29 july ki murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 29 JULY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 29 July 2020

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29-07-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – पहले-पहले सबको बाप का सही परिचय देकर गीता का भगवान सिद्ध करो फिर तुम्हारा नाम बाला होगा”
प्रश्नः- तुम बच्चों ने चारों युगों में चक्र लगाया है, उसकी रस्म भक्ति में चल रही है, वह कौन-सी?
उत्तर:- तुमने चारों युगों में चक्र लगाया वह फिर सब शास्त्रों, चित्रों आदि को गाड़ी में रख चारों ओर परिक्रमा लगाते हैं। फिर घर में आकर सुला देते हैं। तुम ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय…. बनते। इस चक्र के बदले उन्होंने परिक्रमा दिलाना शुरू किया है। यह भी रस्म है।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं, जब कोई को समझाते हो तो पहले यह क्लीयर कर दो कि बाप एक है, पूछना नहीं है कि बाप एक है वा अनेक हैं। ऐसे तो फिर अनेक कह देंगे। कहना ही है बाप रचता गॉड फादर एक है। वह सब आत्माओं का बाप है। पहले-पहले ऐसे भी नहीं कहना चाहिए कि वह बिन्दी है, इसमें फिर मूँझ पड़ेंगे। पहले-पहले तो यह अच्छी रीति समझाओ कि दो बाप हैं – लौकिक और पारलौकिक। लौकिक तो हर एक का होता ही है लेकिन उनको कोई खुदा, कोई गॉड कहते हैं। है एक ही। सब एक को ही याद करते हैं। पहले-पहले यह पक्का निश्चय कराओ कि फादर है स्वर्ग की रचना करने वाला। वह यहाँ आयेंगे स्वर्ग का मालिक बनाने, जिसको शिवजयन्ती भी कहते हैं। यह भी तुम बच्चे जानते हो स्वर्ग का रचता भारत में ही स्वर्ग रचते हैं, जिसमें देवी-देवताओं का ही राज्य होता है। तो पहले-पहले बाप का ही परिचय देना है। उनका नाम है शिव। गीता में भगवानुवाच है ना। पहले-पहले तो यह निश्चय कराए लिखा लेना चाहिए। गीता में है भगवानुवाच – मैं तुमको राजयोग सिखाता हूँ अर्थात् नर से नारायण बनाता हूँ। यह कौन बना सकते हैं? जरूर समझाना पड़े। भगवान कौन है फिर यह भी समझाना होता है। सतयुग में पहले नम्बर में जो लक्ष्मी-नारायण हैं, जरूर वही 84 जन्म लेते होंगे। पीछे फिर और-और धर्म वाले आते हैं। उन्हों के इतने जन्म हो न सकें। पहले आने वालों के ही 84 जन्म होते हैं। सतयुग में तो कुछ सीखते नहीं हैं। जरूर संगम पर ही सीखते होंगे। तो पहले-पहले बाप का परिचय देना है। जैसे आत्मा देखने में नहीं आती है, समझ सकते हैं, वैसे परमात्मा को भी देख नहीं सकते। बुद्धि से समझते हैं वह हम आत्माओं का बाप है। उनको कहा जाता है परम आत्मा। वह सदैव पावन है। उनको आकर पतित दुनिया को पावन बनाना होता है। तो पहले बाप एक है, यह सिद्ध कर बताने से गीता का भगवान कृष्ण नहीं है, वह भी सिद्ध हो जायेगा। तुम बच्चों को सिद्ध कर बताना है, एक बाप को ही ट्रूथ कहा जाता है। बाकी कर्मकान्ड वा तीर्थ आदि की बातें सब भक्ति के शास्त्रों में हैं। ज्ञान में तो इनका कोई वर्णन ही नहीं है। यहाँ कोई शास्त्र नहीं। बाप आकर सारा राज़ समझाते हैं। पहले-पहले तुम बच्चे इस बात पर जीत पायेंगे कि भगवान एक निराकार है, न कि साकार। परमपिता परमात्मा शिव भगवानुवाच, ज्ञान का सागर सबका बाप वह है। श्रीकृष्ण तो सबका बाप हो नहीं सकता वह किसी को कह नहीं सकता कि देह के सब धर्म छोड़ मामेकम् याद करो। है बहुत सहज बात। परन्तु मनुष्य शास्त्र आदि पढ़कर, भक्ति में पक्के हो गये हैं। आजकल शास्त्रों आदि को गाड़ी में रख परिक्रमा देते हैं। चित्रों को, ग्रंथ को भी परिक्रमा दिलाते हैं फिर घर ले आकर सुलाते हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो हम देवता से क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र बनते हैं, यह चक्र लगाते हैं। चक्र के बदले वह फिर परिक्रमा दिलाकर घर में जाए रखते हैं। उन्हों का एक मुकरर दिन रहता है, जब परिक्रमा दिलाते हैं। तो पहले-पहले यह सिद्ध कर बताना है कि श्रीकृष्ण भगवानुवाच नहीं परन्तु शिव भगवानुवाच है। शिव ही पुनर्जन्म रहित है। वह आते जरूर हैं, परन्तु उनका दिव्य जन्म है। भागीरथ पर आकर सवार होते हैं। पतितों को आकर पावन बनाते हैं। रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं, जो नॉलेज और कोई नहीं जानते हैं। बाप को आपेही आकर अपना परिचय देना है। मुख्य बात है ही बाप के परिचय की। वही गीता का भगवान है, यह तुम सिद्ध कर बतायेंगे तो तुम्हारा नाम बहुत बाला हो जायेगा। तो ऐसा पर्चा बनाकर उसमें चित्र आदि भी लगाकर फिर एरोप्लेन से गिराने चाहिए। बाप मुख्य-मुख्य बातें समझाते रहते हैं। तुम्हारी मुख्य एक बात में जीत हुई तो बस तुमने जीत पाई। इसमें तुम्हारा नाम बहुत बाला हुआ है, इसमें कोई खिटपिट नहीं करेंगे। यह बड़ी क्लीयर बात है। बाप कहते हैं मैं सर्वव्यापी कैसे हो सकता हूँ। मैं तो आकर बच्चों को नॉलेज सुनाता हूँ। पुकारते भी हैं – आकर पावन बनाओ। रचता और रचना का ज्ञान सुनाओ। महिमा भी बाप की अलग, कृष्ण की अलग है। ऐसे नहीं शिवबाबा आकर फिर कृष्ण वा नारायण बनते हैं, 84 जन्मों में आते हैं! नहीं। तुम्हारी बुद्धि सारी यह बातें समझाने में लगी रहनी चाहिए। मुख्य है ही गीता। भगवानुवाच है, तो जरूर भगवान का मुख चाहिए ना। भगवान तो है निराकार। आत्मा मुख बिगर बोले कैसे। तब कहते हैं मैं साधारण तन का आधार लेता हूँ। जो पहले लक्ष्मी-नारायण बनते हैं, वही 84 जन्म लेते-लेते पिछाड़ी में आते हैं तो फिर उनके ही तन में आते हैं। कृष्ण के बहुत जन्मों के अन्त में आते हैं। ऐसे-ऐसे विचार सागर मंथन करो कि कैसे किसको समझायें। एक ही बात से तुम्हारा नाम बाला हो जायेगा। रचता बाप का सबको मालूम पड़ जायेगा। फिर तुम्हारे पास बहुत आयेंगे। तुमको बुलायेंगे कि यहाँ आकर भाषण करो इसलिए पहले-पहले अल्फ सिद्ध कर समझाओ। तुम बच्चे जानते हो – बाबा से हम स्वर्ग का वर्सा ले रहे हैं। बाबा हर 5 हज़ार वर्ष बाद भारत में ही भाग्यशाली रथ पर आते हैं। यह है सौभाग्यशाली, जिस रथ में भगवान आकर बैठते हैं। कोई कम है क्या। भगवान इनमें बैठ बच्चों को समझाते हैं कि मैं बहुत जन्मों के अन्त में इसमें प्रवेश करता हूँ। श्रीकृष्ण की आत्मा का रथ है ना। वह खुद कृष्ण तो नहीं है। बहुत जन्मों के अन्त का है। हर जन्म में फीचर्स आक्यूपेशन आदि बदलता रहता है। बहुत जन्मों के अन्त में जिसमें प्रवेश करता हूँ वह फिर कृष्ण बनते हैं। आते हैं संगमयुग में। हम भी बाप का बनकर बाप से वर्सा लेते हैं। बाप पढ़ाकर साथ ले जाते हैं और कोई तकलीफ की बात नहीं। बाप सिर्फ कहते हैं मामेकम् याद करो, तो यह अच्छी रीति विचार करना चाहिए कि कैसे-कैसे लिखें। यही मुख्य मिस्टेक है जिस कारण ही भारत अनराइटियस इरिलीजस, इनसालवेन्ट बना है। बाप फिर आकर राजयोग सिखलाते हैं। भारत को राइटियस, सालवेन्ट बनाते हैं। सारी दुनिया को राइटियस बनाते हैं। उस समय सारे विश्व के मालिक तुम ही हो। कहते हैं ना – विश यू लाँग लाइफ एण्ड प्रॉसपर्टी। बाबा आशीर्वाद नहीं देते हैं कि सदा जीते रहो। यह साधू लोग कहते हैं – अमर रहो। तुम बच्चे समझते हो अमर तो जरूर अमरपुरी में होंगे। मृत्युलोक में फिर अमर कैसे कहेंगे। तो बच्चे जब मीटिंग आदि करते हैं तो बाप से राय पूछते हैं। बाबा एडवांस राय देते हैं सब अपनी-अपनी राय लिख भेजें फिर भल इकट्ठे भी हों। राय तो मुरली में लिखने से सबके पास पहुँच सकती है। 2-3 हज़ार खर्चा बच जाए। इन 2-3 हज़ार से तो 2-3 सेन्टर खोल सकते हैं। गाँव-गाँव में जाना चाहिए, चित्र आदि लेकर।

तुम बच्चों का जास्ती इन्ट्रेस्ट सूक्ष्मवतन की बातों में नहीं होना चाहिए। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि चित्र हैं तो इस पर थोड़ा समझाया जाता है। इन्हों का बीच में थोड़ा पार्ट है। तुम जाते हो, मिलते हो बाकी और कुछ है नहीं इसलिए इसमें जास्ती इन्ट्रेस्ट नहीं लिया जाता है। यहाँ आत्मा को बुलाया जाता है, उनको दिखाते हैं। कोई-कोई आकर रोते भी हैं। कोई प्रेम से मिलते हैं। कोई दु:ख के आंसू बहाते हैं। यह सब ड्रामा में पार्ट है, जिसको चिटचैट कही जाए। वो लोग तो ब्राह्मण में कोई की आत्मा को बुलाते हैं फिर उनको कपड़ा आदि पहनायेंगे। अब शरीर तो वह खत्म हो गया, बाकी पहनेंगे कौन? तुम्हारे पास वह रस्म नहीं है। रोने आदि की तो बात ही नहीं। तो ऊंच ते ऊंच बनना है, वह कैसे बनें। जरूर बीच में संगमयुग है जब पवित्र बनते हैं। तुम एक बात सिद्ध करेंगे तो कहेंगे यह तो बिल्कुल ठीक बताते हैं। भगवान कभी झूठ थोड़ेही बता सकते हैं। फिर बहुतों का प्यार भी होगा, बहुत आयेंगे। समय पर बच्चों को सब प्वाइंट्स भी मिलती रहती हैं। पिछाड़ी में क्या-क्या होना है, वह भी देखेंगे, लड़ाई लगेगी, बॉम्बस छूटेंगे। पहले मौत है उस तरफ। यहाँ तो रक्त की नदियां बहनी हैं फिर घी-दूध की नदी। पहले-पहले धुआं विलायत से निकलेगा। डर भी वहाँ है। कितने बड़े-बड़े बॉम्बस बनाते हैं। क्या-क्या उसमें डालते हैं, जो एकदम शहर को खलास कर देते हैं। यह भी बताना है, किसने स्वर्ग की राजाई स्थापन की। हेविनली गॉड फादर जरूर संगम पर ही आते हैं। तुम जानते हो अभी संगम है। तुमको मुख्य बात समझाई जाती है बाप के याद की, जिससे ही पाप कटेंगे। भगवान जब आया था तो कहा था मामेकम् याद करो तो तुम सतोप्रधान बन जायेंगे। मुक्तिधाम में जायेंगे। फिर पहले से लेकर चक्र रिपीट होगा। डिटीज्म, इस्लामीज्म, बुद्धिज्म…… तुम स्टूडेन्ट की बुद्धि में यह सारी नॉलेज होनी चाहिए ना। खुशी रहती है, हम कितनी कमाई करते हैं, यह अमरकथा अमर बाबा तुमको सुनाते हैं। तुम्हारे अनेक नाम रख दिये हैं। मुख्य पहले-पहले डिटीज्म फिर सबकी वृद्धि होते-होते झाड़ बढ़ता जाता है। अनेकानेक धर्म, अनेक मतें हो जाती हैं। यह एक धर्म एक श्रीमत से स्थापन होता है। द्वेत की बात नहीं। यह रूहानी नॉलेज रूहानी बाप बैठ समझाते हैं। तुम बच्चों को खुशी में भी रहना चाहिए।

तुम जानते हो बाप हमको पढ़ाते हैं, तुम अनुभव से कहते हो तो यह शुद्ध अहंकार रहना चाहिए कि भगवान हमको पढ़ा रहे हैं और क्या चाहिए! जबकि हम विश्व के मालिक बनते हैं तो खुशी क्यों नहीं रहती या निश्चय में कहाँ संशय है। बाप में संशय नहीं लाना चाहिए। माया संशय में लाकर भुला देती है। बाबा ने समझाया है माया आंखों द्वारा बहुत धोखा देती है। अच्छी चीज़ देखेंगे तो दिल बित-बित करेगी खायें, आंखों से देखते हैं तब क्रोध आता है मारने लिए। देखें ही नहीं तो मारे कैसे। आंखों से देखते हैं तब लोभ, मोह भी होता है। मुख्य धोखा देने वाली आंखे हैं। इन पर पूरी नज़र रखनी चाहिए। आत्मा को ज्ञान मिलता है, तो फिर क्रिमिनलपना छूट जाता है। ऐसे भी नहीं है आंखों को निकाल देना है। तुम्हें तो क्रिमिनल आई को सिविलआई बनाना है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सदा इसी नशे वा खुशी में रहना है कि हमको भगवान पढ़ाते हैं। किसी भी बात में संशयबुद्धि नहीं होना है। शुद्ध अहंकार रखना है।

2) सूक्ष्मवतन की बातों में ज्यादा इन्ट्रेस्ट नहीं रखना है। आत्मा को सतोप्रधान बनाने का पूरा-पूरा पुरूषार्थ करना है। आपस में राय कर सबको बाप की सही पहचान देनी है।

वरदान:- संगमयुग के महत्व को जान एक का अनगिनत बार रिटर्न प्राप्त करने वाले सर्व प्राप्ति सम्पन्न भव
संगमयुग पर बापदादा का वायदा है – एक दो लाख लो। जैसे सर्व श्रेष्ठ समय, सर्व श्रेष्ठ जन्म, सर्व श्रेष्ठ टाइटल इस समय के हैं वैसे सर्व प्राप्तियों का अनुभव अभी ही होता है। अभी एक का सिर्फ लाख गुणा नहीं मिलता लेकिन जब चाहो जैसे चाहो, जो चाहो बाप सर्वेन्ट रूप में बांधे हुए हैं। एक का अनगिनत बार रिटर्न मिल जाता है क्योंकि वर्तमान समय वरदाता ही आपका है। जब बीज आपके हाथ में है तो बीज द्वारा जो चाहो वह सेकण्ड में लेकर सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न बन सकते हो।
स्लोगन:- सफलता सम्‍पन्‍न बनना चाहते है तो एक दो की बातों को स्‍वीकार करो और सत्‍कार दो।

TODAY MURLI 29 JULY 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 29 July 2020

29/07/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, first of all, give everyone the Father’s true introduction and prove who the God of the Gita is. Then your name will be glorified.
Question: You children have gone through all four ages of the cycle. What is the custom that has continued on the path of devotion?
Answer: Because of your having gone around the cycle of all four ages, they put all the scriptures, idols, etc. on a cart and go around in all four directions. Then they go back home and put them to sleep. You become Brahmins, deities, warriors etc. In memory of your going around this cycle, they started the custom of taking the scriptures around.

Om shanti. The spiritual Father sits here and explains to you spiritual children. Whenever you explain to anyone, first of all, make it clear that there is only the one Father. There is no need to ask if there is one Father or many fathers. If you did, they could mention many fathers. You just have to say: The Father, the Creator, God, the Father, is only One. He is the Father of all souls. You must not tell them straight away that He is a point; they would become confused by that. First of all, explain very clearly that there are two fathers, the one of this world (lokik) and the one beyond this world (parlokik). Everyone has a physical father and everyone calls the other one “Khuda” or God. In fact, He is one and the same. Everyone remembers that One. First of all, make them have the firm faith that the Father is the One who creates heaven. He comes here in order to make you into the masters of the world. This is called Shiva Jayanti. You also know that it is only in Bharat that the Creator of heaven creates heaven where there is the kingdom of deities. Therefore, first of all, the Father’s introduction has to be given. His name is Shiva. In the Gita it says, “God speaks”. First of all, make this firm for them and get them to write it down. It says in the Gita: God speaks: “I teach you Raj Yoga, that is, I change you from an ordinary man into Narayan.” Who can make you this? This definitely has to be explained. You also have to explain who God is. Lakshmi and Narayan who are number one in the golden age must surely take 84 births. Those of other religions come later. They cannot have as many births. Only those who come first take 84 births. They don’t study any of this in the golden age. They must surely have studied everything at the confluence age. So, first of all, you have to give the Father’s introduction. Just as souls cannot be seen but can be understood, in the same way, the Supreme Soul cannot be seen. However, the intellect can understand that He is the Father of us souls. He is called the Supreme Soul. He is ever pure. He has to come and purify the impure world. Therefore, when you first explain and prove that there is only the one Father, it can also be proved that the God of the Gita cannot be Krishna. You children have to explain and prove that only the one Father is called the Truth. All the other things – physical rituals and going on pilgrimages etc.- are mentioned in the scriptures of the path of devotion. Those things are not mentioned on the path of knowledge. There are no scriptures here. The Father comes and explains all of these secrets. First of all, you children will gain victory by proving the fact that God is incorporeal, not corporeal. God, the Supreme Father the Supreme Soul, Shiva, speaks. God is the Ocean of Knowledge and the Father of everyone. Shri Krishna couldn’t be the Father of everyone. He couldn’t say to anyone: Renounce all bodily religions and remember Me alone! This is such an easy aspect. However, human beings have become very firm in their devotion because of having read so many scriptures. Nowadays, they put the scriptures etc. in a cart and take them around the town. They also take their idols and the Granth around. Then they come back home and put them back to sleep. You children know that you go around the cycle and become deities, then warriors, merchants and shudras. In memory of your going around the cycle, they take the scriptures around, and then bring them back home and put them away. They have a fixed day for taking the scriptures around. Therefore, you first have to prove that the versions in the Gita were spoken by God Shiva and not by Shri Krishna. Only Shiva is beyond rebirth. He definitely comes, but His birth is divine. He comes here and enters Bhagirath (The Lucky Chariot). He comes and purifies the impure. He comes here to give the secrets of the Creator and the beginning, the middle and the end of creation. No one else has this knowledge. The Father Himself has to come to give His own introduction. The main thing is the Father’s introduction. If you prove that He is the God of the Gita, your name will be glorified. Therefore, make such leaflets in which you also have pictures and drop these leaflets from an aeroplane. The Father continues to explain main things. If you gain victory over this one main thing, you can gain victory over everything. Your name will be glorified a great deal in this. No one will argue with you about this. This is a very clear matter. The Father says: How could I be omnipresent? I come and give you children knowledge. People even call out: Come and purify us! Give us the knowledge of the Creator and creation. The praise of the Father is distinct from the praise of Krishna. It isn’t that Shiv Baba comes and becomes Krishna or Narayan or that He takes 84 births; no. Your intellects should be kept busy thinking about how to explain all of these things. The main thing is the Gita. It says, “God speaks”. Therefore, God would surely need a mouth. However, God is incorporeal. How can a soul speak without a mouth? This is why He says: I take the support of an ordinary body. The ones who first become Lakshmi and Narayan are the ones who take 84 births. Then, when he comes to the end of the cycle, I enter that one’s body. I come at the end of the many births of Krishna. Churn this ocean of knowledge as to how you can explain it to others. Just through this one aspect your name will be glorified and everyone will come to know the Father, the Creator. Then, many will come to you. They will invite you to go and give lectures. This is why Alpha has to be proved and explained first. You children know that you are claiming your inheritance of heaven from the Father. Baba comes into Bharat every 5000 years and enters this Lucky Chariot. This one, in whom God comes and sits, is the most fortunate one. This is not a small thing! God sits in this one and explains to you children that He comes and enters this one’s body at the end of the last of his many births. This present chariot is of the soul that was in Shri Krishna. It is not Krishna himself, but the last body of his many births. The features and occupation change in each birth. The one I enter at the end of his many births then becomes Krishna. I come at the confluence age. You belong to the Father and also claim an inheritance from Him. The Father teaches you and then takes you back home with Him. There is no difficulty in this. The Father simply says: Constantly remember Me alone! Therefore, think very carefully about how to write this. Due to this main mistake, Bharat has become unrighteous, irreligious and insolvent. The Father comes again to teach Raj Yoga. He makes Bharat righteous and solvent. He makes the whole world righteous. At that time, you alone are the masters of the whole world. It is said: I wish you long life and prosperity. Baba doesn’t give you the blessing: “May you live for ever!” It is the sages who say: May you become immortal! You children understand that immortal ones would surely exist in the land of immortality. How can there be immortal beings in the land of death? When you children hold meetings, you ask the Father for advice. Baba advises you in advance that you should all send your own opinions in writing. Then you can all get together. That advice can be put in the murli and reach everyone. Two to three thousand rupees would be saved. Two or three centres could be opened with that amount. You should go from village to village taking all the pictures etc. with you. You children shouldn’t have too much interest in the things of the subtle region. Because there are the pictures of Brahma, Vishnu and Shankar, a little about them has to be explained. They have a small part in-between. You just go and meet them; there is nothing else. This is why there shouldn’t be too much interest in those things. Souls are invoked here and shown everything. Some even come and cry. Some meet with love and some shed tears of sorrow. All of that is part of the drama. It is called chit-chat. People invite the soul of someone into the body of a brahmin priest who is made to wear those clothes etc. However, the body has perished. Therefore, who would wear those clothes? You don’t have that custom. There is no question of crying etc. Otherwise, how could you become the highest of all? There definitely is this intermediate confluence age when you have to become pure. When you prove this one thing, they will say that what you say is absolutely right. God can never tell lies. Then, many will have a lot of love. Many will come. You children continue to receive all the points at the right time. You will see what will happen at the end. There will be war. Bombs will be dropped. There will first be death on the other side. Here, rivers of blood will flow. Then there will be rivers of milk and ghee (clarified butter). The smoke will first emerge abroad. There is a lot of fear there. Many huge bombs have been made. Look what they put in them! Whole cities are wiped out. You have to explain who established the kingdom of heaven. Heavenly God, the Father, definitely comes at the confluence age. You know that this is now the confluence age. The main thing that is explained to you is remembrance of the Father. It is by having this remembrance that your sins will be cut away. When God came, He said: Remember Me alone and you will become satopradhan and go to the land of liberation. Then the cycle will repeat from the beginning. There will be deityism, then Islamism and Buddhism. You students should keep this full knowledge in your intellects. You should remain very happy that you are earning such a huge income. Immortal Baba is telling you the story of immortality. You have been given many names. The main religion of deityism exists first. Then, as the tree continues to grow, the population gradually increases. There are then innumerable religions and many opinions. This one religion is established with one shrimat. There is no question of duality. The spiritual Father sits here and explains this spiritual knowledge to you. You children should remain happy. You know that the Father is teaching you. You speak from experience. Therefore, you should have the pure pride of knowing that God is teaching you. What else do you need? Since you are becoming the masters of the world, why isn’t there that happiness? Or, does your faith have doubt? There shouldn’t be any doubt about the Father. Maya brings doubts and makes you forget Him. Baba has explained that Maya deceives you a great deal with your eyes. When you see something tasty, you are tempted to eat it. When your eyes see something, anger emerges and you want to hit someone. If you didn’t see that person, you wouldn’t hit him. It is when your eyes see something that there is greed and attachment too. The eyes are the main organs that deceive you. You have to keep full guard over them. When you souls receive knowledge, all your criminal behaviour should stop. It isn’t that you have to remove your eyes. You have to make your criminal eyes civil. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Always maintain the happiness and intoxication that God is teaching you. Never allow your intellect to have any doubts about anything. Maintain pure pride.
  2. Don’t have too much interest in the things of the subtle region. Make full effort to make the soul satopradhan. Discuss among yourselves how to give everyone the Father’s true introduction.
Blessing: May you know the importance of the confluence age and attain countless times return for one-fold and become filled with all attainments.
At the confluence age, BapDada has promised: Give one-fold and you will receive one hundred-thousand-fold. Just as this time is the most elevated time, the most elevated birth, and has the most elevated title, in the same way, it is only at this time that you can experience all attainments. At this time, not only is it one hundred-thousand-fold return of one, but whenever you want, however you want, whatever you want, the Father is bound to you in the form of the Servant. You receive countless times return of one because, at present, the Bestower of Blessings belongs to you. When you are holding the seeds in your hand, you can take whatever you want in a second from the Seed and become filled with all attainments.
Slogan: No matter what the circumstances are, let go of the circumstances, but do not let go of your happiness.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 29 JULY 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 29 July 2019

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29/07/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, it is now the time to have the stage of deep silence, that is, the stage of being bodiless. Practise staying in this stage.
Question: What is the highest destination of all and how do you attain it?
Answer: To become completely civilized is the highest destination. Only when there isn’t the slightest mischief in your physical organs can you become completely civilized. When you have such a stage, you can receive the sovereignty of the world. It is remembered: Those who ascend taste the sweetness of heaven, that is, they can become the kings of kings. Otherwise, they become subjects. Now, check: What is my attitude like? Do I make any mistakes?

Om shanti. You have to sit here in soul consciousness. The Father explains to you children: Consider yourselves to be souls. Baba is now asking “All-Rounder” Dadi: Are you soul conscious or body conscious in the golden age? There, you are automatically soul conscious. You don’t need to remember this again and again. Yes, there, you understand when your body has grown old and you therefore have to shed it and take a new one. Just like the example of a snake, so a soul sheds his old body and takes a new one. God explains with examples. Buzz knowledge to all human beings and make them as knowledgeable as yourselves, through which they can become viceless deities in the land of angels. The highest study is to change from human beings into deities. It is remembered: It didn’t take God long to change human beings into deities. Who did that? The deities didn’t do that. Only God changes human beings into deities. Human beings don’t know these things. People everywhere ask you: What is your aim and objective? Why don’t you have a small leaflet printed explaining your aim and objective so that you can give it to anyone who asks you. They will be able to understand through that. Baba has explained very well. At this time, it is the iron-aged, impure world in which there is great, limitless sorrow. Baba is now doing the service of taking us human beings to the great, pure, golden-aged land of happiness, that is, He is showing us the way. It isn’t that we are giving undivided (without duality) knowledge. Those people consider the knowledge in the scriptures to be undivided knowledge. In fact, that is not undivided knowledge. Even to write “undivided knowledge” is wrong. You have to explain this clearly to human beings. Have such leaflets printed that people can quickly understand what your aim is. We remove iron-aged, impure, corrupt human beings from limitless sorrow and take them to the golden-aged, pure, elevated world of limitless happiness. Baba gives you children this essay to write. You have to write this very clearly. Everywhere, you should have leaflets with such articles, so that you can quickly bring them out and give them to people and they can realise that they are in the land of sorrow and lying in the dirt. Human beings don’t understand that they are the human beings of the iron-aged, impure land of sorrow and that we are the ones who take them into limitless happiness. So, you should have a good leaflet made just like Baba had one printed: Are you golden-aged or iron-aged? However, people don’t understand anything. They consider jewels to be stones and throw them away. These are the jewels of knowledge whereas those people think that there are jewels in the scriptures. You can clearly explain so that they can realise that there is limitless sorrow here. There should be a list of the types of sorrow and there should be at least 101 types in that list. Write: In this world there is limitless sorrow. Write all of this and make a list. On the other side, write about the limitless happiness where there is no trace of sorrow. We are establishing that kingdom, that is, that land of happiness. People will then very quickly close their mouths. People don’t understand that there is the land of sorrow at this time; they consider this to be heaven. They build huge palaces and new temples etc. They don’t know that all of this is to end. They receive a lot of money through bribery. The Father has explained that all of that is the arrogance of Maya and the arrogance of scienceMotors and aeroplanes etc. are all the show of Maya. It is a law that when the Father establishes heaven, Maya too shows her own splendour. This is called the pomp of Maya. You children are now establishing peace throughout the whole world. If Maya comes and interferes, the consciences of you children bite you. The Father explains that when someone becomes trapped in another’s name and form, this is being criminaleyed. In the iron age there is criminalization, whereas in the golden age, there is civilization. Everyone bows down their heads in front of those deity idols: You are viceless and we are vicious. This is why the Father says: Each of you should check your own stage. All the senior maharathis should look at themselves: My intellect is not being pulled to anyone’s name and form is it? So-and-so is very good; I want to do this. Do you have this feeling inside? Baba knows that, at this time, no one is completely civilized. It is very difficult for there not to be the slightest mischief. There are scarcely any like that. Their eyes definitely deceive them even a little. The drama will not allow anyone to become civilized (civil-eyed)very quickly. You have to make a lot of effort and check yourself: Do my eyes deceive me? It is a very high destination to become a master of the world. Those who climb taste the sweetness of heaven, that is, they become the kings of kings. If they fall, they become subjects. Nowadays, it would be said that these are vicious times. No matter how great a person is, even, for instance, the Queen;she would be internally afraid that perhaps someone will dethrone her. There is peacelessness in every human being. Even some children spread so much peacelessness. You are establishing peace and so, first of all, you have to remain peaceful yourself and you can then fill others with that power. There, the kingdom itself is very peaceful; your eyes become civil. The Father says: Check yourself: What was the attitude of myself, the soul, like today? This requires a lot of effort. You have to look after yourself. Sometimes, you don’t tell the truth to the unlimited Father and you continue to make mistakes at every step. If you look at someone with that criminal vision even slightly or you make a mistake, instantly note that down. Until you become completely free from making mistakes, you must be making at least 10 to 20 mistakes every day. However, no one tells the truth. Those who are body conscious will definitely commit one sin or another. Their consciences will continue to bite them. Some don’t even understand what a mistake is. Do animals understand this? Before receiving knowledge, you too had monkey intellects. Some change by 50 percent, some change by ten percent and others change by some other percentage. These eyes are very deceitful. The eyes are the sharpest. The Father says: You souls came down bodiless. You didn’t have bodies. Do you know at this time what other bodies you will take or what relationships you will enter? You cannot tell. You remain in complete silence in a wombs. The soul becomes completely silent. Only when the body grows do you come to know what you have to become. You simply shed that old body and return home and then, when you take another body, you will play your part in the golden age. It is now the time to become completely silent. Each soul carries those sanskars with him, and they emerge when the body grows larger. You now have to return home and you therefore have to forget this old world and the consciousness of your body. Nothing should be remembered. You have to observe many precautions. Whatever is inside that will emerge outside. Shiv Baba has knowledge in Him. I too have a part. It is of Me that you say: Ocean of Knowledge. People sing this praise but they don’t know the meaning of it. You now understand the meaning of this. However, the intellects of souls become not worth a penny. The Father is now making you so wise. Human beings have millions and multimillions. That is the pomp of Maya. Whatever useful things of science you have now, you will have them there too. Those who have invented them will exist there too. They will not become kings. They will come to you at the end and will then teach others. You learn so much from the one Father. Only the one Father changes the world so much from what it was. There are those who invent those things and then spread them. At first there was only one person who made the bombs. He would have understood that the world will be destroyed by them. Then, he continued to make more. Science is needed there too. There is still time. They will study and become clever. Once they have received the introduction of the Father, they will come to heaven and become maids and servants. There, everything is such that it gives happiness. Whatever existed in the land of happiness will exist there again. There is no question of any disease or sorrow there. Here, there is limitless sorrow. There, there is limitless happiness. We are now establishing it. Only the one Father is the Remover of Sorrow and the Bestower of Happiness. First of all, your own stage has to be like that. You mustn’t simply be a pandit. There is the story of a pandit who said that you can go across by taking the name of Rama. That story applies to this time. By having remembrance of the Father, you go from the ocean of poison to the ocean of milk. The stage of you children has to be very good here. If there isn’t any power of yoga and your eyes are criminal, the arrow will not strike the target. The eyes have to be civil. If you give someone knowledge whilst in remembrance of the Father, the arrow will strike the target. The sword of knowledge has to have the power of yoga. Through knowledge you earn wealth. You have the power of remembrance. Many children don’t have any remembrance at all; they don’t even know anything. The Father says: You have to explain to people that this is the land of sorrow and that the golden age is the land of happiness. There is no mention of happiness in the iron age. Even if there is, it is like the droppings of a crow. There is limitless happiness in the golden age. People don’t understand the meaning of that. They continue to beat their heads for liberation. No one knows about liberation-in-life. So, how could they give knowledge? They come in the rajopradhan period, so how could they teach Raj Yoga? Here, happiness is like the droppings of a crow. They don’t even know what happened through Raj Yoga. You children know that this is the drama that is taking place. They write defamatory things about you in the newspapers, but that has to happen. There are all types of assault on innocent ones. There are many types of sorrow in the world. There isn’t any happiness here now. No matter how wealthy someone is, if he falls ill or goes blind, there is sorrow experienced. Write down everything in the list of types of sorrow. All of these things exist at the end of the iron age, Ravan’s kingdom. There isn’t a single thing that causes sorrow in the golden age. The golden age existed in the past. It is now the confluence age. The Father also comes at the confluence age. You now know which births you take in 5000 years and how you come into sorrow from happiness. Those who have all the knowledge in their intellects and who have imbibed it can understand this. The Father is filling the aprons of you children. It is remembered: Wealth does not diminish by donating it to others. If someone doesn’t donate wealth, it is as though he doesn’t have any. In that case, he will not receive any wealth. There is the account. If you don’t give anything, from where would you receive it? How would there be expansion? All of these are imperishable jewels of knowledge. It is numberwise for everything. This is your spiritual army. Some souls will go and claim a high status whereas others will attain the status of subjects, just as they did in the previous cycle. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found spiritual children, numberwise, according to your efforts, love, remembrance and good morning from deep within the heart, from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. In order to look after yourself, check at every step: a) What was the attitude of myself, the soul, like today? b) Were my eyes civil? c) What sins did I commit under the influence of body consciousness?
  2. Inculcate the imperishable wealth of knowledge into your intellect and then donate it. Definitely fill the sword of knowledge with the power of remembrance.
Blessing: May you become a hero actor by knowing the importance of the confluence age and paying special attention at every moment.
While performing every act, always have this blessing in your awareness: I am a hero actor. Your every act will then be special and every second, every moment and every thought will be elevated. You cannot say that just those five minutes were ordinary. Even five minutes of the confluence age are very important. Five minutes are greater than five years and so pay attention to the time. In order to receive the fortune of the kingdom for all time, let there also be attention paid all the time.
Slogan: For those who have the power of determination in their thoughts, every task is possible.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 29 JULY 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 29 July 2019

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29-07-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – सुन्न अवस्था अर्थात् अशरीरी बनने का अभी समय है, इसी अवस्था में रहने का अभ्यास करोˮ
प्रश्नः- सबसे ऊंची मंज़िल कौन-सी है, उसकी प्राप्ति कैसे होगी?
उत्तर:- सम्पूर्ण सिविलाइज्ड बनना, यही ऊंच मंज़िल है। कर्मेन्द्रियों में ज़रा भी चलायमानी न आये तब सम्पूर्ण सिविलाइज्ड बनें। जब ऐसी अवस्था हो तब विश्व की बादशाही मिल सकती है। गायन भी है चढ़े तो चाखे…….. अर्थात् राजाओं का राजा बने, नहीं तो प्रजा। अब जांच करो मेरी वृत्ति कैसी है? कोई भी भूल तो नहीं होती है?

ओम् शान्ति। आत्म-अभिमानी हो बैठना है। बाप बच्चों को समझाते हैं कि अपने को आत्मा समझो। अब बाबा आलराउण्डर से पूछते हैं सतयुग में आत्म-अभिमानी होते हैं या देह-अभिमानी? वहाँ तो ऑटोमेटिकली आत्म-अभिमानी रहते हैं, घड़ी-घड़ी याद करने की दरकार नहीं रहती। हाँ, वहाँ यह समझते हैं अब यह शरीर बड़ा हुआ, अब इसको छोड़ दूसरा नया लेना है। जैसे सर्प का मिसाल है, वैसे आत्मा भी यह पुराना शरीर छोड़ नया लेती है। भगवान् मिसाल दे समझाते हैं। तुम्हें सभी मनुष्यों को ज्ञान की भूं-भूं कर आपसमान ज्ञानवान बनाना है। जिससे परिस्तानी निर्विकारी देवता बन जायें। ऊंच ते ऊंच पढ़ाई है मनुष्य से देवता बनाना। गायन भी है ना मनुष्य को देवता किये…….. किसने किया? देवताओं ने नहीं किया। भगवान् ही मनुष्यों को देवता बनाते हैं। मनुष्य इन बातों को जानते नहीं। तुमसे सब जगह पूछते हैं – आपकी एम आबजेक्ट क्या है? तो क्यों नहीं एम आबजेक्ट की लिखत का छोटा पर्चा छपा हुआ हो। जो कोई भी पूछे तो उनको पर्चा दे दो जिससे समझ जायें। बाबा ने बहुत अच्छी रीति समझाया है – इस समय यह कलियुगी पतित दुनिया है जिसमें महान् अपरमअपार दु:ख हैं। अब हम मनुष्यों को सतयुगी पावन महान् सुखधाम में ले जाने की सर्विस कर रहे हैं वा रास्ता बताते हैं। ऐसे नहीं हम अद्वेत नॉलेज देते हैं। वे लोग शास्त्रों की नॉलेज को अद्वेत नॉलेज समझते हैं। वास्तव में वह कोई अद्वेत नॉलेज है नहीं। अद्वेत नॉलेज लिखना भी रांग है। मनुष्यों को क्लीयर कर बताना है, ऐसी लिखत छपी हुई हो जो झट समझ जाएं कि इन्हों का उद्देश्य क्या है? कलियुगी पतित भ्रष्टाचारी मनुष्यों को हम अपार दु:खों से निकाल सतयुगी पवित्र श्रेष्ठाचारी अपार सुखों की दुनिया में ले जाते हैं। बाबा यह एसे (निबन्ध) बच्चों को देते हैं। ऐसे क्लीयर कर लिखना है। सब जगह ऐसी तुम्हारी लिखत रखी हो, झट वह निकालकर दे देनी चाहिए तो समझें हम तो दु:खधाम में हैं। गंद में पड़े हैं। मनुष्य कोई समझते थोड़ेही हैं कि हम कलियुगी पतित, दु:खधाम के मनुष्य हैं। यह हमको अपार सुखों में ले जाते हैं। तो ऐसा एक अच्छा पर्चा बनाना है। जैसे बाबा ने भी छपाया था – सतयुगी हो या कलियुगी? परन्तु मनुष्य समझते थोड़ेही हैं। रत्नों को भी पत्थर समझ फेंक देते हैं। यह हैं ज्ञान रत्न। वह समझते हैं शास्त्रों में रत्न हैं। तुम क्लीयर कर ऐसा बोलो जो समझें यहाँ तो अपार दु:ख हैं। दु:खों की भी लिस्ट हो, कम से कम 101 तो जरूर हों। इस दु:खधाम में अपार दु:ख हैं, यह सब लिखो, सारी लिस्ट निकालो। दूसरे तरफ फिर अपार सुख, वहाँ दु:ख का नाम नहीं होता। हम वह राज्य अथवा सुखधाम स्थापन कर रहे हैं जो झट मनुष्यों का मुख बन्द हो जाए। यह कोई समझते थोड़ेही हैं कि इस समय दु:खधाम है, इसको तो वह स्वर्ग समझ बैठे हैं। बड़े-बड़े महल, नये-नये मन्दिर आदि बनाते रहते हैं, यह थोड़ेही जानते हैं कि यह सब खत्म हो जाने हैं। पैसे तो उन्हों को बहुत मिलते हैं रिश्वत के। बाप ने समझाया है यह सब है माया का, साइंस का घमण्ड, मोटरें, एरोप्लेन आदि यह सब माया का शो है। यह भी कायदा है, जब बाप स्वर्ग की स्थापना करते हैं तो माया भी अपना भभका दिखाती है, इसको कहा जाता है माया का पॉम्प।

अब तुम बच्चे सारे विश्व में शान्ति स्थापन कर रहे हो। अगर माया की कहाँ प्रवेशता हो जाती है तो बच्चों को अन्दर खाता है। जब कोई किसके नाम-रूप में फँस पड़ते हैं तो बाप समझाते हैं यह क्रिमिनलाइज़ है। कलियुग में है क्रिमिनलाइजेशन। सतयुग में है सिविलाइजेशन। इन देवताओं के आगे सब माथा टेकते हैं, आप निर्विकारी हम विकारी इसलिए बाप कहते हैं हर एक अपनी अवस्था को देखे। बड़े-बड़े अच्छे महारथी अपने को देखें हमारी बुद्धि किसके नाम-रूप में जाती तो नहीं? फलानी बहुत अच्छी है, यह करें – कुछ अन्दर में आता है? यह तो बाबा जानते हैं इस समय सम्पूर्ण सिविलाइज्ड कोई है नहीं। ज़रा भी चलायमानी न आये, बहुत मेहनत है। कोई विरले ऐसे होते है। आंखे कुछ न कुछ धोखा जरूर देती हैं। ड्रामा किसकी सिविलाइज्ड जल्दी नहीं बनायेगा। खूब पुरूषार्थ कर अपनी जांच करनी है – कहाँ हमारी आंखें धोखा तो नहीं देती हैं? विश्व का मालिक बनना बड़ी ऊंच मंजिल है। चढ़े तो चाखे…….. अर्थात् राजाओं का राजा बनते, गिरे तो प्रजा में चले जायेंगे। आजकल तो कहेंगे विकारी जमाना है। भल कितने बड़े आदमी हैं, समझो क्वीन है उनके अन्दर भी डर रहता होगा कि कहाँ कोई हमें उड़ा न दे। हर एक मनुष्य में अशान्ति है। कोई-कोई बच्चे भी कितनी अशान्ति फैलाते हैं। तुम शान्ति स्थापन कर रहे हो, तो पहले तो खुद शान्ति में रहो, तब दूसरे में भी वह बल भरे। वहाँ तो बड़ा शान्ति का राज्य चलता है। आंखें सिविल बन जाती हैं। तो बाप कहते हैं अपनी जांच करो – आज मुझ आत्मा की वृत्ति कैसी रही? इसमें बहुत मेहनत है। अपनी सम्भाल रखनी है। बेहद के बाप को भी सच कभी नहीं बताते हैं। कदम-कदम पर भूलें होती रहती हैं। थोड़ा भी उस क्रिमिनल दृष्टि से देखा, भूल हुई, फौरन नोट करो। 10-20 भूलें तो रोज़ करते ही होंगे, जब तक अभुल बनें। परन्तु सच कोई बताते थोड़ेही हैं। देह-अभिमानी से कुछ न कुछ पाप जरूर होगा। वह अन्दर खाता रहेगा। कई तो समझते ही नहीं कि भूल किसको कहते हैं। जानवर समझते हैं क्या! तुम भी इस ज्ञान के पहले बन्दरबुद्धि थे। अब कोई 50 परसेन्ट, कोई 10 परसेन्ट कोई कितना चेंज होते जाते हैं। यह आंखे तो बहुत धोखा देने वाली हैं। सबसे तीखी हैं आंखे।

बाप कहते तुम आत्मा अशरीरी आई थी। शरीर नहीं था। क्या अभी तुमको पता है कि दूसरा कौन-सा शरीर लेंगे, किस सम्बन्ध में जायेंगे? मालूम नहीं पड़ता। गर्भ में सुन्न ही सुन्न रहते हैं। आत्मा बिल्कुल ही सुन्न हो जाती। जब शरीर बड़ा हो तब पता पड़े। तो तुमको ऐसा बनकर जाना है। बस, यह पुराना शरीर छोड़कर हमको जाना है फिर जब शरीर लेंगे तो स्वर्ग में अपना पार्ट बजायेंगे। सुन्न होने का अभी समय है। भल आत्मा संस्कार ले जाती है, जब शरीर बड़ा होता है तब संस्कार इमर्ज होते हैं। अभी तुमको घर जाना है इसलिए पुरानी दुनिया का, इस शरीर का भान उड़ा देना है। कुछ भी याद न रहे। परहेज बहुत रखना है। जो अन्दर में होगा वही बाहर निकलेगा। शिवबाबा के अन्दर में भी ज्ञान है, मेरा भी पार्ट है। मेरे लिए ही कहते हैं ज्ञान का सागर…….. महिमा गाते हैं, अर्थ कुछ नहीं जानते। अभी तुम अर्थ सहित जानते हो। बाकी आत्मा की बुद्धि ऐसी वर्थ नाट ए पेनी हो जाती है। अब बाप कितना बुद्धिवान बनाते हैं। मनुष्यों के पास तो करोड़, पद्म हैं। यह माया का पॉम्प है ना। साइंस में जो अपने काम की चीजें हैं, वह वहाँ भी होंगी। वह बनाने वाले वहाँ भी जायेंगे। राजा तो नहीं बनेंगे। यह लोग पिछाड़ी में तुम्हारे पास आयेंगे फिर औरों को भी सिखायेंगे। एक बाप से तुम कितने सीखते हो। एक बाप ही दुनिया को क्या से क्या बना देते हैं। इन्वेन्शन हमेशा एक निकालते हैं फिर फैलाते हैं। बॉम्बस बनाने वाला भी पहले एक था। समझा इनसे दुनिया विनाश हो जायेगी। फिर और बनाते गये। वहाँ भी साइंस तो चाहिए ना। टाइम पड़ा है, सीखकर होशियार हो जायेंगे। बाप की पहचान मिल गई फिर स्वर्ग में आकर नौकर-चाकर बनेंगे। वहाँ सब सुख की बातें होती हैं। जो सुखधाम में था वह फिर होगा। वहाँ कोई रोग-दु:ख की बात नहीं। यहाँ तो अपरम्पार दु:ख है। वहाँ अपरम्पार सुख हैं। अभी हम यह स्थापन कर रहे हैं। दु:ख हर्ता, सुख कर्ता एक बाप ही है। पहले तो खुद की भी ऐसी अवस्था चाहिए, सिर्फ पण्डिताई नहीं चाहिए। ऐसी एक पण्डित की कथा है, बोला राम नाम कहने से पार हो जायेंगे… यह इस समय की बात है। तुम बाप की याद में विषय सागर से क्षीरसागर में चले जाते हो। यहाँ तुम बच्चों की अवस्था बड़ी अच्छी चाहिए। योगबल नहीं है, क्रिमिनल आइज़ हैं तो उनका तीर लग नहीं सकता। आंखे सिविल चाहिए। बाप की याद में रह किसको ज्ञान देंगे तो तीर लग जायेगा। ज्ञान तलवार में योग का जौहर चाहिए। नॉलेज से धन की कमाई होती है। ताकत है याद की। बहुत बच्चे तो बिल्कुल याद करते ही नहीं, जानते ही नहीं। बाप कहते हैं मनुष्यों को समझाना है कि यह है दु:खधाम, सतयुग है सुखधाम। कलियुग में सुख का नाम नहीं। अगर है भी तो भी काग विष्टा के समान है। सतयुग में तो अपार सुख हैं। मनुष्य अर्थ नहीं समझते। मुक्ति के लिए ही माथा मारते रहते हैं। जीवनमुक्ति को तो कोई जानते ही नहीं। तो ज्ञान भी दे कैसे सकते। वह आते ही हैं रजोप्रधान समय में वह फिर राजयोग कैसे सिखलायेंगे। यहाँ तो सुख है काग विष्टा समान। राजयोग से क्या हुआ था – यह भी नहीं जानते। तुम बच्चे जानते हो यह भी सब ड्रामा चल रहा है। अखबार में भी तुम्हारी निन्दा लिखते हैं, यह तो होना ही है। अबलाओं पर किस्म-किस्म के सितम आते हैं। दुनिया में अनेक दु:ख हैं। अभी कोई सुख है थोड़ेही। भल कितना बड़ा साहूकार है, बीमार हुआ, अंधा हुआ, तो दु:ख तो होता है ना। दु:खों की लिस्ट में सब लिखो। रावण राज्य कलियुग के अन्त में यह सब बातें हैं। सतयुग में दु:ख की एक भी बात नहीं होती है। सतयुग तो होकर गया है ना। अभी है संगमयुग। बाप भी संगम पर ही आते हैं। अभी तुम जानते हो 5 हज़ार वर्ष में हम क्या-क्या जन्म लेते हैं। कैसे सुख से फिर दु:ख में आते हैं। जिनको सारा ज्ञान बुद्धि में है, धारणा है वह समझ सकते हैं। बाप तुम बच्चों की झोली भरते हैं। गायन भी है – धन दिये धन ना खुटे। धन दान नहीं करते हैं तो गोया उनके पास है ही नहीं। तो फिर मिलेगा भी नहीं। हिसाब है ना! देते ही नहीं तो मिलेगा कहाँ से। वृद्धि कहाँ से होगी। यह सब है अविनाशी ज्ञान रत्न। नम्बरवार तो हर बात में होते हैं ना। यह भी तुम्हारी रूहानी सेना है। कोई रूह जाकर ऊंच पद पायेगी, कोई रूह प्रजा पद पायेगी। जैसे कल्प पहले पाया था। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे रूहानी बच्चों को नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार बापदादा व मात-पिता का दिल व जान, सिक व प्रेम से याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपनी सम्भाल करने के लिए कदम-कदम पर जांच करनी है कि :-

(अ) आज मुझ आत्मा की वृत्ति कैसी रही?

(ब) आंखे सिविल रहीं?

(स) देह-अभिमान वश कौन-सा पाप हुआ?

2) बुद्धि में अविनाशी ज्ञान धन धारण कर फिर दान करना है। ज्ञान तलवार में याद का जौहर जरूर भरना है।

वरदान:- संगमयुग के महत्व को जान हर समय विशेष अटेन्शन रखने वाले हीरो पार्टधारी भव
हर कर्म करते हुए सदा यही वरदान स्मृति में रहे कि मैं हीरो पार्टधारी हूँ तो हर कर्म विशेष होगा, हर सेकेण्ड, हर समय, हर संकल्प श्रेष्ठ होगा। ऐसे नहीं कह सकते कि यह तो सिर्फ 5 मिनट साधारण हुआ। संगमयुग के 5 मिनट भी बहुत महत्व वाले हैं। 5 मिनट 5 साल से भी ज्यादा हैं इसलिए हर समय इतना अटेन्शन रहे। सदा का राज्यभाग्य प्राप्त करना है तो अटेन्शन भी सदाकाल का हो।
स्लोगन:- जिनके संकल्प में दृढ़ता की शक्ति है, उनके लिए हर कार्य सम्भव है।

TODAY MURLI 29 JULY 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 29 July 2018

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29/07/18
Madhuban
Avyakt BapDada
Om Shanti
25/12/83

The days of the confluence age are days f or celebrating in the greatest pleasure of all.

Today, the greatest Father is giving congratulations for the greatest day to the greatest children of all. Baba is giving greetings for Christmas to all the children who are even sweeter than raisins (kismis). The greatest days are the days of the confluence age. Bad days have now ended and it is now the day of happiness of the confluence age,to be celebrated with enthusiasm. This is the day when the Seed of the tree tells the story of the kalpa tree. On this great day of the confluence age, sparkling, elevated Brahmin souls sparkle at the foundation of the kalpa tree and make the whole tree sparkle. The lucky and lovely stars make the tree extremely beautiful. The living sparkling stars are the decoration of the tree. Sparkling white and light angels make the tree sparkle. People decorate a Christmas tree for this day as a memorial of this. During this great day of the confluence age, of celebrating the festival with enthusiasm, you change night into day; you transform darkness into light. The Brahmin family meets on this great day and eats food for the soul, Brahma Bhojan, with a lot of love. This is why, as a memorial, families all get together and eat, drink and celebrate with pleasure. Out of the whole cycle, the day and the age to celebrate with pleasure is the confluence age, and you can celebrate with pleasure to your heart’s content, as much as you want, at this confluence age. The intoxication of the nectar of knowledge makes you become absorbed in love. People especially experience this spiritual intoxication on a great day. At the brahm-muhurat of the confluence age, at amrit vela, you opened your eyes to your elevated birth and what did you receive? How many gifts did you receive? You opened your eyes and you saw the old Baba. You saw the white Baba. You also saw the red in the white, did you not? Whom did you see? You saw the Father who brings peace. How many gifts did He give you? He gave you so many gifts that you will continue to be sustained by those gifts for birth after birth. You won’t have to buy anything. The biggest gift of all that He gave you was the bracelet of love, which is even more valuable than diamonds. He gave you the bracelet of God’s magic. With this, you can attain whatever you want, whenever you want, as soon as you have the thought and you invoke it. There is nothing lacking in the treasure store of Brahmins. All of you children received such a gift as soon as you opened your eyes. All of you have received it, have you not? Was anyone left out? This is the importance of the great day. The signs of the memorial of the first Brahmins have continued through to the last religion, because all of you elevated Brahmin souls are the foundation of the whole tree. You are the grandfathers and great-grandfathers of all souls. All of them are your branches. All of you very great Brahmins are the foundation of the tree. This is why, even today, souls of all religions celebrate in one form or another the memorial of you souls and the customs and systems of your confluence age. You are such worthy-of-worship souls from time immemorial. In comparison to the Supreme Soul, you are doubly worthy-of-worship. You are celebrating the days of pleasure whilst considering yourselves to be the greatest and most elevated of all, are you not? The days of celebration are so few. Bearing in mind the cycle, celebrate just the one great day a great deal. Dance in happiness! Eat Brahma Bhojan and sing songs of happiness. Do you have any other worries? What do carefree emperors do all day long? They celebrate in pleasure, do they not? Celebrate with pleasure of the mind. Don’t celebrate the pleasure of the limited day. Celebrate the unlimited day and the pleasure of remaining free from sorrow in an unlimited way. Do you understand? Why have you come to the Brahmin world? To celebrate in pleasure. Achcha.

Special congratulations to all the double-foreign children everywhere for celebrating in pleasure the greatest day of all. BapDada has especially come to give you the gift of a meeting. There are very few of you now and yet you have to sit far away. When expansion takes place, everything will be just for the sake of having a glimpse. At that time, there won’t be any chance of having a personal meeting. You will just have a glimpse. Receiving drishti will be changed into simply having a glimpse. The drishti that you receive at the end will be changed on the path of devotion and they will simply use the word “darshan” (glimpse). What is the special intoxication that double foreigners have? There is a song: The high walls of the world… There are the barriers of high walls, big oceans and countries of the world. So, you have come, having crossed the high barriers of countries, the barriers of religion, the barriers of knowledge, the barriers of beliefs and the barriers of customs and systems. Even the people from Bharat meet Baba. Even the people of Bharat have received the inheritance, but they are in the same country. They haven’t had to cross such big barriers. They have simply crossed the barrier of devotion. However, the double-foreign children have crossed many types of high barrier and this is why they have double intoxication. You have passed through the many types of curtains of the world. Therefore, double love and remembrance to the children who have passed through them. You have made that effort, but the Father’s love has made you forget the effort. Achcha.

To all the most elevated, worthy-of-worship souls, to all the greatest of all children who give light and might to everyone, to those who constantly celebrate in spiritual pleasure in the world of pleasure, to those who maintain enthusiasm and celebrate every day as a festival, to those who attain the unlimited gift of God, to the elevated sparkling stars of the kalpa tree, BapDada’s love, remembrance and namaste.

Meeting a U K group:

Do all of you consider yourselves to be long-lost and now-found ones? Baba selected you from all over with so much love and put you in the bouquet. By becoming part of the bouquet all of you have become spiritual roses. “Spiritual roses” mean those who give everlasting fragrance. Do you consider yourselves to be this? All of you have the intoxication of the Father loving you, do you not? Each of you would say that no one else is as loving to the Father as you are. Just as there is no one else as loving as the Father, so too, you children would also say the same because the Father has special love for each one of you according to your speciality. Although you are numberwise, all of you are especially loved. Only the Father and you know the value of you children; no one else can know it. All others consider you to be ordinary. However, you, whom the Father has made belong to Him, are a selected few out of millions and a handful out of that selected few. As soon as you belonged to the Father, you received all attainments. The Father gave all of you the keys to all treasures. He didn’t keep them for Himself. He has so many keys that He gave them to all of you. This master key is such that you can use it for any treasure and attain that treasure. You don’t have to make any effort. London is, in any case, the place where there’s a monarchy. You are not those who are going to become subjects. All of you are those who will move forward in service. Where there is attainment, you cannot stay without doing service. To do less service means you have less attainment. Those who are embodiments of attainment cannot stay without doing service. Look, all of you left this country and went abroad, yet the Father found you abroad and made you belong to Him. No matter how far away you ran, the Father still caught you. Achcha.

Meeting a group from Australia:

All of you are Mahavirs, are you not? “A Mahavir group  means those who bid farewell to Maya for all time. Have you celebrated such a ceremony? BapDada always says that Australia is the place of the brave, courageous ones. So, the residents of Australia are those who bid farewell to Maya for all time, because the Father is with you and Maya cannot come to you while you are in the Father’s company. The Father is always with you and so you have bidden farewell to Maya. Those who bade farewell are constant jewels of contentment. You are content with yourselves, you are content with service and you are content with your connections. You are content with everything. Such jewels of contentment are constantly seated on the heart throne. Those who are seated on the throne are always happy and intoxicated. BapDada is looking at the jewels of contentment, the Mahavir group, which is also a group of conquerors of Maya. All of you are, visibly, experienced souls. You are also servers. Just as London has a special part in the speciality of service, Australia too has a special part. BapDada gives the residents of Australia the certificate of those who are always ever ready for service and who are going to expand service. Achcha.

At the time of farewell:

All of you are still awake. There is always a jagran (staying awake through the night for special deities) taking place for all of you somewhere or other. Since your devotees stay awake for you, what is the big deal if you stay awake now? Everything begins at the confluence age. Whatever you do in knowledge, those people do in devotion. The foundation of devotion is also laid at the confluence age. Those are feelings and this is knowledge. All of you are going on service. It isn’t that you are going back home. To go means to bring back the proof of service. Don’t come back empty-handed. At least a bouquet is given as a present! So, bring a bouquet or a buttonhole. The question of how many you have prepared in a year also has to be added to the form. Don’t give a certificate a second time to those who have come empty-handed. In one year, at least prepare one person and bring him back with you. Achcha.

Avyakt Elevated Versions – Make the atmosphere powerful through your attitude

The fastest service of all is to spread vibrations through your attitude. Your attitude is even faster than the fastest rocket. An atmosphere can be transformed through your attitude. You can reach wherever you want and as many souls as you want with your attitude while sitting here. With your attitude you can transform your vision and the world. Simply let there be good wishes and pure feelings in your attitude for everyone. For world benefit, let your attitude, vision and stage always be unlimited. In your attitude, let there not be the slightest negative or wasteful feelings for anyone. It is a different matter to make a negative situation positive, but those who have a negative attitude themselves are not able to change the negative of others into positive.

At the beginning of establishment, they were not short of facilities, but they were all in a furnace of the unlimited attitude of disinterest. The 14 years of tapasya that they did was in an atmosphere of an attitude of unlimited disinterest. BapDada has now given many facilities, there is no shortage of facilities, but you have to have an attitude of disinterest while having everything. Without the atmosphere of an attitude of disinterest, souls cannot be happy, peaceful or free from distress. So, use all the necessary facilities, but as much as possible, use them with an attitude of disinterest from your heart, not while being influenced by the facilities. Now create an atmosphere of spiritual endeavour in all directions. According to the closeness of time, true tapasya and spiritual endeavour is now unlimited disinterest.

In the world, at present, on the one hand, there is the fire of corruption and on the other hand, there is a need for the powerful yoga of you children, that is, the need for the fire of love in the volcanic form. The volcanic fire will finish the fire of corruption and give co-operation to all souls. Let the fire of your deep love be volcanic, that is, let it be powerful yoga, let there be benevolent feelings in your attitude for all and then this fire of love will finish that fire. On the other side, it will give souls God’s message and the experience of the form of coolness. For this, underline even more the purity in your vision and attitude. However, the main foundation for this is to become embodiments of knowledge and power and to make your thoughts pure. Then, with your vibrations, attitude and pure feelings, the Maya of others will easily go away. If you get caught up in “Why?” and “What?” then, neither will your Maya go nor will the Maya of others go away.

Now, you children have to carry out two types of tasks. One is to make souls worthy (capable) and yogi and secondly, you have to prepare the field. For this, along with words, you especially need to transform your attitude at a fast speed because the atmosphere will be created through your attitude and the atmosphere will then influence matter – for only then will it be ready. Be engaged in serving with your words and your attitude simultaneously. Experience lightness in your words, deeds and attitude. Let it not be that you say that you are light but that others do not understand you or recognise you. If they do not recognise you, then, with your own will power, you can give your recognition to them. Become liked by everyone at least 95%. Let your actions and attitude transform them. For this, you simply need to imbibe the power of tolerance. If you have elevated wishes and elevated feelings in your attitude, then with a second’s thought and drishti, and with a smile from your heart, you can give anyone a lot in just a second. Give a gift to anyone who comes, let them not go away empty-handed.

See, listen to and think about every person and every situation with a positive attitude and there will never be any force or anger. You are master oceans of love and so there cannot be any other intentions – even slightly – in your eyes, features, attitude and drishti. So, no matter what happens, even if the whole world gets angry with you, you master oceans of love, do not be concerned about the world. Become carefree emperors and a powerful atmosphere will then be created through your elevated attitude. Nowadays, with the facilities of science, they are able to transform rough material into something very beautiful. So, let your elevated attitude transform the negative, that is, the wastefulinto positive. Let your mind and intellect become such that nothing negative can touchthem and transformation happens in a second. Achcha.

Blessing: May you be a world benefactor who does everything accurately by setting your daily timetable and being in the company of the Father.
Important people in the world have a set daily timetable. Any task is accurate when the timetable is set. By setting everything, your time and energyare saved and one person can carry out 10 tasks. So, in order to achieve success in every task, you world benefactor, responsible souls have to setyour timetables and always remain combined with the Father. The Father with 1000 arms is with you and so, instead of one task, you can accuratelycarry out 1000 tasks.
Slogan: To have pure thoughts for all souls is to be an image that grants blessings.

 

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 29 JULY 2018 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 29 July 2018

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29-07-18
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 25-12-83 मधुबन

संगमयुग के दिन बड़े ते बड़े मौज मनाने के दिन

आज बड़े ते बड़ा बाप बड़े ते बड़े बच्चों को बड़े दिन की बधाई दे रहे हैं। सभी किसमिस से भी मीठे बच्चों को क्रिसमिस की बधाई दे रहे हैं। बड़े ते बड़े दिन संगमयुग के दिन हैं। बुरे दिन खत्म हो खुशी के, उत्साह में रहने के उत्सव का दिन संगमयुग है। जिस दिन वृक्षपति कल्प-वृक्ष की कहानी सुनाते हैं। इसी संगमयुग के बड़े दिन पर कल्प वृक्ष के फाउन्डेशन में चमकती हुई श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्माएं जगमगाती हुई सारे वृक्ष को जगमगाती हैं। लकी सितारे, लवली सितारे, वृक्ष को अति सुन्दर बना देते हैं। वृक्ष के डेकोरशन चैतन्य जगमगाते सितारे हैं। वृक्ष में व्हाइट और लाइट फरिश्ते चमकते हुए वृक्ष को चमकाते हैं। इसी का यादगार आज के दिन क्रिसमस ट्री के रूप में सजाते हैं। संगम के बड़े दिन में उत्साह के उत्सव के दिन में, रात को दिन बना देते हैं। अंधकार को रोशनी में बदल लेते हैं। ब्राह्मण परिवार संगम के बड़े दिन पर मिलकर आत्मा का भोजन, ब्रह्मा भोजन प्यार से खाते हैं इसलिए यादगार रूप में भी सपरिवार मिलकर खाते-पीते मौज मनाते हैं। सारे कल्प में मौज मनाने का दिन वा मौजों का युग संगमयुग है, जिस संगमयुग में जितना चाहें दिल भरकर मौज मना सकते हैं। ज्ञान अमृत का नशा लवलीन बना देता है। इस रूहानी नशे का अनुभव विशेष बड़े दिन पर करते हैं। संगमयुग के ब्रह्म-महूर्त में अमृतवेले में श्रेष्ठ जन्म की आंख खोली और क्या मिला! कितनी सौगातें मिली? आंख खोली बूढ़ा बाबा देखा। सफेद-सफेद बाबा देखा। सफेद में लाल देखा ना! कौन देखा? शान्ति कर्ता बाप देखा। कितनी सौगातें दी? इतनी सौगातें दी जो जन्म-जन्म उन सौगातों से ही पलते रहेंगे। कुछ खरीद नहीं करना पड़ेगा। सबसे बड़ी से बड़ी सौगात हीरे से भी मूल्यवान स्नेह का कंगन, ईश्वरीय जादू का कंगन दिया। जिस द्वारा जो चाहो जब चाहो संकल्प से आह्वान किया और प्राप्त हुआ। अप्राप्त कोई वस्तु नहीं ब्राह्मणों के खज़ाने में। ऐसी सौगात ऑख खोलते ही सभी बच्चों को मिली। सबको मिली है ना। कोई रह तो नहीं गया ना। यह है बड़े दिन का महत्व। फर्स्ट ब्राह्मण आत्माओं का यादगार, लास्ट धर्म तक भी निशानी अब तक चल रही है क्योंकि आप ब्राह्मण श्रेष्ठ आत्माएं सारे वृक्ष के फाउन्डेशन हो। सर्व आत्माओं के दादे परदादे तो आप ही हो ना। आपकी यह शाखायें हैं। वृक्ष का फाउन्डेशन आप बड़े ते बड़े ब्राह्मण हो इसलिए हर धर्म की आत्मायें किसी न किसी रूप में आप आत्माओं को और आपके संगमयुगी रीति रसम को अभी तक भी मनाते रहते हैं। ऐसी परमपरा की पूज्य आत्माएं हो। परम आत्मा से भी डबल पूज्य आप हो। ऐसे स्वयं को बड़े ते बड़े, श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ समझते हुए मौजों के दिन मना रहे हो ना! मनाने के दिन कितने थोड़े से हैं। कल्प के हिसाब से एक ही बड़ा दिन खूब मनाओ। खुशी में नाचो। ब्रह्मा भोजन खाओ और खुशी के गीत गाओ। और कोई फिकर है क्या! बेफिकर बादशाह सारा दिन क्या करते हैं? मौज मनाते हैं ना। मन की मौज मनाओ। हद के दिन की मौज नहीं मनाना। बेहद के दिन की, बेहद के बेगम की मौज मनाओ। समझा! ब्राह्मण संसार में आये हो, किसलिए? मौज मनाने के लिए। अच्छा।

आज विशेष चारों ओर के डबल विदेशी बच्चों को मौजों के दिन बड़े ते बड़े दिन मनाने की विशेष मुबारक हो। बापदादा विशेष मिलन की सौगात देने के लिए आये हैं। अभी तो बहुत थोड़े हो फिर भी इतना दूर बैठना पड़ता है। जब वृद्धि को प्राप्त होंगे तो फिर दर्शन मात्र रह जायेंगे। फिर मिलने का चान्स नहीं होगा। सिर्फ दर्शन करने का। दृष्टि, दर्शन में बदल जायेगी। अन्त में जो सिर्फ दृष्टि मिलेगी वह भक्ति में दर्शन शब्द में बदल जायेगी। डबल विदेशियों को विशेष नशा कौन सा है? एक गीत है ना – ऊंची-ऊंची दीवारें, ऊंचे-ऊंचे समुद्र, दुनिया के देशों की दीवारें तो हैं। तो ऊंचे-ऊंचे देशों की दीवारें, धर्म की दीवारें, नॉलेज की दीवारें, मान्यताओं की दीवारें, रसम-रिवाज की दीवारें, सब पार करते आ गये हो ना। मिलते तो भारतवासी भी हैं, भारतवासियों को भी वर्सा मिला लेकिन देश का देश में मिला। इतनी ऊंची दीवारें पार नहीं करनी पड़ी। सिर्फ भक्ति की दीवार क्रास की। लेकिन डबल विदेशी बच्चों ने अनेक प्रकार की ऊंची दीवारें पार की, इसलिए डबल नशा है। अनेक प्रकार के पर्दों की दुनिया को पार किया इसलिए पार करने वाले बच्चों को डबल याद-प्यार। मेहनत तो की है ना। लेकिन बाप की मुहब्बत ने मेहनत भुला दी। अच्छा।

सर्वश्रेष्ठ पूज्य आत्माओं को, सर्व को लाइट माइट देने वाले बड़े ते बड़े बच्चों को, मौजों के संसार में सदा रूहानी मौज मनाने वाले, हर दिन उत्सव समझते उत्साह में रहने वाले, बेहद की ईश्वरीय सौगात प्राप्त करने वाले, ऐसे कल्पवृक्ष के चमकते हुए, जगमगाते हुए श्रेष्ठ सितारों को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

विदेशी भाई-बहनों से पर्सनल मुलाकात

1) सभी अपने को सिकीलधे समझते हो ना? कितने सिक व प्रेम से बाप ने कहाँ-कहाँ से चुनकर एक गुलदस्ते में डाला है। गुलदस्ते में आकर सभी रूहे गुलाब बन गये। रूहे गुलाब अर्थात् अविनाशी खुशबू देने वाले। ऐसे अपने को अनुभव करते हो? हरेक को यही नशा है ना कि हम बाप को प्रिय हैं! हरेक कहेगा कि मेरे जैसा प्यारा बाप को और कोई नहीं है। जैसे बाप जैसा प्रिय और कोई नहीं। वैसे बच्चे भी कहेंगे क्योंकि हरेक की विशेषता प्रमाण बाप को सभी से विशेष स्नेह है। नम्बरवार होते हुए भी सभी विशेष स्नेही हैं। बच्चों के मूल्य को सिर्फ बाप जाने और आप जानों और कोई नहीं जान सकता। दूसरे तो आप लोगों को साधारण समझते हैं, लेकिन कोटों में कोई और कोई में भी कोई आप हो, जिसको बाप ने अपना बना लिया। बाप का बनते ही सर्व प्राप्तियाँ हो गई। खजानों की चाबी बाप ने आप सबको दे दी। अपने पास नहीं रखी। इतनी चाबियाँ हैं जो सबको दी है। यह मास्टर की (चाबी) ऐसी है जो जिस खजाने को लगाना चाहो लगाओ और खजाना प्राप्त करो। मेहनत नहीं करनी पड़ती। वैसे भी लण्डन राज्य का स्थान है ना। प्रजा बनने वाले नहीं। सभी सेवा में आगे बढ़ने वाले। जहाँ प्राप्ति है, वहाँ सेवा के सिवाए रह नहीं सकते। सेवा कम अर्थात् प्राप्ति कम। प्राप्ति स्वरूप बिना सेवा के रह नहीं सकते। देखो, आप लोग कितना भी देश छोड़कर विदेश चले गये, तो भी बाप ने विदेश से भी ढूँढकर अपना बना लया। कितना भी भागे फिर भी बाप ने तो पकड़ लिया ना। अच्छा।

आस्ट्रेलिया ग्रुप से:- सभी महावीर हो ना। महावीर ग्रुप अर्थात् सदा के लिए माया को विदाई देने वाले। ऐसी सेरीमनी मनाई है? आस्ट्रेलिया को सदा बापदादा बहादुरों का स्थान कहते हैं। तो आस्ट्रेलिया निवासी सदा ही माया को विदाई देने वाले क्योंकि जब बाप साथ है तो बाप के साथ होते माया आ नहीं सकती। सदा बाप साथ है तो विदाई हो गई ना। विदाई देने वाले सदा सन्तुष्टमणि। स्वयं भी सन्तुष्ट, सेवा से भी सन्तुष्ट, सम्पर्क में भी सन्तुष्ट। सबमें सन्तुष्ट। ऐसी सन्तुष्ट मणियाँ सदा दिलतख्तनशीन हैं। तो जो तख्तनशीन होगा वह सदा खुशी और नशे में रहेगा। बापदादा सन्तुष्ट मणियाँ, महावीर, मायाजीत ग्रुप देख रहे हैं। सभी अनुभवी आत्मायें दिखाई दे रही हैं। सेवाधारी भी हैं। जैसे सेवा की विशेषता में लण्डन का विशेष पार्ट है वैसे आस्ट्रेलिया का भी विशेष पार्ट है। बापदादा आस्ट्रेलिया निवासियों को सदा सेवा में एवररेडी और सदा सेवा में वृद्धि को पाने वाले, ऐसा सर्टीफिकेट देते हैं। अच्छा-

विदाई के समय:- अभी आप सब जाग रहे हो, आप सभी के लिए कहाँ न कहाँ जागरण होता रहता है। जब आपके भक्त जागरण करते हैं तो आपने किया तो क्या बड़ी बात है। सभी शुरू संगम से ही होता है। जो आप ज्ञान से करते उसे वह भक्ति से करते हैं। भक्ति का फाउन्डेशन भी संगम पर ही पड़ता है। वह भावना और यह ज्ञान। सभी सेवा पर जा रहे हो, घर में जा रहे हो, नहीं, जाना अर्थात् सेवा का सबूत फिर से ले आना। खाली हाथ नहीं आना। कम से कम गुलदस्ता तो भेंट किया जाता है। गुलदस्ता लाओ या बटन। फार्म में यह भी क्वेश्चन एड करना कि एक साल में कितने तैयार किये! जो खाली आये उसको दूसरी बार सर्टीफिकेट नहीं देना। एक साल में एक तो तैयार करके साथ में लेकर आओ। अच्छा।

अव्यक्त महावाक्य – वृत्ति द्वारा वायुमण्डल को शक्तिशाली बनाओ

सबसे तीव्रगति की सेवा है – ”वृत्ति द्वारा वायब्रेशन फैलाना”। वृत्ति बहुत तीव्र राकेट से भी तेज है। वृत्ति द्वारा वायुमण्डल को परिवर्तन कर सकते हो। जहाँ चाहो, जितनी आत्माओं के प्रति चाहो वृत्ति द्वारा यहाँ बैठे-बैठे पहुंच सकते हो। वृत्ति द्वारा दृष्टि और सृष्टि परिवर्तन कर सकते हो। सिर्फ वृत्ति में सर्व के प्रति शुभ भावना, शुभ कामना हो। विश्व कल्याण करने के लिए आपकी वृत्ति, दृष्टि और स्थिति सदा बेहद की हो। वृत्ति में ज़रा भी किसी आत्मा के प्रति निगेटिव या व्यर्थ भावना नहीं हो। निगेटिव बात को परिवर्तन कराना, वह अलग चीज़ है। लेकिन जो स्वयं निगेटिव वृत्ति वाला होगा वह दूसरे के निगेटिव को पॉजेटिव में चेंज नहीं कर सकता।

जैसे स्थापना के आदि में साधन कम नहीं थे, लेकिन बेहद के वैराग्य वृत्ति की भट्ठी में पड़े हुए थे। यह 14 वर्ष जो तपस्या की, वह बेहद के वैराग्य वृत्ति का वायुमण्डल था। बापदादा ने अभी साधन बहुत दिये हैं, साधनों की कोई कमी नहीं है लेकिन होते हुए बेहद का वैराग्य हो। आपके वैराग्य वृत्ति के वायुमण्डल के बिना आत्मायें सुखी, शान्त बन नहीं सकती, परेशानी से छूट नहीं सकती, तो सब आवश्यक साधन यूज़ करो लेकिन जितना हो सकता है उतना दिल के वैराग्य वृत्ति से, साधनों के वशीभूत होकर नहीं। अभी साधना का वायुमण्डल चारों ओर बनाओ। समय समीप के प्रमाण अभी सच्ची तपस्या वा साधना है ही ”बेहद का वैराग्य।”

वर्तमान समय विश्व में एक तरफ भ्रष्टाचार, अत्याचार की अग्नि है, दूसरे तरफ आप बच्चों का पावरफुल योग अर्थात् लगन की अग्नि ज्वाला रूप में आवश्यक है। यह ज्वाला रूप इस भ्रष्टाचार, अत्याचार के अग्नि को समाप्त कर सर्व आत्माओं को सहयोग देगा। आपकी लगन ज्वाला रूप की हो अर्थात् पावरफुल योग हो, वृत्ति में सबके कल्याण की भावना हो, तो यह लगन की अग्नि, उस अग्नि को समाप्त करेगी और दूसरे तरफ आत्माओं को परमात्म सन्देश की, शीतल स्वरूप की अनुभूति करायेगी। इसके लिए अभी दृष्टि-वृत्ति में पवित्रता को और भी अण्डरलाइन करो लेकिन मूल फाउण्डेशन – अपने संकल्प को शुद्ध बनाओ, ज्ञान स्वरूप बनाओ, शक्ति स्वरूप बनाओ। तो आपके वायब्रेशन से, वृत्ति से, शुभ भावना से दूसरे की माया सहज भाग जायेगी। अगर क्यों, क्या में जायेंगे, तो न आपकी माया जायेगी न दूसरे की जायेगी।

अभी आप बच्चों को दो प्रकार के कार्य करने हैं – एक तो आत्माओं को योग्य और योगी बनाना है, दूसरा धरणी को भी तैयार करना है। इसके लिए विशेष वाणी के साथ-साथ वृत्ति को और तीव्र गति देनी पड़ेगी क्योंकि वृत्ति से वायुमण्डल बनेगा और वायुमण्डल का प्रभाव प्रकृति पर पड़ेगा, तब तैयार होंगे। वाणी और वृत्ति दोनों साथ-साथ सेवा में लगे रहें। आपके बोल, कर्म और वृत्ति से हल्केपन का अनुभव हो। ऐसे नहीं, मैं तो हल्का हूँ लेकिन दूसरे मेरे को नहीं समझते, पहचानते नहीं। अगर नहीं पहचानते तो आप अपने विल पॉवर से उन्हों को भी पहचान दो। 95 परसेन्ट सबके दिलपसन्द बनो। आपके कर्म, वृत्ति उसको परिवर्तन करें। इसमें सिर्फ सहनशक्ति को धारण करने की आवश्यकता है। अगर आपकी वृत्ति में श्रेष्ठ भावना, श्रेष्ठ कामना है तो सेकण्ड के संकल्प से, दृष्टि से अपने दिल के मुस्कराहट से सेकण्ड में भी किसी को बहुत कुछ दे सकते हो। जो भी आवे उसको गिफ्ट दो, खाली हाथ नहीं जाये।

हर व्यक्ति को, बात को पॉजिटिव वृत्ति से देखो, सुनो या सोचो तो कभी जोश या क्रोध नहीं आयेगा। आप मास्टर स्नेह के सागर हो तो आपके नयन, चैन, वृत्ति, दृष्टि में ज़रा भी और कोई भाव नहीं आ सकता, इसलिए चाहे कुछ भी हो जाये, सारी दुनिया क्यों नहीं आप पर क्रोध करे लेकिन मास्टर स्नेह के सागर दुनिया की परवाह नहीं करो। बेपरवाह बादशाह बनो, तब आपकी श्रेष्ठ वृत्तियों से शक्तिशाली वायुमण्डल बनेगा। जैसे आजकल साइन्स के साधनों द्वारा ऱफ माल को भी बहुत सुन्दर रूप में बदल देते हैं तो आपकी श्रेष्ठ वृत्ति निगेटिव अथवा व्यर्थ को पॉजिटिव में बदल दे। आपका मन और बुद्धि ऐसा बन जाये जो निगेटिव टच नहीं करे, सेकण्ड में परिवर्तन हो जाये। अच्छा।

वरदान:- दिनचर्या की सेटिंग और बाप के साथ द्वारा हर कार्य एक्यूरेट करने वाले विश्व कल्याणकारी भव 
दुनिया में जो बड़े आदमी होते हैं उनकी दिनचर्या सेट होती है। कोई भी कार्य एक्यूरेट तब होता है जब दिनचर्या की सेटिंग हो। सेटिंग से समय, एनर्जी सब बच जाते हैं, एक व्यक्ति 10 कार्य कर सकता है। तो आप विश्व कल्याणकारी जिम्मेवार आत्मायें, हर कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए दिनचर्या को सेट करो और बाप के साथ सदा कम्बाइन्ड होकर रहो। हजार भुजाओं वाला बाप आपके साथ है तो एक कार्य के बजाए हजार कार्य एक्यूरेट कर सकते हो।
स्लोगन:- सर्व आत्माओं प्रति शुद्ध संकल्प करना ही वरदानी मूर्त बनना है।

TODAY MURLI 29 July 2017 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 29 July 2017

Read Murli in Hindi :- Click Here

Read Bk Murli 28 July 2017 :- Click Here

29/07/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, don’t spend your invaluable time in wasteful matters. Become prosperous by having remembrance of the Father.
Question: What advice do both Bap and Dada give the children with humility for their benefit?
Answer: Children, always be aware that Shiv Baba is teaching you. Although Brahma Baba also teaches you, you only benefit by having remembrance of Shiv Baba. That is why this Dada is egoless and says: I do not teach you; only the one Father teaches you, so remember Him alone. Only by remembering Him, not me, will you become conquerors of sinful actions and your sins be absolved.

Om shanti. You children are now sitting in front of the Father. It is definitely in the intellects of you children that the Purifier, the Supreme Father, the Supreme Soul, the Ocean of Knowledge, is teaching you through the body of Brahma. The intellect will first go to your land of peace and then come down here. Shiv Baba has come into the body of Brahma in order to teach you Raja Yoga. The intellects of students are aware who is teaching them. When they go to school,they are aware that such and such a teacher is teaching them; they are aware of their names and they also see them with their eyes. There are various spiritual gatherings that take place. There, they say that a particular mahatma (great soul) is relating such and such a scripture. They relate various scriptures. You have been listening to them for birth after birth. Now, while sitting here, you remember Shiv Baba. You understand that your Baba, the Purifier, is Shiva. He now comes and teaches you through Brahma. This Brahma is teaching you as well. If Brahma Kumars and Kumaris can teach you, can Brahma too not teach you? However, you must have the consciousness that Shiv Baba is teaching you, not Brahma. There is benefit for you in this. This is known as the stage of humility. Bap and Dada are both egoless. This one, himself, says: Although I teach you, have the consciousness that Shiv Baba is teaching you. The more you remember Shiv Baba, the more you will become conquerors of sinful actions. Always think that Shiv Baba, the Purifier, the Ocean of Knowledge, is teaching you. As much as possible, do not forget Shiv Baba. You are to claim the inheritance from Him. Shiv Baba says: Constantly remember Me. He also tells the Brahma soul: You have to come to Me. While sitting or moving, make effort to stay in remembrance. There is a great deal of income in this, and you will also have good health. Don’t ever waste timeHear no evil, speak no evil, see no evil. Only speak of things of knowledge and yoga; do not speak of anything useless. If there is no knowledge, there is definitely ignorance. They will continue to gossip, but you must never listen to such things. If anyone speaks about wasteful matters to you, understand that that one is your enemy. Time is wasted by listening to wasteful matters. The Father says: Don’t listen to such wasteful things. Some will defame others, and some will say wrong things about others. This is why you are told: Neither listen to nor speak of such things. Those who do not have knowledge speak in that way and cause damage. This is why it is explained again and again: Remain busy in service. The more you explain these pictures to others, the more knowledge you will imbibe. While sitting here, look at these pictures and have the thought: This is Shiv Baba and this is Dada; we receive the inheritance through this one and this impure world is then destroyed. You can entertain yourself with such thoughts. This is better than gossiping, otherwise you become sinful souls. The Father says: Children, do not become sinful souls. Those who listen to the news of the world and who relate such things as “So and so is like this”, or, “They do this”, waste time needlessly. You are becoming very prosperous. You are becoming the masters of the world. Definitely, Bharat was very prosperous. It has now become ruined. You are now becoming prosperous through the Father. It is very easy to remember the Father and the world cycle. No one knows about this confluence age. Everyone in the iron age is impure, whereas everyone in the golden age is pure. The Father says: I come at the confluence of every cycle in order to purify the impure ones. There are also sinners such as Ajamil. This is the world of sin, the world without comfort. The world of pure, charitable souls is the world of comfort. No one else can explain these things. Where comfort can be attained is not in the intellect of anyone. You explain that there is happiness in the land of happiness. This is the world of sorrow and, even though people have built huge palaces etc., all of those paths make you impure. Otherwise, why would Bharat be in such a state of degradation? Only the one Father brings about the stage of ascent; all others make you fall. This has to be understood clearly; there is no question of blind faith. If a teacher says, “I teach you to become a BA ,  it cannot be a lie. The unlimited Father says: I teach you easy Raja Yoga and make you into the kings of kings. I make you the kings of heaven. The contrast between the kings of heaven and the kings of hell is like that of day and night. Those who become kings and queens in hell do so by giving donations and performing charity; they receive temporary happiness. The kings and queens of heaven are created by them studying. You also understand what Baba’s plan is: that of changing the entire world,the land of sorrow into the land of happiness and peace. You know that Bharat was the land of happiness and that, at that time, all other souls were in the land of peace. Everyone is now in the land of sorrow, but later we will go to the land of peace and then to the land of happiness. Those who study Raja Yoga are the ones who go to the land of happiness while all others will settle their karmic accounts and return to the land of peace. No one in the world knows what the land of peace and the land of happiness are. This Baba says: I too did not know. The one who was himself the master had forgotten, and so what would anyone else know? According to the drama, all have to descend. It is now time to ascend once again. The Father says: I have come to take everyone to the land of peace and the land of happiness. Many will come to you. They will say: we want peace of mind! No one can talk about the land of happiness. Sannyasis belong to the path of isolation, so they can never show the path to happiness. Just as the Father has mercy in taking these souls to the land of peace and the land of happiness, in the same way, you children should feel that you have to give the Father’s introduction. The people of Bharat should definitely receive the inheritance from the Father. Why are we in hell? We were the ones in heaven and we are now in hell. However, people do not understand these things at all. Maya has locked their intellects so completely that they are not even able to understand such an easy thing. Since God is the Creator of heaven, surely we should be the masters of heaven. We are no longer that because it is the kingdom of Ravan. This kingdom of Ravan is now about to be destroyed, and the same Mahabharat War is standing just ahead for this. It is very easy when this sits in someone’s intellect, but, because it does not sit in their intellects, they keep gossiping among themselves and wasting time. You must not allow yourself to listen to such things. You must remain busy with your studies, for only then will you claim a high status. Good students in a school study very well. During the days of their examinations, they especially go into solitude to study in order not to fail. Those who fail continue to stumble. The Father says: As much as possible, stay in remembrance of the one Father. As soon as a girl becomes engaged to her future bridegroom, that becomes imprinted. Achcha, if, today, a woman gets married and, tomorrow, her husband dies, she continues to remember him for the rest of her life. However, those husbands make you impure. The Father says: I make you into the masters of heaven, so how much should you remember such a Father? Maya will try very hard to break your yoga, but you must be very courageous. Your thoughts will bring many storms that would not have come even when you were in ignorance. Herbalists say that all the sickness will emerge but you must not be afraid; you must not be afraid and start taking some other medicine; no. Baba also says: Do not be afraid. Many storms will come in the mind, but do not perform sinful actions through the sense organs. Speak knowledge to one another and bring benefit to one another. The Father explains: You must remain intoxicated. Open a Gita pathshala in your home. Charity begins at home. Let your children become the masters of heaven. A man takes a wife and creates children with her in order to give them happiness. You also understand that you are earning an income for the future, so why not enable your wife and children to do the same? Tell them again and again: By all means, continue with your business etc., but simply continue to remember the Father. This practice should be instilled to such an extent that, at the end, at the time of destruction, only one Baba is remembered. The Father says: All of you are now in your stage of retirement. Everyone has to return to Me. I have come to take you back. Your wings are broken. Sannyasis cannot remember the Father; they remember the brahm element. Yes, those who belong to the deity religion will accept all of this and begin to remember Shiv Baba. You cannot become a deity without first becoming a Brahmin. This is the somersault of the different castes. You belonged to the shudra clan, but you have now become Brahmins through Brahma and are claiming the inheritance from the Grandfather. You have changed from shudras into Brahmins, and you will later become the masters of the new world. Brahmins are the most elevated; Brahmins are the topknot. We play the game of somersaulting. We receive this knowledge of 84 births in a second. They go on pilgrimages while playing the game of somersaulting. They give so much importance to that; they go with such feelings.

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However, nowadays, they drink alcohol etc., and, even when they go on a pilgrimage, they hide a bottle in their pocket out of habit. Baba has experienced all of those things. Baba has taken a completely experienced chariot. The Father says to this one: You have adopted many gurus and attended many spiritual gatherings, but now forget everything; now listen to what I am telling you. God spoke to Arjuna, but, this is in fact the chariot. Shiv Baba is the Charioteer in the chariot. All of you are Arjuna. However, there is no question of horses and chariots etc., nor is there any question of an army. That is the path of devotion and this is the path of knowledge. The department of devotion is completely separate. Only the one Father gives knowledge; all others are devotees. Souls of all human beings of the world say: O God the Father! Souls understand that He is the Father of souls. They know that they have a lokik father, so why do they not remember H eavenlyGod, the Father? Why do they only remember Him at a time of sorrow? The Father says: I give so much happiness and peace that I am the one who is remembered at a time of sorrow. So, you should talk about the things of knowledge among yourselves. You must also go to your friends, relatives and officers. Stay in connection with everyone. You must give them the donation of the jewels of knowledge with great tact. You should also go to weddings etc. for the sake of service. You are the incognito, non-violent army. You cannot commit any kind of violence; you must not cause sorrow. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love and remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. In order to claim a high status, remain busy with your studies. Don’t listen to wasteful things. Do not waste your time.
  2. Give knowledge and bring benefit to one another. Do not perform any sinful actions with the sense organs under the influence of storms in the mind.
Blessing: May you become supreme and elevated and finish ordinariness by considering yourself to be a special actor.
Just as the Father is the Supreme Soul, similarly, children who play special part s are also supreme, that is, they are elevated in every aspect. You simply have to play your part on the stage as a special actor while walking and moving around and while eating and drinking. Constantly pay attention to your action, that is, your part Special actors can never be careless. If a hero actor were to perform an ordinary act, everyone would laugh at him. So, let your every step, every thought and every moment be special, not ordinary.
Slogan: Make your attitude powerful and service will automatically increase.

*** Om Shanti ***

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Brahma kumaris murli 29 July 2017 : Daily Murli (Hindi)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 29 July 2017

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29/07/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – वाह्यात (व्यर्थ) बातों में तुम्हें अपना अमूल्य समय बरबाद नहीं करना है, बाप की याद से आबाद होना है”
प्रश्नः- बापदादा दोनों ही निरंहकारी बन बच्चों के कल्याण के लिए कौन सी राय देते हैं?
उत्तर:- बच्चे, सदैव समझो हमें शिवबाबा पढ़ाते हैं। भल ब्रह्मा बाबा भी तुम्हें पढ़ा सकते हैं लेकिन शिवबाबा को याद करने में ही तुम्हारा कल्याण है इसलिए यह दादा निरहंकारी बन कहते हैं मैं तुम्हें नहीं पढ़ाता हूँ। पढ़ाने वाला एक बाप है, उसे ही याद करो। उनकी याद से ही तुम विकर्माजीत बनेंगे, विकर्म विनाश होंगे। मेरी याद से नहीं।

ओम् शान्ति। अब बच्चे सामने बैठे हैं, बच्चों की बुद्धि में जरूर होगा कि पतित-पावन परमपिता परमात्मा जो ज्ञान का सागर है वह इस ब्रह्मा तन द्वारा हमको पढ़ा रहे हैं। बुद्धि तो पहले जायेगी अपने शान्तिधाम में, फिर आयेगी यहाँ। शिवबाबा आये हैं इस ब्रह्मा तन में हमको राजयोग सिखाने। स्टूडेन्ट की बुद्धि में यह होगा ना कि हमको कौन पढ़ाते हैं। स्कूल में जायेंगे तो समझेंगे ना कि फलाना टीचर हमको पढ़ाते हैं। उनका नाम भी ख्याल में रहता है। ऑखों से देखते भी हैं। सतसंग भी किसम-किसम के होते हैं। वहाँ कहेंगे फलाना महात्मा हमको फलाना शास्त्र सुनाते हैं। भिन्न-भिन्न अनेकानेक शास्त्र सुनाते हैं। जन्म-जन्मान्तर ऐसे सुनते ही आये हो। अभी तुम यहाँ बैठे-बैठे याद करते हो शिवबाबा को। तुम समझते हो हमारा पतित-पावन बाबा वह शिव है। वही आकर ब्रह्मा द्वारा हमको पढ़ाते हैं। यह ब्रह्मा भी पढ़ाते हैं। जब ब्रह्माकुमार कुमारियाँ भी पढ़ा सकते हैं, तो क्या ब्रह्मा नहीं पढ़ा सकते हैं! फिर भी तुम ऐसे ही समझो कि हमको शिवबाबा ही पढ़ाते हैं, न कि ब्रह्मा। इसमें तुम्हारा बहुत फायदा होगा। इसको ही निरहंकारीपना कहा जाता है। बाप और दादा दोनों ही निरंहकारी हैं। यह खुद कहते हैं भल मैं भी पढ़ाता हूँ परन्तु समझो कि शिवबाबा पढ़ाते हैं। जितना शिवबाबा को याद करेंगे उतना विकर्माजीत बनते जायेंगे। हमेशा समझो कि शिवबाबा पतित-पावन ज्ञान का सागर हमको पढ़ाते हैं। जितना हो सके शिवबाबा को भूलना नहीं है। वर्सा भी उनसे ही पाना है। शिवबाबा कहते हैं निरन्तर मुझे याद करो। ब्रह्मा की आत्मा को भी कहते हैं तुमको मेरे पास आना है। उठते बैठते मेरे को याद करने का पुरुषार्थ करो, इसमें कमाई बहुत है। हेल्थ भी बहुत अच्छी मिलेगी। कभी भी टाइम वेस्ट नहीं करो। हियर नो ईविल, टॉक नो ईविल….. सिवाए ज्ञान और योग के कोई भी वाह्यात बातें नहीं करनी है। जिसमें ज्ञान कम है तो जरूर अज्ञान ही होगा। झरमुई झगमुई करते रहेंगे। ऐसी बातें कभी नहीं सुनना। जब ऐसे देखो कि वह वाह्यात बातें सुनाते हैं तो समझो यह हमारा दुश्मन है। फालतू बातें सुनाकर टाइम वेस्ट करते हैं। बाप कहते हैं ऐसी फालतू बातें नहीं सुनो। कोई की ग्लानी करेंगे, कोई के लिए कुछ बोलेंगे। कहेंगे ऐसी बातें कभी नहीं सुनना, न कभी सुनाना। जिसमें ज्ञान नहीं है वही ऐसी बातें सुनाकर और ही नुकसान करते रहेंगे इसलिए बार-बार समझाया जाता है कि सर्विस में तत्पर रहो। इन चित्रों पर जितना एक दो को समझायेंगे उतना धारणा भी होगी। यहाँ बैठ चित्र देखो – यह ख्याल करो, यह शिवबाबा है, यह दादा है। इन द्वारा हमको वर्सा मिलता है। फिर इस पतित दुनिया का विनाश हो जायेगा। ऐसी-ऐसी बातें करते अपने को भी बहला सकते हो। वह अच्छा होगा। झरमुई झगमुई की तो पाप आत्मा बन जायेंगे। बाप कहते हैं बच्चे पाप आत्मा नहीं बनना। दुनिया का समाचार, फलानी ऐसी है, उसने यह किया, ऐसी बातें जो सुनते और सुनाते हैं वह मुफ्त समय बरबाद करते हैं। तुम तो बहुत आबाद हो रहे हो। विश्व के मालिक बन रहे हो। बरोबर भारत आबाद था। अब बरबाद है। बाप द्वारा आबाद हो रहे हो। बाप और सृष्टि चक्र को याद करना यह तो बड़ा ही सहज है। इस संगमयुग का कोई को पता नहीं है। कलियुग में सब पतित हैं, सतयुग में सब पावन थे। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प के संगमयुग पर आता हूँ, पतितों को पावन बनाने। अजामिल जैसे पापी भी हैं। यह है ही पाप की दुनिया, इसमें कोई चैन नहीं है। वह पुण्य आत्माओं की चैन पाने की दुनिया है। यह बातें कोई समझा न सके। किसी की भी बुद्धि में नहीं है कि चैन कहाँ मिलता है। यह तुम समझाते हो कि सुखधाम में सुख मिलता है। यह है ही दु:खधाम। भल बड़े-बड़े महल बनाकर बैठे हो परन्तु रास्ता सारा पतित बनाने का ही है। नहीं तो भारत की इतनी उतरती कला क्यों होती। चढ़ती कला करने वाला एक ही बाप है। बाकी सब गिराने वाले हैं, इसमें बहुत समझ की बात है। अन्धश्रधा की कोई बात नहीं है। टीचर कहते तुमको बी.ए. पढ़ाते हैं, तो झूठ थोड़ेही हो सकता। यह बेहद का बाप भी कहते हैं मैं तुमको सहज राजयोग सिखाकर राजाओं का राजा बनाता हूँ। स्वर्ग का राजा बनाता हूँ। स्वर्ग का राजा और नर्क का राजा बनने में रात दिन का फर्क है। नर्क में जो राजा रानी बनते हैं, वह दान पुण्य से बनते हैं। अल्पकाल का सुख मिलता है। और स्वर्ग के राजा रानी बनते हैं पढ़ाई से। यह भी तुम जानते हो – बाबा का प्लैन क्या चल रहा है। सारी सृष्टि जो दु:खधाम है, उनको सुखधाम, शान्तिधाम बनाना है। जानते हो भारत सुखधाम था। बाकी सब आत्मायें शान्तिधाम में थी। अभी तो सब दु:खधाम में हैं।

फिर शान्तिधाम, सुखधाम में जाना है। जो राजयोग सीखते हैं वही सुखधाम में आयेंगे, बाकी हिसाब-किताब चुक्तू कर शान्तिधाम में चले जायेंगे। शान्तिधाम-सुखधाम क्या है, यह दुनिया में किसको पता नहीं है। यह बाबा भी कहते हैं हम नहीं जानते थे। जो खुद मालिक था वह भूल गया है, तो बाकी मनुष्य क्या जानते होंगे। ड्रामा अनुसार सबको गिरना ही है। अब फिर चढ़ने का समय है। बाप कहते हैं मैं आया ही हूँ सबको सुखधाम, शान्तिधाम ले चलने। तुम्हारे पास बहुत आयेंगे, कहेंगे मन को शान्ति चाहिए। सुखधाम का वार्तालाप तो कोई करने वाला है नहीं। सन्यासी तो निवृत्ति मार्ग वाले हैं, वह तो कभी सुख का रास्ता बता नहीं सकते। तो जैसे बाप को तरस पड़ता है कि इन्हों को सुखधाम शान्तिधाम में ले जाऊं। बच्चों को भी आना चाहिए कि बाप का परिचय देना है। बाप से जरूर भारतवासियों को वर्सा मिलना चाहिए। हम नर्क में क्यों हैं, हम ही स्वर्ग में थे। अब नर्क में हैं। परन्तु इन बातों को बिल्कुल ही समझ नहीं सकते हैं। माया ने बुद्धि का ताला बिल्कुल ही बन्द कर दिया है, जो इतनी सहज बात भी समझ नहीं सकते हैं। भगवान जब स्वर्ग का रचयिता है तो जरूर हम स्वर्ग के मालिक होने चाहिए। अब नहीं हैं क्योंकि रावणराज्य है। इस रावण राज्य का विनाश तो अब होना ही है। इनके लिए वही महाभारत लड़ाई सामने खड़ी है। बड़ा सहज है। परन्तु जब किसकी बुद्धि में बैठे। बुद्धि में न बैठने के कारण आपस में झरमुई झगमुई बहुत करते हैं। टाइम बरबाद करते हैं। ऐसी बातें कानों से कभी नहीं सुनना। तुम अपनी पढ़ाई में तत्पर रहो, तब ही पद मिलेगा। पाठशाला में जो अच्छे स्टूडेन्ट होते हैं वह बहुत अच्छी रीति पढ़ते हैं। इम्तहान के दिनों में खास एकान्त में जाकर पढ़ते हैं कि कहाँ नापास न हो जाएं। नापास होने वाले धक्के खाते रहेंगे। बाप कहते हैं जितना हो सके एक बाप की याद में रहो। सजनी की साजन से सगाई हुई और बस छाप लगी। अच्छा-आज शादी की, कल पति मर गया। सारी आयु उसको याद करती रहेगी। अब वह तो पतित बनाने वाले हैं, बाप कहते हैं मैं तुमको स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ। तो ऐसे बाप को कितना याद करना चाहिए। माया तुम्हारा योग तोड़ने की बहुत कोशिश करेगी, परन्तु तुमको बहादुर रहना है। संकल्प बहुत तूफान लायेंगे। जो अज्ञान काल में भी नहीं आते थे, जैसे वैद्य लोग कहते हैं – इनसे डरना नहीं है। ऐसे नहीं डरकर जाए दूसरी दवाई करो। नहीं। बाबा भी कहते हैं – डरना नहीं है। मन्सा के तूफान बहुत आयेंगे लेकिन कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म नहीं करना। एक दो को ज्ञान सुनाकर कल्याण करना। बाबा बहुत समझाते हैं कि तुम अपनी मस्ती में मस्त रहो। घर में गीता पाठशाला खोलो। चैरिटी बिगन्स एट होम। बच्चों को भी स्वर्ग का मालिक बनाओ। बाप स्त्री को, बच्चों को रचते हैं सुख के लिए। तुम भी जानते हो हम भविष्य के लिए कमाई करते हैं। तो क्यों नहीं स्त्री बच्चों आदि को भी करायें। उनको घड़ी-घड़ी बोलो धन्धा धोरी भल करो, सिर्फ बाप को याद करते रहो। यह प्रैक्टिस ऐसी पड़ जाए जो पिछाड़ी में विनाश के समय एक बाबा की ही याद रहे।

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बाप कहते हैं – तुम सब अभी वानप्रस्थ अवस्था में हो। सबको मेरे पास आना है। हम आये हैं ले जाने के लिए। तुम्हारे पंख टूटे हुए हैं। सन्यासी तो ब्रह्म तत्व को याद करेंगे, वह बाप को याद कर न सकें। हाँ जो देवता धर्म वाला होगा वह मानेगा और शिवबाबा को याद करने लग पड़ेगा। ब्राह्मण बनने बिगर देवता तो बन न सकें। वर्णों की बाजोली है ना। शूद्र वर्ण के थे। अब ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण बन दादे का वर्सा पा रहे हैं। शूद्र से ब्राह्मण बने हैं। फिर हम नई दुनिया के मालिक बन जायेंगे। ब्राह्मण हैं सबसे ऊंच। ब्राह्मणों की चोटी है ना। हम बाजोली खेलते हैं। इसमें 84 जन्म का ज्ञान सेकेण्ड में मिलता है। जैसे बाजोली खेलते-खेलते तीर्थों पर जाते हैं, इतना महत्व रहता है। बड़ी भावना से जाते हैं। आजकल तो तीर्थों पर भी शराब आदि पीते हैं। आदत होती है तो छिपाकर जेब में बोतल ले जाते हैं। बाबा सब बातों का अनुभवी है। रथ भी बाबा ने पूरा अनुभवी लिया है। इनको भी बाप कहते हैं, तुमने बहुत गुरू किये हैं, सतसंग किये हैं। परन्तु अब वह सब भूल जाओ। अभी जो मैं सुनाता हूँ, वह सुनो। भगवान ने अर्जुन को कहा, रथ तो वास्तव में यह है। रथ में रथी है शिवबाबा। तुम सब अर्जुन हो गये। बाकी घोड़े गाड़ी की तो बात ही नहीं। न सेना की कोई बात है। वह है भक्तिमार्ग। यह है ज्ञान मार्ग। भक्ति की डिपार्टमेंट ही अलग है। ज्ञान देने वाला एक बाप है, बाकी तो सब भगत हैं। सारी दुनिया के जो भी मनुष्य हैं सबकी आत्मा कहती है ओ गॉड फादर। आत्मायें समझती हैं, वही आत्माओं का बाप है। जानती भी हैं हमारा लौकिक फादर भी है। फिर क्यों नहीं हेविनली गॉड फादर को याद करते हैं। सिर्फ दु:ख के समय क्यों याद करते हो। बाप कहते हैं मैं इतना सुख शान्ति देता हूँ, जो फिर दु:ख में मुझे ही याद करते हो। तो आपस में तुमको यह ज्ञान की बातें करनी हैं। मित्र सम्बन्धियों के पास अथवा आफीसर्स के पास भी जाना है, सबसे तैलुक रखना है। बड़ी युक्ति से उनको ज्ञान रत्नों का दान भी देना है। शादी में भी जाना है तो सेवा अर्थ। तुम गुप्त अहिंसक सेना हो, तुम्हें किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करनी है। दु:ख नहीं देना है। अच्छा-

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) ऊंच पद पाने के लिए अपनी पढ़ाई में तत्पर रहना है। झरमुई झगमुई की व्यर्थ बातें नहीं सुननी है। अपना समय व्यर्थ नहीं गॅवाना है।

2) एक दो को ज्ञान सुनाकर कल्याण करना है। कभी भी मन्सा तूफानों के वश हो कर्मेन्द्रियों से कोई विकर्म नहीं करना है।

वरदान:- स्वयं को विशेष पार्टधारी समझ साधारणता को समाप्त करने वाले परम व श्रेष्ठ भव 
जैसे बाप परम आत्मा है, वैसे विशेष पार्ट बजाने वाले बच्चे भी हर बात में परम यानी श्रेष्ठ हैं। सिर्फ चलते-फिरते, खाते-पीते विशेष पार्टधारी समझकर ड्रामा की स्टेज पर पार्ट बजाओ। हर समय अपने कर्म अर्थात् पार्ट पर अटेन्शन रहे। विशेष पार्टधारी कभी अलबेले नहीं बन सकते। यदि हीरो एक्टर साधारण एक्ट करें तो सब हंसेंगे इसलिए हर कदम, हर संकल्प हर समय विशेष हो, साधारण नहीं।
स्लोगन:- अपनी वृत्ति को पावरफुल बनाओ तो सेवा में वृद्धि स्वत: होगी।

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