9 july ki murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 9 JULY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 9 July 2020

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09-07-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – जब समय मिले तो एकान्त में बैठ विचार सागर मंथन करो, जो प्वाइंट्स सुनते हो उसको रिवाइज़ करो”
प्रश्नः- तुम्हारी याद की यात्रा पूरी कब होगी?
उत्तर:- जब तुम्हारी कोई भी कर्मेद्रियाँ धोखा न दें, कर्मातीत अवस्था हो जाए तब याद की यात्रा पूरी होगी। अभी तुमको पूरा पुरुषार्थ करना है, नाउम्मीद नहीं बनना है। सर्विस पर तत्पर रहना है।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे बच्चे आत्म-अभिमानी होकर बैठे हो? बच्चे समझते हैं आधाकल्प हम देह-अभिमानी रहे हैं। अब देही-अभिमानी हो रहने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। बाप आकर समझाते हैं अपने को आत्मा समझकर बैठो तब ही बाप याद आयेगा। नहीं तो भूल जायेंगे। याद नहीं करेंगे तो यात्रा कैसे कर सकेंगे! पाप कैसे कटेंगे! घाटा पड़ जायेगा। यह तो घड़ी-घड़ी याद करो। यह है मुख्य बात। बाकी तो बाप अनेक प्रकार की युक्तियां बतलाते हैं। रांग क्या है, राइट क्या है – वह भी समझाया है। बाप तो ज्ञान का सागर है। भक्ति को भी जानते हैं। बच्चों को भक्ति में क्या-क्या करना पड़ता है। समझाते हैं यह यज्ञ तप आदि करना, यह सब है भक्ति मार्ग। भल बाप की महिमा करते हैं, परन्तु उल्टी। वास्तव में कृष्ण की महिमा भी पूरी नहीं जानते। हर एक बात को समझना चाहिए ना। जैसे कृष्ण को वैकुण्ठ नाथ कहा जाता है। अच्छा, बाबा पूछते हैं, कृष्ण को त्रिलोकीनाथ कहा जा सकता है? गाया जाता है ना – त्रिलोकीनाथ। अब त्रिलोकी के नाथ अर्थात् तीन लोक मूलवतन, सूक्ष्मवतन, स्थूलवतन। तुम बच्चों को समझाया जाता है तुम ब्रह्माण्ड के भी मालिक हो। कृष्ण ऐसे समझते होंगे कि हम ब्रह्माण्ड के मालिक हैं? नहीं। वह तो वैकुण्ठ में थे। वैकुण्ठ कहा जाता है स्वर्ग नई दुनिया को। तो वास्तव में त्रिलोकीनाथ कोई भी है नहीं। बाप राईट बात समझाते हैं। तीन लोक तो हैं। ब्रह्माण्ड का मालिक शिवबाबा भी है, तुम भी हो। सूक्ष्मवतन की तो बात ही नहीं। स्थूल वतन में भी वह मालिक नहीं है, न स्वर्ग का, न नर्क का मालिक है। कृष्ण है स्वर्ग का मालिक। नर्क का मालिक है रावण। इनको रावण राज्य, आसुरी राज्य कहा जाता है। मनुष्य कहते भी हैं परन्तु समझते नहीं हैं। तुम बच्चों को बाप बैठ समझाते हैं। रावण को 10 शीश देते हैं। 5 विकार स्त्री के, 5 विकार पुरूष के। अब 5 विकार तो सबके लिए हैं। सब हैं ही रावण राज्य में। अभी तुम श्रेष्ठाचारी बन रहे हो। बाप आकर श्रेष्ठाचारी दुनिया बनाते हैं। एकान्त में बैठने से ऐसे-ऐसे विचार सागर मंथन चलेगा। उस पढ़ाई के लिए भी स्टूडेण्ट एकान्त में किताब ले जाकर पढ़ते हैं। तुमको किताब तो पढ़ने की दरकार नहीं। हाँ, तुम प्वाइंट्स नोट करते हो। इसको फिर रिवाइज़ करना चाहिए। यह बड़ी गुह्य बातें हैं समझने की। बाप कहते हैं ना – आज तुमको गुह्य ते गुह्य नई-नई प्वाइंट्स समझाता हूँ। पारसपुरी के मालिक तो लक्ष्मी-नारायण हैं। ऐसे भी नहीं कहेंगे कि विष्णु हैं। विष्णु को भी समझते नहीं हैं कि यही लक्ष्मी-नारायण है। अभी तुम शॉर्ट में एम आबजेक्ट समझाते हो। ब्रह्मा-सरस्वती कोई आपस में मेल-फीमेल नहीं हैं। यह तो प्रजापिता ब्रह्मा है ना। प्रजापिता ब्रह्मा को ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर कह सकते हैं, शिवबाबा को सिर्फ बाबा ही कहेंगे। बाकी सब हैं ब्रदर्स। इतने सब ब्रह्मा के बच्चे हैं। सबको मालूम है – हम भगवान के बच्चे ब्रदर्स हो गये। परन्तु वह है निराकारी दुनिया में। अभी तुम ब्राह्मण बने हो। नई दुनिया सतयुग को कहा जाता है। इनका नाम फिर पुरुषोत्तम संगमयुग रखा है। सतयुग में होते ही हैं पुरुषोत्तम। यह बड़ी वन्डरफुल बातें हैं। तुम नई दुनिया के लिए तैयार हो रहे हो। इस संगमयुग पर ही तुम पुरुषोत्तम बनते हो। कहते भी हैं हम लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। यह हैं सबसे उत्तम पुरुष। उन्हों को फिर देवता कहा जाता है। उत्तम से उत्तम नम्बरवन हैं लक्ष्मी-नारायण फिर नम्बरवार तुम बच्चे बनेंगे। सूर्यवंशी घराने को उत्तम कहेंगे। नम्बरवन तो हैं ना। आहिस्ते-आहिस्ते कला कम होती है।

अभी तुम बच्चे नई दुनिया का मुहूर्त करते हो। जैसे नया घर तैयार होता है तो बच्चे खुश होते हैं। मुहूर्त करते हैं। तुम बच्चे भी नई दुनिया को देख खुश होते हो। मुहूर्त करते हो। लिखा हुआ भी है सोने के फूलों की वर्षा होती है। तुम बच्चों को कितना खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। तुमको सुख और शान्ति दोनों मिलते हैं। दूसरा कोई नहीं जिनको इतना सुख और शान्ति मिले। दूसरे धर्म आते हैं तो द्वैत हो जाता है। तुम बच्चों को अपार खुशी है – हम पुरुषार्थ कर ऊंच पद पायें। ऐसे नहीं कि जो तकदीर में होगा सो मिलेगा, पास होने होंगे तो होंगे। नहीं, हर बात में पुरुषार्थ जरूर करना है। पुरुषार्थ नहीं पहुँचता है तो कह देते जो नसीब में होगा। फिर पुरुषार्थ करना ही बन्द हो जाता है। बाप कहते हैं तुम माताओं को कितना ऊंच बनाता हूँ। फीमेल का मान सब जगह है। विलायत में भी मान है। यहाँ बच्ची पैदा होती है तो उल्टा मंझा (उल्टी चारपाई) कर देते। दुनिया बिल्कुल ही डर्टी है। इस समय तुम बच्चे जानते हो भारत क्या था, अब क्या है। मनुष्य भूल गये हैं सिर्फ शान्ति-शान्ति मांगते रहते हैं। विश्व में शान्ति चाहते हैं। तुम यह लक्ष्मी-नारायण का चित्र दिखाओ। इन्हों का राज्य था तो पवित्रता-सुख-शान्ति भी थी। तुमको ऐसा राज्य चाहिए ना। मूलवतन में तो विश्व की शान्ति नहीं कहेंगे। विश्व में शान्ति तो यहाँ होगी ना। देवताओं का राज्य सारे विश्व में था। मूलवतन तो है आत्माओं की दुनिया। मनुष्य तो यह भी नहीं जानते कि आत्माओं की दुनिया होती है। बाप कहते हैं हम तुमको कितना ऊंच पुरुषोत्तम बनाता हूँ। यह समझाने की बात है। ऐसे नहीं, रड़ियाँ मारेंगे – भगवान आया है, तो कोई मानेगा नहीं। और ही गाली खायेंगे और खिलायेंगे। कहेंगे बी.के. अपने बाबा को भगवान कहती हैं। ऐसे सर्विस नहीं होती है। बाबा युक्ति बताते रहते हैं। कमरे में 8-10 चित्र दीवाल में अच्छी रीति लगा दो और बाहर में लिख दो – बेहद के बाप से बेहद सुख का वर्सा लेना है अथवा मनुष्य से देवता बनना है, तो आओ हम आपको समझायें। ऐसे बहुत आने लग पड़ेंगे। आपेही आते रहेंगे। विश्व में शान्ति तो थी ना। अभी इतने ढेर धर्म हैं। तमोप्रधान दुनिया में शान्ति कैसे हो सकती है। विश्व में शान्ति वह तो भगवान ही कर सकता है। शिवबाबा आते हैं जरूर कुछ सौगात लाते होंगे। एक ही बाप है जो इतना दूर से आते हैं और यह बाबा एक ही बार आते हैं। इतना बड़ा बाबा 5 हज़ार वर्ष के बाद आते हैं। मुसाफिरी से लौटते हैं तो बच्चों के लिए सौगात ले आते हैं ना। स्त्री का पति भी, बच्चों का बाप तो बनते हैं ना। फिर दादा, परदादा, तरदादा बनते हैं। इनको तुम बाबा कहते हो फिर ग्रैन्ड फादर भी होगा। ग्रेट ग्रैन्ड फादर भी होगा। बिरादरियां हैं ना। एडम, आदि देव नाम है परन्तु मनुष्य समझते नहीं हैं। तुम बच्चों को बाप बैठ समझाते हैं। बाप द्वारा सृष्टि चक्र की हिस्ट्री-जॉग्राफी को तुम जानकर चक्रवर्ती राजा बन रहे हो। बाबा कितना प्यार और रूचि से पढ़ाते हैं तो इतना पढ़ना चाहिए ना। सवेरे का टाइम तो सब फ्री होते हैं। सुबह का क्लास होता है – आधा पौना घण्टा, मुरली सुनकर फिर चले जाओ। याद तो कहाँ भी रहते कर सकते हो। इतवार का दिन तो छुट्टी है। सवेरे 2-3 घण्टा बैठ जाओ। दिन की कमाई को मेकप कर लो। पूरी झोली भर दो। टाइम तो मिलता है ना। माया के तूफान आने से याद नहीं कर सकते हैं। बाबा बिल्कुल सहज समझाते हैं। भक्ति मार्ग में कितने सतसंगों में जाते हैं। कृष्ण के मन्दिर में, फिर श्रीनाथ के मन्दिर में, फिर और किसके मन्दिर में जायेंगे। यात्रा में भी कितने व्यभिचारी बनते हैं। इतनी तकलीफ भी लेते, फायदा कुछ नहीं। ड्रामा में यह भी नूँध है फिर भी होगा। तुम्हारी आत्मा में पार्ट भरा हुआ है। सतयुग त्रेता में जो पार्ट कल्प पहले बजाया है वही बजायेंगे। मोटी बुद्धि यह भी नहीं समझते हैं। जो महीन बुद्धि हैं वही अच्छी रीति समझ कर समझा सकते हैं। उन्हें अन्दर भासना आती है कि यह अनादि नाटक बना हुआ है। दुनिया में कोई नहीं समझते यह बेहद का नाटक है। इनको समझने में भी टाइम लगता है। हर एक बात डीटेल में समझाकर फिर कहा जाता है – मुख्य है याद की यात्रा। सेकण्ड में जीवनमुक्ति भी गाया हुआ है। और फिर यह भी गायन है कि ज्ञान का सागर है। सारा सागर स्याही बनाओ, जंगल को कलम बनाओ, धरती को कागज़ बनाओ…. तो भी अन्त नहीं आ सकती। शुरू से लेकर तुम कितना लिखते आये हो। ढेर कागज हो जाएं। तुमको कोई धक्का नहीं खाना है। मुख्य है ही अल्फ। बाप को याद करना है। यहाँ भी तुम आते हो शिवबाबा के पास। शिवबाबा इनमें प्रवेश कर तुमको कितना प्यार से पढ़ाते हैं। कोई भी बड़ाई नहीं है। बाप कहते हैं मैं आता हूँ पुराने शरीर में। कैसे साधारण रीति शिवबाबा आकर पढ़ाते हैं। कोई अहंकार नहीं। बाप कहते हैं तुम मुझे कहते ही हो बाबा पतित दुनिया, पतित शरीर में आओ, आकर हमको शिक्षा दो। सतयुग में नहीं बुलाते हो कि आकर हीरे-जवाहरातों के महल में बैठो, भोजन आदि पाओ….. शिवबाबा भोजन पाते ही नहीं। आगे बुलाते थे कि आकर भोजन खाओ। 36 प्रकार का भोजन खिलाते थे, यह फिर भी होगा। यह भी चरित्र ही कहें। कृष्ण के चरित्र क्या हैं? वह तो सतयुग का प्रिन्स है। उनको पतित-पावन नहीं कहा जाता। सतयुग में यह विश्व के मालिक कैसे बने हैं – यह भी अभी तुम जानते हो। मनुष्य तो बिल्कुल घोर अन्धियारे में हैं। अभी तुम घोर रोशनी में हो। बाप आकर रात को दिन बना देते हैं। आधाकल्प तुम राज्य करते हो तो कितनी खुशी होनी चाहिए।

तुम्हारी याद की यात्रा पूरी तब होगी जब तुम्हारी कोई भी कर्मेन्द्रियां धोखा न दें। कर्मातीत अवस्था हो जाए तब याद की यात्रा पूरी होगी। अभी पूरी नहीं हुई है। अभी तुमको पूरा पुरूषार्थ करना है। नाउम्मीद नहीं बनना है। सर्विस और सर्विस। बाप भी आकर बूढ़े तन से सर्विस कर रहे हैं ना। बाप करनकरावनहार है। बच्चों के लिए कितना फिकर रहता है – यह बनाना है, मकान बनाना है। जैसे लौकिक बाप को हद के ख्यालात रहते हैं, वैसे पारलौकिक बाप को बेहद का ख्याल रहता है। तुम बच्चों को ही सर्विस करनी है। दिन-प्रतिदिन बहुत सहज होता जाता है। जितना विनाश के नजदीक आते जायेंगे उतना ताकत आती जायेगी। गाया हुआ भी है भीष्मपितामह आदि को पिछाड़ी में तीर लगे। अभी तीर लग जाए तो बहुत हंगामा हो जाए। इतनी भीड़ हो जाए जो बात मत पूछो। कहते हैं ना – माथा खुजलाने की फुर्सत नहीं। ऐसे कोई है नहीं। परन्तु भीड़ हो जाती है तो फिर ऐसे कहा जाता है। जब इन्हों को तीर लग जाए तो फिर तुम्हारा प्रभाव निकलेगा। सब बच्चों को बाप का परिचय मिलना तो है।

तुम 3 पैर पृथ्वी में भी यह अविनाशी हॉस्पिटल और गॉडली युनिवर्सिटी खोल सकते हो। पैसा नहीं है तो भी हर्जा नहीं है। चित्र तुमको मिल जायेंगे। सर्विस में मान-अपमान, दु:ख-सुख, ठण्डी-गर्मी, सब सहन करनी है। किसको हीरे जैसा बनाना कम बात है क्या! बाप कभी थकता है क्या? तुम क्यों थकते हो? अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सवेरे के समय आधा पौना घण्टा बहुत प्यार वा रूचि से पढ़ाई पढ़नी है। बाप की याद में रहना है। याद का ऐसा पुरूषार्थ हो जो सब कर्मेन्द्रियाँ वश में हो जाएं।

2) सर्विस में दु:ख-सुख, मान-अपमान, गर्मी-ठण्डी सब कुछ सहन करना है। कभी भी सर्विस में थकना नहीं है। 3 पैर पृथ्वी में भी हॉस्पिटल कम युनिवर्सिटी खोल हीरे जैसा बनाने की सेवा करनी है।

वरदान:- सर्व शक्तियों की लाइट द्वारा आत्माओं को रास्ता दिखाने वाले चैतन्य लाइट हाउस भव
यदि सदा इस स्मृति में रहो कि मैं आत्मा विश्व कल्याण की सेवा के लिए परमधाम से अवतरित हुई हूँ तो जो भी संकल्प करेंगे, बोल बोलेंगे उसमें विश्व कल्याण समाया हुआ होगा। और यही स्मृति लाइट हाउस का कार्य करेगी। जैसे उस लाइट हाउस से एक रंग की लाइट निकलती है ऐसे आप चैतन्य लाइट हाउस द्वारा सर्व शक्तियों की लाइट आत्माओं को हर कदम में रास्ता दिखाने का कार्य करती रहेगी।
स्लोगन:- स्नेह और सहयोग के साथ शक्ति रूप बनो तो राजधानी में नम्बर आगे मिल जायेगा।

TODAY MURLI 9 JULY 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 9 July 2020

09/07/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, whenever you have time, sit in solitude and churn the ocean of knowledge. Revise the points that you hear.
Question: When will your pilgrimage of remembrance come to an end?
Answer: When none of your physical organs deceive you. When you reach your karmateet stage, your pilgrimage of remembrance will come to an end. You now have to make full effort and not become disheartened. Be ever ready for service.

Om shanti. Are you sweetest children sitting here in soul consciousness? You children know that you have been body conscious for half a cycle. You now have to make effort to remain soul conscious. The Father comes and explains: When you sit considering yourselves to be souls, you will be able to remember the Father. Otherwise, you will forget Him. How can you stay on the pilgrimage if you don’t remember Him? How would you be absolved of your sins? There would be a loss. Remember this again and again. This is the main thing. The Father tells you many different methods. It has also been explained to you what is right and what is wrong. The Father is the Ocean of Knowledge. You also have knowledge of devotion. Children have to do so many things in devotion. He explains: Holding sacrificial fires and doing tapasya etc. all belong to the path of devotion. They sing songs of praise of the Father, but that praise is wrong. In fact, they don’t even know the full praise of Krishna. Each aspect has to be understood. For example, Krishna is called the Lord of Paradise. OK, Baba asks: Can Krishna be called Trilokinath (Lord of the Three Worlds)? Trilokinath has been remembered. The Lord of the Three Worlds means the Lord of the incorporeal world, the subtle world and the corporeal world. You children have been told that you are also the masters of Brahmand (the element of light). Would Krishna have considered himself to be a master of Brahmand? No; he was in Paradise. Heaven, the new world, is called Paradise. So, in fact, no one is a master of the three worlds. The Father tells you right things. There are three worlds. As well as Shiv Baba, you children too are the masters of Brahmand. There is no question of the subtle region. Shiv Baba is not even the master of the corporeal region – neither of heaven nor of hell. Krishna is a master of heaven and Ravan is the master of hell. This is called the devil’s kingdom, the kingdom of Ravan. People say this, but they don’t understand the meaning of it. The Father sits here and explains to you children. Ravan has been portrayed with ten heads: five vices of the male and five of the female. The five vices now apply to everyone; all are in the kingdom of Ravan. You are now becoming elevated. The Father comes and creates the elevated world. By sitting in solitude, you will be able to churn the ocean of knowledge in this way. In other studies too, students go and study their books in solitude. You don’t need to study any books. Yes, you do have to note down points. You then have to revise them. These aspects are very deep and have to be understood. The Father says: Today, I am telling you the deepest and newest points. Lakshmi and Narayan are the masters of the land of divinity. You would not say that Vishnu is that. They don’t understand that Vishnu is Lakshmi and Narayan. You now explain the aim and objective in short. Brahma and Saraswati are not male and female (as a couple). This one is Prajapita Brahma. So Prajapita Brahma can be called the great-great-grandfather. Shiv Baba would only be called Baba. All the rest are brothers. There are so many children of Brahma. All of them know that they are brothers, the children of God. However, that is in the incorporeal world. You have now become Brahmins. The golden age is called the new world. This age is called the most elevated confluence age. In the golden age, all are the most elevated human beings. These are very wonderful aspects. You are being made ready for the new world. It is only at this confluence age that you become the most elevated human beings. You say: I will become Lakshmi or Narayan. They are the most elevated human beings of all; they are called deities. Lakshmi and Narayan are the highest of all, they are number one, and then you children become numberwise. The sun dynasty is said to be the highest; it is number one. The degrees decrease gradually. You children are now carrying out the inauguration of the new world. Just as children become very happy when their new home is ready and they have an inauguration ceremony, so you children also become happy on seeing the new world and you have your inauguration. It has also been written: There was a shower of golden flowers. The mercury of happiness of you children should rise very high: you receive both peace and happiness. No one else can receive so much peace and happiness. When those of other religions come, there is duality. You children have the infinite happiness of making effort to claim a high status. It shouldn’t be that you just accept whatever is in your fortune, that if you are going to pass you will pass; no. Effort definitely has to be made for everything. Someone who is unable to make effort would say, “Whatever is in my fortune…..”, and he would stop making effort. The Father says: I make you mothers so elevated. There is a great deal of respect for females everywhere else. They are given respect abroad too. Here, when a daughter is born, they turn the bed upside-down. This world is completely dirty. At this time, you children know what Bharat was and what it is now. People have forgotten this and simply keep asking for peace. They want peace in the world. You can show them the picture of Lakshmi and Narayan. When it was their kingdom, there was purity, peace and happiness. You do want such a kingdom, do you not? You wouldn’t speak about world peace for the incorporeal world, would you? It is only here that there can be peace in the world. There used to be the kingdom of deities over the whole world. The incorporeal world is the world of souls. Human beings don’t even know that there is a world of souls. The Father says: I make you into such elevated human beings. All of these matters have to be explained. It isn’t that people will believe you when you shout out to them that God has come. No, they will insult you even more. They would say: The Brahma Kumaris call their Baba God. Service can’t be done in that way. Baba continues to show you methods. Put up eight to ten pictures in a room and write outside: If you want to claim your inheritance of unlimited happiness from the unlimited Father, if you want to change from ordinary human beings into deities, then come inside and we will tell you how. Many will then come to you. They will continue to come by themselves. There was peace in the world, was there not? There are now so many religions. How can there be peace in this tamopradhan world? Only God can bring about peace in the world. When Shiv Baba comes, He definitely brings a gift with Him. Only the one Father comes from so far away and He only comes once. Such a great Baba only comes once every 5000 years. When someone returns from travelling abroad, he brings gifts back with him for his children. A man becomes the husband of his wife, the father of his children and the grandfather of his grandchildren and then the great-grandfather of his great-grandchildren. You call this one Baba, and then he also becomes the grandfather. He will also be the great-grandfather; there are the different generations. There are the names Adam and Adi Dev, but people don’t understand the meaning of them. The Father sits here and explains to you children. You are now becoming rulers of the globe by coming to know the history and geography of the world from the Father. Baba is teaching you with so much love and interest. Therefore, you should study just as much. Everyone is free early in the morning. Just come to morning class and listen to the murli for half to three-quarters of an hour and then go back home. You can remember Baba wherever you are. Sundays are a holiday. Sit for two to three hours in the morning and make up (build up) your income for the whole day. Completely fill your aprons. You do have time, do you not? When storms of Maya come, you are unable to remember Baba. Everything Baba tells you is very easy. On the path of devotion, they go to so many satsangs. They go to a Krishna Temple and to the Shrinath Temple and then someone else’s temple. Many become adulterated even while on a pilgrimage. They face so many difficulties and they receive no benefit from it. That too is fixed in the drama and it will also happen again. This part is recorded in you souls. You will play the same parts that you played in the golden and silver ages; you will play the same parts that you played in the previous cycle. Those with gross intellects cannot understand this. Those who have refined intellects are able to understand everything very well and explain to others. They feel inside that this drama is eternal. No one in the world understands that this is an unlimited play. It takes time to understand it. Everything is explained to you in detail and then you are told that the main thing is the pilgrimage of remembrance. “Liberation-in-life in a second has been remembered. There is also the praise that He is the Ocean of Knowledge and that even if you made a whole ocean into ink and all the forests into pens and the earth into paper, there could still be no end to this knowledge. From the beginning, you have been writing so much and, if you continued to write, how much paper would be used? You don’t have to stumble around. The main thing is Alpha. Remember the Father. You come here to Shiv Baba. Shiv Baba enters this one and teaches you with so much love. He does not have any external show. The Father says: I enter an old body. Look how simply Shiv Baba comes and teaches us. He has no arrogance. The Father says: You have been inviting Me to come into the impure world and an impure body, to come and give you teachings. You don’t invite Me to come in the golden age and sit in palaces studded with diamonds and jewels and offer Me food. Shiv Baba doesn’t eat anything. Previously, you used to invite Him to come and eat. You used to offer Him 36 varieties of food. That too will happen again. This can be called the divine activities. What divine activities could Krishna have? He is a prince of the golden age. He would not be called the Purifier. You now know how he became the master of the golden-aged world. Human beings are in total darkness. You are now in total light. The Father comes and changes night into day. You rule for half the cycle. Therefore, you should be very happy. Your pilgrimage of remembrance will come to an end when none of your physical organs deceive you. When you reach your karmateet stage, your pilgrimage of remembrance will come to an end. You have not completed it yet. You now have to make full effort and not become disheartened. Just continue to do service and nothing but service. The Father has come and is also serving through this old body, is He not? The Father is Karankaravanhar. He has so many concerns for the children: I have to do this; I have to build a house. Just as a worldly father has thoughts about everything limited, in the same way, the Father from beyond this world has thoughts about everything unlimited. You children have to do service. Day by day, everything is becoming easier. The closer you come to destruction, the more strength you will continue to receive. It has been remembered that the arrows struck Bhishampitamay and others at the end. If the arrows were to strike them now, there would be so much chaos. There would be such big crowds, don’t even ask! There would be so many that you would not even have time to scratch your head. It is not like that now. However, when the big crowds come, it will then be said to be like that. Your impact will spread when the arrows strike them. All the children definitely have to receive the Father’s introduction. You can even open this imperishable hospital cum Godly university on three square feet of land. It does not matter if you don’t have any money. You will be given pictures. Everything has to be tolerated in service: regard and disregard, happiness and sorrow, heat and cold. All of that has to be tolerated. To make anyone become like a diamond is no small thing. Does the Father ever become tired? Why do you become tired? Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Study for half an hour or three-quarters of an hour early in the morning with a lot of love and interest. Stay in remembrance of the Father. Make such effort for remembrance that all your physical organs are brought under your control.
  2. Everything has to be tolerated in service: regard and disregard, happiness and sorrow, heat and cold etc. Never become tired of doing service. Open a hospitalcumuniversity on three square feet of land and do the service of making others into diamonds.
Blessing: May you be a living lighthouse and show the path to all souls with the light of all powers.
If you always stay in the awareness of being a soul from the supreme abode who has incarnated for the service of world benefit, then the thoughts you have and the words you speak will have world benefit merged in them. This awareness will then work like a lighthouse. Just as light of one colour emerges from a lighthouse, in the same way, the light of all powers from you living lighthouses will continue to work to show all souls the path at every step.
Slogan: As well as love and co-operation, also become a form of power and you will claim a number ahead in the kingdom.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 9 JULY 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 9 July 2019

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09/07/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you have to return home on time. Therefore, increase the speed of your remembrance. Forget this land of sorrow and remember the land of peace and the land of happiness.
Question: What deep secret should you tell people so that there is upheaval created in their intellects?
Answer: Tell them the deep secret of a soul being a tiny point and having a part recorded in him forever and how he continues to play his part. A soul never gets tired. No one can receive eternal liberation. When people see a lot of sorrow, they say that it would be better if they were to receive eternal liberation. However, imperishable souls cannot remain without playing their parts. On hearing this aspect, there will be upheaval in their intellects.

Om shanti. The Father explains to you sweetest, spiritual children. Here, you are spiritual children. Every day the Father explains that poor people in this world truly do have a lot of sorrow. When there are floods, it is the poor who experience sorrow. Just look what becomes of their belongings etc.! They feel sorrow about that; there is limitless sorrow. The wealthy have happiness, but that is for a temporary period. Even wealthy ones also fall ill. Many deaths take place too: Today, so-and-so died. Today, this happened. Today, someone is a President, and tomorrow, he would have to leave that position; they all surround him and make him get off his position. There is sorrow about that too. Baba has told you to make a list of the types of sorrow there are in this land of sorrow. You children know the land of happiness, whereas the world doesn’t know anything. They cannot compare the land of sorrow with the land of happiness. The Father says: You know everything. They will believe that you really do tell the truth. Here, some have huge houses, aeroplanes etc. and they believe that the iron age will still continue for another 40,000 years and that the golden age will come after that. They are in extreme darkness. You now have to bring them closer. There is little time left. There is a vast difference between them saying that it is hundreds of thousands of years and you proving that it is only 5000 years. The cycle repeats after 5000 years. The drama would not be hundreds of thousands of years. You understand that everything that happens, happens within 5000 years. So, here, in the land of sorrow, there are illnesses etc. You can just write a few main things. There is no mention of sorrow in heaven. The Father explains: Death is now just ahead. The same episode of the Gita is now taking place. The golden age will definitely be established at the confluence age. The Father says: I make you into the kings of kings. Therefore, He would definitely make you into kings of the golden age. Baba explains everything very well. We are now going to the land of happiness. The Father has to take us. Only those who constantly remember Me attain a high status. Baba continues to show you many methods for that. Increase your speed of remembrance. Everyone has to go to the kumbha mela on time. You too have to go on time. It isn’t that you can arrive there sooner. No, it is not in your hands to go there sooner. It is fixed in the drama. All the praise is of the drama. There are so many types of insects, germs etc. that cause sorrow. They don’t exist in the golden age. You should think about the things that will exist there. You remember the golden age, do you not? The Father establishes the golden age. At the end, your intellects will have all the knowledge in a nutshell. For instance, a seed is so small whereas the tree is so big. Those are non-living things whereas this is living. No one knows about this tree. They have made the duration of the cycle very long. It is Bharat that has a lot of happiness and Bharat that has a lot of sorrow. There are also more illnesses in Bharat. Here, people die like mosquitoes because their lifespans are short. There is so much difference between cleaners here and cleaners abroad. All the inventions come here from abroad. The very name of the golden age is Paradise. There, everyone is satopradhan. You will have visions of everything. This is now the confluence age when the Father sits here and explains to you. He will continue to explain to you. He will continue to tell you new things. The Father says: Day by day, I tell you deep things. Previously, you didn’t know that Baba was such a tiny point and that He has a whole part recorded in Him forever. You have been continually playing your parts. If you were to tell someone this, his intellect would be in upheaval: What are you saying? Such a tiny point has such a big part recorded in him and he continues to play it and yet never gets tired! No one knows about this. You children now continue to understand that there is happiness for half the cycle and sorrow for half the cycle. When people see a lot of sorrow, they say: It would be better for us to have eternal liberation than this. You would not say this when you are in happiness or in peace. Your intellects now have all of this knowledge, just as the Father has all the knowledge of the tree in Him because He is the Seed. The model of the tree has been shown. You cannot show it in that very large form. All the knowledge enters your intellects. So, you children should have broad and unlimited intellects. So much has to be explained to you. So-and-so comes again after such-and-such a period to play his part. This is such a great, huge drama. No one can watch the whole drama; it is impossible. Good things are seen with divine vision. Ganesh, Hanuman belong to the path of devotion, but some people have that faith in them and so they are unable to renounce them. You children now have to make effort. In order to attain a status as you did in the previous cycle, you have to study. You know that each one has to take rebirth. You children now know how you have come down the ladder. Those who know this will begin to explain to others. You would have done the same in the previous cycle. You would have created museums like this and explained to the children in the previous cycle too. You continue to make effort and will continue to do so. It is fixed in the drama. Later, there will be many places like this. There will be a school in every street and in every home; it is just a matter of having dharna. Tell them: You have two fathers. Which one is greater? People call out to Him: Have mercy! Give blessings! The Father says: You will not receive anything by asking for it. I have shown you the path. I come only to show you the path. You have the whole tree in your intellects. The Father continues to make so much effort. There is very little time left. I need serviceable children. I need a Gita Pathshala in every home. You don’t have to keep any other pictures, but simply write this outside. In terms of the pictures, just this badge is enough. It is this badge that will be useful to you at the end. It is a matter of just a signal. You know that the unlimited Father will definitely create heaven. So, it is only when you remember the Father that you will go to heaven. You understand that you are impure and that it is only by having remembrance that you will become pure. There is no other way. Heaven is the pure world. If you want to become a master of heaven, you definitely do have to become pure. How can those who are going to go to heaven choke in hell? This is why you are told: Manmanabhav! Remember the unlimited Father and your final thoughts will lead you to your destination. Those who are to go to heaven will not indulge in vice. Devotees do not indulge much in vice. Sannyasis will not ask you to become pure because they themselves also carry out marriage ceremonies. They tell householders: You can indulge in vice once a month. They would not tell those who wish to remain celibate that they must not get married. Some people here have a pure marriage, but the next day the game is over! Maya has a great deal of attraction. It is at this time that you make effort to become pure; then you have the reward. There is no kingdom of Ravan there. There are no criminalthoughts there. It is Ravan who makes you criminal. Shiv Baba makes you civil. You have to remember this too. When a class is conducted in every home, everyone will begin to explain. You have to create a Gita Pathshala in every home and reform those in your home. Expansion will continue to take place in this way. Ordinary ones and poor ones are like equals. Eminent people feel embarrassed to come to the spiritual gatherings of ordinary people, because they have heard that there is magic here and that you convert everyone into brothers and sisters. Ah, but that is good! There are so many complications in a household. They become so unhappy. This is the world of sorrow. There is limitless sorrow and then there will be limitless happiness there. You should try to make a list. Make a list of 25 to 30 main types of sorrow. In order to receive the inheritance from the unlimited Father, you have to make so much effort. The Father is explaining to us through this chariot. This Dada too is a student. Bodily beings are all students and the Teacher who is teaching you is bodiless. He makes you bodiless too. Therefore, the Father says: Continue to renounce any consciousness of the body. None of these buildings etc. will remain. There, you will receive everything new. At the end you will have many visions. You know that there will be a lot of destruction abroad with atomic bombs, whereas here, there will be rivers of blood. That takes time. Death here is very bad. This is the imperishable land. You can see on a map that Hindustan is just in a tiny corner. According to the drama, things there don’t have any effect here. Rivers of blood will flow here. They are now making preparations. It is possible that, at the end, they will even give bombs here on loan. However, they would not loan bombs that would destroy the world when you release them! They would give low quality bombs. You wouldn’t give others something that is useful to you. Destruction will take place as it did in the previous cycle. It is not anything new. Innumerable religions will be destroyed and the one religion established. The land of Bharat is never destroyed. Some will remain. If everyone were to die, annihilation would take place. Day by day, your intellects are becoming broad and unlimited and you will have a lot of regard. You don’t have that much regard at present and this is why so few of you pass. It doesn’t enter your intellects that there will be so much punishment and that you will also come later on. When you fall, everything you have earned is lost and you become uglier than ugly; you cannot then rise again. So many have gone and so many are still to go. You can understand for yourself what your condition would be if you were to leave your body now. This is something to be understood. The Father says: You children are the ones who establish peace. If you have peacelessness in you, your status would be destroyed. There is no need to cause sorrow for anyone. The Father speaks to everyone with so much love, saying, “Child, child!” He is the unlimited Father. He has the knowledge of the whole world and this is why He explains it to you. There are so many types of sorrow in this world. You can write many things about sorrow. When you prove this, people will understand that this is absolutely accurate. No one except the Father can remove this limitless sorrow. If you have a list of the types of sorrow, something will sit in people’s intellects. Otherwise, they listen to something and then forget it. For such people, it is remembered: What do sheep know of the celestial sounds of heaven? The Father explains: You children have to become beautiful. There shouldn’t be any peacelessness or dirt. Those who spread peacelessness are body conscious. Remain distant from them. You mustn’t even touch them. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Just as the Teacher who is teaching you is bodiless and doesn’t have any consciousness of bodies, become bodiless in the same way. Continue to renounce any consciousness of bodies. Change your criminal eye and make it civil.
  2. Make your intellect broad and unlimited. In order to be liberated from punishment, have regard for the Father and the study. Never cause sorrow. Do not spread peacelessness.
Blessing: May you be an angelic form while walking and moving around and enable others to experience rays of the eight powers from you.
When you place very expensive, flawless diamonds in front of a light, you see various colours. In the same way, when your form becomes angelic, others will experience rays of the eight powers from you as you walk and move along. Some will receive the feeling of tolerance from you, some will have the feeling of the power of taking decisions, some will receive the feeling of one power and others of another power.
Slogan: “Practical proof means someone whose every act inspires others.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 9 JULY 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 9 July 2019

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09-07-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम्हें टाइम पर अपने घर वापस जाना है इसलिए याद की रफ्तार को बढ़ाओ, इस दु:खधाम को भूल शान्तिधाम और सुखधाम को याद करोˮ
प्रश्नः- कौन-सा एक गुह्य राज़ तुम मनुष्यों को सुनाओ तो उनकी बुद्धि में हलचल मच जायेगी?
उत्तर:- उन्हें गुह्य राज़ सुनाओ कि आत्मा इतनी छोटी बिन्दी है, उसमें फार एवर पार्ट भरा हुआ है, जो पार्ट बजाती ही रहती है। कभी थकती नहीं। मोक्ष किसी को मिल नहीं सकता। मनुष्य बहुत दु:ख देखकर कहते हैं मोक्ष मिले तो अच्छा है, लेकिन अविनाशी आत्मा पार्ट बजाने के बिना रह नहीं सकती। इस बात को सुनकर उनके अन्दर हलचल मच जायेगी।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों को बाप समझाते हैं, यहाँ तो हैं रूहानी बच्चे। बाप रोज़-रोज़ समझाते हैं बरोबर इस दुनिया में गरीबों को कितना दु:ख है, अभी यह फ्लड्स आदि होती हैं तो गरीबों को दु:ख होता है, उनके सामान आदि का क्या हाल हो जाता है। दु:ख तो होता है ना! अपार दु:ख हैं। साहूकारों को सुख हैं परन्तु वह भी अल्पकाल के लिए। साहूकार भी बीमार पड़ते हैं, मृत्यु भी बहुत होती है – आज फलाना मरा, आज यह हुआ। आज प्रेजीडेंट है, कल गद्दी छोड़नी पड़ती है। घेराव कर उनको उतार देते हैं। यह भी दु:ख होता है। बाबा ने कहा है दु:खों की भी लिस्ट निकालो, किस-किस प्रकार के दु:ख हैं – इस दु:खधाम में। तुम बच्चे सुखधाम को भी जानते हो, दुनिया कुछ भी नहीं जानती। दु:खधाम सुखधाम की भेंट वह नहीं कर सकते। बाप कहते हैं तुम सब कुछ जानते हो, यह मानेंगे कि बरोबर कहते सच हैं। यहाँ जिसको बड़े-बड़े मकान हैं, एरोप्लेन आदि हैं, वह समझते हैं कलियुग को अजुन 40 हज़ार वर्ष चलना है। बाद में सतयुग आयेगा। घोर अन्धियारे में हैं ना। अब उन्हों को नज़दीक ले आना है। बाकी थोड़ा समय है। कहाँ लाखों वर्ष कहते हैं, कहाँ तुम 5 हज़ार वर्ष सिद्ध कर बतलाते हो। यह 5 हज़ार वर्ष के बाद चक्र रिपीट होता है। ड्रामा कोई लाखों वर्ष का थोड़ेही होगा। तुम समझ गये हो जो कुछ होता है वह 5 हज़ार वर्ष में होता है। तो यहाँ दु:खधाम में बीमारियाँ आदि सब होती हैं। तुम तो मुख्य थोड़ी बातें लिख दो। स्वर्ग में दु:ख का नाम भी नहीं। अब बाप समझाते हैं मौत सामने खड़ा है, यह वही गीता का एपीसोड चल रहा है। जरूर संगमयुग पर ही सतयुग की स्थापना होगी। बाप कहते हैं कि मैं राजाओं का राजा बनाता हूँ तो जरूर सतयुग का बनायेगा ना। बाबा अच्छी रीति समझाते हैं।

अब हम जाते हैं सुखधाम। बाप को ले जाना पड़े। जो निरन्तर याद करते हैं वही ऊंच पद पायेंगे, उसके लिए बाबा युक्तियां बतलाते रहते हैं। याद की रफ्तार बढ़ाओ। कुम्भ के मेले पर भी टाइम पर जाना होता है। तुमको भी टाइम पर जाना है। ऐसे नहीं कि जल्दी-जल्दी जाकर पहुँचेंगे। नहीं, यह जल्दी-जल्दी करना अपने हाथ में नहीं है। यह तो है ही ड्रामा की नूँध। महिमा सारी ड्रामा की है। यहाँ कितने जीव जन्तु आदि दु:ख देने वाले हैं। सतयुग में यह होते नहीं। अन्दर ख्याल करना चाहिए – वहाँ यह-यह होगा। सतयुग तो याद आता है ना। सतयुग की स्थापना बाप करते हैं। पिछाड़ी में सारा नटशेल में ज्ञान बुद्धि में आ जाता है। जैसे बीज कितना छोटा, झाड़ कितना बड़ा है। वह तो हैं जड़ चीजें, यह है चैतन्य। इनका किसको पता नहीं है, कल्प की आयु लम्बी-चौड़ी कर दी है। भारत ही बहुत सुख पाता है तो दु:ख भी भारत ही पाता है। बीमारियाँ आदि भी भारत में अधिक हैं। यहाँ मच्छरों सदृश्य मनुष्य मरते हैं क्योंकि आयु छोटी है। यहाँ के सफाई करने वालों और विलायत के सफाई करने वालों में कितना फ़र्क है। विलायत से सारी इन्वेन्शन यहाँ आती है। सतयुग का नाम ही पैराडाइज़ है। वहाँ सब सतोप्रधान हैं। तुमको सब साक्षात्कार होंगे। यह है अब संगमयुग जबकि बाप बैठ समझाते हैं, समझाते रहेंगे, नई-नई बातें सुनाते रहेंगे। बाप कहते हैं दिन-प्रतिदिन गुह्य-गुह्य बातें सुनाता हूँ। आगे थोड़ेही पता था, बाबा इतनी बिन्दी है, उनमें सारा पार्ट भरा हुआ है फार एवर। तुम पार्ट बजाते आये हो, तुम किसको भी बताओ तो बुद्धि में कितनी हलचल हो जायेगी कि यह क्या कहते हैं, इतनी छोटी बिन्दी में सारा पार्ट भरा हुआ है, जो बजाते ही रहते, कब थकते नहीं हैं! किसको भी पता नहीं। अभी तुम बच्चों को समझ पड़ती जाती है कि आधा-कल्प है सुख, आधाकल्प है दु:ख। बहुत दु:ख देख कर ही मनुष्य कहते हैं – इससे तो मोक्ष पा लें। जब तुम सुख में, शान्ति में होंगे, वहाँ थोड़ेही ऐसे कहेंगे। यह सारी नॉलेज अभी तुम्हारी बुद्धि में है। जैसे बाप बीज होने कारण उसके पास सारे झाड़ की नॉलेज है। झाड़ का मॉडल रूप दिखाया है। बड़ा थोड़ेही दिखा सकते। बुद्धि में सारी नॉलेज आ जाती है। तो तुम बच्चों की कितनी विशाल बुद्धि होनी चाहिए। कितना समझाना पड़ता है, फलाने-फलाने इतने समय बाद फिर आते हैं पार्ट बजाने, यह कितना बड़ा ह्यूज़ ड्रामा है। यह सारा ड्रामा तो कभी कोई देख भी न सके। इम्पॉसिबुल है। दिव्य दृष्टि से तो अच्छी चीज़ देखी जाती है। गणेश, हनूमान यह सब हैं भक्ति मार्ग के। परन्तु मनुष्यों की भावना बैठी हुई है तो छोड़ नहीं सकते। अब तुम बच्चों को पुरूषार्थ करना है, कल्प पहले मिसल पद पाने के लिए पढ़ना है। तुम जानते हो पुनर्जन्म तो हर एक को लेना ही है। सीढ़ी कैसे उतरे हैं, यह तो बच्चे जान गये हो। जो खुद जानते हैं वह औरों को भी समझाने लग पड़ेंगे। कल्प पहले भी यही किया होगा। ऐसे ही म्यूजियम बनाकर कल्प पहले भी बच्चों को सिखाया होगा। पुरूषार्थ करते रहते हैं, करते रहेंगे। ड्रामा में नूँध है। ऐसे तो ढेर हो जायेंगे। गली-गली घर-घर में यह स्कूल होगा। है सिर्फ धारणा करने की बात। बोलो तुम्हारे दो बाप हैं, बड़ा कौन ठहरा? उनको ही पुकारते हैं रहम करो। कृपा करो। बाप कहते है मांगने से कुछ भी नहीं मिलेगा। हमने तो रास्ता बता दिया है। मैं आता ही हूँ रास्ता बताने। सारा झाड़ तुम्हारी बुद्धि में है।

बाप कितनी मेहनत करते रहते हैं। बाकी बहुत थोड़ा टाइम बचा है। मुझे सर्विसएबुल बच्चे चाहिए। घर-घर में गीता पाठशाला चाहिए। और चित्र आदि न रखो सिर्फ बाहर में लिख दो। चित्र तो यह बैज ही बस है। पिछाड़ी में यह बैज ही तुमको काम में आयेगा। ईशारे की बात है। मालूम पड़ जाता है बेहद का बाप जरूर स्वर्ग ही रचेंगे। तो बाप को याद करेंगे तब तो स्वर्ग में जायेंगे ना। यह तो समझते हो हम पतित हैं, याद से ही पावन बनेंगे और कोई उपाय नहीं। स्वर्ग है पावन दुनिया, स्वर्ग का मालिक बनना है तो पावन जरूर बनना है। स्वर्ग में जाने वाले फिर नर्क में गोते कैसे खायेंगे इसलिए कहा जाता है मनमनाभव। बेहद के बाप को याद करो तो अन्त मती सो गति होगी। स्वर्ग में जाने वाले विकार में थोड़ेही जायेंगे। भक्त लोग इतना विकार में नहीं जाते। सन्यासी भी ऐसे नहीं कहेंगे पवित्र बनो क्योंकि खुद ही शादियां कराते हैं। वे गृहस्थियों को कहेंगे – मास-मास में विकार में जाओ। ब्रह्मचारियों को ऐसे नहीं कहेंगे कि तुम्हें शादी नहीं करना है। तुम्हारे पास गन्धर्वी विवाह करते हैं फिर भी दूसरे दिन खेल खलास कर देते। माया बहुत कशिश करती है। तो भी पवित्र बनने का पुरूषार्थ इस समय ही होता है, फिर है प्रालब्ध। वहाँ तो रावण राज्य ही नहीं। क्रिमिनल ख्यालात ही नहीं होती। क्रिमिनल रावण बनाता है। सिविल शिवबाबा बनाते हैं। यह भी याद करना है। घर-घर में क्लास होगा तो सब समझाने वाले बन पड़ेंगे। घर-घर में गीता पाठशाला बनाए घर वालों को सुधारना है। ऐसे वृद्धि होती रहेगी। साधारण और गरीब, वह जैसे हमजिन्स ठहरे। बड़े-बड़े आदमियों को छोटे-छोटे आदमियों के सतसंग में आने में भी लज्जा आयेगी क्योंकि सुना है ना जादू है, भाई-बहन बनाती हैं। अरे, यह तो अच्छा है ना। गृहस्थी में कितने झंझट होते हैं। फिर कितना दु:खी होते हैं। यह है ही दु:ख की दुनिया। अपार दु:ख हैं फिर वहाँ सुख भी अपार होगा। तुम कोशिश करो लिस्ट बनाने की। 25-30 मुख्य-मुख्य दु:ख की बातें निकालो।

बेहद के बाप से वर्सा पाने के लिए कितना पुरूषार्थ करना चाहिए। बाप इस रथ द्वारा हमको समझाते हैं, यह दादा भी स्टूडेन्ट है। देहधारी सब स्टूडेन्ट हैं। टीचर पढ़ाने वाला है विदेही। तुमको भी विदेही बनाते हैं इसलिए बाप कहते हैं शरीर का भान छोड़ते जाओ। यह मकान आदि कुछ भी नहीं रहेगा। वहाँ सब कुछ नया मिलना है, पिछाड़ी में तुमको बहुत साक्षात्कार होंगे। यह तो जानते हो उस तरफ विनाश बहुत हो जायेगा, एटॉमिक बाम्बस से। यहाँ के लिए है रक्त की नदियां, इसमें टाइम लगता है। यहाँ का मौत बड़ा खराब है। यह अविनाशी खण्ड है, नक्शे में देखेंगे हिन्दुस्तान तो एक जैसे कोना है। ड्रामा अनुसार यहाँ उनका असर आता ही नहीं है। यहाँ रक्त की नदियां बहती हैं। अभी तैयारियां कर रहे हैं। हो सकता है पिछाड़ी में इनको बॉम्ब्स भी लोन देंगे। बाकी वह बाम्ब्स जो फेंकने से ही दुनिया खत्म हो जाए, वह थोड़ेही लोन पर देंगे। हल्की क्वालिटी के देंगे। काम की चीजें थोड़ेही किसको दी जाती है। विनाश तो कल्प पहले मिसल हो ही जाना है। नई बात नहीं। अनेक धर्म विनाश, एक धर्म की स्थापना। भारत खण्ड कभी विनाश को नहीं पाता है। कुछ तो बचने ही हैं। सब मर जाएं फिर तो प्रलय हो जाए। दिन-प्रतिदिन तुम्हारी बुद्धि विशाल होती जायेगी। तुमको बहुत रिगॉर्ड रहेगा। अभी इतना रिगॉर्ड थोड़ेही है तब तो कम पास होते हैं। बुद्धि में आता नहीं है, कितनी सजायें खानी पड़ेंगी फिर आयेंगे भी देरी से। गिरते हैं तो फिर की कमाई चट हो जाती है। काले के काले बन जायेंगे। फिर वह खड़े हो न सकें। कितने जाते हैं, कितने जाने वाले भी हैं। खुद भी समझ सकते हैं इस हालत में शरीर छूट जाए तो हमारी क्या गति होगी। समझ की बात है ना। बाप कहते हैं तुम बच्चे हो शान्ति स्थापन करने वाले, तुम्हारे में ही अशान्ति होगी तो पद भ्रष्ट हो जायेगा। किसको भी दु:ख देने की दरकार नहीं है। बाप कितना प्यार से सबको बच्चे-बच्चे कहकर बात करते हैं। बेहद का बाप है ना। सारी दुनिया की इसमें नॉलेज है तब तो समझाते हैं। इस दुनिया में कितने प्रकार के दु:ख हैं। ढेर दु:ख की बातें तुम लिख सकते हो। जब तुम यह सिद्ध कर बतायेंगे तो समझेंगे कि यह बात तो बिल्कुल ठीक है। यह अपार दु:ख तो सिवाए एक बाप के और कोई दूर कर नहीं सकते। दु:खों की लिस्ट होगी तो कुछ न कुछ बुद्धि में बैठेगा। बाकी तो सुना-अनसुना कर देंगे, उनके लिए ही गाया जाता है, रिढ (भेड़) क्या जाने साज़ से……. बाप समझाते हैं तुम बच्चों को ऐसा गुल-गुल बनना है। कोई अशान्ति, गंदगी नहीं होनी चाहिए। अशान्ति फैलाने वाले देह-अभिमानी ठहरे, उनसे दूर रहना है। छूना भी नहीं है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) जैसे पढ़ाने वाला टीचर विदेही है, उसे देह का भान नहीं, ऐसे विदेही बनना है। शरीर का भान छोड़ते जाना है। क्रिमिनल आई को बदल सिविल आई बनानी है।

2) अपनी बुद्धि को विशाल बनाना है। सजाओं से छूटने के लिए बाप का वा पढ़ाई का रिगॉर्ड रखना है। कभी भी दु:ख नहीं देना है। अशान्ति नहीं फैलानी है।

वरदान:- चलते-फिरते अपने द्वारा अष्ट शक्तियों की किरणों का अनुभव कराने वाले फरिश्ता रूप भव
जो बहुत कीमती मूल्यवान बेदाग डायमण्ड होता है उसे लाइट के आगे रखो तो भिन्न-भिन्न रंग दिखाई देते हैं। ऐसे जब आप फरिश्ता रूप बनेंगे तो आप द्वारा चलते-फिरते अष्ट शक्तियों के किरणों की अनुभूति होगी। कोई को आपसे सहनशक्ति की फीलिंग आयेगी, कोई को निर्णय करने के शक्ति की फीलिंग आयेगी, कोई से क्या, कोई से क्या शक्तियों की फीलिंग आयेगी।
स्लोगन:- प्रत्यक्ष प्रमाण वह है जिसका हर कर्म सर्व को प्रेरणा देने वाला है।

TODAY MURLI 9 JULY 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 9 July 2018

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09/07/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you have come to this spiritual university to change from buddhus (foolish ones) to wise. Wise means pure. You are now studying this study to become pure.
Question: What are the main signs of wise children?
Answer: Wise children constantly play with knowledge. They are always intoxicated in Godly intoxication. All the knowledge of the world cycle is in their intellects. They have the intoxication: Our Baba has come from the supreme abode for us and we resided with Him in the supreme abode. Our Baba is the Ocean of Knowledge and we have become master oceans of knowledge. He has come to give us the inheritance of liberation and liberation-in-life.
Song: Who has come to the door of my heart?

Om shanti. The soul of the living being knows that our Supreme Father, the Supreme Soul, is personally teaching us; He is teaching us Raja Yoga. Therefore, it is as though this is a Godly U niversity. Why is it called a university? It isn’t that all other universities are for the universe. No. That is not for the universe , so it shouldn’t be called a university. Here, you children know that this is the true Godly University. However, none of them can understand this because they are buddhus. Only the Father makes buddhus wise. Human beings bow down in front of those who are wise. They bow down to the deity idols and sannyasis etc. Sannyasis are pure, and so they are definitely wise. They consider purity to be good. This vice of lust causes distress for human beings. This is why householders consider sannyasis who remain pure to be wise and bow down at their feet. As soon as they see someone wearing the costume of a sannyasi, they instantly bow down to him. However, regard for them has now decreased and this is why people take every step with great caution. Previously, when they saw a sannyasi, they would instantly invite him: Swamiji, come to our house. There are now too many of them and they have now become tamopradhan, and this is why there is only regard for those who are very well known. Even eminent people bow down to them. Why? Those eminent people are more educated than sannyasis, but sannyasis are pure because they have adopted renunciation and that is why they are considered to be wise. You are now becoming wise. You now know the Creator and the beginning, middle and end of creation. However, among you too, not all of you have that intoxication. It takes a lot of timefor that intoxication to rise. Only at the end will there will be complete intoxication. Now, the more effort you make, the more your intoxication continues to rise. You should constantly remember that the Supreme Soul, the Father of us souls, has come. He is teaching us in order to make us into the masters of the world. Therefore, you should have the pure concern to make effort. Not all of you have that concern. At the time of listening to this, their intoxication rises but as soon as they go outside, everything ends; it is numberwise. The Father of us souls has come. We used to reside with Him in the supreme abode. No one else understands this. Sages and sannyasis etc. are pure. You, too, are numberwise. Not everyone has the faith that our Supreme Father, the Supreme Soul, is the Ocean of Knowledge, the Bestower of Liberation-in-Life and that He is making us into the masters of heaven. As soon as you step outside of here, that happiness disappears. Otherwise, you children should have so much happiness. I have taken the support of this body. How else would I teach you Raja Yoga? I don’t have a body of My own. If you look at all of those in the temples, they all have their own bodies, whereas I am bodiless. All others have received an angelic or corporeal body. I don’t have a body. There is the Somnath Temple and even if you go to the Shiva temples, they have incorporeal forms there. It is just that they have given Him different names. You know that souls come here from the supreme abode. Souls adopt different bodies and play their part s. I do not enter this cycle of 84 births. I am the Resident of the supreme abode. I have entered this body. You would ask, “How does the incorporeal One come?” Yes, He can come. When you feed a departed soul, that soul comes, does he not? The body of that soul doesn’t come. The soul enters another body. You understand that the soul enters another person’s body. The souls of some ghosts are very mischievous; they throw stones etc. Only when a soul enters a body can he do something. That is called a ghost. Impure souls also enter others. You children have experienced how impure souls wander around until they receive their own bodies. Pure souls also come; this too is fixed in the drama. Whatever has passed is said to be the playing of the drama. The Father explains: I come and enter an ordinary old body. He would definitely need the body of an experienced person. Brahma’s name is very well known and Brahma’s advice is also well known. Where did Brahma receive advice from? Brahma is Shiv Baba’s child. So His advice is shrimat, and so the main shrimat has to be through Brahma, whom the Father enters. The people of Bharat don’t know these things. They think that all are One. They believe that Krishna, Shiva etc. are all the same. They call Krishna mahatma or yogeshwar, but they don’t know why they call him that. The Krishna soul is now studying yoga with Ishwar (Lord – title of Shiva) and becoming yogeshwar (lord of yoga). This is such an incognito secret. People say that God is beyond name and form and that He doesn’t have a body. However, you say that the Somnath Temple is a memorial of the incarnation of Shiva. Shiv Baba surely came in the previous cycle and He has now come again. Then the worship of Him will start in the copper age. People celebrate Shiv Ratri (Night of Shiva). The Father sits here and explains: You souls came here from the supreme abode to play your part s. Souls are imperishable and they have part s of 84 births recorded in them. Just as the Father has entered an old body, in the same way, you are also in old bodies. Baba liberates you from your old bodies and gives you new bodies. He shows you the way to change from being worthless shells into valuable diamonds. It is sung: The Beloved is only One. The Father says: I am the Resident of the supreme abode. You too are residents of the supreme abode. I have come in the oldest body of all. Those are also your oldest impure bodies of the final 84th birth. You consider yourselves to be souls. We have completed our 84 births and we are now to receive new bodies in the new world. Therefore, you should remain so happy. It is numberwise: some are completely dull headed. Maya has completely turned their intellects to stone. It is like when you sprinkle water on a hot griddle and it instantly dries up; they are such hot griddles. Oh! but you just have to consider yourself to be a soul, a child of the Father. However, they do not consider themselves to be this. If souls do consider themselves to be this, why do they become those who are amazed and then run away? Maya is very powerful. If you make a mistake, Maya will slap you. Oh! Baba has come to give you the inheritance, and yet you become vicious. She slaps you very strongly. The Father does not slap you. Maya slaps you and turns your face away. There are many who continue to be slapped by Maya. Maya also says: You don’t remember the Father and so I slap you. Maya has been given the order. Those who are without wisdom have to be made wise. Therefore, why don’t you do service? Are you still going to experience the slipper from Maya? Many continue to experience the slipper. Some experience the slipper of anger and some experience the slipper of attachment. The Father says: Just surrender everything and live like a trustee. When you have donated the vices, why do you take them back and use them again? Vices don’t have a form. Regarding your money, you are told to live like a trustee. You may use it, but with great care and with the Father’s shrimat. You mustn’t commit any sin with that money. Otherwise, you will accumulate the burden of that on your head. Maya is very tamopradhan and she knows when you are not remembering the Father very well and so she thinks: Punch that one! Maya says: If you don’t remember the Father or your inheritance, I will slap you. Many children write: Baba, Maya slapped me. Baba writes back: Yes children, Maya has been given an order: Slap them a great deal when they do not belong to Me. I have come to make you constantly happy but, in spite of that, you children don’t remember Me. It is very easy but it does take time. Otherwise, the mercury of happiness would rise by your remembering the Father and the inheritance. Eventually, while remembering Baba, you will just feel a little jerk and: OK, I am now going to Baba. Then I will go to heaven. It will be as though you just have complete Godly intoxication and go back home. Achcha, no one knows that souls are lovers of the Supreme Father, the Supreme Soul. You are true lovers. You have been lovers for half the cycle and have been remembering the Beloved a great deal. However, you didn’t know that souls are lovers of the Supreme Father, the Supreme Soul. They say that the soul is the Supreme Soul and that the Supreme Soul is the soul. Here, there is a great difference. You know that God is the Beloved. That pure s oul is making us so beautiful. When we souls became dirty, the jewellery (body) also became dirty. Baba has come once again to make you beautiful and you will then receive a goldenaged body. They mix alloy into gold. Now, just see – that is the Adi Dev temple. Someone has named him, “Mahavir”, but they don’t know the meaning of that at all. They even call Hanuman, “Mahavir”. There is such a vast difference between calling Hanuman “Mahavir” and then calling Adi Dev, “Mahavir”. Whatever the Jain Maharaj Muni said, that continued to be accepted. Nowadays, there is a lot of occult power. This Baba knows everything. People make a lot of effort. They even make saffron emerge from their hands. People think that that is a wonder and quickly become their followers. Those who have occult powers have many followers. It is not like that here. Baba says: I have come exactly as I did 5000 years ago. No one else can say this. Children say: Baba, we came 5000 years ago and attained the inheritance of heaven from You. We have now come once again and become the children of the Supreme Father, the Supreme Soul, Shiva, through this Brahma. The world is in the iron age. Where would Brahmins come from in the iron age? Brahmins are needed at the confluence age. The feet and the topknot come together, and so that is a confluence: the confluence of shudras and Brahmins. You change from shudras into Brahmins. No one knows this cycle of 84 births. You know that you are Brahmins and that you have become the children of Brahma in a practical way. You can tell those brahmins: You brahmins call yourselves children of Brahma, but who is the Father of Brahma? They won’t be able to tell you. It is like pebbles in atin can. They would simply say: We brahmins are God. All of you were devotees and you now say: We are becoming worthy of marrying Lakshmi. You are making effort for this. For instance, just remember that you came from the supreme abode. Baba has now come once again to take us back. We too are the masters of Brahmand. Baba has entered an old body. We too are in old bodies. The Father says: I also have to take an old body. Now remember Me, the Father, and your sins will be absolved. He gives you time. You have to serve the Pandava Government for a minimum of eight hours. You also have to teach Raja Yoga, blow the conch shell. You make Bharat in particular and the world in general into heaven with shrimat. Only you go to heaven; those of other religions do not go there. Brahmins, deities, warriors, merchants and shudras are called the variety-form image. You should create a picture of the variety-form image so that people are easily able to understand. They have shown Vishnu as the variety-form image. A picture is definitely needed. They have pictures in school s. Otherwise, little children would not know what an elephant is. They are shown a picture of it. So, here, there are the four ages. It is now the iron age and the cycle will definitely turn. Brahmins exist at the confluence age. The others are physical brahmins, guides. They are not the mouth-born creation of Brahma. The mouth-born creation of Brahma receive the inheritance from the Grandfather. Those brahmins don’t receive the inheritance. You, too, understand these things, numberwise. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Surrender everything with your intellect and live as a trustee. Perform every task with great caution according to shrimat.
  2. Remember Baba and the inheritance and experience limitless happiness. While in remembrance of Baba, experience Godly intoxication. Become a true lover.
Blessing: May you be a world transformer who burns the rubbish of the world with the fire of yoga.
It is only with the fire of yoga, that is, with the power of elevated thoughts and the fire of love that you can burn the rubbish of impurity. In a memorial of the goddesses, it is portrayed that they burnt the devilish powers with fire. That memorial is of the present time. So, first of all, become the form of fire and burn any devilish sanskars and nature and become completely pure and you will then be able to burn the rubbish of the world with yoga and the fire of purity and become an instrument for world transformation.
Slogan: An obedient soul is one who remains free from any dictates of the self or others and constantly follows shrimat.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 9 JULY 2018 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 9 July 2018

To Read Murli 8 July 2018 :- Click Here
09-07-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

” मीठे बच्चे – तुम इस रूहानी युनिवर्सिटी में आये हो बुद्धू से बुद्धिवान बनने , बुद्धिवान अर्थात् पवित्र , पवित्र बनने की पढ़ाई तुम अभी पढ़ते हो ”
प्रश्नः- बुद्धिवान बच्चों की मुख्य निशानी क्या होगी?
उत्तर:- बुद्धिवान बच्चे ज्ञान में सदा रमण करते रहेंगे। उन्हें मौलाई मस्ती चढ़ी हुई होगी। उनकी बुद्धि में सारे सृष्टि चक्र की नॉलेज होगी। उन्हें नशा रहता कि हमारा बाबा हमारे लिए परमधाम से आया हुआ है, हम उनके साथ परमधाम में रहते थे। हमारा बाबा ज्ञान का सागर है, हम अभी मास्टर ज्ञान सागर बने हैं। हमें वह मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा देने आये हैं।
गीत:- कौन आया मेरे मन के द्वारे…….. 

ओम् शान्ति। जीव की आत्मा जानती है कि हमारा परमपिता परमात्मा हमको सम्मुख पढ़ा रहे हैं वा राजयोग सिखला रहे हैं। तो जैसे कि यह ईश्वरीय युनिवर्सिटी ठहरी। युनिवर्सिटी इसको क्यों कहते हैं? ऐसे नहीं, और जो भी सब युनिवर्सिटीज़ हैं वह युनिवर्स के लिए हैं। नहीं। तो वह युनिवर्स के लिए तो ठहरी नहीं, इसलिए उनको युनिवर्सिटी नहीं कहेंगे। यहाँ तुम बच्चे जानते हो – यह सच्ची-सच्ची ईश्वरीय युनिवर्सिटी है। परन्तु कोई भी समझ नहीं सकते हैं क्योंकि बुद्धू हैं। बाप ही बुद्धूओं को बुद्धिवान बनाते हैं। मनुष्य बुद्धिवान के आगे माथा झुकाते हैं। देवी-देवताओं को, सन्यासियों आदि को माथा झुकाते हैं। सन्यासी पवित्र हैं तो जरूर बुद्धिवान ठहरे। पवित्रता को अच्छा मानते हैं। यह विकार ही मनुष्य को हैरान करते हैं इसलिए पवित्र रहने वाले सन्यासियों को गृहस्थी लोग बुद्धिवान समझते हैं और उनके चरणों में झुकते हैं। बस, सन्यासी लिबास देखा और झट माथा झुकायेंगे। अभी तो उन्हों का मान कम हो गया है इसलिए सम्भालकर कदम उठाते हैं। आगे तो सन्यासियों को देख झट ऑफर करते थे-स्वामी जी, हमारे घर पर चलो। अभी तो टू मच हो गये हैं और तमोप्रधान बन पड़े हैं इसलिए जो बहुत नामीग्रामी हैं उनका ही मान होता है। बड़े आदमी भी उनको माथा झुकाते हैं-क्यों? पढ़े-लिखे तो सन्यासियों से भी जास्ती हैं। परन्तु वह पवित्र हैं, सन्यास किया है इसलिए बुद्धिवान माने जाते हैं। अभी तुम बुद्धिवान बनते हो। तुम अभी रचयिता और रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानते हो। परन्तु तुम्हारे में भी सभी को इतना नशा नहीं है। नशा चढ़ने में भी टाइम बहुत लगता है। पूरा नशा तो अन्त में ही रहता है। अभी जितना-जितना तुम पुरुषार्थ करते हो उतना नशा चढ़ता जाता है। निरन्तर यह याद रहना चाहिए-हम आत्माओं का बाप परमात्मा आया हुआ है। हमको पढ़ा रहे हैं-विश्व का मालिक बनाने। तो पुरुषार्थ करने की शुभ चिंता होनी चाहिए। सभी को वह चिंता नहीं रहती। यहाँ सुनते समय नशा चढ़ा, यहाँ से बाहर निकला और खेल खलास। नम्बरवार हैं ना। हम आत्माओं का बाप आया है। हम उनके पास परमधाम में रहते थे। ऐसे और कोई नहीं समझते हैं। साधू-सन्यासी आदि पवित्र हैं। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं। सभी को यह निश्चय नहीं बैठा है कि हमारा परमपिता परमात्मा ज्ञान का सागर है, जीवन्मुक्ति दाता है जो हमको स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। यहाँ से पांव बाहर निकाला और वह खुशी गुम हो जाती है। नहीं तो तुम बच्चों को कितनी खुशी रहनी चाहिए!

मैंने भी इस तन का आधार लिया है। नहीं तो राजयोग कैसे सिखलाऊं? मुझे अपना शरीर नहीं है। मन्दिरों में देखेंगे तो सबको अपना शरीर है। मैं तो अशरीरी हूँ। और सभी को आकारी वा साकारी शरीर मिला हुआ है, मेरा शरीर नहीं है। सोमनाथ का मन्दिर है अथवा शिव के मन्दिर में जहाँ भी जाओ वहाँ निराकारी रूप है। सिर्फ नाम भिन्न-भिन्न रख दिये हैं। यह तो जानते हो आत्मा परमधाम से आती है। भिन्न-भिन्न शरीर धारण कर पार्ट बजाती है। मैं इस 84 के चक्र में नहीं आता हूँ। मैं हूँ परमधाम में रहने वाला। इस शरीर में आया हूँ। तुम कहेंगे निराकार फिर कैसे आते हैं? हाँ, आ सकते हैं। तुम लोग पित्र खिलाते हो तो आत्मा आती है ना। शरीर तो नहीं आता। आत्मा प्रवेश करती है। समझते हैं आत्मा दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। कोई तो भूत की आत्मायें बहुत चंचल होती हैं, पत्थर आदि मारती हैं। आत्मा शरीर में आती है तब कुछ कर सकती है, उसे घोस्ट कहते हैं। अशुद्ध आत्मायें भी प्रवेश करती हैं। तुम बच्चों को अनुभव है कि कैसे अशुद्ध आत्मायें भटकती हैं। जब तक उनको अपना शरीर मिले। शुद्ध आत्मायें भी आती हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है। जो कुछ पास हुआ ड्रामा का खेल है। बाप समझाते है-मैं आकर साधारण बूढ़े तन में प्रवेश करता हूँ। जरूर अनुभवी का शरीर चाहिए ना। ब्रह्मा का नाम मशहूर है। ब्रह्मा की राय भी मशहूर है। ब्रह्मा को फिर कहाँ से राय मिली? ब्रह्मा है शिवबाबा का बच्चा। तो उनकी है श्रीमत। तो जरूर मुख्य श्रीमत ब्रह्मा की होनी चाहिए जिसमें बाप प्रवेश करते हैं। भारतवासी इन बातों को नहीं जानते। वह तो समझते हैं-सब एक ही एक है। कृष्ण शिव आदि सब एक ही हैं। कृष्ण को महात्मा, योगेश्वर कहते हैं। परन्तु क्यों कहते हैं? यह तो समझते नहीं। कृष्ण की आत्मा अभी ईश्वर द्वारा योग सीख योगेश्वर बन रही है। कितना गुप्त राज़ है! मनुष्य तो कह देते-परमात्मा नाम-रूप से न्यारा है, उनका शरीर है नहीं। परन्तु तुम तो कहते हो-सोमनाथ का मन्दिर शिव के अवतरण का यादगार है। जरूर कल्प पहले शिवबाबा आया हुआ था और अब आया हुआ है। फिर द्वापर में उनकी भक्ति शुरू होती है। शिवरात्रि मनाते हैं।

बाप बैठ समझाते हैं, तुम आत्मायें परमधाम से आई हो पार्ट बजाने। आत्मा अविनाशी है, इसमें 84 जन्मों का पार्ट भरा हुआ है। जैसे बाप पुराने शरीर में आये हैं वैसे तुम भी पुराने शरीर में हो। बाबा इस पुराने शरीर से लिबरेट कर नया देते हैं। युक्ति बतलाते हैं कि कौड़ी तुल्य से हीरे तुल्य कैसे बनो? गाते भी हैं-माशूक एक। बाप कहते हैं-मैं परमधाम का रहवासी हूँ, तुम भी परमधाम में रहने वाले हो। मैं पुराने ते पुराने शरीर में आया हूँ। तुम्हारा भी 84 जन्मों के अन्त का यह पतित तन है। तुम भी अपने को आत्मा समझो। हमने 84 जन्म भोग पूरे किये हैं। अभी फिर नई दुनिया में हमको नया शरीर मिलेगा। तो कितनी खुशी में रहना चाहिए! नम्बरवार हैं, कोई तो बिल्कुल ही डलहेड हैं। माया ने बिल्कुल ही पत्थरबुद्धि बना दिया है। जैसे गर्म तवे पर पानी डालो तो बिल्कुल ही सूख जायेगा। ऐसे तत्ते तवे हैं। अरे, तुम अपने को सिर्फ आत्मा, बाप की सन्तान समझो। वह भी नहीं समझते! अगर समझते तो आश्चर्यवत भागन्ती क्यों हो जाते? माया बड़ी जबरदस्त है। कोई ग़फलत की और माया थप्पड़ मार देगी। अरे, बाबा आया है वर्सा देने, फिर भी तुम विकारी बनते हो! बड़ा जबरदस्त थप्पड़ लगाती है। बाप तो थप्पड़ नहीं मारेंगे। माया थप्पड़ मार मुँह फेर देती है। ऐसे बहुत माया के थप्पड़ खाते रहते हैं। माया भी कहती है-तुम बाप को याद नहीं करते हो तो मैं मारती हूँ। माया को हुक्म मिला हुआ है। बुद्धिहीन को बुद्धिवान बनाना है तो क्यों नहीं सर्विस करते हो। क्या अन्त तक माया के मोचरे खाते रहना है! बहुत मोचरा खाते रहते हैं-कोई को क्रोध का, कोई को मोह का मोचरा। बाप कहते हैं-तुम सब कुछ सरेन्डर कर ट्रस्टी हो रहो। जो विकार दान में दे दिये उन्हें फिर काम में क्यों लाते हो! विकारों का तो कोई रूप नहीं है। धन के लिए कहेंगे ट्रस्टी होकर रहो। भल काम में लगाना परन्तु बहुत सम्भाल से, बाप की श्रीमत से। पैसे से कोई ऐसा विकर्म नहीं करना, नहीं तो उसका सारा बोझा तुम्हारे सिर पर चढ़ेगा।

माया बड़ी तमोप्रधान है। वह भी जानती है-यह बाप को ठीक रीति याद नहीं करते हैं इसलिए मारो इनको घूँसा। माया कहती है-अगर बाप और वर्से को याद नहीं करेंगे तो मैं थप्पड़ मार दूँगी। बहुत बच्चे लिखते भी हैं-बाबा, माया ने थप्पड़ मार दिया। बाबा भी लिखते हैं-हाँ बच्चे, माया को हुक्म मिला हुआ है, खूब थप्पड़ मारो क्योंकि तुम मेरा बनते नहीं हो। तुमको सदा सुखी बनाने आया हूँ, तो भी तुम मुझे याद नहीं करते हो। है भी बड़ा सहज, परन्तु टाइम लगता है। नहीं तो बाप और वर्से को याद कर खुशी का पारा चढ़ जाना चाहिए। आखिर में याद करते-करते झुझकी (हिचकी) आये-बस, हम बाबा के पास चला जाता हूँ, फिर आ जाऊगाँ स्वर्ग में। एकदम जैसे मौलाई (मस्त) बन चले जायेंगे।

अच्छा! यह तो कोई नहीं जानते है-आत्मा आशिक है परमपिता परमात्मा की। सच्चे-सच्चे आशिक तुम हो। आधाकल्प तुम आशिक बन माशूक को खूब याद करते हो। परन्तु यह जानते नहीं कि आत्मा परमात्मा पर आशिक होती है। वह तो कह देते-आत्मा सो परमात्मा, परमात्मा सो आत्मा। यहाँ तो बहुत फ़र्क है। तुम जानते हो-परमात्मा है माशूक। वह पवित्र सोल हमको कितना खूबसूरत बनाती है! हम आत्मा गन्दी बनने से जेवर भी गन्दे बन पड़े हैं। बाबा आये हैं फिर गोरा बनाने फिर शरीर भी गोल्डन एजेड मिलेगा। खाद सोने में डालते हैं ना।

अब देखो-यह मन्दिर है आदि देव का। उनका नाम कोई ने महावीर रख दिया। अर्थ कुछ नहीं जानते। हनूमान को भी महावीर कह देते हैं। अब कहाँ हनूमान, कहाँ फिर आदि देव को भी महावीर कह देते। जैन मुनी महाराज ने जो कुछ कहा वह चल पड़ा। आजकल तो रिद्धि-सिद्धि भी बहुत हो पड़ी है। यह बाबा सबको जानते हैं। बहुत मेहनत करते हैं, हाथ से केसर निकालते हैं। मनुष्य समझते है-बस, कमाल है! झट फालोअर्स बन जाते हैं। रिद्धि-सिद्धि वालों के तो ढेर फालोअर्स हैं। यहाँ तो वह बात नहीं है।

बाबा कहते है-मैं 5 हजार वर्ष पहले मुआफिक आया हूँ। ऐसे कोई कह न सके। बच्चे कहते हैं-बाबा, 5 हजार वर्ष पहले हम आये थे। आप से स्वर्ग का वर्सा पाया था। अब फिर परमपिता परमात्मा शिव के बच्चे आकर बने हैं इस ब्रह्मा द्वारा। दुनिया है कलियुग में। कलियुग में ब्राह्मण कहाँ से आये? ब्राह्मण तो संगम पर चाहिए। पैर और चोटी, संगम हुआ ना। शूद्र और ब्राह्मण का संगम। शूद्र से फिर ब्राह्मण बनते हैं। यह 84 का चक्र तो कोई नहीं जानते। तुम जानते हो-हम ब्राह्मण हैं, ब्रह्मा की औलाद प्रैक्टिकल में बने हैं। उन ब्राह्मणों को तुम कह सकते हो-तुम ब्राह्मण अपने को ब्रह्मा की औलाद कहलाते हो। अच्छा, ब्रह्मा का बाप कौन है? बता नहीं सकेंगे। डिब्बी में ठिकरी। बस, हम ब्राह्मण ही भगवान् हैं! तुम सब भक्त थे। अब कहते हो-हम लक्ष्मी को वरने लायक बन रहे हैं। इसमें पुरुषार्थ चलता है।

समझो, हम परमधाम से आये हैं। अभी बाबा फिर वापिस ले जाने लिए आये हैं। हम भी ब्रह्माण्ड के मालिक हैं। बाबा भी पुराने तन में आये हैं, हम भी पुराने तन में हैं। बाप कहते हैं-हमको भी पुराना तन लेना पड़ता है। अब मुझ बाप को याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। टाइम भी देते हैं। पाण्डव गवर्मेन्ट की सर्विस कम से कम 8 घण्टा होनी चाहिए। राजयोग सिखलाना है। शंखध्वनि करनी है। तुम श्रीमत से भारत को ख़ास और दुनिया को आम स्वर्ग बनाते हो। स्वर्ग में सिर्फ तुम आते हो और धर्म वाले नहीं आते। ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-इसको विराट स्वरूप कहा जाता है। एक विराट रूप का भी चित्र बनाना चाहिए जो मनुष्यों को सहज समझ में आये। विष्णु को विराट स्वरूप में ले आये हैं। चित्र तो जरूर चाहिए ना। स्कूल में भी चित्र रखते हैं ना। नहीं तो बच्चा क्या जाने-हाथी क्या होता है? चित्रों पर दिखाते हैं। तो यह भी चार युग हैं। अब कलियुग है। जरूर चक्र फिरेगा। ब्राह्मण तो संगम पर होते हैं। बाकी हैं जिस्मानी ब्राह्मण, पण्डे। वह ब्रह्मा मुख वंशावली नहीं हैं। ब्रह्मा मुख वंशावली को तो दादे से वर्सा मिलता है। उन ब्राह्मणों को वर्सा कहाँ मिलता! इन बातों को तो तुम्हारे में भी नम्बरवार समझ सकते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बुद्धि से सब कुछ सरेन्डर कर ट्रस्टी हो रहना है। बहुत सम्भाल से श्रीमत प्रमाण हर कार्य करना है।

2) बाबा और वर्से को याद कर अपार खुशी का अनुभव करना है। बाबा की याद में मौलाई बन जाना है। सच्चा आशिक बनना है।

वरदान:- योग ज्वाला द्वारा विश्व के किचड़े को भस्म करने वाले विश्व परिवर्तक भव
योग ज्वाला अर्थात् श्रेष्ठ संकल्पों की शक्ति व लगन की अग्नि द्वारा ही अपवित्रता रूपी किचड़े को भस्म कर सकते हो। जैसे देवियों के यादगार में दिखाते हैं कि ज्वाला से आसुरी शक्तियों को खत्म कर दिया। यह यादगार अभी का है। तो पहले ज्वाला रूप बन आसुरी संस्कार, स्वभाव सब कुछ भस्म कर सम्पूर्ण पावन बनो तब योग और पवित्रता की ज्वाला से विश्व के किचड़े को भस्म कर विश्व परिवर्तन के निमित्त बनेंगे।
स्लोगन:- आज्ञाकारी वह है जो मनमत, परमत से मुक्त रह सदा श्रीमत पर चलता है।

TODAY MURLI 9 July 2017 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 9 July 2017

Read Murli in Hindi :- Click Here

Read Bk Murli 8 July 2017 :- Click Here

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09/07/17
Madhuban
Avyakt BapDada
Om Shanti
18/04/82

Maintain the honour of the highest-on-high Brahmin clan.

Today, BapDada, is seeing all the elevated souls who have total love for Baba and the pure desire to have a meeting with Him. It is only at this time that BapDada has to give children the practical fruit of their pure desire to have a meeting with Him. One cannot receive the fruit of a direct , personal meeting as the fruit of pure devotion. However, once there has been the recognition, that is, once the relationship between Father and child has been forged on the basis of knowledge, then, on the basis of that relationship, on the basis of their right, the Father personally has to give the children who are embodiments of knowledge the fruit of their good wishes, their pure feelings filled with knowledge and their pure desire to have a meeting. Today, BapDada has come amongst you knowledge-full children in order to meet you souls who have the desire to meet the Father. Many Brahmin souls consider themselves to be weak when it comes to becoming embodiments of power, becoming brave soldiers (mahavirs) who are always victorious and having that much courage in themselves. However, because of one speciality, they do come into the list of special souls. What is that speciality? It is that they like the Father and that they also like this elevated life. The selfless love in the gathering of the Brahmin family attracts the mind. The speciality is that they have found Baba, the family, the destination of purity and the easy support to make their lives elevated. On this basis, they continue to move along with the support of love with the pure desire to have a meeting. However, because of they have forged a relationship, they definitely claim a right to heaven as their inheritance on the basis of that relationship, because it is on the basis of Brahmins becoming deities that they definitely claim a right to a deity status. The golden age is called the age of deities. No matter whether someone is a king or a subject, the religion is still the deity religion, because when the highest-on-high Father makes you His child, every child of His claims a right to his inheritance of heaven – his right to become a deity – as his birthright. To become a Brahma Kumar or Brahma Kumari means to have the special imperishable stamp of claiming a right to the inheritance of heaven. Out of everyone in the whole world, only a few souls emerge who claim such a right. This is why you mustn’t consider your becoming a Brahma Kumar or Kumari to be something ordinary. To become a Brahma Kumar or Kumari is in itself a speciality and, because of this speciality, you come into the list of special souls. This is why to become a Brahma Kumar or Kumari means to belong to the Brahmin clan, the Brahmin world and the Brahmin family. If, after becoming a Brahma Kumar or Kumari, there is any ordinary activity or any activity of the past, then not only would you cause a loss for yourself but, because you are not a Brahma Kumar or Kumari in isolation, but you are all members of the Brahmin family, you would therefore also accumulate the burden of defaming the Brahmin family. It is the duty of every Brahmin to maintain the honour of the Brahmin world. You pay so much attention to fulfilling the worldly code of conduct. Sometimes, the worldly code of conduct even deprives you of becoming multi-millionaires. You experience this yourselves and you say that you really want to do this, but that you also have to fulfil your responsibility to other people. You say this, do you not? So, you know very well how that world deprives you of the attainment of many births, how it makes your present diamond-like life into the life of a worthless shell, and yet, in spite of that, you pay so much attention to putting your time and energy into fulfilling the responsibility of that worldly code of conduct. So, is this Brahmin code of conduct not important? In fulfilling your responsibility to that world, you let go of your religion, that is, what you have imbibed, and the elevated activity of remembrance; you let go of both your dharma and karma. Sometimes, you let go of the precaution of having a special attitude, which means you let go of your religion. Sometimes you let go of the religion of having pure vision. Sometimes, you let go of the religion of eating pure food. You then make up many stories in order to justify yourself. What do you then say? That you have to do that. A slight weakness makes you renounce your dharma and karma for all time. Even in the physical family, what is someone who renounces his dharma and karma considered to be? Do you know? This is not the dharma and karma of an ordinary family. This is the Brahmin family of the topknot. So, to which world and clan are you going to fulfil your responsibility? You even confess things very well: I didn’t want to do that, but I did it to please someone. Is it possible that souls without knowledge can be permanently happy? You renounce your elevated karma and dharma because of souls who are sometimes happy and sometimes get upset. Those who don’t have this religion don’t belong to the Brahmin world. You pleased a few souls, but you also disobeyed the directions of the Almighty Father! So, what did you attain and what did you lose? The world that is already finished! The firewood for the funeral pyre has been collected from everywhere with great force. Firewood means the preparations. The more you think that you will remove those sticks and complete all the preparations, the higher the stack of firewood grows. When you are going to burn a fire at holika, even little children go with the adults to fetch firewood. They even fetch firewood from their own homes because they have that interest. Therefore, nowadays, even small towns are co-operating with each other with great interest. So, in order to observe the codes of conduct of such a world, you forget the codes of conduct of your imperishable world of Brahmins who are to become deities. You perform such wonders! Is this fulfilling your responsibility or is it losing out? So, keep the codes of conduct of the Brahmin world in your awareness.

Some children are very clever: they want to observe the code of conduct of the old world and also want to become elevated in the Brahmin world. BapDada says: You may fulfil your responsibility of the code of conduct of your worldly family; you are not forbidden to do that. However, to fulfil that by letting go of your dharma and karma is wrong. What cleverness do you reveal? You think that no one is going to know, that the Father Himself says that He is not Janijananhar (One who knows everything), “what do the instrument souls know?” “That is happening all the time”. You move along in this way and still come to Madhuban! You hide yourself at the service centre and also become well known in service. You give a little co-operation and, on the basis of that co-operation, you even buy yourself a very good title of becoming a server. However, you then lose your elevated title for every birth, the imperishable title of being filled with all virtues, 16 celestial degrees full, completely viceless. Therefore, this is not giving co-operation, but taking the burden of deceit of being one thing inside and something else outside. Instead of being a co-operative soul, you become one who carries a burden. No matter how much you make yourself move along (chalana) with that cleverness, it is not making you move along, but crying out (chilana). Don’t think that this centre is a place of the instrument souls. You may fool souls but, in front of God, a hundred thousand-fold is definitely accumulated for every action in the account of every soul. You cannot fool yourself in this account. This is why BapDada feels mercy for such clever children. Nevertheless, once you have said “Father”, He constantly continues to give you teachings for your benefit. So don’t become clever in that way. Constantly fulfil the code of conduct of the Brahmin world.

BapDada is beyond every action and its fruit. At this time even Brahma Baba has this stage. Later he will have karmic accounts, but at this time he is equal to the Father. This is why whatever each one of you does, you do that for yourself. The Father is the Bestower. Since you do everything yourself and you receive the fruit of that, then what should you do? On seeing from the subtle region the variety of children’s games, BapDada smiles. Achcha.

To those who are the lamps of the Brahmin clan, to those who are loving and co-operative with true love, to those who attain elevated fruit for all time, to the loving souls who sacrifice all the temporary attainments out of true love for the true Father, to the loving, elevated souls, BapDada’s love, remembrance and namaste.

Meeting G roups :

Become a karma yogi and experience the stage of being free from any bondage of karma.

Whilst performing every action, do you experience yourselves to be loving and detached souls who are beyond the bondage of karma and loving to the Father? Those who perform every action as karma yogis never have any bondage of karma. They remain constantly free from bondage and are accurately linked in yoga. A karma yogi never comes under the influence of good or bad actions of anyone. It should not be that when you come into connection with someone who performs good actions, you become happy or that, when you come into connection with someone who doesn’t perform good actions, you get angry or you feel jealous or dislike them. That too is a bondage of karma. No matter what others souls who come in front of a karma yogi are like, such a soul will always remain loving and detached. You would know through knowledge that that is his part at present. To dislike someone who dislikes everything is also a bondage of karma. Those who have such a bondage of karma cannot remain constant: they will sometimes experience one thing and at other times experience something else. Therefore, become a detached observer and see those who are good whilst considering them to be good, and be merciful and, as a detached observer, see those who are bad with the mercy and good wishes of wanting to transform them. This is known as being beyond any bondage of karma. The meaning of knowledge is understanding. So, what is it the understanding of? The understanding of being free from the bondage of karma is knowledge. A knowledgeable soul will never be under the influence of any bondage. He will always be detached. Let it not be that you are sometimes detached and at other times you are affected a little by others. Keep the aim of constantly being a conqueror of sinful actions. You have to become a conqueror of the bondage of karma. By practising this over a long period of time, you will be able to receive a reward for a long period of time. You will also now have very unique experiences. Therefore, be constantly detached and constantly loving. This is the stage of being free from the bondage of karma, equal to the Father.

BapDada speaking to the senior sisters:

What group would you call this group? In the beginning you all had your own names, so what name should you be given now? Those who constantly stay in the company of the Father and who are constantly the Father’s right hands. You are such a group, are you not? How can BapDada carry out such a huge task of establishment without arms? So, you are the special arms for the task of establishment. The right hands are the special arms. BapDada always calls the original jewels real gold. All of you original jewels are playing special part s on the world stage. BapDada is pleased to see the special part of every special soul. There is a variety of roles for everyone; they cannot all be the same. However, this much is certain: that the original jewels have special part s according to the drama. Each of you jewels has a particular speciality on the basis of which you are moving forward and will always continue to do so. You yourselves as well as others know what that speciality is. Nevertheless, all of you are special souls full of specialities.

BapDada gives one hundred thousand-fold congratulations to such original jewels because, from the beginning, you have tolerated so much by being instruments to bring about growth in the physical formin the task of establishment. Others have not tolerated what you had to tolerate in the task of establishment. The seed of your power of tolerance has created this fruit. Therefore, from the beginning, through the middle till the end, BapDada sees what each of you has tolerated and how you have shown your form of a Shakti. You have tolerated everything as a game. You didn’t tolerate anything as though you were tolerating anything, but you became instruments to play your part s of tolerating everything as a game and have thereby recorded hero part s for yourselves. This is why the parts of the original jewels who become instruments are always in front of BapDada. As a result of this, all of you souls are constantly immortal. Do you understand your part? No matter how far ahead someone goes, even then, … “Even then” has to be said, at that time. BapDada knows the value of old things. Do you understand? Achcha.

Question: In which task should Brahmin children of the confluence age remain constantly engaged?

Answer: You have to become powerful and make others powerful too. Remain constantly engaged in this task because you have wasted a lot of time for half the cycle. Now the time is to become powerful and make others the same. Therefore, now finish all wasteful thoughts, wasteful words, wasteful actions; fullstop! The old accounts book is closed. The method to accumulate is to remain constantly powerful because time, energy and knowledge are lost due to wastage.

Blessing: May you be a carefree emperor who is always seated on the heart-throne while carrying out any task.
Those who are constantly seated on BapDada’s heart-throne become carefree emperors. The speciality of this throne is that those who are seated on the throne will always be carefree in every respect. Nowadays, some places have some special newness or some speciality. The speciality of being seated on the heart-throne is that there can be no worries. The heart-throne has received this blessing. So, always be seated on the heart-throne while carrying out any task.
Slogan: In order to claim a number ahead, adopt the form of power as well as having love and co-operation.

 

*** Om Shanti ***

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Brahma kumaris murli 9 July 2017 : Daily Murli (Hindi)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 9 July 2017

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09/07/17
मधुबन
“अव्यक्त-बापदाद”‘
ओम् शान्ति
18-04-82

ऊंचे से ऊंचे ब्राह्मण कुल की लाज रखो

आज बापदादा सर्व स्नेही और मिलन की भावना वाली श्रेष्ठ आत्माओं को देख रहे हैं। बच्चों की मिलन भावना का प्रत्यक्षफल बापदादा को भी इस समय ही देना है। भक्ति की भावना का फल डायरेक्ट सम्मुख मिलन का नहीं मिलता। लेकिन एक बार परिचय अर्थात् ज्ञान के आधार पर बाप और बच्चे का सम्बन्ध जुटा, तो ऐसे ज्ञान स्वरूप बच्चों को अधिकार के आधार पर शुभ भावना, ज्ञान स्वरूप भावना, सम्बन्ध के आधार पर मिलन भावना का फल सम्मुख बाप को देना ही पड़ता है। तो आज ऐसे ज्ञानवान मिलन की भावना स्वरूप आत्माओं से मिलने के लिए बापदादा बच्चों के बीच आये हुए हैं। कई ब्राह्मण आत्मायें शक्ति स्वरूप बन, महावीर बन सदा विजयी आत्मा बनने में वा इतनी हिम्मत रखने में स्वयं को कमज़ोर भी समझती हैं लेकिन एक विशेषता के कारण विशेष आत्माओं की लिस्ट में आ गई हैं। कौन-सी विशेषता? सिर्फ बाप अच्छा लगता है, श्रेष्ठ जीवन अच्छा लगता है। ब्राह्मण परिवार का संगठन, नि:स्वार्थी स्नेह मन को आकर्षित करता है। बस यही विशेषता है कि बाबा मिला, परिवार मिला, पवित्र ठिकाना मिला, जीवन को श्रेष्ठ बनाने का सहज सहारा मिल गया। इसी आधार पर मिलन की भावना में स्नेह के सहारे में चलते जा रहे हैं। लेकिन फिर भी सम्बन्ध जोड़ने के कारण सम्बन्ध के आधार पर स्वर्ग का अधिकार वर्से में पा ही लेते हैं – क्योंकि ब्राह्मण सो देवता, इसी विधि के प्रमाण देवपद की प्राप्ति का अधिकार पा ही लेते हैं। सतयुग को कहा ही जाता है देवताओं का युग। चाहे राजा हो, चाहे प्रजा हो लेकिन धर्म देवता ही है – क्योंकि जब ऊंचे ते ऊंचे बाप ने बच्चा बनाया तो ऊंचे बाप के हर बच्चे को स्वर्ग के वर्से का अधिकार, देवता बनने का अधिकार, जन्म सिद्ध अधिकार में प्राप्त हो ही जाता है। ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारी बनना अर्थात् स्वर्ग के वर्से के अधिकार की अविनाशी स्टैम्प लग जाना। सारे विश्व से ऐसा अधिकार पाने वाली सर्व आत्माओं में से कोई आत्मायें ही निकलती हैं इसलिए ब्रह्माकुमार कुमारी बनना कोई साधारण बात नहीं समझना। ब्रह्माकुमार कुमारी बनना ही विशेषता है और इसी विशेषता के कारण विशेष आत्माओं की लिस्ट में आ जाते हैं इसलिए ब्रह्माकुमार कुमारी बनना अर्थात् ब्राह्मण लोक के, ब्राह्मण संसार के, ब्राह्मण परिवार के बनना। ब्रह्माकुमार कुमारी बन अगर कोई भी साधारण चलन वा पुरानी चाल चलते है तो सिर्फ अकेला अपने को नुकसान नहीं पहुँचाते – क्योंकि अकेले ब्रह्माकुमार कुमारी नहीं हो लेकिन ब्राह्मण कुल के भाती हो। स्वयं का नुकसान तो करते ही हैं लेकिन कुल को बदनाम करने का बोझ भी उसी आत्मा के ऊपर चढ़ता है। ब्राह्मण लोक की लाज रखना, यह भी हर ब्राह्मण का फर्ज है। जैसे लौकिक लोकलाज का कितना ध्यान रखते हैं। लौकिक लोकलाज पदमापदमपति बनने से भी कहाँ वंचित कर देती है। स्वयं अनुभव भी करते हो और कहते भी हो कि चाहते तो बहुत हैं लेकिन लोकलाज को निभाना पड़ता है। ऐसे कहते हो ना। तो जो लोक (दुनिया) अनेक जन्मों की प्राप्ति से वंचित करने वाली है, वर्तमान हीरे जैसा जन्म कौड़ी समान व्यर्थ बनाने वाली है, यह अच्छी तरह से जानते भी हो फिर भी उस लोकलाज को निभाने में अच्छी तरह ध्यान देते हो, समय देते हो, एनर्जी लगाते हो। तो क्या इस ब्राह्मण लोकलाज की कोई विशेषता नहीं है! उस लोक की लाज के पीछे अपना धर्म अर्थात् धारणायें और श्रेष्ठ कर्म याद का, दोनों ही धर्म और कर्म छोड़ देते हो। कभी वृत्ति के परहेज की धारणा अर्थात् धर्म को छोड़ देते हो, कभी शुद्ध दृष्टि के धर्म को छोड़ देते हो। कभी शुद्ध अन्न के धर्म को छोड़ देते हो। फिर अपने आपको श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए बातें बहुत बनाते हो। क्या कहते कि करना ही पड़ता है! थोड़ी सी कमज़ोरी सदा के लिए धर्म और कर्म को छुड़ा देती है। जो धर्म और कर्म को छोड़ देता है उसको लौकिक कुल में भी क्या समझा जाता है? जानते हो ना! यह किसी साधारण कुल का धर्म और कर्म नहीं है। ब्राह्मण कुल ऊंचे ते ऊंची चोटी वाला कुल है। तो किस लोक वा किस कुल की लाज रखनी है! और कई अच्छी-अच्छी बातें सुनाते हैं – मेरी इच्छा नहीं थी लेकिन किसी को खुश करने के लिए किया! क्या अज्ञानी आत्मायें कभी सदा खुश रह सकती हैं! ऐसे अभी खुश, अभी नाराज रहने वाली आत्माओं के कारण अपना श्रेष्ठ कर्म और धर्म छोड़ देते। जो धर्म के नहीं, वह ब्राह्मण दुनिया के नहीं। अल्पज्ञ आत्माओं को खुश कर लिया लेकिन सर्वज्ञ बाप की आज्ञा का उल्लंघन किया ना! तो पाया क्या और गंवाया क्या! जो लोक अब खत्म हुआ ही पड़ा है। चारों ओर आग की लकड़ियाँ बहुत ज़ोर शोर से इकट्ठी हो गई हैं। लकड़ियाँ अर्थात् तैयारियाँ। जितना सोचते हैं इन लकड़ियों को अलग-अलग कर आग की तैयारी को समाप्त कर दें उतना ही लकड़ियों का ढेर ऊंचा होता जाता है। जैसे होलिका को जलाते हैं तो बड़ों के साथ छोटे-छोटे बच्चे भी लकड़ियाँ इकट्ठी कर ले आते हैं। नहीं तो घर से ही लकड़ी ले आते। शौक होता है। तो आजकल भी देखो छोटे-छोटे शहर भी बड़े शौक से सहयोगी बन रहे हैं। तो ऐसे लोक की लाज के लिए अपने अविनाशी ब्राह्मण सो देवता लोक की लाज भूल जाते हो! कमाल करते हो! यह निभाना है या गंवाना है? इसलिए ब्राह्मण लोक की भी लाज स्मृति में रखो।

कई बच्चे बड़े होशियार हैं अपने पुराने लोक की लाज भी रखने चाहते और ब्राह्मण लोक में भी श्रेष्ठ बनना चाहते हैं। बापदादा कहते लौकिक कुल की लोकलाज भल निभाओ उसकी मना नहीं है लेकिन धर्म कर्म को छोड़ करके लोकलाज रखना यह रांग है। और फिर होशियारी क्या करते हैं? समझते हैं किसको क्या पता – बाप तो कहते ही हैं कि मैं जानी जाननहार नहीं हूँ। निमित्त आत्माओं को भी क्या पता। ऐसे तो चलता है। और चल करके मधुबन में पहुँच भी जाते हैं। सेवाकेन्द्रों पर भी अपने आपको छिपाकर सेवा में नामीग्रामी भी बन जाते हैं। ज़रा सा सहयोग देकर सहयोग के आधार पर बहुत अच्छे सेवाधारी का टाइटल भी खरीद कर लेते हैं। लेकिन जन्म-जन्म का श्रेष्ठ टाइटल सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी… यह अविनाशी टाइटल गंवा देते हैं। तो यह सहयोग दिया नहीं लेकिन ‘अन्दर एक बाहर दूसरा’ इस धोखे द्वारा बोझ उठाया। सहयोगी आत्मा के बजाए बोझ उठाने वाले बन गये। कितना भी होशियारी से स्वयं को चलाओ लेकिन यह होशियारी का चलाना, चलाना नहीं लेकिन चिल्लाना है। ऐसे नहीं समझना यह सेवाकेन्द्र कोई निमित्त आत्माओं के स्थान हैं। आत्माओं को तो चला लेते लेकिन परमात्मा के आगे एक का लाख गुणा हिसाब हर आत्मा के कर्म के खाते में जमा हो ही जाता है। उस खाते को चला नहीं सकते इसलिए बापदादा को ऐसे होशियार बच्चों पर भी तरस पड़ता है। फिर भी एक बार बाप कहा तो बाप भी बच्चों के कल्याण के लिए सदा शिक्षा देते ही रहेंगे। तो ऐसे होशियार मत बनना। सदा ब्राह्मण लोक की लाज रखना।

बापदादा तो कर्म और फल दोनों से न्यारे हैं। इस समय ब्रह्मा बाप भी इसी स्थिति पर हैं। फिर तो हिसाब-किताब में आना ही है लेकिन इस समय बाप समान हैं इसलिए जो करेंगे जैसा करेंगे अपने लिए ही करते हो। बाप तो दाता है। जब स्वयं ही करता और स्वयं ही फल पाता है तो क्या करना चाहिए। बापदादा वतन में बच्चों के वैरायटी खेल देख करके मुस्कराते हैं। अच्छा।

ऐसे ब्राह्मण कुल के दीपक, सदा सच्ची लगन से स्नेही और सहयोगी बनने वाले, सदाकाल का श्रेष्ठ फल पाने वाले, सदा सच्चे बाप के सच्चे स्नेह में अल्पकाल की प्राप्तियों को कुर्बान करने वाले ऐसे स्नेही आत्माओं को श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

पार्टियों के साथ

1. कर्म बन्धन से मुक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए कर्मयोगी बनो:-

सदा हर कर्म करते, कर्म के बन्धनों से न्यारे और बाप के प्यारे – ऐसी न्यारी और प्यारी आत्मायें अपने को अनुभव करते हो? कर्मयोगी बन, कर्म करने वाले कभी भी कर्म के बन्धन में नहीं आते हैं, वे सदा बन्धनमुक्त-योगयुक्त होते। कर्मयोगी कभी अच्छे वा बुरे कर्म करने वाले व्यक्ति के प्रभाव में नहीं आते। ऐसा नहीं कि कोई अच्छा कर्म करने वाला कनेक्शन में आये तो उसकी खुशी में आ जाओ और कोई अच्छा कर्म न करने वाला सम्बन्ध में आये तो गुस्से में आ जाओ या उसके प्रति ईर्ष्या वा घृणा पैदा हो। यह भी कर्मबन्धन है। कर्मयोगी के आगे कोई कैसा भी आ जाए – स्वयं सदा न्यारा और प्यारा रहेगा। नॉलेज द्वारा जानेगा, इसका यह पार्ट चल रहा है। घृणा वाले से स्वयं भी घृणा कर ले, यह हुआ कर्म का बन्धन। ऐसा कर्म के बन्धन में आने वाला एकरस नहीं रह सकता। कभी किसी रस में होगा, कभी किसी रस में, इसलिए अच्छे को अच्छा समझकर साक्षी होकर देखो और बुरे को रहमदिल बन रहम की निगाह से, परिवर्तन करने की शुभ भावना से साक्षी हो देखो। इसको कहा जाता है कर्मबन्धन से न्यारे क्योंकि ज्ञान का अर्थ है समझ। तो समझ किस बात की? कर्म के बन्धनों से मुक्त होने की समझ को ही ज्ञान कहा जाता है। ज्ञानी कभी भी बन्धनों के वश नहीं होंगे। सदा न्यारे। ऐसे नहीं कभी न्यारे बन जाओ तो कभी थोड़ा सा सेक आ जाए। सदा विकर्माजीत बनने का लक्ष्य रखो। कर्मबन्धन जीत बनना है। यह बहुतकाल का अभ्यास बहुतकाल की प्रालब्ध के निमित्त बनायेगा। और अभी भी बहुत विचित्र अनुभव करेंगे। तो सदा के न्यारे और सदा के प्यारे बनो। यही बाप समान कर्मबन्धन से मुक्त स्थिति है।

बापदादा पुरानी बड़ी बहनों को देखे बोले:-

इस ग्रुप को कौन-सा ग्रुप कहेंगे? पहले शुरू में तो अपने-अपने नाम रहे – अभी कौन-सा नाम देंगे? सदा बाप के संग रहने वाले, सदा बाप के राइट हैण्ड। ऐसा ग्रुप हो ना! बापदादा भी भुजाओं के बिना इतनी बड़ी स्थापना का कार्य कैसे कर सकते। तो इसीलिए स्थापना के कार्य की विशेष भुजायें हो। विशेष भुजा राइट हैण्ड की होती है। बापदादा सदैव आदि रत्नों को रीयल गोल्ड कहते हैं। सभी आदि रत्न विश्व की स्टेज पर विशेष पार्ट बजा रहे हो। बापदादा भी हर विशेष आत्मा का विशेष पार्ट देख हर्षित होते हैं। पार्ट तो सबका वैरायटी होगा ना! एक जैसा तो नहीं हो सकता लेकिन इतना जरूर है कि आदि रत्नों का विशेष ड्रामा अनुसार विशेष पार्ट है। हरेक रत्न में विशेष-विशेषता है जिसके आधार पर ही आगे बढ़ भी रहे हैं और सदा बढ़ते रहेंगे। वह कौन-सी विशेषता है – यह तो स्वयं भी जानते हो और दूसरे भी जानते हैं। लेकिन विशेषता सम्पन्न विशेष आत्मायें हो।

बापदादा ऐसे आदि रत्नों को लाख-लाख बधाईयां देते हैं क्योंकि आदि से सहन कर स्थापना के कार्य को साकार स्वरूप में वृद्धि को प्राप्त कराने के निमित्त बने हो। तो जो स्थापना के कार्य में सहन किया वह औरों ने नहीं किया है। आपके सहनशक्ति के बीज ने यह फल पैदा किये हैं। तो बापदादा आदि-मध्य-अन्त को देखते हैं कि हरेक ने क्या-क्या सहन किया है और कैसे शक्ति रूप दिखाया है। और सहन भी खेल-खेल में किया। सहन के रूप में सहन नहीं किया, खेल-खेल में सहन का पार्ट बजाने के निमित्त बन अपना विशेष हीरो पार्ट नूँध लिया, इसलिए आदि रत्नों का यह निमित्त बनने का पार्ट बापदादा के सामने रहता है। और इसके फलस्वरूप आप सर्व आत्मायें सदा अमर हो। समझा अपना पार्ट? कितना भी कोई आगे चला जाये – लेकिन फिर भी… फिर भी कहेंगे। बापदादा को पुरानी वस्तु की वैल्यु का पता है। समझा। अच्छा।

प्रश्न:- संगमयुगी ब्राह्मण बच्चों को किस कर्तव्य में सदा तत्पर रहना चाहिए?

उत्तर:- समर्थ बनना है और दूसरों को भी समर्थ बनाना है, इसी कर्तव्य में सदा तत्पर रहना क्योंकि व्यर्थ तो आधाकल्प किया, अब समय ही है समर्थ बनने और बनाने का, इसलिए व्यर्थ संकल्प, व्यर्थ बोल, व्यर्थ कर्म सब समाप्त, फुल स्टॉप। पुराना चौपड़ा खत्म। जमा करने का साधन ही है – सदा समर्थ रहना क्योंकि व्यर्थ से समय, शक्तियां और ज्ञान का नुकसान हो जाता है।

वरदान:- कोई भी कार्य करते सदा दिलतख्तनशीन रहने वाले बेफिक्र बादशाह भव 
जो सदा बापदादा के दिलतख्तनशीन रहते हैं वे बेफिक्र बादशाह बन जाते हैं क्योंकि इस तख्त की विशेषता है कि जो तख्तनशीन होगा वह सब बातों में बेफिक्र होगा। जैसे आजकल भी कोई-कोई स्थान को विशेष कोई न कोई नवीनता, विशेषता मिली हुई है तो दिलतख्त की विशेषता है कि फिक्र आ नहीं सकता। यह दिलतख्त को वरदान मिला हुआ है, इसलिए कोई भी कार्य करते सदा दिलतख्तनशीन रहो।
स्लोगन:- नम्बर आगे लेना है तो स्नेह और सहयोग के साथ शक्ति रूप धारण करो।

 

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