26 december ki murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 26 DECEMBER 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 26 December 2020

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26-12-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – बाबा आये हैं तुम्हें बेहद की जागीर देने, ऐसे मीठे बाबा को तुम प्यार से याद करो तो पावन बन जायेंगे”
प्रश्नः- विनाश का समय जितना नजदीक आता जायेगा – उसकी निशानियां क्या होंगी?
उत्तर:- विनाश का समय नज़दीक होगा तो 1- सबको मालूम पड़ता जायेगा कि हमारा बाबा आया हुआ है। 2- अब नई दुनिया की स्थापना, पुरानी का विनाश होना है। बहुतों को साक्षात्कार भी होंगे। 3- संन्यासियों, राजाओं आदि को ज्ञान मिलेगा। 4- जब सुनेंगे कि बेहद का बाप आया है, वही सद्गति देने वाला है तो बहुत आयेंगे। 5- अखबारों द्वारा अनेकों को सन्देश मिलेगा। 6- तुम बच्चे आत्म-अभिमानी बनते जायेंगे, एक बाप की ही याद में अतीन्द्रिय सुख में रहेंगे।
गीत:- इस पाप की दुनिया से……..

ओम् शान्ति। यह कौन कहते हैं और किसको कहते हैं – रूहानी बच्चे! बाबा घड़ी-घड़ी रूहानी क्यों कहते हैं? क्योंकि अब आत्माओं को जाना है। फिर जब इस दुनिया में आयेंगे तो सुख होगा। आत्माओं ने यह शान्ति और सुख का वर्सा कल्प पहले भी पाया था। अब फिर यह वर्सा रिपीट हो रहा है। रिपीट हो तब सृष्टि का चक्र भी फिर से रिपीट हो। रिपीट तो सब होता है ना। जो कुछ पास्ट हुआ है सो रिपीट होगा। यूं तो नाटक भी रिपीट होते हैं परन्तु उनमें चेंज भी कर सकते हैं। कोई अक्षर भूल जाते हैं तो बनाकर डाल देते हैं। इसको फिर बाइसकोप कहा जाता है, इसमें चेंज नहीं हो सकती। यह अनादि बना-बनाया है, उस नाटक को बना-बनाया नहीं कहेंगे। इस ड्रामा को समझने से फिर उनके लिए भी समझ में आ जाता है। बच्चे समझते हैं जो नाटक आदि अभी देखते हैं, वह सब हैं झूठे। कलियुग में जो चीज़ देखी जाती है वह सतयुग में होगी नहीं। सतयुग में जो हुआ था सो फिर सतयुग में होगा। यह हद के नाटक आदि फिर भी भक्ति मार्ग में ही होंगे। जो चीज़ भक्तिमार्ग में होती है वह ज्ञान मार्ग अर्थात् सतयुग में नहीं होती। तो अभी बेहद के बाप से तुम वर्सा पा रहे हो। बाबा ने समझाया है – एक लौकिक बाप से और दूसरा पारलौकिक बाप से वर्सा मिलता है, बाकी जो अलौकिक बाप है उनसे वर्सा नहीं मिलता। यह खुद उनसे वर्सा पाते हैं। यह जो नई दुनिया की प्रापर्टी है, वह बेहद का बाप ही देते हैं सिर्फ इन द्वारा। इनसे एडाप्ट करते हैं इसलिए इनको बाप कहते हैं। भक्तिमार्ग में भी लौकिक और पारलौकिक दोनों याद आते हैं। यह (अलौकिक) नहीं याद आता क्योंकि इनसे कोई वर्सा मिलता ही नहीं है। बाप अक्षर तो बरोबर है परन्तु यह ब्रह्मा भी रचना है ना। रचना को रचता से वर्सा मिलता है। तुमको भी शिवबाबा ने क्रियेट किया है। ब्रह्मा को भी उसने क्रियेट किया है। वर्सा क्रियेटर से मिलता है, वह है बेहद का बाप। ब्रह्मा के पास बेहद का वर्सा है क्या? बाप इन द्वारा बैठ समझाते हैं इनको भी वर्सा मिलता है। ऐसे नहीं कि वर्सा लेकर तुमको देते हैं। बाप कहते हैं तुम इनको भी याद न करो। यह बेहद के बाप से तुमको प्रापर्टी मिलती है। लौकिक बाप से हद का, पारलौकिक बाप से बेहद का वर्सा, दोनों रिजर्व हो गये। शिवबाबा से वर्सा मिलता है – बुद्धि में आता है! बाकी ब्रह्मा बाबा का वर्सा क्या कहेंगे! बुद्धि में जागीर आती है ना। यह बेहद की बादशाही तुमको उनसे मिलती है। वह है बड़ा बाबा। यह तो कहते हैं मुझे याद नहीं करो, मेरी तो कोई प्रापर्टी है नहीं, जो तुमको मिले। जिससे प्रापर्टी मिलनी है उनको याद करो। वही कहते हैं मामेकम् याद करो। लौकिक बाप की प्रापर्टी पर कितना झगड़ा चलता है। यहाँ तो झगड़े की बात नहीं। बाप को याद नहीं करेंगे तो ऑटोमेटिकली बेहद का वर्सा भी नहीं मिलेगा। बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझो। इस रथ को भी कहते हैं तुम अपने को आत्मा समझ मुझे याद करो तो विश्व की बादशाही मिलेगी। इसको कहा जाता है याद की यात्रा। देह के सब सम्बन्ध छोड़ अपने को अशरीरी आत्मा समझना है। इसमें ही मेहनत है। पढ़ाई के लिए कोई तो मेहनत चाहिए ना। इस याद की यात्रा से तुम पतित से पावन बनते हो। वह यात्रा करते हैं शरीर से। यह तो है आत्मा की यात्रा। यह तुम्हारी यात्रा है परमधाम जाने के लिए। परमधाम अथवा मुक्तिधाम कोई जा नहीं सकते हैं, सिवाए इस पुरुषार्थ के। जो अच्छी रीति याद करते हैं वही जा सकते हैं और फिर ऊंच पद भी वह पा सकते हैं। जायेंगे तो सब। परन्तु वह तो पतित हैं ना इसलिए पुकारते हैं। आत्मा याद करती है। खाती-पीती सब आत्मा करती है ना। इस समय तुमको देही-अभिमानी बनना है, यही मेहनत है। बिगर मेहनत तो कुछ मिलता नहीं। है भी बहुत सहज। परन्तु माया का आपोजीशन होता है। किसकी तकदीर अच्छी है तो झट इसमें लग जाते हैं। कोई देरी से भी आयेंगे। अगर बुद्धि में ठीक रीति बैठ गया तो कहेंगे बस हम इस रूहानी यात्रा में लग जाता हूँ। ऐसे तीव्र वेग से लग जाएं तो अच्छी दौड़ी पहन सकते हैं। घर में रहते भी बुद्धि में आ जायेगा यह तो बहुत अच्छी राइट बात है। हम अपने को आत्मा समझ पतित-पावन बाप को याद करता हूँ। बाप के फरमान पर चलें तो पावन बन सकते हैं। बनेंगे भी जरूर। पुरुषार्थ की बात है। है बहुत सहज। भक्ति मार्ग में तो बहुत डिफीकल्टी होती है। यहाँ तुम्हारी बुद्धि में है अब हमको वापिस जाना है बाबा के पास। फिर यहाँ आकर विष्णु की माला में पिरोना है। माला का हिसाब करें। माला तो ब्रह्मा की भी है, विष्णु की भी है, रूद्र की भी है। पहले-पहले नई सृष्टि के यह हैं ना। बाकी सब पीछे आते हैं। गोया पिछाड़ी में पिरोते हैं। कहेंगे तुम्हारा ऊंच कुल क्या है? तुम कहेंगे विष्णु कुल। हम असल विष्णु कुल के थे, फिर क्षत्रिय कुल के बने। फिर उनसे बिरादरियाँ निकलती हैं। इस नॉलेज से तुम समझते हो बिरादरियाँ कैसे बनती हैं। पहले-पहले रूद्र की माला बनती है। ऊंच ते ऊंच बिरादरी है। बाबा ने समझाया है – यह तुम्हारा बहुत ऊंच कुल है। यह भी समझते हैं सारी दुनिया को पैगाम जरूर मिलेगा। जैसे कई कहते हैं भगवान जरूर कहाँ आया हुआ है परन्तु पता नहीं पड़ता है। आखरीन पता तो लगेगा सबको। अखबारों में पड़ता जायेगा। अभी तो थोड़ा डालते हैं। ऐसे नहीं कि एक अखबार सब पढ़ते हैं। लाइब्रेरी में पढ़ सकते हैं। कोई 2-4 अखबार भी पढ़ते हैं। कोई बिल्कुल नहीं पढ़ते। यह सबको मालूम पड़ना ही है कि बाबा आया हुआ है, विनाश का समय नज़दीक होगा तो मालूम पड़ेगा। नई दुनिया की स्थापना, पुरानी का विनाश होता है। हो सकता है बहुतों को साक्षात्कार भी हो। तुम्हें संन्यासियों, राजाओं आदि को ज्ञान देना है। बहुतों को पैगाम मिलना है। जब सुनेंगे बेहद का बाप आया है, वही सद्गति देने वाला है तो बहुत आयेंगे। अभी अखबार में इतना दिलपसन्द कायदेमुज़ीब निकला नहीं है। कोई निकल पड़ेंगे, पूछताछ करेंगे। बच्चे समझते हैं हम श्रीमत पर सतयुग की स्थापना कर रहे हैं। तुम्हारी यह नई मिशन है। तुम हो ईश्वरीय मिशन के ईश्वरीय भाती। जैसे क्रिश्चियन मिशन के क्रिश्चियन भाती बन जाते हैं। तुम हो ईश्वरीय भाती इसलिए गायन है अतीन्द्रिय सुख गोप-गोपियों से पूछो, जो आत्म-अभिमानी बने हैं। एक बाप को याद करना है, दूसरा न कोई। यह राजयोग एक बाप ही सिखलाते हैं, वही गीता का भगवान है। सबको यही बाप का निमंत्रण वा पैगाम देना है, बाकी सब बातें हैं ज्ञान श्रृंगार। यह चित्र सब हैं ज्ञान का श्रृंगार, न कि भक्ति का। यह बाप ने बैठ बनवाये हैं – मनुष्यों को समझाने के लिए। यह चित्र आदि तो प्राय:लोप हो जायेंगे। बाकी यह ज्ञान आत्मा में रह जाता है। बाप को भी यह ज्ञान है, ड्रामा में नूंध है।

तुम अभी भक्ति मार्ग पास कर ज्ञान मार्ग में आये हो। तुम जानते हो हमारी आत्मा में यह पार्ट है जो चल रहा है। नूंध थी जो फिर से हम राजयोग सीख रहे हैं बाप से। बाप को ही आकर यह नॉलेज देनी थी। आत्मा में नूंध है। वहाँ जाए पहुँचेंगे फिर नई दुनिया का पार्ट रिपीट होगा। आत्मा के सारे रिकार्ड को इस समय तुम समझ गये हो शुरू से लेकर। फिर यह सब बंद हो जायेंगे। भक्तिमार्ग का पार्ट भी बन्द हो जायेगा। फिर जो तुम्हारी एक्ट सतयुग में चली होगी, वही चलेगी। क्या होगा, यह बाप नहीं बताते हैं। जो कुछ हुआ होगा वही होगा। समझा जाता है सतयुग है नई दुनिया। जरूर वहाँ सब कुछ नया सतोप्रधान और सस्ता होगा, जो कुछ कल्प पहले हुआ था वही होगा। देखते भी हैं – इन लक्ष्मी-नारायण को कितने सुख हैं। हीरे-जवाहरात धन बहुत रहता है। धन है तो सुख भी है। यहाँ तुम भेंट कर सकते हो। वहाँ नहीं कर सकेंगे। यहाँ की बातें वहाँ सब भूल जायेंगे। यह हैं नई बातें, जो बाप ही बच्चों को समझाते हैं। आत्माओं को वहाँ जाना है, जहाँ कारोबार सारी बंद हो जाती है। हिसाब-किताब चुक्तू होता है। रिकार्ड पूरा होता है। एक ही रिकार्ड बहुत बड़ा है। कहेंगे फिर आत्मा भी इतनी बड़ी होनी चाहिए। परन्तु नहीं। इतनी छोटी आत्मा में 84 जन्मों का पार्ट है। आत्मा भी अविनाशी है। इनको सिर्फ वण्डर ही कहेंगे। ऐसे आश्चर्यवत चीज़ और कोई हो न सके। बाबा के लिए तो कहते हैं सतयुग-त्रेता के समय विश्राम में रहते हैं। हम तो आलराउण्ड पार्ट बजाते हैं। सबसे जास्ती हमारा पार्ट है। तो बाप वर्सा भी ऊंच देते हैं। कहते हैं 84 जन्म भी तुम ही लेते हो। हमारा तो पार्ट फिर ऐसा है जो और कोई बजा न सके। वण्डरफुल बातें हैं ना। यह भी वण्डर है जो आत्माओं को बाप बैठ समझाते हैं। आत्मा मेल-फीमेल नहीं है। जब शरीर धारण करती है तो मेल-फीमेल कहा जाता है। आत्मायें सब बच्चे हैं तो भाई-भाई हो जाती हैं। भाई-भाई हैं जरूर वर्सा पाने के लिए। आत्मा बाप का बच्चा है ना। वर्सा लेते हैं बाप से इसलिए मेल ही कहेंगे। सब आत्माओं का हक है, बाप से वर्सा लेने का। उसके लिए बाप को याद करना है। अपने को आत्मा समझना है। हम सब ब्रदर्स हैं। आत्मा, आत्मा ही है। वह कभी बदलती नहीं। बाकी शरीर कभी मेल का, कभी फीमेल का लेती है। यह बड़ी अटपटी बातें समझने की हैं, और कोई भी सुना न सके। बाप से या तुम बच्चों से ही सुन सकते हैं। बाप तो तुम बच्चों से ही बात करते हैं। आगे तो सबसे मिलते थे, सबसे बात करते थे। अभी करते-करते आखरीन तो कोई से बात ही नहीं करेंगे। सन शोज़ फादर है ना। बच्चों को ही पढ़ाना है। तुम बच्चे ही बहुतों की सर्विस कर ले आते हो। बाबा समझते हैं यह बहुतों को आपसमान बनाकर ले आते हैं। यह बड़ा राजा बनेंगे, यह छोटा राजा बनेंगे। तुम रूहानी सेना भी हो, जो सबको रावण की जंजीरों से छुड़ाए अपनी मिशन में ले आते हो। जितनी जो सर्विस करते हैं उतना फल मिलता है। जिसने जास्ती भक्ति की है वही जास्ती होशियार हो जाते हैं और वर्सा ले लेते हैं। यह पढ़ाई है, अच्छी रीति पढ़ाई नहीं की तो फेल हो जायेंगे। पढ़ाई बहुत सहज है। समझना और समझाना भी है सहज। डिफीकल्टी की बात नहीं, परन्तु राजधानी स्थापन होनी है, उसमें तो सब चाहिए ना। पुरुषार्थ करना है। उसमें हम ऊंच पद पायें। मृत्युलोक से ट्रांसफर होकर अमरलोक में जाना है। जितना पढ़ेंगे उतना अमरपुरी में ऊंच पद पायेंगे।

बाप को प्यार भी करना होता है क्योंकि यह है बहुत प्यारे ते प्यारी वस्तु। प्यार का सागर भी है, एकरस प्यार हो न सके। कोई याद करते हैं, कोई नहीं करते हैं। किसको समझाने का भी नशा रहता है ना। यह बड़ा टैम्पटेशन है। कोई को भी बताना है – यह युनिवर्सिटी है। यह स्प्रीचुअल पढ़ाई है। ऐसे चित्र और कोई स्कूल में नहीं दिखाये जाते। दिन-प्रतिदिन और ही चित्र निकलते रहेंगे। जो मनुष्य देखने से ही समझ जाएं। सीढ़ी है बहुत अच्छी। परन्तु देवता धर्म का नहीं होगा तो उनको समझ में नहीं आयेगा। जो इस कुल का होगा उनको तीर लगेगा। जो हमारे देवता धर्म के पत्ते होंगे वही आयेंगे। तुमको फील होगा यह तो बहुत रूचि से सुन रहे हैं। कोई तो ऐसे ही चले जायेंगे। दिन-प्रतिदिन नई-नई बातें भी बच्चों को समझाते रहते हैं। सर्विस का बड़ा शौक चाहिए। जो सर्विस पर तत्पर होंगे वही दिल पर चढ़ेंगे और तख्त पर भी चढ़ेंगे। आगे चल तुमको सब साक्षात्कार होते रहेंगे। उस खुशी में तुम रहेंगे। दुनिया में तो हाहाकार बहुत होना है। रक्त की नदियाँ भी बहनी हैं। बहादुर सर्विस वाले कभी भूख नहीं मरेंगे। परन्तु यहाँ तो तुमको वनवास में रहना है। सुख भी वहाँ मिलेगा। कन्या को तो वनवाह में बिठाते हैं ना। ससुरघर जाकर खूब पहनना। तुम भी ससुरघर जाते हो तो वह नशा रहता है। वह है ही सुखधाम। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) माला में पिरोने के लिए देही-अभिमानी बन तीव्र वेग से याद की यात्रा करनी है। बाप के फरमान पर चलकर पावन बनना है।

2) बाप का परिचय दे बहुतों को आप समान बनाने की सर्विस करनी है। यहाँ वनवाह में रहना है। अन्तिम हाहाकार की सीन देखने के लिए महावीर बनना है।

वरदान:- हर कर्म में फालो फादर कर स्नेह का रेसपान्ड देने वाले तीव्र-पुरूषार्थी भव
जिससे स्नेह होता है उसको आटोमेटिकली फालो करना होता है। सदा याद रहे कि यह कर्म जो कर रहे हैं यह फालो फादर है? अगर नहीं है तो स्टॉप कर दो। बाप को कॉपी करते बाप समान बनो। कॉपी करने के लिए जैसे कार्बन पेपर डालते हैं वैसे अटेन्शन का पेपर डालो तो कॉपी हो जायेगा क्योंकि अभी ही तीव्र पुरूषार्थी बन स्वयं को हर शक्ति से सम्पन्न बनाने का समय है। अगर स्वयं, स्वयं को सम्पन्न नहीं कर सकते हो तो सहयोग लो। नहीं तो आगे चल टू लेट हो जायेंगे।
स्लोगन:- सन्तुष्टता का फल प्रसन्नता है, प्रसन्नचित बनने से प्रश्न समाप्त हो जाते हैं।

TODAY MURLI 26 DECEMBER 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 26 December 2020

26/12/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, the Father has come to give you unlimited property. Remember such a sweet Baba with love and you will become pure.
Question: When the time of destruction comes close, what will be the signs?
Answer: When the time of destruction comes close, everyone will come to know: 1. Our Baba has come. 2. The new world is now being established and the old world is to be destroyed. Many will have visions. 3. Sannyasis and kings will receive knowledge. 4. When people hear that the unlimited Father has come and that only He can grant salvation, many will come. 5. Many will receive this message through the newspapers. 6. You children will continue to become soul conscious. You will stay in supersensuous joy in remembrance of the one Father.
Song: Take us away from this world of sin to a world of rest and comfort.

Om shanti. Who says this and to whom does He say it? The spiritual children. Why does Baba repeatedly say “spiritual”? Because you souls now have to return home. Then, when you come down to this world, there will be happiness. You souls received your inheritance of peace and happiness in the previous cycle too. That inheritance is now being repeated. It is only when this is repeated that the world cycle can repeat. Everything repeats, does it not? Whatever happened in the past will repeat again. In fact, even a play repeats, but there can be some change in that; if they forget their words, they can make something up and say those words. However, this is called a film in which there cannot be any change. This drama is eternally predestined. Those plays cannot be called predestined. By understanding this drama, you are also able to understand that drama. You children understand that all the plays you see now are false. Nothing that you can see in the iron age will exist in the golden age. Everything that happened in the golden age will only happen again in the golden age. Those limited plays will exist on the path of devotion. The things that exist on the path of devotion do not exist either on the path of knowledge or in the golden age. So, you are now receiving your inheritance from the unlimited Father. Baba has explained that you receive an inheritance from your worldly fathers and the other inheritance from your parlokik Father, but you don’t receive an inheritance from the alokik father. He himself receives an inheritance from that One. Only through this one does the unlimited Father give you the property of the new world. He adopts you through him, and this is why he is also called a father. On the path of devotion, they remember their worldly fathers and the parlokik Father. This alokik father is not remembered because no inheritance is received from him. The word “father” is correct, but even Brahma is part of creation. The creation receives the inheritance from the Creator. Shiv Baba has created you. He also created Brahma. The inheritance is received from the Creator, the One who is the unlimited Father. Does Brahma have an unlimited inheritance? The Father sits here and explains through this one that he too receives an inheritance. It isn’t that he claims his inheritance and gives it to you. The Father says: You mustn’t even remember this one. You receive this property from the unlimited Father. You receive a limited inheritance from your limited father and the unlimited inheritance from the parlokik Father; both of these are reserved. It enters your intellects that you receive the inheritance from Shiv Baba, but what inheritance would you say you receive from Brahma? The property enters your intellects, does it not? You receive this unlimited sovereignty from that One. He is the greatest Baba. This one says: Don’t remember me! I don’t have any property that you could receive. Remember the One from whom you are to receive the property. He says: Constantly remember Me alone! There is so much fighting over the property of a physical father. Here, there is no question of fighting. If you don’t remember the Father, then automatically you won’t receive an unlimited inheritance. The Father says: Consider yourselves to be souls. He even tells this chariot: Consider yourself to be a soul and remember Me and you will receive the sovereignty of the world. This is called the pilgrimage of remembrance. Renounce all your bodily relations and consider yourselves to be bodiless souls. This does need effort. Some effort is needed to study. By staying on this pilgrimage of remembrance, you become pure from impure. Those people go on pilgrimages physically. Here, this is the pilgrimage of the soul. This is your pilgrimage to the supreme abode. No one can go to the supreme abode and then the land of liberation in life without making this effort. Only those who stay in remembrance very well are able to go there. They are the ones who will claim a high status. Everyone will go back but, because they are impure, they continue to call out. The souls remember. It is souls that eat and drink. Become soul conscious! This is the only effort you have to make at this time. You won’t receive anything without making effort. It is very easy, but there is still opposition from Maya. When someone has the good fortune, he quickly engages himself in this. Some will come even later. When it sits in their intellects very well, they say: We are now going to occupy ourselves on this spiritual pilgrimage. If they occupy themselves intensely on this, they can race ahead very well. Even while living at home with their families, it will enter their intellects that it is a very good and right thing to consider oneself to be a soul and to remember the Purifier Father. When you follow the Father’s orders, you can become pure; you definitely will become that. It is a matter of making effort. It is very easy. On the path of devotion there is a lot of difficulty. Here, it is in your intellects that you have to return to Baba. Then you will go there (the golden age) and be threaded in the rosary of Vishnu. Just think about all the rosaries! There is the rosary of Brahma, the rosary of Vishnu and the rosary of Rudra. This one is the first one in the new world. All the rest come later, that is, they are threaded later. They ask: What is your highest clan? You can reply: The Vishnu clan. Originally, you belonged to the clan of Vishnu and then you became part of the warrior clan. Then the genealogical trees emerged from that. You can understand from this knowledge how the genealogical trees are created. The rosary of Rudra is created first of all. This is the highest genealogical tree. Baba has explained that this is your most elevated clan. You also understand that the whole world will definitely receive the message. Some say: God has definitely come somewhere, but we can’t tell where. Eventually, everyone will come to know. It will continue to be printed in the newspapers. At present, they only print a little. Not everyone reads the same newspaper. Yes, they can be read in libraries. Some even read two to four different newspapers. Some don’t read any papers at all. Everyone has to know that Baba has come. When the time of destruction comes close, they will come to know that the new world is being established and that the old world is to be destroyed. It is possible that many will have visions. You also have to give this knowledge to the sannyasis and the kings. Many are to receive this message. When they hear that the unlimited Father has come and that He is granting salvation, many will come. At the moment, nothing that you like has been printed in the papers officially. Someone will emerge who will ask about this. You children understand that you are establishing the golden age by following shrimat. This is your new mission. You are members of God’s mission just as Christians become members of a Christian Mission. You are God’s members. This is why it is remembered that if you want to know about supersensuous joy, you should ask the gopes and gopis who became soul conscious. Remember the one Father alone and none other. Only the one Father teaches this Raja Yoga. He is the God of the Gita. Everyone has to be given this message or invitation from the Father. All other things are decorations of knowledge. All the pictures are decorations of knowledge, not of devotion. The Father has had them made in order for them to be explained to people. All of these pictures will disappear and only the knowledge will remain in souls. The Father has this knowledge and it is also recorded in the drama. You have now passed through the path of devotion and come onto the path of knowledge. You souls now understand that you are playing the parts that are within you. It is recorded for us to study Raja Yoga once again with the Father. The Father had to come to give us this knowledge. It is recorded in the soul. When you reach there, the part of the new world will repeat. You now understand the whole record of souls from the beginning. Then, all of this will come to an end. Even the part of the path of devotion will come to an end. Then, whatever act you performed in the golden age, you will perform again. The Father doesn’t tell you what is to happen. Whatever has happened will happen again. You understand that the golden age is the new world. Everything there will definitely be new and satopradhan. Everything will be very inexpensive. Whatever happened in the previous cycle will happen again. You can see how much happiness Lakshmi and Narayan had. They had so many diamonds and jewels, so much wealth, etc. When you have wealth, you also have happiness. You could compare that to here, but there, there is no comparison; everything here will have been forgotten there. These are new things that only the Father explains to the children. Souls first have to go there (soul world) where all activity comes to a halt. All karmic accounts are settled. The record is coming to an end. This one record is very long. They say: In that case, souls should be just as big. But no! Such tiny souls have parts of 84 births recorded in them. Souls are imperishable. This can only be called the wonder of nature. There cannot be anything else as amazing as this. It is said of Baba that He remains at rest during the golden and silver ages, whereas you play all-round parts. You have the longest parts. Therefore, the Father gives you the elevated inheritance. He says: You take 84 births. My part is such that no one else can play it. This is a wonderful thing. It is a wonder how the Father sits here and explains to souls. Souls are neither male nor female. It is when a soul adopts a body that he or she is said to be male or female. All souls are children and so they are brothers. In order to claim your inheritance, you definitely have to be brothers. Each soul is a son of the Father. You claim your inheritance from the Father, and so you are definitely called males. All souls have a right to claim the inheritance from the Father. For that, you have to remember the Father. Consider yourselves to be souls. We are all brothers. A soul is a soul. Souls never change, but they sometimes take a male body and sometimes a female body. These are very interesting matters that have to be understood. No one else can relate these things. Others can only hear this from the Father or from you. The Father only speaks to you children. In the early days He used to meet and talk to everyone. Gradually, the time will come when He will not talk to anyone. It is said, “Son shows Father”. You children have to teach others. You children serve many and bring them here. Baba understands that you make many people similar to yourselves and bring them here. This one will become a big king; this one will become a small king. You are the spiritual army who liberates everyone from the chains of Ravan and brings them to your mission. According to the service you do, so will be the fruit you receive. Those who have performed more devotion become clever and claim their inheritance. This is a study. If you don’t study well, you fail. This study is very easy. It is easy to understand and also to explain. There is no question of any difficulty. However, a kingdom is being established and so all types are needed. You have to make effort to claim a high status in this. You have to be transferred from the land of death to the land of immortality. The more you study, the higher the status you will receive in the land of immortality. You also have to love the Father, because He is the loveliest of all. He is the Ocean of Love. You cannot all have the same love. Some remember Him and some don’t remember Him at all! Some have intoxication by explaining to others. This is a huge temptation. You can tell anyone that this is a university. This is spiritual study. Such pictures are not shown in any other schools. Day by day, many more pictures will continue to emerge so that people will be able to understand everything just by looking at them. The picture of the ladder is very good. However, anyone who doesn’t belong to the deity clan will not understand anything. Those who belong to this clan will be struck by the arrow. Those who are the leaves of our deity religion will come. You will feel that they listen with great interest. Some will just come and go away. Day by day, Baba explains new things to you children. You must have great interest in doing service. Those who remain busy doing service are seated on the heart-throne and will also be on that throne. As you progress further, you will have visions of everything; you will stay in that happiness. There will be many cries of distress in the world. There will even be rivers of blood flowing. Courageous ones who do service will never starve to death. However, you have to live here in simplicity. You will receive happiness there. A kumari is made to live in simplicity and then, when she goes to her in-laws she can put on everything she wants to. You are also going to your in-laws’ home and so have that intoxication! That is the land of happiness. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. In order to be threaded in the rosary, become soul conscious and stay on the pilgrimage of remembrance with great intensity. Follow the Father’s directions and become pure.
  2. Do service to make many others similar to yourself by giving them the Father’s message. You have to live here in simplicity. In order to be able to watch the final scenes of the cries of distress, you have to become mahavirs (courageous warriors).
Blessing: May you be an intense effort-maker who follows the Father in every action and gives the response of love.
You automatically follow the one you love. Always remember to ask yourself: Am I following the Father in the action I am performing? If not, then stop there and then. By copying the Father, you become equal to the Father. Just as you use carbon paper to make a copy, in the same way, use the paper of attention and a copy will be made because now is the only time to become an intense effort-maker and make yourself full of every power. If you are unable to make yourself full, then take someone’s help. Otherwise, as you carry on, it will become “too late”.
Slogan: The fruit of contentment is happiness and by being happy, all your questions finish.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 26 DECEMBER 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 26 December 2019

26/12/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, become the Father’s helpers in changing this iron-aged mountain into the golden-aged one. Make effort to reserve a first-class seat in the new world.
Question: What is the Father’s duty? In order to fulfil which duty does the Father have to come at the confluence age?
Answer: The Father’s duty is to make sick and unhappy children happy and well again. He has to remove them from the trap of Maya and give them plenty of happiness. The Father fulfils this duty at the confluence age. Baba says: I have come to cure all sicknesses for all of you. I have come to have mercy on everyone. All of you should now make effort and make your fortune elevated for yourselves for 21 births.
Song: No one is as unique as the Innocent Lord.

Om shanti. The Innocent Lord, God Shiva, speaks through the lotus lips of Brahma. The Father says: This is the human world tree of the various religions. I explain to you children the secrets of this kalpa tree, that is, I tell you the secrets of the beginning, the middle and the end of the world. Shiv Baba is the One who is praised in the song. Shiv Baba’s birth takes place here. The Father says: I have come in Bharat. Because Krishna’s name was put in the Gita, people don’t know when Shiv Baba came. There is no question of His coming in the copper age. The Father explains: Children, I also came here 5000 years ago and gave you this knowledge. Everyone can understand from this picture of the tree. Look at the tree very carefully. There definitely used to be the kingdom of deities in the golden age and then there was the kingdom of Rama and Sita in the silver age. Baba tells you the secrets of the beginning, the middle and the end. Children ask: Baba, when did we become trapped in Maya’s trap? Baba says: In the copper age. Then the different religions began to come, numberwise. By calculating the time, you can understand when you will come again in this world. Shiv Baba says: I have come after 5000 years. I have to come at the confluence age to fulfil My duty. All the human beings of the world in general and the people of Bharat in particular are very unhappy now. According to the drama, I make Bharat happy. The Father’s duty is to provide medicine for His sick children. This is a very severe illness. These five vices are the root cause of all sicknesses. Children ask when they began. They began in the copper age. You have to explain about Ravan. No one is able to see Ravan. He is understood with the intellect. The Father is also understood with the intellect. Souls have their minds and intellects within them. You souls understand that that is our Father, the Supreme Soul. It is souls that experience happiness and sorrow and souls that are influenced by things. Souls experience sorrow when they are in their bodies. They don’t say, “Don’t make me, the Supreme Soul, unhappy.” The Father explains: I too have a part to play,cycle after cycle I play My part at the confluence age. The children whom I sent to the land of happiness are the ones who have become unhappy and this is why, according to the drama, I have to come. However, I do not incarnate in a fish or a crocodile. They say that Parshu-Rama (Rama with an axe) killed warriors with his axe. All of those things are tall stories. The Father now says: Remember Me! These two are Jagadamba and Jagadpita. People speak of the Mother and Fathercountry. The people of Bharat remember this, and say: You are the Mother and Father. Through God’s mercy, we definitely receive limitless happiness. However, it then depends on each one’s efforts. When some people go to watch a movie, they reserve firstclass seats. The Father says: It’s up to you whether you reserve a sun-dynasty seat or a moon-dynasty seat. Whatever effort you make, you will be able to claim a status accordingly. The Father has come to cure all your sicknesses. Ravan has made everyone very unhappy. No human being can grant liberation or salvation to any human being. This is now the end of the iron age. When gurus die, they have to take rebirth here again. Therefore, how could they grant salvation to anyone? Can all of those countless gurus come together and purify the impure world? They speak about the Govardhan mountain. You mothers are now changing the iron-aged mountain into the golden-aged one. People also worship the Govardhan mountain. That is the worship of elements. Sannyasis remember brahm, that is, they remember the element. They believe that that element is the Supreme Soul. They believe that brahm is God. The Father says: That is their imagination. Souls reside in their oval form in Brahmand, in the brahm element. The incorporeal tree has also been shown. All souls have to reside in their own sections. The foundation of this tree is the sun and moon dynasty clans of Bharat. After that, expansion takes place. There are four main religions and you can calculate exactly when each one came. For example, Guru Nanak came 500 years ago. It isn’t that the Sikhs play a part of 84 births. The Father says: Only you Brahmins, who are all-rounders, take 84 births. Baba has explained that you are the ones who have all-round parts. You become Brahmins, deities, warriors, merchants and shudras. Those who first become deities are the ones who go around the whole cycle. The Father says: You have been listening to many Vedas and scriptures. Now listen to this and then judge whether the scriptures are right, whether the gurus are right or whether what the Father tells you is right. The Father is called the Truth. I tell you the truth through which the age of truth, the golden age, is created. From the copper age onwards, you have been listening to falsehood, and so this world has become hell. The Father says: I am your Servant. You have been singing on the path of devotion: I am a servant, I am Your servant. I have now come to serve you children. The Father is remembered as the incorporeal One and the egoless One. Therefore, the Father says: My duty is to make you children constantly happy. There is a song that says, “God reveals His game of coming and going.” There is no question of beating drums etc. However, that One does tell you all the news of the beginning, the middle and the end. The Father says: Children, you are all actors. It is at this time that I become Karankaravanhar. I carry out establishment through this one (Brahma). The things that are mentioned in the Gita are not true. All of those things are now taking place in a practical way. I am teaching you children this easy knowledge and easy yoga. I inspire you to have yoga. I have been called the One who inspires yoga, the One who fills your aprons, the One who cures all sickness. Baba also explains the accurate meaning of the Gita. I teach you yoga, but I also teach you how to teach others yoga. You children study yoga and you then also teach yoga to others. They say: You are the One who ignites our lights with yoga. By your listening to such songs at home, all of this knowledge will turn around in your intellect. By having remembrance of the Father, the intoxication of your inheritance will rise. Your mouth is not sweetened by your simply saying “Supreme Soul” or “God”. To say “Baba” also implies the inheritance. You children are now listening to the knowledge of the beginning, the middle and the end and you then relate it to others. This is called blowing the conch shell. You children don’t have to hold any books etc.; you simply have to imbibe these things. You are the true spiritual Brahmins, children of the spiritual Father. Bharat is changed into heaven through the true Gita. The scripture writers simply sat and made up stories. All of you are Parvatis. I am relating the story of immortality to you. All of you are Draupadis. No one is stripped there. People ask: In that case, how can children be born there? Tell them: Since they are viceless there, how can there be any question of vice? You aren’t able to understand how children will be born through the power of yoga; you keep arguing! Those things are written in the scriptures. That is the completely viceless world, whereas this is the vicious world. I know that, according to the drama, Maya will make you unhappy again. Cycle after cycle, I come to fulfil My duty. Baba knows that everyone from the previous cycle, those who have been lost for a long time, will return and claim the inheritance again; they show signs of it. This is that same Mahabharat War. You do have to make effort to change into deities, which means the masters of heaven again. There is no question of a physical war in this. There was never any battle between the devils and the deities. There, there is no Maya to make you fight. For half a cycle, no one will fight, nor will there be any sickness, peacelessness or sorrow. There is constant happiness there; it is constantly spring there. There are no hospitals there but there are schools for studying. Each one of you is claiming the inheritance here. When people are given an education, they are able to stand on their own two feet. There is also a story about this. A father asked his daughter whose fortune she was eating from and she replied that she was eating from her own fortune. However, that was a limited fortune, whereas you are now making your fortune unlimited. You are now making such a fortune for yourselves that you experience your fortune of the kingdom for 21 births. That is your inheritance of unlimited happiness. You children now understand the contrast very clearly. Bharat used to be so happy! What has Bharat become like now? Those who experienced their fortune of the kingdom in the previous cycle will be the ones who claim it again. However, you shouldn’t say that whatever is in the drama is what you will receive again. Otherwise, you would die of hunger! You have to understand the secrets of the drama accurately. Some scriptures say that the duration of the cycle is one thing and others say something else. There are so many different ideas. Some people say that they are constantly happy anyway. When they are asked whether they ever fall sick, they reply that it is the body that experiences sickness, that the soul is immune to any effect. However, when you are hurt, it is the soul that experiences pain. These things have to be understood very clearly. This is a school in which there is only the one Teacher who teaches you. The knowledge is the same for all of you and you also have the same aim and objective, which is that of changing from a human being into Narayan. Those who fail will become part of the moon dynasty. When the deities existed, the warriors didn’t exist; when the warriors existed, the merchants didn’t exist and the shudras didn’t exist at the same time as the merchants. These are things that have to be understood. It is very easy for you mothers. There is only one examination. Don’t think: How can those who come late study? New ones are very quickly going ahead. This is happening in a practical way. Maya, Ravan, has no form. You can say that someone has an evil spirit of lust, but Ravan doesn’t have a body or a form. Achcha, the saccharine (sweet essence) of everything is “Manmanabhav!” Baba says: Remember Me! Then, through this fire of yoga, your sins will be absolved. The Father comes as your Guide. Baba says: Children, I come in person to teach you. Cycle after cycle I come to fulfil My duty. The parlokik Father says: I have come to fulfil My duty with the help of you children. You will receive a status only when you give your help. I am such a great Father! I create such a huge sacrificial fire! All of you Brahmins, you mouth-born children of Brahma, are brothers and sisters. When you remain in the consciousness of being brother and sister, you can transform your vision of husband and wife. The Father says: Don’t defame the name of this Brahmin clan. There are ways that you can remain pure. People say that it is impossible to live together and not ignite the fire. Baba says: For as long as you keep the sword of knowledge between you, that fire will not ignite. However, only when both of you remain “Manmanabhav”, only when both of you keep remembering Shiv Baba and only when you consider yourselves to be Brahmins can that happen. It is because people don’t understand these things that they create an upheaval. You then have to endure defamation. No one would defame Krishna. If Krishna were to come now, people from abroad etc. would come rushing here in aeroplanes; there would be a huge crowd. Who knows what would happen in Bharat? Achcha, today is the day of offering bhog. This home is your Father’s home, that home is your in-laws’ home and the meeting takes place at the confluence age. Some people think this is magic. Baba has explained what visions are and how people receive visions on the path of devotion. You must not allow your intellects to develop any doubt about this. This is your custom and system. This is Shiv Baba’s treasure-store, and so you should offer bhog to Him in remembrance of Him. It is good to stay in yoga; you will have remembrance of Baba. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Consider yourselves to be the mouth-born children of Brahma and become true, pure Brahmins. Never defame the name of this Brahmin clan.
  2. Be as incorporeal and egoless as the Father and fulfil your duty. Remain engaged in spiritual service.
Blessing: May you be introverted and go into solitude every now and then while on the field of service.
In order to experiment with the power of silence, it is necessary to be introverted and stay in solitude. Some children say that they just don’t have the time to experience the stage of introspection or to be in solitude because the field of service and the field of words have increased a lot. However, for this, instead of taking out half an hour or an hour at one time, find even a little time every now and then and your stage will become powerful.
Slogan: Instead of battling in Brahmin life, celebrate it with pleasure and anything difficult will then become easy.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 26 DECEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 26 December 2019

26-12-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे-बाप का मददगार बन इस आइरन एजड पहाड़ को गोल्डन एजड बनाना है, पुरूषार्थ कर नई दुनिया के लिए फर्स्टक्लास सीट रिजर्व करानी है”
प्रश्नः- बाप की फर्ज़-अदाई क्या है? कौन-सा फ़र्ज पूरा करने के लिए संगम पर बाप को आना पड़ता है?
उत्तर:- बीमार और दु:खी बच्चों को सुखी बनाना, माया के फँदे से निकाल घनेरे सुख देना-यह बाप की फर्ज-अदाई है, जो संगम पर ही बाप पूरी करते हैं। बाबा कहते-मैं आया हूँ तुम सबका मर्ज मिटाने, सब पर कृपा करने। अब पुरूषार्थ कर 21 जन्मों के लिए अपनी ऊंची तकदीर बना लो।
गीत:- भोलेनाथ से निराला….. 

ओम् शान्ति। भोलानाथ शिव भगवानुवाच-ब्रह्मा मुख कमल से बाप कहते हैं-यह वैराइटी भिन्न-भिन्न धर्मों का मनुष्य सृष्टि झाड़ है ना। इस कल्प वृक्ष अथवा सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ बच्चों को समझा रहा हूँ। गीत में भी इनकी महिमा है। शिवबाबा का जन्म यहाँ है, बाप कहते हैं मैं आया हूँ भारत में। मनुष्य यह नहीं जानते कि शिवबाबा कब पधारे थे? क्योंकि गीता में कृष्ण का नाम डाल दिया है। द्वापर की तो बात ही नहीं। बाप समझाते हैं-बच्चे, 5 हज़ार वर्ष पहले भी मैने आकर के यह ज्ञान दिया था। इस झाड़ से सभी को मालूम पड़ जाता है। झाड़ को अच्छी रीति देखो। सतयुग में बरोबर देवी-देवताओं का राज्य था, त्रेता में राम-सीता का है। बाबा आदि-मध्य-अन्त का राज़ बतलाते हैं। बच्चे पूछते हैं-बाबा, हम माया के फँदे में कब फँसे? बाबा कहते हैं द्वापर से। नम्बरवार फिर दूसरे धर्म आते हैं। तो हिसाब लगाने से समझ सकते हैं कि इस दुनिया में हम फिर से कब आयेंगे? शिवबाबा कहते हैं मैं 5 हज़ार वर्ष बाद आया हूँ, संगम पर अपना फ़र्ज निभाने। सभी जो भी मनुष्य मात्र हैं, सभी दु:खी हैं, उनमें भी खास भारतवासी। ड्रामा अनुसार भारत को ही मैं सुखी बनाता हूँ। बाप का फ़र्ज होता है बच्चे बीमार पड़ें तो उनकी दवा दर्मल करना। यह है बहुत बड़ी बीमारी। सभी बीमारियों का मूल ये 5 विकार हैं। बच्चे पूछते हैं यह कब से शुरू हुए? द्वापर से। रावण की बात समझानी है। रावण को कोई देखा नहीं जाता। बुद्धि से समझा जाता है। बाप को भी बुद्धि से जाना जाता है। आत्मा मन-बुद्धि सहित है। आत्मा जानती है कि हमारा बाप परमात्मा है। दु:ख-सुख, लेप-छेप में आत्मा आती है। जब शरीर है तो आत्मा को दु:ख होता है। ऐसे नहीं कहते कि मुझ परमात्मा को दु:खी मत करो। बाप भी समझाते हैं कि मेरा भी पार्ट है, कल्प-कल्प संगम पर आकर मैं पार्ट बजाता हूँ। जिन बच्चों को मैंने सुख में भेजा था, वह दु:खी बन पड़े हैं इसलिए फिर ड्रामा अनुसार मुझे आना पड़ता है। बाकी कच्छ-मच्छ अवतार यह बातें हैं नहीं। कहते हैं परशुराम ने कुल्हाड़ा ले क्षत्रियों को मारा। यह सब हैं दन्त कथायें। तो अब बाप समझाते हैं मुझे याद करो।

यह है जगत अम्बा और जगत पिता। मदर और फादर कन्ट्री कहते हैं ना। भारतवासी याद भी करते हैं-तुम मात-पिता….. तुम्हारी कृपा से सुख घनेरे तो बरोबर मिल रहे हैं। फिर जो जितना पुरूषार्थ करेंगे। जैसे बाइसकोप में जाते हैं, फर्स्टक्लास का रिजर्वेशन कराते हैं ना। बाप भी कहते हैं चाहे सूर्यवंशी, चाहे चन्द्रवंशी में सीट रिजर्व कराओ, जितना जो पुरूषार्थ करे उतना पद पा सकते हैं। तो सब मर्ज मिटाने बाप आये हैं। रावण ने सबको बहुत दु:ख दिया है। कोई भी मनुष्य, मनुष्य की गति-सद्गति कर न सके। यह है ही कलियुग का अन्त। गुरू लोग शरीर छोड़ते हैं फिर यहाँ ही पुनर्जन्म लेते हैं। तो फिर वह औरों की क्या सद्गति करेंगे! क्या इतने सभी अनेक गुरू मिलकर पतित सृष्टि को पावन बनायेंगे? गोवर्धन पर्वत कहते हैं ना। यह मातायें इस आइरन एजड पहाड़ को गोल्डन एजड बनाती हैं। गोवर्धन की फिर पूजा भी करते हैं, वह है तत्व पूजा। सन्यासी भी ब्रह्म अथवा तत्व को याद करते हैं। समझते हैं वही परमात्मा है, ब्रह्म भगवान है। बाप कहते हैं यह तो भ्रम है। ब्रह्माण्ड में तो आत्मायें अण्डे मिसल रहती हैं, निराकारी झाड़ भी दिखाया गया है। हर एक का अपना-अपना सेक्सन है। इस झाड़ का फाउन्डेशन है-भारत का सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी घराना। फिर वृद्धि होती है। मुख्य हैं 4 धर्म। तो हिसाब करना चाहिए-कौन-कौन से धर्म कब आते हैं? जैसे गुरूनानक 500 वर्ष पहले आये। ऐसे तो नहीं सिक्ख लोग कोई 84 जन्म का पार्ट बजाते हैं। बाप कहते हैं 84 जन्म सिर्फ तुम आलराउन्डर ब्राह्मणों के हैं। बाबा ने समझाया है कि तुम्हारा ही आलराउन्ड पार्ट है। ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तुम बनते हो। जो पहले देवी-देवता बनते हैं वही सारा चक्र लगाते हैं।

बाप कहते हैं तुमने वेद-शास्त्र तो बहुत सुने। अभी यह सुनो और जज करो कि शास्त्र राइट हैं या गुरू लोग राइट हैं या जो बाप सुनाते हैं वह राइट है? बाप को कहते ही हैं ट्रूथ। मैं सच बतलाता हूँ जिससे सतयुग बन जाता है और द्वापर से लेकर तुम झूठ सुनते आये हो तो उससे नर्क बन पड़ा है।

बाप कहते हैं-मैं तुम्हारा गुलाम हूँ, भक्ति मार्ग में तुम गाते आये हो-मैं गुलाम, मैं गुलाम तेरा….. अभी मैं तुम बच्चों की सेवा में आया हूँ। बाप को निराकारी, निरहंकारी गाया जाता है। तो बाप कहते हैं मेरा फ़र्ज है तुम बच्चों को सदा सुखी बनाना। गीत में भी है अगम-निगम का भेद खोले….. बाकी डमरू आदि बजाने की कोई बात नहीं है। यह तो आदि-मध्य-अन्त का सारा समाचार सुनाते हैं। बाबा कहते हैं तुम सभी बच्चे एक्टर्स हो, मैं इस समय करनकरावनहार हूँ। मैं इनसे (ब्रह्मा से) स्थापना करवाता हूँ। बाकी गीता में जो कुछ लिखा हुआ है, वह तो है नहीं। अभी तो प्रैक्टिकल बात है ना। बच्चों को यह सहज ज्ञान और सहज योग सिखलाता हूँ, योग लगवाता हूँ। कहा है ना योग लगवाने वाले, झोली भरने वाले, मर्ज़ मिटाने वाले…..। गीता का भी पूरा अर्थ समझाते हैं। योग सिखलाता हूँ और सिखलवाता भी हूँ। बच्चे योग सीखकर फिर औरों को सिखलाते हैं ना। कहते हैं योग से हमारी ज्योत जगाने वाले….. ऐसे गीत भी कोई घर में बैठकर सुने तो सारा ही ज्ञान बुद्धि में चक्र लगायेगा। बाप की याद से वर्से का भी नशा चढ़ेगा। सिर्फ परमात्मा वा भगवान कहने से मुख मीठा नहीं होता। बाबा माना ही वर्सा।

अब तुम बच्चे बाबा से आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान सुनकर फिर औरों को सुनाते हो, इसे ही शंखध्वनि कहा जाता है। तुमको कोई पुस्तक आदि हाथ में नहीं है। बच्चों को सिर्फ धारणा करनी होती है। तुम हो सच्चे रूहानी ब्राह्मण, रूहानी बाप के बच्चे। सच्ची गीता से भारत स्वर्ग बनता है। वह तो सिर्फ कथायें बैठ बनाई हैं। तुम सब पार्वतियाँ हो, तुमको यह अमरकथा सुना रहा हूँ। तुम सब द्रोपदियाँ हो। वहाँ कोई नंगन होते नहीं। कहते हैं तब बच्चे कैसे पैदा होंगे? अरे, हैं ही निर्विकारी तो विकार की बात कैसे हो सकती। तुम समझ नहीं सकेंगे कि योगबल से बच्चे कैसे पैदा होंगे! तुम आरग्यु करेंगे। परन्तु यह तो शास्त्रों की बातें हैं ना। वह है ही सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया। यह है विकारी दुनिया। मैं जानता हूँ ड्रामा अनुसार माया फिर तुमको दु:खी करेगी। मैं कल्प-कल्प अपना फ़र्ज पालन करने आता हूँ। जानते हैं कल्प पहले वाले सिकीलधे ही आकर अपना वर्सा लेंगे। आसार भी दिखाते हैं। यह वही महाभारत लड़ाई है। तुम्हें फिर से देवी-देवता अथवा स्वर्ग का मालिक बनने का पुरूषार्थ करना है। इसमें स्थूल लड़ाई की कोई बात नहीं है। न असुरों व देवताओं की लड़ाई ही हुई है। वहाँ तो माया ही नहीं जो लड़ाये। आधाकल्प न कोई लड़ाई, न कोई भी बीमारी, न दु:ख-अशान्ति। अरे, वहाँ तो सदैव सुख, बहार ही बहार रहती है। हॉस्पिटल होती नहीं, बाकी स्कूल में पढ़ना तो होता ही है। अब तुम हर एक यहाँ से वर्सा ले जाते हो। मनुष्य पढ़ाई से अपने पैर पर खड़े हो जाते हैं। इस पर कहानी भी है-कोई ने पूछा तुम किसका खाती हो? तो कहा हम अपनी तकदीर का खाती हैं। वह होती है हद की तकदीर। अभी तुम अपनी बेहद की तकदीर बनाते हो। तुम ऐसी तकदीर बनाते हो जो 21 जन्म फिर अपना ही राज्य भाग्य भोगते हो। यह है बेहद के सुख का वर्सा, अब तुम बच्चे कान्ट्रास्ट को अच्छी रीति जानते हो, भारत कितना सुखी था। अब क्या हाल है! जिन्होंने कल्प पहले राज्य-भाग्य लिया होगा वही अब लेंगे। ऐसे भी नहीं कि जो ड्रामा में होगा वो मिलेगा, फिर तो भूख मर जायेंगे। यह ड्रामा का राज़ पूरा समझना है। शास्त्रों में कोई ने कितनी आयु, कोई ने कितनी लिख दी है। अनेकानेक मत-मतान्तर हैं। कोई फिर कहते हैं हम तो सदा सुखी हैं ही। अरे, तुम कभी बीमार नहीं होते हो? वह तो कहते हैं रोग आदि तो शरीर को होता है, आत्मा निर्लेप है। अरे, चोट आदि लगती है तो दु:ख आत्मा को होता है ना-यह बड़ी समझने की बातें हैं। यह स्कूल है, एक ही टीचर पढ़ाते हैं। नॉलेज एक ही है। एम ऑबजेक्ट एक ही है, नर से नारायण बनने की। जो नापास होंगे वह चन्द्रवंशी में चले जायेंगे। जब देवतायें थे तो क्षत्रिय नहीं, जब क्षत्रिय थे तो वैश्य नहीं, जब वैश्य थे तो शूद्र नहीं। यह सब समझने की बातें हैं। माताओं के लिए भी अति सहज है। एक ही इम्तहान है। ऐसे भी मत समझो कि देरी से आने वाले कैसे पढ़ेंगे। लेकिन अभी तो नये तीखे जा रहे हैं। प्रैक्टिकल में है। बाकी माया रावण का कोई रूप नहीं, कहेंगे इनमें काम का भूत है, बाकी रावण का कोई बुत वा शरीर तो है नहीं।

अच्छा, सभी बातों का सैक्रीन है मन्मनाभव। कहते हैं मुझे याद करो तो इस योग अग्नि से विकर्म विनाश होंगे। बाप गाइड बनकर आते हैं। बाबा कहते-बच्चे, मैं तो सम्मुख तुम बच्चों को पढ़ा रहा हूँ। कल्प-कल्प अपनी फ़र्ज-अदाई पालन करता हूँ। पारलौकिक बाप कहते हैं मैं अपना फ़र्ज बजाने आया हूँ-तुम बच्चों की मदद से। मदद देंगे तब तो तुम भी पद पायेंगे। मैं कितना बड़ा बाप हूँ। कितना बड़ा यज्ञ रचा है। ब्रह्मा की मुख वंशावली तुम सभी ब्राह्मण-ब्राह्मणियाँ भाई-बहन हो। जब भाई-बहिन बनें तो स्त्री-पुरूष की दृष्टि बदल जाए। बाप कहते हैं इस ब्राह्मण कुल को कलंकित नहीं करना, पवित्र रहने की युक्तियाँ हैं। मनुष्य कहते हैं यह कैसे होगा? ऐसे हो नहीं सकता, इकट्ठे रहें और आग न लगे! बाबा कहते हैं बीच में ज्ञान तलवार होने से कभी आग नहीं लग सकती, परन्तु जबकि दोनों मन्मनाभव रहें, शिवबाबा को याद करते रहें, अपने को ब्राह्मण समझें। मनुष्य तो इन बातों को नहीं समझने कारण हंगामा मचाते हैं, यह गालियाँ भी खानी पड़ती हैं। कृष्ण को थोड़ेही कोई गाली दे सकते। कृष्ण ऐसे आ जाए तो विलायत आदि से एकदम एरोप्लेन में भाग आयें, भीड़ मच जाए। भारत में पता नहीं क्या हो जाए।

अच्छा, आज भोग है – यह है पियरघर और वह है ससुरघर। संगम पर मुलाकात होती है। कोई-कोई इनको जादू समझते हैं। बाबा ने समझाया है कि यह साक्षात्कार क्या है? भक्ति मार्ग में कैसे साक्षात्कार होते हैं, इनमें संशयबुद्धि नहीं होना है। यह रस्म-रिवाज है। शिवबाबा का भण्डारा है तो उनको याद कर भोग लगाना चाहिए। योग में रहना तो अच्छा ही है। बाबा की याद रहेगी। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) स्वयं को ब्रह्मा मुख वंशावली समझकर पक्का पवित्र ब्राह्मण बनना है। कभी अपने इस ब्राह्मण कुल को कलंकित नहीं करना है।

2) बाप समान निराकारी, निरहंकारी बन अपनी फ़र्ज-अदाई पूरी करनी है। रूहानी सेवा पर तत्पर रहना है।

वरदान:- सेवाओं की प्रवृत्ति में रहते बीच-बीच में एकान्तवासी बनने वाले अन्तर्मुखी भव
साइलेन्स की शक्ति का प्रयोग करने के लिए अन्तर्मुखी और एकान्तवासी बनने की आवश्यकता है। कई बच्चे कहते हैं अन्तर्मुखी स्थिति का अनुभव करने वा एकान्तवासी बनने के लिए समय ही नहीं मिलता क्योंकि सेवा की प्रवृत्ति, वाणी के शक्ति की प्रवृत्ति बहुत बढ़ गई है लेकिन इसके लिए इक्ट्ठा आधा घण्टा वा एक घण्टा निकालने के बजाए बीच-बीच में थोड़ा समय भी निकालो तो शक्तिशाली स्थिति बन जायेगी।
स्लोगन:- ब्राह्मण जीवन में युद्ध करने के बजाए मौज मनाओ तो मुश्किल भी सहज हो जायेगा।

TODAY MURLI 26 DECEMBER 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 26 December 2018

Read Murli in Hindi :- Click Here

Read Murli 25 December 2018 :- Click Here

26/12/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, the Benefactor Father is now benefiting you in such a way that you never have to cry. To cry is a sign of inauspiciousness and of body consciousness.
Question: By knowing what is fixed in destiny can you always remain carefree?
Answer: You know that this old world is definitely to be destroyed. Although people continue to make effort for peace, human beings want one thing and something else happens. No matter how much they try, this destiny cannot be prevented. There have to be natural calamities. You have the intoxication that you have taken God’s lap. All the visions that you have had are to happen in a practical way. You therefore remain constantly carefree.

Om shanti. At this moment in the world, there is praise of only the path of devotion in people’s intellects because it is now the path of devotion. Here, there is no praise of devotion. Here, there is praise of the Father. You have to praise the Father from whom you receive such an elevated inheritance. There is no happiness in devotion. Even while on the path of devotion, they still remember heaven. When a person dies, people say that he has become a resident of heaven. So, they should be happy. If someone takes birth in heaven, there is no need to cry. In fact, it is not true that he has become a resident of heaven and this is why they continue to cry. Now, how can there be benefit for those who cry? Crying is a sign of sorrow. Human beings cry, do they not? Even babies cry when they are born because they feel sorrow. If there weren’t sorrow, they would definitely remain cheerful. One feels like crying when there is one type of loss or another. There is never any inauspiciousness in the golden age, and this is why they never cry there. There is no question of anything inauspicious there. Here, sometimes there is a loss in earning an income and sometimes there isn’t any food, and so they are unhappy. At a time of sorrow, people cry and they remember God: Come and benefit everyone. If He is omnipresent, who is it they are telling to come and benefit everyone? To believe that the Supreme Father, the Supreme Soul, is omnipresent is the biggest mistake. The Father is the Benefactor for All. He alone is the Benefactor and so He surely has to benefit everyone. You children know that the Supreme Father, the Supreme Soul, always benefits everyone. So, when can that Supreme Father, the Supreme Soul, come so that He can benefit the world? There is no one else who could benefit the world. They then call the Father omnipresent. That is such a big mistake. The Father now gives you His own introduction and says: Manmanabhav! Only in this is there benefit. In the golden and silver ages, under no circumstances is there ever any inauspiciousness. Even in the silver age, when it is the kingdom of Rama, the lion and the lamb drink water together. We do not praise the kingdom of Rama and Sita as much because, when it becomes two degrees fewer, there is a little less happiness. We prefer heaven which the Father establishes. If we claim our full inheritance of that, it is good. We have to claim the inheritance from the highest-on-high Father and benefit everyone. Each one has to benefit the self by following shrimat. The Father has explained: One is the devilish community and the other is the deity community. Now, on the one side there is the kingdom of Ravan and on the other side I am establishing the deity community. It isn’t that it is the deity community now. I am making the devilish community divine. It is said that the deity community exists in the golden age. The Father says: I am changing this devilish community into the future deity community. It is now the Brahmin community. The deity community is being created. Even Guru Nanak said: It didn’t take God long to change humans into deities. However, which human beings would He change into deities? They don’t know the beginning, the middle or the end of the drama. Even the most elevated Lakshmi and Narayan who exist at the beginning of the world do not know the beginning, the middle or the end. They are not trikaldarshi. They were trikaldarsh in their previous birth. They were spinners of the discus of self-realisation and that was how they claimed their royal status. However, people have then given the discus of self-realisation to Vishnu. Therefore, you have to explain that it is Brahmins who are spinners of the discus of self-realisation, and people will be amazed. They say Krishna is that and also Vishnu is that. They don’t know that Vishnu is the dual-form of Lakshmi and Narayan. We did not know this either. In every situation people say, “It is destiny!” No one can prevent that which is to happen. This is the drama. So, first of all, do you have to give the Father’s introduction or explain the secrets of the drama? In that too, you have to have remembrance of Baba. So, first of all, you have to give the Father’s introduction. Shiv Baba, the unlimited Baba, is well known. “Rudra Baba” is never said. Shiv Baba is very well known. The Father has explained: Wherever there are devotees, go there and explain to them. It was printed in the newspapers that people say that the age of the Himalayas is multimillion years. How could there be an age for the Himalayas? They always exist. Do the Himalayas ever disappear? This Bharat is also eternal. You cannot say when it was created; you cannot give it an age. In the same way, you cannot even say how long the Himalayas have been here. There cannot be an age for these Himalayan mountains. You cannot say that the sky or the ocean are this old. If they speak of the age of the Himalayas, they should also be able to tell the age of the ocean, but they don’t know anything. Here, you have to receive your inheritance from your Father. This is the Godly family. You know that by belonging to the Father you become the masters of heaven. It is not a question of one King Janak. There will be many in liberation-in-life in God’s kingdom. All will have received liberation-in-life. You are making effort in order to receive liberation and liberation-in-life in a second. You have become children. You say: Mama, Baba. You would receive liberation-in-life, would you not? You can understand that so many subjects are being created. Your influence has to spread day by day. It takes a lot of effort to establish this religion. Those souls come from up above to carry out their establishment and all others follow on after them. Here, each one of you has to be made worthy of receiving your fortune of the kingdom. It is the Father’s duty to make you worthy. Maya has made everyone unworthy, even those who were worthy of liberation and liberation-in-life. Even the five elements have become unworthy. Again, it is the Father who makes them worthy. Whatever effort is being made at every second now, you understand that so-and-so made the same effort in the previous cycle. Some who were amazed, run away and divorce the Father. You continue to see this in a practical way. You also understand that destruction is just ahead. According to the drama, everyone has to come to act. Human beings want one thing but destiny is something else. They want peace but you children know the destiny. You have had visions. No matter how much they beat their heads for destruction not to take place, it cannot be prevented; it is destined. There will be earthquakes and natural calamities. What can they do? They will say: This is an act of God. Among you too, there are very few of you who have that much intoxication and stay in remembrance. Not everyone has become complete. You know that this destiny cannot be prevented. There isn’t food; there is no place for people to stay; one can’t find three feet of land. This is your Godly family: the mother, Father and children. The Father says: I reveal Myself in front of My children. I teach you children. Children say: We are following the Father’s directions. The Father says: I only come personally in front of my children and give them directions. Only my children would understand them. If you don’t understand them, then leave it alone; there is no need to fight. I am giving you the Father’s introduction. The Father says: Remember Me and your sins will be absolved, and remember the discus of self-realisation and you will become rulers of the globe. This is the meaning of “Manmanabhav” and “Madhyajibhav”. Give the Father’s introduction through which they can understand the secrets of the Creator and creation. This is the main thing. This is the one main mistake in the Gita. The Father says: I, the Benefactor, have to come and benefit everyone. However, there cannot be any benefit in the scriptures. First of all, you have to prove that God is One. You remember Him but you don’t know Him. If you want to remember the Father, you also need His introduction. Where does He live? Does He come here or not? The Father would definitely give the inheritance for here. Or, would it be for there? The Father has to be personally in front of you. People celebrate Shiv Ratri. Shiva is the Supreme Father of all souls. He is the Creator and He gives new knowledge. He knows the beginning, middle and end of the world cycle. He is the highest-on-high T eacher who changes human beings into deities. He teaches you Raja Yoga. Human beings can never teach Raja Yoga. We have been taught by Him and this is why we able to teach you. “Manmanabhav and Madhyajibhav” are mentioned at the beginning and the end of the Gita. You also have the knowledge of the tree and the drama in your intellects. They have to be explained in detail. The end result is just one thing: You have to remember the Father and the inheritance. Here, there is just the one thing: We will become the masters of the world. Only the Benefactor of the world makes you into the masters of the world. He makes you into the masters of heaven, He would not make you into the masters of hell. The world doesn’t know that Ravan is the creator of hell and that the Father is the Creator of heaven. The Father says: Death is now just ahead. It is the stage of retirement for everyone. I have come to take you back. Remember Me and your sins will be absolved. You souls will become pure from dirty. I will then send you to heaven. You have to explain this to everyone with faith in your intellects, not simply like parrots. Those who have faith in their intellects have no need to cry or become body conscious. Body consciousness makes you very dirty. Become soul conscious now. Perform actions for the livelihood of your body. Those people become renunciates of action. Here, you have to live at home with your families and look after your children. It is very easy to know the Father and the cycle. The Father has so many children. Some of them are worthy and some are unworthy: they defame the Father’s name; they dirty their faces. The Father says: Do not dirty your faces. You become the children and you then dirty your faces! So, you then become those who defame the name of the clan. By sitting on that pyre of lust, you have become ugly. You don’t want to burn yourself to death on the pyre of lust, do you? There shouldn’t be even the slightest intoxication of that. Sannyasis etc. would not say this to their followers. They are not followers in reality. The Father explains true things to everyone. The Father says: Remember Me. You have given a guarantee: Baba, I will follow Your directions and become a resident of heaven. The Father says: Children, in that case, why do you have thoughts of falling into the gutter of vice? When you daughters read them such murlis, they say: We have never heard such knowledge before. You should catch hold of the heads of the temples. You should take the pictures to them. This Trimurti and the tree are pictures of Dilwala. The deity tree is at the top, but then they show the deity tree that has become the past If someone does such service, Baba would praise him: This one has performed wonders; just as Baba praises Ramesh. He has invented a very good exhibition which is a good way of doing service at a fast speed. We will have an exhibition here too. The pictures are very good. Look at the religious conferences that take place in Delhi: they too say that there should be oneness. There is no meaning in that. The Father is One and all the rest are brothers and sisters. It is a question of receiving the inheritance from the Father. How will you unite and become like milk and sugar? These are matters to be understood. A method has to be invented for the growth of exhibitions. Those who don’t give the proof of service should be ashamed. If ten new ones come but eight to ten old ones die, what is the benefit? Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. While performing actions for the livelihood of your body, practise remaining soul conscious. Under no circumstances must you cry or become body conscious.
  2. Benefit yourself and others by following shrimat. Become worthy and glorify the Father’s name.
Blessing: May you be a self-sovereign and by become a goddess of coolness (Sheetla devi) by making your physical organs cool and peaceful.
The children who are self-sovereigns cannot be deceived by any of their physical organs. When the mischief that causes deception finishes and all your physical organs also become cool you become a goddess of coolness. A goddess of coolness never has anger. Some say that they do not have anger, but that they have to be a little bossy. However, bossiness is also a progeny of anger. Where there is a trace of it, a whole progeny is created. So, you are gods and goddesses of coolness and this is why you must not allow the sanskars of anger or bossiness to emerge even in your dreams.
Slogan: Obedient children are naturally worthy of receiving good wishes and blessings; they do not need to ask for blessings.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 26 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 26 December 2018

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26-12-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – कल्याणकारी बाप अभी तुम्हारा ऐसा कल्याण कर देते हैं जो कभी रोना न पड़े, रोना अकल्याण वा देह-अभिमान की निशानी है”
प्रश्नः- किस अटल भावी को जानते हुए तुम्हें सदा निश्चिंत रहना है?
उत्तर:- तुम जानते हो कि इस पुरानी दुनिया का विनाश अवश्य होना है। भल पीस के लिए प्रयास करते रहते हैं लेकिन नर चाहत कुछ और…….. कितना भी कोशिश करें यह भावी टल नहीं सकती। नैचुरल कैलेमिटीज़ आदि भी होनी हैं। तुम्हें नशा है कि हमने ईश्वरीय गोद ली है, जो साक्षात्कार किये हैं, वह सब प्रैक्टिकल में होना ही है, इसलिए तुम सदा निश्चिन्त रहते हो।

ओम् शान्ति। विश्व में मनुष्यों की बुद्धि में भक्ति मार्ग का ही गायन है क्योंकि अभी भक्ति मार्ग चल रहा है। यहाँ फिर भक्ति का गायन नहीं है। यहाँ तो बाप का गायन है। बाप की महिमा करनी होती है, जिस बाप से इतना ऊंच वर्सा मिलता है। भक्ति में सुख नहीं है। भक्ति में रहते हुए भी याद तो स्वर्ग को करते हैं ना। मनुष्य मरते हैं तो कहते हैं स्वर्गवासी हुआ। तो खुश होना चाहिए ना। जबकि स्वर्ग में जन्म लेते तो फिर रोने की तो दरकार नहीं। वास्तव में यह सच्ची बात तो है नहीं कि स्वर्गवासी हुआ, इसलिए रोते रहते हैं। अब इन रोने वालों का कल्याण कैसे हो? रोना दु:ख की निशानी है। मनुष्य रोते तो हैं ना। बच्चे जन्मते हैं तो भी रोते हैं क्योंकि दु:ख होता है। दु:ख नहीं होगा तो जरूर हर्षित रहेंगे। रोना तब आता है जब कोई न कोई अकल्याण होता है। सतयुग में कभी अकल्याण नहीं होता इसलिए वहाँ कभी रोते नहीं। अकल्याण की बात ही नहीं होती। यहाँ कभी कमाई में घाटा पड़ता है या कभी अन्न नहीं मिलता तो दु:खी होते हैं। दु:ख में रोते हैं, भगवान् को याद करते हैं कि आकर सभी का कल्याण करो। अगर सर्वव्यापी है तो किसको कहते हैं – कल्याण करो? परमपिता परमात्मा को सर्वव्यापी मानना बड़े से बड़ी भूल है। बाप है सबका कल्याणकारी, वह एक ही कल्याणकारी है तो जरूर सबका कल्याण करेंगे। तुम बच्चे जानते हो परमपिता परमात्मा हमेशा कल्याण ही करते हैं। अब वह परमपिता परमात्मा कब आये जो विश्व का कल्याण करे? विश्व का कल्याण करने वाला और तो कोई है नहीं। बाप को फिर सर्वव्यापी कह देते हैं। कितनी भारी भूल है। अभी बाप अपना परिचय देकर कहते हैं मनमनाभव, इसमें ही कल्याण है। सतयुग-त्रेता में कोई भी हालत में अकल्याण होता नहीं। त्रेता में भी जबकि रामराज्य है तो वहाँ शेर-बकरी इकट्ठे जल पीते हैं। हम राम-सीता के राज्य की इतनी स्तुति नहीं करेंगे क्योंकि दो कला कम हो जाने से कुछ न कुछ सुख कम मिलता है। हम तो पसन्द करते हैं स्वर्ग, जो बाप स्थापन करते हैं। उसमें पूरा वर्सा पायें तो बहुत अच्छा है। ऊंच ते ऊंच बाप से वर्सा ले हम कल्याण करें। हर एक को अपना कल्याण करना है श्रीमत पर।

बाप ने समझाया है – एक है आसुरी सम्प्रदाय, दूसरा है दैवी सम्प्रदाय। अभी एक तरफ रावण राज्य है, दूसरे तरफ मैं दैवी सम्प्रदाय स्थापन कर रहा हूँ। ऐसे नहीं कि अभी दैवी सम्प्रदाय है। आसुरी सम्प्रदाय को मैं दैवी बना रहा हूँ। कहेंगे दैवी सम्प्रदाय तो सतयुग में होता है। बाप कहते हैं इस आसुरी सम्प्रदाय को दैवी सम्प्रदाय भविष्य के लिए बनाता हूँ। अभी है ब्राह्मण सम्प्रदाय, दैवी सम्प्रदाय बन रहा है। गुरुनानक ने भी कहा है मनुष्य से देवता…….. परन्तु कौन से मनुष्य हैं जिनको देवता बनायेंगे? वह ड्रामा के आदि, मध्य, अन्त को तो जानते नहीं। सृष्टि के आदि में जो लक्ष्मी-नारायण श्रेष्ठाचारी हैं, वह भी आदि, मध्य, अन्त को नहीं जानते। त्रिकालदर्शी नहीं हैं। आगे जन्म में त्रिकालदर्शी थे, स्वदर्शन चक्रधारी थे तब यह राज्य पद पाया है। उन्होंने फिर स्वदर्शन चक्र दे दिया है विष्णु को। तो यह भी समझाना है कि स्वदर्शन चक्रधारी ब्राह्मण हैं तो मनुष्य आश्चर्य खायेंगे। वह तो कृष्ण को भी कह देते, विष्णु को भी कह देते। यह तो जानते नहीं कि विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण हैं। हम भी नहीं जानते थे। मनुष्य तो हर बात में कह देते हैं भावी। जो होने वाला है उसको कोई टाल नहीं सकते। यह तो ड्रामा है। तो पहले-पहले बाप का परिचय दें या ड्रामा का राज़ समझायें? सो भी जब बाबा की याद हो, पहले-पहले बाप का परिचय देना चाहिए। बेहद का बाबा, शिवबाबा तो मशहूर है। रूद्र बाबा भी नहीं कहते। शिवबाबा नामीग्रामी है। बाप ने समझाया है कि जहाँ-जहाँ भक्त हैं, उन्हों को जाकर समझाओ। अखबार में पढ़ा था मनुष्य कहते हैं कि हिमालय की इतनी मल्टीमिलियन एज है। अब हिमालय की कोई आयु होती है क्या? यह तो सदैव है ही। हिमालय कभी गुम होता है क्या? यह भारत भी अनादि है। कब रचा गया, उसकी एज नहीं निकाल सकते। वैसे हिमालय के लिए भी नहीं कह सकते कि यह कब से है। इस हिमालय पहाड़ की आयु गिनी नहीं जाती। ऐसे थोड़ेही कहेंगे कि आकाश की वा समुद्र की आयु इतनी है। हिमालय की आयु कहते हैं, तो समुद्र की भी बतायें, कुछ भी जानते नहीं। यहाँ तो तुमको बाप से वर्सा पाना है। यह है ईश्वरीय फैमली।

तुम जानते हो बाप का बनने से स्वर्ग के मालिक बनते हैं। एक राजा जनक की बात नहीं। जीवनमुक्ति में अथवा रामराज्य में तो बहुत होंगे ना। सबको जीवनमुक्ति मिली होगी। तुम सेकेण्ड में मुक्ति-जीवनमुक्ति पाने के पुरूषार्थी हो। बच्चा बने हो, मम्मा-बाबा कहते हो। जीवनमुक्ति तो मिलेगी ना। समझ सकते हैं प्रजा तो ढेर की ढेर बनती जाती है। दिन-प्रतिदिन प्रभाव तो निकलना है ना। यह धर्म की स्थापना करना बड़ी मेहनत है। वह तो ऊपर से आकर स्थापना करते हैं, उनके पिछाड़ी ऊपर से आते-जाते हैं। यहाँ तो एक-एक को राज्य-भाग्य पाने का लायक बनाना पड़ता है। लायक बनाना बाप का काम है। जो मुक्ति-जीवनमुक्ति के लायक थे, सबको माया ने ना-लायक बना दिया है। 5 तत्व भी ना-लायक बने हैं, फिर लायक बनाने वाला बाप है। तुम्हारा अभी सेकेण्ड-सेकेण्ड जो पुरूषार्थ चलता है, समझते हैं कल्प पहले भी फलाने ने ऐसा ही पुरूषार्थ किया था। कोई आश्चर्यवत् भागन्ती हो जाते हैं, फारकती दे देते हैं। प्रैक्टिकल देखते रहते हैं। यह भी समझते हैं विनाश सामने खड़ा है, ड्रामा अनुसार सबको एक्ट में आना है। नर चाहत कुछ और…… वह चाहते हैं पीस हो परन्तु भावी को तुम बच्चे जानते हो। तुमने साक्षात्कार किया है, वह भल कितना भी माथा मारें कि विनाश न हो परन्तु यह भावी टल नहीं सकती। अर्थक्वेक नैचुरल कैलेमिटीज होंगी, वह क्या कर सकते। कहेंगे यह तो गॉड का काम है। तुम्हारे में भी बहुत थोड़े हैं जिनको इतना नशा चढ़ता है और याद में रहते हैं। सब तो परिपूर्ण नहीं बने हैं। तुम जानते हो यह भावी टलने की नहीं है। अन्न नहीं है, मनुष्यों के रहने के लिए जगह नहीं है, 3 पैर पृथ्वी के नहीं मिलते।

तुम्हारा यह है ईश्वरीय परिवार – मात, पिता और बच्चे। बाप कहते हैं मैं बच्चों के आगे ही प्रत्यक्ष होता हूँ। बच्चों को सिखाता हूँ। बच्चे भी कहते हैं – हम बाप की मत पर चलते हैं। बाप भी कहते हैं मैं बच्चों के ही सम्मुख आकर मत देता हूँ। बच्चे ही समझेंगे। नहीं समझते हैं तो छोड़ो, लड़ने की कोई बात नहीं। हम परिचय देते हैं बाप का। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो विकर्म विनाश होंगे और स्वदर्शन चक्र को याद करो तो चक्रवर्ती राजा बनेंगे। मनमनाभव, मध्याजी भव का अर्थ भी यह है। बाप का परिचय दो जिससे क्रियेटर और क्रियेशन का राज़ तो समझ जायें। मुख्य यह एक ही बात है, गीता में मुख्य यह एक ही भूल है। बाप कहते हैं मुझ कल्याणकारी को ही आकर कल्याण करना है। बाकी शास्त्रों से कल्याण हो नहीं सकता। पहले तो सिद्ध करना है कि भगवान् एक है, उनको तुम याद करते हो परन्तु जानते नहीं हो। बाप को याद करना है तो परिचय भी चाहिए ना। वह कहाँ रहते हैं, आते हैं वा नहीं? बाप वर्सा तो जरूर यहाँ के लिए देंगे या वहाँ के लिए देंगे? बाप तो सम्मुख चाहिए। शिवरात्रि भी मनाते हो। शिव तो सुप्रीम फादर है, सब आत्माओं का। वह रचता है, नई नॉलेज देते हैं। सृष्टि चक्र के आदि, मध्य, अन्त को वह जानते हैं। वह है ऊंचे से ऊंचा टीचर, जो मनुष्य को देवता बनाते हैं, राजयोग सिखलाते हैं। मनुष्य कभी राजयोग सिखला न सकें। हमको भी उसने सिखलाया तब हम सिखलाते हैं। गीता में भी शुरूआत में और अन्त में मनमनाभव और मध्याजी भव कहा है। झाड़ और ड्रामा का नॉलेज भी बुद्धि में रहता है। डिटेल में समझाना पड़ता है। रिजल्ट में फिर भी एक बात आती है – बाप और वर्से को याद करना है। यहाँ तो एक ही बात है, हम विश्व के मालिक बनेंगे। विश्व का कल्याणकारी ही विश्व का मालिक बनाते हैं। स्वर्ग का मालिक बनायेंगे, नर्क का थोड़ेही मालिक बनायेंगे। दुनिया यह नहीं जानती कि नर्क का रचयिता रावण है, स्वर्ग का रचयिता बाप है। अब बाप कहते हैं मौत सामने खड़ा है, सबकी वानप्रस्थ अवस्था है, मैं लेने आया हूँ। मुझे याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। आत्मा मैली से शुद्ध हो जायेगी। फिर तुमको स्वर्ग में भेज देंगे। यह निश्चयबुद्धि से किसको समझाना है, तोते मुआफ़िक नहीं। निश्चयबुद्धि को फिर रोने की वा देह अभिमान में आने की बात नहीं रहती। देह-अभिमान बहुत गन्दा बना देता है। अब तुम देही-अभिमानी बनो। शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करो। वह तो कर्म सन्यासी बन जाते हैं। यहाँ तो तुमको गृहस्थ व्यवहार में रहना है, बच्चों को सम्भालना है। बाप को और चक्र को जानना तो बहुत सहज है।

बाप को कितने बच्चे हैं। फिर उनमें कोई सपूत हैं कोई कपूत हैं। नाम बदनाम करते हैं। काला मुंह कर देते हैं। बाप कहते हैं काला मुंह नहीं करो। बच्चा बन और फिर काला मुंह करते हो, कुल कलंकित बनते हो। इस काम चिता से तुम सांवरे बने हो। काम चिता पर थोड़ेही जल मरना है। हल्का नशा भी नहीं होना चाहिए। सन्यासी आदि अपने फालोअर्स को ऐसे थोड़ेही कहेंगे। वह रीयल्टी में नहीं हैं। बाप तो सबको सच्ची बातें समझाते हैं। बाप कहते हैं मुझे याद करो। तुमने गैरन्टी की है – बाबा आपकी मत पर चल हम स्वर्गवासी बनेंगे। बाप कहते हैं बच्चे फिर विषय गटर में गिरने का ख्याल क्यों करते हो? तुम बच्चियां जब ऐसी मुरली चलाओ तो कहेंगे ऐसा ज्ञान तो हमने कभी सुना नहीं। मन्दिर के हेड्स को पकड़ना चाहिए। चित्र ले जाना चाहिए। यह त्रिमूर्ति झाड़ दिलवाला के ही चित्र हैं। ऊपर में दैवी झाड़ खड़ा है, बाकी दैवी झाड़ जो पास्ट हो गया वह दिखाते हैं। ऐसी सर्विस कोई करके दिखाए तब बाबा महिमा करे, इसने तो कमाल की है। जैसे बाबा रमेश की महिमा करते हैं। प्रदर्शनी विहंग मार्ग की सर्विस का नमूना अच्छा निकाला है। यहाँ भी प्रदर्शनी करेंगे। चित्र तो बहुत अच्छे हैं।

अब देखो देहली में जो रिलीजस कान्फ्रेन्स होती है वह भी कहते हैं वननेस हो। उसका तो अर्थ ही नहीं। बाप एक है, बाकी हैं भाई-बहन। बाप से वर्सा मिलने की बात है। आपस में मिल क्षीरखण्ड कैसे होंगे, यह बातें समझने की हैं। प्रदर्शनी की वृद्धि लिये युक्ति रचनी है। जो सर्विस का सबूत नहीं दिखाते उनको तो लज्जा आनी चाहिए। अगर 10 नये आये और 8-10 मर गये तो इससे फायदा क्या हुआ। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) शरीर निर्वाह अर्थ काम करते देही-अभिमानी रहने का अभ्यास करना है। किसी भी परिस्थिति में रोना वा देह-अभिमान में नहीं आना है।

2) श्रीमत पर अपना और दूसरों का कल्याण करना है। सपूत बन बाप का नाम बाला करना है।

वरदान:- शीतला देवी बन सर्व कर्मेन्द्रियों को शीतल शान्त बनाने वाले स्वराज्य अधिकारी भव
जो स्वराज्य अधिकारी बच्चे हैं, उन्हें कोई भी कर्मेन्द्रिय धोखा नहीं दे सकती। जब धोखा देने की चंचलता समाप्त हो जाती है तब स्वयं शीतला देवी बन जाते और सब कर्मेन्द्रियां भी शीतल हो जाती। शीतला देवी में कभी क्रोध नहीं आता। कई कहते हैं क्रोध नहीं है, थोड़ा रोब तो रखना पड़ता है। लेकिन रोब भी क्रोध का अंश है। तो जहाँ अंश है वहाँ वंश पैदा हो जाता है। तो शीतला देवी और शीतल देव हो इसलिए स्वप्न में भी क्रोध वा रोब का संस्कार इमर्ज न हो।
स्लोगन:- आज्ञाकारी बच्चे स्वत: आशीर्वाद के पात्र होते हैं, उन्हें आशीर्वाद मांगने की दरकार नहीं।
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