18 july ki murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 18 JULY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 18 July 2020

Murli Pdf for Print : – 

18-07-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम डबल अहिंसक रूहानी सेना हो तुम्हें श्रीमत पर अपनी दैवी राजधानी स्थापन करनी है”
प्रश्नः- तुम रूहानी सेवाधारी बच्चे सभी को किस बात की चेतावनी देते हो?
उत्तर:- तुम सभी को चेतावनी देते हो कि यह वही महाभारत लड़ाई का समय है, अब यह पुरानी दुनिया विनाश होनी है, बाप नई दुनिया की स्थापना करा रहे हैं। विनाश के बाद फिर जयजयकार होगी। तुम्हें आपस में मिलकर राय करनी चाहिए कि विनाश के पहले सबको बाप का परिचय कैसे मिले।
गीत:- तूने रात गँवाई सो के…….. 

ओम् शान्ति। बाप समझा रहे हैं ऊंच ते ऊंच है भगवान फिर उनको ऊंच ते ऊंच कमान्डर इन चीफ आदि भी कहो क्योंकि तुम सेना हो ना। तुम्हारा सुप्रीम कमान्डर कौन है? यह भी जानते हो दो सेनाये हैं – वह है जिस्मानी, तुम हो रूहानी। वह हद के, तुम बेहद के। तुम्हारे में कमान्डर्स भी हैं, जनरल भी हैं, लेफ्टीनेंट भी हैं। बच्चे जानते हैं हम श्रीमत पर राजधानी स्थापन कर रहे हैं। लड़ाई आदि की तो कोई बात नहीं। हम सारे विश्व पर फिर से अपना दैवी राज्य स्थापन कर रहे हैं श्रीमत पर। कल्प-कल्प हमारा यह पार्ट बजता है। यह सब हैं बेहद की बातें। उन लड़ाइयों में यह बातें नहीं। ऊंच ते ऊंच बाप है। उनको जादूगर, रत्नागर, ज्ञान का सागर भी कहते हैं। बाप की महिमा अपरम-अपार है। तुम्हें बुद्धि से सिर्फ बाप को याद करना है। माया याद भुला देती है। तुम हो डबल अहिंसक रूहानी सेना। तुमको यही ख्याल है कि हम अपना राज्य कैसे स्थापन करें। ड्रामा जरूर करायेगा। पुरूषार्थ तो करना होता है ना। जो अच्छे-अच्छे बच्चे हैं, आपस में राय करनी चाहिए। माया से युद्ध तो अन्त तक तुम्हारी चलती रहेगी। यह भी जानते हो महाभारत लड़ाई होनी है जरूर। नहीं तो पुरानी दुनिया का विनाश कैसे हो। बाबा हमको श्रीमत दे रहे हैं। हम बच्चों को फिर से अपना राज्य-भाग्य स्थापन करना है। इस पुरानी दुनिया का विनाश हो फिर भारत में जयजयकार हो जाना है, जिसके लिए तुम निमित्त बने हो। तो आपस में मिलना चाहिए। कैसे-कैसे हम सर्विस करें। सभी को बाप का पैगाम सुनायें कि अब इस पुरानी दुनिया का विनाश होना है। बाप नई दुनिया की स्थापना कर रहे हैं। लौकिक बाप भी नया मकान बनाते हैं तो बच्चे खुश होते हैं। वह है हद की बात, यह है सारे विश्व की बात। नई दुनिया को सतयुग, पुरानी दुनिया को कलियुग कहा जाता है। अब पुरानी दुनिया है तो यह मालूम होना चाहिए – बाप कब और कैसे आकर नई दुनिया स्थापन करते हैं। तुम्हारे में नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार जानते हैं। बड़े ते बड़ा है बाप, बाकी फिर नम्बरवार महारथी, घोड़ेसवार, प्यादे हैं। कमान्डर, कैप्टन यह तो सिर्फ मिसाल दे समझाया जाता है। तो बच्चों को आपस में मिल राय निकालनी चाहिए कि सबको बाप का परिचय कैसे दें, यह है रूहानी सेवा। हम अपने भाई-बहिनों को चेतावनी कैसे दें कि बाप नई दुनिया स्थापन करने के लिए आये हैं। पुरानी दुनिया का विनाश भी सामने खड़ा है। यह वही महाभारत लड़ाई है। मनुष्य तो यह भी समझते नहीं हैं कि महाभारत लड़ाई के बाद फिर क्या!

तुम अभी फील करते हो कि अभी हम संगम पर पुरुषोत्तम बन रहे हैं। अब बाप आये हैं पुरुषोत्तम बनाने। इसमें लड़ाई आदि की कोई बात ही नहीं है। बाप समझाते हैं – बच्चे, पतित दुनिया में एक भी पावन नहीं हो सकता और पावन दुनिया में फिर एक भी पतित नहीं हो सकता। इतनी छोटी बात भी कोई समझते नहीं हैं। तुम बच्चों को सब चित्रों आदि का सार समझाया जाता है। भक्ति मार्ग में मनुष्य जप-तप, दान-पुण्य आदि जो भी करते हैं, उससे अल्पकाल के लिए काग विष्टा समान सुख की प्राप्ति होती है। परन्तु जब कोई यहाँ आकर समझे तब यह बातें बुद्धि में बैठें। यह है ही भक्ति का राज्य। ज्ञान रिंचक भी नहीं। जैसे पतित दुनिया में पावन एक भी नहीं, वैसे ज्ञान भी एक के सिवाए और कोई में नहीं। वेद-शास्त्र आदि सब भक्ति मार्ग के हैं। सीढ़ी उतरनी ही है। अभी तुम ब्राह्मण बने हो, इसमें नम्बरवार सेना है। मुख्य-मुख्य जो कमान्डर, कैप्टन, जनरल आदि हैं, उन्हों को आपस में मिल राय करनी चाहिए, हम बाबा का सन्देश कैसे देवें। बच्चों को समझाया है – मैसेन्जर, पैगम्बर अथवा गुरू एक ही होता है। बाकी सब हैं भक्ति मार्ग के। संगमयुगी सिर्फ तुम हो। यह लक्ष्मी-नारायण एम ऑब्जेक्ट बिल्कुल एक्यूरेट है। भक्तिमार्ग में सत्य नारायण की कथा, तीजरी की कथा, अमर कथा बैठ सुनाते हैं। अभी बाप तुमको सच्ची सत्य नारायण की कथा सुना रहे हैं। भक्तिमार्ग में हैं पास्ट की बातें, जो होकर जाते हैं उनका बाद में फिर मन्दिर आदि बनाते हैं। जैसे शिवबाबा अभी तुमको पढ़ा रहे हैं फिर भक्तिमार्ग में यादगार बनायेंगे। सतयुग में शिव वा लक्ष्मी-नारायण आदि कोई का चित्र नहीं होता। ज्ञान बिल्कुल अलग है, भक्ति अलग है। यह भी तुम जानते हो इसलिए बाप ने कहा है हियर नो ईविल, टॉक नो ईविल…….

तुम बच्चों को अभी कितनी खुशी है, नई दुनिया स्थापन हो रही है। सुखधाम की स्थापना अर्थ बाबा हमको फिर से डायरेक्शन दे रहे हैं, उसमें भी नम्बरवन डायरेक्शन देते हैं पावन बनो। पतित तो सभी हैं ना। तो जो अच्छे-अच्छे बच्चे हैं उन्हों को आपस में मिलकर राय करनी चाहिए कि सर्विस को कैसे बढ़ायें, गरीबों को कैसे मैसेज दें, बाप तो कल्प पहले मिसल आया है। कहते हैं अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। राजधानी जरूर स्थापन होनी है। समझेंगे जरूर। जो देवी-देवता धर्म के नहीं हैं वह नहीं समझेंगे। विनाश काले ईश्वर से विपरीत बुद्धि हैं ना। तुम बच्चे जानते हो हमारा धनी है इसलिए तुम्हें न विकार में जाना है, न लड़ना-झगड़ना है। तुम्हारा ब्राह्मण धर्म बहुत ऊंच है। वह शूद्र धर्म के, तुम ब्राह्मण धर्म के। तुम चोटी वह पैर। चोटी के ऊपर है ऊंच ते ऊंच भगवान निराकार। इन आंखों से न देखने के कारण विराट रूप में चोटी (ब्राह्मण) और शिवबाबा को दिखाते नहीं हैं। सिर्फ कहते हैं देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। जो देवता बनते हैं वही फिर से पुनर्जन्म ले क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बनते हैं। विराट रूप का भी अर्थ कोई नहीं जानते। अभी तुम समझते हो तो करेक्ट चित्र बनाना है। शिवबाबा भी दिखाया है और ब्राह्मण भी दिखाये हैं, तुमको अब सबको यह मैसेज देना है कि अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। तुम्हारा काम है मैसेज देना। जैसे बाप की महिमा अपरमअपार है, वैसे भारत की भी बहुत महिमा है। यह भी 7 रोज कोई सुने तब बुद्धि में बैठे। कहते हैं फुर्सत नहीं। अरे, आधा कल्प पुकारते आये हो, अब वह प्रैक्टिकल में आया हुआ है। बाप को आना ही है अन्त में। यह भी तुम ब्राह्मण जानते हो नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। पढ़ाई शुरू की और निश्चय हुआ। माशूक आया हुआ है, जिसको हम पुकारते थे, जरूर कोई शरीर में आया होगा। उनको अपना शरीर तो है नहीं। बाप कहते हैं मैं इनमें प्रवेश कर तुम बच्चों को सृष्टि चक्र की, रचयिता और रचना की नॉलेज देता हूँ। यह और कोई नहीं जानते। यह पढ़ाई है। बहुत सहज करके समझाते हैं। बाबा कहते हैं हम तुमको कितना धनवान बनाता हूँ। कल्प-कल्प तुम्हारे जैसा पवित्र और सुखी कोई नहीं। तुम बच्चे इस समय सभी को ज्ञान दान देते हो। बाप तुम्हें रत्नों का दान देते हैं, तुम दूसरों को देते हो। भारत को स्वर्ग बनाते हो। तुम अपने ही तन-मन-धन से श्रीमत पर भारत को स्वर्ग बना रहे हो। कितना ऊंचा कार्य है। तुम गुप्त सेना हो, किसको भी पता नहीं है। तुम जानते हो हम विश्व की बादशाही ले रहे हैं, श्रीमत द्वारा श्रेष्ठ बनते हैं। अब बाप कहते हैं मामेकम् याद करो। कृष्ण तो कह न सके, वह तो प्रिन्स था। तुम प्रिन्स बनते हो ना। सतयुग-त्रेता में पवित्र प्रवृत्ति मार्ग है। अपवित्र राजायें पवित्र राजा-रानी लक्ष्मी-नारायण की पूजा करते हैं। पवित्र प्रवृत्ति मार्ग वालों का राज्य चलता है फिर होता है अपवित्र प्रवृत्ति मार्ग। आधा-आधा है ना। दिन और रात। लाखों वर्ष की बात हो फिर आधा-आधा तो हो न सके। लाखों वर्ष हो तो फिर हिन्दू जो वास्तव में देवता धर्म के हैं उनकी संख्या बहुत बड़ी होनी चाहिए। अनगिनत होने चाहिए। अभी तो गिनती करते हैं ना। यह ड्रामा में नूँध है, फिर भी होगा। मौत सामने खड़ा है। यह वही महाभारत लड़ाई है। तो आपस में मिलकर सर्विस का प्लैन बनाना है। सर्विस करते भी रहते हैं। नये-नये चित्र निकलते हैं, प्रदर्शनी भी करते हैं। अच्छा, फिर क्या किया जाए? अच्छा रूहानी म्युज़ियम बनाओ। खुद देखकर जायेंगे तो फिर औरों को भेजेंगे। गरीब अथवा साहूकार धर्माऊ तो निकालते हैं ना। साहूकार जास्ती निकालेंगे, इसमें भी ऐसे हैं। कोई एक हज़ार निकालेंगे, कोई कम। कोई तो दो रूपये भी भेज देते हैं। कहते हैं एक रूपये की ईट लगा देना। एक रूपया 21 जन्मों के लिए जमा करना। यह है गुप्त। गरीब का एक रूपया, साहूकार का एक हजार, बराबर हो जाता है। गरीब के पास है ही थोड़ा तो क्या कर सकते हैं। हिसाब है ना। व्यापारी लोग धर्माऊ निकालते हैं, अब क्या करना चाहिए। बाप को मदद देनी है। बाप फिर रिटर्न में 21 जन्म के लिए देते हैं। बाप आकर गरीबों को मदद करते हैं। अब तो यह दुनिया ही नहीं रहेगी। सब मिट्टी में मिल जायेंगे। यह भी जानते हो स्थापना जरूर होनी है कल्प पहले मुआफिक। निराकार बाप कहते हैं – बच्चों, देह के सब धर्म त्याग, एक बाप को याद करो। यह ब्रह्मा भी रचना है ना। ब्रह्मा किसका बच्चा, किसने क्रियेट किया। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को कैसे क्रियेट करते हैं, यह भी कोई नहीं जानते हैं। बाप आकर सत्य बात समझाते हैं। ब्रह्मा भी जरूर मनुष्य सृष्टि में ही होगा। ब्रह्मा की वंशावली गाई हुई है। भगवान मनुष्य सृष्टि की रचना कैसे रचते हैं, यह कोई नहीं जानते। ब्रह्मा तो यहाँ होना चाहिए ना। बाप कहते हैं – जिसमें हमने प्रवेश किया है, यह भी बहुत जन्मों के अन्त वाला है। इसने पूरे 84 जन्म लिए हैं। ब्रह्मा कोई क्रियेटर नहीं है। क्रियेटर तो एक निराकार ही है। आत्मायें भी निराकार हैं। वह तो अनादि हैं। किसी ने क्रियेट नहीं किया फिर ब्रह्मा कहाँ से आया। बाप कहते हैं – मैंने इसमें प्रवेश कर नाम बदली किया। तुम ब्राह्मणों के भी नाम बदली किये। तुम हो राजऋषि, शुरू में सन्यास कर साथ में रहने लगे तो नाम बदली कर दिया। फिर देखा माया खा जाती है तो माला बनाना, नाम रखना छोड़ दिया।

आजकल दुनिया में हर बात में ठगी बहुत है। दूध में भी ठगी। सच्ची चीज़ तो मिलती नहीं। बाप के लिए भी ठगी। स्वयं को ही भगवान कहलाने लगते हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है। तुम्हारे में भी नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार हैं। बाप जानते हैं कौन कैसे पढ़ते और फिर पढ़ाते हैं, क्या पद पायेंगे। निश्चय है हम बाप द्वारा वर्ल्ड का क्राउन प्रिन्स बन रहे हैं। तो ऐसा पुरूषार्थ कर दिखाना है। हम क्राउन प्रिन्स बने। फिर 84 का चक्र लगाया अब फिर बनते हैं। यह है नर्क, इनमें कुछ भी नहीं रहा है। फिर बाप आकर भण्डारा भरपूर कर काल कंटक दूर कर देते हैं। तुम सबसे पूछो यहाँ भण्डारा भरपूर करने आये हो ना। अमरपुरी में काल आ न सके। बाप आते ही हैं भण्डारा भरपूर कर काल कंटक दूर करने। वह है अमरलोक, यह है मृत्युलोक। ऐसी मीठी-मीठी बातें सुननी-सुनानी है। फालतू नहीं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप विश्व का मालिक बनने की पढ़ाई पढ़ाने आये हैं इसलिए कभी ऐसा नहीं कहना कि हमें फुर्सत नहीं। श्रीमत पर तन-मन-धन से भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा करनी है।

2) आपस में बहुत मीठी-मीठी ज्ञान की बातें सुननी और सुनानी है। बाप का यह डायरेक्शन सदा याद रहे – हियर नो ईविल, टॉक नो ईविल……।

वरदान:- पुरूषार्थ के सूक्ष्म आलस्य का भी त्याग करने वाले आलराउन्डर अलर्ट भव
पुरूषार्थ की थकावट आलस्य की निशानी है। आलस्य वाले जल्दी थकते हैं, उमंग वाले अथक होते हैं। जो पुरूषार्थ में दिलशिकस्त होते हैं उन्हें ही आलस्य आता है, वह सोचते हैं क्या करें इतना ही हो सकता है, ज्यादा नहीं हो सकता। हिम्मत नहीं है, चल तो रहे हैं, कर तो रहे हैं – अब इस सूक्ष्म आलस्य का भी नाम निशान न रहे इसके लिए सदा अलर्ट, एवररेडी और आलराउन्डर बनो।
स्लोगन:- समय के महत्व को सामने रख सर्व प्राप्तियों का खाता फुल जमा करो।

TODAY MURLI 18 JULY 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 18 July 2020

18/07/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you are the doubly non-violent spiritual army. You have to establish your divine kingdom by following shrimat.
Question: What should you spiritual servers caution everyone about?
Answer: Caution everyone: This is the time of that same Mahabharat War. This old world is now going to be destroyed. The Father is inspiring the new world to be established. After destruction, there will be cries of victory. You should all get together and discuss how to give everyone the Father’s introduction before destruction takes place.
Song: You wasted the night in sleeping and the day in eating!

Om shanti. The Father explains that God is the Highest on High. Then, because you are an army, He can also be called the Commander-in-Chief. Who is your Supreme Commander? You know that there are two types of army. Those are physical armies, whereas you are a spiritual army. Those armies are limited whereas you are an unlimited army. You have commandersgenerals and also lieutenants. You children know that you are establishing your kingdom by following shrimat. There is no question of a war etc. We are once again establishing our divine kingdom over the whole world by following shrimat. We act out this part every cycle. All of these matters are unlimited. These things don’t apply to those battles. The Father is the Highest on High. He is also called the Magician, the Jewel Merchant and the Ocean of Knowledge. The praise of the Father is limitless. Your intellects simply have to have remembrance of the Father. Maya makes you forget to have remembrance of Him. You are the doubly non-violent spiritual army. Your only concern is how to establish your kingdom. The drama definitely will make you do this. You do have to make effort, do you not? You good children should discuss this among yourselves. Your war with Maya will continue till the end. You know that the Mahabharat War is also definitely going to happen. How else would the destruction of the old world take place? Baba is giving us shrimat. We children have to establish our kingdom once again. After this old world is destroyed, there will be cries of victory in Bharat. You have become the instruments for this. Therefore, meet among yourselves and discuss ways of doing service so that you can give everyone the Father’s message that this old world is to be destroyed. The Father is establishing the new world. When a physical father builds a new home, his children become happy. That is a limited aspect whereas this is a matter of the whole world. The new world is called the golden age and the old world is called the iron age. It is now the old world. Therefore, you should know when and how the Father establishes the new world. Those of you who know this know it, numberwise, according to the effort you make. The greatest of all is the Father. Then the rest are numberwise elephant riders, cavalry and infantry. Commanders and captains are mentioned just as examples in order to explain to you. You children should meet amongst yourselves and discuss ways of giving the Father’s introduction. This is spiritual service. How can we caution our brothers and sisters and tell them that the Father has now come to establish the new world? Destruction of the old world is now standing in front of you. This is the same Mahabharat War. Human beings don’t even know what happens after the Mahabharat War. You feel that you are now becoming the most elevated human beings at this confluence age. The Father has come to make you into the most elevated human beings. There is no question of a war in this. The Father explains: Children, there cannot be a single pure person in this impure world, and there cannot be a single impure person in the pure world. No one understands such a small matter! All the pictures etc., are explained to you children in essence. Whatever people do on the path of devotion, such as chanting, doing penance, giving donations and performing charity etc., it only brings them happiness that is as temporary as the droppings of a crow. However, it is only when you come here and understand these things that it will then sit in your intellects. It is now the kingdom of devotion; there isn’t the slightest knowledge. Just as there is no one pure in this impure world, so too, no one but the One has any of this knowledge. The Vedas and scriptures etc., all belong to the path of devotion. You have to come down the ladder. You have now become Brahmins. This army is numberwise. The main ones, such as commanderscaptains and generals etc., should meet together and discuss how to give Baba’s message. It has been explained to you children that the Messenger, Preceptor and Guru are all One. All others belong to the path of devotion. Only you are at the confluence age. The aim and objective of becoming Lakshmi and Narayan is absolutely accurate. On the path of devotion, they relate the story of the true Narayan, the story of the third eye and the story of immortality. The Father is now telling you the story of the true Narayan. On the path of devotion, everything is a matter of the past. They build temples etc., to whoever came and departed. Similarly, Shiv Baba is now teaching you, and memorials of this will then be built on the path of devotion. In the golden age, there are no images of Shiva or of Lakshmi and Narayan etc. Knowledge is totally distinct from devotion. Only you have this knowledge. This is why the Father has said: Hear no evil, speak no evil…You children are now so happy that the new world is being established. Baba is once again giving us directions for the establishment of the land of happiness. The number one direction is that you must become pure. Everyone is impure. The good children should meet together and discuss how to increase service and how to give the Father’s messageto the poor. The Father has come as He did in the previous cycle. He says: Consider yourselves to be souls and remember Me! The kingdom definitely has to be established. They will definitely understand this. Those who don’t belong to the deity religion will not understand. At the time of destruction they have intellects that have no love for God. You children know that He is your Lord and Master. Therefore, you must neither indulge in vice nor fight or quarrel. Your Brahmin religion is very elevated. They belong to the shudra religion whereas you belong to the Brahmin religion. You are the topknot and they are the feet. Above the topknot there is only incorporeal God, the Highest on High. Because no one can see Him with physical eyes, Shiv Baba hasn’t been shown in the variety-form image, nor has the topknot (symbol of Brahmins) been shown. They only speak of the deities, warriors, merchants and shudras. Those who become deities then take rebirth and become warriors, merchants and shudras. No one understands the symbolism of the variety-form image. You now understand it. Therefore, you should make the picturecorrect. Shiv Baba and you Brahmins too have been shown. You now have to give everyone the message: Consider yourself to be a soul and remember the Father! It is your duty to give this message. Just as the Father’s praise is limitless, so Bharat too is praised a great deal. If someone were to listen to this knowledge for seven days, it would sit in his intellect. They say that they don’t have time. Oh! But you have been calling out for half the cycle and He has now come here in a practical way. The Father has to come here at the end (of the cycle). Only you Brahmins understand this, numberwise, according to the efforts you make. As soon as you began to study this knowledge, you developed the faith that the Beloved to whom you had been calling out has now come. He would surely have to come in someone’s body. He doesn’t have a body of His own. The Father says: I enter this one and give you children knowledge of the world cycle, the Creator and creation. No one else knows this. This is a study. Baba makes it very easy and explains it to you. Baba says: I make you so wealthy! No one becomes as pure or as happy as you are every cycle. You children donate this knowledge to everyone at this time. The Father donates jewels to you. You then donate them to others. You are making Bharat into heaven. You follow shrimat and make Bharat into heaven by using your bodies, minds and wealth. This is such an elevated task. You are an incognito army. No one knows this. You know that you are claiming sovereignty over the world and becoming elevated by following shrimat. The Father says: Now, constantly remember Me alone! Krishna couldn’t have said this; he was a prince. You are becoming princes. In the golden and silver ages, there is the pure family path. Impure kings worship the idols of the pure King Narayan and pure Queen Lakshmi. First there is the kingdom of the pure family path and then the kingdom of the impure family path; it is half and half, day and night. If it were a matter of hundreds of thousands of years, it couldn’t be half and half. If it were hundreds of thousands of years, the population of the Hindu religion, which is in fact the deity religion, would be very much greater; there would be countless Hindus. At present, they still take a census of the population. It is fixed in the drama and it will happen again. Death is standing just ahead. It will be the same Mahabharat War. Therefore, meet together and make service plans. You do continue to do service. You create new pictures and have exhibitions. OK, what should you do now? Achcha, create a spiritual museum. When people see it, they will recommend it to others. Both the poor and the wealthy put money aside to give in donation. The wealthy put aside more money. It is the same here. Some give a thousand and others give less. Some even send just two rupees. They say: Use one rupee to put a brick in my name and accumulate the other rupee for 21 births. This is incognito. One rupee of someone poor is equivalent to one thousand of someone wealthy. Since the poor have very little, what can they do? There is the account. Businessmen also put something aside for donating. What should be done now? Help the Father! The Father will then give you the return of that for 21 births. The Father comes and helps the poor. This world is no longer going to remain; everything will turn to dust. You know that establishment has to take place as it did in the previous cycle. The incorporeal Father says: Children, renounce all your bodily religions and remember the one Father. This Brahma is also part of creation. Who is Brahma a child of? Who created him? How are Brahma, Vishnu and Shankar created? No one knows any of this. The Father comes and explains the truth. Brahma definitely has to exist in the human world. “The Dynasty of Brahma” has been remembered. No one knows how God creates the human world. Brahma has to exist here, does he not? The Father says: The one whose body I have entered is now in the last of his many births. He has taken the full 84 births. Brahma is not the Creator. Only the one incorporeal One is the Creator. Souls too are incorporeal. They are eternal; no one created them. Therefore, where did Brahma come from? The Father says: I entered him and changed his name. The names of you Brahmins were also changed. You are Raj Rishis. In the beginning, you renounced everything and came and stayed with the Father. Therefore, your names were changed. Then, because Maya ate some of you, Baba stopped creating the rosary and giving new names. Nowadays, there’s a lot of cheating in every respect. They even cheat with milk; you just can’t get the real thing. They even cheat the Father; they begin to have themselves called God. You children now understand what a soul is and what the Supreme Soul is, it is numberwise, according to the effort each of you makes. The Father knows how much each of you studies and teaches others and what status you will then receive. You have the faith that you are being made into crown princes of the world by the Father. Therefore, you should make effort accordingly and show everyone that you are becoming crown princes. You have been around the cycle of 84 births and are now becoming that again. This is hell; there is nothing left here. The Father has now come and is filling your treasure-store and removing all your sorrow. Ask everyone: You have come here to have your treasure-store filled, have you not? There can be no death in the land of immortality. The Father has come to remove your sorrow and fill your treasure-store. That is the land of immortality and this is the land of death. Listen to and speak about these sweet things, not useless things. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. The Father has come to teach you this study which makes you into the masters of the world. Therefore, never say that you don’t have time. Follow shrimat and serve Bharat with your body, mind and wealth to make it into heaven.
  2. Listen to and speak about very sweet things of knowledge among yourselves. Always remember the Father’s directionHear no evil, speak no evil
Blessing: May you be an all-rounder who remains alert and ever ready by renouncing even any subtle laziness about making effort.
Getting tired in your efforts is a sign of laziness. Lazy ones get tired quickly, whereas those who have enthusiasm are tireless. Those who become disheartened about their efforts have laziness and think, “What can I do? I can only do this much, I am not able to do any more. I don’t have any courage; I am moving along, I am doing everything…” Now, do not let any name or trace of this subtle laziness remain. To do this, you have to be constantly alerteverready and an all-rounder.
Slogan: Keeping the importance of time in front of you, accumulate fully attainments in your account.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 18 JULY 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 18 July 2019

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Read Murli 17 July 2019:- Click Here

18/07/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, the land of peace is the home of pure souls. If you want to go to that home, become completely pure.
Question: What guarantee does the Father give all of you children?
Answer: Sweet children, remember Me and I guarantee that you will go to My home without experiencing punishment. Just attach your heart to the one Father. While looking at this old world, do not see it. While living in this world, demonstrate how to remain pure and Baba will definitely give you the sovereignty of the world.

Om shanti. The spiritual Father asks you spiritual children: You children know that the Father has come to take you back to His home; so do you desire to go home? That is the home of all souls. Here, the home of all embodied souls is not just one home. You understand that the Father has come. You invited the Father to come here: Take us home! That is, to the land of peace. The Father now says: Ask your hearts, o souls, how you would be able to go back home impure. You surely have to become pure. You now have to return home. He doesn’t tell you anything else. You have been making effort for so long on the path of devotion. What was that for? For liberation. So, the Father now asks you: Do you feel like going home? Children reply: Baba, it is for this that we have performed devotion for so long. You also know that all human souls have to be taken back. However, you have to return home having become pure, and it is the pure souls that come here first. Impure souls cannot live in the home. All the billions of souls definitely have to return home. That home is called the land of peace and the stage of retirement. We souls have to become pure and go to the pure land of peace; that’s all! This is something so easy. That is the souls’ pure land of peace and the other is the pure land of happiness of human, embodied souls, whereas this is the impure land of sorrow of human, embodied souls. There is no need to be confused about this. The land of peace is the place where all pure souls reside. That is the pure world of souls, the viceless, incorporeal world. This is the old world of all embodied souls where all are impure. The Father has now come to make you souls pure and to take you back to the pure world of the land of peace. Then, those who study Raj Yoga will go to the pure land of happiness. This is very easy. You don’t have to think about anything in this. You have to use your intellects to understand. The Father of us souls has come to take us to the pure land of peace. We had forgotten the way to go there, and the Father has now shown us. I come and tell you every cycle: O children, remember Me, Shiv Baba. Only the one Satguru is the Bestower of Salvation for All. He alone comes and gives you children the message, that is, shrimat, regarding what you children now have to do. You have performed a lot of devotion and taken a lot of sorrow for half the cycle. By incurring expense, you have become poverty-stricken. Souls have become tamopradhan from satopradhan. Just these few things have to be understood. Do you now want to go back home or not? Yes Baba, we definitely want to go back home. That is our sweet silence home. You also understand that you are now truly impure and that is why you are unable to go back home. The Father now says: Remember Me and your sins will be cut away. I give you this same message every cycle. Consider yourselves to be souls because those bodies are going to finish. Souls, however, have to go back home. That is called the incorporeal world. All incorporeal souls reside there. That is the home of souls. The incorporeal Father also resides there. The Father comes at the end because He then has to take everyone back home. Not a single impure soul will remain here. There is no question of becoming confused or having any difficulty in this. People sing: O Purifier, come and purify us and take us back with You! He is the Father of all. Then, when we go to play our parts in the new world, very few people will reside there. Where will all the billions of souls go and reside? You also know that there were few human souls in the golden age; the tree was small and then it grew. There is a variety of innumerable religions in the tree. It is called the kalpa tree. If you don’t understand anything, you can ask Baba. Some say: Baba, how can we accept that the duration of the cycle is 5000 years? The Father is only telling you the truth. He has also told you the account of the cycle. The Father comes at the confluence age of this cycle and establishes the deity kingdom which doesn’t exist now. In the golden age, there will then be one deity kingdom. At this time, He is giving you the knowledge of the Creator and the creation. The Father says: I come at the confluence age of every cycle. I establish the new world. The old world is to end. According to the drama plan, the new world becomes old and the old world becomes new. This is also shown in the four equal parts of the swastika, but they don’t understand anything. On the path of devotion, it is as though they simply continue to play with dolls. There are so many pictures. On Deepmala, they especially put them up in shops. There are so many pictures. You understand that there is now one Shiv Baba and you children. You come here, and then it is the kingdom of Lakshmi and Narayan and then the kingdom of Rama and Sita. Then the other religions come. You children have no connection with them. They come at their own time and then everyone has to return home. You children now have to return home. This whole world is to be destroyed. What is the point of staying here any longer? Your hearts are not attached to this world at all. You have to attach your hearts to the one Beloved. He says: Connect your hearts to Me alone and you will become pure. A lot of time has now gone by and little time remains. Time continues to pass by. If you don’t stay in yoga, there will be a lot of repentance at the end. There will be punishment and your status will be destroyed. You now know how long it has been since you left your home. People beat their heads in order to go home. You will meet the Father at home. You will not meet Him in the golden age. People make so much effort to go to the land of liberation. That is called the path of devotion. According to the drama, the path of devotion is now to end. I have now come to take you back home. I will definitely take you back. The purer someone becomes, the higher the status he will claim. There is no question of being confused about this. The Father says: Children, remember Me and I guarantee that you will return home without experiencing punishment. Your sins will be absolved by having remembrance. If you don’t remember Me, there will have to be punishment experienced and the status will be destroyed. I come and explain this every 5000 years. I have come countless times to take you all back home. Only you children play the parts of victory and defeat, and I then come to take you back. This is the impure world which is why people sing: O Purifier, come! We are vicious sinners; come and make us viceless and pure! This is the vicious world. You children now have to become completely viceless. Those who come later come (to heaven) having experienced punishment. This is why they come into a world which is two degrees less; they cannot be called completely pure. This is why you must now make full effort. It should not be that your status is reduced. Although that is not the kingdom of Ravan, the status is numberwise. When alloy is mixed in a soul, he receives a body accordingly. Souls become silveraged from goldenaged. Alloy of silver is mixed into souls and then, day by day, there is dirtier alloy mixed into souls. The Father explains to you very well. If you aren’t able to understand something, raise your hand! The Father explains to those who have been around the cycle of 84 births. The Father says: I enter this one at the end of his 84 births. He then has to go into the first number. The one who was number one is now the last one. The one who has become impure at the end of his many births is the one who comes first. I, the Purifier, enter his body alone. I make him pure. I explain to you so clearly. The Father says: Remember Me and your sins will be burnt away. You have listened a great deal to the knowledge of the Gita and also related it to others, but you didn’t attain salvation through that. Many sannyasis have related the scriptures to you very sweetly. Hearing that sound, many eminent people have gathered together. It is sweetness for the ears. The path of devotion is just sweetness for the ears. Here, souls have to remember the Father. The path of devotion is now ending. The Father says: I have come to give you the knowledge that no one else knows. I alone am the Ocean of Knowledge. Gyan is called knowledge. I teach you everything. I also explain to you the cycle of 84 births. You have all the knowledge in you. From the physical world you cross the subtle region and go to the incorporeal world. First of all there is the dynasty of Lakshmi and Narayan. There are no vicious children there. There is no kingdom of Ravan there. Everything happens with the power of yoga. You have a vision that a baby will now enter the palace of a womb. He departs in happiness. Here, people weep and wail so much! Here, you go into the jail of a womb. There is no question of weeping and wailing there. The body definitely has to be changed, just as there is the example of the snake. However, there is no question of becoming confused about this. There is no need to ask many questions. You should totally engage yourself in the effort to become pure. Is it difficult to remember the Father? You are sitting in front of the Father. I, your Father, am giving you your inheritance of happiness. Can you not stay in remembrance for this final birth? You children understand this very well when you are here, but when you return home and see your wife’s face etc., Maya eats you. The Father says: Do not have attachment to anyone. All of that is definitely to be destroyed. You have to remember the one Father. While walking and moving around, remember the Father and your kingdom. You also have to imbibe divine virtues. In the golden age, there are no dirty things such as meat etc. The Father says: Renounce even the vices. I am giving you the sovereignty of the world. There is so much income in that, so why should we not remain pure? By remaining pure for just one birth, you earn such a huge income. You may live together, but let there be the sword of knowledge in between you. If you demonstrate remaining pure, you will claim the highest status of all because you would then be ones who are celibate from birth. Knowledge is also needed. You have to make others similar to yourselves. You have to demonstrate to the sannyasis how you can live together and still remain pure. Then, they would understand that you have some great power. The Father says: By remaining pure for this one birth, you will become the masters of the world for 21 births. You receive such a big prize and so why would you not demonstrate how to remain pure? Very little time remains. There will continue to be the sound and it will also be printed in the newspapers. You have seen the rehearsals. Look what happened with just one atomic bomb! Even now people are still in hospital. Nowadays, they make such bombs etc. that there will be no difficulty; everyone will be destroyed instantly. These rehearsals will take place and it will then become final. They experiment to see if people die instantly or not. Then they would find other methods. There won’t be any hospitals etc. Who would sit and serve others? No Brahmin etc. will remain to feed you. As soon as the bomb is released, everything will be destroyed. Everything will be buried in the earthquakes; it will not take time. Here, there are crowds of people. In the golden age, there will be very few. How then will all of them be destroyed? As you progress further, you will be able to see what happens. There will be 900,000 there at the beginning. You are the fakirs (religious ascetics) and you love the Lord. You have now renounced everything and you consider yourselves to be souls. The Father loves such fakirs. In the golden age, there will be a small tree. Baba explains many things to you. All actorsare imperishable souls and they come here to play their own parts. You come every cycle to become the Father’s students and to study. You know that Baba will make you pure and take you back with Him. According to the drama, Baba is definitely bound to take everyone back home. This is why the name is the Pandava Army. What are you Pandavas doing? You are claiming your fortune of the kingdom from the Father, exactly as you did in the previous cycle, numberwise, according to the efforts you make. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. In order to be loved by the Father, become complete fakirs (beggar). To forget your body and consider yourself to be a soul is to become fakirs (a beggar). In order to claim the biggest prize from the Father, demonstrate how to become completely pure.
  2. You have to return home and this is why you must not attach your heart to the old world. Attach your heart to only the one Beloved. Remember the Father and the kingdom.
Blessing: May you be a number one server and serve through your mind while remaining stable in your powerful stage.
If someone does not get a chance to serve through words, there is the chance to serve through the mind at every moment. The most powerful and greatest service of all is service through the mind. Service through words is easy, but, in order to serve with your mind, you first have to make yourself powerful. You can serve with words even if your stage is fluctuating, but service through the mind cannot be done in that way. Those who serve with their elevated stage are the number one servers and they claim full marks.
Slogan: To experience spirituality while carrying out your lokik task (mundane work) is to surrender yourself.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 18 JULY 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 18 July 2019

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18-07-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – शान्तिधाम पावन आत्माओं का घर है, उस घर में चलना है तो सम्पूर्ण पावन बनोˮ
प्रश्नः- बाप सभी बच्चों से कौन-सी गैरन्टी करते हैं?
उत्तर:- मीठे बच्चे, तुम मुझे याद करो तो मैं गैरन्टी करता हूँ कि बिगर सज़ा खाये तुम मेरे घर में चलेंगे। तुम एक बाप से दिल लगाओ, इस पुरानी दुनिया को देखते भी नहीं देखो, इस दुनिया में रहते पवित्र बनकर दिखाओ, तो बाबा तुम्हें विश्व की बादशाही अवश्य देंगे।

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चों से रूहानी बाप पूछ रहे हैं, यह तो बच्चे जानते हैं बाप आया है हम बच्चों को अपने घर ले जाने लिए, अब घर जाने की दिल होती है? वह है सब आत्माओं का घर। यहाँ सब जीव आत्माओं का घर एक नहीं है। यह तो समझते हो बाप आया हुआ है। निमंत्रण पर बुलाया है बाप को। हमको घर अर्थात् शान्तिधाम ले चलो। अब बाप कहते हैं अपने दिल से पूछो – हे आत्मायें, तुम पतित कैसे चल सकेंगी? पावन तो जरूर बनना है। अब घर चलना है और तो कोई बात नहीं कहते। भक्ति मार्ग में तुमने इतना समय पुरूषार्थ किया है, किसके लिए? मुक्ति के लिए। तो अब बाप पूछते हैं घर चलने का विचार है? बच्चे कहते – बाबा इसके लिए ही तो इतनी भक्ति की है। यह भी जानते हो जो भी जीव आत्मायें हैं, सबको ले जाना है। परन्तु पवित्र बनकर घर जाना है फिर पवित्र आत्मायें ही पहले-पहले आती हैं। अपवित्र आत्मायें तो घर में रह नहीं सकती। अभी जो भी करोड़ों आत्मायें हैं, सबको घर जरूर जाना है। उस घर को शान्तिधाम वा वानप्रस्थ कहा जाता है। हम आत्माओं को पावन बनकर पावन शान्तिधाम जाना है। बस। कितनी सहज बात है। वह है पावन शान्तिधाम आत्माओं का। वह है पावन सुखधाम जीव आत्माओं का। यह है पतित दु:खधाम जीव आत्माओं का। इसमें मूँझने की तो बात ही नहीं। शान्तिधाम जहाँ सब पवित्र आत्मायें निवास करती हैं। वह है आत्माओं की पवित्र दुनिया – वाइसलेस, इनकारपोरियल वर्ल्ड। यह पुरानी दुनिया है सब जीव आत्माओं की। सब पतित हैं। अब बाप आये हैं आत्माओं को पावन बनाकर, पावन दुनिया शान्तिधाम में ले जाने। फिर जो राजयोग सीखते हैं वही पावन सुखधाम में आयेंगे। यह तो बहुत सहज है, इसमें कोई भी बात का विचार नहीं करना है। बुद्धि से समझना है। हम आत्माओं का बाप आया हुआ है, हमको पावन शान्तिधाम में ले जाने। वहाँ जाने का रास्ता जो हम भूल गये थे, सो अब बाप ने बताया है। कल्प-कल्प मैं ऐसे ही आकर कहता हूँ – हे बच्चे, मुझ शिवबाबा को याद करो। सर्व का सद्गति दाता एक सतगुरू है। वही आकर बच्चों को पैगाम अथवा श्रीमत देते हैं कि बच्चों अभी तुमको क्या करना है? आधाकल्प तुमने बहुत भक्ति की है, दु:ख उठाया है। खर्चा करते-करते कंगाल बन गये हो। आत्मा भी सतोप्रधान से तमोप्रधान बन गई है। बस, यह थोड़ी बात ही समझने की है। अब घर चलना है वा नहीं? हाँ बाबा, जरूर चलना है। वह हमारा स्वीट साइलेन्स होम है। यह भी समझते हो बरोबर अभी हम पतित हैं इसलिए जा नहीं सकते हैं। अब बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे पाप कट जायेंगे। कल्प-कल्प यही पैगाम देता हूँ। अपने को आत्मा समझो, यह देह तो खलास हो जानी है। बाकी आत्माओं को वापिस जाना है। उनको कहते हैं निराकारी दुनिया। सब निराकारी आत्मायें वहाँ रहती हैं। वह घर है आत्माओं का। निराकार बाप भी वहाँ रहते हैं। बाप आते हैं सबसे पिछाड़ी में क्योंकि फिर सबको वापिस ले जाना है। एक भी पतित आत्मा रहती नहीं है, इसमें कोई मूँझने वा तकलीफ की बात नहीं है। गाते भी हैं हे पतित-पावन आकर हमको पावन बनाए साथ ले चलो। सबका बाप है ना। फिर जब हम नई दुनिया में पार्ट बजाने आते हैं तो बहुत थोड़े रहते हैं। बाकी इतनी करोड़ आत्मायें कहाँ जाकर रहती हैं? यह भी जानते हो सतयुग में थोड़ी जीव आत्मायें थी, छोटा झाड़ था फिर वृद्धि को पाया है। झाड़ में अनेक धर्मों की वैराइटी है। उसको ही कल्प वृक्ष कहा जाता है। कुछ भी अगर नहीं समझते हो तो पूछ सकते हो। कई कहते हैं – बाबा, हम कल्प की आयु 5 हज़ार वर्ष कैसे मानें? अरे, बाप तो सत्य ही सुनाते हैं। चक्र का हिसाब भी बताया है।

इस कल्प के संगम पर ही बाप आकर दैवी राजधानी स्थापन करते हैं, जो अभी नहीं है। सतयुग में फिर एक दैवी राजधानी होगी। इस समय तुमको रचता और रचना का ज्ञान सुनाते हैं। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुगे आता हूँ। नई दुनिया की स्थापना करता हूँ। पुरानी दुनिया खत्म हो जानी है। ड्रामा प्लैन अनुसार, नई से पुरानी, पुरानी से नई बनती है। इसके 4 भाग भी पूरे हैं जिसको स्वास्तिका भी कहते हैं परन्तु समझते कुछ भी नहीं हैं। भक्तिमार्ग में तो जैसे गुड़ियों का खेल खेलते रहते हैं। अथाह चित्र हैं, दीपमाला पर खास दुकान निकालते हैं, अनेकानेक चित्र हैं। अभी तुम समझ गये हो एक है शिवबाबा और हम बच्चे। फिर यहाँ आओ तो लक्ष्मी-नारायण का राज्य, फिर राम-सीता का राज्य, फिर बाद में और-और धर्म आते हैं, जिससे तुम बच्चों का कनेक्शन ही नहीं है। वह अपने-अपने समय पर आते हैं फिर सबको वापिस जाना है। तुम बच्चों को भी अब घर जाना है। यह सारी दुनिया विनाश होनी है। अब इसमें क्या रहना है। इस दुनिया से दिल ही नहीं लगती। दिल लगानी है एक माशुक से, वह कहते हैं मुझ एक के साथ दिल लगाओ तो तुम पावन बनेंगे। अब बहुत गई थोड़ी रही, टाइम जाता रहता है। योग में नहीं रहे होंगे तो फिर अन्त में वह बहुत पश्चाताप् करेंगे, सजा खायेंगे, पद भी भ्रष्ट हो जायेगा। यह भी तुमको अभी मालूम पड़ा है कि अपना घर छोड़े हमको कितना समय हुआ है। घर जाने लिए ही तो माथा मारते हैं ना। बाप भी घर में ही मिलेगा। सतयुग में तो नहीं मिलेगा। मुक्तिधाम में जाने के लिए मनुष्य कितनी मेहनत करते हैं। उसको कहा जाता है भक्ति मार्ग। अभी भक्ति मार्ग खलास होना है ड्रामा अनुसार। अभी मैं तुमको घर ले जाने के लिये आया हूँ। जरूर ले जाऊंगा। जितना जो पावन बनेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। इसमें मूँझने की बात ही नहीं। बाप कहते हैं – बच्चे तुम मुझे याद करो, मैं गैरन्टी करता हूँ तुम बिगर सजा खाये घर चले जायेंगे। याद से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। अगर याद नहीं करेंगे तो सजायें खानी पड़ेगी, पद भी भ्रष्ट हो जायेगा। हर 5 हज़ार वर्ष बाद मैं यही आकर समझाता हूँ। मैं अनेकानेक बार आया हूँ तुमको वापिस ले जाने। तुम बच्चे ही हार-जीत का पार्ट बजाते हो, फिर मैं आता हूँ ले जाने। यह है पतित दुनिया, इसलिए गाते भी हैं पतित-पावन आओ, हम विकारी पतित हैं, आकर निर्विकारी पावन बनाओ। यह है विकारी दुनिया। अभी तुम बच्चों को सम्पूर्ण निर्विकारी बनना है। जो पीछे आते हैं वह सजा खाकर जाते हैं इसलिए फिर आते भी ऐसी दुनिया में हैं जहाँ दो कला कम हो जाती हैं। उनको सम्पूर्ण पवित्र नहीं कहेंगे इसलिए अब पुरूषार्थ भी पूरा करना चाहिए। ऐसा न हो कि कम पद हो जाए। भल रावण राज्य नहीं है परन्तु पद तो नम्बरवार है ना। आत्मा में खाद पड़ती है तो फिर उसको शरीर भी ऐसा मिलेगा। आत्मा गोल्डन एजेड से सिलवर एजेड बन जाती है। चांदी की खाद आत्मा में पड़ती है फिर दिन-प्रतिदिन जास्ती छी-छी खाद पड़ती है मुलम्मे की। बाप बहुत अच्छी रीति समझाते हैं। कोई नहीं समझते हैं तो हाथ उठाओ। जिसने 84 जन्मों का चक्र लगाया है, उनको ही समझायेंगे। बाप कहते हैं इनके 84 जन्मों के अन्त में मैं आकर प्रवेश करता हूँ। इनको ही फिर पहले नम्बर में आना है। जो पहले था, वह लास्ट में है। उनको ही पहले नम्बर में जाना है, जो बहुत जन्मों के अन्त में पतित बन गया है, मैं पतित-पावन उनके ही शरीर में आता हूँ, उनको पावन बनाता हूँ। कितना क्लीयर कर समझाता हूँ।

बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे पाप भस्म होंगे। गीता का ज्ञान तो तुमने बहुत सुना और सुनाया है परन्तु उनसे भी तुमने सद्गति को नहीं पाया। बहुत सन्यासियों ने तुमको मीठी-मीठी आवाज़ से शास्त्र सुनाये, जिस आवाज़ को सुनकर बड़े-बड़े आदमी जाकर इकट्ठे होते हैं। कनरस है ना। भक्ति मार्ग है ही कनरस। इसमें तो आत्मा को बाप को याद करना है। भक्ति मार्ग अब पूरा होता है। बाप कहते हैं मैं तुम बच्चों को ज्ञान देने आया हूँ, जो कोई नहीं जानते। मैं ही ज्ञान का सागर हूँ। ज्ञान कहा जाता है नॉलेज को। तुमको सब कुछ पढ़ाते हैं। 84 का चक्र भी समझाते हैं, तुम्हारे में सारी नॉलेज है। स्थूलवतन से सूक्ष्मवतन क्रास कर फिर मूलवतन में जाते हो। पहले-पहले है लक्ष्मी-नारायण की डिनायस्टी। वहाँ विकारी बच्चे नहीं होते, रावण राज्य ही नहीं। योगबल से सब कुछ होता है, तुमको साक्षात्कार होता है – अब बच्चा बन गर्भ महल में जाना है। खुशी से जाते हैं। यहाँ तो मनुष्य कितना रोते चिल्लाते हैं। यहाँ तो गर्भ जेल में जाते हैं ना। वहाँ रोने पीटने की बात नहीं। शरीर तो बदलना जरूर है। जैसे सर्प का मिसाल है, इसमें मूँझने की बात ही नहीं। जास्ती पूछने का रहता नहीं है। एकदम पावन बनने के पुरुषार्थ में लग जाना चाहिए। बाप को याद करना मुश्किल होता है क्या! बाप के सामने बैठे हो ना। मैं तुम्हारा बाप तुमको सुख का वर्सा देता हूँ। तुम यह एक अन्तिम जन्म याद में नहीं रह सकते हो! यहाँ अच्छी रीति समझते भी हैं फिर घर में जाकर स्त्री आदि का चेहरा देखते हैं तो माया खा जाती है। बाप कहते हैं कोई में भी ममत्व नहीं रखो। वह तो सब कुछ खत्म होना ही है। याद तो एक बाप को ही करना है। चलते फिरते बाप और अपनी राजधानी को याद करो। दैवीगुण भी धारण करने हैं। सतयुग में यह गन्दी चीजें मास आदि होता ही नहीं। बाप कहते हैं विकारों को भी छोड़ दो। हम तुमको विश्व की बादशाही देता हूँ, कितनी आमदनी होती है। तो क्यों नहीं पवित्र रहेंगे। सिर्फ एक जन्म पवित्र रहने से कितनी भारी आमदनी हो जाती है। भल इकट्ठे रहो, ज्ञान तलवार बीच में हो। पवित्र रह दिखाया तो सबसे ऊंच पद पायेंगे क्योंकि बाल ब्रह्मचारी ठहरे। फिर नॉलेज भी चाहिए। औरों को आप समान बनाना है। सन्यासियों को दिखाना है कि कैसे हम इकट्ठे रहते पवित्र रहते हैं। तो समझेंगे इनमें तो बड़ी ताकत है। बाप कहते हैं इस एक जन्म पवित्र रहने से 21 जन्म तुम विश्व के मालिक बनेंगे। कितनी बड़ी प्राइज़ मिलती है तो क्यों नहीं पवित्र रह दिखायेंगे। टाइम ही बाकी थोड़ा है। आवाज़ भी होता रहेगा, अखबार में भी पड़ेगा। रिहर्सल तो देखी है ना। एक एटम बॉम से क्या हाल हो गया। अभी तक हॉस्पिटल में पड़े हैं। अभी तो ऐसे बॉम्ब्स आदि बनाते हैं जो कोई तकलीफ नहीं, फट से खत्म। और यह रिहर्सल होकर फिर फाइनल होगा। देखेंगे फट से मरते हैं वा नहीं? फिर और युक्ति रचेंगे। हॉस्पिटल आदि होंगी नहीं। कौन बैठ खिदमत (सेवा) करेंगे। कोई ब्राह्मण आदि खिलाने वाला नहीं रहेगा। बॉम छोड़ा और खलास। अर्थ क्वेक में सब दब जायेंगे। देरी नहीं लगेगी। यहाँ ढेर मनुष्य हैं। सतयुग में बहुत थोड़े होते हैं। तो इतने सब कैसे विनाश होंगे! आगे चल देखना है, वहाँ तो शुरू में 9 लाख हैं।

फ़कीर भी तुम हो, साहेब भी तुमको प्यारा है। अभी सबको छोड़ अपने को आत्मा समझ लिया है, ऐसे फ़कीरों को बाप प्यारा लगता है। सतयुग में बहुत छोटा-सा झाड़ होगा। बातें तो बहुत समझाते हैं। जो भी एक्टर्स हैं, सब आत्मायें अविनाशी हैं, अपना-अपना पार्ट बजाने आती हैं। कल्प-कल्प तुम ही आकर बाप से स्टूडेण्ट बन पढ़ते हो। जानते हो बाबा हमको पवित्र बनाकर साथ ले जायेंगे। बाबा भी ड्रामा अनुसार बंधायमान हैं, सबको वापिस जरूर ले जायेंगे इसलिए नाम ही है पाण्डव सेना। तुम पाण्डव क्या कर रहे हो? तुम बाप से राज्य भाग्य ले रहे हो, हूबहू कल्प पहले मिसल। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप का प्यारा बनने के लिए पूरा फ़कीर बनना है। देह को भी भूल स्वयं को आत्मा समझना ही फ़कीर बनना है। बाप से बड़े ते बड़ी प्राइज़ लेने के लिए सम्पूर्ण पावन बनकर दिखाना है।

2) वापस घर जाना है इसलिए पुरानी दुनिया से दिल नहीं लगानी है। एक माशूक से ही दिल लगानी है। बाप और राजधानी को याद करना है।

वरदान:- अपनी पावरफुल स्थिति में स्थित रह मन्सा द्वारा सेवा करने वाले नम्बरवन सेवाधारी भव
यदि किसी को वाणी की सेवा का चांस नहीं मिलता तो भी मन्सा सेवा का चांस हर समय है ही। पावरफुल और सबसे बड़े से बड़ी सेवा मन्सा सेवा है। वाणी की सेवा सहज है लेकिन मन्सा सेवा के लिए पहले अपने को पावरफुल बनाना पड़ता है। वाणी की सेवा तो स्थिति नीचे ऊपर होते भी कर लेंगे लेकिन मन्सा सेवा ऐसे नहीं हो सकती। जो अपनी श्रेष्ठ स्थिति द्वारा सेवा करते हैं वही नम्बरवन सेवाधारी फुल मार्क्स ले सकते हैं।
स्लोगन:- लौकिक कार्य करते अलौकिकता का अनुभव करना ही सरेन्डर होना है।

TODAY MURLI 18 JULY 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 18 July 2018

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18/07/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, remember the Father. This remembrance is the donation of yoga to the world. The world will become pure through this and your boat will go across.
Question: Which children are looked after by BapDada Himself in the final moments?
Answer: 1) The children who remain engaged in the service of changing thorns into flowers over a long period of time and who are full helpers of the Father are looked after by the Father Himself in the final moments. Baba says: I will show My helpful children wonderful scenes and scenery and entertain them a great deal. They will see a lot of happiness at the end and continue to have visions.
2) Only the children who have made firm the lesson of belonging to the one Father and none other, will receive the Father’s help.
Song: O Beloved, come and meet me! 

Om shanti. The Beloved and the lovers: the Beloved is One and the lovers are many. All the lovers are calling out to the one God. Innumerable devotees are calling out to Him. What for? For happiness. A kumari calls out to her beloved: Come and meet me. What for? For happiness. An engagement takes place for happiness. However, you children know that, since this is now the kingdom of Ravan, you cannot receive happiness from a beloved. There cannot be happiness in the kingdom of Ravan. All lovers are in the cottage of sorrow and this is why they are calling out. No one calls out in the cottage that is free from sorrow. Since there isn’t any sorrow or suffering, why would anyone call out? The Beloved is remembered by those in sorrow, whereas after you lovers find the Beloved you are freed from remembering Him for half the cycle. You now know that only the one Supreme Father, the Supreme Soul, is the sweetest and most lovely Beloved. He is the highest and most elevated of all. Here, no human being can call himself the most elevated of all. Although they say that God is omnipresent and say “Shivohum”, they are more elevated than one another, are they not? Among the sages, some sages lie down flat as a sign of respect in front of the more elevated sages. However, only the one Supreme Father, the Supreme Soul, has been remembered as the highest Beloved of all. All remember Him and that is definitely for happiness. When there is a lot of sorrow, the lovers remember Him a great deal. You children haven’t as yet experienced that much sorrow. A lot more sorrow is yet to come. Whomever you call out to would surely come. The Father also comes. By belonging to the Father, you receive the inheritance of happiness in a second. You children should have the faith that you have come into the lap of the Father, and so you have received liberation-in-life in a second. When a child is born, he is taken into the lap and then there is the faith that that one is an heir. This One is the unlimited Father. You now recognise Him very clearly. There is no difficulty in recognising Him. There are many children. It is remembered that son shows Father. There is no need for anyone to say anything. There are so many Brahma Kumars and Kumaris. No one, apart from God, has as many children. Krishna is a human being with divine virtues. Human beings cannot have as many children. You know that you are the children of Shiv Baba. You can say that no human being has this many children. There are so many Brahma Kumars and Kumaris. There is praise of Prajapita Brahma. People remember the Trikaldarshi Supreme Soul. Only God can have so many children. So, only when that incorporeal One comes in a corporeal form can He adopt you. How could He adopt you if He didn’t have a body? You have come into God’s lap. You know that He alone is the Beloved. He is the sweetest and loveliest One of all. The One whom you love is called the Beloved. We know that our highest-on-high Beloved is that One from whom we lovers receive lots of happiness of heaven. We are personally sitting in front of Him. On the path of devotion, they sing that, by taking the name of Rama, people are able to go across. This is why they say “Rama, Rama!” a great deal, just as they consider the River Ganges to be the Purifier. People go there and light a deepak (small earthenware lamp) on a leaf. Just as they have shown Krishna floating on a leaf in the ocean sucking his thumb, those people light a deepak and place it on a leaf. A soul is also a deepak (light). Human beings don’t have full knowledge. For them, it has become a custom. They light a deepak and say that the soul goes across. The Supreme Father, the Supreme Soul, is called the Boatman. He takes you across the ocean of poison. Those people have heard this and created a custom. The Father ignites the deepaks of souls. All of these things are symbolic. The soul has to shed this body and go across to the supreme abode. You know that souls are to go across the ocean of ignorance to the other side. The Father alone is the Boatman. The Ganges cannot be given the name ‘Boatman’. The Boatman and the Bridegroom are needed together. He takes so many along with Him to the other side. They have given Him many different names. However, it isn’t that He sits you in a boat or a steamer and takes you across. You children know how you stay on the pilgrimage of remembrance. There is no need to say “Rama, Rama!” with your lips. Human beings tell you to say: Rama, Rama. They believe that they are donating that name. The Father donates imperishable jewels of knowledge to you. He says: Sweetest, beloved souls, remember Me, your Father. This remembrance of the Father is the donation of yoga to the world. Remember Shiv Baba. In fact, they call the Supreme Father, the Supreme Soul, Rama, but then they say “King Rama is the Lord of the Raghu clan.” You children now know the drama. You know all about who came from the time of heaven and how they will come again. Whatever happened is all fixed in the drama. When bhog etc. is offered, that too is fixed in the drama ; it is nothing new. You watch as detached observers. Each one is an actor. You know that everyone will play their part s and return home in happiness. When someone dies, people say that that person has become a resident of heaven. You know that you are making effort to become residents of heaven. People go and live at Kashi. They go and sit on the banks of the River Ganges. They have a Shiva Temple there and stay in constant remembrance of Him. They praise the River Ganges and also Shiva. No one goes to sacrifice himself in the River Ganges. Truly, the Purifier is Shiva alone. This is a secret. There is the Shiva Temple there. Previously, they used to sacrifice themselves to Shiva in a particular well. You can give knowledge to those in Benares very well. Tell them: You are sitting here and there are the banks of the River Ganges and there is also the Shiva Temple. So, why do you surrender yourselves to Shiva? Is Shiva the Purifier or is the Ganges? In fact, Shiva alone is the Purifier. People sacrifice themselves to God alone. God would not sacrifice Himself to God; that is not possible. It is not that I am God and you are God. God would not become impure that He would go to bathe in the Ganges. You can quickly disprove the idea of omnipresence. You have to prove that the Purifier is Shiva. Points are given to you children to explain. It is very easy and very good to explain at Kashi. There is the Shiva Temple there and so He must definitely have come at some point. Shiva is always called Baba. He never receives a body of His own. In fact, many children have the name ‘Shiva’. Hundreds of thousands would also have the name ‘Krishna’. However, that Krishna existed in the golden age. Devotees of Krishna would pick up an idol of Krishna and worship that. They would not worship a human being. Therefore, this proves that Krishna exists in the golden age. Human beings don’t know who Radhe and Krishna were or when they ruled their kingdom. The Father sits here and explains this to you. You are spinners of the discus of self-realisation. No one can explain how Vishnu was given the name ‘Spinner of the discus of self-realisation’ or what he did. The Father is incorporeal. No one knows when Vishnu took all the ornaments in his hands. We understand that all of this is fixed in the drama. Those who created the pictures on the path of devotion will do the same again. All of this is a predestined play. The path of devotion continues for half the cycle and the path of knowledge continues for half the cycle. You understand these things. You must be enjoying yourselves. You are true lovers. Those beloveds are false; there is a difference between something real and something false: a false beloved and the real Beloved. A wife calls her husband ‘Love’. You now know that we lovers have found such a sweet Beloved. He is called the Beloved and also the Father. The Father also has love. You at least receive the inheritance from the Father. Lovers don’t receive an inheritance from their beloveds. Instead of considering yourself to be a lover, consider yourself to be a child and you will get a taste of the inheritance. Shiva is always called Baba. Shiv Baba is never called ‘Shiva Husband’. You mustn’t chant the name of Shiva now. Simply remember Baba. When children come, they are asked: When did you belong to God? Until someone becomes a child, he cannot receive the inheritance. He is the Mother and Father and so you have to meet Him personally. If you have faith but you die without meeting Him, you can’t receive the inheritance. There are many who don’t receive the inheritance; they become subjects. The Father says: When you have the faith that that One is that same Mother and Father, you have to come personally in front of Him. Then, you have to serve others and make them similar to yourselves. You have to create subjects and also your heirs. That will not happen by sitting at home. You have to make effort. Some children don’t churn the ocean of knowledge about these things. The Krishna-leela (divine activities of Krishna) are very well known. The divine activities take place in the golden age. They cannot take place here. They simply continue to copy them. You children can understand what will exist in heaven and what the palaces there will be like. Don’t even ask about the things there! Your mouths begin to water! The Father only gives happiness. You don’t invoke the Father for sorrow. There is a lot of sorrow in the world. In a family, if a daughter-in-law happens to be very troublesome, she turns the family upside-down. Baba has seen many such families. There is now very little time left. Belong to the Father and He will help! If someone doesn’t become an heir, how could he or she receive help from the One who gives the inheritance? The Father says: Don’t be afraid. Wealthy people are afraid. This Father is the Bestower. You used to give to the poor in My name on the path of devotion and you also used to receive a birth according to that. Now, I tell you directly: Belong to Me and I will give you your fortune of the kingdom. Shiv Baba doesn’t need to build buildings etc. People ask you: Since all the buildings etc. are to be destroyed, why are you having so many houses built? OK, but where would we then stay? Children who come at the end also have to come and live here. You will see a lot of scenes and scenery at the end and remain in a lot of happiness. As the time comes close, you will continue to have many visions through Baba. Those who remain helpers will experience a lot of happiness at the end. At the time of sorrow, they will experience a lot of happiness. That happiness is wonderful. You lived comfortably in Pakistan too. Baba used to give you visions of how marriages take place in Paradise and how the kingdom of Lakshmi and Narayan is run. You will see a great deal if you continue to help Shiv Baba in changing thorns into flowers. It is said: When a child maintains courage, the Father helps. You should remember such a Beloved a great deal. The world doesn’t know this. There are so many children and so they must definitely have the Mother and Father from whom they receive a lot of happiness. This praise is not of worldly parents. You can see in a practical way how there are so many children. God, the Father, is the Creator. When He creates you, He adopts you. Through whom? This creation is mouth-born. It is very easy to explain this. You now come into God’s lap and you will then go into the laps of deities. Then you will go into the laps of devils. We go to the land of peace and the land of happiness by being in God’s lap. By being in the laps of devils, we go to the land of sorrow. Remember this mantra very well. Gopikas in bondage call out. Therefore, one effort or another has to be made for them. Baba would not be able to go to the little villages. Baba comes and meets the children in the big cities. He has to go there. It has been explained to you how you have to surrender yourselves. King Janak surrendered himself and was then told to look after everything as a trustee. You definitely have to sustain your creation. Consider yourselves to be souls, trustees. Maya, Ravan, causes sorrow and this is why there is no temple to Ravan. However, they do create effigies. Ravan has caused you a lot of sorrow. To the extent that Ravan has caused sorrow, accordingly they burn just as big an effigy of him every year. Shiv Baba has given you happiness and His temple is therefore very grand. There cannot be a temple to Ravan who causes sorrow. They totally destroy him so that nothing of his is visible. Shiv Baba’s temple is visible. He is worshipped so much. In fact, only one Shiv Baba, and none other, is ever worthy of worship. You then become worshippers from being worthy of worship. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Stay in remembrance of the Father and remind everyone of Baba. Continue to make this donation. Surrender yourself to the Father and look after everything as a trustee.
  2. Watch as a detached observer the part of every actor. Constantly maintain the awareness that you are completing your part and returning home in happiness.
Blessing: May you be a carefree emperor who is free from all worries because you can see the line of elevated fortune on your forehead.
The sovereignty of being carefree is the most elevated sovereignty of all sovereignties. If someone wears a crown and sits on a throne but constantly worries, then, is that a throne or worry? God, the Bestower of Fortune, has drawn the line of elevated fortune on your forehead and so you have become a carefree emperor. So, constantly see the line of elevated fortune on your forehead: Wah my elevated Godly fortune! Keep this spiritual intoxication and all worries will finish.
Slogan: To invoke souls with the power of concentration and do spiritual service is true service.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 18 JULY 2018 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 18 July 2018

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18-07-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – तुम बाप को याद करो, यही याद विश्व के लिए योगदान है, इसी से विश्व पावन बनेगा, बेड़ा पार हो जायेगा”
प्रश्नः- किन बच्चों की सम्भाल अन्त समय में स्वयं बापदादा करते हैं?
उत्तर:- जो बच्चे बहुत समय से कांटों को फूल बनाने की सर्विस में तत्पर रहते हैं। बाप के पूरे-पूरे मददगार हैं, ऐसे बच्चों की अन्त समय में बाप स्वयं सम्भाल करते हैं। बाबा कहते – मैं अपने मददगार बच्चों को वन्डरफुल सीन-सीनरियां दिखलाकर खूब बहलाऊंगा। वह अन्त में बहुत सुख देखेंगे। साक्षात्कार करते रहेंगे। 2- जिन्हें ”एक बाप दूसरा न कोई” यह पाठ पक्का है, ऐसे बच्चों को ही बाप की मदद मिलती है।
गीत:- प्रीतम आन मिलो…….. 

ओम् शान्ति। प्रीतम और प्रीतमायें। प्रीतम एक है और प्रीतमायें अनेक हैं। प्रीतमायें बुला रही हैं एक भगवान् को। अनेक भक्त बुला रहे हैं, किसलिए? सुख के लिए। कन्या बुलाती है प्रीतम आन मिलो। किसलिए? सुख के लिए। सगाई होती है सुख के लिए। परन्तु अब बच्चे जान गये हैं जबकि रावण राज्य है तो प्रीतम से कोई सुख मिल नहीं सकता। रावण राज्य में सुख हो न सके। प्रीतमायें सब शोकवाटिका में हैं तब तो बुलाती हैं। अशोक वाटिका में तो कोई बुलाते नहीं। कोई दु:ख वा शोक नहीं तो बुलायेंगे क्यों? दु:ख में ही प्रीतम को याद करते हैं फिर प्रीतम मिल जाता है तो आधाकल्प प्रीतमायें याद करने से छूट जाती हैं। अभी तुम जानते हो – सबसे मीठा, सबसे प्यारा प्रीतम है ही एक परमपिता परमात्मा, सबसे ऊंचा सबसे श्रेष्ठ। यहाँ कोई मनुष्य अपने को श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ कह न सके। भल कहते हैं ईश्वर सर्वव्यापी है, शिवोहम् परन्तु एक-दो से श्रेष्ठ तो होते ही हैं ना। साधू लोगों में जो ऊंच होते हैं उनको और साधू लोग दण्डवत प्रणाम करते हैं। परन्तु सबसे ऊंच ते ऊंच एक ही प्रीतम परमपिता परमात्मा गाया हुआ है। सब उनको याद करते हैं – जरूर सुख के लिए। जब बहुत दु:ख होता है तो बहुत प्रीतमायें याद करती हैं। अभी बच्चों को इतना दु:ख का अनुभव नहीं है। अजुन तो बहुत दु:ख आने वाला है। जिसको बुलाया जाता है वह आयेंगे तो जरूर ना। तो बाप भी आते हैं। बाप का बनने से एक सेकेण्ड में सुख का वर्सा मिल जाता है। बच्चों को निश्चय होना चाहिए – हमने बाप की गोद ली है तो सेकेण्ड में जीवनमुक्ति मिली है। बच्चा पैदा होता है तो गोद में आ जाता है फिर निश्चय हो जाता है कि यह वारिस है। यह भी बेहद का बाप है। अब अच्छी रीति इनको पहचान लेते हैं। पहचान में कोई तकलीफ नहीं है। बच्चे बहुत हैं, गाया जाता है सन शोज़ फादर। तो किसको कहने की दरकार नहीं। ढेर के ढेर ब्रह्माकुमार-कुमारियां हैं। इतने ढेर बच्चे सिवाए ईश्वर के और किसको होते नहीं। कृष्ण तो दैवीगुणों वाला मनुष्य है। मनुष्य को इतने बच्चे हो नहीं सकते। तुम जानते हो हम शिवबाबा के बच्चे हैं। तुम कह सकते हो कोई भी मनुष्य को इतने बच्चे होते नहीं। कितने ब्रह्माकुमार-कुमारियां हैं। गायन तो है ना प्रजापिता ब्रह्मा का। याद करते हैं त्रिकालदर्शी परमात्मा को। भगवान् को ही इतने बच्चे हो सकते हैं। तो वह निराकार जब साकार में आये तब तो एडाप्ट करे। शरीर न हो तो गोद कैसे ले? तुम ईश्वर की गोद में आये हो। जानते हो वही प्रीतम है। सबसे मीठा, सबसे प्यारा है। प्यार करने वाले को प्रीतम कहा जाता है। तुम जानते हो – हमारा ऊंचे ते ऊंचा प्रीतम वह है जिससे हम प्रीतमाओं को स्वर्ग के सुख घनेरे मिलते हैं। उनके सम्मुख बैठे हैं। भक्ति-मार्ग में गाते भी हैं – राम का नाम लेने से मनुष्य पार हो जाते हैं इसलिए राम-राम बहुत कहते हैं। जैसे गंगा नदी को पतित-पावनी समझते हैं। मनुष्य वहाँ जाकर पत्ते पर दीवा जलाते हैं। जैसे कृष्ण को पत्ते पर सागर में अंगूठा चूसता हुआ दिखाते हैं। यह फिर दीवा जगाकर पत्ते पर रखते हैं। आत्मा भी दीपक है। मनुष्यों को तो पूरा ज्ञान नहीं है। उन्हों के लिए तो जैसे एक रस्म हो गई है। दीवा जगाकर कहते हैं – आत्मा पार हो जाती है। परमपिता परमात्मा को तो खिवैया कहा जाता है। विषय सागर से पार ले जाते हैं। उन्होंने अक्षर सुनकर एक रस्म बना दी है। बाप आत्मा का दीवा जगाते हैं। यह सब निशानियां हैं। आत्मा को ही यह शरीर छोड़ जाना पड़ता है – उस पार परमधाम में। तुम जानते हो – आत्मा अज्ञान सागर से उस पार जा रही है। खिवैया तो बाप ही है। गंगा जी को खिवैया अक्षर नहीं दिया जा सकता। खिवैया अथवा साजन तो साथ-साथ चाहिए। कितनों को साथ में उस पार ले जाते हैं, भिन्न-भिन्न नाम रख दिये हैं। बाकी बोट में वा स्टीमर में बिठाए कोई ले नहीं जाते हैं। तुम बच्चे जानते हो कैसे याद की यात्रा में रहते हैं। इसमें कुछ मुख से राम-राम कहने की दरकार नहीं। मनुष्य तो कहते हैं राम-राम कहो। समझते हैं हम यह नाम दान करते हैं। बाप फिर दान देते हैं – अविनाशी ज्ञान रत्नों का। कहते हैं मीठी-मीठी लाडली आत्मायें मुझ बाप को याद करो। यही बाप की याद विश्व के लिए योगदान है। शिवबाबा को याद करो। वास्तव में राम भी परमपिता परमात्मा को कहते हैं परन्तु फिर रघुपति राघो राजा राम कह देते हैं। तुम बच्चों ने अब ड्रामा को जाना है। स्वर्ग से लेकर के तुमको सब मालूम है कौन-कौन आया है? कैसे फिर आयेंगे? जो कुछ होता आया है वह सब ड्रामा में नूँध है। यह भोग आदि लगाया जाता है – यह सब ड्रामा में नूँध है। नई कोई बात नहीं। तुम साक्षी हो देखते हो। हरेक एक्टर है। जानते हैं वह अपना पार्ट बजाए वापिस जाते हैं खुशी से।

मनुष्य कहते हैं मरा तो स्वर्गवासी हुआ। तुम जानते हो हम स्वर्गवासी बनने के लिए पुरुषार्थ करते हैं। मनुष्य काशीवास करते हैं ना। गंगा जी के किनारे पर बैठते हैं। शिव का तो मन्दिर है। शिव की याद में सदैव रहते हैं। गंगा की भी महिमा करते हैं। शिव की भी महिमा करते हैं। गंगा में कोई काशी कलवट नहीं खाते। बरोबर पतित-पावन तो शिव ही है। यह भेद हैं। शिव का मन्दिर है। आगे एक कुएं में शिव पर बलि चढ़ते थे। तुम बनारस वालों को अच्छी रीति ज्ञान दे सकते हो। बोलो – तुम यहाँ बैठे हो, गंगा का कण्ठा भी है। शिव का मन्दिर भी है। फिर तुम शिव पर बलि क्यों चढ़ते हो? शिव पतित-पावन है वा गंगा? वास्तव में पतित-पावन तो शिव ही है। भगवान के पास ही बलि चढ़ते हैं। भगवान्, भगवान् पर बलि थोड़ेही चढ़ेंगे। यह तो हो नही सकता। ऐसे नहीं हम भी भगवान्, तुम भी भगवान्। भगवान् पतित थोड़ेही हो सकता है जो गंगा पर स्नान करने जाते हो। सर्वव्यापी के ज्ञान को तुम झट उड़ा सकते हो। पतित-पावन शिव है – यह सिद्धकर बताना है। बच्चों को प्वाइन्ट दी जाती हैं समझाने लिए। काशी में समझाना सबसे सहज और अच्छा है। शिव का मन्दिर है तो जरूर कभी आया है। शिव को हमेशा बाबा कहा जाता है। उनको अपना शरीर कभी मिलता नहीं। ऐसे तो शिव नाम बहुत बच्चों के हैं। अथवा कृष्ण भी लाखों के नाम होंगे। परन्तु वह कृष्ण तो सतयुग में था ना। कृष्ण के भक्त कृष्ण की मूर्ति उठाए पूजा करेंगे। मनुष्य की तो नहीं करेंगे। तो सिद्ध होता है कृष्ण सतयुग में होता है। मनुष्यों को पता नहीं हैं – राधे-कृष्ण कौन हैं? उन्होंने कब राजाई की है? यह बाप बैठ समझाते हैं।

तुम हो स्वदर्शन चक्रधारी। विष्णु के ऊपर यह स्वदर्शन चक्रधारी नाम कैसे पड़ा, क्या किया – यह तो कोई समझा नहीं सकते हैं। बाप तो है निराकार। विष्णु को इतने हथियार कहाँ से आये – कोई जानते नहीं हैं। हम समझते हैं यह सब ड्रामा में नूँध है। भक्ति मार्ग में भी जिन्होंने चित्र बनवाये हैं वही बनायेंगे। सब बना-बनाया खेल है। आधाकल्प भक्ति आधाकल्प ज्ञान मार्ग चलता है। इन बातों को तुम जानते हो। तुमको ही मज़ा आता होगा। जो सच्ची-सच्ची प्रीतमायें हैं, वह प्रीतम तो झूठा है, झूठी और सच्ची चीज़ में फ़र्क तो है ना। झूठा प्रीतम और सच्चा प्रीतम। पत्नि, पति को प्यारा कहती है ना। अभी तुम जानते हो – हम प्रीतमाओं को कैसा मीठा प्रीतम मिला है। उनको प्रीतम भी कहते हैं तो बाप भी कहते हैं। बाप का भी प्यार होता है। बाप से फिर भी वर्सा मिलता है। प्रीतम से प्रीतमाओं को कोई वर्सा नहीं मिलता। अपने को प्रीतमा समझने से भी, बच्चा समझने से वर्से की टेस्ट आती है। शिव को हमेशा बाबा कहते हैं। शिवबाबा को शिवपति कभी नहीं कहेंगे। अभी तुमको कोई शिव का नाम नहीं जपना है। सिर्फ बाबा को याद करो। बच्चे आते हैं तो पूछा जाता है – कब ईश्वर के बने? बच्चा जब तक न बनें तब तक वर्सा मिल न सके। मात-पिता है तो सम्मुख मिलना है। निश्चय किया, मिले नहीं और मर गया तो वर्सा नहीं मिल सकता। ऐसे बहुत हैं जो वर्सा नहीं पाते। प्रजा में चले जाते हैं। बाप कहते हैं निश्चय हो गया यह वही मात-पिता है तो सम्मुख आना पड़े। फिर सर्विस कर आपसमान बनाना है। प्रजा बनानी है और फिर अपना वारिस भी बनाना है। घर बैठे तो नहीं होगा, मेहनत करनी है। इन बातों पर बच्चे विचार सागर मंथन नहीं करते। कृष्ण लीला मशहूर है। लीला तो सतयुग में होती है। यहाँ थोड़ेही हो सकती। यह तो कॉपी करते रहते हैं। स्वर्ग में क्या-क्या होगा, कैसे महल होंगे – यह तो बच्चे महसूस कर सकते हैं। वहाँ की तो बात मत पूछो। मुख पानी होता है। बाप सुख ही देते हैं। दु:ख के लिए बाप का आह्वान थोड़ेही करते है। दुनिया में बड़ा दु:ख है। एक घर में अगर बहू छटेली आ जाती है तो घर को डांवाडोल कर देती है। ऐसे बहुत घर बाबा के देखे हुए हैं। अभी समय बहुत थोड़ा है। बाप के बनो तब बाबा मदद दे। वारिस ही नहीं बनते तो वर्सा देने वाले की मदद कैसे मिले? बाप कहते हैं डरो मत। साहूकार लोग तो डरते हैं। यह बाप तो दाता है। भक्ति मार्ग में भी तुम मेरे अर्थ गरीबों को देते थे। उस अनुसार जन्म मिलता था। अब डायरेक्ट कहता हूँ – हमारा बनो तो तुमको राज्य-भाग्य दूँगा। शिवबाबा को तो कुछ मकान आदि बनाना नहीं है। तुमसे पूछते हैं जबकि सब खलास हो जाना है तो फिर यह मकान आदि क्यों बनाते हो? अरे, तब रहे कहाँ? पिछाड़ी में भी आकर बच्चों को रहना है। तुम पिछाड़ी में बहुत सीन-सीनरियां देखेंगे। बहुत खुशी में रहेंगे। जितना नजदीक समय आता जायेगा, बाबा द्वारा बहुत साक्षात्कार होते रहेंगे। जो मददगार हो जायेंगे वह पिछाड़ी में बहुत सुख देखेंगे। दु:ख के समय बहुत सुख देखेंगे। वह वन्डरफुल सुख हैं। पाकिस्तान में भी तुम मौज में बैठे थे। वैकुण्ठ में कैसे स्वयंवर होते हैं, लक्ष्मी-नारायण का कैसे राज्य चलता है – सब बाबा साक्षात्कार कराते थे। तुम बहुत देखेंगे अगर शिवबाबा की मत पर कांटों को फूल बनाने में मदद करते रहेंगे, तो कहा जाता है – हिम्मते मर्दा मददे खुदा। ऐसे प्रीतम को तो बहुत याद करना चाहिए। दुनिया थोड़ेही जानती है। इतने ढेर बच्चे हैं तो जरूर उनका मात-पिता होगा ना – जिससे सुख घनेरे मिलते हैं। यह महिमा कोई लौकिक माँ-बाप की थोड़ेही है। तुम प्रैक्टिकल देखते हो कितने ढेर बच्चे हैं। क्रियेटर गॉड फादर है। क्रियेट करेंगे तो एडाप्ट करेंगे ना। किस द्वारा? यह है मुख वंशावली। समझाना बहुत सहज है। अभी ईश्वर की गोद लेते हो फिर दैवी गोद मिलेगी। फिर आसुरी। इस ईश्वरीय गोद से हम शान्तिधाम, सुखधाम जाते हैं। आसुरी गोद से दु:खधाम जाते हैं। यह मंत्र याद कर लो। बांधेली गोपिकायें पुकारती हैं। तो उन्हों के लिए कोई न कोई प्रयत्न करना पड़ता है। बाबा छोटे-छोटे गांव में तो जा नहीं सकेंगे। बड़े गांव में आकर मिलते हैं। जाना तो पड़ता ही है। समझाया जाता है बलिहार भी कैसे जाना है। राजा जनक बलि चढ़ा फिर कहा गया अब ट्रस्टी हो सम्भालो। रचना की पालना तो तुमको जरूर करनी है। तुम अपने को आत्मा ट्रस्टी समझो। माया रावण दु:ख देने वाली है इसलिए रावण का कोई मन्दिर नहीं है। बाकी बुत बना देते हैं। रावण ने बहुत दु:ख दिया है। जितना दु:ख दिया है उतना ही वर्ष-वर्ष उनको जलाते रहते हैं। शिवबाबा ने सुख दिया है, तो उनका मन्दिर बड़ा आलीशान है। रावण दु:ख देने वाले का मन्दिर हो ही नहीं सकता। उसको तो खत्म कर देते हैं। जो कुछ देखने में ही नहीं आता। शिवबाबा का मन्दिर तो देखने में आता है। कितनी पूजा होती है। वास्तव में एवर पूज्य है ही एक शिवबाबा, दूसरा न कोई। तुम फिर पूज्य से पुजारी बनते हो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप की याद में रहना है और सबको याद दिलाना है, यही दान करते रहना है। बाप पर बलि चढ़कर फिर ट्रस्टी हो सम्भालना है।

2) साक्षी हो हरेक एक्टर का पार्ट देखना है। हम पार्ट पूरा कर खुशी से वापस जा रहे हैं – इस स्मृति में सदा रहना है।

वरदान:- अपने मस्तक पर श्रेष्ठ भाग्य की लकीर देखते हुए सर्व चिंताओं से मुक्त बेफिक्र बादशाह भव
बेफिक्र रहने की बादशाही सब बादशाहियों से श्रेष्ठ है। अगर कोई ताज पहनकर तख्त पर बैठ जाए और फिकर करता रहे तो यह तख्त हुआ या चिंता? भाग्य विधाता भगवान ने आपके मस्तक पर श्रेष्ठ भाग्य की लकीर खींच दी, बेफिक्र बादशाह हो गये। तो सदा अपने मस्तक पर श्रेष्ठ भाग्य की लकीर देखते रहो – वाह मेरा श्रेष्ठ ईश्वरीय भाग्य, इसी फ़खुर में रहो तो सब फिकरातें (चिंतायें) समाप्त हो जायेंगी।
स्लोगन:- एकाग्रता की शक्ति द्वारा रूहों का आवाह्न कर रूहानी सेवा करना ही सच्ची सेवा है।

TODAY MURLI 18 July 2017 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 18 July 2017

Read Murli in Hindi :- Click Here

Read Bk Murli 17 July 2017 :- Click Here

18/07/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you now have to remove devilish defects and imbibe Godly virtues. Claim self-sovereignty for 21 births from the Father.
Question: Which of the Father’s acts should also be your acts?
Answer: The Father’s act is to teach everyone knowledge and yoga. You children must also perform this act. You have to purify the impure. Your business is to do spiritual service. Some children leave their bodies but then take new bodies and carry on with this effort. Day by day, your service will continue to increase.
Song: Salutations to Shiva.

Om shanti. It is right to play this song here because this is the praise of Shiv Baba, the Highest on High. It is not Rudra Baba, it is Shiv Baba. Although it is the same whether you say Shiv Baba or Rudra Baba, it still sounds good to say Shiv Baba. You are also sitting here having adopted bodies. The Father is explaining through Brahma, otherwise how could Shiv Baba speak? He is the Living Being, the Truth and the Ocean of Knowledge. Surely, He would only speak knowledge. To introduce Himself is also knowledge. He gives the knowledge of the beginning, the middle and the end of creation, that is, He gives the explanation. That is called knowledge too. To explain to someone, especially to explain about God, means to give knowledge. God introduces Himself. In English, it is said: Father shows son. The Father comes and introduces Himself and gives the knowledge of the beginning, the middle and the end of the world. The rishis and munis used to say that they did not know the Creator or His creation. Now that the Father has explained, it is understood that no one else can give this knowledge, the knowledge through which human beings claim the highest status. Surely, the highest status is that of deities. You children now understand that constant, unshakeable purity, peace, happiness and prosperity are your Godly birthright. You are claiming that once again. The land of happiness is the Godly birthright and the land of sorrow is the devilish birthright. Through Ravan we become impure. Souls receive the inheritance of impurity from Ravan. Then, only the one Supreme Father, the Supreme Soul, Rama, purifies the impure ones. No one knows that Ravan is Bharat’s old enemy for half the cycle. People desire the kingdom of Rama, which means that this is the kingdom of Ravan. However, they do not consider themselves to be impure. The devilish community is now changing into the community of deities. You come here in order to remove devilish defects and to imbibe Godly qualities. The Father alone is the One who inspires you to imbibe Godly virtues. You now understand that you have come here once again to claim your birthright of self-sovereignty for 21 births from the unlimited Father. You are sitting here to claim the self-sovereignty of the sun dynasty and the moon dynasty. You have claimed this self-sovereignty cycle after cycle. You lose it and then you claim it again. It should remain in your intellects that you are now claiming your inheritance from the Father. The children who are claiming the inheritance have to remember the Father. It should enter your intellects that you are sitting face to face with the Mother and the Father in order to claim the inheritance. He is speaking to us through the mouth of Brahma. Those who take Baba’s lap are definitely called Brahmins. This is the sacrificial fire of knowledge, and then, whether you call it a sacrificial fire or whether you call it a school, it is the same thing. When people create a sacrificial fire, they also create a school where they study scriptures etc: the Gita is on one side, the Vedas and scriptures are on another side, and they also study the Ramayana on another side. Those who want to listen to the Ramayana go in one direction and those who want to listen to the Gita go in the other direction. This is the sacrificial fire of the knowledge of Rudra in which everything is to be sacrificed. It is now the end of the world and so this is the end of all sacrificial fires. There is only one sacrificial fire of knowledge. All the other various types of sacrificial fires are material sacrificial fires. There, they put into it barley, sesame seeds etc. This is the unlimited sacrificial fire into which everything is sacrificed and then the new creation takes place once again. There, there is nothing that causes sorrow. Here, there is so much sorrow. Illnesses etc. are increasing so much; there are various sorrows and diseases. All of this is fixed in the drama. There are as many types of sorrow as there are human beings. This is called the land of sorrow, the cottage of sorrow. People experience sorrow because this is the kingdom of Ravan. There is no Ravan in the kingdom of Rama. For half a cycle, it is the land of happiness and for the other half, it is the land of sorrow. The incorporeal Supreme Father, the Supreme Soul, is called Rama. Firstly, there is the rosary of Rudra, the rosary of incorporeal souls, and then the corporeal rosary of Vishnu is created, that is, the rosary of the kingdom; they rule the kingdom numberwise. You children have to understand this clearly and also explain to others. As time passes, the knowledge will become short (er). Baba is creating methods in order for you to be able to explain in short. People will become disinterested at the time of destruction. They will then understand that this is definitely that great Mahabharat War. Surely, God must be incorporeal; it cannot be Krishna. Only the incorporeal One is called the Purifier and the Bestower of Salvation for All. This title cannot be given to anyone else. Baba has also explained that the pure deities will never set foot in this impure world. You ask for money from Lakshmi, but where would Lakshmi get money from? Here, Mama receives money from the father (Brahma). There, too, the father will be the companion. Here, Brahma is with Saraswati, and there, too, both definitely have to be together. There has to be some sign of that. Wealth definitely comes from somewhere. This is why there is the worship of Mahalakshmi. They show her with four arms but not as many legs. Ravan is shown with ten faces but not so many legs. So this proves that there cannot be such human beings; it is like that in order to be able to explain. When someone’s husband dies, that soul is invited, but how can he come? He enters the body of a brahmin priest; he is invoked. These customs and systems are fixed in the drama. Then what happens? That soul comes. Souls are invited for you to feed them, but here, the Father Himself comes and feeds you children. The business of you children now is to do service. Some even make effort after having left the body, that is, they continue to make effort in their next birth. Your business is to change impure ones into pure ones. As you go further, you will see how service increases. This also happened a cycle ago; it is the same reel. You children understand that whatever happens, it happens as it did in the previous cycle. The Father also performs the same act of teaching knowledge and yoga, the act which was performed a cycle ago; it cannot be even slightly different. This is the drama. We souls come down here from our home. We adopt human bodies and play our part s. You must explain fully the 84 births as well as the cycle of the drama. No one else knows this. Previously, we did not understand either. You are those who understood a cycle ago and are now understanding once again. You have now understood the significance of the Creator and the beginning, the middle and the end of His creation. It should remain in your intellects that the Father is the Highest on High; He is the one who gives the inheritance and then there are Brahma, Vishnu and Shankar. Establishment takes place through Brahma. He is the one who then becomes the master of the land of Vishnu and sustains it. Whether you call it the land of Vishnu or the land of Lakshmi and Narayan, it is the same thing. You understand that you are claiming the inheritance of the sun and moon dynasties for 21 births from the Father. The Father says: Children, you belonged to Me. I sent you to play your part s. That too is fixed in the drama. No one is told to do anything. You understand that those who make effort well will go to the land of happiness, numberwise. You remember the land of happiness. You understand that this is the land of sorrow; no one else knows about this. It is in the intellects of you children that this is the land of sorrow. You claim your inheritance from the Father, the One who establishes the land of happiness. We have become Baba’s while alive. When a child is adopted by a king, he understands that he belongs to the king. In the beginning, it is a lokik relationship and later, too, it is still a lokik relationship. Here, it becomes alokik and then parlokik. You understand that you belong to Rama, whereas all others belong to the clan of Ravan. They are on one side and you are on the other. The soul understands that he has truly completed 84 births. I, the soul, shed one body and take a new one. You are making effort inspired by the Father, the Purifier, the Ocean of Knowledge, the Bestower of Salvation for All. He teaches you through Brahma. It is the soul that studies. The soul is filled with the sanskars of a barrister etc. The soul speaks through the sense organs. You make a lot of effort to become soul conscious. The Father gives advice: The time of amrit vela is very well known. At that time, consider yourselves to be souls and remember the Father so that the rust on you souls is removed. Alloy has been mixed into souls. Pure jewellery is made out of pure gold. There is rust on souls, so they receive bodies accordingly. This is why you are put in an orb (of light). However, this is a question of using the intellect. You sit in remembrance of the Father. There is no other difficulty. It is as though a child is remembering his father. That is the unlimited Father. Other souls remember the body. Now, you souls remember your Father.

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The Father says: I am the unlimited Father, so, surely, I must give the unlimited happiness. I also gave this a cycle ago. Bharat was definitely the master of the world. There were no enemies. You are now becoming the masters of the land of happiness. You became so senseless! You were worthy of heaven and have now become worthy of hell. The Father has come once again to make you worthy of heaven. There is the birth of incorporeal Shiva as well as the birth of the Gita. People truly believe that when Shiv Baba comes, there will be the versions of God, and so there will also be the birth of the Gita. He comes once again and introduces Himself. The Gita is created from what He spoke when He came. You children know what Ravan is. This kingdom of Ravan is now to be destroyed. Death is standing ahead. This world was transformed a cycle ago as well. Everything is explained so clearly. It takes effort. While staying in your household, live as pure as a lotus flower and take this course at the same timeAsk the teacher. This course is very easy. Stay in your household, remember Me and understand the beginning, the middle and the end of creation. A few who listen for seven days emerge. Feel the pulse of every person. It is seen that some have deep love: they are desperate to listen to Baba’s knowledge personally and you can tell this from their faces and their vibrations. Because their pulse is not felt properly, many good ones leave. They say: What can we do? We don’t have time for seven days. Some say: Grant us a vision! Firstly, tell them to come and understand. Ask them: Whom have you come to? What relationship do you have with the Supreme Father, the Supreme Soul? You too are Brahma Kumars and Kumaris. You are the grandchildren of Shiva, so you are the children of Brahma. The Father is the Creator of heaven, so He must give the inheritance. He must teach Raja Yoga. You must explain to them and then make them write it down. Some understand very well within a day. Many clever ones who will gallop ahead will emerge. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Awaken at amrit vela and remember the Father with a lot of love and make effort to be soul conscious. Remove the rust of vices with the power of remembrance.
  2. Whilst staying in your household, take the course to become like a lotus flower. Feel each one’s pulse and see their keenness and then give knowledge.
Blessing: May you be an incognito effort-maker who remains constantly content and makes others content when forming connections and relationships with them.
The confluence age is the age of contentment. If you do not remain content at the confluence age, then when would you remain content? Therefore, neither let there be any type of conflict within yourself nor let there be any type of conflict in your connections with others. A garland is created when one bead comes into contact with another bead. Therefore, when you remain constantly content and you make others content when in relationship and connection with them, you will then become the beads of the garland. To be in a family means to remain constantly content and make others content.
Slogan: Those who renounce even a trace of their old nature and sanskars are full renunciates.

*** Om Shanti ***

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Brahma kumaris murli 18 July 2017 : Daily Murli (Hindi)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 18 July 2017

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18/07/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम्हें अब आसुरी अवगुण निकाल ईश्वरीय गुण धारण करने हैं, बाप से अपना 21 जन्मों का स्वराज्य लेना है”
प्रश्नः- बाप की कौन सी एक्ट चलती है जो तुम बच्चों की भी होनी चाहिए?
उत्तर:- बाप की एक्ट है सभी को ज्ञान और योग सिखलाने की। यही एक्ट तुम बच्चों को भी करनी है। पतितों को पावन बनाना है। तुम्हारा धन्धा ही है रूहानी सर्विस करना। कोई-कोई बच्चे शरीर छोड़कर जाते हैं फिर नया शरीर ले यही मेहनत करते हैं। दिन-प्रतिदिन तुम्हारी सर्विस बढ़ती जायेगी।
गीत:- ओम् नमो शिवाए…

ओम् शान्ति। यह गीत यहाँ शोभता है, क्योंकि यह ऊंचे ते ऊंचे शिवबाबा की महिमा है। रूद्र बाबा नहीं, शिवबाबा। शिव वा रूद्र बाबा सही है। फिर भी शिवबाबा कहना अच्छा लगता है। तुम भी शरीर ले बैठे हो। बाप ब्रह्मा द्वारा समझा रहे हैं। नहीं तो शिवबाबा बोल कैसे सके। वह चैतन्य है, सत है, ज्ञान का सागर है। जरूर ज्ञान ही सुनायेंगे। अपना परिचय देना यह भी ज्ञान हुआ। फिर रचना के आदि मध्य अन्त का ज्ञान अर्थात् समझानी देते हैं, इसको भी ज्ञान कहा जाता है। किसको समझाना यह ज्ञान देना है। सो भी ईश्वर के लिए समझाना ज्ञान है। सो तो ईश्वर ही खुद परिचय देते हैं। अंग्रेजी में कहते भी हैं फादर शोज़ सन। बाप आकर अपना और सृष्टि के आदि मध्य अन्त का परिचय देते हैं। ऋषि मुनि आदि सब कहते थे हम रचयिता और रचना को नहीं जानते हैं। अभी बाप ने समझाया है तो समझा जाता है यह ज्ञान कोई दे नहीं सकते हैं। जिस ज्ञान से मनुष्य ऊंच ते ऊंच पद पाते हैं। जरूर ऊंच ते ऊंच पद है ही देवी देवताओं का। अब तुम बच्चे जानते हो अखण्ड, अटल, पवित्रता, सुख-शान्ति-सम्पत्ति ही हमारा ईश्वरीय जन्म सिद्ध अधिकार है, जो फिर से ले रहे हैं। ईश्वरीय जन्म सिद्ध अधिकार सुखधाम और आसुरी जन्म सिद्ध अधिकार यह दु:खधाम है। रावण द्वारा हम पतित बनते हैं। रावण से वर्सा मिलता ही है पतित बनने का। फिर पतित से पावन एक परमात्मा राम ही बनाते हैं। यह किसको पता नहीं है कि रावण आधाकल्प का पुराना दुश्मन है भारत का। कहते हैं रामराज्य चाहिए अर्थात् यह रावण राज्य है। परन्तु अपने को पतित अथवा रावण समझते नहीं हैं। अब यह आसुरी सम्प्रदाय बदल दैवी सम्प्रदाय बन रही है। तुम यहाँ आते ही हो आसुरी अवगुणों को निकाल ईश्वरीय गुण धारण करने। ईश्वरीय गुण धारण कराने वाला बाप ही है।

तुम जानते हो अब हम आये हैं बेहद के बाप से अपना फिर से जन्म सिद्ध अधिकार 21 जन्मों का स्वराज्य लेने। यहाँ बैठे ही हैं सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी स्वराज्य प्राप्त करने। जो स्वराज्य तुम कल्प-कल्प प्राप्त करते आये हो। गंवाते हो फिर पाते हो। यह तो बुद्धि में रहना चाहिए ना। अब हम बाप से वर्सा लेते हैं। वर्सा लेने वाले बच्चों को बाप को याद करना पड़े ना। यह तो बुद्धि में आना चाहिए – हम मात-पिता के सम्मुख बैठे हैं, वर्सा लेने के लिए। वह ब्रह्मा मुख से हमको सुनाते हैं। जो गोद लेते हैं वह जरूर ब्राह्मण कहलायेंगे। यह ज्ञान यज्ञ है फिर यज्ञ कहो वा पाठशाला कहो, एक ही बात है। जब रूद्र यज्ञ रचते हैं तो पाठशाला भी बना देते हैं। एक तरफ वेद शास्त्र आदि, एक तरफ गीता, एक तरफ रामायण आदि रखते हैं। जिनको रामायण सुनना है वह उनके तरफ जाकर सुने, जिसको गीता सुनना हो वह उनके पास जाकर सुने। यह रूद्र ज्ञान यज्ञ है, जिसमें सब कुछ स्वाहा होना है। सृष्टि का अन्त है तो सभी यज्ञों का भी अन्त है। ज्ञान यज्ञ तो एक ही है। बाकी जो अनेक प्रकार के यज्ञ हैं – वह हैं मैटेरियल यज्ञ। जिसमें जौं-तिल आदि सामग्री पड़ती है। यह है बेहद का यज्ञ इसमें यह सब स्वाहा हो जायेगा। फिर से नई पैदाइस होती है। वहाँ दु:ख देने वाली चीज़ कोई होती नहीं। यहाँ तो कितना दु:ख है। बीमारियां आदि कितनी वृद्धि को पा रही हैं। भिन्न-भिन्न प्रकार के दु:ख रोग निकलते जाते हैं। ड्रामा में यह सब नूंध है। जैसे मनुष्य वैसे किसम-किसम के दु:ख निकलते जाते हैं। इसको कहा ही जाता है दु:खधाम, शोक वाटिका। मनुष्य दु:खी हैं क्योंकि रावण राज्य है। रामराज्य में रावण होता ही नहीं। आधाकल्प है सुखधाम, आधाकल्प है दु:खधाम। राम निराकार परमपिता परमात्मा को कहते हैं। एक है रूद्र माला निराकारी आत्माओं की और फिर विष्णु की माला बनती है साकारी। वह तो राजाई की है। फिर वहाँ नम्बरवार राज्य करते हैं। यह तुम बच्चों को अच्छी रीति समझना और समझाना है। जितना-जितना समय बीतता जायेगा उतना-उतना ज्ञान शार्ट होता जायेगा। इतना शार्ट में समझाने के लिए बाबा युक्तियां रच रहे हैं। विनाश के समय मनुष्यों को वैराग्य आयेगा। फिर समझेंगे कि बरोबर यह वही महाभारी महाभारत की लड़ाई है। जरूर निराकार भगवान भी होगा, कृष्ण तो हो नहीं सकता। निराकार को ही सर्व का पतित-पावन, सर्व का सद्गति दाता कहा जाता है। यह टाइटिल कोई को दे नहीं सकते।

बाबा ने यह भी समझाया है पवित्र देवतायें कभी अपवित्र दुनिया में पैर नहीं रख सकते। तुम लक्ष्मी से धन माँगते हो परन्तु लक्ष्मी कहाँ से लायेगी? यहाँ भी मम्मा, बाप से धन लेती है। वहाँ भी बाप साथी होगा। यहाँ सरस्वती साथ ब्रह्मा है। वहाँ भी दोनों जरूर चाहिए। निशानी चाहिए। कहाँ से धन मिलता जरूर है, इसलिए महालक्ष्मी की पूजा होती है। उनको 4 भुजायें देते हैं। टांगे तो इतनी देते नहीं। रावण को 10 मुख देते हैं। टांगे तो नहीं देते हैं। तो सिद्ध होता है, ऐसे मनुष्य होते नहीं हैं। यह है समझाने के लिए। जब कोई का पति मरता है तो उनकी आत्मा को इनवाइट किया जाता है, परन्तु आये कैसे? ब्राह्मण के तन में आती है। बुलवाया जाता है। यह रसम-रिवाज ड्रामा में नूँधी हुई है। फिर जो होता है, वहाँ आत्मायें आती हैं। आत्मा को बुलाकर उनको खिलाते हैं। यहाँ बाप तो खुद आकर तुम बच्चों को खिलाते हैं। तो अब तुम बच्चों का धन्धा ही यह सर्विस का हुआ। शरीर छोड़कर फिर कहाँ जन्म ले फिर मेहनत करते हैं। तुम्हारा है ही पतितों को पावन बनाने का धन्धा। तुम आगे चल देखेंगे कैसे सर्विस बढ़ती है। कल्प पहले भी ऐसे हुआ था, वही रील है। तुम बच्चे जानते हो जो कुछ होता है कल्प पहले मुआ]िफक। बाप भी ज्ञान और योग सिखलाने की वही एक्ट करते हैं, जो कल्प पहले की है। इसमें ज़रा भी फ़र्क नहीं पड़ सकता है। यह ड्रामा है ना। हम आत्मायें घर से आती हैं। मनुष्य तन धारण कर पार्ट बजाती हैं। 84 जन्मों को और ड्रामा के चक्र को पूरा समझाना है। और कोई जानते नहीं हैं, हम खुद ही नहीं जानते थे। तुमने ही कल्प पहले जाना था, अब फिर से जान रहे हो। रचयिता और रचना के आदि मध्य अन्त का राज़ अब समझा है। तुम्हारी बुद्धि में यह रहना है, ऊंच ते ऊंच बाप है, वही वर्सा देते हैं। फिर है ब्रह्मा विष्णु शंकर। ब्रह्मा द्वारा स्थापना होती है फिर वही पालना करते हैं, विष्णुपुरी के मालिक बन। विष्णुपुरी कहो वा लक्ष्मी-नारायण की पुरी कहो, बात एक ही है। तुम जानते हो हम सूर्यवंशी चन्द्रवंशी वर्सा बाप से ले रहे हैं, 21 जन्मों के लिए। बाप कहते हैं बच्चे तुम हमारे थे, हमने तुमको भेजा पार्ट बजाने। यह भी ड्रामा में नूँध है। कोई कहा नहीं जाता है। यह भी तुम समझते हो जो अच्छी रीति पुरुषार्थ करेंगे वह फिर नम्बरवार सुखधाम में आयेंगे। तुम याद करते हो सुखधाम को। जानते हो यह दु:खधाम है और कोई को पता नहीं है। तुम बच्चों की बुद्धि में आता है कि यह दु:खधाम है। तुम सुखधाम स्थापन करने वाले बाप से वर्सा पा रहे हो। हम जीते जी उनके बने हैं। राजा की गोद लेते हैं तो समझते हैं ना – हम उनके हैं। पहले भी लौकिक फिर दूसरा भी लौकिक ही सम्बन्ध रहता है। यहाँ अलौकिक फिर पारलौकिक हो जाता है। तुम जानते हो अभी हम राम के बने हैं। बाकी तो सब रावण कुल के हैं। एक तरफ वह दूसरे तरफ हम हैं। आत्मा समझती है बरोबर मैंने 84 जन्म पूरे किये हैं। मैं आत्मा एक पुराना शरीर छोड़ दूसरा नया लेती हूँ। पुरुषार्थ कर रहे हैं -ज्ञान सागर पतित-पावन सद्गति दाता बाप द्वारा। वह इस ब्रह्मा द्वारा पढ़ाते हैं। पढ़ती आत्मा है। आत्मा में ही बैरिस्टरी आदि के संस्कार रहते हैं ना। आत्मा बोलती है, आरगन्स द्वारा।

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तुमको आत्म-अभिमानी बनने में बड़ी मेहनत लगती है। बाप राय देते हैं – अमृतवेले का समय मशहूर है। उसी समय अपने को आत्मा समझ बाप को याद करते रहो तो तुम्हारी आत्मा पर जो कट लगी हुई है वह साफ होगी। आत्मा में खाद पड़ती है। प्योर सोने का प्योर जेवर होता है। आत्मा पर कट लगी हुई है। फिर शरीर भी ऐसा मिलता है इसलिए तुमको कार्ब में डाला जाता है। परन्तु इसमें सारा बुद्धि का काम है। बाप की याद में बैठे हैं और कोई तकलीफ की बात नहीं। जैसे बच्चा बाप को याद करता है। यह है बेहद का बाप। वह आत्मा शरीर को याद करती है। अब तुम आत्मा अपने बाप को याद करती हो। बाप कहते हैं मैं बेहद का बाप हूँ तो जरूर बेहद का सुख दूँगा। कल्प पहले दिया था। बरोबर भारत विश्व का मालिक था। दुश्मन आदि कोई नहीं था। अभी तुम सुखधाम के मालिक बन रहे हो। कितने बेसमझ बन पड़े थे। जो तुम स्वर्ग के लायक थे, अब नर्क के लायक बन पड़े हो। फिर स्वर्ग के लायक बनाने बाप आये हैं। निराकार शिव की जयन्ती होती और गीता जयन्ती भी होती है। बरोबर मानते हैं। शिवबाबा जब आते हैं तब भगवानुवाच होता है। तो फिर से गीता जयन्ती होती है, फिर से आकर परिचय देगा ना। आकर जो सुनाया वह फिर गीता बनी।

यह भी तुम बच्चे जानते हो कि रावण किसको कहा जाता है। अब इस रावण राज्य का विनाश होना है। मौत सामने खड़ा है। कल्प पहले भी यह दुनिया बदली थी। कितनी अच्छी रीति समझाया जाता है। मेहनत है, घर गृहस्थ में रहते कमल फूल समान पवित्र रह फिर साथ में यह कोर्स उठाओ। टीचर से पूछो। कोर्स तो बड़ा सहज है। घर में रहते मुझे याद कर रचना के आदि मध्य अन्त को जानो। 7 रोज़ समझने वाले भी कोई निकलते हैं। हर एक मनुष्य की रग देखी जाती है। देखा जाता है इनकी लगन बहुत अच्छी है। तड़फते हैं, हम बाबा का ज्ञान तो सम्मुख सुनें। उनकी शक्ल वातावरण से समझ सकते हो। रग को पूरा न समझने के कारण अच्छे-अच्छे भी चले जाते हैं। कहते हैं 7 रोज़ टाइम नहीं है, क्या करें! कोई कहते हैं दर्शन कराओ। बोलो – पहले आकर समझो। किसके पास आये हो? परमपिता परमात्मा से तुम्हारा क्या सम्बन्ध है?

ब्रह्माकुमार कुमारी तो तुम भी ठहरे ना। शिवबाबा के पोत्रे सो ब्रह्मा के बच्चे हो गये। बाप स्वर्ग का रचयिता है। तो जरूर वर्सा देता होगा। राजयोग सिखलाता होगा। समझाकर फिर लिखा लेना चाहिए। एक दिन में भी कोई अच्छा समझ सकता है। ऐसे तीखे निकलेंगे जो बहुत गैलप करेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) अमृतवेले उठ बाप को प्यार से याद कर आत्म-अभिमानी बनने की मेहनत करनी है। याद के बल से विकारों की कट उतारनी है।

2) घर गृहस्थ में रहते कमल फूल समान बनने का कोर्स उठाना है। हर एक की रग अथवा लगन देखकर ज्ञान देना है।

वरदान:- सम्पर्क सम्बन्ध में आते सदा सन्तुष्ट रहने और सन्तुष्ट करने वाले गुप्त पुरूषार्थी भव 
संगमयुग सन्तुष्टता का युग है, यदि संगम पर सन्तुष्ट नहीं रहेंगे तो कब रहेंगे, इसलिए न स्वयं में किसी भी प्रकार की खिटखिट हो न दूसरों के साथ सम्पर्क में आने में खिटखिट हो। माला बनती ही तब है जब दाना, दाने के सम्पर्क में आता है इसलिए सम्बन्ध-सम्पर्क में सदा सन्तुष्ट रहना और सन्तुष्ट करना, तब माला के मणके बनेंगे। परिवार का अर्थ ही है सदा सन्तुष्ट रहने और सन्तुष्ट करने वाले।
स्लोगन:- पुराने स्वभाव-संस्कार के वंश का भी त्याग करने वाले ही सर्वंश त्यागी हैं।

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