11 january ki murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 11 JANUARY 2021 : AAJ KI MURLI

11-01-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – मोस्ट बील्वेड शिवबाबा आये हैं तुम बच्चों को विश्व का मालिक बनाने, तुम उनकी श्रीमत पर चलो”
प्रश्नः- मनुष्य परमात्मा के बारे में कौनसी दो बातें एक-दूसरे से भिन्न बोलते हैं?
उत्तर:- एक ओर कहते – परमात्मा अखण्ड ज्योति है और दूसरी ओर कहते वह तो नाम-रूप से न्यारा है। यह दोनों बातें एक-दूसरे से भिन्न हो जाती हैं। यथार्थ रूप से न जानने कारण ही पतित बनते जाते हैं। बाप जब आते हैं तो अपनी सही पहचान देते हैं।
गीत:- मरना तेरी गली में……..

ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना। जब कोई मरते हैं तो बाप के पास जन्म लेंगे। कहने में यही आता है कि बाप के पास जन्म लिया, माँ का नाम नहीं लेंगे। बधाईयाँ बाप को दी जाती हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो हम आत्मायें हैं, वह हो गई शरीर की बात। एक शरीर छोड़ फिर दूसरे बाप के पास जाते हैं। तुमने 84 जन्मों में 84 साकारी बाप किये हैं। वास्तव में असुल हो निराकार बाप के बच्चे। तुम आत्मा परमपिता परमात्मा के बच्चे हो। रहने वाले भी वहाँ के हो जिसको निर्वाणधाम वा शान्तिधाम कहते हैं। असुल तुम वहाँ के रहने वाले हो। बाप भी वहाँ रहते हैं। यहाँ आकर तुम लौकिक बाप के बच्चे बनते हो तो फिर उस बाप को भूल जाते हो। सतयुग में भी तुम सुखी बन जाते हो तो उस पारलौकिक बाप को भूल जाते हो। सुख में उस बाप का कोई सिमरण नहीं करते हैं। दु:ख में याद करते हैं। और याद भी आत्मा करती है। जब लौकिक बाप को याद करते हैं तो बुद्धि शरीर तरफ रहती है। यह बाबा उनको याद करेंगे तो कहेंगे ओ बाबा। हैं दोनों बाबा। राइट अक्षर बाबा ही है। यह भी फादर, वह भी फादर। आत्मा उस रूहानी बाप को याद करती है तो बुद्धि वहाँ जाती है। यह बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। अभी तुम यह जानते हो बाबा आया हुआ है, हमको अपना बनाया है। बाप कहते हैं पहले-पहले हमने तुमको स्वर्ग में भेजा। तुम बहुत-बहुत साहूकार थे फिर 84 जन्म ले ड्रामा प्लैन अनुसार अभी तुम दु:खी हुए हो। अब ड्रामा अनुसार पुरानी दुनिया खत्म होनी है। तुम्हारी आत्मा और शरीर रूपी वस्त्र सतोप्रधान थे फिर गोल्डन एज से सिलवर एज में आत्मा आई तो शरीर भी सिलवर एज में आया फिर कॉपर एज में आया। अभी तो तुम्हारी आत्मा बिल्कुल ही पतित हो गई है तो शरीर भी पतित है। जैसे 14 कैरेट का सोना कोई पसन्द नहीं करते हैं। काला पड़ जाता है। तुम भी अभी काले आइरन एजेड बन गये हो। अब आत्मा और शरीर जो ऐसे काले बन गये हैं तो फिर प्योर कैसे बनें। आत्मा प्योर बने तो शरीर भी प्योर मिले। वह कैसे होगा? क्या गंगा स्नान करने से? नहीं। पुकारते ही हैं – हे पतित-पावन… यह आत्मा कहती है। बुद्धि पारलौकिक बाप तरफ चली जाती है – हे बाबा। देखो बाबा अक्षर ही कितना मीठा है। भारत में ही बाबा-बाबा कहते हैं। अभी तुम आत्म-अभिमानी बन बाबा के बने हो। बाप कहते हैं मैंने तुमको स्वर्ग में भेजा था। नया शरीर धारण किया था। अब तुम क्या बन गये हो। यह बातें हमेशा अन्दर रहनी चाहिए। बाबा को ही याद करना चाहिए। याद भी करते हैं ना – हे बाबा हम आत्मायें पतित बन गई हैं। अब आप आकर पावन बनाओ। ड्रामा में भी यह पार्ट है तब तो बुलाते हैं। ड्रामा प्लैन अनुसार आयेंगे भी तब जब पुरानी दुनिया से नई बननी है तो जरूर संगम पर ही आयेंगे।

तुम बच्चों को निश्चय है बील्वेड मोस्ट बाबा है। कहते भी हैं स्वीट, स्वीटर, स्वीटेस्ट। अब स्वीट कौन है? लौकिक सम्बन्ध में पहले है फादर, जो जन्म देते हैं। फिर टीचर। वह अच्छा होता है। उससे पढ़कर मर्तबा पाते हो। नॉलेज इज़ सोर्स ऑफ इनकम कहा जाता है। ज्ञान है नॉलेज। योग है याद। तो बेहद का बाप जिसने तुमको स्वर्ग का मालिक बनाया था, उनको तुम अभी भूल गये हो। शिवबाबा कैसे आया किसको पता नहीं। चित्रों में भी क्लीयर दिखाया है। ब्रह्मा द्वारा स्थापना शिवबाबा कराते हैं। कृष्ण कैसे राजयोग सिखायेगा? राजयोग सिखलाते ही हैं सतयुग के लिए। तो जरूर संगम पर बाप ने ही सिखाया होगा। सतयुग की स्थापना करने वाला है बाबा। शिवबाबा इन द्वारा कराते हैं, करनकरावनहार है ना। वो लोग त्रिमूर्ति ब्रह्मा कह देते हैं। ऊंच ते ऊंच शिव है ना। यह साकार है, वह निराकार है। सृष्टि भी यहाँ ही है। इस सृष्टि का ही चक्र है जो फिरता रहता है, रिपीट होता रहता है। सूक्ष्मवतन की सृष्टि का चक्र नहीं गाया जाता है। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी मनुष्यों की रिपीट होती है। सूक्ष्मवतन में कोई चक्र आदि नहीं होता। गाते भी हैं वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट। वह यहाँ की बात है। सतयुग-त्रेता….. बीच में जरूर संगमयुग चाहिए। नहीं तो कलियुग को सतयुग कौन बनाये। नर्कवासियों को स्वर्गवासी बनाने बाप संगम पर आते हैं। यह तो हाइएस्ट अथॉरिटी गॉड फादरली गवर्नमेन्ट है। साथ में धर्मराज भी है। आत्मा कहती है मुझ निर्गुण हारे में कोई गुण नाही। कोई भी देवता के मन्दिर में जायेंगे तो उनके आगे ऐसे कहेंगे। कहना चाहिए बाप को। उनको छोड़ ब्रदर्स (देवताओं) को आकर लगे हैं। यह देवतायें ब्रदर्स ठहरे ना। ब्रदर्स से तो कुछ भी मिलना नहीं है। भाइयों की पूजा करते-करते नीचे गिरते आये हैं। अब तुम बच्चे जानते हो बाबा आया हुआ है, उनसे हमको वर्सा मिलता है। बाप को ही नहीं जानते, सर्वव्यापी कह देते हैं। कोई फिर कहते अखण्ड ज्योति तत्व है। कोई कहते वह नाम-रूप से न्यारा है। जब अखण्ड ज्योति स्वरूप है तो फिर नाम-रूप से न्यारा कैसे कहते हो। बाप को न जानने कारण ही पतित बन पड़े हैं। तमोप्रधान भी बनना ही है। फिर जब बाप आते हैं तब आकर सभी को सतोप्रधान बनाते हैं। आत्मायें निराकारी दुनिया में सब बाप के साथ रहती हैं फिर यहाँ सतो-रजो-तमो में आकर पार्ट बजाती हैं। आत्मा ही बाप को याद करती है। बाप आते भी हैं, कहते भी हैं ब्रह्मा तन का आधार लेता हूँ। यह है भाग्यशाली रथ। बिगर आत्मा रथ थोड़ेही होता है। अभी तुम बच्चों को समझाया है, यह है ज्ञान की वर्षा। नॉलेज है, इससे क्या होता है? पतित दुनिया से पावन दुनिया बनती है। गंगा-जमुना तो सतयुग में भी होते हैं। कहते हैं कृष्ण जमुना के कण्ठे पर खेलपाल करते हैं। ऐसी कोई बातें हैं नहीं। वह तो सतयुग का प्रिन्स है। बहुत अच्छी रीति उनको सम्भाला जाता है क्योंकि फूल है ना। फूल कितने अच्छे सुन्दर होते हैं। फूल से सब आकर खुशबू लेते हैं। कांटों की थोड़ेही खुशबू लेंगे। अभी तो यह है कांटों की दुनिया। कांटों के जंगल को बाप आकर गार्डन ऑफ फ्लावर बनाते हैं इसलिए उनका नाम बबुलनाथ भी रख दिया है। कांटों को बैठ फूल बनाते हैं इसलिए महिमा गाते हैं – कांटों को फूल बनाने वाले बाबा। अब तुम बच्चों का बाप के साथ कितना लव होना चाहिए। वो लौकिक बाप तो तुमको गटर में डालते हैं। यह बाप 21 जन्मों के लिए तुमको गटर से निकाल पावन बनाते हैं। वह तुमको पतित बनाते हैं तब तो लौकिक बाप होते भी पारलौकिक बाप को आत्मा याद करती है।

अभी तुम जानते हो आधाकल्प बाप को याद किया है। बाप आते भी जरूर हैं। शिवजयन्ती मनाते हैं ना। तुम जानते हो हम बेहद के बाप के बने हैं। अभी हमारा संबंध उनसे भी है तो लौकिक से भी है। पारलौकिक बाप को याद करने से तुम पावन बनेंगे। आत्मा जानती है वह हमारा लौकिक और यह पारलौकिक बाप है। भक्ति मार्ग में भी यह आत्मा जानती है। तब तो कहते हैं – हे भगवान, ओ गॉड फादर। अविनाशी फादर को याद करते हैं। वह बाप आकर हेविन स्थापन करते हैं। यह किसको पता नहीं हैं। शास्त्रों में तो युगों को भी बहुत लम्बी-चौड़ी आयु दे दी है। यह किसके ख्याल में नहीं आता कि बाप आते ही हैं पतितों को पावन बनाने। तो जरूर संगम पर आयेंगे। कल्प की आयु लाखों वर्ष लिख मनुष्यों को बिल्कुल घोर अन्धियारे में डाल दिया है। धक्के खाते रहते हैं, बाप को पाने के लिए। कहते हैं जो बहुत भक्ति करते हैं तो भगवान मिलता है। सबसे जास्ती भक्ति करने वाले को जरूर पहले मिलना चाहिए। बाप ने हिसाब भी बताया है, सबसे पहले भक्ति तुम करते हो। तो तुमको ही पहले-पहले भगवान द्वारा ज्ञान मिलना चाहिए जो फिर तुम ही नई दुनिया में राज्य करो। बेहद का बाप तुम बच्चों को ज्ञान दे रहे हैं, इसमें तकलीफ की कोई बात नहीं है। बाप कहते हैं तुमने आधाकल्प याद किया है। सुख में तो कोई याद करते ही नहीं। अन्त में जब दु:खी हो जाते हैं तब हम आकर सुखी बनाते हैं। अभी तुम बहुत बड़े आदमी बनते हो। देखो चीफ मिनिस्टर, प्राइम मिनिस्टर आदि के बंगले कितने फर्स्टक्लास होते हैं। वहाँ फिर गायें आदि सारा फर्नीचर ऐसा फर्स्टक्लास होगा। तुम तो कितने बड़े आदमी (देवता) बनते हो। दैवीगुणों वाले देवता स्वर्ग के मालिक बनते हो। वहाँ तुम्हारे लिए महल भी हीरे-जवाहरातों के होते हैं। वहाँ तुम्हारा फर्नीचर सोने के जड़ित का फर्स्टक्लास होगा। यहाँ तो झूले आदि सब बेगरी हैं। वहाँ तो फर्स्टक्लास हीरे-जवाहरातों की सब चीजें होंगी। यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ। शिव को रूद्र भी कहते हैं। जब भक्ति पूरी होती है तो फिर भगवान रूद्र यज्ञ रचते हैं। सतयुग में यज्ञ अथवा भक्ति की बात ही नहीं। इस समय ही बाप यह अविनाशी रूद्र ज्ञान यज्ञ रचते हैं, जिसका फिर बाद में गायन चलता है। भक्ति सदैव तो नहीं चलती रहेगी। भक्ति और ज्ञान। भक्ति है रात, ज्ञान है दिन। बाप आकर दिन बनाते हैं तो बच्चों का बाप के साथ कितना लव होना चाहिए। बाबा हमको विश्व का मालिक बनाते हैं। मोस्ट बील्वेड बाबा है। उनसे ज्यादा प्यारी वस्तु कोई हो न सके। आधाकल्प से याद करते आये हो। बाबा आकर हमारे दु:ख हरो। अब बाप आये हैं। समझाते हैं तुमको अपने गृहस्थ व्यवहार में तो रहना ही है। यहाँ बाबा पास कहाँ तक बैठेंगे। बाप के साथ तो परमधाम में ही रह सकते। यहाँ इतने सब बच्चे तो नहीं रह सकते। टीचर सवाल कैसे पूछेंगे। लाउडस्पीकर पर रेसपान्ड कैसे दे सकेंगे इसलिए थोड़े-थोड़े स्टूडेन्ट्स को पढ़ाते हैं। कॉलेज तो बहुत होते हैं फिर सबके इम्तहान होते हैं। लिस्ट निकलती है। यहाँ तो एक ही बाप पढ़ाते हैं। यह भी समझाना चाहिए दु:ख में सिमरण सब उस पारलौकिक बाप का करते हैं। अब यह बाप आया हुआ है। महाभारी महाभारत लड़ाई भी सामने खड़ी है। वह समझते हैं महाभारत लड़ाई में कृष्ण आया। यह तो हो न सके। बिचारे मूँझे हुए हैं ना। फिर भी कृष्ण-कृष्ण याद करते रहते हैं। अब मोस्ट बील्वेड शिव भी है तो कृष्ण भी है। परन्तु वह है निराकार, वह है साकार। निराकार बाप सब आत्माओं का बाप है। हैं दोनों मोस्ट बील्वेड। कृष्ण भी विश्व का मालिक है ना। अभी तुम जज कर सकते हो – जास्ती प्यारा कौन? शिवबाबा ही तो ऐसा लायक बनाते हैं ना। कृष्ण क्या करते हैं? बाप ही तो उनको ऐसा बनाते हैं, तो गायन भी जास्ती उस बाप का होना चाहिए। शंकर का डांस दिखाते हैं। वास्तव में डांस आदि की तो बात नहीं। बाप ने समझाया है तुम सब पार्वतियां हो। यह शिव अमरनाथ तुमको कथा सुना रहे हैं। वह है वाइसलेस वर्ल्ड। विकार की बात नहीं। बाप विकारी दुनिया थोड़ेही रचेंगे। विकार में ही दु:ख है। मनुष्य हठयोग आदि बहुत सीखते हैं। गुफाओं में जाकर बैठते हैं, आग से भी चले जाते हैं। रिद्धि-सिद्धि भी बहुत है। जादूगरी से बहुत चीज़ों निकालते हैं। भगवान को भी जादूगर, रत्नागर, सौदागर कहते हैं तो जरूर चैतन्य है ना। कहते भी हैं मैं आता हूँ, जादूगर है ना। मनुष्य को देवता, बेगर से प्रिन्स बनाते हैं। ऐसा जादू कभी देखा। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) फूलों के बगीचे में चलना है इसलिए खुशबूदार फूल बनना है। किसी को भी दु:ख नहीं देना है। एक पारलौकिक बाप से सर्व संबंध जोड़ने हैं।

2) शिवबाबा प्यारे से प्यारा है उस एक को ही प्यार करना है। सुखदाता बाप को याद करना है।

वरदान:- इस लोक के लगाव से मुक्त बन अव्यक्त वतन का सैर करने वाले उड़ता पंछी भव
बुद्धि रूपी विमान से अव्यक्त वतन व मूलवतन का सैर करने के लिए उड़ता पंछी बनो। बुद्धि द्वारा जब चाहो, जहाँ चाहो पहुंच जाओ। यह तब होगा जब बिल्कुल इस लोक के लगाव से परे रहेंगे। यह असार संसार है, इस असार संसार से जब कोई काम नहीं, कोई प्राप्ति नहीं तो बुद्धि द्वारा भी जाना बन्द करो। यह रौरव नर्क है इसमें जाने का संकल्प और स्वप्न भी न आये।
स्लोगन:- अपने चेहरे और चलन से सत्यता की सभ्यता का अनुभव कराना ही श्रेष्ठता है।

TODAY MURLI 11 JANUARY 2021 DAILY MURLI (English)

11/01/21
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, most beloved Shiv Baba has come to make you children into the masters of the world. Therefore, follow His shrimat.
Question: What two completely contradictory things, in connection with the Supreme Father, do people tell one another?
Answer: On the one hand, they say that He is the Eternal Light and, on the other hand, they say that He is beyond name and form. These two aspects contradict each other. Because of not knowing Him accurately, they continue to become impure. When the Father comes He gives His true introduction.
Song: To live in Your lane and to die in Your lane.

Om shanti. You children heard the song. When someone dies he takes birth to a father. It is said that he took birth to his father. They don’t mention the mother’s name; congratulations are given to the father. You children now understand that you are souls. That is an aspect of bodies. A soul sheds his body and goes to his next father. In 84 births you have had 84 physical fathers. In fact, you are originally the children of the incorporeal Father. You souls are the children of the Supreme Father, the Supreme Soul. You are in fact residents of the place that is called the land of nirvana and the land of peace. You are originally the residents of that place. The Father too resides there. You come here and become children of physical fathers and so you forget that Father. In the golden age, where you are happy, you forget that parlokik Father. None of them remembers that Father when they are happy. They remember Him when they are unhappy and it is souls that remember Him. When a physical father is remembered, the intellect goes to the body. When this Baba (Brahma Baba) remembers that Baba, he says, “Oh Baba!” Both are Babas. The right word is “Baba”. That One is the Father and this one is also a father. When a soul remembers that spiritual Father, his intellect goes there. The Father sits here and explains to you children. You now understand that Baba has come and made you belong to Him. The Father says: When I first sent you to heaven you were very wealthy, whereas now, having taken 84 births according to the dramaplan, you are unhappy. Now, according to the drama, the old world has to finish. You souls and your bodily costumes were satopradhan. Then you souls went from the golden age to the silver age and your bodies thereby also became silver aged. Then you went into the copper age. You souls have now become completely impure, and so your bodies too are impure. Just as no one likes 14 carat gold because it becomes tarnished, so you too have now become tarnished and ironaged. Now, how can souls and bodies, that have become so ugly, become pure again? When souls become pure they receive pure bodies. How will you become like that? Is it by bathing in the Ganges? No! You call out: O Purifier! It is the soul that says this. The intellect goes to the parlokik Father. “O Baba!” Look how sweet the word “Baba” is. It is only in Bharat that you say, “Baba, Baba!” You now belong to Baba and are becoming soul conscious. The Father says: I sent you to heaven. You adopted new bodies. What have you now become? You should always keep these things within you. You should only remember the Father. You remember Him: O Baba, we souls have become impure! Now come and purify us! This part is fixed in the drama, and this is why they call out. According to the dramaplan, He will only come here when the old world has to become new again. Therefore, He definitely has to come at the confluence age. You children have the faith that Baba is the most beloved. It is said: Sweet, sweeter and sweetest! Now, who is sweet? In worldly relations, first it is the father who gives you birth. Then there is the teacher; he is good. You study with him and claim a status. It is said: Knowledge is the source of income. Gyan is knowledge and yoga is remembrance. So, you forgot the unlimited Father who made you into the masters of heaven. No one knows how Shiv Baba comes. It is clearly shown in the pictures that Shiv Baba carries out establishment through Brahma. How could Krishna teach Raj Yoga? Raj Yoga is taught for the golden age. Therefore, the Father would surely teach it at the confluence age. It is Baba who establishes the golden age. Shiv Baba carries it out through this one. He is Karankaravanhar (The One who acts and also acts through others). Those people speak of Trimurti Brahma. Shiva is the Highest on High. This one is corporeal whereas that One is incorporeal. The world exists here. The cycle of this world continues to turn; it continues to repeat. There is no mention of a cycle of the world in the subtle region. It is the world history and geography of human beings that repeat. There is no cycle in the subtle region. They speak about repetition of world history and geography. That refers to this time. There is the golden age, the silver age, the copper age and iron age, the confluence age is definitely required in between. Otherwise, who would make the iron age into the golden age? The Father comes at the confluence age to change residents of hell into residents of heaven. This is the Highest Authority, the Godfatherly Government and Dharamraj is also with Him. Souls say: “I am without virtues. I have no virtues!” People say this when they go in front of the deity idols in the temples. They should say this to the Father. They put Him aside and go and say this to the brothers. Those deities are brothers. You don’t receive anything from brothers(deities). While worshipping brothers, you have continued to come down. You children now understand that Baba has come and that you receive the inheritance from Him. People don’t even know the Father and say that He is omnipresent. Some say that He is the eternal Element of Light. Others say that He is beyond name and form. Since He is the form of Eternal Light, how can He be beyond name and form? Because of not knowing the Father, people have become impure. Everyone has to become tamopradhan. Then, when the Father comes, He makes everyone satopradhan. All souls reside with the Father in the incorporeal world. Then, they come here and play their parts as they go through their sato, rajo and tamo stages. Souls remember the Father. The Father comes and says: I take the support of the body of Brahma. This is the Lucky Chariot. There cannot be a chariot without a soul. It has been explained to you children that this is the rain of knowledge; it is knowledge. What happens through this? The impure world becomes pure. The River Ganges and the River Jamuna will also exist in the golden age. They say that Krishna plays on the banks of the River Ganges. There is nothing like that. He is a prince of the golden age and is looked after very well because he is a flower. A flower is so good and beautiful. Everyone comes and takes fragrance from flowers. No one takes fragrance from thorns. This is now the world of thorns. The Father comes and makes this forest of thorns into a garden of flowers and this is why He is called Babulnath (The Lord of Thorns). Because He sits here and changes thorns into flowers, He is praised as the Baba who changes thorns into flowers. You children should now have so much love for the Father! Physical fathers throw you into the gutter! This Father purifies you and removes you from the gutter for 21 births. They make you impure and this is why souls, while having worldly fathers, still remember the Father from beyond this world. You now understand that you have been remembering the Father for half the cycle. The Father definitely comes. People celebrate the birthday of Shiva. You know that you belong to the unlimited Father. You now have a relationship with Him and also with your worldly fathers. By remembering the Father from beyond, you will become pure. You souls understand that those are your worldly fathers and that this One is the Father from beyond. Even on the path of devotion, souls understand this. That is why souls call out: O God! O God the Father! Souls remember the imperishable Fatherbut no one understands that that Father comes and establishes heaven. In the scriptures, they have given a long duration to all the ages. It doesn’t enter anyone’s thoughts that the Father comes to purify the impure and that He would surely have to come at the confluence age. They have written that the duration of the cycle is hundreds of thousands of years and have thrown people into total darkness! They continue to stumble around in order to attain God. They say: Those who do a lot of devotion definitely attain God. Those who do the most devotion should definitely find Him first. The Father has shown you the clear account. You are the ones who perform devotion first. Therefore, you should receive knowledge from God first so that you can go and rule in the new world. The unlimited Father is giving you children knowledge. There is no question of difficulty about this. The Father says: You have been remembering Me for half the cycle. No one remembers Me when they are in happiness. It is when everyone becomes unhappy at the end that I come and make you happy. You are now becoming great people. Look how firstclass the bungalows of the Chief Minister and the Prime Minister are! There, the cows and all the furniture etc. will be first class. You are becoming such great people (deities); you are becoming deities with divine virtues, the masters of heaven. There, your palaces will be studded with diamonds and jewels. There, your furniture will be firstclass and studded with gold. Here, even the swings etc. are of very poor quality. There, everything will be first class and studded with diamonds and jewels. This is the sacrificial fire of the knowledge of Rudra. Shiva is also called Rudra. When devotion comes to an end, God creates the sacrificial fire of Rudra. In the golden age there is no question of sacrificial fires or devotion. At this time the Father creates this imperishable sacrificial fire of Rudra which is then remembered later. Devotion does not continue for all time. There is devotion and knowledge. Devotion is the night and knowledge is the day. The Father comes and brings the day. Therefore you children should have so much love for the Father. Baba is making you into the masters of the world! He is the most beloved Baba. There cannot be anyone lovelier than He is. You have been remembering Him for half the cycle: Baba, come and remove our sorrow! The Father has now come and explains: You have to live at home with your family. For how long could you stay here with Baba? You can only stay with Baba in the supreme abode. So many children cannot stay here. How could the Teacher ask questions? Would you be able to respond to a loudspeaker? This is why he only teaches a few students at a time. There are so many colleges and then all of them have to take exams. A list is made. Here, it is only the one Father who is teaching you. You have to explain that everyone remembers that Father from beyond this world at the time of sorrow. That Father has now come here. The great Mahabharat War is in front of you. Those people think that Krishna too came at the time of the Mahabharat War. That is impossible! People are completely confused. In spite of that, they continue to remember Krishna. Now, as well as Shiva, Krishna is most beloved. However, he is corporeal whereas that One is incorporeal. The incorporeal Father is the Father of all souls. Both are most beloved. Krishna is also the master of the world. You can now judge for yourself who is lovelier. It is only Shiv Baba who makes you as worthy as that. What does Krishna do? Only the Father makes him become like that, and so that Father should be praised more. They have portrayed the dance of Shankar. In fact, there is no question of a dance etc. The Father has explained to you: All of you are Parvatis. Shiva, the Lord of Immortality, is telling you the story. That is the viceless world. There is no question of vice there. Would the Father create a vicious world? There is sorrow in vices. People learn many types of hatha yoga. They go and sit in caves. They even walk over fire. There is a lot of occult power; many things are made to emerge through magic. God is also called the Magician, the Jewel Merchant and the Businessman. Therefore, He must definitely be living. He says: I do come. He is the Magician. He changes humans into deities and beggars into princes. Have you ever seen such magic? Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. You have to go to the garden of flowers. Therefore, become fragrant flowers. Don’t cause anyone sorrow. Have all relationships with the one parlokik Father.
  2. Shiv Baba is the loveliest of all. Have love for Him alone. Remember the Father, the Bestower of Happiness.
Blessing: May you become a flying bird, free from attachment to this world, and tour around the subtle region.
In order to tour around the subtle region and the incorporeal world with the plane of your intellect, become a flying bird. Go wherever you want, whenever you want with your intellect. This is only possible when you become completely free from attachment to this world. This world is tasteless and when you have nothing to do with this tasteless world, where there is no attainment you should stop going there with your intellect. This is the depths of hell and so let there not be any thoughts or dreams of going into this world.
Slogan: To give the experience of truth and manners through your face and your activity is greatness.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 11 JANUARY 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 11 January 2020

11/01/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, continue to follow the directions of the one Father and the Father will be responsible for you. The Father’s direction is: Remember Me whilst walking and moving around.
Question: What are the main signs of the children who are good and virtuous?
Answer: They do very good service of changing thorns into flowers. They do not prick anyone like thorns do. They never fight amongst themselves. They do not cause sorrow for anyone. To cause sorrow means to prick them like thorns.
Song: Time is passing by.

Om shanti. You sweetest, long-lost and now-found, spiritual children understand the meaning of this song, numberwise, according to the efforts you make. “Numberwise” is said because some have first-grade understanding, some secondgrade and others thirdgrade. Each one understands in his own way. Each of your intellects has your own individual faith. The Father continues to explain. Always consider it to be Shiv Baba giving directions through this one. You have been following devilish directions for half a cycle. Now have the faith that by following God’s directions your boat can go across. If you consider these directions to come from a human being, and not from God, you become confused. The Father says: Follow My directions and I am then responsible for you. I am responsible for whatever activity is performed through this one. I will make it right. Simply continue to follow My directions. Those whose remembrance is accurate are the ones who follow My directions. If you understand at every step that these are God’s directions and you follow them, you can never experience a loss. There is victory in having faith. There are many children who do not understand these things. By having a little knowledge, they become body conscious and they have very little yoga. Knowledge means to know the history and geography. This is very easy. People here study so much science. This study is very easy; it is yoga that requires effort. If someone says to Baba that he remains very intoxicated in yoga, Baba would not believe him. Baba sees each one’s acts. Those who remember the Father must be the most lovely. However, when you don’t have remembrance, it is then that you perform wrong acts; there is the difference of day and night. You can now explain the picture of the ladder very well. At present, this is a jungle of thorns; it is not a garden. You should explain clearly that Bharat used to be a garden of flowers. Do wild animals ever live in a garden? Only deities live there. The Father is the highest Authority and then Brahma, the Father of Humanity, is also the highest authority. This Dada is also the highest authority. There is Shiva and there is Brahma, the Father of Humanity. You souls are the children of Shiv Baba, and, in your corporeal forms, you are brothers and sisters, children of Brahma, the Father of Humanity. He is the great,great grandfather of everyone. A building is needed for such a highestAuthority. Write this and see if it touches anyone’s intellect. There is Shiv Baba and there is Brahma, the Father of Humanity; the Father of all souls and the father of all human beings. This is a very good point to explain to others. However, you children do not explain it fully. You forget it because you develop the arrogance of having knowledge. It is as though you even try to gain victory over BapDada. This Dada says: OK, if you don’t listen to me, always think that it is Shiv Baba who is explaining and that you must follow His directions. It is God who is directly giving you directions to do this and that. He is responsible. Follow the directions given by God. This one is not God. You have to study with God. Always think that it is God who is giving you directions. Lakshmi and Narayan were also human beings of Bharat. All are human beings, but they were all residents of Shivalaya; that is why everyone says namaste to them. However, some children don’t explain fully. Many develop arrogance of their knowledge. Many have defects. It is only when you have full yoga that your sins can be absolved. To become a master of the world is not like going to your aunty’s home. Baba sees how Maya catches hold of some children by their noses and throws them into the gutter. You should stay in remembrance of the Father with happiness and in full bloom. Your aim and objective is in front of you. You have to become like Lakshmi and Narayan. By forgetting this, your degree of happiness does not rise. Some say that they want to have conducted meditation because they are unable to remember Him when they are outside. Because you don’t stay in remembrance, Baba sometimes sends you a programme to follow but, in spite of that, you don’t sit in remembrance. Their intellects continue to wander here and there. Baba gives his own example. He was such a strong devotee of Narayan that he always kept a picture of Narayan with him wherever he went. Nevertheless, his intellect would still wander around at the time of worshipping. The same happens here. The Father says: Whilst walking and moving around, you should continue to remember the Father, but many of you want to have a sister especially conduct meditation for you. There is no reason to have specially conducted meditation. Baba always says: Stay in remembrance! Whilst sitting in yoga, some children go into trance. They are unable to remember knowledge or have yoga and they start dozing off. Many have the habit of doing that. That peace is only temporary and it means that they are peaceless throughout the day. If you do not remember the Father whilst walking and moving around, how would your burden of sins be removed? This is the burden of half a cycle. It is considering yourself to be a soul and remembering the Father that takes a lot of effort. Although many children write to Baba telling Him that they stayed in remembrance for such-and-such a time, they are not really able to stay in remembrance for that long; they don’t really understand the chart. Baba is the unlimited Father. He is the Purifier, and so you should remain in happiness. You should not think that you belong to Shiv Baba anyway. There are many children like this who think that they belong to Baba anyway, and they do not remember Him at all. If they did remember Him, they would become numberone. You need a very good intellect in order to explain to others. We are praising Bharat. When the world was new there was the kingdom of deities. It is now the old world, the iron age. That is the land of happiness and this is the land of sorrow. When Bharat was golden aged, it was the kingdom of deities. People ask you: How can we believe that it was their kingdom? This knowledge is so wonderful. Whatever is in each one’s fortune and whatever effort each of you makes is clearly visible. You can tell from their activity. After all, you are human beings, both in the golden age and in the iron age. So, why do people go and bow their heads in front of those idols? They are called the masters of heaven. When someone dies, they say that so-and-so has become a resident of heaven. They don’t even understand that. At this time, all are residents of hell. Everyone will surely take rebirth here. Baba continues to observe everyone’s behaviour. Baba has to talk in such an ordinary way to some of you. He has to look after you. The Father explains everything very clearly. You understand that this is correct, so why do you still become big thorns? By causing sorrow for one another you become thorns. You do not let go of that habit. The Father, the Gardener, is now planting a garden of flowers. He continues to change you from thorns into flowers. This is His task. How could anyone who is a thorn change others into flowers? You still have to be cautious about whom you send to the exhibitions. Good and virtuous children are those who do the good service of changing thorns into flowers. They do not prick anyone like thorns do, that is, they do not cause sorrow for anyone. They never fight amongst themselves. You children have to explain very accurately. There is no question of insulting anyone in this. Shiv Jayanti is now coming and so you should hold many exhibitions. You can also hold small exhibitions and explain: Become residents of heaven in a second, that is, from being impure, corrupt ones, become pure and elevated. Attain liberation-in-life in a second. They don’t even understand the meaning of liberation-in-life. It is now that you also understand. Everyone receives liberation and liberation-in-life from the Father. However, you also have to understand the drama. Those in other religions will not go to heaven. Everyone will return to their own section. Then, they will come down at their own times to establish their religions. This is clearly shown in the picture of the tree. No one, other than the one Satguru, can grant salvation to all. However, there are many gurus who can teach you devotion. No human guru can grant salvation. You simply need the wisdom to explain. You have to use your intellects in this. This drama is played out so wonderfully. There are very few of you who remain intoxicated by this. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Night class – 18/03/68

In fact, you do not need to debate about the scriptures. The main aspect is remembrance and to understand the beginning, the middle and end of the world. You have to become a ruler of the globe. You simply have to understand this cycle. It is remembered of this, that you receive liberation-in-life in a second. It must be a wonder for you children that devotion lasts for half the cycle and that there isn’t the slightest knowledge. Only the Father has knowledge. You have to know it from the Father. This Father is so uncommon and this is why only a handful out of multimillions emerge. Those teachers would not say this. This One says: I am the Father, Teacher and Guru. So people wonder about this when they hear this. Bharat is said to be the mother country because the name of Amba (Goddess Mother) is very well known. They have many melas (fairs) to Amba. The word “Amba” is sweet. Little children love their mother a lot because she feeds them, gives them a drink and looks after them. However, there has to be a father of Amba too. This child is adopted. She doesn’t have a husband. This is something new. Prajapita Brahma would definitely adopt children. The Father alone comes and explains all these things to you. So many melas to Amba take place and she is worshipped because that child (Mama) has done a lot of service. No one else could teach as many children as the number of people Mama has taught. Mama is very well known and many big melas are held. You children know that it is the Father who has come and explained the secrets of the beginning, middle and end to you children. You children also know about the Father’s home. You have love for the Father and you also love the home. You receive this knowledge at this time. So much income is earned through this study. So, there has to be happiness. You are completely ordinary. The world does not know that the Father comes and speaks this knowledge. The Father alone comes and tells you children all these new things. The new world is created through the unlimited study. There is disinterest in the old world. You children have happiness of knowledge within you. You have to remember the Father and the home. Everyone has to return home. The Father would say to everyone, “Children, I have come to give you the inheritance of liberation and liberation-in-life.” So, why do you forget? I am your unlimited Father. I have come to teach you Raj Yoga. So, will you not follow shrimat? Otherwise, there would be a great loss. This is an unlimited loss. If you let go of the Father’s hand, there will be a loss in your income. Achcha.

Good night. Om shanti.

Essence for dharna:

  1. Become most lovely by having remembrance of the one Father. Whilst walking, moving around and performing actions practise remaining in remembrance. Stay in remembrance of the Father and remain happy and in full bloom.
  2. Follow God’s directions at every step whilst performing every act. Do not become arrogant (intoxication of body consciousness). Do not perform any bad act. Do not become confused.
Blessing: May you be economical with your time and powers as a master creatorby while understanding your responsibility for world benefit.
All the souls of the world are the family of you elevated souls and the bigger the family, the more you have to consider being economical. Use all your time and powers economicallywhile keeping all souls in front of you and considering yourself to be an instrument for unlimited service. Just to earn for yourself, to eat from that and use it up – do not be careless in that way. Make a budget of all your treasures. Keep the blessing of being a master creator in your awareness and accumulate a stock of time and powers for service.
Slogan: Everyone continues to receive blessings from the thoughts and words of a great donor.

*** Om Shanti ***

Special homework to experience the avyakt stage in this avyakt month.

The speciality of an angelic or avyakt life is to be ignorant of the knowledge of desire. There is no question of any desires in a deity life. When your life becomes a Brahmin life and so an angelic life, that is, when you have attained the karmateet stage, you cannot be bound by any type of action, whether it is a pure action, a wasteful action, a sinful action or an action of the past.

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 11 JANUARY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 11 January 2020

11-01-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम एक बाप के डायरेक्शन पर चलते चलो तो बाप तुम्हारा रेस्पॉन्सिबुल है, बाप का डायरेक्शन है चलते-फिरते मुझे याद करो”
प्रश्नः- जो अच्छे गुणवान बच्चे हैं उनकी मुख्य निशानियां क्या होंगी?
उत्तर:- वह कांटों को फूल बनाने की अच्छी सेवा करेंगे। किसी को भी कांटा नहीं लगायेंगे, कभी भी आपस में लड़ेंगे नहीं। किसी को भी दु:ख नहीं देंगे। दु:ख देना भी कांटा लगाना है।
गीत:- यह वक्त जा रहा है……..

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे सिकीलधे रूहानी बच्चों ने नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार इस गीत का अर्थ समझा। नम्बरवार इसलिए कहते हैं क्योंकि कोई तो फर्स्ट ग्रेड में समझते हैं, कोई सेकण्ड ग्रेड में, कोई-कोई थर्ड ग्रेड में। समझ भी हर एक की अपनी-अपनी है। निश्चयबुद्धि भी हर एक की अपनी है। बाप तो समझाते रहते हैं, ऐसा ही हमेशा समझो कि शिवबाबा इन द्वारा डायरेक्शन देते हैं। तुम आधाकल्प आसुरी डायेरक्शन पर चलते आये हो, अब ऐसे निश्चय करो कि हम ईश्वरीय डायरेक्शन पर चलते हैं तो बेड़ा पार हो सकता है। अगर ईश्वरीय डायरेक्शन न समझ मनुष्य का डायरेक्शन समझा तो मूंझ पड़ेंगे। बाप कहते हैं-मेरे डायरेक्शन पर चलने से फिर मैं रेसपॉन्सिबुल हूँ ना। इन द्वारा जो कुछ होता है, उनकी एक्टिविटी का मैं ही रेसपॉन्सिबुल हूँ, उसको हम राइट करेंगे। तुम सिर्फ हमारे डायरेक्शन पर चलो। जो अच्छी रीति याद करेंगे वही डायरेक्शन पर चलेंगे। कदम-कदम ईश्वरीय डायरेक्शन समझ चलेंगे तो कभी घाटा नहीं होगा। निश्चय में ही विजय है। बहुत बच्चे इन बातों को समझते नहीं हैं। थोड़ा ज्ञान आने से देह-अभिमान आ जाता है। योग बहुत ही कम है। ज्ञान तो है हिस्ट्री-जॉग्राफी को जानना, यह तो सहज है। यहाँ भी मनुष्य कितनी साइंस आदि पढ़ते हैं। यह पढ़ाई तो इज़ी है, बाकी मेहनत है योग की।

कोई कहे बाबा हम योग में बहुत मस्त रहते हैं, बाबा मानेगा नहीं। बाबा हर एक की एक्ट को देखते हैं। बाप को याद करने वाला तो मोस्ट लवली होगा। याद नहीं करते इसलिए ही उल्टा-सुल्टा काम होता है। बहुत रात-दिन का फ़र्क है। अभी तुम इस सीढ़ी के चित्र पर भी अच्छी रीति समझा सकते हो। इस समय है कांटों का जंगल। यह बगीचा नहीं है। यह तो क्लीयर समझाना चाहिए कि भारत फूलों का बगीचा था। बगीचे में कभी जंगली जानवर रहते हैं क्या? वहाँ तो देवी-देवता रहते हैं। बाप तो है ही हाइएस्ट अथॉरिटी और फिर यह प्रजापिता ब्रह्मा भी हाइएस्ट अथॉरिटी ठहरे। यह दादा है सबसे बड़ी अथॉरिटी। शिव और प्रजापिता ब्रह्मा। आत्मायें हैं शिव बाबा के बच्चे और फिर साकार में हम भाई-बहन सब हैं प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे। यह है सबका ग्रेट-ग्रेट ग्रैन्ड फादर। ऐसे हाइएस्ट अथॉरिटी के लिए हमको मकान चाहिए। ऐसे तुम लिखो फिर देखो बुद्धि में कुछ आता है।

शिवबाबा और प्रजापिता ब्रह्मा, आत्माओं का बाप और सब मनुष्य मात्र का बाप। यह प्वाइंट बहुत अच्छी है समझाने की। परन्तु बच्चे पूरी रीति समझाते नहीं हैं, भूल जाते हैं, ज्ञान की मगरूरी चढ़ जाती है। जैसेकि बापदादा पर भी जीत पा लेते हैं। यह दादा कहते हैं, मेरी भल न सुनो। हमेशा समझो शिवबाबा समझाते हैं, उनकी मत पर चलो। डायरेक्ट ईश्वर मत देते हैं कि यह-यह करो, रेसपॉन्सिबुल हम हैं। ईश्वरीय मत पर चलो। यह ईश्वर थोड़ेही है, तुमको ईश्वर से पढ़ना है ना। हमेशा समझो यह डायरेक्शन ईश्वर देते हैं। यह लक्ष्मी-नारायण भी भारत के ही मनुष्य थे। यह भी सब मनुष्य हैं। परन्तु यह शिवालय के रहने वाले हैं इसलिए सब नमस्ते करते हैं। परन्तु बच्चे पूरा समझाते नहीं हैं, अपना नशा चढ़ जाता है। डिफेक्ट तो बहुतों में है ना। जब पूरा योग हो तब विकर्म विनाश हों। विश्व का मालिक बनना कोई मासी का घर थोड़ेही है। बाबा देखते हैं, माया एकदम नाक से पकड़कर गटर में गिरा देती है। बाप की याद में तो बड़ी खुशी में प्रफुल्लित रहना चाहिए। सामने एम ऑब्जेक्ट खड़ी है, हम यह लक्ष्मी-नारायण बन रहे हैं। भूल जाने से खुशी का पारा नहीं चढ़ता है। कहते हैं हमको नेष्ठा में बिठाओ, बाहर में हम याद नहीं कर सकते हैं। याद में नहीं रहते हैं इसलिए कभी-कभी बाबा भी प्रोगाम भेज देते हैं परन्तु याद में बैठते थोड़ेही हैं, बुद्धि इधर-उधर भटकती रहती है। बाबा अपना मिसाल बताते हैं-नारायण का कितना पक्का भक्त था, जहाँ-तहाँ साथ में नारायण का चित्र रहता था। फिर भी पूजा के समय बुद्धि इधर-उधर भागती थी। इसमें भी ऐसा होता है। बाप कहते हैं चलते-फिरते बाप को याद करो परन्तु कई कहते हैं – बहन नेष्ठा करावे। नेष्ठा का तो कोई अर्थ ही नहीं है। बाबा हमेशा कहते हैं याद में रहो, कई बच्चे नेष्ठा में बैठे-बैठे ध्यान में चले जाते हैं। न ज्ञान, न याद रहती। या तो फिर झुटके खाने लग पड़ते हैं, बहुतों को आदत पड़ गई है। यह तो अल्पकाल की शान्ति हो गई। गोया बाकी सारा दिन अशान्ति रहती है। चलते-फिरते बाप को याद नहीं करेंगे तो पापों का बोझा कैसे उतरेगा? आधाकल्प का बोझा है। इसमें ही बड़ी मेहनत है। अपने को आत्मा समझो और बाप को याद करो। भल बाबा को बहुत बच्चे लिख भेजते हैं-इतना समय याद में रहा परन्तु याद रहती नहीं है। चार्ट को समझते ही नहीं हैं। बाबा बेहद का बाप है। पतित-पावन है तो खुशी में रहना चाहिए। ऐसे नहीं, हम तो शिवबाबा के हैं ना। ऐसे भी बहुत हैं, समझते हैं हम तो बाबा के हैं लेकिन याद बिल्कुल करते नहीं। अगर याद करते होते तो फिर पहले नम्बर में जाना चाहिए। किसको समझाने की भी बड़ी अच्छी बुद्धि चाहिए। हम तो भारत की महिमा करते हैं। नई दुनिया में आदि सनातन देवी-देवताओं का राज्य था। अभी है पुरानी दुनिया, आइरन एज। वह सुखधाम, यह दु:खधाम। भारत गोल्डन एज था तो इन देवताओं का राज्य था। कहते हैं हम कैसे समझें कि इनका राज्य था? यह नॉलेज बड़ी वन्डरफुल है। जिसकी तकदीर में जो है, जो जितना पुरूषार्थ करते हैं वह देखने में तो आता है। तुम एक्टिविटी से जानते हो, हैं तो कलियुगी भी मनुष्य, तो सतयुगी भी मनुष्य। फिर उन्हों के आगे माथा जाकर क्यों टेकते हो? इन्हों को स्वर्ग का मालिक कहते हैं ना। कोई मरता है तो कहते हैं फलाना स्वर्गवासी हुआ, यह भी नहीं समझते। इस समय तो नर्कवासी सब हैं। जरूर पुनर्जन्म भी यहाँ ही लेंगे। बाबा हर एक की चलन से देखते रहते हैं। बाबा को कितना साधारण रीति से किस-किस से बात करनी पड़ती है। सम्भालना पड़ता है। बाप कितना क्लीयर कर समझाते हैं। समझते भी हैं तो बात बड़ी ठीक है। फिर भी क्यों बड़े-बड़े काँटे बन जाते हैं। एक-दो को दु:ख देने से काँटे बन जाते हैं। आदत छोड़ते ही नहीं। अभी बागवान बाप फूलों का बगीचा लगाते हैं। काँटों को फूल बनाते रहते हैं। उनका धन्धा ही यह है। जो खुद ही काँटा होगा तो फूल कैसे बनायेगा? प्रदर्शनी में भी बड़ी खबरदारी से किसको भेजना होता है।

अच्छे गुणवान बच्चे वह जो कांटों को फूल बनाने की अच्छी सेवा करते हैं। किसी को भी कांटा नहीं लगाते हैं अर्थात् किसी को दु:ख नहीं देते हैं। कभी भी आपस में लड़ते नहीं हैं। तुम बच्चे बहुत एक्यूरेट समझाते हो। इसमें किसी की इनसल्ट की तो बात ही नहीं। अभी शिव जयन्ती भी आती है। तुम प्रदर्शनी जास्ती करते रहो। छोटी-छोटी प्रदर्शनी पर भी समझा सकते हो। एक सेकेण्ड में स्वर्गवासी बनो अथवा पतित भ्रष्टाचारी से पावन श्रेष्ठाचारी बनो। एक सेकण्ड में जीवनमुक्ति प्राप्त करो। जीवनमुक्ति का भी अर्थ समझते नहीं हैं। तुम भी अभी समझते हो। बाप द्वारा सबको मुक्ति जीवनमुक्ति मिलती है। परन्तु ड्रामा को भी जानना है। सब धर्म स्वर्ग में नहीं आयेंगे। वह फिर अपने-अपने सेक्शन में चले जायेंगे। फिर अपने-अपने समय पर आकर स्थापना करेंगे। झाड़ में कितना क्लीयर है। एक सद्गुरू के सिवाए सद्गति दाता और कोई हो नहीं सकता। बाकी भक्ति सिखलाने वाले तो ढेर गुरू हैं। सद्गति के लिए मनुष्य गुरू हो नहीं सकता। परन्तु समझाने का भी अक्ल चाहिए, इसमें बुद्धि से काम लेना होता है। ड्रामा का कैसा वन्डरफुल खेल है। तुम्हारे में भी बहुत थोड़े हैं जो इस नशे में रहते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

रात्रि क्लास 18-3-68

तुमको वास्तव में शास्त्रों पर वाद-विवाद करने की कोई दरकार नहीं है। मूल बात है ही याद की, और सृष्टि के आदि मध्य अन्त को समझना है। चक्रवर्ती राजा बनना है। इस चक्र को ही सिर्फ समझना है, इनका ही गायन है सेकण्ड में जीवनमुक्ति। तुम बच्चों को वन्डर लगता होगा आधाकल्प भक्ति चलती है। ज्ञान रिंचक नहीं। ज्ञान है ही बाप के पास। बाप द्वारा ही जानना है। यह बाप कितना अनकामन है इसलिए कोटों में कोई निकलते हैं। वह टीचर्स ऐसे थोड़ेही कहेंगे। यह तो कहते हैं मैं ही बाप टीचर गुरु हूँ। तो मनुष्य सुनकर वन्डर खायेंगे। भारत को मदरकन्ट्री कहते हैं क्योंकि अम्बा का नाम बहुत बाला है। अम्बा के मेले भी बहुत लगते हैं, अम्बा मीठा अक्षर है। छोटे बच्चे भी माँ को प्यार करते हैं ना क्योंकि माँ खिलाती, पिलाती सम्भालती है। अब अम्बा का बाबा भी चाहिए ना। यह तो बच्ची है एडाप्टेड। पति तो है नहीं। यह नई बात है ना। प्रजापिता ब्रह्मा तो जरूर एडाप्ट करते होंगे। यह सभी बातें बाप ही आकर तुम बच्चों को समझाते हैं। अम्बा का कितना मेला लगता है, पूजा होती है, क्योंकि बच्ची ने बहुत सर्विस की है। मम्मा ने जितने को पढ़ाया होगा उतना और कोई पढ़ा न सके। मम्मा का नामाचार बहुत है, मेला भी बहुत बड़ा लगता है। अभी तुम बच्चे जानते हो बाप ने ही आकर रचना के आदि-मध्य-अन्त का सारा राज़ तुम बच्चों को समझाया है। तुमको बाप के घर का भी मालूम पड़ा है। बाप से भी लव है तो घर से भी लव है। यह ज्ञान तुमको अभी मिलता है। इस पढ़ाई से कितनी कमाई होती है। तो खुशी होनी चाहिए ना। और तुम हो बिल्कुल साधारण। दुनिया को पता नहीं है, बाप आकर यह नॉलेज सुनाते हैं। बाप ही आकर सभी नई नई बातें बच्चों को सुनाते हैं। नई दुनिया बनती है बेहद की पढ़ाई से। पुरानी दुनिया से वैराग्य आ जाता है। तुम बच्चों के अन्दर में ज्ञान की खुशी रहती है। बाप को और घर को याद करना है। घर तो सभी को जाना ही है। बाप तो सभी को कहेंगे ना बच्चों, हम तुमको मुक्ति जीवनमुक्ति का वर्सा देने आया हूँ। फिर भूल क्यों जाते हो। मैं तुम्हारा बेहद का बाप हूँ। राजयोग सिखलाने आया हूँ। तो क्या तुम श्रीमत पर नहीं चलेंगे! फिर तो बहुत घाटा पड़ जायेगा। यह है बेहद का घाटा। बाप का हाथ छोड़ा तो कमाई में घाटा पड़ जायेगा। अच्छा गुडनाईट। ओम् शान्ति।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) एक बाप की याद से मोस्ट लवली बनना है। चलते फिरते कर्म करते याद में रहने की प्रैक्टिस करनी है। बाप की याद और खुशी में प्रफुल्लित रहना है।

2) कदम-कदम ईश्वरीय डायरेक्शन पर चल हर कार्य करना है। अपनी मगरूरी (देह-अभिमान का नशा) नहीं दिखाना है। कोई भी उल्टा-सुल्टा काम नहीं करना है। मूंझना नहीं है।

वरदान:- विश्व कल्याण की जिम्मेवारी समझ समय और शक्तियों की इकॉनामी करने वाले मास्टर रचयिता भव
विश्व की सर्व आत्मायें आप श्रेष्ठ आत्माओं का परिवार है, जितना बड़ा परिवार होता है उतना ही इकॉनामी का ख्याल रखा जाता है। तो सर्व आत्माओं को सामने रखते हुए, स्वयं को बेहद की सेवार्थ निमित्त समझते हुए अपने समय और शक्तियों को कार्य में लगाओ। अपने प्रति ही कमाया, खाया और गँवाया-ऐसे अलबेले नहीं बनो। सर्व खजानों का बजट बनाओ। मास्टर रचयिता भव के वरदान को स्मृति में रख समय और शक्ति का स्टॉक सेवा प्रति जमा करो।
स्लोगन:- महादानी वह है जिसके संकल्प और बोल द्वारा सबको वरदानों की प्राप्ति हो।

अव्यक्त स्थिति का अनुभव करने के लिए विशेष होमवर्क

फरिश्ता वा अव्यक्त जीवन की विशेषता है – इच्छा मात्रम् अविद्या। देवताई जीवन में तो इच्छा की बात ही नहीं। जब ब्राह्मण जीवन सो फरिश्ता जीवन बन जाती अर्थात् कर्मातीत स्थिति को प्राप्त हो जाते तब किसी भी शुद्ध कर्म, व्यर्थ कर्म, विकर्म वा पिछला कर्म, किसी भी कर्म के बन्धन में नहीं बंध सकते।

TODAY MURLI 11 JANUARY 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 11 January 2019

Today Murli in Hindi :- Click Here

Read Murli 10 January 2019 :- Click Here

11/01/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, remain constantly happy and give happiness to others. This is having mercy for everyone. To show anyone the path is the greatest charity.
Question: Who can remain constantly happy and what is the way to become happy?
Answer: Only those who are very clever in knowledge and who know how to remember the drama in the form of a story can remain constantly happy. In order to remain constantly happy, continue to follow the Father’s shrimat. Consider yourself to be a soul and churn very well everything that the Father explains to you. By churning the ocean of knowledge, you will become happy.

Om shanti. The spiritual Father is having a heart-to-heart conversation with the spiritual children. You souls know that only the One is our Father and that He also gives us teachings. It is the duty of a teacher to give teachings and the duty of a guru to show you your destination. You children have understood your destination. The pilgrimage of remembrance is absolutely necessary for liberation and liberation-in-life; both are easy. The cycle of 84 births continues to turn. You should also remember that our cycle of 84 births is now ending and that we now have to return home. However, sinful souls cannot go to liberation or liberation-in-life. You have to churn the ocean of knowledge in this way. Those who do this will receive the reward. They are the ones who will remain happy and also make others happy. You have to have mercy for others to show them the path. You children know that this is the most auspicious confluence age. Some remember this, whereas others don’t; they forget it. If you remember even this much, the mercury of your happiness will remain high. If you also remember the Father in the form of the Teacher and the Guru, too, the mercury of your happiness will remain high. However, while you are moving along, there is some confusion. Just as you have to come up and go down the mountain, so the children’s stage is also the same. Some climb up very high and then they fall. So, they fall down even further than they were before. Everything they had earned is then lost. No matter how much they have donated or how much charity they have performed, if they begin to commit sin while performing charity, all the charity is finished. The greatest charity is to remember the Father. It is only by having remembrance that you will become a charitable soul. If you continue to make mistakes by being coloured by the company you keep, you will fall even further than you were before. Then, nothing will be accumulated in that account; there will be a loss. When you do something sinful, a loss is incurred; a lot of sin is accumulated in your account. Accounts have to be looked after. The Father also says: You had an account of charity, and by then committing sin, that became an account of one hundred-fold sin; you incurred a further loss. Some sins are very big and others are lighter. Lust is very severe. Anger is the second number and greed is less than that. Whatever you have accumulated, that is reduced the most by lust. Instead of a profit, there is a loss. Those who defame the Satguru cannot receive a status. Some belong to the Father and then leave Him. What is the reason for that? Usually, they are hurt by lust. That is a very severe enemy. They make an effigy of it and burn it. They don’t create effigies of anger or greed. You have to gain total victory over lust, for only then will you become the conquerors of the world. You call out: Come and make us, who have become impure in the kingdom of Ravan, pure. They all sing: O Purifier, o Purifier, the One who purifies the impure, the Rama who belongs to Sita, come! However, they don’t understand the meaning of that. You know that the Father would surely come to establish the new world but, because they have lengthened its duration, there is now extreme darkness. There is knowledge and ignorance. Devotion is ignorance because they don’t know the One whom they worship. So, how can they attain Him? This is why their donations and charity etc. are fruitless. Perhaps they receive a little temporary happiness like the droppings of a crow but, otherwise, there is nothing but sorrow. The Father now says: Constantly remember Me alone and all your sorrow will be removed. You now have to see how much you remember Him so that the old finishes and the new accumulates. Some don’t accumulate anything. Everything depends on remembrance. How can your sins be erased or cut away without you having remembrance? There are many sins of birth after birth. Your sins of many births will not be cut away by telling Baba your life story of this birth. The sins of this birth become a little lighter, but you have to make a lot of effort. Only with yoga will all the karmic accounts of so many births be settled. You should think about how much yoga you have. Will I be able to take birth at the beginning of the golden age? Only those who make a lot of effort will take birth at the beginning of the golden age; they cannot remain hidden. Not everyone will go to the golden age. Others would claim a low status at the end. If they do come at the beginning, they would have to serve. This is something common that has to be understood. This is why you have to remember the Father a great deal. You know that we have come here to become the masters of the world in the new world. Those who remember Baba will definitely remain happy. If you want to become a king, you also have to create your subjects. How else could it be understood that you are going to become a king? Those who open centres and do service also earn an income. They receive a lot of benefit. They receive a reward too. Some even open three or four centres. Whatever they do, they definitely receive a share of that. The burden of Maya’s sorrow is now being lifted by all of you together and so everyone gives a shoulder. Therefore, everyone receives a reward. Those who make effort and show the path to many will accordingly receive a high status. They will have a lot of happiness. Your heart knows how many you have shown the path to and how many you have uplifted. This is the time to do everything. You all receive food and drink. Some don’t do any work at all. Look how much service Mama did! She benefited a lot from doing service. A lot of service is needed here too. There is service in yoga too. You receive such deep directions. Now, as you move forward, many different points will emerge. Day by day, there will continue to be progress; new points will emerge. Those who remain engaged in service are quickly able to grasp them. Nothing will sit in the intellects of those who don’t do service. How can they understand the form of a point? You can ask anyone: How big is a soul? Tell us what the land and time period of souls are! No one would be able to tell you. People ask about the name, form, land and time of the Supreme Soul. If you ask them this about souls, they become confused. No one knows this. A soul is such a tiny point and such a huge part is recorded in it. Here, too, there are many who don’t know about souls or the Supreme Soul. They have just renounced the vices and that, too, is a wonder! The religion of sannyasis is separate. This knowledge is for you. The Father explains: You were pure and you then became impure. You now have to become pure again. Only you go around the cycle of 84 births. No one in the world knows these things. Knowledge is separate from devotion. Knowledge makes you ascend and devotion makes you descend. So, there is the difference of day and night. No matter how much people consider themselves to be authorities of the Vedas and scriptures, they don’t know anything at all. You too now know them. Amongst you too, it is numberwise. It is because you forget that your happiness disappears. Otherwise, you would have a lot of happiness. You are receiving this inheritance from Baba. Baba grants you visions. However, if you have visions, but you don’t follow shrimat, what is the benefit in that? People remember the Father when they are in sorrow. They call out to the Father: Liberator! Oh Rama! Oh Prabhu! But they don’t know who He is. No one on the path of devotion says: Consider yourself to be a soul and remember the Father. Not at all! If they were to say this, it would have continued from time immemorial. Devotion has continued. There is a lot of devotion whereas knowledge is of One. People think that they will find God by performing devotion, but they don’t know how or when. No one knows when devotion begins or who does the maximum devotion. Will they continue to perform devotion for another 40,000 years? On the one side, people are doing devotion and on the other side, you are receiving knowledge. You have to beat your heads so much with human beings. You hold so many exhibitions but, in spite of that, only a handful out of multimillions emerges. How many do you make the same as yourselves and bring here? You cannot calculate at this time how many true Brahmins there are. There are many false children too. Brahmin priests tell religious stories whereas Baba is telling you the story of the Gita. You too relate it. Just as Baba speaks it, so do you children. It is the duty of you children to relate the true Gita. Everyone has scriptures. In fact, all the scriptures etc. belong to the path of devotion. Only the one Gita is the religious book of knowledge. The Gita is the mother and father. The Father Himself comes and grants salvation to everyone. People then defame such a Father. Shiv Baba’s birthday is worth diamonds. God, Himself, the Highest on High, is the Bestower of Salvation. How can there be praise of anyone else? People praise the deities, but it is only the one Father who makes them into deities. Our construction and destruction are taking place. There are many who are unable to explain anything, and so they do physical work. In the military, there are those who do all the work. It is said: The uneducated ones will have to bow down in front of the educated ones. Learn from what Mama and Baba do. You can also understand who the especially beloved children are. If you ask Baba, Baba would give you a name and say: Follow so-and-so. What would those who are not serviceable teach others? They would waste even more time. Baba explains: If you want to make progress, you can do that here. There is the picture here of how you took 84 births. You have understood this and so now explain it to others. It is so easy! You have to become this. Yesterday, you worshipped them. Today, you don’t because you have received knowledge. Many will come and take knowledge. As you open more centres, many people will come and understand it. The mercury of their happiness will rise as soon as they hear it. You have to change from an ordinary man into Narayan. There is also the story of the true Narayan. People continue to descend by doing devotion. They don’t know what knowledge is. The unlimited Father is explaining to you accurately. Baba says: Yesterday, I gave you the kingdom, so where did that kingdom go? You yourselves know that this is a play. Only the one Father tells you the secrets of the whole play. We say: Baba, You are bound by the drama, and You therefore have to come into the impure world and enter an impure body. People praise God a great deal. Children say: Baba, we called You and so You had to come to serve us, that is, to make us pure from impure. Every cycle, You make us into deities and then depart. This is like a story; it is a story for those who are clever. You children should remain happy. Baba has also become the Servantaccording to the drama. The Father says: Follow My directions. Consider yourselves to be souls. Renounce body consciousness. You will receive new bodies in the new world. Churn very well the things that the Father explains to you. Use your intellects to understand that you have come here to become this. Your aimand objective is in front of you. Those people consider God to be a human being or they say that He is incorporeal. All of you souls are also incorporeal. You adopt bodies and play your part. Baba too is playing a part. Only those who do good service will have the faith that they will definitely become a bead of the rosary. You have to change from an ordinary man into Narayan. When you fail, you automatically become Rama or Sita. God is teaching you and so you should study very well. However, there is also a lot of opposition from Maya. Maya brings storms. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Churn the ocean of knowledge and experience limitless happiness. Have the mercy to show the path to others. Don’t be coloured by the company you keep and thereby perform sinful actions.
  2. In order to lift the burden of Maya’s sorrow, you all have to give your shoulders. Open centres and become instruments for the benefit of many.
Blessing: May you in your Brahmin life be in the combined form and always have a cheerful and careful mood.
If in any situation your mood of happiness changes that would not then be called permanent happiness. Always have a cheerful and careful moodyour Brahmin life. Let your mood not change. When your mood changes, you would say that you want solitude because your mood is like that today. Your mood changes when you are alone. Always remain combined and your mood will not change.
Slogan: To celebrate a festival means to have enthusiasm for remembrance and service.

*** Om Shanti ***

Special effort to become equal to Father Brahma.

Now, keep the aim for intense effort: I am a doublelight angel. Increase the experience of the walking and moving angel. Practise the bodiless stage. Remaindouble light in order to finish any thoughts, sanskars or nature in one second.

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 11 JANUARY 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 11 January 2019

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11-01-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – सदा खुशी में रहो और दूसरों को भी खुशी दिलाओ, यही है सब पर कृपा करना, किसी को भी रास्ता बताना यह सबसे बड़ा पुण्य है।”
प्रश्नः- सदा खुशमिज़ाज़ कौन रह सकते हैं? खुशमिज़ाज़ बनने का साधन क्या है?
उत्तर:- सदा खुशमिज़ाज़ वही रह सकते जो ज्ञान में बहुत होशियार हैं, जो ड्रामा को कहानी की तरह जानते और सिमरण करते हैं। खुशमिज़ाज़ बनने के लिए सदा बाप की श्रीमत पर चलते रहो। अपने को आत्मा समझो और बाप जो भी समझाते हैं उसका अच्छी तरह मंथन करो। विचार सागर मंथन करते-करते खुशमिज़ाज़ बन जायेंगे।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप रूहानी बच्चों के साथ रूहरिहान कर रहे हैं। यह तो आत्मायें जानती हैं कि एक ही हमारा बाप है और शिक्षा भी देते हैं, टीचर का काम हैं शिक्षा देना। गुरू का काम है मंजिल बताना। मंजिल को भी बच्चे समझ गये हैं। मुक्ति जीवनमुक्ति के लिए याद की यात्रा बिल्कुल ज़रूरी है। हैं दोनों सहज। 84 जन्मों का चक्र भी फिरता रहता है। यह याद रहना चाहिए अभी हमारा 84 का चक्र पूरा हुआ है, अब वापिस जाना है। परन्तु पाप आत्मायें मुक्ति जीवनमुक्ति में वापिस जा नहीं सकती। ऐसे-ऐसे विचार सागर मंथन करना है। जो करेंगे सो पायेंगे। खुशी में भी वही आयेंगे और दूसरों को भी खुशी में वही लायेंगे। औरों पर भी कृपा करनी है – रास्ता बताने की। तुम बच्चे जानते हो यह पुरूषोत्तम संगमयुग है। यह भी कोई को याद रहता है, कोई को नहीं। भूल जाता है। यह भी याद रहे तो खुशी का पारा चढ़ा रहे। बाप टीचर गुरू के रूप में याद रहे तो भी खुशी का पारा चढ़ा रहे। परन्तु चलते-चलते कुछ रोला पड़ जाता है। जैसे पहाड़ों पर नीचे ऊपर चढ़ना होता है, वैसे बच्चों की अवस्था भी ऐसे होती है। कोई बहुत ऊंच चढ़ते हैं फिर गिरते हैं तो आगे से भी जास्ती गिर पड़ते हैं। की कमाई चट हो जाती है। भल कितना भी दान पुण्य करते हैं परन्तु फिर पुण्य करते-करते अगर पाप करने लग पड़ते हैं तो सब पुण्य खत्म हो जाते हैं। सबसे बड़ा पुण्य है-बाप को याद करना। याद से ही पुण्य आत्मा बनेंगे। अगर संग के रंग से भूल ही भूल करते जायें तो आगे से भी जास्ती नीचे गिर जाते। फिर वह खाता जमा नहीं रहेगा। ना (घाटा) हो जायेगा। पाप का काम करने से ना हो जाता। बहुत पाप का खाता चढ़ जाता है। मुरादी सम्भाली जाती है ना। बाप भी कहते हैं तुम्हारा खाता पुण्य का था, पाप करने से वह सौ गुणा हो जाता है और ही घाटे में आ जायेगा। पाप भी कोई बहुत बड़ा, कोई हल्का होता है। काम है बहुत कड़ा, क्रोध है सेकेण्ड नम्बर, लोभ उनसे कम। सबसे जास्ती काम वश होने से जो जमा हुआ वह ना हो जाता है। फायदे के बदले नुकसान हो जाता है। सतगुरू का निंदक ठौर न पाये। बाप का बनकर फिर छोड़ देते हैं। क्या कारण हुआ? अक्सर करके काम की चोट लगती है। यह है कड़ा दुश्मन। उनका ही बुत बनाकर जलाते हैं। क्रोध, लोभ का बुत नहीं बनायेंगे। काम पर ही पूरी जीत पानी है तब जगतजीत बनेंगे। बुलाते भी हैं कि हम जो रावण राज्य में पतित बने हैं, हमको आकर पावन बनाओ। गाते तो सब हैं पतित-पावन। हे पतितों को पावन बनाने वाले सीताओं के राम आओ। परन्तु अर्थ नहीं समझते हैं। यह भी जानते हैं कि बाप ज़रूर नई दुनिया स्थापन करने आयेंगे। परन्तु बहुत टाइम देने से घोर अन्धियारा हो गया है। ज्ञान और अज्ञान है ना। अज्ञान है भक्ति जिसकी पूजा करते उनको जानते ही नहीं। तो उनके पास पहुँचेंगे कैसे? इसलिए दान पुण्य आदि निष्फल हो जाता है। करके कुछ अल्पकाल के लिए काग विष्टा के समान सुख मिलता है। बाकी तो दु:ख ही दु:ख है। अब बाप कहते हैं मामेकम् याद करो तो तुम्हारे सब दु:ख दूर हो जायेंगे। अब देखना है हम कितना याद करते हैं, जो पुराना खत्म हो नया जमा हो। कोई तो कुछ भी जमा नहीं करते। सारा मदार है याद पर। याद बिगर पाप कैसे मिटे अथवा कटें। पाप तो बहुत हैं – जन्म-जन्मान्तर के। इस जन्म की जीवन कहानी सुनाने से कोई जन्म-जन्मान्तर के पाप कट नहीं जायेंगे। सिर्फ इस जन्म की हल्काई हो जाती है। बाकी तो मेहनत बहुत करनी है, इतने जन्मों का जो हिसाब किताब है – वो योग से ही चुक्तू होने वाला है। विचार करना चाहिए कि हमारा योग कितना है? हमारा जन्म सतयुग के आदि में हो सकेगा? जो बहुत पुरूषार्थ करेंगे वही सतयुग के आदि में जन्म लेंगे। वह छिपे नहीं रह सकते। सब तो सतयुग में नहीं आयेंगे। पिछाड़ी में जाकर थोड़ा पद पाते हैं। अगर पहले आते भी हैं तो नौकरी करते हैं। यह तो कामन बात है समझने की, इसलिए बाप को बहुत याद करना है। तुम जानते हो हम नई दुनिया के लिए विश्व का मालिक बनने आये हैं। जो याद करेंगे उनको ज़रूर खुशी रहेगी। अगर राजा बनना है तो प्रजा भी बनानी पड़े। नहीं तो कैसे समझेंगे कि हम राजा बनने वाले हैं। जो सेन्टर खोलते हैं, सर्विस करते हैं उनकी भी कमाई होती। उनको भी बहुत फायदा मिलता है। उनको भी उजूरा मिल जाता है। कोई 3-4 सेन्टर भी खोलते हैं ना। जो जो करते हैं उनका हिस्सा तो आता है ना। मिलकर माया के दु:ख का छप्पर उठाते हैं तो इसमें कंधा सब देते हैं। तो सबको उजूरा मिलता है। जो बहुतों को रास्ता बताते हैं, जितनी मेहनत करते हैं उतना ऊंच पद पाते हैं। उनको खुशी बहुत होती है। दिल जानती है हमने कितनों को रास्ता बताया है? कितनों का उद्धार किया है? सब कुछ करने का समय तो यही है। खान-पान तो सबको मिलता ही है। कोई तो कुछ भी काम नहीं करते हैं। जैसे मम्मा ने कितनी सर्विस की। सर्विस से उनका बहुत कल्याण हो गया। इसमें भी सर्विस बहुत चाहिए। योग की भी सर्विस है ना। कितने डीप डायरेक्शन मिलते रहते हैं। अभी तो आगे चलकर क्या-क्या प्वाइंट्स निकलेंगी। दिन प्रतिदिन उन्नति होती जायेगी। नई-नई प्वाइंट्स निकलेगी। जो सर्विस में तत्पर रहते हैं, वह झट पकड़ लेते हैं। जो सर्विस नहीं करते उनकी बुद्धि में कुछ बैठेगा नहीं।

बिंदी रूप कैसे समझें? तुम कोई से पूछो आत्मा कितनी बड़ी है? आत्मा का देश काल बताओ तो कभी नहीं बता सकेंगे। मनुष्य परमात्मा का नाम रूप देश काल पूछते हैं। तुम आत्मा का पूछो तो मूँझ जायेंगे। किसको भी मालूम नहीं है। आत्मा इतनी छोटी बिन्दी उसमें इतना सारा पार्ट भरा हुआ है। यहाँ भी बहुत हैं जो आत्मा परमात्मा को जानते ही नहीं। सिर्फ विकारों का सन्यास किया है, वह भी कमाल है। सन्यासियों का धर्म अलग है। यह ज्ञान तुम्हारे लिए है। बाप समझाते हैं तुम पवित्र थे फिर अपवित्र बने, अब फिर पवित्र बनना है। तुम ही 84 का चक्र लगाते हो। दुनिया में ज़रा भी इन बातों को नहीं जानते। ज्ञान अलग, भक्ति अलग है। ज्ञान चढ़ाता है भक्ति गिराती है। तो रात दिन का फ़र्क है। मनुष्य भल कितना भी अपने को वेदों शास्त्रों की अथॉरिटी समझते हैं परन्तु जानते कुछ नहीं। तुमको भी अभी मालूम पड़ा है। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं। भूलने कारण ही खुशी गुम होती है। नहीं तो अथाह खुशी होनी चाहिए। बाबा से तुमको यह वर्सा मिल रहा है। बाबा साक्षात्कार करा देते हैं। परन्तु साक्षात्कार किया, श्रीमत पर नहीं चले तो फायदा ही क्या! बाप को दु:ख में सिमरण करते हैं। बाप को कहते हैं लिबरेटर, हे राम, हे प्रभू कहते हैं। परन्तु वह कौन है, जानते नहीं। भक्ति में कोई ऐसे नहीं कहते हैं कि अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। बिल्कुल नहीं। अगर कहते होते तो परमपरा चला आता। भक्ति तो चली आती है ना। भक्ति अथाह है। ज्ञान है एक। मनुष्य समझते हैं भक्ति से भगवान मिलेगा। परन्तु कैसे, कब? यह नहीं जानते। भक्ति कब शुरू होती है, कौन जास्ती भक्ति करते हैं-यह कोई नहीं जानते। क्या इतना 40 हज़ार वर्ष और भक्ति करते रहेंगे? एक तरफ मनुष्य भक्ति कर रहे हैं दूसरे तरफ तुम ज्ञान पा रहे हो। मनुष्यों से कितना माथा मारना पड़ता है। इतनी प्रदर्शनी करते हो फिर भी निकलते कोटों में कोई हैं। कितनों को आप समान बनाकर ले आते हैं। सच्चे-सच्चे ब्राह्मण कितने हैं – यह हिसाब अभी निकाल नहीं सकते। बहुत झूठे बच्चे भी हैं। ब्राह्मण लोग कथा सुनाते हैं। बाबा गीता की कथा सुनाते हैं। तुम भी सुनाते हो यथा बाबा तथा बच्चे। बच्चों का भी काम है सच्ची-सच्ची गीता सुनाना। शास्त्र तो सबके हैं। वास्तव में जो भी शास्त्र आदि हैं वह सब हैं भक्ति मार्ग के। ज्ञान का पुस्तक एक ही गीता है। गीता है माई बाप। बाप ही आकर सबकी सद्गति करते हैं। मनुष्य फिर ऐसे बाप की ही ग्लानि करते हैं। शिवबाबा की जयन्ती है हीरे तुल्य। ऊंच ते ऊंच भगवान ही सद्गति दाता है। बाकी और किसी की महिमा कैसे हो सकती है। देवताओं की महिमा करते हैं परन्तु देवता बनाने वाला एक बाप ही है। हमारा कन्स्ट्रक्शन भी होता है तो डिस्ट्रक्शन भी होता है।

बहुत हैं जो कुछ समझा नहीं सकते तो स्थूल काम करो। मिलेट्री में सब काम करने वाले होते हैं। कहा भी जाता है पढ़े के आगे अनपढ़े को भरी ढोनी पड़े। मम्मा बाबा जो करते हैं उनसे सीखो। तुम भी समझ सकते हो अनन्य बच्चे कौन हैं। बाबा से पूछेंगे तो बाबा भी नाम बतायेंगे कि फलाने को फालो करो। जो सर्विसएबुल नहीं वह औरों को क्या सिखलायेंगे। वह तो और ही टाइम वेस्ट कर देंगे। बाबा समझाते हैं अपनी उन्नति करने चाहते हो तो यहाँ कर सकते हो। चित्र रखे हैं हमने 84 जन्म कैसे लिये, यह अब समझा है तो दूसरों को समझाओ। कितना सहज है – यह बनना है। कल इनकी भक्ति करते थे, आज नहीं। नॉलेज मिल गई। ऐसे बहुत आकर नॉलेज लेंगे। जितना तुम सेन्टरों का जास्ती घेराव डालेंगे तो बहुत आकर समझेंगे। सुनने से उनको खुशी का पारा चढ़ जायेगा। नर से नारायण बनना है। सच्ची सत्य नारायण की कथा भी है, भक्ति से तो गिरते ही जाते हैं। उनको पता ही नहीं पड़ता – ज्ञान क्या चीज़ है। तुमको बेहद का बाप यथार्थ समझाते हैं। बाबा कहते हैं कल तुमको राजाई दी फिर तुम्हारी राजाई कहाँ गई? यह तो खुद जानते हैं। यह तो खेल है। एक ही बाप है जो सारे खेल का राज़ बताते हैं। हम कहते हैं बाबा आप बांधेले हो ड्रामा में, आपको आना ही पड़े, पतित दुनिया और पतित शरीर में। ईश्वर की बहुत महिमा करते हैं। बच्चे कहेंगे बाबा हमने आपको बुलाया तो आपको आना ही पड़ा – हमारी सर्विस करने अथवा हमको पतित से पावन बनाने। कल्प-कल्प हमको सो देवता बनाकर आप चले जाते हो। यह जैसे एक कहानी है, जो होशियार हैं उन्हों के लिए तो एक कहानी है। तुम बच्चों को खुशमिजाज़ होना चाहिए। बाबा भी ड्रामा अनुसार सर्वेन्ट बना है। बाप कहते हैं मेरी मत पर चलो। अपने को आत्मा समझो। देह-अभिमान छोड़ो। नई दुनिया में तुमको नया शरीर मिलेगा। बाप जो समझाते हैं उनको अच्छी तरह मंथन करो। बुद्धि से समझते हो हम आये हैं – यह बनने के लिए। एम आबजेक्ट सामने खड़ी है। भगवानुवाच, वो लोग भगवान को मनुष्य समझ लेते हैं या निराकार कहते हैं। तुम आत्मायें भी सब निराकारी हो। शरीर लेकर पार्ट बजाती हो, बाबा भी पार्ट बजाते हैं। जो अच्छी सर्विस करेंगे उनको ही निश्चय होगा कि हम माला का दाना अवश्य बनेंगे। नर से नारायण बनना है। फेल होने से आटोमेटिकली राम-सीता बन जाते हैं। भगवान पढ़ाते हैं तो अच्छी तरह पढ़ना चाहिए। परन्तु माया का आपोजीशन बहुत होता है। माया तूफान में लाती है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) विचार सागर मंथन कर अपार खुशी का अनुभव करना है। औरों को भी रास्ता बताने की कृपा करनी है। संग के रंग में आकर कोई भी पाप कर्म नहीं करना है।

2) माया के दु:खों का छप्पर उठाने के लिए मिल करके कंधा देना है। सेन्टर्स खोल अनेकों के कल्याण के निमित्त बनना है।

वरदान:- ब्राह्मण जीवन में सदा चियरफुल और केयरफुल मूड में रहने वाले कम्बाइन्ड रूपधारी भव
यदि किसी भी परिस्थिति में प्रसन्नता की मूड परिवर्तन होती है तो उसे सदाकाल की प्रसन्नता नहीं कहेंगे। ब्राह्मण जीवन में सदा चियरफुल और केयरफुल मूड हो। मूड बदलनी नहीं चाहिए। जब मूड बदलती है तो कहते हैं मुझे तो एकान्त चाहिए। आज मेरा मूड ऐसा है। मूड बदलती तब है जब अकेले होते हो, सदा कम्बाइन्ड रूप में रहो तो मूड नहीं बदलेगी।
स्लोगन:- कोई भी उत्सव मनाना अर्थात् याद और सेवा के उत्साह में रहना।

ब्रह्मा बाप समान बनने के लिए विशेष पुरुषार्थ

अभी तीव्र पुरुषार्थ का यही लक्ष्य रखो कि मैं डबल लाइट फरिश्ता हूँ, चलते-फिरते फरिश्ता स्वरूप की अनुभूति को बढ़ाओ। अशरीरीपन का अभ्यास करो। सेकण्ड में कोई भी संकल्पों को समाप्त करने में, संस्कार स्वभाव में डबल लाइट रहो।

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