23 october ki murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 23 OCTOBER 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 23 October 2019

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23-10-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम जितना-जितना बाप को प्यार से याद करेंगे उतना आशीर्वाद मिलेगी, पाप कटते जायेंगे”
प्रश्नः- बाप बच्चों को किस धर्म में टिकने की मत देते हैं?
उत्तर:- बाबा कहते बच्चे – तुम अपने विचित्रता के धर्म में टिको, चित्र के धर्म में नहीं। जैसे बाप विदेही, विचित्र है ऐसे बच्चे भी विचित्र हैं फिर यहाँ चित्र (शरीर) में आते हैं। अभी बाप बच्चों को कहते हैं बच्चे विचित्र बनो, अपने स्वधर्म में टिको। देह-अभिमान में नहीं आओ।
प्रश्नः- भगवान भी ड्रामा अनुसार किस बात के लिए बंधायमान है?
उत्तर:- ड्रामानुसार बच्चों को पतित से पावन बनाने के लिए भगवान भी बंधायमान है। उनको आना ही है पुरुषोत्तम संगमयुग पर।

ओम् शान्ति। बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं जब ओम् शान्ति कहा जाता है तो गोया अपनी आत्मा को स्वधर्म का परिचय दिया जाता है। तो जरूर बाप भी ऑटोमेटिकली याद आता है क्योंकि याद तो हरेक मनुष्य भगवान को ही करते हैं। सिर्फ भगवान का पूरा परिचय नहीं है। भगवान अपना और आत्मा का परि-चय देने ही आते हैं। पतित-पावन कहा ही जाता है भगवान को। पतित से पावन बनाने के लिए भगवान भी ड्रामा अनुसार बंधायमान हैं। उनको भी आना है पुरूषोत्तम संगमयुग पर। संगमयुग की समझानी भी देते हैं। पुरानी दुनिया और नई दुनिया के बीच में ही बाप आते हैं। पुरानी दुनिया को मृत्युलोक, नई दुनिया को अमर-लोक कहा जाता है। यह भी तुम समझते हो, मृत्युलोक में आयु कम होती है। अकाले मृत्यु होती रहती है। वह फिर है अमरलोक, जहाँ अकाले मृत्यु नहीं होती क्योंकि पवित्र हैं। अपवित्रता से व्यभिचारी बनते हैं और आयु भी कम होती है। बल भी कम हो जाता है। सतयुग में पवित्र होने कारण अव्यभिचारी हैं। बल भी जास्ती रहता है। बल बिगर राजाई कैसे प्राप्त की? जरूर बाप से उन्होंने आशीर्वाद ली होगी। बाप है सर्वशक्तिमान्। आशीर्वाद कैसे ली होगी? बाप कहते हैं मुझे याद करो। तो जिन्होंने जास्ती याद किया होगा उन्होंने ही आशी-र्वाद ली होगी। आशीर्वाद कोई मांगने की चीज़ नहीं है। यह तो मेहनत करने की चीज़ है। जितना जास्ती याद करेंगे उतना जास्ती आशीर्वाद मिलेगी अर्थात् ऊंच पद मिलेगा। याद ही नहीं करेंगे तो आर्शीवाद भी नहीं मिलेगी। लौकिक बाप बच्चों को कभी यह नहीं कहते हैं कि मुझे याद करो। वह छोटेपन से आपेही मम्मा-बाबा करते रहते हैं। आरगन्स छोटे हैं, बड़े बच्चे कब ऐसे बाबा-बाबा, मम्मा-मम्मा नहीं कहेंगे। उन्हों की बुद्धि में रहता है – यह हमारे माँ-बाप हैं, जिनसे यह वर्सा मिलना है। कहने की वा याद करने की बात नहीं रहती है। यहाँ तो बाप कहते हैं मुझे और वर्से को याद करो। हद के सम्बन्ध को छोड़ अब बेहद के सम्बन्ध को याद करना है। सब मनुष्य चाहते हैं हमारी गति हो। गति कहा जाता है मुक्तिधाम को। सद्गति कहा जाता है फिर से सुखधाम में आने को। कोई भी पहले आयेगा तो जरूर सुख ही पायेगा। बाप सुख के लिए ही आते हैं। जरूर कोई बात डिफीकल्ट है इसलिए इनको ऊंच पढ़ाई कहा जाता है। जितनी ऊंच पढ़ाई उतनी डिफी-कल्ट भी होगी। सभी तो पास कर न सकें। बड़े ते बड़ा इम्तहान बहुत थोड़े स्टूडेन्ट पास करते हैं क्योंकि बड़ा इम्तहान पास होने से फिर सरकार को पघार (नौकरी) भी बहुत देना पड़े ना। कई स्टूडेन्ट बड़ा इम्तहान पास करके भी ऐसे ही बैठे रहते हैं। सरकार के पास इतना पैसा नहीं है जो बड़ा पघार दे। यहाँ तो बाप कहते हैं जितना ऊंच पढ़ेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। ऐसे भी नहीं सब कोई राजायें वा साहूकार बनेंगे। सारा मदार पढ़ाई पर है। भक्ति को पढ़ाई नहीं कहा जाता। यह तो है रूहानी ज्ञान जो रूहानी बाप पढ़ाते हैं। कितनी ऊंच पढ़ाई है। बच्चों को डिफीकल्ट लगता है क्योंकि बाप को याद नहीं करते तो कैरेक्टर्स भी सुधरते नहीं हैं। जो अच्छा याद करते हैं उनके कैरेक्टर्स भी अच्छे होते जाते हैं। बहुत-बहुत मीठे सर्विसएबुल बनते जाते हैं। कैरेक्टर्स अच्छे नहीं हैं तो कोई को पसन्द भी नहीं आते हैं। जो नापास होते हैं तो जरूर कैरेक्टर्स में रोला है। श्री लक्ष्मी-नारायण के कैरेक्टर्स बहुत अच्छे हैं। राम को दो कला कम कहेंगे। भारत रावण राज्य में झूठ खण्ड हो पड़ता है। सचखण्ड में तो ज़रा भी झूठ हो न सके। रावण राज्य में है झूठ ही झूठ। झूठे मनुष्यों को दैवी गुणों वाला कह नहीं सकते। यह बेहद की बात है। अभी बाप कहते हैं ऐसी झूठी बातें किसी की न सुनो, न सुनाओ। एक ईश्वर की मत को ही लीगल मत कहा जाता है। मनुष्य मत को इलीगल मत कहा जाता। लीगल मत से तुम ऊंच बनते हो। परन्तु सब नहीं चल सकते हैं तो इलीगल बन पड़ते हैं। कई बाप के साथ प्रतिज्ञा भी करते हैं – बाबा इतनी आयु हमने इलीगल काम किये हैं, अभी नहीं करेंगे। सबसे इलीगल काम है विकार का भूत। देह-अभिमान का भूत तो सबमें है ही। मायावी पुरूष में देह-अभिमान ही होता है। बाप तो है ही विदेही, विचित्र। तो बच्चे भी विचित्र हैं। यह समझ की बात है। हम आत्मा विचित्र हैं फिर यहाँ चित्र (शरीर) में आते हैं। अभी बाप फिर कहते हैं विचित्र बनो। अपने स्वधर्म में टिको। चित्र के धर्म में नहीं टिको। विचित्रता के धर्म में टिको। देह-अभिमान में न आओ। बाप कितना समझाते हैं – इसमें याद की बहुत जरूरत है। बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझ मुझे याद करो तो तुम सतोप्रधान, प्योर बनेंगे। इमप्योरिटी में जाने से बहुत दण्ड मिल जाता है। बाप का बनने के बाद अगर कोई भूल होती है तो फिर गायन है सतगुरू के निंदक ठौर न पायें। अगर तुम मेरी मत पर चल पवित्र नहीं बनेंगे तो सौ गुणा दण्ड भोगना पड़ेगा। विवेक चलाना है। अगर हम याद नहीं कर सकते तो इतना ऊंच पद भी नहीं पा सकेंगे। पुरूषार्थ के लिए टाइम भी देते हैं। तुमको कहते हैं क्या सबूत है? बोलो, जिस तन में आते हैं वह प्रजापिता ब्रह्मा तो मनुष्य है ना। मनुष्य का नाम शरीर पर पड़ता है। शिवबाबा तो न मनुष्य है, न देवता है। उनको सुप्रीम आत्मा कहा जाता है। वह तो पतित वा पावन नहीं होता, वह समझाते हैं मुझे याद करने से तुम्हारे पाप कट जायेंगे। बाप ही बैठ समझाते हैं तुम सतोप्रधान थे, अभी तमोप्रधान बने हो। फिर सतोप्रधान बनने के लिए मुझे याद करो। इन देवताओं की क्वालिफिकेशन देखो कैसी है और उन्हों से रहम मांगने वालों को भी देखो वन्डर लगता है – हम क्या थे! फिर 84 जन्मों में कितना गिरकर एकदम चट हो पड़े हैं।

बाप कहते हैं – मीठे-मीठे बच्चे, तुम दैवी घराने के थे। अभी अपनी चाल को देखो यह (देवी-देवता) बन सकते हो? ऐसे नहीं, सब लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। फिर तो सारा फूलों का बगीचा हो जाए। शिवबाबा को सिर्फ गुलाब के फूल ही चढ़ायें, परन्तु नहीं, अक के फूल भी चढ़ाते हैं। बाप के बच्चे कोई फूल भी बनते हैं, कोई अक भी बनते हैं। पास नापास तो होते ही हैं। खुद भी समझते हैं कि हम राजा तो बन नहीं सकेंगे। आप समान ही नहीं बनाते हैं, साहूकार कैसे, कौन बनेंगे वह तो बाप जाने। आगे चल तुम बच्चे भी समझ जायेंगे कि यह फलाना बाप का कैसा मददगार है। कल्प-कल्प जिन्होंने जो कुछ किया है वही करेंगे। इसमें फ़र्क नहीं पड़ सकता। बाप प्वाइंट्स तो देते रहते हैं। ऐसे-ऐसे बाप को याद करना है और ट्रांसफर भी करना है। भक्ति मार्ग में तुम ईश्वर अर्थ करते हो। परन्तु ईश्वर को जानते नहीं हो। इतना समझते हो ऊंच ते ऊंच भगवान है। ऐसे नहीं कि ऊंच ते ऊंच नाम रूप वाला है। वह है ही निराकार। फिर ऊंच ते ऊंच साकार यहाँ होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को देवता कहा जाता है। ब्रह्मा देवताए नम:, विष्णु देवताए नम: फिर कहते हैं शिव परमा-त्माए नम:। तो परमात्मा बड़ा ठहरा ना। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को परमात्मा नहीं कहेंगे। मुख से कहते भी हैं शिव परमात्माए नम: तो जरूर परमात्मा एक हुआ ना। देवताओं को नमन करते हैं। मनुष्य लोक में मनुष्य को मनुष्य कहेंगे। उनको फिर परमात्माए नम: कहना – यह तो पूरा अज्ञान है। सबकी बुद्धि में यह है कि ईश्वर सर्वव्यापी है। अभी तुम बच्चे समझते हो भगवान तो एक है, उनको ही पतित-पावन कहा जाता है। सबको पावन बनाना यह भगवान का ही काम है। जगत का गुरू कोई मनुष्य हो न सके। गुरू पावन होते हैं ना। यहाँ तो सब हैं विकार से पैदा होने वाले। ज्ञान को अमृत कहा जाता है। भक्ति को अमृत नहीं कहा जाता। भक्ति मार्ग में भक्ति ही चलती है। सब मनुष्य भक्ति में हैं। ज्ञान सागर, जगत का गुरू एक को कहा जाता है। अभी तुम जानते हो बाप क्या आकर करते हैं। तत्वों को भी पवित्र बनाते हैं। ड्रामा में उनका पार्ट है। बाप निमित्त बनते हैं सर्व का सद्गति दाता है। अब यह समझावें कैसे। आते तो बहुत हैं। उद्घाटन करने आते हैं तो तार दी जाती है कि होवनहार विनाश के पहले बेहद के बाप को जानकर उनसे ही वर्सा लो। यह है रूहानी बाप। जो भी मनुष्य मात्र हैं सब फादर कहते हैं। क्रियेटर है तो जरूर क्रियेशन को वर्सा मिलेगा। बेहद के बाप को कोई भी जानते नहीं। बाप को भूलना – यह भी ड्रामा में नूँध है। बेहद का बाप ऊंच ते ऊंच है, वह कोई हद का वर्सा तो नहीं देगा ना। लौकिक बाप होते भी बेहद के बाप को सब याद करते हैं। सतयुग में उनको कोई याद नहीं करते क्योंकि बेहद सुख का वर्सा मिला हुआ है। अभी तुम बाप को याद करते हो। आत्मा ही याद करती है फिर आत्मायें अपने को और अपने बाप को, ड्रामा को भूल जाती हैं। माया का परछाया पड़ जाता है। सतोप्रधान बुद्धि को फिर तमोप्रधान जरूर होना है। स्मृति में आता है, नई दुनिया में देवी-देवतायें सतोप्र-धान थे, यह कोई भी नहीं जानते हैं। दुनिया ही सतोप्रधान गोल्डन एजड बनती है। उसको कहा जाता है न्यू वर्ल्ड। यह है आइरन एजड वर्ल्ड। यह सब बातें बाप ही आकर बच्चों को समझाते हैं। कल्प-कल्प जो वर्सा तुम लेते हो, पुरूषार्थ अनुसार वही मिलने का है। तुमको भी अभी मालूम पड़ा है हम यह थे फिर ऐसे नीचे आ गये हैं। बाप ही बताते हैं कि ऐसे-ऐसे होगा। कोई कहते हैं कोशिश बहुत करते हैं परन्तु याद ठहरती नहीं है। इसमें बाप अथवा टीचर क्या करे, कोई पढ़ेंगे नहीं तो टीचर क्या करे। टीचर आशीर्वाद करे फिर सब पास हो जाएं। पढ़ाई का फर्क तो बहुत रहता है। यह है बिल्कुल नई पढ़ाई। यहाँ तुम्हारे पास अक्सर करके गरीब दु:खी ही आयेंगे, साहूकार नहीं आयेंगे। दु:खी हैं तब आते हैं। साहूकार समझते हैं हम तो स्वर्ग में बैठे हैं। तकदीर में नहीं है, जिनकी तकदीर में है, उनको झट निश्चय बैठ जाता है। निश्चय और संशय में देरी नहीं लगती है। माया झट भुला देती है। टाइम तो लगता है ना। इसमें मूँझने की दरकार नहीं है। अपने ऊपर रहम करना है। श्रीमत तो मिलती रहती है। कितना सहज बाप कहते हैं सिर्फ अपने को आत्मा समझ मुझे याद करो।

तुम जानते हो यह है ही मृत्युलोक। वह है अमरलोक। वहाँ अकाले मृत्यु नहीं होता। क्लास में स्टूडेन्ट नम्ब-रवार बैठते हैं ना। यह भी स्कूल है ना। ब्राह्मणी से पूछा जाता है तुम्हारे पास नम्बरवार होशियार बच्चे कौन से हैं? जो अच्छा पढ़ते हैं, वे राइट साइड में होने चाहिए। राइट हैण्ड का महत्व होता है ना। पूजा आदि भी राइट हैण्ड से की जाती है। बच्चे ख्याल करते रहें – सतयुग में क्या होगा। सतयुग याद पड़ेगा तो सत बाबा भी याद पड़ेगा। बाबा हमको सतयुग का मालिक बनाते हैं। वहाँ यह पता नहीं है कि हमको यह बादशाही कैसे मिली है। इसलिए बाबा कहते हैं इन लक्ष्मी-नारायण में भी यह ज्ञान नहीं है। बाप हरेक बात अच्छी रीति समझाते रहते हैं जो कल्प पहले वाले समझे हैं वही जरूर समझेंगे। फिर भी पुरूषार्थ करना पड़ता है ना। बाप आते ही हैं पढ़ाने। यह पढ़ाई है, इसमें बड़ी समझ चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) यह रूहानी पढ़ाई बहुत ऊंची और डिफीकल्ट है, इसमें पास होने के लिए बाप की याद से आशीर्वाद लेनी है। अपने कैरेक्टर्स सुधारने हैं।

2) अभी कोई भी इलीगल काम नहीं करना है। विचित्र बन अपने स्वधर्म में टिकना है और विचित्र बाप की लीगल मत पर चलना है।

वरदान:- परमात्म लव में लीन होने वा मिलन में मग्न होने वाले सच्चे स्नेही भव
स्नेह की निशानी गाई जाती है – कि दो होते भी दो न रहें लेकिन मिलकर एक हो जाएं, इसको ही समा जाना कहते हैं। भक्तों ने इसी स्नेह की स्थिति को समा जाना वा लीन होना कह दिया है। लव में लीन होना – यह स्थिति है लेकिन स्थिति के बदले उन्होंने आत्मा के अस्तित्व को सदा के लिए समाप्त होना समझ लिया है। आप बच्चे जब बाप के वा रूहानी माशूक के मिलन में मग्न हो जाते हो तो समान बन जाते हो।
स्लोगन:- अन्तर्मुखी वह है जो व्यर्थ संकल्पों से मन का मौन रखता है।

TODAY MURLI 23 OCTOBER 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 23 October 2019

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23/10/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, the more you remember the Father with love, the more blessings you will receive and the more your sins will continue to be cut away.
Question: Which religion does the Father direct you children to stay in?
Answer: Baba says: Children, stay in your religion of being without an image; do not stay in the religion of an image (body). Just as the Father is bodiless and without an image, so each of you children too is without an image and you then enter an image (body) here. The Father now says to you children: Children, become one without an image (bodiless); stabilise in your original religion of the self. Do not come into body consciousness.
Question: What is God bound to do by the drama?
Answer: God is bound by the drama to purify the children. He has to come at the most auspicious confluence age.

Om shanti. The Father sits here and explains to the spiritual children: When “Om shanti” is said, souls are being given the introduction of their original religion. So, surely, the Father is automatically remembered because every human being definitely remembers God, but it is just that they don’t have God’s introduction. God comes simply to give His own introduction and the introduction of souls. God alone is called the Purifier. God is bound by the drama to make impure ones pure. He has to come at the most auspicious confluence age. He also gives the explanation of the confluence age. The Father only comes between the old world and the new world. The old world is called the land of death and the new world is called the land of immortality. You also understand that the lifespan is short in the land of death and that there continues to be untimely death. That is the land of immortality where there is no untimely death because they are pure. Through impurity, they become adulterated, their lifespan become short and their power decreases. In the golden age, because they are pure, they are unadulterated and they have greater power. How did they attain their kingdom without power? They must definitely have taken blessings from the Father. The Father is the Almighty Authority. How would they have claimed their blessings? The Father says: Remember Me! Those who had more remembrance would have claimed blessings. A blessing is not something to be asked for; it is something for which you make effort. The more remembrance you have, the more blessings you receive, that is, you receive a higher status. If you don’t have remembrance, you won’t receive blessings. A physical father never tells his children to remember him. From his childhood, a child automatically says “mama” and “baba”. His organs are small. Older children would not say “mama” and “baba”. It would be in their intellects that they are their mother and father from whom they are to receive their inheritance. It is not something that has to be said or remembered. Here, the Father says: Remember Me and the inheritance. Renounce limited relationships and now remember the unlimited relationship. All human beings want liberation. Liberation refers to the land of liberation. Salvation means to go once again to the land of happiness. Anyone who comes will definitely first receive happiness. The Father comes just to give happiness. There must definitely be something difficult because this is why it is said to be such a high study. The higher the study, the more difficult it would be. Not everyone can pass. Very few students pass the highest examinations because when someone passes a high examination, the Government also has to give a higher salary. Some students pass a high examination and yet they remain sitting idle. The Government doesn’t have enough money to give them a high salary. Here, the Father says: The more you study, the higher the status you will claim. It isn’t that everyone will become kings or wealthy people. Everything depends on how you study. Devotion is not called a study. This is spiritual knowledge which the spiritual Father teaches. This study is so high! Children find this difficult because they don’t remember the Father and they don’t reform their characters. The characters of those who have good remembrance continue to become good. They continue to become very, very sweet and serviceable. If their characterarenot good, no one likes them. Those who fail definitely have something wrong in their character. The character of Lakshmi and Narayan are very good. Rama is said to be two degrees less. Bharat becomes the land of falsehood in the kingdom of Ravan. There cannot be the slightest falsehood in the land of truth. In the kingdom of Ravan, there is nothing but falsehood. False human beings cannot be called those with divine virtues. This is something unlimited. The Father now says: Do not listen to such false things from others or relate them to others. Only the directions of God are said to be legal directions. Human directions are said to be illegal directions. You become elevated by following legal directions. However, not everyone can follow them, and so they become illegal. Some even promise the Father: Baba, until this age, we have done illegal work and we won’t do that now. The most illegal work is the evil spirit of lust. There is the evil spirit of body consciousness in everyone anyway. There is body consciousness in people influenced by Maya. The Father is bodiless, without an image. Therefore, children too are without images. This is something to understand. We souls are without images, and then we enter images (bodies) here. The Father says once again: Become without an image. Stabilise yourself in your original religion. Do not stabilise yourself in the religion of your image. Stabilise yourself in the religion of being without an image. Do not become body conscious. The Father explains to you so much; there is a great need for remembrance in this. The Father says: Consider yourself to be a soul and remember Me and you will become satopradhan and pure. A lot of punishment is received by becoming impure. It is remembered of those who make a mistake after belonging to the Father: Those who defame the Satguru cannot attain a high status. If you don’t follow My directions to become pure, there will have to be one hundred-fold punishment. You have to use your conscience. If I am unable to have remembrance, I won’t be able to claim such a high status. You have to make time for making effort. When you are asked what proof you have, tell them: The body that God enters is that of Prajapita Brahma who is a human being. The bodies of human beings are given names. Shiv Baba is neither a human being nor a deity. He is called the Supreme Soul. He doesn’t become impure or pure. He explains: By remembering Me, your sins will be cut away. The Father sits here and explains: You were satopradhan and have now become tamopradhan. Remember Me in order to become satopradhan again. Look what the qualifications of the deities are and look at those who ask them for mercy! You then wonder what you yourselves were. You have become completely degraded by falling through your 84 births. The Father says: Sweetest children, you used to belong to the deity dynasty. Now, look at your behaviour and see whether you are able to become like the deities. Do not think that everyone will become Lakshmi and Narayan. In that case, the whole place would become a garden of flowers. Only roses should be offered to Shiv Baba. But no, all flowers including uck flowers are offered to Him. Some of the Father’s children become flowers and others become uck flowers. There are those who pass and those who fail. They can understand for themselves that they will not be able to become kings. They don’t make anyone the same as themselves. Only the Father knows who will become wealthy and how. As you children progress further, you will also understand what type of helper of the Father a particular child is. Whatever any of them did in the previous cycles, they will do the same again. There cannot be any difference in that. The Father continues to give you points. You have to remember the Father in this way and also transfer everything. On the path of devotion, you do everything in the name of God, but you do not know God. You only understand that God is the Highest on High. It isn’t that He is one with the highest name and form; He is incorporeal. Then, the highest-on-high corporeal beings exist here. Brahma, Vishnu and Shankar are called deities. It is said: Salutations to the deity Brahma, salutations to the deity Vishnu and then they say: Salutations to the Supreme Soul Shiva. So, God is the greatest. Brahma, Vishnu and Shankar cannot be called God. People say through their mouths: Salutations to the Supreme Soul Shiva, and so God must surely be one. People bow down to the deities. In the human world, human beings are called human beings. To say: “Salutations to the Supreme Soul” when referring to human beings is total ignorance. It is in everyone’s intellect that God is omnipresent. You children now understand that God is one and that He alone is called the Purifier. To make everyone pure is the task of God alone. No human being can be the Guru of the world. Gurus are pure. Here, all are those who are born through vice. Knowledge is called nectar. Devotion cannot be called nectar. On the path of devotion, there is only devotion. All human beings are on the path of devotion. Only the One is called the Ocean of Knowledge, the Guru of the World. You now know what the Father does when He comes. He purifies the elements too; such is His part in the drama. The Father becomes the Instrument. He is the Bestower of Salvation for All, but how can He explain? Many people come here. When an inauguration takes place, a telegram is sent to people: Before the forthcoming destruction, come and know the unlimited Father and claim your inheritance from Him. That One is the spiritual Father. All human beings call Him the Father. He is the Creator, and so the creation would surely receive the inheritance. No one knows the unlimited Father. To forget the Father is also fixed in the drama. The unlimited Father is the Highest on High. He does not give you a limited inheritance. Even though everyone has a physical father, they still remember the unlimited Father. In the golden age, no one remembers Him because they have received their inheritance of unlimited happiness. You now remember the Father. It is souls who remember Him and then they forget themselves, their Father and the drama. There is the shadow of Maya. Satopradhan intellects definitely have to become tamopradhan. You are now aware that the deities were satopradhan in the new world. No one knows this. The world itself becomes satopradhan and the golden age. That is called the new world. This is the iron-aged world. The Father alone comes and explains all of these things. Whatever inheritance you receive every cycle, according to your efforts, you will receive that same inheritance. You now also know that you were like that and have now come down. The Father Himself tells you: This and that will happen. Some say: We try a great deal, but we are unable to have remembrance. What can the Father or the Teacher do about this? What can the Teacher do if someone doesn’t study? If the Teacher were to give blessings, everyone would pass. There is a lot of difference in how you study. This is a completely new study. Here, it is generally the poor and unhappy ones who come to you; wealthy ones do not come here. It is because people are unhappy that they come here. The wealthy think that they are sitting in heaven. This isn’t in their fortune. Those who have it in their fortune instantly have faith in this. Faith and doubt don’t take time. Maya soon makes you forget. This does take time. There is no need to become confused about this. Have mercy for yourself! You continue to receive shrimat. The Father tells you something so easy: Simply consider yourselves to be souls and remember Me. You know that this is the land of death and that that is the land of immortality. There is no untimely death there. Students in a class sit numberwise. This too is a school. The teacher is asked: Who is the number one clever child in your class? Those who study well should be on the right side. The right hand has importance. Worship is also carried out with the right hand. You children should continue to think about what will exist in the golden age. If you remember the golden age, you will also remember the true Baba. Baba is making us into the masters of the golden age. There, you won’t know how you received your kingdom. This is why Baba says: Even Lakshmi and Narayan don’t have this knowledge. The Father continues to explain everything very well. Those who understood it in the previous cycle will definitely understand again. Nevertheless, you still have to make effort. The Father comes to teach you. This is a study and a lot of understanding is needed for this. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. This spiritual study is very high and difficult.So, in order to pass it, you have to claim blessings by having remembrance of the Father. Reform your character.
  2. Do not do anything illegal now. Be one without an image and remain stable in your original religion and follow the legal directions of the Father without an image.
Blessing: May you be truly loving and merged in love for God and remain absorbed in that meeting.
The sign of love that has been remembered is that although they are two beings, they are not two, but become combined in one form. This is known as being merged. Devotees have referred to this stage of love as being merged or absorbed. To merge in love is a stage. However, instead of a stage, they consider the identity of the soul to finish for all time. When you children become absorbed in meeting the Father or Spiritual Beloved, you then become equal.
Slogan: Someone who is introverted becomes free from waste thoughts and observes silence of the mind.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 23 OCTOBER 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 23 October 2018

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23/10/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, the more you stay in remembrance and become pure, the more blessings you will receive from the parlokik Mother and Father. By receiving blessings you will become constantly happy.
Question: What advice does the Father give all of you children and thereby saves you from doing wrong things?
Answer: Baba advises you: Children, keep all the wealth and prosperity you have with you, but live as trustee s. You have been saying: O God, all of this is Yours! God gave you a son, He gave you wealth and so God now says: Remove your intellect’s yoga from all of that and remain a trustee. Follow shrimat and you won’t do anything wrong; you will become elevated.
Song: Take blessings from the Mother and Father. 

Om shanti. Shiv Baba explains to the teachers at the centres how they should teach the children who say that their mouths do not open or that they are unable to explain. It is very easy to explain using the pictures. When you explain to little children, you have to use pictures, do you not? It shouldn’t be that as soon as everyone comes and sits in class, you begin the murli, no. You have to sit and explain to them from deep within. You children heard the song. One is the parlokik Mother and Father whom you continue to remember: You are the Mother and Father. He is the Creator of the World. The Mother and Father definitely creates heaven. In the golden age, children are residents of heaven. Mothers and fathers here are themselves residents of hell and so they would create children who are residents of hell. In the song, it says: Take blessings from the mother and father. You know that mothers and fathers of this time don’t give blessings. Those who reside in heaven give you blessings which then last for half the cycle. Then, after half the cycle, you become cursed. They become impure themselves and they also make their children impure. That would not be called blessings. By continually giving curses, the people of Bharat have become cursed; there is so much sorrow. This is why they remember the Mother and Father. That Mother and Father is now giving blessings. He is teaching you and making you pure from impure. Here, it is the devilish community, the kingdom of Ravan, whereas there, it is the deity community, the kingdom of Rama. The birth of Ravan takes place in Bharat. Shiv Baba, whom you call Rama, also takes birth in Bharat. When you go on to the path of sin, the kingdom of Ravan begins in Bharat. So, Rama, the Supreme Father, the Supreme Soul, comes and makes Bharat pure from impure. When Ravan comes, people become impure. It is sung: Rama went and Ravan went and their whole families went. The family of Rama is very small. All the other religions end; all of them are destroyed; only you deities then remain. You, who have now become Brahmins, are the only ones who will be transferred to the golden age. So you now receive blessings from the Mother and Father. The Mother and Father are making you into the masters of heaven. There, there is nothing but happiness. At this time, there is sorrow in the iron age, and so all religions are unhappy. Now, after the iron age, the golden age has to come. There are so many people in the iron age. There will not be as many people in the golden age. However many Brahmins there are, there will be that many deities there. The number of them will continue to increase till the end of the silver age. They say that 3000 years before Christ there was the golden age. There is ‘B efore Christ  (BC) and AD (After Christ – Anno Domini). In the golden age there is just the one religion and one kingdom. There will be few people there. There will just be Bharat and there won’t be any other religions. There will just be the sun dynasty; there won’t even be the moon dynasty. The sun dynasty can be called gods and goddesses because they are perfect. You children know that the Purifier is only the one Supreme Father, the Supreme Soul. (Pointing to the picture of the cycle). Look, the Father is sitting up above. He is carrying out establishment through Brahma. You are now studying. When it is the kingdom of those deities, there are no other religions. Then, after half the cycle, expansion takes place. Souls continue to come down from up above. The clans continue to change and the number of human beings continues to increase. There will be 900,000 in the golden age and then there will be a million and they will continue to grow in number. In the golden age, Bharat was elevated, whereas now, it is corrupt. It isn’t that those of all religions will become elevated. There are so many human beings. Here, as well, it takes so much effort to become elevated from corrupt. While becoming elevated, they often fall into vice and become corrupt. The Father says: I have come to make you beautiful from ugly. You repeatedly fall down. The unlimited Father tells you everything in a straightforward manner. He says: You become those who defame the name of the clan. You are dirtying your face. Will you not become beautiful? You were elevated for half the cycle and then your degrees continued to decrease. By the end of the iron age, the degrees have completely finished. In the golden age, there was just the one Bharat. Now, there are so many religions. The Father comes and once again establishes the elevated golden-aged world. You also have to become elevated. Who comes and makes you elevated? The Father is the Lord of the Poor. This is not a question of money. You come to the unlimited Father to become elevated but, nevertheless, people ask: Why do you go there? They create so many obstacles. You know that there are many obstacles created by devils to this sacrificial fire of the knowledge of Rudra. Many innocent ones are beaten. Some women also cause a lot of trouble; they get married for vice. The Father now removes you from the pyre of lust and sits you on the pyre of knowledge. This is a contract for birth after birth. At this time, it is the kingdom of Ravan. The Government has so many celebrations. They burn Ravan and they go to watch plays. Where did this Ravan come from? It is 2500 years since Ravan came. Ravan has made everyone sit in the cottage of sorrow. Everyone is now unhappy and only unhappy. In the kingdom of Rama, everyone is completely happy. It is now the end of the iron age; destruction is just ahead. If so many millions of people are going to die, then war would surely take place, would it not? Everyone will be crushed like mustard seeds. You can see how preparations are now taking place. The Father is establishing heaven. No one else can give this knowledge. Only the Father comes and gives you this knowledge and makes you pure from impure. It is only the one Father who grants you salvation. In the golden age, there is salvation. There is no need for gurus there. Through this knowledge , you are now becoming trikaldarshi. In the golden age, Lakshmi and Narayan will not have this knowledge at all. So, how could this knowledge have continued from time immemorial? It is now the end of the iron age. The Father says: Remember Me! Remember the Father who carries out the establishment of the kingdom of heaven and also remember the inheritance. You definitely do have to remain pure. That is the pure world and this is the impure world. Kans, Jarasanha, Hirnayakasyap etc. do not exist in the pure world. They have taken the things of the iron age into the golden age. Shiv Baba has come at the end of the iron age. Today, Shiv Baba has come and tomorrow, Shri Krishna will come. So they have mixed up the parts of Shiv Baba and Shri Krishna. God Shiva speaks: The Shri Krishna soul studies from Him and attains that status. They have then inserted Krishna’s name in the Gita by mistake. This mistake will take place again. Only when people become corrupt can the Father come and make them elevated. Only those who are elevated take the full 84 births and become corrupt. It is very easy to explain using this picture of the cycle. It is also shown in the picture of the tree: Down below, you are doing the tapasya of Raja Yoga and up above, there is the kingdom of Lakshmi and Narayan. You are now sitting beneath the trunk and the foundation is being laid. You know that you will then go to the sun-dynasty clan (to Paradise). The kingdom of Rama is not called Paradise. Paradise is the kingdom of Krishna. Many people will now come to you. Your name will be glorified through the exhibitions etc. When people see one another coming, there will be a lot of expansion. The Father comes and explains all of these things. It is very easy to explain to anyone by using these pictures. Only God comes and carries out establishment of the golden age, and He comes into the impure world. He makes ugly ones beautiful. You are part of the dynasty and also people of the kingdom of Krishna. The Father explains to you very well. Incorporeal Shiv Baba sits here and says to you souls: Remember Me! This is the spiritual pilgrimage. O souls, remember your land of peace, the land of liberation and you will receive the inheritance of heaven. You are now sitting at the confluence age. The Father says: Remember Me and your inheritance and you will come to heaven. The more someone stays in remembrance and remains pure, the higher the status he will claim. You are receiving so many great blessings. May you be wealthy! May you have a son! May you have a long life! The lifespan of deities is very long. They have visions when they have to shed their bodies and become children again. So, this should enter you: I, the soul, will shed this old body and go and reside in a womb. Your final thoughts will lead you to your destination. Instead of being old, why should I not become a child? When a soul is in a body, he experiences difficulty. When a soul is separate from the body, he doesn’t experience any difficulty at all. As soon as a soul separates from his body, everything is over. We now have to return. Baba comes from the incorporeal world to take us back. This is the land of sorrow. We are now to go to the land of liberation. The Father says: I take everyone to the land of liberation. Those of all religions have to go to the land of liberation. They make effort to go to the land of liberation. The Father says: Remember Me and you will come to Me. Eat food in remembrance of Baba and you will receive strength. If you remain bodiless as you walk down to Abu Road, you won’t feel any tiredness. Baba used to make the children practise this in the early days. They used to think: I am a soul. They used to be very light and would walk down. They didn’t have any tiredness at all. Without a body, you souls can reach Baba in a second. You shed a body here and you go in a second and take another body in London. There is nothing as fast as a soul. So, the Father now says: Children, I have come to take you back. Now remember Me, your Baba. You are now receiving unlimited blessings from the parlokik Father in a practical way. The Father is giving you children the most elevated of all directions. You can keep all the wealth and prosperity you have. Simply live as trustee s. You have been saying: O God, all of this is Yours. God gave a child. God gave this wealth and prosperity. Achcha. God then comes and says: Remove your intellect’s yoga from all of that and live as a trustee. Follow shrimat and the Father will know whether you are doing anything wrong. Only by following shrimat will you become elevated. By following devilish dictates, you have become corrupt. It has taken you half the cycle to become corrupt. From being 16 celestial degrees, you become 14 degrees and then the degrees gradually decrease; that takes time. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. While walking and moving around, practise being bodiless. Eat food in remembrance of the one Father.
  2. Take blessings from the Mother and Father. Remain a trustee. Don’t do anything wrong.
Blessing: May you become an embodiment of knowledge who recognises the philosophy of karma and move along free from any bondage of karma.
Some children become forceful: they leave everything or step away from everything even their bodies. However, because there are karmic accounts of their minds, they are pulled. Their intellects are pulled continually. This becomes a huge obstacle, and so if you do want to step away from anyone, first of all have it verified by the instrument souls because this is part of the philosophy of karma. By breaking away forcefully, the mind is pulled back there again and again. Therefore, become an embodiment of knowledge, recognise the philosophy of karma and have it verified and you will easily become free from any bondage of karma.
Slogan: Remain set on your seat of self-respect and Maya will surrender to you.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 23 OCTOBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 23 October 2018

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23-10-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – जितना याद में रहेंगे, पवित्र बनेंगे उतना पारलौकिक मात-पिता की दुआयें मिलेंगी, दुआयें मिलने से तुम सदा सुखी बन जायेंगे।”
प्रश्नः- बाप सभी बच्चों को कौन-सी राय देकर कुकर्मों से बचाते हैं?
उत्तर:- बाबा राय देते – बच्चे, तुम्हारे पास जो भी धन-दौलत आदि है, वह सब अपने पास रखो लेकिन ट्रस्टी होकर चलो। तुम कहते आये हो हे भगवान् यह सब कुछ आपका है। भगवान् ने बच्चा दिया, धन-दौलत दिया, अब भगवान् कहते हैं इन सबसे बुद्धियोग निकाल तुम ट्रस्टी होकर रहो, श्रीमत पर चलो तो कोई भी कुकर्म नहीं होगा। तुम श्रेष्ठ बन जायेंगे।
गीत:- ले लो दुआयें माँ बाप की………. 

ओम् शान्ति। जो बच्चे कहते हैं हमारा मुख नहीं चलता है, समझा नहीं सकते हैं – उन्हें सेन्टर की ब्राह्मणियाँ कैसे सिखलायें, यह शिवबाबा समझाते हैं। चित्रों पर समझाना तो बहुत सहज है। छोटे बच्चों को चित्र दिखलाकर समझाना पड़े ना। ऐसे नहीं, क्लास में सब आकर बैठे और तुमने मुरली शुरू कर ली, नहीं। यह तो हड्डी (ज़िगरी) बैठ समझाना चाहिए। बच्चों ने गीत तो सुना – एक है पारलौकिक मात-पिता, जिसको याद करते रहते हैं तुम मात-पिता…. वह है सृष्टि का रचयिता। मात-पिता जरूर स्वर्ग ही रचेंगे। सतयुग में स्वर्गवासी बच्चे होते हैं। यहाँ के मात-पिता खुद ही नर्कवासी हैं तो बच्चे भी नर्कवासी ही पैदा करेंगे। गीत में कहा – ले लो दुआयें माँ-बाप की…… तुम जानते हो इस समय के माँ-बाप तो दुआयें नहीं देते। स्वर्गवासी दुआ करते हैं, जो दुआ फिर आधाकल्प चलती है। फिर आधाकल्प बाद श्रापित हो जाते हैं। खुद भी पतित बनते तो बच्चों को भी बनाते हैं। उसे आशीर्वाद तो नहीं कहेंगे। श्राप देते-देते भारतवासी श्रापित हो गये, कितना दु:ख ही दु:ख है, इसलिए मात-पिता को याद करते हैं। अभी वह मात-पिता दुआयें कर रहे हैं। पढ़ाकर पतित से पावन बना रहे हैं। यहाँ है आसुरी सम्प्रदाय, रावण राज्य। वहाँ है दैवी सम्प्रदाय, राम राज्य। रावण का जन्म भी भारत में है। शिवबाबा, जिसको राम कहते हैं, उनका जन्म भी भारत में है। तुम जब वाम मार्ग में जाते हो तो भारत में रावण राज्य शुरू होता है। तो भारत को ही राम परमपिता परमात्मा आकर पतित से पावन बनाते हैं। रावण आते हैं तो मनुष्य पतित बनते हैं। गाते भी हैं राम गयो, रावण गयो, जिनका बहु परिवार है। राम का परिवार तो बहुत छोटा है। और सब धर्म ख़त्म हो जाते हैं, सबका विनाश हो जाता है। बाकी तुम देवी-देवतायें रहेंगे। तुम अभी जो ब्राह्मण बने हो वही ट्रान्सफर होंगे सतयुग में। तो अब तुमको माँ-बाप की दुआयें मिल रही हैं। माँ-बाप तुमको स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। वहाँ तो सुख ही सुख है। इस समय कलियुग में है दु:ख, सभी धर्म दु:खी हैं। अभी कलियुग के बाद फिर सतयुग होना है। कलियुग में कितने ढेर मनुष्य हैं, सतयुग में तो इतने मनुष्य नहीं होंगे। जितने ब्राह्मण होंगे वही फिर वहाँ देवता बनेंगे। वह भी त्रेता तक वृद्धि को पाते रहेंगे। कहते हैं क्राइस्ट से 3000 वर्ष पहले सतयुग था। बिफोर क्राइस्ट और आफ्टर क्राइस्ट। सतयुग में तो एक ही धर्म, एक ही राज्य है। वहाँ मनुष्य भी थोड़े होंगे। सिर्फ भारत होगा और कोई धर्म नहीं होगा। सिर्फ सूर्यवंशी ही होंगे। चन्द्रवंशी भी नहीं होंगे। सूर्यवंशी को भगवान्-भगवती कह सकते हैं क्योंकि वे सम्पूर्ण हैं।

तुम बच्चे जानते हो पतित-पावन तो एक परमपिता परमात्मा ही है। (चक्र के चित्र तरफ इशारा) देखो, बाप ऊपर में बैठे हैं। यह ब्रह्मा द्वारा स्थापना करा रहे हैं। अभी तुम पढ़ रहे हो। जब इन देवताओं का राज्य रहता है तब और कोई धर्म नहीं रहता है। फिर आधाकल्प बाद वृद्धि होती जाती है। ऊपर से आत्मायें आती जाती हैं, वर्ण बदलते जाते हैं, जीव आत्मायें बढ़ती जाती हैं। सतयुग में होंगे 9 लाख, फिर करोड़ होंगे फिर वृद्धि को पाते जायेंगे। सतयुग में भारत श्रेष्ठाचारी था, अभी भ्रष्टाचारी है। ऐसे नहीं, सब धर्म वाले श्रेष्ठाचारी बन जायेंगे। कितने ढेर मनुष्य हैं। यहाँ भी भ्रष्टाचारी से श्रेष्ठाचारी बनने में कितनी मेहनत लगती है। घड़ी-घड़ी श्रेष्ठाचारी बनते-बनते फिर विकार में जाए भ्रष्टाचारी बन पड़ते हैं। बाप कहते हैं मैं आया हूँ, तुमको काले से गोरा बनाने, तुम घड़ी-घड़ी फिर गिर पड़ते हो। बेहद का बाप तो सीधी बात बतलाते हैं। कहते हैं यह क्या कुल कलंकित बनते हो, काला मुँह करते हो। क्या तुम गोरा नहीं बनेंगे? तुम आधाकल्प श्रेष्ठ थे फिर कलायें कम होती जाती हैं। कलियुग अन्त में तो कलायें एकदम पूरी ख़त्म हो जाती हैं। सतयुग में सिर्फ एक ही भारत था। अभी तो सब धर्म हैं। बाप आकर फिर सतयुगी श्रेष्ठ सृष्टि स्थापन करते हैं। तुमको भी श्रेष्ठाचारी बनना चाहिए। श्रेष्ठाचारी कौन आकर बनाते हैं? बाप है ही गरीब निवाज़। पैसे की बात नहीं। बेहद के बाप के पास श्रेष्ठ बनने आते हैं तो भी लोग कहते हैं तुम यहाँ क्यों जाते हो। कितने विघ्न डालते हैं। तुम जानते हो इस रूद्र ज्ञान यज्ञ में असुरों के विघ्न बहुत पड़ते हैं। अबलाओं पर अत्याचार होते हैं। कोई फिर स्त्रियाँ भी बहुत तंग करती हैं। विकार के लिए शादी करते हैं। अब बाप काम चिता से उतार ज्ञान चिता पर बिठाते हैं। जन्म-जन्मान्तर का कान्ट्रैक्ट है। इस समय है ही रावण राज्य। गवर्मेन्ट कितने शादमाने करती है। रावण को जलाते हैं, खेल देखने जाते हैं। अब यह रावण कहाँ से आया? रावण का जन्म हुए तो 2500 वर्ष हुए हैं। रावण ने सबको शोक वाटिका में बिठा दिया है। सब दु:खी ही दु:खी हैं। राम राज्य में सब सुखी ही सुखी होते हैं। अभी है कलियुग का अन्त। विनाश सामने खड़ा है। इतने करोड़े मनुष्य मरेंगे तो जरूर लड़ाई लगेगी ना। सरसों मुआफिक सब पीस जाते हैं। अब देखते हो तैयारियाँ हो रही हैं। बाप स्वर्ग की स्थापना कर रहे हैं। यह ज्ञान और कोई भी दे न सके। यह ज्ञान बाप ही आकर देते हैं और पतित को पावन बनाते हैं। सद्गति करने वाला एक ही बाप है। सतयुग में है ही सद्गति। वहाँ गुरू की दरकार नहीं। अभी तुम इस नॉलेज से त्रिकालदर्शी बनते हो। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण में यह ज्ञान बिल्कुल नहीं होगा। तो फिर परम्परा से यह ज्ञान कहाँ से आया? अभी है कलियुग का अन्त। बाप कहते हैं तुम मुझे याद करो। स्वर्ग की राजधानी स्थापन करने वाले बाप को और वर्से को याद करो। पवित्र तो जरूर रहना पड़ेगा। वह है पावन दुनिया, यह है पतित दुनिया। पावन दुनिया में कंस, जरासन्धी, हिरण्यकश्यप आदि होते नहीं। कलियुग की बातों को सतयुग में ले गये हैं। शिवबाबा आये हैं कलियुग के अन्त में। आज शिवबाबा आये हैं, कल श्रीकृष्ण आयेगा। तो शिवबाबा और श्रीकृष्ण के पार्ट को मिला दिया है। शिव भगवानुवाच – उन द्वारा पढ़कर कृष्ण की आत्मा यह पद पाती है। उन्होंने फिर भूल से गीता में कृष्ण का नाम डाल दिया है। यह भूल फिर भी होगी। मनुष्य भ्रष्टाचारी बनें तब तो बाप आकर श्रेष्ठाचारी बनाये। श्रेष्ठाचारी ही 84 जन्म पूरे कर भ्रष्टाचारी बनते हैं। इस चक्र पर समझाना तो बहुत सहज है। झाड़ में भी दिखाया हुआ है – नीचे तुम राजयोग की तपस्या कर रहे हो, ऊपर लक्ष्मी-नारायण का राज्य खड़ा है। अभी तुम थुर में बैठे हो, फाउन्डेशन लग रहा है। तुम जानते हो फिर सूर्यवंशी कुल (वैकुण्ठ में) जायेंगे। रामराज्य को वैकुण्ठ नहीं कहा जाता। वैकुण्ठ कृष्ण के राज्य को कहा जाता है।

अभी तो तुम्हारे पास बहुत आयेंगे। एग्जीवीशन आदि में तुम्हारा नाम बाला होगा। एक-दो को देखकर वृद्धि को पायेंगे। बाप आकर यह सब बातें समझाते हैं। चित्रों पर किसको समझाना बहुत सहज है। सतयुग की स्थापना भगवान् ही आकर करते हैं। और आते हैं पतित दुनिया में। सांवरे से गोरा बनाते हैं। तुम कृष्ण की राजधानी की वंशावली भी हो। प्रजा भी हो। बाप अच्छी रीति समझाते हैं। निराकार शिवबाबा आत्माओं को बैठ समझाते हैं कि आप मुझे याद करो। यह है रूहानी यात्रा। हे आत्मायें, तुम अपने शान्तिधाम, निर्वाणधाम को याद करो तो स्वर्ग का वर्सा मिलेगा। अभी तुम संगम पर बैठे हो। बाप कहते हैं मुझे और अपने वर्से को याद करो तो तुम यहाँ स्वर्ग में आ जायेंगे। जो जितना याद करेंगे और पवित्र रहेंगे उतना ऊंचा पद मिलेगा। तुमको कितनी बड़ी दुआयें मिल रही हैं – धनवान भव, पुत्रवान भव, आयुषवान भव। देवताओं की आयु बहुत बड़ी होती है। साक्षात्कार होता है अभी यह शरीर छोड़ जाकर बच्चा बनना है। तो यह अन्दर में आना चाहिए – हम आत्मा यह पुराना शरीर छोड़ जाकर गर्भ में निवास करेंगी। अन्त मते सो गते। बूढ़े से तो हम क्यों न बच्चा बन जाऊं। आत्मा इस शरीर के साथ है तब तकल़ीफ महसूस करती है। आत्मा शरीर से अलग है तो आत्मा को कोई तकल़ीफ महसूस नहीं होती है। शरीर से अलग हुआ ख़लास। हमको अब जाना है, मूलवतन से बाबा आते हैं लेने लिए। यह दु:खधाम है। अभी हम जायेंगे मुक्तिधाम। बाप कहते हैं सबको मुक्तिधाम ले जाता हूँ। जो भी धर्म वाले हैं सबको मुक्तिधाम जाना है। वह पुरुषार्थ भी मुक्ति में जाने के लिए करते हैं।

बाप कहते हैं मुझे याद करो तो मेरे पास आ जायेंगे। बाबा को याद कर भोजन खाओ तो तुमको ताकत मिलेगी। अशरीरी होकर तुम पैदल आबूरोड तक चले जाओ, कभी तुमको कुछ भी थकावट नहीं होगी। बाबा शुरू में यह प्रैक्टिस कराते थे। समझते थे हम आत्मा हैं। बहुत हल्के होकर पैदल चले जाते थे। कुछ भी थकावट नहीं होती थी। शरीर बिगर तुम आत्मा तो सेकेण्ड में बाबा पास पहुँच सकती हो। यहाँ एक शरीर छोड़ा सेकेण्ड में जाकर लण्डन में जन्म लेते हैं। आत्मा जैसी तीखी और कोई चीज़ होती नहीं। तो अब बाप कहते हैं – बच्चे, हम तुमको लेने लिए आये हैं। अब मुझ बाबा को याद करो। अभी तुमको प्रैक्टिकल में बेहद के पारलौकिक बाप की दुआयें मिल रही हैं। बाप बच्चों को श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ मत दे रहे हैं। धन दौलत आदि सब तुम अपने पास रखो। सिर्फ ट्रस्टी होकर चलो। तुम कहते भी आये हो – हे भगवान् यह सब कुछ आपका है। भगवान् ने बच्चा दिया, भगवान् ने यह धन-दौलत दिया। अच्छा, फिर भगवान् आकर कहते हैं इन सबसे बुद्धियोग निकाल तुम ट्रस्टी होकर चलो। श्रीमत पर चलो तो बाप को मालूम पड़ेगा। तुम कोई कुकर्म तो नहीं करते हो। श्रीमत पर चलने से ही तुम श्रेष्ठ बनेंगे। आसुरी मत पर चलने से तुम भ्रष्ट बने हो। आधाकल्प तुमको भ्रष्ट बनने में लगा है। 16 कला से फिर 14 कला बनते हो फिर धीरे-धीरे कलायें कम होती जाती है, तो इसमें टाइम लगता है ना। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) चलते-फिरते अशरीरी बनने का अभ्यास करना है। भोजन एक बाप की याद में खाना है।

2) मात-पिता की दुआयें लेनी हैं। ट्रस्टी होकर रहना है। कोई भी कुकर्म नहीं करना है।

वरदान:- ज्ञान स्वरूप बन कर्म फिलासॅफी को पहचान कर चलने वाले कर्मबन्धन मुक्त भव
कई बच्चे जोश में आकर सब कुछ छोड़ किनारा कर तन से अलग हो जाते लेकिन मन का हिसाब-किताब होने के कारण खींचता रहता है। बुद्धि जाती रहती है, यह भी एक बड़ा विघ्न बन जाता है इसलिए कोई से किनारा भी करना है तो पहले निमित्त आत्माओं से वेरीफाय कराओ क्योंकि यह कर्मो की फिलासफी है। जबरदस्ती तोड़ने से मन बार-बार जाता रहता है। तो ज्ञान स्वरूप होकर कर्म फिलॉसफी को पहचानो और वेरीफाय कराओ तो सहज कर्मबन्धन से मुक्त हो जायेंगे।
स्लोगन:- अपने स्वमान की सीट पर सेट रहो तो माया आपके आगे सरेन्डर हो जायेगी।

TODAY MURLI 23 OCTOBER 2017 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 23 OCTOBER 2017

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23/10/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, your study is that of the intellect. In order to make your intellect clean and pure, interact with your family tactfully. Maintain precautions with your food and drink.
Question: How is God’s activity very wonderful and incognito?
Answer: The activity of making each and every one settle his and her karmic accounts is very wonderful and incognito. No matter how much someone tries to hide his or her sins, they cannot be hidden. Punishment definitely has to be experienced. Each one’s account is kept up above and this is why the Father says: If any sin is committed after belonging to the Father, then, by telling the truth, half will be forgiven and the punishment will be reduced. Don’t hide anything. It is said: Someone who steals a straw is the same as someone who steals one hundred thousand. By hiding it, one cannot imbibe virtues.

Om shanti. In whose remembrance are you sitting here? You children understand that the mother and Father, BapDada, will come here now. They will come and give you your inheritance. You are once again claiming your inheritance of heaven from Baba as you did 5000 years ago. This would be in everyone’s heart. The haystack of hell is now to be set on fire. You don’t have any connection with the people of this world. For you, knowledge is incognito and the inheritance is also incognito. The inheritance from a physical father is visible: This is my father’s property. You can see it with your eyes. You can see your father and also your inheritance. However, you souls are incognito. You can neither see a soul nor the Supreme Soul with those eyes. In a physical relationship, you consider yourself to be a body, you see it with your eyes and you also see your father who gave you the body. You see your teacher and guru too. Here, the Father, Teacher and Guru are all incognito. You children know that you have now received the third eye of knowledge. Previously, you didn’t have the third eye. Souls were sleeping, and they are now being awakened. Therefore, souls are incognito. Just as a soul comes and enters a body, in the same way, Shiv Baba also enters this body and is now making us into the masters of heaven. The intellect also says that you have claimed your inheritance for half the cycle from the Father many times. You then lost it for half the cycle. We are now once again establishing our kingdom by following shrimat. The One who gives us shrimat is also incognito. You souls know that you are listening to the Supreme Father, the Supreme Soul, in an incognito way. You definitely have to become soul conscious. First is the soul and then the body. The soul is imperishable and the Father is also imperishable. The body that the Father takes is perishable. He enters this body and says, “Child, child,” and reminds you that He has come to inspire you to make effort for the deity, golden-aged sovereignty. You have to make full effort. In the golden age, there will just be your kingdom. You used to rule the kingdom and then you had to take rebirth. Only those who belonged to the dynasty of Shri Krishna and were part of the deity clan will remain; there won’t be anyone else. Even those of the moon dynasty won’t exist there. These things are very easy to understand. Truly, there weren’t other religions in the golden age. Now there are so many religions. They continue to fight and quarrel among themselves. There is so much conflict. In the golden age, there is just one religion and so there is no conflict. Therefore, you children are establishing your kingdom in an incognito way. Each of you would say that you are making effort to claim a high status in your kingdom. So, you also have to have that much courage. Your name is Shiv Shaktis. No one actually rides a lion, but that is just the praise that is shown; it is why Shaktis are shown riding a lion. You don’t actually sit on a lion. You are those who are going to conquer Maya. You show this bravery and that is why your name is the Shiv Shakti Army. In fact, there are also brothers, but the majority is women. You take everyone from the impure family path to the pure family path. You know that you were very happy in the golden age, in the land of Vishnu. There was everything: purity, happiness and peace. Here, there is so much sorrow. When a child is disobedient in a family, he causes so much trouble. There, they remain constantly cheerful. You know that the unlimited Father has come once again to give you unlimited happiness. The Father says: You may live at home, but simply imbibe this in your intellect. This study is for the intellects. While living at home, follow shrimat. You are even affected by your food and drink and this is why you have to be very tactful. Each one’s karmic accounts are his or her own. Some are in bondage and others are free from bondage. Some cleverly buzz knowledge and ask permission. Many methods have been explained to you. Tell them: The Father’s orders are: Become pure. I have come to give you the fruit of your devotion. Therefore, you definitely have to follow God’s directions because it is only then that you will receive liberation and liberation-in-life without experiencing punishment. There is a burden of sin of many births on your heads. Just as the Father gives liberation and liberation-in-life in a second , in the same way, punishment is also received in a second. However, that suffering is very great. For instance, when people sacrifice themselves at Kashi, there is a lot of punishment experienced in a short time, but the karmic accounts are settled. You have to settle your karmic accounts without experiencing punishment. Therefore, make such effort that you don’t have to experience punishment. It is good to remember Baba. Destruction is just ahead. The Pandavas had loving intellects at the time of destruction. The Father personally came and enabled you to have love. What would you do having love for others? All of them are to be destroyed. Make deep effort to remember the Father. Externally, you may ask your friends and relatives about their welfare and how they are, but your heart should be attached to the one Father. A physical lover and beloved remember one another while at home. You have become lovers of Shiv Baba. He is personally in front of you. He remembers you and you have to remember Him. Shiv Baba enters this body and makes you souls become engaged to Him. This is called the benevolent meeting (mela) of souls with the Supreme Father, the Supreme Soul. You are the Ganges of knowledge and the one Father is the Ocean of Knowledge. Your sins will be absolved by remembering the Father. The Father doesn’t give you any other difficulty. You simply have to remain pure. Lust is the greatest enemy. By conquering it, you will become the masters of the land of Krishna. The Father’s orders are: Become pure and you will receive a kingdom for 21 births. Instead of becoming impure, it is better to remain pure and wash dishes. However, because body consciousness doesn’t break, you even lose your inheritance. Look how great the Father is! He has come into the impure world and entered an impure body. People worship Shiv Baba in the Somnath Temple. Look how ordinarily that same Baba is sitting here now. God Himself is now giving you teachings and if you don’t follow those, you cancel your status. The Father says: Children, become pure! Now, all are degraded. Those who remain pure are called elevated. The Government gathered together a group of sannyasis and asked them to make everyone elevated. However, only in the golden age do elevated ones exist; no one can be that here. Only those who are pure are said to be elevated. Sannyasis are pure, but they still take birth through impure ones because this is Maya’s kingdom. No one here takes birth with the power of yoga. The Father explains to you children: Always keep your heart clean. Let there not be the slightest arrogance. It is good to become completely poor. The Father is the Lord of the Poor. Wah poverty! Wah! The poor have to be made wealthy. The Father says: I make Bharat wealthy from poor. Only the people of Bharat will become that and, in that too, only those who follow shrimat will become that. Only they can become the masters of heaven. The Father teaches you easy Raja Yoga to make you into the masters of the land of Krishna or heaven. The Father’s order is: Become pure! We don’t accept any human beings as our guru. There is a lot of conflict because of purity. Someone would be beaten, someone would be thrown out of the home, and so what can she do? The Father gives her refuge. However, it shouldn’t be that when you come to Baba, you remember your relatives and continue to cause a loss. In that case, you would be lost to both worlds. If you don’t imbibe knowledge, you can’t reform yourself. You would then continue with the same activity as before. You mustn’t commit any sin here. You have to become charitable souls. On the basis of shrimat, ask yourself whether something is sinful or charitable. Baba explains: Whatever sins you have committed, by telling the Father about them, half of those sins are erased. Many children say: I did this. This is my crime. I became impure in that way. The Father knows how many sins you have committed. He explains: Don’t commit any more sins. Otherwise, the punishment will be one hundred-fold and you will then be given visions of that in the land of Dharamraj: You used to commit sin in that way and then hid it. Nothing can remain hidden. Although it cannot be seen, the Father knows everything very clearly. The whole account remains with Dharamraj. God’s activity is very wonderful and incognito. It is said: That person must definitely have committed sin for that is why he received birth in a dirty home. Therefore, that is definitely accumulated. There is the account up above. That account is now here and this is why the Father continues to tell you: You mustn’t commit any sin now. It is said: A thief who steals a straw is the same as a thief who steals one hundred thousand. You should understand that you are committing a great sin and that the status would thereby be destroyed. If you don’t imbibe virtues, you can’t do God’s service. You also have to benefit others. If you just continue to waste your time and commit sin, your status will be reduced. Then, that would become your status for cycle after cycle. Therefore, make as much effort as possible. You are asked why you go to Baba. You say: To claim the sun dynasty and moon dynasty inheritance. Therefore, you definitely have to follow shrimat. Check that you don’t perform any bad actions or commit any sin, otherwise, there will be one hundred-fold punishment and you will then become maids and servants. You have not come here to become that. You say “Mama and Baba” and so you should become Narayan from a ordinary man, should you not? How would you claim a status without imbibing knowledge? If you say “Mama, Baba” and don’t sit on the throne of the mother and father, it would be understood that you didn’t study fully. Mama and Baba become Lakshmi and Narayan from an ordinary woman and ordinary man. The mother and Father are teaching you the same thing. Therefore, you should claim your full inheritance from the Father. Many continue to commit sins secretly and don’t tell Baba about them. No matter how much you explain to them, they don’t stop doing that. When a thief has developed that habit, he can’t stop himself stealing and telling lies. You should only speak the truth to the true Father. Tell the Father: I committed this sin; forgive me! Maya made me commit sin. Achcha, you have at least spoken the truth and so half of that sin can be forgiven. Otherwise, sin will continue to increase. Some say that they have to commit sin in business. Because businessmen commit sin, they put something aside for charity so that their sins are reduced. After committing sin, to use that money for charity is also good. It you are able to save iron from a sunken boat, that too is good. That Father is establishing heaven and so everything will be used for charity. Those who give donations and perform charity do receive something. The Father explains to everyone. The Father gives directions for everything. Therefore, you children should never perform such actions. However, Maya doesn’t leave anyone alone. If they see something good, they will quickly eat it or pick it up. By performing such sinful actions, you destroy your own status. Some children say “Baba, Baba” and then let go of Baba’s hand. What would their condition become once they leave Baba’s hand? Maya will eat them raw and they won’t then remain worth even a shell; it is numberwise. In the land of happiness, someone will rule the kingdom and someone will be ordinary. There will also be maids and servants. You children are now receiving the inheritance of unlimited happiness from the unlimited Father. This is why you have to follow the Father’s shrimat and claim your full inheritance. Death is just ahead. There is untimely death. When an aeroplane crashes, everyone dies. Does anyone know in advance that that is to happen? Death is just over your head. Therefore, you must make effort to claim your full inheritance from the Father. You may perform actions for the livelihood of your body according to shrimat. Together with that, also study this study. Baba gives you all the methods. You have to make effort and remain pure. Rather than becoming impure, it is better to sweep floors or wash dishes. However, you have to become soul conscious. There is respect for purity. If you don’t become pure, you won’t receive a status. This explanation is given to all the children. The number of children will continue to grow. Many subjects are also to be created. One king has to have thousands of subjects. It requires effort to become a king. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. At this time of destruction, have true love in your heart for only the one Father. Stay in remembrance of One.
  2. Remain constantly true to the true Father. Don’t hide anything. Make effort to remain soul conscious. Never become impure.
Blessing: May you be constantly fearless and victorious and find a solution to every problem by being a mahavir.
Those who are mahavirs never make excuses such as that the circumstances were like that, that the problems were such and that was why they were defeated. It is the duty of the problems to come and the duty of the mahavirs to find a solution to the problems and not to be defeated. A mahavir is one who is always fearless and becomes victorious, not someone who becomes weak in trivial situations. Victorious mahavir souls remain happy at every step with their bodies and minds and are never unhappy. Waves of sorrow cannot come to them even in their dreams.
Slogan: Let there always be feelings of benevolence for everyone: this is the qualification of a knowledgeable and yogi soul.

*** Om Shanti ***

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BRAHMA KUMARIS MURLI 23 OCTOBER 2017 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 23 October 2017

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23/10/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – तुम्हारी पढ़ाई बुद्धि की है, बुद्धि को शुद्ध करने के लिए प्रवृत्ति में बहुत युक्ति से चलना है, खान-पान की परहेज रखनी है”
प्रश्नः- ईश्वर की कारोबार बड़ी वन्डरफुल और गुप्त है कैसे?
उत्तर:- हर एक के कर्मो का हिसाब -किताब चुक्तू करवाने की कारोबार बड़ी वन्डरफुल और गुप्त है। कोई कितना भी अपने पाप कर्म छिपाने की कोशिश करे लेकिन छिप नहीं सकता। सजा जरूर भोगनी पड़ेगी। हर एक का खाता ऊपर में रहता है, इसलिए बाप कहते हैं – बाप का बनने के बाद कोई पाप होता है तो सच बताने से आधा माफ हो जायेगा। सजायें कम हो जायेंगी। छिपाओ मत। कहा जाता है कख का चोर सो लख का चोर…… छिपाने से धारणा हो नहीं सकती।

ओम् शान्ति। किसकी याद में बैठे हो? बच्चे समझते हैं मात-पिता बापदादा अभी आयेंगे, आकर हम बच्चों को अपना वर्सा देंगे। बाबा से हम फिर से 5 हजार वर्ष पहले मुआफिक स्वर्ग का वर्सा ले रहे हैं। यह तो हर एक के दिल में होगा ना। अभी इस नर्क रूपी भंभोर को आग लगने वाली है। तुम्हारा इस दुनिया वालों से कोई भी तैलुक नहीं है। तुम्हारे लिए ज्ञान भी गुप्त है तो वर्सा भी गुप्त है। लौकिक बाप का वर्सा तो प्रत्यक्ष होता है। बाप की यह जायदाद है। ऑखों से देखते हैं। बाप को भी देखते हैं और वर्से को भी देखते हैं। अब हमारी आत्मा भी गुप्त है। इन ऑखों से न आत्मा को न परमात्मा को देख सकते हैं। लौकिक सम्बन्ध में अपने को शरीर समझ इनको (शरीर को) भी इन ऑखों से देखते हैं और शरीर देने वाले बाप को भी देखते हैं। टीचर गुरू को भी देखते हैं यहाँ तो यह बाप टीचर गुरू सब है गुप्त। बच्चे जानते हैं हम आत्माओं को अब ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। आगे तीसरा नेत्र नहीं था। आत्मा सोई पड़ी थी। अब आत्मा को जगाते हैं, तो आत्मा भी गुप्त है। जैसे आत्मा आकर शरीर में प्रवेश करती है वैसे शिवबाबा भी इस शरीर में आकरके हमको फिर स्वर्ग का मालिक बना रहे हैं। बुद्धि भी कहती है हमने अनेक बार बाप से वर्सा लिया है – आधाकल्प के लिए। फिर आधाकल्प गँवा देते हैं। अब फिर से हम श्रीमत पर अपनी राजधानी स्थापन कर रहे हैं। श्रीमत देने वाला भी गुप्त है। तुम्हारी आत्मा जानती है कि हम परमपिता परमात्मा से गुप्त रूप से सुन रहे हैं। आत्म-अभिमानी जरूर बनना है। पहले आत्मा है, पीछे शरीर है। आत्मा अविनाशी, बाप भी अविनाशी। बाप जो शरीर लेता है वह विनाशी है। इस शरीर में आकर बच्चे-बच्चे कहते हैं और स्मृति दिलाते हैं कि मैं आया हूँ तुमको दैवी सतयुगी स्वराज्य के लिए पुरूषार्थ कराने। पुरूषार्थ भी पूरा करना है। सतयुग में सिर्फ तुम्हारा ही राज्य होगा। तुम राज्य करते थे। फिर पुनर्जन्म तो लेना होता है। जो श्रीकृष्ण की वंशावली अथवा दैवी कुल के थे वही फिर रहेंगे। दूसरा फिर कोई नहीं होगा। चन्द्रवंशी कुल भी नहीं होगा। यह तो बहुत सहज बातें हैं समझने की। बरोबर सतयुग में कोई धर्म नहीं था। अभी तो ढेर धर्म हैं, आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं। अनेक तालियाँ बजती रहती हैं। सतयुग में धर्म ही एक है तो ताली बजती नहीं। तो तुम बच्चे गुप्त ही अपना राज्य स्थापन कर रहे हो। हर एक कहेंगे हम अपने राज्य में ऊंच पद पाने का पुरूषार्थ कर रहे हैं। तो इतनी बहादुरी भी चाहिए। तुम्हारा नाम ही है शिव शक्तियाँ, शेर पर सवारी कोई होती नहीं है, यह महिमा दिखाई है इसलिए शक्ति को शेर पर बिठाते हैं। तुम कोई शेर पर तो नहीं बैठते हो। तुम तो माया पर जीत पाने वाले हो। यह पहलवानी दिखाते हो इसलिए तुम्हारा नाम शिव शक्ति सेना रखा है। यूँ तो गोप भी हैं परन्तु मैजारिटी माताओं की है। अपवित्र प्रवृत्ति मार्ग से पवित्र प्रवृत्तिमार्ग में तुम ले जाते हो। तुम जानते हो सतयुग विष्णुपुरी में हम बहुत सुखी थे। पवित्रता, सुख, शान्ति सब कुछ था। यहाँ तो कितना दु:ख है। घर में बच्चे कपूत होते हैं तो कितना तंग करते हैं। वहाँ तो सदैव हर्षित रहते हैं। तुम जानते हो बेहद का बाप फिर से बेहद का सुख देने आया है। बाप कहते हैं भल गृहस्थ व्यवहार में रहो सिर्फ बुद्धि में यह धारणा करो – यह पढ़ाई बुद्धि की है। घर में रहते श्रीमत पर चलो। खान-पान से भी असर लग जाता है इसलिए युक्ति से चलना है। हर एक का कर्मबन्धन अपना है। कोई बांधेली है, कोई बन्धनमुक्त है। कोई तो चतुराई से भूँ-भूँ कर छुटटी ले लेती हैं। युक्तियां तो बहुत समझाई हैं। बोलो बाप का फरमान है पवित्र बनो, मैं तुम्हें भक्ति का फल देने आया हूँ। तो जरूर भगवान की मत पर चलना पड़े तब ही बिगर सजा खाये हम मुक्ति-जीवनमुक्ति को पायेंगे। जन्म-जन्मान्तर का बोझा सिर पर है। जैसे बाप एक सेकेण्ड में मुक्ति-जीवनमुक्ति देते हैं, वैसे सजायें भी एक सेकेण्ड में मिल जाती हैं, परन्तु भोगना बहुत होती है। जैसे काशी कलवट खाते हैं तो वह थोड़े समय में बहुत सजायें खाते हैं परन्तु हिसाब-किताब चुक्तू हो जाता है। तुमको तो बिगर सजा खाये हिसाब-किताब चुक्तू करना है इसलिए ऐसा पुरूषार्थ करना चाहिए जो सजा न खानी पड़े। बाबा को याद करना अच्छा है। विनाश भी सामने खड़ा है। विनाश काले पाण्डवों की प्रीत बुद्धि। बाप ने सम्मुख आकर प्रीत रखवाई है। बाकी औरों से प्रीत रख क्या करेंगे! वह सब खलास हो जाने हैं। एक बाप को याद करने का हड्डी पुरूषार्थ करना है। बाहर से करके मित्र सम्बन्धियों से खुश खैराफत पूछी जाती है, परन्तु दिल एक बाप से। जिस्मानी आशिक माशूक घर में रहते एक दो को याद करते हैं। तुम आशिक बने हो शिवबाबा के। वह तुम्हारे सम्मुख है। वह तुमको याद करते, तुम उनको याद करो। शिवबाबा इस शरीर में आकर आत्माओं की सगाई स्वयं से कराते हैं। इसको कहा जाता है आत्माओं का परमपिता परमात्मा के साथ कल्याणकारी मेला। तुम ज्ञान गंगायें हो, ज्ञान सागर बाप एक है। बाप को याद करने से विकर्म विनाश होंगे। बाप और कोई तकलीफ नहीं देते, सिर्फ पवित्र रहना है। काम महाशत्रु है, इन पर जीत पाने से तुम कृष्णपुरी के मालिक बनेंगे। बाप का फरमान है पवित्र बनो तो 21 जन्म की राजाई पायेंगे। पतित बनने से तो बर्तन मांजकर रहना अच्छा है। परन्तु देह-अभिमान न टूटने के कारण वर्से को भी गँवा देते हैं। देखो बाप कितना बड़ा है, पतित दुनिया, पतित शरीर में आया है। शिवबाबा को सोमनाथ के मन्दिर में पूज रहे हैं। वही बाबा इस समय देखो कितना साधारण बैठे हैं। अब परमात्मा खुद शिक्षा दे रहे हैं, इस पर भी नहीं चलेंगे तो पद को लकीर लगा देंगे।

बाप कहते हैं बच्चे पवित्र बनो। अभी सब भ्रष्टाचारी हैं, श्रेष्ठाचारी उनको कहा जाता है जो पवित्र रहते हैं। गवर्मेन्ट ने सन्यासियों का झुण्ड बनाया है कि तुम सबको श्रेष्ठाचारी बनाओ। परन्तु श्रेष्ठाचारी तो होते ही सतयुग में हैं। यहाँ कोई हो न सके। पवित्र ही श्रेष्ठ कहे जाते हैं। सन्यासी पवित्र हैं परन्तु फिर भी अपवित्र से जन्म लेते हैं क्योंकि है ही माया का राज्य। कोई योगबल से जन्म तो लेते नहीं हैं। बाप बच्चों को समझाते हैं दिल हमेशा साफ रहनी चाहिए। जरा भी अंहकार न रहे। बिल्कुल गरीब बन जाना अच्छा है। बाप है गरीब निवाज़, वाह गरीबी वाह! गरीबों को साहूकार बनाना है। बाप कहते हैं भारत को गरीब से साहूकार बनाता हूँ। भारतवासी ही बनेंगे और बनेंगे वह जो श्रीमत पर चलेंगे। वही स्वर्ग के मालिक बन सकेंगे। बाप सहज राजयोग सिखलाते ही हैं कृष्णपुरी अथवा स्वर्ग का मालिक बनने के लिए। बाप का फरमान है पवित्र बनो और कोई मनुष्य को हम गुरू नहीं मानते। जास्ती खिटपिट होती है पवित्रता पर। किसको मार मिलेगी, घर से निकाल देंगे तो वह क्या करेगी? बाप उनको शरण देते हैं, परन्तु ऐसे भी नहीं कि बाबा पास आकर फिर सम्बन्धी याद पड़े और नुकसान करते रहें। फिर दोनों जहानों से निकल जाते हैं। ज्ञान की धारणा नहीं करते तो सुधरते नहीं। पुरानी ही चाल चलते रहते हैं। यहाँ तो कोई भी पाप नहीं करना चाहिए। तुमको तो पुण्य आत्मा बनना है। श्रीमत के आधार पर अपने आपसे पूछो – यह पाप है वा पुण्य है? बाबा समझाते हैं जो भी पाप किये हैं वह बाप को सुनाने से आधा पाप मिट जायेगा। बहुत बच्चे बताते हैं हमने यह किया है। यह गुनाह है, फलाने से पतित बने हैं। बाप तो जानते हैं ना कितने विकर्म किये हैं। समझाते हैं अभी कोई पाप नहीं करो, नहीं तो सज़ा एकदम सौगुणी हो जायेगी फिर धर्मराजपुरी में साक्षात्कार करायेंगे। तुम ऐसे-ऐसे पाप करके छिपाते थे। छिप तो नहीं सकता। भल नहीं देखते हैं, वह बाप तो अच्छी रीति जानते हैं ना। धर्मराज के पास सारा खाता रहता है। ईश्वरीय कारोबार बड़ी वन्डरफुल और गुप्त है। कहते हैं ना – जरूर पाप किया है तब दूसरे जन्म में छी-छी घर में जन्म मिला है। तो जरूर जमा होता है ना। ऊपर में खाता तो है ना। अभी वह खाता यहाँ है इसलिए बाप समझाते रहते हैं कि अब कोई पाप नहीं करना। कख का चोर सो लख का चोर कहा जाता है। समझना चाहिए कि हम बहुत बड़ा पाप करते हैं फिर पद भ्रष्ट हो जायेंगे। धारणा नहीं होती तो ईश्वरीय सर्विस कर नहीं सकते औरों का भी कल्याण करना है। ऐसे समय बरबाद करेंगे, पाप करते रहेंगे तो पद कम हो पड़ेगा। फिर कल्प-कल्पान्तर के लिए वह पद हो जायेगा इसलिए जितना हो सके पुरूषार्थ करना है। पूछते हैं बाबा के पास क्यों आते हो? कहते हैं सूर्यवंशी राजधानी का वर्सा लेने, तो श्रीमत पर जरूर चलना पड़े। देखना है कि मेरे से कोई बुरा काम वा पाप तो नहीं होता है? नहीं तो सौगुणा दण्ड पड़ जायेगा, फिर दास दासी जाकर बनेंगे। यहाँ इसलिए थोड़ेही आये हो। मम्मा बाबा कहते हो तो नर से नारायण बनना चाहिए ना। बिगर धारणा के पद कैसे पायेंगे। मम्मा बाबा कहते भी माँ बाप के तख्त पर न बैठे तो समझेंगे पूरा पढ़ते नहीं हैं। मम्मा बाबा तो नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बनते हैं ना। तुमको भी बाप वही पढ़ाते हैं ना। तो बाप से पूरा वर्सा लेना चाहिए। बहुत हैं जो छिप-छिप करके पाप करते रहते हैं, बतलाते नहीं हैं। कितना भी समझाओ फिर भी छोड़ते नहीं। चोर को आदत पड़ जाती है तो चोरी बिगर, झूठ बोलने बिगर रह नहीं सकते। सच्चे बाप के साथ सच ही बोलना चाहिए। बाप को बतलाना चाहिए कि हमसे यह पाप हुआ है, क्षमा करो। माया ने पाप करा लिया। अच्छा फिर भी सच बोला है तो पाप आधा माफ हो सकता है। नहीं तो पाप बढ़ता ही जायेगा। कोई कहते हैं धन्धे में पाप होता है। व्यापारी लोग पाप करते हैं तो धर्माऊ निकालते हैं कि पाप कम हो जाये। पाप करके फिर पुण्य में पैसा लगा दिया वह भी अच्छा ही है। डूबी नांव से लोहा निकले वह भी अच्छा। यह बाप तो स्वर्ग की स्थापना करते हैं तो सब पुण्य में ही चला जायेगा। दान पुण्य करने वाले को मिलता तो है ना। बाप हर एक को समझाते हैं, बाप हर एक बात में मत देते हैं तो बच्चों को कभी ऐसा काम नहीं करना चाहिए। परन्तु माया छोड़ती नहीं है। अच्छी-अच्छी चीज़ देखेंगे तो झट खा लेंगे वा उठा लेंगे। ऐसे-ऐसे पाप कर्म करने से अपना ही पद भ्रष्ट कर लेते हैं। कई बच्चे बाबा-बाबा कह कर फिर हाथ छोड़ देते हैं। हाथ छोड़ा फिर क्या हाल होगा? माया एकदम ही कच्चा खा लेगी फिर वह कौड़ी का भी नहीं रहता। नम्बरवार तो होते हैं ना। सुखधाम में कोई तो राजाई करते हैं, कोई फिर साधारण भी होंगे। दास दासियां भी होंगी ना। अभी तुम बच्चों को बेहद के बाप से बेहद सुख का वर्सा मिल रहा है, इसलिए बाप की श्रीमत पर चलकर पूरा वर्सा लो। मौत तो सामने खड़ा है। अकाले मृत्यु तो होती है ना। एरोप्लेन गिरा तो सब मर गये। किसको पता था कि यह होगा। मौत सिर पर खड़ा है इसलिए कोशिश करके बाप से पूरा वर्सा लेना चाहिए। श्रीमत पर शरीर निर्वाह अर्थ कर्म भल करो। साथ-साथ यह पढ़ाई भी पढ़ो। बाप युक्तियाँ तो सब बतलाते हैं। पुरूषार्थ कर पवित्र भी रहना है। झाड़ू लगाना, बर्तन मांजना अच्छा है – अपवित्र बनने से। परन्तु देही-अभिमानी बनना पड़े। पवित्रता का मान तो है ना। पवित्र नहीं बनेंगे तो पद भी नहीं पायेंगे। यह सब बच्चों को समझानी दी जाती है। बच्चे तो वृद्धि को पाते रहेंगे। प्रजा भी बहुत बननी है। एक राजा को प्रजा तो हजारों की अन्दाज में चाहिए ना। राजा बनने में मेहनत है। अच्छा-

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस विनाशकाल में दिल की सच्ची प्रीत एक बाप से रखनी है। एक की ही याद में रहना है।

2) सच्चे बाप से सदा सच्चे रहना है। कुछ भी छिपाना नहीं है। देही-अभिमानी रहने की मेहनत करनी है। अपवित्र कभी नहीं बनना है।

वरदान:- महावीर बन हर समस्या का समाधान करने वाले सदा निर्भय और विजयी भव 
जो महावीर हैं वह कभी यह बहाना नहीं बना सकते कि सरकमस्टांश ऐसे थे, समस्या ऐसी थी इसलिए हार हो गई। समस्या का काम है आना और महावीर का काम है समस्या का समाधान करना न कि हार खाना। महावीर वह है जो सदा निर्भय होकर विजयी बनें, छोटी-मोटी बातों में कमजोर न हो। महावीर विजयी आत्मायें हर कदम में तन से, मन से खुश रहते हैं वे कभी उदास नहीं होते, उनके पास दु:ख की लहर स्वप्न में भी नहीं आ सकती।
स्लोगन:- सर्व के प्रति सदा कल्याण की भावना रहे – यही ज्ञानी, योगी आत्मा के लक्षण हैं।

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