Daily Gyan Murli : Hindi

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 15 APRIL 2021 : AAJ KI MURLI

15-04-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – बाप समान रहमदिल बन अनेकों को रास्ता बताओ, जो बच्चे दिन रात सर्विस में लगे रहते हैं – वही बहादुर हैं”
प्रश्नः- ऊंची तकदीर का मुख्य आधार किस बात पर है?
उत्तर:- याद की यात्रा पर। जितना जो याद करता है उतनी ऊंची तकदीर बनाता है। शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करते बाप और वर्से को याद करते रहो तो तकदीर ऊंची बनती जायेगी।
गीत:- तकदीर जगाकर आई हूँ… 

ओम् शान्ति। बच्चे जब पैदा होते हैं तो अपने साथ कर्मों अनुसार तकदीर ले आते हैं। कोई साहूकार पास, कोई गरीब के पास जन्म लेते हैं। बाप भी समझते हैं कि वारिस आया है। जैसे-जैसे दान पुण्य किया है, उस अनुसार जन्म मिलता है। अब तुम मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों को कल्प बाद फिर से बाप ने आकर समझाया है। बच्चे भी जानते हैं कि हम अपनी तकदीर ले आये हैं। स्वर्ग की बादशाही की तकदीर ले आये हैं, जिन्होंने अच्छी तरह से जाना है और बाप को याद कर रहे हैं। याद के साथ तकदीर का कनेक्शन है। जन्म लिया है – तो बाप की याद भी होनी चाहिए। जितना याद करेंगे उतनी तकदीर ऊंची रहेगी। कितनी सहज बात है। सेकेण्ड में जीवनमुक्ति मिल जाती है। तुम आये हो सुखधाम की तकदीर प्राप्त करने। अभी हर एक पुरूषार्थ कर रहे हैं। हर एक अपने को देख रहे हैं कि हम कैसे पुरूषार्थ कर रहे हैं। जैसे मम्मा बाबा और सर्विसएबुल बच्चे पुरूषार्थ करते हैं उनको फॉलो करना चाहिए। सबको बाप का परिचय देना चाहिए। बाप का परिचय दिया तो रचना के आदि-मध्य-अन्त का भी आ जायेगा। ऋषि, मुनि आदि कोई भी रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त का नॉलेज दे नहीं सकते। अभी तुम्हारी बुद्धि में सारा चक्र स्मृति में रहता है। दुनिया में कोई भी बाप और वर्से को नहीं जानते। तुम बच्चे अब बाप को और अपनी तकदीर को जानते हो। अब बाप को याद करना है। शरीर निर्वाह अर्थ कर्म भी करना है। घरबार भी सम्भालना है। कोई निर्बन्धन हैं तो वह अच्छी सर्विस कर सकते हैं। बाल-बच्चे कोई नहीं तो उनको सर्विस करने का अच्छा चांस है। स्त्री को पति वा बच्चों का बंधन होता है। अगर बच्चे नहीं हैं तो बन्धनमुक्त ठहरे ना। वह जैसे वानप्रस्थी हो गये। फिर मुक्तिधाम में जाने के लिए संग चाहिए। भक्ति मार्ग में तो संग मिलता है – साधुओं आदि का, निवृत्ति मार्ग वालों का। वह निवृत्ति मार्ग वाले प्रवृत्ति मार्ग का वर्सा दिला न सकें। तुम बच्चे ही दिला सकते हो। तुमको बाप ने रास्ता बताया है। भारत की हिस्ट्री-जॉग्राफी 84 जन्मों की बैठ समझाओ। भारतवासी ही 84 जन्म लेते हैं। एक की बात नहीं है। सूर्यवंशी सो फिर चन्द्रवंशी, फिर वैश्यवंशी…. घराने में आते हैं, नम्बरवार तो होते हैं ना। भारत का पहला नम्बर प्रिन्स है श्रीकृष्ण, जिसको झूले में झुलाते हैं। दूसरे नम्बर को झुलाते ही नहीं हैं क्योंकि कला कम हो गई। जो पहला नम्बर है, पूजा उसकी होती है। मनुष्य समझते नहीं कि कृष्ण एक है वा दो तीन हैं। कृष्ण की डिनायस्टी चलती है, यह किसको भी पता नहीं है। पूजा सिर्फ नम्बरवन की होती है। मार्क्स तो नम्बरवार ही मिलते हैं। तो पुरूषार्थ करना चाहिए कि क्यों न हम पहले नम्बर में आयें। मम्मा बाबा को फालो करें, उनकी राजधानी ले लेवें। जो अच्छी सर्विस करेंगे वह अच्छे महाराजा के घर में जन्म लेंगे। वहाँ तो है ही महाराजा महारानी। उस समय कोई राजा-रानी का टाइटिल नहीं होता है। वह बाद में शुरू होता है। द्वापर से जब पतित बनते हैं तो उनमें बड़ी प्रापर्टी वाले को राजा कहा जाता है। फिर महाराजा का लकब कम हो जाता है, प्राय: लोप हो जाता है। फिर जब भक्ति मार्ग होता है तो गरीब, साहूकार में फ़र्क तो रहता है ना। अब तुम बच्चे ही शिवबाबा को याद करते हो और उनसे वर्सा ले रहे हो। और सतसंगों में मनुष्य बैठ कथा सुनाते हैं, मनुष्य, मनुष्य को भक्ति सिखलाते हैं। वे ज्ञान देकर सद्गति नहीं कर सकते। वेद, शास्त्र आदि सब हैं भक्ति मार्ग के। सद्गति तो ज्ञान से होती है। पुनर्जन्म को भी मानते हैं। बीच में तो कोई भी वापिस जा न सके। अन्त में ही बाप आकर सबको ले जाते हैं। इतनी सब आत्मायें कहाँ जाकर ठहरेंगी? सब धर्म वालों के सेक्शन तो अलग-अलग हैं ना। तो यह भी समझाना है। यह किसको पता नहीं है कि आत्माओं का भी झाड़ है। तुम बच्चों की बुद्धि में सारे झाड़ का ज्ञान रहता है। आत्माओं का झाड़ भी है, जीव आत्माओं का भी झाड़ है। बच्चे जानते हैं कि हम यह पुराना शरीर छोड़कर घर जा रहे हैं। “मैं आत्मा” इस शरीर से अलग हूँ – यह समझना गोया जीते जी मरना। आप मुये मर गई दुनिया। मित्र, सम्बन्धी आदि सबको छोड़ दिया। पहले पूरी शिक्षा लेकर, मर्तबे के अधिकारी बन फिर जाना है। बाप को याद करना तो बहुत सहज है। भल कोई बीमार हो, उनको भी कहते रहना चाहिए कि शिवबाबा को याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। जो पक्के योगी हैं उनके लिए जल्दी मरना (शरीर छोड़ना) भी अच्छा नहीं है क्योंकि वह योग में रहकर रूहानी सेवा करते हैं। मर जायेंगे तो सेवा कर नहीं सकेंगे। सेवा करने से अपना ऊंच पद बनाते रहेंगे और भाई-बहिनों की सेवा भी होगी। वह भी बाप से वर्सा पा लेंगे। हम आपस में भाई-भाई हैं, एक बाप के बच्चे हैं।

बाप कहते हैं öमुझे याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। आगे भी ऐसे कहा था। किसको भी समझा सकते हो, बहन जी अथवा भाई जी, तुम्हारी आत्मा तमोप्रधान बन गई है। जो सतोप्रधान थी अब फिर तमोप्रधान से सतोप्रधान बन सतोप्रधान दुनिया में चलना है। आत्मा को सतोप्रधान बनाना है याद की यात्रा से। याद का पूरा चार्ट रखना चाहिए। ज्ञान का चार्ट नहीं रख सकेंगे। बाप तो ज्ञान देते रहते हैं। जाँच रखनी है कि हमारे ऊपर जो विकर्मों का बोझा है, वह कैसे उतरे इसलिए याद का चार्ट रखा जाता है। हमने कितना घण्टा याद किया? मूलवतन को भी याद करते हैं फिर नई दुनिया को भी याद करते हैं। उथल-पुथल होनी है। उसकी भी तैयारी हो रही है। बॉम्ब्स आदि भी बनते जायेंगे। एक तरफ कहते हैं कि हम ऐसे-ऐसे मौत के लिए सामान बना रहे हैं। दूसरी तरफ कहते मौत का सामान नहीं बनाओ। समुद्र के नीचे भी मारने का सामान रखा है, ऊपर आकर बॉम्ब्स छोड़ फिर समुद्र में चले जायेंगे। ऐसी-ऐसी चीज़े बनाते रहते हैं। यह अपने ही विनाश के लिए कर रहे हैं। मौत सामने खड़ा है। इतने बड़े-बड़े महल बना रहे हैं। तुम जानते हो यह सब मिट्टी में मिल जायेंगे। किनकी दबी रही धूल में… लड़ाई जरूर होगी। कोशिश कर पॉकेट सबके खाली करेंगे। चोर भी कितने घुस पड़ते हैं। लड़ाई पर कितना खर्चा करते हैं। यह सब मिट्टी में मिल जाना है। मकान आदि सब गिरेंगे। बॉम्ब्स आदि गिरने से सृष्टि के 3 भाग खलास हो जाते हैं। बाकी एक भाग बच जाता है। भारत एक हिस्से में है ना। बाकी तो सब बाद में आये हुए हैं। अभी भारत का ही भाग बचेगा। मौत तो सबका होना ही है तो क्यों न हम बाप से पूरा वर्सा ले लेंवे इसलिए बाप कहते हैं लौकिक सम्बन्धियों से भी तोड़ निभाना है। बाकी बंधन नहीं है तो बाबा राय देंगे कि क्यों नहीं सर्विस पर लग जाते हो। स्वतन्त्र हैं तो बहुतों का भला कर सकते हैं। अच्छा कहाँ बाहर न जायें तो अपने मित्र सम्बन्धियों पर ही रहम करना चाहिए। आगे कहते थे ना कि बाबा रहम करो। अब तो तुमको रास्ता मिला है तो औरों पर भी रहम करना चाहिए, जैसे बाप रहम करता है। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। संन्यासी लोग तो हठयोग आदि की कितनी मेहनत करते हैं। यहाँ तो यह कुछ नहीं है। सिर्फ याद करो तो पाप भस्म हो जायेंगे, इसमें कोई तकलीफ नहीं। सिर्फ याद के यात्रा की बात है। उठो-बैठो, कर्मेन्द्रियों से भल कर्म भी करो, सिर्फ बुद्धि का योग बाप से लगाओ। सच्चा-सच्चा आशिक बनना है उस माशूक का। खुद कहते हैं कि हे आशिकों, हे बच्चों! भक्ति मार्ग में तो बहुत याद किया। लेकिन अब मुझ माशूक को याद करो तो तुम्हारे पाप भस्म होंगे। मैं गैरन्टी करता हूँ। कोई-कोई बात शास्त्रों में आ गई है। भगवान द्वारा गीता सुनने से तुम जीवनमुक्ति पाते हो। मनुष्य द्वारा गीता सुनने से जीवनबन्ध में आ गये हो, सीढ़ी उतरते आये हो। हर एक बात में विचार सागर मंथन करना है। अपनी बुद्धि चलानी है। यह बुद्धि की यात्रा है, जिससे विकर्म विनाश होंगे। वेद, शास्त्र, यज्ञ, तप आदि करने से पाप नाश नहीं होंगे। नीचे ही गिरते आये। अभी तुमको ऊपर जाना है। सिर्फ सीढ़ी से कोई समझ नहीं सकेंगे, जब तक उस पर कोई समझाये नहीं। जैसे छोटे बच्चे को चित्र दिखाकर सिखाना पड़ता है – यह हाथी है। जब हाथी देखेंगे तो चित्र भी याद आयेगा। जैसे तुम्हारी बुद्धि में आ गया है। चित्र में हमेशा छोटी चीज़ दिखाई जाती है। तुम जानते हो कि वैकुण्ठ तो बड़ा होगा ना। बड़ी राजधानी होगी। वहाँ हीरे जवाहरातों के महल होते हैं, वह फिर प्राय:लोप हो जाते हैं। सब चीज़ें गायब हो जाती हैं। नहीं तो यह भारत गरीब कैसे बना? साहूकार से गरीब, गरीब से साहूकार बनना है। यह ड्रामा बना-बनाया है इसलिए सीढ़ी पर समझाया जाता है, नये-नये आते हैं उनको समझाने से प्रैक्टिस होगी, मुख खुल जायेगा। सर्विस लायक बच्चों को बनाया जाता है। कई सेन्टर्स पर तो बहुत बच्चे अशान्ति फैलाते रहते हैं। बुद्धियोग बाहर भटकता है तो नुकसान कर देते हैं। वायुमण्डल खराब कर देते हैं। नम्बरवार तो हैं ना। फिर बाप कहेगा तुमने पढ़ा नहीं, तो यह हाल अपना देखो। दिन-प्रतिदिन जास्ती साक्षात्कार होते रहेंगे। पाप करने वालों को सज़ायें भी मिलती रहेंगी। फिर कहेंगे – नाहेक हमने पाप किया। बाप को सुनाकर प्रायश्चित करने से कुछ कम हो सकता है। नहीं तो वृद्धि होती रहेगी। ऐसा होता रहता है। खुद भी महसूस करेंगे परन्तु फिर कहते क्या करें – हमारी यह आदत मिटती नहीं, इससे तो घर जाकर रहें। कोई तो अच्छी सर्विस करते हैं। कोई डिस-सर्विस भी करते हैं। हमारी सेना में कौन-कौन बहादुर हैं, यह बाप बैठ नाम बताते हैं। बाकी लड़ाई आदि की यहाँ बात नहीं है। यह हैं बेहद की बातें। अच्छे बच्चे होंगे तो बाप जरूर महिमा भी करेंगे। बच्चों को बहुत रहमदिल, कल्याणकारी बनना है। अन्धों की लाठी बनना है। सबको रास्ता बताना है कि बाप को याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। पाप आत्मा और पुण्य आत्मा कहते हैं ना। ऐसे थोड़ेही कि अन्दर परमात्मा है वा आत्मा कोई परमात्मा बन जाती है। यह सब रांग है। परमात्मा पर थोड़ेही पाप लगता है। उसका तो ड्रामा में पार्ट है सर्विस करने का। मनुष्य ही पापात्मा, पुण्यात्मा बनते हैं। जो सतोप्रधान थे वही तमोप्रधान बने हैं। उनके तन में बाप बैठ सतोप्रधान बनाते हैं तो उनकी मत पर चलना पड़े ना।

अभी बाप ने तुम बच्चों को विशालबुद्धि बनाया है। अभी तुम जानते हो कि राजधानी कैसे स्थापन हो रही है। बाप ही ब्रह्मा तन में आकर ब्रह्मा मुख वंशावली बच्चों को राजयोग सिखाए देवी देवता बनाते हैं। फिर पुनर्जन्म ले सीढ़ी उतरते हैं। अब फिर सब रिपीट करना है। बाप फिर ब्रह्मा द्वारा स्थापना करा रहे हैं। योग बल से तुम 5 विकारों पर जीत पाकर जगतजीत बनते हो। बाकी लड़ाई आदि की कोई बात नहीं है। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बन्धनमुक्त बन बाप की सर्विस में लग जाना है, तब ही ऊंची तकदीर बनेंगी। रहमदिल बन अनेको को रास्ता बताना है। अन्धों की लाठी बनना है।

2) इस शरीर से ममत्व निकाल जीते जी मरना है क्योंकि अब वापिस घर जाना है। बीमारी में भी एक बाप की याद रहे तो विकर्म विनाश हो जायेंगे।

वरदान:- अन्य आत्माओं की सेवा के साथ-साथ स्वयं की भी सेवा करने वाले सफलतामूर्त भव
सेवा में सफलतामूर्त बनना है तो दूसरों की सर्विस के साथ-साथ अपनी भी सर्विस करो। जब कोई भी सर्विस पर जाते हो तो ऐसे समझो कि सर्विस के साथ-साथ अपने भी पुराने संस्कारों का अन्तिम संस्कार करते हैं। जितना संस्कारों का संस्कार करेंगे उतना ही सत्कार मिलेगा। सभी आत्मायें आपके आगे मन से नमस्कार करेंगी। लेकिन बाहर से नमस्कार करने वाले नहीं बनाना, मानसिक नमस्कार करने वाले बनाना।
स्लोगन:- बेहद की सेवा का लक्ष्य रखो तो हद के बन्धन सब टूट जायेंगे।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 14 APRIL 2021 : AAJ KI MURLI

14-04-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – अन्तर्मुखी बन ज्ञान रूप अवस्था में रहकर इन महावाक्यों को धारण करो तब अपना व अन्य आत्माओं का कल्याण कर सकेंगे, अपने मन वा दिल रूपी मन्दिर को ईश्वरीय गुणों रूपी मूर्तियों से सजाओ और पवित्र संकल्पों की खुशबू फैलाओ “
प्रश्नः- सर्वोत्तम सच्ची सर्विस कौन सी है? यथार्थ सर्विस का सूक्ष्म और महीन राज़ क्या है?
उत्तर:- जब किसी से कोई भूल होती है तो उसे सावधान करने के साथ सूक्ष्म रीति से अपनी योग शक्ति उन तक पहुंचाकर उनके अशुद्ध संकल्पों को भस्म करना, यही सर्वोत्तम सच्ची सर्विस है। साथ-साथ अपने ऊपर भी अटेन्शन देना, मन्सा में भी कोई अशुद्ध संकल्प उत्पन्न न हो। इसमें खुद भी सावधान रहना और दूसरों प्रति ऐसी दिव्य सर्विस करना, यही सर्विस का सूक्ष्म और महीन राज़ है।

ओम शान्ति। हर एक पुरुषार्थी बच्चे को पहले अन्तर्मुख अवस्था अवश्य धारण करनी है। अन्तर्मुखता में बड़ा ही कल्याण समाया हुआ है, इस अवस्था से ही अचल, स्थिर, धैर्यवत, निर्माणचित इत्यादि दैवी गुणों की धारणा हो सकती है तथा सम्पूर्ण ज्ञानमय अवस्था प्राप्त हो सकती है। अन्तर्मुख न होने के कारण वह सम्पूर्ण ज्ञान रूप अवस्था नहीं प्राप्त होती क्योंकि जो भी कुछ ”महावाक्य“ सम्मुख सुने जाते हैं, अगर उसे गहराई में जाकर ग्रहण नहीं करते सिर्फ उन महावाक्यों को सुनकर रिपीट कर देते हैं तो वह महावाक्य, वाक्य हो जाते हैं। जो ज्ञान रूप अवस्था में रहकर महावाक्य नहीं सुने जाते, उन महावाक्यों पर माया का परछाया पड़ जाता है। अब ऐसी माया के अशुद्ध वायब्रेशन से भरे हुए महावाक्य सुनकर सिर्फ रिपीट करने से खुद सहित औरों का कल्याण होने के बदले अकल्याण हो जाता है इसलिए हे बच्चों एकदम अन्तर्मुखी बन जाओ।

आपका यह मन मन्दिर सदृश्य है। जैसे मन्दिर से सदैव खुशबू आती है ऐसे मन मन्दिर जब पवित्र बनता है तो संकल्प भी पवित्र इमर्ज होते हैं। जैसे मन्दिर में सिर्फ पवित्र देवी देवताओं के ही चित्र रखे जाते हैं, न कि दैत्यों के। ऐसे तुम बच्चे अपने मन व दिल रूपी मन्दिर को सर्व ईश्वरीय गुणों की मूर्तियों से सजा दो, वे गुण हैं – निर्मोह, निर्लोभ, निर्भय, धैर्यवत, निरंहकार इत्यादि क्योंकि यह सब तुम्हारे ही दिव्य लक्षण हैं। आप बच्चों को अपने मन मन्दिर को उजियारा अर्थात् सम्पूर्ण शुद्ध बनाना है। जब मन मन्दिर उजियारा बनें तब ही अपने उजियारे प्यारे वैकुण्ठ देश में चल सकें। तो अब अपने मन को उज्वल बनाने का प्रयत्न करना है तथा मन सहित विकारी कर्मेन्द्रियों को वश करना है। परन्तु न सिर्फ अपना मगर अन्य प्रति भी यही दिव्य सर्विस करनी है।

वास्तव में सर्विस का अर्थ अति सूक्ष्म और महीन है। ऐसा नहीं कि किसकी भूल पर सिर्फ सावधान करना इतने तक सर्विस है। परन्तु नहीं, उनको सूक्ष्म रीति अपनी योग की शक्ति पहुंचाए उनके अशुद्ध संकल्प को भस्म कर देना, यही सर्वोत्तम सच्ची सर्विस है और साथ-साथ अपने ऊपर भी अटेन्शन रखना है। न सिर्फ वाचा अथवा कर्मणा तक मगर मन्सा में भी कोई अशुद्ध संकल्प उत्पन्न होता है तो उनका वायब्रेशन अन्य के पास जाए सूक्ष्म रीति अकल्याण करता है, जिसका बोझ खुद पर आता है और वही बोझ बन्धन बन जाता है इसलिए हे बच्चों खुद सावधान रहो फिर अन्य प्रति वही दिव्य सर्विस करो, यही आप सेवाधारी बच्चों का अलौकिक कर्तव्य है। ऐसी सर्विस करने वालों को फिर अपने प्रति कोई भी सर्विस नहीं लेनी है। भल कभी कोई अनायास भूल हो भी जाए तो उसे अपने बुद्धियोग बल से सदैव के लिए करेक्ट कर देना है। ऐसा तीव्र पुरुषार्थी थोड़ा भी ईशारा मिलने से शीघ्र महसूस करके परिवर्तन कर लेता है और आगे के लिए अच्छी रीति अटेन्शन रख चलता है, यही विशाल बुद्धि बच्चों का कर्तव्य है।

हे मेरे प्राणों, परमात्मा द्वारा रचे हुए इस अविनाशी राजस्व ज्ञान यज्ञ प्रति तन, मन, धन को सम्पूर्ण रीति से स्वाहा करने का राज़ बहुत महीन है। जिस घड़ी आप कहते हो कि मैं तन मन धन सहित यज्ञ में स्वाहा अर्थात् अर्पण हो मर चुका, उस घड़ी से लेकर अपना कुछ भी नहीं रहता। उसमें भी पहले तन, मन को सम्पूर्ण रीति से सर्विस में लगाना है। जब सब कुछ यज्ञ अथवा परमात्मा के प्रति है तो फिर अपने प्रति कुछ रह नहीं सकता, धन भी व्यर्थ नहीं गंवा सकते। मन भी अशुद्ध संकल्प विकल्प तरफ दौड़ नहीं सकता क्योंकि परमात्मा को अर्पण कर दिया। अब परमात्मा तो है ही शुद्ध शान्त स्वरूप। इस कारण अशुद्ध संकल्प स्वत: शान्त हो जाते हैं। अगर मन माया के हाथ में दे देते हो तो माया वैरायटी रूप होने के कारण अनेक प्रकारों के विकल्प उत्पन्न कर मन रूपी घोड़े पर आए सवारी करती है। अगर किसी बच्चे को अभी तक भी संकल्प विकल्प आते हैं तो समझना चाहिए कि अभी मन पूर्ण रीति से स्वाहा नहीं हुआ है अर्थात् ईश्वरीय मन नहीं बना है इसलिए हे सर्व त्यागी बच्चों, इन गुह्य राज़ों को समझ कर्म करते साक्षी हो खुद को देख बहुत खबरदारी से चलना है।

स्वयं गोपी वल्लभ तुम अपने प्रिय गोप गोपियों को समझा रहे हैं कि तुम हर एक का वास्तविक सच्चा प्रेम कौन सा है! हे प्राणों तुम्हें एक दो की प्रेम भरी सावधानी को स्वीकार करना है क्योंकि जितना प्रिय फूल उतना ही श्रेष्ठ परवरिश। फूल को वैल्युबुल बनाने अर्थ माली को कांटों से निकालना ही पड़ता है। वैसे तुम्हें भी जब कोई सावधानी देता है तो समझना चाहिए जैसेकि उसने मेरी परवरिश की अर्थात् मेरी सर्विस की। उस सर्विस अथवा परवरिश को रिगार्ड देना है, यही सम्पूर्ण बनने की युक्ति है। यही ज्ञान सहित आन्तरिक सच्चा प्रेम है। इस दिव्य प्रेम में एक दो के लिए बहुत रिगार्ड होना चाहिए। हर एक बात में पहले खुद को ही सावधान करना है, यही निर्माणचित अति मधुर अवस्था है। ऐसे प्रेम पूर्वक चलने से तुम्हें जैसे यहाँ ही वे सतयुग के सुहावने दिन आन्तरिक महसूस होंगे। वहाँ तो यह प्रेम नेचुरल रहता है परन्तु इस संगम के स्वीटेस्ट समय पर एक दो के लिए सर्विस करने का यह अति मीठा रमणीक प्रेम है, यही शुद्ध प्रेम जग में गाया हुआ है।

तुम हर एक चैतन्य फूलों को हरदम हर्षित मुख हो रहना है क्योंकि निश्चय बुद्धि होने के कारण तुम्हारी नस नस में सम्पूर्ण ईश्वरीय ताकत समाई हुई है। ऐसी आकर्षण शक्ति अपना दिव्य चमत्कार अवश्य निकालती है। जैसे छोटे निर्दोष बच्चे शुद्ध पवित्र होने कारण सदैव हंसते रहते हैं और अपने रमणीक चरित्र से सबको बहुत खींचते हैं। वैसे तुम हर एक की ऐसी ईश्वरीय रमणीक जीवन होनी चाहिए, इसके लिए तुम्हें किसी भी युक्ति से अपने आसुरी स्वभावों पर जीत प्राप्त करनी है। जब कोई को देखो कि यह क्रोध विकार के वश हो मेरे सामने आता है तो उनके सामने ज्ञान रूप हो बचपन की मीठी रीति से मुस्कराते रहो तो वह खुद शान्तिचत हो जायेगा अर्थात् विस्मृति स्वरूप से स्मृति में आ जायेगा। भल उनको पता न भी पड़े लेकिन सूक्ष्म रीति से उनके ऊपर जीत पाकर मालिक बन जाना, यही मालिक और बालकपन की सर्वोच्च शिरोमणि विधि है।

ईश्वर जैसे सम्पूर्ण ज्ञान रूप वैसे फिर सम्पूर्ण प्रेम रूप भी है। ईश्वर में दोनों ही क्वालिटीज़ समाई हुई हैं परन्तु फर्स्ट ज्ञान, सेकण्ड प्रेम। अगर कोई पहले ज्ञान रूप बनने बिगर सिर्फ प्रेम रूप बन जाता है तो वह प्रेम अशुद्ध खाते में ले जाता है इसलिए प्रेम को मर्ज कर पहले ज्ञान रूप बन भिन्न-भिन्न रूपों में आई हुई माया पर जीत पाकर पीछे प्रेम रूप बनना है। अगर ज्ञान बिगर प्रेम में आये तो कहाँ विचलित भी हो जायेंगे। जैसे अगर कोई ज्ञान रूप बनने के बिगर ध्यान में जाते हैं तो कई बार माया में फंस जाते हैं, इसलिए बाबा कहते हैं बच्चे, यह ध्यान भी एक सूत की जंजीर है परन्तु ज्ञान रूप बन पीछे ध्यान में जाने से अति मौज का अनुभव होता है। तो पहले है ज्ञान पीछे है ध्यान। ध्यानिष्ट अवस्था से ज्ञानिष्ट अवस्था श्रेष्ठ है। इसलिए हे बच्चों, पहले ज्ञान रूप बन फिर प्रेम इमर्ज करना है। ज्ञान बिगर सिर्फ प्रेम इस पुरुषार्थी जीवन में विघ्न डालता है।

साक्षीपन की अवस्था अति मीठी, रमणीक और सुन्दर है। इस अवस्था पर ही आगे की जीवन का सारा मदार है। जैसे कोई के पास कोई शारीरिक भोगना आती है। उस समय अगर वह साक्षी, सुखरूप अवस्था में उपस्थित हो उसे भोगता है तो पास्ट कर्मो को भोग चुक्तू भी करता है और साथ साथ फ्युचर के लिए सुख का हिसाब भी बनाता है। तो यह साक्षीपन की सुखरूप अवस्था पास्ट और फ्युचर दोनों से कनेक्शन रखती है। तो इस राज़ को समझने से कोई भी ऐसे नहीं कहेगा कि मेरा यह सुहावना समय सिर्फ चुक्तू करने में चला गया। नहीं, यही सुहावना पुरुषार्थ का समय है जिस समय दोनों कार्य सम्पूर्ण रीति सिद्ध होते हैं। ऐसे दोनों कार्य को सिद्ध करने वाला तीव्र पुरुषार्थी ही अतीन्द्रिय सुख वा आनंद के अनुभव में रहता है।

इस वैरायटी विराट ड्रामा की हर एक बात में तुम बच्चों को सम्पूर्ण निश्चय होना चाहिए क्योंकि यह बना बनाया ड्रामा बिल्कुल वफादार है। देखो, यह ड्रामा हर एक जीव प्राणी से उनका पार्ट पूर्ण रीति से बजवाता है। भल कोई रांग है, तो वह रांग पार्ट भी पूर्ण रीति से बजाता है। यह भी ड्रामा की नूंध है। जब रांग और राइट दोनों ही प्लैन में नूंधे हुए हैं तो फिर कोई बात में संशय उठाना, यह ज्ञान नहीं है क्योंकि हर एक एक्टर अपना-अपना पार्ट बजा रहा है। जैसे बाइसकोप में अनेक भिन्न-भिन्न नाम रूपधारी एक्टर्स अपनी-अपनी एक्टिंग करते हैं तो उनको देख, किससे नफरत आवे और किससे हर्षित होवे, ऐसा नहीं होता है। पता है कि यह एक खेल है, जिसमें हर एक को अपना अपना गुड वा बेड पार्ट मिला हुआ है। वैसे ही इस अनादि बने हुए बाइसकोप को भी साक्षी हो एकरस अवस्था से हर्षितमुख हो देखते रहना है। संगठन में यह प्वाइंट बहुत अच्छी रीति धारण करनी है। एक दो को ईश्वरीय रूप से देखना है, महसूसता का ज्ञान उठाए सर्व ईश्वरीय गुणों की धारणा करनी है। अपने लक्ष्य स्वरूप की स्मृति से शान्त चित, निर्माणचित, धैर्यवत, मिठाज़, शीतलता इत्यादि सर्व दैवी गुण इमर्ज करने हैं।

धैर्यवत अवस्था धारण करने का मुख्य फाउण्डेशन – वेट एण्ड सी। हे मेरे प्रिय बच्चों, वेट अर्थात् धैर्य धरना, सी अर्थात् देखना। अपने दिल भीतर पहले धैर्यवत गुण धारण कर उसके बाद फिर बाहर में विराट ड्रामा को साक्षी हो देखना है। जब तक कोई भी राज़ सुनने का समय समीप आवे तब तक धैर्यवत गुण की धारणा करनी है। समय आने पर उस धैर्यता के गुण से राज़ सुनने में कभी भी विचलित नहीं होंगे। इसलिए हे पुरुषार्थी प्राणों, जरा ठहरो और आगे बढ़कर राज़ देखते चलो। इस ही धैर्यवत अवस्था से सारा कर्तव्य सम्पूर्ण रीति से सिद्ध होता है। यह गुण निश्चय से बांधा हुआ है। ऐसे निश्चयबुद्धि साक्षी दृष्टा हो हर खेल को हर्षित चेहरे से देखते आन्तरिक धैर्यवत और अडोलचित रहते हैं, यही ज्ञान की परिपक्व अवस्था है जो अन्त में सम्पूर्णता के समय प्रैक्टिकल में रहती है इसलिए बहुत समय से लेकर इस साक्षीपन की अवस्था में स्थित रहने का परिश्रम करना है।

जैसे नाटक में एक्टर को अपना मिला हुआ पार्ट पूर्ण बजाने अर्थ आगे से ही रिहर्सल करनी पड़ती है, वैसे तुम प्रिय फूलों को भी आने वाली भारी परीक्षाओं से योग बल द्वारा पास होने के लिए आगे से ही रिहर्सल अवश्य करनी है। लेकिन बहुत समय से लेकर अगर यह पुरुषार्थ किया हुआ नहीं होगा तो उस समय घबराहट में फेल हो जायेंगे, इसलिए पहला अपना ईश्वरीय फाउण्डेशन पक्का रख दैवीगुणधारी बन जाना है।

ज्ञान स्वरूप स्थिति में स्थित रहने से स्वत: शान्त रूप अवस्था हो जाती है। जब ज्ञानी तू आत्मा बच्चे, इकट्ठे बैठकर मुरली सुनते हैं तो चारों तरफ शान्ति का वायुमण्डल बन जाता है क्योंकि वे कुछ भी महावाक्य सुनते हैं तो आन्तरिक डीप चले जाते हैं। डीप जाने के कारण आन्तरिक उन्हों को शान्ति की मीठी महसूसता होती है। अब इसके लिए कोई खास बैठकर मेहनत नहीं करनी है परन्तु ज्ञान की अवस्था में स्थित रहने से यह गुण अनायास आ जाता है। तुम बच्चे जब सवेरे सवेरे उठकर एकान्त में बैठते हो तो शुद्ध विचारों रूपी लहरें उत्पन्न होती हैं, उस समय बहुत उपराम अवस्था होनी चाहिए। फिर अपने निज़ शुद्ध संकल्प में स्थित होने से अन्य सब संकल्प आपेही शान्त हो जायेंगे और मन अमन हो जायेगा क्योंकि मन को वश करने अर्थ भी कोई ताकत तो अवश्य चाहिए इसलिए पहले अपने लक्ष्य स्वरूप के शुद्ध संकल्प को धारण करो। जब आन्तिरक बुद्धियोग कायदे प्रमाण होगा तो तुम्हारी यह निरसंकल्प अवस्था स्वत: हो जायेगी। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे, ज्ञान गुल्जारी, ज्ञान सितारों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपने लक्ष्य स्वरूप की स्मृति से शान्त चित, निर्माणचित, धैर्यवत, मिठाज़, शीतलता आदि सर्व दैवी गुण धारण करने है।

2) निश्चयबुद्धि साक्षी दृष्टा हो इस खेल को हर्षित चेहरे से देखते आन्तरिक धैर्यवत और अडोलचित रहना है। बहुत समय से लेकर इस साक्षीपन की अवस्था में स्थित रहने का परिश्रम करना है।

वरदान:- स्नेह और शक्ति रूप के बैलेन्स द्वारा सेवा करने वाले सफलतामूर्त भव
जैसे एक आंख में बाप का स्नेह और दूसरी आंख में बाप द्वारा मिला हुआ कर्तव्य (सेवा) सदा स्मृति में रहता है। ऐसे स्नेही-मूर्त के साथ-साथ अभी शक्ति रूप भी बनो। स्नेह के साथ-साथ शब्दों में ऐसा जौहर हो जो किसी का भी हृदय विदीरण कर दे। जैसे माँ बच्चों को कैसे भी शब्दों में शिक्षा देती है तो माँ के स्नेह कारण वह शब्द तेज वा कडुवे महसूस नहीं होते। ऐसे ही ज्ञान की जो भी सत्य बातें हैं उन्हें स्पष्ट शब्दों में दोöलेकिन शब्दों में स्नेह समाया हुआ हो तो सफलतामूर्त बन जायेंगे।
स्लोगन:- सर्वशक्तिमान् बाप को साथी बना लो तो पश्चाताप से छूट जायेंगे।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 13 APRIL 2021 : AAJ KI MURLI

13-04-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – बाप जो है, जैसा है, तुम बच्चों में भी नम्बरवार पहचानते हैं, अगर सब पहचान लें तो बहुत भीड़ मच जाये”
प्रश्नः- चारों ओर प्रत्यक्षता का आवाज कब फैलेगा?
उत्तर:- जब मनुष्यों को पता पड़ेगा कि स्वयं भगवान इस पुरानी दुनिया का विनाश कराके नई दुनिया स्थापन करने आये हैं। 2- हम सबकी सद्गति करने वाला बाप हमें भक्ति का फल देने आया है। यह निश्चय हो तो प्रत्यक्षता हो जाए। चारों ओर हलचल मच जाए।
गीत:- जो पिया के साथ है…. 

ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत की दो लाइन सुनी। जो पिया के साथ है, अब पिया कौन है! यह दुनिया नहीं जानती। भल ढेर बच्चे हैं, उनमें भी बहुत हैं जो नहीं जानते हैं कि किस प्रकार से बाप को याद करना चाहिए। वह याद करने नहीं आता। घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। बाप समझाते हैं बच्चे अपने को आत्मा समझो, हम बिन्दी हैं। बाप, ज्ञान का सागर है, उनको ही याद करना है। याद करने की ऐसी प्रैक्टिस पड़ जाए जो निरन्तर याद ठहर जाये। पिछाड़ी में यही याद रहे कि हम आत्मा हैं, शरीर तो है परन्तु यह ज्ञान बुद्धि में रखना है कि हम आत्मा हैं। बाप का डायरेक्शन मिला हुआ है मैं जो हूँ, उस रूप में कोई विरला याद करते हैं। देह-अभिमान में बच्चे बहुत आ जाते हैं। बाप ने समझाया है, कोई को भी जब तक बाप का परिचय नहीं दिया है तब तक कुछ भी समझ नहीं सकेंगे। पहले तो उन्हों को यह मालूम पड़े कि वह निराकार हमारा बाप, गीता का भगवान है, वही सर्व का सद्गति दाता है। वह इस समय सद्गति करने का पार्ट बजा रहे हैं। इस प्वाइंट में निश्चयबुद्धि हो जाएं तो फिर जो भी इतने साधू-सन्त आदि हैं सब एक सेकण्ड में आ जायें। भारत में बड़ा हंगामा मच जाये। अभी मालूम पड़ जाये कि यह दुनिया विनाश होने वाली है। इस बात का निश्चय हो जाए तो बम्बई से लेकर आबू तक क्यू लग जाये। लेकिन इतना जल्दी कोई को निश्चय नहीं हो सकता। तुम जानते हो विनाश होना है, यह सब घोर निद्रा में सोये ही रहने हैं। फिर अन्त समय तुम्हारा प्रभाव निकलेगा। मासी का घर नहीं है जो इस बात में निश्चय हो जाए कि गीता का भगवान परमपिता पर-मात्मा शिव है। यह प्रसिद्ध हो जाए तो सारे भारत में आवाज हो जाये। अभी तो तुम एक को समझायेंगे तो दूसरा कहेगा तुमको जादू लग गया है। यह झाड़ बहुत धीरे-धीरे बढ़ना है। अभी थोड़ा टाइम है फिर भी पुरूषार्थ करने में हर्जा नहीं है। तुम बड़े-बड़े लोगों को समझाते हो, परन्तु वे कुछ भी समझते थोड़ेही हैं। बच्चों में भी कई इस नॉलेज को समझते नहीं हैं। बाप की याद नहीं तो वह अवस्था नहीं। बाप जानते हैं निश्चय किसको कहा जाता है। अभी तो कोई 1-2 परसेन्ट भी मुश्किल बाप को याद करते हैं। भल यहाँ बैठे हैं, बाप के साथ वह लव नहीं रहता। इसमें लव चाहिए, तकदीर चाहिए। बाप से लव हो तो समझें, हमको कदम-कदम श्रीमत पर चलना है। हम विश्व के मालिक बनते हैं। आधाकल्प का देह-अभिमान बैठा हुआ है सो अब देही-अभिमानी बनने में बड़ी मेहनत लगती है। अपने को आत्मा समझ मोस्ट बिलवेड बाप को याद करना मासी का घर नहीं है। उनके चेहरे में ही रौनक आ जाए। कन्या शादी करती है, जेवर आदि पहनती है तो चेहरे में एकदम खुशी आ जाती है। परन्तु यहाँ तो साजन को याद ही नहीं करते तो वह शक्ल मुरझाई हुई रहती है। बात मत पूछो। कन्या शादी करती है तो चेहरा खुशनुम: हो जाता है। कोई की तो शादी के बाद भी शक्ल मुर्दे जैसी रहती है। किसम-किसम के होते हैं। कोई तो दूसरे घर में जाकर मूँझ पड़ती हैं। तो यहाँ भी ऐसे है। बाप को याद करने की मेहनत है। यह गायन अन्त का है कि अतीन्द्रिय सुख गोपी वल्लभ के गोप-गोपियों से पूछो। अपने को गोप-गोपी समझना और निरन्तर बाप को याद करना, वह अवस्था होनी है। बाप का परिचय सबको देना है। बाप आया हुआ है वो वर्सा दे रहे हैं। इसमें सारी नॉलेज आ जाती है। लक्ष्मी-नारायण ने जब 84 जन्म पूरे किये तब बाप ने अन्त में आकर उन्हों को राजयोग सिखाकर राजाई दी। लक्ष्मी-नारायण का यह चित्र है नम्बरवन। तुम जानते हो उन्होंने आगे जन्म में ऐसे कर्म किये हैं, वह कर्म अब बाप सिखला रहे हैं। कहते हैं मनमनाभव, पवित्र रहो। कोई भी पाप मत करो क्योंकि तुम अभी स्वर्ग के मालिक, पुण्य आत्मा बनते हो। आधाकल्प माया रावण पाप कराती आई है। अब अपने से पूछना है – हमसे कोई पाप तो नहीं होता है? पुण्य का काम करते रहते हैं? अन्धों की लाठी बने हैं? बाप कहते हैं मनमना-भव। यह भी पूछना होता है कि मनमनाभव किसने कहा? वह कहेंगे कृष्ण ने कहा। तुम मानते हो परमपिता परमात्मा शिव ने कहा। रात-दिन का फर्क है। शिव जयन्ती के साथ है गीता जयन्ती। गीता जयन्ती के साथ कृष्ण जयन्ती।

तुम जानते हो हम भविष्य में प्रिन्स बनेंगे। बेगर टू प्रिन्स बनना है। यह एम-आब्जेक्ट ही राजयोग की है। तुम सिद्ध कर बताओ कि गीता का भगवान श्रीकृष्ण नहीं था, वह तो निराकार था। तो सर्वव्यापी का ज्ञान उड़ जाए। सर्व का सद्गति दाता, पतित-पावन बाप है। कहते भी हैं कि वह लिबरेटर है, फिर सर्वव्यापी कह देते। जो कुछ बोलते हैं, समझते नहीं हैं। धर्म के बारे में जो आता है, बोल देते हैं। मुख्य धर्म हैं तीन। देवी देवता धर्म तो आधाकल्प चलता है। तुम जानते हो बाप ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय धर्म स्थापन करते हैं। यह दुनिया नहीं जानती। वह तो सतयुग को ही लाखों वर्ष कह देते हैं। आदि सनातन देवी देवता धर्म है सबसे ऊंचा, परन्तु यह अपने धर्म को भूल इरिलीजियस बन पड़े हैं। क्रिश्चियन लोग अपने धर्म को नहीं छोड़ते। वह जानते हैं – क्राइस्ट ने हमारा धर्म स्थापन किया था। इस्लामी, बौद्धी, फिर क्रिश्चियन, यह हैं मुख्य धर्म। बाकी तो छोटे-छोटे बहुत हैं। कहाँ से वृद्धि हुई? यह कोई नहीं जानता। मुहम्मद को अभी थोड़ा समय हुआ है, इस्लामी पुराने हैं। क्रिश्चियन भी मशहूर हैं। बाकी तो कितने ढेर हैं। सबका अपना-अपना धर्म है। अपना भिन्न-भिन्न धर्म, भिन्न-भिन्न नाम हैं तो मूँझ गये हैं। यह नहीं जानते कि मुख्य धर्मशास्त्र ही 4 हैं। इसमें डिटीज्म, ब्राह्मणिज्म भी आ जाते हैं। ब्राह्मण सो देवता, देवता सो क्षत्रिय, यह किसको पता नहीं। गाते हैं ब्राह्मण देवताए नम:। परमपिता ने ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय धर्म की स्थापना की, अक्षर हैं परन्तु पढ़ते ऐसे हैं जैसे तोते।

यह है कांटों का जंगल। भारत गॉर्डन ऑफ फ्लॉवर था, यह भी मानते हैं। परन्तु वह कब, कैसे, किसने बनाया, परमात्मा क्या चीज़ है, यह कोई नहीं जानते। तो आरफन हो गये ना इसलिए यह लड़ाई-झगड़े आदि हैं। सिर्फ भक्ति में खुश होते रहते हैं। अब बाप आये हैं सोझरा करने, सेकेण्ड में जीवनमुक्त बना देते हैं। ज्ञान अंजन सतगुरू दिया, अज्ञान अन्धेर विनाश। अभी तुम जानते हो हम सोझरे में हैं। बाप ने तीसरा नेत्र दिया है। भल देवताओं को तीसरा नेत्र दिखाते हैं परन्तु अर्थ नहीं जानते। वास्तव में तीसरा नेत्र तुमको है। उन्होंने फिर दे दिया है देवताओं को। गीता में ब्राह्मणों की कोई बात नहीं। उसमें तो फिर कौरव, पाण्डवों आदि की लड़ाई, घोड़े-गाड़ी आदि लिख दी है, कुछ भी समझते नहीं। तुम समझायेंगे तो कहेंगे तुम शास्त्रों आदि को नहीं मानते। तुम कह सकते हो हम शास्त्रों को मानते क्यों नहीं हैं, जानते हैं – यह सब भक्ति मार्ग की सामग्री है। गाया हुआ है ज्ञान और भक्ति। जब रावण राज्य होता है तब भक्ति शुरू होती है। भारतवासी वाम मार्ग में जाकर धर्म भ्रष्ट और कर्म भ्रष्ट बन जाते हैं इसलिए अब हिन्दू कहला दिया है। पतित बन गये हैं। पतित किसने बनाया? रावण ने। रावण को जलाते भी हैं, समझते हैं यह परम्परा से चला आता है। परन्तु सतयुग में तो रावण राज्य ही नहीं था। कुछ भी समझते नहीं। माया बिल्कुल ही पत्थरबुद्धि बना देती है। पत्थर से पारस बाप ही बनाते हैं। जब आइरन एज में आये तब तो आकर गोल्डन एज स्थापन करें। बाप समझाते हैं फिर भी बड़ा मुश्किल किसकी बुद्धि में बैठता है।

तुम कुमारियों की अब सगाई होती है। तुमको पटरानी बनाते हैं। तुमको भगाया अर्थात् तुम आत्माओं को कहते हैं – तुम मेरे थे फिर तुम मुझे भूल गये हो। देह-अभिमानी बन माया के बन गये हो। बाकी भगाने आदि की तो बात नहीं है। मामेकम् याद करो। याद की ही मेहनत है। बहुत देह-अभिमान में आकर विकर्म करते हैं। बाप जानते हैं यह आत्मा मुझे याद ही नहीं करती है। देह-अभिमान में आकर बहुत पाप करते हैं तो पाप का घड़ा सौगुणा भर जाता है। औरों को रास्ता बताने के बदले खुद ही भूल जाते हैं। और ही जास्ती दुर्गति को पा लेते हैं। बड़ी ऊंची मंजिल है। चढ़े तो चाखे वैकुण्ठ रस, गिरे तो चकनाचूर। यह राजाई स्थापन हो रही है। इसमें फ़र्क देखो कितना पड़ जाता है। कोई तो पढ़कर आसमान में चढ़ जाते हैं, कोई पट में पड़ जाते हैं। बुद्धि डल होती है तो पढ़ नहीं सकते हैं। कोई-कोई कहते हैं बाबा हम किसको समझा नहीं सकते हैं। कहता हूँ अच्छा सिर्फ अपने को आत्मा समझो, मुझ बाप को याद करो तो मैं तुमको सुख दूँगा। परन्तु याद ही नहीं करते हैं। याद करें तो औरों को याद दिलाते रहें। बाप को याद करें तो पाप नष्ट हो जायें। उनकी याद बिगर तुम सुखधाम में जा नहीं सकते हो। 21 जन्मों का वर्सा निराकार बाप से मिल सकता है। बाकी तो सब अल्पकाल का सुख देने वाले हैं। कोई को रिद्धि-सिद्धि से बच्चा मिल गया वा आशीर्वाद से लॉटरी मिल गई तो बस विश्वास बैठ जाता है। कोई को 2-4 करोड़ फायदा हो जायेगा बस बहुत महिमा करेंगे। परन्तु वह तो है अल्पकाल के लिए। 21 जन्मों के लिए हेल्थ वेल्थ तो मिल नहीं सकती ना। परन्तु मनुष्य नहीं जानते हैं। दोष भी नहीं दे सकते हैं। अल्पकाल के सुख में ही खुश हो जाते हैं।

बाप तुम बच्चों को राजयोग सिखलाकर स्वर्ग की बादशाही देते हैं। कितना सहज है। कोई तो बिल्कुल समझा नहीं सकते। कोई समझते भी हैं परन्तु योग पूरा न होने के कारण कोई को तीर नहीं लगता है। देह-अभिमान में आने से कुछ न कुछ पाप होते रहते हैं। योग ही मुख्य है। तुम योगबल से विश्व के मालिक बनते हो। प्राचीन योग भगवान ने सिखाया था, न कि श्रीकृष्ण ने। याद की यात्रा बड़ी अच्छी है। तुम ड्रामा देखकर आओ तो बुद्धि में सारा सामने आ जायेगा। कोई को बताने में टाइम लगेगा। यह भी ऐसे है। बीज और झाड़। यह चक्र बड़ा क्लीयर है। शान्तिधाम, सुखधाम, दु:खधाम….सेकण्ड का काम है ना। परन्तु याद भी रहे ना। मुख्य बात है बाप का परिचय। बाप कहते हैं – मेरे को याद करने से तुम सब कुछ जान जायेंगे। अच्छा।

शिवबाबा तुम बच्चों को याद करते हैं, ब्रह्मा बाबा याद नहीं करते हैं। शिवबाबा जानते हैं हमारे सपूत बच्चे कौन-कौन हैं। सर्विसएबुल सपूत बच्चों को तो याद करते हैं। यह थोड़ेही किसको याद करेंगे। इनकी आत्मा को तो डायरेक्शन है मामेकम् याद करो। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) तकदीरवान बनने के लिए एक बाप से सच्चा-सच्चा लव रखना है। लव रखना माना कदम-कदम एक की ही श्रीमत पर चलते रहना।

2) रोज़ पुण्य का काम अवश्य करना है। सबसे बड़ा पुण्य है सबको बाप का परिचय देना। बाप को याद करना और सबको बाप की याद दिलाना।

वरदान:- स्थूल कार्य करते भी मन्सा द्वारा विश्व परिवर्तन की सेवा करने वाली जिम्मेवार आत्मा भव
कोई भी स्थूल कार्य करते सदा यह स्मृति रहे कि मैं विश्व की स्टेज पर विश्व कल्याण की सेवा अर्थ निमित्त हूँ। मुझे अपनी श्रेष्ठ मन्सा द्वारा विश्व परिवर्तन के कार्य की बहुत बड़ी जिम्मेवारी मिली हुई है। इस स्मृति से अलबेलापन समाप्त हो जायेगा और समय भी व्यर्थ जाने से बच जायेगा। एक-एक सेकण्ड अमूल्य समझते हुए विश्व कल्याण के वा जड़-चैतन्य को परिवर्तन करने के कार्य में सफल करते रहेंगे।
स्लोगन:- अभी योद्धा बनने के बजाए निरन्तर योगी बनो।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 12 APRIL 2021 : AAJ KI MURLI

12-04-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम्हारी यह वन्डरफुल युनिवर्सिटी है, जिसमें बिगड़ी को बनाने वाला भोलानाथ बाप टीचर बनकर तुम्हें पढ़ाते हैं”
प्रश्नः- इस कयामत के समय में तुम बच्चे सभी को कौन सा लक्ष्य देते हो?
उत्तर:- हे आत्मायें अब पावन बनो, पावन बनने बिगर वापिस जा नहीं सकते। आधाकल्प का जो रोग लगा हुआ है, उससे मुक्त होने के लिए तुम सबको 7 रोज़ भट्ठी में बिठाते हो। पतितों के संग से दूर रहे, कोई भी याद न आये तब कुछ बुद्धि में ज्ञान की धारणा हो।
गीत:- तूने रात गॅवाई…

ओम् शान्ति। यह बच्चों को किसने कहा? क्योंकि स्कूल में बैठे हुए हो तो जरूर टीचर ने कहा। प्रश्न उठता है यह टीचर ने कहा, बाप ने कहा वा सतगुरू ने कहा? यह वर्शन्स किसने कहे? बच्चों को बुद्धि में पहले-पहले यह आना चाहिए कि हमारा बेहद का बाप है, जिसको परमपिता परमात्मा कहा जाता है। तो बाप ने भी कहा, शिक्षक ने भी कहा तो साथ-साथ सतगुरू ने भी कहा। यह तुम्हारी बुद्धि में है, जो स्टूडेन्ट हैं। और कॉलेज वा युनिवर्सिटी में टीचर पढ़ाते हैं, उनको कोई फादर वा गुरू नहीं कहेंगे। यह है भी पाठशाला, फिर युनिवर्सिटी कहो वा कॉलेज कहो। है तो पढ़ाई ना। पहले-पहले यह समझना है, पाठशाला में हमको कौन पढ़ाते हैं? बच्चे जानते हैं वह निराकार जो सभी आत्माओं का बाप है, सर्व का सद्गति दाता है वह हमको पढ़ा रहे हैं। यह सारी रचना उस एक रचता की प्रापर्टी है। तो खुद ही बैठ रचना के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं। तुम बच्चों ने जन्म लिया है – बाप के पास। तुम बुद्धि से जानते हो हम सभी आत्माओं का वह बाप है, जिसको ज्ञान का सागर, नॉलेजफुल कहा जाता है। ज्ञान का सागर है, पतित-पावन है। ज्ञान से ही सद्गति होती है, मनुष्य पतित से पावन बनते हैं। अब तुम बच्चे यहाँ बैठे हो। और कोई स्कूल में किसको बुद्धि में नहीं रहता कि हमको ज्ञान का सागर निराकार बाप पढ़ा रहे हैं। यह यहाँ ही तुम जानते हो। तुमको ही समझाया जाता है। खास भारत और आम सारी दुनिया में ऐसे कोई भी नहीं समझेंगे कि हमको निराकार परमात्मा पढ़ाते हैं। उनको पढ़ाने वाले हैं ही मनुष्य टीचर। और फिर ऐसा भी ज्ञान नहीं है जो समझें – हम आत्मा हैं। आत्मा ही पढ़ती है। आत्मा ही सब कुछ करती है। फलानी नौकरी आत्मा करती है – इन आरगन्स द्वारा। उनको तो यह रहता है कि हम फलाना है। झट अपना नाम रूप याद आ जाता है। हम यह करते हैं, हम ऐसे करते हैं। शरीर का नाम ही याद आ जाता है, परन्तु वह रांग है। हम तो पहले आत्मा हैं ना। पीछे यह शरीर लिया है। शरीर का नाम बदलता रहता है, आत्मा का नाम तो नहीं बदलता। आत्मा तो एक ही है। बाप ने कहा है मुझ आत्मा का एक ही नाम शिव है। यह सारी दुनिया जानती है। बाकी इतने सब नाम शरीरों पर रखे जाते हैं। शिवबाबा को तो शिव ही कहते हैं, बस। उनका कोई शरीर नहीं दिखाई पड़ता। मनुष्य के ऊपर नाम पड़ता है, मैं फलाना हूँ। हमको फलाना टीचर पढ़ा रहे हैं। नाम लेंगे ना। वास्तव में आत्मा शरीर के द्वारा टीचर का काम करती है, उनकी आत्मा को पढ़ाती है। संस्कार आत्मा में होते हैं। आरगन्स द्वारा पढ़ाती है, पार्ट बजाती है, संस्कार अनुसार। परन्तु देह पर नाम जो पड़े हैं, उस पर सारे धन्धे आदि चलते हैं। यहाँ तुम बच्चे जानते हो हमको निराकार बाप पढ़ाते हैं। तुम्हारी बुद्धि कहाँ चली गई! हम आत्मा उस बाप के बने हैं। आत्मा समझती है निराकार फादर हमको आकर इस साकार द्वारा पढ़ाते हैं। उनका नाम है शिव। शिवजयन्ती भी मनाते हैं। शिव तो है बेहद का बाप, उनको ही परमपिता परमात्मा कहा जाता है। वह सभी आत्माओं का बाप है, अब उनकी जयन्ती कैसे मनाते हैं। आत्मा शरीर में प्रवेश करती है वा गर्भ में आती है। ऊपर से आती है, यह किसको मालूम नहीं पड़ता। क्राइस्ट को धर्म स्थापक कहते हैं। उनकी आत्मा पहले-पहले ऊपर से आनी चाहिए। सतोप्रधान आत्मा आती है। कोई भी विकर्म किया हुआ नहीं है। पहले सतोप्रधान फिर सतो, रजो, तमो में आते हैं तब विकर्म होते हैं। पहले आत्मा जो आयेगी, सतोप्रधान होने के कारण कोई दु:ख नहीं भोग सकती। आधा टाइम जब पूरा होता है तब विकर्म करने लगती है।

आज से 5 हजार वर्ष पहले बरोबर सूर्यवंशी राज्य था और सब धर्म बाद में आये। भारतवासी विश्व के मालिक थे। भारत को अविनाशी खण्ड कहा जाता है और कोई खण्ड था नहीं। तो शिवबाबा है बिगड़ी को बनाने वाला, भोलानाथ शिव को कहा जाता है, न कि शंकर को। भोलानाथ शिव बिगड़ी को बनाने वाला है। शिव और शंकर एक नहीं हैं, अलग-अलग हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर की कोई महिमा नहीं है। महिमा सिर्फ एक शिव की है जो बिगड़ी को बनाते हैं। कहते हैं – मैं साधारण बूढ़े तन में आता हूँ। इसने 84 जन्म पूरे किये, अब खेल पूरा हुआ। यह पुराना चोला, पुराने सम्बन्ध भी खलास हो जाने वाले हैं। अब किसको याद करें? खत्म होने वाली चीज़ को याद नहीं किया जाता है। नया मकान बनता है तो फिर पुराने से दिल हट जाती है। यह फिर है बेहद की बात। सर्व की सद्गति होती है अर्थात् रावण के राज्य से सबको छुटकारा मिलता है। रावण ने सबको बिगाड़ दिया है। भारत बिल्कुल ही कंगाल भ्रष्टाचारी है। लोग भ्रष्टाचार समझते हैं करप्शन, एडल्ट्रेशन को, चोरी ठगी को। परन्तु बाप कहते हैं – पहला भ्रष्टाचार है मूत पलीती बनना। शरीर विकार से पैदा होता है इसलिए इसको विशश वर्ल्ड कहा जाता है। सतयुग को वाइसलेस कहा जाता है। हम सतयुग में प्रवृत्ति मार्ग वाले देवी देवता थे। कहते हैं पवित्र होने से विकार बिगर बच्चे कैसे पैदा होंगे। बोलो, हम अपनी राजधानी बाहुबल से नहीं योगबल से स्थापन करते हैं। तो क्या योगबल से बच्चे नहीं पैदा हो सकते हैं! जबकि है ही वाइसलेस वर्ल्ड, पवित्र गृहस्थ आश्रम। यथा राजा रानी सम्पूर्ण निर्विकारी तथा प्रजा। यहाँ हैं सम्पूर्ण विकारी। सतयुग में विकार होते नहीं। उसको कहा जाता है ईश्वरीय राज्य। ईश्वर बाप का स्थापन किया हुआ। अभी तो है रावण राज्य। शिवबाबा की पूजा होती है, जिसने स्वर्ग स्थापन किया। रावण, जिसने नर्क बनाया उसको जलाते आते हैं। द्वापर कब शुरू हुआ, यह भी किसको पता नहीं है। यह भी समझ की बात है। यह है ही तमोप्रधान आसुरी दुनिया। वह है ईश्वरीय दुनिया। उसको स्वर्ग दैवी पावन दुनिया कहा जाता है। यह है नर्क, पतित दुनिया। यह बातें भी समझेंगे वही जो रोज़ पढ़ेंगे। बहुत कहते हैं फलानी जगह स्कूल थोड़ेही है। अरे हेड ऑफिस तो है ना। तुम आकर डायरेक्शन ले जाओ। बड़ी बात तो नहीं है। सृष्टि चक्र को सेकेण्ड में समझाया जाता है। सतयुग, त्रेता पास्ट हो गया फिर द्वापर, कलियुग, यह भी पास्ट हुआ। अभी है संगमयुग। नई दुनिया में जाने के लिए पढ़ना है। हर एक का हक है पढ़ना। बाबा हम नौकरी करते हैं। अच्छा एक हफ्ता ज्ञान ले फिर चले जाना, मुरली मिलती रहेगी। पहले 7 रोज़ भट्ठी में जरूर रहना है। भल 7 रोज़ आयेंगे परन्तु सबकी बुद्धि एक जैसी नहीं रहेगी। 7 रोज़ भट्ठी माना कोई की भी याद न आये। कोई से पत्र व्यवहार आदि भी न हो। सब एक जैसा तो समझ नहीं सकते। यहाँ पतितों को पावन बनना है। यह पतितपना भी रोग है, आधाकल्प के महारोगी मनुष्य हैं। उनको अलग बिठाना पड़े। कोई का भी संग न हो। बाहर जायेंगे, उल्टा-सुल्टा खायेंगे, पतित के हाथ का खायेंगे। सतयुग में देवतायें पावन हैं ना। उनके लिए देखो खास मन्दिर बनते हैं। देवताओं को फिर पतित छू न सके। इस समय तो मनुष्य बिल्कुल पतित भ्रष्टाचारी हैं। शरीर विष से पैदा होता है इसलिए इनको भ्रष्टाचारी कहा जाता है। संन्यासियों का भी शरीर विष से बना हुआ है। बाप कहते हैं पहले-पहले आत्मा को पवित्र होना है, फिर शरीर भी पवित्र चाहिए इसलिए पुराने इम्प्योर शरीर सब विनाश हो जाने हैं। सबको वापिस जाना है। यह है कयामत का समय। सबको पवित्र बन वापिस जाना है। भारत में ही होलिका मनाते हैं। यहाँ 5 तत्वों के शरीर तमो-प्रधान हैं। सतयुग में शरीर भी सतोप्रधान होते हैं। श्रीकृष्ण का चित्र है ना। नर्क को लात मारना होता है क्योंकि सतयुग में जाना है। मुर्दे को भी जब शमशान में ले जाते हैं तो पहले मुँह शहर तरफ, पैर शमशान तरफ करते हैं। फिर जब शमशान के अन्दर घुसते हैं तो मुँह शमशान तरफ कर देते हैं। अभी तुम स्वर्ग में जाते हो तो तुम्हारा मुँह उस तरफ है। शान्तिधाम और सुखधाम, पैर दु:खधाम तरफ हैं। वह तो मुर्दे की बात है, यहाँ तो पुरूषार्थ करना होता है। स्वीट होम को याद करते-करते तुम आत्मायें स्वीटहोम में चली जायेंगी। यह है बुद्धि की प्रैक्टिस। यह बाप बैठ सब राज़ समझाते हैं। तुम जानते हो अभी हम आत्माओं को जाना है घर। यह पुराना चोला पुरानी दुनिया है, नाटक पूरा हुआ माना 84 जन्म पार्ट बजाया। यह भी समझाया है कि सब 84 जन्म नहीं लेते हैं। जो आते ही बाद में हैं और धर्म में, जरूर उनके कम जन्म होगे। इस्लामी से बौद्धियों का कम। क्रिश्चियन के उनसे कम। गुरू-नानक के सिक्ख लोग आये ही अभी हैं। गुरूनानक को 500 वर्ष हुआ तो वह थोड़ेही 84 जन्म लेंगे। हिसाब किया जाता है। 5 हजार वर्ष में इतने जन्म, तो 500 वर्ष में कितने जन्म हुए होंगे? 12-13 जन्म। क्राइस्ट के 2 हजार वर्ष होंगे तो उनके कितने जन्म होंगे। आधा से भी कम हो जायेंगे। हिसाब है ना। इसमें कोई कितने, कोई कितने एक्यूरेट नहीं कह सकते। इन बातों में डिबेट करने में जास्ती टाइम वेस्ट नहीं करना है। तुम्हारा काम है बाप को याद करना। फालतू बातों में बुद्धि नहीं जानी चाहिए। बाप से योग लगाना, चक्र को जानना है। बाकी पाप नष्ट होंगे याद से। इसमें ही मेहनत है इसलिए भारत का प्राचीन योग कहते हैं, जो बाप ही सिखाते हैं। सतयुग, त्रेता में तो योग की बात ही नहीं। फिर भक्ति मार्ग में हठयोग शुरू होता है। यह है सहज राजयोग। बाप कहते हैं – मुझे याद करने से पावन बनेंगे। मूल बात याद की है। कोई भी पाप नहीं करना है। देवी देवताओं के मन्दिर हैं क्योंकि पावन हैं। पुजारी लोग तो पतित हैं। पावन देवताओं को स्नान आदि कराते हैं। वास्तव में पतित का हाथ भी नहीं लगना चाहिए। यह सब है भक्तिमार्ग का रसमरिवाज़। अभी तो हम पावन बन रहे हैं। पवित्र बन जायेंगे तो फिर देवता बन जायेंगे। वहाँ तो पूजा आदि की दरकार नहीं रहती। सर्व का सद्गति दाता है ही एक बाप। उनको ही भोलानाथ कहते हैं। मैं आता हूँ पतित दुनिया, पतित शरीर में पुराने रावण राज्य में। हाँ, कोई के भी तन में प्रवेश कर मुरली चला सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि सर्वव्यापी है। हर एक में तो अपनी-अपनी आत्मा है। फार्म में भी लिखवाया जाता है तुम्हारी आत्मा का बाप कौन है? परन्तु समझते नहीं हैं। आत्माओं का बाप तो एक ही होगा। हम सब ब्रदर्स हैं। फादर एक है। उनसे वर्सा मिलता है जीवनमुक्ति का। वही लिबरेटर, गाइड है। सभी आत्माओं को ले जायेंगे स्वीट होम इसलिए पुरानी दुनिया का विनाश होता है। होलिका होती है ना। शरीर सब खत्म हो जायेंगे। बाकी आत्मायें सब वापिस चली जायेंगी। सतयुग में तो फिर बहुत थोड़े होंगे। समझना चाहिए कि स्वर्ग की स्थापना कौन कराते हैं, कलियुग का विनाश कौन कराते हैं? सो तो क्लीयर लिखा हुआ है। कहते हैं मिठरा घुर त घुराय। (प्यार करो तो प्यार मिलेगा) बाप कहते हैं जो मेरे अर्थ बहुत सर्विस करते हैं, मनुष्य को देवता बनाने की वह जास्ती प्यारे लगते हैं।

जो पुरूषार्थ करेंगे वही ऊंच वर्सा पायेंगे। वर्सा आत्माओं को पाना है परमात्मा बाप से। आत्म-अभिमानी बनना पड़े। कई बहुत भूलें भी करते हैं, पुरानी आदतें पक्की हो गई हैं। तो कितना भी समझाओ वह छूटती नहीं, उससे अपना ही पद कम कर देते हैं। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) किसी भी बात की डिबेट में अपना टाइम वेस्ट नहीं करना है। व्यर्थ की बातों में बुद्धि जास्ती न जाये। जितना हो सके याद की यात्रा से विकर्म विनाश करने हैं। आत्म-अभिमानी रहने की आदत डालनी है।

2) इस पुरानी दुनिया से अपना मुँह फेर लेना है। शान्तिधाम और सुखधाम को याद करना है। नया मकान बन रहा है तो पुराने से दिल हटा लेनी है।

वरदान:- माया के विघ्नों को खेल के समान अनुभव करने वाले मास्टर विश्व-निर्माता भव
जैसे कोई बुजुर्ग के आगे छोटे बच्चे अपने बचपन के अलबेलेपन के कारण कुछ भी बोल दें, कोई ऐसा कर्तव्य भी कर लें तो बुजुर्ग लोग समझते हैं कि यह निर्दोष, अन्जान, छोटे बच्चे हैं। कोई असर नहीं होता है। ऐसे ही जब आप अपने को मास्टर विश्व-निर्माता समझेंगे तो यह माया के विघ्न बच्चों के खेल समान लगेंगे। माया किसी भी आत्मा द्वारा समस्या, विघ्न वा परीक्षा पेपर बनकर आ जाए तो उसमें घबरायेंगे नहीं लेकिन उन्हें निर्दोष समझेंगे।
स्लोगन:- स्नेह, शक्ति और ईश्वरीय आकर्षण स्वयं में भरो तो सब सहयोगी बन जायेंगे।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 11 APRIL 2021 : AAJ KI MURLI

11-04-21
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 10-12-87 मधुबन

तन, मन, धन और सम्बन्ध का श्रेष्ठ सौदा

आज सर्व खजानों के सागर रत्नागर बाप अपने बच्चों को देख मुस्करा रहे हैं कि सर्व खजानों के रत्नागर बाप के सौदागर बच्चे अर्थात् सौदा करने वाले कौन हैं और किससे सौदा किया है? परमात्म-सौदा देने वाले और परमात्मा से सौदा करने वाली सूरतियाँ कितनी भोली हैं और सौदा कितना बड़ा किया है! यह इतना बड़ा सौदा करने वाले सौदागर आत्मायें हैं – यह दुनिया वालों की समझ में नहीं आ सकता। दुनिया वाले जिन आत्माओं को ना-उम्मींद, अति गरीब समझ, असम्भव समझ किनारे कर दिया कि यह कन्यायें, मातायें परमात्म-प्राप्ति के क्या अधिकारी बनेंगे? लेकिन बाप ने पहले माताओं, कन्याओं को ही इतना बड़े ते बड़ा सौदा करने वाली श्रेष्ठ आसामी बना दिया। ज्ञान का कलश पहले माताओं, कन्याओं के ऊपर रखा। यज्ञ-माता जगदम्बा निमित्त गरीब कन्या को बनाया। माताओं के पास फिर भी अपनी कुछ न कुछ छिपी हुई प्रापर्टी रहती है लेकिन कन्या माताओं से भी गरीब होती। तो बाप ने गरीब से गरीब को पहले सौदागर बनाया और सौदा कितना बड़ा किया! जो गरीब कुमारी से जगत अम्बा सो धन देवी लक्ष्मी बना दिया! जो आज दिन तक भी भल कितने भी मल्टी-मिलिनीयर (करोड़पति) हों लेकिन लक्ष्मी से धन जरूर मांगेंगे, पूजा जरूर करेंगे। रत्नागर बाप अपने सौदागर बच्चों को देख हर्षित हो रहे हैं। एक जन्म का सौदा करने से अनेक जन्म सदा मालामाल भरपूर हो जाते हैं। और निमित्त सौदा करने वाला भल कितना भी बड़ा बिजनैसमैन हो लेकिन वह सिर्फ धन का सौदा, वस्तु का सौदा करेंगे। एक ही बेहद का बाप है जो धन का भी सौदा करते, मन का भी सौदा करते, तन का भी और सदा श्रेष्ठ सम्बन्ध का भी सौदा करते। ऐसा दाता कोई देखा? चारों ही प्रकार के सौदे किये हैं ना? तन सदा तन्दरुस्त रहेगा, मन सदा खुश, धन के भण्डार भरपूर और सम्बन्ध में नि:स्वार्थ स्नेह। और गैरन्टी है। आजकल भी जो मूल्यवान वस्तु होती है उसकी गैरन्टी देते हैं। 5 वर्ष, 10 वर्ष की गैरन्टी देंगे, और क्या करेंगे? लेकिन रत्नागर बाप कितने समय की गैरन्टी देते हैं? अनेक जन्मों की गैरन्टी देते हैं। चारों में एक की भी कमी नहीं हो सकती। चाहे प्रजा की प्रजा भी बनें लेकिन उनको भी लास्ट जन्म तक अर्थात् त्रेता के अन्त तक भी यह चारों ही बातें प्राप्त होंगी। ऐसा सौदा कब किया? अब तो किया है ना सौदा? पक्का सौदा किया है या कच्चा? परमात्मा से कितना सस्ता सौदा किया है! क्या दिया, कोई काम की चीज़ दी?

फारेनर्स बापदादा के पास सदैव दिल बनाकर भेज देते हैं। पत्र भी दिल के चित्र के अन्दर लिखेंगे, गिफ्ट भी दिल की भेजेंगे। तो दिल दिया ना। लेकिन कौनसी दिल दी? एक दिल के कितने टुकडे हुए पड़े थे? माँ, बाप, चाचा, मामा, कितनी लम्बी लिस्ट है? अगर सम्बन्ध की लिस्ट निकालो कलियुग में तो कितनी लम्बी लिस्ट होगी! एक सम्बन्ध में दिल दे दिया, दूसरा वस्तुओं में भी दिल दे दी… तो दिल लगाने वाली वस्तुएं कितनी हैं, व्यक्ति कितने हैं? सबमें दिल लगाके दिल ही टुकड़ा-टुकड़ा कर दी। बाप ने अनेक टुकड़े वाली दिल को एक तरफ जोड़ लिया। तो दिया क्या और लिया क्या! और सौदा करने की विधि कितनी सहज है! सेकण्ड का सौदा है ना। “बाबा” शब्द ही विधि है। एक शब्द की विधि है, इसमें कितना समय लगता? सिर्फ दिल से कहा “बाबा” तो सेकण्ड में सौदा हो गया। कितनी सहज विधि है। इतना सस्ता सौदा सिवाए इस संगमयुग के और किसी भी युग में नहीं कर सकते। तो सौदागरों की सूरत-मूरत देख रहे थे। दुनिया के अन्तर में कितने भोले-भाले हैं! लेकिन कमाल तो इन भोले-भालों ने किया है। सौदा करने में तो होशियार निकले ना। आज के बड़े-बड़े नामीग्रामी धनवान, धन कमाने के बजाए धन को सम्भालने की उलझन में पड़े हुए हैं। उसी उलझन में बाप को पहचानने की भी फुर्सत नहीं है। अपने को बचाने में, धन को बचाने में ही समय चला जाता है। अगर बादशाह भी हैं तो फिकर वाले बादशाह हैं क्योंकि फिर भी काला धन है ना, इसलिए फिकर वाले बादशाह हैं और आप बाहर से बिन कौड़ी हो लेकिन बेफिकर बादशाह हो, बेगर होते भी बादशाह। शुरू-शुरू में साइन क्या करते थे? बेगर टू प्रिन्स। अभी भी बादशाह और भविष्य में भी बादशाह हैं। आजकल के जो नम्बरवन धनवान आसामी हैं उनके सामने आपके त्रेता अन्त वाली प्रजा भी ज्यादा धनवान होगी। आजकल की संख्या के हिसाब से सोचो – धन तो वही होगा, और ही दबा हुआ धन भी निकलेगा। तो जितनी बड़ी संख्या है, उसी प्रमाण धन बांटा हुआ है। और वहाँ संख्या कितनी होगी? उसी हिसाब से देखो तो कितना धन होगा! प्रजा को भी अप्राप्त कोई वस्तु नहीं। तो बादशाह हुए ना। बादशाह का अर्थ यह नहीं कि तख्त पर बैठें। बादशाह अर्थात् भरपूर, कोई अप्राप्ति नहीं, कमी नहीं। तो ऐसा सौदा कर लिया है या कर रहे हो? वा अभी सोच रहे हो? कभी कोई बड़ी चीज़ सस्ती और सहज मिल जाती है तो भी उलझन में पड़ जाते कि पता नहीं ठीक है वा नहीं? ऐसी उलझन में तो नहीं हो ना? क्योंकि भक्ति मार्ग वालों ने सहज को इतना मुश्किल कर और चक्र में डाल दिया है, जो आज भी बाप को उसी रूप से ढूँढते रहते हैं। छोटी बात को बड़ी बात बना दी है, इसलिए उलझन में पड़ जाते हैं। ऊंचे ते ऊंचा भगवान उनसे मिलने की विधियाँ भी लम्बी-चौड़ी बता दी। उसी चक्र में भक्त आत्मायें सोच में ही पड़ी हुई हैं। भगवान भक्ति का फल देने भी आ गये हैं लेकिन भक्त आत्मायें उलझन के कारण पत्ते-पत्ते को पानी देने में ही बिज़ी हैं। कितना भी आप सन्देश देते हो तो क्या कहते हैं? इतना ऊंचा भगवान, ऐसे सहज आये – हो ही नहीं सकता, इसलिए बाप मुस्करा रहे थे कि आजकल के चाहे भक्ति के नामीग्रामी, चाहे धन के नामीग्रामी, चाहे किसी भी आक्यूपेशन के नामीग्रामी – अपने ही कार्य में बिजी हैं। लेकिन आप साधारण आत्माओं ने बाप से सौदा कर लिया। पाण्डवों ने पक्का सौदा कर लिया ना? डबल फारेनर्स सौदा करने में होशियार हैं। सौदा तो सबने किया लेकिन सब बात में नम्बरवार होते हैं। बाप ने तो सभी को एक जैसे सर्व खजाने दिये क्योंकि अखुट सागर है। बाप को देने में नम्बरवार देने की आवश्यकता ही नहीं है।

जैसे आजकल की विनाशकारी आत्मायें कहती हैं कि विनाश की इतनी सामग्री तैयार की है जो ऐसी कई दुनियायें विनाश हो सकती हैं। बाप भी कहते बाप के पास भी इतना खज़ाना है जो सारे विश्व की आत्मायें आप जैसे समझदार बन सौदा कर लें तो भी अखुट है। जितनी आप ब्राह्मणों की संख्या है, उससे और पद्मगुणा भी आ जाएं तो भी ले सकते हैं। इतना अथाह खजाना है! लेकिन लेने वालों में नम्बर हो जाते हैं। खुले दिल से सौदा करने वाले हिम्मतवान थोड़े ही निकलते हैं, इसलिए दो प्रकार की माला पूजी जाती है। कहाँ अष्ट रत्न और कहाँ 16 हजार का लास्ट! कितना अन्तर हो गया! सौदा करने में तो एक जैसा ही है। लास्ट नम्बर भी कहता बाबा और फर्स्ट नम्बर भी कहता बाबा। शब्द में अन्तर नहीं है। सौदा करने की विधि एक जैसी है और देने वाला दाता भी एक जैसा देता है। ज्ञान का खजाना वा शक्तियों का खजाना, जो भी संगमयुगी खजाने जानते हो, सबके पास एक जैसा ही है। किसको सर्वशक्तियाँ दी, किसको एक शक्ति दी वा किसको एक गुण वा किसको सर्वगुण दिया – यह अन्तर नहीं। सभी का टाइटिल एक ही है – आदि-मध्य-अन्त के ज्ञान को जानने वाले त्रिकालदर्शी, मास्टर सर्वशक्तिवान हैं। ऐसे नहीं कि कोई सर्वशक्तिवान हैं, कोई सिर्फ शक्तिवान हैं। नहीं। सभी को सर्वगुण सम्पन्न बनने वाली देव आत्मा कहते हैं, गुण मूर्ति कहते हैं। खज़ाना सभी के पास है। एक मास से स्टडी करने वाला भी ज्ञान का खज़ाना ऐसे ही वर्णन करता जैसे 50 वर्ष वाले वर्णन करते हैं। अगर एक-एक गुण पर, शक्तियों पर भाषण करने के लिए कहें तो बहुत अच्छा भाषण कर सकते हैं। बुद्धि में है तब तो कर सकते हैं ना। तो खज़ाना सबके पास है, बाकी अन्तर क्या हो गया? नम्बरवन सौदागर खज़ाने को स्व के प्रति मनन करने से कार्य में लगाते हैं। उसी अनुभव की अथॉरिटी से अनुभवी बन दूसरों को बांटते। कार्य में लगाना अर्थात् खज़ाने को बढ़ाना। एक हैं सिर्फ वर्णन करने वाले, दूसरे हैं मनन करने वाले। तो मनन करने वाले जिसको भी देते हैं वह स्वयं अनुभवी होने के कारण दूसरे को भी अनुभवी बना सकते हैं। वर्णन करने वाले दूसरे को भी वर्णन करने वाला बना देते। महिमा करते रहेंगे लेकिन अनुभवी नहीं बनेंगे। स्वयं महान नहीं बनेंगे लेकिन महिमा करने वाले बनेंगे।

तो नम्बरवन अर्थात् मनन शक्ति से खजाने के अनुभवी बन अनुभवी बनाने वाले अर्थात् दूसरे को भी धनवान बनाने वाले, इसलिए उन्हों का खज़ाना सदा बढ़ता जाता है और समय प्रमाण स्वयं प्रति और दूसरों के प्रति कार्य में लगाने से सफलता स्वरूप सदा रहते हैं। सिर्फ वर्णन करने वाले दूसरे को भी धनवान नहीं बना सकेंगे और अपने प्रति भी समय प्रमाण जो शक्ति, जो गुण, जो ज्ञान की बातें यूज़ करनी चाहिए वह समय पर नहीं कर सकेंगे, इसलिए खज़ाने के भरपूर स्वरूप का सुख और दाता बन देने का अनुभव नहीं कर सकते। धन होते भी धन से सुख नहीं ले सकते। शक्ति होते भी समय पर शक्ति द्वारा सफलता पा नहीं सकते। गुण होते भी समय प्रमाण उस गुण को यूज़ नहीं कर सकते। सिर्फ वर्णन कर सकते हैं। धन सबके पास है लेकिन धन का सुख समय पर यूज़ करने से अनुभव होता। जैसे आजकल के समय में भी कोई-कोई विनाशी धनवान के पास भी धन बैंक में होगा, अलमारी में होगा या तकिये के नीचे होगा, न खुद कार्य में लायेगा, न औरों को लगाने देगा। न स्वयं लाभ लेगा, न दूसरों को लाभ देगा। तो धन होते भी सुख तो नहीं लिया ना। तकिये के नीचे ही रह जायेगा, खुद चला जायेगा। तो यह वर्णन करना अर्थात् यूज़ न करना, सदा गरीब दिखाई देंगे। यह धन भी अगर स्वयं प्रति वा दूसरों प्रति समय प्रमाण यूज़ नहीं करते, सिर्फ बुद्धि में रखा है तो न स्वयं अविनाशी धन के नशे में, खुशी में रहते, न दूसरों को दे सकते। सदा ही क्या करें, कैसे करें… इस विधि से चलते रहेंगे, इसलिए दो मालायें हो जाती हैं। वह मनन करने वाली, वह सिर्फ वर्णन करने वाली। तो कौन से सौदागर हो? नम्बरवन वाले या दूसरे नम्बर वाले? इस खज़ाने का कन्डीशन (शर्त) यह है – जितना औरों को देंगे, जितना कार्य में लगायेंगे उतना बढ़ेगा। वृद्धि होने की विधि यह है। इसमें विधि को न अपनाने कारण स्वयं में भी वृद्धि नहीं और दूसरों की सेवा करने में भी वृद्धि नहीं। संख्या की वृद्धि नहीं कह रहे हैं, सम्पन्न बनाने की वृद्धि। कई स्टूडेन्टस संख्या में तो गिनती में आते हैं लेकिन अब तक भी कहते रहते – समझ में नहीं आता योग क्या है, बाप को याद कैसे करें? अभी शक्ति नहीं है। तो स्टूडेन्टस की लाइन में तो हैं, रजिस्टर में नाम है लेकिन धनवान तो नहीं बना ना। मांगता ही रहेगा। कभी कोई टीचर के पास जायेगा – मदद दे दो, कभी बाप से रूहरिहान करेगा – मदद दे दो। तो भरपूर तो नहीं हुआ ना। जो स्वयं अपने प्रति मनन शक्ति से धन को बढ़ाता है वह दूसरे को भी धन में आगे बढ़ा सकता हैं। मनन शक्ति अर्थात् धन को बढ़ाना। तो धनवान की खुशी, धनवान का सुख अनुभव करना। समझा? मनन शक्ति का महत्व बहुत है। पहले भी थोड़ा इशारा सुनाया है। और भी मनन शक्ति के महत्व का आगे सुनायेंगे। चेक करने का काम देते रहते हैं। रिजल्ट आउट हो और फिर आप कहो कि हमें तो पता नहीं, यह बात तो बापदादा ने कही नहीं थी, इसलिए रोज़ सुनाते रहते हैं। चेक करना अर्थात् चेन्ज करना। अच्छा।

सर्व श्रेष्ठ सौदागर आत्माओं को, सदा सर्व खजानों को समय प्रमाण कार्य में लगाने वाले महान विशाल बुद्धिवान बच्चों को, सदा स्वयं को और सर्व को सम्पन्न अनुभव कर अनुभवी बनाने वाले अनुभव की अथॉरिटी वाले बच्चों को आलमाइटी अथॉरिटी बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

ईस्टर्न ज़ोन के भाई बहिनों से अव्यक्त बापदादा की मुलाकात

ईस्ट से सूर्य उदय होता है ना। तो ईस्टर्न ज़ोन अर्थात् सदा ज्ञान सूर्य उदय है ही। ईस्टर्न वाले अर्थात् सदा ज्ञान सूर्य के प्रकाश द्वारा हर आत्मा को रोशनी में लाने वाले, अंधकार समाप्त करने वाले। सूर्य का काम है अंधकार को खत्म करना। तो आप सब मास्टर ज्ञान सूर्य अर्थात् चारों ओर का अज्ञान समाप्त करने वाले हो ना। सभी इसी सेवा में बिजी रहते हो या अपनी वा प्रवृत्ति की परिस्थितियों के झंझट में फंसे रहते हो? सूर्य का काम है रोशनी देने के कार्य में बिजी रहना। चाहे प्रवृत्ति में, चाहे कोई भी व्यवहार में हो, चाहे कोई भी परिस्थिति सामने आये लेकिन सूर्य रोशनी देने के कार्य के बिना रह नहीं सकता। तो ऐसे मास्टर ज्ञान सूर्य हो या कभी उलझन में आ जाते हो? पहला कर्तव्य है – ज्ञान की रोशनी देना। जब यह स्मृति में रहता है कि परमार्थ द्वारा व्यवहार और परिवार दोनों को श्रेष्ठ बनाना है तब यह सेवा स्वत: होती है। जहाँ परमार्थ है वहाँ व्यवहार सिद्ध व सहज हो जाता है। और परमार्थ की भावना से परिवार में भी सच्चा प्यार, एकता स्वत: ही आ जाती है। तो परिवार भी श्रेष्ठ और व्यवहार भी श्रेष्ठ। परमार्थ व्यवहार से किनारा नहीं कराता, और ही परमार्थ-कार्य में बिजी रहने से परिवार और व्यवहार में सहारा मिल जाता है। तो परमार्थ में सदा आगे बढ़ते चलो। नेपाल वालों की निशानी में भी सूर्य दिखाते हैं ना। वैसे राजाओं में सूर्यवंशी राजायें प्रसिद्ध हैं, श्रेष्ठ माने जाते हैं। तो आप भी मास्टर ज्ञान सूर्य सबको रोशनी देने वाले हो। अच्छा।

वरदान:- संगमयुग पर हर कर्म कला के रूप में करने वाले 16 कला सम्पन्न भव
संगमयुग विशेष कर्म रूपी कला दिखाने का युग है। जिनका हर कर्म कला के रूप में होता है उनके हर कर्म का वा गुणों का गायन होता है। 16 कला सम्पन्न अर्थात् हर चलन सम्पूर्ण कला के रूप में दिखाई देöयही सम्पूर्ण स्टेज की निशानी है। जैसे साकार के बोलने, चलने …सभी में विशेषता देखी, तो यह कला हुई। उठने बैठने की कला, देखने की कला, चलने की कला थी। सभी में न्यारापन और विशेषता थी। तो ऐसे फालो फादर कर 16 कला सम्पन्न बनो।
स्लोगन:- पावरफुल वह है जो फौरन परखकर फैंसला कर दे।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 10 APRIL 2021 : AAJ KI MURLI

10-04-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – पतित जगत से नाता तोड़ एक बाप से बुद्धियोग लगाओ तो माया से हार नहीं हो सकती”
प्रश्नः- समर्थ बाप साथ होते हुए भी यज्ञ में अनेक विघ्न क्यों पड़ते हैं? कारण क्या है?
उत्तर:- यह विघ्न तो ड्रामा अनुसार पड़ने ही हैं क्योंकि जब यज्ञ में असुरों के विघ्न पड़ें तब तो पाप का घड़ा भरे। इसमें बाप कुछ नहीं कर सकते, यह तो ड्रामा में नूँध है। विघ्न पड़ने ही हैं लेकिन विघ्नों से तुम्हें घबराना नहीं है।
गीत:- कौन है माता, कौन पिता है….

ओम् शान्ति। बच्चों ने बेहद के बाप का फरमान सुना। यह जो इस जगत के मम्मा-बाबा हैं, यह जो तुम्हारा नाता है, देह के साथ है क्योंकि देह से पहले-पहले माता की फिर पिता की लागत होती है फिर भाई-बन्धु आदि की होती है। तो बेहद के बाप का कहना है कि इस जगत में तुम्हारे जो मात-पिता हैं उनसे बुद्धि का योग तोड़ दो। इस जगत से नाता नहीं रखो क्योंकि यह सब हैं कलियुगी छी-छी नाते। जगत अर्थात् दुनिया। इस पतित दुनिया से बुद्धि का योग तोड़ मुझ एक से जोड़ो और फिर नये जगत के साथ जोड़ो, क्योंकि अब तुमको मेरे पास आना है। सिर्फ नाता जोड़ने की बात है और कोई बात नहीं और कोई तकलीफ नहीं। नाता जोड़ेंगे वह जिनको डायरेक्शन मिलता है। सतयुग में पहले नाता अच्छा होता है, सतोप्रधान फिर नीचे उतरते जाते हैं। फिर जो सुख का नाता है वह आहिस्ते-आहिस्ते कम होता जाता है। अभी तो बिल्कुल ही इस पुरानी दुनिया से नाता तोड़ना पड़े। बाप कहते हैं मेरे साथ नाता जोड़ो। श्रीमत पर चलो और जो भी देह के नाते हैं वह सब छोड़ दो। विनाश तो होना ही है। बच्चे जानते हैं बाप जिसको परमपिता परमात्मा कहा जाता है, वह भी ड्रामा अनुसार सर्विस करते हैं। वह भी ड्रामा के बन्धन में बांधा हुआ है। मनुष्य तो समझते हैं वह सर्वशक्तिमान् हैं। जैसे कृष्ण को भी सर्वशक्तिमान् मानते हैं। उनको स्वदर्शन चक्र दे दिया है। समझते हैं उनसे गला काटते हैं। परन्तु यह नहीं समझते कि देवतायें हिंसा का काम कैसे करेंगे। वह तो कर नहीं सकते। देवताओं के लिए तो कहा जाता है – अहिंसा परमो धर्म था। उन्हों में हिंसा कहाँ से आई? जिसको जो आया वह बैठकर लिख दिया है। कितनी धर्म की ग्लानी की है। बाप कहते हैं इन शास्त्रों में सच तो बिल्कुल आटे में नमक मिसल है। यह भी लिखा हुआ है कि रूद्र ज्ञान यज्ञ रचा था। उसमें असुर विघ्न डालते थे। अबलाओं पर अत्याचार होते थे। वह तो ठीक लिखा हुआ है। अभी तुम समझते हो – शास्त्रों में सच क्या है, झूठ क्या है। भगवान खुद कहते हैं इस रूद्र ज्ञान यज्ञ में विघ्न पड़ेंगे जरूर। ड्रामा में नूँध है। ऐसे नहीं कि परमात्मा साथ है तो विघ्नों को हटा देंगे। इसमें बाप क्या करेंगे! ड्रामा में होने का ही है। यह सब विघ्न डालें तब तो पाप का घड़ा भरे ना। बाप समझाते हैं ड्रामा में जो नूँध है वही होना है। असुरों के विघ्न जरूर पड़ेंगे। अपनी राजधानी जो स्थापन हो रही है। आधाकल्प माया के राज्य में मनुष्य कितना तमोप्रधान बुद्धि, भ्रष्टाचारी बन जाते हैं। फिर उनको श्रेष्ठाचारी बनाना बाप का काम है ना। आधाकल्प लगता है भ्रष्टाचारी बनने में। फिर एक सेकेण्ड में बाप श्रेष्ठाचारी बनाते हैं। निश्चय होने में देरी थोड़ेही लगती है। ऐसे बहुत अच्छे बच्चे हैं जिन्हों को निश्चय होता है, झट प्रतिज्ञा करते हैं, परन्तु माया भी तो पहलवान है ना। कुछ न कुछ मन्सा में तूफान लाती है। पुरूषार्थ कर कर्मणा में नहीं आना है। सब पुरूषार्थ कर रहे हैं। कर्मातीत अवस्था तो हुई नहीं है। कुछ न कुछ कर्मेन्द्रियों से हो जाता है। कर्मातीत अवस्था तक पहुँचने में बीच में विघ्न जरूर पड़ेंगे। बाप ने समझाया है – पुरूषार्थ करते-करते अन्त में जाकर कर्मतीत अवस्था होती है फिर तो इस शरीर को रहना नहीं है, इसलिए टाइम लगता है। विघ्न कुछ न कुछ पड़ते हैं। कहाँ माया हरा भी देती है। बाक्सिंग है ना। चाहते हैं बाबा की याद में रहें, परन्तु रह नहीं सकते। थोड़ा बहुत टाइम जो पड़ा हुआ है, धीरे-धीरे वह अवस्था धारण करनी है। कोई जन्मते ही राजा तो नहीं होता है। छोटा बच्चा धीरे-धीरे बड़ा होगा ना, इसमें भी टाइम लगता है। अब तो बाकी थोड़ा समय रहा है। सारा मदार पुरूषार्थ के ऊपर है। अटेन्शन देना है, हम कैसे भी करके बाप से वर्सा लेंगे जरूर। माया का सामना जरूर करेंगे इसलिए प्रतिज्ञा करते हैं। माया भी कम नहीं है। हल्के से हल्के रूप में भी आती है। रुस्तम के सामने अच्छा जोर मारती है। यह बातें कोई शास्त्रों में नहीं हैं। बाप कहते हैं कि तुम बच्चों को अभी समझाता हूँ। बाप द्वारा तुम सद्गति को पा लेते हो। फिर इस ज्ञान की दरकार ही नहीं रहती। ज्ञान से सद्गति हो जाती है। सद्गति कहा जाता है सतयुग को।

तो मीठे-मीठे बच्चों को लक्ष्य मिला है – यह भी समझते हैं ड्रामा अनुसार झाड़ बढ़ने में टाइम तो लगता ही है। विघ्न तो बहुत पड़ते हैं। चेंज होना पड़ता है। कौड़ी से हीरे जैसा बनना पड़ता है। रात-दिन का फ़र्क है। देवताओं के मन्दिर अभी तक भी बनाते रहते हैं। तुम ब्राह्मण अभी मन्दिर नहीं बनायेंगे क्योंकि वह है भक्ति मार्ग। दुनिया को यह पता ही नहीं कि अब भक्ति मार्ग खत्म हो ज्ञान मार्ग जिंदाबाद होना है। यह सिर्फ तुम बच्चों को मालूम है। मनुष्य तो समझते हैं कलियुग अभी बच्चा है। उन्हों का सारा मदार है – शास्त्रों पर। तुम बच्चों को तो बाप बैठ सभी वेदों शास्त्रों का राज़ समझाते हैं। बाप कहते हैं – अभी तक तुम जो पढ़े हो, वह सब भूल जाओ। उनसे कोई की सद्गति होती नहीं। भल करके अल्पकाल का सुख मिलता आया है। सदा सुख ही सुख मिले, ऐसे हो नहीं सकता। यह है क्षण भंगुर सुख। मनुष्य दु:ख में रहते हैं। मनुष्य यह नहीं जानते कि सतयुग में दु:ख का नाम निशान नहीं होता है। उन्होंने वहाँ के लिए भी ऐसी बातें बता दी हैं। वहाँ कृष्णपुरी में कंस था, यह था..। कृष्ण ने जेल में जन्म लिया। बहुत बातें लिख दी हैं। अब श्रीकृष्ण स्वर्ग का पहला नम्बर प्रिन्स, उसने क्या पाप किया? यह हैं दन्त कथायें, सो भी तुम अभी समझते हो जबकि बाप ने सच बताया है। बाप ही आकर सचखण्ड स्थापन करते हैं। सच-खण्ड में कितना सुख था, झूठ खण्ड में कितना दु:ख है। यह सब भूल गये हैं। तुम जानते हो हम श्रीमत पर सच-खण्ड स्थापन करके उसके मालिक बनेंगे।

बाप समझाते हैं, ऐसे-ऐसे श्रीमत पर चलने से तुम ऊंच पद पा सकेंगे। बच्चे यह जानते हैं हमको यह पढ़ाई पढ़कर सूर्यवंशी महाराजा महारानी बनना है। दिल भी सबकी होती है ऊंच पद पाने की। सबका पुरूषार्थ चलता है। अच्छे पक्के भक्त जो होते हैं वह चित्र साथ में रखते हैं तो घड़ी-घड़ी उनकी याद रहेगी। बाबा भी कहते हैं त्रिमूर्ति का चित्र साथ में रख दो तो घड़ी-घड़ी याद आयेगी। बाप को याद करने से हम सूर्यवंशी घराने में आ जायेंगे। कमरे में त्रिमूर्ति का चित्र लगा हुआ होगा तो घड़ी-घड़ी नज़र सामने पड़ेगी। बाबा द्वारा हम इस सूर्यवंशी घराने में जायेंगे। सवेरे उठते ही नज़र उस पर जायेगी। यह भी एक पुरूषार्थ है। बाबा राय देते हैं – अच्छे-अच्छे भगत बहुत पुरूषार्थ करते हैं। आंख खोलने से ही कृष्ण याद आ जाये, इसलिए चित्र सामने रख देते हैं। तुम्हारे लिए तो और ही सहज है। अगर सहज याद नहीं आती, माया हैरान करती है तो यह चित्र मदद करेंगे। शिवबाबा हमको ब्रह्मा द्वारा विष्णुपुरी का मालिक बनाते हैं। हम बाबा से विश्व का मालिक बन रहे हैं। इस सिमरण में रहने से भी मदद बहुत मिलेगी। जो बच्चे समझते हैं याद घड़ी-घड़ी भूल जाती है तो बाबा राय देते हैं, चित्र सामने रख दो तो बाप भी और वर्सा भी याद आयेगा। परन्तु ब्रह्मा को याद नहीं करना है। सगाई करते हैं तो दलाल थोड़ेही याद आता है। तुम बाबा को अच्छी रीति याद करो तो बाबा भी तुमको याद करेगा। याद से याद मिलती है। अभी माशुक के आक्युपेशन का तुमको पता है। शिव के कितने ढेर भगत हैं। शिव-शिव कहते रहते हैं। परन्तु वह रांग है – शिवकाशी, विश्वनाथ फिर गंगा कह देते हैं। पानी के किनारे जाकर बैठते हैं। यह समझते नहीं कि ज्ञान का सागर बाप है। बनारस में बहुत फॉरेनर्स आदि जाते हैं देखने। बड़े-बड़े घाट हैं फिर भी सभी के बाप का मन्दिर तो खींचता है। सब उनके पास जाते हैं। मन्दिर तो किसके पास जायेगा नहीं। मन्दिर के देवतायें खींचते हैं। शिवबाबा भी खींचते हैं। नम्बरवन है शिव-बाबा फिर सेकेण्ड नम्बर में यह ब्रह्मा, सरस्वती सो विष्णु। विष्णु सो ब्रह्मा। ब्राह्मण सो विष्णुपुरी के देवतायें। विष्णुपुरी के देवतायें सो ब्राह्मण। अब तुम्हारा धन्धा यह रहा, हम सो देवता बन रहे हैं तो औरों को भी रास्ता बताना है। और सब हैं जंगल में ले जाने वाले। तुम जंगल से निकाल बगीचे में ले जाते हो। शिवबाबा आकर कांटों को फूल बनाते हैं। तुम भी यह धन्धा करते हो। इन बातों को तुम ही जानते हो। कोई राजा-रानी तो हैं नहीं जिनको तुम समझाओ। गाया हुआ है पाण्डवों को 3 पैर पृथ्वी के नहीं मिलते थे। बाप समर्थ था तो उनको विश्व की बादशाही दे दी। अभी भी वही पार्ट बजेगा ना। बाप है गुप्त। कृष्ण को तो कोई विघ्न पड़ न सके। अब बाप आये हैं, बाप से आकर वर्सा लेना है, इसके लिए मेहनत करनी होती है। दिन प्रतिदिन नई-नई प्वाइंट्स निकलती रहती हैं। देखने में आता है, प्रदर्शनी में समझाने से अच्छा प्रभाव पड़ता है। बुद्धि से काम लिया जाता है कि प्रदर्शनी से अच्छा प्रभाव होता है या प्रोजेक्टर से? प्रदर्शनी में समझाने से चेहरा देखकर समझाया जा सकता है। समझते हो गीता का भगवान बाप है, तो बाप से फिर वर्सा लेने का पुरूषार्थ करना है। 7 रोज़ देना है। लिखकर दो। नहीं तो बाहर जाने से ही माया भुला देगी। तुम्हारी बुद्धि में आ गया – हमने 84 का चक्र लगाया है, अभी जाना है। तमोप्रधान से सतोप्रधान बनना है। यह चित्र तो साथ में होने ही चाहिए। बड़े अच्छे हैं। बिड़ला आदि भी यह नहीं जानते कि इन लक्ष्मी-नारायण ने यह राज्य-भाग्य कब और कैसे लिया। तुम जानते हो तो तुमको बड़ी खुशी होनी चाहिए। लक्ष्मी-नारायण का चित्र ले, झट कोई को समझायेंगे। उन्होंने यह पद कैसे पाया? यह बातें बुद्धि से समझने और समझाने की हैं। मंजिल है ऊंची। जो जैसा टीचर है वह वैसे ही सर्विस करते हैं। देखते हैं – कौन-कौन सेन्टर सम्भाल रहे हैं, अपनी अवस्था अनुसार। नशा तो सबको है। परन्तु विवेक कहता है समझाने वाला जितना होशियार होगा उतना सर्विस अच्छी होगी। सब तो होशियार हो नहीं सकते। सबको एक जैसा टीचर मिल नहीं सकता। जैसे कल्प पहले चला था वैसे ही चल रहा है। बाप कहते हैं अपनी अवस्था को जमाते रहो। कल्प-कल्प की बाजी है। देखा जा रहा है – कल्प पहले मुआफिक हर एक का पुरूषार्थ चल रहा है। जो कुछ होता है – हम कह देते कल्प पहले भी ऐसे हुआ था। फिर खुशी भी रहती है, शान्ति भी रहती है। बाप कहते हैं कर्म करते हुए बाप को याद करो। बुद्धि का योग वहाँ लटका रहे तो बहुत कल्याण होगा, जो करेगा सो पायेगा। अच्छा करेगा अच्छा पायेगा। माया की मत पर सब बुरा ही करते आये हैं। अब मिलती है श्रीमत। भला करो तो भला हो। हर एक अपने लिए मेहनत करते हैं। जैसा करेंगे वैसा पायेंगे। क्यों न हम योग लगाते सर्विस करते रहें। योग से आयु बढ़ेगी। याद की यात्रा से निरोगी बनना है तो क्यों न हम बाबा की याद में रहें! यथार्थ बात है तो क्यों न हम कोशिश करें। ज्ञान तो बिल्कुल सहज है। छोटे बच्चे भी समझ जाते हैं और समझाते हैं। परन्तु वह योगी तो नहीं ठहरे ना। यह तो पक्का कराना है कि बाप को याद करो। जो समझते हैं, घड़ी-घड़ी भूल जाता है तो चित्र रख दें, तो भी अच्छा है। सवेरे चित्र को देखते ही याद आ जाता है। शिवबाबा से हम विष्णुपुरी का वर्सा ले रहे हैं। यह त्रिमूर्ति का चित्र ही मुख्य है, जिसका अर्थ तो तुमने अभी समझा है। दुनिया में ऐसे त्रिमूर्ति का चित्र और कोई के पास है नहीं। यह तो बिल्कुल सहज है। हम लिखें वा न लिखें। यह तो सभी जानते हैं ब्रह्मा द्वारा स्थापना, विष्णु द्वारा पालना। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) माया की बॉक्सिंग में कभी भी हार न हो – इसका ध्यान रखना है। कल्प पहले की स्मृति से अपनी अवस्था को जमाना है। खुशी और शान्ति में रहना है।

2) अपना भला करने के लिए श्रीमत पर चलना है। इस पुरानी दुनिया से नाता तोड़ देना है। माया के तूफान से बचने के लिए चित्रों को सामने रख बाप और वर्से को याद करना है।

वरदान:- निर्बल आत्माओं में शक्तियों का फोर्स भरने वाले ज्ञान-दाता सो वरदाता भव
वर्तमान समय निर्बल आत्माओं में इतनी शक्ति नहीं है जो जम्प दे सकें, उन्हें एक्स्ट्रा फोर्स चाहिए। तो आप विशेष आत्माओं को स्वयं में विशेष शक्ति भरकरके उन्हें हाई जम्प दिलाना है। इसके लिए ज्ञान दाता के साथ-साथ शक्तियों के वरदाता बनो। रचता का प्रभाव रचना पर पड़ता है इसलिए वरदानी बनकर अपनी रचना को सर्व शक्तियों का वरदान दो। अभी इसी सर्विस की आवश्यकता है।
स्लोगन:- साक्षी होकर हर खेल देखो तो सेफ भी रहेंगे और मज़ा भी आयेगा।
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