16 december ki murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 16 DECEMBER 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 16 December 2020

Murli Pdf for Print : – 

16-12-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – पापों से हल्का होने के लिए व़फादार, ऑनेस्ट बन अपनी कर्म कहानी बाप को लिखकर दो तो क्षमा हो जायेगी”
प्रश्नः- संगमयुग पर तुम बच्चे कौन-सा बीज नहीं बो सकते हो?
उत्तर:- देह-अभिमान का। इस बीज से सब विकारों के झाड़ निकल पड़ते हैं। इस समय सारी दुनिया में 5 विकारों के झाड़ निकले हुए हैं। सब काम-क्रोध के बीज बोते रहते हैं। तुम्हें बाप का डायरेक्शन है बच्चे योगबल से पावन बनो। यह बीज बोना बन्द करो।
गीत:- तुम्हें पा के हमने जहाँ पा लिया है …….

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत सुना! अभी तो थोड़े हैं, अनेकानेक बच्चे हो जायेंगे। इस समय थोड़े प्रैक्टिकल में बने हो फिर भी इस प्रजापिता ब्रह्मा को जानते तो सब हैं ना। नाम ही है प्रजापिता ब्रह्मा। कितनी ढेर प्रजा है। सब धर्म वाले इनको मानेंगे जरूर। उन द्वारा ही मनुष्य मात्र की रचना हुई है ना। बाबा ने समझाया है लौकिक बाप भी हद के ब्रह्मा हैं क्योंकि उनका भी सिजरा बनता है ना। सरनेम से सिजरा चलता है। वह होते हैं हद के, यह है बेहद का बाप। इनका नाम ही है प्रजापिता। वो लौकिक बाप तो लिमिटेड प्रजा रचते हैं। कोई नहीं भी रचते। यह तो जरूर रचेंगे। ऐसे कोई कहेंगे कि प्रजापिता ब्रह्मा को सन्तान नहीं है? इनकी सन्तान तो सारी दुनिया है। पहले-पहले है ही प्रजापिता ब्रह्मा। मुसलमान भी आदम बीबी जो कहते हैं सो जरूर किसको तो कहते होंगे ना। एडम ईव, आदि देव, आदि देवी यह प्रजापिता ब्रह्मा के लिए ही कहेंगे। जो भी धर्म वाले हैं सब इनको मानेंगे। बरोबर एक है हद का बाप, दूसरा है बेहद का। यह बेहद का बाप है बेहद का सुख देने वाला। तुम पुरूषार्थ भी करते हो बेहद स्वर्ग के सुख के लिए। यहाँ बेहद के बाप से बेहद के सुख का वर्सा पाने आये हो। स्वर्ग में बेहद का सुख, नर्क में बेहद का दु:ख भी कह सकते हैं। दु:ख भी बहुत आने वाले हैं। हाय-हाय करते रहेंगे। बाप ने तुमको सारे विश्व के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाया है। तुम बच्चे सामने बैठे हो और पुरूषार्थ भी करते हो। यह तो मात-पिता दोनों हुए ना। इतने ढेर बच्चे हैं। बेहद के मात-पिता से कभी कोई दुश्मनी रखेंगे नहीं। मात-पिता से कितना सुख मिलता है। गाते भी हैं तुम मात-पिता…. यह तो बच्चे ही समझते हैं। दूसरे धर्म वाले सब फादर को ही बुलाते हैं। मात-पिता नहीं कहेंगे। सिर्फ यहाँ ही गाते हैं तुम मात-पिता हम…… तुम बच्चे जानते हो हम पढ़कर मनुष्य से देवता, कांटे से फूल बन रहे हैं। बाप खिवैया भी है, बागवान भी है। बाकी तुम ब्राह्मण सब अनेक प्रकार के माली हो। मुगल गार्डन का भी माली होता है ना। उनकी पगार भी कितनी अच्छी होती है। माली भी नम्बरवार हैं ना। कोई-कोई माली कितने अच्छे-अच्छे फूल बनाते हैं। फूलों में एक किंग ऑफ फ्लावर भी होता है। सतयुग में किंग क्वीन फ्लावर भी हैं ना। यहाँ भल महाराजा-महारानी हैं परन्तु फ्लावर्स नहीं हैं। पतित बनने से कांटे बन जाते हैं। रास्ते चलते-चलते कांटा लगाकर भाग जाते हैं। अजामिल भी उनको कहा जाता है। सबसे जास्ती भक्ति भी तुम करते हो। वाम मार्ग में गिरने वाले चित्र देखो कैसे-कैसे गन्दे बनाये हुए हैं। देवताओं के ही चित्र दिये हैं। अब वह हैं वाम मार्ग के चित्र। अभी तुम बच्चों ने यह बातें समझ ली हैं। तुम अभी ब्राह्मण बने हो। हम विकारों से बहुत दूर-दूर जाते हैं। ब्राह्मणों में भाई-बहिन के साथ विकार में जाना – यह तो बहुत बड़ा क्रिमिनल एसाल्ट हो जाए। नाम ही खराब हो जाता है, इसलिए छोटेपन से ही कुछ खराब काम किया है तो वह भी बाबा को सुनाते हैं तो आधा माफ हो जाता है। याद तो रहता है ना। फलाने समय यह हमने गंदा काम किया। बाबा को लिखकर देते हैं। जो बहुत व़फादार ऑनेस्ट होते हैं वह बाबा को लिखते हैं – बाबा हमने यह-यह गंदा काम किया। क्षमा करो। बाप कहते हैं क्षमा तो होती नहीं, बाकी सच बताते हो तो वह हल्का हो जायेगा। ऐसे नहीं, भूल जाता है। भूल नहीं सकता। आगे फिर ऐसा कोई काम न हो उसके लिए खबरदार करता हूँ। बाकी दिल खाती जरूर है। कहते हैं बाबा हम तो अजामिल थे। इस जन्म की ही बात है। यह भी अभी तुम जानते हो। कब से वाम मार्ग में आकर पाप आत्मा बने हो? अब बाप फिर हमको पुण्य आत्मा बनाते हैं। पुण्य आत्माओं की दुनिया ही अलग है। भल दुनिया एक ही है परन्तु समझ गये हो कि दो भाग में है। एक है पुण्य आत्माओं की दुनिया जिसको स्वर्ग कहा जाता है। दूसरी है पाप आत्माओं की दुनिया जिसको नर्क दु:खधाम कहा जाता है। सुख की दुनिया और दु:ख की दुनिया। दु:ख की दुनिया में सब चिल्लाते रहते हैं हमको लिबरेट करो, अपने घर ले जाओ। यह भी बच्चे समझते हैं कि घर में जाकर बैठना नहीं है, फिर पार्ट बजाने आना है। इस समय सारी दुनिया पतित है। अभी बाप द्वारा तुम पावन बन रहे हो। एम ऑब्जेक्ट सामने खड़ी है। और कोई भी यह एम ऑब्जेक्ट नहीं दिखायेंगे कि हम यह बन रहे हैं। बाप कहते हैं बच्चे तुम यह थे, अब नहीं हो। पूज्य थे अब पुजारी बन गये हो फिर पूज्य बनने के लिए पुरूषार्थ चाहिए। बाप कितना अच्छा पुरूषार्थ कराते हैं। यह बाबा समझते हैं ना हम प्रिन्स बनूँगा। नम्बरवन में है यह, फिर भी हर वक्त याद नहीं ठहरती है। भूल जाते हैं। कितना भी कोई मेहनत करे परन्तु अभी वह अवस्था होगी नहीं। कर्मातीत अवस्था तब होगी जब लड़ाई का समय होगा। पुरूषार्थ तो सबको करना है ना। इनको भी करना है। तुम समझाते भी हो चित्र में देखो बाबा का चित्र कहाँ है? एकदम झाड़ के पिछाड़ी में खड़ा है, पतित दुनिया में और नीचे में फिर तपस्या कर रहे हैं। कितना सहज समझाया जाता है। यह सब बातें बाप ने ही समझाई हैं। यह भी नहीं जानते थे। बाप ही नॉलेजफुल है, उसको ही सब याद करते हैं – हे परमपिता परमात्मा आकर हमारे दु:ख हरो। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर तो देवतायें हैं। मूलवतन में रहने वाली आत्माओं को देवता थोड़ेही कहा जाता है। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर का भी राज़ बाप ने समझाया है। ब्रह्मा, लक्ष्मी-नारायण यह तो सब यहाँ ही हैं ना। सूक्ष्मवतन का सिर्फ तुम बच्चों को अभी साक्षात्कार होता है। यह बाबा भी फरिश्ता बन जाते हैं। यह तो बच्चे जानते हैं जो सीढ़ी के ऊपर में खड़ा है वही फिर नीचे तपस्या कर रहे हैं। चित्र में बिल्कुल क्लीयर दिखाया है। वह अपने को भगवान कहाँ कहलाते हैं। यह तो कहते हैं हम वर्थ नाट ए पेनी थे, ततत्वम्। अभी वर्थ पाउण्ड बन रहे हो ततत्वम्। कितनी सहज समझने की बातें हैं। कभी कोई बोले तो कहो देखो यह तो कलियुग के अन्त में खड़ा है ना। बाप कहते हैं जब जड़जड़ीभूत अवस्था, वानप्रस्थ होती है तब मैं इनमें प्रवेश करता हूँ। अभी राजयोग की तपस्या कर रहे हैं। तपस्या करने वाले को देवता कैसे कहेंगे? राजयोग सीखकर यह बनेंगे। तुम बच्चों को भी ऐसा ताज वाला बनाते हैं ना। यह सो देवता बनते हैं। ऐसे तो 10-20 बच्चों के चित्र भी रख सकते हैं। दिखलाने के लिए कि यह बनते हैं। आगे सबके ऐसे फोटो निकले हुए हैं। यह समझाने की बात है ना। एक तरफ साधारण, दूसरे तरफ डबल सिरताज। तुम समझते हो हम यह बन रहे हैं। बनेंगे वह जिनकी लाइन क्लीयर होगी और बहुत मीठा भी बनना है। इस समय मनुष्यों में काम-क्रोध आदि का बीज कितना हो गया है। सबमें 5 विकार रूपी बीज के झाड़ निकल पड़े हैं। अभी बाप कहते हैं ऐसा बीज नहीं बोना है। संगमयुग पर तुमको देह-अभिमान का बीज नहीं बोना है। काम का बीज नहीं बोना है। आधाकल्प के लिए फिर रावण ही नहीं रहेगा। हर एक बात बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। मुख्य तो एक ही बात है मनमनाभव। बाप कहते हैं मुझे याद करो। सबसे पिछाड़ी में यह है, फिर सबसे पहले भी यह है। योगबल से कितना पावन बनते हैं। शुरू में तो बच्चों को बहुत साक्षात्कार होते थे। भक्ति मार्ग में जब नौधा भक्ति करते हैं तब साक्षात्कार होता है। यहाँ तो यह बैठे-बैठे ध्यान में चले जाते थे, इसको जादू समझते थे। यह तो फर्स्टक्लास जादू है। मीरा ने तो बहुत तपस्या की, साधू-सन्त आदि का संग किया। यहाँ साधू आदि कहाँ हैं। यह तो बाप है ना। सबका बाप है शिवबाबा। कहते हैं गुरू जी से मिलें। यहाँ तो गुरू है नहीं। शिवबाबा तो है निराकार फिर किससे मिलना चाहते हो? उन गुरूओं के पास तो जाकर भेंटा रखते हैं। यह तो बाप बेहद का मालिक है। यहाँ भेंटा आदि चढ़ाने की बात नहीं। यह पैसा क्या करेंगे? यह ब्रह्मा भी समझते हैं हम विश्व का मालिक बनते हैं। बच्चे जो कुछ पैसा आदि देते हैं तो उन्हों के लिए ही मकान आदि बना देते हैं। पैसे तो न शिवबाबा के काम के हैं, न ब्रह्मा बाबा के काम के हैं। यह मकान आदि बनाया ही है बच्चों के लिए, बच्चे ही आकर रहते हैं। कोई गरीब हैं, कोई साहूकार हैं, कोई तो दो रूपये भी भेज देते हैं – बाबा हमारी एक ईट लगा दो। कोई हजार भेज देते हैं। भावना तो दोनों की एक है ना। तो दोनों का इक्वल बन जाता है। फिर बच्चे आते हैं जहाँ चाहें रहें। जिसने मकान बनवाया है वह अगर आते हैं तो उनको जरूर सुख से रहायेंगे। कई फिर कह देते बाबा के पास भी खातिरी होती है। अरे वह तो जरूर करनी पड़ेगी ना। कोई कैसे हैं, कोई तो कहाँ भी बैठ जाते हैं। कोई बहुत नाज़ुक होते हैं, विलायत में रहने वाले, बड़े-बड़े महलों में रहने वाले होते हैं, हर एक नेशन में बड़े-बड़े साहूकार निकलते हैं तो मकान आदि ऐसे बनाते हैं। यहाँ तो देखो कितने ढेर बच्चे आते हैं। और किसी बाप को ऐसे ख्यालात थोड़ेही होंगे। करके 10-12-20 पोत्रे-पोत्रियाँ हों। अच्छा, किसको 200-500 भी हों इनसे जास्ती तो नहीं होंगे। इस बाबा की फैमिली तो कितनी बड़ी है, और ही वृद्धि को पानी है। यह तो राजधानी स्थापन हो रही है। बाप की फैमिली कितनी बनेंगी। फिर प्रजापिता ब्रह्मा की फैमिली कितनी हो गई। कल्प-कल्प जब आते हैं तब ही वन्डरफुल बातें तुम्हारे कानों में पड़ती है। बाप के लिए ही कहते हो ना – हे प्रभु तुम्हारी गति-मत सबसे न्यारी शुरू होती है। भक्ति और ज्ञान में फ़र्क देखो कितना है।

बाप तुमको समझाते हैं – स्वर्ग में जाना है तो दैवीगुण भी धारण करने चाहिए। अभी तो कांटे हैं ना। गाते रहते हैं मैं निर्गुण हारे में कोई गुण नाही। बाकी 5 विकारों के अवगुण हैं, रावण राज्य है। अभी तुमको कितनी अच्छी नॉलेज मिलती है। वह नॉलेज इतनी खुशी नहीं देती है, जितनी यह। तुम जानते हो हम आत्मायें ऊपर मूलवतन में रहने वाली हैं। सूक्ष्मवतन में ब्रह्मा-विष्णु-शंकर, वह भी सिर्फ साक्षात्कार होता है। ब्रह्मा भी यहाँ, लक्ष्मी-नारायण भी यहाँ के हैं। यह सिर्फ साक्षात्कार होता है। व्यक्त ब्रह्मा सो फिर सूक्ष्मवतनवासी ब्रह्मा फरिश्ता कैसे बन जाते हैं, वह निशानी है। बाकी है कुछ नहीं। अभी तुम बच्चे सब बातें समझते जाते हो, धारणा करते जाते हो। नई बात नहीं है। तुम अनेक बार देवता बने हो, डीटी राज्य था ना। यह चक्र फिरता रहता है। वह विनाशी ड्रामा होता है, यह है अनादि अविनाशी ड्रामा। यह तुम्हारे सिवाए और कोई की बुद्धि में नहीं है। यह सब बाप बैठ समझाते हैं। ऐसे नहीं कि परम्परा से चला आया है। बाप कहते हैं यह ज्ञान अभी तुमको सुनाते हैं। फिर यह प्राय: लोप हो जाता है। तुम राजाई पद प्राप्त कर लेते हो फिर सतयुग में यह नॉलेज होती नहीं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सदा स्मृति रहे कि हम अभी ब्राह्मण हैं इसलिए विकारों से बहुत-बहुत दूर रहना है। कभी भी क्रिमिनल एसाल्ट न हो। बाप से बहुत-बहुत ऑनेस्ट, वफादार रहना है।

2) डबल सिरताज देवता बनने के लिए बहुत मीठा बनना है, लाइन क्लीयर रखनी है। राजयोग की तपस्या करनी है।

वरदान:- ईश्वरीय नशे द्वारा पुरानी दुनिया को भूलने वाले सर्व प्राप्ति सम्पन्न भव
जैसे वह नशा सब कुछ भुला देता है, ऐसे यह ईश्वरीय नशा दुखों की दुनिया को सहज ही भुला देता है। उस नशे में तो बहुत नुकसान होता है, अधिक पीने से खत्म हो जाते हैं लेकिन यह नशा अविनाशी बना देता है। जो सदा ईश्वरीय नशे में मस्त रहते हैं वह सर्व प्राप्ति सम्पन्न बन जाते हैं। एक बाप दूसरा न कोई – यह स्मृति ही नशा चढ़ाती है। इसी स्मृति से समर्थी आ जाती है।
स्लोगन:- एक दो को कॉपी करने के बजाए बाप को कॉपी करो।

TODAY MURLI 16 DECEMBER 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 16 December 2020

16/12/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, in order to lighten your burden of sins, be faithful and honest in writing the history of your past actions give it to the Father and you will then be forgiven.
Question: Which seed can you children not sow at the confluence age?
Answer: The seed of body consciousness. It is from this seed that the whole tree of vices grows. At present, the tree of these five vices has grown over the whole world. Everyone continues to sow the seeds of lust and anger. The Father’s directionto you are: Children, become pure through the power of yoga. Stop sowing that seed.
Song: Having attained You, we have attained the world!

Om shanti. You sweetest, spiritual children heard the song. At present, there are few of you. Soon, there will be very many children. Even though there are now only a few of you who have become children of Prajapita Brahma practically, everyone knows of him. He is called Brahma, the Father of People. There are so many people. People of all religions will definitely accept him. It was through him that humans were created. Baba has explained that physical fathers are also limited Brahmas, because genealogical trees are formed through those too. A genealogical tree continues, based on the surname. Those are limited fathers; this one (Brahma) is an unlimited father. This one’s name is Prajapita. Physical fathers create limited families. Some do not even create a family. This one definitely creates one. Is there anyone who would say that Prajapita Brahma doesn’t have children? People of the whole world are his children. Prajapita Brahma is the foremost one. Even Muslims remember Adam and Bibi, so they must surely be referring to some persons. When they speak of Adam and Eve, Adi Dev and Adi Devi, they are referring to Prajapita Brahma. All religions will believe in him. Truly, there is a limited father and the other is the unlimited Father. That unlimited Father is the One who gives unlimited happiness. You are making effort to attain the unlimited happiness of heaven. You have come here to attain your inheritance of unlimited happiness from the unlimited Father. It can also be said that there is unlimited happiness in heaven and that there is unlimited sorrow in hell. A lot of sorrow is to come. There will be cries of distress. The Father has explained to you the secrets of the beginning, the middle and the end of the whole world. You children are personally sitting in front of Him and are also making effort. He is both the Mother and the Father. There are so many children! No one has enmity for the unlimited Mother and Father. You receive so much happiness from the Mother and Father. People sing: You are the Mother and Father…. This aspect can only be understood by the children. People of other religions only call out to the Father; they do not speak of the “Mother and Father”. It is only here that you sing “You are the Mother and the Father”. You children understand that, by studying, we are changing from ordinary humans into deities, from thorns into flowers. The Father is the Boatman as well as the Gardener. You Brahmins are all different types of gardener. There is also a gardener for the Mughal Gardens. His salary is very good. Gardeners too are numberwise. Some gardeners grow such beautiful flowers. Among flowers there is a king of flowers. In the golden age there are king and queen flowers. Although there are emperors and empresses now, they are not like flowers. By becoming impure they become thorns. While moving along, they prick you like thorns and run away. They are called Ajamil. You perform the most devotion. Look how they have created dirty images of degradation on the path of sin! They portray images of the deities, but they are images of the path of sin. You children now understand these aspects. You have now become Brahmins. We go very far, far away from the vices. Among Brahmins, it is a very big criminal assault for a brother and sister to indulge in vice. Their name is spoilt. This is why Baba says: Tell Baba all the dirty acts you have performed from childhood and half will then be forgiven. You do remember at what times you performed dirty acts, do you not? Write them down and give it to Baba. Those who are very faithful and honest will write: “Baba, I performed these bad acts. Please forgive me!” The Father says: You cannot be forgiven! However, because you have told the truth, your burden will be lightened. It is not that you can forget about them; you cannot forget them. You are warned not to perform any such acts in the future. However, your conscience definitely bites. They say: Baba, we were like Ajamil. This refers to the present birth. You also know when you went on to the path of sin and became sinful souls. The Father now makes us into charitable souls. The world of charitable souls is separate. Even though there is only one world, you understand that it is divided into two. One is the world of charitable souls which is called heaven, and the other is the world of sinful souls which is called the land of sorrow or hell. There is the world of happiness and there is the world of sorrow. In the land of sorrow, everyone calls out to be liberated and to be taken home. You children also understand that you are not going to go and sit at home, but that you have to come down and play your parts again. At present, the whole world is impure. You are now being made pure by the Father. The aim and objective is in front of you. No one else has this aim and objective: We are becoming this. The Father says: Children, you were this. Now you are not. You were worthy of worship and have now become worshippers. Effort is required in order to become worthy of worship again. The Father inspires you to make such good effort. This Baba understands that he will become a prince. This one is number one, yet he is not able to remain in constant remembrance; he forgets. No matter how much effort someone makes, he will not be able to reach that stage at present. The karmateet stage will be achieved when it is time for the war. Everyone has to make effort. This one also has to make effort. Ask them: Where is Baba positioned in the picture? He is standing right at the top of the tree in the impure world and he is also doing tapasya at the bottom of the tree. It is explained in such a simple way. All of these aspects have been explained by the Father. We did not know these things. The Father is knowledgefull. He is the One whom everyone remembers. They say: O Supreme Father, Supreme Soul, come and liberate us from sorrow! Brahma, Vishnu and Shankar are deities. The souls who reside in the incorporeal world are not called deities. The Father has explained the secret of Brahma, Vishnu and Shankar. Brahma, Lakshmi and Narayan all exist here. Only you children have visions of the subtle region now. This Baba also becomes an angel. The children know that the one who is standing at the top of the ladder is also the one who is doing tapasya at the bottom; this is shown very clearly in the picture. He does not call himself God. He says: I was not worth a penny and the same applies to you. I am now becoming worth a pound and the same applies to you. These things are very easy to understand. If someone objects, tell him that he is standing at the end of iron age. The Father says: When this one has reached the stage of decay in his age of retirement, I enter him. He is now doing the tapasya of Raj Yoga. How can you call someone a deity when he is doing tapasya? It is after studying Raj Yoga that he becomes that. You children are also being made into those who wear crowns; you are becoming deities. You can print pictures of 10 to 20 children to show that you all become that. Earlier, each one had a photo taken like that. This aspect has to be explained. On one side, they are simple and on the other side, they are double crowned. You understand that you are becoming that. Only those whose lineare clear will become that. You also have to become very sweet. At present, the seeds of lust and anger have increased so much in human beings. The tree of the five vices has emerged in all of them. The Father says: Do not sow such seeds now! You should not sow the seed of any body-consciousness at the confluence age. You mustn’t sow the seed of lust. Ravan will not exist for half the cycle. The Father sits here and explains every aspect to the children. The main thing is: “Manmanabhav!” The Father says: Remember Me! This one is right at the back and he is also right at the front. You become very pure through the power of yoga. In the beginning, some of you children used to have many visions. On the path of devotion, someone receives a vision after performing intense devotion. Here, you just used to sit and easily go into trance. It was considered to be magic; it was first-class magic. Meera did a lot of tapasya and spent her time in the company of sages and holy men. There are no holy men here. This one is the Father. Shiv Baba is Father of all. People ask to meet the guru. However, there is no guru here. Shiv Baba is the incorporeal, so whom do they want to meet? They offer gifts to those gurus. This Father is the Master of the unlimited. There is no question of offering Him anything. What would He do with money? Brahma understands that he is going to be the master of the world. Whatever money etc. children give, it is used to make buildings etc. for them. Money is of no use to Shiv Baba or to Brahma Baba. These buildings etc. have been made for the children to come and stay in. Some children are poor, some are rich and some even send two rupees and tell Baba: Baba put a brick in my name. Some send a thousand rupees. The intention of both is the same. Therefore, it becomes equal for both of them. Children can then come and stay wherever they like. Someone who had the building made is offered greater hospitality when he comes. Some then say: Baba favours them. Of course, they definitely have to be offered this. There are all types. Some will stay anywhere. Others are very delicate. Foreigners stay in very big mansions. Many wealthy people emerge in every nation. Therefore, such buildings have to be built for them. Look how so many children come here! No other father would have such thoughts. At the most, someone may have 10, 12 or 20 grandchildren. Achcha, someone could even have 200 to 500, but no one would have more than that. This family of Baba is so large and it will grow even larger. The kingdom is being established. How large the Father’sfamily is and how large the family of Prajapita Brahma is! Only when He comes each cycle do you hear these wonderfulthings. It is said of the Father: O Prabhu! Your ways and means are unique. This refers to now. Look at the difference between devotion and knowledge. The Father explains to you: If you want to go to heaven, imbibe divine virtues. You are now like thorns. They continue to sing: I am without virtue. However, there are the defects of the five vices in the kingdom of Ravan. You now receive such good knowledge! That knowledge does not give you as much happiness as this knowledge. You understand that we souls reside above in the incorporeal world. Brahma, Vishnu and Shankar are in the subtle region. That is also just for the purpose of visions. Brahma is here and so are Lakshmi and Narayan. There is just a vision of them. That symbolizes how corporeal Brahma becomes the angel, the Brahma of the subtle region. Otherwise, there is nothing like that. You children now continue to understand and imbibe everything. These aspects are not new. You have become deities many times. There used to be the deity kingdom. This cycle continues to turn. Those dramas are perishable, whereas this is an eternal and imperishable drama. This is not in anyone’s intellect except yours. The Father sits here and explains all of this to you. It isn’t that it has continued from time immemorial. The Father says: I am now giving you this knowledge and it will then disappear. When you have attained your royal status in the golden age, this knowledge will not exist. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Always have the awareness that you are now Brahmins. Therefore, stay very far away from the vices. Never let there be criminal assault. Remain very honest and faithful to the Father.
  2. In order to become double-crowned kings, become very sweet and keep the line of your intellects clear. Do the tapasya of Raj Yoga.
Blessing: May you forget the old world by having Godly intoxication and become filled with all attainments.
Just as the other intoxication makes you forget everything, in the same way, Godly intoxication makes you easily forget the world of sorrow. That intoxication causes a lot of damage and you can even kill yourself by drinking too much whereas this intoxication makes you imperishable. Those who remain constantly intoxicated with Godly intoxication become filled with all attainments. The awareness of belonging to one Father and none other increases your intoxication. Your power is increased with this awareness.
Slogan: Instead of copying one another, copy the Father.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 16 DECEMBER 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 16 December 2019

16/12/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, in order to have unlimited happiness and intoxication, renounce the illness of body consciousness. Have loving intellects and reform your behaviour.
Question: Which children cannot have any wrong intoxication of knowledge?
Answer: Those who accurately know and remember the Father, those who praise the Father from their hearts and pay full attention to this study are the children who can never have any wrong type of intoxication of knowledge. Those who consider the Father to be ordinary are unable to remember Him. If they remembered Him, they would definitely write to Him and give Him news of themselves. When a child doesn’t write to Baba and give Him news, the Father wonders whether that child has become unconscious.

Om shanti. The Father sits here and explains: Children, when a new person comes, first of all, give him the introduction of the two fathers, the limited and the unlimited. The unlimited Father means the Father of unlimited souls. Each human soul has a separate, limited father. Not everyone will imbibe this knowledge to the same extent. Some only imbibe 1% of it, whereas others imbibe 95% of it; it is all a matter of understanding. There will be the sun and moon dynasties. There will be the king, the queen and the subjects. There will be all kinds of people as subjects. Subjects means subjects! The Father explains that this is a study that each of you studies according to your intellect. Each of you has received your own part to play. To whatever extent you imbibed this knowledge in the previous cycle, to that extent you will imbibe it now. However much anyone studies cannot remain hidden; you receive a status according to how much you study. The Father has explained that you will have to take an exam later on. You cannot get transferred without taking an exam. You will come to know everything at the end, but you can understand even now what status you are worthy of receiving. Although you all raise your hands out of embarrassment, each of you can understand whether you could possibly become that! Nevertheless, some of you raise your hands. This is called ignorance. The Father very quickly understands that worldly students have more sense than you do. They know when they’re unworthy of receiving a scholarship, that they won’t pass. They’re able to understand how many marks they will receive in whatever subject the teacher teaches them. They wouldn’t say that they will pass with honours. Here, some of you children don’t even have this much sense. You have a great deal of body consciousness. You have come here to become like them (the deities). Therefore, your behaviour also has to be like theirs. The Father says: There are those whose intellects have no love for the Father at the time of destruction because they do not love the Father accurately. The Father has explained to you children the accurate meaning of having an intellect that has no love at the time of destruction. If even you children are unable to understand this fully, what would others understand? To remember the Father is an incognito matter, but how much you study is not incognito. All of you are numberwise in studying; you do not all study to the same extent. Baba understands that some of you are still babies. Sometimes, you don’t even remember such an unlimited Father for three or four months. How could Baba know that you are remembering Him if you don’t even write a letter to the Father telling Him how you are progressing and what service you are doing? The Father has so much concern for you children! He wonders: Has that child become unconscious? Has that child died? Some write wonderful service news to Baba, in which case the Father understands that those children are still alive. Serviceable children can never remain hidden. The Father wins the heart of each one of you children. He knows what each of you is like. The illness of body consciousness is very severe. Baba explains in the murli that some have the wrong intoxication of knowledge; they have arrogance. Such children neither remember Baba nor even write Him a letter. How can the Father then remember you? Remembrance attracts remembrance. You children now remember the Father whilst knowing Him accurately. You sing His praise from your hearts. Some of you children consider the Father to be ordinary and so you don’t remember Him. Baba doesn’t display any great pomp etc. God speaks: I teach you Raj Yoga in order for you to attain the sovereignty of the world. However, you don’t seem to realise that you are studying with the unlimited Father in order to claim the sovereignty of the world. If you had this intoxication, your mercury of unlimited happiness would always remain high. Those who study the Gita say that Shri Krishna spoke the words: “I teach you Raj Yoga”, but they wouldn’t have the happiness of attaining a kingdom. When they finish studying the Gita, they go off to their business. It is now in your intellects that the unlimited Father is teaching you. This would not enter their intellects. Therefore, you must first of all give the introduction of the two fathers to anyone who comes. Tell them: Bharat was once heaven, but it is now hell. This is now the iron age. It would hardly be called heaven! You can’t claim to be in both the golden age and the iron age at the same time. When someone receives sorrow, he would say that he is in hell whereas when someone experiences happiness, he would say that he is in heaven. There are many who say this. Those who experience a lot of sorrow are in hell, whereas we now experience a lot of happiness. Because some people have palaces and motors etc., they think that they’re in heaven and that, whether it is the golden age or the iron age, it’s all the same to them. Therefore, you first of all have to make the aspect of the two fathers sit in their intellects. The Father, Himself, gives you His own introduction. How could He be omnipresent? Would you call your physical father omnipresent? They can see in the pictures you show them that the form of a soul and the form of the Supreme Soul are identical; there’s no difference between them. A soul is no larger or smaller than the Supreme Soul. Each one is a soul; He too is a soul. He constantly resides in the supreme abode and so He is called the Supreme Soul. I do not come into this world like all other souls do. I just come at the end and enter this body. Although these things are very easy to understand, outsiders can’t understand them. The only difference is that they have replaced the name of the Father with the name of Krishna, the resident of Vaikunth (Paradise). How could Krishna come from Vaikunth, heaven, into hell and teach you Raj Yoga? How could Krishna say, “Forget your body, including your bodily relations, and remember me alone!” How could your sins be cut away by having remembrance of a bodily being? Krishna was just a small child! Just look at the contrast between him and Myself when I enter the old body of an ordinary human being. There is so much difference! Due to this one mistake, every human being has become impure and poverty-stricken! Neither am I omnipresent nor is Krishna omnipresent. A soul is omnipresent in each body! I do not even have a body of My own. Each soul has his own body. Each body is given a different name. Neither do I have a body nor is a bodily name given to Me. I take this old body and change his name to Brahma. Brahma is not My name. I am eternally Shiva. I alone am the Bestower of Salvation for All. It is not souls that are called the Bestower of Salvation for All. Does the Supreme Soul ever become degraded? Only souls become degraded and only souls receive salvation from the Father. You must churn the ocean of knowledge and think about all of these things. Otherwise, how would you be able to explain them to others? However, Maya is so powerful that she doesn’t let the intellects of you children progress. Some of youwaste time gossiping throughout the day. In order to pull you away from the Father, Maya exerts great force on you. Some children break away. Because they don’t remember the Father, their stage doesn’t become unshakeable and immovable. The Father makes you get up again and again, and then Maya continues to knock you down. The Father says: You must never be defeated. This match happens every cycle; it is nothing new. You will definitely become conquerors of Maya by the end. Ravan’s kingdom has to end and we will then rule the new world. We have become conquerors of Maya every cycle. We have ruled the new world countless times. The Father says: Keep your intellects constantly busy and you will remain constantly safe. This is what is known as being a spinner of the discus of self-realisation. There is no question of violence in this. Only you Brahmins can be called spinners of the discus of self-realisation. Deities cannot be called spinners of the discus of self-realisation. There is a great difference between the customs and systems of the impure world and those of the deities. It is the residents of the land of death who call out to the Purifier Father: Come and purify us impure ones! Take us to the pure world! It is in your intellects that, 5000 years before today, there used to be the pure, new world which was called the golden age. The silver age wouldn’t be called the new world. The Father has explained that that is firstclass and the other is secondclass. You should imbibe every aspect very well, so that anyone who comes and listens to you becomes amazed. There are many who become amazed, but they do not have the time to make effort because they have heard that they definitely have to remain pure. It is the vice of lust that makes human beings impure. By conquering it, you become conquerors of the world. However, it is as though vice is a treasure for them and this is why they don’t even speak of it! They simply say that you must control your mind. Only when your mind is not in a body can it become free from thoughts. Your mind can not become free from thoughts otherwise. You receive a body in order to acts. Therefore, how could you stay in the karmateet stage? The karmateet stage is said to be the stage of a corpse. To be a living corpse means to become detached from your body. The Father is teaching you to study becoming detached from your bodies. You souls are distinct from your bodies. You souls are residents of the supreme abode. When you souls enter bodies, you are called human beings. Each of you receives a body in order to act. You leave one body and take another in order to carry on acting. Only when souls are not in bodies can they experience peace. Neither are actions performed in the incorporeal world, nor is there any question of actions in the subtle region; the world cycle only turns here. Knowledge means to know the Father and the world cycle. There is no one with a white costume or beautifully decorated costume in the subtle region, nor is there Shankar, adorned with a snake etc. The Father continues to explain to you the secrets of Brahma and Vishnu. Brahma exists here and the dual form of Vishnu is also here. That is just part of the drama for giving visions which you can only see with divine vision. You cannot see anything pure with those criminal eyes. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. In order to keep yourself constantly safe, you must keep your intellect busy churning the ocean of knowledge. Become a spinner of the discus of self-realisation. Do not waste your time gossiping.
  2. Study the study that the Father teaches you of becoming detached from your body. In order to be saved from Maya’s force, make your stage unshakeable and immovable.
Blessing: May you have the fortune of happiness eternally and have constantly zeal and enthusiasm by singing songs of happiness in your mind.
You fortunate children claim imperishable success by using eternal methods. Your minds constantly sing songs of “Wah, Wah! Wah Baba! Wah fortune! Wah the sweet family! Wah, the most elevated beautiful time of the confluence age!” Every act is “Wah Wah” (wonderful) and this is why you have the eternal fortune of happiness. You can never have “Why?” or “I” in your mind. Instead of “Why?” you say “Wah, Wah” and instead of “I”, you say, “Baba, Baba”.
Slogan: Put your imperishable stamp of government over whatever thoughts you have and they will remain firm.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 16 DECEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 16 December 2019

16-12-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – अपार खुशी व नशे में रहने के लिए देह-अभिमान की बीमारी छोड़ प्रीत बुद्धि बनो, अपनी चलन सुधारो”
प्रश्नः- किन बच्चों को ज्ञान का उल्टा नशा नहीं चढ़ सकता है?
उत्तर:- जो बाप को यथार्थ जानकर याद करते हैं, दिल से बाप की महिमा करते हैं, जिनका पढ़ाई पर पूरा ध्यान है उन्हें ज्ञान का उल्टा नशा नहीं चढ़ सकता। जो बाप को साधारण समझते हैं वे बाप को याद कर नहीं सकते। याद करें तो अपना समाचार भी बाप को अवश्य दें। बच्चे अपना समाचार नहीं देते तो बाप को ख्याल चलता कि बच्चा कहाँ मूर्छित तो नहीं हो गया?

ओम् शान्ति। बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं-बच्चे, जब कोई नया आता है तो उनको पहले हद और बेहद, दो बाप का परिचय दो। बेहद का बाबा माना बेहद की आत्माओं का बाप। वह हद का बाप, हरेक जीव आत्मा का अलग है। यह नॉलेज भी सभी एकरस धारण नहीं कर सकते। कोई एक परसेन्ट, कोई 95 परसेन्ट धारण करते हैं। यह तो समझ की बात है, सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी घराना होगा ना। राजा, रानी तथा प्रजा। प्रजा में सभी प्रकार के मनुष्य होते हैं। प्रजा माना ही प्रजा। बाप समझाते हैं यह पढ़ाई है, हर एक अपनी बुद्धि अनुसार ही पढ़ते हैं। हर एक को अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है। जिसने कल्प पहले जितनी पढ़ाई धारण की है, उतनी अभी भी करते हैं। पढ़ाई कभी छिपी नहीं रह सकती है। पढ़ाई अनुसार पद भी मिलता है। बाप ने समझाया है, आगे चल इम्तहान होगा। बिगर इम्तहान के ट्रांसफर हो न सकें। तो पिछाड़ी में सब मालूम पड़ेगा। परन्तु अभी भी समझ सकते हो हम किस पद के लायक हैं? भल लज्जा के मारे सभी हाथ उठा लेते हैं परन्तु समझ सकते हैं, ऐसे हम कैसे बन सकते हैं! फिर भी हाथ उठा देते हैं। यह भी अज्ञान ही कहेंगे। बाप तो झट समझ जाते हैं कि इससे तो जास्ती अक्ल लौकिक स्टूडेन्ट में होता है। वह समझते हैं हम स्कॉलरशिप लेने लायक नहीं हैं, पास नहीं होंगे। वह समझते हैं, टीचर जो पढ़ाते हैं उसमें हम कितने मार्क्स लेंगे? ऐसे थोड़ेही कहेंगे कि हम पास विद् ऑनर होंगे। यहाँ तो कई बच्चों में इतनी भी अक्ल नहीं है, देह-अभिमान बहुत है। भल आये हैं यह (देवता) बनने के लिए परन्तु ऐसी चलन भी तो चाहिए। बाप कहते हैं विनाश काले विपरीत बुद्धि क्योंकि कायदेसिर बाप से प्रीत नहीं है।

बाप तुम बच्चों को समझाते हैं कि विनाश काले विपरीत बुद्धि का यथार्थ अर्थ क्या है? बच्चे ही पूरा नहीं समझ सकते हैं तो फिर वह क्या समझेंगे? बाप को याद करना-यह तो हुई गुप्त बात। पढ़ाई तो गुप्त नहीं है ना। पढ़ाई में नम्बरवार होते हैं। एक जैसा थोड़ेही पढ़ेंगे। बाबा समझते हैं अभी तो बेबी हैं। ऐसे बेहद के बाप को तीन-तीन, चार-चार मास याद भी नहीं करते हैं। मालूम कैसे पड़े कि याद करते हैं? बाप को पत्र तक नहीं लिखते कि बाबा मैं कैसे-कैसे चल रहा हूँ, क्या-क्या सर्विस करता हूँ? बाप को बच्चों की कितनी फा रहती है कि कहाँ बच्चा मूर्छित तो नहीं हो गया है, कहाँ बच्चा मर तो नहीं गया? कोई तो बाबा को कितना अच्छा-अच्छा सर्विस समाचार लिखते हैं। बाप भी समझते, बच्चा जीता है। सर्विस करने वाले बच्चे कभी छिप नहीं सकते। बाप तो हर बच्चे का दिल लेते हैं कि कौन-सा बच्चा कैसा है? देह-अभिमान की बीमारी बहुत कड़ी है। बाबा मुरली में समझाते हैं, कइयों को तो ज्ञान का उल्टा नशा चढ़ जाता है, अहंकार आ जाता है फिर याद भी नहीं करते, पत्र भी नहीं लिखते। तो बाप भी याद कैसे करेंगे? याद से याद मिलती है। अभी तुम बच्चे बाप को यथार्थ जानकर याद करते हो, दिल से महिमा करते हो। कई बच्चे बाप को साधारण समझते हैं इसलिए याद नहीं करते। बाबा कोई भभका आदि थोड़ेही दिखायेगा। भगवानुवाच, मैं तुम्हें विश्व की राजाई देने के लिए राजयोग सिखलाता हूँ। तुम ऐसे थोड़ेही समझते हो कि हम विश्व की बादशाही लेने के लिए बेहद के बाप से पढ़ते हैं। यह नशा हो तो अपार खुशी का पारा सदा चढ़ा रहे। गीता पढ़ने वाले भल कहते हैं-श्रीकृष्ण भगवानुवाच, मैं राजयोग सिखलाता हूँ, बस। उन्हें राजाई पाने की खुशी थोड़ेही रहेगी। गीता पढ़कर पूरी की और गये अपने-अपने धन्धेधोरी में। तुमको तो अभी बुद्धि में है कि हमको बेहद का बाप पढ़ाते हैं। उन्हें ऐसा बुद्धि में नहीं आयेगा। तो पहले-पहले कोई भी आये तो उनको दो बाप का परिचय देना है। बोलो भारत स्वर्ग था, अभी नर्क है। यह कलियुग है, इसे स्वर्ग थोड़ेही कहेंगे। ऐसे तो नहीं कहेंगे कि सतयुग में भी हैं, कलियुग में भी हैं। किसको दु:ख मिला तो कहेंगे नर्क में हैं, किसको सुख है तो कहेंगे स्वर्ग में हैं। ऐसे बहुत कहते हैं-दु:खी मनुष्य नर्क में हैं, हम तो बहुत सुख में बैठे हैं, महल माड़ियाँ, मोटरें आदि हैं, समझते हैं हम तो स्वर्ग में हैं। गोल्डन एज, आइरन एज एक ही बात है।

तो पहले-पहले दो बाप की बात बुद्धि में बिठानी है। बाप ही खुद अपनी पहचान देते हैं। वह सर्वव्यापी कैसे हो सकता है? क्या लौकिक बाप को सर्वव्यापी कहेंगे? अभी तुम चित्र में दिखाते हो आत्मा और परमात्मा का रूप तो एक ही है, उसमें फ़र्क नहीं। आत्मा और परमात्मा कोई छोटा-बड़ा नहीं। सभी आत्मायें हैं, वह भी आत्मा है। वह सदा परमधाम में रहते हैं इसलिए उन्हें परम आत्मा कहा जाता है। सिर्फ तुम आत्मायें जैसे आती हो वैसे मैं नहीं आता। मैं अन्त में इस तन में आकर प्रवेश करता हूँ। यह बातें कोई बाहर का समझ न सके। बात बड़ी सहज है। फ़र्क सिर्फ इतना है जो बाप के बदले वैकुण्ठवासी कृष्ण का नाम डाल दिया है। क्या कृष्ण ने वैकुण्ठ से नर्क में आकर राजयोग सिखाया? कृष्ण कैसे कह सकता है देह सहित…… मामेकम् याद करो। देहधारी की याद से पाप कैसे कटेंगे? कृष्ण तो एक छोटा बच्चा और कहाँ मैं साधारण मनुष्य के वृद्ध तन में आता हूँ। कितना फ़र्क हो गया है। इस एकज़ भूल के कारण सभी मनुष्य पतित, कंगाल बन गये हैं। न मैं सर्वव्यापी हूँ, न कृष्ण सर्वव्यापी है। हर शरीर में आत्मा सर्वव्यापी है। मुझे तो अपना शरीर भी नहीं है। हर आत्मा को अपना-अपना शरीर है। नाम हर एक शरीर पर अलग-अलग पड़ता है। न मुझे शरीर है और न मेरे शरीर का कोई नाम है। मैं तो बूढ़ा शरीर लेता हूँ तो इसका नाम बदलकर ब्रह्मा रखा है। मेरा तो ब्रह्मा नाम नहीं है। मुझे सदा शिव ही कहते हैं। मैं ही सर्व का सद्गति दाता हूँ। आत्मा को सर्व का सद्गति दाता नहीं कहेंगे। परमात्मा की कभी दुर्गति होती है क्या? आत्मा की ही दुर्गति और आत्मा की ही सद्गति होती है। यह सभी बातें विचार सागर मंथन करने की हैं। नहीं तो दूसरों को कैसे समझायेंगे। परन्तु माया ऐसी दुस्तर है जो बच्चों की बुद्धि आगे नहीं बढ़ने देती। दिन भर झरमुई झगमुई में ही टाइम वेस्ट कर देते हैं। बाप से पिछाड़ने के लिए माया कितना फोर्स करती है। फिर कई बच्चे तो टूट पड़ते हैं। बाप को याद न करने से अवस्था अचल-अडोल नहीं बन पाती। बाप घड़ी-घड़ी खड़ा करते, माया गिरा देती। बाप कहते कभी हार नहीं खानी है। कल्प-कल्प ऐसा होता है, कोई नई बात नहीं। मायाजीत अन्त में बन ही जायेंगे। रावण राज्य खलास तो होना ही है। फिर हम नई दुनिया में राज्य करेंगे। कल्प-कल्प माया जीत बने हैं। अनगिनत बार नई दुनिया में राज्य किया है। बाप कहते हैं बुद्धि को सदा बिजी रखो तो सदा सेफ रहेंगे। इसको ही स्वदर्शन चक्रधारी कहा जाता है। बाकी इसमें हिंसा आदि की बात नहीं है। ब्राह्मण ही स्वदर्शन चक्रधारी होते हैं। देव-ताओं को स्वदर्शन चक्रधारी नहीं कहेंगे। पतित दुनिया की रस्म-रिवाज और देवी-देवताओं की रस्म-रिवाज में बहुत अन्तर है। मृत्युलोक वाले ही पतित-पावन बाप को बुलाते हैं, हम पतितों को आकर पावन बनाओ। पावन दुनिया में ले चलो। तुम्हारी बुद्धि में है आज से 5 हज़ार वर्ष पहले नई पावन दुनिया थी, जिसको सतयुग कहा जाता है। त्रेता को नई दुनिया नहीं कहेंगे। बाप ने समझाया है – वह है फर्स्टक्लास, वह है सेकण्ड क्लास। एक-एक बात अच्छी रीति धारण करनी चाहिए जो कोई आकर सुने तो वण्डर खाये। कोई-कोई वण्डर भी खाते हैं, परन्तु फुर्सत नहीं जो पुरूषार्थ करें। फिर सुनते हैं पवित्र जरूर बनना है। यह काम विकार ही मनुष्य को पतित बनाता है, उनको जीतने से तुम जगतजीत बनेंगे। परन्तु काम विकार उन्हों की जैसे पूँजी है, इसलिए वह अक्षर नहीं बोलते हैं। सिर्फ कहते हैं मन को वश में करो। लेकिन मन अमन तब हो जब शरीर में नहीं हो। बाकी मन अमन तो कभी होता ही नहीं। देह मिलती है कर्म करने के लिए तो फिर कर्मातीत अवस्था में कैसे रहेंगे? कर्मातीत अवस्था कहा जाता है मुर्दे को। जीते जी मुर्दा अथवा शरीर से डिटैच। बाप तुमको शरीर से न्यारा बनने की पढ़ाई पढ़ाते हैं। शरीर से आत्मा अलग है। आत्मा परमधाम की रहने वाली है। आत्मा शरीर में आती है तो उसे मनुष्य कहा जाता है। शरीर मिलता ही है कर्म करने के लिए। एक शरीर छोड़ फिर दूसरा शरीर कर्म करने लिए लेना है। शान्ति तो तब हो जब शरीर में नहीं है। मूलवतन में कर्म होता नहीं। सूक्ष्मवतन की तो बात ही नहीं। सृष्टि का चक्र यहाँ फिरता है। बाप और सृष्टि चक्र को जानना, इसको ही नॉलेज कहा जाता है। सूक्ष्मवतन में न सफेद पोशधारी, न सजे सजाये, न नाग-बलाए पहनने वाले शंकर आदि ही होते हैं। बाकी ब्रह्मा और विष्णु का राज़ बाप समझाते रहते हैं। ब्रह्मा यहाँ है। विष्णु के दो रूप भी यहाँ हैं। वह सिर्फ साक्षात्कार का पार्ट ड्रामा में है, जो दिव्य दृष्टि से देखा जाता है। क्रिमिनल आंखों से पवित्र चीज़ दिखाई न पड़े। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपने आपको सदा सेफ रखने के लिए बुद्धि को विचार सागर मंथन में बिज़ी रखना है। स्वदर्शन चक्रधारी बनकर रहना है। झरमुई झगमुई में अपना समय नहीं गँवाना है।

2) शरीर से डिटैच रहने की पढ़ाई जो बाप पढ़ाते हैं, वह पढ़नी है। माया के फोर्स से बचने के लिए अपनी अवस्था अचल-अडोल बनानी है।

वरदान:- सदा उमंग-उत्साह में रह मन से खुशी के गीत गाने वाले अविनाशी खुशनसीब भव
आप खुशनसीब बच्चे अविनाशी विधि से अविनाशी सिद्धियां प्राप्त करते हो। आपके मन से सदा वाह-वाह की खुशी के गीत बजते रहते हैं। वाह बाबा! वाह तकदीर! वाह मीठा परिवार! वाह श्रेष्ठ संगम का सुहावना समय! हर कर्म वाह-वाह है इसलिए आप अविनाशी खुशनसीब हो। आपके मन में कभी व्हाई, आई (क्यों, मैं) नहीं आ सकता। व्हाई के बजाए वाह-वाह और आई के बजाए बाबा-बाबा शब्द ही आता है।
स्लोगन:- जो संकल्प करते हो उसे अविनाशी गवर्मेन्ट की स्टैम्प लगा दो तो अटल रहेंगे।

TODAY MURLI 16 DECEMBER 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 16 December 2018

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16/12/18
Madhuban
Avyakt BapDada
Om Shanti
09/03/84

Make your transformation imperishable.

BapDada is looking at all the chatrak children (a bird that eagerly awaits a drop of rain). Everyone’s deep desire is to listen, to meet and to become. You are allnumber one chatraks when it comes to listening; you take a number when it comes to meeting and becoming. You become equal according to your capacity. However, all elevated souls, all Brahmins souls are chatrak in all three. A number one chatrak easily and constantly becomes a master murlidhar, a masteralmighty authority, equal to the Father. To listen means to become a murlidhar. To meet means to be coloured by the company and to be coloured like Him in termsof powers and virtues. To become means to become equal to the Father by following His every step in your thoughts, words and deeds, which means to place your footsteps in Baba’s steps visibly and practically. You children need to experience your thoughts to be the same as the Father’s thoughts. From your words and deeds let everyone experience you to be the same as the Father. This is known as becoming equal and a number one chatrak. Check which one of the three you are. All the children’s thoughts filled with zeal and enthusiasm reach BapDada. You have very good thoughts of courage and determination. The seed of thought is powerful, but when it comes to the land of imbibing virtues and the Ganges water of knowledge and the sunshine of remembrance and the warmth of paying constant attention to the self, you sometimes become careless about these. When there is something lacking in even one thing, the seed of thought doesn’t bear constant fruit. It would give fruit for a short time, for one or two seasons. It would not give fruit eternally. You then think that the seed was powerful, that you made a firm promise, that everything had become clear and so you don’t know what happened. For six months you have a lot of enthusiasm and then, whilst moving along, you don’t know what happened. Therefore, pay constant attention to the things you were told earlier.

Secondly, you very quickly become confused over trivial matters. Because of being confused, you make small things into very big things. It is an ant and you make it into an elephant. This is why there is no balance. Because of not having a balance, you become heavy in your life. Either you get completely high because of your intoxication or just a tiny pebble brings you down. Instead of becoming knowledgefull and removing it in a second, you begin to think about how a pebble has come in between, that you stopped, you have come down, that this happened. You became ill, you had a fever or some pain. If you continue to think and speak about those things, what would be your condition? So, now end the trivial things that come. Remove them and fly. Don’t become weak through thinking that this has happened or that has come. Take medicine and become healthy. Sometimes, seeing the children’s faces, BapDada thinks: What were you just before and what have you now become? Are you the same one or have you become something else? What happens immediately, when you fluctuate? Your head becomes heavy. Physically, too, if you keep going up and coming down, you feel dizzy. Therefore, transform those sanskars. Don’t think that this is the habit all of you have anyway, that it happens like that because of the country, the atmosphere, your sanskars of birth or your nature. Such beliefs make you weak. Your birth has changed, and so change your sanskars. Since you are world transformers, you are already self-transformers. Know your original and eternal sanskars and nature: these are your real sanskars. Those others are artificial. “My sanskars, my nature, etc.” is the nature of being influenced by Maya. That is not the original and eternal nature of you elevated souls. This is why Baba is once again drawing your attention to these things. He is making you revise this. Make this transformation ever-lasting.

You have many specialities. You are number one in love and in enthusiasm for service. Even though you are physically far away, you are close. Your catchingpower is very good. Your power of realisation is also very intense. You swing in swings of happiness too. You sing very good songs of “Wah Baba, wah the family and wah drama!” Your speciality of determination is also good. Your intellects are very sharp when it comes to recognising. You are the long-lost and now-found, very much loved children of the Father and the family. You are the decoration of Madhuban and you have brought great splendour here. The example of all of you variet ies of branches having come together to form a sandalwood tree is very good. You have so many specialities. There are many specialities and one weakness. So, it is very easy to end one thing. Your problems have now ended, have they not? Do you understand?

Just as you speak with honesty and a clean heart, in the same way, you should be number one in removing everything from your heart with honesty and cleanliness. If Baba made a garland of the specialities, it would be very big. Nevertheless, Baba is congratulating you. You have had 99% transformation and only one per cent remains. That transformation has also already taken place. Do you understand? You are so good that even now you change and, from saying “No” you say “Yes”. This too is a speciality. You give very good responses. When Baba asks you if you are you powerful and victorious, you say you are already that. This too is very intense power of transformation, is it not? It is just that you have the sanskars of becoming afraid of ants and mice. Become a mahavir and crush the ant under your foot and ride on the mice. Become Ganesh. Become destroyers of obstacles from now, become Ganesh and start riding the rats. Don’t be afraid of mice. A rat bites your powers. It makes you finish your power of tolerance and your easy nature. It finishes love. It bites you, does it not? An ant goes straight into your head. In your stage of tension, it makes you unconscious. It causes you distress at that time, does it not? Achcha.

To those who are constant mahavirs and who remain stable in a powerful stage, to the true life companions who move along with the Father at every step, placing their footsteps in His steps in their thoughts, words and deeds, to those who constantly keep their specialities in front of them and bid farewell to weaknesses for all time, to those who constantly make the seed of thoughts fruitful, to those who eat unlimited visible and practical fruit at every moment, to those who swing in the swings of all attainments, to such constantly powerful souls, BapDada’s love, remembrance and namaste.

BapDada meeting the French group:

All of you have met Baba many times and are meeting Him once again, because you met Baba in the previous cycle and are therefore meeting Him now. The souls who belonged to Baba in the previous cycle have once again come here to claim their right once again. You don’t find this to be something new, do you? You are remembering with recognition that you have met Baba many times. When things are familiar, you feel at home. When you meet someone you know well, you are happy to see that person. You now understand that the relationships you had previously were based on selfishness. They weren’t real, but you have now reached your family and your sweet home. BapDada also welcomes you by saying, “It is good that you have come”.

Determination brings success. When you wonder whether something will happen or not, there isn’t success. Where there is determination, success is already guaranteed. Never get disheartened in service. This is the imperishable task of the imperishable Father and therefore success also has to be imperishable. It is not possible that there isn’t the fruit of service. Some fruit emerges at the time and some after some time. So, never even have that thought. Always think that service has to take place.

BapDada meeting a group from Japan:

Are you receiving all treasures from the Father? Do you experience being souls who are full? These treasures will continue not only for one birth but for 21 births. No matter how wealthy someone is in today’s world, no one else has the treasures you have. So, who are the true VIPs in reality? You are that, are you not? They have that position today, but not tomorrow. No one can snatch away your Godly position. You are children who are the decoration of the Father’s home. Just as a home is decorated with flowers, in the same way, you are the decoration of the Father’s home. So, always consider yourselves to be the Father’s decoration and remain stable in an elevated stage. Never remember things of weakness. By your remembering things of the past, a lot more weakness will develop. If you think about the past, you will end up crying. Therefore, the past means “finished . Remembrance of the Father makes you into powerful souls. For powerful souls, effort changes into love. To the extent that you give the treasures of knowledge to others, to that extent there is expansion. With courage and enthusiasm, constantly continue to make progress and move forward.

Avyakt Elevated versions – Become ignorant of all desires.

The description of the final, perfect form of a Brahmin is of one who is ignorant of all desire. When you reach this stage, cries of victory and distress will be heard. For this, you have to become a satisfied soul. To the extent that you become satisfied you will accordingly become ignorant of all desires. Just as BapDada never has any desire for the fruit of His acts, in the same way, you have remembrance of the Father in your every word and act; you must never desire any fruit of that even in your thoughts. Therefore, follow the Father. Children, you must have no desire for the raw fruit of your acts. When you have a subtle desire for some fruit, it is as though you eat that fruit as soon as you receive it and no more fruit will then be visible. Therefore, put aside any desire for some fruit and become completely ignorant of all desire.

Just as there is a long list of the different types of sorrow, so too, there are various desires for fruit or you have some subtle thoughts for a response, in which case you are unable to have an altruistic attitude. Even whilst knowing the reward of effort, you must have no attachment to it. When you pay special attention to someone who praises you, that too is like accepting fruit in a subtle way. By performing one elevated act, you receive one hundred-fold fruit in return, but you have to remain ignorant of all temporary and limited desire. Desire finishes all good acts. Desire finishes all cleanliness so that, instead of having cleanliness, you become one who thinks too much about everything. Therefore, you have to become ignorant of even the knowledge of desire.

You saw how the father gave his own time for service. He was humble and gave respect to the children. He always put the children first. He had the children’s name praised and yet did everything himself. He renounced any attainment of his name being praised for the work that he did. He kept the children as the masters whilst he himself served them. He relinquished any regard, prestige and praise as a master. He never glorified his own name, but it was always said, “My children!” Therefore, just as the father renounced his prestige, regard and pride, so follow the father in that way. If you do some service now and accept the fruit of that at the same time, you cannot accumulate anything. It is like earning and using simultaneously. You won’t then have any will power. You will be weak internally; you will not be powerful but feel empty inside. When you stop this, you will automatically have an incorporeal, egoless and viceless stage. Children, the more you remain detached from all desire, the more all of your desires will easily be fulfilled. Don’t ask for facilities but be a bestower and give what you have to others. Of course, you will attain something for your own progress or for some temporary success of service on the basis of your facilities. However, today, you may well be great, but tomorrow, you would become a soul who is thirsty for greatness and would constantly desire one or another attainment.

Don’t become one who asks for justice. Whenever you ask for something, you cannot experience yourself to be a fully contented and satisfied soul. A great donor can have no desire or beg like a beggar for even a penny. To have thoughts of receiving co-operation in the form of, “This one should change; this one should do something; this one should co-operate; this one should move forward”, means to want something like a beggar. If any of your family, co-operative brothers or sisters, due to not understanding or due to childish stubbornness, considers a temporary thing to be a permanent attainment or wants name, regard, honour or desire for temporary attainment, then become humble and give them respect. This form of giving becomes a form of receiving for all time. Never think of seeking facilities from others before giving them facilities. Become a beggar (one who doesn’t have) in terms of this temporary desire. For as long as you have even a slight trace of interest in the old world, for as long as you don’t experience the world to be tasteless, for as long as your intellect doesn’t feel that everyone is already dead, it is possible that you would still desire some form of attainment. However, those who remain constantly lost in the sweetness of One would have a constant and stable stage. They wouldn’t want to attain anything from a corpse. No perishable sweetness would attract them.

Having one desire or another obstructs you from being able to face anything. For as long as you still have the desire to glorify your own name or feel that you are “such-and-such” and ask why no one sought your advice, or why your opinion isn’t valued, there will be obstacles in service. Therefore, renounce any desire for regard and remain stable in your self-respect. Then, regard will follow you like a shadow.

Many children are very good effort-makers, but after some of you make good effort, you want your reward here and now. This desire of experiencing all your fruit now will stop you from accumulating. Therefore, finish your desire for any reward and simply make good effort. Instead of the word “desire” remember the word “good”.

Your stage of being ignorant of all desires is the basis of you enabling your devotee souls to receive all attainments. Only when you yourself become completely ignorant of all desires will you be able to fulfil the desires of many other souls. Have no desires for yourself, but think about how to fulfil the desires of others, and then you, yourself, will automatically become full. Now, have the determined thought to fulfil all the different desires of all the souls of the world. To make yourself ignorant of all desires means to fulfil the desires of others. Just as giving is, in fact, receiving, so too, to fulfil the desires of others is to make oneself full. Always have the aim of becoming an idol through which everyone’s desires are fulfilled.

Blessing: May you be a powerful soul who is an embodiment of remembrance by overcoming adverse situations considering them to be side scenes.
Because souls who are embodiments of remembrance are powerful, they consider adverse situations to be a game. No matter how big the situations may be, all of those are side scenes on the path for powerful souls to reach their destination. People actually spend money to go and see side scenes. For powerful souls who are embodiments of remembrance, whether you call it an adverse situation, a paper or an obstacle, all of them are side scenes. Therefore, remain aware that you have crossed those side s cenes on the way to your destination countless times; nothing new.
Slogan: Instead of correcting others, make a connection with the Father and you will continue to experience blessings.

 

*** Om Shanti ***

Special note: This evening is the third Sunday of the month and all brothers and sisters will have special collective meditation from 6.30 pm – 7.30 pm and spread rays of all powers into the world. Keep the self-respect in your awareness: I, a master almighty authority soul, am giving the donation of all powers to all souls, including all the elements of nature.

BRAHMA KUMARIS MURLI 16 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 16 December 2018

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16-12-18
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 09-03-84 मधुबन

परिवर्तन को अविनाशी बनाओ

बापदादा सभी चात्रक बच्चों को देख रहे हैं। सभी को सुनना, मिलना और बनना यही लगन है। सुनना, इसमें नम्बरवन चात्रक हैं। मिलना इसमें नम्बर हैं और बनना – इसमें यथा शक्ति तथा समान बनना। लेकिन सभी श्रेष्ठ आत्मायें, ब्राह्मण आत्मायें तीनों के चात्रक जरूर हैं। नम्बरवन चात्रक मास्टर मुरलीधर, मास्टर सर्वशक्तिवान बाप समान सदा और सहज बन जाते हैं। सुनना अर्थात् मुरलीधर बनना। मिलना अर्थात् संग के रंग में उसी समान शक्तियों और गुणों में रंग जाना। बनना अर्थात् संकल्प के कदम पर, बोल के कदम पर, कर्म के कदम पर कदम रखते हुए साक्षात बाप समान बनना। बच्चे के संकल्प में बाप का संकल्प समान अनुभव हो। बोल में, कर्म में जैसा बाप वैसा बच्चा सर्व को अनुभव हो। इसको कहा जाता है समान बनना वा नम्बरवन चात्रक। तीनों में से चेक करो मैं कौन हूँ! सभी बच्चों के उमंग-उत्साह भरे संकल्प बापदादा के पास पहुँचते हैं। संकल्प बहुत अच्छे हिम्मत और दृढ़ता से करते हैं। संकल्प रूपी बीज शक्तिशाली है लेकिन धारणा की धरनी, ज्ञान का गंगाजल और याद की धूप कहो वा गर्मी कहो, बार-बार स्व अटेन्शन की रेख-देख इसमें कहाँ-कहाँ अलबेले बन जाते हैं। एक भी बात में कमी होने से संकल्प रूपी बीज सदा फल नहीं देता है। थोड़े समय के लिए एक सीजन, दो सीजन फल देगा। सदा का फल नहीं देगा। फिर सोचते हैं बीज तो शक्तिशाली था, प्रतिज्ञा तो पक्की की थी। स्पष्ट भी हो गया था। फिर पता नहीं क्या हो गया। 6 मास तो बहुत उमंग रहा फिर चलते-चलते पता नहीं क्या हुआ। इसके लिए जो पहले बातें सुनाई उस पर सदा अटेन्शन रहे।

दूसरी बात – छोटी-सी बात में घबराते जल्दी हो। घबराने के कारण छोटी-सी बात को भी बड़ा बना देते हो। होती चींटी है उसको बना देते हो हाथी, इसलिए बैलेन्स नहीं रहता। बैलेन्स न होने के कारण जीवन से भारी हो जाते हो। या तो नशे में बिल्कुल ऊंचे चढ़ जाते वा छोटी-सी कंकडी भी नीचे बिठा देती। नॉलेजफुल बन सेकण्ड में उसको हटाने के बजाए कंकड़ी आ गई, रूक गये, नीचे आ गये, यह हो गया, इसको सोचने लग जाते हो। बीमार हो गया, बुखार वा दर्द आ गया। अगर यही सोचते और कहते रहे तो क्या हाल होगा! ऐसे जो छोटी-छोटी बातें आती हैं उनको मिटाओ, हटाओ और उड़ो। हो गया, आ गया, इसी संकल्प में कमजोर नहीं बनो। दवाई लो और तन्दरूस्त बनो। कभी-कभी बापदादा बच्चों के चेहरे को देख सोचते हैं अभी-अभी क्या थे, अभी-अभी क्या हो गये! यह वो ही हैं या दूसरे बन गये! जल्दी में नीचे ऊपर होने से क्या होता? माथा भारी हो जाता। वैसे भी स्थूल में अभी ऊपर अभी नीचे आओ तो चक्र महसूस करेंगे ना। तो यह संस्कार परिवर्तन करो। ऐसे नहीं सोचो कि हम लोगों की आदत ही ऐसी है। देश के कारण वा वायुमण्डल के कारण वा जन्म के संस्कार, नेचर के कारण ऐसा होता ही है, ऐसी-ऐसी मान्यतायें कमजोर बना देती हैं। जन्म बदला तो संस्कार भी बदलो। जब विश्व परिवर्तक हो तो स्व परिवर्तक तो पहले ही हो ना। अपने आदि अनादि स्वभाव-संस्कार को जानो। असली संस्कार वह हैं। यह तो नकली हैं। मेरे संस्कार, मेरी नेचर यह माया के वशीभूत होने की नेचर है। आप श्रेष्ठ आत्माओं की आदि अनादि नेचर नहीं है, इसलिए इन बातों पर फिर से अटेन्शन दिला रहे हैं। रिवाइज करा रहे हैं। इस परिवर्तन को अविनाशी बनाओ।

विशेषतायें भी बहुत हैं। स्नेह में नम्बरवन हो, सेवा के उमंग में नम्बरवन हो। स्थूल में दूर होते भी समीप हो। कैचिंग पावर भी बहुत अच्छी है। महसूसता की शक्ति भी बहुत तीव्र है। खुशियों के झूले में भी झूलते हो। वाह बाबा, वाह परिवार, वाह ड्रामा के गीत भी अच्छे गाते हो। दृढ़ता की विशेषता भी अच्छी है। पहचानने की बुद्धि भी तीव्र है। बाप और परिवार के सिकीलधे लाडले भी बहुत हो। मधुबन के श्रृंगार हो और रौनक भी अच्छी हो। वैरायटी डालियां मिलकर एक चन्दन का वृक्ष बनने का एग्जैम्पल भी बहुत अच्छे हो। कितनी विशेषतायें हैं! विशेषतायें ज्यादा हैं और कमजोरी एक है। तो एक को मिटाना तो बहुत सहज है ना। समस्यायें समाप्त हो गई हैं ना! समझा!

जैसे सफाई से सुनाते हो, वैसे दिल से सफाई से निकालने में भी नम्बरवन हो। विशेषताओं की माला बनायेंगे तो लम्बी चौड़ी हो जायेगी। फिर भी बापदादा मुबारक देते हैं। यह परिवर्तन 99 प्रतिशत तो कर लिया, बाकी 1 प्रतिशत है। वह भी परिवर्तन हुआ ही पड़ा है। समझा। कितने अच्छे हैं जो अभी-अभी भी बदल करके ना से हाँ कर देते हैं। यह भी विशेषता है ना! उत्तर बहुत अच्छा देते हैं। इन्हों से पूछते हैं शक्तिशाली, विजयी हो? तो कहते हैं अभी से हैं! यह भी परिवर्तन की शक्ति तीव्र हुई ना। सिर्फ चींटी, चूहे से घबराने का संस्कार है। महावीर बन चींटी को पांव के नीचे कर दो और चूहे को सवारी बना दो, गणेश बन जाओ। अभी से विघ्न-विनाशक अर्थात् गणेश बनकर चूहे पर सवारी करने लग जाना। चूहे से डरना नहीं। चूहा शक्तियों को काट लेता है। सहन शक्ति खत्म कर लेता है। सरलता खत्म कर देता है, स्नेह खत्म कर देता है। काटता है ना और चींटी सीधे माथे में चली जाती है। टेन्शन में बेहोश कर देती है। उस समय परेशान कर लेती है ना। अच्छा!

सदा महावीर बन शक्तिशाली स्थिति में स्थित होने वाले, हर संकल्प, बोल और कर्म, हर कदम पर कदम रख बाप के साथ-साथ चलने वाले सच्चे जीवन के साथी, सदा अपनी विशेषताओं को सामने रख कमजोरी को सदा के लिए विदाई देने वाले, संकल्प रूपी बीज को सदा फलदायक बनाने वाले, हर समय बेहद का प्रत्यक्ष फल खाने वाले, सर्व प्राप्तियों के झूलों में झूलने वाले ऐसे सदा के समर्थ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

फ्रांस ग्रुप से

1. सभी बहुत बार मिले हो और अब फिर से मिल रहे हो – क्योंकि जब कल्प पहले मिले थे तब अब मिल रहे हो। कल्प पहले वाली आत्मायें फिर से अपना हक लेने के लिए पहुँच गई हैं? नया नहीं लगता है ना! पहचान याद आ रही है कि हम बहुत बारी मिले हैं! पहचाना हुआ घर लग रहा है। जब अपना कोई मिल जाता है तो अपने को देखकर खुशी होती है। अभी समझते हो कि वह जो सम्बन्ध था वह स्वार्थ का सम्बन्ध था, असली नहीं था। अपने परिवार में, अपने स्वीट होम में पहुँच गये। बापदादा भी भले पधारे कहकर स्वागत कर रहे हैं।

दृढ़ता सफलता को लाती है, जहाँ यह संकल्प होता है कि यह होगा या नहीं होगा वहाँ सफलता नहीं होती। जहाँ दृढ़ता है वहाँ सफलता हुई पड़ी है। कभी भी सेवा में दिलशिकस्त नहीं होना क्योंकि अविनाशी बाप का अविनाशी कार्य है। सफलता भी अविनाशी होनी ही है। सेवा का फल न निकले, यह हो नहीं सकता। कोई उसी समय निकलता है कोई थोड़ा समय के बाद इसलिए कभी भी यह संकल्प भी नहीं करना। सदा ऐसे समझो कि सेवा होनी ही है।

जापान ग्रुप से:- बाप द्वारा सर्व खजाने प्राप्त हो रहे हैं? भरपूर आत्मायें हैं, ऐसा अनुभव करते हो? एक जन्म नहीं लेकिन 21 जन्म यह खजाने चलते रहेंगे। कितना भी आज की दुनिया में कोई धनवान हो लेकिन जो खजाना आपके पास है वह किसी के पास भी नहीं है। तो वास्तविक सच्चे वी.आई.पी. कौन हैं? आप हो ना। वह पोजीशन तो आज है कल नहीं लेकिन आपका यह ईश्वरीय पोजीशन कोई छीन नहीं सकता। बाप के घर के श्रृंगार बच्चे हो। जैसे फूलों से घर को सजाया जाता है ऐसे बाप के घर के श्रृंगार हो। तो सदा स्वयं को मैं बाप का श्रृंगार हूँ, ऐसा समझ श्रेष्ठ स्थिति में स्थित रहो। कभी भी कमजोरी की बातें याद नहीं करना। बीती बातों को याद करने से और ही कमजोरी आ जायेगी। पास्ट सोचेंगे तो रोना आयेगा इसलिए पास्ट अर्थात् फिनिश। बाप की याद शक्तिशाली आत्मा बना देती है। शक्तिशाली आत्मा के लिए मेहनत भी मुहब्बत में बदल जाती है। जितना ज्ञान का खजाना दूसरों को देते हैं उतना वृद्धि होती है। हिम्मत और उल्लास द्वारा सदा उन्नति को पाते आगे बढ़ते चलो। अच्छा!

अव्यक्त महावाक्य – ”इच्छा मात्रम् अविद्या बनो”

ब्राह्मणों का अन्तिम सम्पूर्ण स्वरूप वा स्थिति का वर्णन है – इच्छा मात्रम् अविद्या। जब ऐसी स्थिति बनेगी तब जयजयकार और हाहाकार होगी। इसके लिए तृप्त आत्मा बनो। जितना तृप्त बनेंगे उतना ही इच्छा मात्रम् अविद्या होंगे। जैसे बापदादा कोई भी कर्म के फल की इच्छा नहीं रखते हैं। हर वचन और कर्म में सदैव पिता की स्मृति होने कारण फल की इच्छा का संकल्प मात्र भी नहीं रहता ऐसे फालो फादर करो। कच्चे फल की इच्छा नहीं रखो। फल की इच्छा सूक्ष्म में भी रहती है तो जैसे किया और फल खाया, फिर फलस्वरूप कैसे दिखाई दे, इसलिए फल की इच्छा को छोड़ इच्छा मात्रम् अविद्या बनो।

जैसे अपार दु:खों की लिस्ट है, वैसे फल की इच्छाएं वा जो उसका रेसपान्स लेने का सूक्ष्म संकल्प रहता है वह भी भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। निष्काम वृत्ति नहीं रहती। पुरुषार्थ के प्रारब्ध की नॉलेज होते हुए भी उसमें अटैचमेंट रहती है। कोई महिमा करते हैं और उसकी तरफ आपका विशेष ध्यान जाता है तो यह भी सूक्ष्म फल को स्वीकार करना है। एक श्रेष्ठ कर्म करने का सौ गुणा सम्पन्न फल आपके सामने आयेगा लेकिन आप अल्प-काल के इच्छा मात्रम् अविद्या बनो। इच्छा – अच्छा कर्म समाप्त कर देती है, इच्छा स्वच्छता को खत्म कर देती है और स्वच्छता के बजाय सोचता बना देती है, इसलिए इस विद्या की अविद्या हो।

जैसे बाप को देखा – स्वयं का समय भी सेवा में दिया। स्वयं निर्मान बन बच्चों को मान दिया। पहले बच्चे – नाम बच्चे का, काम अपना। काम के नाम की प्राप्ति का त्याग किया। बच्चों को मालिक रखा और स्वयं को सेवाधारी। मालिकपन का मान भी दे दिया – शान भी दे दिया, नाम भी दे दिया। कभी अपना नाम नहीं किया – मेरे बच्चे। तो जैसे बाप ने नाम, मान, शान सबका त्याग किया ऐसे फालो फादर करो। आपने कोई सेवा अभी-अभी की और अभी-अभी उसका फल ले लिया तो जमा कुछ नहीं हुआ, कमाया और खाया। उसमें फिर विलपावर नहीं रहती। वह अन्दर से कमजोर रहते हैं, शक्तिशाली नहीं खाली-खाली रह जाते हैं। जब यह बात खत्म हो जायेगी तब निराकारी, निरहंकारी और निर्विकारी स्थिति स्वत: बन जायेगी। आप बच्चे जितना हर कामना से न्यारे रहेंगे उतना आपकी हर कामना सहज पूरी होती जायेगी। फैसल्टीज़ मांगो नहीं, दाता बनकर दो – कोई भी सेवा प्रति वा स्वयं प्रति सैलवेशन के आधार पर स्वयं की उन्नति वा सेवा की अल्पकाल की स़फलता प्राप्त हो जायेगी लेकिन आज महान होंगे कल महानता की प्यासी आत्मा बन जायेंगे, सदा प्राप्ति की इच्छा में रहेंगे।

कभी भी इन्साफ माँगने वाले नहीं बनो। किसी भी प्रकार के माँगने वाला स्वयं को तृप्त आत्मा अनुभव नहीं करेंगे। महादानी भिखारी से एक नया पैसा लेने की इच्छा नहीं रख सकते। यह बदले वा यह करे वा यह कुछ सहयोग दे, कदम आगे बढ़ावे, ऐसे संकल्प वा ऐसे सहयोग की भावना परवश, शक्तिहीन, भिखारी आत्मा से क्या रख सकते! अगर कोई आपके सहयोगी भाई वा बहन परिवार की आत्मायें, बेसमझी वा बालहठ से अल्पकाल की वस्तु को सदाकाल की प्राप्ति समझ, अल्पकाल का मान-शान-नाम वा अल्पकाल की प्राप्ति की इच्छा रखती हैं तो दूसरे को मान देकर के स्वयं निर्मान बनना, यह देना ही सदा के लिए लेना है। किसी से कोई सैलवेशन लेकर के फिर सैलवेशन देने का संकल्प में भी न हो। इस अल्पकाल की इच्छा से बेगर बनो। जब तक किसी में अंशमात्र भी कोई रस दिखाई देता है, असार संसार का अनुभव नहीं होता है बुद्धि में यह नहीं आता कि यह सब मरे पड़े हैं तब तक उनसे कोई प्राप्ति की इच्छा हो सकती है, लेकिन सदा एक के रस में रहने वाले, एकरस स्थिति वाले बन जाते हैं। उन्हें मुर्दो से किसी प्रकार की प्राप्ति की कामना नहीं रह सकती। कोई विनाशी रस अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर सकता।

अनेक प्रकार की कामनायें सामना करने में विघ्न डालती हैं। जब यह कामना रखते हो कि मेरा नाम हो, मैं ऐसा हूँ, मेरे से राय क्यों नहीं ली, मेरा मूल्य क्यों नहीं रखा? तब सेवा में विघ्न पड़ते हैं इसलिए मान की इच्छा को छोड़ स्वमान में टिक जाओ तो मान परछाई के समान आपके पिछाड़ी आयेगा।

कई बच्चे बहुत अच्छे पुरुषार्थी हैं लेकिन पुरुषार्थ करते-करते कहाँ-कहाँ पुरुषार्थ अच्छा करने के बाद प्रालब्ध यहाँ ही भोगने की इच्छा रखते हैं। यह भोगने की इच्छा जमा होने में कमी कर देती है इसलिए प्रालब्ध की इच्छा को खत्म कर सिर्फ अच्छा पुरुषार्थ करो। इच्छा के बजाए अच्छा शब्द याद रखो।

भक्तों को सर्व प्राप्ति कराने का आधार- ‘इच्छा मात्रम् अविद्या’ की स्थिति है। जब स्वयं ‘इच्छा मात्रम् अविद्या’ हो जाते हो, तब ही अन्य आत्माओं की सर्व इच्छाएं पूर्ण कर सकते हो। कोई भी इच्छाएं अपने प्रति नहीं रखो लेकिन अन्य आत्माओं की इच्छाएं पूर्ण करने का सोचो तो स्वयं स्वत: ही सम्पन्न बन जायेंगे। अब विश्व की आत्माओं की अनेक प्रकार की इच्छाऍ अर्थात् कामनायें पूर्ण करने का दृढ़ संकल्प धारण करो। औरों की इच्छायें पूर्ण करना अर्थात् स्वयं को इच्छा मात्रम् अविद्या बनाना। जैसे देना अर्थात् लेना है, ऐसे ही दूसरों की इच्छायें पूर्ण करना अर्थात् स्वयं को सम्पन्न बनाना है। सदा यही लक्ष्य रखो कि हमें सर्व की कामनायें पूर्ण करने वाली मूर्ति बनना है। अच्छा।

वरदान:- परिस्थितियों को साइडसीन समझ पार करने वाले स्मृति स्वरूप समर्थ आत्मा भव 
स्मृति स्वरूप आत्मा समर्थ होने के कारण परिस्थितियों को खेल समझती है। भल कितनी भी बड़ी परिस्थिति हो लेकिन समर्थ आत्मा के लिए मंजिल पर पहुंचने के लिए यह सब रास्ते के साइड सीन्स हैं। लोग तो खर्चा करके भी साइड सीन्स देखने जाते हैं। तो स्मृति स्वरूप समर्थ आत्मा के लिए परिस्थिति कहो, पेपर कहो, विघ्न कहो सब साइडसीन्स हैं और स्मृति में है कि यह मंजिल के साइडसीन्स अनगिनत बार पार की हैं, नथिंगन्यु।
स्लोगन:- दूसरों की करेक्शन करने के बजाए बाप से कनेक्शन जोड़ लो तो वरदानों की अनुभूति होती रहेगी।
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