14 december ki murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 14 DECEMBER 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 14 December 2020

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14-12-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम्हारे दु:ख के दिन अब पूरे हुए, तुम अब ऐसी दुनिया में जा रहे हो जहाँ कोई भी अप्राप्त वस्तु नहीं”
प्रश्नः- किन दो शब्दों का राज़ तुम्हारी बुद्धि में होने कारण पुरानी दुनिया से बेहद का वैराग्य रहता है?
उत्तर:- उतरती कला और चढ़ती कला का राज़ तुम्हारी बुद्धि में है। तुम जानते हो आधाकल्प हम उतरते आये, अभी है चढ़ने का समय। बाप आये हैं नर से नारायण बनाने की सत्य नॉलेज देने। हमारे लिए अब कलियुग पूरा हुआ, नई दुनिया में जाना है इसलिए इससे बेहद का वैराग्य है।
गीत:- धीरज धर मनुवा……..

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत सुना। रूहानी बाप बैठ समझाते हैं – यह एक ही पुरुषोत्तम संगमयुग है जबकि कल्प-कल्प बाप आकर रूहानी बच्चों को पढ़ाते हैं। राजयोग सिखलाते हैं। बाप रूहानी बच्चों को कहते हैं मनुवा अर्थात् आत्मा, हे आत्मा धीरज धरो। आत्माओं से बात करते हैं। इस शरीर का मालिक आत्मा है। आत्मा कहती है – मैं अविनाशी आत्मा हूँ, यह मेरा शरीर विनाशी है। रूहानी बाप कहते हैं – मैं एक ही बार कल्प के संगम पर आकर तुम बच्चों को धीरज देता हूँ कि अब सुख के दिन आते हैं। अभी तुम दु:खधाम रौरव नर्क में हो। सिर्फ तुम नहीं हो परन्तु सारी दुनिया रौरव नर्क में है, तुम जो मेरे बच्चे बने हो, रौरव नर्क से निकलकर स्वर्ग में चल रहे हो। सतयुग, त्रेता, द्वापर पास हो गया। कलियुग भी तुम्हारे लिए पास हो गया। तुम्हारे लिए यह पुरुषोत्तम संगमयुग है जबकि तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बनते हो। आत्मा जब सतोप्रधान बन जायेगी तो फिर यह शरीर भी छोड़ेगी। सतोप्रधान आत्मा को सतयुग में नया शरीर चाहिए। वहाँ सब कुछ नया होता है। बाप कहते हैं बच्चे अब दु:खधाम से सुखधाम में चलना है, उसके लिए पुरुषार्थ करना है। सुखधाम में इन लक्ष्मी-नारायण की राजाई थी। तुम पुरुषार्थ कर रहे हो नर से नारायण बनने का। यह सत्य नर से नारायण बनने की नॉलेज है। भक्ति मार्ग में हर पूर्णमासी पर कथा सुनते आये हो, परन्तु वह है ही भक्ति मार्ग। उसे सत्य मार्ग नहीं कहेंगे, ज्ञान मार्ग है सत्य मार्ग। तुम सीढ़ी उतरते-उतरते झूठ खण्ड में आते हो। अभी तुम जानते हो सत्य बाप से हम यह नॉलेज पाकर 21 जन्म देवी-देवता बनेंगे। हम थे, फिर सीढ़ी उतरते आये। उतरती कला और चढ़ती कला का राज़ तुम्हारी बुद्धि में है। पुकारते भी हैं हे बाबा आकर हमको पावन बनाओ। एक बाप ही पावन बनाने वाला है। बाप कहते हैं – बच्चे, तुम सतयुग में विश्व के मालिक थे। बहुत धनवान, बहुत सुखी थे। अभी बाकी थोड़ा समय है। पुरानी दुनिया का विनाश सामने खड़ा है। नई दुनिया में एक राज्य, एक भाषा थी। उसको कहा जाता है अद्वैत राज्य। अभी कितना द्वैत है, अनेक भाषायें हैं। जैसे मनुष्यों का झाड़ बढ़ता जाता है, भाषाओं का भी झाड़ वृद्धि को पाता जाता है। फिर होगी एक भाषा। गायन है ना वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट। मनुष्यों की बुद्धि में नहीं बैठता। बाप ही दु:ख की पुरानी दुनिया को बदल सुख की नई दुनिया स्थापन करते हैं। लिखा हुआ है प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा डिटीज्म की स्थापना। यह है राजयोग की पढ़ाई। यह ज्ञान जो गीता में लिखा हुआ है, बाप ने जो सम्मुख सुनाया वह फिर मनुष्यों ने भक्ति मार्ग के लिए बैठ लिखा है, जिससे तुम उतरते आये हो। अभी भगवान तुमको पढ़ाते हैं ऊपर चढ़ने के लिए। भक्ति को कहा ही जाता है उतरती कला का मार्ग। ज्ञान है चढ़ती कला का मार्ग। यह समझाने में तुम डरो मत। भल ऐसे भी हैं जो इन बातों को न समझने कारण विरोध करेंगे, शास्त्रवाद करेंगे। परन्तु तुमको कोई से शास्त्रवाद नहीं करना है। बोलो शास्त्र, वेद, उपनिषद वा गंगा स्नान करना, तीर्थ आदि करना यह सब भक्ति काण्ड है। भारत में रावण भी है बरोबर, जिसकी एफीजी जलाते हैं। वैसे तो दुश्मनों की एफीजी जलाते हैं, अल्पकाल के लिए। यह इस एक रावण की ही एफीज़ी हर वर्ष जलाते आते हैं। बाप कहते हैं तुम गोल्डन एजेड बुद्धि से आइरन एजेड बुद्धि हो गये हो। तुम कितने सुखी थे। बाप आते ही हैं सुखधाम की स्थापना करने। फिर बाद में जब भक्ति मार्ग शुरू होता है तो दु:खी बनते हैं। फिर सुखदाता को याद करते हैं, वह भी नाम मात्र क्योंकि उनको जानते नहीं। गीता में नाम बदल दिया है। पहले-पहले तुम यह समझाओ कि ऊंच ते ऊंच भगवान एक है, याद भी उनको करना चाहिए। एक को याद करना उसको ही अव्यभिचारी याद, अव्यभिचारी ज्ञान कहा जाता है। तुम अभी ब्राह्मण बने हो तो भक्ति नहीं करते हो। तुमको ज्ञान है। बाप पढ़ाते हैं जिससे हम यह देवता बनते हैं। दैवीगुण भी धारण करने हैं इसलिए बाबा कहते हैं अपना चार्ट रखो तो मालूम पड़ेगा हमारे में कोई आसुरी गुण तो नहीं हैं। देह-अभिमान है पहला अवगुण फिर दुश्मन है काम। काम पर जीत पाने से ही तुम जगतजीत बनेंगे। तुम्हारा उद्देश्य ही यह है, इन लक्ष्मी-नारायण के राज्य में कोई अनेक धर्म थे नहीं। सतयुग में देवताओं का ही राज्य होता है। मनुष्य होते हैं कलियुग में। हैं भल वह भी मनुष्य, परन्तु दैवीगुणों वाले। इस समय सब मनुष्य हैं आसुरी गुणों वाले। सतयुग में काम महाशत्रु होता नहीं। बाप कहते हैं इस काम महाशत्रु पर जीत पाने से तुम जगतजीत बनेंगे। वहाँ रावण होता नहीं। यह भी मनुष्य समझ नहीं सकते। गोल्डन एज से उतरते-उतरते तमोप्रधान बुद्धि बने हैं। अब फिर सतोप्रधान बनना है। उसके लिए एक ही दवाई मिलती है – बाप कहते हैं अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो जन्म-जन्मान्तर के पाप भस्म हो जायेंगे। तुम बैठे हो पापों को भस्म करने तो फिर आगे पाप नहीं करना चाहिए। नहीं तो वह सौ गुणा बन जायेगा। विकार में गये तो सौ गुणा दण्ड पड़ जायेगा, फिर वह मुश्किल चढ़ सकते हैं। पहला नम्बर दुश्मन है यह काम। 5 मंजिल से गिरेंगे तो हडगुड एकदम टूट जायेंगी। शायद मर भी जायें। ऊपर से गिरने से एकदम चकनाचूर हो जाते हैं। बाप से प्रतिज्ञा तोड़ काला मुंह किया तो गोया आसुरी दुनिया में चला गया। यहाँ से मर गया। उनको ब्राह्मण भी नहीं, शूद्र कहा जायेगा।

बाप कितना सहज समझाते हैं। पहले तो यह नशा रहना चाहिए। अगर समझो कृष्ण भगवानुवाच भी हो, वह भी तो जरूर पढ़ा करके आपसमान बनायेंगे ना। परन्तु कृष्ण तो भगवान हो न सके। वह तो पुनर्जन्म में आते हैं। बाप कहते हैं मैं ही पुनर्जन्म रहित हूँ। राधे-कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण अथवा विष्णु एक ही बात है। विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण और लक्ष्मी-नारायण का ही बचपन है राधे-कृष्ण। ब्रह्मा का भी राज़ समझाया है – ब्रह्मा-सरस्वती सो लक्ष्मी-नारायण। अब ट्रांसफर होते हैं। पिछाड़ी का नाम इनका ब्रह्मा रखा है। बाकी यह ब्रह्मा तो देखो एकदम आइरन एज में खड़ा है। यही फिर तपस्या कर कृष्ण वा श्री नारायण बनते हैं। विष्णु कहने से उसमें दोनों आ जाते हैं। ब्रह्मा की बेटी सरस्वती। यह बातें कोई समझ न सकें। 4 भुजा ब्रह्मा को भी देते हैं क्योंकि प्रवृत्ति मार्ग है ना। निवृत्ति मार्ग वाले यह ज्ञान दे नहीं सकते। बहुतों को बाहर से फंसा कर ले आते हैं कि चलो हम प्राचीन राजयोग सिखलायें। अब संन्यासी राजयोग सिखला न सकें। अब ईश्वर आये हैं, तुम अब उनके बच्चे ईश्वरीय सम्प्रदाय बने हो। ईश्वर आये हैं तुमको पढ़ाने। तुमको राजयोग सिखला रहे हैं। वह तो है निराकार। ब्रह्मा द्वारा तुमको अपना बनाया है। बाबा-बाबा तुम उनको कहते हो, ब्रह्मा तो बीच में इन्टरप्रेटर है। भाग्यशाली रथ है। इस द्वारा बाबा तुमको पढ़ाते हैं। तुम भी पतित से पावन बनते हो। बाप पढ़ाते हैं – मनुष्य से देवता बनाने। अभी तो रावण राज्य, आसुरी सम्प्रदाय है ना। अभी तुम ईश्वरीय सम्प्रदाय बने हो फिर दैवी सम्प्रदाय बनेंगे। अभी तुम पुरुषोत्तम संगमयुग पर हो, पावन बन रहे हो। संन्यासी लोग तो घरबार छोड़ जाते हैं। यहाँ बाप तो कहते हैं – भल स्त्री-पुरुष घर में इकट्ठे रहो, ऐसे मत समझो स्त्री नागिन है इसलिए हम अलग हो जायें तो छूट जायेंगे। तुमको भागना नहीं है। वह हद का संन्यास है जो भागते हैं, तुम यहाँ बैठे हो परन्तु तुमको इस विकारी दुनिया से वैराग्य है। यह सब बातें तुम्हें अच्छी रीति धारण करनी है, नोट करना है और परहेज भी रखनी है। दैवीगुण धारण करने हैं। श्रीकृष्ण के गुण गाये जाते हैं ना। यह तुम्हारी एम आब्जेक्ट है। बाप नहीं बनते, तुमको बनाते हैं। फिर आधाकल्प के बाद तुम नीचे उतरते, तमोप्रधान बनते हो। मैं नहीं बनता हूँ, यह बनते हैं। 84 जन्म भी इसने लिए हैं। इनको भी अभी सतोप्रधान बनना है, यह पुरुषार्थी है। नई दुनिया को सतोप्रधान कहेंगे। हर एक चीज़ पहले सतोप्रधान फिर सतो-रजो-तमो में आती है। छोटे बच्चे को भी महात्मा कहा जाता है क्योंकि उनमें विकार होते नहीं, इसलिए उनको फूल कहा जाता है। संन्यासियों से छोटे बच्चों को उत्तम कहेंगे क्योंकि संन्यासी तो फिर भी लाइफ पास कर आते हैं ना। 5 विकारों का अनुभव है। बच्चों को तो पता नहीं रहता इसलिए बच्चों को देख खुशी होती है, चैतन्य फूल हैं। अपना तो है ही प्रवृत्ति मार्ग।

अभी तुम बच्चों को इस पुरानी दुनिया से नई दुनिया में जाना है। अमरलोक में चलने के लिए तुम सब पुरुषार्थ करते हो, मृत्युलोक से ट्रांसफर होते हो। देवता बनना है तो उसके लिए अब मेहनत करनी पड़े, प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे भाई-बहन हो जाते हैं। भाई-बहन तो थे ना। प्रजापिता ब्रह्मा की औलाद आपस में क्या ठहरे? प्रजापिता ब्रह्मा गाया जाता है। जब तक प्रजापिता का बच्चा न बनें, सृष्टि की रचना कैसे हो? प्रजापिता ब्रह्मा के हैं सब रूहानी बच्चे। वह ब्राह्मण होते हैं जिस्मानी यात्रा वाले। तुम हो रूहानी यात्रा वाले। वह पतित, तुम पावन। वह कोई प्रजापिता की सन्तान नहीं हैं, यह तुम समझते हो। भाई-बहन जब समझें तक विकार में न जायें। बाप भी कहते हैं खबरदार रहना, हमारा बच्चा बनकर कोई क्रिमिनल काम नहीं करना, नहीं तो पत्थरबुद्धि बन जायेंगे। इन्द्र सभा की कहानी भी है। शूद्र को ले आई तो इन्द्र सभा में उनकी बदबू आने लगी। तो बोला पतित को यहाँ क्यों लाया है। फिर उनको श्राप दे दिया। वास्तव में इस सभा में भी कोई पतित आ नहीं सकते। भल बाप को मालूम पड़े वा न पड़े, यह तो अपना ही नुकसान करते हैं, और ही सौगुणा दण्ड पड़ जाता है। पतित को एलाउ नहीं है। उन्हों के लिए विजिटिंग रूम ठीक है। जब पावन बनने की गैरन्टी करे, दैवीगुण धारण करे तब एलाउ हो। दैवीगुण धारण करने में टाइम लगता है। पावन बनने की एक ही प्रतिज्ञा है।

यह भी समझाया है, देवताओं की और परमात्मा की महिमा अलग-अलग है। पतित-पावन, लिबरेटर, गाइड बाप ही है। सब दु:खों से लिबरेट कर अपने शान्तिधाम में ले जाते हैं। शान्तिधाम, सुखधाम और दु:खधाम यह भी चक्र है। अभी दु:खधाम को भूल जाना है। शान्तिधाम से सुखधाम में वो आयेंगे जो नम्बरवार पास होंगे, वही आते रहेंगे। यह चक्र फिरता रहता है। ढेर की ढेर आत्मायें हैं, सबका पार्ट नम्बरवार है। जायेंगे भी नम्बरवार। उनको कहा जाता है शिवबाबा का सिजरा अथवा रूद्र माला। नम्बरवार जाते हैं फिर नम्बरवार आते हैं। दूसरे धर्म वालों का भी ऐसा होता है। बच्चों को रोज़ समझाया जाता है, स्कूल में रोज़ नहीं पढ़ेंगे, मुरली नहीं सुनेंगे तो फिर अबसेन्ट हो जायेंगे। पढ़ाई की लिफ्ट तो जरूर चाहिए। गॉडली युनिवर्सिटी में अबसेन्ट थोड़ेही होनी चाहिए। पढ़ाई कितनी ऊंच है, जिससे तुम सुखधाम के मालिक बनते हो। वहाँ तो अनाज सब फ्री रहता है, पैसा नहीं लगता। अभी तो कितना मंहगा है। 100 वर्ष में कितना महंगा हो गया है। वहाँ कोई अप्राप्त वस्तु नहीं होती जिसके लिए मुश्किलात आये। वह है ही सुखधाम। तुम अभी वहाँ के लिए तैयारी कर रहे हो। तुम बेगर टू प्रिन्स बनते हो। साहूकार लोग अपने को बेगर नहीं समझते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप से जो सम्पूर्ण पावन बनने की प्रतिज्ञा की है, इसे तोड़ना नहीं है। बहुत-बहुत परहेज रखनी है। अपना चार्ट देखना है – हमारे में कोई अवगुण तो नहीं है?

2) गॉडली युनिवर्सिटी में कभी भी अबसेन्ट नहीं होना है। सुखधाम का मालिक बनने की ऊंची पढ़ाई एक दिन भी मिस नहीं करनी है। मुरली रोज़ जरूर सुननी है।

वरदान:- मन्सा-वाचा और कर्मणा की पवित्रता में सम्पूर्ण मार्क्स लेने वाले नम्बरवन आज्ञाकारी भव
मन्सा पवित्रता अर्थात् संकल्प में भी अपवित्रता के संस्कार इमर्ज न हों। सदा आत्मिक स्वरूप अर्थात् भाई-भाई की श्रेष्ठ स्मृति रहे। वाचा में सदा सत्यता और मधुरता हो, कर्मणा में सदा नम्रता, सन्तुष्टता और हर्षितमुखता हो। इसी आधार पर नम्बर मिलते हैं और ऐसे सम्पूर्ण पवित्र आज्ञाकारी बच्चों का बाप भी गुणगान करते हैं। वही अपने हर कर्म से बाप के कर्तव्य को सिद्ध करने वाले समीप रत्न हैं।
स्लोगन:- सम्बन्ध-सम्पर्क और स्थिति में लाइट बनो, दिनचर्या में नहीं।

TODAY MURLI 14 DECEMBER 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 14 December 2020

14/12/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, your days of sorrow are now over. You are now going to such a world that nothing is unattained there.
Question: By keeping the significance of which two words in your intellects is it possible to have unlimited disinterest in the old world?
Answer: The significance of both the descending and ascending stages are in your intellects. You know that we have been descending for half a cycle; now, it is time to ascend. The Father has come to give us true knowledge to make us into Narayan from ordinary humans. The iron age has now come to an end for us and we are going to the new world. This is why we have unlimited disinterest.
Song: Have patience, o mind! Your days of happiness are about to come.

Om shanti. You sweetest, spiritual children heard the song. The spiritual Father sits here and explains: This is the only elevated confluence age when the Father comes every cycle and teaches the spiritual children. He teaches us Raja Yoga. The Father says to the spiritual children: O human beings, that is, O souls, have patience! He speaks to souls. The soul is the master of this body. The soul says: I am an imperishable soul; this body of mine is perishable. The spiritual Father says: I only come once, at the confluence age, to give you children the patience of knowing that your days of happiness are now coming. You are now in the land of sorrow and the extreme depths of hell. It isn’t just you children, but the whole world, who are in the extreme depths of hell. Those who have become My children have emerged from the extreme depths of hell and are going to heaven. The golden, silver and copper ages have passed. The iron age has also passed for you. For you, it is now the elevated confluence age when you become satopradhan from tamopradhan. When the soul becomes satopradhan he will leave the body. In the golden age, a satopradhan soul needs a new body. There, everything is new. The Father says: Children, you now have to go from the land of sorrow to the land of happiness. Therefore, make effort for that. In the land of happiness it was the kingdom of Lakshmi and Narayan. You are making effort to change from ordinary humans into Narayan. This is the true knowledge to become Narayan from an ordinary human. On the path of devotion they listen to stories from the scriptures on the night of the full moon. However, that is the path of devotion. You cannot call that the path of truth; the path of knowledge is the true path. While descending the ladder you came into the land of falsehood. You now know that, having attained this knowledge from the true Father, we will become deities for 21 births. We were that and then we came down the ladder. The significance of the stages of descending and ascending is in your intellects. They even call out: O Baba, come and purify us! Only the one Father can purify us. The Father says: Children, you were the masters of the world in the golden age. You were very wealthy and happy. There is now little time left. The destruction of the old world is in front of you. In the new world, there is one kingdom and one language. That is called the undivided kingdom. At present, there are many divisions and many languages. Just as the human world tree grows, so the tree of languages also continues to grow. Then there will be one language. It is remembered: The history and geography of the world repeat. This does not sit in the intellects of humans. The Father is the One who changes the old world of sorrow and establishes the new world of happiness. It is written that deityism is established through Prajapita Brahma. This is the study of Raj Yoga. The knowledge written in the Gita is that which the Father spoke to you face to face. People then rewrote this knowledge for the path of devotion, and this led to your descent. God is now teaching you to make you ascend. Devotion is called the path of descending. Knowledge is the path for ascending. Do not be afraid to explain this. Even though some people may oppose and argue with you because they do not understand, you should not argue with anyone. Tell them that the scriptures, the Vedas, the Upanishads, bathing in the Ganges and going on pilgrimages are all the paraphernalia of the path of devotion. Ravan truly exists in Bharat and that is why they burn his effigy. Generally, an effigy of an enemy is burnt for a temporary period, but only the effigy of Ravan is burnt every year. The Father says: Your intellects have become ironaged from golden aged. You were so happy! The Father has come to establish the land of happiness. Later, when the path of devotion begins, you experience sorrow. At that time, you remember the Bestower of Happiness, but that, too, is just in name because you do not know Him. They have changed the name in the Gita. First of all, you should explain that there is only one God, the Highest on High, and it is He who should be remembered. It is the remembrance of only One that is known as unadulterated remembrance and unadulterated knowledge. You do not perform any devotion now as you have become Brahmins; you have knowledge. We become deities through the study that the Father teaches us. Divine virtues also have to be imbibed and that is why Baba says: Keep your chart so that you can know whether you have any devilish traits in you. Bodyconsciousness is the first defect. The next enemy is lust. By conquering lust you will become the conquerors of the world. This is your aim. There aren’t innumerable religions in the kingdom of Lakshmi and Narayan. In the golden age it is only the kingdom of deities. Human beings exist in the iron age. They (deities) are also human beings, but they have divine virtues. At this time, all human beings have devilish traits. Lust, the greatest enemy, does not exist in the golden age. The Father says: By conquering this great enemy of lust you will become the conquerors of the world. Ravan does not exist there. Even this cannot be understood by human beings. Intellects have become tamopradhan while descending from the golden age. You now have to become satopradhan again. You only receive one medicine for this. The Father says: Consider yourselves to be souls and remember the Father and your sins of many births will be burnt away. Since you are sitting here to have your sins burnt away, you shouldn’t commit any further sin. Otherwise it will become one hundred-fold. If you indulge in vice, you will receive one hundred-fold punishment and you will then barely be able to climb up. The number one enemy is lust. If you fall from the fifth floor, your bones would be completely broken. Perhaps you would even die. You are completely crushed when you fall from up above. If you break your promise to the Father and become ugly, you go back to the devilish world. That means you have died from here. Such a soul would not even be called a Brahmin but a shudra. Baba explains in such an easy way. First of all you should have this intoxication. For instance, if there were versions spoken by Krishna, he would also have taught others and made them the same as himself. However, Krishna cannot be God. He takes re-birth. The Father says: I alone am free from re-birth. It is all the same whether you say Radhe and Krishna or Lakshmi and Narayan or Vishnu. The two forms of Vishnu are Lakshmi and Narayan and in their childhood they are Radhe and Krishna. The secret of Brahma has also been explained. Brahma and Saraswati become Narayan and Lakshmi. They are now to be transferred. This one’s name at the end is kept as Brahma, but see how Brahma is now standing completely in the iron age. He does tapasya here in order to become Krishna or Shri Narayan. When you say Vishnu, both are included in that. Saraswati is the daughter of Brahma. No one can understand this. Brahma is shown with four arms because this is the family path. Those on the path of isolation cannot give this knowledge. They trap many people from abroad by telling them that they will teach them ancient Raj Yoga. However, sannyasis cannot teach Raj Yoga. God has now come. You, His children, have now become part of the Godly community. God has come to teach you. He is teaching you Raj Yoga. He is incorporeal. He has made you belong to Him through Brahma. You call out to Him “Baba, Baba!” Brahma is just an interpreter in between. He is “The Lucky Chariot”. Baba teaches you through him. You also become pure from impure. The Father teaches you in order to change you from human beings into deities. It is now the kingdom of Ravan, the devilish community. You now belong to the Godly community and you will then belong to the deity community. You are now at the elevated confluence age and are becoming pure. Sannyasis leave their households. Here, the Father says: Husband and wife may stay together at home. Don’t think that a woman is a serpent and that you will become free by leaving her. You mustn’t run away. Their running away is limited renunciation. You are sitting here, but you have disinterest in this vicious world. You have to imbibe all of these aspects very well. Note them down and also take precautions. Imbibe divine virtues too. There is praise of the virtues of Shri Krishna. That is your aim and objective. The Father does not become that, but He makes you become that. After half a cycle, you climb down and become tamopradhan. I do not become tamopradhan, but this one becomes that. This one has taken 84 births. He now has to become satopradhan; he too is an effort-maker. The new world is said to be satopradhan. Everything is originally satopradhan and it then goes through the stages of sato, rajo and tamo. A young child is also called a great soul. He does not have any vices in him and he is therefore called a flower. A young child is said to be more elevated than a sannyasi because a sannyasi has already experienced life. They have the experience of the five vices. A child is unaware of the vices. This is why there is happiness on seeing a child, a living flower. We belong to the family path. You children now have to go from this old world to the new world. All of you are making effort to go to the land of immortality. You are being transferred from the land of death. In order to become deities you now have to make effort. The children of Prajapita Brahma are brothers and sisters. You were brothers and sisters. What is the relationship between the children of Prajapita Brahma? Prajapita Brahma is remembered. How can the world be created until you become a child of Prajapita Brahma? All are the spiritual children of Prajapita Brahma. Those brahmins are on a physical pilgrimage whereas you are on a spiritual pilgrimage. They are impure and you are pure. You understand that they are not the children of Prajapita Brahma. They will not indulge in vice only when they consider themselves to be brothers and sisters. The Father says: Be careful not to perform any criminal acts after becoming My child. Otherwise, you will become one with a stone intellect. There is a story about the Court of Indra. An angel brought a shudra into the gathering and there was a bad odour. She was questioned as to why she had brought an impure person there. She was then cursed. In fact, no impure person can come into this gathering. Whether the Father is aware or not, they cause themselves a loss; they incur one hundred-fold punishment. Impure ones are not allowed here. A visiting room is suitable for them. Only when they promise to become pure and imbibe divine virtues will they be allowed. It takes time to imbibe divine virtues. There is only one promise: to become pure. It has also been explained that the praise of the Supreme Soul is different from that of the deities. Only the Father is the Purifier, the Liberator andthe Guide. He liberates us from all sorrow and takes us back to the land of peace. The cycle is made up of the land of peace, the land of happiness and the land of sorrow. You now have to forget the land of sorrow. Only those who pass, numberwise, will be able to go to the land of happiness from the land of peace. They will continue to come down; the cycle continues to turn. There are very many souls and each soul has his own part, numberwise. Souls will return, numberwise, as well. That is called Shiv Baba’s genealogical tree or the rosary of Rudra. Souls will return, numberwise, and come back, numberwise. Other religions also go through the same process. It is explained to the children every day: If you do not study at school every day and don’t listen to the murli, you will be marked absent. You definitely need the lift of studying. You should not be absent from the Godly university. This study, through which you become the masters of the land of happiness, is so elevated. There, all grains are free; they don’t cost anything. At present they are so expensive. Within a span of 100 years it has become so expensive. There, there is nothing that is unavailable or difficult to obtain. That is the land of happiness. You are getting ready to go there. From beggarsyou are becoming princes. Wealthy people do not consider themselves to be beggars. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. You should not break the promise you made to the Father to become completely pure. You have to take a lot of precautions. Examine your chart to see whether you have any devilish traits.
  2. You should not be absent from the Godly university. Do not miss this elevated study of becoming the masters of the land of happiness for even a day. Definitely listen to the murli every day.
Blessing: May you be a number one obedient soul who claims full marks in purity of thoughts, words and deeds.
Purity in the mind means that no sanskars of impurity emerge even in your thoughts. To be constantly in the soul conscious form means to have the elevated awareness of brotherhood. Let there always be truth and sweetness in your words and humility, contentment and cheerfulness in your deeds. Each of you receives a number on this basis and even the Father sings praise of such completely pure and obedient children. They are the close jewels who reveal the Father’s task through every deed of theirs.
Slogan: Be light in your relationships, connections and stage, not in keeping your day’s timetable.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 14 DECEMBER 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 14 December 2019

14/12/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you come to the Father in order to be refreshed. When you meet the Father, all your tiredness from the path of devotion is removed.
Question: What methods does Baba use to refresh you children?
Answer: 1. Baba refreshes you by continually giving you this knowledge. 2. You are also refreshed by having remembrance of Baba. The golden age is in fact the true land of rest. You lack nothing there for which you would have to make effort. 3. As soon as you take Shiv Baba’s lap, you children receive rest and all your tiredness is removed.

Om shanti. The Father sits here and explains and, because the Father sits and explains through this Dada, this Dada listens to Him at the same time. This Dada understands just like you do. It is not Dada who is called God. These are the versions of God. What does the Father say? May you become soul conscious. This is because, unless you consider yourself to be a soul, you cannot remember the Supreme Father, the Supreme Soul. At present, all souls are impure. Impure ones are called human beings, whereas pure ones are called deities. These things are very easy to understand and explain to others. It is human beings who call out: O Purifier of the Impure, come! Deities never call out in this way. The Purifier Father comes at the call of the impure ones. He makes souls pure and also establishes the pure, new world. It is souls that call out to the Father; bodies do not call out. Everyone remembers the parlokik Father, the One who is ever pure. This world is old. The Father makes the world new and pure. Some people say that they have unlimited happiness here (in the old world). They have plenty of wealth and property here and so they think that this is heaven for them. How would they accept the things you say? It is senseless to consider this iron-aged world to be heaven. This world has reached a state of total decay. Nevertheless, they still say that they are sitting in heaven. If you children are unable to explain this, the Father would definitely ask if your intellects are made of stone. Are you not able to explain this to others? Only when you become those with divine intellects will you be able to make others the same as yourselves. You have to make effort very well. There is no question of being embarrassed about this. However, human beings are unable to forget very quickly the wrong ideas that their intellects have been filled with for half a cycle. Until you have accurate recognition of the Father, you won’t be able to have that power. The Father says: Human beings have not been reformed by studying those Vedas and scriptures. They became worse day by day. They have become tamopradhan from satopradhan. It is not in anyone’s intellect how we were satopradhan deities and how we came down. No one knows anything at all. Instead of 84 births, they speak of 8.4 million births. Therefore, how could they know anything? No one but the Father can give you the light of knowledge. Everyone continues to stumble along from door to door after one another. They have continued to come down and have now reached the bottom. They have used up all their strength. Their intellects have no strength with which to recognise the Father accurately. The Father comes and opens the lock on everyone’s intellect. Then they become so refreshed. You children come to the Father in order to be refreshed. You get rest in your home. When you find the Father, all your tiredness from the path of devotion is removed. The golden age is also called the land of rest. You get so much rest there! There, you do not lack anything for which you would have to make effort. Here, the Father, as well as this Dada, refreshes you. As soon as you come into Shiv Baba’s lap you receive so much rest. Rest means silence. People go to rest when they are tired. Some go to one place to rest and others go somewhere else to rest. However, there is no refreshment in that rest. Here, the Father refreshes you so much with knowledge. You also become refreshed by having remembrance of the Father. From being tamopradhan, you continue to become satopradhan. You come here to the Father in order to become satopradhan. The Father says: Sweetest children, remember the Father. The Father has explained how the world cycle turns and how and where all souls receive rest. It is the duty of you children to give everyone the Father’s message. The Father says: Remember Me and you will become the masters of this inheritance. The Father creates the new world of heaven at the confluence age. You go and become the masters there. Then, in the copper age, you are cursed by Maya, Ravan, and you lose all of your purity, peace, happiness, wealth etc. The Father has also explained how you gradually lose them. There cannot be any rest in the land of sorrow, whereas there is nothing but rest in the land of happiness. People become very tired by performing devotion. They have become tired by performing devotion for birth after birth. The Father sits here and explains the secrets of how you became totally poverty-stricken. When new ones come here, you have to explain so much to them. They think about everything so much. They are afraid that they might have a magic spell cast on them. However, you are the ones who say that God is the Magician. So, the Father says: Yes, I truly am the Magician, but I do not perform magic to change people into sheep or goats. Your intellects can understand which ones are like goats. There is the song that says: What could a goat know about the celestial sounds of heaven? At present, people are like sheep and goats. All of those stories refer to this place; those songs refer to this time. People are unable to understand even at the end of the cycle. They hold such a large fair for Chandika (the Cremator goddess). Who was she? They say that she was a goddess. They do not have such names in the golden age. They have beautiful names in the golden age. Those in the golden-aged community are called elevated whereas those in the iron-aged community have been given dirty titles. One wouldn’t say that the people of today are elevated. It is the deities who are called elevated. There is a saying that it didn’t take God long to change human beings into deities. The Father has explained to you the secret of how deities change into human beings and how human beings change into deities. That is the deity world and this is the human world. Day is light and night is darkness. Knowledge is light and devotion is darkness. It is called the sleep of ignorance. You understand that you knew nothing of this previously. You used to say “neti, neti”, which means that you didn’t know. You now understand that you were atheists previously; you didn’t know the unlimited Father. He is your true, eternal Baba. He is called the Father of all souls. You children know that you now belong to that unlimited Father. The Father gives you children incognito knowledge. You cannot receive this knowledge from human beings. You souls are incognito and the knowledge you souls imbibe is also incognito. You souls speak this knowledge through your mouths. You souls stay in incognito remembrance of the incognito Father. The Father says: Children, do not become body conscious. When you souls become body conscious, you lose your strength. By becoming soul conscious, you souls accumulate power within yourselves. The Father says: You have to continue to move along whilst very clearly understanding the secrets of the drama. Those who very clearly understand the secrets of the imperishable drama will always remain cheerful. At this time, people make so much effort to go above because they think that there is a world up there. They have heard from the scriptures that there is a world up there and so they want to go and see it. Because this world population has grown so much, they try to establish a world up there. There only used to be the one original, eternal, deity religion in Bharat; there were no other lands etc. Then the population grew so much! Just think about it: the deities must have been living within such a small area of Bharat! Paristhan existed by the banks of the River Jamuna where Lakshmi and Narayan ruled. The world was then so beautiful and satopradhan; there was natural beauty. The entire sparkle is in the soul. Some of you children have had visions of how Shri Krishna takes birth. It is as though there is light in the whole room. The Father sits here and explains to you children. You are now making effort to go to Paristhan. It isn’t that you become angels by taking a dip in that lake. Lakes have been given those false names. By speaking of hundreds of thousands of years, they have completely forgotten everything. You now remember everything, numberwise, according to the efforts you make. You should think about how such tiny souls play such large parts through their bodies. Just look at the state of someone’s body after the soul has left it. It is souls that plays parts. This is a matter for deep thought. All the actors of the whole world have to act out their own parts. There cannot be the slightest difference in their own parts. All the actare being repeated identically. There can be no doubt about this. There can be a difference between everyone’s intellects, because the mind and intellect are together in the soul. When children know that they are going to receive a scholarship, they have happiness in their hearts. Here, too, as soon as you come in and see your aim and objective in front of you, you definitely become happy. You now know that you are studying here in order to become like them (Lakshmi and Narayan). There isn’t any other school where you can see your aim and objective for your next birth. You can see how you are becoming like Lakshmi and Narayan. We are now at the confluence age and are studying this education in order to become like Lakshmi and Narayan in the future. This is such an incognito study! There should be so much happiness when you see your aim and objective. There should be no limit to your happiness. This is what a school should be like. This school is incognito, but very powerful. Normally, according to how important a study is, there would be that many facilities. However, here, you study whilst sitting on the floor. It is you souls that have to study and so, whether you sit on the floor or on a gaddi, you should be jumping with joy that you will become like them after studying for that and passing the exams. The Father has now come and given you children His introduction and told you how He enters this one and teaches you. The Father doesn’t teach deities. How could deities have this knowledge? People become confused and ask: Do deities not have this knowledge? It was by studying this knowledge that they became deities. Having become deities, what need would they have for this knowledge? Would you continue to study to become a barrister after you had become a barrister and were earning an income? Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Remain cheerful by accurately understanding the secrets of the imperishable drama. Each actor has to play his own part in this drama and he plays it identically each cycle.
  2. Keeping your aim and objective in front of you, you should be jumping with joy as you are becoming like them. Let it remain in your intellect that it is through this study that you are becoming like Lakshmi and Narayan.
Blessing: May you become a completely pure soul and experience the stage of happiness at every second of Brahmin life.
Purity is said to be the mother of happiness and peace. Any type of impurity makes you experience sorrow and peacelessness. Brahmin life means staying in a stage that gives happiness at every second. Even if there is a scene of sorrow, where there is the power of purity, there cannot be any experience of sorrow. Pure souls become master bestowers of happiness and transform an atmosphere of sorrow into one of spiritual happiness.
Slogan: To increase your spiritual endeavour by experimenting with the facilities is to have an attitude of unlimited disinterest.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 14 DECEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 14 December 2019

14-12-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम बाप के पास आते हो रिफ्रेश होने, बाप के मिलने से भक्ति मार्ग की सब थकान दूर हो जाती है”
प्रश्नः- तुम बच्चों को बाबा किस विधि से रिफ्रेश करते हैं?
उत्तर:- 1. बाबा ज्ञान सुना-सुना कर तुम्हें रिफ्रेश कर देते हैं। 2. याद से भी तुम बच्चे रिफ्रेश हो जाते हो। वास्तव में सतयुग है सच्ची विश्राम पुरी। वहाँ कोई अप्राप्त वस्तु नहीं, जिसको प्राप्त करने के लिए परिश्रम करना पड़े, 3. शिवबाबा की गोद में आते ही तुम बच्चों को विश्राम मिल जाता है। सारी थकान दूर हो जाती है।

ओम् शान्ति। बाप बैठ समझाते हैं, साथ में यह दादा भी समझते हैं क्योंकि बाप इन दादा द्वारा बैठ समझाते हैं। जैसे तुम समझते हो, वैसे यह दादा भी समझते हैं। दादा को भगवान नहीं कहा जाता, यह है भगवानुवाच। बाप क्या समझाते हैं? देही-अभिमानी भव क्योंकि अपने को आत्मा समझने बिगर परमपिता परमात्मा को याद कर न सकें। इस समय तो सभी आत्मायें पतित हैं। पतित को ही मनुष्य कहा जाता है, पावन को देवता कहा जाता है। यह बहुत सहज समझने और समझाने की बातें हैं। मनुष्य ही पुकारते हैं-हे पतितों को पावन बनाने वाले आओ। देवी-देवतायें ऐसे कभी नहीं कहेंगे। पतित-पावन बाप पतितों के बुलावे पर आते हैं। आत्माओं को पावन बनाकर फिर नई पावन दुनिया भी स्थापन करते हैं। आत्मा ही बाप को पुकारती है। शरीर तो नहीं पुकारेगा। पारलौकिक बाप जो सदा पावन है, उसे ही सब याद करते हैं। यह है पुरानी दुनिया। बाप नई पावन दुनिया बनाते हैं। कई तो ऐसे भी हैं जो कहते हैं हमको तो यहाँ ही अपार सुख हैं, धन माल बहुत है। वह समझते हैं हमारे लिए स्वर्ग यही हैं। वह तुम्हारी बातें कैसे मानेंगे? कलियुगी दुनिया को स्वर्ग समझना-यह भी बेसमझी है। कितनी जड़जड़ीभूत अवस्था हो गई है। तो भी मनुष्य कहते हैं हम तो स्वर्ग में बैठे हैं। बच्चे नहीं समझाते हैं तो बाप कहेंगे ना-तुम क्या पत्थरबुद्धि हो? दूसरे को नहीं समझा सकते हो? जब खुद पारसबुद्धि बनें तब तो दूसरों को भी बनावें। पुरूषार्थ अच्छा करना चाहिए, इसमें लज्जा की बात नहीं। परन्तु मनुष्यों की बुद्धि में आधाकल्प की जो उल्टी मतें भरी हुई हैं वह कोई जल्दी भूलते नहीं। जब तक बाप को यथार्थ रीति नहीं पहचाना है तब तक वह ताकत आ नहीं सकती। बाप कहते हैं इन वेदों-शास्त्रों आदि से मनुष्य कुछ भी सुधरते नहीं हैं। दिन-प्रतिदिन और ही बिगड़ते आये हैं। सतोप्रधान से तमोप्रधान ही बने हैं। यह किसकी भी बुद्धि में नहीं है कि हम ही सतोप्रधान देवी-देवता थे, कैसे नीचे गिरे हैं। किसको ज़रा भी पता नहीं है और फिर 84 जन्म के बदले 84 लाख जन्म कह दिया है तो फिर पता भी कैसे पड़े। बाप बिगर ज्ञान की रोशनी देने वाला कोई नहीं। सभी एक-दो के पिछाड़ी दर-दर धक्के खाते रहते हैं। नीचे गिरते-गिरते पट पड़ गये हैं, सब ताकत खत्म हो गई है। बुद्धि में भी ताकत नहीं जो बाप को यथार्थ जान सकें। बाप ही आकर सबकी बुद्धि का ताला खोलते हैं। तो कितने रिफ्रेश होते हैं। बाप के पास बच्चे रिफ्रेश होने आते हैं। घर में विश्राम मिलता है ना। बाप के मिलने से भक्ति मार्ग की सब थकान ही दूर हो जाती है। सतयुग को भी विश्रामपुरी कहा जाता है। वहाँ तुम्हें कितना विश्राम मिलता है। कोई अप्राप्त वस्तु नहीं जिसके लिए परिश्रम करना पड़े। यहाँ रिफ्रेश बाप भी करते हैं तो यह दादा भी करते हैं। शिवबाबा की गोद में आते कितना विश्राम मिलता है। विश्राम माना ही शान्त। मनुष्य भी थककर विश्रामी हो जाते हैं। कोई कहाँ, कोई कहाँ विश्राम के लिए जाते हैं ना। लेकिन उस विश्राम में रिफ्रेशमेंट नहीं। यहाँ तो बाप तुम्हें कितना ज्ञान सुनाकर रिफ्रेश करते हैं। बाप की याद से भी कितने रिफ्रेश होते और तमोप्रधान से सतोप्रधान भी बनते जाते हो। सतोप्रधान बनने के लिए यहाँ बाप के पास आते हो। बाप कहते हैं मीठे-मीठे बच्चों, बाप को याद करो। बाप ने समझाया है कि सारे सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है, सर्व आत्माओं को विश्राम कैसे और कहाँ मिलता है। तुम बच्चों का फ़र्ज है-सबको बाप का पैगाम देना। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो इस वर्से के तुम मालिक बन जायेंगे। बाप इस संगमयुग पर नई स्वर्ग की दुनिया रचते हैं। जहाँ तुम जाकर मालिक बनते हो। फिर द्वापर में माया रावण के द्वारा तुम्हें श्राप मिलता है, तो पवित्रता, सुख, शान्ति, धन आदि सब खत्म हो जाता है। कैसे धीरे-धीरे खत्म होता है वह भी बाप ने समझाया है। दु:खधाम में कोई विश्राम थोड़ेही होता है। सुखधाम में विश्राम ही विश्राम है। मनुष्यों को भक्ति कितना थकाती है। जन्म-जन्मान्तर भक्ति से कितने थक जाते हैं। कैसे एकदम कंगाल बन गये हो, यह सारा राज़ बाप बैठ समझाते हैं। नये-नये आते हैं तो उन्हें कितना समझाना होता है। हर एक बात पर मनुष्य कितना सोचते हैं। समझते हैं कहाँ जादू न हो। अरे, तुम ही कहते हो भगवान जादूगर है। तो बाप कहते हैं हाँ, मैं बरोबर जादूगर हूँ। परन्तु वह जादू नहीं, जिससे मनुष्य भेड़-बकरी बन जायें। यह बुद्धि से समझा जाता है, यह तो जैसे रिढ़ मिसल है। गायन भी तो है सुरमण्डल के साज़ से….. इस समय तो जैसे सभी मनुष्य रिढ़-बकरियाँ हैं। यह बातें सारी यहाँ की हैं। इस समय का ही गायन है। कल्प के पिछाड़ी को भी मनुष्य समझ नहीं सकते। चण्डिका का कितना बड़ा मेला लगता है। वह कौन थी? कहते हैं वह एक देवी थी। ऐसा नाम तो वहाँ कोई होता ही नहीं। सतयुग में कितने अच्छे सुन्दर नाम होते हैं। सतयुगी सम्प्रदाय को श्रेष्ठाचारी कहा जाता है। कलियुगी सम्प्रदाय को तो कितना छी-छी टाइटल देते हैं। अभी के मनुष्यों को श्रेष्ठ नहीं कहेंगे। देवताओं को श्रेष्ठ कहा जाता है। गायन भी है मनुष्य से देवता किये, करत न लागी वार। मनुष्य से देवता, देवता से मनुष्य कैसे बनते हैं, यह राज़ बाप ने तुम्हें समझाया है। उनको डीटी वर्ल्ड, इनको ह्युमन वर्ल्ड कहा जाता है। दिन को सोझरा, रात को अन्धियारा कहा जाता है। ज्ञान है सोझरा, भक्ति है अन्धियारा। अज्ञान नींद कहा जाता है ना। तुम भी समझते हो कि आगे हम कुछ भी नहीं जानते थे तो नेती-नेती कहते थे अर्थात् हम नहीं जानते। अभी तुम समझते हो-हम भी तो पहले नास्तिक थे। बेहद के बाप को ही नहीं जानते थे। वह है असली अविनाशी बाबा। उसे सर्व आत्माओं का बाप कहा जाता है। तुम बच्चे जानते हो-अभी हम उस बेहद के बाप के बने हैं। बाप बच्चों को गुप्त ज्ञान देते हैं। यह ज्ञान मनुष्यों के पास कहाँ मिल न सके। आत्मा भी गुप्त है, गुप्त ज्ञान आत्मा धारण करती है। आत्मा ही मुख द्वारा ज्ञान सुनाती है। आत्मा ही गुप्त बाप को गुप्त याद करती है।

बाप कहते हैं बच्चों, देह-अभिमानी नहीं बनो। देह-अभिमान से आत्मा की ताकत खत्म होती है। आत्म-अभिमानी बनने से आत्मा में ताकत जमा होती है। बाप कहते हैं ड्रामा के राज़ को अच्छी रीति समझकर चलना है। इस अविनाशी ड्रामा के राज़ को जो ठीक रीति जानते हैं, वह सदा हर्षित रहते हैं। इस समय मनुष्य ऊपर जाने की कितनी कोशिश करते हैं, समझते हैं ऊपर में दुनिया है। शास्त्रों में सुन रखा है ऊपर में दुनिया है तो वहाँ जाकर देखें। वहाँ दुनिया बसाने की कोशिश करते हैं। दुनिया तो बहुत बसाई है ना। भारत में सिर्फ एक ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म था और कोई खण्ड आदि नहीं था। फिर कितना बसाया है। तुम विचार करो भारत के कितने थोड़े टुकड़े में देवतायें होते हैं। जमुना के किनारे पर ही परिस्तान था जहाँ यह लक्ष्मी-नारायण राज्य करते थे। कितनी सुन्दर शोभायमान, सतोप्रधान दुनिया थी। नैचुरल ब्युटी थी। आत्मा में ही सारा चमत्कार रहता है। बच्चों को दिखाया था श्रीकृष्ण का जन्म कैसे होता है। सारे कमरे में जैसे रोशनी हो जाती है। तो बाप बैठ कर बच्चों को समझाते हैं, अभी तुम परिस्तान में जाने के लिए पुरूषार्थ कर रहे हो। बाकी ऐसे नहीं – तालाब में डुबकी लगाने से परियाँ बन जायेंगे। यह सभी झूठे नाम रख दिये हैं। लाखों वर्ष कह देने से बिल्कुल ही सब-कुछ भूल गये हैं। अभी तुम अभुल बन रहे हो नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। विचार किया जाता है-इतनी छोटी-सी आत्मा कितना बड़ा पार्ट शरीर से बजाती है, फिर शरीर से आत्मा निकल जाती है तो शरीर का देखो क्या हाल हो जाता है। आत्मा ही पार्ट बजाती है। कितनी बड़ी विचार की बात है। सारी दुनिया के एक्टर्स (आत्मायें) अपनी एक्ट अनुसार ही पार्ट बजाते हैं। कुछ भी फर्क नहीं पड़ सकता। हूबहू सारी एक्ट फिर से रिपीट हो रही है। इसमें संशय कर नहीं सकते। हर एक की बुद्धि में फर्क पड़ सकता है क्योंकि आत्मा तो मन-बुद्धि सहित है ना। बच्चों को मालूम है कि हमको स्कॉलरशिप लेनी है तो दिल अन्दर खुशी होती है। यहाँ भी अन्दर आने से ही एम ऑब्जेक्ट सामने देखते हैं तो खुशी तो जरूर होगी। अभी तुम जानते हो हम यह (देवी-देवता) बनने के लिए यहाँ पढ़ते हैं। ऐसा कोई स्कूल नहीं जहाँ दूसरे जन्म की एम ऑब्जेक्ट को देख सकें। तुम देखते हो कि हम लक्ष्मी-नारायण जैसे बन रहे हैं। अभी हम संगमयुग पर हैं जो भविष्य में इन जैसा लक्ष्मी-नारायण बनने की पढ़ाई पढ़ रहे हैं। कितनी गुप्त पढ़ाई है। एम ऑब्जेक्ट को देख कितनी खुशी होनी चाहिए। खुशी का पारावार नहीं। स्कूल वा पाठशाला हो तो ऐसी। है कितनी गुप्त, परन्तु जबरदस्त पाठशाला है। जितनी बड़ी पढ़ाई उतनी ही फैसिलिटीज़ रहती हैं। परन्तु यहाँ तुम पट पर बैठ पढ़ते हो। आत्मा को पढ़ना होता है फिर चाहे पट पर बैठे, चाहे तख्त पर, परन्तु खुशी से खग्गियां मारते रहो कि इस पढ़ाई को पास करने बाद जाकर यह बनेंगे। अभी तुम बच्चों को बाप ने आकर अपना परिचय दिया है कि मैं इनमें कैसे प्रवेश कर तुम्हें पढ़ाता हूँ। बाप देवताओं को तो नहीं पढ़ायेंगे। देवताओं को यह ज्ञान कहाँ। मनुष्य तो मूँझते हैं क्या देवताओं में ज्ञान नहीं है। देवतायें ही इस ज्ञान से देवता बनते हैं। देवता बनने के बाद फिर ज्ञान की क्या दरकार है। लौकिक पढ़ाई से बैरिस्टर बन गया, कमाई में लग गया फिर बैरिस्टरी पढ़ेंगे क्या? अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अविनाशी ड्रामा के राज़ को यथार्थ समझ हर्षित रहना है। इस ड्रामा में हर एक एक्टर का पार्ट अपना-अपना है, जो हूबहू बजा रहे हैं।

2) एम ऑब्जेक्ट को सामने रख खुशी में खग्गियां मारनी है। बुद्धि में रहे हम इस पढ़ाई से ऐसा लक्ष्मी-नारायण बनेंगे।

वरदान:- ब्राह्मण जीवन में हर सेकण्ड सुखमय स्थिति का अनुभव करने वाले सम्पूर्ण पवित्र आत्मा भव
पवित्रता को ही सुख-शान्ति की जननी कहा जाता है। किसी भी प्रकार की अपवित्रता दु:ख अशान्ति का अनुभव कराती है। ब्राह्मण जीवन अर्थात् हर सेकण्ड सुखमय स्थिति में रहने वाले। चाहे दु:ख का नज़ारा भी हो लेकिन जहाँ पवित्रता की शक्ति है वहाँ दु:ख का अनुभव नहीं हो सकता। पवित्र आत्मायें मास्टर सुख कर्ता बन दु:ख को रूहानी सुख के वायुमण्डल में परिवर्तन कर देती हैं।
स्लोगन:- साधनों का प्रयोग करते साधना को बढ़ाना ही बेहद की वैराग्य वृत्ति है।

BRAHMA KUMARIS MURLI 14 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 14 December 2018

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14-12-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – अपना सरनेम सदा याद रखो, तुम हो गॉडली चिल्ड्रेन, तुम्हारा ईश्वरीय कुल है, तुम देवताओं से भी ऊंच हो, तुम्हारे मैनर्स बड़े रॉयल चाहिए”
प्रश्नः- बाप ने बच्चों को आप समान प्यार का सागर बनाया है, उसकी निशानी क्या है?
उत्तर:- तुम बच्चे बाप समान प्यारे बने हो इसलिए तो तुम्हारे यादगार चित्रों को सभी प्यार करते हैं। प्यार से देखते रहते हैं। लक्ष्मी-नारायण सदा हर्षितमुख, रमणीक हैं। अभी तुम जानते हो कि बाबा हमें ज्ञान-योग से बहुत-बहुत मीठा बना रहे हैं। तुम्हें मुख से सदा ज्ञान रत्न ही निकालने हैं।
गीत:- तू प्यार का सागर है…….. 

ओम् शान्ति। यह किसकी महिमा में गाते हैं कि तू प्यार का सागर है। यह किसी मनुष्य की महिमा नहीं। कहा जाता है कि तू प्यार, शान्ति व पवित्रता का सागर है। अभी तुम पवित्र बनते हो। ऐसे बहुत हैं जो शादी नहीं करते, बहुत हैं जो बिगर सन्यास लिए भी पवित्र रहते हैं। गाया हुआ भी है – गृहस्थ व्यवहार में जनक मिसल ज्ञान। उसकी हिस्ट्री है। कहा हमको कोई ब्रह्म ज्ञान सुनाओ। वास्तव में कहना चाहिए ब्रह्मा ज्ञान। परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा आकर ज्ञान देते हैं ब्रह्माकुमार कुमारियों को।

तुम जानते हो कि इस समय हमारा सरनेम है ब्रह्माकुमार-कुमारी, हम हैं गॉडली चिल्ड्रेन। ऐसे तो सब कहते हैं हम ईश्वर की सन्तान हैं। तो जरूर भाई-भाई ठहरे तो फिर अपने को बाप कह न सकें। फादर हुड नहीं फिर तो ब्रदरहुड कहा जाए। एक तो तुम ब्रह्माकुमार-कुमारी कहलाते हो, दूसरा जिसके कुमार-कुमारियां हो उनको मम्मा-बाबा कहते हो। बच्चे जानते हैं हम शिवबाबा के पोत्रे-पोत्रियां ब्रहमाकुमार-कुमारियां है। भारत में अनेक शास्त्र, वेद, पुराण आदि तो सब पढ़ते हैं। सर्व शास्त्रमई शिरोमणी श्रीमद् भगवत गीता है। गीता से सतयुग स्थापन होता है। गीता का ज्ञान दिया ज्ञान सागर परमात्मा ने। यह सब ज्ञान नदियां ज्ञान सागर से निकलती हैं। पानी की गंगा से थोड़ेही ज्ञान मिलता है जो पावन बनेंगे। सद्गति अर्थात् पावन बनना। यह तो है ही तमोप्रधान पतित दुनिया। अगर पावन बनें तो कहाँ रहें। वापिस तो जा न सकें। कायदा नहीं है। सबको पुनर्जन्म ले तमोप्रधान बनना ही है। बाप है ज्ञान का सागर। तुम प्रैक्टिकल रूप से सुन रहे हो। यह कोई कॉपी कर न सके। भल ऐसे बहुत हैं जो कहते हैं हम भी वही ज्ञान देते हैं, परन्तु नहीं। यहाँ जिसको भी ज्ञान मिलता है वह ब्रह्माकुमार-कुमारी कहलाते हैं और कोई ऐसी संस्था नहीं जहाँ ब्रह्माकुमार-कुमारी कहलायें। भल ड्रेस भी यह पहनें परन्तु यह कैसे कहें कि हम ब्रह्मा के बच्चे हैं। इनको मैंने नाम दिया है ब्रह्मा। इनको बैठ समझाते हैं। तुमको भी कहते हैं तुम ब्रह्माकुमार-कुमारियां अपने जन्मों को नहीं जानते, मैं जानता हूँ। अब संगमयुग पर पैर और चोटी हैं इससे पुरानी दुनिया बदल नई बनती है। सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग….. सृष्टि वृद्धि को पाती रहती है। अब अन्त है, दुनिया बदल नई बननी है। बाप आकर त्रिकालदर्शी बनाते हैं। वह है प्यार का सागर, तो जरूर ऐसा प्यारा बनायेगा। लक्ष्मी-नारायण में देखो कितनी आकर्षण है। जितना लक्ष्मी-नारायण का रमणीक हर्षितमुख चित्र देखेंगे उतना राम-सीता का नहीं। लक्ष्मी-नारायण को देखने में ही खुशी आ जाती है। राधे-कृष्ण के मन्दिर में जाने से इतनी खुशी नहीं होगी। लक्ष्मी-नारायण को तो राज्य-भाग्य है। अब दुनिया तो इन बातों को जानती नहीं। तुम जानते हो बाबा हमको बहुत मीठा बनाते हैं। लक्ष्मी-नारायण को ज्ञान का सागर नहीं कहेंगे। वह इस ज्ञान-योग से ऐसे बने। अब तुम भी बनते हो। मनुष्य चाहते हैं कि दुनिया एक हो जाए, एक राज्य हो। याद दिलाते हैं कि कभी एक राज्य जरूर था। परन्तु ऐसे नहीं सब मिलकर एक हो जायेंगे। नहीं, वहाँ तो बहुत थोड़े मनुष्य थे। तुम समझते हो हम ईश्वरीय सन्तान हैं। कहते हैं ईश्वर हाज़िराहज़ूर है। परन्तु हाज़िर-नाज़िर आत्मा को कहेंगे। आत्मा सर्वव्यापी है, सबमें आत्मा है। ऐसे नहीं सबमें परमात्मा है। तो कसम उठाने की क्या बात है? अगर हमारे में परमात्मा है तो कसम किसकी उठाते हैं? हम अगर उल्टा कार्य करेंगे तो परमात्मा सज़ा देंगे। अगर परमात्मा सबमें हैं तो कसम आदि की बात नहीं। अब तुम साकार में हो, जैसे आत्मा इन आंखों से देखी नहीं जाती तो परमात्मा को कैसे देखेंगे? फील करते हैं हमारे में आत्मा है। कहेंगे परमात्मा का साक्षात्कार हो लेकिन जब आत्मा को ही नहीं देख सकते तो परमात्मा को कैसे देख सकेंगे? आत्मा ही पुण्य आत्मा, पाप आत्मा बनती है। इस समय पाप आत्मा है। तुमने बहुत पुण्य किया था, बाप के आगे तन-मन-धन समर्पण किया था। अब पाप आत्मा से पुण्य आत्मा बन रहे हो। शिवबाबा को तन-मन-धन बलि देते हो। इसने भी अर्पण किया ना। तन भी सच्ची सेवा में दिया। माताओं के आगे अर्पण कर उन्हें ट्रस्टी बना दिया। माताओं को आगे बढ़ाना है। माताओं ने ही आकर शरण ली तो उनकी सम्भाल कैसे हो? माताओं पर बलि चढ़ना पड़े। बाप कहते हैं वन्दे मातरम्। हाज़िर-नाज़िर का भी राज़ समझाया है। आत्मा पुकारती है ओ गॉड फादर। किस फादर को बुलाते हैं? समझते नहीं। तुम लक्ष्मी-नारायण बनते हो। मनुष्य कितना प्यार करते हैं। हर होलीनेस और हिज़ होलीनेस उनको कहा जाता है। अब तुम कहेंगे हम ईश्वरीय कुल के हैं, पहले आसुरी कुल के थे। ब्राह्मणों का तो सरनेम ही है ईश्वरीय सन्तान। बापू गांधी भी चाहते थे कि रामराज्य हो। नये भारत में नया राज्य हो। वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी गवर्मेन्ट हो जो कि बेहद का बाप ही बना सकते हैं। बाप कहते हैं मैं वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी हूँ। ऊंच ते ऊंच निराकार हूँ। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर तो हमारी रचना है। भारत शिवालय, सम्पूर्ण निर्विकारी था, अब सम्पूर्ण विकारी है। यह भी नहीं जानते कि सम्पूर्ण निर्विकारी यहाँ होते हैं। चाहते हैं वन वर्ल्ड हो, वन ऑलमाइटी अथॉरिटी राज्य हो। सो तो परमात्मा वन वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी डीटी, लक्ष्मी-नारायण का राज्य स्थापन कर रहे हैं और सबका विनाश सामने खड़ा है। इतना नशा रहना चाहिए! यहाँ से घर जाते हैं तो मूर्छित हो जाते हैं। संजीवनी बूटी की कहानी है ना। लेकिन यह तो ज्ञान की बूटी है, मनमनाभव की। देह-अभिमान में आने से माया का थप्पड़ लगता है। देही-अभिमानी बनने से थप्पड़ नहीं लगेगा। हम शिवबाबा से वर्सा लेते हैं। ब्रह्मा का यह अन्तिम जन्म है, वह भी वर्सा लेते हैं। डीटी वर्ल्ड सावरन्टी इज योर गॉड फादरली बर्थ राइट। तुम बच्चों में दैवी मैनर्स होने चाहिए। तुम ब्राह्मण देवताओं से भी ऊंच हो। तुमको बहुत मीठा बोलना चाहिए। भाषण आदि में तो बोलना पड़ता है, बाकी व्यर्थ बातों में नहीं जाना चाहिए। मुख से सदैव रत्न निकालो। भल यह आंखे हैं लेकिन स्वर्ग को और मूलवतन को देखो। ज्ञान का नेत्र आत्मा को प्राप्त होता है। आत्मा आरगन्स द्वारा पढ़ती है। तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है, जैसे अक्ल की दाढ़ निकलती है। बाप वर्सा ब्राह्मणों को देगा, शूद्रों को थोड़ेही देगा। तीसरा नेत्र आत्मा को मिलता है। ज्ञान नेत्र बिना राइट-रांग को समझ नहीं सकते। रावण रांग रास्ते पर ही चलायेगा, बाबा राइट रास्ते पर चलाते हैं। हमेशा एक-दूसरे से गुण उठाना चाहिए। गुण के बदले अवगुण नहीं उठाना चाहिए।

देखो डॉ. निर्मला आती है, उनका स्वभाव बहुत मीठा है। शान्तचित, थोड़ा बोलना उनसे सीखना चाहिए। बड़ी सयानी और मीठी बच्ची है। शान्त में भी बैठने की रॉयल्टी चाहिए। ऐसे नहीं कुछ समय याद किया फिर सारा दिन ख़लास। यह भी अभ्यास करना है। बाप को याद करने से ताकत आती है। तो बाप भी खुश होता है। ऐसी अवस्था वाला जिसको भी देखेगा तो झट उनको भी अशरीरी बना देगा। अशरीरी बन जाते हैं, शान्त हो जाते हैं। सिर्फ शान्ति में बैठना कोई सुख नहीं है, वह है अल्पकाल का सुख। शान्त हो बैठ जायेगा तो फिर कर्म कैसे करेगा? योग से विकर्म विनाश होंगे। सच्ची सुख-शान्ति तो यहाँ हो न सके। यहाँ हर चीज़ अल्पकाल की है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

रात्रि क्लास 9-4-68

आजकल बहुत करके यही कान्फ्रेन्स करते रहते हैं कि विश्व में शान्ति कैसे हो! उन्हों को बताना चाहिए देखो सतयुग में एक ही धर्म, एक ही राज्य, अद्वैत धर्म था। दूसरा कोई धर्म ही नहीं जो ताली बजे। था ही रामराज्य, तब ही विश्व में शान्ति थी। तुम चाहते हो विश्व में शान्ति हो। वह तो सतयुग में थी। पीछे अनेक धर्म होने से अशान्ति हुई है। परन्तु जब तक कोई समझे तब तक माथा मारना पड़ता है। आगे चलकर अखबारों में भी पड़ेगा फिर इन सन्यासियों आदि के भी कान खुलेंगे। यह तो तुम बच्चों की खातिरी है कि हमारी राजधानी स्थापन हो रही है। यही नशा है। म्युज़ियम का भभका देख बहुत आयेंगे। अन्दर आकर वन्डर खायेंगे। नये नये चित्रों पर नई नई समझानी सुनेंगे।

यह तो बच्चों को मालूम है – योग है मुक्ति जीवनमुक्ति के लिये। सो तो मनुष्य मात्र कोई सिखला न सके। यह भी लिखना है सिवाय परमपिता परमात्मा के कोई भी मुक्ति-जीवनमुक्ति के लिये योग सिखला नहीं सकते। सर्व का सद्गति दाता है ही एक। यह क्लीयर लिख देना चाहिए, जो भल मनुष्य पढ़ें। सन्यासी लोग क्या सिखाते होंगे। योग-योग जो करते हैं, वास्तव में योग कोई भी सिखला नहीं सकते हैं। महिमा है ही एक की। विश्व में शान्ति स्थापन करना वा मुक्ति जीवन्मुक्ति देना बाप का ही काम है। ऐसे-ऐसे विचार सागर मंथन कर प्वाइन्ट्स समझानी है। ऐसा लिखना चाहिए जो मनुष्यों को बात ठीक जंच जाये। इस दुनिया को तो बदलना ही है। यह है मृत्युलोक। नई दुनिया को कहा जाता है अमरलोक। अमरलोक में मनुष्य कैसे अमर रहते हैं यह भी वन्डर है ना। वहाँ आयु भी बड़ी रहती है और समय पर आपे ही शरीर बदली कर देते हैं जैसे कपड़ा चेंज किया जाता है। यह सभी समझाने की बाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे रूहानी बच्चों को रूहानी बाप व दादा का याद प्यार गुडनाईट और नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपना स्वभाव बहुत मीठा, शान्तचित बनाना है। बहुत कम और रायॅल्टी से बात करनी है।

2) तन-मन-धन से ब्रह्मा बाप समान ट्रस्टी होकर रहना है।

वरदान:- अपने आदि अनादि स्वरूप की स्मृति द्वारा सर्व बन्धनों को समाप्त करने वाले बन्धनमुक्त स्वतंत्र भव
आत्मा का आदि अनादि स्वरूप स्वतंत्र है, मालिक है। यह तो पीछे परतंत्र बनी है इसलिए अपने आदि और अनादि स्वरूप को स्मृति में रख बन्धनमुक्त बनो। मन का भी बंधन न हो। अगर मन का भी बंधन होगा तो वह बंधन और बन्धनों को ले आयेगा। बंधनमुक्त अर्थात् राजा, स्वराज्य अधिकारी। ऐसे बन्धनमुक्त स्वतंत्र आत्मायें ही पास विद आनर बनेंगी अर्थात् फर्स्ट डिवीज़न में आयेंगी।
स्लोगन:- मास्टर दु:ख हर्ता बन दु:ख को भी रूहानी सुख में परिवर्तन करना ही सच्ची सेवा है।

TODAY MURLI 14 DECEMBER 2017 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 14 DECEMBER 2017

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14/12/17
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, you have received the third eye of knowledge and you have become trikaldarshi, but you cannot be given those ornaments at this time because you are effort-makers.
Question: While living at home with your family you definitely have to do things, but what one thing do you have to be very cautious about?
Answer: While doing everything and interacting with everyone, be very cautious about your food. Don’t eat food prepared by impure human beings. Continue to protect yourselves. Don’t become renunciates of action, but definitely do take precautions. You are karma yogis. While doing everything, stay in remembrance of the Father and your sins will be absolved.

Om shanti. The Father sits here and explains to you children. When someone relates the Gita etc., he says: Whenever there is extreme irreligiousness, I come. Whenever there is defamation of religion and unrighteousness grows, God comes. There truly is defamation of religion. Defamation is insult. So, there is defamation of religion and an increase of unrighteousness in Bharat. I come when it is in this condition. There is a lot of sorrow and death is just ahead. Missiles too are ready for destruction. You children know that Baba has now come to establish the original eternal deity religion. There is establishment through Brahma, destruction through Shankar and sustenance through Vishnu. Truly, these three acts take place at this time. You are now Brahmins and you know that you are now changing from Brahmins into deities. You are now the grandchildren of Shiv Baba. Shiv Baba has one child. From one, so many of you continue to become children. You are doing the service of purifying the impure. This is the unlimited sacrificial fire. The whole of the old world will be sacrificed in the sacrificial fire. There will be no more sacrificial fires after this sacrificial fire. No one creates any sacrificial fires in the golden and silver ages. Sacrificial fires are created to remove obstacles. This is a very big obstacle and so a very big sacrificial fire is needed for it. This is the unlimited sacrificial fire. All the materials of the old world are to be sacrificed into it whatever they are. Rudra and Shiv Baba are one and the same. As is the form of Shiva, so is the form of Rudra. Krishna is a corporeal being. The real name of this is: The sacrificial fire of the knowledge of Shiva. “Shiv Baba” is said, not “Rudra Baba”. Shiv Baba is called the Innocent Lord. This is the sacrificial fire of Shiv Baba. We are receiving the knowledge of the beginning, the middle and the end of the world from Him. You know that you have each received a third eye of knowledge. They show deities with a third eye. However, it is the third eye of knowledge which you Brahmins receive. Through this you become deities. There is no need for a third eye there. However, you cannot be shown with it here because you are effort-makers. While moving along, some ran away and that is why these ornaments were given to those who achieved the final result. Otherwise, the deities don’t have the conch shell or the discus of self-realisation etc. That One tells you the knowledge of the beginning, the middle and the end of the world cycle. They have then written in the scriptures that so-and-so was killed and that it was done with the discus of self-realisation. The Father says: I come to purify the impure. There is no question of violence in this. The deities have the supreme religion of non-violence. How can they then write about Krishna committing violence? They have created such wonderful pictures! He relates the Gita there, he teaches Raja Yoga there and then he kills someone there! You remember the Father for Him to come and purify the impure world and teach Raja Yoga. The Father says: I am the Ocean of Knowledge and the k nowledge-full One. You are receiving knowledge and this is called the story of immortality. They say that Shiva and Shankar are one and the same. Shankar is a resident of the subtle region, so how would he relate a story? He cannot be called knowledge-full. Shiv Baba explains the secrets of the whole world cycle. No one else has this knowledge. It is because of not knowing the Father that everyone has become an orphan ; they continue to fight and quarrel. There is no battling in the golden age. There is no weeping or wailing. That is why they relate the story of the king who conquered attachment. There are many stories. There are many different stories in every religion. All of those are the paraphernalia of the path of devotion. They perform devotion in order to meet God. They have been performing devotion for half the cycle, and yet no one has found God. The Father has now given you children His introduction. You then have to give it to others. It is said: Son shows Father. Therefore, give the Father’s introduction and continue to relate this knowledge to everyone. It is in the intellect of each of you children that Shiv Baba is your spiritual Father. You also have to explain to people on the path of devotion that they have two fathers. One is a worldly father and the other is the Father from beyond the world who is also called God, the Father, who created this unlimited creation. You must definitely be receiving the inheritance from the Father. He is the One who creates heaven. Bharat used to be heaven. It was the kingdom of this Lakshmi and Narayan. Who gave them that kingdom? At the end of the iron age, no one is a master of the world. This is the kingdom of Ravan. People say: We want the kingdom of Rama, the new deity kingdom in New Delhi. The golden and silver ages are the kingdom of Rama. The copper and iron ages are the kingdom of Ravan. The path of devotion begins with the copper age. Vices also begin at that time; there are the signs of that. In Jagannathpuri they have dirty images of the deities outside the temple. They have the same throne and crown, but they have portrayed them indulging in vice. There is upheaval of the earth when the deities go onto the path of sin. The golden palaces studded with diamonds go down below. They built such a grand temple for worship on the path of devotion. Those who were worthy of worship became worshippers of themselves. The Father explains: I do not become a worshipper. If I became that, who would then make Me worthy of worship? Neither do I become impure nor do I make anyone impure. It is Ravan, whose effigy you continue to burn, who makes you impure. At this time this is the world of sinful souls. They sing: O Purifier, come! Then, they also say: The Purifier is Rama who belongs to Sita. They quickly remember the Rama of the silver age. However, he is not the Purifier. The Father explains all of these things. All of you are Sitas and Draupadis. It is not a question of just one. They show Draupadi with five husbands. It wasn’t like that. Bharat was an ancient, pure land because it was the birthplace of the Purifier, the Supreme Father, the Supreme Soul. He came here and uplifted the impure residents of hell. People of all religions remember God, the Father, because they are all tamopradhan. Abraham, Buddha etc. are all present at this time. Even the first number Brahma is in the impure world. Therefore, how could anyone else go back? At this time, everyone is in a graveyard. The Father comes and grants everyone salvation or liberation. In the golden age Bharat was pure. They sing in front of the deity idols: You are full of all virtues, completely viceless; we are vicious. At this time all are vicious. The Father has to come to make everyone viceless. Therefore, the Father, not the water of the rivers, is the Purifier. You are the Ganges of knowledge who have emerged from the Purifier, the Ocean of Knowledge. This is the Shiv Shakti Army. You receive the urn of knowledge from Shiva. The Father says: Children, become pure while living at home with your family. You also definitely have to do things. This is karma yoga; there cannot be renunciation of action. Those people think that because they don’t prepare food at home but live on whatever they manage to beg, they are renunciates of action; they are beggars. The food they eat is that of those who indulge in vice and so they are influenced by that food. Although they have left their impure homes, they still have to take birth in impure homes. You too are affected by the food you eat. This is why you are told to take precautions. You shouldn’t eat food prepared by impure people. Continue to protect yourself as much as possible. Some even quarrel a lot because of this. There are many such cases where one brother is on the path of knowledge and the other one isn’t. You are claiming such an unlimited kingdom and so there will definitely be some quarrelling. You have to continue to protect yourself under all circumstances. No one attains liberation. They simply tell lies when they say that they will merge into the element of light. When you continue to explain to them, it will eventually enter their intellects that this is right. If the duration of the golden age were hundreds of thousands of years, the population would be very large. The population now is even less than that of other religions because they have been converted into other religions. Those of the deity religion are the sun dynasty. Even Rama has been given the symbol of a warrior. You are now spiritual warriors; you are conquering Maya. You need a very good intellect to understand this. Yoga is very easy. Souls have yoga with the Supreme Father, the Supreme Soul. There are also many yoga ashrams, but all of them teach hatha yoga. They don’t tell you to have yoga with the Supreme Father, the Supreme Soul. You children know that you have found Baba in the form of the Agent. He says: Constantly remember Me alone and the alloy will be removed. By remembering Me you will go to the land of liberation. The Father sits here and explains: Children, look at what the condition of the world has become! You, who were the masters of the world, have now become beggars. You now have to change from beggars to princes. Bharat is a beggar. Impure kings build temples to the pure emperors and empresses and worship them. They worship incorporeal Shiv Baba. He must definitely have done something. There are so many temples. You now know that He came 5000 years ago and taught you Raja Yoga. You have claimed and lost the kingdom innumerable times. Now remember the land of peace and the land of happiness and continue to forget the land of sorrow. All of it is to be destroyed. You will then become the masters of heaven. The Father says: I am your unlimited Father. I have come to give you your unlimited inheritance. You have the happiness in your hearts that you are establishing your own kingdom by following shrimat. However, all of this is incognito. You have to conquer Ravan. It is remembered that those who conquer Maya conquer the world. You have to conquer the five vices. You have to renounce the five vices. The one Father is the Boatman. Without the Satguru who grants everyone salvation, there is extreme darkness. There are many gurus in Bharat: each woman’s husband is her guru. So, why is there so much degradation? They say that everyone is a form of God. “I am God”. So, with whom should there be yoga? In that case, devotion would also end. So, to whom are you calling out when you say, “O God”? For whom are you making spiritual endeavour? God Himself would not fall ill. However, there is no one to ask these questions. They are afraid that they will perhaps be cursed. In fact it is Ravan who curses you. The Father gives you the inheritance. Ravan is an enemy and that is why people continue to burn his effigy. Do they ever burn the image of Lakshmi and Narayan? Certainly not! You now know what Ravan is. In the pure household of the golden age, you had happiness. Now, in the impure household, there is sorrow. This is now to be destroyed. You will see how earthquakes continue to take place. For how long would Baba sit here and continue to give you teachings? There would have to be a limit. The kingdom will be established and destruction will take place. At the end, you will see many amazing scenes, even more than at the beginning. That was in Pakistan. It is now the time of destruction. Baba will show you many things. Then those who haven’t studied well will become very desperate. What could be done then? Make as much effort as you want now. You have to look after your children etc. You mustn’t become cowards. Follow shrimat at every step. Continue to remember the Father, that’s all! It is this that requires effort. How can the burden of sin on your heads be removed? There is easy yoga for that. This is the power of knowledge and it is through the power of yoga that you conquer Maya and become the masters of the world. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Conquer Maya with the power of knowledge and yoga by following shrimat. Have your sins absolved before destruction takes place.
  2. In order to claim the unlimited kingdom, continue to protect yourself in every way. Be very cautious about being affected by the food you eat.
Blessing: May you become a holy swan by finishing the waste of impurity and becoming completely clean.
The speciality of a holy swan is constantly to pick up jewels of knowledge. Then by using the power of discernment, to separate milk from water, that is, to discern between the wasteful and the powerful. To be a holy swan means to be constantly clean. Cleanliness means purity and not to be even slightly influenced by any dirt nor any impurity of waste. If there is any waste, you cannot then be said to be completely clean. Let your intellect constantly churn the jewels of knowledge. If the churning of knowledge continues, there will not be any waste. This is known as picking up jewels.
Slogan: When the boat and the Boatman are strong, even storms become a gift.

*** Om Shanti ***

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BRAHMA KUMARIS MURLI 14 DECEMBER 2017 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 14 December 2017

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14/12/17
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – तुम्हें ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है, तुम त्रिकालदर्शी बने हो लेकिन यह अलंकार अभी तुम्हें नहीं दे सकते क्योंकि तुम पुरुषार्थी हो”
प्रश्नः- गृहस्थ में रहते कर्म अवश्य करना है लेकिन किस एक बात की सम्भाल जरूर रखनी है?
उत्तर:- कर्म करते, व्यवहार में आते अन्न की बहुत परहेज़ रखनी है। पतितों के हाथ का नहीं खाना है, अपने को बचाते रहना है। कर्म सन्यासी नहीं बनना है लेकिन परहेज़ जरूर रखनी है। तुम कर्मयोगी हो। कर्म करते बाप की याद में रहो तो विकर्म विनाश होंगे।

ओम शान्ति। बाप बच्चों को बैठ समझाते हैं। जब कोई गीता आदि सुनाते हैं तो कहते हैं यदा यदाहि… जब-जब धर्म की ग्लानि, अधर्म की वृद्धि होती है, तब भगवान आते हैं। बरोबर धर्म की ग्लानि होती है। ग्लानि माना निंदा… तो भारत में धर्म की ग्लानि और अधर्म की वृद्धि हो जाती है। मैं आता ही तब हूँ, जब यह हालत होती है। बहुत दु:ख है, मौत सामने खड़ा है। विनाश के लिए मूसल भी तैयार हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो बाबा आया हुआ है, आदि सनातन धर्म की स्थापना करने। ब्रह्मा द्वारा स्थापना, शंकर द्वारा विनाश, विष्णु द्वारा पालना… बरोबर यह तीनों कर्तव्य अभी चल रहे हैं।

अभी तुम ब्राह्मण हो और जानते हो अभी हम ब्राह्मण से फिर देवता बन रहे हैं। अभी शिवबाबा के पोत्रे हैं। शिवबाबा का एक बच्चा, एक से फिर तुम कितने बच्चे बनते जाते हो। पतितों को पावन बनाने की सेवा तुम कर रहे हो। यह है बेहद का यज्ञ। यज्ञ में सारी पुरानी दुनिया स्वाहा हुई थी। इस यज्ञ के बाद फिर कोई यज्ञ होगा ही नहीं। सतयुग त्रेता में कोई यज्ञ रचते ही नहीं। यज्ञ रचते ही हैं विघ्नों को हटाने के लिए। यह तो बहुत भारी विघ्न है, तो इसके लिए बड़ा यज्ञ चाहिए। यह है बेहद का यज्ञ। इसमें पुरानी दुनिया की सामग्री जो भी है सब स्वाहा होनी है। रुद्र अथवा शिवबाबा एक ही है। जैसे शिव का रूप है वैसे रुद्र का भी रूप है। कृष्ण तो साकारी है, इसका सच्चा-सच्चा नाम ही है शिव ज्ञान यज्ञ। शिवबाबा कहते हैं, रुद्र बाबा नहीं कहते हैं। भोला भण्डारी शिवबाबा को कहते हैं। यह है शिवबाबा का यज्ञ। उनसे हमें सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज मिल रही है। तुम जानते हो हमको ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। देवताओं को तीसरा नेत्र दिखाते हैं ना। परन्तु यह है ज्ञान का तीसरा नेत्र जो तुम ब्राह्मणों को मिलता है, जिससे तुम देवता बनते हो। वहाँ तीसरे नेत्र की दरकार नहीं है। परन्तु तुमको तो दिखा नहीं सकते क्योंकि तुम पुरुषार्थी हो। चलते-चलते भाग जाते हो इसलिए जो फाइनल रिजल्ट वाले हैं उनको यह अलंकार दिये हैं। नहीं तो देवताओं के पास थोड़ेही शंख, चक्र आदि हैं। यह सृष्टि चक्र के आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज तुमको सुना रहे हैं। उन्होंने फिर शास्त्रों में लिख दिया है कि स्वदर्शन चक्र से फलाने को मारा, यह किया। बाप कहते हैं मैं तो पतितों को पावन बनाने आता हूँ, इसमें हिंसा की तो बात ही नहीं है। देवताओं का है ही अहिंसा परमो धर्म। कृष्ण के लिए फिर हिंसा करना कैसे लिखा है। कैसे वन्डरफुल चित्र बनाये हैं। वहाँ ही गीता सुनाते, राजयोग सिखाते, वहाँ ही फिर किसको मारते हैं। बाप को तो याद करते ही इसलिए है कि आकर पतित दुनिया को पावन बनाओ, राजयोग सिखाओ। बाप कहते हैं ज्ञान का सागर, नॉलेजफुल मैं हूँ। तुमको नॉलेज मिल रही है, इसको ही अमरकथा कहते हैं। वह तो शिवशंकर को एक कह देते हैं। शंकर सूक्ष्मवतनवासी, वह कैसे कथा सुनायेंगे। उनको तो नॉलेजफुल नहीं कहा जाता। शिवबाबा सारे सृष्टि चक्र का राज़ समझाते हैं। जो नॉलेज कोई के पास है नहीं। बाप धनी को न जानने के कारण ही आरफन बन पड़े हैं। लड़ते-झगड़ते रहते हैं। सतयुग में कोई झगड़ा होता ही नहीं। न रोना, न पीटना… इसलिए मोहजीत राजा की कथा सुनाते हैं। कथायें तो ढेर हैं। हर एक धर्म में किसम-किसम की कथायें हैं, जो सब भक्ति मार्ग की सामग्री है। भक्ति करते हैं भगवान से मिलने लिए। आधाकल्प भक्ति करते आये हैं। भगवान तो किसको मिला ही नहीं। अब बाप ने तुम बच्चों को परिचय दिया है। तुम्हें फिर औरों को देना है। सन शोज़ फादर… तो बाप का परिचय दे सबको नॉलेज बताते रहते हो।

तुम हर एक बच्चे की बुद्धि में है कि शिवबाबा हमारा रूहानी बाप है। यह भी भक्ति मार्ग वालों को समझाना है कि तुम्हारे दो बाप हैं। एक लौकिक बाप, दूसरा पारलौकिक बाप, जिसको गॉड फादर कहते हैं जिसने यह बेहद की रचना रची है। बाप से तो जरूर वर्सा मिलता होगा। वह है ही स्वर्ग की रचना रचने वाला। भारत स्वर्ग था। इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। उन्हों को यह राज्य किसने दिया? कलियुग अन्त में कोई भी विश्व का मालिक है नहीं। यह है ही रावण का राज्य, खुद भी कहते हैं हमको रामराज्य, नई देहली में दैवी राज्य चाहिए। रामराज्य है सतयुग-त्रेता। रावण राज्य है द्वापर कलियुग। द्वापर से ही भक्ति मार्ग शुरू होता है। विकार भी शुरू होते हैं, जिसकी निशानियाँ भी हैं। जगन्नाथपुरी के मन्दिर में बाहर देवताओं के गन्दे चित्र बनाये हैं। ताज तख्त आदि वही है, सिर्फ चित्र विकारी दिखाते हैं। जब देवतायें वाम मार्ग में जाते हैं तो फिर धरती की उथल पाथल भी होती है। सोने-हीरे के महल सब नीचे चले जाते हैं। पूजा के लिए कितना भारी मन्दिर बनाया है, भक्ति मार्ग में। आपे ही पूज्य आपेही पुजारी। बाप समझाते हैं – मैं तो पुजारी नहीं बनता हूँ। अगर मैं बनूँ तो मुझे फिर पूज्य कौन बनायेगा? मैं न पतित बनता हूँ, न बनाता हूँ। पतित तुमको रावण बनाते हैं, जिसको जलाते आते हैं। इस समय पाप आत्माओं की दुनिया है। गाते भी हैं पतित-पावन आओ। फिर कह देते पतित-पावन सीताराम। झट त्रेता वाले राम की याद आ जाती है। अब वह तो पतित-पावन नहीं है। बाप यह सब बातें समझाते हैं। तुम सब सीतायें हो, द्रोपदियाँ हो। एक की बात नहीं है। द्रोपदी को 5 पति दिखाते हैं। ऐसी बात है नहीं। भारत ही प्राचीन पवित्र खण्ड था क्योंकि पतित-पावन परमपिता परमात्मा का बर्थ प्लेस है। उसने यहाँ आकर पतित नर्कवासियों का उद्धार किया है। सब धर्म वाले गॉड फादर को याद करते हैं क्योंकि सब तमोप्रधान हैं। इब्राहिम, बौद्ध आदि सब इस समय हाज़िर हैं। पहला नम्बर ब्रह्मा भी पतित दुनिया में है तो और कोई वापस कैसे जा सकता। सभी इस समय कब्रदाखिल हैं। बाप आकर सबको गति सद्गति देते हैं। सतयुग में भारत पवित्र था। देवताओं के आगे गाते भी हैं आप सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी… हम विकारी हैं। इस समय सब विकारी हैं, सबको निर्विकारी बनाने बाप को आना पड़ता है। तो पतित-पावन बाप ठहरा, न कि पानी की नदियाँ। पतित-पावन ज्ञान सागर से निकली हुई यह ज्ञान गंगायें। शिव शक्ति सेना है। शिव से ज्ञान का कलष मिलता है। बाप कहते हैं – बच्चे गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनो। कर्म भी जरूर करना है। यह है ही कर्मयोग। कर्म-सन्यास तो नहीं हो सकता। वह समझते हैं घर में खाना नहीं बनाते, भीख पर गुज़ारा करते हैं, इसलिए कर्म सन्यासी हैं। वह तो फकीर ठहरे। अन्न तो विकारियों का पेट में पड़ता है, तो अन्नदोष लग जाता है। पतित घर से भल निकल जाते हैं फिर भी जन्म तो पतित घर में लेना पड़ता है। तुमको भी अन्न असर करेगा, इसलिए परहेज रखी जाती है। पतित का अन्न नहीं खाना चाहिए। जितना हो सके अपने को बचाते रहो। कोई का बहुत झगड़ा भी हो जाता है। एक भाई ज्ञान में आता, दूसरा नहीं आता ऐसे बहुत केस होते हैं। इतना बेहद का राज्य लेते हो तो जरूर कुछ झगड़े होंगे। कोई भी हालत में तुमको अपना बचाव रखना है। मुक्ति तो कोई पाते नहीं हैं। गपोड़े मारते रहते हैं हम ज्योति ज्योत में लीन होंगे। समझाते-समझाते आखिर उन्हों की बुद्धि में भी आयेगा कि यह बात ठीक है। सतयुग की आयु अगर लाखों वर्ष होती तो संख्या बहुत बढ़ जाती। अभी तो संख्या और ही सबसे थोड़ी है क्योंकि कनवर्ट हो गये हैं और धर्मों में। देवता धर्म वाले हैं सूर्यवंशी। राम को फिर क्षत्रिय की निशानी दे दी है। अभी तुम रूहानी क्षत्रिय हो। माया पर जीत पाते हो, इसमें समझने की बड़ी बुद्धि चाहिए। योग भी बड़ा सहज है। आत्माओं का योग लगता है परमपिता परमात्मा के साथ। योग आश्रम तो बहुत हैं परन्तु वह सब हठयोग कराते हैं। यह थोड़ेही कहते हैं परमपिता परमात्मा के साथ योग लगाओ। तुम बच्चे जानते हो – बाबा हमको दलाल के रूप में मिले हैं। कहते हैं – मामेकम् याद करो तो खाद निकल जायेगी। याद करते-करते तुम मुक्तिधाम में चले जायेंगे।

बाप बैठ समझाते हैं – बच्चे दुनिया का हाल देखो क्या हो गया है। तुम जो विश्व के मालिक थे, अब बेगर बन पड़े हो फिर बेगर टू प्रिन्स बनना है। भारत बेगर है। पतित राजायें, पावन महाराना-महारानी के मन्दिर बनाकर पूजा करते हैं। निराकार शिवबाबा की पूजा करते हैं। जरूर कुछ किया होगा। कितने मन्दिर हैं। तुम अभी जानते हो 5 हजार वर्ष पहले भी आकर राजयोग सिखाया था। तुमने अनेक बार राज्य लिया है और गँवाया है। अब फिर शान्तिधाम और सुखधाम को याद करो, दु:खधाम को भूलते जाओ। यह सब विनाश होना है। फिर तुम स्वर्ग के मालिक बन जायेंगे। बाप कहते हैं – मैं तुम्हारा बेहद का बाप भी हूँ, तुमको बेहद का वर्सा देने आया हूँ। तुम्हारी दिल में खुशी है, हम अपनी राजधानी श्रीमत पर स्थापन कर रहे हैं। परन्तु है सारा गुप्त। रावण पर जीत पानी है। गाया भी जाता है माया जीते जगत जीत। 5 विकारों पर जीत पानी है। 5 विकारों का सन्यास करना है। खिवैया तो एक बाप है। सबकी सद्गति करने वाले सतगुरू बिगर घोर अन्धियारा है। भारत में गुरू तो बहुत हैं। हर एक स्त्री का पति भी गुरू है। फिर इतनी दुर्गति क्यों हुई है? कह देते हैं सब ईश्वर के रूप हैं। हम ईश्वर हैं। फिर योग किससे लगायें? फिर तो भक्ति ही बन्द हो जाये। फिर हे भगवान कह किसको बुलाते हैं? साधना किसकी करते हैं? खुद ईश्वर थोड़ेही कभी बीमार पड़ता है। परन्तु कोई पूछने वाला नहीं है। डरते रहते हैं, श्राप न मिल जाये। वास्तव में श्राप देने वाला है रावण। बाप तो वर्सा देते हैं। रावण दुश्मन है इसलिए जलाते रहते हैं। लक्ष्मी-नारायण के चित्र को कब जलाते हैं क्या? बिल्कुल नहीं। रावण क्या चीज़ है – अभी तुमको मालूम पड़ा है। सतयुग में पावन प्रवृत्ति में सुख था। अभी पतित प्रवृत्ति में दु:ख है। अभी इसका विनाश होना है। तुम देखेंगे अर्थक्वेक आदि होती रहेंगी। बाबा भी कहाँ तक बैठ शिक्षा देंगे? लिमिट होगी ना। राजाई स्थापन होगी और विनाश होगा। अन्त में तुम बहुत मज़े देखेंगे, शुरूआत से भी जास्ती। वह तो पाकिस्तान था। अभी तो विनाश का समय है। तुमको बाबा बहुत कुछ दिखायेंगे। फिर जो अच्छी रीति नहीं पढ़े हुए होंगे वह अन्दर फथकते रहेंगे। क्या कर सकते हैं? अभी जितना पुरुषार्थ करना है कर लो, बाल-बच्चों को तो सम्भालना ही है। कायर नहीं बनना है। कदम-कदम श्रीमत पर चलना है। बाप को याद करते रहना है। बस इसमें ही मेहनत है। पापों का बोझा सिर से कैसे उतरे? उसके लिए है सहज योग। यह है ज्ञान बल, योगबल जिससे माया पर विजय पाकर विश्व के मालिक बनते हो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) श्रीमत पर ज्ञान और योगबल से माया पर विजय पानी है। विनाश के पहले अपने विकर्मों को विनाश करना है।

2) बेहद का राज्य लेने के लिए हर बात में अपना बचाव करते रहना है। अन्नदोष से बहुत सम्भाल करनी है।

वरदान:- व्यर्थ की अपवित्रता को समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ बनने वाले होलीहंस भव 
होलीहंस की विशेषता है – सदा ज्ञान रत्न चुगना और निर्णय शक्ति द्वारा दूध पानी को अलग करना अर्थात् व्यर्थ और समर्थ का निर्णय करना। होलीहंस अर्थात् सदा स्वच्छ। स्वच्छता अर्थात् पवित्रता, कभी भी मैलेपन का असर न हो। व्यर्थ की अपवित्रता भी नहीं, अगर व्यर्थ भी है तो सम्पूर्ण स्वच्छ नहीं कहेंगे। हर समय बुद्धि में ज्ञान रत्न चलते रहें, ज्ञान का मनन चलता रहे तो व्यर्थ नहीं चलेगा। इसको कहा जाता है रत्न चुगना।
स्लोगन:- नाँव और खिवैया मजबूत हो तो तूफान भी तोहफा बन जाते हैं।

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