Daily Gyan Murli : Hindi

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 22 NOVEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 22 November 2019

22-11-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – इस समय निराकार बाप साकार में आकर तुम्हारा श्रृंगार करते हैं, अकेला नहीं”
प्रश्नः- तुम बच्चे याद की यात्रा में क्यों बैठते हो?
उत्तर:- 1. क्योंकि तुम जानते हो इस याद से ही हमें बहुत बड़ी आयु मिलती है, हम निरोगी बनते हैं। 2. याद करने से हमारे पाप कटते हैं। हम सच्चा सोना बन जाते हैं। आत्मा से रजो-तमो की खाद निकल जाती है, वह कंचन बन जाती है। 3. याद से ही तुम पावन दुनिया के मालिक बन जायेंगे। 4. तुम्हारा श्रृंगार होगा। 5. तुम बहुत धनवान बन जायेंगे। यह याद ही तुम्हें पद्मापद्म भाग्यशाली बनाती है।

ओम् शान्ति। रूहानी बच्चों को रूहानी बाप समझा रहे हैं। यहाँ बैठ तुम क्या करते हो? ऐसे नहीं, सिर्फ शान्ति में बैठे हो। अर्थ सहित ज्ञानमय अवस्था में बैठे हो। तुम बच्चों को ज्ञान है-बाप को हम क्यों याद करते हैं। बाप हमको बहुत बड़ी आयु देते हैं। बाप को याद करने से हमारे पाप कट जायेंगे। हम सच्चा सोना सतोप्रधान बन जायेंगे। तुम्हारा कितना श्रृंगार होता है। तुम्हारी आयु बड़ी हो जायेगी। आत्मा कंचन हो जायेगी। अब आत्मा में खाद पड़ी हुई है। याद की यात्रा से वह सब खाद जो रजो-तमो की पड़ी है वह सब निकल जायेगी। इतना तुमको फायदा होता है। फिर आयु बड़ी हो जायेगी। तुम स्वर्ग के निवासी बन जायेंगे और बहुत धनवान बनेंगे। तुम पद्मापद्म भाग्यशाली बन जायेंगे इसलिए बाप कहते हैं मनमनाभव, मामेकम् याद करो। कोई देहधारी के लिए नहीं कहते। बाप को तो शरीर है नहीं। तुम्हारी आत्मा भी निराकार थी। फिर पुनर्जन्म में आते-आते पारसबुद्धि से पत्थरबुद्धि बन गई है। अब फिर कंचन बनना है। अभी तुम पवित्र बन रहे हो। पानी के स्नान तो जन्म-जन्मान्तर किये। समझा हम इससे पावन बनेंगे परन्तु पावन बनने बदले और ही पतित बन नुकसान में पड़े हो क्योंकि यह है ही झूठी माया, झूठ बोलने के संस्कार हैं सबके। बाप कहते हैं मैं तुमको पावन बनाकर जाता हूँ फिर तुमको पतित कौन बनाता? अभी तुम फील करते हो ना। कितना गंगा स्नान करते आये परन्तु पावन तो बने नहीं। पावन बनकर तो पावन दुनिया में जाना पड़े। शान्तिधाम और सुखधाम है पावन धाम। यह तो है ही रावण की दुनिया, इसको दु:खधाम कहा जाता है। यह तो सहज समझने की बात है ना। इसमें कोई मुश्किलात ही नहीं। न किसको सुनाने में मुश्किलात है। जब कोई मिले तो सिर्फ यह बोलो अपने को आत्मा समझ बेहद के बाप को याद करो। आत्माओं का बाप है परमपिता परमात्मा शिव। हरेक के शरीर का तो अलग-अलग बाप होता है। आत्माओं का तो एक ही बाप है। कितना अच्छी रीति समझाते हैं और हिन्दी में ही समझाते हैं। हिन्दी भाषा ही मुख्य है। तुम पद्मापद्म भाग्यशाली इन देवी-देवताओं को कहेंगे ना। यह कितने भाग्यशाली हैं। यह किसको भी पता नहीं है कि यह स्वर्ग के मालिक कैसे बनें। अभी तुमको बाप सुना रहे हैं। इस सहज योग द्वारा इस पुरूषोत्तम संगम पर ही यह बनते हैं। अभी है पुरानी दुनिया और नई दुनिया का संगम। फिर तुम नई दुनिया के मालिक बन जायेंगे। अब बाप सिर्फ कहते हैं दो अक्षर अर्थ सहित याद करो। गीता में है मनमनाभव। अक्षर तो पढ़ते हैं परन्तु अर्थ बिल्कुल नहीं जानते। बाप कहते हैं मुझे याद करो क्योंकि मैं ही पतित-पावन हूँ, और कोई ऐसे कह न सकें। बाप ही कहते हैं मुझे याद करने से तुम पावन बन पावन दुनिया में चले जायेंगे। पहले-पहले तुम सतोप्रधान थे फिर पुनर्जन्म लेते-लेते तमोप्रधान बने हो। अब 84 जन्म बाद फिर तुम नई दुनिया में देवता बनते हो।

रचयिता और रचना दोनों को तुम जान गये हो। तो अभी तुम आस्तिक बन गये हो। आगे जन्म-जन्मान्तर तुम नास्तिक थे। यह बात जो बाप सुनाते हैं और कोई जानते ही नहीं। कहाँ भी जाओ, कोई भी तुमको यह बातें नहीं सुनायेंगे। अभी दोनों ही बाप तुम्हारा श्रृंगार कर रहे हैं। पहले तो बाप अकेले था। शरीर बिगर था। ऊपर बैठ तुम्हारा श्रृंगार कर न सके। कहते हैं ना – बत्त बारह (1 और 2 मिलकर 12 होते हैं) बाकी प्रेरणा वा शक्ति आदि की बात नहीं। ऊपर से प्रेरणा द्वारा मिल न सके। निराकार जब साकार शरीर का आधार लेते हैं तब तुम्हारा श्रृंगार करते हैं। समझते भी हैं-बाबा हमको सुखधाम में ले जाते हैं। ड्रामा के प्लैन अनुसार बाबा बंधायमान है, उनको ड्युटी मिली हुई है। हर 5 हज़ार वर्ष बाद आते हैं तुम बच्चों के लिए। इस योगबल से तुम कितने कंचन बनते हो। आत्मा और काया दोनों कंचन बनती है फिर छी-छी बनते हो। अभी तुम साक्षात्कार करते हो-इस पुरूषार्थ से हम ऐसा श्रृंगारा हुआ बनेंगे। वहाँ क्रिमिनल आई होती नहीं। तो भी अंग सब ढके हुए होते हैं। यहाँ तो देखो छी-छी बातें रावण राज्य में सीखते हैं। इन लक्ष्मी-नारायण को देखो ड्रेस आदि कितनी अच्छी है। यहाँ सब हैं देह-अभिमानी। उन्हों को देह-अभिमानी नहीं कहेंगे। उन्हों की नैचुरल ब्युटी है। बाप तुमको ऐसा नैचुरल ब्युटीफुल बनाते हैं। आजकल तो सच्चा जेवर कोई पहन भी नहीं सकता है। कोई पहने तो उनको ही लूट जाएं। वहाँ तो ऐसी कोई बात नहीं। ऐसा बाप तुमको मिला है, इन बिगर तो तुम बन न सको। बहुत कहते हैं हम तो डायरेक्ट शिवबाबा से लेते हैं। परन्तु वह देंगे ही कैसे। भल कोशिश करके देखो डायरेक्ट मांगो। देखो मिलता है! ऐसे बहुत कहते हैं-हम तो शिवबाबा से वर्सा लेंगे। ब्रह्मा से पूछने की भी क्या दरकार है। शिवबाबा प्रेरणा से कुछ दे देंगे! अच्छे-अच्छे पुराने बच्चे उनको भी माया ऐसे चक पहन लेती है (काट लेती है)। एक को मानते हैं, परन्तु एक क्या करेंगे। बाप कहते हैं मैं एक कैसे आऊं। मुख बिगर बात कैसे कर सकूँ। मुख का तो गायन है ना। गऊमुख से अमृत लेने के लिए कितना धक्का खाते हैं। फिर श्रीनाथ द्वारे पर जाकर दर्शन करते हैं। परन्तु उनका दर्शन करने से क्या होगा। उसको कहा जाता है बुत पूजा। उनमें आत्मा तो है नहीं। बाकी 5 तत्वों का पुतला बना हुआ है तो गोया माया को याद करना हो गया। 5 तत्व प्रकृति है ना। उनको याद करने से क्या होगा? प्रकृति का आधार तो सबको है परन्तु वहाँ है सतोप्रधान प्रकृति। यहाँ है तमोप्रधान प्रकृति। बाप को सतोप्रधान प्रकृति का आधार कभी नहीं लेना पड़ता। यहाँ तो सतोप्रधान प्रकृति मिल न सके। यह जो भी साधू-सन्त हैं बाप कहते हैं इन सबका उद्धार मुझे करना पड़ता है। मैं निवृत्ति मार्ग में आता ही नहीं हूँ। यह है ही प्रवृत्ति मार्ग। सबको कहता हूँ पवित्र बनो। वहाँ तो नाम-रूप आदि सब बदल जाता है। तो बाप समझाते हैं देखो यह नाटक कैसा बना हुआ है। एक के फीचर्स न मिले दूसरे से। इतने करोड़ों हैं, सबके फीचर्स अलग। कितना भी कोई कुछ करे तो भी एक के फीचर्स दूसरे से मिल न सकें। इसको कहा जाता है कुदरत, वन्डर। स्वर्ग को वन्डर कहा जाता है ना। कितना शोभनिक है। माया के 7 वन्डर, बाप का एक वन्डर। वह 7 वन्डर्स तराजू के एक तरफ रखो, यह एक वन्डर दूसरे तरफ में रखो तो भी यह भारी हो जायेगा। एक तरफ ज्ञान, एक तरफ भक्ति को रखो तो ज्ञान का तरफ बहुत भारी हो जायेगा। अभी तुम समझते हो भक्ति सिखलाने वाले तो ढेर हैं। ज्ञान देने वाला एक ही बाप है। तो बाप बैठ बच्चों को पढ़ाते हैं, श्रृंगार करते हैं। बाप कहते हैं पवित्र बनो तो कहते-नहीं, हम तो छी-छी बनेंगे। गरूड पुराण में भी विषय वैतरणी नदी दिखाते हैं ना। बिच्छू, टिण्डन, सर्प आदि सब एक-दो को काटते रहते हैं। बाप कहते हैं तुम कितने निधनके बन जाते हो। तुम बच्चों को ही बाप समझाते हैं। बाहर में कोई को ऐसा सीधा कहो तो बिगड़ जायें। बड़ा युक्ति से समझाना होता है। कई बच्चों में बातचीत करने का भी अक्ल नहीं रहता। छोटे बच्चे एकदम इनोसेन्ट होते हैं इसलिए उनको महात्मा कहा जाता है। कहाँ कृष्ण महात्मा, कहाँ यह सन्यासी निवृत्ति मार्ग वाले महात्मा कहलाते हैं। वह है प्रवृत्ति मार्ग। वह कभी भ्रष्टाचार से पैदा नहीं होते। उनको कहते ही हैं श्रेष्ठाचारी। अभी तुम श्रेष्ठाचारी बन रहे हो। बच्चे जानते हैं यहाँ बापदादा दोनों इकट्ठे हैं। यह जरूर श्रृंगार अच्छा ही करेंगे। सबकी दिल होगी ना-जिन्होंने इन बच्चों को ऐसा श्रृंगार कराया है तो हम क्यों न उनके पास जायें इसलिए तुम यहाँ आते हो रिफ्रेश होने। दिल कशिश करती है, बाप के पास आने। जिनको पूरा निश्चय होता है वह तो कहेंगे चाहे मारो, चाहे कुछ भी करो, हम कभी साथ नहीं छोड़ेंगे। कोई तो बिगर कारण भी छोड़ देते हैं। यह भी ड्रामा का खेल बना हुआ है। फ़ारकती वा डायओर्स दे देते हैं।

बाप जानते हैं यह रावण के वंश के हैं। कल्प-कल्प ऐसा होता है। कोई फिर आ जाते हैं। बाबा समझाते हैं हाथ छोड़ने से पद कम हो जाता है। सम्मुख आते हैं, प्रतिज्ञा करते हैं-हम ऐसे बाप को कभी नहीं छोड़ेंगे। परन्तु माया रावण भी कम नहीं है। झट अपनी तरफ खींच लेती है। फिर सम्मुख आते हैं तो उनको समझाया जाता है। बाप लाठी थोड़ेही लगायेंगे। बाप तो फिर भी प्यार से ही समझायेंगे, तुमको माया ग्राह खा जाता, अच्छा हुआ जो बचकर आ गये। घायल होंगे तो पद कम हो जायेगा। जो सदैव एकरस ही रहेंगे वह कभी हटेंगे नहीं। कभी हाथ नहीं छोड़ेंगे। यहाँ से बाप को छोड़ मरकर माया रावण के बनते हैं तो उनको माया और ही जोर से खायेगी। बाप कहते हैं तुमको कितना श्रृंगार करते हैं। समझाया जाता है अच्छे होकर चलो। किसको दु:ख नहीं दो। ब्लड से भी लिखकर देते हैं फिर वैसे के वैसे बन जाते हैं। माया बड़ी जबरदस्त है। कान-नाक से पकड़कर बहुत तड़फाती है। अब तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र देते हैं तो क्रिमिनल दृष्टि कभी नहीं जानी चाहिए। विश्व का मालिक बनना है तो कुछ मेहनत भी करनी पड़े ना। अब तुम्हारी आत्मा और शरीर दोनों तमोप्रधान हैं। खाद पड़ गई है। इस खाद को भस्म करने के लिए बाप कहते हैं मुझे याद करो। तुम बाप को याद नहीं कर सकते हो, लज्जा नहीं आती है। याद नहीं करेंगे तो माया के भूत तुमको हप कर लेंगे। तुम कितना छी-छी बन गये हो, रावण राज्य में एक भी ऐसा नहीं जो विकार से पैदा न हुआ हो। वहाँ इस विकार का नाम नहीं, रावण ही नहीं। रावण राज्य होता ही है द्वापर से। पावन बनाने वाला एक ही बाप है। बाप कहते हैं बच्चे यह एक जन्म ही पवित्र बनना है फिर तो विकार की बात ही नहीं होती। वह है ही निर्विकारी दुनिया। तुम जानते हो यह पवित्र देवी-देवता थे फिर 84 जन्म लेते-लेते नीचे आये हैं। अब हैं पतित तब पुकारते हैं शिवबाबा हमको इस पतित दुनिया से छुड़ाओ। अभी जब बाप आये हैं तब तुमको समझ पड़ी है कि यह पतित काम है। आगे नहीं समझते थे क्योंकि तुम रावण राज्य में थे। अब बाप कहते हैं सुखधाम चलना है तो छी-छी बनना छोड़ो। आधाकल्प तुम छी-छी बने हो। सिर पर पापों का बहुत बोझा है और तुमने गाली भी बहुत दी है। बाप को गाली देने से बहुत पाप चढ़ जाते हैं, यह भी ड्रामा में पार्ट है। तुम्हारी आत्मा को भी 84 का पार्ट मिला हुआ है, वह बजाना ही है। हरेक को अपना पार्ट बजाना है। फिर तुम रोते क्यों हो! सतयुग में कोई रोता नहीं। फिर ज्ञान की दशा पूरी होती है तो वही रोना पीटना शुरू हो जाता है। मोहजीत की कथा भी तुमने सुनी है। यह तो एक झूठा दृष्टान्त बनाया है। सतयुग में कोई की अकाले मृत्यु होती नहीं। मोह जीत बनाने वाला तो एक ही बाप है। परमपिता परमात्मा के तुम वारिस बनते हो, जो तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं। अपने से पूछो हम आत्मायें उनके वारिस हैं? बाकी जिस्मानी पढ़ाई में क्या रखा है। आजकल तो पतित मनुष्यों की शक्ल भी नहीं देखनी चाहिए, न बच्चों को दिखानी चाहिए। बुद्धि में हमेशा समझो हम संगमयुग पर हैं। एक बाप को ही याद करते हैं और सबको देखते हुए नहीं देखते हैं। हम नई दुनिया को ही देखते हैं। हम देवता बनते हैं, उस नये सम्बन्धों को ही देखते हैं। पुराने सम्बन्ध को देखते हुए नहीं देखते हैं। यह सब भस्म होने वाला है। हम अकेले आये थे फिर अकेले ही जाते हैं। बाप एक ही बार आते हैं साथ ले जाने। इनको शिवबाबा की बरात कहा जाता है। शिवबाबा के बच्चे सब हैं। बाप विश्व की बादशाही देते हैं, मनुष्य से देवता बनाते हैं। आगे विष उगलते थे, अब अमृत उगलते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) स्वयं को संगमयुग निवासी समझकर चलना है। पुराने सम्बन्धों को देखते हुए भी नहीं देखना है। बुद्धि में रहे हम अकेले आये थे, अकेले जाना है।

2) आत्मा और शरीर दोनों को कंचन (पवित्र) बनाने के लिए ज्ञान के तीसरे नेत्र से देखने का अभ्यास करना है। क्रिमिनल दृष्टि खत्म करनी है। ज्ञान और योग से अपना श्रृंगार करना है।

वरदान:- बाप की छत्रछाया में सदा मौज का अनुभव करने और कराने वाली विशेष आत्मा भव
जहाँ बाप की छत्रछाया है वहाँ सदा माया से सेफ हैं। छत्रछाया के अन्दर माया आ नहीं सकती। मेहनत से स्वत: दूर हो जायेंगे, मौज में रहेंगे क्योंकि मेहनत मौज का अनुभव करने नहीं देती। छत्रछाया में रहने वाली ऐसी विशेष आत्मायें ऊंची पढ़ाई पढ़ते हुए भी मौज में रहती हैं, क्योंकि उन्हें निश्चय है कि हम कल्प-कल्प के विजयी हैं, पास हुए पड़े हैं। तो सदा मौज में रहो और दूसरों को मौज में रहने का सन्देश देते रहो। यही सेवा है।
स्लोगन:- जो ड्रामा के राज़ को नहीं जानता है वही नाराज़ होता है।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 21 NOVEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 21 November 2019

21-11-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – सन शोज़ फादर, मनमत को छोड़ श्रीमत पर चलो तब बाप का शो कर सकेंगे”
प्रश्नः- किन बच्चों की रक्षा बाप जरूर करते ही हैं?
उत्तर:- जो बच्चे सच्चे हैं, उनकी रक्षा जरूर होती है। अगर रक्षा नहीं होती है तो अन्दर में जरूर कोई न कोई झूठ होगा। पढ़ाई मिस करना, संशय में आना माना अन्दर में कुछ न कुछ झूठ है। उन्हें माया अंगूरी मार देती है।
प्रश्नः- किन बच्चों के लिए माया चुम्बक है?
उत्तर:- जो माया की खूबसूरती की तरफ आकर्षित हो जाते हैं, उन्हों के लिए माया चुम्बक है। श्रीमत पर चलने वाले बच्चे आकर्षित नहीं होंगे।

ओम् शान्ति। रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं, यह तो बच्चों ने निश्चय किया है रूहानी बाप हम रूहानी बच्चों को पढ़ाते हैं। जिसके लिए ही गायन है-आत्मायें परमात्मा अलग रहे बहुकाल… मूल-वतन में अलग नहीं रहते हैं। वहाँ तो सब इकट्ठे रहते हैं। अलग रहते हैं तो जरूर आत्मायें वहाँ से बिछुड़ती हैं, आकरके अपना-अपना पार्ट बजाती हैं। सतोप्रधान से उतरते-उतरते तमोप्रधान बनती हैं। बुलाते हैं पतित-पावन आकर हमको पावन बनाओ। बाप भी कहते हैं हम हर 5 हज़ार वर्ष के बाद आते हैं। यह सृष्टि का चक्र ही 5 हज़ार वर्ष है। आगे तुम यह नहीं जानते थे। शिवबाबा समझाते हैं तो जरूर कोई तन द्वारा समझायेंगे। ऊपर से कोई आवाज़ तो नहीं करते हैं। शक्ति वा प्रेरणा आदि की कोई बात नहीं। तुम आत्मा शरीर में आकर वार्तालाप करती हो। वैसे बाप भी कहते हैं मैं भी शरीर द्वारा डायरेक्शन देता हूँ। फिर उस पर जो जितना चलते हैं, अपना ही कल्याण करते हैं। श्रीमत पर चलें वा न चलें, टीचर का सुनें वा न सुनें, अपने लिए ही कल्याण वा अकल्याण करते हैं। नहीं पढ़ेंगे तो जरूर फेल होंगे। यह भी समझाते रहते हैं शिवबाबा से सीखकर फिर औरों को सिखलाना है। फादर शोज़ सन। जिस्मानी फादर की बात नहीं। यह है रूहानी बाप। यह भी तुम समझते हो जितना हम श्रीमत पर चलेंगे उतना वर्सा पायेंगे। पूरा चलने वाले ऊंच पद पायेंगे। नहीं चलने वाले ऊंच पद नहीं पायेंगे। बाप तो कहते हैं मुझे याद करो तो तुम्हारे पाप कट जाएं। रावण राज्य में तुम्हारे पर पाप तो बहुत चढ़े हुए हैं। विकार में जाने से ही पाप आत्मा बनते हैं। पुण्य आत्मा और पाप आत्मा जरूर होते हैं। पुण्य आत्मा के आगे पाप आत्मायें जाकर माथा टेकती हैं। मनुष्यों को यह पता नहीं है कि देवतायें जो पुण्य आत्मा हैं, वही फिर पुनर्जन्म में आते-आते पाप आत्मा बनते हैं। वह तो समझते हैं यह सदैव पुण्य आत्मा हैं। बाप समझाते हैं, पुनर्जन्म लेते-लेते सतोप्रधान से तमोप्रधान तक आते हैं। जब बिल्कुल पाप आत्मा बन जाते हैं तो फिर बाप को बुलाते हैं। जब पुण्य आत्मा हैं तो याद करने की दरकार नहीं रहती। तो यह तुम बच्चों को समझाना है, सर्विस करनी है। बाप तो नहीं जाकर सबको सुनायेंगे। बच्चे सर्विस करने लायक हैं तो बच्चों को ही जाना चाहिए। मनुष्य तो दिन-प्रतिदिन असुर बनते जाते हैं। पहचान न होने कारण बकवास करने में भी देरी नहीं करते हैं। मनुष्य कहते हैं गीता का भगवान कृष्ण है। तुम समझाते हो वह तो देहधारी है, उनको देवता कहा जाता है। कृष्ण को बाप नहीं कहेंगे। यह तो सब फादर को याद करते हैं ना। आत्माओं का फादर तो दूसरा कोई होता नहीं। यह प्रजापिता ब्रह्मा भी कहते हैं-निराकार फादर को याद करना है। यह कारपोरियल फादर हो जाता है। समझाया तो बहुत जाता है, कई पूरा न समझकर उल्टा रास्ता ले जंगल में जाकर पड़ते हैं। बाप तो रास्ता बताते हैं स्वर्ग में जाने का। फिर भी जंगल तरफ चले जाते हैं। बाप समझाते हैं तुमको जंगल तरफ ले जाने वाला है-रावण। तुम माया से हार खाते हो। रास्ता भूल जाते हो तो फिर उस जंगल के कांटे बन जाते हो। वह फिर स्वर्ग में देरी से आयेंगे। यहाँ तुम आये ही हो स्वर्ग में जाने का पुरूषार्थ करने। त्रेता को भी स्वर्ग नहीं कहेंगे। 25 परसेन्ट कम हुआ ना। वह फेल गिना जाता है। तुम यहाँ आये ही हो पुरानी दुनिया छोड़ नई दुनिया में जाने। त्रेता को नई दुनिया नहीं कहेंगे। नापास वहाँ चले जाते हैं क्योंकि रास्ता ठीक पकड़ते नहीं। नीचे-ऊपर होते रहते हैं। तुम महसूस करते हो जो याद होनी चाहिए वह नहीं रहती। स्वर्गवासी जो बनते हैं उनको कहेंगे अच्छे पास। त्रेता वाले नापास गिने जाते हैं। तुम नर्कवासी से स्वर्गवासी बनते हो। नहीं तो फिर नापास कहा जाता है। उस पढ़ाई में तो फिर दुबारा पढ़ते हैं। इसमें दूसरा वर्ष पढ़ने की तो बात नहीं। जन्म-जन्मान्तर, कल्प-कल्पान्तर वही इम्तहान पास करते हैं जो कल्प पहले किया है। इस ड्रामा के राज़ को अच्छी रीति समझना चाहिए। कई समझते हैं हम चल नहीं सकते हैं। बुढ़ा है तो उनको हाथ से पकड़कर चलाओ तो चलेंगे, नहीं तो गिर पड़ेंगे। परन्तु तकदीर में नहीं है तो कितना भी जोर देते फूल बनाने का, परन्तु बनते नहीं। अक भी फूल होता है। यह कांटे तो चुभते हैं।

बाप कितना समझाते हैं। कल तुम जिस शिव की पूजा करते थे वह आज तुमको पढ़ा रहे हैं। हर बात में पुरूषार्थ के लिए ही जोर दिया जाता है। देखा जाता है-माया अच्छे-अच्छे फूलों को नीचे गिरा देती है। हड़गुड़ तोड़ देती है, जिसको फिर ट्रेटर कहा जाता है। जो एक राजधानी छोड़ दूसरे में चला जाता है उनको ट्रेटर कहा जाता है। बाप भी कहते हैं मेरे बनकर फिर माया का बन जाते हैं तो उनको भी ट्रेटर कहा जाता है। उनकी चलन ही ऐसी हो जाती है। अब बाप माया से छुड़ाने आये हैं। बच्चे कहते हैं-माया बड़ी दुश्तर है, अपनी तरफ बहुत खींच लेती है। माया जैसे चुम्बक है। इस समय चुम्बक का रूप धरती है। कितनी खूबसूरती दुनिया में बढ़ गई है। आगे यह बाइसकोप आदि थोड़ेही थे। यह सब 100 वर्ष में निकले हैं। बाबा तो अनुभवी है ना। तो बच्चों को इस ड्रामा के गुहय राज़ को अच्छी रीति समझना चाहिए, हरेक बात एक्यूरेट नूँधी हुई है। सौ वर्ष में यह जैसे बहिश्त बन गया है, आपोजीशन के लिए। तो समझा जाता है-अब स्वर्ग और ही जल्दी होना है। साइंस भी बहुत काम में आती है। यह तो बहुत सुख देने वाली भी है ना। वह सुख स्थाई हो जाए उसके लिए इस पुरानी दुनिया का विनाश भी होना है। सतयुग के सुख हैं ही भारत के भाग्य में। वह तो आते ही बाद में हैं, जब भक्तिमार्ग शुरू होता है, जब भारतवासी गिरते हैं तब दूसरे धर्म वाले नम्बरवार आते हैं। भारत गिरते-गिरते एकदम पट पर आ जाता है। फिर चढ़ना है। यहाँ भी चढ़ते हैं फिर गिरते हैं। कितना गिरते हैं, बात मत पूछो। कोई तो मानते ही नहीं कि बाबा हमको पढ़ाते हैं। अच्छे-अच्छे सर्विसएबुल जिनकी बाप महिमा करते हैं वह भी माया के चम्बे में आ जाते हैं। कुश्ती होती है ना। माया भी ऐसे लड़ती है। एकदम पूरा गिरा देती है। आगे चल तुम बच्चों को मालूम पड़ता जायेगा। माया एकदम पूरा सुला देती है। फिर भी बाप कहते हैं एक बार ज्ञान सुना है तो स्वर्ग में जरूर आयेंगे। बाकी पद तो नहीं पा सकेंगे ना। कल्प पहले जिसने जो पुरूषार्थ किया है वा पुरूषार्थ करते-करते गिरे हैं, ऐसे ही अब भी गिरते और चढ़ते हैं। हार और जीत होती है ना। सारा मदार बच्चों का याद पर है। बच्चों को यह अखुट खजाना मिलता है। वह तो कितना लाखों का देवाला मारते हैं। कोई लाखों का धनवान बनते हैं, सो भी एक जन्म में। दूसरे जन्म में थोड़ेही इतना धन रहेगा। कर्मभोग भी बहुत है। वहाँ स्वर्ग में तो कर्मभोग की बात होती नहीं। इस समय तुम 21 जन्मों के लिए कितना जमा करते हो। जो पूरा पुरूषार्थ करते हैं, पूरा स्वर्ग का वर्सा पाते हैं। बुद्धि में रहना चाहिए हम बरोबर स्वर्ग का वर्सा पाते हैं। यह ख्याल नहीं करना है कि फिर नीचे गिरेंगे। यह सबसे जास्ती गिरे अब फिर चढ़ना ही है। ऑटोमेटिकली पुरूषार्थ भी होता रहता है। बाप समझाते हैं-देखो, माया कितनी प्रबल है। मनुष्यों में कितना अज्ञान भर गया है, अज्ञान के कारण बाप को भी सर्वव्यापी कह देते हैं। भारत कितना फर्स्टक्लास था। तुम समझते हो हम ऐसे थे, अब फिर बन रहे हैं। इन देवताओं की कितनी महिमा है, परन्तु कोई जानते नहीं हैं, तुम बच्चों के सिवाए। तुम ही जानते हो बेहद का बाप ज्ञान सागर आकर हमको पढ़ाते हैं फिर भी माया बहुतों को संशय में ला देती है। झूठ कपट छोड़ते नहीं। तब बाप कहते हैं-सच्चा-सच्चा अपना चार्ट लिखो। परन्तु देह-अभिमान के कारण सच नहीं बताते हैं। तो वह भी विकर्म बन जाता है, सच बताना चाहिए ना। नहीं तो बहुत सजा खानी पड़ती है। गर्भ जेल में भी बहुत सजा मिलती है। कहते हैं तोबां-तोबां.. हम फिर ऐसा काम नहीं करेंगे। जैसे किसको मार मिलती है तो भी ऐसे माफी माँगते हैं। सज़ा मिलने पर भी ऐसे करते हैं। अभी तुम बच्चे समझते हो माया का राज्य कब से शुरू हुआ है। पाप करते रहते हैं। बाप देखते हैं-यह इतना मीठे-मीठे मुलायम नहीं बनते हैं। बाप कितना मुलायम बच्चे मिसल हो चलते हैं, क्योंकि ड्रामा पर चलते रहते हैं। कहेंगे जो हुआ ड्रामा की भावी। समझाते भी हैं कि आगे फिर ऐसा न हो। यह बापदादा दोनों इकट्ठे हैं ना। दादा की मत अपनी, ईश्वर की मत अपनी है। समझना चाहिए कि यह मत कौन देता है? यह भी बाप तो है ना। बाप की तो माननी चाहिए। बाबा तो बड़ा बाबा है ना, इसलिए बाबा कहते हैं ऐसे ही समझो शिवबाबा समझाते हैं। नहीं समझेंगे तो पद भी नहीं पायेंगे। ड्रामा के प्लेन अनुसार बाप भी है, दादा भी है। बाप की श्रीमत मिलती है। माया ऐसी है जो महावीर, पहलवानों से भी कोई न कोई उल्टा काम करा देती है। समझा जाता है यह बाप की मत पर नहीं हैं। खुद भी फील करते हैं, मैं अपनी आसुरी मत पर हूँ। श्रीमत देने वाला आकर उपस्थित हुआ है। उनकी है ईश्वरीय मत। बाप खुद कहते हैं इनकी अगर कोई ऐसी मत मिल भी गई तो भी उनको मैं ठीक करने वाला बैठा हूँ। फिर भी हमने रथ लिया है ना। हमने रथ लिया तब ही इसने गाली खाई है। नहीं तो कभी गाली नहीं खाई। मेरे कारण कितनी गाली खाते हैं। तो इनकी भी सम्भाल करनी पड़े। बाप रक्षा जरूर करते हैं। जैसे बच्चों की रक्षा बाप करते हैं ना। जितना सच्चाई पर चलते हैं उतनी रक्षा होती है। झूठे की रक्षा नहीं होती। उनकी तो फिर सज़ा कायम हो जाती है। इसलिए बाप समझाते हैं – माया तो एकदम नाक से पकड़कर खत्म कर देती है। बच्चे खुद फील करते हैं माया खा लेती है तो फिर पढ़ाई छोड़ देते हैं। बाप कहते हैं पढ़ाई जरूर पढ़ो। अच्छा, कहाँ किसका दोष है। इसमें जैसा जो करेगा, सो भविष्य में पायेगा क्योंकि अभी दुनिया बदल रही है। माया ऐसे अंगुरी मार देती है जो वह खुशी नहीं रहती है। फिर चिल्लाते हैं-बाबा, पता नहीं क्या होता है। युद्ध के मैदान में बहुत खबरदार रहते हैं कि कहाँ कोई अंगूरी न मार दे। फिर भी जास्ती ताकत वाले होते हैं तो दूसरे को गिरा देते हैं। फिर दूसरे दिन पर रखते हैं। यह माया की लड़ाई तो अन्त तक चलती रहती है। नीचे-ऊपर होते रहते हैं। कई बच्चे सच नहीं बताते हैं। इज्ज़त का बहुत डर है-पता नहीं बाबा क्या कहेंगे। जब तक सच बताया नहीं है तब तक आगे चल न सकें। अन्दर में खटकता रहता है, फिर वृद्धि हो जाती है। आपेही सच कभी नहीं बतायेंगे। कहाँ दो हैं तो समझते हैं यह बाबा को सुनायेंगे तो हम भी सुना दें। माया बड़ी दुश्तर है। समझा जाता है उनकी तकदीर में इतना ऊंच पद नहीं है तो सर्जन से छिपाते हैं। छिपाने से बीमारी छूटेगी नहीं। जितना छिपायेंगे उतना गिरते ही रहेंगे। भूत तो सबमें हैं ना। जब तक कर्मातीत अवस्था नहीं बनी, तब तक क्रिमिनल आई भी छोड़ती नहीं है। सबसे बड़ा दुश्मन है काम। कई गिर पड़ते हैं। बाबा तो बार-बार समझाते हैं शिवबाबा के सिवाए कोई देहधारी को याद नहीं करना है। कई तो ऐसे पक्के हैं, जो कभी किसकी याद भी नहीं आयेगी। पतिव्रता स्त्री होती है ना, उनकी कुबुद्धि नहीं होती है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) हमें पढ़ाने वाला स्वयं ज्ञान का सागर, बेहद का बाप है, इसमें कभी संशय नहीं लाना है, झूठ कपट छोड़ अपना सच्चा-सच्चा चार्ट रखना है। देह-अभिमान में आकर कभी ट्रेटर नहीं बनना है।

2) ड्रामा को बुद्धि में रख बाप समान बहुत-बहुत मीठा मुलायम (नम्र) बनकर रहना है। अपना अहंकार नहीं दिखाना है। अपनी मत छोड़ एक बाप की श्रेष्ठ मत पर चलना है।

वरदान:- साथी को सदा साथ रख सहयोग का अनुभव करने वाले कम्बाइन्ड रूपधारी भव
सदा “आप और बाप” ऐसे कम्बाइन्ड रहो जो कोई भी अलग न कर सके। कभी अपने को अकेला नहीं समझो। बापदादा अविनाशी साथ निभाने वाले आप सबके साथी हैं। बाबा कहा और बाबा हाज़िर है। हम बाबा के, बाबा हमारा। बाबा आपकी हर सेवा मे सहयोग देने वाले है सिर्फ अपने कम्बाइन्ड स्वरूप के रूहानी नशे में रहो।
स्लोगन:- सेवा और स्व-उन्नति दोनों का बैलेन्स हो तो सदा सफलता मिलती रहेगी।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 20 NOVEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 20 November 2019

20-11-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – यदि शिवबाबा का कदर है तो उनकी श्रीमत पर चलते रहो, श्रीमत पर चलना माना बाप का कदर करना”
प्रश्नः- बच्चे बाप से भी बड़े जादूगर हैं – कैसे?
उत्तर:- ऊंचे से ऊंचे बाप को अपना बच्चा बना देना, तन-मन-धन से बाप को वारिस बनाकर वारी जाना-यह बच्चों की जादूगरी है। जो अभी भगवान को वारिस बनाते हैं वह 21 जन्मों के लिए वर्से के अधिकारी बन जाते हैं।
प्रश्नः- ट्रिब्युनल किन बच्चों के लिए बैठती है?
उत्तर:- जो दान की हुई चीज़ को वापस लेने का संकल्प करते, माया के वश हो डिससर्विस करते हैं उन्हों के लिए ट्रिब्युनल बैठती है।

ओम् शान्ति। रूहानी विचित्र बाप बैठ विचित्र बच्चों को समझाते हैं अर्थात् दूरदेश का रहने वाला जिसको परमपिता परमात्मा कहा जाता है। बहुत-बहुत दूरदेश से आकर इस शरीर द्वारा तुमको पढ़ाते हैं। अब जो पढ़ते हैं वह पढ़ाने वाले के साथ योग तो ऑटोमेटिकली रखते हैं। कहना नहीं पड़ता है कि हे बच्चों, टीचर से योग रखो वा उनको याद करो। नहीं, यहाँ बाप कहते हैं-हे रूहानी बच्चों, यह तुम्हारा बाप भी है, टीचर भी है, गुरू भी है, इनके साथ योग रखो अर्थात् बाप को याद करो। यह है विचित्र बाबा। तुम घड़ी-घड़ी इनको भूल जाते हो इसलिए कहना पड़ता है। पढ़ाने वाले को याद करने से तुम्हारे पाप भस्म हो जायेंगे। यह लॉ नहीं कहता जो टीचर कहे मेरे को देखो, इसमें तो बड़ा फायदा है। बाप कहते हैं सिर्फ मुझे याद करो। इस याद के बल से ही तुम्हारे पाप कटने हैं, इसको कहा जाता है याद की यात्रा। अब रूहानी विचित्र बाप बच्चों को देखते हैं। बच्चे भी अपने को आत्मा समझ विचित्र बाप को ही याद करते हैं। तुम तो घड़ी-घड़ी शरीर में आते हो। मैं तो सारा कल्प शरीर में आता नहीं हूँ सिर्फ इस संगमयुग पर ही बहुत दूरदेश से आता हूँ – तुम बच्चों को पढ़ाने। यह अच्छी रीति याद करना है। बाबा हमारा बाप, टीचर और सतगुरू है। विचित्र है। उनको अपना शरीर नहीं है, फिर आते कैसे हैं? कहते हैं मुझे प्रकृति का, मुख का आधार लेना पड़ता है। मैं तो विचित्र हूँ। तुम सभी चित्र वाले हो। मुझे रथ तो जरूर चाहिए ना। घोड़े गाड़ी में तो नहीं आयेंगे ना। बाप कहते हैं मैं इस तन में प्रवेश करता हूँ, जो नम्बरवन है वही फिर नम्बर लास्ट बनते हैं। जो सतोप्रधान थे वही तमोप्रधान बनते हैं। तो उन्हों को ही फिर सतोप्रधान बनाने के लिए बाप पढ़ाते हैं। समझाते हैं इस रावणराज्य में 5 विकारों पर जीत पाकर जगतजीत तुम बच्चों को बनना है। बच्चों यह याद रखना है कि हमको विचित्र बाप पढ़ाते हैं। बाप को याद नहीं करेंगे तो पाप भस्म कैसे होंगे। यह बातें भी सिर्फ अभी संगमयुग पर ही सुनते हो। एक बार जो कुछ होता है फिर कल्प बाद वही रिपीट होगा। कितनी अच्छी समझानी है, इसमें बहुत विशाल बुद्धि चाहिए। यह कोई साधू-सन्त आदि का सतसंग नहीं है। उनको बाप भी कहते हो तो बच्चा भी कहते हो। तुम जानते हो यह हमारा बाप भी है, बच्चा भी है। हम सब कुछ इस बच्चे को वर्सा देकर और बाप से 21 जन्मों के लिए वर्सा लेते हैं। किचड़-पट्टी सब देकर बाप से हम विश्व की बादशाही लेते हैं। कहते हैं बाबा हमने भक्तिमार्ग में कहा था कि जब आप आयेंगे तो हम आप पर तन-मन-धन सहित वारी जायेंगे। लौकिक बाप भी बच्चों पर वारी जाते हैं ना। तो यहाँ तुमको यह कैसा विचित्र बाप मिला है, उनको याद करो तो तुम्हारे पाप भस्म हों और अपने घर चले जायेंगे। कितनी लम्बी मुसाफिरी है। बाप आते देखो कहाँ हैं! पुराने रावण राज्य में। कहते हैं मेरी तकदीर में पावन शरीर मिलना है नहीं। पतितों को पावन बनाने कैसे आऊं। हमको पतित दुनिया में ही आकर सबको पावन बनाना पड़ता है। तो ऐसे टीचर का कदर भी रखना चाहिए ना। बहुत हैं जो कदर जानते ही नहीं। यह भी ड्रामा में होना ही है। राजधानी में तो सब चाहिए ना-नम्बरवार। तो सब प्रकार के यहाँ ही बनते हैं। कम दर्जा पाने वाले का यह हाल होगा। न पढ़ेंगे, न बाप की याद में रहेंगे। यह बहुत ही विचित्र बाप है ना, इनकी चलन भी अलौकिक है। इनका पार्ट और कोई को मिल न सके। यह बाप आकर तुमको कितनी ऊंच पढ़ाई पढ़ाते हैं, तो उसका कदर भी रखना चाहिए। उनकी श्रीमत पर चलना चाहिए। परन्तु माया घड़ी-घड़ी भुला देती है। माया इतनी जबरदस्त है जो अच्छे-अच्छे बच्चों को गिरा देती है। बाप कितना धनवान बनाते हैं परन्तु माया एकदम माथा मूड़ लेती है। माया से बचना है तो बाप को जरूर याद करना पड़े। बहुत अच्छे बच्चे हैं जो बाप का बनकर फिर माया के बन जाते हैं, बात मत पूछो, पक्के ट्रेटर बन जाते हैं। माया एकदम नाक से पकड़ लेती है। अक्षर भी है ना-गज को ग्राह ने खाया। परन्तु उसका अर्थ कोई नहीं समझते हैं। बाप हर बात अच्छी रीति समझाते हैं। कई बच्चे समझते भी हैं परन्तु नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। कोई को तो ज़रा भी धारणा नहीं होती। बहुत ऊंची पढ़ाई है ना। तो उनकी धारणा कर नहीं सकते। बाप कहेंगे इनकी तकदीर में राज्य-भाग्य नहीं है। कोई अक के फूल हैं, कोई खूशबूदार फूल है। वैराइटी बगीचा है ना। ऐसे भी तो चाहिए ना। राजधानी में तुमको नौकर-चाकर भी मिलेंगे। नहीं तो नौकर-चाकर कैसे मिलेंगे। राजाई यहाँ ही बनती है। नौकर, चाकर, चण्डाल आदि सब मिलेंगे। यह राजधानी स्थापन हो रही है। वन्डर है। बाप तुमको इतना ऊंच बनाते हैं तो ऐसे बाप को याद करते प्रेम के आंसू बहने चाहिए।

तुम माला के दाने बनते हो ना। कहते हैं बाबा आप कितने विचित्र हो। कैसे आकर हम पतितों को आप पावन बनाने के लिए पढ़ाते हो। भक्ति मार्ग में भल शिव की पूजा करते हैं परन्तु समझते थोड़ेही हैं कि यह पतित-पावन है फिर भी पुकारते रहते हैं-हे पतित-पावन आओ, आकर हमको गुल-गुल देवी-देवता बनाओ। बच्चों के फ़रमान को बाप मानते हैं और जब आते हैं तो कहते हैं-बच्चे, पवित्र बनो। इस पर ही हंगामें होते हैं। बाप वन्डरफुल है ना। बच्चों को कहते हैं मुझे याद करो तो पाप कटें। बाप जानते हैं हम आत्माओं से बात करते हैं। सब कुछ आत्मा ही करती है, विकर्म आत्मा ही करती है। आत्मा ही शरीर द्वारा भोगती है। तुम्हारे लिए तो ट्रिब्युनल बैठेगी। खास उन बच्चों के लिए जो सर्विस लायक बनकर फिर ट्रेटर बन जाते हैं। यह तो बाप ही जानते हैं, कैसे माया हप कर लेती है। बाबा हमने हार खा ली, काला मुँह कर लिया…… अब क्षमा करो। अब गिरा और माया का बना फिर क्षमा काहे की। उनको तो फिर बहुत-बहुत मेहनत करनी पड़े। बहुत हैं जो माया से हार जाते हैं। बाप कहते हैं-यहाँ बाप पास दान देकर जाओ फिर वापस नहीं लेना। नहीं तो खलास हो जायेगा। हरिश्चन्द्र का मिसाल है ना। दान देकर फिर बहुत खबरदार रहना है। फिर ले लिया तो सौगुणा दण्ड पड़ जाता है। फिर बहुत हल्का पद पा लेंगे। बच्चे जानते हैं यह राजधानी स्थापन हो रही है। और जो धर्म स्थापन करते हैं, उन्हों की पहले राजाई नहीं चलती। राजाई तो तब हो जब 50-60 करोड़ हों, तब लश्कर बनें। शुरू में तो आते ही हैं एक-दो, फिर वृद्धि को पाते हैं। तुम जानते हो क्राइस्ट भी कोई वेष में आयेंगे। बेगर रूप में पहला नम्बर वाला फिर जरूर लास्ट नम्बर में होगा। क्रिश्चियन लोग झट कहेंगे बरोबर क्राइस्ट इस समय बेगर रूप में है। समझते हैं पुनर्जन्म तो लेना ही है। तमोप्रधान तो जरूर हरेक को बनना है। इस समय सारी दुनिया तमोप्रधान जड़-जड़ीभूत है। इस पुरानी दुनिया का विनाश जरूर होना है। क्रिश्चियन लोग भी कहेंगे क्राइस्ट से 3 हजार वर्ष पहले हेविन था फिर जरूर अब होगा। परन्तु यह बातें समझावे कौन। बाप कहते हैं अभी वह अवस्था बच्चों की कहाँ है। घड़ी-घड़ी लिखते हैं हम योग में नहीं रह सकते। बच्चों की एक्टिविटी से समझ जाते हैं। बाबा को समाचार देने से भी डरते हैं। बाप तो बच्चों को कितना प्यार करते हैं। प्यार से नमस्ते करते हैं। बच्चों में तो अहंकार रहता है। अच्छे-अच्छे बच्चों को माया भुला देती है। बाबा समझ सकते हैं, कहते हैं मै नॉलेजफुल हूँ। जानी-जाननहार का मतलब यह नहीं कि मैं सबके अन्दर को जानता हूँ। मै आया ही हूँ पढ़ाने ना कि रीड करने। मैं किसको रीड नहीं करता हूँ, तो यह साकार भी रीड नहीं करता है। इनको सब कुछ भूलना है। रीड फिर क्या करेंगे। तुम यहाँ आते ही हो पढ़ने। भक्ति मार्ग ही अलग है। यह भी गिरने का उपाय चाहिए ना। इन बातों से ही तुम गिरते हो। यह ड्रामा का खेल बना हुआ है। भक्ति मार्ग के शास्त्र पढ़ते-पढ़ते तुम नीचे उतरते तमोप्रधान बनते हो। अभी तुमको इस छी-छी दुनिया में बिल्कुल रहना नहीं है। कलियुग से फिर सतयुग आना है। अभी है यह संगमयुग। यह सब बातें धारण करनी है। बाप ही समझाते हैं बाकी तो सारी दुनिया की बुद्धि पर गॉडरेज का ताला लगा हुआ है। तुम समझते हो यह दैवीगुण वाले थे वही फिर आसुरी गुण वाले बने हैं। बाप समझाते हैं अब भक्ति मार्ग की बातें सब भूल जाओ। अब मैं जो सुनाता हूँ, वह सुनो, हियर नो ईविल…… अब मुझ एक से सुनो। अभी मैं तुमको तारने आया हूँ।

तुम हो ईश्वरीय सम्प्रदाय। प्रजापिता ब्रह्मा के मुख कमल से तुम पैदा हुए हो ना, इतने सब एडाप्टेड बच्चे हैं। उनको आदि देव कहा जाता है। महावीर भी कहते हैं। तुम बच्चे महावीर हो ना-जो योगबल से माया पर जीत पाते हो। बाप को कहा जाता है ज्ञान का सागर। ज्ञान सागर बाप तुमको अविनाशी ज्ञान रत्नों की थालियां भरकर देते हैं। तुमको मालामाल बनाते हैं। जो ज्ञान धारण करते हैं वह ऊंच पद पाते हैं, जो धारणा नहीं करते तो जरूर कम पद पायेंगे। बाप से तुम कारून का खजाना पाते हो। अल्लाह अवलदीन की भी कथा है ना। तुम जानते हो वहाँ हमको कोई अप्राप्त वस्तु नहीं रहती। 21 जन्मों के लिए वर्सा बाप दे देते हैं। बेहद का बाप बेहद का वर्सा देते हैं। हद का वर्सा मिलते हुए भी बेहद के बाप को याद जरूर करते हैं-हे परमात्मा रहम करो, कृपा करो। यह किसको पता थोड़ेही है वह क्या देने वाला है। अभी तुम समझते हो बाबा तो हमको विश्व का मालिक बनाते हैं। चित्रों में भी है ब्रह्मा द्वारा स्थापना, ब्रह्मा सामने बैठे हैं साधारण। स्थापना करेंगे तो जरूर उनको ही बनायेंगे ना। बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं। तुम पूरा समझा नहीं सकते हो। भक्ति मार्ग में शंकर के आगे जाकर कहते हैं – भर दो झोली। आत्मा बोलती है हम कंगाल हैं। हमारी झोली भरो, हमको ऐसा बनाओ। अभी तुम झोली भरने आये हो। कहते हैं हम तो नर से नारायण बनना चाहते हैं। यह पढ़ाई ही नर से नारायण बनने की है। पुरानी दुनिया में आने की दिल किसकी होगी! परन्तु नई दुनिया में तो सब नहीं आयेंगे। कोई 25 परसेन्ट पुरानी में आयेंगे। कुछ कमी तो पड़ेगी ना। थोड़ा भी किसको मैसेज देते रहेंगे तो तुम स्वर्ग के मालिक जरूर बनेंगे। अभी नर्क के मालिक भी सब हैं ना। राजा, रानी, प्रजा सब नर्क के मालिक हैं। वहाँ थे डबल सिरताज। अभी वह नहीं हैं। आजकल तो धर्म आदि को कोई मानते नहीं। देवी-देवता धर्म ही खत्म हो गया है। गाया जाता है रिलीजन इज माइट, धर्म को न मानने कारण ताकत नहीं रही है। बाप समझाते हैं-मीठे-मीठे बच्चों, तुम ही पूज्य से पुजारी बनते हो। 84 जन्म लेते हो ना। हम सो ब्राह्मण, सो देवता फिर हम सो क्षत्रिय…… बुद्धि में यह सारा चक्र आता है ना। यह 84 का चक्र हम लगाते ही रहते हैं अब फिर वापस घर जाना है। पतित कोई जा न सके। आत्मा ही पतित अथवा पावन बनती है। सोने में खाद पड़ती है ना। जेवर में नहीं पड़ती, यह है ज्ञान अग्नि जिससे सारी खाद निकल तुम पक्का सोना बन जायेंगे फिर जेवर भी तुमको अच्छा मिलेगा। अभी आत्मा पतित है तो पावन के आगे नमन करते हैं। करती तो सब कुछ आत्मा है ना। अब बाप समझाते हैं-बच्चे, सिर्फ मामेकम् याद करो तो बेड़ा पार हो जाए। पवित्र बन पवित्र दुनिया में चले जायेंगे। अब जो जितना पुरूषार्थ करेंगे। सबको यही परिचय देते रहो। वह है हद का बाप, यह है बेहद का बाप। संगम पर ही बाप आते हैं स्वर्ग का वर्सा देने। तो ऐसे बाप को याद करना पड़े ना। टीचर को कब स्टूडेन्ट भूलते हैं क्या! परन्तु यहाँ माया भुलाती रहेगी। बड़ा खबरदार रहना है। युद्ध का मैदान है ना। बाप कहते हैं अब विकार में मत जाओ, गन्दे नहीं बनो। अब तो स्वर्ग में चलना है। पवित्र बनकर ही पवित्र नई दुनिया के मालिक बनेंगे। तुमको विश्व की बादशाही देता हूँ। कम बात है क्या। सिर्फ यह एक जन्म पवित्र बनो। अब पवित्र नहीं बनेंगे तो नीचे गिर जायेंगे। टैम्पटेशन बहुत है। काम पर जीत पाने से तुम जगत के मालिक बनेंगे। तुम साफ कह सकते हो परमपिता परमात्मा ही जगतगुरू है जो सारे जगत को सद्गति देते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अविनाशी ज्ञान रत्नों से बुद्धि रूपी झोली भरकर मालामाल बनना है। किसी भी प्रकार का अहंकार नहीं दिखाना है।

2) सर्विस लायक बनकर फिर कभी ट्रेटर बन डिससर्विस नहीं करनी है। दान देने के बाद बहुत-बहुत खबरदार रहना है, कभी वापस लेने का ख्याल न आये।

वरदान:- ब्राह्मण जीवन में एकव्रता के पाठ द्वारा रूहानी रॉयल्टी में रहने वाले सम्पूर्ण पवित्र भव
इस ब्राह्मण जीवन में एकव्रता का पाठ पक्का कर प्युरिटी की रॉयल्टी को धारण कर लो तो सारे कल्प में यह रूहानी रॉयल्टी चलती रहेगी। आपके रूहानी रॉयल्टी और प्युरिटी की चमक परमधाम में सर्व आत्माओं में श्रेष्ठ है। आदिकाल देवता स्वरूप में भी यह पर्सनैलिटी विशेष रही है, फिर मध्यकाल में भी आपके चित्रों की विधिपूर्वक पूजा होती है। इस संगमयुग पर ब्राह्मण जीवन का आधार प्युरिटी की रॉयल्टी है इसलिए जब तक ब्राह्मण जीवन में जीना है तब तक सम्पूर्ण पवित्र रहना ही है।
स्लोगन:- आप सहनशीलता के देव और देवी बनो तो गाली देने वाले भी गले लगायेंगे।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 19 NOVEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 19 November 2019

19-11-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – तुम्हें एक बाप से ही सुनना है और सुन करके दूसरों को सुनाना है”
प्रश्नः- बाप ने तुम बच्चों को कौन-सी समझ दी है, जो दूसरों को सुनानी है?
उत्तर:- बाबा ने तुम्हें समझ दी कि तुम आत्मायें सब भाई-भाई हो। तुम्हें एक बाप की याद में रहना है। यही बात तुम सभी को सुनाओ क्योंकि तुम्हें सारे विश्व के भाईयों का कल्याण करना है। तुम ही इस सेवा के निमित्त हो।

ओम् शान्ति। ओम् शान्ति अक्सर करके क्यों कहा जाता है? यह है परिचय देना-आत्मा का परिचय आत्मा ही देती है। बातचीत आत्मा ही करती है शरीर द्वारा। आत्मा बिगर तो शरीर कुछ कर नहीं सकता। तो यह आत्मा अपना परिचय देती है। हम आत्मा हैं परमपिता परमात्मा की सन्तान हैं। वह तो कह देते अहम् आत्मा सो परमात्मा। तुम बच्चों को यह सब बातें समझाई जाती हैं। बाप तो बच्चे-बच्चे ही कहेंगे ना। रूहानी बाप कहते हैं-हे रूहानी बच्चों, इन आरगन्स द्वारा तुम समझते हो। बाप समझाते हैं पहले-पहले है ज्ञान फिर है भक्ति। ऐसे नहीं कि पहले भक्ति, पीछे ज्ञान है। पहले है ज्ञान दिन, भक्ति है रात। फिर पीछे दिन कब आये? जब भक्ति का वैराग्य हो। तुम्हारी बुद्धि में यह रहना चाहिए। ज्ञान और विज्ञान है ना। अभी तुम ज्ञान की पढ़ाई पढ़ रहे हो। फिर सतयुग-त्रेता में तुमको ज्ञान की प्रालब्ध मिलती है। ज्ञान बाबा अभी देते हैं जिसकी प्रालब्ध फिर सतयुग में होगी। यह समझने की बातें हैं ना। अभी बाप तुमको ज्ञान दे रहे हैं। तुम जानते हो फिर हम ज्ञान से परे विज्ञान अपने घर शान्तिधाम में जायेंगे। उसको न ज्ञान, न भक्ति कहेंगे। उसको कहा जाता है विज्ञान। ज्ञान से परे शान्तिधाम में चले जाते हैं। यह सब ज्ञान बुद्धि में रखना है। बाप ज्ञान देते हैं-कहाँ के लिए? भविष्य नई दुनिया के लिए देते हैं। नई दुनिया में जायेंगे तो पहले अपने घर जरूर जायेंगे। मुक्तिधाम में जाना है। जहाँ की आत्मायें रहवासी हैं वहाँ तो जरूर जायेंगे ना। यह नई-नई बातें तुम ही सुनते हो और कोई समझ नहीं सकते। तुम समझते हो हम आत्मायें स्प्रीचुअल फादर के स्प्रीचुअल बच्चे हैं। रूहानी बच्चों को जरूर रूहानी बाप चाहिए। रूहानी बाप और रूहानी बच्चे। रूहानी बच्चों का एक ही रूहानी बाप है। वह आकर नॉलेज देते हैं। बाप कैसे आते हैं-वह भी समझाया है। बाप कहते हैं मुझे भी प्रकृति धारण करनी पड़ती है। अभी तुमको बाप से सुनना ही सुनना है। सिवाए बाप के और कोई से सुनना नहीं है। बच्चे सुनकर फिर और भाईयों को सुनाते हैं। कुछ न कुछ सुनाते जरूर हैं। अपने को आत्मा समझो, बाप को याद करो क्योंकि वही पतित-पावन है। बुद्धि वहाँ चली जाती है। बच्चों को समझाने से समझ जाते हैं क्योंकि पहले बेसमझ थे। भक्ति मार्ग में बेसमझाई से रावण के चम्बे में आने से क्या करते हैं! कैसे छी-छी बन जाते हैं! शराब पीने से क्या बन जाते हैं? शराब गन्दगी को और ही फैलाती है। अभी तुम बच्चों की बुद्धि में है कि बेहद के बाप से हमको वर्सा लेना है। कल्प-कल्प लेते आये हैं इसलिए दैवीगुण भी जरूर धारण करने हैं। कृष्ण के दैवीगुणों की कितनी महिमा है। वैकुण्ठ का मालिक कितना मीठा है। अभी कृष्ण की डिनायस्टी नहीं कहेंगे। डिनायस्टी विष्णु अथवा लक्ष्मी-नारायण की कहेंगे। अभी तुम बच्चों को मालूम है बाप ही सतयुगी राजाई की डिनायस्टी स्थापन करते हैं। यह चित्र आदि भल न भी हो तो भी समझा सकते हैं। मन्दिर तो बहुत बनते रहते हैं, जिनमें ज्ञान है वह औरों का भी कल्याण करने, आपसमान बनाने भागते रहेंगे। अपने को देखना है हमने कितनों को ज्ञान सुनाया है! कोई-कोई को झट ज्ञान का तीर लग जाता है। भीष्म-पितामह आदि ने भी कहा है ना-हमको कुमारियों ने ज्ञान बाण मारा। यह सब पवित्र कुमार-कुमारियाँ हैं अर्थात् बच्चे हैं। तुम सब बच्चे हो इसलिए कहते हो हम ब्रह्मा के बच्चे कुमार-कुमारियाँ भाई-बहन हैं। यह पवित्र नाता होता है। सो भी एडाप्टेड चिल्ड्रेन हैं। बाप ने एडाप्ट किया है। शिवबाबा ने एडाप्ट किया है प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा। वास्तव में एडाप्ट अक्षर भी नहीं कहेंगे। शिवबाबा के बच्चे तो हैं ही। सब मुझे बुलाते हैं शिवबाबा, शिवबाबा आओ। परन्तु समझ कुछ नहीं है। सब आत्मायें शरीर धारण कर पार्ट बजाती हैं। तो शिवबाबा भी जरूर शरीर द्वारा पार्ट बजायेंगे ना। शिवबाबा पार्ट न बजावे फिर तो कोई काम का न रहा। वैल्यु ही नहीं होती। उनकी वैल्यु ही तब होती है जबकि सारी दुनिया को सद्गति में पहुँचाते हैं तब उनकी महिमा भक्तिमार्ग में गाते हैं। सद्गति हो जाती है फिर पीछे तो बाप को याद करने की दरकार ही नहीं रहती। वह सिर्फ गॉड फादर कहते हैं तो फिर टीचर गुम हो जाता। कहने मात्र रह जाता कि परमपिता परमात्मा पावन बनाने वाला है। वह सद्गति करने वाला भी नहीं कहते। भल गायन में आता है – सर्व का सद्गति दाता एक है। परन्तु बिगर अर्थ कह देते हैं। अभी तुम जो कुछ कहते हो सो अर्थ सहित। समझते हो भक्ति की रात अलग है, ज्ञान दिन अलग है। दिन का भी टाइम होता है। भक्ति का भी टाइम होता है। यह बेहद की बात है। तुम बच्चों को नॉलेज मिली है बेहद की। आधाकल्प है दिन, आधाकल्प है रात। बाप कहते हैं मैं भी आता हूँ रात को दिन बनाने।

तुम जानते हो आधाकल्प है रावण का राज्य, उसमें अनेक प्रकार के दु:ख हैं फिर बाप नई दुनिया स्थापन करते हैं तो उसमें सुख ही सुख मिलता है। कहा भी जाता है यह सुख और दु:ख का खेल है। सुख माना राम, दु:ख माना रावण। रावण पर जीत पाते हो तो फिर रामराज्य आता है, फिर आधाकल्प बाद रावण, रामराज्य पर जीत पहन राज्य करते हैं। तुम अभी माया पर जीत पाते हो। अक्षर बाई अक्षर तुम अर्थ सहित कहते हो। यह तुम्हारी है ईश्वरीय भाषा। यह कोई समझेगा थोड़ेही। ईश्वर कैसे बात करते हैं। तुम जानते हो यह गॉड फादर की भाषा है क्योंकि गॉड फादर नॉलेजफुल है। गाया भी जाता है वह ज्ञान का सागर नॉलेजफुल है तो जरूर किसको तो नॉलेज देंगे ना। अभी तुम समझते हो कैसे बाबा नॉलेज देते हैं। अपनी भी पहचान देते हैं और सृष्टि चक्र का भी नॉलेज देते हैं। जो नॉलेज लेने से हम चक्रवर्ती राजा बनते हैं। स्वदर्शन चक्र है ना। याद करने से हमारे पाप कटते जाते हैं। यह है तुम्हारा अहिंसक चक्र याद का। वह चक्र है हिंसक, सिर काटने का। वह अज्ञानी मनुष्य एक-दो का सिर काटते रहते हैं। तुम इस स्वदर्शन चक्र को जानने से बादशाही पाते हो। काम महाशत्रु है, जिससे आदि, मध्य, अन्त दु:ख मिलता है। वह है दु:ख का चक्र। तुमको बाप यह चक्र का नॉलेज समझाते हैं। स्वदर्शन चक्रधारी बना देते हैं। शास्त्रों में तो कितनी कथायें बना दी हैं। तुमको अभी वह सब भूलना पड़ता है। सिर्फ एक बाप को याद करना है क्योंकि बाप से ही स्वर्ग का वर्सा लेंगे। बाप को याद करना है और वर्सा लेना है। कितना सहज है। बेहद का बाप नई दुनिया स्थापन करते हैं तो वर्सा लेने के लिए ही याद करते हो। यह है मनमनाभव, मध्याजी भव। बाप और वर्से को याद करते, बच्चों को खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए। हम बेहद के बाप के बच्चे हैं। बाप स्वर्ग की स्थापना करते हैं, हम मालिक थे फिर जरूर होंगे। फिर तुम ही नर्कवासी हुए हो। सतोप्रधान थे, अब तमोप्रधान बने हो। भक्ति मार्ग में भी हम ही आये हैं। आलराउण्ड चक्र लगाया है। हम ही भारतवासी सूर्यवंशी थे फिर चन्द्रवंशी, वैश्य वंशी…… बन नीचे गिरे हैं। हम भारतवासी देवी-देवता थे फिर हम ही गिरे हैं। तुमको अभी सारा मालूम पड़ता है। वाम मार्ग में जाते तो कितना छी-छी बन जाते हो। मन्दिर में भी ऐसे छी-छी चित्र बनाये हुए हैं। आगे घड़ियाँ भी ऐसे चित्रों वाली बनाते थे। अब तुम समझते हो हम कितने गुल-गुल थे फिर हम ही पुनर्जन्म लेते-लेते कितने छी-छी बनते हैं। यह सतयुग के मालिक थे तो दैवी गुणों वाले मनुष्य थे। अभी आसुरी गुणों वाले बने हैं और कोई फ़र्क नहीं है। पूँछ वाले वा सूँढ वाले मनुष्य होते नहीं हैं। देवताओं की सिर्फ यह निशानियाँ हैं। बाकी तो स्वर्ग प्राय: लोप हो गया है सिर्फ यह चित्र निशानी हैं। चन्द्रवंशियों की भी निशानी है। अभी तुम माया पर जीत पाने के लिए युद्ध करते हो। युद्ध करते-करते फेल हो जाते हैं तो उनकी निशानी तीर कमान है। भारतवासी वास्तव में हैं ही देवी-देवता घराने के। नहीं तो किस घराने के गिने जाएं। परन्तु भारतवासियों को अपने घराने का मालूम न होने कारण हिन्दू कह देते हैं। नहीं तो वास्तव में तुम्हारा है ही एक घराना। भारत में हैं सब देवता घराने के, जो बेहद का बाप स्थापन करते हैं। शास्त्र भी भारत का एक ही है। डीटी डिनायस्टी की स्थापना होती है, फिर उनमें भिन्न-भिन्न ब्रैन्चेज हो जाती हैं। बाप स्थापन करते हैं देवी-देवता धर्म। मुख्य हैं 4 धर्म। फाउन्डेशन देवी-देवता धर्म का ही है। रहने वाले सब मुक्तिधाम के हैं। फिर तुम अपने देवताओं की ब्रैन्चेज में चले जायेंगे। भारत की बाउन्ड्री एक ही है और कोई धर्म की नहीं है। यह हैं असुल देवता धर्म के। फिर उनसे और धर्म निकले हैं ड्रामा के प्लैन अनुसार। भारत का असुल धर्म है ही डीटी, जो स्थापन करने वाला भी है बाप। फिर नये-नये पत्ते निकलते हैं। यह सारा ईश्वरीय झाड़ है। बाप कहते हैं मैं इस झाड़ का बीजरूप हूँ। यह फाउन्डेशन है फिर उनसे ट्यूब्स निकलती हैं। मुख्य बात है ही हम सब आत्मायें भाई-भाई हैं। सब आत्माओं का बाप एक ही है, सभी उनको याद करते हैं। अब बाप कहते हैं इन आंखों से तुम जो कुछ देखते हो उनको भूल जाना है। यह है बेहद का वैराग्य, उनका है हद का। सिर्फ घरबार से वैराग्य आ जाता है। तुमको तो इस सारी पुरानी दुनिया से वैराग्य है। भक्ति के बाद है वैराग्य पुरानी दुनिया का। फिर हम नई दुनिया में जायेंगे वाया शान्तिधाम। बाप भी कहते हैं यह पुरानी दुनिया भस्म होनी है। इस पुरानी दुनिया से अब दिल नहीं लगानी है। रहना तो यहाँ ही है, जब तक लायक बन जायें। हिसाब-किताब सब चुक्तू करना है।

तुम आधाकल्प के लिए सुख जमा करते हो। उनका नाम ही है शान्तिधाम, सुखधाम। पहले सुख होता है, पीछे दु:ख। बाप ने समझाया है, जो भी नई-नई आत्मायें ऊपर से आती हैं, जैसे क्राइस्ट की आत्मा आई, उनको पहले दु:ख नहीं होता है। खेल है ही पहले सुख, पीछे दु:ख। नये-नये जो आते हैं वह हैं सतोप्रधान। जैसे तुम्हारा सुख का अन्दाज जास्ती है, वैसे सबका दु:ख का अन्दाज जास्ती है। यह सब बुद्धि से काम लिया जाता है। बाप आत्माओं को बैठ समझा रहे हैं। वह फिर और आत्माओं को समझाते हैं। बाप कहते हैं मैंने यह शरीर धारण किया है। बहुत जन्मों के अन्त में अर्थात् तमोप्रधान शरीर में मैं प्रवेश करता हूँ। फिर उनको ही फर्स्ट नम्बर में जाना है। फर्स्ट सो लास्ट, लास्ट सो फर्स्ट। यह भी समझाना पड़ता है। फर्स्ट के पीछे फिर कौन? मम्मा। उनका पार्ट होना चाहिए। उसने बहुतों को शिक्षा दी है। फिर तुम बच्चों में नम्बरवार हैं जो बहुतों को शिक्षा देते, पढ़ाते हैं। फिर वह पढ़ने वाले भी ऐसी कोशिश करते हैं जो तुमसे भी ऊंच चले जाते हैं। बहुत सेन्टर्स पर ऐसे हैं जो पढ़ाने वाली टीचर से ऊंच चले जाते हैं। एक-एक को देखा जाता है। सबकी चलन से मालूम तो पड़ता है ना। कोई-कोई को तो माया ऐसा नाक से पकड़ लेती है जो एकदम खलास कर देती है। विकार में गिर पड़ते हैं। आगे चलकर तुम बहुतों का सुनते रहेंगे। वन्डर खायेंगे, यह तो हमको ज्ञान देती थी, फिर यह कैसे चली गई। हमको कहती थी पवित्र बनो और खुद फिर छी-छी बन गई। समझेंगे तो जरूर ना। बहुत छी-छी बन जाते हैं। बाबा ने कहा है बड़े-बड़े अच्छे महारथियों को भी माया जोर से फथकायेगी। जैसे तुम माया को फथकाकर जीत पहनते हो, माया भी ऐसे करेगी। बाप ने कितने अच्छे-अच्छे फर्स्टक्लास, रमणीक नाम भी रखे। परन्तु अहो माया, आश्चर्यवत् सुनन्ती, कथन्ती, फिर भागन्ती….. गिरन्ती हो गये। माया कितनी जबरदस्त है इसलिए बच्चों को बहुत खबरदार रहना है। युद्ध का मैदान है ना। माया के साथ तुम्हारी कितनी बड़ी युद्ध है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) यहाँ ही सब हिसाब-किताब चुक्तू कर आधाकल्प के लिए सुख जमा करना है। इस पुरानी दुनिया से अब दिल नहीं लगानी है। इन आंखों से जो कुछ दिखाई देता है, उसे भूल जाना है।

2) माया बड़ी जबरदस्त है, उससे खबरदार रहना है। पढ़ाई में गैलप कर आगे जाना है। एक बाप से ही सुनना और उनसे ही सुना हुआ दूसरों को सुनाना है।

वरदान:- सदा एकरस मूड द्वारा सर्व आत्माओं को सुख-शान्ति-प्रेम की अंचली देने वाले महादानी भव
आप बच्चों की मूड सदा खुशी की एकरस रहे, कभी मूड आफ, कभी मूड बहुत खुश… ऐसे नहीं। सदा महादानी बनने वालों की मूड कभी बदलती नहीं है। देवता बनने वाले माना देने वाले। आपको कोई कुछ भी दे लेकिन आप महादानी बच्चे सबको सुख की अंचली, शान्ति की अंचली, प्रेम की अंचली दो। तन की सेवा के साथ मन से ऐसी सेवा में बिजी रहो तो डबल पुण्य जमा हो जायेगा।
स्लोगन:- आपकी विशेषतायें प्रभू प्रसाद हैं, इन्हें सिर्फ स्वयं प्रति यूज़ नहीं करो, बांटो और बढ़ाओ।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 18 NOVEMBER 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 18 November 2019

18-11-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – हद के संसार की वाह्यात बातों में अपना टाइम वेस्ट नहीं करना है, बुद्धि में सदा रॉयल ख्यालात चलते रहें”
प्रश्नः- कौन-से बच्चे बाप के हर डायरेक्शन को अमल में ला सकते हैं?
उत्तर:- जो अन्तर्मुखी हैं, अपना शो नहीं है, रूहानी नशे में रहते हैं, वही बाप के हर डायरेक्शन को अमल में ला सकते हैं। तुम्हें मिथ्या अहंकार कभी नहीं आना चाहिए। अन्दर की बड़ी सफाई हो। आत्मा बहुत अच्छी हो, एक बाप से सच्चा लव हो। कभी लूनपानी अर्थात् खारे-पन का संस्कार न हो, तब बाप का हर डायरेक्शन अमल में आयेगा।

ओम् शान्ति। बच्चे सिर्फ याद की यात्रा में ही नहीं बैठे हैं। बच्चों को यह फ़खुर है कि हम श्रीमत पर अपना परिस्तान स्थापन कर रहे हैं। इतना उमंग, खुशी रहनी चाहिए। किचड़पट्टी आदि की सब वाह्यात बातें निकल जानी चाहिए। बेहद के बाप को देखते ही हुल्लास में आना चाहिए। जितना-जितना तुम याद की यात्रा में रहेंगे उतना इप्रूवमेंट आती जायेगी। बाप कहते हैं बच्चों के लिए रूहानी युनिवर्सिटी होनी चाहिए। तुम्हारी है ही वर्ल्ड स्प्रीचुअल युनिवर्सिटी। तो वह युनिवर्सिटी कहाँ है? युनिवर्सिटी खास स्थापन की जाती है। उसके साथ बड़ी रॉयल हॉस्टल चाहिए। तुम्हारे कितने रॉयल ख्यालात होने चाहिए। बाप को तो रात-दिन यही ख्यालात रहते हैं-कैसे बच्चों को पढ़ाकर ऊंच इम्तहान में पास करायें? जिससे फिर यह विश्व के मालिक बनने वाले हैं। असुल में तुम्हारी आत्मा शुद्ध सतोप्रधान थी तो शरीर भी कितना सतोप्रधान सुन्दर था। राजाई भी कितनी ऊंच थी। तुम्हारा हद के संसार की किचड़पट्टी की बातों में टाइम बहुत वेस्ट होता है। तुम स्टूडेन्ट के अन्दर किचड़पट्टी के ख्यालात नहीं होने चाहिए। कमेटियाँ आदि तो बहुत अच्छी-अच्छी बनाते हैं। परन्तु योगबल है नहीं। गपोड़ा बहुत मारते हैं-हम यह करेंगे, यह करेंगे। माया भी कहती है हम इनको नाक-कान से पकड़ेंगे। बाप के साथ लव ही नहीं है। कहा जाता है ना – नर चाहत कुछ और….. तो माया भी कुछ करने नहीं देती है। माया बहुत ठगने वाली है, कान ही काट लेती है। बाप कितना बच्चों को ऊंच बनाते हैं, डायरेक्शन देते हैं – यह-यह करो। बाबा बड़ी रॉयल-रॉयल बच्चियाँ भेज देते हैं। कोई-कोई कहते हैं बाबा हम ट्रेनिंग लिए जावें? तो बाबा कहते हैं बच्चे, पहले तुम अपनी कमियों को तो निकालो। अपने को देखो हमारे में कितने अवगुण हैं? अच्छे-अच्छे महारथियों को भी माया एकदम लून-पानी कर देती है। ऐसे खारे बच्चे हैं जो बाप को कभी याद भी नहीं करते हैं। ज्ञान का “ग” भी नहीं जानते। बाहर का शो बहुत है। इसमें तो बड़ा अन्तर्मुख रहना चाहिए, परन्तु कइयों की तो ऐसी चलन होती है जैसे अनपढ़ जट लोग होते हैं, थोड़े-से पैसे हैं तो उसका नशा चढ़ जाता है। यह नहीं समझते कि अरे, हम तो कंगाल हैं। माया समझने नहीं देती है। माया बड़ी जबरदस्त है। बाबा थोड़ी महिमा करते हैं तो उसमें बड़ा खुश हो जाते हैं।

बाबा को रात-दिन यही ख्यालात चलती हैं कि युनिवर्सिटी बड़ी फर्स्टक्लास होनी चाहिए, जहाँ बच्चे अच्छी रीति पढ़ें। तुम जानते हो हम स्वर्ग में जाते हैं तो खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए ना। यहाँ बाबा किस्म-किस्म का डोज़ देते हैं, नशा चढ़ाते हैं। कोई देवाला निकाला हुआ हो, उनको शराब पिला दो तो समझेंगे हम बादशाह हैं। फिर नशा पूरा होने से वैसे का वैसा बन जाते हैं। अब यह तो है रूहानी नशा। तुम जानते हो बेहद का बाप टीचर बन हमको पढ़ाते हैं और डायरेक्शन देते हैं-ऐसे-ऐसे करो। कोई-कोई समय में किसको मिथ्या अहंकार भी आ जाता है। माया है ना। ऐसी-ऐसी बातें बनाते हैं जो बात मत पूछो। बाबा समझते हैं यह चल नहीं सकेंगे। अन्दर की बड़ी सफाई चाहिए। आत्मा बहुत अच्छी चाहिए। तुम्हारी लव मैरेज हुई है ना। लव मैरेज में कितना प्यार होता है, यह तो पतियों का पति है। सो भी कितनों की लव मैरेज होती है। एक की थोड़ेही होती है। सब कहते हैं हमारी तो शिवबाबा के साथ सगाई हो गई। हम तो स्वर्ग में जाकर बैठेंगे। खुशी की बात है ना। अन्दर में आना चाहिए ना बाबा हमको कितना श्रृंगार करते हैं। शिवबाबा श्रृंगार करते हैं इन द्वारा। तुम्हारी बुद्धि में है कि हम बाप को याद करते-करते सतोप्रधान बन जायेंगे। इस नॉलेज को और कोई जानता ही नहीं। इसमें बड़ा नशा रहता है। अभी अजुन इतना नशा चढ़ता नहीं है। होना है जरूर। गायन भी है अतीन्द्रिय सुख गोप-गोपियों से पूछो। अभी तुम्हारी आत्मायें कितनी छी-छी हैं। जैसे बहुत छी-छी किचड़े में बैठी हैं। उन्हों को बाप आकर चेंज करते हैं, रिज्युवनेट करते हैं। मनुष्य ग्लान्स चेंज कराते हैं तो कितनी खुशी होती है। तुमको तो अब बाप मिला तो बेड़ा ही पार है। समझते हो हम बेहद के बाप के बने हैं तो अपने को कितना जल्दी सुधारना चाहिए। रात-दिन यही खुशी, यही चिन्तन रहे-तुमको मार्शल देखो कौन मिला हुआ है! रात-दिन इसी ख्यालात में रहना होता है। जो-जो अच्छी रीति समझते हैं, पहचानते हैं, वह तो जैसे उड़ने लग पड़ते हैं।

तुम बच्चे अभी संगम पर हो। बाकी वह सभी तो गंद में पड़े हैं। जैसे किचड़े के किनारे झोपड़ियाँ लगाकर गंद में बैठे रहते हैं ना। कितनी झुग्गियाँ बनी हुई रहती हैं। यह फिर है बेहद की बात। अभी उनसे निकलने की शिवबाबा तुमको बहुत सहज युक्ति बतलाते हैं। मीठे-मीठे बच्चों तुम जानते हो ना इस समय तुम्हारी आत्मा और शरीर दोनों ही पतित हैं। अभी तुम निकल आये हो। जो-जो निकलकर आये हैं उनमें ज्ञान की पराकाष्ठा है ना। तुमको बाप मिला तो फिर क्या! यह नशा जब चढ़े तब तुम किसको समझा सको। बाप आया हुआ है। बाप हमारी आत्मा को पवित्र बना देते हैं। आत्मा पवित्र बनने से फिर शरीर भी फर्स्ट-क्लास मिलता है। अभी तुम्हारी आत्मा कहाँ बैठी है? इस झुग्गी (शरीर) में बैठी हुई है। तमोप्रधान दुनिया है ना। किचड़े के किनारे पर आकर बैठे हैं ना। विचार करो हम कहाँ से निकले हैं। बाप ने गन्दे नाले से निकाला है। अब हमारी आत्मा स्वच्छ बन जायेगी। रहने वाले भी फर्स्टक्लास महल बनायेंगे। हमारी आत्मा को बाप श्रृंगार कर स्वर्ग में ले जा रहे हैं। अन्दर में ऐसे-ऐसे ख्यालात बच्चों को आने चाहिए। बाप कितना नशा चढ़ाते हैं। तुम इतना ऊंच थे फिर गिरते-गिरते आकर नीचे पड़े हो। शिवालय में थे तो आत्मा कितनी शुद्ध थी। तो फिर आपस में मिलकर जल्दी-जल्दी शिवालय में जाने का उपाय करना चाहिए।

बाबा को तो वन्डर लगता है – बच्चों को वह दिमाग नहीं! बाबा हमको कहाँ से निकालते हैं! पाण्डव गवर्मेन्ट स्थापन करने वाला बाप है। भारत जो हेविन था सो अब हेल है। आत्मा की बात है। आत्मा पर ही तरस पड़ता है। एकदम तमोप्रधान दुनिया में आकर आत्मा बैठी है इसलिए बाप को याद करती है-बाबा, हमको वहाँ ले जाओ। यहाँ बैठे भी तुमको यह ख्यालात चलाने चाहिए इसलिए बाबा कहते हैं बच्चों के लिए फर्स्टक्लास युनिवर्सिटी बनाओ। कल्प-कल्प बनती है। तुम्हारे ख्यालात बड़े आलीशान होने चाहिए। अभी वह नशा नहीं चढ़ा हुआ है। नशा हो तो पता नहीं क्या करके दिखायें। बच्चे युनिवर्सिटी का अर्थ नहीं समझते हैं। उस रॉयल्टी के नशे में नहीं रहते हैं। माया दबाकर बैठी है। बाबा समझाते हैं बच्चे अपना उल्टा नशा मत चढ़ाओ। हरेक अपनी-अपनी क्वालिफिकेशन देखो। हम कैसे पढ़ते हैं, क्या मदद करते हैं, सिर्फ बातों का पकौड़ा नहीं खाना है। जो कहते हो वह करना है। गपोड़े नहीं कि यह करेंगे, यह करेंगे। आज कहते हैं यह करेंगे, कल मौत आया खत्म हो जायेंगे। सतयुग में तो ऐसे नहीं कहेंगे। वहाँ कभी अकाले मृत्यु होता नहीं। काल आ नहीं सकता। वह है ही सुखधाम। सुखधाम में काल के आने का हुक्म नहीं। रावण राज्य और रामराज्य के भी अर्थ को समझना है। अभी तुम्हारी लड़ाई है ही रावण से। देह-अभिमान भी कमाल करता है, जो बिल्कुल पतित बना देता है। देही-अभिमानी होने से आत्मा शुद्ध बन जाती है। तुम समझते हो ना वहाँ हमारे कैसे महल बनेंगे। अभी तुम तो संगम पर आ गये हो। नम्बरवार सुधर रहे हो, लायक बन रहे हो। तुम्हारी आत्मा पतित होने के कारण शरीर भी पतित मिले हैं। अभी मैं आया हूँ तुमको स्वर्गवासी बनाने। याद के साथ दैवीगुण भी चाहिए। मासी का घर थोड़ेही है। समझते हैं कि बाबा आया है हमको नर से नारायण बनाने परन्तु माया का बड़ा गुप्त मुकाबला है। तुम्हारी लड़ाई है ही गुप्त इसलिए तुमको अननोन-वारियर्स कहा गया है। अननोन वारियर और कोई होता ही नहीं। तुम्हारा ही नाम है वारियर्स। और तो सबके नाम रजिस्टर में हैं ही। तुम अननोन वारियर्स की निशानी उन्होंने पकड़ी है। तुम कितने गुप्त हो, किसको पता नहीं। तुम विश्व पर विजय पा रहे हो माया को वश करने के लिए। तुम बाप को याद करते हो फिर भी माया भुला देती है। कल्प-कल्प तुम अपना राज्य स्थापन कर लेते हो। तो अननोन वारियर्स तुम हो जो सिर्फ बाप को याद करते हो। इसमें हाथ-पांव कुछ नहीं चलाते हो। याद के लिए युक्तियाँ भी बाबा बहुत बतलाते हैं। चलते-फिरते तुम याद की यात्रा करो, पढ़ाई भी करो। अभी तुम समझते हो हम क्या थे, क्या बन गये हैं। अब फिर बाबा हमको क्या बनाते हैं। कितना सहज युक्ति बतलाते हैं। कहाँ भी रहते याद करो तो जंक उतर जाये। कल्प-कल्प यह युक्ति देते रहते हैं। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो सतोप्रधान बनेंगे, और कोई भी बंधन नहीं। बाथरूम में जाओ तो भी अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो आत्मा का मैल उतर जाये। आत्मा को कोई तिलक नहीं लगाना होता है, यह सब तो भक्ति मार्ग की निशानी हैं। इस ज्ञान मार्ग में कोई दरकार नहीं है, पाई का खर्चा नहीं। घर बैठे याद करते रहो। कितना सहज है। वह बाबा हमारा बाप भी है, टीचर और गुरू भी है।

पहले बाप की याद फिर टीचर की फिर गुरू की, कायदा ऐसे कहता है। टीचर को तो जरूर याद करेंगे, उनसे पढ़ाई का वर्सा मिलता है फिर वानप्रस्थ अवस्था में गुरू मिलता है। यह बाप तो सब होलसेल में दे देते हैं। तुमको 21 जन्म के लिए राजाई होलसेल में दे देते हैं। शादी में कन्या को दहेज गुप्त देते हैं ना। शो करने की दरकार नहीं। कहा जाता है गुप्त दान। शिवबाबा भी गुप्त है ना, इसमें अहंकार की कोई बात नहीं। कोई-कोई को अहंकार रहता है कि सब देखें। यह है सब गुप्त। बाप तुमको विश्व की बादशाही दहेज में देते हैं। कितना गुप्त तुम्हारा श्रृंगार हो रहा है। कितना बड़ा दहेज मिलता है। बाप कैसे युक्ति से देते हैं, किसको पता नहीं पड़ता। यहाँ तुम बेगर हो, दूसरे जन्म में गोल्डन स्पून इन माउथ होगा। तुम गोल्डन दुनिया में जाते हो ना। वहाँ सब कुछ सोने का होगा। साहूकारों के महलों में अच्छी जड़ित होगी। फ़र्क तो जरूर रहेगा। यह भी अभी तुम समझते हो-माया सबको उल्टा लटका देती है। अब बाप आया है तो बच्चों में कितना हौंसला होना चाहिए। परन्तु माया भुला देती है-बाप का डायरेक्शन है या ब्रह्मा का? भाई का है या बाप का? इसी में बहुत मूँझते हैं। बाप कहते हैं अच्छा वा बुरा हो-तुम बाप का डायरेक्शन ही समझो। उन पर चलना पड़े। इनकी कोई भूल भी हो जायेगी तो अभुल करा देंगे। उनमें ताकत तो है ना। तुम देखते हो यह कैसे चलते हैं, इनके सिर पर कौन बैठे हैं। एकदम बाजू में बैठे हैं। गुरू लोग बाजू में बिठाकर सिखलाते हैं ना। तो भी मेहनत इनको करनी होती है। तमोप्रधान से सतोप्रधान बनने में पुरूषार्थ करना पड़ता है।

बाप कहते हैं मुझे याद कर भोजन बनाओ। शिवबाबा की याद का भोजन और किसको मिल न सके। अभी के भोजन का ही गायन है। वह ब्राह्मण लोग भल स्तुति गाते हैं परन्तु अर्थ कुछ नहीं समझते। जो महिमा करते हैं, समझते कुछ नहीं। इतना समझा जाता है कि यह रिलीजस माइन्डेड हैं क्योंकि पुजारी हैं। वहाँ तो रिलीजस माइन्डेड की बात ही नहीं, वहाँ भक्ति होती नहीं। यह भी किसको पता नहीं है-भक्ति क्या चीज़ होती है। कहते थे ज्ञान, भक्ति, वैराग्य। कितने फर्स्ट क्लास अक्षर हैं। ज्ञान दिन, भक्ति रात। फिर रात से वैराग्य तो दिन में जाते हैं। कितना क्लीयर है। अभी तुम समझ गये हो तो तुमको धक्का नहीं खाना पड़ता है।

बाप कहते हैं मुझे याद करो, मैं तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ। मैं तुम्हारा बेहद का बाप हूँ, सृष्टि का चक्र जानना भी कितना सहज है। बीज और झाड को याद करो। अभी कलियुग का अन्त है फिर सतयुग आना है। अभी तुम संगमयुग पर गुल-गुल बनते हो। आत्मा सतोप्रधान बन जायेगी तो फिर रहने का भी सतोप्रधान महल मिलेगा। दुनिया ही नई बन जाती है। तो बच्चों को कितनी खुशी रहनी चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सदा फ़खुर (नशा) रहे कि हम श्रीमत पर अपना परिस्तान स्थापन कर रहे हैं। वाह्यात किचड़पट्टी की बातों को छोड़ बड़े हुल्लास में रहना है।

2) अपने ख्यालात बड़े आलीशान रखने हैं। बहुत अच्छी रॉयल युनिवर्सिटी और हॉस्टल खोलने का प्रबन्ध करना है। बाप का गुप्त मददगार बनना है, अपना शो नहीं करना है।

वरदान:- ज्ञान सम्पन्न दाता बन सर्व आत्माओं के प्रति शुभचिंतक बनने वाले श्रेष्ठ सेवाधारी भव
शुभ-चिंतक बनने का विशेष आधार शुभ चिंतन है। जो व्यर्थ चिंतन वा परचिंतन करते हैं वह शुभ चिंतक नहीं बन सकते। शुभचिंतक मणियों के पास शुभ-चिंतन का शक्तिशाली खजाना सदा भरपूर होगा। भरपूरता के कारण ही औरों के प्रति शुभचिंतक बन सकते हैं। शुभचिंतक अर्थात् सर्व ज्ञान रत्नों से भरपूर, ऐसे ज्ञान सम्पन्न दाता ही चलते-फिरते हर एक की सेवा करते श्रेष्ठ सेवाधारी बन जाते हैं।
स्लोगन:- विश्व राज्य अधिकारी बनना है तो विश्व परिवर्तन के कार्य में निमित्त बनो।
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