4 july ki murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 4 JULY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 4 July 2020

Murli Pdf for Print : – 

04-07-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – ऊंच बनना है तो अपना पोतामेल रोज़ देखो, कोई भी कर्मेन्द्रिय धोखा न दे, आंखें बहुत धोखेबाज हैं इनसे सम्भाल करो”
प्रश्नः- सबसे बुरी आदत कौन-सी है, उनसे बचने का उपाय क्या है?
उत्तर:- सबसे बुरी आदत है – जबान का स्वाद। कोई अच्छी चीज़ देखी तो छिपाकर खा लेंगे। छिपाना अर्थात् चोरी। चोरी रूपी माया भी बहुतों को नाक कान से पकड़ लेती है। इससे बचने का साधन जब भी कहाँ बुद्धि जाए तो खुद ही खुद को सज़ा दो। बुरी आदतों को निकालने के लिए अपने आपको खूब फटकार लगाओ।

ओम शान्ति। आत्म-अभिमानी होकर बैठे हो? हर एक बात अपने आपसे पूछनी होती है। हम आत्म-अभिमानी हो बैठे हैं और बाप को याद कर रहे हैं? गाया हुआ भी है शिव शक्ति पाण्डव सेना। यह शिवबाबा की सेना बैठी है ना। उस जिस्मानी सेना में सिर्फ जवान होते हैं, बूढ़े वा बच्चे आदि नहीं। इस सेना में तो बूढ़े, बच्चे, जवान आदि सब बैठे हैं। यह है माया पर जीत पाने के लिए सेना। हर एक को माया पर जीत पाकर बाप से बेहद का वर्सा लेना है। बच्चे जानते हैं माया बड़ी प्रबल है। कर्मेन्द्रियाँ ही सबसे जास्ती धोखा देती हैं। चार्ट में यह भी लिखो कि आज कौन-सी कर्मेन्द्रिय ने धोखा दिया? आज फलानी को देखा तो दिल हुई इनको हाथ लगायें, यह करें। आंखें बहुत नुकसान करती हैं। हर एक कर्मेन्द्रिय देखो, कौन-सी कर्मेन्द्रिय बहुत नुकसान करती है? सूरदास का भी इस पर मिसाल देते हैं। अपनी जांच रखनी चाहिए। आंखें बहुत धोखा देने वाली हैं। अच्छे-अच्छे बच्चों को भी माया धोखा दे देती है। भल सर्विस अच्छी करते हैं परन्तु आंखें धोखा देती हैं। इस पर बड़ी जांच रखनी होती है क्योंकि दुश्मन है ना। हमारे पद को भ्रष्ट कर देती है। जो सेन्सीबुल बच्चे हैं, उन्हों को अच्छी रीति नोट करना चाहिए। डायरी पॉकेट में पड़ी हो। जैसे भक्ति मार्ग में बुद्धि और तरफ भागती है तो अपने को चुटकी काटते हैं। तुमको भी सज़ा देनी चाहिए। बड़ी खबरदारी रखनी चाहिए। कर्मेन्द्रियाँ धोखा तो नहीं देती! किनारा कर लेना चाहिए। खड़ा होकर देखना भी नहीं चाहिए। स्त्री-पुरूष का ही बहुत हंगामा है। देखने से काम विकार की दृष्टि जाती है इसलिए संन्यासी लोग आंखें बन्द करके बैठते हैं। कोई-कोई संन्यासी तो स्त्री को पीठ देकर बैठते हैं। उन संन्यासियों आदि को क्या मिलता है? करके 10-20 लाख, करोड़ इकट्ठा करेंगे। मर गये तो खलास। फिर दूसरे जन्म में इकट्ठा करना पड़े। तुम बच्चों को तो जो कुछ मिलता है वह अविनाशी वर्सा हो जाता है। वहाँ धन की लालच होती ही नहीं। ऐसी कोई अप्राप्ति होती नहीं, जिसके लिए माथा मारना पड़े। कलियुग अन्त और सतयुग आदि में रात-दिन का फ़र्क है। वहाँ तो अपार सुख होता है। यहाँ कुछ भी नहीं। बाबा हमेशा कहते हैं – संगम अक्षर के साथ पुरूषोत्तम अक्षर जरूर लिखो। साफ-साफ अक्षर बोलने चाहिए। समझाने में सहज होता है। मनुष्य से देवता किये … तो जरूर संगम पर ही आयेगा ना देवता बनाने, नर्कवासी को स्वर्गवासी बनाने। मनुष्य तो घोर अन्धियारे में हैं। स्वर्ग क्या होता है, पता ही नहीं। और धर्म वाले तो स्वर्ग को देख भी नहीं सकते इसलिए बाबा कहते हैं तुम्हारा धर्म बहुत सुख देने वाला है। उनको कहते ही हैं हेविन। परन्तु यह थोड़ेही समझते हैं कि हम भी हेविन में जा सकते हैं। किसको भी पता नहीं है। भारतवासी यह भूल गये हैं। हेविन को लाखों वर्ष कह देते हैं। क्रिश्चियन लोग खुद कहते हैं 3 हज़ार वर्ष पहले हेविन था। लक्ष्मी-नारायण को कहते ही हैं गॉड-गॉडेज। जरूर गॉड ही गॉड-गॉडेज बनायेंगे। तो मेहनत करनी चाहिए। रोज़ अपना पोतामेल देखना चाहिए। कौनसी कर्मेन्द्रिय ने धोखा दिया? जबान भी कोई कम नहीं। कोई अच्छी चीज़ देखी तो छिपाकर खा लेंगे। समझते थोड़ेही हैं कि यह भी पाप हैं। चोरी हुई ना। सो भी शिवबाबा के यज्ञ से चोरी करना बहुत खराब है। कख का चोर सो लख का चोर कहा जाता है। बहुतों को माया नाक से पकड़ती रहती है। यह सब बुरी आदतें निकालनी हैं। अपने पर फटकार डालनी चाहिए। जब तक बुरी आदतें हैं तब तक ऊंच पद पा नहीं सकेंगे। स्वर्ग में जाना तो बड़ी बात नहीं है। परन्तु कहाँ राजा-रानी कहाँ प्रजा! तो बाप कहते हैं कर्मेन्द्रियों की बड़ी जांच करनी चाहिए। कौन-सी कर्मेन्द्रिय धोखा देती है? पोतामेल निकालना चाहिए। व्यापार है ना। बाप समझाते हैं मेरे से व्यापार करना है, ऊंच पद पाना है तो श्रीमत पर चलो। बाप डायरेक्शन देंगे, उसमें भी माया विघ्न डालेगी। करने नहीं देगी। बाप कहते हैं यह भूलो मत। ग़फलत करने से फिर बहुत पछतायेंगे। कभी ऊंच पद नहीं पायेंगे। अभी तो खुशी से कहते हैं हम नर से नारायण बनेंगे परन्तु अपने से पूछते रहो – कहाँ कर्मेन्द्रियाँ धोखा तो नहीं देती हैं?

अपनी उन्नति करनी है तो बाप जो डायरेक्शन देते हैं उसे अमल में लाओ। सारे दिन का पोतामेल देखो। भूलें तो बहुत होती रहती हैं। आंखें बड़ा धोखा देती हैं। तरस पड़ेगा – इनको खिलाऊं, सौगात दूँ। अपना बहुत टाइम वेस्ट कर लेते हैं। माला का दाना बनने में बड़ी मेहनत है। 8 रत्न हैं मुख्य। 9 रत्न कहते हैं। एक तो बाबा, बाकी हैं 8, बाबा की निशानी तो चाहिए ना बीच में, कोई ग्रहचारी आदि आती है तो 9 रत्न की अंगूठी आदि पहनाते हैं। इतने ढेर पुरूषार्थ करने वालों से 8 निकलते हैं – पास विद् ऑनर्स। 8 रत्नों की बहुत महिमा है। देह-अभिमान में आने से कर्मेन्द्रियाँ बहुत धोखा देती हैं। भक्ति में भी चिंता रहती है ना, सिर पर पाप बहुत हैं – दान-पुण्य करें तो पाप मिट जाएं। सतयुग में कोई चिंता की बात नहीं क्योंकि वहाँ रावण-राज्य ही नहीं। वहाँ भी ऐसी बातें हो फिर तो नर्क और स्वर्ग में कुछ फ़र्क ही न रहे। तुमको इतना ऊंच पद पाने के लिए भगवान बैठ पढ़ाते हैं। बाबा याद नहीं पड़ता है, अच्छा पढ़ाने वाला टीचर तो याद पड़े। अच्छा भला यह याद करो कि हमारा एक ही बाबा सतगुरू है। मनुष्यों ने आसुरी मत पर बाप का कितना तिरस्कार किया है। बाप अब सब पर उपकार करते हैं। तुम बच्चों को भी उपकार करना चाहिए। किसी पर भी अपकार नहीं, कुदृष्टि भी नहीं। अपना ही नुकसान करते हैं। वह वायब्रेशन फिर दूसरों पर भी असर करता है। बाप कहते हैं बहुत बड़ी मंजिल है। रोज़ अपना पोतामेल देखो – कोई विकर्म तो नहीं बनाया? यह है ही विकर्मी दुनिया, विकर्मी संवत। विकर्माजीत देवताओं के संवत का कोई को पता नहीं। बाप समझाते हैं, विकर्माजीत संवत को 5 हज़ार वर्ष हुए फिर बाद में विकर्म संवत शुरू होता है। राजायें भी विकर्म ही करते रहते हैं, तब बाप कहते हैं कर्म-अकर्म-विकर्म की गति मैं तुमको समझाता हूँ। रावण राज्य में तुम्हारे कर्म विकर्म बन जाते हैं। सतयुग में कर्म अकर्म होते हैं। विकर्म बनता नहीं। वहाँ विकार का नाम ही नहीं। यह ज्ञान का तीसरा नेत्र अभी तुमको मिला है। अभी तुम बच्चे बाप के द्वारा त्रिनेत्री-त्रिकालदर्शी बने हो। मनुष्य कोई बना न सके। तुमको बनाने वाला है बाप। पहले जब आस्तिक हो तब त्रिनेत्री-त्रिकालदर्शी बनें। सारा ड्रामा का राज़ बुद्धि में है। मूलवतन, सूक्ष्मवतन, 84 का चक्र सब बुद्धि में है। फिर पीछे और धर्म आते हैं। वृद्धि को पाते रहते हैं। उन धर्म स्थापकों को गुरू नहीं कहेंगे। सर्व की सद्गति करने वाला सतगुरू एक ही है। बाकी वह कोई सद्गति करने थोड़ेही आते हैं। वह धर्म स्थापक हैं। क्राइस्ट को याद करने से सद्गति थोड़ही होगी। विकर्म विनाश थोड़ेही होंगे। कुछ भी नहीं। उन सबको भक्ति की लाइन में कहा जायेगा। ज्ञान की लाइन में सिर्फ तुम हो। तुम पण्डे हो। सबको शान्तिधाम, सुखधाम का रास्ता बताते हो। बाप भी लिबरेटर, गाइड है। उस बाप को याद करने से ही विकर्म विनाश होंगे।

अभी तुम बच्चे अपने विकर्म विनाश करने का पुरूषार्थ कर रहे हो तो तुम्हें ध्यान रखना है कि एक तरफ पुरूषार्थ, दूसरे तरफ विकर्म न होता रहे। पुरूषार्थ के साथ-साथ विकर्म भी किया तो सौगुणा हो जायेगा। जितना हो सके उतना विकर्म न करो। नहीं तो एडीशन भी होगी। नाम भी बदनाम करेंगे। जबकि जानते हो भगवान हमको पढ़ाते हैं तो फिर कोई विकर्म नहीं करना चाहिए। छोटी चोरी या बड़ी चोरी, पाप तो हो जाता है ना। यह आंखें बड़ा धोखा देती हैं। बाप बच्चों की चलन से समझ जाते हैं, कभी ख्याल भी न आये कि यह हमारी स्त्री है, हम ब्रह्माकुमार-कुमारी हैं, शिवबाबा के पोत्रे हैं। हमने बाबा से प्रतिज्ञा की है, राखी बांधी है, फिर आंखें क्यों धोखा देती हैं? याद के बल से कोई भी कर्मेन्द्रियों के धोखे से छूट सकते हो। बड़ी मेहनत चाहिए। बाप के डायरेक्शन पर अमल कर चार्ट लिखो। स्त्री-पुरूष भी आपस में यही बातें करो – हम तो बाबा से पूरा वर्सा लेंगे, टीचर से पूरा पढ़ेंगे। ऐसा टीचर कभी मिल न सके, जो बेहद की नॉलेज दे। लक्ष्मी-नारायण ही नहीं जानते तो उनके पिछाड़ी आने वाले कैसे जान सकते हैं। बाप कहते हैं यह सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान सिर्फ तुम जानते हो संगम पर। बाबा बहुत समझाते हैं – यह करो, ऐसे करो। फिर यहाँ से उठे तो खलास। यह नहीं समझते कि शिवबाबा हमको कहते हैं। हमेशा समझो शिवबाबा कहते हैं, इनका फोटो भी नहीं रखो। यह रथ तो लोन लिया है। यह भी पुरूषार्थी है, यह भी कहते हैं मैं बाबा से वर्सा ले रहा हूँ। तुम्हारे सदृश्य यह भी स्टूडेन्ट लाइफ में है। आगे चल तुम्हारी महिमा होगी। अभी तो तुम पूज्य देवता बनने के लिए पढ़ते हो। फिर सतयुग में तुम देवता बनेंगे। यह सब बातें सिवाए बाप के कोई समझा न सके। तकदीर में नहीं है तो संशय उठता है – शिवबाबा कैसे आकर पढ़ायेंगे! मैं नहीं मानता। मानते नहीं तो फिर शिवबाबा को याद भी कैसे करेंगे। विकर्म विनाश हो नहीं सकेंगे। यह सारी नम्बरवार राजधानी स्थापन हो रही है। दास-दासियाँ भी तो चाहिए ना। राजाओं को दासियाँ भी दहेज में मिलती हैं। यहाँ ही इतनी दासियाँ रखते हैं तो सतयुग में कितनी होंगी। ऐसा थोड़ेही ढीला पुरूषार्थ करना चाहिए जो दास-दासी जाकर बनें। बाबा से पूछ सकते हो – बाबा अभी मर जायें तो क्या पद मिलेगा? बाबा झट बता देंगे। अपना पोतामेल आपेही देखो। अन्त में नम्बरवार कर्मातीत अवस्था हो जानी है। यह है सच्ची कमाई। उस कमाई में रात-दिन कितना बिज़ी रहते हैं। सट्टे वाले जो होते हैं वह एक हाथ से खाना खाते हैं, दूसरे हाथ से फोन पर कारोबार चलाते रहते हैं। अब बताओ ऐसे आदमी ज्ञान में चल सकेंगे? कहते हैं हमको फुर्सत कहाँ। अरे, सच्ची राजाई मिलती है। बाप को सिर्फ याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। अष्ट देवता आदि को भी याद करते हैं ना। उनकी याद से तो कुछ भी मिलता नहीं। बाबा बार-बार हर एक बात पर समझाते रहते हैं। जो फिर ऐसे कोई न कहे कि फलानी बात पर तो समझाया नहीं। तुम बच्चों को पैगाम भी सबको देना है। एरोप्लेन से भी पर्चे गिराने लिए कोशिश करनी चाहिए। उसमें लिखो शिवबाबा ऐसे कहते हैं। ब्रह्मा भी शिवबाबा का बच्चा है। प्रजापिता है तो वह भी बाप, यह भी बाप। शिवबाबा कहने से भी बहुत बच्चों को प्रेम के आंसू आ जाते हैं। कभी देखा भी नहीं है। लिखते हैं बाबा कब आकर आपसे मिलेंगे, बाबा बन्धन से छुड़ाओ। बहुतों को बाबा का, फिर प्रिन्स का भी साक्षात्कार होता है। आगे चल बहुतों को साक्षात्कार होंगे फिर भी पुरूषार्थ तो करना पड़े। मनुष्य को मरने समय भी कहते हैं भगवान को याद करो। तुम भी देखेंगे पिछाड़ी में खूब पुरूषार्थ करेंगे। याद करने लगेंगे।

बाप राय देते हैं – बच्चे, जो समय मिले उसमें पुरूषार्थ कर मेकप कर लो। बाप की याद में रह विकर्म विनाश करो तो पीछे आते भी आगे जा सकते हो। जैसे ट्रेन लेट होती है तो मेकप कर लेते हैं ना। तुमको भी यहाँ समय मिलता है तो मेकप कर लो। यहाँ आकर कमाई करने लग जाओ। बाबा राय भी देते हैं – ऐसे-ऐसे करो, अपना कल्याण करो। बाप की श्रीमत पर चलो। एरोप्लेन से पर्चे गिराओ, जो मनुष्य समझें कि यह तो बरोबर ठीक पैगाम देते रहते हैं। भारत कितना बड़ा है, सबको मालूम पड़ना चाहिए जो फिर ऐसे न कहें कि बाबा हमको तो पता ही नहीं पड़ा। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सेन्सीबुल बन अपनी जांच करनी है कि आंखें धोखा तो नहीं देती हैं। कोई भी कर्मेन्द्रिय के वश हो उल्टा कर्म नहीं करना है। याद के बल से कर्मेन्द्रियों के धोखे से छूटना है।

2) इस सच्ची कमाई के लिए समय निकालना है, पीछे आते भी पुरूषार्थ से मेकप कर लेना है। यह विकर्म विनाश करने का समय है इसलिए कोई भी विकर्म नहीं करना है।

वरदान:- हर कन्डीशन में सेफ रहने वाले एयरकन्डीशन की टिकिट के अधिकारी भव
एयरकन्डीशन की टिकेट उन्हीं बच्चों को मिलती है जो यहाँ हर कन्डीशन में सेफ रहते हैं। कोई भी परिस्थिति आ जाए, कैसी भी समस्यायें आ जाएं लेकिन हर समस्या को सेकण्ड में पार करने का सर्टीफिकेट चाहिए। जैसे उस टिकिट के लिए पैसे देते हो ऐसे यहाँ “सदा विजयी” बनने की मनी चाहिए – जिससे टिकिट मिल सके। यह मनी प्राप्त करने के लिए मेहनत करने की जरूरत नहीं, सिर्फ बाप के सदा साथ रहो तो अनगिनत कमाई जमा होती रहेगी।
स्लोगन:- कैसी भी परिस्थिति हो, परिस्थिति चली जाए लेकिन खुशी नहीं जाए।

TODAY MURLI 4 JULY 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 4 July 2020

04/07/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, if you want to become elevated, examine your chart every day to see that none of your physical organs deceive you. The eyes are very deceitful. Therefore, remain very cautious with them.
Question: What is the worst habit of all and what is the way to remain safe from it?
Answer: The worst habit is to please your taste buds. When some of you see something nice, you eat it secretly. To hide something means to steal. Maya, in the form of stealing, catches hold of many by their nose and ears. The way to remain safe from this habit is to punish yourself when your intellect is being pulled by something. In order to remove your bad habits you have to punish yourself a great deal.

Om shanti. Are you sitting here in soul consciousness? You have to ask yourself everything. Am I sitting here in soul consciousness and remembering the Father? The Shiv Shakti Pandava Army has been remembered. You are Shiv Baba’s army sitting here. In that physical army, there are just young men; there aren’t any old people or children etc. In this army, there are young, old and children etc. All are sitting here. This is the army for conquering Maya. Each one of you has to conquer Maya and claim your unlimited inheritance from the Father. You children know that Maya is very powerful. Your physical organs deceive you the most. Write in your chart which physical organ deceived you today. “Today, I saw so-and-so and wanted to touch her.” The eyes cause a lot of damage. Examine each of the physical organs. Which physical organ causes the most damage? There is the example of Surdas based on this (he blinded himself). You have to check yourself. The eyes can deceive you a lot. Maya deceives even good children. Even though they do very good service, their eyes deceive them a great deal. You have to pay great attention because they are your enemy. They make you destroy your status. Sensible children should note this down very well. Keep a diary in your pocket. On the path of devotion, when their intellects go in the wrong direction, they pinch themselves. You too should punish yourselves. You have to remain very cautious. Check that your physical organs are not deceiving you. If they do, then step away. Do not remain standing there looking at that person. There is a great deal of upheaval (of bad vision) between men and women. As soon as they see one another, there is the vision of vice. This is why sannyasis sit with their eyes closed. Some sannyasis sit with their backs to women. What do those sannyasis receive? They would collect one or two million or even a billion. When they die, everything is finished. Then, they would accumulate money again in their next birth. Whatever you children receive now becomes your imperishable inheritance. There is no greed for wealth there. You lack nothing there for which you would have to beat your head. There is the difference of day and night between the end of the iron age and the beginning of the golden age. There is limitless happiness there; there is nothing here. Baba constantly says: Definitely write the words “most elevated” with the word “confluence”. You have to speak the words clearly because it becomes easy to explain. It is said that human beings were transformed into deities. Therefore, He would surely have to come at the confluence age to make them into deities, to change the residents of hell into the residents of heaven. Human beings are in extreme darkness. They don’t know what heaven is. Those of other religions are unable even to see heaven. This is why Baba says: Your religion is one that gives a great deal of happiness. That place is called heaven. However, they don’t understand that they too can go to heaven. No one knows this. The people of Bharat have forgotten this. They say that heaven existed hundreds of thousands of years ago. Christians themselves say that heaven existed 3000 years before Christ. Lakshmi and Narayan are called a goddess and god. It would surely be God who creates gods and goddesses. So, you have to make effort. Check your chart every day. Which physical organ deceived you? The tongue is no less. Whenever some of you see something good, you eat it secretly. You don’t understand that that is a sin, that it is stealing and that, to steal from Shiv Baba’s yagya too is very bad. Anyone who even steals a straw could have the habit of stealing a thousand. Maya catches hold of many by their nose. All of those bad habits have to be removed. You should continue to punish yourself. For as long as you still have bad habits, you will not be able to claim a high status. It is not a big thing to go to heaven. However, there is such a great difference between being a king or queen and a subject. So, the Father says: Keep a check on your physical organs. Which physical organs deceive you? Keep a chart because this too is a business. The Father explains: If you want to do business with Me, if you want to claim a high status, follow shrimat. The Father gives you directions, but Maya puts obstacles in your way; she doesn’t allow you to follow them. The Father says: Don’t forget that when you make mistakes, you will have to repent a great deal and never be able to claim a high status. At the moment, you happily say that you will become Narayan from an ordinary human. However, you must continue to ask yourself: Are my physical organs deceiving me? In order to make progress, continue to put into practice the directions that the Father gives you. Look at your chart for the whole day. Many mistakes continue to be made. The eyes deceive you a great deal. Sometimes, you feel pity for someone and you want to give that one some food or a gift. A great deal of time is wasted in that. It takes great effort to become a bead of the rosary. The eight jewels are the main ones. Nine jewels are spoken of. One is Baba and then there are the other eight beads. The one in the middle symbolizes Baba. When people experience bad omens, they are given a ring of nine jewels to wear. Out of so many effort-makers, eight emerge who pass with honours. There is a great deal of praise of the eight jewels. When you become body conscious, your physical organs deceive you. They also have this concern on the path of devotion, that there is a burden of many sins on their heads. They feel that if they give a donation or perform charity, their sins can be erased. There is nothing to worry about in the golden age because there is no kingdom of Ravan there. If the same thing were to happen there that happens here, there would not be any difference between heaven and hell. God sits here and teaches you how to claim such a high status. If you can’t remember Baba, then remember the Teacher who is teaches you. Then, you can also remember that only our one Baba is the Satguru. By following devilish dictates, human beings have dishonoured the Father so much. The Father now uplifts everyone. You children also have to uplift everyone. Neither should there be any defamation of anyone nor should there be impure vision towards anyone. Otherwise, you will cause yourself a loss. Those vibrations will then also affect others. The Father says: The destination is very high. Look at your chart every day: did I perform any sinful acts? This is the world of sinful acts, the era of performing sinful acts. No one knows about the era of the deities who conquered sinful acts. The Father explains that it is 5000 years since the era of conquering sin began. Later, the era of vices began. Even the kings here continue to perform sinful acts, and this is why the Father says: I explain to you the philosophy of karma, neutral karma and sinful karma. In the kingdom of Ravan, your acts are sinful. In the golden age, acts are neutral. There are no sins committed there; there is no mention of vice there. You have now each received a third eye of knowledge. You children have now been made trinetri and trikaldarshi by the Father. No human being can make you this. It is the Father who makes you this. You first become theists and you then become trinetri and trikaldarshi. The secrets of the whole drama are in your intellects. The incorporeal world, the subtle region and the cycle of 84 births; everything is in your intellects. Later, all the other religions come; they continue to expand. Those founders of religions would not be called gurus. Only the one Satguru grants salvation to everyone. None of the others come to grant salvation; they are founders of religions. No one receives salvation by remembering Christ nor would anyone’s sins be absolved; not at all! All of them are said to be in the line of devotion. Only you are in the line of knowledge. You are guides. You show everyone the path to the land of peace and the land of happiness. The Father is the Liberator and the Guide. It is only by remembering that Father that your sins can be absolved. You children are now making effort to have your sins absolved. Therefore, you have to pay attention so that, on the one hand you make effort, on the other hand you don’t perform any sinful acts. If, while making effort, you perform any sinful acts, there will be one hundred-fold punishment. Try as much as possible not to perform any sinful acts. Otherwise, there will be an addition and your name will also be defamed. When you know that it is God who is teaching you, you shouldn’t perform any sinful actions. Whether a small thing is stolen or a big thing is stolen, it is still a sin that is committed. These eyes deceive you a great deal. The Father understands from the children’s behaviour. There should never be the thought “This one is my wife.” We are Brahma Kumars and Kumaris; we are grandchildren of Shiv Baba. We have made a promise to Baba and have had a rakhi tied. Therefore, why should our eyes deceive us? With the power of remembrance, you can be liberated from being deceived by any of your physical organs. A great deal of effort is required. Follow the Father’s directions and write your chart. Husband and wife should also talk about these things between themselves: I will definitely claim the full inheritance from the Father and study fully with the Teacher. You will never find such a Teacher anywhere else who could give you this unlimited knowledge. Since Lakshmi and Narayan don’t have this knowledge, how could those who come after them have it? The Father says: Only you have the knowledge of the beginning, the middle and the end of the world and you only have it at the confluence age. Baba explains to you a great deal what to do and how to do it, but, as soon as you get up from here, everything finishes. You don’t understand that it is Shiv Baba who is telling you. Always consider it to be Shiv Baba who is speaking to you. Don’t even keep a photo of this one. This chariot has been taken on loan. This one is also an effort-maker. He says: I too receive my inheritance from Baba. This one is also leading a studentlife like you. As you make further progress, you will be praised. You are now studying to become worthy-of-worship deities. Then, in the golden age, you will become deities. No one except the Father can explain all of these aspects. When it is not in someone’s fortune, he has doubts about how Shiv Baba comes and teaches. They say: “I don’t believe this.” If he doesn’t believe this, how could he even remember Shiv Baba? In that case, his sins will not be absolved. A numberwise kingdom is being established. Maids and servants are also needed. Kings are given maids as part of the dowry. People have so many maids and servants here. So you can imagine how many there would be in the golden age. You should not make such slack effort that you become a maid or a servant. If you asked Baba what status you would claim if you were to die now, Baba would instantly tell you: Look at your own chart yourself. At the end you will all reach your karmateet stage, numberwise. This is a true income. People remain busy day and night in earning other incomes. Stockbrokers eat meals with one hand and run their businesses over the phone with the other hand. Now, tell Me: how could such a person follow the path of knowledge? He would say: I don’t have the time. Ah! but you receive a true kingdom here. Simply remember the Father and your sins will be absolved. People remember the eight special deities etc. Nothing can be achieved by remembering them. Baba continually explains each and every thing again and again so that none of you can say that He didn’t explain any one particular aspect. You children have to give everyone the message. You should also try to drop leaflets from an aeroplane. Write in those leaflets: This is what Shiv Baba says. Brahma too is Shiv Baba’s child. Since he is Prajapita, he is the father and that One is also the Father. Many children have tears of love just by saying “Shiv Baba”. They haven’t even seen Him, and so they write: Baba, when can I come and meet You? Baba, liberate me from this bondage! Many have visions of Baba, and then of a prince. As you progress further, many will have visions, but you also have to make effort. When someone is dying, he is told to remember God. You will see how everyone makes a great deal of effort at the end. They will all begin to remember Him. The Father advises you: Children, try and makeup whatever time you can. Stay in remembrance of the Father and have yourselves absolved of your sins. Then, even if you have come late, you will be able to go ahead. Just as when a train is late, it is able to make up that lost time, so, here, too, you have time to be able to make up lost time. Come here and engage yourselves in earning your income. The Father advises you what to do to benefit yourselves. Follow the Father’s shrimat. Drop leaflets from an aeroplane so that people can understand that you are giving the right message. Bharat is huge. Everyone must come to know so that no one can then say “Baba, I didn’t even know anything about this.” Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Become sensible and check that your eyes are not deceiving you. Don’t perform any wrong acts under the influence of your physical organs. With the power of remembrance liberate yourself from the deceit of physical organs.
  2. Make time to earn this true income. Even though you may have come late, you can still make up time by making effort. This is the time to have yourselves absolved of your sins. Therefore, don’t perform any sinful acts.
Blessing: May you claim a right to an air-conditioned ticket by remaining safe in every condition.
The children who remain safe here in every condition are the ones who receive an air-conditioned ticket. No matter what situations arise, what problems come, you need to have a certificate to overcome any problem in a second. Just as you have to pay money for that ticket, in the same way, you need to have the money here of “being constantly victorious” with which you can receive a ticket. There is no need to work hard to earn this money, but simply to stay with the Father all the time and you will continue to accumulate a countless income.
Slogan: No matter what the situation is, let it go, but never let your happiness go.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 4 JULY 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 4 July 2019

Today Murli in Hindi :- Click Here

Read Murli 3 July 2019:- Click Here

04/07/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you should have an interest in reading about and listening to news of service because your zeal and enthusiasm increase through this and thoughts of how to do service emerge.
Question: At the confluence age, the Father doesn’t give you happiness, but He shows you the path to happiness. How is this?
Answer: Because all are the children of the Father, if He were to give happiness to one child, that would not be right. Children receive accurate shares from their physical father. The unlimited Father does not distribute shares, but He shows the path to happiness. Those who follow that path and make effort receive a high status. You children have to make effort; everything depends on your efforts.

Om shanti. You children understand that the Father plays the murli (flute). The murli is sent to everyone. The news of those who study the murli and do serviceis printed in the magazines. Now, those children who read the magazines can come to know the service news of all the centresthat service is taking place in such-and-such a place. Those who don’t read them will not know any news, nor will they make effort. When you hear news of service, it enters your hearts that you also want to do that type of service. By reading the magazines, you can come to know how much service your brothers and sisters are doing. You children understand that the more service you do, the higher the status you will claim. Therefore, the magazines can give you enthusiasm for service; they are not made without any purpose. Those who don’t read them consider them to be useless. Some say that they cannot read or write. Ah! people go to listen to Ramayana, the Bhagawad, the Gita etc., and so you should also listen to these. Otherwise your enthusiasm for service will not increase. This service took place at such-and-such a place. If you have an interest, you can ask someone to read it to you. There must be children at many centres who don’t read the magazines. There are many who do not do the slightest service and so they will claim a status accordingly. You understand that a kingdom is being established and that you will claim a status according to the effort you make. You will fail if you don’t pay attention to studying. Everything depends on how much you study now. The more you study and teach others, the more you yourself will benefit. There are many children who don’t even think of reading the magazines. They will only claim a status worth pennies. There, you will not have the thought that someone didn’t make effort and this is why he has received that status; no. It is here that intellects have the aspects of karma and sinful karma. The Father explains to you at the confluence age of every cycle. Those who do not understand are like ones with stone intellects. You also understand that you had impure intellects and that there is also a percentage in that. Baba continues to explain to you children: It is now the iron age and there is limitless sorrow in this. There is this-and-that sorrow. Those who are sensible will quickly understand that what He says is correct. You also understand that, yesterday, you were very unhappy; you were in the midst of limitless sorrow. You are now again going into limitless happiness. You also know that this is the iron age, the kingdom of Ravan. If you understand but are not able to explain to others, then Baba would say that you have not understood anything. When you do service it can be said that you understand and the news of that service would be mentioned in the magazine. Day by day, Baba continues to speak many easy points. People think that the iron age is still in its infancy. It is only when they understand the confluence age that they can compare this iron age with the golden age, and that there is limitless sorrow in the iron age and limitless happiness in the golden age. Tell them: The Father gives us children limitless happiness which we are telling you about. No one else can explain this. You relate new aspects. No one else would ask whether you are a resident of heaven or of hell. You children are also numberwise. You are not able to remember all the points. You come into body consciousness when explaining to others. It is souls that listen and imbibe this. However, even some good maharathis forget this and they start to speak in a state of body consciousness. This happens to everyone. The Father says: All are effort-makers. It is not that you all speak while considering yourselves to be souls; no. The Father considers you to be souls and gives you knowledge. However, those who are brothers are still making effort in order to maintain that stage. Therefore, you children have to explain that there is limitless sorrow in the iron age and limitless happiness in the golden age. It is now the confluence age. The Father shows you the path; it is not that the Father gives you happiness. He shows you the path to happiness. Ravan does not cause you sorrow either. He shows you the wrong path; the path to sorrow. The Father neither causes you sorrow nor gives you happiness. He shows you the path to happiness. Then, each of you receives happiness according to the effort you make. He does not give you happiness. It is by following the Father’s shrimat that you receive happiness. The Father simply shows you the path. You are led onto the path of sorrow by Ravan. If the Father gave anything, everyone would have to receive an equal inheritance. A physical father distributes his inheritance. Here, it depends on how much effort each of you makes. The Father shows you a very easy path: If you do this and this, you will claim a high status. You children have to make effort: We should try and claim the highest status. We have to study. It is not that you should have an attitude of letting others study and claim a high status whilst you sit back. No; effort comes first. According to the drama, you definitely do have to make effort. Some make fast effort and some make dull effort. Everything depends on your efforts. The Father has shown you the path. He says: Remember Me! The more you remember Me, to that extent your sins will be absolved. You should not leave it to the dramaThis is also something that you have to understand. World history and geography repeats. So, surely, whatever part you played before has to be played again. All the religions will come again at their own time. For example, if there are a billion Christians, that many will come again to play their parts. A soul is never destroyed nor is his part ever destroyed. This is something that you have to understand. Those who understand will definitely explain to others. “Donate wealth and it will never diminish”. You will continue to imbibe knowledge and continue to make others wealthy. However, if it is not in your fortune, you consider yourself to be helpless. The Teacher would say that if you are not able to relate this knowledge, that is then your fortune of your status becoming worth only pennies. If it is not in your fortune, what effort would you make? This is an unlimited school. Every teacher teaches his or her own subject. Only the Father and you children know the Father’s methods of teaching. No one else can know them. Although you children try very hard to explain, very few understand; it does not sit in their intellects. The closer you come, the clearer it will be that you are becoming cleverer. Museums and spiritual colleges etc. are now being opened. Your name, “Spiritual University” is unique. The Government will also see this. Tell them: Your universities are physical whereas this is spiritual: spirits are studying. In the whole of the cycle of 84 births, the spiritual Father only comes once to teach the spiritual children. When you see a film, it repeats identically every three hours. This cycle of 5000 years also repeats identically. Only you children know this. Those people only believe the scriptures of the path of devotion to be right. You do not have any scriptures. The Father sits here and explains to you. The Father did not study any scriptures. Those people read and relate the Gita. A baby doesn’t come out of the mother’s womb educated. It is in the unlimited Father’s part to teach you. He gives His own introduction. No one in the world knows this. You also sing that the Father is the Ocean of Knowledge. They do not say of Krishna that he is the Ocean of Knowledge. Are Lakshmi and Narayan Oceans of Knowledge? No. It is a wonder that only we Brahmins give this knowledge on the basis of shrimat. On account of this, you can explain that only you Brahmins are the children of Prajapita Brahma. You have become his children many times and you will become those again. Only when human beings understand this will they believe it. You understand that you become the adopted children of Prajapita Brahma cycle after cycle. The intellects of those who understand also develop faith. How can you become a deity without first becoming a Brahmin? Everything depends on each one’s intellect. This happens in schools: some win a scholarship whereas others fail. They have to study again from the beginning. The Father says: If you fall into vice, everything you had earned is destroyed and knowledge cannot sit in your intellect. Your conscience will continue to bite you inside. Each one of you is aware of the sins you have committed in this birth. You do not remember the sins you have committed in your previous births. You definitely committed sins. Those who were pure charitable souls have become sinful souls. The Father sits here and explains the whole account. There are many children who forget this and don’t study. If they did study, they would definitely teach others. Some with dull intellects become ones with clever intellects. This study is so great. The sun and moon dynasties are going to be created through this Father’s study. Those people study in this one birth and claim their status in this same birth. You understand that you will claim your status from this study in the new world. That is not far away. Just as you change your clothes, in the same way, you will leave the old world and go to the new world. Destruction will definitely take place. You are now becoming those who belong to the new world and you will have to leave your old costumes behind. The kingdom is being established, numberwise. Those who study well will go to heaven first. The rest will come later; they will not be able to go to heaven. The maids and servants in heaven will be the ones who would have climbed into Baba’s heart. It is not that everyone will go there. Spiritual colleges etc. are now being opened. Everyone will come and make effort. Those who are clever at studying will claim a high status. Those with dull intellects will claim a low status. It is possible that someone with a dull intellect will be able to make good effort later on. Some with sensible intellects also fall. This is understood from the efforts they make. This whole drama carries on. Souls adopt bodies and play their parts here. They adopt new bodies and play new parts; they become something or other. Sanskars are contained in each soul. No one outside has the slightest knowledge. It is only when the Father comes and teaches you that you receive knowledge. How could you be given knowledge if there were not the teacher? Those are devotees. There is limitless sorrow on the path of devotion. Although Meera had a vision, she did not have happiness. Would she not have fallen ill? There, there are no aspects of any type of sorrow. Here, there is limitless sorrow whereas there, there is limitless happiness. Here, everyone is unhappy. Kings experience sorrow too: the very name is the land of sorrow. That is the land of happiness. This is the age of the confluence of total sorrow and total happiness. There is total happiness in the golden age and total sorrow in the iron age. All the varieties of sorrow are continuing to increase. As time goes by, sorrow will increase even more. Mountains of limitless sorrow are yet to fall. Those people give you very little time to speak. Even if they give you two minutes, explain that there was limitless happiness in the golden age which the Father gives. You receive limitless sorrow from Ravan. The Father now says: Gain victory over lust and you will become the conquerors of the world. This knowledge is never destroyed. Even if a soul hears a little, he will go to heaven. Many become subjects. There is a vast difference between a king and a pauper. Each one’s intellect is different. Those who understand this knowledge and explain it to others will claim a good status. This schoolis also most uncommon! God comes here and teaches you! Shri Krishna is a human being with divine virtues. The Father says: I am beyond divine virtues and devilish traits. I, your Father, come to teach you. Only the Supreme Spirit can give spiritual knowledge. This knowledge of the Gita is not given by any bodily being or deity. They say: Salutations to the deity Vishnu. So, who is Krishna? The deity Krishna is Vishnu. No one else knows this. There are some amongst you too who forget this. If you yourself have understood fully, you should be able to explain to others. When you bring the proof of service here, it can be understood that you have done service. This is why Baba says: Do not write long-winded news, such as that so-and-so is going to come or that this is what he said. There is no need to write that. You have to write in brief. When he comes, see if he stays! After he has understood knowledge and begins to do service, you can then write to Baba. Some write news just for show. Baba wants to see the result of everything. Many come to Baba but then leave. What benefit is there in that? What can Baba do with them? They do not take benefit and nor do you. Your mission will not expand through that. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Never allow yourself to be helpless in any situation. Imbibe knowledge yourself and donate it to others. You also have to awaken the fortune of others.
  2. At the time of speaking to anyone, first consider yourself to be a soul and then speak to that soul. There should not be the slightest body consciousness. Distribute to others the limitless happiness that you receive from the Father.
Blessing: May you be a jewel of contentment and with the awareness of your eternal form, experience and enable others to experience contentment.
Bring into your awareness your eternal and original forms and when you stabilise in that awareness, you yourself will remain content and you will also be able to give others the experience of the speciality of contentment. The reason for discontentment is a lack of some attainment. Your sloganis: I have attained what I wanted to attain. To belong to the Father means to claim a right to the inheritance. Souls who have such rights are always full and are jewels of contentment.
Slogan: In order to become equal to the Father, let there be equality in your understanding, your desires and your actions.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 4 JULY 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 4 July 2019

To Read Murli 3 July 2019 :- Click Here
04-07-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – सर्विस समाचार सुनने, पढ़ने का भी तुम्हें शौक चाहिए, क्योंकि इससे उमंग-उत्साह बढ़ता है, सर्विस करने का संकल्प उठता हैˮ
प्रश्नः- संगमयुग पर बाप तुम्हें सुख नहीं देते हैं लेकिन सुख का रास्ता बताते हैं – क्यों?
उत्तर:- क्योंकि बाप के सब बच्चे हैं, अगर एक बच्चे को सुख दें तो यह भी ठीक नहीं। लौकिक बाप से बच्चों को बराबर हिस्सा मिलता है, बेहद का बाप हिस्सा नहीं बाँटते, सुख का रास्ता बताते हैं। जो उस रास्ते पर चलते हैं, पुरूषार्थ करते हैं, उन्हें ऊंच पद मिलता है। बच्चों को पुरूषार्थ करना है, सारा मदार पुरूषार्थ पर है।

ओम् शान्ति। बच्चे जानते हैं बाप मुरली बजाते हैं। मुरली सबके पास जाती है और जो मुरली पढ़कर सर्विस करते हैं उन्हों का समाचार मैगज़ीन में आता है। अब जो बच्चे मैगज़ीन पढ़ते हैं, उन्हें सेन्टर्स के सर्विस समाचार का मालूम पड़ेगा – फलानी-फलानी जगह ऐसी सर्विस हो रही है। जो पढ़ेंगे ही नहीं तो उनको कुछ भी समाचार का मालूम नहीं पड़ेगा और पुरूषार्थ भी नहीं करेंगे। सर्विस का समाचार सुनकर दिल में आता है मैं भी ऐसी सर्विस करूँ। मैगज़ीन से मालूम पड़ता है, हमारे भाई-बहिन कितनी सर्विस करते हैं। यह तो बच्चे समझते हैं – जितनी सर्विस, उतना ऊंच पद मिलेगा इसलिए मैगज़ीन भी उत्साह दिलाती है सर्विस के लिए। यह कोई फालतू नहीं बनती है। फालतू वह समझते हैं जो खुद पढ़ते नहीं हैं। कोई कहते हम अक्षर नहीं जानते, अरे रामायण, भागवत, गीता आदि सुनने के लिए जाते हैं, यह भी सुननी चाहिए। नहीं तो सर्विस का उमंग नहीं बढ़ेगा। फलानी जगह यह सर्विस हुई। शौक हो तो किसको कहें वह पढ़कर सुनाये। बहुत सेन्टर्स पर ऐसे भी होगा जो मैगज़ीन नहीं पढ़ते होंगे। बहुत हैं जिनके पास तो सर्विस का नाम-निशान भी नहीं रहता। तो पद भी ऐसा पायेंगे। यह तो समझते हैं राजधानी स्थापन हो रही है, उसमें जो जितनी मेहनत करते हैं, उतना पद पाते हैं। पढ़ाई में अटेन्शन नहीं देंगे तो फेल हो जायेंगे। सारा मदार है इस समय की पढ़ाई पर। जितना पढ़ेंगे और पढ़ायेंगे उतना अपना ही फ़ायदा है। बहुत बच्चे हैं जिनको मैगज़ीन पढ़ने का ख्याल भी नहीं आता है। वो पाई-पैसे का पद पा लेंगे। वहाँ यह ख्यालात नहीं रहती कि इसने पुरूषार्थ नहीं किया है तो यह पद मिला है। नहीं। कर्म-विकर्म की बातें सब यहाँ बुद्धि में हैं।

कल्प के संगमयुग पर ही बाप समझाते हैं, जो नहीं समझते हैं वह तो जैसे पत्थरबुद्धि हैं। तुम भी समझते हो हम तुच्छ बुद्धि थे फिर उसमें भी परसेन्टेज़ होती हैं। बाबा बच्चों को समझाते रहते हैं, अभी कलियुग है, इनमें अपार दु:ख होते हैं। यह-यह दु:ख हैं, जो सेन्सीबुल होंगे वह झट समझ जायेंगे कि यह तो ठीक बोलते हैं। तुम भी जानते हो कल हम कितने दु:खी थे, अपार दु:खों के बीच थे। अभी फिर अपार सुखों के बीच में जा रहे हैं। यह है ही रावण राज्य कलियुग – यह भी तुम जानते हो। जो जानते हैं लेकिन औरों को नहीं समझाते है तो बाबा कहेगा कुछ नहीं जानते हैं। जानते हैं तब कहें जब सर्विस करें, समाचार मैगज़ीन में आये। दिन-प्रतिदिन बाबा बहुत सहज प्वाइंट्स भी सुनाते रहते हैं। वो लोग तो समझते कलियुग अजुन बच्चा है, जब संगम समझें तब भेंट कर सकें – सतयुग और कलियुग में। कलियुग में अपार दु:ख हैं, सतयुग में अपार सुख हैं। बोलो, अपार सुख हम बच्चों को बाप दे रहे हैं जो हम वर्णन कर रहे हैं। और कोई ऐसे समझा न सके। तुम नई बातें सुनाते हो और कोई तो यह पूछ न सके कि तुम स्वर्गवासी हो या नर्कवासी हो? तुम बच्चों में भी नम्बरवार हैं, इतनी प्वाइंट्स याद नहीं कर सकते हैं, समझाने समय देह-अभिमान आ जाता है। आत्मा ही सुनती वा धारण करती है। परन्तु अच्छे-अच्छे महारथी भी यह भूल जाते हैं। देह-अभिमान में आकर बोलने लग पड़ते हैं, ऐसे सबका होता है। बाप तो कहते हैं सब पुरूषार्थी हैं। ऐसे नहीं कि आत्मा समझ बात करते हैं। नहीं, बाप आत्मा समझ ज्ञान देते हैं। बाकी जो भाई-भाई हैं, वह पुरूषार्थ कर रहे हैं – ऐसी अवस्था में ठहरने का। तो बच्चों को भी समझाना है, कलियुग में अपार दु:ख हैं, सतयुग में अपार सुख हैं। अभी संगमयुग चल रहा है। बाप रास्ता बताते हैं, ऐसे नहीं बाप सुख देते हैं। सुख का रास्ता बताते हैं। रावण भी दु:ख देते नहीं हैं, दु:ख का उल्टा रास्ता बताते हैं। बाप न दु:ख देते हैं, न सुख देते हैं, सुख का रास्ता बताते हैं। फिर जो जितना पुरूषार्थ करेंगे उतना सुख मिलेगा। सुख देते नहीं हैं। बाप की श्रीमत पर चलने से सुख पाते हैं। बाप तो सिर्फ रास्ता बताते हैं, रावण से दु:ख का रास्ता मिलता है। अगर बाप देता हो तो फिर सबको एक जैसा वर्सा मिलना चाहिए। जैसे लौकिक बाप भी वर्सा बांटते हैं। यहाँ तो जो जैसा पुरूषार्थ करे। बाप रास्ता बहुत सहज बताते हैं। ऐसे-ऐसे करेंगे तो इतना ऊंच पद पायेंगे। बच्चों को पुरूषार्थ करना होता है – हम सबसे जास्ती पद पायें, पढ़ना है। ऐसे नहीं यह भल ऊंच पद पायें, मैं बैठा रहूँ। नहीं, पुरूषार्थ फर्स्ट। ड्रामा अनुसार पुरूषार्थ जरूर करना होता है। कोई तीव्र पुरूषार्थ करते हैं, कोई डल। सारा पुरूषार्थ पर मदार है। बाप ने तो रास्ता बताया है – मुझे याद करो। जितना याद करेंगे उतना विकर्म विनाश होंगे। ड्रामा पर छोड़ नहीं देना है। यह तो समझ की बात है।

वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होती है। तो जरूर जो पार्ट बजाया है वही बजाना पड़े। सब धर्म फिर से अपने समय पर आयेंगे। समझो क्रिश्चियन अब 100 करोड़ हैं फिर इतने ही पार्ट बजाने आयेंगे। न आत्मा विनाश होती, न उनका पार्ट कभी विनाश हो सकता है। यह समझने की बातें हैं। जो समझते हैं तो समझायेंगे भी जरूर। धन दिये धन ना खुटे। धारणा होती रहेगी, औरों को भी साहूकार बनाते रहेंगे लेकिन तकदीर में नहीं है तो फिर अपने को भी बेवश समझते हैं। टीचर कहेंगे तुम बोल नहीं सकते तो तुम्हारी तकदीर में पाई-पैसे का पद है। तकदीर में नहीं तो तदबीर क्या कर सकते। यह है बेहद की पाठशाला। हर एक टीचर की सब्जेक्ट अपनी होती है। बाप के पढ़ाने का तरीका बाप ही जाने और तुम बच्चे जानो, और कोई नहीं जान सकते। तुम बच्चे कितनी कोशिश करते हो तो भी जब कोई समझें। बुद्धि में बैठता ही नहीं है। जितना नज़दीक होते जायेंगे, देखने में आता है होशियार होते जायेंगे। अब म्युज़ियम, रूहानी कॉलेज आदि भी खोलते हैं। तुम्हारा तो नाम ही न्यारा है रूहानी युनिवर्सिटी। गवर्मेन्ट भी देखेगी। बोलो तुम्हारी है जिस्मानी युनिवर्सिटी, यह है रूहानी। रूह पढ़ती है। सारे 84 के चक्र में एक ही बार रूहानी बाप आकर रूहानी बच्चों को पढ़ाते हैं। ड्रामा (फिल्म) तुम देखेंगे फिर 3 घण्टे बाद हूबहू रिपीट होगा। यह भी 5 हज़ार वर्ष का चक्र हूबहू रिपीट होता है। यह तुम बच्चे जानते हो। वह तो सिर्फ भक्ति में शास्त्रों को ही राइट समझते हैं। तुमको तो कोई शास्त्र नहीं है। बाप बैठ समझाते हैं, बाप कोई शास्त्र पढ़ा है क्या? वह तो गीता पढ़कर सुनायेंगे। पढ़ा हुआ तो माँ के पेट से नहीं निकलेगा। बेहद के बाप का पार्ट है पढ़ाने का। अपना परिचय देते हैं। दुनिया को तो पता ही नहीं। गाते भी हैं – बाप ज्ञान का सागर है। कृष्ण के लिए नहीं कहते ज्ञान का सागर है। यह लक्ष्मी-नारायण ज्ञान सागर हैं क्या? नहीं। यही वन्डर है, हम ब्राह्मण ही यह ज्ञान सुनाते हैं श्रीमत पर। तुम समझाते हो इस हिसाब से हम ब्राह्मण ही प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान ठहरे। अनेक बार बने थे, फिर होंगे। मनुष्यों की समझ में जब आयेगा तब मानेंगे। तुम जानते हो कल्प-कल्प हम प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान एडाप्टेड बच्चे बनते हैं। जो समझते हैं वह निश्चयबुद्धि भी हो जाते हैं। ब्राह्मण बनने बिगर देवता कैसे बनेंगे। हर एक की बुद्धि पर है। स्कूल में ऐसा होता है – कोई तो स्कॉलरशिप लेते, कोई फेल हो पड़ते हैं। फिर नयेसिर पढ़ना पड़े। बाप कहते हैं विकार में गिरे तो की कमाई चट हुई, फिर बुद्धि में बैठेगा नहीं। अन्दर खाता रहेगा।

तुम समझते हो इस जन्म में जो पाप किये हैं, उनका तो सबको पता है। बाकी आगे जन्मों में क्या किया है वह तो याद नहीं है। पाप किये जरूर हैं। जो पुण्य आत्मा थे वही फिर पाप आत्मा बनते हैं। हिसाब-किताब बाप बैठ समझाते हैं। बहुत बच्चे हैं, भूल जाते हैं, पढ़ते नहीं हैं। अगर पढ़ें तो जरूर पढ़ायें भी। कोई डल बुद्धि होशियार बुद्धि बन जाते, कितनी बड़ी पढ़ाई है। इस बाप की पढ़ाई से ही सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी घराना बनने का है। वह इस जन्म में ही पढ़कर और मर्तबा पा लेते हैं। तुम तो जानते हो इस पढ़ाई का पद फिर नई दुनिया में मिलना है। वह कोई दूर नहीं है। जैसे कपड़ा बदला जाता है ऐसे ही पुरानी दुनिया को छोड़ जाना है नई दुनिया में। विनाश भी होगा जरूर। अब तुम नई दुनिया के बन रहे हो। फिर यह पुराना चोला छोड़ जाना है। नम्बरवार राजधानी स्थापन हो रही है, जो अच्छी रीति पढ़ेंगे वही पहले स्वर्ग में आयेंगे। बाकी पीछे आयेंगे। स्वर्ग में थोड़ेही आ सकेंगे। स्वर्ग में जो दास-दासियां होंगे वह भी दिल पर चढ़े हुए होंगे। ऐसे नहीं कि सब आ जायेंगे। अब रूहानी कॉलेज आदि खोलते रहते हैं, सब आकर पुरूषार्थ करेंगे। जो पढ़ाई में ऊंचे तीखे जायेंगे, वह ऊंच पद पायेंगे। डल बुद्धि कम पद पायेंगे। हो सकता है, आगे चल डल बुद्धि भी अच्छा पुरूषार्थ करने लग पड़े। कोई समझदार बुद्धि नीचे भी चले जाते हैं। पुरूषार्थ से समझा जाता है। यह सारा ड्रामा चल रहा है। आत्मा शरीर धारण कर यहाँ पार्ट बजाती है, नया चोला धारण कर नया पार्ट बजाती है। कब क्या, कब क्या बनती है। संस्कार आत्मा में होते हैं। ज्ञान बाहर में ज़रा भी किसी के पास नहीं है। बाप जब आकर पढ़ायें तब ही ज्ञान मिले। टीचर ही नहीं तो ज्ञान कहाँ से आये। वह हैं भक्त। भक्ति में अपार दु:ख हैं, मीरा को भल साक्षात्कार हुआ परन्तु सुख थोड़ेही था। क्या बीमार नहीं पड़ी होगी। वहाँ तो कोई प्रकार के दु:ख की बात होती ही नहीं। यहाँ अपार दु:ख हैं, वहाँ अपार सुख हैं। यहाँ सब दु:खी होते हैं, राजाओं को भी दु:ख है ना, नाम ही है दु:खधाम। वह है सुखधाम। सम्पूर्ण दु:ख और सम्पूर्ण सुख का यह है संगमयुग। सतयुग में सम्पूर्ण सुख, कलियुग में सम्पूर्ण दु:ख। दु:ख की जो वैराइटी है सब वृद्धि को पाती रहती है। आगे चल कितना दु:ख होता रहेगा। अथाह दु:ख के पहाड़ गिरेंगे।

वह लोग तो तुम्हें बोलने का टाइम बहुत थोड़ा देते हैं। दो मिनट देवें तो भी समझाओ, सतयुग में अपार सुख थे जो बाप देते हैं। रावण से अपार दु:ख मिलते हैं। अब बाप कहते हैं काम पर जीत पहनो तो जगत जीत बनेंगे। इस ज्ञान का विनाश नहीं होता है। थोड़ा भी सुना तो स्वर्ग में आयेंगे। प्रजा तो बहुत बनती है। कहाँ राजा, कहाँ रंक। हर एक की बुद्धि अपनी-अपनी है। जो समझकर औरों को समझाते हैं, वही अच्छा पद पाते हैं। यह स्कूल भी मोस्ट अनकॉमन है। भगवान् आकर पढ़ाते हैं। श्रीकृष्ण तो फिर भी दैवी गुणों वाला देवता है। बाप कहते हैं मैं दैवी गुणों और आसुरी गुणों से न्यारा हूँ। मैं तुम्हारा बाप आता हूँ पढ़ाने। रूहानी नॉलेज सुप्रीम रूह ही देता है। गीता का ज्ञान कोई देहधारी मनुष्य वा देवता ने नहीं दिया। विष्णु देवता नम: कहते, तो कृष्ण कौन? देवता कृष्ण ही विष्णु है – यह कोई जानते नहीं। तुम्हारे में भी भूल जाते हैं। खुद पूरा समझा हुआ हो तो औरों को भी समझाये। सर्विस करके सबूत ले आये तब समझें कि सर्विस की इसलिए बाबा कहते हैं लम्बे-चौड़े समाचार न लिखो, वह फलाना आने वाला है, ऐसे कहकर गया है……. यह लिखने की दरकार नहीं है। कम लिखना होता है। देखो, आया, ठहरता है? समझकर और सर्विस करने लगे तब समाचार लिखो। कोई-कोई अपना शो बहुत करते हैं। बाबा को हर बात की रिज़ल्ट चाहिए। ऐसे तो बहुत आते हैं बाबा के पास, फिर चले जाते हैं, उनसे क्या फ़ायदा। उनको बाबा क्या करे। न उन्हें फ़ायदा, न तुम्हें। तुम्हारे मिशन की वृद्धि तो हुई नहीं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) किसी भी बात में बेवश नहीं होना है। स्वयं में ज्ञान को धारण कर दान करना है। औरों की भी तकदीर जगानी है।

2) किसी से भी बात करते समय स्वयं को आत्मा समझ आत्मा से बात करनी है। ज़रा भी देह-अभिमान न आये। बाप से जो अपार सुख मिले हैं, वो दूसरों को बांटने हैं।

वरदान:- अनादि स्वरूप की स्मृति द्वारा सन्तुष्टता का अनुभव करने और कराने वाले सन्तुष्टमणी भव
स्लोगन:- अपने अनादि और आदि स्वरूप को स्मृति में लाओ और उसी स्मृति स्वरूप में स्थित हो जाओ तो स्वयं भी स्वयं से सन्तुष्ट रहेंगे और औरों को भी सन्तुष्टता की विशेषता का अनुभव करा सकेंगे। असन्तुष्टता का कारण होता है अप्राप्ति। आपका स्लोगन है – पाना था वो पा लिया। बाप का बनना अर्थात् वर्से का अधिकारी बनना, ऐसी अधिकारी आत्मायें सदा भरपूर, सन्तुष्टमणी होंगी।

स्लोगन:- बाप समान बनने के लिए – समझना, चाहना और करना इन तीनों की समानता हो।

TODAY MURLI 4 JULY 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 4 July 2018

Read Murli in Hindi :- Click Here

Read Murli 3 July 2018 :- Click Here

04/07/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you now have to become pure, living beings (embodied souls). No one at this time is a pure, living being and no one can therefore call himself a mahatma (great soul).
Question: Which children receive the prize of the golden-aged kingdom?
Answer: Those who claim number one in the race of remembrance by following shrimat receive the prize of the kingdom. If you race fast, you have a good name in the register and claim a right to the prize. You children become far-sighted and race far away. You reach your goal (the supreme abode) in a second and come back again. It is in your intellects that you will first go into liberation and then into liberation-in-life. No one else can race like you.
Song: At last the day for which we had been waiting has come! 

Om shanti. Who knows that at last that day has come? You children know that the day has now finally come when you are face to face with the Father. The soul says this through the body. You souls, now sitting here, know that you are sitting face to face with the Supreme Father, the Supreme Soul. We souls, that is, we living souls, also truly met God personally 5000 years ago. The soul says: This is my body. The body would not say: This is my soul. The Father of us souls has finally come here today. After there is devotion, He definitely has to come to give knowledge. He has finally come to give us salvation through knowledge. No one in the whole world knows this. He cannot be face to face with the whole world. You children also have faith, numberwise, according to the effort you make. First of all, you have the faith that you are souls and then you have the faith that your Father has come once again. You would think that everyone else also has faith in this way, but it isn’t like that. He is without an image such that you repeatedly forget Him. You forget that you are souls and that you are sitting face to face with the Supreme Father, the Supreme Soul. Even the world knows that the Supreme Father, the Supreme Soul, comes to make impure living beings pure. Living beings do not come here to make souls pure. All are living beings whereas the Supreme Father, the Supreme Soul, is only One. He would not be called a living being (embodied being) because He doesn’t have a physical or a subtle body. The Father sits here and explains this. All the bodily beings with names, that is, Brahma, Vishnu and Shankar, whose images you see, reside in the subtle region. They too are subtle living beings. These matters have to be clearly understood. Although people say that so-and-so is a mahatma (a great soul), where would great souls come from in the impure world? No one here can be supremely pure. Yes, that Supreme Father went away after purifying you. There used to be deities at the beginning of the golden age. You surely understand that souls were pure and that they are now impure living beings. There were also pure living beings. Truly, there were pure living beings in the world at the beginning of the golden age. They are called great souls. The Father explains that no one in the impure world can be a great soul. All are impure living beings. Impure living beings would definitely make others impure too. There, there are pure living beings. So, what would they do? It isn’t that they would make living beings pure. No, there is no question of making anyone pure. It is at this time that all become pure living beings. There, all are pure. Who makes everyone so pure? The Father sits here and explains: When you were deities, you were pure, then you came here and then became impure. This is the world of sinful living beings. You have to explain the words ‘sinful living beings’ very clearly because souls and bodies are both impure. There, they are not given the title mahatma. There, all are pure; they are called deities. They are full of all virtues, 16 celestial degrees full, the living beings who follow the highest religion of non-violence. ‘Completely viceless’ means completely pure. It has been explained to you children that sannyasis make effort to remain pure. Good sannyasis who are called mahatmas remain pure. They remain separate in order to become pure, but they belong to the path of isolation. They are called great souls on the path of devotion, not on the path of knowledge. Knowledge and devotion are both remembered separately. For half the cycle, there is the reward of knowledge in the golden and silver ages. Then, it would be said that here you have the reward of devotion. That is the path of devotion. First of all, devotion is unadulterated and then, at the end, devotion too is tamopradhan and adulterated. It is now the end of adulterated devotion, which is why the Father has come. The Father only comes once and makes your reward for half the cycle. You make number one effort. Some become kings and queens and others become subjects or maids and servants because a kingdom is being established. You are now becoming those with far-sighted intellects. Those with far-sighted intellects are called seers of the three aspects of time. Those who have knowledge of the three worlds and the three aspects of time are called trikaldarshi. You now know all three worlds. The incorporeal world, the subtle region and the corporeal world are the three worlds. You have now become far-sighted. Your intellects go from the beginning to the end, numberwise, according to your efforts. In a race , those who are weak are left behind. This is a very long, far-sighted race. You would never have heard of a race of souls. You souls know that you are students and that this is your race. You have to reach a particular goal and then return. You souls have to race very far. Your intellects know that, originally, you are residents of that place. You can reach there in a second and become liberated-in-life. We are originally residents of the supreme abode. Your intellects know correctly that you will go to the supreme abode and then come down again. Just as you would reach your goal in a race and then return, so we too will go to Baba and then come down again. We souls are learning to race. You tell everyone: Become “Manmanabhav” and connect your intellect in yoga with your Father and the supreme abode where you remain bodiless. Only you have this accurately in your intellects. You have the knowledge of the three aspects of time and the three worlds in your intellects. No one else can have the knowledge of 84 births. You know that we have to become liberated from this dirty world and these dirty bodies and return home. We are now going there. The Father teaches you this race every day. Your race is imperishable. The more you remember the Father, the better your name will be in the register. It would be said: This one’s pilgrimage of the intellect is very good. Only by having remembrance will your sins be absolved. If you don’t have remembrance, then, because your sins are not absolved, you are left behind. To become subjects or maids or servants is not a prize. To become Narayan from an ordinary man and Lakshmi from an ordinary woman is called receiving a prize. The Father gives you the prize of the kingdom if you follow His directions and race. Some don’t even race two steps. Those subjects will claim a completely low status. They might even be living here and yet they would claim a very low status in the kingdom. Your intellects have become so far-sighted. Children from Bangalore and Madras are sitting here and so someone should sit and explain to them in the Madrasi language. Our language is Hindi. Baba would also have explained in this way in the previous cycle. It is asked: Why doesn’t God know all the languages? However, that is not in the drama. If it were in the drama, I would give lectures in all languages. For instance, if people of all languages were sitting here, would I speak in all languages? That would not be possible. For how long would I continue to speak to each one? There would be chaos. Therefore, you should explain: Baba is now explaining in the same language in which He explained in the previous cycle. This is why Hindi is widely used. English is also necessary, because the Indians have a greater connection with the British. Russia and America etc. have their own languages. They are all Christians, belonging to the one religion. However, there are many languages. Here, all are the people of Bharat who belong to the original, eternal, deity religion, but they have forgotten their religion. There are now so many languages. There is a mixture of everything. You have to speak to others in their own language. You have to be very clever in this so that you are able to understand and explain to others. You should bring such a translator with you who is able to explain accurately. This is the biggest of all living pilgrimages, whereas all others are non-living pilgrimages. All the sages, holy men and great souls go there; they go very far away. They go to the temples of the ones who went away after making Bharat pure. This is also something to be understood. The Father says: How much should I explain about the expansion of the tree and its branches, twigs and leaves? You understand that all of those are small branches and twigs. There are so many leaves on a branch. There are so many sects and cults. Your trunk would be so big. There would also be so many leaves. The original, eternal, deity religion has continued from the golden age. So, there should be so many Hindus. However, in fact, there aren’t even as many Hindus any more because they have been converted to other religions. This is the kalpa tree. At the beginning, there were those who belonged to the original, eternal, deity religion. In fact, those who call themselves Hindus also originally belonged to the original, eternal, deity religion, but they have been converted. The Father says: I come and once again establish the religion that is called the deity religion. Those who have been converted will come and once again claim their inheritance. When not a single person who could have been called a deity remains here, the Father comes. He comes and explains that your non-living memorials exist here. When Christ comes, his religion is not spoken about. Here, there are temples and other signs of the deities. When it is your kingdom, there is no name or trace of Christ. Here, there is everyone’s name and trace. You know when Christ came and how Christianity was established. In which body would Christ be now? He would definitely be in an impure body. He himself was pure. You children have all the knowledge in your intellects. You are made far-sighted. No one knows where we souls come from or where we reside. They consider the place of residence to be God. In fact, when souls become false, the bodies also becomes false. Holy men say: Maya is false, the body is false, the whole world is false, but the soul is free from the effect of action. They only speak of things that suit them. Why do they not say, “False soul and the body of the false soul.”? They put the body on a funeral pyre. No one places the soul on the funeral pyre; it is the body that is put on the pyre. The soul left that body and entered another. This is something to be understood. You can explain to any sage or holy man etc. No one here in this impure world is a great soul. Great souls are called pure souls. So, the body too has to be pure: it is iron aged! A kumari is worshipped until she indulges in vice. People call out for purity: Come and make us pure! Since they call out, how can you consider them to be great souls? No one is a great soul. This is the unique, Supreme Father, the Supreme Soul, the One without an image. You know that you, who were pure living beings, deities, have now become impure. You have become corrupt in your religion. Christians know about their religion. They would instantly say that they are Christians. You, who belonged to the highest-on-high religion, have forgotten your religion. By forgetting, you have become corrupt in your religion and action. You were elevated and Ravan has now made you degraded. You can understand the meaning of this. You children are now imbibing knowledge to make your future fortune elevated. By disobeying shrimat, your fortune is crossed out. You even forget that it is the Father who gives you shrimat. So, at last that day has come… Only you know this. Not everyone knows this accurately. They will know it at the end when they understand everything. Now they repeatedly forget. Hardly anyone speaks the truth. They don’t hesitate to tell lies. Maya slaps very good strong children. The Father knows everything. He tells you that you are making a mistake and doing a lot of disservice. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Become far-sighted, know the three worlds and the three aspects of time and race with your intellect. Become liberated from this dirty world and that dirty body.
  2. Erase the habit of telling lies. Never disobey shrimat thereby doing disservice.
Blessing: May you be a karma yogi and become fine by finishing the file of all complaints.
Just as when a soul and body are combined there is life, similarly, let karma and yoga be combined ; not yogis who have yoga for two to three hours, but to have a yogi life. Their yoga is natural and easy, their yoga would not break that they would have to make effort to connect it again. They do not need to make any complaints. When you stay in remembrance all your tasks are automatically successful. All the files of those who become fine finish because a yogi life is a life with all attainments.
Slogan: Remember the Karavanhar (One who inspires) Father at every moment and you will become a constant yogi.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 4 JULY 2018 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 4 July 2018

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04-07-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – अभी तुम्हें पवित्र जीवात्मा बनना है। इस समय कोई पवित्र जीवात्मा नहीं हैं इसलिए अपने को महात्मा भी नहीं कहला सकते।”
प्रश्नः- सतयुगी राजाई का इनाम किन बच्चों को प्राप्त होता है?
उत्तर:- जो श्रीमत पर याद की रेस में नम्बरवन जाते हैं, उन्हें ही राजाई का इनाम मिलता है। तीखी रेस होगी तो रजिस्टर में नाम अच्छा होगा और इनाम के अधिकारी बनेंगे। तुम बच्चे दूरादेशी बन बड़ी दूर की रेस करते हो। एक सेकेण्ड में निशान तक (परमधाम तक) पहुँच वापस लौटकर आते हो। तुम्हारी बुद्धि में है पहले हम मुक्ति में जायेंगे फिर जीवनमुक्ति में आयेंगे। तुम्हारे जैसी रेस और कोई कर नहीं सकता।
गीत:- आखिर वह दिन आया आज…. 

ओम् शान्ति। यह कौन जानते हैं कि आखिर वह दिन आया आज? बच्चे जानते हैं आखिर वह दिन आया आज, जो हम बाप के सम्मुख हुए हैं। आत्मा कहती है इस शरीर द्वारा। अभी तुम बैठे हो, जानते हो हम आत्मायें अभी परमपिता परमात्मा के सम्मुख बैठी हैं। बरोबर पांच हजार वर्ष पहले भी हम आत्मायें यानी जीव की आत्मायें, परमात्मा से सम्मुख मिली थी। आत्मा कहती है – मेरा यह शरीर है। शरीर नहीं कहेगा – मेरी यह आत्मा है। हम आत्माओं का बाप आखिर आज आया है। आना भी जरूर है, भक्ति के बाद ज्ञान देने लिए। ज्ञान से सद्गति करने लिए आखिर आया है। यह सारी दुनिया नहीं जानती। सारी दुनिया के सम्मुख हो भी नहीं सकेंगे। तुम बच्चों को भी नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार निश्चय है। पहले तो आत्मा निश्चय करते हैं, फिर निश्चय करते हैं हमारा बाप फिर से आया हुआ है। तुम समझते होंगे ऐसे सब निश्चय करते हैं। परन्तु ऐसे भी नहीं है। यह ऐसा विचित्र है जो घड़ी-घड़ी भूल जाता है। हम आत्मा हैं, परमपिता परमात्मा के सम्मुख हैं – यह भूल जाते हैं। यह तो दुनिया भी जानती है पतित जीव आत्माओं को पावन बनाने परमपिता परमात्मा आते हैं। जीव आत्मायें, आत्माओं को पवित्र बनाने नहीं आती। सभी जीव आत्मायें हैं, परमपिता परमात्मा एक ही है, उनको जीव नहीं कहेंगे क्योंकि उनको कोई स्थूल-सूक्ष्म शरीर नहीं है। यह बाप बैठ समझाते हैं। तुम जो भी नामधारी देखते हो, ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का चित्र देखते हो वे सूक्ष्मवतन में रहते हैं। वह भी सूक्ष्म जीव आत्मा ठहरे। यह बड़ी समझने की बातें हैं। मनुष्य तो भल कहते हैं फलाना महात्मा है। परन्तु पतित दुनिया में महात्मा आ कहाँ से सकते! यहाँ कोई सुप्रीम पावन हो न सके। हाँ, वह सुप्रीम बाप पावन बनाकर गये हैं। सतयुग आदि में देवी-देवता थे। यह तो जरूर समझेंगे कि पवित्र आत्मायें थी, अभी पतित जीव आत्मायें हैं। पावन जीव आत्मायें भी थी। बरोबर सतयुग आदि से सृष्टि पर पवित्र जीव आत्मायें थी। उन्हों को महान् आत्मा कहेंगे। बाप समझाते हैं पतित दुनिया में कोई भी महान् आत्मा हो नहीं सकते। सब पतित जीव आत्मायें हैं। पतित जीव आत्मा जरूर औरों को भी पतित ही बनायेंगी। वहाँ हैं पवित्र जीव आत्मायें। तो क्या करेंगे? ऐसे नहीं कि पवित्र जीव आत्मा बनायेंगे। नहीं। वहाँ बनाने की बात नहीं रहती। इस समय सभी पवित्र जीव आत्मायें बनती हैं। वहाँ तो हैं ही सब पावन। इतना पावन बनाने वाला कौन? बाप बैठ समझाते हैं तुम जब देवी-देवता थे तो पावन थे। यहाँ आकर पतित बने हो। यह है ही पाप जीव आत्माओं की दुनिया। अक्षर बिल्कुल क्लीयर समझाना है – पाप जीव आत्मा क्योंकि आत्मा भी पतित है, शरीर भी पतित है। वहाँ फिर महात्मा अक्षर नहीं देते। वहाँ तो हैं ही सब पवित्र, कहते ही देवी-देवता हैं। सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, अहिंसा परमो धर्म जीव आत्मायें हैं। सम्पूर्ण निर्विकारी माना सम्पूर्ण पवित्र। तुम बच्चों को समझाया जाता है सन्यासी पवित्र रहने लिए पुरुषार्थी हैं। अच्छे-अच्छे सन्यासी पवित्र रहते हैं, जिनको महात्मा कहा जाता है। पवित्र रहने लिए अलग रहते हैं। परन्तु वह तो हैं निवृत्ति मार्ग वाले। उनको भक्ति मार्ग में महात्मा कहेंगे, ज्ञान मार्ग में नहीं। ज्ञान और भक्ति दोनों अलग-अलग गाये जाते हैं। आधाकल्प सतयुग-त्रेता में ज्ञान की प्रालब्ध है, यहाँ फिर भक्ति की प्रालब्ध कहेंगे। यह है भक्ति मार्ग। पहले भक्ति भी अव्यभिचारी होती है फिर अन्त में तमोप्रधान व्यभिचारी भक्ति होती है। अभी व्यभिचारी भक्ति का अन्त होना है, तब बाप आये हैं। बाप एक ही बार आकर ज्ञान से आधाकल्प के लिए तुम्हारी प्रालब्ध बनाते हैं। तुम नम्बरवन पुरुषार्थ करते हो। कोई तो राजा-रानी बनते हैं, कोई फिर प्रजा वा दास-दासी बन जाते हैं क्योंकि राजधानी स्थापन हो रही है।

तुम अब दूरादेशी बुद्धि बनते हो। दूरादेशी बुद्धि को त्रिकालदर्शी कहा जाता है। जिन्हें तीनों लोकों, तीनों कालों का ज्ञान है उन्हें त्रिकालदर्शी कहा जाता है। तुम अब तीनों लोकों को जानते हो। मूलवतन, सूक्ष्मवतन और स्थूलवतन तीन लोक हुए ना। तुम अब दूरादेशी बन गये हो। तुम्हारी बुद्धि आदि से अन्त तक जाती है – नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। कोई कमजोर होते हैं जो रेस में पीछे रह जाते हैं। यह तो बहुत बड़ी दूरादेशी रेस है। आत्माओं की रेस कभी सुनी नहीं होगी। तुम आत्मायें जानती हो हम स्टूडेन्ट हैं, हमारी ये रेस है। फलाने निशान तक पहुँच कर फिर लौटना है। तुम आत्माओं की यह बड़ी दूर की रेस है। बुद्धि जानती है हम वास्तव में वहाँ के रहने वाले हैं। एक सेकेण्ड में हम वहाँ पहुँच जायेंगे, जीवन-मुक्त बन जायेंगे। हम असुल परमधाम के निवासी हैं। यथार्थ रीति बुद्धि जानती है – हम परमधाम जायेंगे फिर आयेंगे। जैसे रेस में निशान तक पहुँचकर फिर लौटते हैं। हम भी बाबा के पास जायेंगे फिर वापिस आयेंगे। अब आत्मायें रेस सीख रही हैं। तुम सबको कहते हो मनमनाभव, बुद्धि का योग अपने बाप और परमधाम से रखो, जहाँ तुम अशरीरी रहते हो। यह सिर्फ तुम्हारी बुद्धि में ही यथार्थ रीति है। तीनों कालों, तीनों लोकों की नॉलेज तुम्हारी बुद्धि में है। 84 जन्मों का ज्ञान और कोई में हो नहीं सकता। तुम जानते हो हमको इस छी-छी दुनिया से, छी-छी शरीर से मुक्त होकर जाना है। हम जा रहे हैं। बाप रोज़ यह रेस सिखलाते हैं। तुम्हारी रेस अविनाशी है। बाप को जितना जास्ती याद करेंगे उतना तुम्हारा रजिस्टर में नाम अच्छा रहेगा। कहेंगे इनकी बुद्धि की यात्रा बहुत तीखी है। याद से ही विकर्म विनाश होंगे। याद नहीं करते हैं, तो विकर्म विनाश न होने के कारण पिछाड़ी में रह जाते हैं। प्रजा वा दास-दासी बनना यह कोई प्राइज़ नहीं है। नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनना इसको इनाम कहा जाता है। बाप राजाई का इनाम देते हैं, अगर उनकी मत पर चल दौड़ी लगाई तो। कोई तो दो क़दम भी दौड़ी नहीं लगाते हैं। अगर प्रजा वाले होंगे तो बिल्कुल कम दर्जा पा लेंगे। यहाँ रहने वाले भी होंगे तो भी राजाई में बहुत कम पद पायेंगे। तुम्हारी कितनी विशाल बुद्धि हुई है।

अब बैंगलोर, मद्रास के बच्चे बैठे हैं, उन्हों को फिर मद्रासी भाषा में कोई बैठ समझाये। हमारी भाषा तो हिन्दी है। कल्प पहले भी ऐसे समझाया होगा। कहेंगे भगवान् सब भाषायें क्यों नहीं जानते! परन्तु ड्रामा में है नहीं। ड्रामा में होता तो मैं सब भाषाओं में भाषण करता। समझो भिन्न-भिन्न भाषाओं वाले बैठे हों तो क्या हम सब भाषाओं में बैठ बोलूंगा क्या? यह तो हो नहीं सकता। एक-दो को भी कहाँ तक सुनायेंगे। घमसान हो जाए। तो समझाना चाहिए बाबा ने कल्प पहले जिस भाषा में समझाया था उसी भाषा में ही समझाते हैं, इसलिए हिन्दी का जोर है। अंग्रेजी भी जरूरी है क्योंकि इन्हों का कनेक्शन अंग्रेजों से जास्ती है। रशिया, अमेरिका आदि की भाषा अपनी-अपनी है। हैं एक ही धर्म वाले क्रिश्चियन। परन्तु भाषायें बहुत हैं। यहाँ भी हैं सब भारतवासी आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले परन्तु अपने धर्म को भूल गये हैं। भाषायें कितनी हो गई हैं। सब मिक्सचर हैं। जिसकी जो भाषा है उसमें फिर उनको सुनाना है। इसमें भी बड़ा होशियार चाहिए, जो समझकर और समझाये। साथी ऐसा साथ लाना चाहिए जो एक्यूरेट समझा सके। यह है सबसे बड़ा चैतन्य तीर्थ। वह सब हैं जड़ तीर्थ। साधू, सन्त, महात्मा सब वहाँ जाते हैं। बहुत दूर-दूर जाते हैं। जो भारत को पावन बनाकर गये हैं उन्हों के मन्दिर में जाते हैं। यह भी समझने की बातें हैं ना। बाप कहते हैं झाड़ की टाल, टालियां, पत्ते उसका विस्तार कितना समझायें! तुम तो समझ गये हो – यह छोटे-छोटे टाल-टालियां हैं। टाली में भी कितने पत्ते होंगे। अथाह मठ पंथ हैं। तुम्हारा थुर तो कितना बड़ा होना चाहिए। कितने पत्ते होने चाहिए। आदि सनातन देवी-देवता धर्म सतयुग से लेकर चला आया है। तो हिन्दू कितने होंगे। परन्तु हिन्दू भी नहीं रहे हैं, और धर्मों में कनवर्ट हो गये हैं। यह है कल्प वृक्ष, शुरू में आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले थे। हिन्दू कहलाने वाले भी वास्तव में हैं आदि सनातन देवी-देवता धर्म के, परन्तु कनवर्ट हो गये हैं। बाप कहते हैं मैं आकर फिर उस देवी-देवता कहलाने वाले धर्म की स्थापना करता हूँ। जो कनवर्ट हो गये हैं वही फिर से आकर वर्सा लेंगे। जब देवी-देवता कहलाने वाला एक भी नहीं रहता तब ही बाप आते हैं। आकर समझाते हैं – तुम्हारे जड़ यादगार खड़े हैं। क्राइस्ट आते हैं तो उनके धर्म की चर्चा आदि होती नहीं। यहाँ तो अभी भी देवताओं के मन्दिर आदि निशानी हैं। तुम्हारा जब राज्य होगा तो क्राइस्ट आदि का नाम-निशान नहीं होगा। यहाँ तो सभी का नाम-निशान है। तुम जानते हो क्राइस्ट कब आया, क्रिश्चियन धर्म कैसे स्थापन हुआ? क्राइस्ट अब किस शरीर में होगा? जरूर पतित शरीर में ही होगा। खुद तो पावन था ना। तुम बच्चों की बुद्धि में सारा ज्ञान है। तुमको दूरादेशी बनाया है। हम आत्मायें कहाँ रहती हैं? कहाँ से आती हैं? यह किसको पता नहीं है। रहने के स्थान को परमात्मा मान लिया है। वास्तव में आत्मा झूठी बनने से काया भी झूठी बन जाती है। साधू लोग कह देते झूठी माया, झूठी काया….. बाकी आत्मा तो निर्लेप है। अपने मतलब की बात कह देते हैं। ऐसे क्यों नहीं कहते झूठी आत्मा, झूठी आत्मा की काया। काया को ही काई पर (अर्थी पर) बिठाते हैं। आत्मा को तो काई (अर्थी) पर नहीं बिठाते हैं। काई पर काया को बिठाया जाता है। आत्मा ने तो एक काया को छोड़ दूसरी काया में जाकर प्रवेश किया। यह समझ की बात है। कोई भी साधू-सन्त आदि को तुम समझा सकते हो। यहाँ पतित दुनिया में कोई भी महात्मा नहीं है। महान् आत्माओं को पावन आत्मा कहा जाता है। तो शरीर भी पावन चाहिए। यह है ही आइरन एजड। परन्तु कन्या जब तक विकार में नहीं गई है तो पूजी जाती है। पवित्रता के लिए ही पुकारते हैं – आकरके हमको पावन पवित्र बनाओ। जबकि पुकारते रहते हैं तो तुम उनको महान् आत्मा कैसे मान सकते हो। महात्मा तो कोई है नहीं। यह है विचित्र परमपिता परमात्मा। तुम जानते हो हम जो पावन जीव आत्मायें देवी-देवता थीं, अभी पतित बनी हुई हैं। धर्म भ्रष्ट हैं। क्रिश्चियन लोग अपने धर्म को जानते हैं। झट कहेंगे हम क्रिश्चियन हैं। तुम ऊंच ते ऊंच धर्म वाले अपने धर्म को भूल गये हो। भूल जाने से धर्म भ्रष्ट, कर्म भ्रष्ट बन पड़े हो। तुम श्रेष्ठाचारी थे, अब रावण ने भ्रष्टाचारी कर दिया है। यह अर्थ भी तुम समझ सकते हो। तुम बच्चे अभी अपनी भविष्य ऊंच तकदीर बनाने के लिए धारणा कर रहे हो। श्रीमत का उल्लंघन करने से तकदीर को लकीर लग जाती है। यह भी भूल जाते हैं कि श्रीमत देने वाला बाप है। तो आखिर वह दिन आया आज, यह तुम जानते हो। सभी एक्यूरेट नहीं जानते। अन्त में जानेंगे, जब पूरे समझ जायेंगे। अभी तो घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। मुश्किल कोई सच बतलाते हैं। झूठ बोलने में देरी नहीं करते हैं। माया अच्छे-अच्छे रूसतम बच्चों को थप्पड़ लगा देती है। बाप तो सब जानते हैं, बतलाते हैं – तुम भूल करते हो, बड़ी डिससर्विस करते हो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) दूरादेशी बन तीनों लोकों और तीनों कालों को जान बुद्धि से रेस करनी है। इस छी-छी दुनिया, छी-छी शरीर से मुक्त होना है।

2) झूठ बोलने की आदत को मिटाना है। श्रीमत का उल्लंघन कर डिससर्विस नहीं करनी है।

वरदान:- सर्व फरियादों के फाइल को समाप्त कर फाइन बनने वाले कर्मयोगी भव
जैसे आत्मा और शरीर कम्बाइन्ड है तो जीवन है, ऐसे कर्म और योग कम्बाइन्ड हो। 2-3 घण्टा योग लगाने वाले योगी नहीं, लेकिन योगी जीवन वाले। उनका योग स्वत: और सहज होता है, उनका योग टूटता ही नहीं जो मेहनत करनी पड़े। उन्हें कोई भी फरियाद करने की आवश्यकता नहीं। याद में रहने से सब कार्य स्वत: सफल हो जाते हैं। फाइन बनने वाले के सब फाइल खत्म हो जाते हैं, क्योंकि योगी जीवन सर्व प्राप्तियों की जीवन है।
स्लोगन:- हर समय करावनहार बाप याद रहे तो निरन्तर योगी बन जायेंगे।

TODAY MURLI 4 July 2017 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 4 July 2017

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Read Bk Murli 3 July 2017 :- Click Here

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04/07/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, forget the consciousness of those bodies and make effort to be bodiless because you now have to return home.
Question: What words can only you theist children speak?
Answer: God is our Father. Only you theist children can say this, because only you have Baba’s introduction. Atheists do not know Him. Only theist children say: I belong to one Baba and none other.
Question: What should your stage be in order to become a fast effort-maker?
Answer: That of a detached observer. Be a detached observer; continue to make effort while seeing each one’s part with detachment.
Song: To live in Your lane and to die in Your lane.

 

Om shanti. Who said this? Human souls said this, the ones who are sitting here personally. You wouldn’t say that just souls are sitting here. No, it is human souls that are sitting here. The Father has explained that the soul performs every action through the body. This is known as the state of soul consciousness. The soul that resides in the body says to his supremely beloved, Supreme Father, the Supreme Soul: I, the soul, will now become a garland around Your neck, that is, I will shed this body and come to You. The Father has explained that there is a genealogical tree of human beings. There is the genealogical tree of Brahma and Saraswati, of Adam and Eve. You have seen how there is the genealogical tree in the supreme abode. Shiv Baba comes first. How will you become the garland around My neck? By remembering Me. The more you remember Me, the faster you will race. Those who have a lot of love for Me cannot stay without coming to Me, because souls experience sorrow, not happiness, through these bodies. God is incorporeal. He speaks to incorporeal souls. Only the Supreme Father, the Supreme Soul, knows the beginning, the middle and the end of the world; He is Trikaldarshi. No matter how much of a scholar a person may be and, although he may have studied the Vedas and scriptures, he does not have the knowledge of the beginning, the middle and the end of the world. They cannot be trikaldarshi, because they are atheists. You are now theists because the Father has introduced Himself to you. This is why you have the right to say “Baba”. They say that God is omnipresent. What does one receive by saying that? Nothing at all! The Father is the Ocean of Knowledge, He does not say: I am omnipresent. If God were omnipresent, everyone would be called ‘Father . Is the expression ‘Fatherhood’ used? All are the children of the one Father. He is also called Prabhu, Ishwar (different names for God). He is the One who creates Brahma, Vishnu and Shankar. It is wrong to use the term ‘Trimurti Brahma’. Shiva is the Father of Brahma, Vishnu and Shankar as well. He has adopted Brahma. You also understand that Shiva, the Supreme Father, the Supreme Soul, is making you trikaldarshi and swadarshanchakradhari (those who spin the discus of self-realisation) through the mouth of Brahma. It is the knowledge of the soul, that is, of the self. The soul receives the kingdom of self-sovereignty. The soul is imperishable and the body is perishable. It is the soul that imbibes good or bad sanskars. You know: I, the soul, have now become tamopradhan. There are the terms, ‘pure soul’ and ‘impure soul’. It is not the body that they refer to. ‘Charitable soul’ and ‘great soul’ are also said. It is the soul that is praised. The soul listens to the Supreme Father, the Supreme Soul. No one in the world knows that the Father sits in this way and teaches the children. You now understand that you belong to the Father. We are to claim the inheritance from the Father. We don’t have any concern with anyone else. The soul says: Mine is one Shiv Baba and none other. A student would say: Mine is only one teacher and none other. You have only one Father and one Teacher. He is the Purifier Father. Everyone has a connection with that Father and Teacher. Even if teachers teach you, they have studied from Me, their Father. The Father says: Remember Me, not the teacher. You children now know Me, your Father. Now that you have recognized Me, you have become theists. Those who do not know Me are atheists and orphans. What is the name, the form and the land of the Father? They do not know anything. They say: He does not have a name or form. You now understand that His name is definitely Shiva. He does not adopt a body of His own. This is why His name never changes. You understand that your name and form change in each of your 84 births. His name is always Shiva. As is the form of God, so is the form of souls. It is not that the Supreme Soul is larger or that He is the infinite light. The Father says: Just as a soul is like a star, I am also the same, but I have all knowledge; that is why My praise is sung. I am the Truth, the Living Being, the Embodiment of Bliss and the Ocean of Knowledge. Baba is the Living Being; that is why He speaks knowledge. He is the Living Seed. A non-living seed cannot say anything. Only you human beings understand that just as the Father’s intellect contains the knowledge of the entire human world tree, so your intellects also contain it in the same way. There is so much varietyhere! The features of one cannot be the same as another’s. Each one’s features are different. Each one has his own part to play. The Father explains how huge this unlimited play is. There are a variety of features. All are actors in this drama. Since this drama is imperishable, none of the actors can be changed. You have come to know that you have 84 names for your 84 births. The names have finished and so has that clan. It will now repeat , that is, the episode of the Gita is being rep eated. In the beginning the shrimat of God is praised, but they have forgotten God. First, there is the birth of Shiv Baba and then there is the birth of Krishna. How can the birth of the Father be forgotten and that of the child be celebrated? It has been explained to you children that Lakshmi and Narayan were the masters of the world. How did they claim that inheritance? From the Supreme Father, the Supreme Soul; only the Supreme Father, the Supreme Soul, teaches Raja Yoga. When did He teach this? The Father says: I come every cycle at the confluence age, when the devilish kingdom is to be destroyed and the divine kingdom established. Those who have become theists are claiming the inheritance. Atheists cannot claim the inheritance. The Father comes and liberates everyone from sorrow. When all of you souls go to the land of happiness, all other souls will have settled their karmic accounts and returned home. The incorporeal Father has come to take all souls back home. The One who takes you back home is called the Great Death, the Death of all Deaths. There is also a temple to the Great Death, the Death of all Deaths. Shiva, Somnath or Rudra is called the Great Death (Mahakaal). He personally says: I am the Guide of all souls. I will take everyone back home. The Father says: I liberate you from the kingdom of Ravan. This is the kingdom of Ravan. There is now death for the kingdom of Ravan and victory for the kingdom of Rama. Everyone wants the kingdom of Rama, so the kingdom of Ravan definitely has to be destroyed. The Father explains: The old world is now about to finish. The original eternal deity religion has been completely forgotten. This is that same episode of the Gita that is now being enacted. The Yadavas and the Kauravas are definitely here. The Yadavas are the Europeans, the ones who invent missiles. It has also been written that everyone will be destroyed in an international war. No one knows about their original eternal deity religion. It is also said: Religion is might. A religious person is considered to be good. An irreligious person is considered to be bad. You understand that Bharat was religious when there was the original eternal deity religion. Bharat has now become irreligious. They renounced their religion. They had to let it go according to the drama. There, there is the kingdom of emperors and empresses. There are no advisers etc; that is not the system. It is when they become impure that they require advisers etc. Now each kingdom has so many advisers (ministers), and the instructions of one cannot be the same as those of another, and so there is so much conflict. You children now understand that Baba is teaching you in order to change you from humans into deities. The Father says: Now consider yourselves to be souls. Forget all the relationships of the body. Brahma Baba became a beggar by giving everything, including his own body; what else remained? Nothing! The Supreme Father, the Supreme Soul, says: I speak to souls. I have come to take souls back home. Continue to forget the consciousness of the body. This takes effort. The Father says: Sweet children, you have been body conscious throughout the whole cycle. You have only remembered your lokik father. Now become soul conscious and remember Me. Only by having remembrance of Me will you receive strength. O children, o souls, remember Me alone and no one else. Don’t remember anyone else even by mistake. You make a promise: Baba, You alone are mine. I am a soul and You are the Supreme Soul. You have told us that souls are Your children. I have now come to liberate you from the sorrow of Ravan and take you back home. You children must now have patience. Once the kingdom is established, the great Mahabharat War will take place. Only then will the iron age change into the golden age. So, I am the Death of all Deaths. I am the Father as well as the Teacher and I am also the Purifier. Then I am also the Great Death. Where will I take you? Sweet children, I will take you to the land of liberation. If you become liberated from here, you can go to heaven. You are studying to become the future deities. You Brahmins are now Godly children. You all say: We Brahmins are the children of God. As children of Brahma, you are brothers and sisters, and so you cannot indulge in vice. You are the grandchildren of God. You are claiming your inheritance from Him. To the extent that you make effort, so you claim a status. You will now make the effort that you have made every cycle. For this, you have to practise being detached observers. Become detached observers and see what effort each one of you makes, and to what extent you follow Baba. Do not become trapped in the name and form of anyone. No one except the Father should be remembered. Baba says: Children, I teach you Raja Yoga; I make you pure and take you back with Me. You now understand that you definitely receive these teachings every cycle, according to the drama. All of you are Draupadis. This is not the kingdom of happiness. There is also a story about this, but the Father explains the reality. You are now claiming your inheritance from the Father. You remove everyone from the quicksand, the bog. Everyone is burning away on the pyre of lust. All of you are being showered with knowledge. The Father says: All My children have been burnt and turned to ashes. I have come to liberate everyone and take them back with Me. People don’t even know this. You have now come out of immense darkness. The Father says: Now remember Me and remember the home; you souls have even forgotten your home. The supreme region and the subtle region are also remembered; all souls reside in the supreme region. They don’t understand anything: they don’t understand what a soul is, what God is, or what the subtle region is. They cancel out everything by saying that souls and the Supreme Soul are one. Baba says: This is also fixed in the drama. Whatever happens now, every second that passes is the drama and it will repeat once again. The Father sits here and teaches us. The Father has also explained the significance of the repetition. You should not think: I will receive as my fortune whatever is fixed in the drama, that each act is fixed in the drama and so what effort can I make? There are some who think in this way, but no, you must make effort. The Father has come to inspire you to make effort. You children must make full effort. Become detached observers and see who makes effort, who it is that makes intense effort and thereby claims a high status, and who are taking their full inheritance from the Father. Become detached observers and make effort for yourselves and inspire others to make effort. Be observers and see how much service so and so does and how many others they make the same as themselves, to how many they give the Father’s introduction. See the effort of others and make intense effort yourself. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Forget the body and bodily relations and become complete beggars. Let there be the awareness: Nothing is mine. Make effort to remain soul conscious. Don’t be trapped in the name and form of anyone.
  2. Don’t stop making effort and think that you will make effort if it is in the drama. Become detached and see the efforts of others and make intense effort yourself.
Blessing: May you become equal, perfect and complete and be ever ready before destruction takes place.
To be ever ready before destruction takes place is the means of safety. If you have time, then enjoy the pleasures of the confluence age, but remain ever ready because you will never know the date in advance of the final destruction. It will happen suddenly. If you are not ever ready, you will be deceived and so, remain ever ready. Always remember that you and the Father are always together. Just as the Father is perfect and complete, similarly, those who remain with Him will become equal, complete and perfect. Only those who become equal to Him will go back with Him.
Slogan: Those whose nature is pure and gentle will have success merged in their every step.

*** Om Shanti ***

 

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Brahma kumaris murli 4 July 2017 : Daily Murli (Hindi)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 4 July 2017

July 2017 all murlis :- Click Here

To Read Murli 3 July 2017 :- Click Here

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04/07/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – इस शरीर का भान भूलते जाओ, अशरीरी बनने की मेहनत करो, क्योंकि अब घर चलना है”
प्रश्नः- तुम आस्तिक बच्चे ही कौन सा शब्द बोल सकते हो?
उत्तर:- भगवान हमारा बाप है, यह आस्तिक बच्चे ही बोल सकते हैं क्योंकि उन्हें ही बाप का परिचय है। नास्तिक तो जानते ही नहीं। आस्तिक बच्चे ही कहेंगे – मेरा तो एक बाबा दूसरा न कोई।
प्रश्नः- तीव्र पुरुषार्थी बनने के लिए कौन सी स्थिति चाहिए?
उत्तर:- साक्षी स्थिति। साक्षी होकर हर एक के पार्ट को देखते पुरुषार्थ करते रहो।
गीत:- मरना तेरी गली में….

 

ओम् शान्ति। यह किन्हों ने कहा? जीव की आत्माओं ने कहा, जो सम्मुख बैठे हो। यहाँ यह नहीं कह सकते कि आत्मा बैठी है। नहीं, जीव आत्मायें बैठी हैं। बाप ने समझाया है कि आत्मा ही शरीर द्वारा हर कार्य करती है, इसको कहा जाता है देही-अभिमानी। देह में रहने वाले अपने परमप्रिय परमात्मा को कहते हैं कि हम आत्मा अब आपके गले का हार बनेंगे अर्थात् हम यह शरीर छोड़ आपके पास आ जायेंगे। बाप ने समझाया है जैसे मनुष्य का जीनालॉजिकल ट्री है। ब्रह्मा सरस्वती, आदम ईव आदि उन्हों का सिजरा बनता है। वैसे तुमने देखा है मूलवतन में भी सिज़रा है। पहले-पहले है शिव। तुम आत्मा मेरे गले का हार कैसे बनेंगी? मुझे याद करने से। जितना जो मुझे याद करते हैं उतना तीखी दौड़ी पहनते हैं। मेरे साथ बहुत प्रेम है। मेरे पास आने बिना रह नहीं सकते क्योंकि आत्मा को इस शरीर के साथ सुख नहीं, दु:ख है। अब भगवान तो है निराकार। कहते भी हैं निराकार आत्माओं को। वह परमपिता परमात्मा ही सृष्टि के आदि मध्य अन्त को जानते हैं, त्रिकालदर्शी हैं। और कोई मनुष्य भल कितना बड़ा पण्डित हो, वेद शास्त्र पढ़ा हुआ हो परन्तु उनको इस सृष्टि के आदि मध्य अन्त का ज्ञान नहीं है। नास्तिक होने के कारण त्रिकालदर्शी हो नहीं सकते। तुम बच्चे अभी आस्तिक हो। बाप ने तुमको परिचय दिया है, इसलिए तुम बाबा कहने के हकदार हो। वह तो कह देते परमात्मा सर्वव्यापी है, फिर इससे क्या मिला! कुछ भी नहीं। बाप तो ज्ञान का सागर है। वह ऐसे नहीं कहते कि मैं सर्वव्यापी हूँ। फिर तो सब फादर हो जाते। फादर हुड कहा जाता है क्या? एक बाप के बच्चे हैं। उनको प्रभु ईश्वर भी कहते हैं। ब्रह्मा विष्णु शंकर को रचने वाला है। त्रिमूर्ति ब्रह्मा कहना रांग है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का भी बाप वह शिव है। उसने ब्रह्मा को एडाप्ट किया है। तुम भी जानते हो ब्रह्मा के मुख से परमपिता परमात्मा शिव द्वारा हम त्रिकालदर्शी वा स्वदर्शन चक्रधारी बन रहे हैं। स्व अर्थात् आत्मा का ज्ञान। आत्मा को ही स्वराज्य मिलता है। आत्मा अविनाशी है, शरीर विनाशी है। आत्मा ही अच्छे वा बुरे सभी संस्कार धारण करती है। तुम जानते हो हम आत्मा अभी तमोप्रधान हैं। कहा भी जाता है पतित आत्मा वा पावन आत्मा। शरीर का नाम नहीं लिया जाता है। पुण्य आत्मा, महान आत्मा। आत्मा की ही महिमा की जाती है। आत्मा परमपिता परमात्मा बाप से बैठ सुनती है। दुनिया में कोई को पता नहीं कि बाप ऐसे बैठ बच्चों को पढ़ाते हैं। अभी तुम समझते हो कि हम बाप के बने हैं। बाप से हमको वर्सा लेना है। दूसरे से हमारा कोई काम नहीं। आत्मा कहती है मेरा तो एक शिवबाबा दूसरा न कोई। स्टूडेन्ट समझेंगे मेरा तो एक टीचर… तुम्हारा एक ही बाप, शिक्षक है। वह पतित-पावन बाप है। सभी आत्माओं का कनेक्शन उस बाप, शिक्षक से ही है। भल कोई ब्राह्मणी पढ़ाती है। परन्तु वह भी मुझ बाप से ही पढ़ी हुई है। बाप कहते हैं तुम मुझे याद करो, न कि ब्राह्मणी को। अब तुम बच्चे मुझ बाप को जान गये हो, पहचान गये हो। अब तुम आस्तिक बने हो। जो नहीं जानते वह हैं नास्तिक, निधनके। बाप का नाम, रूप, देश, काल क्या है? कुछ भी नहीं जानते। कह देते उसका कोई नाम रूप नहीं है। अब तुम जानते हो जरूर उनका नाम है शिव। वह अपना शरीर तो धारण करते नहीं, इसलिए उनका नाम कभी बदल नहीं सकता। तुम जानते हो हमारे 84 जन्मों का नाम-रूप बदलता जाता है। उनका नाम तो है ही शिव। जैसे आत्मा का रूप है वैसे परमात्मा का भी रूप है। ऐसे नहीं कि परमात्मा कोई अखण्ड ज्योति बहुत बड़ा है। बाप कहते हैं जैसे आत्मा स्टॉर मिसल है, वैसे मैं भी हूँ। परन्तु मेरे में ज्ञान है इसलिए मेरी महिमा है। सत-चित-आनंद स्वरूप, ज्ञान का सागर है। चैतन्यता है, तब तो ज्ञान सुनाते हैं। वह है चैतन्य बीज रूप। वह जड़ बीज तो कुछ सुना न सके। मनुष्य ही जानते हैं। जैसे बाप की बुद्धि में सारे मनुष्य सृष्टि का झाड़ है, वैसे तुम्हारी बुद्धि में है। कितना वैराइटी है। एक का भी फीचर न मिले दूसरे से। हर एक का फीचर अलग-अलग है। हर एक का अपना-अपना पार्ट है। बाप समझाते हैं कितना बड़ा बेहद का नाटक है। कितने वैराइटी फीचर्स हैं। सभी इस ड्रामा में एक्टर्स हैं। जबकि यह ड्रामा अविनाशी है तो कोई भी एक्टर बदली नहीं हो सकता। तुमको मालूम पड़ा है कि हमारे 84 जन्मों के 84 नाम पड़ते हैं। अभी नाम भी पूरे हुए तो वर्ण भी पूरे हुए। अब फिर रिपीट होगा अर्थात् गीता एपीसोड रिपीट हो रहा है। पहले-पहले श्रीमत भगवान की गाई हुई है। परन्तु भगवान को भूल गये हैं। शिवबाबा की जयन्ती हो तब कृष्ण की हो। ऐसे थोड़ेही कि बाप की जयन्ती ही गुम हो जाए और बच्चे की जयन्ती हो जाए। तुम बच्चों को समझाया जाता है कि लक्ष्मी-नारायण विश्व के मालिक थे। उन्होंने यह वर्सा कैसे पाया? परमपिता परमात्मा से। परमपिता परमात्मा ही राजयोग सिखलाते हैं। कब? बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुग पर आता हूँ। जबकि आसुरी राज्य का विनाश, दैवी राज्य की स्थापना होती है। जो आस्तिक बने हैं, उन्हों को वर्सा मिल रहा है। नास्तिक को वर्सा मिल न सके। बाप आये हैं सबको दु:ख से मुक्त करते हैं, अब यह सुखधाम में जाते हैं तब और बाकी आत्मायें हिसाब-किताब चुक्तू कर वापिस चली जाती हैं। निराकार बाप सर्व आत्माओं को घर ले जाने के लिए आये हैं। ले जाने वाले को महाकाल, कालों का काल कहा जाता है। कालों का काल महाकाल का भी मन्दिर है। महाकाल शिव है वा सोमनाथ, रूद्र कहो। सम्मुख कहते हैं मैं इन सभी आत्माओं का गाइड हूँ। सभी को साथ ले जाऊंगा। बाप कहते हैं तुमको इस रावण के राज्य से लिबरेट करता हूँ। यह है रावण राज्य। अब रावण राज्य मुर्दाबाद हो रामराज्य जिंदाबाद होना है। राम राज्य चाहते तो सब हैं ना। तो जरूर रावण के राज्य का विनाश चाहिए।

बाप समझाते हैं अब यह पुरानी दुनिया ही खत्म होनी है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म को बिल्कुल ही भूल गये हैं। यह वही गीता एपीसोड चल रहा है। यादव कौरव भी बरोबर हैं। यादव वही यूरोपवासी हैं। मूसल इनवेंट करने वाले हैं, यह भी लिखा है इन्टरनेशनल लड़ाई में सब खत्म होंगे। कोई अपने आदि सनातन देवी-देवता धर्म को नहीं जानते। गाया भी जाता है रिलीजन इज़ माइट। रिलीजस आदमी को अच्छा माना जाता है। इरिलीजस को बुरा माना जाता है। तुम जानते हो भारत रिलीजस था। आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। अभी भारत इरिलीजस बना है। अपने धर्म को छोड़ दिया। यह ड्रामा अनुसार ऐसे छोड़ना ही है। वहाँ तो महाराजा महारानी का राज्य चलता है। वजीर आदि वहाँ होते ही नहीं। कायदा नहीं। जब पतित बनते हैं तब वजीर आदि की दरकार रहती है। अभी तो एक-एक राजधानी को कितने वजीर (मंत्री) हैं। एक की मत न मिले दूसरे से, कितना मतभेद में आते रहते हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो कि बाबा हमको पढ़ा रहे हैं, मनुष्य से देवता बनाने। बाप कहते हैं सभी अपने को आत्मा समझो। देह के इन सब सम्बन्धों को भूल जाओ। एकदम बेगर बन गये, सब कुछ दे दिया। शरीर भी दे दिया बाकी क्या रहा। कुछ भी नहीं। परमपिता परमात्मा कहते हैं मैं आत्माओं से बात करता हूँ। आत्माओं को ले जाना है। इस शरीर के भान को भूलते जाओ, इसमें ही मेहनत है।

बाप कहते हैं मीठे बच्चों, सारा कल्प तुम देह-अभिमानी रहे हो। लौकिक बाप को ही याद किया है, अब देही-अभिमानी बन मेरे को याद करो। मेरी याद से ही बल मिलेगा। हे बच्चे, हे आत्मायें मामेकम् याद करो, दूसरा न कोई। भूले चूके भी और कोई को याद नहीं करना है। तुम यह प्रतिज्ञा करते हो। बाबा मेरे तो आप एक ही हो। हम आत्मा हैं, आप परमात्मा हो। आपने बतलाया है। आत्मा हमारे बच्चे हो। अब रावण के दु:ख से तुमको लिबरेट कर वापिस ले जाने आया हूँ। अब बच्चों को धीरज धरना है। जब राजधानी स्थापन हो जायेगी तो फिर यह महाभारी महाभारत की लड़ाई लगेगी। तब ही कलियुग बदल सतयुग हो सकता। तो मैं कालों का काल ठहरा ना। मैं बाप भी हूँ तो शिक्षक भी हूँ, पतित-पावन भी हूँ, फिर मैं महाकाल भी हूँ। कहाँ ले जाऊंगा? मीठे बच्चे मुक्तिधाम में ले जाऊंगा। यहाँ से मुक्त होंगे तो स्वर्ग में आयेंगे। तुम पढ़ते हो – भविष्य में देवी-देवता बनने। अब तुम ब्राह्मण ईश्वरीय सन्तान हो। सब कहते हैं हम ब्राह्मण ईश्वरीय सन्तान हैं। ब्रह्मा की औलाद भाई बहन हैं। विकार में जा नहीं सकते। हम ईश्वरीय पोत्रे पोत्रियाँ हैं, उनसे हम वर्सा ले रहे हैं। जितना जो पुरुषार्थ करेंगे उतना पद पायेंगे। कल्प-कल्प पुरुषार्थ किया होगा तो अब तुम पुरुषार्थ करने लग पड़ेंगे। इसमें साक्षी रहने का अभ्यास चाहिए। साक्षी होकर देखो हर एक कितना पुरुषार्थ करते हैं, कहाँ तक फालो करते हैं। कोई के नाम-रूप में नहीं अटकना है। सिवाए बाप के और कोई याद न आये। बाबा कहते हैं बच्चे मैं तुम्हें राजयोग सिखलाए पावन बनाकर साथ ले जाऊंगा। अभी तुम समझते हो बरोबर कल्प-कल्प हमको बाप से शिक्षा मिलती है ड्रामा अनुसार। तुम द्रोपदियाँ हों, यह कोई सुख का राज्य नहीं है। इस पर कहानी भी बनाई हुई है। अब बाप तो रीयल्टी में समझाते हैं। तुम अब बाप से वर्सा ले रहे हो, सबको दुबन (दलदल) से निकालते हो। सब काम चिता पर बैठ जल मरे हैं। तुम्हारे सिर पर तो ज्ञान की वर्षा हो रही है। बाप कहते हैं यह मेरे बच्चे जलकर खाक हो गये हैं। मैं आया हूँ सबको लिबरेट कर साथ ले जाऊंगा। मनुष्यों को यह पता नहीं। अब तुम घोर अन्धियारे से निकल आये हो। अब बाप कहते हैं मुझे याद करो, घर को याद करो। तुम आत्मायें घर को भूल गई हो। गाते भी हैं मूलवतन, सूक्ष्मवतन। मूलवतन में सभी आत्मायें रहती हैं। आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है, मूलवतन क्या है…, कुछ भी नहीं जानते। वह तो आत्मा सो परमात्मा कह सब खेल ही खलास कर देते हैं। बाबा कहते हैं यह भी ड्रामा में नूँध है। इस समय जो भी होता है, जो सेकेण्ड बीतता वह ड्रामा फिर से रिपीट होता है। बाप बैठ पढ़ाते हैं। यह रिपीटेशन का राज़ भी बाप ने समझाया है। ऐसे नहीं कि ड्रामा में जो मेरा भाग्य होगा, वह मिलेगा। ड्रामा अनुसार एक्ट चलती है तो हम पुरुषार्थ क्या करें, ऐसा समझने वाले भी हैं। परन्तु नहीं, पुरुषार्थ तो करना है ना। बाप आये ही हैं पुरुषार्थ कराने। तुम बच्चों को पूरा पुरुषार्थ करना है। साक्षी हो देखना भी है। कौन तीव्र पुरुषार्थ करते हैं, कौन अच्छा पद पा सकेंगे? बाप द्वारा कौन पूरा वर्सा लेते हैं? साक्षी हो पुरुषार्थ करना और कराना है और साक्षी हो देखना है कि यह कितनी सर्विस करते हैं। कितनों को आप समान बनाते हैं। बाप का परिचय देते हैं औरों के पुरुषार्थ को देख खुद भी तीव्र पुरुषार्थ करना है। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) देह और देह के सम्बन्धों को भूल पूरा बेगर बनना है, मेरा कुछ नहीं। देही-अभिमानी रहने की मेहनत करनी है। किसी के नाम रूप में नहीं अटकना है।

2) ड्रामा में होगा तो पुरुषार्थ कर लेंगे, ऐसा सोचकर पुरुषार्थ-हीन नहीं बनना है। साक्षी हो दूसरों के पुरुषार्थ को देखते तीव्र पुरुषार्थी बनना है।

वरदान:- विनाश के पहले एवररेडी रहने वाले समान और सम्पन्न भव 
विनाश के पहले एवररेडी बनना ही सेफ्टी का साधन है। अगर समय मिलता है तो संगमयुग की मौज मनाओ लेकिन रहो एवररेडी क्योंकि फाइनल विनाश की डेट कभी भी पहले मालूम नहीं पड़ेगी, अचानक होना है। एवररेडी नहीं होंगे तो धोखा हो जायेगा इसलिए एवररेडी रहो। सदा याद रखो कि हम और बाप सदा साथ हैं। जैसे बाप सम्पन्न है वैसे साथ रहने वाले भी समान और सम्पन्न हो जायेंगे। समान बनने वाले ही साथ चलेंगे।
स्लोगन:- जिनका स्वभाव निर्मल है उनके हर कदम में सफलता समाई हुई है।

 

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