn’t have any other name. Baba’s name is Shiva. People also go to Shiva temples. Only the Supreme Soul, Shiva, is called the incorporeal One. He doesn’t have a human body. You souls come here to play your parts and this is why you receive human bodies. He is Shiva and you are saligrams. People worship Shiva and the saligrams because they have been and gone in the living form. They must have done something before they departed. That is why they are well known and worshipped. No one knows about their previous birth. They are praised in this birth. People worship the deities. In this birth, many have become leaders too. Stampare produced of the very good sages and holy men who have been and gone to make them famous. Whose name would be remembered as the greatest here? Who is the greatest of all here? It is God alone who is the Highest on High. He is the Incorporeal and His praise is completely separate. The praise of deities is separate from that of human beings. Human beings cannot be called deities. Deities had all the virtues. Lakshmi and Narayan have been and gone. They were the pure masters of the world, and they are worshipped because pure ones are worthy of worship. Those who are impure cannot be said to be worthy of worship. Impure ones always worship pure ones. When a kumari is pure she is worshipped, but when she becomes impure, she has to bow down at everyone’s feet. At this time, all are impure whereas everyone in the golden age was pure. That is the pure world and the iron age is the impure world. This is why they call out to the Purifier Father. They do not call out to Him when they are pure. The Father Himself says: No one remembers Me at the time of happiness. This refers to Bharat alone. The Father only comes in Bharat. Bharat has become impure at this time. It is Bharat that was pure. If you want to see the pure deities, you can go to the temples and see them there. All deities are pure and the heads (main ones) of them are shown in the temples. In the kingdom of Lakshmi and Narayan, all were pure. As were the king and queen, so the subjects. At this time, all are impure. Everyone continues to call out: O Purifier, come! Sannyasis would never accept Krishna to be God or brahm. They believe God to be incorporeal. His image is worshipped as that of the Incorporeal. His accurate name is Shiva. When you souls come here and adopt bodies, you are given names. Souls are imperishable whereas bodies are perishable. Souls shed bodies and take others. There have to be 84 births, there cannot be 8.4 million births. The Father explains: This world was new and righteous in the golden age and this same world then became unrighteous. That is the land of truth where everyone speaks the truth. Bharat is called the land of truth. The land of falsehood then becomes the land of truth. Only the true Father comes and creates the land of truth. He is called the true Emperor, the Truth. This is the land of falsehood; whatever people say is false. Deities have sensible intellects and human beings worship them. It is said: Wise and senseless. The Father tells you who makes you wise and who then makes you senseless. It is the Father who makes you wise and full of all virtues. He Himself comes and gives you His own introduction. Just as you are souls and you adopt bodies here to play your partsso I too enter this one just once. You know that He is the only One. He alone is called the Almighty Authority. No human being can be called the Almighty Authority. Even Lakshmi and Narayan cannot be called that because there is also the One who gives them power. Impure human beings cannot have power. The power that souls have gradually becomes degraded, that is, the satopradhan power that souls had then became tamopradhan power. Similarly, a motor car comes to a standstill when there is no petrol in it. This battery does not become dischargedagain and again; it has been given its full time. At the end of the iron age, the battery becomes cold. The satopradhan masters of the world lost their power because they became tamopradhan; they had no power left. They became worth not a penny. When there was the deity religion in Bharat, they were worth a pound. It is said: Religion is might. There is power in the deity religion. They were the masters of the world. What power did they have? They didn’t have the power to fight etc. They receive power from the Father, the Almighty Authority. What is power? The Father explains: Sweetest children, you souls were satopradhan and are now tamopradhan. Instead of being the masters of the world, you have become the slaves of the world. The Father explains: Ravan, the five vices, has snatched away all your strength. This is why the people of Bharat have become poverty-stricken. Do not think that scientists have a lot of power. That is not power. This is spiritual power which you receive by having yoga with the Almighty Authority Father. It is as though a battle is taking place between science and silence at this time. You go into silence and you receive power through that. By receiving the power of silence, you go to the world of silence. You remember the Father and you detach yourselves from your bodies. On the path of devotion, you beat your heads a great deal in order to go to God. However, because of calling Him omnipresent, you couldn’t find the path; you became tamopradhan. So, this is a study. A study cannot be called power. The Father says: First of all, become pure and then understand the knowledge of how the world cycle turns. The Father alone is knowledge-full. There is no question of power in that. Children do not know how the world cycle turns. You actors are playing roles. This is an unlimited drama. Previously, when people used to perform their parts in a drama, the actors could be changed. However, now they make movies. It is easy for the Father to explain using the example of a movie. Those are little movies and this is the big one. In a play (worldly drama), the actors can be changed. This drama is eternal and, once something has been shot, it cannot be changed. This whole world is an unlimited movie. There is no question of power. Amba is called Shakti, but she still has a name. Why is she called Amba? What did she do when she was here? You now understand that Amba and Lakshmi are the highest on high. Amba then becomes Lakshmi. Only you children understand this. You become knowledge-full and you are also taught purity. That purity continues for half the cycle. The Father then comes and shows you the path to purity. People call out to Him at this time to come and show them the path and also to become the Guide. He is the Supreme Soul. Souls become supreme by studying with the Supreme. Someone who is pure is called supreme. You are now impure. The Father is everpure; there is a difference. Only when the One who is everpure comes here does He give you your inheritance and teach you. He enters this one and He Himself tells you that He is your Father. I definitely need a chariot. How else would the Soul speak? The chariot is also well known. “The Lucky Chariot” is remembered. So, “The Lucky Chariot” is a human being. It is not a question of a horse chariot. A human chariot is needed so that He can sit in it and explain to human beings. They have then shown a horse chariot. A human being is called “The Lucky Chariot”. Here, some animals are looked after so well; even human beings are not cared for as much. People love their dogs so much! They even love horses and cows. They have dog exhibitions. None of that would exist there. Would Lakshmi and Narayan look after dogs? You children now know that all human beings at this time have tamopradhan intellects and that they have to be made satopradhan. There, horses etc. are not such that people would have to serve them. The Father explains: Look what your condition has become! Ravan has made your condition like that. He is your enemy. However, you don’t know when this enemy takes birth. You don’t know about the birth of Shiva or even about the birth of Ravan. The Father tells you that Ravan comes at the end of the silver age and the beginning of the copper age. Why has he been shown with ten heads? Why do people burn his effigy every year? No one knows that. You are now studying to change from human beings into deities. Those who don’t study cannot become deities. They will then come when the kingdom of Ravan begins. You now know that you belonged to the deity religion and that that sapling is now being planted. The Father says: I come every 5000 years and teach you in this way. At this time, the tree of the whole world has become old. When it was new, there was just the one deity religion and then they gradually came down. The Father is telling you the account of 84 births because He is knowledge-full. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Accumulate the power of silence. With the power of silence, you have to go to the world of silence. Take power by having remembrance of the Father and become a master, free yourself from slavery.
  2. By studying with the Supreme, you souls become supreme. Only follow the path of purity, become pure and make others pure. Become a guide.
Blessing: May you be an embodiment of experience who considers souls who create obstacles to be your teachers and learn lessons from them.
Do not look at souls who become instruments for creating obstacles as souls who create obstacles, but consider such souls to be souls who teach you lessons and instruments who enable you to move forward. Consider them to be your teachers who make you experienced. Since you say that those who defame you are your friends, then those who enable you to go across obstacles and make you experienced are your teachers. Therefore, instead of looking at souls who create obstacles with that vision, consider them to be instruments who always enable you to go across obstacles and instruments to make you unshakeable. Your authority of experience will continue to increase in this way.
Slogan: Finishthe file of complaints and become fine and refined.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 9 OCTOBER 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 9 October 2018

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09/10/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, the mantras you have received from human beings are not going to be of any use. Therefore, remove your intellects’ yoga away from everything else and remember the one Father.
Question: What things of the path of devotion cannot continue on the path of knowledge?
Answer: On the path of devotion, they ask God for mercy and blessings. On the path of knowledge, it is not a question of blessings or mercy. This is a study. The Father becomes the Teacher and teaches you. The basis of your fortune is how you study. If the Father were to have mercy, the whole classwould pass. This is why it is not a question of mercy or blessings on the path of knowledge. Each of you definitely has to make your own effort.
Song: I am a small child and You are the Almighty.

Om shanti. This call is from the path of devotion, of the young and the old, because it has been explained that devotees hold sacrificial fires, do chanting and tapasya etc. They believe that they will find a way to the Supreme Soul by doing all of that. To say that God is omnipresent, to say “I am a form of Him” or “God is also in me” are all lies. God doesn’t experience sorrow. God is something separate. This is the mistake of human beings due to which they are experiencing sorrow. Among you also, hardly anyone knows the Father. Maya repeatedly makes you forget. The Father repeatedly tells you: You are given the shrimat to consider yourself to be a soul and to remember Me, the Father. This is the most elevated direction of all. With the Father’s shrimat, human beings change from ordinary humans to Narayan, from impure to pure. The directions that impure human beings of this time give are not elevated. God has also said that this is the corrupt, devilish community. The Father says: Your deity religion is one that gives a lot of happiness. You attained a lot of happiness. This drama is predestined. One shouldn’t ask: Why has God created this drama? This drama is eternal. Knowledge means the day and devotion means the night. With knowledge, you are now becoming residents of heaven whereas with devotion you have become residents of hell. However, because human beings have stone intellects, they don’t understand. Anger is very bad. They continue to manufacture so many bombs. They understand that destruction will definitely take place. Therefore, their intellects are corrupt, are they not? The iron age is called the kingdom of Ravan. It is Ravan that makes you corrupt. The Father comes and issues an ordinance: Stop this corruption! The number one corruption is to make one another impure. This is a brothel. Iron-aged Bharat is called a brothel. Everyone is born through vice. The golden age is called Shivalaya. It was the pure Bharat that was established by Shiv Baba. Lakshmi and Narayan etc. are called full of all virtues, 16 celestial degrees full, completely viceless. In that case, the question of how children are born cannot arise. Since it is through the power of yoga that you children become the masters of the world, what is not possible through the power of yoga? Baba says: Through the power of yoga you can become the masters of heaven by following shrimat. Children there will be born through the power of yoga. You cannot rule the whole world with physical power. Theirs is physical power whereas yours is yoga power. You have yoga with the Almighty Authority Father. The Almighty Father Himself says: Remember Me and your sins will be absolved. However, this doesn’t stay in anyone’s intellect. They say, “Yes, yes”, at that time and then forget. Truly God, the unlimited Father, is decorating you with knowledge by teaching you Raja Yoga. In spite of that, if it doesn’t sit in your intellect, it would be said that it is not in your fortune, and that is why you do not make effort. A teacher teaches everyone and then some study to a certain extent and some fail. You wouldn’t tell your teacher to give you blessings. In a study, there cannot be mercy or blessings etc. On the path of knowledge, the Father says namaste to you. You mustn’t ask for mercy or blessings. When a child comes to the Father, the child becomes a master. The Father says: This one is a master; there is no question of mercy. The father’s property becomes the child’s property. However, yes, it is a teacher’s duty to reform children. A teacher would ask you to study. It is your duty to study. What mercy would he have? It is a guru’s duty to show you the path to salvation; there is no question of blessings. This is the only One who is the Father, Teacher and Guru. There is no question of asking for mercy from any of the three. The Father sits here and gives wisdom to senseless human beings. This is His blessings anyway. However, it is the children’s duty to follow. It has been remembered: Shrimat spoken by God. He is the Highest on High and so His directions would also be elevated. By following shrimat, you become elevated deities, numberwise, according to your efforts. You can also understand how many marks you will pass with. At school, students can understand that they will fail because they haven’t studied fully. Even a father can tell from the registerthat his child will fail. This One is the unlimited Father, Teacher and Guru. This One knows and the children know when they are not studying. If you don’t study, your status will definitely be low. You are not even making effort to study well. No matter how much Baba beats His head and explains to you, you don’t do anything. When shrimat is not followed, a low status is claimed. Those who become the children will become part of the dynasty. There are many levels of status in that too. There are those who even become maids and servants. You children know that if you don’t study and teach others, you become maids and servants. However, they too remain royal. Lakshmi and Narayan will have palaces studded with jewels and diamonds, and the maids and servants will also reside there. They can then claim a higher status in the future, numberwise. The subjects too are numberwise. People insure everything on the path of devotion; they make donations in the name of God. For instance, if someone had a hospital built, he would receive a healthy body free from disease in his next birth. Temporary fruit is definitely received. If someone opened a school, he would study well in his next birth. If someone opened a dharamshala, he would have a good building to stay in his next birth. Therefore, this is insuring, is it not? Each one insures himself. Everything of yours is now direct with God. That is indirect whereas this is insuring directly. “Baba, all of this is Yours; I am a trustee. In return for this, You give us self-sovereignty for 21 births.” This is insuringdirectly with the Father for 21 births. The Father says: Transfer your bags and baggage to the golden age. When war breaks out, the smaller kings place all their wealth with the bigger king, and then, when the war is over, they take all their wealth back. Baba is experienced in these things. The Father knows and Dada also knows. You should understand that you are receiving the inheritance from Baba through Dada. The Father is teaching you. That Father, not this one, is Heavenly God, the Father. This one is Dada (the elder brother). Firstly, you definitely have to belong to Dada (Grandfather): Baba, I belong to You, I will claim my inheritance from You. To break away your intellect’s yoga away from everyone else requires effort. The Father says: Now, all the mantras from the gurus etc. are not going to be of any use. None of the mantras from any of the human beings are going to be of use now. I tell you: Remember Me and victory is yours. You have big burdens of sins on your heads. Now remember Me and your sins will be absolved. Then I will send you to heaven. First of all, you have to have this faith. If there isn’t faith, Baba doesn’t open the locks on the intellects and you don’t imbibe anything. When you belong to the Father, you also claim a right to the inheritance. This doesn’t sit in some intellects. Some new ones go ahead of the older ones. The Father explains very clearly. To the extent that someone studies, accordingly he earns an income. This God f atherly knowledge is a source of income. Through knowledge you become the masters of the world. Human beings don’t have this knowledge. You have now become My children. From the devilish community, you now belong to the deity community. From corrupt, you are becoming elevated. No one can become elevated without following shrimat. Otherwise, at the end, you will return home having experienced punishment. Although those who listen to a little knowledge will come to heaven, they will attain a completely ordinary status amongst the subjects. The status there is numberwise. There, people won’t be so poor that they don’t have chapattis to eat. Poor people there are not like the poor people here. Everyone has happiness there. Don’t think: It’s OK even if I am one of the subjects. That is weakness. First of all, there has to be firm faith. These are the versions of incorporeal God. God says: I do not take a human costume. My name is Shiva. All deities and human beings have names given to their bodies. I do not have a bodily name. I do not have a body of My own. Bodily beings cannot be called God; they are called human beings. It is due to considering human beings to be God that the people of Bharat have become senseless. Otherwise, the people of Bharat were very wise and sensible. Earlier, the cloth etc. of Bharat was good, very refined. Now, they cannot make those same things. S cience too exists in heaven for your happiness. Here, science is for both happiness and sorrow; you receive temporary happiness. There is limitless sorrow. When the whole world is destroyed, there will be sorrow, will there not? Everyone will cry out in distress. There, there is nothing but happiness through science ; there is no mention of sorrow. Only those whose fortune has opened can understand this. If they don’t have happiness in their fortune, they don’t understand. Barristers etc. are also numberwise. Some charge 10 to 20 thousand for a single case, whereas other barristers don’t even have a coat to wear. It is the same here. One either becomes a king of kings or a subject worth a few pennies. The Father sits here and explains to you children. Bharat is the poorest of all at this time. It is Bharat that then becomes wealthy. Donations are always given to the poor. The wealthy are not able to take this knowledge as much as ordinary, poor people. Only they will take this knowledge. It is not the law to give donations to wealthy ones. You are poor, are you not? Your Mama was the poorest of all, but she will then become the empress of the world. The drama has been created in this way. The majority of those who take this knowledge are poor because they are unhappy. The wealthy are very happy anyway. They say that this is heaven for them. They have motorcars and money etc. They say: Give knowledge to those who don’t have money and are in hell. Yours is God f atherly service. You are the true servants of Bharat. Those are physical social workers ; they give a little happiness to human beings. You cleanse the whole world and make it pure and happy. You are serving Bharat with your bodies, minds and wealth. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Transfer your old bags and baggage for 21 births. Insure them and then look after them as a trustee.
  2. Study with faith in your intellect. Donate the wealth of knowledge to the poor. Do the true spiritual service of making Bharat pure.
Blessing: May you be an embodiment of attainment and experience fullness and perfection by being full of all treasures.
When the moon is full, that fullness is a sign of its perfection. It will not grow any more, its perfection is only to that extent, there isn’t anything missing from its edge. In the same way, when you children are filled with knowledge, yoga, virtues and service, that is, all treasures, this fullness is said to be perfection. Because such full souls are embodiments of attainment, they are always close in their stage too.
Slogan: To attain total success with a divine intellect is to be an embodiment of success.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 9 OCTOBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 9 October 2018

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09-10-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – अब मनुष्यों द्वारा मिले हुए मंत्र-जंत्र काम में नहीं आने हैं, इसलिए तुम सबसे अपना बुद्धियोग तोड़ एक बाप को याद करो”
प्रश्नः- भक्ति की कौन-सी बात ज्ञान मार्ग में नहीं चल सकती है?
उत्तर:- भक्ति में भगवान् से कृपा अथवा आशीर्वाद मांगते हैं, ज्ञान मार्ग में आशीर्वाद वा कृपा की बात नहीं। यह पढ़ाई है, बाप टीचर बनकर तुमको पढ़ा रहे हैं। तकदीर का आधार पढ़ाई पर है। अगर बाप कृपा करे तो सारा क्लास ही पास हो जाए इसलिए ज्ञान मार्ग में कृपा वा आशीर्वाद की बात नहीं। हरेक को अपना-अपना पुरुषार्थ जरूर करना है।
गीत:- मैं एक नन्हा सा बच्चा हूँ…….

ओम् शान्ति। यह है भक्ति मार्ग के लिए पुकार, छोटे और बड़े की क्योंकि समझाया गया है भक्त तो यज्ञ, जप, तप आदि करते हैं, समझते हैं इनसे परमात्मा से मिलने का रास्ता मिलेगा। फिर ईश्वर को सर्वव्यापी कहना, मैं भी उनका रूप हूँ, मेरे में भी भगवान् है, यह कहना तो झूठ है ना। वह कोई दु:ख सहन नहीं करता। भगवान् तो अलग चीज़ है ना। यही मनुष्यों की भूल है जिस कारण दु:ख भोग रहे हैं। तुम्हारे में भी कोई विरले बाप को जानते हैं। माया घड़ी-घड़ी भुला देती है। बाप तो बार-बार कहते हैं, तुमको श्रीमत देते हैं कि अपने को आत्मा समझो और मुझ बाप को याद करो। यह है श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ मत। बाप की श्रीमत से मनुष्य नर से नारायण, पतित से पावन बनते हैं। इस समय के जो यह पतित मनुष्य हैं उन्हों की श्रेष्ठ मत नहीं है। भगवान् ने भी कहा है कि यह भ्रष्टाचारी आसुरी सम्प्रदाय है। बाप कहते हैं तुम्हारा देवी-देवता धर्म बहुत सुख देने वाला है। तुमने बहुत सुख पाया है, यह बना-बनाया ड्रामा है। ऐसे नहीं कि भगवान् ने क्यों बनाया है? यह तो अनादि ड्रामा है ना। ज्ञान माना दिन, भक्ति माना रात। ज्ञान से अब तुम स्वर्गवासी बन रहे हो, भक्ति से नर्कवासी बने हो। परन्तु मनुष्य पत्थरबुद्धि होने कारण समझते नहीं। क्रोध कितना भारी है। कितने बाम्ब्स बनाते रहते हैं, समझते हैं विनाश जरूर होगा। तो यह भ्रष्टाचारी बुद्धि हुई ना। कलियुग को कहा जाता है रावण राज्य। रावण ही भ्रष्टाचारी बनाते हैं। बाप आकर आर्डीनेन्स निकालते हैं कि अब भ्रष्टाचार बन्द करो। नम्बरवन भ्रष्टाचार है एक-दो को पतित बनाना। यह है वेश्यालय। कलियुगी भारत को वेश्यालय कहा जाता है। सब विष से पैदा होने वाले हैं। सतयुग को कहा जाता है शिवालय। शिवबाबा का स्थापन किया हुआ पवित्र भारत। लक्ष्मी-नारायण आदि को कहा जाता है सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी…… फिर यह प्रश्न नहीं उठ सकता कि बच्चे कैसे पैदा होते हैं? जबकि तुम बच्चे योगबल से विश्व के मालिक बन सकते हो तो योगबल से क्या नहीं हो सकता है! बाबा कहते हैं तुम योगबल से श्रीमत पर स्वर्ग के मालिक बन सकते हो तो वहाँ योगबल से बच्चे भी पैदा होंगे। बाहुबल से सारी सृष्टि पर राज्य नहीं कर सकते। उन्हों का है बाहुबल, तुम्हारा है योगबल। तुम सर्वशक्तिमान बाप से योग लगाते हो। सर्वशक्तिमान बाप खुद कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। परन्तु कोई की बुद्धि में ठहरता नहीं। उसी समय हाँ-हाँ कहते हैं फिर भूल जाते हैं।

बरोबर भगवान् बेहद का बाप राजयोग सिखलाकर ज्ञान से हमारा श्रृंगार कर रहे हैं। फिर भी बुद्धि में नहीं बैठता है तो कहेंगे उसकी तकदीर में नहीं है इसलिए तदबीर नहीं करते। टीचर तो सबको पढ़ाते हैं फिर कोई कितना पढ़ते हैं, कोई नापास हो जाते हैं। टीचर को थोड़ेही कहेंगे आशीर्वाद करो। पढ़ाई में आशीर्वाद, कृपा आदि नहीं चलती है। ज्ञान मार्ग में तो बाप तुमको नमस्ते करते हैं। कृपा वा आशीर्वाद नहीं मांगनी है। बाप के पास बच्चा आया तो वह मालिक ही बन जाता है। बाप कहते हैं यह तो मालिक है, कृपा की बात नहीं। बाप की मिलकियत सो बच्चे की हो गई। हाँ, बाकी बच्चों को सुधारना, वह फिर टीचर का काम है। टीचर कहेंगे पढ़ो। पढ़ना तुम्हारा काम है। कृपा क्या करेंगे? गुरू का भी फ़र्ज है रास्ता बताना, सद्गति मार्ग का। आशीर्वाद की बात नहीं। यह तो एक ही बाप, टीचर, गुरू है। तीनों से कृपा मांगने की बात नहीं। बेसमझ मनुष्यों को बाप बैठ समझ देते हैं। यह तो उनकी आशीर्वाद है ही। बाकी उस पर चलना बच्चों का काम है। गाया हुआ है – श्रीमत भगवानुवाच। वह है ऊंच ते ऊंच तो उनकी मत भी ऊंच होगी ना। श्रीमत से तुम श्रेष्ठ देवी-देवता बन रहे हो नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। तुम भी समझ सकते हो हम कितनी मार्क्स से पास होंगे। स्कूल में स्टूडेंट समझ तो सकते हैं ना – हमने पूरा पढ़ा नहीं है इसलिए हम नापास होंगे। बाप भी रजिस्टर से समझ जाते हैं यह नापास होगा। यह भी बेहद का बाप, टीचर, गुरू एक ही है। यह भी जानते हैं, बच्चे भी जानते हैं हम पढ़ते नहीं। पढ़ते नहीं तो जरूर कम पद होगा। यह भी पुरुषार्थ नहीं करते कि अच्छा हम तीखा पढ़ें। भल कितना भी माथा मारते है, समझाते हैं तो भी कुछ करते नहीं। श्रीमत पर न चलने से नीच पद पायेंगे। जो बच्चे बनते हैं वह डिनायस्टी में तो आ जायेंगे। उनमें भी बहुत पद हैं ना। दास-दासी भी बनते हैं। बच्चे जानते हैं पढ़ेंगे, पढ़ायेंगे नहीं तो दास-दासी बनेंगे। परन्तु वह भी रॉयल रहते हैं। लक्ष्मी-नारायण के हीरे जवाहरों के महल होंगे, तो दास-दासियां भी वहाँ रहेंगी ना। फिर नम्बरवार आगे चल पद पा सकते हैं। प्रजा में भी नम्बरवार हैं। भक्ति मार्ग में मनुष्य इन्श्योर करते हैं ना। ईश्वर अर्थ दान देते हैं। समझो कोई ने हॉस्पिटल बनाई होगी तो दूसरे जन्म में अच्छी निरोगी काया मिलेगी। अल्पकाल के लिए फल तो मिलता है ना। कोई ने पाठशाला खोली होगी तो दूसरे जन्म में अच्छा पढ़ेंगे। धर्मशाला खोली होगी तो दूसरे जन्म में रहने के लिए अच्छा मकान मिलेगा। तो यह इन्श्योर करना हुआ ना। हर एक अपने को इन्श्योर करते हैं। अभी तुम्हारा है डायरेक्ट ईश्वर के साथ। वह है इनडायरेक्ट, यह है डायरेक्ट इन्श्योर करना। बाबा यह सब कुछ आपका ही है, हम ट्रस्टी हैं। इनके बदले में आप हमें 21 जन्म के लिए स्वराज्य दे देना। यह हुआ डायरेक्ट बाप को इन्श्योर करना, 21जन्म लिए। बाप कहते हैं अपना बैग-बैगेज सब सतयुग में ट्रान्सफर कर दो। जैसे लड़ाई लगती है तो फिर छोटे-छोटे राजायें बड़े राजाओं के पास अपनी मिलकियत रखते हैं। फिर लड़ाई जब पूरी हो जाती है तो फिर बड़ों से वापिस ले लेते हैं। बाबा तो इन बातों का अनुभवी है ना। बाप भी जानते हैं, यह दादा भी जानते हैं। समझना चाहिए हमको दादा द्वारा बाबा से वर्सा मिलता है। बाप पढ़ाते हैं। हेविनली गॉड फादर वह बाप है, यह नहीं, यह है दादा। पहले जरूर दादे का बनना पड़े। बाबा, हम आपके हैं, आपसे हम वर्सा लेंगे। और सब तरफ से बुद्धियोग तोड़ना इसमें मेहनत है।

बाप कहते हैं अभी और गुरू आदि के मंत्र कोई भी काम में नहीं आयेंगे। कोई भी मनुष्य मात्र का मंत्र अभी काम नहीं आयेगा। मैं तुमको कहता हूँ मुझे याद करो तो तुम्हारी विजय है। तुम्हारे सिर पर पापों का बोझा बहुत है। अब मुझे याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। फिर तुमको स्वर्ग में भेज दूँगा। पहले तो यह निश्चय चाहिए ना। निश्चय नहीं है तो बाबा बुद्धि का ताला भी नहीं खोलता, धारणा नहीं होती। बाप का बने तो वर्से का भी हकदार बने। बुद्धि में बैठता नहीं है। कोई-कोई नये भी पुरानों से तीखे चले जाते हैं। बाप तो अच्छी रीति समझाते हैं। जितना जो पढ़ेंगे उतनी कमाई है। यह गॉड फादरली नॉलेज सोर्स आफ इनकम है। तुम विश्व का मालिक बनते हो, नॉलेज से। मनुष्यों में यह ज्ञान थोड़ेही है। अब तुम मेरे बच्चे आसुरी सम्प्रदाय से दैवी सम्प्रदाय, भ्रष्टाचारी से श्रेष्ठाचारी बन रहे हो। सिवाए श्रीमत के कोई भी श्रेष्ठाचारी बन नहीं सकता। नहीं तो फिर अन्त में सजायें खाकर वापिस जायेंगे। भल थोड़ा-बहुत जो सुनते हैं वो स्वर्ग में आयेंगे परन्तु बिल्कुल ही साधारण प्रजा में। मर्तबे तो नम्बरवार होते हैं ना। वहाँ ऐसे गरीब नहीं होंगे जो किसको रोटी नहीं मिले। यहाँ जैसे गरीब वहाँ नहीं होते। सुख सबको रहता है। परन्तु ऐसे नहीं समझना है – अच्छा, प्रजा तो प्रजा ही सही। यह तो कमजोरी हुई ना। पहले तो पक्का निश्चय चाहिए। यह निराकार भगवानुवाच है। भगवान् कहते हैं मुझे मनुष्य चोला तो नहीं है। मेरा नाम है शिव। बाकी जो भी देवतायें या मनुष्य हैं, सबके शरीर पर नाम हैं, मेरा नाम शरीर पर नहीं है। मुझे अपना शरीर ही नहीं है। शरीरधारी को भगवान् नहीं कहा जाता, मनुष्य कहा जाता है। मनुष्य को भगवान् मानने से ही भारतवासी बेसमझ बन गये हैं। नहीं तो भारतवासी बहुत सयाने थे। पहले भारत में कपड़ा आदि बहुत रिफाइन अच्छा बनता था। अभी तो वह चीज़ बन नहीं सकती। तो स्वर्ग में साइन्स भी सुख के लिए होती है। यहाँ तो साइन्स सुख-दु:ख दोनों के लिए है। अल्पकाल का सुख मिलता है। दु:ख तो अपार है। सारी दुनिया ख़त्म हो जायेगी तो दु:ख हुआ ना। सब त्राहि-त्राहि करेंगे। वहाँ तो साइन्स से सुख ही सुख होता है, दु:ख का नाम निशान नहीं। यह भी जिनकी तकदीर खुलती है वही समझ सकते हैं। तकदीर में सुख नहीं है तो समझ नहीं सकते। बैरिस्टर भी नम्बरवार होते हैं ना। कोई तो एक-एक केस का 10-20 हजार रूपया लेते हैं। कोई बैरिस्टर को देखो तो कोट भी पहनने के लिए नहीं होगा। यहाँ भी ऐसे है ना, या तो राजाओं का राजा बनते या तो पाई पैसे की प्रजा बनते हैं। तो बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं भारत ही इस समय सबसे गरीब है, भारत ही फिर साहूकार बनता है। दान हमेशा गरीबों को दिया जाता है। धनवान इतना उठा नहीं सकते हैं। गरीब साधारण ही यह ज्ञान उठायेंगे। साहूकारों को दान देना यह लॉ नहीं है। तुम गरीब हो ना। तुम्हारी मम्मा सबसे गरीब, वह फिर विश्व की महारानी बनती है। ड्रामा ही ऐसा बना हुआ है। गरीब जास्ती उठाते हैं क्योंकि दु:खी हैं ना। साहूकार तो बहुत सुखी हैं। वह तो कहते हैं हमको तो यहाँ ही स्वर्ग है, मोटर-गाड़ियाँ, पैसा आदि है। जिनको पैसा नहीं है, नर्क में है उनको आप ज्ञान दो – ऐसे भी कहते हैं। तुम्हारी है अब गॉड फादरली सर्विस। तुम भारत के सच्चे सर्वेन्ट हो। वह सोशल वर्कर्स हैं जिस्मानी। मनुष्यों को थोड़ा सुख देते हैं। यह तो सारी सृष्टि को साफ कर पवित्र-सुखी बना देते हैं। यह तन-मन-धन से भारत की सेवा कर रहे हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बपदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपना पुराना बैग-बैगेज 21 जन्मों के लिए ट्रान्सफर करना है, इनश्योर कर ट्रस्टी हो सम्भालना है।

2) निश्चयबुद्धि बन पढ़ाई करनी है। गरीबों को ज्ञान दान देना है। भारत को पवित्र बनाने की सच्ची रूहानी सेवा करनी है।

वरदान:- सर्व खजानों की सम्पन्नता द्वारा सम्पूर्णता का अनुभव करने वाले प्राप्ति स्वरूप भव
जैसे चन्द्रमा जब सम्पन्न होता है तो सम्पन्नता उसके सम्पूर्णता की निशानी होती है, इससे और आगे नहीं बढ़ेगा, बस इतनी ही सम्पूर्णता है, जरा भी किनारी कम नहीं होती है। ऐसे आप बच्चे जब ज्ञान, योग, धारणा और सेवा अर्थात् सभी खजानों से सम्पन्न होते हो, तो इस सम्पन्नता को ही सम्पूर्णता कहा जाता है। ऐसी सम्पन्न आत्मायें प्राप्ति स्वरूप होने के कारण स्थिति में भी सदा समीप रहती हैं।
स्लोगन:- दिव्य बुद्धि द्वारा सर्व सिद्धियों को प्राप्त करना ही सिद्धि स्वरूप बनना है।
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