16 may ki murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 16 MAY 2021 : AAJ KI MURLI

16-05-21
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 31-12-87 मधुबन

नया वर्ष – बाप समान बनने का वर्ष

आज त्रिमूर्ति बाप तीन संगम देख रहे हैं। एक है बाप और बच्चों का संगम, दूसरा है यह युग संगम, तीसरा है आज वर्ष का संगम। तीनों ही संगम अपनी-अपनी विशेषता का है। हर एक संगम, परिवर्तन होने की प्रेरणा देने वाला है। संगमयुग विश्व-परिवर्तन की प्रेरणा देता है। बाप और बच्चों का संगम सर्व श्रेष्ठ भाग्य, एवं श्रेष्ठ प्राप्तियों की अनुभूति कराने वाला है। वर्ष का संगम नवीनता की प्रेरणा देने वाला है। तीनों ही संगम अपने-अपने अर्थ से महत्व रखते हैं। आज सभी देश-विदेश के बच्चे विशेष पुरानी दुनिया का नया वर्ष मनाने के लिए आये हैं। बापदादा सभी साकार रूपधारी वा आकार रूपधारी बुद्धि के विमान से पहुँचे हुए बच्चों को देख रहे हैं और नये वर्ष मनाने की डायमण्ड तुल्य मुबारक दे रहे हैं क्योंकि सब बच्चे हीरे तुल्य जीवन बना रहे हैं। डबल हीरो बने हो? एक तो बाप के अमूल्य रत्न हो, हीरो डायमण्ड हो। दूसरा हीरो पार्ट बजाने वाले हीरो हो इसलिए बापदादा हर सेकण्ड, हर संकल्प, हर जन्म की अविनाशी मुबारक दे रहे हैं। आप श्रेष्ठ आत्माओं का सिर्फ आज का दिन मुबारक वाला नहीं। लेकिन हर समय श्रेष्ठ भाग्य, श्रेष्ठ प्राप्ति के कारण बाप को भी हर समय आप मुबारक देते हो और बाप बच्चों को मुबारक देते सदा उड़ती कला में ले जा रहे हैं। इस नये वर्ष में यही विशेष नवीनता जीवन में अनुभव करते रहो – जो हर सेकेण्ड और संकल्प में बाप को तो सदा मुबारक देते हो लेकिन आपस में भी हर ब्राह्मण आत्मा वा कोई भी अन्जान, अज्ञानी आत्मा भी सम्बन्ध वा सम्पर्क में आये तो बाप समान हर समय, हर आत्मा के प्रति दिल के खुशी की मुबारक वा बधाई निकलती रहे। कोई कैसा भी हो लेकिन आपके खुशी की बधाई उनको भी खुशी की प्राप्ति का अनुभव कराये। बधाई देना – यह खुशी की लेन-देन करना है। कभी भी किसी को बधाई देते तो वह खुशी की बधाई है। दु:ख के समय बधाई नहीं कहेंगे। तो हर एक आत्मा को देख खुश होना वा खुशी देना – यही दिल की मुबारक वा बधाई है। दूसरी आत्मा भले आपसे कैसा भी व्यवहार करे लेकिन आप बापदादा की हर समय बधाई लेने वाली श्रेष्ठ आत्मायें सदा हरेक को खुशी दो। वह कांटा दे, आप बदले में रूहानी गुलाब दो। वह दु:ख दे, आप सुखदाता के बच्चे सुख दो। जैसे से वैसे नहीं बन जाओ, अज्ञानी से अज्ञानी नहीं बन सकते। संस्कारों के वा स्वभाव के वशीभूत आत्मा से आप भी ‘वशीभूत’ नहीं बन सकते।

आप श्रेष्ठ आत्माओं के हर संकल्प में सर्व के कल्याण की, श्रेष्ठ परिवर्तन की, ‘वशीभूत’ से स्वतन्त्र बनाने की दिल की दुआयें वा खुशी की मुबारक सदा नैचुरल रूप में दिखाई दे क्योंकि आप सभी दाता अर्थात् देवता हो, देने वाले हो। तो इस नये वर्ष में विशेष खुशियों की मुबारकें देते रहो। ऐसे नहीं कि सिर्फ आज के दिन वा कल के दिन चलते-फिरते मुबारक हो, मुबारक हो – यह कहके नया वर्ष आरम्भ नहीं करना। कहना भले, दिल से कहना। लेकिन सारा वर्ष कहना, सिर्फ दो दिन नहीं कहना। किसी को भी अगर दिल से मुबारक देते हो तो वह आत्मा दिल की मुबारक ले दिलखुश हो जाए। तो हर समय दिल-खुश मिठाई बांटते रहना। सिर्फ एक दिन नहीं मिठाई खाना वा खिलाना। कल के दिन मुख की मिठाइयाँ जितनी चाहिए उतनी खाना, सभी को बहुत-बहुत मिठाई खिलाना। लेकिन ऐसे ही सदा हर एक को दिल से दिलखुश मिठाई खिलाते रहो तो कितनी खुशी होगी! आजकल की दुनिया में तो फिर भी मुख की मिठाई खाने में डर भी है लेकिन यह दिलखुश मिठाई जितनी चाहिए खा सकते हो, खिला सकते हो, इसमें बीमारी नहीं होगी क्योंकि बापदादा बच्चों को समान बनाते हैं। तो विशेष इस वर्ष में बाप समान बनने की – यही विशेषता विश्व के आगे, ब्राह्मण परिवार के आगे दिखाओ। जैसे हर एक आत्मा “बाबा” कहते मधुरता वा खुशी का अनुभव करती है। ‘वाह बाबा’ कहने से मुख मीठा होता है क्योंकि प्राप्ति होती है। ऐसे हर ब्राह्मण आत्मा कोई भी ब्राह्मण का नाम लेते ही खुश हो जाए क्योंकि बाप समान आप सभी भी एक दो को बाप द्वारा प्राप्त हुई विशेषता द्वारा आपस में लेन-देन करते हो, आपस में एक दो के सहयोगी साथी बन उन्नति को प्राप्त कराते हो। जीवन साथी नहीं बनना, लेकिन कार्य के साथी भले बनो। हर एक आत्मा अपनी प्राप्त विशेषताओं से आपस में खुशी की लेन-देन करते भी हो और आगे भी सदा करते रहना। जैसे बाप को याद करते ही खुशी में नाचते हैं, वैसे हर एक ब्राह्मण आत्मा को हर ब्राह्मण याद करते रूहानी खुशी का अनुभव करे, हद की खुशी का नहीं। हर समय बाप की सर्व प्राप्तियों का साकार निमित्त रूप अनुभव करे। इसको कहते हैं हर संकल्प वा हर समय एक दो को मुबारक देना। सबका लक्ष्य तो एक ही है कि बाप समान बनना ही है क्योंकि समान के बिना तो न बाप के साथ स्वीट होम में जायेंगे और न ब्रह्मा बाप के साथ राज्य में आयेंगे। जो बापदादा के साथ अपने घर में जायेंगे वही ब्रह्मा बाप के साथ राज्य में उतरेंगे। ऊपर से नीचे आयेंगे ना। सिर्फ साथ जायेंगे नहीं लेकिन साथ आयेंगे भी। पूज्य भी ब्रह्मा के साथ बनेंगे और पुजारी भी ब्रह्मा बाप के साथ बनेंगे। तो अनेक जन्मों का साथ है। लेकिन उसका आधार इस समय समान बन साथ चलने का है।

इस वर्ष की विशेषता देखो – नम्बर भी 8, 8 हैं। आठ का कितना महत्व है! अगर अपना पूज्य रूप देखो तो अष्ट भुजाधारी, अष्ट शक्तियाँ उसी की ही यादगार है – अष्ट रत्न, अष्ट राजधानियाँ – अष्ट का भिन्न-भिन्न रूप से गायन है इसलिए यह वर्ष विशेष बाप समान बनने का दृढ़ संकल्प का वर्ष मनाओ। जो भी कर्म करो बाप समान करो। संकल्प करो, बोल बोलो, सम्बन्ध-सम्पर्क में आओ, बाप समान। ब्रह्मा बाप समान बनना तो सहज है ना क्योंकि साकार है। 84 जन्म लेने वाली आत्मा है। पूज्य अथवा पुजारी सभी की अनुभवी आत्मा है। पुरानी दुनिया के, पुराने संस्कारों के, पुराने हिसाब-किताब के, संगठन में चलने और चलाने – सब बातों के अनुभवी है। तो अनुभवी को फालो करना मुश्किल नहीं होता है। और बाप तो कहते हैं कि ब्रह्मा बाप के हर कदम के ऊपर कदम रखो। कोई नया मार्ग नहीं निकालना है, सिर्फ हर कदम पर कदम रखना है। ब्रह्मा को कापी करो। इतनी अक्ल तो है ना। सिर्फ मिलाते जाओ क्योंकि, बापदादा – दोनों ही आपके साथ चलने के लिए रुके हुए हैं। निराकार बाप परमधाम निवासी हैं लेकिन संगमयुग पर साकार द्वारा पार्ट तो बजाना पड़ता है ना इसलिए आपके इस कल्प का पार्ट समाप्त होने के साथ बाप, दादा – दोनों का भी पार्ट इस कल्प का समाप्त होगा। फिर कल्प रिपीट होगा इसलिए निराकार बाप भी आप बच्चों के पार्ट के साथ बंधा हुआ है। शुद्ध बन्धन है। लेकिन पार्ट का बन्धन तो है ना। स्नेह का बन्धन, सेवा का बन्धन… लेकिन मीठा बन्धन है। कर्मभोग वाला बन्धन नहीं है।

तो नया वर्ष सदा मुबारक का वर्ष है। नया वर्ष सदा बाप समान बनने का वर्ष है। नया वर्ष ब्रह्मा बाप को फॉलो करने का वर्ष है। नया वर्ष बाप के साथ स्वीट होम और स्वीट राजधानी में साथ रहने के वरदान प्राप्त करने का वर्ष है क्योंकि अभी से सदा साथ रहेंगे। अभी का साथ रहना सदा साथ रहने का वरदान है। नहीं तो बाराती बनेंगे और नजदीक वाले सम्बन्धी के बजाए दूर के सम्बन्धी बनेंगे। कभी-कभी मिलेंगे। कभी-कभी वाले तो नहीं हो ना? पहले जन्म में पहले राज्य का सुख और पहले नम्बर के राज्य अधिकारी विश्व महाराजा-विश्व महारानी के रॉयल सम्बन्ध, उसकी झलक और फलक न्यारी होगी! अगर दूसरे नम्बर विश्व महाराजा-महारानी की रॉयल फैमली में भी आ जाओ तो उसमें भी अन्तर है। एक जन्म का फर्क भी पड़ जायेगा। इसको भी साथ नहीं कहेंगे। कोई भी नई चीज़ एक बार भी यूज़ कर लो तो उसको यूज़ किया हुआ कहेंगे ना। नया तो नहीं कहेंगे। साथ चलना है, साथ आना है, साथ में पहले जन्म का राज्य रॉयल फैमली बन करना है। इसको कहते हैं समान बनना। तो क्या करना है, समान बनना है वा बराती बनना है?

बापदादा अज्ञानी और ज्ञानियों का एक अन्तर देख रहा था। एक दृश्य के रूप में देख रहा था। बाप के बच्चे क्या हैं और अज्ञानी क्या हैं? आज की दुनिया में विकारी आत्मायें क्या बन गई हैं? जैसे आजकल कोई भी बड़ी फैक्ट्रीज वा जहाँ भी आग जलती है तो आग का धुऑ निकालने के लिये चिमनी बनाते हैं ना। उससे सदैव धुऑ निकलता है और चिमनी सदैव काली दिखाई देगी। तो आज का मानव विकारी होने के कारण, किसी न किसी विकार वश होने के कारण संकल्प में, बोल में ईर्ष्या, घृणा या कोई न कोई विकार का धुऑ निकलता रहता है। ऑखों से भी विकारों का धुऑ निकलता रहता और ज्ञानी बच्चों के हर बोल वा संकल्प से, फरिश्तापन से दुआयें निकलती हैं। उसका है विकारों की आग का धुऑ और ज्ञानी तू आत्माओं के फरिश्ते रूप से सदा दुआयें निकलती। कभी भी संकल्प में भी किसी विकार के वश, विकार की अग्नि का धुऑ नहीं निकलना चाहिए, सदा दुआयें निकलें। तो चेक करो – कभी दुआओं के बदले धुऑ तो नहीं निकलता? फरिश्ता है ही दुआओं का स्वरूप। जब कोई भी ऐसा संकल्प आये या बोल निकले तो यह दृश्य सामने लाना – मैं क्या बन गया, फरिश्ते से बदल तो नहीं गया? व्यर्थ संकल्पों का भी धुऑ है। वह जलती हुई आग का धुऑ है, वह आधी आग का धुऑ है। पूरी आग नहीं जलती है तो भी धुऑ निकलता है ना। तो ऐसे फरिश्ता रूप हो जो सदा दुआयें निकलती रहे। इसको कहते हैं मास्टर दयालू, कृपालू, मर्सीफुल। तो अभी यह पार्ट बजाओ। अपने ऊपर भी कृपा करो तो दूसरे पर भी कृपा करो। जो देखा, जो सुना – वर्णन नहीं करो, सोचो नहीं। व्यर्थ को न सोचना, न देखना – यह है अपने ऊपर कृपा करना और जिसने किया वा कहा उसके प्रति भी सदा रहम करो, कृपा करो अर्थात् जो व्यर्थ सुना, देखा उस आत्मा के प्रति भी शुभ भावना शुभ कामना की कृपा करो। और कोई कृपा नहीं वा कोई हाथ से वरदान नहीं देंगे लेकिन मन पर नहीं रखना – यह है उस आत्मा के प्रति कृपा करना। अगर कोई भी व्यर्थ बात देखी हुई वा सुनी हुई वर्णन करते हो अर्थात् व्यर्थ बीज का वृक्ष बढ़ाते हो, वायुमण्डल में फैलाते हो – यह वृक्ष बन जाता है क्योंकि एक जो भी बुरा देखता वा सुनता है तो अपने एक मन में नहीं रख सकता, दूसरे को जरूर सुनायेगा, वर्णन जरूर करेगा। और एक का एक होता है तो क्या हो जायेगा? एक से अनेकता में आ जाते हैं। और जब एक से एक, एक से एक माला बन जाती है तो जो करने वाला होता है वह और ही व्यर्थ को स्पष्ट करने के लिए जिद्द में आ जाता है। तो वायुमण्डल में क्या फैला? व्यर्थ। यह धुऑ फैला ना। यह दुआ हुई या धुऑ? इसलिए व्यर्थ देखते हुए, सुनते हुए स्नेह से, शुभ भावना से समा लो। विस्तार नहीं करो। इसको कहते हैं दूसरे के ऊपर कृपा करना अर्थात् दुआ करना। तो तैयारी करो समान बन साथ चलने और साथ रहने की। ऐसे तो नहीं समझते हो कि अभी यहाँ ही रहना ठीक है, साथ चलने की तैयारी अभी नहीं करें, थोड़ा और रूकें? रुकने चाहते हो? रुकना भी हो तो बाप समान बन करके रुको। ऐसे ही नहीं रुको, लेकिन समान बनके रुको। फिर भले रुको, छुट्टी है। आप तो एवररेडी हो ना? सेवा रुकाती है वा ड्रामा रूकाता है, वह और बात है लेकिन अपने कारण से रुकने वाले नहीं बनो। कर्मबन्धन वश रुकने वाले नहीं। कर्मों के हिसाब-किताब का चौपड़ा साफ और स्पष्ट होना चाहिए। समझा। अच्छा!

चारों ओर के सर्व बच्चों को नये वर्ष की महानता से महान बनने की मुबारक सदा साथ रहे। सर्व हिम्मत वाले, फॉलो फादर करने वाले, सदा एक दो में दिलखुश मिठाई खिलाने वाले, सदा फरिश्ता बन दुआयें देने वाले, ऐसे बाप समान दयालू, कृपालू बच्चों को समान बनने की मुबारक साथ-साथ बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।

डबल विदेशी भाई-बहिनों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

सदा अपने को संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें अनुभव करते हो? श्रेष्ठ आत्माओं का हर संकल्प वा बोल वा हर कर्म स्वत: ही श्रेष्ठ होता है। तो हर कर्म श्रेष्ठ बन गया है ना? जो जैसा होता है वैसा ही उसका कार्य होता है। तो श्रेष्ठ आत्माओं का कर्म भी श्रेष्ठ ही होगा ना। जैसी स्मृति होती है वैसी स्थिति स्वत: होती है। तो श्रेष्ठ स्थिति नेचुरल स्थिति है क्योंकि हो ही विशेष आत्मायें। ऊंचे ते ऊंचे बाप के बन गये तो जैसा बाप वैसे बच्चे हुए ना। बच्चों के लिए सदा कहा जाता है सन शोज़ फादर। तो ऐसे हो? आप सबके दिल में कौन समाया है? जो दिल में होगा वही बुद्धि में होगा, बोल में होगा, संकल्प में भी वही होगा। आप लोग कार्ड भी हार्ट का ले आते हो ना। गिफ्ट भी हार्ट की भेजते हो। तो यह अपनी स्थिति का चित्र भेजते हो ना। तो जो बाप की दिल पर सदा रहता है वह सदा ही जो बोलेगा, जो करेगा वह स्वत: ही बाप समान होगा। बाप समान बनना मुश्किल नहीं है ना? सिर्फ डॉट (बिन्दी) याद रखो तो मुश्किल नॉट हो जायेगी। डॉट को भूलते हो तो नॉट नहीं होता। कितना सहज है डॉट बनाना वा डॉट लगाना। सारा ज्ञान इसी एक डॉट शब्द में समाया हुआ है। आप भी बिन्दी, बाप भी बिन्दी और जो बीत गया उसे भी बिन्दी लगा दो, बस। छोटा बच्चा भी लिखने जब शुरू करता है तो पहले जब पेन्सिल कागज पर रखता है तो क्या बन जाता? डॉट बनेगा ना? तो यह भी बच्चों का खेल है। यह पूरा ही ज्ञान की पढ़ाई खेल-खेल में है। मुश्किल काम नहीं दिया है इसलिए काम भी सहज है और हो भी सहज-योगी। बोर्ड में भी लिखते हो “सहज राज-योग”। तो ऐसा सहज अनुभव करना, इसे ही ज्ञान कहा जाता है। जो नॉलेजफुल हैं वह स्वत: ही पॉवरफुल भी होंगे क्योंकि नॉलेज को लाइट और माइट कहा जाता है। तो नॉलेजफुल आत्मायें सहज ही पॉवरफुल होने के कारण हर बात में सहज आगे बढ़ती हैं। तो यह सारा ग्रुप सहजयोगियों का ग्रुप है ना। ऐसे ही सहजयोगी रहना। अच्छा।

वरदान:- संशय के संकल्पों को समाप्त कर मायाजीत बनने वाले विजयी रत्न भव
कभी भी पहले से यह संशय का संकल्प उत्पन्न न हो कि ना मालूम हम फेल हो जायें, संशयबुद्धि होने से ही हार होती है इसलिए सदा यही संकल्प हो कि हम विजय प्राप्त करके ही दिखायेंगे। विजय तो हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, ऐसे अधिकारी बनकर कर्म करने से विजय अर्थात् सफलता का अधिकार अवश्य प्राप्त होता है, इसी से विजयी रत्न बन जायेंगे इसलिए मास्टर नॉलेजफुल के मुख से नामालूम शब्द कभी नहीं निकलना चाहिए।
स्लोगन:- रहम की भावना सहज ही निमित्त भाव इमर्ज कर देती है।

TODAY MURLI 16 MAY 2021 DAILY MURLI (English)

16/05/21
Madhuban
Avyakt BapDada
Om Shanti
31/12/87

The New Year, the Year to become equal to the Father.

Today, the Trimurti Father is looking at three confluences (meetings). One is the meeting of the Father and the children. The second is this confluence age and the third is the meeting of the years. Each of the three confluences has its own speciality. Each confluence is one that inspires you to bring about transformation. The confluence age inspires world transformation. The confluence of the Father and the children is one that makes you experience the most elevated fortune and the most elevated attainments. The confluence of the years inspires you to have newness. Each of the three confluences has its own significance. Today, all the children from this land and abroad have especially come to celebrate the New Year of the old world. BapDada is seeing all the children who are here in their physical forms and the children in their subtle forms who have reached here with the viman of their intellects, and is giving diamond congratulations for celebrating the New Year because all the children are making their lives as valuable as diamonds. Have you become double heroes (diamonds)? Firstly, each of you is the Father’s invaluable jewel; you are a hero (diamond). Secondly, you are a hero who plays a hero part. This is why BapDada is giving everlasting congratulations for every second, every thought and every birth. For you elevated souls, it is not just today that you give congratulations, but it is because of having elevated fortune and elevated attainment at every moment that you congratulate the Father at every moment, and the Father congratulates you children and constantly takes you into the flying stage. In this New Year, continue to experience this special newness in your lives. You of course congratulate the Father at every second and in every thought. With each other too – like the Father, let congratulations of happiness and greetings continue to emerge from your hearts at every moment for every soul – whether they are Brahmin souls, souls you don’t know, souls without knowledge or those who are in contact and connection with you. No matter what someone is like, let your greetings of happiness give that one an experience of the attainment of happiness. To give greetings is to give and receive happiness. Whenever you give anyone greetings, those are greetings of happiness. You would not give congratulations at a time of sorrow. So, seeing every soul, be happy and give happiness: this is to give congratulations and greetings from the heart. It doesn’t matter what type of interaction the other soul has with you, you elevated souls, who constantly receive greetings from BapDada have to give everyone happiness. If they give you thorns, you, in return, give them spiritual roses. If they cause you sorrow, you children of the Bestower of Happiness give them happiness. Do not treat them in the same way as they treat you. You cannot become ‘ignorant’ (agyani – without knowledge) with those who are ignorant. You cannot be influenced by a soul who is influenced by his sanskars or nature.

In every thought of you elevated souls, let blessings and greetings of happiness to benefit everyone, to transform everyone and to free influenced souls – be visible in a natural way, because all of you are bestowers, that is, deities – those who give. So, in this New Year, especially continue to give greetings of happiness. Let it not be that you go around saying, “Greetings, greetings,” just today and tomorrow. Do not begin the New Year just saying this. By all means say it, but say it from your hearts and say it throughout the whole year; do not just say it for two days. When you give a soul greetings from your heart, then that soul’s heart becomes happy when it receives greetings from the heart. So, continue to distribute the Dilkhush (happy-heart) toli at every moment. Do not eat and give others this sweet on just one day. Tomorrow, eat as much of such sweet (toli) as you want; feed everyone lots and lots of this sweet. If you continue to give each one Dilkhush toli from your heart in this same way, you will have so much happiness. In today’s world, people are still a little afraid to eat sweet things, but you can eat as much of this Dilkhush sweet as you want; you can give them as much as they want. This won’t make you ill, because BapDada is making you children equal to Him. So, this year, especially show the world and the Brahmin family the speciality of becoming equal to the Father. For instance, when any soul says “Baba”, he experiences sweetness and happiness. By saying, “Wah Baba!” your mouth is sweetened, because you attain something. In the same way, let every Brahmin soul become happy just mentioning the name of any Brahmin soul, because all of you are also equal to the Father and so you share between you the specialities you have received from the Father. You are co-operative companions with one another and you continue to make progress. Don’t be each other’s life companions, but companions in the task. All of you souls continue to share happiness between yourselves with the specialities that you have attained and you will continue to do that in the future too. Just as you dance in happiness as soon as you remember the Father, in the same way, as soon as every one of you Brahmin souls remembers another Brahmin soul, you experience spiritual happiness, not limited happiness. At every moment, experience all attainments from the Father practically. This is known as giving each other greetings at every moment and through every thought. Everyone’s aim is the same: you have to become equal to the Father because, without becoming equal, you will neither be able to go back with the Father to the sweet home, nor will you go into the kingdom with Father Brahma. Those who go back home with BapDada will go down into the kingdom with Father Brahma. You will come down from up above, will you not? You will not just go back together but also come down together. You will be worthy of worship with Brahma and also become a worshipper with Father Brahma. So, you have the companionship for many births. However, the basis of that is to become equal at this time and to go back with him.

Look at the speciality of this coming year: it has the numbers 8 and 8. The number 8 has so much importance. If you look at your worthy-of-worship form, there is the memorial of those with eight arms, and eight powers. There are eight jewels, eight kingdoms. The figure eight is remembered in many different ways. Therefore, celebrate this year especially as the year for having the determination to become equal to the Father. Whatever actions you perform, let them be equal to those of the Father. Whatever thoughts you have, whatever words you speak, when you come into connection or relationship with someone, be equal to the Father. It is easy to become equal to Father Brahma because he is corporeal. He is a soul who takes 84 births. He is a soul who has experienced being worthy of worship and also a worshipper. He has experienced the old world, old sanskars, old karmic accounts, being in a gathering and getting everyone to work together in a gathering: he is experienced in everything. So, it is not difficult to follow someone who is experienced, and the Father is telling you to place your every step in Father Brahma’s footsteps. You don’t have to find a new path. You simply have to place your steps in the footsteps. Copy Brahma. You have this much wisdom, do you not? Simply continue to match yourself, because both Bap and Dada are waiting for you to go back with them. The incorporeal Father is the Resident of the supreme abode but, at the confluence age, He has to play His part through the corporeal form, does He not? Therefore, together with this part of the cycle ending, the parts of both Bap and Dada will also end for this cycle. The cycle will then repeat. This is why the incorporeal Father is also bound to the parts of you children. It is a pure bondage. However, there is the bondage of the part, is there not? It is a bondage of love, a bondage of service, but it is a sweet bondage: it is not a bondage of karma.

So, the New Year is the year for constant greetings. The New Year is the year for constantly being equal to the Father. The New Year is the year to follow Father Brahma. The New Year is the year for receiving the blessing to be with the Father in the sweet home and in the kingdom, because you will remain in constant company from now. To be together at this time is the blessing of being with Him always. Otherwise, you will become part of the procession and, instead of being close relatives, you will be distant relatives. You will only meet sometimes. You are not those who only meet sometimes, are you? The happiness of the first birth and the sparkle and intoxication of a royal relationship with the world emperor and world empress, who have a right to the first kingdom, will be unique. Even if you go into the royal family of the second world emperor and empress, there would still be a difference. Even one birth would make a difference. That too is not called being together. Once anything new is used, it becomes a used thing, does it not? It would not be called new anymore. You have to go back together, descend together and rule in the kingdom of the first birth together as part of the royal family. This is called becoming equal. So, what do you want to do? Do you want to become equal or part of the procession?

BapDada was seeing one difference between those without knowledge and those with knowledge. He was seeing it in the form of a scene. What are the Father’s children like and what are the children without knowledge like? What have vicious souls become like in today’s world? Big factories and places where they burn something have chimneys to let out the smoke. Smoke is constantly coming out of those chimneys and it always seems black. Similarly, because today’s human beings are vicious, because they are influenced by one vice or another, the smoke of jealousy, dislike or any other type of vice continues to emerge in their thoughts and words. The smoke of vices continues to emerge from their eyes, whereas blessings continue to emerge from the words and thoughts of children with knowledge, in their angelic stage. They have the smoke of the fire of vices, whereas you gyani souls constantly have blessings emerging from your angelic forms. Let no smoke of the fire of vices emerge under the influence of vices even in your thoughts. Always let blessings emerge. Therefore, check yourself: does smoke (dhuwa) sometimes emerge instead of blessings (duwa)? Angels are embodiments of blessings. If you ever have any such thought or such words, then bring this scene in front of you: What have I become? Have I changed from being an angel? There is the smoke of even waste thoughts. That is the smoke of a burning fire and this is the smoke of a half lit fire. When there isn’t an intense fire burning, smoke still emerges. So, become such an angel that blessings always continue to emerge. This is known as being master merciful, compassionate, merciful. So now play this part. Have mercy for yourself and also for others. Whatever you saw, whatever you heard, do not speak about it, do not think about it. Do not think about anything wasteful. Do not see it. This is having mercy for yourself, and always having mercy for those who did or said something. Have mercy, that is, whatever wasteful thing you saw or heard about another soul, have good wishes and pure feelings of mercy for that soul. You won’t have any other type of mercy or give any other blessings, but do not keep anything in your mind. This is having mercy for that soul. If you speak about anything wasteful that you have seen or heard about, that is, if you are growing a tree from a wasteful seed, if you are spreading it into the atmosphere, that becomes a big tree. This is because whatever bad things a person sees or hears and is unable to keep in his own mind, he will definitely relate it to others; he will definitely speak about it. Then each one has someone else to relate it to, so what does that then become? From one, there will then be many. Then, when a rosary is created one after another, the one who did that wasteful thing would become even more stubborn to justify himself. So, what was spread into the atmosphere? Waste. It was smoke that was spread, was it not? Were those blessings or smoke? Therefore, while seeing or hearing anything wasteful, merge it with love and good wishes. Do not expand it. This is known as having mercy for others, that is, of giving blessings. So make preparations to become equal and to go back with the Father and to stay with Him. You do not think that it is fine just to stay here, do you? Or, that you shouldn’t now prepare to go back with Him, but rather stay here a little longer, do you? Do you want to stay here a little longer? Even if you want to stay here, then stay here by becoming equal to the Father. Do not stay here just like that, but become equal and stay here. You may then stay here; you have permission for that. You are ever ready, are you not? If service or the drama makes you stay here, that is a different matter, but don’t stay here for your own reasons. You are not those who stay here because of your karmic bondages. Let the account book of karmic accounts be clean and clear. Do you understand? Achcha.

To all the children from everywhere, may the congratulations for becoming great through the greatness of the New Year constantly be with you. To all those who have courage, who follow the Father, to those who always give one another Dilkhush toli, to those who are always angels and give blessings to others, to such merciful, compassionate children congratulations for becoming equal to the Father, and BapDada’s love, remembrance and namaste.

BapDada meeting double-foreign brothers and sisters

Do you constantly experience yourselves to be the elevated confluence-aged souls? Every thought, word and action of elevated souls is automatically elevated. So, every action has become elevated, has it not? As is the person, so his task. So, the actions of elevated souls would be elevated, would they not? As is your awareness, so automatically your stage. So, the elevated stage is your natural stage because you are special souls. Now that you belong to the highest-on-high Father, as is the Father, so are the children, are they not? For children it is always said: Son shows Father. So, are you like that? Who is merged in the hearts of all of you? Whoever is in your heart will be in your intellect, in your words and in your thoughts. You all bring cards of the heart, do you not? You also send gifts of the heart. So, they are images of your stage that you send, are they not? So, those who constantly remain in the Father’s heart will always automatically say and do the things that are equal to those of the Father. It is not difficult to become equal to the Father, is it? Simply remember the dot and any difficulty will become “not. When you forget the dot, it doesn’t become “not. It is so easy to make a dot or to put a dot. All the knowledge is merged in this one word “dot. You are a dot, the Father is a dot and, whatever has passed, put a dot to that. That is all. When a small child starts to write, when he puts his pencil on the paper, what does it become? It would be a dot, would it not? So, this too is child’s play. The whole study of this knowledge is carried out as a game. You have not been given a difficult job. Therefore, the work is easy and you are easy yogis. On the board too, you write “Easy Raj Yoga”. So to experience it to be easy is said to be knowledge. Those who are knowledge-full will also automatically be powerful because knowledge is said to be light and might. So, because knowledge-full souls are easily powerful, they easily move forward. Therefore, this whole group is of easy yogis. Constantly remain easy yogis in this way. Achcha.

Blessing: May you become a victorious jewel and a conqueror of Maya by finishing thoughts of doubt.
Never allow a thought of doubt to arise about yourself and think “Perhaps I may fail. It is by having an intellect filled with doubt that you are defeated. Therefore, always have the thought that you will definitely show everyone by gaining victory. Victory is our birthright; by doing everything while having all rights, you definitely have a right to victory, that is, success. In this way, you will become a victorious jewel. This is why words such as, “I don’t know, but, perhaps…” should never emerge from the lips of a master knowledge-full soul.
Slogan: The feeling of mercy easily makes the consciousness of being an instrument emerge.

 

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 16 MAY 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 16 May 2020

16/05/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, this drama cycle is now ending. Therefore, in order to go to the new world, you have to become like milk and sugar. Everyone there is like milk and sugar, whereas everyone here is like salt water.
Question: By knowing which knowledge have you children, who each has a third eye of knowledge, become knowers of the three aspects of time?
Answer: You have now received the knowledge of the history and geography of the whole world. You know the history and geography from the beginning of the golden age to the end of the iron age. You have each received the third eye of knowledge. A soul leaves one body and takes another. Sanskars are in each soul. The Father says: Children, now become detached from name and form. Consider yourselves to be bodiless souls.
Song: Have patience o man! Your days of happiness are about to come.

Om shanti. This is said to the children every cycle; you children also know this. Your hearts’ desire is for the golden age to come soon, so that you can be liberated from this world of sorrow. However, the drama moves very slowly. The Father tells you to have patience: Only a few more days remain. The sound also comes from eminent people that this world has to change. All the leaders, for example, the Pope etc., say that the world is going to change. Achcha, how would there then be peace? At present, everyone is like salt water. Here, we are becoming like milk and sugar, whereas those on the other side are becoming more and more like salt water day by day. They will all fight amongst themselves and finish one another off. All the preparations are being made for that. The cycle of the drama is now ending. The old world is about to end and the new world is being established. The new world becomes old and then the old world is made new again. This is called the cycle of the world and it continues to turn. It is not that the old world becomes new after hundreds of thousands of years; no. You children know very clearly that devotion is completely separate from knowledge. Devotion is connected with Ravan, and knowledge is connected with Rama. You now understand this. You call out to the Father and pray: O Purifier, come! Come and establish a new world. There is definitely happiness in the new world. Both young and old children know that we now have to return home. This drama is now ending. Once again, we are to go to the golden age and then go around the cycle of 84 births. We souls have recognised ourselves. We souls all have a third eye of knowledge, which means we know the world cycle. This is called being Trinetri. You now have a third eye, whereas all other human beings simply have their physical eyes. None of them have the eye of knowledge. Only when they each have the third eye through which the soul receives knowledge, can they become knowers of the three aspects of time. It is the soul that leaves one body and takes the next. The sanskars are in the soul. Souls are imperishable. The Father now says: Become detached from name and form. Consider yourself to be a bodiless soul. Do not consider yourself to be a body. You also know that you have been remembering the Supreme Soul for half a cycle, and that you remember Him more when you have a lot of sorrow. There is so much sorrow now. Previously, there wasn’t so much sorrow. Those kings started to fight among themselves when the outsiders came; they became disunited. In the golden age there was only one kingdom. We now understand the history and geography from the beginning of the golden age to the end of the iron age. There was only one kingdom in the golden and silver ages. Otherwise, there isn’t usually just one dynasty. Just look at the Christians. They are all disunited. There, in the golden age, the whole world is in the hands of just one. That only exists in the golden and silver ages. This unlimited history and geography is now in your intellects. You won’t hear the words “history and geography” in other satsangs. There, you only hear the Ramayana and the Mahabharata. Those things do not exist here. Here, you have the history and geography of the world. It is in your intellects that the Highest on High is your Father. It is thanks to the Father who has spoken all of this knowledge. One tree is that of souls and the other tree is that of human beings. Who is shown standing at the top of the tree of human beings? Only Brahma is called the great-great-grandfather. You know that Brahma is the main one, but no one knows the history and geography of Brahma. It is now in your intellects that the highest-on-high Father lives in the supreme abode. You also know about the subtle region. You human beings are to change into angels. This is why the subtle region is shown. You souls go there; your bodies won’t go to the subtle region. How do you go there? That is said to be with the third eye. It is also called a divine vision or trance. When you go into trance, you see Brahma, Vishnu and Shankar. People have shown destruction taking place when the eye of Shankar opened. No one can understand anything from that. You know that, according to the drama, destruction has to take place. People will fight among themselves and destruction will take place. However, what does Shankar do? His name is mentioned simply according to the drama. Therefore, you have to explain that there are the three: Brahma, Vishnu and Shankar. Brahma is shown for establishment, Vishnu for sustenance and Shankar for destruction. In fact, this drama is predestined. Shankar has no part to play. The part that Brahma and Vishnu play exist for the entire cycle. Brahma becomes Vishnu and Vishnu becomes Brahma. The 84 births of Brahma have been completed and so the 84 births of Vishnu have also been completed. Shankar is beyond birth and death. This is why they have combined Shiva with Shankar. In fact, Shiva has the greatest part. He teaches you. God is called knowledge-full. If He had to carry out His task through inspiration, how would He give us the knowledge of the world cycle? This is why the Father explains: Children, it is not a question of inspiration; the Father has to come here. The Father says: Children, I have the knowledge of the world cycle. I have received this part to play. This is why I am called the Ocean of Knowledge, the knowledge-full One. It is only when you receive knowledge that you can know what knowledge is. If you haven’t received it, how could you know its meaning? Previously, you also used to say that God gives inspiration, that He knows everything and that God sees whatever sins we commit. Baba says: I do not do that business. Whatever actions each of you performs, you yourself have to experience the punishment for them; I do not give it to anyone. Neither do I watch anyone, nor do I give punishment through inspiration. If I did anything through inspiration, it would be as though I gave punishment. If I were to tell someone to kill another person, I would be blamed. The one who tells the other person would be trapped. If Shankar were to give inspiration, he too would be trapped. The Father says: I give happiness to you children. You praise Me. You sing: Baba, come and remove our sorrow. I do not cause you any sorrow. You children are now sitting personally in front of the Father. Therefore, you should have so much happiness. You receive the direct feeling here that Baba is personally teaching us. This is called a meeting (mela). You go to the centres, but, you wouldn’t call it a meeting of souls with the Supreme Soul there. The meeting of souls with the Supreme Soul takes place here. Only you know that the meeting is taking place now; the Father has come amongst His children. All souls are here. It is souls that remember the Father and ask Him to come. This is the best meeting. The Father comes and liberates all souls from the kingdom of Ravan. This is a good meeting then, is it not? It is a meeting through which human beings become those with divine intellects. Human beings become dirty at those melas (fairs). They do not receive anything but simply continue to waste their money. Those are called Maya’s devilish melas. This is God’s mela. There is the difference of day and night. You too used to belong to the devilish melas, but you now belong to God’s mela. You too know that Baba has come. If everyone were to know this, there’s no telling how big the crowd here would be. Where would Baba obtain so many buildings for people to stay in? It is remembered that people sang at the end: O God, Your play is wonderful! Which play? That of transforming the world. This is the greatest, wonderful play. Before the old world is destroyed, the new world has to be established. Therefore, when you explain to anyone, always first of all speak of establishment, then destruction and then sustenance. When establishment has been completed, destruction will begin, and then sustenance will take place. So, you children have the happiness that you are the Brahmins who are spinners of the discus of self-realisation. You then become rulers of the globe. No one knows what happened to the kingdom of deities. All name and trace of it have been lost. Instead of calling themselves deities, they call themselves Hindus. Those who live in Hindustan are called Hindus. Lakshmi and Narayan would never be called that. They are called deities. So, you have come to this mela according to the drama. This is fixed in the drama. Expansion will continue to take place gradually. Whatever parts you are playing now, you will play those partsin the next cycle. This cycle continues to turn. You have had devilish sustenance in the kingdom of Ravan. You are now God’s children. You will become the children of deities, then the children of warriors. You became part of the impure family path, but you are now becoming part of the pure family path. They too are human beings but they have divine virtues. They have been portrayed with many arms. No one can tell you who Vishnu is. They worship Maha-Lakshmi. People never ask Jagadamba for wealth. If they receive a lot of money, they say that it is because they worship Lakshmi, that that is why she filled their treasure-store. Here, you are attaining everything from the Supreme Father, the Supreme Soul, Shiva, through Jagadamba. He is the Bestower. You children are even luckier than BapDada. Just look how many fairs are held for Jagadamba. There aren’t as many held for Brahma. Brahma has been made to sit in only one place. There is a huge temple to Brahma near Ajmer. There are many temples to the goddesses because of all the praise of the things you do now. Because you serve Bharat, you are worshipped more. You are lucky. Jagadamba is never called omnipresent. You are praised. Brahma, Vishnu and Shankar are not called omnipresent, but I am said to be in every particle! You defame Me so much! I increase your praise so much! It is said: Victory to Mother Bharat. You, not the earth, are the mothers of Bharat. In the golden age, the earth that is now tamopradhan will then be satopradhan. This is why it is said that deities never place their feet on this impure world. They come when the land becomes satopradhan. You now have to become satopradhan. If you continue to follow shrimat and remember the Father, you claim a high status. You must have this concern. When you remember Baba, your sins are absolved. You will continue to receive shrimat. In the golden age, you souls will have become pure. Therefore, you will receive pure bodies. When gold has alloy mixed into it, the jewellery made from it is also like that. Similarly, when souls are false, their bodies are also false. The value of gold is reduced when it has alloy mixed into it. You now have no value. Previously, you were 24 carat gold, masters of the world. Now you are said to be nine carat. The Father has this heart-to-heart conversation with you children. He sits here and entertains you children. Therefore, just by listening to Him, you change from ordinary humans into deities. There will be palaces of diamonds and jewels. What else could heaven be? You even drink mango juice there (in trance) and then come back here. The fruit there is so large. You wouldn’t find such fruit here. There is nothing in the subtle region. You are soon to go there in a practical way. This is the meeting of souls with the Supreme Soul. Through this meeting you become clean and bright. When you children come here, you are free because you have no worries of your home or business. Therefore, while you are here, you have a very good chance to stay on the pilgrimage of remembrance. There, you remember your home and everything. Here, there is nothing to remember. You can wake up at two in the morning and sit here. You cannot go to the centres at night. Here, it is very easy. You can come and sit in remembrance of Shiv Baba. Do not remember anyone else. You also receive help here. Go to sleep early and wake up early. Come and sit here from three to five. Baba will come, and you children will also be very happy. Baba is the One who teaches yoga. This one is also studying. Therefore, both Bap and Dada will come here. Then you will notice the difference between sitting here in remembrance and sitting there. You don’t have to remember anything else here. There is a lot of benefit in this. Baba advises you that this is very good. We shall now see if you children can wake up. Some of you have the practice of waking up early in the morning. You have renounced the five vices and have disinterest in the whole of the old world. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. The wonderful act of transforming the world is now taking place. Therefore, transform yourself. Live together like milk and sugar.
  2. Wake up early in the morning and sit in remembrance of the one Father. Do not remember anyone else at that time. Have unlimited disinterest in the old world and renounce the five vices.
Blessing: May you become victorious by your intellect having faith and experience the Father’s support at every moment instead of stepping away from anything.
Souls who have received the blessing of being victorious experience themselves to have support at every moment. They don’t have the slightest thought in their minds of being without support or being lonely. They are never sad or have limited, temporary disinterest. They never step away from any task, problem or person, but while performing every action and facing everything, they are co-operative and maintain an attitude of unlimited disinterest.
Slogan: Stay in the company of the one Father and make Him your Companion.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 16 MAY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 16 May 2020

Murli Pdf for Print : – 

16-05-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – अभी ड्रामा का चक्र पूरा होता है, तुम्हें क्षीरखण्ड बनकर नई दुनिया में आना है, वहाँ सब क्षीरखण्ड हैं, यहाँ लूनपानी हैं”
प्रश्नः- तुम त्रिनेत्री बच्चे किस नॉलेज को जान कर त्रिकालदर्शी बन गये हो?
उत्तर:- तुम्हें अभी सारे वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी की नॉलेज मिली है, सतयुग से लेकर कलियुग अन्त तक की हिस्ट्री-जॉग्राफी तुम जानते हो। तुम्हें ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला कि आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। संस्कार आत्मा में हैं। अब बाप कहते हैं – बच्चे, नाम-रूप से न्यारा बनो। अपने को आत्मा अशरीरी समझो।
गीत:- धीरज धर मनुवा…….

ओम् शान्ति। कल्प-कल्प बच्चों को कहा जाता है और बच्चे जानते हैं, दिल होती है कि जल्दी सतयुग हो जाए तो इस दु:ख से छूट जायें। परन्तु ड्रामा बहुत धीरे-धीरे चलने वाला है। बाप धीरज देते हैं बाकी थोड़े रोज़ हैं। बड़ो-बड़ों द्वारा भी आवाज़ सुनते रहेंग़े दुनिया बदलनी है। जो भी बड़े-बड़े हैं पोप जैसे वह भी कहते हैं दुनिया बदलने वाली है। अच्छा फिर पीस कैसे होगी? इस समय सब लूनपानी हैं। अभी हम क्षीरखण्ड हो रहे हैं। उस तरफ दिन-प्रतिदिन लूनपानी होते जाते हैं। आपस में लड़ झगड़ कर खत्म होने वाले हैं, तैयारियाँ हो रही हैं। यह ड्रामा का चक्र अब पूरा होता है। पुरानी दुनिया पूरी होती है। नई दुनिया की स्थापना हो रही है। नई दुनिया सो पुरानी, पुरानी सो नई दुनिया फिर बनेगी। इसको दुनिया का चक्र कहा जाता है जो फिरता रहता है। ऐसे नहीं, लाखों वर्ष बाद पुरानी दुनिया नई होगी। नहीं। तुम बच्चे अच्छी रीति जान चुके हो, भक्ति बिल्कुल ही अलग है। भक्ति का कनेक्शन रावण के साथ है। ज्ञान का कनेक्शन राम के साथ है। यह तुम अभी समझ रहे हो। अभी बाप को बुलाते भी हैं – हे पतित-पावन आओ, आकर नई दुनिया स्थापन करो। नई दुनिया में जरूर सुख होता है। अब बच्चे छोटे अथवा बड़े सब जान गये हैं कि अभी घर चलना है। यह नाटक पूरा होता है। हम फिर से सतयुग में जायेंगे फिर 84 जन्मों का चक्र लगाना है। स्व आत्मा को दर्शन होता है – सृष्टि चक्र का अर्थात् आत्मा को ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है, उसको कहा जाता है त्रिनेत्री। अभी तुम त्रिनेत्री हो और सभी मनुष्यों को यह स्थूल नेत्र हैं। ज्ञान का नेत्र कोई को नहीं है। त्रिनेत्री बनें तब त्रिकालदर्शी बनें क्योंकि आत्मा को ज्ञान मिलता है ना। आत्मा ही एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। संस्कार आत्मा में रहते हैं। आत्मा अविनाशी है। अब बाप कहते हैं नाम-रूप से न्यारा बनो। अपने को अशरीरी समझो। देह नहीं समझो। यह भी जानते हो हम आधाकल्प से परमात्मा को याद करते आये हैं। इसमें जब जास्ती दु:ख होता है तब जास्ती याद करते हैं, अभी कितना दु:ख है। आगे इतना दु:ख नहीं था। जबसे बाहर वाले आये हैं तब से यह राजायें लोग भी आपस में लड़े हैं। जुदा-जुदा हुए हैं। सतयुग में तो एक ही राज्य था।

अभी हम सतयुग से लेकर कलियुग अन्त तक हिस्ट्री-जॉग्राफी समझ रहे हैं। सतयुग-त्रेता में एक ही राज्य था। ऐसे एक ही डिनायस्टी कोई की होती नहीं। क्रिश्चियन में भी देखो फूट है, वहाँ तो सारा विश्व एक के हाथ में रहता है। वह सिर्फ सतयुग-त्रेता में ही होता है। यह बेहद की हिस्ट्री-जॉग्राफी अभी तुम्हारी बुद्धि में है। और कोई सतसंग में हिस्ट्री-जॉग्राफी अक्षर नहीं सुनेंगे। वहाँ तो रामायण, महाभारत आदि ही सुनते हैं। यहाँ वह बातें हैं नहीं। यहाँ है वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी। तुम्हारी बुद्धि में है ऊंच ते ऊंच हमारा बाप है। बाप का शुािढया है जिसने सारा ज्ञान सुनाया है। एक आत्माओं का झाड़ है, दूसरा है मनुष्यों का झाड़। मनुष्यों के झाड़ में ऊपर में कौन हैं? ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर ब्रह्मा को ही कहेंगे। यह जानते हैं ब्रह्मा मुख्य है परन्तु ब्रह्मा के पीछे क्या हिस्ट्री-जॉग्राफी है, यह कोई नहीं जानते। अभी तुम्हारी बुद्धि में है – ऊंच ते ऊंच बाप रहते भी हैं परमधाम में। फिर सूक्ष्मवतन का भी तुमको मालूम है। मनुष्य ही फ़रिश्ता बनते हैं, इसलिए सूक्ष्मवतन दिखाया है। तुम आत्मायें जाती हो, शरीर तो सूक्ष्मवतन में नहीं जायेगा। जाते कैसे हैं, उनको कहा जाता है तीसरा नेत्र, दिव्य-दृष्टि अथवा ध्यान भी कहते हैं। तुम ध्यान में ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को देखते हो। लोग दिखलाते हैं – शंकर के आंख खोलने से विनाश हो जाता है। अब इनसे तो कोई समझ न सके। अभी तुम जानते हो विनाश तो ड्रामा अनुसार होना ही है। आपस में लड़कर विनाश हो जायेंगे। बाकी शंकर क्या करते हैं! यह ड्रामा अनुसार नाम रख दिया है। तो समझाना पड़ता है। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर तीन हैं। स्थापना के लिए ब्रह्मा को रखा है, पालना के लिए विष्णु को, विनाश के लिए शंकर को रख दिया है। वास्तव में यह बना बनाया ड्रामा है। शंकर का पार्ट कुछ भी है नहीं। ब्रह्मा और विष्णु का पार्ट तो सारे कल्प में है। ब्रह्मा सो विष्णु, विष्णु सो ब्रह्मा। ब्रह्मा के भी 84 जन्म पूरे हुए तो विष्णु के भी पूरे हुए। शंकर तो जन्म-मरण से न्यारा है इसलिए शिव और शंकर को फिर मिला दिया है। वास्तव में शिव का तो बहुत पार्ट है, पढ़ाते हैं।

भगवान को कहा जाता है नॉलेजफुल। अगर वह प्रेरणा से कार्य करता तो सृष्टि चक्र का ज्ञान कैसे देता! इसलिए बाप समझाते हैं – बच्चे, प्रेरणा की तो कोई बात ही नहीं। बाप को तो आना पड़ता है। बाप कहते – बच्चे, मेरे में सृष्टि चक्र का ज्ञान है। मेरे को यह पार्ट मिला हुआ है इसलिए मुझे ही ज्ञान सागर नॉलेजफुल कहते हैं। नॉलेज किसको कहा जाता है, वह तो जब मिले तब पता पड़े। मिला ही नहीं है तो अर्थ का कैसे मालूम पड़े। आगे तुम भी कहते थे ईश्वर प्रेरणा करते हैं। वह सब कुछ जानते हैं। हम जो पाप करते हैं, ईश्वर देखते हैं। बाबा कहते हैं यह धन्धा मैं नहीं करता हूँ। यह तो जैसा कर्म करते हैं उसकी खुद ही सज़ा भोगते हैं, मैं किसको नहीं देता हूँ। न कोई प्रेरणा से सज़ा दूँगा। मैं प्रेरणा से करूँ तो जैसे मैंने सज़ा दी। कोई को कहना कि इनको मारो, यह भी दोष है। कहने वाला भी फँस पड़े। शंकर प्रेरणा दे तो वह भी फँस जाए। बाप कहते हैं मैं तो तुम बच्चों को सुख देने वाला हूँ। तुम मेरी महिमा करते हो – बाबा आकर दु:ख हरो। मैं थोड़ेही दु:ख देता हूँ।

अब तुम बच्चे बाप के सम्मुख बैठे हो तो कितनी खुशी होनी चाहिए! यहाँ डायरेक्ट भासना आती है। बाबा हमको पढ़ाते हैं। इनको मेला कहा जाता है। सेन्टर्स पर तुम जाते हो वहाँ कोई आत्माओं, परमात्मा का मेला नहीं कहेंगे। आत्माओं परमात्मा का मेला यहाँ लगता है। यह भी तुम जानते हो मेला लगा हुआ है। बाप बच्चों के बीच में आये हैं। आत्मायें सब यहाँ है। आत्मा ही याद करती हैं कि बाप आये। यह सबसे अच्छा मेला है। बाप आकर सब आत्माओं को रावण राज्य से छुड़ा देते हैं। ये मेला अच्छा हुआ ना, जिससे मनुष्य पारसबुद्धि बनते हैं। उन मेलों पर तो मनुष्य मैले हो जाते हैं। पैसे बरबाद करते रहते हैं, मिलता कुछ भी नहीं। उनको मायावी, आसुरी मेला कहा जायेगा। यह है ईश्वरीय मेला। रात-दिन का फ़र्क है। तुम भी आसुरी मेले में थे। अभी हो ईश्वरीय मेले में। तुम ही जानते हो बाबा आया हुआ है। सब जान जाएं तो पता नहीं कितनी भीड़ हो जाए। इतने मकान आदि रहने के लिए कहाँ से लायेंगे! पिछाड़ी में गाते हैं ना – अहो प्रभू तेरी लीला। कौन-सी लीला? सृष्टि के बदलने की लीला। यह है सबसे बड़ी लीला। पुरानी दुनिया खत्म होने से पहले नई दुनिया की स्थापना होती है इसलिए हमेशा किसको भी समझाओ तो पहले स्थापना, विनाश फिर पालना कहना है। जब स्थापना पूरी होती है तब फिर विनाश शुरू होता है, फिर पालना होगी। तो तुम बच्चों को यह खुशी रहती है – हम स्वदर्शन चक्रधारी ब्राह्मण हैं। फिर हम चक्रवर्ती राजा बनते हैं। यह कोई को पता नहीं, इन देवताओं का राज्य कहाँ गया। नाम-निशान गुम हो गया है। देवता के बदले अपने को हिन्दू कह देते हैं। हिन्दुस्तान में रहने वाले हिन्दू हैं। लक्ष्मी-नारायण को तो ऐसे कभी नहीं कहेंगे। उन्हों को तो देवता कहा जाता है। तो अब इस मेले में ड्रामा अनुसार तुम आये हो। यह ड्रामा में नूँध है। धीरे-धीरे वृद्धि होती रहेगी। तुम्हारा जो कुछ पार्ट चल रहा है फिर कल्प बाद चलेगा। यह चक्र फिरता रहता है। फिर रावण राज्य में आसुरी पालना होगी। तुम अभी ईश्वरीय बच्चे हो फिर दैवी बच्चे फिर क्षत्रिय बनेंगे। तुम जो अपवित्र प्रवृत्ति वाले बन गये थे सो फिर पवित्र प्रवृत्ति वाले बनते हो। हैं तो यह भी दैवी गुण वाले मनुष्य ना। बाकी इतनी भुजायें आदि दे दी हैं, विष्णु कौन हैं, यह कोई बता न सके। महालक्ष्मी की भी पूजा करते हैं। जगत अम्बा से कभी धन नहीं मांगते हैं। धन जास्ती मिल गया तो कहेंगे लक्ष्मी की पूजा की इसलिए उसने भण्डारा भर दिया। यहाँ तो तुम जगत अम्बा से पा रहे हो परमपिता परमात्मा शिव द्वारा, देने वाला वह है। तुम बच्चे बापदादा से भी लक्की हो। देखो, जगदम्बा का कितना मेला लगता है, ब्रह्मा का इतना नहीं। ब्रह्मा को तो एक ही जगह बिठा दिया है, अजमेर में बड़ा मन्दिर है। देवियों के मन्दिर बहुत हैं क्योंकि इस समय तुम्हारी बहुत महिमा है। तुम भारत की सेवा करते हो। पूजा भी तुम्हारी जास्ती होती है। तुम लकी हो। जगत अम्बा के लिए ऐसे कभी नहीं कहेंगे कि वह सर्वव्यापी है। तुम्हारी महिमा होती रहती है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को भी सर्वव्यापी नहीं कहते, मुझे कह देते कण-कण में है, कितनी ग्लानि करते हैं।

तुम्हारी मैं कितनी महिमा बढ़ाता हूँ। भारत माता की जय कहते हैं ना। भारत माता तो तुम हो ना। धरनी नहीं। धरनी आदि जो अब तमोप्रधान है, सतयुग में सतोप्रधान हो जाती है इसलिए कहते हैं देवताओं के पैर पतित दुनिया में नहीं आते। जब सतोप्रधान धरनी होती है तब आते हैं। अभी तुमको सतोप्रधान बनना है। श्रीमत पर चलते बाप को याद करते रहेंगे तो ऊंच पद पायेंगे। यह ख्याल रखना है। याद करेंगे तो विकर्म विनाश होंगे। श्रीमत मिलती रहती है। सतयुग में तो तुम्हारी आत्मा पवित्र कंचन हो जाती है तो शरीर भी कंचन मिलता है। सोने में खाद पड़ती है तो फिर जेवर भी ऐसा बनता है। आत्मा झूठी तो शरीर भी झूठा। खाद पड़ने से सोने का मूल्य भी कम हो जाता है। तुम्हारा मूल्य अब कुछ भी नहीं है। पहले तुम विश्व के मालिक 24 कैरेट थे। अभी 9 कैरेट कहेंगे। यह बाप बच्चों से रूहरिहान करते हैं। बच्चों को बैठ बहलाते हैं, जो तुम सुनते-सुनते चेंज हो जाते हो। मनुष्य से देवता बन जाते हो। वहाँ हीरे-जवाहरातों के महल होंगे, स्वर्ग तो फिर क्या! वहाँ के शूबीरस आदि भी तुम पीकर आते हो। वहाँ के फल ही इतने बड़े-बड़े होते हैं। यहाँ तो मिल न सकें। सूक्ष्मवतन में तो कुछ है नहीं। अभी तुम प्रैक्टिकल में जाते हो। यह है आत्मा और परमात्मा का मेला, इनसे तुम उज्जवल बनते हो।

तुम बच्चे जब यहाँ आते हो तो फ्री हो, घर-बार धन्धे आदि का कोई फुरना नहीं है। तो यहाँ तुमको याद की यात्रा में रहने का चांस अच्छा है। वहाँ तो घर-घाट आदि याद आता रहेगा। यहाँ तो कुछ है नहीं। रात को दो बजे उठ-कर यहाँ बैठ जाओ। सेन्टर्स पर तो रात को तुम जा नहीं सकते। यहाँ तो सहज है। शिवबाबा की याद में आकर बैठो, और कोई याद न आये। यहाँ तुमको मदद भी मिलेगी। सवेरे (जल्दी) सो जाओ फिर सवेरे उठो। 3 से 5 बजे तक आकर बैठो। बाबा भी आ जायेंगे, बच्चे खुश होंगे। बाबा है योग सिखलाने वाला। यह भी सीखने वाला है तो दोनों बाप और दादा आ जायेंगे फिर यहाँ और वहाँ योग में बैठने के फ़र्क का भी पता पड़ेगा। यहाँ कुछ भी याद नहीं पड़ेगा, इसमें फायदा बहुत है। बाबा राय देते हैं – यह बहुत अच्छा हो सकता है। अब देखें बच्चे उठ सकते हैं? कइयों को सवेरे उठने का अभ्यास है। तुम्हारा सन्यास है 5 विकारों का और वैराग्य है सारी पुरानी दुनिया से। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अभी सृष्टि बदलने की लीला चल रही है इसलिए स्वयं को बदलना है। क्षीरखण्ड होकर रहना है।

2) सवेरे उठकर एक बाप की याद में बैठना है, उस समय और कोई भी याद न आये। पुरानी दुनिया से बेहद का वैरागी बन 5 विकारों का सन्यास करना है।

वरदान:- किनारा करने के बजाए हर पल बाप का सहारा अनुभव करने वाले निश्चय बुद्धि विजयी भव
विजयी भव की वरदानी आत्मा हर पल स्वयं को सहारे के नीचे अनुभव करती है। उनके मन में संकल्पमात्र भी बेसहारे वा अकेलेपन का अनुभव नहीं होता। कभी उदासी या अल्पकाल के हद का वैराग्य नहीं आता। वे कभी किसी कार्य से, समस्या से, व्यक्ति से किनारा नहीं करते लेकिन हर कर्म करते हुए, सामना करते हुए, सहयोगी बनते हुए बेहद की वैराग्य वृत्ति में रहते हैं।
स्लोगन:- एक बाप की कम्पन्नी में रहो और बाप को ही अपना कम्पैनियन बनाओ।

TODAY MURLI 16 MAY 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 16 May 2019

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16/05/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, the first faith you need is that it is the Father, the Ocean of Peace and the Ocean of Happiness, Himself, who is teaching you. No human being can grant peace or happiness to anyone.
Question: What is the highest destination of all? What effort is needed to reach that destination?
Answer: Let there be firm remembrance of the one Father. Let your intellect not be drawn towards anyone else. This is the highest destination. For this, you need to make effort to become soul conscious. When you become soul conscious, all vicious thoughts will end and the wandering of your intellect will stop. Your vision should not be drawn to bodies at all. This is your destination and for this, may you be soul conscious!

Om shanti. The spiritual Father sits here and explains to you spiritual children. This one (Brahma Baba) cannot be called the spiritual Father. Today, (Thursday) is called the day of the Satguru. It is a mistake to call it the day of just guruvar (Thursday). There are many gurus, but only one Satguru. There are many who have themselves called a guru and also a satguru. You children now understand that there is a difference between the Satguru and a guru. Sat means the truth. Only the one incorporeal Father, and not any human being, is called the Truth. The Father, the Ocean of Knowledge, only comes once and gives you this true knowledge. Human beings can never give this true knowledge to human beings. It is only the one incorporeal Father who is the Truth. This one’s name is Brahma; he cannot give knowledge to anyone. Brahma didn’t have any knowledge. Even now, you would say that he doesn’t have all the knowledge. It is only the Ocean of Knowledge, the Supreme Father, the Supreme Soul, who has complete knowledge. There is no human being who can call himself the Satguru. “Satguru” means the One who is the complete Truth. When you become true, those bodies will not remain. Human beings can never be called the Satguru. They don’t have strength worth even a penny. This one himself says: I myself am a human being, the same as you. There is no question of strength in that. It is the Father, not Brahma, who is teaching you. This Brahma also studies with Him and then teaches you. You call yourselves Brahma Kumars and Kumaris and you are studying with the Supreme Father, the Supreme Soul, the Satguru. You receive strength from Him. Strength doesn’t mean that when you push someone, he falls down; no. This is spiritual strength which you receive from the spiritual Father. You attain peace through the power of remembrance and you receive happiness by studying. Just as other teachers teach you, so the Father too is teaching you. This one is also studying; he is a student. All bodily beings are students. The Father doesn’t have a body. He is incorporeal and He comes here Himself and teaches you. You are studying in the same way as other students study. There is no question of effort in this. At the time of studying, students remain celibate. They observe celibacy and then, when they finish their studies, they indulge in vice. Human beings are seen as human beings. It would be said: This one is such-and-such a person, this one is an LLB., and this one is such-and-such an officer. They receive titles according to their studies, but their faces are the same. You know about worldly studies. Sages and holy men who read and study the scriptures have no greatness. No one can receive peace through that. They themselves are also stumbling around searching for peace. If there were peace in the jungles, why would they return home? No one attains liberation. Those very well-known ones who existed in the past, such as Rama-Krishna Paramhans, have all taken rebirth and come down. No one has attained liberation or liberation-in-life. Everyone has to become tamopradhan. You cannot see anything physically. Ask anyone: What do you receive from your guru? They would say: Peace. However, they don’t receive anything. They don’t even know the meaning of peace. You children now understand that Baba is the Ocean of Knowledge. No sage, holy man or guru can be the Ocean of Peace. Human beings cannot give anyone true peace. You children first of all have to have the faith that it is only the one Father who is the Ocean of Peace that is teaching you. The Father has also explained to you how the world cycle turns. Human beings can never give peace or happiness to human beings. This Brahma is His chariot; he is a student, the same as you. He also belonged to the family path. He simply gave his chariot on loan to the Father in his stage of retirement. It is the one Father who is explaining to you. That Father says to everyone: You have to become viceless. Those who cannot become this themselves will insult you in many ways. They believe that you are making them renounce the food (vices) that they have been receiving for birth after birth as an inheritance from their fathers. It is the unlimited Father who makes them renounce that. He also made this one renounce it. He also tried to save the children. He saved those who were able to come to Him. It is now in the intellects of you children that it is not a human being who is teaching you. Only the one incorporeal Father is called the Almighty Authority. No one else can be called this. He Himself is giving you knowledge. The Father Himself is explaining to you. These vices are your greatest enemies and you have to renounce them. Those who are unable to renounce them fight so much. Some women too are such that they cause a lot of upheaval for vice. You are now at the confluence age. No one knows that this is the most auspicious confluence age. The Father explains to you so clearly. There are many who have full faith. Some have semi-faith, some have 100% faith whereas others only have 10% faith. God is now giving you shrimat: Children, remember Me! This is the greatest order from the Father. Only when you have faith will you follow that order. The Father says: My sweetest children, consider yourselves to be souls and remember the Father. You mustn’t remember this one. I do not say this, but Baba tells you through me. This one is also studying in the same way as you children are. All are students. There is only the one Teacher who is teaching you. There, it is human beings who teach you, whereas here, it is God who is teaching you. You souls study and you souls then teach others. You have to become very soul conscious in this. It is the soul that becomes a barrister or an engineer. Souls now have body consciousness. Instead of being soul conscious, you have become body conscious. When you are soul conscious, you cannot be called vicious. Such souls would never have vicious thoughts. It is only through body consciousness that you have vicious thoughts. At that time, you look at others with the vision of vice. Deities can never have vicious vision. The vision changes through knowledge. In the golden age, they will not have love or dance in the way that they do here. There, they will have love, but there won’t be the bad odour of vice. People have been indulging in vice for birth after birth and so it is with great difficulty that they are able to remove that intoxication. The Father makes you viceless and so some children become very strong. I just have to become completely viceless. I came alone and I have to go back alone. They would not like it if someone touched them even slightly. They would say: Why is that one touching me? There is the odour of vice in that one. Those who are vicious should never even touch us. You have to reach this destination. Your vision should not go towards bodies at all. You have to create that karmateet stage now. Even now, there isn’t anyone who looks at just the soul. This is your destination. The Father always says: Children, consider yourselves to be souls. Those bodies are tails through which you play your parts. Some say that there is some power in this one, but it is not a question of power. This is a study. Just as others are studying, so this one is also studying. One has to beat one’s head so much for purity; it requires a lot of effort. This is why the Father says: Look at one another as souls. You still remain soul conscious in the golden age. There is no kingdom of Ravan there. There is no question of vice there. Here, in this kingdom of Ravan, all are vicious. This is why the Father comes and makes you viceless. If you don’t become this, punishment will have to be experienced. The soul cannot go up above without becoming pure. All karmic accounts have to be settled. Even then, the status is reduced. A kingdom is being established. You children know that there was the one original, eternal, kingdom of the deities in heaven. At first, there would definitely be one king and queen. Then, there would be their dynasty. So many subjects are created. There would be differences created in their stage. Those who don’t have full faith will not be able to study fully; they cannot become pure. For those who have been impure for half the cycle, for them to become pure for 21 births in just one birth – is that like going to your aunty’s home? The main thing is lust. Anger etc. are not as strong. If your intellects are being drawn somewhere else, you definitely don’t have remembrance of the Father. If remembrance of the Father becomes firm, your intellects will not go in other directions. The destination is very high. Some people hear about purity and it is as though they burn in a fire. They say: No one else has ever said this before. It is not mentioned in the scriptures. They consider it to be very difficult. That is a separate religion of the path of isolation. They have to take rebirth and go into the religion of renunciation. They carry those same sanskars with them. You don’t have to renounce your homes and families. It is explained that you may live at home and also explain to them: It is now the confluence age. Without becoming pure, you cannot become deities in the golden age. Those who hear even just a little knowledge will continue to become subjects. There are many subjects created. There are no advisers in the golden age because the Father makes you completely knowledge-full. It is those who don’t have knowledge who need to have advisers. At this time, look how they continue to kill one another. Their nature of enmity is so strong. You now understand that you will shed those old bodies and take others. It is not a big thing. Those people die in sorrow whereas you have to go in remembrance of the Father in happiness. The more you remember Me, the Father, the more you will continue to forget everyone else. No one else will be remembered. However, you will have this stage when you have full faith. If there isn’t faith, there cannot be remembrance. They simply say it for the sake of it. If there isn’t faith, why would you have remembrance? Not everyone has faith to the same extent. Maya makes you move away from faith. You become just like you were previously. First of all, you need to have faith in the Father. Would you doubt that that One is the Father? Only the one Father gives you this knowledge. This one says: I didn’t know the Creator or the beginning, middle and end of creation. Someone would have related that to me. I had adopted 12 gurus, but I had to renounce all of them. Those gurus didn’t give me knowledge. The Satguru suddenly came and entered me. I thought: I don’t know what is going to happen. It is mentioned in the Gita that Arjuna was granted a vision. It is not a question of just Arjuna alone. This one is the chariot. This one also used to study the Gita formerly. The Father entered him, granted a vision that it is the Father alone who gives this knowledge, and so he stopped reading the Gita. The Father is the Ocean of Knowledge. He tells us this. The Gita is the mother and father. It is the Father to whom you say: You are the Mother and You are the Father. He creates creation; He adopts it. This Brahma is also like you. The Father says: When it is this one’s stage of retirement, I enter him. Kumaris are pure anyway. It is easy for them. After they get married, their relationships increase so much. This is why it requires effort to become soul conscious. In fact, the soul is separate from the body, but you have been body conscious for half the cycle. The Father comes and makes you soul conscious in this final birth, and so you find it difficult. After making effort, very few pass. Only eight jewels emerge. Ask yourself: Is my line clear? Do I remember anyone except the one Father? This stage will be created by the end. It requires a lot of effort to become soul conscious. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Change your vision with knowledge. Become soul conscious and finish all vicious thoughts. Let there be no bad odour of any vice. Let your vision not be directed to bodies at all.
  2. Only when there is the firm faith that only the unlimited Father is teaching you will your remembrance become firm. Pay attention that Maya doesn’t make you waver even slightly from your faith.
Blessing: May you become a worthy of worship soul who always performs elevated deeds with the foundation of purity.
Purity makes you worthy of worship. Those who always perform elevated deeds become worthy of worship. However, purity is not just celibacy; let there not be any negative thoughts for anyone in your mind; let there not be inappropriate words; let there not be any difference in your relationships and connections; let there be same good relationship with everyone. When there is no impurity in your thoughts, words or deeds, you would then be said to be a soul worthy of worship. “I am a supremely worthy of worship soul” – with this awareness make your foundation of purity strong.
Slogan: Always have this spiritual intoxication, “Wah re me! (The wonder of myself)” and you will naturally continue to dance in happiness in your mind and with your body.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 16 MAY 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 16 May 2019

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16-05-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम्हें पहला-पहला निश्चय चाहिए कि हमको पढ़ाने वाला स्वयं शान्ति का सागर, सुख का सागर बाप है। कोई मनुष्य किसी को सुख-शान्ति नहीं दे सकता”
प्रश्नः- सबसे ऊंची मंज़िल कौन-सी है? उस मंज़िल को पाने का पुरूषार्थ क्या है?
उत्तर:- एक बाप की याद पक्की हो जाए, बुद्धि और कोई की तरफ न जाये, यह ऊंची मंज़िल है। इसके लिए आत्म-अभिमानी बनने का पुरूषार्थ करना पड़े। जब तुम आत्म-अभिमानी बन जायेंगे तो सब विकारी ख्यालात खत्म हो जायेंगे। बुद्धि का भटकना बंद हो जायेगा। देह के तरफ बिल्कुल दृष्टि न जाये, यह मंज़िल है इसके लिए आत्म-अभिमानी भव।

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप बैठ समझाते हैं – इनको (ब्रह्मा बाबा को) रूहानी बाप नहीं कहेंगे। आज के दिन को सतगुरूवार कहते हैं, गुरूवार कहना भूल है। सतगुरूवार। गुरू लोग तो बहुत ढेर हैं, सतगुरू एक ही है। बहुत हैं जो अपने को गुरू भी कहते हैं, सतगुरू भी कहते हैं। अभी तुम बच्चे समझते हो – गुरू और सतगुरू में तो फ़र्क है। सत् अर्थात् ट्रूथ। सत्य एक ही निराकार बाप को कहा जाता है, न कि मनुष्य को। सच्चा ज्ञान तो एक ही बार ज्ञान सागर बाप आकर देते हैं। मनुष्य, मनुष्य को कभी सच्चा ज्ञान दे नहीं सकते। सच्चा है ही एक निराकार बाप। इनका नाम तो ब्रह्मा है, यह किसी को ज्ञान दे न सकें। ब्रह्मा में ज्ञान कुछ भी था नहीं। अभी भी कहेंगे इनमें सारा ज्ञान तो है नहीं। सम्पूर्ण ज्ञान तो ज्ञान सागर परमपिता परमात्मा में ही है। अभी ऐसा कोई मनुष्य है नहीं जो अपने को सतगुरू कहला सके। सतगुरू माना सम्पूर्ण सत्य। तुम जब सत बन जायेंगे तो फिर यह शरीर नहीं रहेगा। मनुष्य को कभी सतगुरू कह नहीं सकते। मनुष्यों में तो पाई की भी ताकत नहीं है। यह खुद कहते हैं मैं भी तुम्हारे जैसा मनुष्य हूँ, इसमें ताकत की बात उठ नहीं सकती। यह तो बाप पढ़ाते हैं, न कि ब्रह्मा। यह ब्रह्मा भी उनसे पढ़कर फिर पढ़ाते हैं। तुम ब्रह्माकुमार-कुमारियां कहलाने वाले भी परमपिता परमात्मा सतगुरू से पढ़ते हो। तुमको उनसे ताकत मिलती है। ताकत का मतलब यह नहीं कि कोई को घूंसा मारो जो गिर पड़े। नहीं, यह है रूहानी ताकत जो रूहानी बाप द्वारा मिलती है। याद के बल से तुम शान्ति को पाते हो और पढ़ाई से तुमको सुख मिलता है। जैसे और टीचर्स तुमको पढ़ाते हैं, वैसे बाप भी पढ़ाते हैं। यह भी पढ़ते हैं, स्टूडेन्ट हैं। देहधारी जो भी हैं वे सभी स्टूडेन्ट हैं। बाप को तो देह है नहीं। वह निराकार है, वही आकर पढ़ाते हैं। जैसे और स्टूडेन्ट पढ़ते हैं वैसे तुम भी पढ़ते हो। इसमें मेहनत की बात नहीं। पढ़ने समय हमेशा ब्रह्मचर्य में रहते हैं। ब्रह्मचर्य में पढ़कर जब पूरा करते हैं तब बाद में विकार में गिरते हैं। मनुष्य तो मनुष्य जैसे ही देखने में आते हैं। कहेंगे यह फलाना आदमी है, यह एल. एल. बी. है, यह फलाना आफीसर है। पढ़ाई पर टाइटिल मिल जाता है। शक्ल तो वही है। उस जिस्मानी पढ़ाई को तो तुम जानते हो। साधू-सन्त आदि जो शास्त्र पढ़ते-पढ़ाते हैं, उनमें कोई बड़ाई नहीं, उससे कोई को शान्ति तो मिल नहीं सकती। खुद भी शान्ति के लिए धक्के खाते हैं। जंगल में अगर शान्ति होती तो फिर वापिस क्यों लौटते! मुक्ति को तो कोई पाता नहीं। जो भी अच्छे-अच्छे नामीग्रामी राम कृष्ण परमहंस आदि होकर गये हैं, वह भी सब पुनर्जन्म लेते-लेते नीचे ही आये हैं। मुक्ति-जीवनमुक्ति को कोई भी पाते नहीं। तमोप्रधान बनना ही है। देखने में तो कुछ नहीं आता। कोई से पूछो – तुमको गुरू से क्या मिलता है? तो कहेंगे शान्ति मिलती है। परन्तु मिलता कुछ भी नहीं। शान्ति का अर्थ ही नहीं जानते। अभी तुम बच्चे समझते हो, बाबा ज्ञान का सागर है, और कोई साधू, सन्त, गुरू आदि शान्ति का सागर हो न सकें। मनुष्य किसको सच्ची शान्ति दे नहीं सकते। तुम बच्चों को पहले-पहले तो निश्चय करना है – शान्ति का सागर एक बाप है, जो हमको पढ़ाते हैं। सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है, वह भी बाप ने समझाया है। मनुष्य, मनुष्य को कभी सुख-शान्ति दे नहीं सकते। यह (ब्रह्मा) उनका रथ है। तुम्हारे जैसा स्टूडेन्ट ही है। यह भी गृहस्थ व्यवहार में रहने वाला था। सिर्फ बाप को अपना रथ लोन पर दिया है, सो भी वानप्रस्थ अवस्था में। तुमको समझाने वाला एक बाप है, वह बाप कहते हैं सबको निर्विकारी बनना है। जो खुद नहीं बन सकते तो फिर अनेक प्रकार की बातें करेंगे, गालियां भी देंगे। समझते हैं हमारा जन्म-जन्मान्तर का भोजन जो बाप का वर्सा मिला हुआ है, वह छुड़ाते हैं। अब छुड़ाते तो वह बेहद का बाप है ना। इनको भी उसने छुड़ाया। बच्चों को भी बचाने की कोशिश की, जो निकल सके उनको निकाला। अब तुम बच्चों की बुद्धि में है कि हमको पढ़ाने वाला कोई मनुष्य नहीं है। सर्वशक्तिमान् एक ही निराकार बाप को कहा जाता है, और किसको कहा नहीं जाता। वही तुमको नॉलेज दे रहे हैं। बाप ही तुमको समझाते हैं। यह विकार तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन है, इनको छोड़ो। फिर जो नहीं छोड़ सकते हैं वे कितना झगड़ा करते हैं। मातायें भी कोई-कोई ऐसी निकल पड़ती हैं जो विकार के लिए बड़ा हंगामा करती हैं।

अभी तुम हो संगमयुग पर। यह भी कोई नहीं जानते कि यह पुरूषोत्तम संगमयुग है। बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं। बहुत हैं जिनको पूरा निश्चय है। कोई को सेमी निश्चय है, कोई को 100, प्रतिशत, कोई को 10 प्रतिशत भी है। अब भगवान् श्रीमत देते हैं – बच्चे, मुझे याद करो। यह है बाप का बड़ा फ़रमान। निश्चय हो तब तो उस फ़रमान पर चलें ना। बाप कहते हैं – मेरे मीठे बच्चों तुम अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। इनको याद नहीं करना है। मैं नहीं कहता, बाबा मेरे द्वारा तुमको कहते हैं। जैसे तुम बच्चे पढ़ते हो तो यह भी पढ़ता है। सब स्टूडेन्ट हैं। पढ़ाने वाला एक टीचर है। वह सब मनुष्य पढ़ाते हैं। यहाँ तुमको ईश्वर पढ़ाते हैं। तुम आत्मायें पढ़ती हो। तुम्हारी आत्मा फिर पढ़ाती है। इसमें बहुत आत्म-अभिमानी बनना है। बैरिस्टर-इन्जीनियर आत्मा ही बनती है। आत्मा को अब देह-अभिमान आ गया है। आत्म-अभिमानी के बदले देह-अभिमानी बन पड़े हैं। जब आत्म-अभिमानी हो तब विकारी नहीं कहला सकते। उनको कभी विकारी ख्याल भी नहीं आ सकता। देह-अभिमान से ही विकारी ख्याल आते हैं। फिर विकार की ही दृष्टि से देखते हैं। देवताओं की विकारी दृष्टि कभी हो नहीं सकती। ज्ञान से फिर दृष्टि बदल जाती है। सतयुग में ऐसे थोड़ेही प्यार करेंगे, डांस करेंगे। वहाँ प्यार करेंगे परन्तु विकार की बांस नहीं होगी। जन्म-जन्मान्तर विकार में गये हैं तो वह नशा बहुत मुश्किल उतरता है। बाप निर्विकारी बनाते हैं तो कई बच्चियां बिल्कुल मजबूत हो जाती हैं। बस हमको तो पूरा निर्विकारी बनना है। हम अकेले थे, अकेले ही जाना है। उनको कोई थोड़ा टच करेगा तो अच्छा नहीं लगेगा। कहेंगे यह हमको हाथ क्यों लगाते हैं, इनमें विकारी बांस है। विकारी हमको टच भी न करे। इस मंजिल पर पहुँचना है। देह तरफ बिल्कुल दृष्टि ही न रहे। वह कर्मातीत अवस्था अभी बनानी है। अभी तक ऐसा नहीं है कि सिर्फ आत्मा को ही देखते हैं। मंजिल है। बाप हमेशा कहते रहते हैं – बच्चे, अपने को आत्मा समझो। यह शरीर दुम है, जिसमें तुम पार्ट बजाते हो।

कई कहते हैं इनमें शक्ति है। परन्तु शक्ति की कोई बात ही नहीं। यह तो पढ़ाई है। जैसे और भी पढ़ते हैं, यह भी पढ़ते हैं। प्योरिटी के लिए कितना माथा मारना पड़ता है। बड़ी मेहनत है इसलिए बाप कहते हैं एक-दो को आत्मा ही देखो। सतयुग में भी तुम आत्म-अभिमानी रहते हो। वहाँ तो रावण राज्य ही नहीं, विकार की बात नहीं। यहाँ रावण राज्य में सब विकारी हैं इसलिए बाप आकर निर्विकारी बनाते हैं। नहीं बनेंगे तो सजा खानी पड़ेगी। आत्मा पवित्र बनने बिगर ऊपर जा न सके। हिसाब-किताब चुक्तू करना पड़ता है। फिर भी पद कम हो पड़ता है। यह राजधानी स्थापन हो रही है। बच्चे जानते हैं स्वर्ग में एक आदि सनातन देवी-देवताओं का राज्य था। पहले-पहले तो जरूर एक राजा-रानी होंगे फिर डिनायस्टी होगी। प्रजा ढेर बनती है। उसमें अवस्थाओं में फर्क पड़ेगा, जिनको पूरा निश्चय नहीं वह पूरा पढ़ भी न सकें। पवित्र बन न सके। आधाकल्प के पतित एक जन्म में 21 जन्मों के लिए पावन बनें – मासी का घर है क्या! मुख्य है ही काम की बात। क्रोध आदि का इतना नहीं। कहाँ बुद्धि जाती है तो जरूर बाप को याद नहीं करते हैं। बाप की याद पक्की हो जायेगी तो फिर और कोई की तरफ बुद्धि नहीं जायेगी। बहुत ऊंची मंज़िल है। पवित्रता की बात सुनकर आग में जल मरते हैं। कहते हैं यह बात तो कभी कोई ने कही नहीं। कोई शास्त्र में है नहीं। बड़ा मुश्किल समझते हैं। वह तो है ही निवृत्ति मार्ग का धर्म अलग। उनको तो पुनर्जन्म ले फिर भी सन्यास धर्म में ही जाना है, वही संस्कार ले जाते हैं। तुमको तो घर-बार छोड़ना नहीं है। समझाया जाता है भल घर में रहो उन्हों को भी समझाओ – अब है संगमयुग। पवित्र बनने बिगर सतयुग में देवता बन नहीं सकेंगे। थोड़ा भी ज्ञान सुनते हैं तो वह प्रजा बनती जाती है। प्रजा तो ढेर होती है ना। सतयुग में वजीर भी नहीं होते क्योंकि बाप सम्पूर्ण ज्ञानी बना देते हैं। वजीर आदि चाहिए अज्ञानियों को। इस समय देखो एक-दो को मारते कैसे हैं, दुश्मनी का स्वभाव कितना कड़ा है। अभी तुम समझते हो हम यह पुराना शरीर छोड़, जाकर दूसरा लेते हैं। कोई बड़ी बात है क्या! वह दु:ख से मरते हैं। तुमको सुख से बाप की याद में जाना है। जितना मुझ बाप को याद करेंगे तो और सब भूल जायेंगे। कोई भी याद नहीं रहेगा। परन्तु यह अवस्था तब हो जब पक्का निश्चय हो। निश्चय नहीं तो याद भी ठहर नहीं सकती। नाम मात्र सिर्फ कहते हैं। निश्चय ही नहीं तो याद काहे को करेंगे। सबको एक जैसा निश्चय तो नहीं है ना। माया निश्चय से हटा देती है। जैसे के वैसे बन जाते हैं। पहले-पहले तो निश्चय चाहिए बाप में। संशय रहेगा क्या कि यह बाप नहीं है। बेहद का बाप ही ज्ञान देते हैं। यह तो कहता है मैं सृष्टि के रचयिता और रचना को नहीं जानता था। मेरे को कोई तो सुनायेगा। मैंने 12 गुरू किये, उन सबको छोड़ना पड़ा। गुरू ने तो ज्ञान दिया नहीं। सतगुरू ने अचानक आकर प्रवेश किया। समझा, पता नहीं क्या होना है। गीता में भी है ना, अर्जुन को भी साक्षात्कार कराया। अर्जुन की बात है नहीं, यह तो रथ है ना, यह भी पहले गीता पढ़ता था। बाप ने प्रवेश किया, साक्षात्कार कराया कि यह तो बाप ही ज्ञान देने वाला है, तो उस गीता को छोड़ दिया। बाप है ज्ञान का सागर। हमको तो वही बतायेगा ना। गीता है माई बाप। वह बाप ही है जिसको त्वमेव माताश्च पिता कहते हैं। वह रचना रचते, एडाप्ट करते हैं ना। यह ब्रह्मा भी तुम्हारे जैसा है। बाप कहते हैं इनकी भी जब वानप्रस्थ अवस्था होती है तब मैं प्रवेश करता हूँ। कुमारियां तो हैं ही पवित्र। उनके लिए तो सहज है। शादी के बाद कितने सम्बन्ध बढ़ जाते हैं इसलिए देही-अभिमानी बनने में मेहनत लगती है। वास्तव में आत्मा शरीर से अलग है। परन्तु आधाकल्प देह-अभिमानी रहे हैं। बाप आकर अन्तिम जन्म में देही-अभिमानी बनाते हैं तो मुश्किल भासता है। पुरूषार्थ करते-करते कितने थोड़े पास होते हैं। 8 रत्न निकलते हैं। अपने से पूछो – हमारी लाईन क्लीयर है? एक बाप के सिवाए और कुछ याद तो नहीं आता है? यह अवस्था पिछाड़ी में होगी। आत्म-अभिमानी बनने में बहुत मेहनत है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) ज्ञान से अपनी दृष्टि का परिर्वतन करना है। आत्म-अभिमानी बन विकारी ख्यालात समाप्त करने हैं। किसी भी विकार की बांस न रहे, देह तरफ बिल्कुल दृष्टि न जाये।

2) बेहद का बाप ही हमें पढ़ाते हैं – ऐसा पक्का निश्चय हो तब याद मजबूत होगी। ध्यान रहे, माया निश्चय से जरा भी हिला न दे।

वरदान:- पवित्रता के फाउन्डेशन द्वारा सदा श्रेष्ठ कर्म करने वाली पूज्य आत्मा भव
पवित्रता पूज्य बनाती है। पूज्य वही बनते हैं जो सदा श्रेष्ठ कर्म करते हैं। लेकिन पवित्रता सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं, मन्सा संकल्प में भी किसी के प्रति निगेटिव संकल्प उत्पन्न न हो, बोल भी अयथार्थ न हो, सम्बन्ध-सम्पर्क में भी फ़र्क न हो, सबके साथ अच्छा एक जैसा सम्बन्ध हो। मन्सा-वाचा-कर्मणा किसी में भी पवित्रता खण्डित न हो तब कहेंगे पूज्य आत्मा। मैं परम पूज्य आत्मा हूँ – इस स्मृति से पवित्रता का फाउन्डेशन मजबूत बनाओ।
स्लोगन:- सदा इसी अलौकिक नशे में रहो “वाह रे मैं” तो मन और तन से नेचुरल खुशी की डांस करते रहेंगे।
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