Daily Gyan Murli : Hindi

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 25 JANUARY 2021 : AAJ KI MURLI

25-01-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – बाप की श्रीमत से तुम मनुष्य से देवता बनते हो, इसलिए उनकी श्रीमत का शास्त्र है सर्व शास्त्र शिरोमणी श्रीमद् भगवत गीता”
प्रश्नः- सतयुग में हर चीज़ अच्छे से अच्छी सतोप्रधान होती है क्यों?
उत्तर:- क्योंकि वहाँ मनुष्य सतोप्रधान हैं, जब मनुष्य अच्छे हैं तो सामग्री भी अच्छी है और मनुष्य बुरे हैं तो सामग्री भी नुकसानकारक है। सतोप्रधान सृष्टि में कोई भी वस्तु अप्राप्त नहीं है, कुछ भी कहीं से मंगाना नहीं पड़ता।

ओम् शान्ति। बाबा इस शरीर द्वारा समझाते हैं। इनको जीव कहा जाता, इनमें आत्मा भी है और तुम बच्चे जानते हो परमपिता परमात्मा भी इनमें है। यह तो पहले-पहले पक्का होना चाहिए इसलिए इनको दादा भी कहते हैं। यह तो बच्चों को निश्चय है। इस निश्चय में ही रमण करना है। बरोबर बाबा ने जिसमें पधरामणी की है वा अवतार लिया है उनके लिए बाप खुद कहते हैं मैं इनके बहुत जन्मों के अन्त के भी अन्त में आता हूँ। बच्चों को समझाया गया है यह है सर्व शास्त्र शिरोमणी गीता का ज्ञान। श्रीमत अर्थात् श्रेष्ठ मत। श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ मत है ऊंच ते ऊंच भगवान की। जिसकी श्रीमत से तुम मनुष्य से देवता बनते हो। तुम भ्रष्ट मनुष्य से श्रेष्ठ देवता बनते हो। तुम आते ही इसलिए हो। बाप भी खुद कहते हैं मैं आता हूँ तुमको श्रेष्ठाचारी, निर्विकारी मत वाले देवी-देवता बनाने। मनुष्य से देवता बनने का अर्थ भी समझना है। विकारी मनुष्य से निर्विकारी देवता बनाने आते हैं। सतयुग में मनुष्य रहते हैं परन्तु दैवीगुणों वाले। अभी कलियुग में हैं आसुरी गुणों वाले। है सारी मनुष्य सृष्टि, परन्तु वह है ईश्वरीय बुद्धि, यह है आसुरी बुद्धि। वहाँ ज्ञान, यहाँ भक्ति। ज्ञान और भक्ति अलग-अलग है ना। भक्ति की पुस्तक कितनी और ज्ञान की पुस्तक कितनी है। ज्ञान का सागर बाप है। उनका पुस्तक भी तो एक ही होना चाहिए। जो भी धर्म स्थापन करते हैं, उनका पुस्तक एक होना चाहिए। उनको रिलीजस बुक कहा जाता है। पहला रिलीजस बुक है गीता। श्रीमद् भगवत गीता। यह भी बच्चे जानते हैं – पहला आदि सनातन देवी-देवता धर्म है, न कि हिन्दू धर्म। मनुष्य समझते हैं गीता से हिन्दू धर्म स्थापन हुआ और गीता गाई है कृष्ण ने। कोई से पूछो तो कहेंगे परम्परा से यह कृष्ण ने गाई है। कोई शास्त्र में शिव भगवानुवाच है नहीं। श्रीमद् कृष्ण भगवानुवाच लिख दिया है, जो गीता पढ़े होंगे उनको सहज समझ में आयेगा। अभी तुम समझते हो इसी गीता ज्ञान से मनुष्य से देवता बने हैं, जो अभी बाप तुमको दे रहे हैं। राजयोग सिखा रहे हैं। पवित्रता भी सिखा रहे हैं। काम महाशत्रु है, इस द्वारा ही तुमने हार खाई है। अब फिर उन पर जीत पाने से तुम जगतजीत अर्थात् विश्व का मालिक बन जाते हो। यह तो बहुत सहज है। बेहद का बाप बैठ इनके द्वारा तुमको पढ़ाते हैं। वह है सभी आत्माओं का बाप। यह फिर है बेहद का बाप मनुष्यों का। नाम ही है प्रजापिता ब्रह्मा। तुम कोई से भी पूछेंगे ब्रह्मा के बाप का नाम बताओ तो मूँझ पड़ेंगे। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर है क्रियेशन। इन तीनों का कोई तो बाप होगा ना। तुम दिखाते हो इन तीनों का बाप है निराकार शिव। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को सूक्ष्मवतन के देवतायें दिखलाते हैं। उनके ऊपर है शिव। बच्चे जानते हैं – शिवबाबा के बच्चे जो भी आत्मायें हैं उनको अपना शरीर तो होगा। वह तो सदैव निराकार परमपिता परमात्मा है। बच्चों को मालूम हुआ है निराकार परमपिता परमात्मा के हम बच्चे हैं। आत्मा शरीर द्वारा बोलती है – परमपिता परमात्मा। कितनी सहज बातें हैं। इसको कहा जाता है अल्फ बे। पढ़ाते कौन हैं? गीता का ज्ञान किसने सुनाया? निराकार बाप ने। उन पर कोई ताज आदि है नहीं। वह ज्ञान का सागर, बीजरूप, चैतन्य है। तुम भी चैतन्य आत्मायें हो ना! सभी झाड़ों के आदि-मध्य-अन्त को तुम जानते हो। भल माली नहीं हो परन्तु समझ सकते हो कैसे बीज डालते हैं, उनसे झाड़ निकलते हैं। वह तो है जड़ झाड़, यह है चैतन्य। तुम्हारी आत्मा में ज्ञान है, और कोई की आत्मा में ज्ञान होता नहीं। बाप चैतन्य मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। तो झाड़ भी मनुष्यों का होगा। यह है चैतन्य क्रियेशन। बीज और क्रियेशन में फ़र्क तो है ना! आम का बीज डालने से आम निकलता है, फिर झाड़ कितना बड़ा होता है। वैसे मनुष्य के बीज से मनुष्य कितने फरटाइल होते हैं। जड़ बीज में कोई ज्ञान नहीं है। यह तो चैतन्य बीजरूप है। उनमें सारे सृष्टि रूपी झाड़ का ज्ञान है कि कैसे उत्पत्ति, पालना फिर विनाश होता है। यह बहुत बड़ा झाड़ खलास हो फिर दूसरा नया झाड़ कैसे खड़ा होता है! यह है गुप्त। तुमको ज्ञान भी गुप्त मिलता है। बाप भी गुप्त आये हैं। तुम जानते हो यह कलम लग रहा है। अभी तो सब पतित बन गये हैं। अच्छा बीज से पहले-पहले नम्बर में जो पत्ता निकला वह कौन था? सतयुग का पहला पत्ता तो कृष्ण को ही कहेंगे, लक्ष्मी-नारायण को नहीं। नया पत्ता छोटा होता है। पीछे बड़ा होता है। तो इस बीज की कितनी महिमा है। यह तो चैतन्य है ना। फिर पत्ते भी निकलते हैं। उन्हों की महिमा तो होती है। अभी तुम देवी-देवता बन रहे हो। दैवी गुण धारण कर रहे हो। मूल बात ही यह है कि हमको दैवीगुण धारण करने हैं, इन जैसा बनना है। चित्र भी हैं। यह चित्र न होते तो बुद्धि में ज्ञान ही नहीं आता। यह चित्र बहुत काम में आते हैं। भक्तिमार्ग में इन चित्रों की भी पूजा होती है और ज्ञान मार्ग में इन चित्रों से तुमको ज्ञान मिलता है कि ऐसा बनना है। भक्तिमार्ग में ऐसे नहीं समझते कि हमको ऐसा बनना है। भक्तिमार्ग में मन्दिर कितने बनते हैं। सबसे जास्ती मन्दिर किसके होंगे? जरूर शिवबाबा के होंगे जो बीजरूप है। फिर उसके बाद पहली क्रियेशन के मन्दिर होंगे। पहली क्रियेशन यह लक्ष्मी-नारायण हैं। शिव के बाद इनकी पूजा सबसे जास्ती होती है। मातायें तो ज्ञान देती हैं, उनकी पूजा नहीं होती। वह तो पढ़ाती हैं ना। बाप तुमको पढ़ाते हैं। तुम किसकी पूजा नहीं करते हो। पढ़ाने वाले की अभी पूजा नहीं कर सकते। तुम जब पढ़कर फिर अनपढ़ बनेंगे तब फिर पूजा होगी। तुम सो देवी-देवता बनते हो। तुम ही जानते हो जो हमको ऐसा बनाते हैं उनकी पूजा होगी फिर हमारी पूजा होगी नम्बरवार। फिर गिरते-गिरते पांच तत्वों की भी पूजा करने लग पड़ते हैं। शरीर 5 तत्वों का है ना। 5 तत्वों की पूजा करो या शरीर की करो, एक हो जाती। यह तो ज्ञान बुद्धि में है। यह लक्ष्मी-नारायण सारे विश्व के मालिक थे। इन देवी-देवताओं का राज्य नई सृष्टि पर था। परन्तु वह कब था? यह नहीं जानते, लाखों वर्ष कह देते हैं। अब लाखों वर्ष की बात तो कभी किसकी बुद्धि में रह न सके। अभी तुमको स्मृति है हम आज से 5000 वर्ष पहले आदि सनातन देवी-देवता धर्म के थे। देवी-देवता धर्म वाले फिर और धर्मों में कनवर्ट हुए हैं। हिन्दू धर्म कह नहीं सकते। परन्तु पतित होने कारण अपने को देवी-देवता कहना शोभता ही नहीं। अपवित्र को देवी-देवता कह न सकें। मनुष्य पवित्र देवियों की पूजा करते हैं तो जरूर खुद अपवित्र हैं इसलिए पवित्र के आगे माथा झुकाना पड़ता है। भारत में खास कन्याओं को नमन करते हैं। कुमारों को नमन नहीं करते। फीमेल को नमन करते हैं। मेल को नमन क्यों नहीं करते? क्योंकि इस समय ज्ञान भी पहले माताओं को मिलता है। बाप इनमें प्रवेश करते हैं। यह भी समझते हो बरोबर यह ज्ञान की बड़ी नदी है। ज्ञान नदी भी है फिर पुरुष भी है। यह है सबसे बड़ी नदी। ब्रह्मपुत्रा नदी है सबसे बड़ी, जो कलकत्ता तरफ सागर में जाकर मिलती है। मेला भी वहाँ लगता है। परन्तु उनको यह पता नहीं कि यह आत्माओं और परमात्मा का मेला है। वह तो पानी की नदी है, जिस पर नाम ब्रह्मपुत्रा रखा है। उन्होंने तो ब्रह्म ईश्वर को कहा हुआ है इसलिए ब्रह्मपुत्रा को बहुत पावन समझते हैं। बड़ी नदी है तो पवित्र भी वह होगी। पतित-पावन वास्तव में गंगा को नहीं, ब्रह्मपुत्रा को कहा जाए। मेला भी इनका लगता है। यह भी सागर और ब्रह्मा नदी का मेला है। ब्रह्मा द्वारा एडाप्शन कैसे होती है – यह गुह्य बातें समझने की हैं, जो प्राय: लोप हो जाती हैं। यह तो बिल्कुल सहज बात है ना।

भगवानुवाच, मैं तुमको राजयोग सिखलाता हूँ, फिर यह दुनिया ही खलास हो जायेगी। शास्त्र आदि कुछ भी नहीं रहेंगे। फिर भक्तिमार्ग में यह शास्त्र होते हैं। ज्ञान मार्ग में शास्त्र होते नहीं। मनुष्य समझते हैं यह शास्त्र परम्परा से चले आते हैं। ज्ञान तो कुछ है नहीं। कल्प की आयु ही लाखों वर्ष कह दी है इसलिए परम्परा कह देते हैं। इनको कहा जाता है अज्ञान अन्धियारा। अभी तुम बच्चों को यह बेहद की पढ़ाई मिलती है, जिससे तुम आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझा सकते हो। तुमको इन देवी-देवताओं की हिस्ट्री-जॉग्राफी का पूरा पता है। यह पवित्र प्रवृत्ति मार्ग वाले पूज्य थे। अभी पुजारी पतित बने हैं। सतयुग में है पवित्र प्रवृत्ति मार्ग, यहाँ कलियुग में अपवित्र प्रवृत्ति मार्ग है। फिर बाद में निवृत्ति मार्ग होता है। वह भी ड्रामा में है। उसको संन्यास धर्म कहा जाता है। घरबार का संन्यास कर जंगल में चले जाते हैं। वह है हद का संन्यास। रहते तो इसी पुरानी दुनिया में ही है ना। अभी तुम समझते हो हम संगमयुग पर हैं फिर नई दुनिया में जायेंगे। तुमको तिथि, तारीख, सेकेण्ड सहित सब मालूम है। वह लोग तो कल्प की आयु ही लाखों वर्ष कह देते हैं, इनका पूरा हिसाब निकाल सकते हैं। लाखों वर्ष की तो बात कोई याद भी न कर सके। अभी तुम समझते हो बाप क्या है, कैसे आते हैं, क्या कर्तव्य करते हैं? तुम सबके आक्यूपेशन को, जन्मपत्री को जानते हो। बाकी झाड़ के पत्ते तो ढेर होते हैं। वह गिनती थोड़ेही कर सकते हैं। इस बेहद सृष्टि रूपी झाड़ के कितने पत्ते हैं? 5000 वर्ष में इतने करोड़ हैं। तो लाखों वर्ष में कितने अनगिनत मनुष्य हो जाएं। भक्तिमार्ग में दिखाते हैं – लिखा हुआ है सतयुग इतने वर्ष का है, त्रेता इतने वर्ष का है, द्वापर इतने वर्ष का है। तो बाप बैठ तुम बच्चों को यह सब राज़ समझाते हैं। आम का बीज देखने से आम का झाड़ सामने आयेगा ना! अभी मनुष्य सृष्टि का बीजरूप तुम्हारे सामने है। तुमको बैठ झाड़ का राज़ समझाते हैं क्योंकि चैतन्य है। बताते हैं हमारा यह उल्टा झाड़ है। तुम समझा सकते हो जो भी इस दुनिया में हैं, जड़ वा चैतन्य, हूबहू रिपीट करेंगे। अभी कितना वृद्धि को पाते रहते हैं। सतयुग में इतना हो नहीं सकता। कहते हैं फलानी चीज़ आस्ट्रेलिया से, जापान से आई। सतयुग में आस्ट्रेलिया, जापान आदि थोड़ेही थे। ड्रामा अनुसार वहाँ की चीज़ यहाँ आती है। पहले अमेरिका से गेहूँ आदि आते थे। सतयुग में कहाँ से आयेंगे थोड़ेही। वहाँ तो है ही एक धर्म, सब चीज़ें भरपूर रहती हैं। यहाँ धर्म वृद्धि को पाते रहते हैं, तो उनके साथ सब चीजें कम होती जाती हैं। सतयुग में कहाँ से मंगाते नहीं हैं। अभी तो देखो कहाँ-कहाँ से मंगाते हैं! मनुष्य पीछे वृद्धि को पाते गये हैं, सतयुग में तो अप्राप्त कोई वस्तु होती नहीं। वहाँ की हर चीज़ सतोप्रधान बहुत अच्छी होती है। मनुष्य ही सतोप्रधान हैं। मनुष्य अच्छे हैं तो सामग्री भी अच्छी है। मनुष्य बुरे हैं तो सामग्री भी नुकसानकारक है।

साइन्स की मुख्य चीज़ है एटॉमिक बॉम्ब्स, जिससे इतना सारा विनाश होता है। कैसे बनाते होंगे! बनाने वाली आत्मा में पहले से ही ड्रामा अनुसार ज्ञान होगा। जब समय आता है तब उनमें वह ज्ञान आता है, जिसमें सेन्स होगी वही काम करेंगे और दूसरे को सिखायेंगे। कल्प-कल्प जो पार्ट बजाया है वही बजता रहता है। अभी तुम कितने नॉलेजफुल बनते हो, इनसे जास्ती नॉलेज होती नहीं। तुम इस नॉलेज से देवता बन जाते हो। इससे ऊंच कोई नॉलेज है नहीं। वह है माया की नॉलेज, जिससे विनाश होता है। वह लोग (साइन्टिस्ट) मून में जाते हैं, खोजते हैं। तुम्हारे लिए कोई नई बात नहीं। यह सब माया का पॉम्प है। बहुत शो करते हैं, अति डीपनेस में जाते हैं। बहुत बुद्धि को लड़ाते हैं। कुछ कमाल कर दिखावें। बहुत कमाल करने से फिर नुकसान हो जाता है। क्या-क्या बनाते रहते हैं। बनाने वाले जानते हैं इनसे यह विनाश होगा। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) गुप्त ज्ञान का सिमरण कर हर्षित रहना है। देवताओं के चित्रों को सामने देखते, उन्हें नमन वन्दन करने के बजाए उन जैसा बनने के लिए दैवीगुण धारण करने हैं।

2) सृष्टि के बीजरूप बाप और उनकी चैतन्य क्रियेशन को समझ नॉलेजफुल बनना है, इस नॉलेज से बढ़कर और कोई नॉलेज नहीं हो सकती, इसी नशे में रहना है।

वरदान:- जिम्मेवारी सम्भालते हुए आकारी और निराकारी स्थिति के अभ्यास द्वारा साक्षात्कारमूर्त भव
जैसे साकार रूप में इतनी बड़ी जिम्मेवारी होते हुए भी आकारी और निराकारी स्थिति का अनुभव कराते रहे ऐसे फालो फादर करो। साकार रूप में फरिश्ते पन की अनुभूति कराओ। कोई कितना भी अशान्त वा बेचैन घबराया हुआ आपके सामने आये लेकिन आपकी एक दृष्टि, वृत्ति और स्मृति की शक्ति उनको बिल्कुल शान्त कर दे। व्यक्त भाव में आये और अव्यक्त स्थिति का अनुभव करे तब कहेंगे साक्षात्कारमूर्त।
स्लोगन:- जो सच्चे रहमदिल हैं उन्हें देह वा देह-अभिमान की आकर्षण नहीं हो सकती।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 24 JANUARY 2021 : AAJ KI MURLI

24-01-21
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 17-10-87 मधुबन

ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार – ‘पवित्रता’

आज बापदादा अपने विश्व के चारों ओर के विशेष होवनहार पूज्य बच्चों को देख रहे हैं। सारे विश्व में से कितने थोड़े अमूल्य रत्न पूजनीय बने हैं! पूजनीय आत्मायें ही विश्व के लिए विशेष जहान के नूर बन जाते हैं। जैसे इस शरीर में नूर नहीं तो जहान नहीं, ऐसे विश्व के अन्दर पूजनीय जहान के नूर आप श्रेष्ठ आत्मायें नहीं तो विश्व का भी महत्व नहीं। स्वर्ण-युग वा आदि-युग वा सतोप्रधान युग, नया संसार आप विशेष आत्माओं से आरम्भ होता है। नये विश्व के आधार-मूर्त, पूजनीय आत्मायें आप हो। तो आप आत्माओं का कितना महत्व है! आप पूज्य आत्मायें संसार के लिए नई रोशनी हो। आपकी चढ़ती कला विश्व को श्रेष्ठ कला में लाने के निमित्त बनती है। आप गिरती कला में आते हो तो संसार की भी गिरती कला होती है। आप परिवर्तन होते हो तो विश्व भी परिवर्तन होता है। इतने महान् और महत्व वाली आत्मायें हो!

आज बापदादा सर्व बच्चों को देख रहे थे। ब्राह्मण बनना अर्थात् पूज्य बनना क्योंकि ब्राह्मण सो देवता बनते हैं और देवतायें अर्थात् पूजनीय। सभी देवतायें पूजनीय तो हैं, फिर भी नम्बरवार जरूर हैं। किन देवताओं की पूजा विधिपूर्वक और नियमित रूप से होती है और किन्हों की पूजा विधिपूर्वक नियमित रूप से नहीं होती। किन्हों के हर कर्म की पूजा होती है और किन्हों के हर कर्म की पूजा नहीं होती है। कोई का विधिपूर्वक हर रोज श्रृंगार होता है और कोई का श्रृंगार रोज़ नहीं होता है, ऊपर-ऊपर से थोड़ा-बहुत सजा लेते हैं लेकिन विधिपूर्वक नहीं। कोई के आगे सारा समय कीर्तन होता और कोई के आगे कभी-कभी कीर्तन होता है। इन सभी का कारण क्या है? ब्राह्मण तो सभी कहलाते हैं, ज्ञान-योग की पढ़ाई भी सभी करते हैं, फिर भी इतना अन्तर क्यों? धारणा करने में अन्तर है। फिर भी विशेष कौनसी धारणाओं के आधार पर नम्बरवार होते हैं, जानते हो?

पूजनीय बनने का विशेष आधार पवित्रता के ऊपर है। जितना सर्व प्रकार की पवित्रता को अपनाते हैं, उतना ही सर्व प्रकार के पूजनीय बनते हैं और जो निरन्तर विधिपूर्वक आदि, अनादि विशेष गुण के रूप से पवित्रता को सहज अपनाते हैं, वही विधिपूर्वक पूज्य बनते हैं। सर्व प्रकार की पवित्रता क्या है? जो आत्मायें सहज, स्वत: हर संकल्प में, बोल में, कर्म में सर्व अर्थात् ज्ञानी और अज्ञानी आत्मायें, सर्व के सम्पर्क में सदा पवित्र वृत्ति, दृष्टि, वायब्रेशन से यथार्थ सम्पर्क-सम्बन्ध निभाते हैं – इसको ही सर्व प्रकार की पवित्रता कहते हैं। स्वप्न में भी स्वयं के प्रति या अन्य कोई आत्मा के प्रति सर्व प्रकार की पवित्रता में से कोई कमी न हो। मानो स्वप्न में भी ब्रह्मचर्य खण्डित होता है वा किसी आत्मा के प्रति किसी भी प्रकार की ईर्ष्या वा आवेश के वश कर्म होता या बोल निकलता है, क्रोध के अंश रूप में भी व्यवहार होता है तो इसको भी पवित्रता का खण्डन माना जायेगा। सोचो, जब स्वप्न का भी प्रभाव पड़ता है तो साकार में किये हुए कर्म का कितना प्रभाव पड़ता होगा! इसलिए खण्डित मूर्ति कभी पूजनीय नहीं होती। खण्डित मूर्तियाँ मन्दिरों में नहीं रहती, आजकल के म्यूज़ियम में रहती हैं। वहाँ भक्त नहीं आते। सिर्फ यही गायन होता है कि बहुत पुरानी मूर्तियाँ हैं, बस। उन्होंने स्थूल अंगों के खण्डित को खण्डित कह दिया है लेकिन वास्तव में किसी भी प्रकार की पवित्रता में खण्डन होता है तो वह पूज्य-पद से खण्डित हो जाते हैं। ऐसे, चारों प्रकार की पवित्रता विधिपूर्वक है तो पूजा भी विधिपूर्वक होती है।

मन, वाणी, कर्म (कर्म में सम्बन्ध सम्पर्क आ जाता है) और स्वप्न में भी पवित्रता – इसको कहते हैं सम्पूर्ण पवित्रता। कई बच्चे अलबेलेपन में आने के कारण, चाहे बड़ों को, चाहे छोटों को, इस बात में चलाने की कोशिश करते हैं कि मेरा भाव बहुत अच्छा है लेकिन बोल निकल गया, वा मेरी एम (लक्ष्य) ऐसे नहीं थी लेकिन हो गया, या कहते हैं कि हंसी-मजाक में कह दिया अथवा कर लिया। यह भी चलाना है इसलिए पूजा भी चलाने जैसी होती है। यह अलबेलापन सम्पूर्ण पूज्य स्थिति को नम्बरवार में ले आता है। यह भी अपवित्रता के खाते में जमा होता है। सुनाया ना – पूज्य, पवित्र आत्माओं की निशानी यही है – उन्हों की चारों प्रकार की पवित्रता स्वभाविक, सहज और सदा होगी। उनको सोचना नहीं पड़ेगा लेकिन पवित्रता की धारणा स्वत: ही यथार्थ संकल्प, बोल, कर्म और स्वप्न लाती है। यथार्थ अर्थात् एक तो युक्तियुक्त, दूसरा यथार्थ अर्थात् हर संकल्प में अर्थ होगा, बिना अर्थ नहीं होगा। ऐसे नहीं कि ऐसे ही बोल दिया, निकल गया, कर लिया, हो गया। ऐसी पवित्र आत्मा सदा हर कर्म में अर्थात् दिनचर्या में यथार्थ युक्तियुक्त रहती है। इसलिए पूजा भी उनके हर कर्म की होती है अर्थात् पूरे दिनचर्या की होती है। उठने से लेकर सोने तक भिन्न-भिन्न कर्म के दर्शन होते हैं।

अगर ब्राह्मण जीवन की बनी हुई दिनचर्या प्रमाण कोई भी कर्म यथार्थ वा निरन्तर नहीं करते तो उसके अन्तर के कारण पूजा में भी अन्तर पड़ेगा। मानो कोई अमृतवेले उठने की दिनचर्या में विधिपूर्वक नहीं चलते, तो पूजा में भी उनके पुजारी भी उस विधि में नीचे-ऊपर करते अर्थात् पुजारी भी समय पर उठकर पूजा नहीं करेगा, जब आया तब कर लेगा अथवा अमृतवेले जागृत स्थिति में अनुभव नहीं करते, मजबूरी से वा कभी सुस्ती, कभी चुस्ती के रूप में बैठते तो पुजारी भी मजबूरी से या सुस्ती से पूजा करेंगे, विधिपूर्वक पूजा नहीं करेंगे। ऐसे हर दिनचर्या के कर्म का प्रभाव पूजनीय बनने में पड़ता है। विधिपूर्वक न चलना, कोई भी दिनचर्या में ऊपर-नीचे होना – यह भी अपवित्रता के अंश में गिनती होता है क्योंकि आलस्य और अलबेलापन भी विकार है। जो यथार्थ कर्म नहीं है वह विकार है। तो अपवित्रता का अंश हो गया ना। इस कारण पूज्य पद में नम्बरवार हो जाते हैं। तो फाउन्डेशन क्या रहा? पवित्रता।

पवित्रता की धारणा बहुत महीन है। पवित्रता के आधार पर ही कर्म की विधि और गति का आधार है। पवित्रता सिर्फ मोटी बात नहीं है। ब्रह्मचारी रहे या निर्मोही हो गये – सिर्फ इसको ही पवित्रता नहीं कहेंगे। पवित्रता ब्राह्मण जीवन का श्रृंगार है। तो हर समय पवित्रता के श्रृंगार की अनुभूति चेहरे से, चलन से औरों को हो। दृष्टि में, मुख में, हाथों में, पांवों में सदा पवित्रता का श्रृंगार प्रत्यक्ष हो। कोई भी चेहरे तरफ देखे तो फीचर्स से उन्हें पवित्रता अनुभव हो। जैसे और प्रकार के फीचर्स वर्णन करते हैं, वैसे यह वर्णन करें कि इनके फीचर्स से पवित्रता दिखाई देती है, नयनों में पवित्रता की झलक है, मुख पर पवित्रता की मुस्कराहट है। और कोई बात उन्हें नज़र न आये। इसको कहते हैं पवित्रता के श्रृंगार से श्रृंगारी हुई मूर्त। समझा? पवित्रता की तो और भी बहुत गुह्यता है, वह फिर सुनाते रहेंगे। जैसे कर्मों की गति गहन है, पवित्रता की परिभाषा भी बड़ी गुह्य है और पवित्रता ही फाउन्डेशन है। अच्छा।

आज गुजरात आया है। गुजरात वाले सदा हल्के बन नाचते और गाते हैं। चाहे शरीर में कितने भी भारी हों लेकिन हल्के बन नाचते हैं। गुजरात की विशेषता है – सदा हल्का रहना, सदा खुशी में नाचते रहना और बाप के वा अपने प्राप्तियों के गीत गाते रहना। बचपन से ही नाचते-गाते अच्छा हैं। ब्राह्मण जीवन में क्या करते हो? ब्राह्मण जीवन अर्थात् मौजों की जीवन। गर्भा रास करते हो तो मौज में आ जाते हो ना। अगर मौज में न आये तो ज्यादा कर नहीं सकेंगे। मौज-मस्ती में थकावट नहीं होती है, अथक बन जाते हैं। तो ब्राह्मण जीवन अर्थात् सदा मौज में रहने की जीवन, वह है स्थूल मौज और ब्राह्मण जीवन की है मन की मौज। सदा मन मौज में नाचता और गाता रहे। वह लोग हल्के बन नाचने-गाने के अभ्यासी हैं। तो इन्हों को ब्राह्मण जीवन में भी डबल लाइट (हल्का) बनने में मुश्किल नहीं होती। तो गुजरात अर्थात् सदा हल्के रहने के अभ्यासी कहो, वरदानी कहो। तो सारे गुजरात को वरदान मिल गया – डबल लाइट। मुरली द्वारा भी वरदान मिलते हैं ना।

सुनाया ना – आपकी इस दुनिया में यथा शक्ति, यथा समय होता है। यथा और तथा। और वतन में तो यथा-तथा की भाषा ही नहीं है। यहाँ दिन भी तो रात भी देखना पड़ता। वहाँ न दिन, न है रात; न सूर्य उदय होता, न चन्द्रमा। दोनों से परे है। आना तो वहाँ है ना। बच्चों ने रूहरिहान में कहा ना कि कब तक? बापदादा कहते हैं कि आप सभी कहो कि हम तैयार हैं तो ‘अभी’ कर लेंगे। फिर ‘कब’ का तो सवाल ही नहीं है। ‘कब’ तब तक है जब तक सारी माला तैयार नहीं हुई है। अभी नाम निकालने बैठते हो तो 108 में भी सोचते हो कि यह नाम डालें वा नहीं? अभी 108 की माला में भी सभी वही 108 नाम बोलें। नहीं, फर्क हो जायेगा। बापदादा तो अभी घड़ी ताली बजावे और ठकाठक शुरू हो जायेगी – एक तरफ प्रकृति, एक तरफ व्यक्तियाँ। क्या देरी लगती। लेकिन बाप का सभी बच्चों में स्नेह है। हाथ पकड़ेंगे, तब तो साथ चलेंगे। हाथ में हाथ मिलाना अर्थात् समान बनना। आप कहेंगे – सभी समान अथवा सभी तो नम्बरवन बनेंगे नहीं। लेकिन नम्बरवन के पीछे नम्बर टू होगा। अच्छा, बाप समान नहीं बनें लेकिन नम्बरवन दाना जो होगा वह समान होगा। तीसरा दो के समान बने। चौथा तीन के समान बने। ऐसे तो समान बनें, तो एक दो के समीप होते-होते माला तैयार हो। ऐसी स्टेज तक पहुँचना अर्थात् समान बनना। 108 दाना 107 से तो मिलेगा ना। उन जैसी विशेषता भी आ जाए तो भी माला तैयार हो जायेगी। नम्बरवार तो होना ही है। समझा? बाप तो कहते – अभी कोई है गैरन्टी करने वाला कि हाँ, सब तैयार हैं? बापदादा को तो सेकेण्ड लगता। दृश्य दिखाते थे ना – ताली बजाई और परियाँ आ गई। अच्छा।

चारों ओर के परम पूज्य श्रेष्ठ आत्माओं को, सर्व सम्पूर्ण पवित्रता के लक्ष्य तक पहुँचने वाले तीव्र पुरूषार्थी आत्माओं को, सदा हर कर्म में विधिपूर्वक कर्म करने वाले सिद्धि-स्वरूप आत्माओं को, सदा हर समय पवित्रता के श्रृंगार में सजी हुई विशेष आत्माओं को बापदादा का स्नेह सम्पन्न यादप्यार स्वीकार हो।

पार्टियों से मुलाकात

1. विश्व में सबसे ज्यादा श्रेष्ठ भाग्यवान अपने को समझते हो? सारा विश्व जिस श्रेष्ठ भाग्य के लिए पुकार रहा है कि हमारा भाग्य खुल जाए… आपका भाग्य तो खुल गया। इससे बड़ी खुशी की बात और क्या होगी! भाग्यविधाता ही हमारा बाप है – ऐसा नशा है ना! जिसका नाम ही भाग्यविधाता है उसका भाग्य क्या होगा! इससे बड़ा भाग्य कोई हो सकता है? तो सदा यह खुशी रहे कि भाग्य तो हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार हो गया। बाप के पास जो भी प्रापर्टी होती है, बच्चे उसके अधिकारी होते हैं। तो भाग्यविधाता के पास क्या है? भाग्य का खज़ाना। उस खज़ाने पर आपका अधिकार हो गया। तो सदैव ‘वाह मेरा भाग्य और भाग्य-विधाता बाप’! – यही गीत गाते खुशी में उड़ते रहो। जिसका इतना श्रेष्ठ भाग्य हो गया उसको और क्या चाहिए? भाग्य में सब कुछ आ गया। भाग्यवान के पास तन-मन-धन-जन सब कुछ होता है। श्रेष्ठ भाग्य अर्थात् अप्राप्त कोई वस्तु नहीं। कोई अप्राप्ति है? मकान अच्छा चाहिए, कार अच्छी चाहिए… नहीं। जिसको मन की खुशी मिल गई, उसे सर्व प्राप्तियाँ हो गई! कार तो क्या लेकिन कारून का खजाना मिल गया! कोई अप्राप्त वस्तु है ही नहीं। ऐसे भाग्यवान हो! विनाशी इच्छा क्या करेंगे। जो आज है, कल है ही नहीं – उसकी इच्छा क्या रखेंगे इसलिए, सदा अविनाशी खज़ाने की खुशियों में रहो जो अब भी है और साथ में भी चलेगा। यह मकान, कार वा पैसे साथ नहीं चलेंगे लेकिन यह अविनाशी खज़ाना अनेक जन्म साथ रहेगा। कोई छीन नहीं सकता, कोई लूट नहीं सकता। स्वयं भी अमर बन गये और खज़ाने भी अविनाशी मिल गये! जन्म-जन्म यह श्रेष्ठ प्रालब्ध साथ रहेगी। कितना बड़ा भाग्य है! जहाँ कोई इच्छा नहीं, इच्छा मात्रम् अविद्या है – ऐसा श्रेष्ठ भाग्य भाग्यविधाता बाप द्वारा प्राप्त हो गया।

2. अपने को बाप के समीप रहने वाली श्रेष्ठ आत्मायें अनुभव करते हो? बाप के बन गये – यह खुशी सदा रहती है? दु:ख की दुनिया से निकल सुख के संसार में आ गये। दुनिया दु:ख में चिल्ला रही है और आप सुख के संसार में, सुख के झूले में झूल रहे हो। कितना अन्तर है! दुनिया ढूंढ रही है और आप मिलन मना रहे हो। तो सदा अपनी सर्व प्राप्तियों को देख हर्षित रहो। क्या-क्या मिला है, उसकी लिस्ट निकालो तो बहुत लम्बी लिस्ट हो जायेगी। क्या-क्या मिला? तन में खुशी मिली, तो तन की तन्दरुस्ती है; मन में शान्ति मिली, तो शान्ति मन की विशेषता है और धन में इतनी शक्ति आई जो दाल-रोटी 36 प्रकार के समान अनुभव हो। ईश्वरीय याद में दाल-रोटी भी कितनी श्रेष्ठ लगती है! दुनिया के 36 प्रकार हों और आप की दाल-रोटी हो तो श्रेष्ठ क्या लगेगा? दाल-रोटी अच्छी है ना क्योंकि प्रसाद है ना। जब भोजन बनाते हो तो याद में बनाते हो, याद में खाते हो तो प्रसाद हो गया। प्रसाद का महत्व होता है। आप सभी रोज़ प्रसाद खाते हो। प्रसाद में कितनी शक्ति होती है! तो तन-मन-धन सभी में शक्ति आ गई इसलिए कहते हैं – अप्राप्त नहीं कोई वस्तु ब्राह्मणों के खजाने में। तो सदा इन प्राप्तियों को सामने रख खुश रहो, हर्षित रहो, अच्छा।

वरदान:- कर्म द्वारा गुणों का दान करने वाले डबल लाइट फरिश्ता भव
जो बच्चे कर्मणा द्वारा गुणों का दान करते हैं उनकी चलन और चेहरा दोनों ही फरिश्ते की तरह दिखाई देते हैं। वे डबल लाइट अर्थात् प्रकाशमय और हल्केपन की अनुभूति करते हैं। उन्हें कोई भी बोझ महसूस नहीं होता है। हर कर्म में मदद की महसूसता होती है। जैसे कोई शक्ति चला रही है। हर कर्म द्वारा महादानी बनने के कारण उन्हें सर्व की आशीर्वाद वा सर्व के वरदानों की प्राप्ति का अनुभव होता है।
स्लोगन:- सेवा में सफलता का सितारा बनो, कमजोर नहीं।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 23 JANUARY 2021 : AAJ KI MURLI

23-01-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – कदम-कदम पर श्रीमत पर चलते रहो, यह ब्रह्मा की मत है या शिवबाबा की, इसमें मूँझो नहीं”
प्रश्नः- अच्छी ब्रेन वाले बच्चे कौन सी गुह्य बात सहज ही समझ सकते हैं?
उत्तर:- ब्रह्मा बाबा समझा रहे हैं या शिवबाबा – यह बात अच्छी ब्रेन वाले सहज ही समझ लेंगे। कई तो इसमें ही मूँझ जाते हैं। बाबा कहते – बच्चे, बापदादा दोनों इकट्ठे हैं। तुम मूँझो नहीं। श्रीमत समझकर चलते रहो। ब्रह्मा की मत का रेसपॉन्सिबुल भी शिवबाबा है।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप बच्चों को समझा रहे हैं, तुम समझते हो हम ब्राह्मण ही रूहानी बाप को पहचानते हैं। दुनिया में कोई भी मनुष्यमात्र रूहानी बाप, जिसको गॉड फादर वा परमपिता परमात्मा कहते हैं, उनको जानते नहीं हैं। जब वह रूहानी बाप आये तब ही रूहानी बच्चों को पहचान दे। यह नॉलेज न सृष्टि के आदि में रहती, न सृष्टि के अन्त में रहती। अभी तुमको नॉलेज मिली है, यह है सृष्टि के अन्त और आदि का संगमयुग। इस संगमयुग को भी नहीं जानते तो बाप को कैसे जान सकेंगे। कहते हैं – हे पतित-पावन आओ, आकर पावन बनाओ, परन्तु यह पता नहीं है कि पतित-पावन कौन है और वह कब आयेंगे। बाप कहते हैं – मैं जो हूँ जैसा हूँ, मुझे कोई भी नहीं जानते। जब मैं आकर पहचान दूँ तब मुझे जानें। मैं अपना और सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का परिचय संगमयुग पर एक ही बार आकर देता हूँ। कल्प बाद फिर से आता हूँ। तुमको जो समझाता हूँ वह फिर प्राय: लोप हो जाता है। सतयुग से लेकर कलियुग अन्त तक कोई भी मनुष्य मात्र मुझ परमपिता परमात्मा को नहीं जानते हैं। न ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को जानते। मुझे मनुष्य ही पुकारते हैं। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर थोड़ेही पुकारते हैं। मनुष्य दु:खी होते हैं तब पुकारते हैं। सूक्ष्मवतन की तो बात ही नहीं। रूहानी बाप आकर अपने रूहानी बच्चों अर्थात् रूहों को बैठ समझाते हैं। अच्छा, रूहानी बाप का नाम क्या है? बाबा जिसको कहा जाता है, जरूर कुछ नाम होना चाहिए। बरोबर नाम एक ही गाते हैं शिव। यह नामीग्रामी है परन्तु मनुष्यों ने अनेक नाम रखे हैं। भक्ति मार्ग में अपनी ही बुद्धि से यह लिंग रूप बना दिया है। नाम फिर भी शिव है। बाप कहते हैं मैं एक बार आता हूँ। आकर मुक्ति-जीवनमुक्ति का वर्सा देता हूँ। मनुष्य भल नाम लेते हैं – मुक्तिधाम, निर्वाणधाम, परन्तु जानते कुछ नहीं हैं। न बाप को जानते हैं, न देवताओं को। यह किसको भी पता नहीं है बाप भारत में आकर कैसे राजधानी स्थापन करते हैं। शास्त्रों में भी ऐसी कोई बात नहीं है परमपिता परमात्मा कैसे आकर आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करते हैं। ऐसे नहीं सतयुग में देवताओं को ज्ञान था, जो गुम हो गया। नहीं, अगर देवताओं में भी यह ज्ञान होता तो चलता आता। इस्लामी, बौद्धी आदि जो हैं उन्हों का ज्ञान चलता आता है। सब जानते हैं – यह ज्ञान प्राय:लोप हो जाता है। मैं जब आता हूँ तो जो आत्मायें पतित बन राज्य गवाँ बैठी हैं उन्हों को आकर फिर पावन बनाता हूँ। भारत में राज्य था फिर गवाँया कैसे है, वह भी किसको पता नहीं इसलिए बाप कहते हैं बच्चों की कितनी तुच्छ बुद्धि बन गई है। मैं बच्चों को यह ज्ञान दे प्रालब्ध देता हूँ फिर सभी भूल जाते हैं। कैसे बाप आया, कैसे बच्चों को शिक्षा दी, वह सब भूल जाते हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है। बच्चों को विचार सागर मंथन करने की बड़ी बुद्धि चाहिए।

बाप कहते हैं यह जो शास्त्र आदि तुम पढ़ते आये हो यह सतयुग-त्रेता में नहीं पढ़ते थे। वहाँ थे ही नहीं। तुम यह नॉलेज भूल जाते हो फिर गीता आदि शास्त्र कहाँ से आया? जिन्होंने गीता सुनकर यह पद पाया है वही नहीं जानते तो और फिर कैसे जान सकते। देवतायें भी जान नहीं सकते। हम मनुष्य से देवता कैसे बनें। वह पुरुषार्थ का पार्ट ही बन्द हो गया। तुम्हारी प्रालब्ध शुरू हो गई। वहाँ यह नॉलेज हो कैसे सकती। बाप समझाते हैं यह नॉलेज तुमको फिर से मिल रही है, कल्प पहले मिसल। तुमको राजयोग सिखलाए प्रालब्ध दी जाती है। फिर वहाँ तो दुर्गति है नहीं। तो ज्ञान की बात भी नहीं उठ सकती। ज्ञान है ही सद्गति पाने के लिए। वह देने वाला एक बाप है। सद्गति और दुर्गति का अक्षर यहाँ से निकलता है। सद्गति को भारतवासी ही पाते हैं। समझते हैं हेविनली गॉड फादर ने हेविन रचा था। कब रचा? यह कुछ भी पता नहीं। शास्त्रों में लाखों वर्ष लिख दिया है। बाप कहते हैं – बच्चों, तुमको फिर से नॉलेज देता हूँ फिर यह नॉलेज खलास हो जाती है तो भक्ति शुरू होती है। आधाकल्प है ज्ञान, आधाकल्प है भक्ति। यह भी कोई नहीं जानते हैं। सतयुग की आयु ही लाखों वर्ष दे दी है। तो मालूम कैसे पड़े। 5 हज़ार वर्ष की बात भी भूल गये हैं। तो लाखों वर्ष की बात कैसे जान सकें। कुछ भी समझते नहीं। बाप कितना सहज समझाते हैं। कल्प की आयु 5 हज़ार वर्ष है। युग ही 4 हैं। चारों का इक्वल टाइम 1250 वर्ष है। ब्राह्मणों का यह मिडगेड युग है। बहुत छोटा है उन 4 युगों से। तो बाप भिन्न-भिन्न रीति से, नई-नई प्वाइंट्स सहज रीति बच्चों को समझाते रहते हैं। धारणा तुमको करनी है। मेहनत तुमको करनी है। ड्रामा अनुसार जो समझाता आया हूँ वह पार्ट चला आता है। जो बताने का था वही आज बता रहा हूँ। इमर्ज होता रहता है। तुम सुनते जाते हो। तुमको ही धारण करना और कराना है। मुझे तो धारण नहीं करना है। तुमको सुनाता हूँ, धारणा कराता हूँ। हमारी आत्मा में पार्ट है पतितों को पावन बनाने का। जो कल्प पहले समझाया था वही निकलता रहता है। मैं पहले से जानता नहीं था कि क्या सुनाऊंगा। भल इनकी सोल विचार सागर मंथन करती हो। यह विचार सागर मंथन कर सुनाते हैं या बाबा सुनाते हैं – यह बड़ी गुह्य बातें हैं, इसमें ब्रेन बड़ी अच्छी चाहिए। जो सर्विस में तत्पर होंगे उनका ही विचार सागर मंथन चलता होगा।

वास्तव में कन्यायें बंधनमुक्त होती हैं। वह इस रूहानी पढ़ाई में लग जाएं, बंधन तो कोई है नहीं। कुमारियां अच्छा उठा सकती हैं, उनको है ही पढ़ना और पढ़ाना। उनको कमाई करने की दरकार नहीं है। कुमारी अगर अच्छी रीति से यह नॉलेज समझ जाए तो सबसे अच्छी है। सेन्सीबुल होगी तो बस इस रूहानी कमाई में लग जायेगी। कई तो शौक से लौकिक पढ़ाई पढ़ती रहती हैं। समझाया जाता है – इससे कोई फायदा नहीं। तुम यह रूहानी पढ़ाई पढ़कर सर्विस में लग जाओ। वह पढ़ाई तो कोई काम की नहीं है। पढ़कर चले जाते हैं गृहस्थ व्यवहार में। गृहस्थी मातायें बन जाती हैं। कन्याओं को तो इस नॉलेज में लग जाना चाहिए। कदम-कदम श्रीमत पर चल धारणा में लग जाना है। मम्मा शुरू से आई और फिर इस पढ़ाई में लग गई, कितनी कुमारियां तो गुम हो गई। कुमारियों को अच्छा चांस है। श्रीमत पर चले तो बहुत फर्स्टक्लास हो जाएं। यह श्रीमत है वा ब्रह्मा की मत है – इसमें ही मूँझ पड़ते हैं। फिर भी यह बाबा का रथ है ना। इनसे कुछ भूल हो जाए, तुम श्रीमत पर चलते रहेंगे तो वह आपेही ठीक कर देंगे। श्रीमत मिलेगी भी इन द्वारा। सदैव समझना चाहिए श्रीमत मिलती है फिर कुछ भी हो – रेसपान्सिबुल खुद है। इनसे कुछ हो जाता है, बाबा कहते हैं मैं रेसपान्सिबुल हूँ। ड्रामा में यह राज़ नूँधा हुआ है। इनको भी सुधार सकते हैं। फिर भी बाप है ना। बापदादा दोनों इकट्ठे हैं तो मूँझ पड़ते हैं। पता नहीं शिवबाबा कहते हैं वा ब्रह्मा कहते हैं। अगर समझें शिवबाबा ही मत देते हैं तो कभी भी हिले नहीं। शिवबाबा जो समझाते हैं सो राइट ही है। तुम कहते हो बाबा आप ही हमारे बाप-टीचर-गुरू हो। तो श्रीमत पर चलना चाहिए ना। जो कहे उस पर चलो। हमेशा समझो शिवबाबा कहते हैं – वह है कल्याणकारी, इनकी रेसपान्सिबिल्टी भी उन पर है। उनका रथ है ना। मूँझते क्यों हो, पता नहीं यह ब्रह्मा की राय है या शिव की? तुम क्यों नहीं समझते हो शिवबाबा ही समझाते हैं। श्रीमत जो कहे सो करते रहो। दूसरे की मत पर तुम आते ही क्यों हो। श्रीमत पर चलने से कभी झुटका नहीं आयेगा। परन्तु चल नहीं सकते, मूँझ पड़ते हैं। बाबा कहते हैं तुम श्रीमत पर निश्चय रखो तो मैं रेसपान्सिबुल हूँ। तुम निश्चय ही नहीं रखते हो तो फिर मैं भी रेसपान्सिबुल नहीं। हमेशा समझो श्रीमत पर चलना ही है। वह जो कहे, चाहे प्यार करो, चाहे मारो….. यह उनके लिए गायन है। इसमें लात आदि मारने की तो बात नहीं है। परन्तु किसको निश्चय बैठना ही बड़ा मुश्किल है। निश्चय पूरा बैठ जाए तो कर्मातीत अवस्था हो जाए। लेकिन वह अवस्था आने में भी टाइम चाहिए। वह होगी अन्त में, इसमें निश्चय बड़ा अडोल चाहिए। शिवबाबा से तो कभी कोई भूल हो न सके, इनसे हो सकती है। यह दोनों हैं इकट्ठे। परन्तु तुमको निश्चय भी रखना है – शिवबाबा समझाते हैं, उस पर हमको चलना पड़े। तो बाबा की श्रीमत समझकर चलते चलो। तो उल्टा भी सुल्टा हो जायेगा। कहाँ मिसअन्डरस्टैंडिंग भी हो जाती है। शिवबाबा और ब्रह्मा बाबा की मुरली को भी बड़ा अच्छी रीति समझना है। बाबा ने कहा व इसने कहा। ऐसे नहीं कि ब्रह्मा बोलते ही नहीं है। परन्तु बाबा ने समझाया है – अच्छा, समझो यह ब्रह्मा कुछ नहीं जानते, शिवबाबा ही सब कुछ सुनाते हैं। शिवबाबा के रथ को स्नान कराता हूँ, शिवबाबा के भण्डारे की सर्विस करता हूँ – यह याद रहे तो भी बहुत अच्छा है। शिवबाबा की याद में रहते कुछ भी करे तो बहुतों से तीखे जा सकते हैं। मुख्य बात है ही शिवबाबा के याद की। अल्फ और बे। बाकी है डिटेल।

बाप जो समझाते हैं उस पर अटेन्शन देना है। बाप ही पतित-पावन, ज्ञान का सागर है ना। वही पतित शूद्रों को आकर ब्राह्मण बनाते हैं। ब्राह्मणों को ही पावन बनाते हैं, शूद्रों को पावन नहीं बनाते, यह सब बातें कोई भागवत आदि में नहीं हैं। थोड़े-थोड़े अक्षर हैं। मनुष्यों को तो यह भी पता नहीं है कि राधे-कृष्ण ही लक्ष्मी-नारायण हैं। मूँझ जाते हैं। देवतायें तो हैं ही सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी। लक्ष्मी-नारायण की डिनायस्टी, सीता-राम की डिनायस्टी। बाप कहते हैं भारतवासी स्वीट चिल्ड्रेन याद करो, लाखों वर्ष की तो बात ही नहीं है। कल की बात है। तुमको राज्य दिया था। इतना अकीचार (अथाह) धन दौलत दिया। बाप ने सारे विश्व का तुमको मालिक बनाया, और कोई खण्ड थे नहीं, फिर तुमको क्या हुआ! विद्वान, आचार्य, पण्डित कोई भी इन बातों को नहीं जानते। बाप ही कहते हैं – अरे भारतवासियों, तुमको राज्य-भाग्य दिया था ना। तुम भी कहेंगे शिवबाबा कहते हैं – इतना तुमको धन दिया फिर तुमने कहाँ गँवा दिया! बाप का वर्सा कितना जबरदस्त है। बाप ही पूछते हैं ना वा बाप चला जाता है तो मित्र-सम्बन्धी पूछते हैं। बाप ने तुमको इतने पैसे दिये सब कहाँ गँवायें! यह तो बेहद का बाप है। बाप ने कौड़ी से हीरे जैसा बनाया। इतना राज्य दिया फिर पैसा कहाँ गया? तुम क्या जवाब देंगे? किसको भी समझ में नहीं आता है। तुम समझते हो बाबा पूछते ठीक हैं – इतने कंगाल कैसे बने हो! पहले सब कुछ सतोप्रधान था फिर कला कम होती गई तो सब कुछ कम होता गया। सतयुग में तो सतोप्रधान थे, लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। राधे-कृष्ण से लक्ष्मी-नारायण का नाम जास्ती है। उन्हों की कोई ग्लानि नहीं लिखी है और सबके लिए निंदा लिखी है। लक्ष्मी-नारायण के राज्य में कोई दैत्य आदि नहीं बताते हैं। तो यह बातें समझने की हैं। बाबा ज्ञान धन से झोली भर रहे हैं। बाप कहते हैं बच्चे इस माया से खबरदार रहो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉनिंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सेन्सीबुल बन सच्ची सेवा में लग जाना है। जवाबदार एक बाप है इसलिए श्रीमत में संशय नहीं उठाना है। निश्चय में अडोल रहना है।

2) विचार सागर मंथन कर बाप की हर समझानी पर अटेन्शन देना है। स्वयं ज्ञान को धारण कर दूसरों को सुनाना है।

वरदान:- अपने प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा बाप को प्रत्यक्ष करने वाले श्रेष्ठ तकदीरवान भव
कोई भी बात को स्पष्ट करने के लिए अनेक प्रकार के प्रमाण दिये जाते हैं। लेकिन सबसे श्रेष्ठ प्रमाण प्रत्यक्ष प्रमाण है। प्रत्यक्ष प्रमाण अर्थात् जो हो, जिसके हो उसकी स्मृति में रहना। जो बच्चे अपने यथार्थ वा अनादि स्वरूप में स्थित रहते हैं वही बाप को प्रत्यक्ष करने के निमित्त हैं। उनके भाग्य को देखकर भाग्य बनाने वाले की याद स्वत: आती है।
स्लोगन:- अपने रहम की दृष्टि से हर आत्मा को परिवर्तन करने वाले ही पुण्य आत्मा हैं।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 22 JANUARY 2021 : AAJ KI MURLI

22-01-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम बाप के पास आये हो रिफ्रेश होने, बाप और वर्से को याद करो तो सदा रिफ्रेश रहेंगे”
प्रश्नः- समझदार बच्चों की मुख्य निशानी क्या होगी?
उत्तर:- जो समझदार हैं उन्हें अपार खुशी होगी। अगर खुशी नहीं तो बुद्धू हैं। समझदार अर्थात् पारसबुद्धि बनने वाले। वह दूसरों को भी पारसबुद्धि बनायेंगे। रूहानी सर्विस में बिजी रहेंगे। बाप का परिचय देने बिगर रह नहीं सकेंगे।

ओम् शान्ति। बाप बैठ समझाते हैं, यह दादा भी समझते हैं क्योंकि बाप बैठ दादा द्वारा समझाते हैं। तुम जैसे समझते हो वैसे दादा भी समझते हैं। दादा को भगवान नहीं कहा जाता। यह है भगवानुवाच। बाप मुख्य क्या समझाते हैं कि देही-अभिमानी बनो। यह क्यों कहते हैं? क्योंकि अपने को आत्मा समझने से हम पतित-पावन परमपिता परमात्मा से पावन बनने वाले हैं। यह बुद्धि में ज्ञान है। सबको समझाना है, पुकारते भी हैं कि हम पतित हैं। नई दुनिया पावन जरूर ही होगी। नई दुनिया बनाने वाला, स्थापन करने वाला बाप है। उनको ही पतित-पावन बाबा कह बुलाते हैं। पतित-पावन, साथ में उनको बाप कहते हैं। बाप को आत्मायें बुलाती हैं। शरीर नहीं बुलायेगा। हमारी आत्मा का बाप पारलौकिक है, वही पतित-पावन है। यह तो अच्छी रीति याद रहना चाहिए। यह नई दुनिया है या पुरानी दुनिया है, यह समझ तो सकते हैं ना। ऐसे भी बुद्धू हैं, जो समझते हैं हमको सुख अपार हैं। हम तो जैसे स्वर्ग में बैठे हैं। परन्तु यह भी समझना चाहिए कि कलियुग को कभी स्वर्ग कह नहीं सकते। नाम ही है कलियुग, पुरानी पतित दुनिया। अन्तर है ना। मनुष्यों की बुद्धि में यह भी नहीं बैठता है। बिल्कुल ही जड़जड़ीभूत अवस्था है। बच्चे नहीं पढ़ते हैं तो कहते हैं ना कि तुम तो पत्थरबुद्धि हो। बाबा भी लिखते हैं तुम्हारे गांव निवासी तो बिल्कुल पत्थरबुद्धि हैं। समझते नहीं हैं क्योंकि दूसरों को समझाते नहीं हैं। खुद पारसबुद्धि बनते हैं तो दूसरे को भी बनाना चाहिए। पुरुषार्थ करना चाहिए। इसमें लज्जा आदि की तो बात ही नहीं। परन्तु मनुष्यों की बुद्धि में आधाकल्प उल्टे अक्षर पड़े हैं तो वह भूलते नहीं हैं। कैसे भुलायें? भुलवाने की ताकत भी तो एक बाप के पास ही है। बाप बिगर यह ज्ञान तो कोई दे नहीं सकते। गोया सब अज्ञानी ठहरे। उनका ज्ञान फिर कहाँ से आये! जब तक ज्ञान सागर बाप आकर न सुनाये। तमोप्रधान माना ही अज्ञानी दुनिया। सतोप्रधान माना दैवी दुनिया। फ़र्क तो है ना। देवी-देवतायें ही पुनर्जन्म लेते हैं। समय भी फिरता रहता है। बुद्धि भी कमजोर होती जाती है। बुद्धि का योग लगाने से जो ताकत मिले वह फिर खलास हो जाती है।

अभी तुमको बाप समझाते हैं तो तुम कितने रिफ्रेश होते हो। तुम रिफ्रेश थे और विश्राम में थे। बाप भी लिखते हैं ना – बच्चों आकर रिफ्रेश भी हो जाओ और विश्राम भी पाओ। रिफ्रेश होने बाद तुम सतयुग में विश्रामपुरी में जाते हो। वहाँ तुमको बहुत विश्राम मिलता है। वहाँ सुख-शान्ति-सम्पत्ति आदि सब कुछ तुमको मिलता है। तो बाबा के पास आते हैं रिफ्रेश होने, विश्राम पाने। रिफ्रेश भी शिवबाबा करते हैं। विश्राम भी बाबा के पास लेते हो। विश्राम माना शान्त। थक कर विश्रामी होते हैं ना! कोई कहाँ, कोई कहाँ जाते हैं विश्राम पाने। उसमें तो रिफ्रेशमेन्ट की बात ही नहीं। यहाँ तुमको बाप रोज़ समझाते हैं तो तुम यहाँ आकर रिफ्रेश होते हो। याद करने से तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बनते हो। सतोप्रधान बनने के लिए ही तुम यहाँ आते हो। उसके लिए क्या पुरुषार्थ है? मीठे-मीठे बच्चे बाप को याद करो। बाप ने सारी शिक्षा तो दी है। यह सृष्टि चक्र कैसे फिरता है, तुमको विश्राम कैसे मिलता है। और कोई भी यह बातें नहीं जानते तो उन्हों को भी समझाना चाहिए, ताकि वह भी तुम जैसा रिफ्रेश हो जाए। अपना फ़र्ज ही यह है, सबको पैगाम देना। अविनाशी रिफ्रेश होना है। अविनाशी विश्राम पाना है। सबको यह पैगाम दो। यही याद दिलाना है कि बाप को और वर्से को याद करो। है तो बहुत सहज बात। बेहद का बाप स्वर्ग रचते हैं। स्वर्ग का ही वर्सा देते हैं। अभी तुम हो संगमयुग पर। माया के श्राप और बाप के वर्से को तुम जानते हो। जब माया रावण का श्राप मिलता है तो पवित्रता भी खत्म, सुख-शान्ति भी खत्म, तो धन भी खत्म हो जाता है। कैसे धीरे-धीरे खत्म होता है – वह भी बाप ने समझाया है। कितने जन्म लगते हैं, दु:खधाम में कोई विश्राम थोड़ेही होता है। सुखधाम में विश्राम ही विश्राम है। मनुष्यों को भक्ति कितना थकाती है। जन्म-जन्मान्तर भक्ति थका देती है। कंगाल कर देती है। यह भी अब तुमको बाप समझाते हैं। नये-नये आते हैं तो कितना समझाया जाता है। हर एक बात पर मनुष्य बहुत सोच करते हैं। समझते हैं कहाँ जादू न हो। अरे तुम कहते हो जादूगर। तो मैं भी कहता हूँ – जादूगर हूँ। परन्तु जादू कोई वह नहीं है जो भेड़-बकरी आदि बना देंगे। जानवर तो नहीं हैं ना। यह बुद्धि से समझा जाता है। गायन भी है सुरमण्डल के साज से…. इस समय मनुष्य जैसे रिढ़ मिसल है। यह बातें यहाँ के लिए हैं। सतयुग में नहीं गाते, इस समय का ही गायन है। चण्डिका का कितना मेला लगता है। पूछो वह कौन थी? कहेंगे देवी। अब ऐसा नाम तो वहाँ होता नहीं। सतयुग में तो सदैव शुभ नाम होता है। श्री रामचन्द्र, श्रीकृष्ण.. श्री कहा जाता है श्रेष्ठ को। सतयुगी सम्प्रदाय को श्रेष्ठ कहा जाता है। कलियुगी विशश सम्प्रदाय को श्रेष्ठ कैसे कहेंगे। श्री माना श्रेष्ठ। अभी के मनुष्य तो श्रेष्ठ है नहीं। गायन भी है मनुष्य से देवता……फिर देवता से मनुष्य बनते हैं क्योंकि 5 विकारों में जाते हैं। रावण राज्य में सब मनुष्य ही मनुष्य हैं। वहाँ हैं देवतायें। उनको डीटी वर्ल्ड, इसको ह्युमन वर्ल्ड कहा जाता है। डीटी वर्ल्ड को दिन कहा जाता है। ह्युमन वर्ल्ड को रात कहा जाता है। दिन सोझरे को कहा जाता है। रात अज्ञान अन्धियारे को कहा जाता है। इस फ़र्क को तुम जानते हो। तुम समझते हो हम पहले कुछ भी नहीं जानते थे। अभी सब बातें बुद्धि में हैं। ऋषि-मुनियों से पूछते हैं रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त को जानते हो तो वह भी नेती-नेती कर गये। हम नहीं जानते। अभी तुम समझते हो हम भी पहले नास्तिक थे। बेहद के बाप को नहीं जानते थे। वह है असुल अविनाशी बाबा, आत्माओं का बाबा। तुम बच्चे जानते हो हम उस बेहद के बाप के बने हैं, जो कभी जलते नहीं हैं। यहाँ तो सब जलते हैं, रावण को भी जलाते हैं। शरीर है ना। फिर भी आत्मा को तो कभी कोई जला नहीं सकते। तो बच्चों को बाप यह गुप्त ज्ञान सुनाते हैं, जो बाप के पास ही है। यह आत्मा में गुप्त ज्ञान है। आत्मा भी गुप्त है। आत्मा इस मुख द्वारा बोलती है इसलिए बाप कहते हैं – बच्चे, देह-अभिमानी मत बनो। आत्म-अभिमानी बनो। नहीं तो जैसे उल्टे बन जाते हो। अपने को आत्मा भूल जाते हो। ड्रामा के राज़ को भी अच्छी रीति समझना है। ड्रामा में जो नूँध है वह हूबहू रिपीट होता है। यह किसको पता नहीं है। ड्रामा अनुसार सेकेण्ड बाई सेकेण्ड कैसे चलता रहता है, यह भी नॉलेज बुद्धि में है। आसमान का कोई भी पार नहीं पा सकते हैं। धरती का पा सकते हैं। आकाश सूक्ष्म है, धरती तो स्थूल है। कई चीजों का पार पा नहीं सकते। जबकि कहते भी हैं आकाश ही आकाश, पाताल ही पाताल है। शास्त्रों में सुना है ना, तो ऊपर में भी जाकर देखते हैं। वहाँ भी दुनिया बसाने की कोशिश करते हैं। दुनिया बसाई तो बहुत है ना। भारत में सिर्फ एक ही देवी-देवता धर्म था और खण्ड आदि नहीं था फिर कितना बसाया है। तुम विचार करो। भारत के भी कितने थोड़े टुकड़े में देवतायें होते हैं। जमुना का कण्ठा होता है। देहली परिस्तान थी, इसको कब्रिस्तान कहा जाता है, जहाँ अकाले मृत्यु होती रहती है। अमरलोक को परिस्तान कहा जाता है। वहाँ बहुत नैचुरल ब्युटी होती है। भारत को वास्तव में परिस्तान कहते थे। यह लक्ष्मी-नारायण परिस्तान के मालिक हैं ना। कितने शोभावान हैं। सतोप्रधान हैं ना। नेचुरल ब्युटी थी। आत्मा भी चमकती रहती है। बच्चों को दिखाया था कृष्ण का जन्म कैसे होता है। सारे कमरे में ही जैसे चमत्कार हो जाता है। तो बाप बच्चों को बैठ समझाते हैं। अभी तुम परिस्तान में जाने के लिए पुरुषार्थ कर रहे हो। नम्बरवार तो जरूर चाहिए। एक जैसे सब हो न सके। विचार किया जाता है, इतनी छोटी आत्मा कितना बड़ा पार्ट बजाती है। शरीर से आत्मा निकल जाती है तो शरीर का क्या हाल हो जाता है। सारी दुनिया के एक्टर्स वही पार्ट बजाते हैं जो अनादि बना हुआ है। यह सृष्टि भी अनादि है। उसमें हर एक का पार्ट भी अनादि है। उनको तुम वन्डरफुल तब कहते हो जबकि जानते हो यह सृष्टि रूपी झाड़ है। बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं। ड्रामा में फिर भी जिसके लिए जितना समय है उतना समझने में समय लेते हैं। बुद्धि में फ़र्क है ना। आत्मा मन-बुद्धि सहित है ना तो कितना फ़र्क रहता है। बच्चों को मालूम पड़ता है हमको स्कालरशिप लेने की है। तो दिल अन्दर खुशी होती है ना। यहाँ भी अन्दर आने से ही एम ऑब्जेक्ट सामने देखने में आती है तो जरूर खुशी होगी ना! अभी तुम जानते हो यह बनने के लिए यहाँ पढ़ने आये हैं। नहीं तो कभी कोई आ न सके। यह है एम ऑब्जेक्ट। ऐसा कोई स्कूल कहाँ भी नहीं होगा जहाँ दूसरे जन्म की एम ऑब्जेक्ट को देख सके। तुम देख रहे हो यह स्वर्ग के मालिक हैं, हम ही यह बनने वाले हैं। हम अभी संगमयुग पर हैं। न उस राजाई के हैं, न इस राजाई के हैं। हम बीच में हैं, जा रहे हैं। खिवैया (बाप) भी है निराकार। बोट (आत्मा) भी है निराकार। बोट को खींचकर परमधाम में ले जाते हैं। इनकारपोरियल बाप इनकारपोरियल बच्चों को ले जाते हैं। बाप ही बच्चों को साथ में ले जायेंगे। यह चक्र पूरा होता है फिर हूबहू रिपीट करना है। एक शरीर छोड़ दूसरा लेंगे। छोटा बनकर फिर बड़ा बनेंगे। जैसे आम की गुठली को जमीन में डाल देते हैं तो उनसे फिर आम निकल आयेंगे। वह है हद का झाड़। यह मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ है, इनको वैरायटी झाड़ कहा जाता है। सतयुग से लेकर कलियुग तक सब पार्ट बजाते रहते हैं। अविनाशी आत्मा 84 के चक्र का पार्ट बजाती है। लक्ष्मी-नारायण थे जो अब नहीं हैं। चक्र लगाए अब फिर यह बनते हैं। कहेंगे पहले यह लक्ष्मी-नारायण थे फिर उन्हों का यह है लास्ट जन्म ब्रह्मा-सरस्वती। अभी सबको वापिस जरूर जाना है। स्वर्ग में तो इतने आदमी थे नहीं। न इस्लामी, न बौद्धी…. कोई भी धर्म वाले एक्टर्स नहीं थे, सिवाए देवी-देवताओं के। यह समझ भी कोई में नहीं है। समझदार को टाइटल मिलना चाहिए ना। जितना जो पढ़ता है नम्बरवार पुरुषार्थ से पद पाता है। तो तुम बच्चों को यहाँ आने से ही यह एम ऑब्जेक्ट देख खुशी होनी चाहिए। खुशी का तो पारावार नहीं। पाठशाला वा स्कूल हो तो ऐसा। है कितनी गुप्त, परन्तु जबरदस्त पाठशाला है। जितनी बड़ी पढ़ाई, उतना बड़ा कॉलेज। वहाँ सब फैसिलिटीज़ मिलती हैं। आत्मा को पढ़ना है फिर चाहे सोने के तख्त पर, चाहे लकड़ी के तख्त पर चढ़े। बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए क्योंकि शिव भगवानुवाच है ना। पहले नम्बर में है यह विश्व का प्रिन्स। बच्चों को अब पता पड़ा है। कल्प-कल्प बाप ही आकर अपना परिचय देते हैं। मैं इनमें प्रवेश कर तुम बच्चों को पढ़ा रहा हूँ। देवताओं में यह ज्ञान थोड़ेही होगा। ज्ञान से देवता बन गये फिर पढ़ाई की दरकार नहीं, इसमें बड़ी विशालबुद्धि चाहिए समझने की। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस पतित दुनिया का बुद्धि से संन्यास कर पुरानी देह और देह के सम्बन्धियों को भूल अपनी बुद्धि बाप और स्वर्ग तरफ लगानी है।

2) अविनाशी विश्राम का अनुभव करने के लिए बाप और वर्से की स्मृति में रहना है। सबको बाप का पैगाम दे रिफ्रेश करना है। रूहानी सर्विस में लज्जा नहीं करनी है।

वरदान:- सदा बाप के सम्मुख रह खुशी का अनुभव करने वाले अथक और आलस्य रहित भव
कोई भी प्रकार के संस्कार या स्वभाव को परिवर्तन करने में दिलशिकस्त होना या अलबेलापन आना भी थकना है, इससे अथक बनो। अथक का अर्थ है जिसमें आलस्य न हो। जो बच्चे ऐसे आलस्य रहित हैं वे सदा बाप के सम्मुख रहते और खुशी का अनुभव करते हैं। उनके मन में कभी दु:ख की लहर नहीं आ सकती इसलिए सदा सम्मुख रहो और खुशी का अनुभव करो।
स्लोगन:- सिद्धि स्वरूप बनने के लिए हर संकल्प में पुण्य और बोल में दुआयें जमा करते चलो।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 21 JANUARY 2021 : AAJ KI MURLI

21-01-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम यहाँ आये हो सर्वशक्तिमान् बाप से शक्ति लेने अर्थात् दीपक में ज्ञान का घृत डालने”
प्रश्नः- शिव की बरात का गायन क्यों है?
उत्तर:- क्योंकि शिवबाबा जब वापिस जाते हैं तो सभी आत्माओं का झुण्ड उनके पीछे-पीछे भागकर जाता है। मूलवतन में भी आत्माओं का मनारा (छत्ता) लग जाता है। तुम पवित्र बनने वाले बच्चे बाप के साथ-साथ जाते हो। साथ के कारण ही बरात का गायन है।

ओम् शान्ति। बच्चों को पहले-पहले एक ही प्वाइंट समझने की है कि हम सब भाई-भाई हैं और वह सबका बाप है। उनको सर्वशक्तिमान् कहा जाता है। तुम्हारे में सर्वशक्तियां थी। तुम विश्व पर राज्य करते थे। भारत में ही इन देवी-देवताओं का राज्य था। गोया तुम बच्चों का राज्य था। तुम पवित्र देवी-देवतायें थे, तुम्हारा कुल वा डिनायस्टी है, वह सब निर्विकारी थे। कौन निर्विकारी थे? आत्मायें। अब फिर तुम निर्विकारी बन रहे हो। जैसेकि सर्वशक्तिमान् बाप को याद कर उनसे शक्ति ले रहे हो। बाप ने समझाया है आत्मा ही 84 का पार्ट बजाती है। उनमें जो सतोप्रधान ताकत थी वह फिर दिन-प्रतिदिन कम होती जाती है। सतोप्रधान से तमोप्रधान बनना है। जैसे बैटरी की ताकत कम होती जाती है तो मोटर खड़ी हो जाती है। बैटरी डिस्चार्ज हो जाती है। आत्मा की बैटरी फुल डिस्चार्ज नहीं होती है, कुछ न कुछ ताकत रहती है। जैसे कोई मरता है तो दीपक जलाते हैं, उसमें घृत डालते रहते हैं कि ज्योति बुझ न जाए। बैटरी की ताकत कम होती है तो फिर चार्ज करने रखते हैं। अभी तुम बच्चे समझते हो – तुम्हारी आत्मा सर्वशक्तिमान् थी, अब फिर तुम सर्वशक्तिमान् बाप से अपना बुद्धियोग लगाते हो। तो बाबा की शक्ति हमारे में आ जाए क्योंकि शक्ति कम हो गई है। थोड़ी जरूर रहती है। एकदम खत्म हो जाए तो फिर शरीर न रहे। आत्मा बाप को याद करते-करते बिल्कुल प्योर हो जाती है। सतयुग में तुम्हारी बैटरी फुल चार्ज होती है फिर थोड़ी-थोड़ी कम होती जाती है। त्रेता तक मीटर कम होता है, जिसको कला कहा जाता है। फिर कहेंगे आत्मा जो सतोप्रधान थी वह सतो बनी, ताकत कम हो जाती है। तुम समझते हो हम मनुष्य से देवता बन जाते हैं सतयुग में। अब बाप कहते हैं – मुझे याद करो तो तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान बन जायेंगे। अभी तुम तमोप्रधान बन गये हो तो ताकत का देवाला निकल गया है। फिर बाप को याद करने से पूरी ताकत आयेगी, क्योंकि तुम जानते हो देह सहित देह के जो भी सब सम्बन्ध हैं, वह सब खत्म हो जाने हैं फिर तुमको बेहद का राज्य मिलता है। बाप भी बेहद का है तो वर्सा भी बेहद का देते हैं। अभी तुम पतित हो, तुम्हारी ताकत बिल्कुल कम होती गई है। हे बच्चों – अब तुम मुझे याद करो, मैं ऑलमाइटी हूँ, मेरे द्वारा ऑलमाइटी राज्य मिलता है। सतयुग में देवी-देवता सारे विश्व के मालिक थे, पवित्र थे, दैवी गुणवान थे। अभी वह दैवीगुण नहीं हैं। सबकी बैटरी पूरी डिस्चार्ज होने लगी है। फिर अब बैटरी भरती है। सिवाए परमपिता परमात्मा के साथ योग लगाने के बैटरी चार्ज नहीं हो सकती। वह बाप ही एवर प्योर है। यहाँ सब हैं इमप्योर। जब प्योर रहते हैं तो बैटरी चार्ज रहती है। तो अब बाप समझाते हैं एक को ही याद करना है। ऊंच ते ऊंच है भगवान। बाकी सब हैं रचना। रचना से रचना को कभी वर्सा नहीं मिलता है। क्रियेटर तो एक ही है। वह है बेहद का बाप। बाकी तो सब हैं हद के। बेहद के बाप को याद करने से बेहद की बादशाही मिलती है। तो बच्चों को दिल अन्दर समझना चाहिए – हमारे लिए बाबा नई दुनिया स्वर्ग की स्थापना कर रहे हैं। ड्रामा प्लैन अनुसार स्वर्ग की स्थापना हो रही है। तुम जानते हो – सतयुग आने वाला है। सतयुग में होता ही है सदा सुख। वह कैसे मिलता है? बाप बैठ समझाते हैं मामेकम् याद करो। मैं एवरप्योर हूँ। मैं कभी मनुष्य तन नहीं लेता हूँ। न दैवी तन, न मनुष्य तन लेता हूँ अर्थात् मैं जन्म-मरण में नहीं आता हूँ। सिर्फ तुम बच्चों को स्वर्ग की बादशाही देने लिए, जब यह 60 वर्ष की वानप्रस्थ अवस्था में होता है तब इनके तन में आता हूँ। यही पूरा सतोप्रधान से तमोप्रधान बना है। नम्बरवन ऊंच ते ऊंच भगवान फिर हैं सूक्ष्मवतनवासी ब्रह्मा-विष्णु-शंकर, जिसका साक्षात्कार होता है। सूक्ष्मवतन बीच का है ना। जहाँ शरीर नहीं हो सकते। सूक्ष्म शरीर सिर्फ दिव्य दृष्टि से देखा जाता है। मनुष्य सृष्टि तो यहाँ है। बाकी वह तो सिर्फ साक्षात्कार के लिए फरिश्ते हैं। तुम बच्चे भी अन्त में जब बिल्कुल पवित्र हो जाते हो तो तुम्हारा भी साक्षात्कार होता है। ऐसे फरिश्ते बन फिर सतयुग में यहाँ ही आकर स्वर्ग के मालिक बनेंगे। यह ब्रह्मा कोई विष्णु को याद नहीं करते हैं। यह भी शिवबाबा को याद करते हैं और यह विष्णु बनते हैं। तो यह समझना चाहिए ना। इन्होंने राज्य कैसे पाया! लड़ाई आदि तो कुछ भी होती नहीं। देवतायें हिंसा कैसे करेंगे!

अभी तुम बच्चे बाप को याद करके राजाई लेते हो। कोई माने न माने। गीता में भी है – हे बच्चों, देह सहित देह के सब धर्म छोड़ मामेकम् याद करो। उनको तो देह है नहीं जो ममत्व रखें। कहते हैं मैं थोड़े समय के लिए इनके शरीर का लोन लेता हूँ। नहीं तो मैं नॉलेज कैसे दूँ! मैं बीजरूप हूँ ना। इस सारे झाड़ की नॉलेज मेरे पास है। और किसको पता नहीं, सृष्टि की आयु कितनी है? कैसे इनकी स्थापना, पालना, विनाश होता है? मनुष्यों को तो पता होना चाहिए। मनुष्य ही पढ़ते हैं। जानवर तो नहीं पढ़ेंगे ना। वह पढ़ते हैं हद की पढ़ाई। बाप तुमको बेहद की पढ़ाई पढ़ाते हैं, जिससे तुमको बेहद का मालिक बनाते हैं। तो यह समझाना चाहिए कि भगवान किसी मनुष्य को अथवा देहधारी को नहीं कहा जाता। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को भी सूक्ष्म देह है ना। इन्हों का नाम ही अलग है, इनको भगवान नहीं कहा जाता। यह शरीर तो इस दादा की आत्मा का तख्त था। अकाल तख्त है ना। अभी यह अकालमूर्त बाप का तख्त है। अमृतसर में भी एक अकाल तख्त है ना। बड़े-बड़े जो होते हैं वहाँ अकाल तख्त पर जाकर बैठते हैं। अभी बाप समझाते हैं यह सब अकाल आत्माओं के तख्त हैं। आत्मा अकाल है जिसको काल खा न सके। बाकी तख्त तो बदलते रहते हैं। अकालमूर्त आत्मा इस तख्त पर बैठती है। पहले छोटा तख्त होता है फिर बड़ा हो जाता है। आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। आत्मा अकाल है। बाकी उनमें अच्छे वा बुरे संस्कार होते हैं तब तो कहा जाता है ना – कर्मों का यह फल है। आत्मा कभी विनाश नहीं होती है। आत्मा का बाप है एक। यह तो समझना चाहिए ना। यह बाबा कोई शास्त्रों की बात सुनाते हैं क्या! शास्त्र आदि पढ़ने से वापिस तो कोई जा नहीं सकते। पिछाड़ी में सब जायेंगे। जैसे टिड्डियों का अथवा मधुमक्खी का झुण्ड जाता है ना। मधुमक्खियों की भी क्वीन होती है। उनके पिछाड़ी सब जाते हैं। बाप भी जायेंगे तो उनके पिछाड़ी सब आत्मायें जायेंगी। वहाँ मूलवतन में जैसे सब आत्माओं का मनारा (छत्ता) है। यहाँ फिर है मनुष्यों का झुण्ड। तो यह झुण्ड भी एक दिन भागना है। बाप आकर सब आत्माओं को ले जाते हैं। शिव की बरात कहा जाता है। बच्चे कहो अथवा सजनियां कहो। बाप आकर बच्चों को पढ़ाकर याद की यात्रा सिखलाते हैं। पवित्र बनने बिगर तो आत्मा जा नहीं सकती। जब पवित्र बन जायेगी तब पहले-पहले शान्तिधाम जायेगी। वहाँ जाकर सब निवास करते हैं। वहाँ से फिर धीरे-धीरे आते रहते हैं, वृद्धि होती रहती है। तुम ही पहले-पहले भागेंगे बाप के पिछाड़ी। तुम्हारा बाप के साथ अथवा सजनियों का साजन के साथ योग है। राजधानी बननी है ना। सब इकट्ठे नहीं आते हैं। वहाँ सब आत्माओं की दुनिया है। वहाँ से फिर नम्बरवार आते हैं। झाड़ धीरे-धीरे वृद्धि को पाता है। पहले-पहले तो है आदि सनातन देवी-देवता धर्म, जो बाप स्थापन करते हैं। पहले-पहले हमको ब्राह्मण बनाते हैं। प्रजापिता ब्रह्मा है ना। प्रजा में भाई-बहिन हो जाते हैं। ब्रह्माकुमार और कुमारियां ढेर हैं। जरूर निश्चयबुद्धि होंगे तब तो इतने ढेर हुए हैं। ब्राह्मण कितने होंगे? कच्चे वा पक्के? कोई तो 99 मार्क्स लेते हैं, कोई 10 मार्क्स लेते हैं तो गोया कच्चे ठहरे ना। तुम्हारे में भी जो पक्के हैं वह जरूर पहले आयेंगे। कच्चे वाले पिछाड़ी में आयेंगे। यह पार्टधारियों की दुनिया है जो फिरती रहती है। सतयुग, त्रेता…. यह पुरुषोत्तम संगमयुग है। यह अभी बाप ने बताया है। पहले तो हम उल्टा ही समझते आये कि कल्प की आयु लाखों वर्ष है। अभी बाप ने बताया है यह तो पूरा 5 हज़ार वर्ष का चक्र है। आधाकल्प है राम का राज्य, आधाकल्प है रावण का राज्य। लाखों वर्ष का कल्प होता तो आधा-आधा भी हो न सके। दु:ख और सुख की यह दुनिया बनी हुई है। यह बेहद की नॉलेज बेहद के बाप से मिलती है। शिवबाबा के शरीर का कोई नाम नहीं है। यह शरीर तो इस दादा का है। बाबा कहाँ है? बाबा ने थोड़े समय के लिए लोन लिया है। बाबा कहते हैं हमको मुख तो चाहिए ना। यहाँ भी गऊमुख बनाया हुआ है। पहाड़ी से पानी तो जहाँ-तहाँ आता है। यहाँ फिर गऊ का मुख बना दिया है, उससे पानी आता है, उनको गंगाजल समझ लेते हैं। अब गंगा फिर कहाँ से आई? यह है सब झूठ। झूठी काया, झूठी माया, झूठा सब संसार। भारत जब स्वर्ग था तो सचखण्ड कहा जाता है फिर भारत ही पुराना बनता तो झूठखण्ड कहा जाता है। इस झूठखण्ड में जब सभी पतित बन जाते हैं तब बुलाते हैं – बाबा हमको पावन बनाए इस पुरानी दुनिया से ले चलो। बाप कहते हैं मेरे सब बच्चे काम चिता पर चढ़ काले बन गये हैं। बाप बच्चों को बैठ कहते हैं तुम तो स्वर्ग के मालिक थे ना! स्मृति आई है ना। बच्चों को समझाते हैं, सारी दुनिया को नहीं समझाते। तुमको ही समझाते हैं तो मालूम पड़े कि हमारा बाप कौन है!

इस दुनिया को कहा जाता है फॉरेस्ट ऑफ थॉर्नस। (कांटों का जंगल) सबसे बड़ा काम का कांटा लगाते हैं। भल यहाँ भगत भी बहुत हैं, वेजीटेरियन हैं, परन्तु ऐसे नहीं कि विकार में नहीं जाते हैं। ऐसे तो बहुत बाल ब्रह्मचारी भी रहते हैं। छोटेपन से ही कब छी-छी खाना आदि नहीं खाते हैं। संन्यासी भी कहते हैं – निर्विकारी बनो। वह हद का संन्यास मनुष्य कराते हैं। दूसरे जन्म में फिर गृहस्थी पास जन्म ले फिर घरबार छोड़ चले जाते हैं। सतयुग में यह कृष्ण आदि देवतायें कभी घरबार छोड़ते हैं क्या? नहीं। तो उन्हों का है हद का संन्यास। अभी तुम्हारा है बेहद का संन्यास। सारी दुनिया का, सम्बन्धियों आदि का भी संन्यास करते हो। तुम्हारे लिए अब स्वर्ग की स्थापना हो रही है। तुम्हारी बुद्धि स्वर्ग तरफ ही जायेगी। तो शिवबाबा को ही याद करना है। बेहद का बाप कहते हैं मुझे याद करो। मनमनाभव, मध्याजी भव। तो तुम देवता बन जायेंगे। यह वही गीता का एपीसोड है। संगमयुग भी है। मैं संगम पर ही सुनाता हूँ। राजयोग जरूर आगे जन्म में संगम पर सीखे होंगे। यह सृष्टि बदलती है ना, तुम पतित से पावन बन जाते हो। अब यह है पुरुषोत्तम संगमयुग, जबकि हम ऐसे तमोप्रधान से सतोप्रधान बनते हैं। हर एक बात अच्छी रीति समझकर निश्चय करनी चाहिए। यह कोई मनुष्य थोड़ेही कहते हैं। यह है श्रीमत अर्थात् श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ मत, भगवान की। बाकी सब हैं मनुष्य मत। मनुष्य मत से गिरते आते हो। अब श्रीमत से तुम चढ़ते हो। बाप मनुष्य से देवता बना देते हैं। दैवी मत स्वर्गवासी की है और वह है नर्कवासी मनुष्य मत, जिसको रावण मत कहा जाता है। रावण राज्य भी कोई कम नहीं है। सारी दुनिया पर रावण का राज्य है। यह बेहद की लंका है जिस पर रावण का राज्य है फिर देवताओं का पवित्र राज्य होगा। वहाँ बहुत सुख होता है। स्वर्ग की कितनी महिमा है। कहते भी हैं स्वर्ग पधारा। तो जरूर नर्क में था ना। हेल से गया तो जरूर फिर हेल में ही आयेगा ना! स्वर्ग अभी है कहाँ? यह बातें कोई शास्त्रों में नहीं हैं। अभी बाप तुम्हें सारी नॉलेज देते हैं। बैटरी भरती है। माया फिर लिंक तोड़ देती है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) मन-वचन-कर्म से पवित्र बन आत्मा रूपी बैटरी को चार्ज करना है। पक्का ब्राह्मण बनना है।

2) मनमत वा मनुष्य मत छोड़ एक बाप की श्रीमत पर चलकर स्वयं को श्रेष्ठ बनाना है। सतोप्रधान बन बाप के साथ उड़कर जाना है।

वरदान:- श्रीमत के आधार पर खुशी, शक्ति और सफलता का अनुभव करने वाले सर्व प्राप्ति सम्पन्न भव
जो बच्चे स्वयं को ट्रस्टी समझकर श्रीमत प्रमाण चलते हैं, श्रीमत में जरा भी मनमत या परमत मिक्स नहीं करते उन्हें निरन्तर खुशी, शक्ति और सफलता की अनुभूति होती है। पुरूषार्थ वा मेहनत कम होते भी प्राप्ति ज्यादा हो तब कहेंगे यथार्थ श्रीमत पर चलने वाले। परन्तु माया, ईश्वरीय मत में मनमत वा परमत को रायॅल रूप से मिक्स कर देती है इसलिए सर्व प्राप्तियों का अनुभव नहीं होता। इसके लिए परखने और निर्णय करने की शक्ति धारण करो तो धोखा नहीं खायेंगे।
स्लोगन:- बालक सो मालिक वह है जो तपस्या के बल से भाग्यविधाता बाप को अपना बना दे।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 20 JANUARY 2021 : AAJ KI MURLI

20-01-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – सारे कल्प का यह है सर्वोत्तम कल्याणकारी संगमयुग, इसमें तुम बच्चे याद की सैक्रीन से सतोप्रधान बनते हो”
प्रश्नः- अनेक प्रकार के प्रश्नों की उत्पत्ति का कारण तथा उन सबका निवारण क्या है?
उत्तर:- जब देह-अभिमान में आते हो तो संशय पैदा होता है और संशय उठने से ही अनेक प्रश्नों की उत्पत्ति हो जाती है। बाबा कहते मैंने तुम बच्चों को जो धन्धा दिया है – पतित से पावन बनो और बनाओ, इस धन्धे में रहने से सब प्रश्न खत्म हो जायेंगे।
गीत:- तुम्हें पाके हमने जहान पा लिया है….

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत सुना। यह किसने कहा मीठे-मीठे रूहानी बच्चे? जरूर रूहानी बाप ही कह सकते हैं। मीठे-मीठे रूहानी बच्चे अभी सम्मुख बैठे हैं और बाप बहुत प्यार से समझा रहे हैं। अब तुम जानते हो सिवाए रूहानी बाप के सर्व को सुख-शान्ति देने वा सर्व को इस दु:ख से लिबरेट करने वाला, दुनिया भर में और कोई मनुष्य हो नहीं सकता इसलिए दु:ख में बाप को याद करते रहते हैं। तुम बच्चे सम्मुख बैठे हो। जानते हो बाबा हमको सुखधाम के लायक बना रहे हैं। सदा सुखधाम का मालिक बनाने वाले बाप के सम्मुख आये हैं। अभी समझते हो सम्मुख सुनने और दूर रहकर सुनने में बहुत फ़र्क है। मधुबन में सम्मुख आते हो। मधुबन मशहूर है। मधुबन में उन्होंने कृष्ण का चित्र दिखाया है। परन्तु कृष्ण है नहीं। तुम बच्चे जानते हो – इसमें मेहनत लगती है। अपने को घड़ी-घड़ी आत्मा निश्चय करना है। मैं आत्मा बाप से वर्सा ले रही हूँ। बाप एक ही समय आता है सारे चक्र में। यह कल्प का सुहावना संगमयुग है। इसका नाम रखा है पुरुषोत्तम। यही संगमयुग है जिसमें सभी मनुष्य मात्र उत्तम बनते हैं। अभी तो सभी मनुष्यमात्र की आत्मायें तमोप्रधान हैं सो फिर सतोप्रधान बनती हैं। सतोप्रधान हैं तो उत्तम हैं। तमोप्रधान होने से मनुष्य भी कनिष्ट बनते हैं। तो अब बाप आत्माओं को सम्मुख बैठ समझाते हैं। सारा पार्ट आत्मा ही बजाती है, न कि शरीर। तुम्हारी बुद्धि में आ गया है कि हम आत्मा असुल में निराकारी दुनिया वा शान्तिधाम में रहने वाले हैं। यह किसको भी पता नहीं है। न खुद समझा सकते हैं। तुम्हारी बुद्धि का अब ताला खुला है। तुम समझते हो बरोबर आत्मायें परमधाम में रहती हैं। वह है इनकारपोरियल वर्ल्ड। यह है कारपोरियल वर्ल्ड। यहाँ हम सब आत्मायें, एक्टर्स पार्टधारी हैं। पहले-पहले हम पार्ट बजाने आते हैं, फिर नम्बरवार आते जाते हैं। सभी एक्टर्स इकट्ठे नहीं आ जाते। भिन्न-भिन्न प्रकार के एक्टर्स आते जाते हैं। सब इकट्ठे तब होते जब नाटक पूरा होता है। अभी तुमको पहचान मिली है, हम आत्मा असुल शान्तिधाम की रहवासी हैं, यहाँ आते हैं पार्ट बजाने। बाप सारा समय पार्ट बजाने नहीं आते हैं। हम ही पार्ट बजाते-बजाते सतोप्रधान से तमोप्रधान बन जाते हैं। अभी तुम बच्चों को सम्मुख सुनने से बड़ा मजा आता है। इतना मजा मुरली पढ़ने से नहीं आता। यहाँ सम्मुख हो ना।

तुम बच्चे समझते हो कि भारत गॉड-गॉडेज का स्थान था। अभी नहीं है। चित्र देखते हो, था जरूर। हम वहाँ के रहवासी थे – पहले-पहले हम देवता थे, अपने पार्ट को तो याद करेंगे कि भूल जायेंगे। बाप कहते हैं तुमने यहाँ यह पार्ट बजाया। यह ड्रामा है। नई दुनिया सो फिर जरूर पुरानी दुनिया होती है। पहले-पहले ऊपर से जो आत्मायें आती हैं, वो गोल्डन एज में आती हैं। यह सब बातें अभी तुम्हारी बुद्धि में हैं। तुम विश्व के मालिक महाराजा-महारानी थे। तुम्हारी राजधानी थी। अभी तो राजधानी है नहीं। अभी तुम सीख रहे हो, हम राजाई कैसे चलायेंगे! वहाँ वजीर होते नहीं। राय देने वाले की दरकार नहीं। वह तो श्रीमत द्वारा श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ बन जाते हैं। फिर इनको दूसरे कोई से राय लेने की दरकार नहीं है। अगर कोई से राय ले तो समझा जायेगा उनकी बुद्धि कमजोर है। अभी जो श्रीमत मिलती है, वह सतयुग में भी कायम रहती है। अभी तुम समझते हो पहले-पहले बरोबर इन देवी-देवताओं का आधाकल्प राज्य था। अब तुम्हारी आत्मा रिफ्रेश हो रही है। यह नॉलेज परमात्मा के सिवाए कोई भी आत्माओं को दे न सके।

अभी तुम बच्चों को देही-अभिमानी बनना है। शान्तिधाम से आकर यहाँ तुम टॉकी बने हो। टॉकी होने बिगर कर्म हो न सके। यह बड़ी समझने की बातें हैं। जैसे बाप में सारा ज्ञान है वैसे तुम्हारी आत्मा में भी ज्ञान है। आत्मा कहती है – हम एक शरीर छोड़ संस्कार अनुसार फिर दूसरा शरीर लेता हूँ। पुनर्जन्म भी जरूर होता है। आत्मा को जो भी पार्ट मिला हुआ है, वह बजाती रहती है। संस्कारों अनुसार दूसरा जन्म लेते रहते हैं। आत्मा की दिन-प्रतिदिन प्योरिटी की डिग्री कम होती जाती है। पतित अक्षर द्वापर से काम में लाते हैं। फिर भी थोड़ा सा फ़र्क जरूर पड़ता है। तुम नया मकान बनाओ, एक मास के बाद कुछ जरूर फ़र्क पड़ेगा। अभी तुम बच्चे समझते हो बाबा हमको वर्सा दे रहे हैं। बाप कहते हैं हम आये हैं तुम बच्चों को वर्सा देने। जितना जो पुरुषार्थ करेगा उतना पद पायेगा। बाप के पास कोई फ़र्क नहीं है। बाप जानते हैं हम आत्माओं को पढ़ाते हैं। आत्मा का हक है बाप से वर्सा लेने का, इसमें मेल-फीमेल की दृष्टि यहाँ नहीं रहती। तुम सब बच्चे हो। बाप से वर्सा ले रहे हो। सभी आत्मायें ब्रदर्स हैं, जिनको बाप पढ़ाते हैं, वर्सा देते हैं। बाप ही रूहानी बच्चों से बात करते हैं – हे लाडले मीठे सिकीलधे बच्चों, तुम बहुत समय पार्ट बजाते-बजाते अब फिर आकर मिले हो, अपना वर्सा लेने। यह भी ड्रामा में नूंध है। शुरू से लेकर पार्ट नूँधा हुआ है। तुम एक्टर्स पार्ट बजाते एक्ट करते रहते हो। आत्मा अविनाशी है, इसमें अविनाशी पार्ट नूँधा हुआ है। शरीर तो बदलता रहता है। बाकी आत्मा सिर्फ पवित्र से अपवित्र बनती है। पतित बनती है, सतयुग में है पावन। इसको कहा जाता है पतित दुनिया। जब देवताओं का राज्य था तो वाइसलेस वर्ल्ड थी। अभी नहीं है। यह खेल है ना। नई दुनिया सो पुरानी दुनिया, पुरानी दुनिया फिर नई दुनिया। अभी सुखधाम स्थापन होता है, बाकी सब आत्मायें मुक्तिधाम में रहेंगी। अभी यह बेहद का नाटक आकर पूरा हुआ है। सब आत्मायें मच्छरों मिसल जायेंगी। इस समय कोई भी आत्मा आये तो पतित दुनिया में उनकी क्या वैल्यु होगी। वैल्यु उनकी है जो पहले-पहले नई दुनिया में आते हैं। तुम जानते हो जो नई दुनिया थी वह फिर पुरानी बनी है। नई दुनिया में हम देवी-देवता थे। वहाँ दु:ख का नाम नहीं था। यहाँ तो अथाह दु:ख हैं। बाप आकर दु:ख की दुनिया से लिबरेट करते हैं। यह पुरानी दुनिया बदलनी जरूर है। तुम समझते हो बरोबर हम सतयुग के मालिक थे। फिर 84 जन्मों के बाद ऐसे बने हैं। अब फिर बाप कहते हैं मुझे याद करो तो तुम स्वर्ग के मालिक बनेंगे। तो हम क्यों न अपने को आत्मा निश्चय करें और बाप को याद करें। कुछ तो मेहनत करनी होगी ना। राजाई पाना कोई सहज थोड़ेही है। बाप को याद करना है। यह माया का वण्डर है जो घड़ी-घड़ी तुमको भुला देती है। उसके लिए उपाय रचना चाहिए। ऐसे नहीं, मेरा बनने से याद जम जायेगी। बाकी पुरुषार्थ क्या करेंगे! नहीं। जब तक जीना है पुरुषार्थ करना है। ज्ञान अमृत पीते रहना है। यह भी समझते हो हमारा यह अन्तिम जन्म है। इस शरीर का भान छोड़ देही-अभिमानी बनना है। गृहस्थ व्यवहार में भी रहना है। पुरुषार्थ जरूर करना है। सिर्फ अपने को आत्मा निश्चय कर बाप को याद करो। त्वमेव माताश्च पिता….. यह सब है भक्ति मार्ग की महिमा। तुमको सिर्फ एक अल्फ को याद करना है। एक ही मीठी सैक्रीन है। और सब बातें छोड़ एक सैक्रीन (बाप) को याद करो। अभी तुम्हारी आत्मा तमोप्रधान बनी है, उनको सतोप्रधान बनाने के लिए याद की यात्रा में रहो। सबको यही बताओ बाप से सुख का वर्सा लो। सुख होता ही है सतयुग में। सुखधाम स्थापन करने वाला बाबा है। बाप को याद करना है बहुत सहज। परन्तु माया का आपोजीशन बहुत है इसलिए कोशिश कर मुझ बाप को याद करो तो खाद निकल जायेगी। सेकण्ड में जीवनमुक्ति गाया जाता है। हम आत्मा रूहानी बाप के बच्चे हैं। वहाँ के रहने वाले हैं। फिर हमको अपना पार्ट रिपीट करना है। इस ड्रामा के अन्दर सबसे जास्ती हमारा पार्ट है। सुख भी सबसे जास्ती हमको मिलेगा। बाप कहते हैं तुम्हारा देवी-देवता धर्म बहुत सुख देने वाला है और बाकी सब शान्तिधाम में ऑटोमेटिकली चले जायेंगे हिसाब-किताब चुक्तू कर। जास्ती विस्तार में हम क्यों जायें। बाप आते ही हैं सबको वापिस ले जाने। मच्छरों सदृश्य सबको ले जाते हैं। सतयुग में बहुत थोड़े होते हैं। यह सारी ड्रामा में नूँध है। शरीर खत्म हो जायेंगे। आत्मा जो अविनाशी है वह हिसाब-किताब चुक्तू कर चली जायेगी। ऐसे नहीं कि आत्मा आग में पड़ने से पवित्र होगी। आत्मा को याद रूपी योग अग्नि से ही पवित्र होना है। योग की अग्नि है यह। उन्होंने फिर नाटक बैठ बनाये हैं। सीता आग से पार हुई। आग से कोई थोड़ेही पावन होना है। बाप समझाते हैं तुम सब सीतायें इस समय पतित हो। रावण के राज्य में हो। अब एक बाप की याद से तुमको पावन बनना है। राम एक ही है। अग्नि अक्षर सुनने से समझते हैं – आग से पार हुई। कहाँ योग अग्नि, कहाँ वह। आत्मा परमपिता परमात्मा से योग रखने से ही पतित से पावन होगी। रात-दिन का फ़र्क है। हेल में सब सीतायें रावण की जेल में शोक वाटिका में हैं। यहाँ का सुख तो काग विष्टा के समान है। भेंट की जाती है। स्वर्ग के सुख तो अथाह हैं।

तुम आत्माओं की अभी शिव साजन के साथ सगाई हुई है। तो आत्मा फीमेल हुई ना! शिवबाबा कहते हैं सिर्फ मुझे याद करो तो तुम पावन बन जायेंगे। शान्तिधाम जाए फिर सुखधाम में आ जायेंगे। तो बच्चों को ज्ञान रत्नों से झोली भरनी चाहिए। कोई भी प्रकार का संशय नहीं ले आना चाहिए। देह-अभिमान में आने से फिर अनेक प्रकार के प्रश्न उठते हैं। फिर बाप जो धन्धा देते हैं वह करते नहीं हैं। मूल बात है हमको पतित से पावन बनना है। दूसरी बातें छोड़ देनी चाहिए। राजधानी की जैसी रस्म-रिवाज होगी वह चलेगी। जैसे महल बनाये होंगे वैसे बनायेंगे। मूल बात है पवित्र बनने की। बुलाते भी हैं हे पतित-पावन….. पावन बनने से सुखी बन जायेंगे। सबसे पावन हैं देवी-देवतायें।

अभी तुम 21 जन्म के लिए सर्वोत्तम पावन बनते हो। उसको कहा जाता है सम्पूर्ण निर्विकारी पावन। तो बाप जो श्रीमत देते हैं उस पर चलना चाहिए। कोई भी संकल्प उठाने की दरकार नहीं। पहले हम पतित से पावन तो बनें। पुकारते भी हैं – हे पतित-पावन…. परन्तु समझते कुछ भी नहीं। यह भी नहीं जानते पतित-पावन कौन है? यह है पतित दुनिया, वह है पावन दुनिया। मुख्य बात है ही पावन बनने की। पावन कौन बनायेंगे? यह कुछ भी पता नहीं। पतित-पावन कह बुलाते हैं परन्तु बोलो, तुम पतित हो तो बिगड़ पड़ेंगे। अपने को विकारी कोई भी समझते नहीं। कहते हैं गृहस्थी में तो सब थे। राधे-कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण को भी बच्चे थे ना। वहाँ योगबल से बच्चे पैदा होते हैं, यह भूल गये हैं। उनको वाइसलेस वर्ल्ड स्वर्ग कहा जाता है। वह है शिवालय। बाप कहते हैं पतित दुनिया में एक भी पावन नहीं। यह बाप तो बाप, टीचर और सतगुरू है जो सबको सद्गति देते हैं। वह तो एक गुरू चला गया तो फिर बच्चे को गद्दी देंगे। अब वह कैसे सद्गति में ले जायेंगे? सर्व का सद्गति दाता है ही एक। सतयुग में सिर्फ देवी-देवता होते हैं। बाकी इतनी सब आत्मायें शान्तिधाम में चली जायेंगी। रावण राज्य से छूट जाते हैं। बाप सबको पवित्र बनाकर ले जाते हैं। पावन से फिर फट से कोई पतित नहीं बनते हैं। नम्बरवार उतरते हैं, सतोप्रधान से सतो, रजो, तमो….. तुम्हारी बुद्धि में 84 जन्मों का चक्र बैठा है। तुम जैसे अब लाइट हाउस हो। ज्ञान से इस चक्र को जान गये हो कि यह चक्र कैसे फिरता है। अभी तुम बच्चों को और सबको रास्ता बताना है। सब नईयाएं हैं, तुम पाइलेट हो, रास्ता बताने वाले। सबको बोलो आप शान्तिधाम, सुखधाम को याद करो। कलियुग दु:खधाम को भूल जाओ। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) जब तक जीना है ज्ञान अमृत पीते रहना है। अपनी झोली ज्ञान रत्नों से भरनी है। संशय में आकर कोई प्रश्न नहीं उठाने हैं।

2) योग अग्नि से आत्मा रूपी सीता को पावन बनाना है। किसी बात के विस्तार में जास्ती न जाकर देही-अभिमानी बनने की मेहनत करनी है। शान्तिधाम और सुखधाम को याद करना है।

वरदान:- देही-अभिमानी स्थिति में स्थित हो सदा विशेष पार्ट बजाने वाले सन्तुष्टमणि भव
जो बच्चे विशेष पार्टधारी हैं उनकी हर एक्ट विशेष होती, कोई भी कर्म साधारण नहीं होता। साधारण आत्मा कोई भी कर्म देह-अभिमानी होकर करेगी और विशेष आत्मा देही-अभिमानी बनकर करेगी। जो देही-अभिमानी स्थिति में स्थित रहकर कर्म करते हैं वे स्वयं भी सदा सन्तुष्ट रहते हैं और दूसरों को भी सन्तुष्ट करते हैं इसलिए उन्हें सन्तुष्टमणि का वरदान स्वत: प्राप्त हो जाता है।
स्लोगन:- प्रयोगी आत्मा बन योग के प्रयोग से सर्व खजानों को बढ़ाते चलो।
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