10 july ki murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 10 JULY 2020 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 10 July 2020

Murli Pdf for Print : – 

10-07-2020
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम इस पढ़ाई से अपने सुखधाम जाते हो वाया शान्तिधाम, यही तुम्हारी एम आब्जेक्ट है, यह कभी नहीं भूलनी चाहिए”
प्रश्नः- तुम बच्चे साक्षी होकर इस समय ड्रामा की कौन-सी सीन देख रहे हो?
उत्तर:- इस समय ड्रामा में टोटल दु:ख की सीन है। अगर किसी को सुख है भी तो अल्पकाल काग विष्टा समान। बाकी दु:ख ही दु:ख है। तुम बच्चे अभी रोशनी में आये हो। जानते हो सेकण्ड बाई सेकण्ड बेहद सृष्टि का चक्र फिरता रहता है, एक दिन न मिले दूसरे से। सारी दुनिया की एक्ट बदलती रहती है। नई सीन चलती रहती है।

डबल ओम् शान्ति। एक – बाप स्वधर्म में टिके हुए हैं, दूसरा – बच्चों को भी कहते हैं अपने स्वधर्म में टिको और बाप को याद करो। और कोई ऐसे कह न सके कि स्वधर्म में टिको। तुम बच्चों की बुद्धि में निश्चय है। निश्चयबुद्धि विजयन्ती। वही विजय पायेंगे। काहे की विजय पायेंगे? बाप के वर्से की। स्वर्ग में जाना – यह है बाप के वर्से की विजय पाना। बाकी है पद के लिए पुरुषार्थ। स्वर्ग में जाना तो जरूर है। बच्चे जानते हैं यह छी-छी दुनिया है। बहुत अथाह दु:ख आने वाले हैं। ड्रामा के चक्र को भी तुम जानते हो। अनेक बार बाबा आया हुआ है पावन बनाए सभी आत्माओं को मच्छरों सदृश्य ले जाने, फिर खुद भी निर्वाणधाम में जाकर निवास करेंगे। बच्चे भी जायेंगे! तुम बच्चों को यह तो खुशी रहनी चाहिए – इस पढ़ाई से हम अपने सुखधाम जायेंगे वाया शान्तिधाम। यह है तुम्हारी एम ऑब्जेक्ट। यह भूलनी नहीं चाहिए। रोज़-रोज़ सुनते हो, समझते हो हमको पतित से पावन बनाने के लिए बाप पढ़ाते हैं। पावन बनने का सहज उपाय बताते हैं याद का। यह भी नई बात नहीं। लिखा हुआ है भगवान ने राजयोग सिखाया। सिर्फ भूल यह कर दी है जो कृष्ण का नाम डाल दिया है। ऐसे भी नहीं है बच्चों को जो नॉलेज मिल रही है, वह गीता के सिवाए और कोई शास्त्र में होगी। बच्चे जानते हैं कोई भी मनुष्य की महिमा है नहीं, जैसे बाप की है। बाप न आये तो सृष्टि का चक्र ही न फिरे। दु:खधाम से सुखधाम कैसे बनें? सृष्टि का चक्र तो फिरना ही है। बाप को भी जरूर आना ही है। बाप आते हैं सबको ले जाने फिर चक्र फिरता है। बाप न आये तो कलियुग से सतयुग कैसे बनें? बाकी यह बातें कोई शास्त्रों में नहीं हैं। राजयोग है ही गीता में। अगर समझें भगवान आबू में आया है तो एकदम भागे मिलने के लिए। संन्यासी भी चाहते तो हैं ना कि भगवान से मिलें। पतित-पावन को याद करते हैं वापिस जाने के लिए। अभी तुम बच्चे पद्मापद्म भाग्यशाली बन रहे हो। वहाँ अथाह सुख होते हैं। नई दुनिया में जो देवी-देवता धर्म था, वह अभी नहीं है। बाप दैवी राज्य की स्थापना करते ही हैं ब्रह्मा द्वारा। यह तो क्लीयर है। तुम्हारी एम ऑब्जेक्ट ही यह है। इसमें संशय की बात ही नहीं। आगे चलकर समझ ही जायेंगे, राजधानी जरूर स्थापन होती है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म है। जब तुम स्वर्ग में रहते हो तो इनका नाम ही भारत रहता है फिर जब तुम नर्क में आते हो तब हिन्दुस्तान नाम पड़ता है। यहाँ कितना दु:ख ही दु:ख है। फिर यह सृष्टि बदलती है फिर स्वर्ग में है ही सुखधाम। यह नॉलेज तुम बच्चों को है। दुनिया में मनुष्य कुछ भी नहीं जानते। बाप खुद कहते हैं अभी है अन्धियारी रात। रात में मनुष्य धक्के खाते रहते हैं। तुम बच्चे रोशनी में हो। यह भी साक्षी हो बुद्धि में धारण करना है। सेकण्ड बाई सेकण्ड बेहद सृष्टि का चक्र फिरता रहता है। एक दिन न मिले दूसरे से। सारी दुनिया की एक्ट बदलती रहती है। नई सीन चलती रहती है। इस समय टोटल है ही दु:ख की सीन। अगर सुख है तो भी काग विष्टा समान। बाकी दु:ख ही दु:ख है। इस जन्म में करके सुख होगा फिर दूसरे जन्म में दु:ख। अब तुम बच्चों की बुद्धि में यह रहता है – अभी हम जाते हैं अपने घर। इसमें मेहनत करनी है पावन बनने की। श्री-श्री ने श्रीमत दी है श्री लक्ष्मी-नारायण बनने की। बैरिस्टर मत देंगे – बैरिस्टर भव। अब बाप भी कहते हैं श्रीमत से यह बनो।

अपने से पूछना चाहिए – मेरे में कोई अवगुण तो नहीं है? इस समय गाते भी हैं मुझ निर्गुण हारे में कोई गुण नाही, आपेही तरस परोई। तरस अर्थात् रहम। बाबा कहते – बच्चे मैं तो किसी पर रहम करता ही नहीं हूँ। रहम तो हर एक को अपने पर करना है। यह ड्रामा बना हुआ है। बेरहमी रावण तुमको दु:ख में ले आते हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है। इसमें रावण का भी कोई दोष नहीं। बाप आकर सिर्फ राय देते हैं। यही उनका रहम है। बाकी यह रावणराज्य तो फिर भी चलेगा। ड्रामा अनादि है। न रावण का दोष है, न मनुष्यों का दोष है। चक्र को फिरना ही है। रावण से छुड़ाने के लिए बाप युक्तियां बताते रहते हैं। रावण मत पर तुम कितना पाप आत्मा बने हो। अभी पुरानी दुनिया है। फिर जरूर नई दुनिया आयेगी। चक्र तो फिरेगा ना। सतयुग को फिर जरूर आना है। अभी है संगमयुग। महाभारत लड़ाई भी इस समय की है। विनाश काले विप्रीत बुद्धि विनशन्ती। यह होने का है। और हम विजयन्ती स्वर्ग के मालिक होंगे। बाकी सब होंगे ही नहीं। यह भी समझते हो – पवित्र होने बिगर देवता बनना मुश्किल है। अब बाप से श्रीमत मिलती है श्रेष्ठ देवता बनने की। ऐसी मत कभी मिल न सके। श्रीमत देने का उनका पार्ट है भी संगम पर। और कोई में तो यह ज्ञान ही नहीं है। भक्ति माना भक्ति। उनको ज्ञान नहीं कहेंगे। रूहानी ज्ञान, ज्ञान-सागर रूह ही देते हैं। उनकी ही महिमा है ज्ञान का सागर, सुख का सागर। बाप पुरुषार्थ की युक्तियाँ भी बताते हैं। यह ख्याल रखना चाहिए कि अभी फेल हुए तो कल्प-कल्पान्तर फेल होंगे, बहुत चोट लग जायेगी। श्रीमत पर न चलने से चोट लग जाती है। ब्राह्मणों का झाड़ बढ़ना भी जरूर है। इतना ही बढ़ेगा जितना देवताओं का झाड़ है। तुमको पुरुषार्थ करना और कराना है। सैपलिंग लगती रहेगी। झाड़ बड़ा हो जायेगा। तुम जानते हो अभी हमारा कल्याण हो रहा है। पतित दुनिया से पावन दुनिया में जाने का कल्याण होता है। तुम बच्चों की बुद्धि का ताला अभी खुला है। बाप बुद्धिवानों की बुद्धि है ना। अभी तुम समझ रहे हो फिर आगे चल देखना किस-किस का ताला खुलता है। यह भी ड्रामा चलता है। फिर सतयुग से रिपीट होगा। लक्ष्मी-नारायण जब तख्त पर बैठते हैं तब संवत शुरू होता है। तुम लिखते भी हो वन से 1250 वर्ष तक स्वर्ग, कितना क्लीयर है। कहानी है सत्य नारायण की। कथा अमरनाथ की है ना। तुम अभी सच्ची-सच्ची अमरनाथ की कथा सुनते हो उसका फिर गायन चलता है। त्योहार आदि सब इस समय के हैं। नम्बरवन पर्व है शिवबाबा की जयन्ती। कलियुग के बाद जरूर बाप को आना पड़े दुनिया को चेंज करने। चित्रों को कोई अच्छी रीति से देखे, कितना पूरा हिसाब बना हुआ है। तुमको यह खातिरी है, जितना कल्प पहले पुरुषार्थ किया है उतना करेंगे जरूर। साक्षी हो औरों का भी देखेंगे। अपने पुरुषार्थ को भी जानते हैं। तुम भी जानते हो। स्टूडेन्ट अपनी पढ़ाई को नहीं जानते होंगे? दिल खायेगी जरूर कि हम इस सब्जेक्ट में बहुत कच्चे हैं। फिर नापास हो जाते हैं। इम्तहान के टाइम जो कच्चे होंगे उनकी दिल धड़कती रहेगी। तुम बच्चे भी साक्षात्कार करेंगे। परन्तु नापास तो हो ही गये, कर क्या सकते हैं! स्कूल में नापास होते हैं तो संबंधी भी नाराज़, टीचर भी नाराज़ होता है। कहेंगे हमारे स्कूल से कम पास हुए तो समझा जायेगा कि टीचर इतना अच्छा नहीं इसलिए कम पास हुए। बाबा भी जानते हैं सेन्टर्स पर कौन-कौन अच्छी टीचर है, कैसे पढ़ाती है। कौन-कौन अच्छी रीति पढ़ाकर ले आती है। सब मालूम पड़ता है। बाबा कहते – बादलों को लाना है। छोटे बच्चों को ले आयेंगे तो उनमें मोह रहेगा। अकेला निकलकर आना चाहिए तो बुद्धि अच्छी रीति लगी रहे। बच्चों को तो वहाँ भी देखते रहते हैं।

बाप कहते हैं यह पुरानी दुनिया तो कब्रिस्तान होनी है। नया मकान बनाते हैं तो बुद्धि में रहता है ना – हमारा नया मकान बन रहा है। धंधा आदि तो करते रहते हैं। परन्तु बुद्धि नये मकान तरफ रहती है। चुपकर तो नहीं बैठ जाते। वह है हद की बात, यह है बेहद की बात। हर कार्य करते हुए स्मृति रहे कि अभी हम घर जाकर फिर अपनी राजधानी में जायेंगे तो अपार खुशी रहेगी। बाप कहते हैं – बच्चे, अपने बच्चों आदि की सम्भाल भी करनी है। परन्तु बुद्धि वहाँ लगी रहे। याद न करने से फिर पवित्र भी नहीं बन सकते। याद से पवित्र, ज्ञान से कमाई। यहाँ तो सब हैं पतित। दो किनारे हैं। बाबा को खिवैया कहते हैं, परन्तु अर्थ नहीं समझते। तुम जानते हो बाप उस किनारे ले जाते हैं। आत्मा जानती है हम अब बाप को याद कर बहुत नजदीक जा रहे हैं। खिवैया नाम भी अर्थ सहित रखा है ना। यह सब महिमा करते हैं – नईया मेरी पार लगाओ। सतयुग में ऐसे कहेंगे क्या? कलियुग में ही पुकारते हैं। तुम बच्चे समझते हो बेसमझ को तो यहाँ आना नहीं है। बाप की सख्त मना है। निश्चय नहीं तो कभी नहीं ले आना चाहिए। कुछ भी समझेंगे नहीं। पहले तो 7 रोज़ का कोर्स दो। कोई को तो 2 रोज़ में भी तीर लग जाता है। अच्छा लग गया तो फिर छोड़ेंगे थोड़ेही। कहेंगे हम 7 रोज़ और भी सीखेंगे। तुम झट समझ जायेंगे यह इस कुल का है। तेज बुद्धि जो होंगे वह कोई बात की परवाह नहीं करेंगे। अच्छा, एक नौकरी छूट जायेगी दूसरी मिलेगी, बच्चे दिल वाले जो होते हैं उनकी नौकरी आदि छूटती ही नहीं है। खुद ही वन्डर खाते हैं। बच्चियाँ कहती हैं हमारे पति की बुद्धि फेरो। बाबा कहते हैं मुझे मत कहो। तुम योगबल में रह फिर बैठ ज्ञान समझाओ। बाबा थोड़ेही बुद्धि को फेरेंगे। फिर तो सभी ऐसे धन्धे करते रहेंगे। जो रसम निकलती है उनको पकड़ लेते हैं। कोई गुरू से किसको फायदा हुआ, सुना, तो बस उनके पीछे पड़ जाते हैं। नई आत्मा आती है तो उनकी महिमा तो निकलेगी ना। फिर बहुत फालोअर्स बन पड़ते हैं इसलिए इन सब बातों को देखना नहीं है। तुमको देखना है अपने को – हम कहाँ तक पढ़ते हैं? यह तो बाबा डीटेल में जैसे चिटचैट करते हैं। बाकी सिर्फ कह देना बाप को याद करो यह तो घर में भी रह कर सकते हो। लेकिन ज्ञान का सागर है तो जरूर ज्ञान भी देंगे ना। यह है मुख्य बात – मनमनाभव। साथ में सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ भी समझाते हैं। चित्र भी तो इस समय बहुत अच्छे-अच्छे निकले हैं। उनका भी अर्थ बाप समझाते हैं। विष्णु की नाभी से ब्रह्मा को दिखाया है। त्रिमूर्ति भी है फिर विष्णु की नाभी से ब्रह्मा यह फिर क्या है? बाप बैठ समझाते हैं – यह राइट है या रांग है? मनोमय चित्र भी ढेर बनाते हैं ना। कोई-कोई शास्त्रों में चक्र भी दिखाया है। परन्तु कोई ने कितनी आयु लिख दी है, कोई ने कितनी। अनेक मत हैं ना। शास्त्रों में हद की बातें लिख दी हैं, बाप बेहद की बात समझाते हैं कि सारी दुनिया में है रावणराज्य। यह तुम्हारी बुद्धि में ज्ञान है – हम कैसे पतित बने फिर पावन कैसे बनते हैं। पीछे फिर और धर्म आते हैं। अनेक वैरायटी है। एक न मिले दूसरे से। एक जैसे फीचर्स वाले दो हो न सकें। यह बना-बनाया खेल है जो रिपीट होता रहता है। बाप बच्चों को बैठ समझाते हैं। टाइम थोड़ा होता जाता है। अपनी जांच करो – हम कहाँ तक खुशी में रहते हैं? हमको कोई विकर्म नहीं करना है। तूफान तो आयेंगे। बाप समझाते हैं – बच्चे, अन्तर्मुख होकर अपना चार्ट रखो तो जो भूलें होती हैं उनका पश्चाताप् कर सकेंगे। यह जैसे योगबल से अपने को माफ करते हो। बाबा कोई क्षमा या माफ नहीं करते। ड्रामा में क्षमा अक्षर ही नहीं है। तुमको अपनी मेहनत करनी है। पापों का दण्ड मनुष्य खुद ही भोगते हैं। क्षमा की बात ही नहीं। बाप कहते हैं हर बात में मेहनत करो। बाप बैठ युक्ति बताते हैं आत्माओं को। बाप को बुलाते हो पुराने रावण के देश में आओ, हम पतितों को आकर पावन बनाओ। परन्तु मनुष्य समझते नहीं। वह है आसुरी सम्प्रदाय। तुम हो ब्राह्मण सम्प्रदाय, दैवी सम्प्रदाय बन रहे हो। पुरुषार्थ भी बच्चे नम्बरवार करते हैं। फिर कह देते इनकी तकदीर में इतना ही है। अपना टाइम वेस्ट करते हैं। जन्म-जन्मान्तर, कल्प-कल्पान्तर ऊंच पद पा नहीं सकेंगे। अपने को घाटा नहीं डालना चाहिए क्योंकि अभी जमा होता है फिर घाटे में चले जाते हो। रावण राज्य में कितना घाटा होता है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अन्तर्मुखी बन अपनी जांच करनी है, जो भी भूलें होती हैं उनका दिल से पश्चाताप् कर योगबल से माफ करना है। अपनी मेहनत करनी है।

2) बाप की जो राय मिलती है उस पर पूरा चलकर अपने ऊपर आपेही रहम करना है। साक्षी हो अपने वा दूसरों के पुरुषार्थ को देखना है। कभी भी अपने आपको घाटा नहीं डालना है।

वरदान:- निरन्तर याद द्वारा अविनाशी कमाई जमा करने वाले सर्व खजानों के अधिकारी भव
निरन्तर याद द्वारा हर कदम में कमाई जमा करते रहो तो सुख, शान्ति, आनंद, प्रेम…इन सब खजानों के अधिकार का अनुभव करते रहेंगे। कोई कष्ट, कष्ट अनुभव नहीं होंगे। संगम पर ब्राह्मणों को कोई कष्ट हो नहीं सकता। यदि कोई कष्ट आता भी है तो बाप की याद दिलाने के लिए, जैसे गुलाब के पुष्प के साथ कांटा उनके बचाव का साधन होता है। वैसे यह तकलीफें और ही बाप की याद दिलाने के निमित्त बनती हैं।
स्लोगन:- स्नेह रूप का अनुभव तो सुनाते हो अब शक्ति रूप का अनुभव सुनाओ।

TODAY MURLI 10 JULY 2020 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 10 July 2020

10/07/20
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, through this study you go to your land of happiness via the land of peace. This is your aim and objective. You should never forget this.
Question: At this time, what scenes of the drama do you children observe as detached observers?
Answer: At this time there are scenes of total sorrow in the drama. Even if someone does have some happiness, it is only temporary, like the droppings of a crow. The rest is nothing but sorrow. You children have now come into the light. You know how the unlimited world cycle continues to turn second by second. One day cannot be the same as the next. The acts of the whole world continue to change as new scenes continue.

Om shanti. Double om shanti. The Father is stabilised in His original religion and He is also telling you children to stabilise yourselves in your original religion of the self and to remember the Father. No one else can say: Stabilise in your original religion. The intellects of you children have faith. Those whose intellects have faith become victorious. It is they who gain victory. What victory will they gain? That of the Father’s inheritance. To go to heaven means to be victorious in gaining the Father’s inheritance. The other effort you make is for a status. You definitely have to go to heaven. You children know that this is a dirty world. A lot more sorrow is yet to come. You also know the cycle of the drama. Baba has come many times to purify souls and to take them back home like swarms of mosquitoes. Then He Himself goes and resides in the land of peace. Children too will go there. You children should have the happiness that you will go to your land of happiness via the land of peace through this study. This is your aim and objective. You shouldn’t forget this. You hear this every day. You understand that the Father is teaching you in order to purify you. He shows you the easy method of remembrance to become pure. This is not anything new. It is written that God taught Raj Yoga. The only mistake they made was that they put Krishna’s name in the Gita. It isn’t that the knowledge you children now receive is in any scripture other than the Gita. You children know that no human being has the praise that the Father has. If the Father did not come, the world cycle would not turn. How would the land of sorrow become the land of happiness? The world cycle has to turn. Therefore, the Father definitely has to come. The Father also comes to take everyone back home and then the cycle begins again. If the Father did not come, how would the iron age change into the golden age? These things are not mentioned in the scriptures. Raj Yoga is only mentioned in the Gita. If people were to know that God has come in Abu, they would all run here to meet Him. Even sannyasis want to meet God. People remember the Purifier in order to return home. You children are now becoming multimillion times fortunate. There is limitless happiness there. The deity religion that existed in the new world no longer exists. The Father carries out establishment of the deity kingdom through Brahma. This is very clear. This is your aim and objective. There is no question of doubt about this. As you make further progress, it will be understood that the kingdom definitely has to be established, that there is to be the original eternal deity religion. When you live in heaven, this land is called Bharat and then, when you come into hell, it is called Hindustan. Here, there is sorrow and only sorrow. Then, this world changes into heaven; there will just be the land of happiness. You children have this knowledge. People in the world do not know anything at all. The Father Himself says: It is now the darkness of night. Human beings continue to stumble during the night. You children are now in the light. Become detached observers and imbibe this with your intellects. The unlimited world cycle continues to turn second by second, one day cannot be the same as the next. The acts of the whole world continue to change and new scenes continue. At this time, there are scenes of total sorrow. If there is happiness, it is like the droppings of a crow and the rest is nothing but sorrow. Perhaps there is happiness in this birth for some, but then, in their next birth, there would be sorrow. It is in the intellects of you children that you are now to go home; you have to make effort to become pure for this. Shri Shri has given you shrimat to become Shri Lakshmi and Narayan. A barrister would give instructions for you to become a barrister. The Father now says: Follow shrimat and become this. Ask yourself: Are there any defects in me? People now sing: I am without virtue! I have no virtues! Have compassion for me! Compassion means mercy. Baba says: Children, I don’t have mercy for anyone. Each one of you has to have mercy for yourself. This drama is predestined. Merciless Ravan takes you into sorrow. This too is fixed in the drama. Ravan shouldn’t be blamed for this. The Father comes and simply gives you advice. This is His mercy. However, this kingdom of Ravan will still continue. The drama is eternal. Neither should Ravan be blamed nor should human beings be blamed. The cycle has to turn. The Father continues to show you methods to liberate yourselves from Ravan. You have become very sinful souls by following Ravan’s directions. This is now the old world. The new world will definitely come. The cycle has to turn. The golden age definitely has to come once again. It is now the confluence age. The Mahabharat War is of this time. Those whose intellects have no love at the time of destruction are led to destruction. This will happen and we will become victorious and the masters of heaven. None of the rest will be there. You understand that it is difficult to become deities without becoming pure. The Father is now giving you shrimat in order to make you into elevated deities. You cannot receive such directions at any other time. Only at the confluence age does He play His part of giving you shrimat. No one else has this knowledge. Devotion means devotion; it cannot be called knowledge. Only the Spirit, the Ocean of Knowledge, gives spiritual knowledge. “The Ocean of Knowledge, the Ocean of Happiness”, is His praise alone. The Father shows you ways to make effort. You should be aware that if you fail now, you will fail for cycle after cycle and you will be hurt a great deal. It is when you don’t follow shrimat that you get hurt. The tree of Brahmins definitely has to grow. It will only grow as much as the tree of deities grows. You have to make effort and inspire others to do the same. The sapling continues to be planted and the tree will become larger. You know that you are now being benefited. The benefit you experience is that you are going from the impure world to the pure world. The locks on the intellects of you children have now opened. The Father is the Intellect of the Wise. You now understand everything. As you progress further, you will see the locks on whose intellects open. This also continues according to the drama. It will then repeat from the golden age. The era begins from the coronation of Lakshmi and Narayan. You write very clearly that it is heaven from the year 1 to 1250. There is the story of the true Narayan. There is also the devotional story of the Lord of Immortality. You are now listening to the true story of the Lord of Immortality. Then the memorial of this time will continue on the path of devotion. All the festivals etc. refer to this time. The number one festival is that of Shiv Baba’s coming. The Father definitely has to come at the end of the iron age in order to change the world. Anyone who looks at the pictures closely can see how accurate the account is. It is guaranteed that you will definitely make the same effort that you made in the previous cycle. You become detached observers and see the efforts that others make. They know about their own efforts. You also know. Would a student not know how much he has studied? His conscience would bite him if he were very weak in a particular subject and he then failed. At the time of the examinations, the hearts of those who are weak in their studies beat very fast. Children will have visions, but they will already have failed. Therefore, what can be done at that time? When someone fails at school, the relatives and the teacher become upset. If very few students from their school pass, they would perhaps say that it was because the teacher wasn’t good enough. Baba knows who the good teachers at the centres are and how they teach. He knows who teaches others well and brings them here. He knows everything. Baba says: Bring the clouds here. If you bring your small children here, you have attachment to them. You should come alone so that your intellects can remain focused on this. You see your children at home all the time anyway. The Father says: This old world has to become a graveyard. When a new house is being built it remains in your intellect that your new house is being built. You continue with your business anyway, but your intellect would be drawn to the new house. You don’t just sit down quietly somewhere. That is a limited aspect whereas this is an unlimited aspect. While performing every act, remain aware that you are now to return home, that you will then go to your kingdom and experience limitless happiness. The Father says: Children, you have to look after your children etc., but your intellects should be connected up there. If you don’t stay in remembrance, you cannot become pure. By having remembrance you become pure and by having knowledge you earn an income. Here, everyone is impure. There are the two shores. Baba is called the Boatman but no one understands the meaning of that. You know that the Father is taking you across to the other shore. You souls know that by remembering the Father, you are getting very close. There is significance in the name “Boatman” that has been given. Everyone sings the praise: Take my boat across. Would you sing this in the golden age? It is only in the iron age that people call out. You children understand all of these things. Those who are senseless cannot come here; Baba strictly forbids it. If someone doesn’t have faith, you mustn’t bring him here at all; he won’t understand anything. First of all, give him the seven days’ course. The arrow can strike someone in just two days. If he likes it, he won’t let go of it. He would say, “I want to study this for seven more days.” You would then immediately understand that that soul belongs to this clan. Those who have sharp intellects will not be concerned about other things. “OK, if I am dismissed from my job, I’ll find another one.” The children who have honest hearts would never be dismissed from their jobs; they are surprised themselves. Some daughters say, “Baba, transform the intellect of my husband!” Baba says: Don’t tell Me to do that! You can stay in remembrance and sit with him and with the power of yoga explain this knowledge. Baba will not transform anyone’s intellect. Otherwise, everyone would do the same. People very quickly begin to follow whatever system one person starts to do. When others hear of someone receiving benefit from a guru, they all begin to follow that one. Of course there would be praise of a new soul that comes from above. He would then have many followers. This is why you mustn’t look at any of those things. You only have to look at yourself and see to what extent you are studying. Baba chitchats with you in detail. If you just tell them “Remember the Father”, that can even be done while sitting at home. However, the Ocean of Knowledge would definitely give knowledge, would He not? The main thing is “Manmanabhav”. Together with this, He also explains the secrets of the beginning, the middle and the end of the world. Many very good pictures have now been created. The Father explains the meanings of them to you. Brahma is portrayed at the end of the navel cord of Vishnu. The Trimurti is also portrayed. So, how could Brahma emerge from the navel of Vishnu as they show? The Father sits here and explains what is right and what is wrong. People create many pictures from their own imagination. The cycle is also shown in some scriptures, but its duration is written as one thing in some and as something else in others; there are many opinions. Many limited things have been written in the scriptures. The Father explains unlimited things as to how the whole world is the kingdom of Ravan. Your intellects have the knowledge of how you became impure and how you can once again become pure. All other religions come later. There are many varieties; one cannot be the same as another. No two people can have the same features. This play is predestined and it continues to repeat. The Father sits here and explains to you children. Less and less time now remains. Check yourself: To what extent do I remain happy? I mustn’t perform any sinful acts. Storms will definitely come. The Father explains: Children, become introverted and keep your charts and you will be able to repent for the mistakes you have made. This is like forgiving yourself with the power of yoga. Baba doesn’t give forgiveness. The word “forgiveness” is not in the drama; you have to make effort for yourself. Human beings have to pay for the sins they commit; there is no question of forgiveness. The Father says: Make effort in every respect. The Father sits here and gives you souls methods to do this. You call out to the Father to come into Ravan’s old world: Come and purify us impure ones! However, human beings don’t understand anything. That is the devilish community. You are the Brahmin community who are becoming the deity community. You children make effort, numberwise. Then it is said that there is only so much in your fortune! You waste your time. For birth after birth, for cycle after cycle, you won’t be able to claim a high status. You mustn’t cause yourself a loss, because it is now the time to accumulate. Later on, you incur a loss. There is so much loss in the kingdom of Ravan. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Become introverted and check yourself. Repent from deep within your heart for the mistakes you have made and forgive yourself with the power of yoga. Make effort for yourself.
  2. Follow the Father’s advice fully and have mercy for yourself. Look at your own efforts and the efforts of others as a detached observer. Never cause yourself a loss.
Blessing: May you claim a right to all the treasures by having constant remembrance and accumulate an imperishable income.
By having constant remembrance you will continue to earn an income at every step and experience having a right to all the treasures of happiness, peace, bliss and love. Any suffering will not be experienced as suffering. At the confluence age, Brahmins cannot suffer. If there is any suffering, it comes to remind you of the Father. Just as a rose has thorns to protect itself, in the same way, any difficulties will be instrumental in reminding you of the Father even more.
Slogan: When the seed of action continues to receive the water of pure thoughts on the basis of God’s shrimat, the seed will become powerful.

*** Om Shanti ***

TODAY MURLI 10 JULY 2019 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma Kumaris: 10 July 2019

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Read Murli 9 July 2019:- Click Here

10/07/19
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, learn from the Father how to do wholesale business. “Manmanabhav” and remembering Alpha and reminding others of Him is wholesale business. All the rest is retail.
Question: Which children will the Father welcome to His home?
Answer: The Father will receive in His home the children who follow the Father’s directions very well, those who don’t remember anyone else, those who break the yoga of their intellects away from all their bodily relationships, including their own bodies, and who stay in remembrance of the one Father. The Father is now making you children into beautiful flowers and He will then welcome the flower children to His home.

Om shanti. You children have to sit here in remembrance of the Father and of the land of peace and the land of happiness. Souls must only remember their Father and forget this land of sorrow. This is a sweet relationship of the Father and the children. There isn’t such a sweet relationship with any other father. One relationship is with the father and then there are also the relationships with theteacher and the guru. Here, all three are One. If you remember even this much, it is a matter of great happiness. You have found the one Father who shows you a very easy path. Remember the Father, the land of peace and the land of happiness and forget this land of sorrow. You may tour around, but let there be this remembrance alone in your intellects. There is no mundane business etc. here. You are sitting at home. The Father is telling you to remember just three words. In fact, it is just one sentence: Remember the Father. By remembering the Father, you remember both inheritances: the land of peace and the land of happiness. It is the Father who gives you everything. By remembering Him, your mercury of happiness rises. The happiness of you children is very well known. It is in the intellects of you children that Baba will receive you at home and welcome you there, but only those who follow the Father’s directions very well and who don’t remember anyone else. Break the yoga of your intellects away from your bodies and all bodily relationships and constantly remember Me alone. On the path of devotion too, you did a lot of service, but you didn’t find the way to go home. The Father is now showing you such an easy path. Simply remember: The Father is the Father and also the Teacher and He gives you the knowledge of the beginning, the middle and the end of the world which no one else can explain. The Father says: You now have to return home. You will then come first to the golden age. You now have to return home from this dirty world. Although you are sitting here, you have now almost gone from here. The Father too is pleased. You children have been inviting the Father for a long time to come and you have now received Him. The Father says: I will make you into beautiful flowers and then receive you in the land of peace. You will then leave, numberwise. It is so easy! You must not forget such a Father. This is a very sweet and straightforward matter. Remember just the one thing, Alpha. Although He explains in detail, He finally says: Remember Alpha alone and no one else. You have been lovers of the one Beloved for many births. You have been singing: Baba, when You come, I will belong to You alone. Now that He has come, you have to belong to the One. Those whose intellects have faith are victorious. You will gain victory over Ravan. You will then have to go to the kingdom of Rama. You have gained victory over Ravan every cycle. As soon as you became Brahmins, you conquered Ravan. You have a right to the kingdom of Rama. You recognised the Father and claimed your right to the kingdom of Rama, but you now have to make effort to claim a high status. You have to become part of the rosary of victory. The rosary of victory is very long. If you become kings, you will receive everything. All the maids and servants are created numberwise; not all are the same. Some stay very close and they eat what the kings and queens eat. The maids and servants receive whatever is prepared in the kitchen. That is called 36 varieties of food. The kings are called multimillionaires. The people cannot be called that, even though they are not concerned about wealth there. That, however, is a sign of the deities. The more you remember Baba, the more you will become part of the sun dynasty. You have to go to the new world. You have to become emperors and empresses. The Father gives you knowledge in order to change you from ordinary human into Narayan. This is called Raj Yoga. You are the ones who have studied the scriptures on the path of devotion the most. You children have performed the most devotion. You have now come and met the Father. The Father shows you a very easy and direct path: Remember the Father. Baba says “Child, child!” and explains to you. The Father surrenders Himself to the children. You are heirs and so He has to surrender Himself to you. You also said: Baba, when You come, I will surrender myself to You. You said you would surrender yourself to Him with your body, mind and wealth. You only surrender yourself once whereas Baba surrenders Himself 21 times. The Father reminds you children. He can understand that all the children have come to claim their fortune, numberwise, according to their efforts. The Father says: Sweet children, the sovereignty of the world is My property. Make as much effort now as you can. The more effort you make, the higher the status you will claim. The one who was number one becomes the last number. He will then definitely become number one again. Everything depends on your efforts. The Father has come to take you children back home. If you now consider yourselves to be souls and remember the Father, your sins will continue to be cut away. That is the fire of lust and this is the fire of yoga. By burning in the fire of lust you have become ugly. You have become completely like ashes. I have now come to awaken you. I show you the way to become satopradhan from tamopradhan. It is very simple. I am a soul. By being body conscious for so long, you were dangling upside-down. Now become soul conscious and remember the Father. You have to return home and the Father has come to take you back. You invited the Father and He came. He makes impure ones pure; He becomes the Guide and takes all souls back home. It is the soul that has to go on the pilgrimage. You are the Pandava community. The Pandavas didn’t have a kingdom. There was the kingdom of the Kauravas. The rule of kings has now finished here. The condition of Bharat has become so bad. You were worthy-of-worship masters of the world and have now become worshippers. So, no one is a master of the world. Only the deities become masters of the world. Those people say that there should be peace in the world. You can ask them: What do you call peace in the world? When was there peace in the world? The history and geography of the world repeats and the cycle continues to turn. Tell me when there was peace in the world. What kind of peace do you want? No one will be able to tell you. The Father explains that there was peace in the world in heaven. That was called ParadiseChristians say that 3000 years before Christ there truly was Paradise. Their intellects neither become divine nor stone. It is only the people of Bharat who become those with divine intellects and those with stone intellects. The new world is called heaven. The old world cannot be called heaven. The Father has explained to you children the secrets of heaven and hell. That is retail. In wholesale, He just uses one expression: Constantly remember Me alone! Only from the Father do you receive the unlimited inheritance. This too is an old matter. Five thousand years ago there was heaven in Bharat. The Father tells you children the true story. The story of the true Narayan, the story of the third eye and the story of immortality are very well known. You also receive the third eye of knowledge. That is called the story of the third eye. They have made that into a religious book of the path of devotion. Everything is now explained to you children very well. There is retail and wholesale. Baba gives you so much knowledge that, even if you make the whole ocean into ink, you cannot reach the end of it. That is retail. In wholesale, He simply says: Manmanabhav! There is just the one expression and only you understand its meaning. No one else can tell you that. The Father did not give you knowledge in the Sanskrit language. Whoever the king is, he uses his own language. Our language will be only Hindi. So, why should you learn Sanskrit? People spend so much money. When anyone comes to you, tell him: The Father says: Remember Me and you will receive the inheritance of the land of peace and the land of happiness. If you want to understand this, sit here and understand it. We don’t have anything else to explain. The Father only explains Alpha. Only from Alpha do you receive the inheritance. Remember the Father and your sins can be absolved and you will become pure and go to the land of peace. People say: O Bestower of Peace! The Father alone is the Ocean of Peace and so they remember Him alone. The heaven that the Father establishes will be here. There is nothing in the subtle region. Those are just visions. You have to become angels like them. You have to become that here. You will become angels and then go back home. You receive the inheritance of the kingdom from the Father. You receive both inheritances of peace and happiness. No one, apart from the Father, can be called the Ocean. The Father is the Ocean of Knowledge and so He alone can grant salvation to everyone. The Father asks you: I am your Father, Teacher and Guru and I grant you salvation, and so who then takes you into degradation? Ravan. This is a play about degradation and salvation. If anyone is confused, he can ask. Many questions arise on the path of devotion, but there are no questions on the path of knowledge. In the scriptures, they have caused so much defamation of Shiv Baba and the deities; they haven’t left anyone out. This drama is predestined and they will also do the same again. The Father says: This deity religion is one that gives a lot of happiness. This sorrow will not then remain. The Father is making you so sensible. Lakshmi and Narayan are sensible and this is why they are the masters of the world. Those who are senseless cannot be the masters of the world. At first you were thorns and you are now becoming flowers and this is why Baba brings a rose and says that you have to become such a flower. He Himself comes and creates the garden of flowers and then Ravan comes to make it into the jungle of thorns. It is so clear! You have to think about all of these things. Everything is included in the remembrance of One. You receive the inheritance from the Father. This is great prosperity. You receive the inheritance of peace because He alone is the Ocean of Peace. You would never praise a physical father in this way. Shri Krishna is the loveliest of all. He takes the first birth and this is why everyone loves him the most. The Father gives His children news of the whole household. The Father is the real Businessman, but hardly anyone does such business as He does. Scarcely a few become such wholesale businessmen. You are wholesale businessmen. You continue to remember the Father. Some make a bargain in retail and then forget. The Father says: Constantly continue to remember Me alone. Once you have received your inheritance, there will be no need to remember Me. In worldly relationships, when a father becomes old, some children support him till the end, whereas others squander all the wealth as soon as they receive it. Baba is experienced in all of these things. This is why the Father made him His chariot. He is experienced in poverty as well as wealth; he is experienced in everything. According to the drama, there is just this one chariot. This can never be changed. The drama has been created and there cannot be any change in it. After explaining everything in wholesale and retail, He finally says: Manmanabhav, madhyajibhav! Everything is included in “Manmanabhav”. This is a greattreasure with which He is filling your aprons. Each imperishable jewel of knowledge is worth hundreds of thousands of rupees. You are becoming multimillion times fortunate. The Father is beyond being happy or unhappy. He observes the drama as the detached Observer. You are playing your parts. I am the detached Observer playing My part. I do not enter the cycle of birth and death. No one else can be liberated from this. No one can receive eternal liberation. This eternal drama is predestined. This too is wonderful.A whole part is recorded in each tiny soul. This imperishable drama can never be destroyed. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found, serviceable children, numberwise, according to the effort you make, love, remembrance and good morningfrom the depths of the heart and with lots of love from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Just as the Father surrenders Himself to the children, similarly, once you surrender yourself fully to the Father with your body, mind and wealth you claim the inheritance for 21 births.
  2. Always keep your apron overflowing with the invaluable imperishable treasures that the Father gives you. Always stay in the happiness and intoxication that you are multimillion times fortunate.
Blessing: May you be loving to Father Brahma and become constantly victorious on the basis of your determined faith.
When youhave determined faith, the sign of your faith is that victory cannot be prevented. Even if all the five elements and souls oppose you, they will oppose you, and you, on the basis of your firm faith and power to accommodate, will be able to accommodate that opposition. There can never be upheaval in your faith. Only victorious children who remain unshakeable are loving to the Father. Loving children remain constantly enfolded in the arms of Father Brahma.
Slogan: In order to receive the key to all treasures, be experienced in God’s love.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 10 JULY 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 10 July 2019

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10-07-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – बाप से होलसेल व्यापार करना सीखो, होलसेल व्यापार है मन्मनाभव, अल्फ को याद करना और कराना, बाकी सब है रिटेलˮ
प्रश्नः- बाप अपने घर में किन बच्चों की वेलकम करेंगे?
उत्तर:- जो बच्चे अच्छी रीति बाप की मत पर चलते हैं और कोई को भी याद नहीं करते हैं, देह सहित देह के सभी सम्बन्धों से बुद्धियोग तोड़ एक की याद में रहते हैं, ऐसे बच्चों को बाप अपने घर में रिसीव करेंगे। बाप अभी बच्चों को गुल-गुल (फूल) बनाते, फिर फूल बच्चों की अपने घर में वेलकम करते हैं।

ओम् शान्ति। बच्चों को अपने बाप और शान्तिधाम, सुखधाम की याद में बैठना है। आत्मा को, बाप को ही याद करना है, इस दु:खधाम को भूल जाना है। बाप और बच्चों का यह है मीठा सम्बन्ध। इतना मीठा सम्बन्ध और कोई बाप का होता ही नहीं। सम्बन्ध एक होता है बाप से फिर टीचर और गुरू से होता है। अभी यहाँ यह तीनों ही एक हैं। यह भी बुद्धि में याद रहे, खुशी की बात है ना। एक ही बाप मिला हुआ है, जो बहुत सहज रास्ता बताते हैं। बाप को, शान्तिधाम और सुखधाम को याद करो, इस दु:खधाम को भूल जाओ। घूमो-फिरो लेकिन बुद्धि में यही याद रहे। यहाँ तो कोई गोरखधन्धा आदि नहीं है। घर में बैठे हैं। बाप सिर्फ 3 अक्षर याद करने को कहते हैं। वास्तव में है एक अक्षर – बाप को याद करो। बाप को याद करने से सुखधाम और शान्तिधाम दोनों वर्से याद आ जाते हैं। देने वाला तो बाप ही है। याद करने से खुशी का पारा चढ़ेगा। तुम बच्चों की खुशी तो नामीग्रामी है। बच्चों की बुद्धि में है – बाबा हमको घर में फिर वेलकम करेंगे, रिसीव करेंगे, परन्तु उनको, जो अच्छी रीति बाप की मत पर चलेंगे और कोई को याद नहीं करेंगे। देह सहित देह के सर्व सम्बन्धों से बुद्धियोग तोड़ मामेकम् याद करना है। भक्तिमार्ग में तो तुमने बहुत सेवा की है परन्तु जाने का रास्ता मिलता ही नहीं। अभी बाप कितना सहज रास्ता बताते हैं, सिर्फ यह याद करो – बाप, बाप भी है, शिक्षक भी है, सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान सुनाते हैं, जो और कोई समझा न सके। बाप कहते हैं अब घर चलना है। फिर पहले-पहले सतयुग में आयेंगे। इस छी-छी दुनिया से अब जाना है। भल यहाँ बैठे हैं परन्तु यहाँ से अब गये कि गये। बाप भी खुश होते हैं, तुम बच्चों ने बाप को इनवाइट किया है बहुत समय से। अब फिर बाप को रिसीव किया है। बाप कहते हैं मैं तुमको गुल-गुल बनाकर फिर शान्तिधाम में रिसीव करूँगा। फिर तुम नम्बरवार चले जायेंगे। कितना सहज है। ऐसे बाप को भूलना नहीं है। बात तो बहुत मीठी और सीधी है। एक बात अल्फ़ को याद करो। भल डिटेल में समझाते हैं फिर पिछाड़ी में कहते हैं अल्फ़ को याद करो, दूसरा न कोई। तुम जन्म-जन्मान्तर के आशिक हो एक माशूक के। तुम गाते आये हो – बाबा आप आयेंगे तो हम आपके ही बनेंगे। अब वह आये हैं तो एक का ही बनना चाहिए। निश्चयबुद्धि विजयन्ती। विजय पायेंगे रावण पर। फिर आना है रामराज्य में। कल्प-कल्प तुम रावण पर विजय पाते हो। ब्राह्मण बने और विजय पाई रावण पर। रामराज्य पर तुम्हारा हक है। बाप को पहचाना और रामराज्य पर हक हुआ। बाकी पुरूषार्थ करना है ऊंच पद पाने का। विजय माला में आना है। बड़ी विजय माला है। राजा बनेंगे तो सब कुछ मिलेगा। दास-दासियाँ सब नम्बरवार बनते हैं। सब एक जैसे नहीं होते। कोई तो बहुत नज़दीक रहते हैं, जो राजा-रानी खाते, जो कुछ भण्डारे में बनता वह सब दास-दासियों को मिलता है, जिसको 36 प्रकार का भोजन कहा जाता है। पद्मपति भी राजाओं को कहा जाता, प्रजा को पद्मपति नहीं कहेंगे। भल वहाँ धन की परवाह नहीं रहती। परन्तु यह निशानी देवताओं की होती है। जितना याद करेंगे उतना सूर्यवंशी में आयेंगे। नई दुनिया में आना है ना। महाराजा-महारानी बनना है। बाप नॉलेज देते हैं नर से नारायण बनने की, जिसको राजयोग कहा जाता है। बाकी भक्ति मार्ग के शास्त्र भी सबसे जास्ती तुमने पढ़े हैं। सबसे जास्ती भक्ति तुम बच्चों ने की है। अब बाप से आकर मिले हो। बाप रास्ता तो बहुत सहज और सीधा बताते हैं कि बाप को याद करो। बाबा बच्चे-बच्चे कह समझाते हैं। बाप बच्चों पर वारी जाते हैं। वारिस हैं तो वारी जाना पड़े। तुमने भी कहा था बाबा आप आयेंगे तो हम वारी जायेंगे। तन-मन-धन सहित कुर्बान जायेंगे। तुम एक बार कुर्बान जाते हो, बाबा 21 बार जायेंगे। बाप बच्चों को याद भी दिलाते हैं। समझ सकते हैं, सब बच्चे नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार अपना-अपना भाग्य लेने आये हैं। बाप कहते हैं मीठे बच्चों, विश्व की बादशाही हमारी जागीर है। अब जितना पुरूषार्थ तुम कर लो। जितना पुरूषार्थ करेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। नम्बरवन सो नम्बर लास्ट में है। नम्बरवन में फिर जरूर जायेंगे। सारा मदार पुरूषार्थ पर है। बाप बच्चों को घर ले जाने आये हैं। अब अपने को आत्मा समझ बाप को याद करेंगे तो पाप कटते जायेंगे। वह है काम अग्नि, यह है योग अग्नि। काम अग्नि में जलते-जलते तुम काले हो गये हो। बिल्कुल खाक हो पड़े हो। अब मैं आकर तुमको जगाता हूँ। तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने की युक्ति बताता हूँ, बिल्कुल सिम्पुल। मैं आत्मा हूँ, इतना समय देह-अभिमान में रहने कारण तुम उल्टा लटक पड़े थे। अब देही-अभिमानी बन बाप को याद करो। घर जाना है, बाप लेने के लिए आया है। तुमने निमंत्रण दिया और बाप आये हैं। पतितों को पावन बनाकर पण्डा बन ले जायेंगे सब आत्माओं को। आत्मा को ही यात्रा पर जाना है।

तुम हो पाण्डव सम्प्रदाय। पाण्डवों का राज्य नहीं था। कौरवों का राज्य था। यहाँ तो अभी राजाई भी खत्म हो गई है। अभी भारत का कितना बुरा हाल हो गया है। तुम पूज्य विश्व के मालिक थे अब पुजारी बने हो। तो विश्व का मालिक कोई भी नहीं। विश्व के मालिक सिर्फ देवी-देवता ही बनते हैं। यह लोग कहते हैं विश्व में शान्ति हो। तुम पूछो विश्व में शान्ति किसको कहते हो? विश्व में शान्ति कब हुई है? वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होती रहती है। चक्र फिरता रहता है। बताओ विश्व में शान्ति कब हुई थी? तुम कौन-सी शान्ति चाहते हो? कोई बता नहीं सकेंगे। बाप समझाते हैं विश्व में शान्ति तो स्वर्ग में थी, जिसको पैराडाइज़ कहते हैं। क्रिश्चियन लोग कहते हैं बरोबर क्राइस्ट से 3 हज़ार वर्ष पहले पैराडाइज़ था। उन्हों की न पारसबुद्धि बनती है, न फिर पत्थरबुद्धि बनती है। भारतवासी ही पारसबुद्धि और पत्थरबुद्धि बनते हैं। न्यु वर्ल्ड को हेविन कहा जाता, पुरानी को तो हेविन नहीं कहेंगे। बच्चों को बाप ने हेल और हेविन का राज़ समझाया है। यह है रिटेल। होलसेल में तो सिर्फ एक अक्षर कहते हैं – मामेकम् याद करो। बाप से ही बेहद का वर्सा मिलता है। यह भी पुरानी बात है, पाँच हज़ार वर्ष पहले भारत में स्वर्ग था। बाप बच्चों को सच्ची-सच्ची कहानी बताते हैं। सत्य नारायण की कथा, तीजरी की कथा, अमरकथा मशहूर है। तुमको भी तीसरा नेत्र ज्ञान का मिलता है। उसको तीजरी की कथा कहा जाता है। वह तो भक्ति की पुस्तक बना दी है। अब तुम बच्चों को सब बातें अच्छी रीति समझाई जाती है। रिटेल और होलसेल होता है ना! इतना ज्ञान सुनाते हैं जो सागर को स्याही बनाओ तो भी अन्त न आये – यह हुआ रिटेल। होलसेल में सिर्फ कहते हैं मन्मनाभव। अक्षर ही एक है, उसका अर्थ भी तुम समझते हो और कोई बता न सके। बाप ने कोई संस्कृत में ज्ञान नहीं दिया है। वह तो जैसा राजा है वह अपनी भाषा चलाते हैं। अपनी भाषा तो एक हिन्दी ही होगी। फिर संस्कृत क्यों सीखनी चाहिए। कितना पैसा खर्च करते हैं।

तुम्हारे पास कोई भी आये उनको बोलो बाप कहते हैं मुझे याद करो तो शान्तिधाम-सुखधाम का वर्सा मिलेगा। यह समझना हो तो बैठकर समझो। बाकी हमारे पास और कोई बात नहीं है। बाप अल्फ़ ही समझाते हैं। अल्फ से ही वर्सा मिलता है। बाप को याद करो तो पाप नाश हों फिर पवित्र बन शान्तिधाम में चले जायेंगे। कहते भी हैं शान्ति देवा। बाप ही शान्ति के सागर हैं तो उनको ही याद करते हैं। बाप जो स्वर्ग स्थापन करते हैं वह तो यहाँ ही होता है। सूक्ष्मवतन में कुछ भी है नहीं। यह तो साक्षात्कार की बातें हैं। ऐसा फ़रिश्ता बनना है। बनना यहाँ ही है। फरिश्ता बनकर फिर घर चले जायेंगे। राजधानी का वर्सा बाप से मिलता है। शान्ति और सुख दोनों वर्से मिलते हैं। बाप के सिवाए और कोई को सागर कह नहीं सकते हैं। बाप जो ज्ञान का सागर है वही सर्व की सद्गति कर सकते हैं। बाप पूछते हैं, मैं तुम्हारा बाप, टीचर, गुरू हूँ, तुम्हारी सद्गति करता हूँ, फिर तुम्हारी दुर्गति कौन करते हैं? रावण। दुर्गति और सद्गति का यह खेल है। कोई मूँझते हैं तो पूछ सकते हैं। भक्ति मार्ग में प्रश्न ढेर उठते हैं, ज्ञान मार्ग में प्रश्न की बात नहीं। शास्त्रों में तो शिवबाबा से लेकर देवताओं की भी कितनी ग्लानि कर दी है, किसको भी छोड़ा नहीं है। यह भी ड्रामा बना हुआ है, फिर भी करेंगे। बाप कहते हैं यह देवी-देवता धर्म बहुत सुख देने वाला है। फिर यह दु:ख नहीं रहेगा। बाप तुम्हें कितना समझदार बनाते हैं। यह लक्ष्मी-नारायण समझदार हैं, तब तो विश्व के मालिक हैं। बेसमझ तो विश्व के मालिक हो न सकें। पहले तो तुम काँटे थे, अब फूल बन रहे हो इसलिए बाबा भी गुलाब का फूल ले आते हैं – ऐसा फूल बनना है। खुद आकर फूलों का बगीचा बनाते हैं। फिर रावण आता है काँटों का जंगल बनाने। कितना क्लीयर है। यह सब सिमरण करना है। एक को याद करने से उसमें सब आ जाता है। बाप से वर्सा मिलता है। यह बहुत भारी दौलत है, शान्ति का भी वर्सा मिलता है क्योंकि शान्ति का सागर वही है। लौकिक बाप की ऐसी महिमा कभी नहीं करेंगे। श्रीकृष्ण है सबसे प्यारा। पहले-पहले जन्म ही उनका होता है इसलिए उनको सबसे जास्ती प्यार करते हैं। बाप बच्चों को ही सारे घर का समाचार देते हैं। बाप भी पक्का व्यापारी है, कोई विरला ऐसा व्यापार करे। होलसेल व्यापारी कोई मुश्किल बनता है। तुम होलसेल व्यापारी हो ना! बाप को याद करते ही रहते हो। कई रिटेल में सौदा कर फिर भूल जाते हैं। बाप कहते हैं निरन्तर याद करते रहो। वर्सा मिल गया फिर याद करने की दरकार नहीं रहेगी। लौकिक सम्बन्ध में बाप बूढ़ा हो जाता है तो कोई-कोई बच्चे पिछाड़ी तक भी सहायक बनते हैं। कोई तो मिलकियत मिली और उड़ाकर खलास कर देते हैं। बाबा सब बातों का अनुभवी है। तब तो बाप ने भी इनको अपना रथ बनाया है। गरीबी का, साहूकारी का सबमें अनुभवी है। ड्रामा अनुसार यह एक ही रथ है। यह कभी बदल नहीं सकता। ड्रामा बना हुआ है, इसमें कभी चेन्ज हो नहीं सकती है। सब बातें होलसेल और रिटेल में समझाकर फिर अन्त में कह देते हैं मन्मनाभव, मध्याजी भव। मन्मनाभव में सब आ जाता है। यह बहुत भारी खजाना है, उनसे झोली भरते हैं। अविनाशी ज्ञान रत्न एक-एक लाख रूपये के हैं। तुम पद्मापद्म भाग्यशाली बनते हो। बाप तो खुशी, ना खुशी दोनों से न्यारा है। साक्षी हो ड्रामा देख रहे हैं। तुम पार्ट बजाते हो। मैं पार्ट बजाते भी साक्षी हूँ। जन्म-मरण में नहीं आता हूँ। और तो कोई इनसे छूट नहीं सकता, मोक्ष मिल न सके। यह अनादि बना-बनाया ड्रामा है। यह भी वण्डरफुल है। छोटी-सी आत्मा में सारा पार्ट भरा हुआ है। यह अविनाशी ड्रामा कभी विनाश को नहीं पाता। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का दिल व जान, सिक व प्रेम से, सर्विसएबुल बच्चों को नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) जैसे बाप बच्चों पर वारी जाते हैं, ऐसे तन-मन-धन सहित एक बार बाप पर पूरा कुर्बान जाकर 21 जन्मों का वर्सा लेना है।

2) बाप जो अविनाशी अनमोल खजाना देते हैं उससे अपनी झोली सदा भरपूर रखनी है। सदा इसी खुशी व नशे में रहना है कि हम पद्मापद्म भाग्यशाली हैं।

वरदान:- दृढ़ निश्चय के आधार पर सदा विजयी बनने वाले ब्रह्मा बाप के स्नेही भव
जो दृढ़ निश्चय रखते हैं, तो निश्चय की विजय कभी टल नहीं सकती। चाहे पांच ही तत्व या आत्मायें कितना भी सामना करें लेकिन वो सामना करेंगे और आप अटल निश्चय के आधार पर समाने की शक्ति से उस सामना को समा लेंगे। कभी निश्चय में हलचल नहीं हो सकती। ऐसे अचल रहने वाले विजयी बच्चे ही बाप के स्नेही हैं। स्नेही बच्चे सदा ब्रह्मा बाप की भुजाओं में समाये रहते हैं।
स्लोगन:- सर्व खजानों की चाबी प्राप्त करनी है तो परमात्म प्यार के अनुभवी बनो।

TODAY MURLI 10 JULY 2018 DAILY MURLI (English)

Today Murli Brahma kumaris : 10 July 2018

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Read Murli 9 July 2018 :- Click Here

10/07/18
Morning Murli
Om Shanti
BapDada
Madhuban
Essence: Sweet children, keep a picture of Shiv Baba in a little room. Go there again and again and sit in front of it and talk to Baba and your remembrance will then remain throughout the whole day.
Question: What new and unique type of love can only be experienced at the confluence age?
Answer: To love the Father who has no image is a new type of love. You understand that incorporeal Baba, the One without an image, has come into the corporeal one. You are sitting in front of Him. At the confluence age, you receive love directly from God. This love is new and unique. You have loved bodily beings throughout the whole cycle. Now love the bodiless Father. Such love can only exist at the confluence age.
Song: Who has come to the door of my heart in the early morning.

Om shanti. You children understand that the unlimited Father is without an image. We have now come to Baba and are sitting with Him with this new type of love. This is known as new love. Children only receive God’s love once. You children can understand that we all definitely remember the Supreme Father, the Supreme Soul. He sits and teaches us children. That incorporeal Baba, the One without an image, has entered this one. The Supreme Father, the Supreme Soul, is the Father of us souls. We have now come to know and recognise Him. This love is unique. In fact, love normally only exists between bodily beings but that One is bodiless, without a body. You are sitting in front of Him. He comes and teaches you with great love. So this is a new aspect. Previously, all the desires you had were to receive wealth or a palace. All of those desires have now changed. Your desires compared to those of the whole world have changed. We are now making effort to become the masters of the world through Baba. You are now sitting personally in front of Him. You understand that He is Shiva, the Father of all souls, the Purifier. It is that One whom you have to remember. You are now sitting personally in front of Him. You have the enthusiasm in your hearts that you are to claim your unlimited inheritance from the unlimited Father. Baba is so unique! He is without an image and so wonderful ! No one else knows this. Only you know how the Father comes and makes you belong to Him and teaches you. So, what method can you create so that you continue to remember the Father again and again? The Father advises you: Each of you should keep a picture of Shiv Baba in your home. On seeing Shiv Baba’s picture, you will understand that the unlimited Father, the Purifier, has come to establish the pure world. We are claiming our inheritance of self-sovereignty of heaven from Him as we did 5000 years ago. Souls understand that they will go to heaven and rule their kingdoms through bodies. This is something we never even dreamt of. That One has now come. Therefore, make a little room and keep a picture of Shiva there and write: Baba has come. He has to come to establish heaven, to change the residents of hell into the residents of heaven. If you continue to look at Shiv Baba again and again, you will remember Him. Some people put a photograph (in a locket) around their necks. They even put a photo of their husbands around their necks. A similar thing is also being prepared for you children. To remember the Father from beyond is something unique. Stop remembering everyone else and remember the one Father. Just as people on the path of devotion make a little room or a shrine in their homes for worship, in the same way, on the path of knowledge, make a small room and just keep a picture of Shiv Baba there. Human beings believe that the murli of the Brahma Kumaris frees you from vice. Oh! but this is very good! Vice definitely has to be renounced in order to become pure. They become upset and ask: Why do you renounce devotion? Achcha, we do devotion, but only of the One and none other. Break your intellect’s yoga away from the company of others. Your war is with Maya. You remember the Father and Maya tries to break the connection. We receive our inheritance from Shiv Baba. Continue to have remembrance in this way. If you continue to look at Shiv Baba, your little room will become Paradise. Meera too had visions of Paradise when she did devotion. It was Shiv Baba who granted her visions. It has now entered your intellects that we are becoming the masters of the world through Shiv Baba. People on the path of devotion don’t know what Shiva does or why they sacrifice themselves to Him. You understand that Shiv Baba is the highest of all and that He is called the Supreme Soul. Surely, something new would be received from God. He is called Heavenly God, the Father. Shri Krishna exists in heaven. He cannot be called a father; he is a child. The incorporeal Father is the One who establishes heaven. He is not a bodily being. In fact, nowadays, they call everyone ‘father . They even called Gandhi ‘Bapuji’ (father). However, those of other religions would not call him that. They don’t understand the meaning of that. You understand that the Bapuji of everyone is Shiv Baba. Shiva is not Dada, He is Baba and He resides in the incorporeal world. People remember Krishna, but he is a resident of Paradise. All bodily beings, rishis and munis etc. have been here. God is incorporeal; He doesn’t have a body. Because of the concept of omnipresence, no one’s intellect works. The Father comes and opens the locks of your intellects. This is a new aspect here. In other spiritual gatherings, they do not understand that Shiv Baba is giving them knowledge. Only bodily beings sit there. You have the faith that you are listening to the incorporeal Father. Surely, it is only when the incorporeal One comes into the corporeal that He can introduce Himself. The Father comes every cycle. He comes and makes you into the masters of the world. However, Maya still harasses you a great deal; she creates obstacles. Devils create obstacles in the sacrificial fire of the knowledge of Rudra. Obstacles come when you become body conscious. Baba says: Consider yourselves to be bodiless. We belong to Baba. Baba has come to take us back home. You have to shed your bodies and return home. Talk to yourselves in this way. Renounce remembering subtle and physical bodily beings. Let there be this firm faith: We souls have come from the supreme abode. We are residents of that place. We ruled a kingdom in the golden age for so many births. We have taken 84 births and the play is now coming to an end. We have to return home. If there is any disturbance in your home, keep a picture of Shiv Baba in a little room. Brahmin priests tell women that they shouldn’t worship Shiva. However, Shiv Baba comes especially for the mothers. Many pour water over a Shiv lingam. The priests become very happy, because it is the mothers who give the most money. It is the innocent mothers who have true feelings of devotion, whereas men are very unstable; they repeatedly go away. Their intellects’ yoga wanders a lot. However, a wife has a lot of attachment to her husband. You children understand that this is the land of sorrow. Baba, who creates the land of happiness, has now come. You have to invent methods for remembering the Father. He cannot be seen with these eyes. It is the soul that says: Shiv Baba is our Father. You will experience great happiness on seeing the picture of Shiv Baba. The yoga of you children has to be unadulterated. Keep a picture of Shiva and remember Him again and again. Baba has also given you his own example of how much love he had for the picture of Lakshmi and Narayan. Then, one day, I thought: Why is Lakshmi massaging his feet like a maid? That is not right. So an artist was told to liberate Lakshmi from that. However, the picture of Narayan was kept in his pocket. One was kept in a pocket and another in the cash box. Baba would look at the picture again and again and become intoxicated. However, he would do that secretly, so that no one was able to see him. Otherwise, they would say: What is this person doing? First, he had love for Krishna and then he left him and had love for Vishnu. Just as there is intense devotion, so your remembrance should be just as intense. There is great attainment through this, whereas they attain nothing by doing that. They only attain a little happiness for a temporary period and they then have to make effort again in their next birth. Devotion and business both require effort. First earn; only then can you spend. Baba inspires you to make so much effort in this one birth that you experience its reward for 21 births. There will be no need to make effort there. You will remain constantly happy for 21 births. Therefore, should you not remember such a Father who teaches you to make such effort? He says: Stay in remembrance with every breath. Gurus tell their followers: Rotate the rosary and continue to chant, “Rama, Rama”. That’s all! By chanting Rama’s name, they have goose pimples. While chanting “Rama, Rama” they start swaying in intoxication. It is as though they have reached the land of Rama. Baba says to you: Let there be the soundless chant of remembrance of one Shiv Baba and let nothing else be remembered. However, Maya also opposes you. Maya doesn’t oppose you on the path of devotion. This is the war between Maya and you children of God. Plays are also created in which they portray what God says and what Maya says. It is now the confluence age. Impure and vicious thoughts of Maya will continue to come. Some storms come with such great force that they blow human beings overand throw them far away. These storms are of Maya, Ravan. Baba continues to tell you methods to save yourself from them. You say: The Supreme Father, the Supreme Soul, is teaching us Raja Yoga. If anyone asks you who inspired you to have renunciation and who your guru is, tell him: It is the Supreme Father, the Supreme Soul. There is no one else for whom God can come and inspire to have renunciation. Elsewhere, it is human beings who inspire other human beings. Here, the Father comes and tells you: Renounce all the relations of bodies, including your own bodies. Renounce this old world and remember the new world. Sannyasis cannot say this. The old world is now to be destroyed in a practical way. Therefore, remove everyone from your intellects and link your intellects to the one Father. You are now engaged. If you remember a bodily being, your engagement is weakened. Renounce all other religions such as: I am so and so, or I am this or that. Renounce all of that and consider yourself to be souls. You have now come to know about your 84 births. You should applaud because you are now to return home in great happiness. You shed a body and take another. Consider yourself to be souls. Previously, I, the soul, was beautiful and I then took 84 births. I will now return home and then come back to rule in the kingdom of heaven. It is so easy to spin this discus of self-realisation. Keep a picture of Shiv Baba in your pocket. Talk to Him in this way: Baba, You have come. You are so sweet. You are our Baba. You used to talk to Krishna in this way on the path of devotion. First-class lockets etc. of Shiva will be made of gold and silver. Poor ones will be given lockets of gold and wealthy ones of silver. These mothers are very sweet. Villagers have very good feelings of devotion. Baba also becomes pleased on seeing His ordinary children. Krishna was known as a village urchin. In fact, Krishna cannot become a village urchin; he is the master of heaven. They have mixed up things about this one with those of Krishna. It is this one who has fully experienced village life. Therefore, neither Shiv Baba nor Krishna can be a village urchin. Yes, this Dada was an urchin in his childhood. He grew up in a village. The Father has come once again and entered this ordinary body. Baba has explained the main aspect of how everything depends on remembrance. You should never forget remembrance. A lokik (physical) child would never say that he forgets his father. Does a bride ever forget her bridegroom? It is impossible. This is the effort you children have to make. It is only by practising remembrance constantly that your sins will be absolved. Otherwise, there will have to be the experience of punishment and you will not become part of the rosary of victory. It is a wonder of the Father that He comes and uplifts the old, the poor, the uneducated and downtrodden ones, the hunchbacks, etc. and makes them all belong to Him. In fact, there is no need for a picture, but Maya makes you forget and this is why a picture is kept. It should remain in your intellects that you are going to Baba. We have seen the path to liberation and liberation-in-life. There are no other guides who can take us there. This is also known as Indraprasth (Court of Indra). If anyone impure comes and sits here secretly, he will become one with a stone intellect. Baba is the One who knows all the secrets. This Baba (Brahma) knows all the external things. That Baba (Shiv Baba) is able to know straight away whether anyone sitting here secretly is impure. Therefore, both the one who brings an impure person and the impure person who comes and sits here will experience punishment. Therefore, you must never bring impure ones here. The laws are very strict. Dirty and impure ones should not be allowed to sit here. Otherwise, you will have to experience very severe punishment. No cheating or stealing can carry on here. Both accounts of sin and charity remain with Dharamraj. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:

  1. Stop remembering everyone. Disconnect your intellect’s yoga from everyone and stay in remembrance of the one Father. Make a little room for Shiv Baba and sit in unadulterated remembrance of Him.
  2. Tell yourself these sweet things: Previously, we were so beautiful. We have now completed 84 births and are going to return home happily. Talk to yourself in this way and spin the discus of self-realisation.
Blessing: May you have a right to a high status by making your stage constant and stable with remembrance of the One.
In order to make your stage constant and stable, remain constantly stable in the remembrance of One. If you remember anyone else instead of the One, then, instead of having a constant and stable stage, your stage will become diluted (sweetness of many). If any other sweetness attracts you, and your final moment comes at that moment, you cannot claim a high status. So, pay attention at every moment. Make the lesson of One constantly firm: one Father, the one time of the confluence age and stay in a constant and stable stage and you will claim a right to a high status.
Slogan: Those who accept the food of pure thoughts are the true Vaishnavs.

*** Om Shanti ***

BRAHMA KUMARIS MURLI 10 JULY 2018 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 10 July 2018

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10-07-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – शिवबाबा का चित्र एक कोठरी में रख दो, घड़ी-घड़ी जाकर उसके सामने बैठ बातें करो, तो सारा दिन याद बनी रहेगी”
प्रश्नः- नया और अनोखा प्यार कौनसा है, जिसकी अनुभूति केवल संगम पर ही होती है?
उत्तर:- विचित्र बाप के साथ प्यार करना – यह है नया प्यार। तुम जानते हो निराकार विचित्र बाबा इस साकार में आया हुआ है, हम उनके सामने बैठे हैं, हमें संगम पर डायरेक्ट ईश्वर का प्यार मिलता है – यह है नया और अनोखा प्यार। सारा कल्प देहधारियों से प्यार किया, अब विदेही बाप से प्यार करना है। ऐसा प्यार संगम पर ही होता है।
गीत:- कौन आया मेरे मन के द्वारे…..

ओम् शान्ति। बच्चे जानते हैं कि बेहद का बाप विचित्र है और अभी एक नया प्यार लेकर के हम बाबा के पास बैठे हैं वा आये हैं। इसको नया प्यार कहते हैं। ईश्वर का प्यार सिर्फ एक बार बच्चों को मिलता है। बच्चे समझ सकते हैं बरोबर परमपिता परमात्मा को हम सब याद करते हैं। वह बैठ बच्चों को पढ़ाते हैं। वह निराकार विचित्र बाबा इसमें आया हुआ है। परमपिता परमात्मा हम आत्माओं का बाप है। हम अभी उनको जान-पहचान गये हैं। यह प्यार भी अनोखा है। वैसे तो हमेशा देहधारी को ही प्यार किया जाता है। यह है विदेही, बिगर देह के। हम उनके सामने बैठे हैं। वह बहुत प्यार से आकर पढ़ाते हैं। तो नई बात हुई ना। आगे जो आशायें थी – धन मिले, महल मिलें, वह सब आशायें बदल गई हैं। सारी दुनिया में तुम्हारी आश बदली हुई है। हम अभी बाबा से विश्व का मालिक बनने का पुरुषार्थ कर रहे हैं। अभी तुम सम्मुख बैठे हो। जानते हो वही सब आत्माओं का बाप पतित-पावन शिव है। याद भी उनको ही करते हैं। अभी तुम बच्चे सम्मुख बैठे हो। दिल में उमंग है – बेहद के बाप से, बेहद का वर्सा लेना है। कितना विचित्र, अनोखा, वन्डरफुल बाबा है! यह और कोई नहीं जानते। सिर्फ तुम ही जानते हो – बाप कैसे अपना बनाकर फिर पढ़ाते हैं। तो ऐसी क्या युक्ति करें जो घड़ी-घड़ी बाप को याद करते रहें? बाप राय देते हैं – हर एक अपने घर में शिव का चित्र रख दे। शिवबाबा का चित्र देख समझेंगे – बेहद का बाबा पतित-पावन आया हुआ है पावन दुनिया स्थापन करने। उनसे हम अभी 5 हजार वर्ष पहले मुआफिक वर्सा ले रहे हैं, स्वर्ग के स्वराज्य का। आत्मा जानती है – हम स्वर्ग में जाकर शरीर के साथ राज्य करेंगे। जो बात कभी स्वप्न में भी नहीं थी, अब वह आया है तो एक कोठरी अपनी बनाए शिव का चित्र रख उसमें लिख देना चाहिए – बाबा आया हुआ है। उनको आना ही है स्वर्ग की स्थापना करने। नर्कवासियों को स्वर्गवासी बनाने। घड़ी-घड़ी शिवबाबा को देखते रहेंगे तो याद रहेगी। चित्र गले में भी डाल देते हैं। पति का चित्र भी गले में डाल देते हैं ना। तुम बच्चों के लिए भी तैयार करा रहे हैं। पारलौकिक बाप को याद करना बड़ा अनोखा है। और सभी की याद को समेट एक को याद करना है। जैसे भक्ति मार्ग में भी अपने घर में पूजा की कोठी अथवा मन्दिर बनाते हैं ना, वैसे ज्ञान मार्ग में भी कोठी बनाए उसमें सिर्फ शिवबाबा का चित्र रखना चाहिए। मनुष्य समझते हैं – ब्रह्माकुमारियों की मुरली विकार से छुड़ाती है। अरे, यह तो अच्छा है ना। पावन बनने लिए जरूर विकारों को तो छोड़ना होगा। बिगड़ते हैं – भक्ति क्यों छोड़ते हो? अच्छा, हम भक्ति करते हैं परन्तु एक की, दूसरा न कोई। और संग बुद्धियोग तोड़ देना है।

तुम्हारी युद्ध माया से है। तुम बाप को याद करते हो, माया तोड़ने की कोशिश करती है। हमको शिवबाबा से वर्सा मिलता है – ऐसे याद करते रहेंगे। शिवबाबा को देखते रहेंगे तो तुम्हारी कोठी वैकुण्ठ बन जायेगी। मीरा भी भक्ति करती थी तो वैकुण्ठ का साक्षात्कार करती थी। उनको भी साक्षात्कार कराने वाला शिवबाबा है। तुम्हारी बुद्धि में अब आया है – हम शिवबाबा से विश्व का मालिक बनते हैं। भक्ति मार्ग में यह पता नहीं रहता – शिव क्या करते हैं? क्यों उस पर बलि चढ़ते हैं? तुम समझते हो – सबसे ऊंच है शिवबाबा, उनको ही परमात्मा कहा जाता है। परमात्मा से जरूर नई चीज़ मिलेगी। उनको हेविनली गॉड फादर कहा जाता है। स्वर्ग में है श्रीकृष्ण, उनको फादर नहीं कहेंगे। वह तो बच्चा है। स्वर्ग स्थापन करने वाला बाप है निराकार। वह देहधारी नहीं। यूँ तो आजकल सबको फादर कहते रहते हैं। गांधी को भी बापू जी कहते हैं। परन्तु सब धर्म वाले नहीं कहेंगे। अर्थ तो समझते नहीं। तुम जानते हो – सबका बापू जी शिवबाबा है। शिव दादा नहीं, बाबा। वह निराकारी दुनिया में रहते हैं। कृष्ण को याद करेंगे लेकिन वह तो वैकुण्ठ निवासी है। ऋषि-मुनि आदि सब देहधारी यहाँ होकर गये हैं। परमात्मा है निराकार, उनको देह है नहीं। सर्वव्यापी के ज्ञान कारण बुद्धि किसकी भी चलती नहीं। बाप आकर बुद्धि का ताला खोलते हैं। यहाँ है नई बात। और सतसंग में ऐसे नहीं समझते हैं कि शिवबाबा नॉलेज दे रहे हैं। वहाँ तो सब देहधारी बैठे हुए हैं। तुमको निश्चय है – हम निराकार बाप से सुन रहे हैं। निराकार जरूर जब साकार में आये तब तो पहचान दे। कल्प-कल्प बाप आते हैं। आकर मालिक बनाते हैं। फिर भी माया कितना हैरान करती है! विघ्न डालती है। रूद्र ज्ञान यज्ञ में असुरों के विघ्न पड़ते हैं। देह अभिमान आने से ही विघ्न पड़ते हैं। बाबा कहते हैं – अपने को अशरीरी समझो। हम तो बाबा के बने हैं। बाबा वापिस लेने आये हैं। यह शरीर छोड़ अब वापिस जाना है। अपने से बातें करो। सूक्ष्म देहधारी वा स्थूल देहधारी सबकी याद छोड़नी है। पक्का-पक्का निश्चय करना है। हम आत्मायें परमधाम से आई हैं। वहाँ के हम रहने वाले हैं। सतयुग में इतने जन्म राजाई की। 84 जन्म लिए, अब नाटक पूरा होता है। वापिस जाना है। घर में कोई हंगामा हो तो कोठरी में शिव का चित्र रख दो।

ब्राह्मण लोग स्त्रियों को कहते हैं कि शिव की पूजा नहीं करनी है। परन्तु शिवबाबा तो आते ही हैं माताओं के लिए। शिव के ऊपर तो बहुत जाकर लोटियां चढ़ाते हैं। पुजारी लोग खुश होते हैं क्योंकि मातायें सबसे जास्ती पैसे रखती हैं। भक्ति की सच्ची भावना अबलाओं माताओं में रहती है। पुरुष तो जैसे खग्गे हैं। घड़ी-घड़ी बाहर निकल जाते हैं। बुद्धियोग बहुत भटकता है। पत्नि का पति तरफ बहुत मोह जाता है। तुम बच्चे समझते हो यह दु:खधाम है। अब सुखधाम स्थापन करने वाला बाबा आया हुआ है। युक्तियां रचनी है – हम बाप को कैसे याद करें? उनको इन आंखों से नहीं देखा जाता। यह आत्मा कहती है – हमारा शिवबाबा बाप है। शिव का चित्र देखने से बड़ी खुशी होगी।

तुम बच्चों का योग भी अव्यभिचारी चाहिए। शिव का चित्र रख घड़ी-घड़ी याद करते रहो। बाबा ने अपना मिसाल बताया था। लक्ष्मी-नारायण के चित्र से हमारा कितना प्यार था! फिर एक दिन ख्याल आया – लक्ष्मी दासी बन पांव दबा रही है। ऐसे तो ठीक नहीं है। तो आर्टिस्ट को कहा – इससे लक्ष्मी को तो मुक्त कर दो। बाकी नारायण का चित्र पॉकेट में पड़ा रहता था। एक पॉकेट में, एक मुरादी के बॉक्स में। घड़ी-घड़ी चित्र देखता रहता था। जैसे मस्त। परन्तु गुप्त करता था। कोई देखे नहीं। नहीं तो कहेंगे – यह क्या करता है? पहले कृष्ण से प्यार था फिर उनको छोड़ विष्णु से हो गया। जैसे भक्ति नौधा होती है। वैसे यह याद भी नौधा होनी चाहिए, इससे प्राप्ति बहुत भारी है। उनसे तो कुछ नहीं अल्पकाल के लिए थोड़ा सुख मिलता है। फिर दूसरे जन्म में मेहनत करनी पड़े। भक्ति में, धन्धे आदि में मेहनत लगती है। कमाओ, तब खाओ। बाबा तुमको इस एक जन्म में इतनी मेहनत कराते हैं जो 21 जन्म प्रालब्ध भोगते रहेंगे। कुछ मेहनत करने की दरकार नहीं रहेगी। 21 जन्म सदा सुखी रहेंगे। तो ऐसा बाप जो पुरुषार्थ करना सिखलाते हैं, उनको तो याद करना चाहिए ना। कहते हैं – श्वाँसों श्वाँस याद करो। गुरू लोग अपने शिष्यों को कहते हैं – माला फेरो। राम-राम करते रहो, बस। राम-राम जपते-जपते रोमांच खड़े हो जाते हैं। राम-राम की मस्ती में झूलते हैं। जैसे कि राम की पुरी में पहुँच गये हैं। तुमको तो बाबा कहते हैं – एक शिवबाबा की याद का अजपाजाप करो और कुछ याद न आये। परन्तु माया भी सामना करती है। भक्ति मार्ग में थोड़ेही माया सामना करती है। यह है माया और ईश्वर के बच्चों की युद्ध। नाटक भी बनाते हैं – भगवान् ऐसे कहते हैं, माया ऐसे कहती है। अभी है संगमयुग। माया के उल्टे-सुल्टे संकल्प-विकल्प तो आते रहेंगे। तूफान ऐसा जोर से लगता है जो मनुष्य को भी उड़ाकर दूर फेंक देता है। यह फिर माया रावण का तूफान है। उनसे बचने की युक्तियां तो बाबा बताते रहते हैं। तुम कहेंगे हमको परमपिता परमात्मा राजयोग सिखलाते हैं।

तुमसे कोई पूछे – तुमको यह सन्यास किसने कराया? गुरू कौन है? बोलो – परमपिता परमात्मा। ऐसा कोई नहीं होगा जिसको भगवान् आकर सन्यास कराये। वह सब मनुष्य, मनुष्य को कराते हैं। यहाँ बाप आकर कहते हैं – देह सहित जो भी सम्बन्ध हैं उनको छोड़ो। इस पुरानी दुनिया का त्याग कर नई दुनिया को याद करो – सन्यासी ऐसे थोड़ेही कहेंगे। अब तो प्रैक्टिकल में पुरानी दुनिया का विनाश होना है, इसलिए सबका बुद्धि से त्याग कर एक बाप से बुद्धि लगानी है। तुम सगाई करते हो ना। देहधारी को याद किया तो सगाई कच्ची हो जायेगी। सर्व धर्मानि… मैं फलाना हूँ, यह हूँ…। वह सब छोड़ अपने को आत्मा समझो। 84 जन्मों को तो तुम जान गये हो। अब खुशी से वापिस जाते हैं। ताली बजानी चाहिए। हम आत्मायें एक शरीर छोड़ दूसरा लेती हैं। अपने को देही समझना है। हम आत्मा पहले-पहले गोरी थी, फिर 84 जन्म लिए। अब वापिस जाकर के फिर आए स्वर्ग में राज्य करेंगे। यह स्वदर्शन चक्र फिराना कितना सहज है। शिव का चित्र तो पॉकेट में पड़ा रहे। बाबा आप आये हो, कितने मीठे हो, हमारे बाबा हो ना – ऐसी-ऐसी बातें करनी चाहिए। कृष्ण के साथ भक्ति मार्ग में ऐसी बातें करते थे ना। शिव का फर्स्ट क्लास लॉकेट सोने-चांदी का बनायेंगे। गरीबों को सोने का, साहूकारों को चांदी का देंगे। यह मातायें बड़ी मीठी हैं। गांव वालों में भाव अच्छा रहता है। साधारण बच्चों को देख बाबा भी खुश होते हैं। कृष्ण को गांवड़े का छोरा कहते हैं ना। कृष्ण तो गांवड़े का छोरा बन न सके। वह तो स्वर्ग का मालिक है। इनकी और कृष्ण की बातें मिक्स कर दी हैं। गांवड़े का पूरा अनुभव इनको है। तो शिवबाबा वा कृष्ण गांवड़े का छोरा बन न सके। हाँ, यह (दादा) छोटेपन में था। पला ही गांवड़े में हूँ। तो इस साधारण तन में फिर बाप ने आकर प्रवेश किया है। बाबा ने मुख्य बात समझाई है कि सारा मदार है याद पर। याद कभी भूलनी नहीं चाहिए। लौकिक बच्चा थोड़ेही कभी कहेगा – मैं बाप को भूल जाता हूँ। सज़नी कभी साजन को भूल जाती है क्या? इम्पासिबुल है। यह है तुम बच्चों के लिए मेहनत। निरन्तर याद के अभ्यास से ही विकर्म विनाश होंगे। नहीं तो फिर सजा खानी पड़ेगी। विजय माला में आ नहीं सकेंगे। कमाल है बाप की जो बुढ़ियों, गरीबों, गणिकाओं, अहिल्याओं, कुब्जाओं आदि को आकर अपना बनाते हैं। यूँ तो कोई चित्र की दरकार नहीं है। परन्तु माया भुला देती है, इसलिए चित्र रखा जाता है। बुद्धि में रहना चाहिए हम जाते हैं बाबा के पास। रास्ता देख लिया है मुक्ति-जीवनमुक्ति का। और कोई पण्डा होता ही नहीं है। इनको इन्द्रप्रस्थ भी कहते हैं, कोई पतित आकर छिप करके बैठेगा तो पत्थरबुद्धि बन जायेगा। बाबा तो अन्तर्यामी है ना! यह बाबा (ब्रह्मा) बाहरयामी है। उस बाबा को झट मालूम पड़ जाता है – पतित छिपा हुआ बैठा है। तो जिसने ऐसे पतित को लाया उनको और जो पतित आकर बैठा होगा – उन दोनों को सजा मिलेगी इसलिए कभी भी पतित को नहीं लाना चाहिए। लॉ ऐसे कड़े हैं। कोई पतित छी-छी को नहीं बिठाना चाहिए। नहीं तो बड़ी कड़ी सजा के भागी बन जायेंगे। यहाँ कोई चोरी ठगी चल न सके। पाप और पुण्य का हिसाब-किताब धर्मराज के पास रहता है ना। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद, प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सभी की याद को समेट, बुद्धियोग सभी से तोड़ एक बाप की याद में रहना है। शिवबाबा की कोठी बनाए उनकी अव्यभिचारी याद में बैठना है।

2) अपने आपसे मीठी-मीठी बातें करनी है। हम पहले कितने सुन्दर (गोरे) थे, फिर 84 जन्म लिए, अब खुशी से वापिस जाते हैं – ऐसे अपने साथ बातें कर स्वदर्शन चक्र फिराना है।

वरदान:- एक की स्मृति द्वारा एकरस स्थिति बनाने वाले ऊंच पद के अधिकारी भव
एकरस स्थिति बनाने के लिए सदा एक की स्मृति में स्थित रहो। अगर एक के बजाए दूसरा कोई भी याद आया तो एकरस के बजाए बहुरस स्थिति हो जायेगी। जिस समय और कोई रस अकर्षित करता है, उसी समय यदि आपका अन्तिम समय आ जाए तो ऊंच पद नहीं मिल सकता, इसलिए हर सेकण्ड अटेन्शन रखो। सदैव एक का पाठ पक्का हो, एक बाप, एक ही संगम का समय है और एकरस स्थिति में रहना है तो ऊंच पद का अधिकार मिल जायेगा।
स्लोगन:- शुद्ध सकंल्पों का भोजन स्वीकार करने वाले ही सच्चे-सच्चे वैष्णव हैं।
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