3 august ki murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 3 AUGUST 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 3 August 2020

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03-08-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम्हें सर्विस की बहुत उछल आनी चाहिए, ज्ञान और योग है तो दूसरों को भी सिखाओ, सर्विस की वृद्धि करो”
प्रश्नः- सर्विस में उछल न आने का कारण क्या है? किस विघ्न के कारण उछल नहीं आती?
उत्तर:- सबसे बड़ा विघ्न है क्रिमिनल आई। यह बीमारी सर्विस में उछलने नहीं देती। यह बहुत कड़ी बीमारी है। अगर क्रिमिनल आई ठण्डी नहीं हुई है, गृहस्थ व्यवहार में दोनों पहिये ठीक नहीं चलते तो गृहस्थी का बोझ हो जाता, फिर हल्के हो सर्विस में उछल नहीं सकते।
गीत:- जाग सजनियाँ जाग ……..

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे बच्चों ने यह गीत सुना। ऐसे-ऐसे दो-चार अच्छे गीत हैं वह सभी के पास होने चाहिए या टेप में भरने चाहिए। अब यह तो गीत मनुष्यों का बनाया हुआ कहेंगे। ड्रामा अनुसार टच किया हुआ है जो फिर बच्चों को काम आ जाता है। ऐसे-ऐसे गीत बच्चों को सुनने से नशा चढ़ता है। बच्चों को तो नशा चढ़ा रहना चाहिए कि अभी हम नई राजाई स्थापन कर रहे हैं। रावण से ले रहे हैं। जैसे कोई लड़ते हैं तो ख्याल रहता है ना – इनकी राजाई हप कर लेवें। इनका गांव हम अपने हाथ करें। अब वह सब हद के लिए लड़ते हैं। तुम बच्चों की लड़ाई है माया से, जिसका सिवाए तुम ब्राह्मणों के और कोई को पता नहीं। तुम जानते हो हमको इस विश्व पर गुप्त रीति राज्य स्थापन करना है अथवा बाप से वर्सा लेना है। इसको वास्तव में लड़ाई भी नहीं कहेंगे। ड्रामा अनुसार तुम जो सतोप्रधान से तमोप्रधान बने हो सो फिर सतोप्रधान बनना है। तुम अपने जन्मों को नहीं जानते थे। अभी बाप ने समझाया है। और जो भी धर्म हैं उनको यह नॉलेज मिलने की है नहीं। बाप तुम बच्चों को ही बैठ समझाते हैं। गाया भी जाता है धर्म में ही ताकत है। भारतवासियों को यह पता नहीं है कि हमारा धर्म क्या है। तुमको बाप द्वारा पता पड़ा है कि हमारा आदि सनातन देवी-देवता धर्म है। बाप आकर फिर तुमको उस धर्म में ट्रांसफर करते हैं। तुम जानते हो हमारा धर्म कितना सुख देने वाला है। तुमको कोई से लड़ाई आदि नहीं करनी है। तुमको तो अपने स्वधर्म में टिकना है और बाप को याद करना है, इसमें भी टाइम लगता है। ऐसे नहीं कि सिर्फ कहने से टिक जाते हैं। अन्दर में यह स्मृति रहनी चाहिए – मैं आत्मा शान्त स्वरूप हूँ। हम आत्मा अभी तमोप्रधान पतित बनी हैं। हम आत्मा जब शान्तिधाम में थी तो पवित्र थी, फिर पार्ट बजाते-बजाते तमोप्रधान बनी हैं। अभी फिर पवित्र बन हमको वापिस घर जाना है। बाप से वर्सा लेने लिए अपने को आत्मा निश्चय कर बाप को याद करना है। तुमको नशा चढ़ेगा हम ईश्वर की सन्तान हैं। बाप को याद करने से ही विकर्म विनाश होते हैं। कितना सहज है – याद से हम पवित्र बन फिर शान्तिधाम में चले जायेंगे। दुनिया इस शान्तिधाम, सुखधाम को भी नहीं जानती। यह बातें कोई शास्त्रों में नहीं हैं। ज्ञान सागर की है ही एक गीता, जिसमें सिर्फ नाम बदल लिया है। सर्व का सद्गति दाता, ज्ञान का सागर उस परमपिता परमात्मा को कहा जाता है। और कोई को ज्ञानवान कह नहीं सकते। जब वह ज्ञान दे तब तुम ज्ञानवान बनो। अभी सब हैं भक्तिवान। तुम भी थे। अभी फिर ज्ञानवान बनते जा रहे हो। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार ज्ञान कोई में है, कोई में नहीं है। तो क्या कहेंगे? उस हिसाब से ऊंच पद पा न सकें। बाप सर्विस के लिए कितना उछलते हैं। बच्चों में अभी वह ताकत आई नहीं है जो किसको अच्छी रीति समझायें। ऐसी-ऐसी युक्तियां रचें। भल बच्चे मेहनत कर कान्फ्रेन्स आदि कर रहे हैं, गोपों में कुछ ताकत है, उनको ख्याल रहता है कि संगठन हो जिसमें युक्तियां निकालें। सर्विस वृद्धि को कैसे पाये? माथा मार रहे हैं। नाम भल शक्ति सेना है परन्तु पढ़ी लिखी नहीं हैं। कोई फिर अनपढ़ भी पढ़े लिखे को अच्छा पढ़ाती हैं। बाबा ने समझाया है क्रिमिनल आई बड़ा नुकसान करती है। यह बीमारी बड़ी कड़ी है इसलिए उछलते नहीं हैं। तो बाबा पूछते हैं तुम युगल दोनों पहिये ठीक चल रहे हो? उस तरफ कितनी बड़ी-बड़ी सेनायें हैं, स्त्रियों का भी झुण्ड है, पढ़े लिखे हैं। उन्हों को मदद भी मिलती है। तुम तो हो गुप्त। कोई भी नहीं जानते कि यह ब्रह्माकुमार कुमारियां क्या करते हैं। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं। गृहस्थ व्यवहार का बोझा सिर पर रहने से झुके हुए हैं। ब्रह्माकुमार कुमारी कहलाते हैं परन्तु वह क्रिमिनल आई ठण्डी नहीं होती। दोनों पहिये एक जैसे हों बड़ा मुश्किल है। बाबा बच्चों को सर्विस उठाने के लिए समझाते रहते हैं। कोई धनवान हैं – तो भी उछलते नहीं हैं। धन के भूखे हैं, बच्चा नहीं होगा तो भी गोद में लेते हैं। उछल नहीं आती, बाबा हम बैठे हैं। हम बड़ा मकान लेकर देते हैं।

बाबा की नज़र देहली पर विशेष है क्योंकि देहली है कैपीटल, हेड आफिस। बाबा कहते हैं देहली में विशेष सेवा का घेराव डालो। कोई को समझाने के लिए अन्दर घुसना चाहिए। गाया भी हुआ है कि पाण्डवों को कौरवों से 3 पैर पृथ्वी के भी नहीं मिलते थे। यह कौरव अक्षर तो गीता का है। भगवान ने आकर राजयोग सिखाया, उसका नाम गीता रखा है। परन्तु गीता के भगवान को भूल गये हैं इसलिए बाबा घड़ी-घड़ी कहते रहते हैं मुख्य इस प्वाइंट को ही उठाना है। आगे बाबा कहते थे बनारस के विदुत मण्डली वालों को समझाओ। बाबा युक्तियां तो बतलाते रहते हैं। फिर अच्छी रीति कोशिश करनी है। बाप बार-बार समझाते रहते हैं। नम्बरवन देहली में युक्ति रचो। संगठन में भी यह विचार करो। मूल बात कि बड़ा मेला आदि देहली में कैसे करें। वो लोग तो देहली में बहुत ही भूख हडताल आदि करते हैं। तुम तो ऐसा कोई काम नहीं करते हो। लड़ना झगड़ना कुछ नहीं। तुम तो सिर्फ सोये हुए को जगाते हो। देहली वालों को ही मेहनत करनी है। तुम तो जानते हो हम ब्रह्माण्ड के भी मालिक फिर कल्प पहले मुआफिक सृष्टि के भी मालिक बनेंगे। यह पक्का है जरूर। विश्व का मालिक बनना ही है। अभी तुमको 3 पैर पृथ्वी के भी कैपीटल में ही चाहिए, जो वहाँ ज्ञान के गोले छोड़ें। नशा चाहिए ना! बड़ों का आवाज चाहिए ना। इस समय भारत सारा गरीब है। गरीबों की सेवा करने के लिए ही बाप आते हैं। देहली में तो बहुत अच्छी सर्विस होनी चाहिए। बाबा इशारा देते रहते हैं। देहली वाले समझते हैं बाबा हमारा अटेन्शन खिंचवाते हैं। आपस में क्षीरखण्ड होना चाहिए। अपना पाण्डवों का किला तो बनायें। देहली में ही बनाना पड़ेगा। इसमें दिमाग बड़ा अच्छा चाहिए। बहुत कुछ कर सकते हैं। वो लोग गाते तो बहुत हैं भारत हमारा देश है, हम ऐसे करेंगे। परन्तु खुद में कुछ भी दम नहीं। सिवाए फारेन की मदद से उठ नहीं सकते। तुमको तो बहुत मदद मिल रही है बेहद के बाप से। इतनी मदद कोई दे न सके। अब जल्दी किला बनाना है। तुम बच्चों को बाप विश्व की बादशाही देते हैं तो हौंसला बहुत चाहिए। झरमुई झगमुई में बहुतों की बुद्धि अटकी रहती है। बन्धनों की आफत है माताओं पर। मेल्स पर कोई बन्धन नहीं। माताओं को अबला कहा जाता है। पुरूष बलवान होते हैं। पुरूष शादी करते हैं तो उनको बल दिया जाता है – तुम ही गुरू ईश्वर सब कुछ हो। स्त्री तो जैसे पूँछ है। पिछाड़ी में लटकने वाली तो सचमुच पूँछ होकर ही लटक पड़ती है। पति में मोह, बच्चों में मोह, पुरूषों को इतना मोह नहीं रहता है। उनकी तो एक जुत्ती गई तो दूसरी तीसरी ले लेते। आदत पड़ गई है। बाबा तो समझाते रहते हैं – यह-यह अखबार में डालो। बच्चों को बाप का शो करना है। यह समझाना तुम्हारा काम है। बाबा के साथ तो दादा भी है। तो यह जा नहीं सकते। कहेंगे शिवबाबा यह बताओ, यह हमारे ऊपर आफतें आई हैं, इसमें आप राय दो। ऐसी-ऐसी बातें पूछते हैं। बाप तो आये हैं पतितों को पावन बनाने। बाप कहते हैं तुम बच्चों को सब नॉलेज मिलती है। कोशिश कर आपस में मिलकर राय करो। तुम बच्चों को अभी विहंग मार्ग की सेवा का तमाशा दिखाना चाहिए। चींटी मार्ग की सर्विस तो चलती आ रही है। लेकिन ऐसा तमाशा दिखाओ जो बहुतों का कल्याण हो जाए। बाबा ने यह कल्प पहले भी समझाया था, अब भी समझाते हैं। बहुतों की बुद्धि कहाँ न कहाँ फँसी हुई है। उमंग नहीं। झट देह-अभिमान आ जाता है। देह-अभिमान ने ही सत्यानाश की है। अब बाप सत्या ऊंच करने की कितनी सहज बात बताते हैं। बाप को याद करो तो शक्ति आये। नहीं तो शक्ति आती नहीं। भल सेन्टर सम्भालते हैं, परन्तु नशा नहीं क्योंकि देह-अभिमान है। देही-अभिमानी बनें तो नशा चढ़े। हम किस बाप के बच्चे हैं। बाप कहते हैं जितना तुम देही-अभिमानी होंगे उतना बल आयेगा। आधाकल्प का देह-अभिमान का नशा है तो देही-अभिमानी बनने में बड़ी मेहनत लगती है। ऐसे नहीं बाबा ज्ञान का सागर है, हमने भी ज्ञान उठाया है, बहुतों को समझाते हैं परन्तु याद का जौहर भी चाहिए। ज्ञान की तलवार है। याद की फिर यात्रा है। दोनों अलग चीज़ हैं। ज्ञान में याद की यात्रा का जौहर चाहिए। वह नहीं है तो काठ की तलवार हो जाती है। सिक्ख लोग तलवार का कितना मान रखते हैं। वह तो हिंसक थी, जिससे लड़ाई की। वास्तव में गुरू लोग लड़ाई थोड़ेही कर सकते हैं। गुरू तो अहिंसक चाहिए ना। लड़ाई से थोड़ेही सद्गति होती है। तुम्हारी तो है योग की बात। याद के बल बिगर ज्ञान तलवार काम नहीं करेगी। क्रिमिनल आई बड़ा नुकसान करने वाली है। आत्मा कानों से सुनती है, बाप कहते हैं तुम याद में मस्त रहो तो सर्विस बढ़ती जायेगी। कभी-कभी कहते हैं बाबा सम्बन्धी सुनते नहीं हैं। बाबा कहते हैं याद की यात्रा में कच्चे हो इसलिए ज्ञान तलवार काम नहीं करती है। याद की मेहनत करो। यह है गुप्त मेहनत। मुरली चलाना तो प्रत्यक्ष है। याद ही गुप्त मेहनत है, जिससे शक्ति मिलती है। ज्ञान से शक्ति नहीं मिलती। तुम पतित से पावन याद के बल से बनते हो। कमाई का ही पुरूषार्थ करना है।

बच्चों को याद जब एकरस रहती है, अवस्था अच्छी है तो बहुत खुशी रहती है और जब याद ठीक नहीं, किसी बात में घुटका खाते हैं तो खुशी गायब हो जाती है। क्या स्टूडेन्ट को टीचर याद नहीं पड़ता होगा। यहाँ तो घर में रहते, सब कुछ करते टीचर को याद करना है। इस टीचर से तो बहुत-बहुत ऊंच पद मिलता है। गृहस्थ व्यवहार में भी रहना है। टीचर की याद रहे तो भी बाप और गुरू याद जरूर आयेंगे। कितने प्रकार से समझाते रहते हैं। परन्तु घर में फिर धन-दौलत, बाल-बच्चे आदि देख भूल जाते हैं। समझाते तो बहुत हैं। तुमको रूहानी सर्विस करनी है। बाप की याद ही है ऊंच ते ऊंच सेवा। मन्सा-वाचा-कर्मणा बुद्धि में बाप की याद रहे। मुख से भी ज्ञान की बातें सुनाओ। किसको दु:ख नहीं देना है। कोई अकर्तव्य नहीं करना है। पहली बात अल्फ न समझने से और कुछ भी समझेंगे नहीं। पहले अल्फ पक्का कराओ तब तक आगे बढ़ना नहीं चाहिए। शिवबाबा राजयोग सिखलाकर विश्व का मालिक बनाते हैं। इस छी-छी दुनिया में माया का शो बहुत है। कितना फैशन हो गया है। छी-छी दुनिया से ऩफरत आनी चाहिए। एक बाप को याद करने से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। पवित्र बन जायेंगे। टाइम वेस्ट नहीं करो। अच्छी रीति धारणा करो। माया दुश्मन बहुतों का अक्ल चट कर देती है। कमान्डर ग़फलत करते हैं तो उनको डिसमिस भी करते हैं। खुद कमान्डर को भी लज्जा आती है फिर रिजाइन भी कर देते हैं। यहाँ भी ऐसे होता है। अच्छे-अच्छे कमान्डर्स कभी फाँ हो जाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) याद की गुप्त मेहनत करनी है। याद की मस्ती में रहने से सर्विस स्वत: ही बढ़ती रहेगी। मन्सा-वाचा-कर्मणा याद में रहने का पुरूषार्थ करना है।

2) मुख से ज्ञान की ही बातें सुनानी है, किसको दु:ख नहीं देना है। कोई भी अकर्तव्य नहीं करना है। देही-अभिमानी बनने की मेहनत करनी है।

वरदान:- विजयीपन के नशे द्वारा सदा हर्षित रहने वाले सर्व आकर्षणों से मुक्त भव
विजयी रत्नों का यादगार – बाप के गले का हार आज तक पूजा जाता है। तो सदा यही नशा रहे कि हम बाबा के गले का हार विजयी रत्न हैं, हम विश्व के मालिक के बालक हैं। हमें जो मिला है वह किसी को भी मिल नहीं सकता – यह नशा और खुशी स्थाई रहे तो किसी भी प्रकार की आकर्षण से परे रहेंगे। जो सदा विजयी हैं वो सदा हर्षित हैं। एक बाप की याद के ही आकर्षण में आकर्षित हैं।
स्लोगन:- एक के अन्त में खो जाना अर्थात् एकान्तवासी बनना।

TODAY MURLI 3 AUGUST 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 3 August 2020

03/08/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you should have great enthusiasm for doing service. You have knowledge and yoga, so teach it to others. Increase service.
Question: What is the reason for not having enthusiasm for doing service? Due to which obstacle is there no enthusiasm?
Answer: The biggest obstacle is the criminal eye. This illness does not allow you to have enthusiasm for doing service. This is a very severe illness. If the criminal eye doesn’t cool down, if both wheels of family life don’t run together well, the household becomes a burden. In that case, it isn’t possible to remain light and have enthusiasm for service.
Song: Awaken! O brides, awaken! The new age is about to dawn.

Om shanti. You sweetest, spiritual children heard the song. There are a few good songs, such as this one, that everyone should have. They should be recorded on tape. These songs have been composed by people who, according to the drama, must have been touched to do so. This is why they are useful for you children. When you children listen to such songs, your intoxication rises. The intoxication of you children should continue to remain high knowing that you are now establishing a new kingdom. You are reclaiming it from Ravan. When people go to war, they think of taking over someone’s kingdom; they want to take over someone’s village. They all fight for limited things. The fight of you children is with Maya. No one, except you Brahmins, knows about this. You know that you have to establish your kingdom over this world in an incognito way, that is, you have to claim your inheritance from the Father. In fact, you wouldn’t call this fighting. According to the drama, you had to become tamopradhan from satopradhan and you now have to become satopradhan again. You didn’t know about your own births. The Father has explained this to you. Those of other religions will not receive this knowledge. The Father sits here and only explains to you children. It is said: Religion is Might. The people of Bharat don’t know what their religion is. You have now come to know from the Father that your religion is the original eternal deity religion. The Father comes to transfer you back into that religion. You know how much happiness your religion gives. You don’t have to fight with anyone. You have to become stabilised in the original religion of the self and remember the Father. This too takes time. It isn’t that you can stabilise in this just by speaking about it. Internally, there should be the awareness: I, a soul, am an embodiment of peace. I, a soul, have now become tamopradhan, impure. When I, a soul, was in the land of peace, I was pure, and then, while playing my part, I became tamopradhan. I now have to become pure and return home. In order to claim your inheritance from the Father, have the faith that you are souls and remember the Father. You will have the intoxication that you are the children of God. Only by remembering the Father will you be absolved of your sins. It is so easy! It is by having remembrance that you will become pure and go to the land of peace. The world does not even know about that land of peace and land of happiness. These things are not mentioned in the scriptures. There is just the one Gita of the Ocean of Knowledge, but it is only that they have changed the name in that. The one Supreme Father, the Supreme Soul, is called the Bestower of Salvation for All and the Ocean of Knowledge. No one else is called knowledge-full. Only when He gives you knowledge can you become knowledge-full. Everyone now is full of devotion. You too were like that. You are now becoming knowledge-full. You are numberwise according to the efforts you make; some of you have knowledge and some don’t. So, what can be said? You cannot claim a high status according to that. The Father has so much enthusiasm for doing service. As yet, children don’t have the power to explain to others very well or to create such tactics, although you children are making effort to hold conferences etc. The brothers have some power and are thinking about holding a gathering in which they can create ways of doing service to make it expand. They are working on this. Although this is called the Shakti Army, some Shaktis are not educated. Some uneducated ones teach educated ones very well. Baba has explained to you that the criminal eye causes a great deal of harm. This is a very severe illness; it is why there isn’t that enthusiasm. Therefore, Baba asks if both the wheels of the household path are running together well. On that side, there are such big armies. There are groups of women who are very well educated; they receive help. You are incognito. No one knows what you Brahma Kumars and Kumaris are doing. You are also numberwise. You have been bent over by the burden of the household path. Although some call themselves Brahma Kumars and Kumaris, their criminal eyes do not cool down. It is very difficult for both wheels to run at the same speed. Baba continues to explain to you children in order to make you take up service. Some are wealthy and yet there isn’t that enthusiasm; they are greedy for wealth. If they don’t have children of their own, they want to adopt a child. They don’t say with that enthusiasm: Baba, I am here. I will buy a big house and give that for service. Baba’s vision is especially on Delhi because Delhi is the capital, the head office. Baba says: Service must spread, especially in Delhi. You should push your way in and explain to someone. It is remembered that the Pandavas weren’t even given three square feet of land by the Kauravas. The word “Kaurava” comes from the Gita. God came and taught Raj Yoga and that was named the Gita. However, they have forgotten the God of the Gita. This is why Baba repeatedly tells you: Just take up this one main point. Earlier, Baba used to say: Explain to those who belong to the Vidhuth Society from Benares. Baba continues to show you methods. Therefore, you have to try to explain to them very well. The Father continues to explain to you over and over again. Create ways to serve the number one (capital), Delhi. Have a gathering and think about these aspects. The main thing is to think about how to hold a huge mela in Delhi. Those people go on many hunger strikes etc., in Delhi. You don’t do such things. You don’t have to fight or quarrel. You simply awaken those who are asleep. Those in Delhi have to make effort to do this work. You know that you were the masters of Brahmand, the element of light, and that you are also becoming the masters of the world just as you did in the previous cycle. It is definitely certain that you have to become the masters of the world. You now also need three square feet of land in the capital so that you can drop bombs of knowledge. There has to be this intoxication. A sound from eminent people is needed. At this time, the whole of Bharat is poor. The Father comes to serve the poor. There should be very good service taking place in Delhi. Baba continues to give you signals. Those in Delhi understand that Baba is drawing their attention to this. You have to live together like milk and sugar. There should at least be a fortress of you Pandavas. It has to be built in Delhi. A very good head is needed for this. You can do a great deal. Those people very proudly sing, “Bharat is our land and we will do this”, etc. However, they don’t have any strength in them. They cannot be uplifted without help from abroad. You are receiving a great deal of help from the unlimited Father. No one else can give as much help. Now create a fortress very quickly. The Father is giving you children the sovereignty of the world. Therefore, you should have great enthusiasm. The intellects of many become stuck in gossiping. Women have great difficulty because of their bondage. Males don’t have any bondage. Women are said to be poor and weak, whereas men are strong. When a man gets married he is given even more power because he is told that he is the guru and god, that he is everything. It is as though the woman is just the tail. A woman who always dangles after her husband would truly dangle like a tail behind him. She would have attachment to her husband and children but men don’t have as much attachment. When they lose a shoe (wife), they find a second, a third. They have instilled that habit in themselves. Baba continues to explain to you: Print this and this in the newspapers. You children have to reveal the Father. It is your duty to explain this. Dada is also with Baba; therefore this one cannot go anywhere. People would say: Shiv Baba, I have such and such a difficulty. Can You advise me on this? They ask such questions. The Father has come to purify the impure. The Father says: You children receive all the knowledge. Try and discuss these matters among yourselves. You children now have to show the wonders of doing fast service. Service has continued to take place at a crawling speed. Now show such wonders that many are benefitted. Baba also explained this in the previous cycle and he is explaining it to you now. The intellects of many become trapped somewhere or other; they don’t have enthusiasm. They very quickly become body conscious. It is body consciousness that has destroyed everything (all truth). The Father is now telling you such easy things in order to revive the truth. Remember the Father and you will receive power. Otherwise, you won’t receive power. Although some look after centres, they don’t have any intoxication because they are body conscious. If they were to become soul conscious, they would become intoxicated knowing whose children they are. The Father says: The more soul conscious you become, the more power you will receive. There has been the intoxication of body consciousness for half a cycle, so it takes great effort to become soul conscious. It isn’t just because Baba is the Ocean of Knowledge and you have taken knowledge that you feel you are able to explain it to many others. There also has to be the power of remembrance. There is the sword of knowledge and the pilgrimage of remembrance; the two things are separate. The power of the pilgrimage of remembrance is required on the path of knowledge. If there isn’t that, then the sword becomes a sword of bamboo. Sikhs have so much respect for swords. That was the weapon with which they used to fight. In fact, gurus should never fight. A guru has to be non-violent. There cannot be salvation by fighting. Yours is a matter of yoga. The sword of knowledge will not work without the power of remembrance. The criminal eye causes a great deal of damage. Souls hear through the ears. The Father says: Remain intoxicated in remembrance and service will continue to increase. Sometimes, children say that their relatives won’t listen to them. Baba says: It is because you are weak in the pilgrimage of remembrance that the sword of knowledge is not working. Make effort to have remembrance. This effort is incognito. Giving knowledge to others is very visible. The effort of remembrance through which you receive power is incognito. You don’t receive power by having knowledge. It is with the power of remembrance that you become pure from impure. You have to make effort to earn an income. When the remembrance of you children is constant and your stage remains good, you have great happiness. When you don’t have accurate remembrance and you choke over something, your happiness disappears. Would students not remember their teacher? Here, while living at home and carrying on with everything, you have to remember the Teacher. You receive a very high status through this Teacher. You have to stay living at home with your families. By remembering the Teacher, you will definitely also remember the Father and the Guru. He continues to explain to you in many different ways. However, when you see your wealth and prosperity and your children etc., at home, you forget everything. Baba tells you so much that you have to do spiritual service. Remembrance of the Father is the highest service of all. Let there be remembrance of the Father in your intellects, in your thoughts, words and deeds. Relate points of knowledge to others. Do not cause sorrow for anyone. Do not perform any unrighteous acts. If they don’t understand the first aspect of Alpha, they will not understand anything else. First of all, make Alpha firm for them. Don’t move on to any other subject till then. Shiv Baba is teaching you Raj Yoga and making you into the masters of the world. There is a great show of Maya in this dirty world. There is so much fashion, etc. There should be dislike for this dirty world. By remembering the one Father, your sins will be absolved and you will become pure. Don’t waste your time. Imbibe everything very well. Maya, the enemy, completely finishes the wisdom of many. When a commander makes a mistake, he is dismissed. The commander feels so ashamedof himself that he resigns. It is the same here. Sometimes even very good commanders fail. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Make incognito effort to have remembrance. By maintaining your intoxication of remembrance, service will automatically continue to increase. Make effort to stay in remembrance in your thoughts, words and deeds.
  2. Only speak about things of knowledge. Never cause sorrow for anyone. Don’t perform any unrighteous acts. Make effort to become soul conscious.
Blessing: May you become free from all attractions and remain constantly cheerful with the intoxication of always being victorious.
The memorial of victorious jewels is the garland around the Father’s neck and it is worshipped even today. So, always have the intoxication of being the victorious jewels who are the garland around Baba’s neck. You are the children of the Master of the World. No one else can receive what you have received. When you permanently have this intoxication and happiness you will be able to remain beyond any type of attraction. Those who are constantly victorious will always remain cheerful. They are only attracted to the attraction of remembrance of the one Father.
Slogan: To be lost in the depths of One means to be in solitude.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 3 AUGUST 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 3 August 2019

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03-08-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम्हारा अनादि नाता है भाई-भाई का, तुम साकार में भाई-बहिन हो इसलिए तुम्हारी कभी क्रिमिनल दृष्टि नहीं जा सकती”
प्रश्नः- विजयी अष्ट रत्न कौन बनते हैं? उनकी वैल्यु क्या है?
उत्तर:- जिनकी मन्सा में क्रिमिनल ख्यालात नहीं रहते, पूरी सिविल आई हो, वही अष्ट रत्न बनते हैं अर्थात् कर्मातीत अवस्था को पाते हैं। उनकी इतनी अधिक वैल्यु होती जो किसी पर कभी ग्रहचारी बैठती है तो उसे अष्ट रत्न की अंगूठी पहनाते हैं। समझते हैं इससे ग्रहचारी उतर जायेगी। अष्ट रत्न बनने वाले दूरादेशी बुद्धि होने कारण भाई-भाई की स्मृति में निरन्तर रहते हैं।

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चे जानते हैं। उन्हों का नाम क्या है? ब्राह्मण। ब्रह्माकुमार और कुमारियाँ ढेर हैं। इससे सिद्ध होता है यह एडाप्टेड चिल्ड्रेन हैं क्योंकि एक ही बाप के बच्चे हैं। तो जरूर एडाप्टेड हैं। तुम ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ ही एडाप्टेड चिल्ड्रेन हो। बहुत चिल्ड्रेन हैं। एक होते हैं प्रजापिता ब्रह्मा के और एक होते हैं परमपिता परमात्मा शिव के, तो जरूर उन्हों का आपस में कनेक्शन है क्योंकि उनके हैं रूहानी बच्चे और इनके हैं जिस्मानी बच्चे। अगर उनके हैं तो जैसे भाई-भाई हैं। प्रजापिता ब्रह्मा के साकार भाई-बहन हो जाते हैं। भाई-बहन का क्रिमिनल नाता कभी होता नहीं। तुम्हारे लिए भी आवाज़ होता है ना कि यह सबको भाई-बहन बनाती हैं, जिससे शुद्ध नाता रहे। क्रिमिनल दृष्टि न जाये। सिर्फ इस जन्म के लिए यह दृष्टि पड़ जाने से फिर भविष्य कभी क्रिमिनल दृष्टि नहीं पड़ेगी। ऐसे नहीं कि वहाँ बहन-भाई समझते हैं। वहाँ तो जैसे महाराजा-महारानी होते हैं, वैसे ही होते हैं। अब तुम बच्चे जानते हो हम पुरूषोत्तम संगमयुग पर हैं और हम सब भाई-बहन हैं। प्रजापिता ब्रह्मा नाम तो है ना। प्रजापिता ब्रह्मा कब हुआ था – यह दुनिया को पता नहीं है। तुम यहाँ बैठे हो, जानते हो हम पुरूषोत्तम संगमयुगी बी.के. हैं। अभी इसे धर्म नहीं कहेंगे, यह कुल की स्थापना हो रही है। तुम ब्राह्मण कुल के हो। तुम कह सकते हो हम ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ जरूर एक प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान हैं। यह नई बात है ना। तुम कह सकते हो हम बी.के. हैं। यूं तो वास्तव में हम सब ब्रदर्स हैं। एक बाप के बच्चे हैं। उनके लिए एडाप्टेड नहीं कहेंगे। हम आत्मायें उनकी सन्तान तो अनादि हैं। वह परमपिता परमात्मा सुप्रीम सोल है। और किसको ‘सुप्रीम’ अक्षर नहीं कहेंगे। सुप्रीम कहा जाता है सम्पूर्ण पवित्र को। ऐसे नहीं कहेंगे सबमें प्योरिटी है। प्योरिटी सीखते हैं इस संगम पर। तुम तो पुरूषोत्तम संगमयुग के निवासी हो। जैसे कलियुग निवासी, सतयुग के निवासी कहा जाता है। सतयुग, कलियुग को तो बहुत ही जानते हैं। अगर दूरादेशी बुद्धि हो तो समझ सकेंगे। कलियुग और सतयुग के बीच को कहा जाता है संगमयुग। शास्त्रों में फिर युगे-युगे कह दिया है। बाप कहते हैं मैं युगे-युगे नहीं आता हूँ। तुम्हारी बुद्धि में यह होना चाहिए कि हम पुरूषोत्तम संगमयुगी ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ हैं। न हम सतयुग में हैं, न कलियुग में हैं। संगम के बाद सतयुग आना है जरूर।

तुम अभी सतयुग में जाने के लिए पुरूषार्थ कर रहे हो। वहाँ पवित्रता बिगर कोई जा नहीं सकते। इस समय तुम पवित्र बनने के लिए पुरूषार्थी हो। सब तो पवित्र नहीं हैं। कई पतित भी होते हैं। चलते-चलते गिर पड़ते हैं, फिर छिपकर आए अमृत पीते हैं। वास्तव में जो अमृत छोड़ विष खाते हैं, उनको कुछ समय आने नहीं देते। परन्तु यह भी गायन है – जब अमृत बांटा था तो विकारी असुर छिपकर आए बैठते थे। कहते हैं इन्द्र सभा में ऐसे अपवित्र आकर बैठते तो उन्हें श्राप लग जाता है। एक कहानी भी बताते हैं कि एक परी एक विकारी को ले आई, फिर उनका क्या हाल हुआ? विकारी तो जरूर गिर पड़ेंगे। यह समझ की बात है। विकारी चढ़ न सकें। कहते हैं वह जाकर पत्थर बना। अब ऐसे नहीं कि मनुष्य पत्थर वा झाड़ बनते हैं। पत्थरबुद्धि बन गये हैं। यहाँ आते हैं पारसबुद्धि बनने के लिए परन्तु छिपकर विष पीते हैं तो सिद्ध होता है पत्थरबुद्धि ही रहेंगे। यह सामने समझाया जाता है, शास्त्रों में तो ऐसे ही बैठ लिखा है। नाम रखा है इन्द्र सभा। जहाँ पुखराज़ परी, किस्म-किस्म की परियाँ दिखाते हैं। रत्नों में भी नम्बरवार होते हैं ना। कोई बहुत अच्छा रत्न, कोई कम। कोई की वैल्यु कम, कोई की बहुत होती है। 9 रत्न की अंगूठी भी बहुत बनाते हैं। एडवरटाइज़ करते हैं। नाम तो रत्न ही है। यहाँ बैठे हैं ना। परन्तु उनमें भी कहेंगे यह हीरा है, यह पन्ना है, यह माणिक, पुखराज भी बैठे हैं। रात-दिन का फर्क है। उनकी वैल्यु में भी बहुत फ़र्क होता है। वैसे ही फिर फूलों से भेंट की जाती है। उनमें भी वैराइटी है। बच्चे जानते हैं कौन-कौन फूल हैं। ब्राह्मणियाँ पण्डे बनकर आती हैं, वह अच्छा फूल होता है। कोई तो फिर स्टूडेन्ट भी जास्ती तीखे होते हैं, समझाने करने में। बाबा ब्राह्मणी को फूल न देकर उनको देंगे। सिखलाने वाले से भी उनमें गुण बड़े अच्छे होते हैं। कोई भी विकार नहीं होता। कोई कोई में अवगुण होते हैं – क्रोध का भूत, लोभ का भूत…….। तो बाप जानते हैं यह फेवरेट (मनपसन्द) पण्डा है, यह सेकेण्ड नम्बर है। कोई-कोई पण्डा इतना फेवरेट नहीं होता, जितना जिज्ञासू, जिनको ले आते हैं वह फेवरेट होते हैं। ऐसे भी होते हैं – सिखलाने वाले माया के चम्बे में आकर विकार में चले जाते हैं। ऐसे हैं, बहुतों को दुबन से निकालते और खुद फँस मरते हैं। माया बड़ी जबरदस्त है। बच्चे भी समझते हैं, क्रिमिनल आई बहुत धोखा देती है। जब तक क्रिमिनल आई है तो भाई-बहन का जो डायरेक्शन मिला है वह भी नहीं चल सकता। सिविल आई बदल कर क्रिमिनल आई बन जाती है। जब क्रिमिनल आई टूट कर पक्की सिविल आई बन जाती है तो उसको कहा जाता है कर्मातीत अवस्था। इतनी अपनी जांच करनी है। इकट्ठे रहते हुए विकार की दृष्टि न जाये। यहाँ तुम भाई-बहन बनते हो, ज्ञान तलवार बीच में हैं। हमको तो पवित्र रहने की पक्की प्रतिज्ञा करनी है। परन्तु लिखते हैं बाबा कशिश होती है, वह अवस्था अजुन पक्की नहीं हुई है। पुरूषार्थ करते रहते हैं – यह भी न हो। एकदम सिविल आई जब बन जाये तब ही विजय पा सकते हैं। अवस्था ऐसी चाहिए जो कोई विकारी संकल्प भी न उठे, इसको ही कर्मातीत अवस्था कहा जाता है। मंजिल है।

कितनी वन्डरफुल माला बनती है। 8 रत्न की भी माला होती है। बच्चे तो ढेर के ढेर हैं। सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी घराना यहाँ स्थापन होता है। उन सबको मिलाकर फुल पास, स्कॉलरशिप लेने वाले 8 रत्न निकलते हैं। बीच में फिर उन्हों को रत्न बनाने वाला हीरा ‘शिव’ डालते हैं, जिसने ऐसे रत्न बनाये। ग्रहचारी बैठती है तो भी 8 रत्न की अंगूठी पहनते हैं। इस समय भारत पर राहू की ग्रहचारी है। पहले थी वृक्षपति की अर्थात् बृहस्पति की दशा। तुम सतयुगी देवता थे, विश्व पर राज्य करते थे। फिर राहू की दशा बैठ गई। अभी तुम जानते हो हमारे ऊपर बृहस्पति की दशा थी, नाम है वृक्षपति। शार्ट में बृहस्पति कहा जाता है। हमारे पर बरोबर बृहस्पति की दशा थी, जबकि हम विश्व के मालिक थे, अभी राहू की दशा बैठी है, जो हम कौड़ी मिसल बनें हैं। यह तो हर एक समझ सकते हैं। पूछने की भी बात नहीं है। गुरुओं आदि से पूछते हैं – इस इम्तहान में पास होंगे? यहाँ भी बाबा से पूछते हैं – हम पास होंगे? कहता हूँ अगर ऐसे पुरूषार्थ से चलते रहे तो क्यों नहीं पास होंगे। परन्तु माया बड़ी प्रबल है। तूफान में ला देगी। इस समय तो ठीक है, आगे चल तूफान बहुत आये तो? अभी तुम युद्ध के मैदान में हो, फिर हम गैरन्टी कैसे कर सकते हैं? आगे माला बनाते थे, जिनको 2-3 नम्बर में रखते थे, वह हैं नहीं। एकदम कांटा बन गये। तो बाप ने कहा – ब्राह्मणों की माला बन नहीं सकती है। युद्ध के मैदान में हैं ना। आज ब्राह्मण, कल शूद्र बन जायेंगे, विकार में गया, गोया शूद्र बना। राहू की दशा बैठ गई। बृहस्पति की दशा के लिए पुरूषार्थ करते थे, वृक्षपति पढ़ाते थे। चलते-चलते माया का थप्पड़ लगा, फिर राहू की दशा बैठ गई। ट्रेटर बन पड़ते हैं। ऐसे सब जगह होते हैं। एक राजाई से निकल दूसरी राजाई में जाकर शरण लेते हैं। फिर वह लोग भी देखते हैं यह हमारे काम का है तो शरण दे देते हैं। ऐसे बहुत ट्रेटर बनते हैं एरोप्लेन सहित जाकर दूसरी राजाई में बैठते हैं। फिर वो लोग एरोप्लेन वापिस कर लेते हैं, उनको शरण दे देते हैं। एरोप्लेन को थोड़ेही शरण लेते, वह तो उनकी प्रापर्टी है ना। उनकी चीज़ उनको वापिस कर देते हैं। बाकी मनुष्य, मनुष्य को शरण देते हैं।

अभी तुम बच्चे शरण आये हो बाप के पास। कहते हो हमारी लाज रखो। द्रोपदी ने पुकारा कि हमको यह नंगन करते हैं, पतित होने से बचाओ। सतयुग में कभी नंगन नहीं होते। उनको तो कहते ही हैं सम्पूर्ण निर्विकारी। छोटे बच्चे तो होते ही हैं निर्विकारी। यह गृहस्थ व्यवहार में रहते सम्पूर्ण निर्विकारी रहते हैं। भल स्त्री-पुरूष साथ रहते हैं तो भी निर्विकारी रहते हैं, इसलिए कहते हम नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बन रहे हैं। वह है निर्विकारी दुनिया, वहाँ रावण नहीं। उसको कहा जाता है राम राज्य। राम शिवबाबा को कहा जाता है। राम नाम जपने का अर्थ ही है बाप को याद करना। राम-राम जब कहते हैं तो बुद्धि में निराकार ही रहता है। राम-राम कहते हैं, सीता को छोड़ देते हैं। वैसे कृष्ण का नाम लेते हैं, राधे को छोड़ देते हैं। यहाँ तो बाप है ही एक, वह कहते हैं मामेकम् याद करो। कृष्ण को पतित-पावन नहीं कहेंगे। छोटेपन में राधे-कृष्ण भाई-बहन भी नहीं थे। अलग-अलग राजाई के थे। बच्चे तो होते ही शुद्ध हैं। बाबा भी कहते हैं – बच्चे तो फूल हैं, उनमें विकार की दृष्टि नहीं होती। जब बड़े होते हैं तब दृष्टि जाती है इसलिए बालक और महात्मा को समान कहते हैं। बल्कि बच्चा महात्मा से भी ऊंच है। महात्मा को फिर भी मालूम है हम भ्रष्टाचार से पैदा हुआ हूँ। छोटे बच्चे को यह मालूम नहीं रहता है। बच्चा बाप का बना और वर्सा तो है ही। तुम विश्व की राजधानी के मालिक बनते हो। कल की बात है तुम विश्व के मालिक थे। अब फिर तुम बनते हो। इतनी प्राप्ति होती है। तो स्त्री-पुरूष बहन-भाई बन पवित्र रहें तो क्या बड़ी बात है। कुछ तो मेहनत भी चाहिए ना। हाँ, नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार अब ब्रहस्पति की दशा में जाते हो। स्वर्ग में तो जाते हैं फिर पढ़ाई से कोई ऊंच पद पाते हैं, कोई मध्यम, कोई फूल बनते, कोई क्या। बगीचा है ना। फिर पद भी ऐसे लेंगे। पुरूषार्थ खूब करना है, ऐसा फूल बनने के लिए इसलिए बाबा फूल ले आते हैं बच्चों को दिखाने। बगीचे में तो अनेक प्रकार के फूल होते हैं। सतयुग है फूलों का बगीचा और यह है कांटों का जंगल। अभी तुम कांटे से फूल बनने का पुरूषार्थ कर रहे हो। एक-दो को कांटा मारने से बचने का पुरूषार्थ कर रहे हो, जो जितना पुरूषार्थ करेंगे उतना जीत पायेंगे। मूल बात है काम पर जीत पाने से ही जगतजीत बनेंगे। यह तो बच्चों पर रहा। जवानों को बहुत मेहनत करनी पड़ती है, बुढ़ों को कम। वानप्रस्थ अवस्था वालों को और कम। बच्चों को बहुत कम।

तुम जानते हो हमको विश्व के बादशाही की प्रापर्टी मिलती है, उसके लिए एक जन्म पवित्र रहे तो क्या हर्जा। उनको कहा जाता है बाल ब्रह्मचारी। अन्त तक पवित्र रहते हैं। जो पवित्र बने हैं, उनको बाप की कशिश होती है, बच्चों को छोटेपन से ही ज्ञान मिलता जाए तो बच सकते हैं। छोटे बच्चे अबोध होते हैं परन्तु फिर बाहर स्कूल आदि में संग का रंग लग जाता है। संग तारे, कुसंग डुबोये। बाप कहते हैं हम तुमको पार ले जाते हैं शिवालय में। सतयुग है बिल्कुल नई दुनिया। बहुत थोड़े मनुष्य रहते हैं फिर वृद्धि को पाते हैं। वहाँ तो बहुत थोड़े देवतायें रहते हैं। तो नई दुनिया में जाने का पुरूषार्थ करना है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप का मन पसन्द बनने के लिए गुणवान बनना है। अच्छे-अच्छे गुण धारण कर फूल बनना है। अवगुण निकाल देने हैं। किसी को भी कांटा नहीं लगाना है।

2) फुल पास होने वा स्कॉलरशिप लेने के लिए ऐसी अवस्था बनानी है जो कुछ भी याद न आये, पूरी सिविल आई बन जाये। सदा बृहस्पति की दशा बनी रहे।

वरदान:- स्व स्वरूप और बाप के सत्य स्वरूप को पहचान सत्यता की शक्ति धारण करने वाले दिव्यता सम्पन्न भव
जो बच्चे अपने स्व स्वरूप को वा बाप के सत्य परिचय को यथार्थ जान लेते हैं और उसी स्वरूप की स्मृति में रहते हैं तो उनमें सत्यता की शक्ति आ जाती है। उनके हर संकल्प सदा सत्यता वा दिव्यता सम्पन्न होते हैं। संकल्प, बोल, कर्म और सम्बन्ध-सम्पर्क सबमें दिव्यता की अनुभूति होती है। सत्यता को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती। अगर सत्यता की शक्ति है तो खुशी में नाचते रहेंगे।
स्लोगन:- सकाश देने की सेवा करो तो समस्यायें सहज ही भाग जायेंगी।

TODAY MURLI 3 AUGUST 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 3 August 2019

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03/08/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, your eternal relationship is of brothers. You are brothers and sisters in the corporeal form and this is why you can never have criminal vision.
Question: Who become the victorious eight jewels? What is their value?
Answer: Those who don’t have any criminal thoughts in their minds, those whose eyes are completely civil are the ones who become the special eight jewels; they attain their karmateet stage. Their value is so high that when anyone experiences bad omens, they are made to wear a ring of eight jewels. They believe that their omens will be removed by wearing that ring. Those who become the eight jewels stay constantly in the awareness of being brothers because they have far-sighted intellects.

Om shanti. You spiritual children know what your name is. You are called Brahmins. There are so many Brahma Kumars and Kumaris. This proves that you are adopted childrenBecause you are all children of the one Father, you are definitely adopted. Only you Brahma Kumars and Kumaris are adopted children. There are many children. One type are the children of Prajapita Brahma and the other type are the children of the Supreme Father, the Supreme Soul, Shiva, and so they definitely have a connection between themselves. That One has spiritual children and this one has physical children. If they are that One’s children, they are like brothers. The children of Prajapita Brahma become corporeal brothers and sisters. A brother and sister never have a criminalrelationship. They say of you that you make everyone into brothers and sisters through which there is a pure relationship and there isn’t criminal vision. By your having this vision for just this one birth, there won’t be criminal vision in the future. It isn’t that you consider yourselves to be brothers and sisters there. There, you are like emperors and empresses. You children now know that you are at the most auspicious confluence age and that all of you are brothers and sisters. There is the name, “Prajapita Brahma”. The world doesn’t know when Prajapita Brahma existed. You are sitting here and you know that you are the auspicious confluence-aged BKs. This would not be called a religion. This is a clan that is being established. You belong to the Brahmin clan. You can say that you Brahma Kumars and Kumaris are definitely the children of Prajapita Brahma. This is something new. You can say that you are BKs. In fact, all of us are brothers, children of the one Father. So, you would not say that you are adopted by Him. We souls are His children eternally. The Supreme Father is the Supreme Soul. The word “Supreme” cannot be given to anyone else. Only the One who is completely pure can be called the Supreme. You would not say that everyone has purity. You learn purity at this confluence age. You are residents of the most auspicious confluence age, just as you speak of the residents of the iron age and the residents of the golden age. Many people know about the golden and iron ages. If someone has a far-sighted intellect, he can understand that there is the confluence age between the iron age and the golden age. In the scriptures, they have spoken of God coming in every age. The Father says: I do not come in every age. It should remain in your intellects that you are the most auspicious confluence-aged Brahma Kumars and Kumaris. We are neither in the golden age nor in the iron age. After the confluence age, the golden age definitely has to come. You are now making effort to go to the golden age. No one can go there without purity. At this time, you are making effort to become pure. Not everyone is pure. There are many who are impure. Whilst moving along they fall, and then they go and drink nectar secretly. In fact, those who renounce nectar and drink poison are not allowed to come here for some time. However, it is also remembered: When nectar was being distributed, vicious devils used to go and sit there secretly. It is said: When such impure ones come and sit in such a gathering of Indra, they are cursed. There is also the story of an angel who brought a vicious person into the gathering. What did her condition become? Those who are vicious will definitely fall. This is a matter of understanding. Those who are vicious cannot ascend. It is said that he (the vicious person) wasthen turned to stone. It isn’t that human beings become stones or trees. They become those with stone intellects. They come here to become those with divine intellects, but when they secretly drink poison, it means that they will remain those with stone intellects. This is explained personally, whereas it is just written in the scriptures for people to read about. They have called that, “The Court of Indra”, and they have shown a variety of angels there. Jewels are also numberwise. Some are very good jewels and others less so. The value of some is less, whereas some have a lot of value. They make many rings of the nine jewels. They advertise these, even though they are just called jewels. You are sitting here but, amongst you too, it is said: This one is a diamond, this one is an emerald, this one is a ruby, a topaz. There is the difference of day and night. There is a lot of difference in their value too. In the same way, you are also compared to flowers. There is variety amongst flowers too. You children know who the flowers are. The Brahmin teachers who come as guides are very good flowers. Some students are much cleverer in explaining. Baba would not give a flower to the teacher but to the student. Many qualities of some students are better than those who teach. They don’t have any vices. Some have defects such as the evil spirits of anger and greed. The Father knows that that one is a favourite guide and that this one is a second number guide. Some guides are not such favourites as the students. Those whom they bring are the favourites. It does happen that those who teach are caught in the claws of Maya and go into vice. There are also many who remove many others from the quicksand but who then become trapped in it themselves. Maya is very powerful. You children understand that the criminal eye is very deceitful. Whilst there is the criminal eye, you are unable to follow the direction to be brother and sister. The civil eye changes into the criminal eye. When the eye stops being criminal and you develop a strong civil eye, that is called the karmateet stage. You have to check yourself to this extent. Whilst living together, there should be no vision of vice. Here, you become brothers and sisters and there is the sword of knowledge in between. You have to make a firm promise to remain pure. However, some write: Baba, there is an attraction. We haven’t yet made that stage firm. We continue to make effort so that that doesn’t happen. Only when our eyes become completely civil can we gain victory. Your stage has to be such that no vicious thoughts arise. This is called the karmateet stage. This is the destination. Such a wonderful rosary is created. There is the rosary too of eight jewels. There are many children. The sun and moon dynasty clans are being established here. Out of all of them, there are only eight jewels who pass fully and claim the scholarship. They place Shiva, the Diamond who made them into such jewels, in between. When people experience bad omens, they wear a ring of eight jewels. At this time, there are the omens of Rahu over Bharat. At first, there were the omens of the Lord of the Tree, that is, the omens of Jupiter. You were golden-aged deities who ruled the world. Then there were the omens of Rahu. You now know that you had the omens of Jupiter. His name is the Lord of the Tree. In brief, He is called Jupiter. We truly had the omens of Jupiter when we were the masters of the world, whereas there are now the omens of Rahu and we have become like shells. Each one of you can understand this. There is no question of asking about it. People ask their gurus if they will pass a particular examination. Here, too, some ask Baba: Will I pass? Baba says: If you continue to move along making such effort, why would you not pass? However, Maya is very powerful; she brings storms. At this time, you would be moving along well, but what if many storms come as you move along? You are now on a battlefield, so how can I give a guarantee? Previously, a rosary used to be created. Those who were placed as number two or three are no longer here; they have become complete thorns. The Father said: A rosary of Brahmins cannot be created. You are on a battlefield. Today, someone is a Brahmin and tomorrow, he or she would become a shudra. When they indulge in vice, they become shudras and there are the omens of Rahu. You used to make effort for the omens of Jupiter, and the Lord of the Tree was teaching you. As you were moving along, you were slapped by Maya and there were the omens of Rahu. Some become traitors. This happens everywhere. They leave one country and go to another country to seek refuge there. Then, those people also see that they are of use to them and so they give them refuge. Many become such traitors; they take an aeroplane and go to another country. They then return the aeroplane and give refuge to that person. They don’t give refuge to the aeroplane because that is the property of the other government. They return that which doesn’t belong to them, but they do give refuge to the people who have come to them. You children have now come to seek refuge with the Father. You say: Maintain my honour! Draupadi called out: They are stripping me! Save me from becoming impure! No one in the golden age ever becomes impure. That is called the completely viceless world. Little children are viceless anyway; they remain completely viceless whilst living at home. Although husband and wife live together, they remain viceless. This is why you say: We are changing into Narayan from an ordinary man and into Lakshmi from an ordinary woman. That is the viceless world. Ravan doesn’t exist there. That is called the kingdom of Rama. Shiv Baba is called Rama. To chant the name of Rama means to remember the Father. When people chant “Rama, Rama”, they only have the incorporeal One in their intellects. They say: “Rama! Rama!” and leave out Sita. They also take the name of Krishna and leave out Radhe. Here, there is just the one Father and He says: Constantly remember Me alone. Krishna cannot be called the Purifier. In childhood, Radhe and Krishna were not brother and sister; they belonged to separate kingdoms. Little children are always pure anyway. Baba also says: Little children are flowers. They don’t have any vision of vice. As they grow older, their vision is drawn to vice. This is why a child and a great soul (mahatma) are considered to be equal. In fact, a child is even higher than a mahatma. A mahatma knows that he has been born through vice. Little children are not aware of that. As soon as a child belongs to the Father, he has the inheritance. You become the masters of the kingdom of the world. It is a matter of yesterday when you were the masters of the world. You are now becoming that again. You receive so much attainment. So what is the big deal if husband and wife become brother and sister and remain pure? Some effort is required. Yes, you now receive the omens of Jupiter, numberwise, according to the effort you make. You do go to heaven, but some claim a high status by studying and some claim a medium status. Some become flowers and others become something else. This is a garden. So you also claim a status accordingly. You have to make a lot of effort to become such flowers. This is why Baba brings flowers to show you children. There are many types of flowers in a garden. The golden age is a garden of flowers whereas this is a jungle of thorns. You are now making effort to change from thorns into flowers. You make effort to save yourselves from pricking one another like thorns. To the extent that someone makes effort, accordingly, he will become victorious. The main thing is that you become conquerors of the world by conquering lust. This depends on you children. Young ones have to make a lot of effort, whereas the older ones have to make less effort. Those who are in the stage of retirement have to make even less effort. Little children too have to make even less effort. You know that you are receiving the property of the sovereignty of the world. So, what does it matter if you remain pure for one birth to receive that? Such ones are called celibate ones who remain pure from birth till the end. Those who have become pure are attracted to the Father. Children can be saved if they continue to receive knowledge from childhood. Little children are ignorant, but when they go outside to school etc., they are coloured by the company they keep. It is said: Good company takes you across and bad company drowns you. The Father says: I am taking you across to Shivalaya. The golden age is the completely new world. Very few people will be there and then growth will take place. Very few deities reside there. So you have to make effort to go to the new world. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. In order to become a favourite of the Father, become virtuous. Imbibe virtues well and become a flower. Remove defects. Never prick anyone like a thorn does.
  2. In order to pass fully and to claim a scholarship, create such a stage that you don’t remember anything. Let your eyes become completely civil. Let there constantly be the omens of Jupiter over you.
Blessing: May you be filled with divinity and develop the power of truth by recognizing your own true form and that of the Father.
The children who recognize their own form and accurately know the true introduction of the Father develop the power of truth by remaining aware of that form. Their every thought is then always filled with truth and divinity. There is the experience of divinity in their every thought, word, act, relationship and connection. There is no need to prove the truth. When there is the power of truth, the soul continues to dance in happiness.
Slogan: Do the service of giving sakaash and any problems will easily run away.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 3 AUGUST 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 3 August 2018

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03/08/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, become those who have a far-sighted and broad, unlimited intellects. Don’t cause any disturbance in Shiv Baba’s task. Those who cause a disturbance cannot receive a high status.
Question: What thoughts do people who live in this world have which golden-aged deities would never have?
Answer: Here, people think that their sons and grandsons will eat from whatever they earn. The deities would never have such thoughts because their sons and grandsons take their inheritance with them from here. They believe that their kingdom is imperishable. Each one is making his own individual effort here.
Song: Mother, o mother, you are the fortune of tomorrow.

Om shanti. You children heard praise of the mothers. You children know which mothers are praised. Surely, it is the mothers who have been here and gone that are praised so much. They are not here now. On the path of devotion, there is praise of the one who was Jagadamba. You too didn’t know what she did before she went. They go to the Jagadamba Temple and ask for something or other. Some would want a child and others would ask for blessings. Non-living images cannot do or understand anything, but that is devotion! You know that they existed in the past. There is praise of Jagadamba. She isn’t the only one. All of you sustain the Brahmin clan and you will then sustain the divine clan. At this time, it is as though you are sustaining the whole world, but no one knows this. There is also a gathering for goddess Chandika, but the name Chandika is not so good. Baba says: Those who were amazed and who then ran away and divorced the Father will then go and take birth as cremators. If children cause mischief at home or are disobedient, they are called cremators. You can really see that some belong to Shiv Baba and yet they cause so much mischief. To make mischief means to be disobedient. Those who cause a disturbance in Shiv Baba’s service would eventually leave. A Brahma Kumari at a centre making mischief won’t be able to explain to anyone. If she gets angry, everyone would say: She has a lot of anger. Chandika would not be just one; there are many of them. There is praise of the goddesses and there are also memorials of those who become like Chandika. They still belonged to God. Although some leave, they still go to heaven. They would still become the masters. Although only the kings and queens become the masters, the subjects would also say: We are the masters. The Congress Party say: Our Bharat is great. Nowadays, they even sing songs: Bharat was very good. Today, there are rivers of blood flowing. You have now become children of the unlimited Father. The gopes and gopis of Gopi Vallabh have been remembered. Vallabh is the Father. It is remembered that the one Gopi Vallabh has many gopes and gopies. In the golden age, there is no question of gopikas etc. You children now have far-sighted and broad, unlimited intellects. The locks on your intellects have opened. You know very well the life story of this birth. Everyone has that intoxication. There is Birla who would have intoxication of his wealth. He would think that he is the wealthiest of all. However, you know that those who are wealthy today will then become poor. There is the difference of day and night between your intellects and those of people outside. Some have intoxication of one thing and others have intoxication of another thing: I am so-and-so, I am like this. This one (Brahma) also had the intoxication of being a big jewel-merchant. You now understand that all of those types of intoxication are worth shells. The intoxication of you children is so high. Those people think that they will earn something and that their sons and grandsons will eat from that. It is not like that here. You know that by knowing the unlimited Father, we are claiming our inheritance from Him, and that we ourselves will receive the reward of that status for birth after birth. All the sons and grandsons are making effort here. There, they don’t think: Our grandsons will eat from this. They understand that that is the imperishable kingdom. Here, royal people think that their sons and grandsons will eat from their earnings. You are now claiming so much inheritance from the Father and performing such actions that you continue to receive the fruit of that for 21 births. You are not concerned about your sons and grandsons. All of them also claim their inheritance here. You have so much knowledge. People don’t know anything. People would definitely receive so much happiness from God, the Father, whom everyone remembers so much. It is sung: O Supreme Father, Supreme Soul, have mercy! He is called the Supreme Soul. He is the Supreme. He is beyond birth and death and this is why He is called the Supreme Soul, that is, God. The form of all souls is the same. Whatever effort each of you makes, so accordingly is the status you claim. This one’s soul studies well and thus becomes Narayan. Someone who fails will become Rama. It is the soul that becomes that. You souls understand that you are studying Raja Yoga with the Supreme Father, the Supreme Soul. The soul then comes and wears a new costume and plays his part. He will change from an ordinary man into Narayan. This is in the intellects of you children, numberwise, according to the effort you make. This knowledge will then disappear. There won’t be anyone impure there. Whom would you give knowledge to? The Purifier is remembered here. OK, just think that the Ganges is the Purifier. However, the Ganges would not be able to teach you Raja Yoga. The Father teaches you Raja Yoga. All the secrets of the drama, from the beginning to the end, are in the intellects of you children. All of you are studying in the one class, but you are numberwise. At the beginning, there was a bhatthi of 300. If there were thousands of cows in a cowshed to be looked after, no one would be able to look after all of them. A bhatthi of only a few had to be created. Of those, too, some are still continuing to move along and some have broken away. Some children think that it would have been better if they had been here from the beginning, but that is not so; so many of the old ones run away. Even those who have been here for 25 to 30 years don’t even remember that He is the unlimited Father from whom they receive the inheritance. Baba makes you into the masters of heaven; it is a matter of a second. The Father says: By belonging to Me, you will become the masters of heaven. Kings and queens and also the subjects receive liberation-in-life. ‘Liberation-in-life in a second  has been remembered. What would the children who do not study fully be doing? Making mischief. Some children are very obedient; they claim an even better status than their father. Their father would be earning a 100 or 200 and the child would become a millionaire. So, it is the same with spiritual relations. A child who is seven days old would quickly go ahead of someone who has been here for 25 years. It is numberwise. In fact, all of you are brides and you remember the one Bridegroom. You know that the Father comes and gives us the inheritance of the land of happiness. Women all have their physical husbands, and yet everyone remembers the Husband of all husbands. The Bridegroom from beyond gives you nectar to drink and this is why He is remembered. Then you become the masters of heaven. You don’t remember anyone there. Through your efforts of the present time, you claim a reward for 21 births. Your intellects have opened up so much. That is numberwise and so the sovereignty you claim is also numberwise. Everything has been explained to you. By studying well here, you will also claim a high status. Otherwise, uneducated ones will have to bow down in front of educated ones. You have to make very good effort in this. The time now is very good for making effort. You know that you have to drink the nectar of knowledge while you are alive, that is, you have to continue to study. Saplings continue to be planted. For those who understand quickly, it is obvious that they will receive a good status. He is a flower who is very close and has surrendered himself in body, mind and wealth and has become engaged in service very well. He understands that however much time he gives for service , it is beneficial. Just as Baba became the Stick for all of us who were blind, without the eye of knowledge, so we also have to become the same. You continue to become the sticks for one another. It was Ravan who made you blind. It is explained to you that, at this time, the whole world is Lanka; all are in the cottage of sorrow. They have the name ‘Ashoka (without sorrow) Hotel , and they have great pleasure there. You know that Baba has now come. The Mahabharat War is just ahead. It has to take place because the gates to the home have to open. There is no question of this happening in the copper age. There is extreme darkness now. The night of Brahmins has now come to an end and Baba has come. Only you children know these things. When studying at school, some claim very good marks whereas others fail. The sign of failing is to become part of the moon dynasty. Rama has been given the symbol of a warrior. They don’t understand the meaning of that. They sit and relate so many stories about Luv and Kush (children of Rama). They make so many false allegations. It is sung: The King is Rama and the people are those who belong to Rama; there is mercy because of righteousness. So, where did all those things come from? All of these things have to be understood. You know that this knowledge is in your intellects, numberwise. Students have to make very good, intense effort. We are God f atherly students. Who would not remember their teacher? We are the students of God, the Father, the Purifier. The Father, Teacher and Satguru are all included in this. All of you are Sitas. You are sitting in Ravan’s cottage of sorrow. Incorporeal God, the Father, is the Ocean of Knowledge, knowledge-full. You would not say this of Krishna or Lakshmi and Narayan. Their praise is completely different. In the song, it is sung: The praise is limitless of the One who makes us like that. You say: Baba, I will claim the full inheritance from You. You are so sweet! You are so lovely! Lakshmi and Narayan are so sweet and lovely. Look at the picture of Lakshmi and Narayan. They are always shown smiling. You know that deities used to stay in this Bharat. Where are they now? You can tell everyone: This is your final birth and you have to become like Krishna once again. The land of Krishna is now being established. The Krishna soul is also studying Raja Yoga. If you want to go to the land of Krishna, then study Raja Yoga. When you speak of Lakshmi and Narayan, they become confused. Krishna is rocked in a cradle and they worship Lakshmi and Narayan. They are not shown in any childhood activities. Where did Radhe and Krishna go and what happened to them? They don’t know anything. Radhe and Krishna were not brother and sister. Now, there is no kingdom of Radhe and Krishna. No one in the copper age knows about their kingdom. A very good intellect is needed to understand all of these things. It takes effort to write literature. They portray the ornaments on Vishnu but, in fact, Vishnu doesn’t have those ornaments. Neither Vishnu nor Lakshmi and Narayan have the conch shell. So, what should we write? People cannot understand anything. You have the conch shell, so the ornaments surely have to be given to Brahmins. They would say: Where did these Brahmins come from? They wouldn’t be able to understand anything. You can explain that we Brahmins are the spinners of the discus of self-realisation. A very broad and unlimited intellect is needed to explain all of these things. Those who have gross intellects and are to become subjects won’t be able to understand anything. They find it very difficult to explain. Baba writes: Sweetest, beloved, long-lost and now-found spinners of the discus of self-realisation, mouth-born creation of Brahma. However, you don’t have those ornaments. In the pictures, they have shown the goddesses with a third eye, but they don’t have a third eye. Your third eyes have now opened. There is praise of you Shaktis. Since there is Jagadamba, the children would also be with her. Mothers are in the majority. The mothers are raised up high. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Use your time in a worthwhile way for service. Surrender your body, mind and wealth and continue to study for as long as you live.
  2. Sustain one another with knowledge. Don’t perform any task through which you would disobey the Father.
Blessing: May you be a special soul who receives the fruit of the seed of your speciality in the form of contentment.
In this special age, the most elevated fruit of the seed of speciality is contentment. To remain content and to make everyone content is the sign of a special soul. Therefore, water the seed of your speciality, your blessing, with the water of all powers and the seed will be fruitful. Otherwise, even a fully grown tree will shake from time to time and fall in storms that come. This means that there would not be the zeal, enthusiasm, happiness or spiritual intoxication to move forward. So, using the right method, make the powerful seed fruitful.
Slogan: To share the holy food (prasad) of experiences and make weak ones powerful is a very great act of charity.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 3 AUGUST 2018 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 3 August 2018

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03-08-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – दूरादेशी और विशालबुद्धि बनो, शिवबाबा के कार्य में कभी डिस्टर्ब नहीं करना, डिस्टर्ब करने वालों को ऊंच पद नहीं मिल सकता”
प्रश्नः- इस दुनिया में मनुष्यों को कौन से ख्यालात रहते हैं जो सतयुगी देवताओं को कभी नहीं आयेंगे?
उत्तर:- यहाँ मनुष्य समझते हैं कि हम कमायेंगे तो हमारे पुत्र और पोत्रे खायेंगे लेकिन यह ख्यालात देवताओं में नहीं होंगे क्योंकि उनके पुत्र और पोत्रे सब यहाँ से ही वर्सा लेकर जाते हैं। वह समझते हैं हमारी अविनाशी राजाई है। यहाँ ही हरेक अपना-अपना पुरुषार्थ कर रहे हैं।
गीत:- माता ओ माता…..

ओम् शान्ति। बच्चों ने माताओं की महिमा सुनी। बच्चे जान चुके हैं किस-किस माता की महिमा होती है। माताओं की इतनी महिमा करते हैं, तो जरूर होकर गयी हैं। अभी तो वह है नहीं। जो जगत अम्बा होकर गई है उनकी भक्ति मार्ग में महिमा होती है। अब वह क्या करके गयी – यह तुम भी नहीं जानते थे। जगत अम्बा के मन्दिर में जाते हैं, जाकर उनसे कुछ न कुछ मांगते हैं। कोई को बच्चे की आश होगी, कोई आशीर्वाद मांगेंगे। अब जड़ चित्र तो कुछ कर नहीं सकते, न वह समझते हैं परन्तु यह है भक्ति। तुम जानते हो वह पास्ट हो गये हैं। जगत अम्बा की महिमा है। एक तो नहीं है, तुम सब ब्राह्मण कुल की पालना करते हो, फिर दैवी कुल की पालना करेंगे। तुम इस समय जैसे कि सारे जगत की पालना करते हो परन्तु कोई जानते नहीं। चण्डिका देवी का भी मेला लगता है। चण्डिका नाम देखो कितना छी-छी है! बाबा कहते हैं जो आश्चर्यवत् भागन्ती हो फ़ारकती देते हैं वह जाकर चण्डाल का जन्म पाते हैं। घर में चंचलता करते हैं तो उनको कहा जाता है ना – तुम तो चण्डी हो, चण्डाल हो। बरोबर तुम देखते हो शिवबाबा का बनकर फिर भी बहुत चंचलता करते हैं, चंचलता अर्थात् अवज्ञा करते हैं, शिवबाबा की सर्विस में डिस्टर्ब करते हैं तो अन्त में चले ही जाते हैं। कोई भी ब्रह्माकुमारी सेन्टर में होगी, कुछ चंचलता करेगी, किसको समझा नहीं सकेगी वा क्रोध करती होगी तो सब कहेंगे इनमें तो बहुत क्रोध है! अब चण्डिका एक तो नहीं, बहुत होती हैं। देवियों की महिमा भी है और फिर ऐसे जो चण्डिका आदि बनते हैं उनका भी गायन है। फिर भी ईश्वर के बने हैं। भल कोई चले जाते हैं फिर भी स्वर्ग में तो आयेंगे ना। मालिक तो बनेंगे ना। भल मालिक तो राजा-रानी ही बनते हैं लेकिन प्रजा भी कहेगी हम मालिक हैं। कांग्रेसी लोग कहते हैं ना हमारा भारत महान् है। आजकल तो गीत में भी गाते रहते हैं – भारत बहुत अच्छा था। आज तो खून की नदियां बह रही हैं।

अभी तुम बेहद के बाप के बच्चे बने हो। गोपी वल्लभ की गोप-गोपियां गाई हुई हैं। वल्लभ बाप को कहा जाता है। गाया भी जाता है एक गोपी वल्लभ की अनेक गोप-गोपियां। सतयुग में तो गोपिकाओं आदि की बात ही नहीं है। अभी तुम बच्चे विशाल दूरांदेशी बुद्धि बने हो। बुद्धि का ताला खुल गया है। इस जन्म की जीवन कहानी को तुम अच्छी रीति जानते हो। हर एक को नशा तो रहता है ना। अभी बिड़ला है, उनको अपने धन का नशा होगा। समझेंगे – मैं सबसे साहूकार हूँ। परन्तु तुम जानते हो – जो आज साहूकार हैं वह फिर गरीब बन जायेंगे। तुम्हारी और अन्य मनुष्यों की बुद्धि में रात-दिन का फ़र्क है। कोई को क्या नशा, कोई को क्या नशा रहता है – मैं फलाना हूँ, ऐसे हूँ. . . . .। इनको (ब्रह्मा को) भी नशा था ना – मैं बड़ा जौहरी हूँ। अभी समझते हैं वह सभी नशे कौड़ी मिसल हैं। तुम बच्चों को कितना नशा चढ़ा हुआ है! वह समझते हैं हम कमायेंगे फिर हमारे पुत्र-पोत्रे खायेंगे। यहाँ तो वह बात नहीं है। तुम जानते हो हम बेहद के बाप को जानकर उनसे वर्सा पा रहे हैं। जिसकी प्रालब्ध हम ही खुद जन्म बाई जन्म पद पायेंगे। पुत्र-पोत्रे आदि सब यहाँ पुरुषार्थ कर रहे हैं। ‘हमारे पौत्रे खायेंगे’ – यह ख्यालात वहाँ नहीं रहती। समझते हैं अविनाशी राजाई है। यहाँ तो राजे लोग समझते हैं – पुत्र-पोत्रे खायेंगे। तुम अभी बाप से इतना वर्सा लेते हो, ऐसे कर्म करते हो जो 21 जन्म उसका फल मिलता रहता है, पुत्र-पौत्रों का ख्याल नहीं रहता। वे भी सब यहाँ ही वर्सा पाते हैं। तुमको कितना ज्ञान है, मनुष्य तो कुछ भी नहीं जानते। गॉड फादर, जिनको इतना याद करते हैं, जरूर उनसे इतना भारी सुख मिलता होगा। गाते हैं ना – हे परमपिता परमात्मा रहम करो। उनको परम आत्मा कहा जाता है, वह सुप्रीम है। जन्म-मरण रहित है इसलिए उनको परम आत्मा अर्थात् परमात्मा कहते हैं। सभी आत्माओं का रूप एक जैसा है। जैसा-जैसा पुरुषार्थ करते हैं वैसा पद पाते हैं। इनकी आत्मा अच्छा पढ़ती है तो नारायण बनती है। कोई फिर फेल होंगे तो राम बनेंगे। आत्मा ही बनती है ना। तुम्हारी आत्मा समझती है मैं परमपिता परमात्मा से राजयोग सीख रही हूँ। आत्मा फिर आकर नया चोला पहन पार्ट बजायेगी, नर से नारायण बनेगी। यह तुम बच्चों की बुद्धि में है नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। फिर यह ज्ञान प्राय: लोप हो जायेगा। वहाँ कोई पतित होगा नहीं। ज्ञान किसको देंगे? पतित-पावन को यहाँ याद करते हैं। अच्छा समझो गंगा पतित-पावनी है तो भी वह राजयोग तो नहीं सिखला सकती है, बाप तो राजयोग सिखलाते हैं ना। यह सारा ड्रामा का राज़ आदि से अन्त तक तुम बच्चों की बुद्धि में है।

तुम सब पढ़ते तो एक ही क्लास में हो, लेकिन नम्बरवार हो। शुरू-शुरू में 300 की भट्ठी थी। गऊशाला में हजारों की अन्दाज़ में गऊयें हों तो कोई सम्भाल भी न सके। भट्ठी भी थोड़ों की बननी थी। उनमें से भी कई तो चल रहे हैं, कई टूट पड़े। कई बच्चे समझते हैं हम पहले से होते तो अच्छा था परन्तु ऐसे भी नहीं है। पुराने-पुराने कितने भागन्ती हो गये! 25-30 वर्ष वाले भी इतना नहीं याद रखते कि वह बेहद का बाप है, जिससे वर्सा पाते हैं। बाबा स्वर्ग का मालिक बनाते हैं, सेकेण्ड की बात है। बाप कहते हैं तुम मेरा बनने से स्वर्ग के मालिक बनेंगे। जीवनमुक्ति तो राजा-रानी भी पाते हैं, प्रजा भी पाती है। गाया हुआ है सेकेण्ड में जीवनमुक्ति। बच्चे जो पूरा पढ़ते नहीं हैं वह क्या करते होंगे? चंचलता। कोई-कोई बच्चे तो बड़े आज्ञाकारी होते हैं। बाप से भी अच्छा मर्तबा पा लेते हैं। बाप 100-200 कमाने वाला होगा, बच्चा लखपति बन जाता है। तो अलौकिक सम्बन्ध में भी ऐसे होता है – 7 रोज वाला बच्चा 25 वर्ष वाले से तीखा चला जाता है। नम्बरवार तो होते ही हैं।

तुम वास्तव में सब सजनियां हो, एक साजन को याद करते हो। तुम जानते हो बाप आकर हमको सुख-धाम का वर्सा देते हैं। लौकिक पति है फिर भी याद उनको करते हैं जो पतियों का पति है। पारलौकिक साज़न अमृत पिलाते हैं इसलिए उनको याद किया जाता है, फिर तुम स्वर्ग के मालिक बन जाते हो, फिर वहाँ कोई को याद नहीं करते। अभी के पुरुषार्थ से तुम 21 जन्म प्रालब्ध पाते हो। तुम्हारी बुद्धि कितनी खुली है! वह भी नम्बरवार, तो बादशाही भी नम्बरवार लेते हो। तुमको सब समझा दिया है। यहाँ अच्छी रीति पढ़ाई पढ़ने से तुम पद भी इतना ऊंच पायेंगे। नहीं तो अनपढ़े, पढ़े के आगे भरी ढोयेंगे। इसमें पुरुषार्थ बहुत अच्छी रीति करना है। अभी टाइम अच्छा है पुरुषार्थ के लिए। तुम जानते हो – जहाँ जीना है वहाँ ज्ञानामृत पीना है अथवा पढ़ते रहना है। सैपलिंग लगाते रहते हैं। कोई झट समझ जाते हैं तो समझा जाता है इनका पद तो अच्छा देखने में आता है, अच्छा नजदीक का फूल है, तन-मन-धन अर्पण कर बैठा है, सर्विस में अच्छा लग गया है। समझता है अपना समय जितना सर्विस में देंगे, उतना फायदा है। जैसे बाबा हम ज्ञान नेत्रहीन अंधों की लाठी बना है ऐसे हमें भी बनना है। तुम एक-दो की लाठी बनते जाते हो। अंधा बनाया है रावण ने। यह तुमको समझाया जाता है कि इस समय सारी दुनिया लंका है, सब शोक वाटिका में हैं। नाम रखा है अशोका होटल, वहाँ खूब मजे उड़ाते हैं।

अभी तुम जानते हो बाबा आया हुआ है। महाभारत लड़ाई सामने खड़ी है। यह तो लगनी है जबकि घर के गेट्स खुलने हैं। द्वापर की तो बात ही नहीं। अभी तो घोर अन्धियारा है ना। ब्राह्मणों की रात अब पूरी हुई है, बाबा आया हुआ है। यह बातें तुम बच्चे ही जानते हो। स्कूल में पढ़ते हैं, कोई तो बहुत अच्छे मार्क्स लेते हैं, कोई फेल हो जाते हैं। फेल की निशानी है चन्द्रवंशी में चले जायेंगे। राम को क्षत्रिय की निशानी दी है। अर्थ नहीं समझते। लव-कुश की क्या-क्या बातें बैठ सुनाते हैं। कितने झूठे दोष बैठ लगाते हैं। गाते हैं – राम राजा, राम प्रजा, धर्म का उपकार है। फिर यह सब बातें कहाँ से आई? यह सब बातें समझने की हैं। तुम जानते हो यह नॉलेज नम्बरवार हमारी बुद्धि में है। स्टूडेन्ट को बहुत तीखा पुरुषार्थ करना चाहिए। हम गॉड फादरली स्टूडेन्ट हैं। टीचर को कौन नहीं याद करेंगे! हम हैं पतित-पावन गॉड फादरली स्टूडेन्ट। इसमें बाप, टीचर, सतगुरू तीनों ही आ जाते हैं। तुम सब सीतायें हो ना। रावण की शोक वाटिका में पड़े हो। इनकारपोरियल गॉड फादर इज़ ज्ञान सागर नॉलेजफुल। कृष्ण को अथवा लक्ष्मी-नारायण को ऐसे नहीं कहेंगे। उनकी महिमा ही न्यारी है। गीत में भी गाते हैं – उनकी महिमा अपरमअपार है, जो ऐसा बनाते हैं। तुम कहते हो – बाबा, हम आपसे पूरा वर्सा लेंगे। आप कितने मीठे हो, कितने प्यारे हो! लक्ष्मी-नारायण कितने मीठे, कितने प्यारे हैं! लक्ष्मी-नारायण के चित्र देखो, हमेशा मुस्कराहट वाले दिखाते हैं। तुम जानते हो देवतायें इस भारत में ही थे। अभी कहाँ है? तुम सबको बतला सकते हो कि यह उनका अन्तिम जन्म है। फिर से कृष्ण बनना है। अभी कृष्णपुरी स्थापन हो रही है। कृष्ण भी राजयोग सीख रहे हैं। तुम भी कृष्णपुरी में जाना चाहो तो राजयोग सीखो। लक्ष्मी-नारायण कहने से मनुष्य मूंझ जाते हैं। कृष्ण को झूले में झुलाते हैं। पूजा लक्ष्मी-नारायण की करते हैं। उन्हों का बाल चरित्र कुछ भी है नहीं। राधे-कृष्ण फिर कहाँ गये, क्या हुआ – कुछ भी पता नहीं है। राधे-कृष्ण कोई आपस में भाई-बहन नहीं थे। अभी राधे-कृष्ण का राज्य तो है नहीं। द्वापर में भी उन्हों की राजधानी का कुछ पता थोड़ेही है। तो यह सब बातें समझने के लिए बहुत अच्छी बुद्धि चाहिए। लिटरेचर बनाने में भी मेहनत लगती है। विष्णु के अलंकार दिखाते हैं परन्तु वास्तव में विष्णु के यह अलंकार होते नहीं। विष्णु वा लक्ष्मी-नारायण को शंख थोड़ेही है। तो हम क्या लिखें? मनुष्य तो कुछ भी समझ न सकें। शंख तो है तुम्हारे पास। तो अलंकार जरूर ब्राह्मणों को देना पड़े। कहेंगे यह ब्राह्मण फिर कहाँ से आये? समझ नहीं सकेंगे। तुम समझा सकते हो – हम ब्राह्मण स्वदर्शन चक्रधारी हैं। यह सब बातें समझाने में बड़ी ही विशाल बुद्धि चाहिए। प्रजा में जाने वाले मोटी बुद्धि समझ न सकें। समझाने में बड़ी ही डिफीकल्टी लगती है। बाबा लिखते भी हैं सिकीलधे स्वदर्शन चक्रधारी ब्रह्मा मुख वंशावली। परन्तु तुम्हारे पास अलंकार कहाँ हैं। चित्रों में देवियों को तीसरा नेत्र दिया है, लेकिन उनको तो तीसरा नेत्र है नहीं। तुम्हारी अब तीसरी आंख खुली है। तुम शक्तियों की महिमा है। जगत अम्बा है तो बच्चे भी साथ में होंगे। मैजारिटी माताओं की है। माताओं को ही ऊंच उठाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपना समय सर्विस में सफल करना है। तन-मन-धन सब अर्पण कर जब तक जीना है पढ़ाई पढ़ते रहना है।

2) आपस में एक-दो की ज्ञान से पालना करनी है। ऐसा कोई कार्य नहीं करना है जिससे बाप की अवज्ञा हो।

वरदान:- विशेषता के बीज द्वारा सन्तुष्टता रूपी फल प्राप्त करने वाली विशेष आत्मा भव
इस विशेष युग में विशेषता के बीज का सबसे श्रेष्ठ फल है “सन्तुष्टता”। सन्तुष्ट रहना और सर्व को सन्तुष्ट करना – यही विशेष आत्मा की निशानी है इसलिए विशेषताओं के बीज अथवा वरदान को सर्व शक्तियों के जल से सींचो तो बीज फलदायक हो जायेगा। नहीं तो विस्तार हुआ वृक्ष भी समय प्रति समय आये हुए तूफान में हिलते-हिलते टूट जाता है अर्थात् आगे बढ़ने का उमंग, उत्साह, खुशी वा रूहानी नशा नहीं रहता। तो विधिपूर्वक शक्तिशाली बीज को फलदायक बनाओ।
स्लोगन:- अनुभूतियों का प्रसाद बांटकर असमर्थ को समर्थ बना देना – यही सबसे बड़ा पुण्य है।
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