Daily Gyan Murli : Hindi

BRAHMA KUMARIS MURLI 15 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 15 December 2018

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15-12-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
”मीठे बच्चे – अपनी रॉयल चलन से सेवा करनी है, श्रीमत पर बुद्धि को रिफाइन बनाना है, माताओं का रिगॉर्ड रखना है”
प्रश्नः- कौन-सा कर्तव्य एक बाप का है, किसी मनुष्य का नहीं?
उत्तर:- सारे विश्व में पीस स्थापन करना, यह कर्तव्य बाप का है। मनुष्य भल कितनी भी कान्फ्रेन्स आदि करते रहें पीस हो नहीं सकती। शान्ति का सागर बाप जब बच्चों से पवित्रता की प्रतिज्ञा कराते हैं तब पीस स्थापन होती है। पवित्र दुनिया में ही शान्ति है। तुम बच्चे यह बात सबको बड़ी युक्ति से और भभके से समझाओ तब बाप का नाम बाला हो।
गीत:- मैं एक नन्हा सा बच्चा हूँ…….. 

ओम् शान्ति। यह गीत तो भक्ति मार्ग का गाया हुआ है क्योंकि एक तरफ भक्ति का प्रभाव है दूसरे तरफ अब ज्ञान का प्रभाव है। भक्ति और ज्ञान में रात-दिन का फ़र्क है। कौन-सा फ़र्क है? यह तो बहुत सहज है। भक्ति है रात और ज्ञान है दिन। भक्ति में है दु:ख, जब भक्त दु:खी होते हैं तो भगवान् को पुकारते हैं। फिर भगवान् को आना पड़ता है दु:खियों का दु:ख दूर करने। फिर बाप से पूछा जाता है – ड्रामा में क्या कोई भूल है? बाप कहते हैं – हाँ, बड़ी भूल है, जो तुम मुझे भूल जाते हो। कौन भुलाते हैं? माया रावण। बाप बैठ समझाते हैं – बच्चे, यह खेल बना हुआ है। स्वर्ग और नर्क होता तो भारत में ही है। भारत में ही कोई मरता है तो कहते हैं बैकुण्ठवासी हुआ। यह तो जानते नहीं कि स्वर्ग अथवा बैकुण्ठ कब होता है? जब स्वर्ग होता है तो मनुष्य पुनर्जन्म जरूर स्वर्ग में ही लेंगे। अभी तो है ही नर्क तो पुनर्जन्म भी जरूर नर्क में ही लेंगे, जब तक स्वर्ग की स्थापना हो। मनुष्य यह बातें नहीं जानते हैं। एक है ईश्वरीय अथवा राम सम्प्रदाय, दूसरा है रावण सम्प्रदाय। सतयुग-त्रेता में है राम सम्प्रदाय, उनको कोई दु:ख नहीं है। अशोक वाटिका में रहते हैं। फिर आधाकल्प बाद रावण राज्य शुरू होता है। अब बाप फिर से आदि सनातन देवी-देवता धर्म स्थापन करते हैं। वह है सबसे सर्वोत्तम धर्म। धर्म तो सब हैं ना। धर्मों की कान्फ्रेन्स होती है। भारत में अनेक धर्म वाले आते हैं, कान्फ्रेन्स करते हैं। अब जो भारतवासी धर्म को मानने वाले ही नहीं, वह कान्फ्रेन्स क्या करेंगे? वास्तव में भारत का प्राचीन धर्म तो है ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म। हिन्दू धर्म तो है नहीं। सबसे ऊंच है देवी-देवता धर्म। अब कायदा कहता है सबसे ऊंच ते ऊंच धर्म वाले को गद्दी पर बिठाना चाहिए। सबसे आगे किसको बिठायें? इस पर भी कभी उन्हों का झगड़ा लग पड़ता है। जैसे एक बार कुम्भ के मेले में झगड़ा हो गया था। वह कहे पहले हमारी सवारी चले, वह कहे पहले हमारी। लड़ पड़े थे। तो अब इस कान्फ्रेन्स में बच्चों को यह समझाना है कि ऊंच ते ऊंच कौन-सा धर्म है? वह तो जानते नहीं। बाप कहते हैं आदि सनातन है ही देवी-देवता धर्म। जो अब प्राय: लोप हो गया है और अपने को हिन्दू कहलाने लग पड़े हैं। अब चीन में रहने वाले अपना धर्म चीन तो नहीं कहेंगे, वो लोग तो जिसको नामीग्रामी देखते हैं उनको मुख्य करके बिठा देते हैं। कायदे अनुसार कान्फ्रेन्स में बहुत तो आ नहीं सकते। सिर्फ रिलीजन के हेड्स को ही निमंत्रण दिया जाता है। बहुतों से फिर बहुत बोलचाल हो जाता है। अब उन्हों को राय देने वाला तो कोई है नहीं। तुम हो ऊंच ते ऊंच देवी-देवता धर्म वाले। अब देवता धर्म की स्थापना कर रहे हो। तुम ही बता सकते हो भारत का जो मुख्य धर्म है, जो सब धर्मों का माई-बाप है उनके हेड को इस कान्फ्रेन्स में मुख्य बनाना चाहिए। गद्दी नशीन उनको करना चाहिए। बाकी तो सब हैं उनके नीचे। तो मुख्य बच्चे जो हैं उनकी बुद्धि चलनी चाहिए।

भगवान् अर्जुन को बैठ समझाते हैं। संजय यह है। अर्जुन तो है रथी। उनमें रथवान है बाप, वह समझते हैं रूप बदलकर कृष्ण के तन में आकर ज्ञान दिया है। परन्तु ऐसे तो है नहीं। अब प्रजापिता भी है, त्रिमूर्ति के ऊपर बहुत अच्छी रीति समझाया जा सकता है। त्रिमूर्ति के ऊपर शिवबाबा का चित्र जरूर चाहिए। वह है सूक्ष्मवतन की रचना। बच्चे समझते हैं यह विष्णु है पालनकर्ता। प्रजापिता ब्रह्मा है स्थापन कर्ता। तो उनका भी चित्र चाहिए। यह बड़ी समझ की बात है। बुद्धि में रहता है प्रजापिता ब्रह्मा जरूर है। विष्णु भी तो चाहिए। जिससे स्थापना करायेंगे उससे ही पालना भी करायेंगे। स्थापना कराते हैं ब्रह्मा से। ब्रह्मा के साथ सरस्वती आदि बहुत बच्चे हैं। वास्तव में यह भी पतित से पावन बन रहे हैं। तो कान्फ्रेन्स में आदि सनातन देवी-देवता धर्म की हेड जगदम्बा होनी चाहिए क्योंकि माताओं का बहुत मान है। जगत अम्बा का मेला बड़ा भारी लगता है। वह है जगत पिता की बेटी। अब आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना हो रही है। गीता एपीसोड रिपीट हो रहा है। यह वही महाभारत की लड़ाई सामने खड़ी है। बाप भी कहते हैं मैं कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुग पर आता हूँ, भ्रष्टाचारी दुनिया को श्रेष्ठाचारी बनाने। जगत अम्बा गॉडेज ऑफ नॉलेज गाई हुई है। उनके साथ ज्ञान गंगायें भी हैं। उनसे पूछ सकते हैं कि उनको यह नॉलेज कहाँ से मिली हुई है! नॉलेजफुल गॉड फादर तो एक ही है, वह नॉलेज कैसे दे? जरूर उनको शरीर लेना पड़े। तो ब्रह्मा मुख कमल से सुनाते हैं। ये मातायें बैठ समझायेंगी। कान्फ्रेन्स में उन्हों को यह मालूम होना चाहिए ना कि बड़ा धर्म कौन-सा है? यह तो कोई समझते ही नहीं कि हम आदि सनातन देवी-देवता धर्म के हैं। बाप कहते हैं यह धर्म जब प्राय: लोप हो जाता है तो मैं आकर फिर स्थापन करता हूँ। अभी देवता धर्म है नहीं। बाकी 3 धर्मों की वृद्धि होती जा रही है। तो जरूर देवी-देवता धर्म फिर से स्थापन करना पड़े। फिर यह सब धर्म रहेंगे ही नहीं। बाप आते ही हैं आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करने। तुम बच्चियां ही बता सकती हो कि पीस कैसे स्थापन हो सकती है? शान्ति का सागर तो है ही परमपिता परमात्मा। तो पीस जरूर वही स्थापन करेंगे। ज्ञान का सागर, सुख का सागर वही है। गाते भी हैं पतित-पावन आओ, आकर के भारत को पावन रामराज्य बनाओ। पीसफुल तो वही बनायेंगे। यह बाप का ही कर्तव्य है। तुम उनकी मत पर चलने से श्रेष्ठ पद पाते हो। बाप कहते हैं जो मेरे बनेंगे, राजयोग सीखेंगे और पवित्रता की प्रतिज्ञा करेंगे कि बाबा हम पवित्र बन 21 जन्मों का वर्सा लेंगे वही मालिक बनेंगे, पतित से पावन बनेंगे। पावन हैं लक्ष्मी-नारायण सबसे ऊंच। फिर अभी पावन दुनिया की स्थापना हो रही है। तुम पीस के लिए कान्फ्रेन्स कर रहे हो परन्तु मनुष्य थोड़ेही पीस करेंगे। यह तो शान्ति के सागर बाप का काम है। कान्फ्रेन्स में बड़े आदमी आते हैं, बहुत मेम्बर्स बनते हैं तो उन्हों को राय भी देनी पड़े। फादर शोज़ सन। शिवबाबा के पोत्रे ब्रह्मा के बच्चे हैं गॉडेज ऑफ नॉलेज। उनको गॉड ने नॉलेज दी है। मनुष्य तो शास्त्रों की नॉलेज पढ़ते हैं। ऐसे भभके से समझाओ तो बड़ा मजा हो। युक्ति जरूर रचनी पड़ती है। एक तरफ उन्हों की कान्फ्रेन्स हो और दूसरे तरफ फिर तुम्हारी भी भभके से कान्फ्रेन्स हो। चित्र भी क्लीयर हैं, जिनसे झट समझ जायेंगे। उनका आक्यूपेशन अलग है, उनका अलग है। ऐसे थोड़ेही सब एक ही एक हैं। नहीं। सभी धर्मों का पार्ट अलग-अलग है। शान्ति के लिए मिल करके कार्य करते हैं, कहते हैं रिलीजन इज़ माइट। परन्तु सबसे ताकत वाला कौन? वही आकरके पहला नम्बर देवी-देवता धर्म की स्थापना करते हैं। यह तुम बच्चे ही जानते हो। दिन-प्रतिदिन तुम बच्चों को प्वाइन्ट्स मिलती रहती हैं। समझाने की पॉवर भी है। योगी की पॉवर अच्छी होगी। बाबा कहते ज्ञानी तू आत्मा ही मुझे प्रिय हैं। ऐसे नहीं कि योगी प्रिय नहीं हैं। जो ज्ञानी होंगे वह योगी भी जरूर होंगे। योग परमपिता परमात्मा के साथ रखते हैं। योग बिगर धारणा नहीं होगी। जिनका योग नहीं है तो धारणा भी नहीं है क्योंकि देह-अभिमान बहुत है। बाप तो समझाते हैं – आसुरी बुद्धि को दैवी बुद्धि बनाना है। पत्थरबुद्धि को पारस बुद्धि बनाने वाला बाप ईश्वर है। रावण आकरके पत्थरबुद्धि बनाते हैं। उन्हों का नाम ही है आसुरी सम्प्रदाय। देवताओं के आगे कहते हैं हमारे में कोई गुण नाही, हम कामी कपटी हैं। तुम मातायें अच्छी रीति समझा सकती हो। मुरली चलाने का इतना हौंसला चाहिए। बड़ी-बड़ी सभाओं में ऐसी-ऐसी बातें करनी पड़े। मम्मा है गॉडेज ऑफ नॉलेज। ब्रह्मा को कभी गॉड ऑफ नॉलेज नहीं कहा जाता है। सरस्वती का नाम गाया हुआ है। जिसका जो नाम है वही रखते हैं। माताओं का नाम बाला करना है। कई गोपों को बहुत देह-अभिमान है। समझते हैं हम ब्रह्माकुमार गॉड आफ नॉलेज नहीं हैं क्या! अरे, खुद ब्रह्मा ही अपने को गॉड आफ नॉलेज नहीं कहते। माताओं का बहुत रिगॉर्ड रखना पड़े। यह मातायें ही जीवन पलटाने वाली हैं। मनुष्य से देवता बनाने वाली हैं। मातायें भी हैं, कन्यायें भी हैं। अधर कुमारी का राज़ तो कोई समझते नहीं हैं। भल शादी की हुई है तो भी ब्रह्माकुमारियां हैं। यह बड़ी वन्डरफुल बातें हैं। जिन्हों को बाप से वर्सा लेना है वह समझते हैं। बाकी जिनकी तकदीर में नहीं है वह क्या समझेंगे, नम्बरवार दर्जे जरूर हैं। वहाँ भी कोई दास-दासियां होंगे, कोई प्रजा होंगे। प्रजा भी चाहिए। मनुष्य सृष्टि वृद्धि को पाती रहेगी तो प्रजा भी वृद्धि को पाती रहेगी। तो ऐसी-ऐसी कान्फ्रेन्स जो होती हैं उसके लिए जो अपने को मुख्य समझते हैं उनको तैयार रहना चाहिए। जिनमें ज्ञान नहीं है वह जैसे छोटे ठहरे। इतनी बुद्धि नहीं। देखने में भल बड़े हैं परन्तु बुद्धि नहीं है, वह छोटे हैं। कोई-कोई की बुद्धि बड़ी अच्छी है। सारा मदार बुद्धि पर है। छोटे-छोटे भी तीखे चले जाते हैं। कोई की समझानी में बड़ा मिठास होता है। बातचीत बड़ी रायॅल करते हैं। समझेंगे यह रिफाइन बच्चे हैं। चलन से भी शो होता है ना। बच्चों की चलन बहुत रायॅल होनी चाहिए। कोई अनरॉयल काम नहीं करना चाहिए। नाम बदनाम करने वाले ऊंच पद पा नहीं सकते। शिवबाबा का नाम बदनाम करते हैं तो बाप का भी हक है समझाने का। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

रात्रि क्लास –

अब तुम बच्चे समझते हो कि हम जीव आत्मायें परमपिता परमात्मा के सम्मुख बैठे हैं। इसको ही मंगल मिलन कहा जाता है। गाया जाता है ना – ‘मंगलम् भगवान् विष्णु’। अभी मंगल है ना, मिलन का। भगवान् वर्सा देते हैं विष्णु कुल का, इसलिए उनको ‘मंगलम् भगवान् विष्णु’ कहा जाता है। जब बाप मिलते हैं जीव आत्माओं से, वह मिलन बड़ा सुन्दर है। तुम भी समझते हो अभी हम ईश्वरीय बच्चे बने हैं, ईश्वर से अपना वर्सा लेने लिए। बच्चे जानते हैं ईश्वर के वर्से बाद दैवी वर्सा मिलता है अर्थात् स्वर्ग में पुनर्जन्म मिलता है। तो तुम बच्चों को खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए। तुम जैसा खुशनसीब वा सौभाग्यशाली तो कोई नहीं। दुनिया में सिवाए ब्राह्मण कुल के और कोई भी भाग्यशाली हो नहीं सकता। विष्णु कुल सेकेण्ड नम्बर में हो गया। वह दैवी गोद हो जाती। अभी ईश्वरीय गोद है। यह तो ऊंच ठहरे ना। देलवाड़ा मन्दिर ईश्वरीय गोद का मन्दिर है। जैसे अम्बा के भी मन्दिर हैं, वह इतना संगमयुग का साक्षात्कार नहीं कराते हैं, यह देलवाड़ा मन्दिर संगमयुग का साक्षात्कार कराता है। बच्चों को जितनी समझ है उतना और कोई मनुष्य मात्र को हो न सके। जितना तुम ब्राह्मणों को समझ है, उतनी देवताओं को भी नहीं। तुम संगमयुगी ब्राह्मण हो। वह संगमयुगी ब्राह्मणों की महिमा करते हैं। कहते हैं ब्राह्मण सो देवता बनते हैं। ऐसे ब्राह्मणों को नम:। ब्राह्मण ही नर्क को स्वर्ग बनाने की सर्विस करते हैं, ऐसे बच्चों (ब्राह्मणों) को नमस्ते करते हैं। अच्छा! गुडनाइट।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप का प्रिय बनने के लिए ज्ञानी और योगी बनना है। देह-अभिमान में नहीं आना है।

2) मुरली चलाने का हौंसला रखना है। अपनी चलन से बाप का शो करना है। बातचीत बड़े मिठास से करनी है।

वरदान:- मन्सा और वाचा की शक्ति को यथार्थ और समर्थ रूप से कार्य में लगाने वाले तीव्र पुरुषार्थी भव
स्लोगन:- तीव्र पुरुषार्थी अर्थात् फर्स्ट डिवीजन में आने वाले बच्चे संकल्प शक्ति और वाणी की शक्ति को यथार्थ और समर्थ रीति से कार्य में लगाते हैं। वे इसमें लूज़ नहीं होते। उन्हें यह स्लोगन सदा याद रहता कि कम बोलो, धीरे बोलो और मधुर बोलो। उनका हर बोल योगयुक्त, युक्तियुक्त होता। वे आवश्यक बोल ही बोलते, व्यर्थ बोल, विस्तार के बोल बोलकर अपनी एनर्जी समाप्त नहीं करते। वे सदा एकान्तप्रिय रहते हैं।

स्लोगन:- सम्पूर्ण नष्टोमोहा वह है जो मेरे पन के अधिकार का भी त्याग कर दे।

BRAHMA KUMARIS MURLI 14 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 14 December 2018

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14-12-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – अपना सरनेम सदा याद रखो, तुम हो गॉडली चिल्ड्रेन, तुम्हारा ईश्वरीय कुल है, तुम देवताओं से भी ऊंच हो, तुम्हारे मैनर्स बड़े रॉयल चाहिए”
प्रश्नः- बाप ने बच्चों को आप समान प्यार का सागर बनाया है, उसकी निशानी क्या है?
उत्तर:- तुम बच्चे बाप समान प्यारे बने हो इसलिए तो तुम्हारे यादगार चित्रों को सभी प्यार करते हैं। प्यार से देखते रहते हैं। लक्ष्मी-नारायण सदा हर्षितमुख, रमणीक हैं। अभी तुम जानते हो कि बाबा हमें ज्ञान-योग से बहुत-बहुत मीठा बना रहे हैं। तुम्हें मुख से सदा ज्ञान रत्न ही निकालने हैं।
गीत:- तू प्यार का सागर है…….. 

ओम् शान्ति। यह किसकी महिमा में गाते हैं कि तू प्यार का सागर है। यह किसी मनुष्य की महिमा नहीं। कहा जाता है कि तू प्यार, शान्ति व पवित्रता का सागर है। अभी तुम पवित्र बनते हो। ऐसे बहुत हैं जो शादी नहीं करते, बहुत हैं जो बिगर सन्यास लिए भी पवित्र रहते हैं। गाया हुआ भी है – गृहस्थ व्यवहार में जनक मिसल ज्ञान। उसकी हिस्ट्री है। कहा हमको कोई ब्रह्म ज्ञान सुनाओ। वास्तव में कहना चाहिए ब्रह्मा ज्ञान। परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा आकर ज्ञान देते हैं ब्रह्माकुमार कुमारियों को।

तुम जानते हो कि इस समय हमारा सरनेम है ब्रह्माकुमार-कुमारी, हम हैं गॉडली चिल्ड्रेन। ऐसे तो सब कहते हैं हम ईश्वर की सन्तान हैं। तो जरूर भाई-भाई ठहरे तो फिर अपने को बाप कह न सकें। फादर हुड नहीं फिर तो ब्रदरहुड कहा जाए। एक तो तुम ब्रह्माकुमार-कुमारी कहलाते हो, दूसरा जिसके कुमार-कुमारियां हो उनको मम्मा-बाबा कहते हो। बच्चे जानते हैं हम शिवबाबा के पोत्रे-पोत्रियां ब्रहमाकुमार-कुमारियां है। भारत में अनेक शास्त्र, वेद, पुराण आदि तो सब पढ़ते हैं। सर्व शास्त्रमई शिरोमणी श्रीमद् भगवत गीता है। गीता से सतयुग स्थापन होता है। गीता का ज्ञान दिया ज्ञान सागर परमात्मा ने। यह सब ज्ञान नदियां ज्ञान सागर से निकलती हैं। पानी की गंगा से थोड़ेही ज्ञान मिलता है जो पावन बनेंगे। सद्गति अर्थात् पावन बनना। यह तो है ही तमोप्रधान पतित दुनिया। अगर पावन बनें तो कहाँ रहें। वापिस तो जा न सकें। कायदा नहीं है। सबको पुनर्जन्म ले तमोप्रधान बनना ही है। बाप है ज्ञान का सागर। तुम प्रैक्टिकल रूप से सुन रहे हो। यह कोई कॉपी कर न सके। भल ऐसे बहुत हैं जो कहते हैं हम भी वही ज्ञान देते हैं, परन्तु नहीं। यहाँ जिसको भी ज्ञान मिलता है वह ब्रह्माकुमार-कुमारी कहलाते हैं और कोई ऐसी संस्था नहीं जहाँ ब्रह्माकुमार-कुमारी कहलायें। भल ड्रेस भी यह पहनें परन्तु यह कैसे कहें कि हम ब्रह्मा के बच्चे हैं। इनको मैंने नाम दिया है ब्रह्मा। इनको बैठ समझाते हैं। तुमको भी कहते हैं तुम ब्रह्माकुमार-कुमारियां अपने जन्मों को नहीं जानते, मैं जानता हूँ। अब संगमयुग पर पैर और चोटी हैं इससे पुरानी दुनिया बदल नई बनती है। सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग….. सृष्टि वृद्धि को पाती रहती है। अब अन्त है, दुनिया बदल नई बननी है। बाप आकर त्रिकालदर्शी बनाते हैं। वह है प्यार का सागर, तो जरूर ऐसा प्यारा बनायेगा। लक्ष्मी-नारायण में देखो कितनी आकर्षण है। जितना लक्ष्मी-नारायण का रमणीक हर्षितमुख चित्र देखेंगे उतना राम-सीता का नहीं। लक्ष्मी-नारायण को देखने में ही खुशी आ जाती है। राधे-कृष्ण के मन्दिर में जाने से इतनी खुशी नहीं होगी। लक्ष्मी-नारायण को तो राज्य-भाग्य है। अब दुनिया तो इन बातों को जानती नहीं। तुम जानते हो बाबा हमको बहुत मीठा बनाते हैं। लक्ष्मी-नारायण को ज्ञान का सागर नहीं कहेंगे। वह इस ज्ञान-योग से ऐसे बने। अब तुम भी बनते हो। मनुष्य चाहते हैं कि दुनिया एक हो जाए, एक राज्य हो। याद दिलाते हैं कि कभी एक राज्य जरूर था। परन्तु ऐसे नहीं सब मिलकर एक हो जायेंगे। नहीं, वहाँ तो बहुत थोड़े मनुष्य थे। तुम समझते हो हम ईश्वरीय सन्तान हैं। कहते हैं ईश्वर हाज़िराहज़ूर है। परन्तु हाज़िर-नाज़िर आत्मा को कहेंगे। आत्मा सर्वव्यापी है, सबमें आत्मा है। ऐसे नहीं सबमें परमात्मा है। तो कसम उठाने की क्या बात है? अगर हमारे में परमात्मा है तो कसम किसकी उठाते हैं? हम अगर उल्टा कार्य करेंगे तो परमात्मा सज़ा देंगे। अगर परमात्मा सबमें हैं तो कसम आदि की बात नहीं। अब तुम साकार में हो, जैसे आत्मा इन आंखों से देखी नहीं जाती तो परमात्मा को कैसे देखेंगे? फील करते हैं हमारे में आत्मा है। कहेंगे परमात्मा का साक्षात्कार हो लेकिन जब आत्मा को ही नहीं देख सकते तो परमात्मा को कैसे देख सकेंगे? आत्मा ही पुण्य आत्मा, पाप आत्मा बनती है। इस समय पाप आत्मा है। तुमने बहुत पुण्य किया था, बाप के आगे तन-मन-धन समर्पण किया था। अब पाप आत्मा से पुण्य आत्मा बन रहे हो। शिवबाबा को तन-मन-धन बलि देते हो। इसने भी अर्पण किया ना। तन भी सच्ची सेवा में दिया। माताओं के आगे अर्पण कर उन्हें ट्रस्टी बना दिया। माताओं को आगे बढ़ाना है। माताओं ने ही आकर शरण ली तो उनकी सम्भाल कैसे हो? माताओं पर बलि चढ़ना पड़े। बाप कहते हैं वन्दे मातरम्। हाज़िर-नाज़िर का भी राज़ समझाया है। आत्मा पुकारती है ओ गॉड फादर। किस फादर को बुलाते हैं? समझते नहीं। तुम लक्ष्मी-नारायण बनते हो। मनुष्य कितना प्यार करते हैं। हर होलीनेस और हिज़ होलीनेस उनको कहा जाता है। अब तुम कहेंगे हम ईश्वरीय कुल के हैं, पहले आसुरी कुल के थे। ब्राह्मणों का तो सरनेम ही है ईश्वरीय सन्तान। बापू गांधी भी चाहते थे कि रामराज्य हो। नये भारत में नया राज्य हो। वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी गवर्मेन्ट हो जो कि बेहद का बाप ही बना सकते हैं। बाप कहते हैं मैं वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी हूँ। ऊंच ते ऊंच निराकार हूँ। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर तो हमारी रचना है। भारत शिवालय, सम्पूर्ण निर्विकारी था, अब सम्पूर्ण विकारी है। यह भी नहीं जानते कि सम्पूर्ण निर्विकारी यहाँ होते हैं। चाहते हैं वन वर्ल्ड हो, वन ऑलमाइटी अथॉरिटी राज्य हो। सो तो परमात्मा वन वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी डीटी, लक्ष्मी-नारायण का राज्य स्थापन कर रहे हैं और सबका विनाश सामने खड़ा है। इतना नशा रहना चाहिए! यहाँ से घर जाते हैं तो मूर्छित हो जाते हैं। संजीवनी बूटी की कहानी है ना। लेकिन यह तो ज्ञान की बूटी है, मनमनाभव की। देह-अभिमान में आने से माया का थप्पड़ लगता है। देही-अभिमानी बनने से थप्पड़ नहीं लगेगा। हम शिवबाबा से वर्सा लेते हैं। ब्रह्मा का यह अन्तिम जन्म है, वह भी वर्सा लेते हैं। डीटी वर्ल्ड सावरन्टी इज योर गॉड फादरली बर्थ राइट। तुम बच्चों में दैवी मैनर्स होने चाहिए। तुम ब्राह्मण देवताओं से भी ऊंच हो। तुमको बहुत मीठा बोलना चाहिए। भाषण आदि में तो बोलना पड़ता है, बाकी व्यर्थ बातों में नहीं जाना चाहिए। मुख से सदैव रत्न निकालो। भल यह आंखे हैं लेकिन स्वर्ग को और मूलवतन को देखो। ज्ञान का नेत्र आत्मा को प्राप्त होता है। आत्मा आरगन्स द्वारा पढ़ती है। तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है, जैसे अक्ल की दाढ़ निकलती है। बाप वर्सा ब्राह्मणों को देगा, शूद्रों को थोड़ेही देगा। तीसरा नेत्र आत्मा को मिलता है। ज्ञान नेत्र बिना राइट-रांग को समझ नहीं सकते। रावण रांग रास्ते पर ही चलायेगा, बाबा राइट रास्ते पर चलाते हैं। हमेशा एक-दूसरे से गुण उठाना चाहिए। गुण के बदले अवगुण नहीं उठाना चाहिए।

देखो डॉ. निर्मला आती है, उनका स्वभाव बहुत मीठा है। शान्तचित, थोड़ा बोलना उनसे सीखना चाहिए। बड़ी सयानी और मीठी बच्ची है। शान्त में भी बैठने की रॉयल्टी चाहिए। ऐसे नहीं कुछ समय याद किया फिर सारा दिन ख़लास। यह भी अभ्यास करना है। बाप को याद करने से ताकत आती है। तो बाप भी खुश होता है। ऐसी अवस्था वाला जिसको भी देखेगा तो झट उनको भी अशरीरी बना देगा। अशरीरी बन जाते हैं, शान्त हो जाते हैं। सिर्फ शान्ति में बैठना कोई सुख नहीं है, वह है अल्पकाल का सुख। शान्त हो बैठ जायेगा तो फिर कर्म कैसे करेगा? योग से विकर्म विनाश होंगे। सच्ची सुख-शान्ति तो यहाँ हो न सके। यहाँ हर चीज़ अल्पकाल की है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

रात्रि क्लास 9-4-68

आजकल बहुत करके यही कान्फ्रेन्स करते रहते हैं कि विश्व में शान्ति कैसे हो! उन्हों को बताना चाहिए देखो सतयुग में एक ही धर्म, एक ही राज्य, अद्वैत धर्म था। दूसरा कोई धर्म ही नहीं जो ताली बजे। था ही रामराज्य, तब ही विश्व में शान्ति थी। तुम चाहते हो विश्व में शान्ति हो। वह तो सतयुग में थी। पीछे अनेक धर्म होने से अशान्ति हुई है। परन्तु जब तक कोई समझे तब तक माथा मारना पड़ता है। आगे चलकर अखबारों में भी पड़ेगा फिर इन सन्यासियों आदि के भी कान खुलेंगे। यह तो तुम बच्चों की खातिरी है कि हमारी राजधानी स्थापन हो रही है। यही नशा है। म्युज़ियम का भभका देख बहुत आयेंगे। अन्दर आकर वन्डर खायेंगे। नये नये चित्रों पर नई नई समझानी सुनेंगे।

यह तो बच्चों को मालूम है – योग है मुक्ति जीवनमुक्ति के लिये। सो तो मनुष्य मात्र कोई सिखला न सके। यह भी लिखना है सिवाय परमपिता परमात्मा के कोई भी मुक्ति-जीवनमुक्ति के लिये योग सिखला नहीं सकते। सर्व का सद्गति दाता है ही एक। यह क्लीयर लिख देना चाहिए, जो भल मनुष्य पढ़ें। सन्यासी लोग क्या सिखाते होंगे। योग-योग जो करते हैं, वास्तव में योग कोई भी सिखला नहीं सकते हैं। महिमा है ही एक की। विश्व में शान्ति स्थापन करना वा मुक्ति जीवन्मुक्ति देना बाप का ही काम है। ऐसे-ऐसे विचार सागर मंथन कर प्वाइन्ट्स समझानी है। ऐसा लिखना चाहिए जो मनुष्यों को बात ठीक जंच जाये। इस दुनिया को तो बदलना ही है। यह है मृत्युलोक। नई दुनिया को कहा जाता है अमरलोक। अमरलोक में मनुष्य कैसे अमर रहते हैं यह भी वन्डर है ना। वहाँ आयु भी बड़ी रहती है और समय पर आपे ही शरीर बदली कर देते हैं जैसे कपड़ा चेंज किया जाता है। यह सभी समझाने की बाते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे रूहानी बच्चों को रूहानी बाप व दादा का याद प्यार गुडनाईट और नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपना स्वभाव बहुत मीठा, शान्तचित बनाना है। बहुत कम और रायॅल्टी से बात करनी है।

2) तन-मन-धन से ब्रह्मा बाप समान ट्रस्टी होकर रहना है।

वरदान:- अपने आदि अनादि स्वरूप की स्मृति द्वारा सर्व बन्धनों को समाप्त करने वाले बन्धनमुक्त स्वतंत्र भव
आत्मा का आदि अनादि स्वरूप स्वतंत्र है, मालिक है। यह तो पीछे परतंत्र बनी है इसलिए अपने आदि और अनादि स्वरूप को स्मृति में रख बन्धनमुक्त बनो। मन का भी बंधन न हो। अगर मन का भी बंधन होगा तो वह बंधन और बन्धनों को ले आयेगा। बंधनमुक्त अर्थात् राजा, स्वराज्य अधिकारी। ऐसे बन्धनमुक्त स्वतंत्र आत्मायें ही पास विद आनर बनेंगी अर्थात् फर्स्ट डिवीज़न में आयेंगी।
स्लोगन:- मास्टर दु:ख हर्ता बन दु:ख को भी रूहानी सुख में परिवर्तन करना ही सच्ची सेवा है।

BRAHMA KUMARIS MURLI 13 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 13 December 2018

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13-12-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – तुम्हारा अव्यभिचारी प्यार एक बाप के साथ तब जुट सकता है जब बुद्धियोग देह सहित देह के सब सम्बन्धों से टूटा हुआ हो”
प्रश्नः- तुम बच्चों की रेस कौन-सी है? उस रेस में आगे जाने का आधार क्या है?
उत्तर:- तुम्हारी रेस है ”पास विद् आनर बनने की” इस रेस का आधार है बुद्धियोग। बुद्धियोग जितना बाप के साथ होगा उतना पाप कटेंगे और अटल, अखण्ड, सुख-शान्तिमय 21 जन्म का राज्य प्राप्त होगा। इसके लिए बाप राय देते हैं – बच्चे, नींद को जीतने वाले बनो। एक घड़ी, आधी घड़ी भी याद में रहते-रहते अभ्यास बढ़ाते जाओ। याद का ही रिकार्ड रखो।
गीत:- न वह हमसे जुदा होंगे, न उलफत दिल से निकलेगी……. 

ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना। उल़फत कहा जाता है प्यार को, अब तुम बच्चों का प्यार बांधा हुआ है बेहद के बाप शिव के साथ। तुम बी.के. उनको दादा कहेंगे। ऐसे कोई मनुष्य नहीं होगा जो अपने बापदादा के आक्यूपेशन को न जानता हो। ऐसी कोई संस्था नहीं जहाँ इतने ढेर के ढेर कहें कि हम ब्रह्माकुमार-कुमारी हैं। मातायें तो कुमारी नहीं हैं फिर ब्रह्माकुमारी क्यों कहलाती हैं? यह तो हैं ब्रह्मा मुख वंशावली। इतने ब्रह्माकुमार-कुमारियां हैं प्रजापिता ब्रह्मा की मुख वंशावली। एक बाप की बच्चियां हैं। ब्रह्मा के आक्यूपेशन को भी जानना है। ब्रह्मा किसका बच्चा है? शिव का। शिव के तीन बच्चे ब्रह्मा, विष्णु, शंकर सूक्ष्मवतन वासी हैं। अब प्रजापिता ब्रह्मा तो स्थूलवतन वासी होना चाहिए। इतने सब कहते हैं प्रजापिता ब्रह्मा के मुख वंशावली हैं। कुख वंशावली तो हो न सकें। यह कोई गर्भ की पैदाइस नहीं है। और फिर तुमसे पूछते भी नहीं कि इतने सब ब्रह्माकुमार-कुमारियां कैसे कहलाते हो? माताएं भी ब्रह्माकुमारियां हैं तो जरूर ब्रह्मा के बच्चे हुए ब्रह्मा के मुख वंशावली। यह सब हैं ईश्वर की सन्तान। ईश्वर कौन है? वह है परमपिता परमात्मा, रचता। किस चीज़ की रचना करते हैं? स्वर्ग की। तो जरूर अपने पोत्रे-पोत्रियों को स्वर्ग का वर्सा देते होंगे। उनको शरीर चाहिए जो राजयोग सिखाये। ऐसे थोड़ेही पाग रख देंगे। शिवबाबा बैठ ब्रह्मा मुख वंशावली को फिर से राजयोग सिखलाते हैं क्योंकि फिर से स्वर्ग की स्थापना करते हैं। नहीं तो फिर इतने ब्रह्माकुमार-कुमारियां कहाँ से आयें? वन्डर है, कोई हिम्मत रख पूछते भी नहीं! कितने सेन्टर्स हैं! पूछना चाहिए आप हैं कौन, अपना परिचय दो? यह तो साफ है प्रजापिता ब्रह्मा के कुमार-कुमारियां और शिव के पोत्रे-पोत्रियां हैं। हम उनके बच्चे बने हैं। उनसे हमारा प्यार है। शिवबाबा भी कहते हैं सबसे प्यार अथवा बुद्धियोग हटाए मुझ एक के साथ रखो। मैं तुमको ब्रह्मा द्वारा राजयोग सिखला रहा हूँ ना और तुम ब्रह्माकुमार-कुमारी सुन रहे हो ना। कितनी सहज सीधी सी बात है। पूछो तो सही। तो यह हो गई गऊशाला। शास्त्रों में ब्रह्मा की गऊशाला भी गाई हुई है। वास्तव में शिवबाबा की गऊशाला है, शिवबाबा इस नंदीगण में आता है तो गऊशाला अक्षर के कारण शास्त्रों में फिर गऊ आदि दिखा दी है। शिव जयन्ती है तो जरूर शिव आया होगा। जरूर किसी तन में आया होगा। तुम जानते हो यह गॉड फादर का स्कूल है। शिव भगवानुवाच। ज्ञान सागर पतित-पावन वह है। कृष्ण तो स्वयं पावन है, उनको क्या पड़ी है जो पतित तन में आये। गाया भी जाता है दूर देश का रहने वाला आया देश पराये……..। शरीर भी पराया है। तो जरूर शिवबाबा ने इनको रचा होगा तब तो मनुष्य सृष्टि रची जाए। तो सिद्ध हुआ कि यह बापदादा है। प्रजापिता ब्रह्मा है आदि देव, महावीर क्योंकि माया पर जीत पाते हैं। जगदम्बा भी गाई हुई है। श्री लक्ष्मी भी गाई हुई है। दुनिया को पता नहीं कि जगदम्बा कोई ब्रह्मा की बेटी सरस्वती है। वह भी ब्रह्माकुमारी है। यह भी ब्रह्माकुमारी है। शिवबाबा ने ब्रह्मा मुख से इनको अपना बनाया है। अब इन सभी के बुद्धि का योग (उल़फत) उनके साथ है। कहा भी जाता है उल़फत परमात्मा के साथ रखो। और सब साथ तोड़ एक साथ जोड़ो। वह एक है भगवान्। परन्तु जानते नहीं। जाने भी कैसे? जब बाप आकर अपना परिचय दे, तब निश्चय हो। आजकल तो सिखला दिया है – आत्मा सो परमात्मा….. जिससे संबंध ही टूट गया है। अब तुम बच्चे वास्तव में सच्ची-सच्ची सत्य नारायण की कथा सुनते हो। वह है सुखदेव और तुम हो व्यास। गीता में भी व्यास का नाम है ना। वह तो मनुष्य ठहरा। परन्तु सच्चे व्यास तुम हो। तुम जो गीता बनाते हो वह भी विनाश हो जायेगी। झूठी और सच्ची गीता अभी है। सचखण्ड में झूठ का नाम नहीं रहता। तुम वर्सा ले रहे हो दादे से। इस बाबा की प्रापर्टी नहीं है। स्वर्ग का रचता है शिवबाबा, न कि ब्रह्मा। ब्रह्मा मनुष्य सृष्टि का रचयिता है। ब्रह्मा मुख कमल से ब्राह्मण वर्ण रचा गया। तुम हो शिव के पोत्रे अर्थात् ईश्वरीय सम्प्रदाय। उनको अपना बनाया है। गुरू पोत्रे कहलाते हैं ना। अब तुम हो सतगुरू पोत्रे और पोत्रियां। वह तो सिर्फ पोत्रे हैं अर्थात् मेल्स हैं। पोत्रियां हैं नहीं। सतगुरू तो एक शिवबाबा है। गाया जाता है सतगुरू बिन घोर अन्धियारा। तुम्हारा ब्रह्माकुमार-कुमारी नाम बड़ा वन्डरफुल है। बाप कितना समझाते हैं परन्तु कई बच्चे समझते नहीं। बाप कहते हैं मुझ बेहद के बाप को जानने से तुम सब कुछ जान जायेंगे। सतयुग-त्रेता में सूर्यवंशी चन्द्रवंशी राज्य था। फिर रावण राज्य में ब्रह्मा की रात शुरू होती है। प्रैक्टिकल में ब्रह्माकुमार-कुमारियां तुम हो। सतयुग को ही स्वर्ग कहा जाता है जहाँ घी दूध की नदी बहती है। यहाँ तो घी मिलता नहीं। बाप कहते हैं बच्चे यह पुरानी दुनिया अब विनाश होनी है। एक दिन इस भंभोर को आग लगेगी, सब खत्म हो जायेंगे फिर मेरे से वर्सा तो पा नहीं सकेंगे।

मैं आऊं तो जरूर शरीर का लोन लेना पड़े। मकान तो चाहिए ना। बाबा कितना अच्छा, रमणीक रीति से समझाते हैं। तुम अब मेरे द्वारा सब कुछ जान गये हो। यह सृष्टि चक्र कैसे चलता है, यह कोई को भी पता नहीं। 84 जन्म कौन लेते हैं? सब तो नहीं लेंगे। जरूर पहले आने वाले देवी-देवता ही 84 जन्म लेंगे। अब उनको फिर से मैं राजयोग सिखाता हूँ। भारत को फिर से नर्क से स्वर्ग बनाने मैं आता हूँ। इनको लिबरेट मैं करता हूँ। फिर गाइड बन वापिस भी ले जाता हूँ। मुझे ज्योति स्वरूप भी कहते हैं। ज्योति स्वरूप को भी आना पड़े, स्वयं कहते बच्चे मैं तुम्हारा बाप हूँ। मेरी ज्योति कभी बुझती नहीं। वह स्टॉर है जो भ्रकुटी के बीच रहते हैं। बाकी सब आत्मायें एक शरीर छोड़ दूसरा लेती हैं। तो आत्मा रूपी स्टॉर में 84 जन्मों का पार्ट अविनाशी नूंधा हुआ है। 84 जन्म भोग फिर पहले नम्बर से शुरू करते हैं। यथा राजा रानी तथा प्रजा। नहीं तो भला बताओ आत्मा में इतना पार्ट कहाँ से भरा हुआ है। इसको कहा जाता है बहुत गुह्य वन्डरफुल बात है। सारी मनुष्य सृष्टि की आत्माओं का पार्ट नूंधा हुआ है। कहते हैं मेरे में यह पार्ट है, वह भी अविनाशी है। उसमें कोई तबदीली (अदली-बदली) नहीं हो सकती। मेरे पार्ट को ब्रह्माकुमारकुमारियां जानते हैं। पार्ट को बायोग्राफी कहा जाता है। प्रजापिता ब्रह्मा है तो जरूर जगदम्बा भी होगी। वह भी शूद्र से ब्राह्मण बनी है। तो तुम बच्चे जानते हो हमारी उल़फत बाप के साथ है और हमारा एक के ही साथ प्यार है। अव्यभिचारी प्यार होने में देरी नहीं लगती है। माया बिल्ली भी कम नहीं है। कई स्त्रियां होती हैं जिनकी आपस में ईर्ष्या हो जाती है। हम भी शिवबाबा से प्यार रखते हैं तो माया को ईर्ष्या हो जाती है इसलिए तूफान लाती है। तुम चाहते हो पऊंबारा डालें (चौपड़ का खेल) परन्तु माया बिल्ली तीन दाने डाल देती है। तुम गृहस्थ व्यवहार में रहते हो सिर्फ तुम्हारा बुद्धियोग देह सहित देह के सब सम्बन्धों से हटाए कहते हैं मेरे को याद करो। मैं तुम्हारा मोस्ट बिलवेड बाप हूँ। मैं तुमको स्वर्ग का मालिक बनाऊंगा, यदि मेरी श्रीमत पर चलेंगे तो। ब्रह्मा की राय भी मशहूर है। तो जरूर ब्रह्मा के बच्चों की भी मशहूर होगी। वे भी ऐसी राय देते होंगे। यह सारे सृष्टि चक्र का समाचार तो बाप ही बतलाते हैं। भल बच्चों आदि को सम्भालो परन्तु बुद्धियोग बाप के साथ हो। समझो यह कब्रिस्तान है, हम परिस्तान में जाते हैं। कितनी सहज बात है।

बाप समझाते हैं कि कोई भी साकारी वा आकारी देवता से बुद्धियोग नहीं लगाओ। बाप दलाल बनकर कहते हैं। गाते हैं ना आत्मायें परमात्मा अलग रहे बहुकाल। अब बहुकाल से अलग तो देवी-देवता हैं। वही पहले-पहले पार्ट बजाने आते हैं। सुन्दर मेला कर दिया जब सतगुरू मिला दलाल। दलाल के रूप में कहते हैं मामेकम् याद करो और प्रतिज्ञा करो कि हम काम चिता से उतर ज्ञान चिता पर बैठेंगे। फिर तुम राज्य भाग्य ले लेंगे। अपने पास रिकार्ड रखो कि हम कितना समय ऐसे मोस्ट बिलवेड बाप को याद करते हैं। कन्या दिन-रात पति को याद करती है ना। बाप कहते हैं – हे नींद को जीतने वाले बच्चे, अब पुरूषार्थ करो। एक घड़ी आधी घड़ी……. शुरू करो फिर धीरे-धीरे बढ़ाते जाओ। मेरे से योग लगायेंगे तो पास विद् आनर हो जायेंगे। यह रेस है बुद्धि की। समय लगता है, बुद्धियोग से ही पाप कटेंगे। और फिर तुम अटल, अखण्ड, सुख-शान्तिमय 21 जन्म राज्य करेंगे। कल्प पहले भी किया था, अब फिर राज्य-भाग्य लो। कल्प-कल्प हम ही स्वर्ग बनाते, राज्य करते हैं। फिर हमको ही माया नर्कवासी बनाती है। अभी हम हैं राम सम्प्रदाय। हमारा उनसे प्रेम है। बाप ने हमको अपनी पहचान दी है। बाप है स्वर्ग का रचयिता। हम उनके बच्चे हैं तो फिर हम नर्क में क्यों पड़े हैं? जरूर स्वर्ग में कभी थे। बाप ने तो स्वर्ग रचा है। ब्रह्माकुमार-कुमारियां हैं सबको प्राण दान देने वाले। उनके प्राणों को कभी काल आकर बेकायदे, अकाले नहीं ले जायेंगे। वहाँ अकाले मृत्यु होना असम्भव है। वहाँ रोना भी होता नहीं। तुमने साक्षात्कार में भी देखा है कि श्रीकृष्ण कैसे जन्म लेते हैं। एकदम बिजली चमक जाती है। सतयुग का फर्स्ट प्रिन्स है ना। कृष्ण है नम्बरवन सतोप्रधान। फिर सतो, रजो, तमो में आते हैं। जब तमो जड़जड़ीभूत शरीर होता है तो फिर एक शरीर छोड़ दूसरा ले लेते हैं। यह प्रैक्टिस यहाँ की जाती है। बाबा, अब हम आपके पास आते हैं फिर वहाँ से हम स्वर्ग में जाकर नया शरीर लेंगे। अब तो वापिस बाबा के पास जाना है ना। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अकाले मृत्यु से बचने के लिए सबको प्राण दान देने की सेवा करनी है। रावण सम्प्रदाय को राम सम्प्रदाय बनाना है।

2) दिल की उल़फत (प्यार) एक बाप से रखना है। बुद्धियोग भटकाना नहीं है, नींद को जीत याद को बढ़ाते जाना है।

वरदान:- समय प्रमाण रूप-बसन्त अर्थात् ज्ञानी व योगी तू आत्मा बनने वाले स्व शासक भव
जो स्व-शासक हैं वह जिस समय चाहें रूप बन जाएं और जिस समय चाहें बसन्त बन जाएं। दोनों स्थिति सेकण्ड में बना सकते हैं। ऐसे नहीं कि बनने चाहें रूप और याद आती रहें ज्ञान की बातें। सेकण्ड से भी कम टाइम में फुलस्टाप लग जाए। पावरफुल ब्रेक का काम है जहाँ लगाओ वहाँ लगे, इसके लिए प्रैक्टिस करो कि जिस समय जिस विधि से जहाँ मन-बुद्धि को लगाना चाहें वहाँ लग जाए। ऐसी कन्ट्रोलिंग वा रूलिंग पावर हो।
स्लोगन:- शान्तिदूत वह है जो तूफान मचाने वालों को भी शान्ति का तोहफा दे।

BRAHMA KUMARIS MURLI 12 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 12 December 2018

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12-12-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – शिवबाबा के सिवाए तुम्हारा यहाँ कुछ भी नहीं, इसलिए इस देह के भान से भी दूर खाली बेगर होना है, बेगर ही प्रिन्स बनेंगे”
प्रश्नः- ड्रामा की यथार्थ नॉलेज कौन-से ख्यालात समाप्त कर देती है?
उत्तर:- यह बीमारी क्यों आई, ऐसा नहीं करते तो ऐसा नहीं होता, यह विघ्न क्यों पड़ा. . . . बंधन क्यों आया…. यह सब ख्यालात ड्रामा की यथार्थ नॉलेज से समाप्त हो जाते हैं क्योंकि ड्रामा अनुसार जो होना था वही हुआ, कल्प पहले भी हुआ था। पुराना शरीर है इसे चत्तियां भी लगनी ही है इसलिए कोई ख्यालात चल नहीं सकते।
गीत:- हमें उन राहों पर चलना है…….. 

ओम् शान्ति। उन राहों पर चलना है, कौन-सी राहें? राह कौन बताता है? बच्चे जानते हैं कि हम किसकी राय पर चल रहे हैं। राय कहो, राह कहो वा श्रीमत कहो – बात एक ही है। अब श्रीमत पर चलना है। लेकिन श्रीमत किसकी? लिखा हुआ है श्रीमत भगवत गीता, तो जरूर श्रीमत की तरफ हमारा बुद्धियोग जायेगा। अब तुम बच्चे किसकी याद में बैठे हो? अगर श्रीकृष्ण कहते हो तो उनको वहाँ याद करना पड़े। तुम बच्चे श्रीकृष्ण को याद करते हो या नहीं? वर्से के रूप में याद करते हैं। यह तो जानते हो हम प्रिन्स बनेंगे। ऐसे तो नहीं, जन्मते ही लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। बरोबर हम शिवबाबा को याद करते हैं क्योंकि श्रीमत उनकी है, कृष्ण भगवानुवाच कहने वाले कृष्ण को याद करेंगे, परन्तु कहाँ याद करेंगे? उनको तो याद किया जाता है वैकुण्ठ में। तो मनमनाभव अक्षर कृष्ण कह नहीं सकते, मध्याजी भव कह सकते हैं। मुझे याद करो वह तो वैकुण्ठ में ठहरा। दुनिया इन बातों को नहीं जानती। बाप कहते हैं-बच्चे, यह सब शास्त्र भक्ति मार्ग के हैं। सभी धर्म शास्त्रों में गीता भी आ जाती है। बरोबर गीता भारत का धर्म शास्त्र है। वास्तव में तो यह सभी का शास्त्र है। कहा भी जाता है श्रीमत सर्व शास्त्रमई शिरोमणि गीता। यानी सबसे उत्तम ठहरी। सभी से उत्तम है शिवबाबा श्री श्री, श्रेष्ठ से श्रेष्ठ। कृष्ण को श्री श्री नहीं कहेंगे। श्री श्री कृष्ण वा श्री श्री राम नहीं कहेंगे। उनको सिर्फ श्री कहेंगे। श्रेष्ठ से श्रेष्ठ जो है वही आकर फिर श्रेष्ठ बनाते हैं। श्रेष्ठ से श्रेष्ठ है भगवान्। श्री श्री अर्थात् सभी से श्रेष्ठ। श्रेष्ठ का नाम बाला है। श्रेष्ठ तो जरूर देवी-देवताओं को कहेंगे, जो अभी नहीं हैं। आजकल श्रेष्ठ किसको समझते हैं? अभी के लीडर्स आदि का कितना सम्मान करते हैं। परन्तु उन्हें श्री तो कह नहीं सकते। महात्मा आदि को भी श्री अक्षर नहीं दे सकते। अभी तुमको ऊंचे से ऊंचे परमात्मा से ज्ञान मिल रहा है। सबसे ऊंचा है परमपिता परमात्मा, फिर है उनकी रचना। फिर रचना में ऊंचे से ऊंचे हैं ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। यहाँ भी नम्बरवार मर्तबे हैं। ऊंचे से ऊंचे प्रेजीडेंट फिर प्राइम मिनिस्टर, युनियन मिनिस्टर….।

बाप बैठ सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं। भगवान् रचयिता है। अब रचयिता अक्षर कहने से मनुष्य पूछते हैं-सृष्टि कैसे रची गई? इसलिए यह जरूर कहना पड़ता है कि त्रिमूर्ति शिव रचयिता है। वास्तव में रचयिता के बजाए रचवाने वाला कहना ठीक है। ब्रह्मा द्वारा दैवी कुल की स्थापना कराते हैं। ब्रह्मा द्वारा स्थापना किसकी? दैवी सम्प्रदाय की। शिवबाबा कहते हैं अभी तुम हो ब्रह्मा की ब्राह्मण सम्प्रदाय, वह हैं आसुरी सम्प्रदाय, तुम हो ईश्वरीय सम्प्रदाय फिर दैवी सम्प्रदाय बनेंगे। बाप ब्रह्मा द्वारा सभी वेद-शास्त्रों का सार भी समझाते हैं। मनुष्य बहुत मूंझे हुए हैं, कितना माथा मारते रहते हैं – बर्थ कन्ट्रोल हो। बाप कहते हैं मैं आकर भारत की यह सर्विस कर रहा हूँ। यहाँ तो है ही तमोप्रधान मनुष्य। 10-12 बच्चे पैदा करते रहते। झाड़ वृद्धि को जरूर पाना ही है। पत्ते निकलते रहेंगे। इसको कोई कन्ट्रोल कर न सके। सतयुग में कन्ट्रोल है – एक बच्चा, एक बच्ची, बस। यह बातें तुम बच्चे ही समझते हो। आगे चल आते रहेंगे, समझते रहेंगे। गाया भी हुआ है अतीन्द्रिय सुख गोप-गोपियों से पूछो। यहाँ जब तुम सम्मुख सुनते हो तो सुख भासता है। फिर धन्धे-धोरी में जाने से इतना सुख नहीं भासता है। यहाँ तुमको त्रिकालदर्शी बनाया जाता है। त्रिकालदर्शी को स्वदर्शन चक्रधारी भी कहते हैं। मनुष्य कहते हैं फलाना महात्मा त्रिकालदर्शी था। तुम कहते हो वैकुण्ठनाथ राधे-कृष्ण को भी स्वदर्शन चक्र की वा तीनों कालों की नॉलेज नहीं थी। कृष्ण तो सभी का प्यारा सतयुग का फर्स्ट प्रिन्स है। परन्तु मनुष्य न समझने कारण कह देते कि तुम श्रीकृष्ण को भगवान् नहीं मानते इसलिए नास्तिक हो। फिर विघ्न डालते हैं। अविनाशी ज्ञान यज्ञ में विघ्न पड़ते हैं। कन्याओं-माताओं पर भी विघ्न आते हैं। बांधेलियां कितना सहन करती हैं, तो समझना चाहिए ड्रामा अनुसार हमारा पार्ट ऐसा ही है। विघ्न पड़ गया फिर यह ख्यालात नहीं चलना चाहिए कि ऐसे नहीं करते तो ऐसा नहीं होता, ऐसे नहीं करते तो बुखार नहीं होता… हम ऐसे नहीं कह सकते। ड्रामा अनुसार यह किया, कल्प पहले भी किया था, तब तकलीफ हुई। पुराने शरीर को चत्तियां भी लगनी ही हैं। अन्त तक मरम्मत होती रहेगी। यह भी आत्मा का पुराना मकान है। आत्मा कहती है मैं भी बहुत पुरानी हूँ, कोई ताकत नहीं रही। ताकत न होने कारण कमजोर आदमी दु:ख भोगते हैं। माया कमजोर को बहुत दु:ख देगी। हम भारतवासियों को बरोबर माया ने बहुत कमजोर किया है। हम बहुत ताकत वाले थे फिर माया ने कमजोर बना दिया, अब फिर उन पर जीत पाते हैं तो माया भी हमारी दुश्मन बनती है। भारत को ही जास्ती दु:ख मिलता है। सबसे कर्जा ले रहे हैं। भारत बिल्कुल पुराना हो गया। जो बिल्कुल साहूकार था, उनको बहुत बेगर बनना है। फिर बेगर से प्रिन्स। बाबा कहते इस शरीर के भान से भी दूर खाली हो जाओ। तुम्हारा यहाँ कुछ है नहीं, सिवाए एक शिवबाबा दूसरा न कोई। तो तुमको बहुत बेगर बनना पड़े। युक्तियां भी बताते रहते हैं। जनक का मिसाल – गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल समान रहना है, श्रीमत पर चलना है, सब सरेन्डर भी कर देना है। जनक ने सब कुछ दिया फिर उनको कहा कि अपनी मिलकियत तुम सम्भालो और ट्रस्टी होकर रहो। हरिश्चन्द्र का भी दृष्टान्त है।

बाप समझाते हैं-बच्चे, तुम अगर बीज नहीं बोयेंगे तो तुम्हारा पद कम हो जायेगा। फालो फादर, तुम्हारे सामने यह दादा बैठा है। बिल्कुल ही शिवबाबा और शिव-शक्तियों को ट्रस्टी बनाया। शिवबाबा थोड़ेही बैठ सम्भालेंगे। यह अपने पर थोड़ेही बलि चढ़ेगा। इनको माताओं पर बलि चढ़ना पड़े। माताओं को ही आगे करना है। बाप आकर ज्ञान अमृत का कलष माताओं को ही देते हैं कि मनुष्य को देवता बनायें। लक्ष्मी को नहीं दिया है। इस समय यह है जगत अम्बा, सतयुग में होगी लक्ष्मी। जगत अम्बा का गीत कितना अच्छा बना हुआ है। उनकी बहुत मान्यता है। वह सौभाग्य विधाता कैसे है, उनको धन कहाँ से मिलता है? क्या ब्रह्मा से? कृष्ण से? नहीं। धन फिर भी मिलता है ज्ञान सागर से। यह बड़ी गुप्त बातें हैं ना। भगवानुवाच है सबके लिए। भगवान् तो सबका है ना। सब धर्म वालों को कहते हैं मामेकम् याद करो। भल शिव के पुजारी भी बहुत हैं परन्तु जानते कुछ भी नहीं। वह हुई भक्ति। अब तुमको ज्ञान कौन देते हैं? मोस्ट बिलवेड फादर। कृष्ण को ऐसे नहीं कहेंगे, उनको सतयुग का प्रिन्स कहेंगे। भल कृष्ण की पूजा करते हैं परन्तु यह ख्याल नहीं करते कि वह सतयुग का प्रिन्स कैसे बना? आगे हम भी नहीं जानते थे। तुम बच्चे अब जानते हो बरोबर हम फिर से प्रिन्स-प्रिन्सेज बनेंगे तब तो फिर बड़े होकर लक्ष्मी-नारायण को वरेंगे ना। यह नॉलेज है ही भविष्य के लिए। इसका फल 21 जन्म के लिए मिलता है। कृष्ण के लिए नहीं कहेंगे कि वह वर्सा देते हैं। वर्सा बाप से मिलता है। शिवबाबा राजयोग सिखलाते हैं। ब्रह्मा के मुख से हजारों ब्राह्मण निकलते हैं, उन्हों को ही यह शिक्षा मिलती है। सिर्फ तुम ब्राह्मण हो कल्प के संगमयुग के, बाकी सारी सृष्टि है कलियुग की। वह सब कहेंगे अब हम कलियुग में हैं, तुम कहेंगे हम संगम पर हैं। यह बातें कहीं हैं नहीं। यह नई-नई बातें दिल में रखनी हैं। मुख्य बात है बाप और वर्से को याद करना। अगर पवित्र नहीं रहेंगे तो योग कभी नहीं लगेगा, लॉ नहीं कहता इसलिए इतना पद भी नहीं पा सकेंगे। थोड़ा योग लगाने से भी स्वर्ग में तो जायेंगे। बाप कहते हैं अगर पवित्र नहीं बनेंगे तो मेरे पास आ नहीं सकेंगे। भल घर बैठे भी स्वर्ग में आ सकते हैं, अच्छा पद पा सकते हैं, परन्तु तब, जबकि योग में रहें, पवित्र रहें। पवित्रता बिगर योग लगेगा नहीं। माया लगाने नहीं देगी। सच्चे दिल पर साहेब राज़ी होगा। जो विकार में जाते रहते हैं, कहते मैं शिवबाबा को याद करता हूँ, यह तो अपनी दिल खुश करते हैं। मुख्य है पवित्रता। कहते हैं बर्थ कन्ट्रोल करो, बच्चे पैदा मत करो। यह तो है ही तमोप्रधान दुनिया। अभी बाबा बर्थ कन्ट्रोल करा रहे हैं। तुम हो सभी कुमार-कुमारियां, तो विकार की बात नहीं। यहाँ तो विष पर बच्चियों को कितना सहन करना पड़ता है। बाबा कहते हैं बहुत परहेज रखनी है। यहाँ ऐसा तो कोई नहीं होगा जो शराब पीता होगा? बाप बच्चों से पूछते हैं। अगर झूठ बोलेंगे तो धर्मराज की कड़ी सजा भोगनी पड़ेगी। भगवान् के आगे तो सच बोलना चाहिए। कोई जरा भी शराब किसी कारण से अथवा दवाई रीति से पीते हैं? कोई ने हाथ नहीं उठाया। यहाँ सच जरूर बोलना है। कोई भी भूल होती है तो फिर से लिखना चाहिए-बाबा, मेरे से यह भूल हुई, माया ने थप्पड़ मार दिया। बाबा को तो बहुत लिखते भी हैं आज हमारे में क्रोध का भूत आ गया, थप्पड़ मार दिया। आपकी तो मत है थप्पड़ नहीं मारना चाहिए। दिखलाते हैं कृष्ण को ओखरी से बांधा। यह तो सब झूठी बातें हैं। बच्चों को प्यार से शिक्षा देनी चाहिए, मार नहीं देनी चाहिए। भोजन बंद करना, मिठाई न देना… ऐसे सुधारना चहिए। थप्पड़ मारना, क्रोध की निशानी हो जाती है। सो भी महात्मा पर क्रोध करते हैं। छोटे बच्चे महात्मा समान होते हैं ना इसलिए थप्पड़ नहीं मारना चाहिए। गाली भी नहीं दे सकते। ऐसा कर्म नहीं करना चहिए जो ख्याल में आये – हमने यह विकर्म किया। अगर किया तो फौरन लिखना चाहिए – बाबा हमसे यह भूल हुई, हमें क्षमा करो। आगे नहीं करेंगे। तोबाँ करते हैं ना। वहाँ भी धर्मराज सजा देते हैं, तो तोबाँ करते हैं – आगे फिर नहीं करेंगे। बाबा बहुत प्यार से कहते हैं लाडले सपूत बच्चे, प्यारे बच्चे कभी झूठ नहीं बोलना।

क़दम-क़दम पर राय पूछना है। तुम्हारा पैसा अब लगता है भारत को स्वर्ग बनाने में, तो कौड़ी-कौड़ी हीरे समान है। ऐसे नहीं, हम कोई सन्यासियों आदि को दान-पुण्य करते हैं। मनुष्य हॉस्पिटल अथवा कॉलेज आदि बनाते हैं तो क्या मिलता है? कॉलेज खोलने से दूसरे जन्म में विद्या अच्छी मिलेगी, धर्मशाला बनाने से महल मिलेगा। यहाँ तो तुमको जन्म-जन्मान्तर के लिए बाप से बेहद का सुख मिलता है। बेहद की आयु मिलती है। इससे बड़ी आयु और कोई धर्म वाले की होती नहीं। कम आयु भी यहाँ की गिनी जाती है तो अब बेहद के बाप को चलते-फिरते, उठते-बैठते याद करेंगे तब ही खुशी में रहेंगे। कोई भी तकलीफ हो तो पूछो। बाकी ऐसे थोड़ेही गरीब होंगे, कहेंगे बाबा हम तो आपके हैं, अब हम आपके पास बैठ जाते हैं। ऐसे तो दुनिया में गरीब बहुत हैं। सब कहें हमको मधुबन में रख लो, ऐसे तो लाखों इकट्ठे हो जाएं, यह भी कायदा नहीं। तुमको गृहस्थ व्यवहार में रहना है, यहाँ ऐसे रह नहीं सकते।

धन्धे में हमेशा ईश्वर अर्थ एक-दो पैसा निकालते हैं। बाबा कहते हैं-अच्छा, तुम गरीब हो, कुछ भी नहीं निकालो, नॉलेज को तो समझो और मनमनाभव हो जाओ। तुम्हारी मम्मा ने क्या निकाला, फिर वह ज्ञान में भी तीखी है। तन-मन से सेवा कर रही है। इसमें पैसे की बात नहीं। बहुत-बहुत करके एक रूपया दे देना, तुम्हें साहूकार जितना मिल जायेगा। पहले अपने गृहस्थ व्यवहार की सम्भाल करनी है। बच्चे दु:खी न हों। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। वन्दे मातरम्, सलाम मालेकम्। जय जय जय हो तेरी…. ओम् शान्ति।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) ऐसा कोई कर्म नही करना है जिसके पीछे ख्याल चले, तोबा-तोबा (पश्चाताप्) करना पड़े। झूठ नहीं बोलना है। सच्चे बाप से सच्चा रहना है।

2) भारत को स्वर्ग बनाने में अपनी एक-एक कौड़ी सफल करनी है। ब्रह्मा बाप समान सरेन्डर हो ट्रस्टी बनकर रहना है।

वरदान:- निमित्त आत्माओं के डायरेक्शन के महत्व को जान पापों से मुक्त होने वाले सेन्सीबुल भव
जो सेन्सीबुल बच्चे हैं वो कभी यह नहीं सोचते कि यह निमित्त आत्मायें जो डायरेक्शन दे रही हैं शायद कोई के कहने से कह रही हैं। निमित्त बनी हुई आत्माओं के प्रति कभी यह व्यर्थ संकल्प नहीं उठाने चाहिए। मानो कोई ऐसा फैंसला भी दे देते हैं जो आपको ठीक नहीं लगता है, लेकिन आप उसमें जिम्मेवार नहीं हो, आपका पाप नहीं बनेगा क्योंकि जिसने इन्हें निमित्त बनाया है वह बाप, पाप को भी बदल लेगा, यह गुप्त रहस्य, गुप्त मशीनरी है।
स्लोगन:- ऑनेस्ट वह है जो प्रभु पसन्द और विश्व पसन्द है, आराम पसन्द नहीं।

BRAHMA KUMARIS MURLI 11 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 11 December 2018

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11-12-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – बाप हर बात में कल्याणकारी है इसलिए जो डायरेक्शन मिलते हैं उसमें आनाकानी न कर श्रीमत पर सदा चलते रहो”
प्रश्नः- नौधा भक्ति और नौधा पढ़ाई दोनों से जो प्राप्तियाँ होती हैं, उसमें क्या अन्तर है?
उत्तर:- नौधा भक्ति से सिर्फ साक्षात्कार होता है, जैसे श्रीकृष्ण के भक्त होंगे तो उन्हें श्रीकृष्ण का साक्षात्कार होगा, रास आदि करेंगे लेकिन वे कोई वैकुण्ठपुरी वा श्रीकृष्णपुरी में नहीं जाते। तुम बच्चे नौधा पढ़ाई पढ़ते हो जिससे तुम्हारी सब मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। इस पढ़ाई से तुम वैकुण्ठपुरी में चले जाते हो।
गीत:- आज नहीं तो कल…….. 

ओम् शान्ति। यह किसने कहा कि घर चल? किसका बच्चा रूठकर चला जाता है तो मित्र-सम्बन्धी आदि उनके पिछाड़ी जाते हैं, कहते हैं रूठे क्यों हो? अब चलो घर। यह भी बेहद का बाप आकर सब बच्चों को कहते हैं। बाप भी है, दादा भी है। जिस्मानी भी है तो रूहानी भी है। कहते हैं – हे बच्चे, अब घर चलो, रात पूरी हुई है, अब दिन होता है। यह हो गई ज्ञान की बातें। ब्रह्मा की रात, ब्रह्मा का दिन – यह किसने समझाया? बाप बैठ ब्रह्मा और ब्रह्माकुमार कुमारियों को समझाते हैं। आधाकल्प है रात अर्थात् पतित रावण राज्य अथवा भ्रष्टाचारी राज्य क्योंकि आसुरी मत पर चलते हैं। अब तुम श्रीमत पर हो। श्रीमत भी है इनकागनीटो। हम जानते हैं बाप खुद आते हैं। उनका रूप अलग है। रावण का रूप अलग है। उनको 5 विकार रूपी रावण कहा जाता है। अभी रावण राज्य खलास होगा फिर ईश्वरीय राज्य होगा। राम राज्य कहते हैं ना। सीता के राम को नहीं जपते हैं। माला में राम-राम जपते हैं ना। वह परमात्मा को याद करते हैं। जो सर्व का सद्गति-दाता है, उनको ही जपते रहते हैं। राम माना गॉड। माला जब जपते हैं तो कभी कोई व्यक्ति को याद नहीं करेंगे, उनकी बुद्धि में दूसरा कोई आयेगा नहीं। तो अब बाप समझाते हैं रात पूरी हुई। यह है कर्मक्षेत्र, स्टेज, जहाँ हम आत्मायें शरीर धारण कर पार्ट बजाती हैं। 84 जन्मों का पार्ट बजाना है। फिर उसमें वर्ण भी दिखाते हैं क्योंकि 84 जन्मों का हिसाब भी चाहिए ना। किस-किस जन्म में, किस कुल में, किस वर्ण में आते हैं, इसलिए ही विराट रूप भी दिखाया है। पहले-पहले हैं ब्राह्मण। सिर्फ सतयुगी सूर्यवंशी में 84 जन्म हो न सकें। ब्राह्मण कुल में भी 84 जन्म नहीं होते। 84 जन्म तो भिन्न-भिन्न नाम, रूप, देश, काल में होते हैं। सतयुग सतोप्रधान से फिर कलियुग तमोप्रधान में जरूर आना है। उनका भी टाइम दिया जाता है। मनुष्य 84 जन्म कैसे लेते हैं – यह भी समझने की बात है। मनुष्य तो समझ नहीं सकते तब तो बाप कहते हैं तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो, मैं बतलाता हूँ। बाप समझते हैं ड्रामा अनुसार सब भूलना जरूर है।

अभी यह संगमयुग है। दुनिया तो कहती है कलियुग अभी छोटा बच्चा है। इसको कहा जाता है अज्ञान, घोर अन्धियारा। जैसे ड्रामा के एक्टर्स को मालूम होता है कि अभी नाटक पूरा होने में 10 मिनट हैं, यह भी चैतन्य ड्रामा है। यह कब पूरा होता है, मनुष्य नहीं जानते। मनुष्य तो घोर अन्धियारे में हैं। बाप कहते हैं गुरू-गोसांई वेद-शास्त्र जप-तप आदि से मैं नहीं मिलता हूँ। यह है भक्ति मार्ग की सामग्री। मैं तो अपने समय पर आता हूँ, जब रात से दिन बनाना है अथवा अनेक धर्मों का विनाश कर एक धर्म की स्थापना करनी है। जब सृष्टि चक्र पूरा हो तब तो मैं स्वर्ग की स्थापना करुँ। झट बादशाही शुरू होती है। तुम जानते हो हम फिर कोई राजाओं के पास जन्म लेते हैं फिर आहिस्ते-आहिस्ते नई दुनिया बन जाती है। सब कुछ नया बनाना पड़ता है। बाबा ने समझाया है आत्मा में पढ़ाई के संस्कार वा कर्म करने के संस्कार रहते हैं। अब तुम बच्चों को आत्म-अभिमानी बनना चाहिए। मनुष्य हैं सब देह-अभिमानी, जब आत्म-अभिमानी बनें तब परमात्मा को याद कर सकें। पहले-पहले है आत्म-अभिमानी बनने की बात। कहते भी सब हैं कि हम जीव आत्मा हैं। यह भी कहते हैं आत्मा अविनाशी है, यह शरीर विनाशी है। आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। इतना भी कहते हैं परन्तु इस पर चलते नहीं। अभी तुम जानते हो आत्मा निराकारी दुनिया से आती है, उसमें अविनाशी पार्ट है। यह बाप बैठ समझाते हैं। पुनर्जन्म लेते हैं। ड्रामा तो हूबहू रिपीट होता है। फिर क्राइस्ट आदि सबको आना पड़ेगा, अपने-अपने समय पर आकर धर्म स्थापन करते हैं। तुम्हारा अभी यह है संगमयुगी ब्राहमणों का धर्म। वह हैं पुजारी ब्राह्मण, तुम हो पूज्य। तुम कभी पूजा नहीं करेंगे। मनुष्य तो पूजा करेंगे। तो बाप समझाते हैं यह कितनी बड़ी पढ़ाई है। कितनी धारणा करनी पड़ती है। विस्तार से धारणा करने में नम्बरवार हैं। नटशेल में तो समझते हैं – बाबा रचता और यह उनकी रचना है। अच्छा, यह तो समझते हो ना बाप है। बाप को सब भक्त याद करते हैं। भक्त भी हैं, बच्चे भी हैं। भक्त बाबा कह पुकारते हैं। अगर भक्त भगवान् हैं तो फिर बाबा कह किसको पुकारते हैं। यह भी समझते नहीं। अपने को भगवान् समझ बैठ जाते हैं। बाबा कहते हैं ड्रामा अनुसार जब ऐसी हालत हो जाती है, भारत बिल्कुल ही लास्ट खाते में चला जाता है तब बाप आते हैं। भारत जब पुराना हो तब फिर नया बने। नया भारत जब था तो और कोई धर्म नहीं था। उसको स्वर्ग कहा जाता है। अभी पुराना भारत है, इसको नर्क कहेंगे। वहाँ पूज्य थे, अब पुजारी हैं। पूज्य और पुजारी का फ़र्क तो बता दिया है। हम आत्मा सो पूज्य, फिर हम आत्मा सो पुजारी। हम सो ज्ञानी तू आत्मा, हम आत्मा पुजारी तू आत्मा। आप ही पूज्य, आप ही पुजारी भगवान् को नहीं कहेंगे, लक्ष्मी-नारायण को कहेंगे। तो यह बुद्धि में आना चाहिए कि वह कैसे पूज्य फिर पुजारी बनते हैं?

बाप कहते हैं कल्प पहले भी मैंने ऐसे ही ज्ञान दिया था, कल्प-कल्प देता हूँ। मैं आता ही हूँ कल्प के संगमयुग पर। मेरा नाम ही पतित-पावन है। जब सारी दुनिया पतित होती है तब मैं आता हूँ। देखो, यह झाड़ है, इसमें ब्रह्मा ऊपर में खड़ा है। पहले आदि में दिखाते हैं। अभी सब पिछाड़ी में हैं। जैसे ब्रह्मा पिछाड़ी में प्रत्यक्ष हुआ है वैसे वह भी पिछाड़ी में आयेंगे। जैसे क्राइस्ट है तो वह फिर अन्त में आयेगा। परन्तु हम पिछाड़ी यानी डाल के अन्त में उनका चित्र नहीं दे सकते हैं, समझा सकते हैं। जैसे यह देवी-देवता धर्म की स्थापना करने वाला प्रजापिता ब्रह्मा है, अभी झाड़ की एन्ड (अन्त) में खड़ा है – क्राइस्ट भी क्रिश्चियन धर्म का प्रजापिता है ना। जैसे यह प्रजापिता ब्रह्मा वैसे वो प्रजापिता क्राइस्ट, प्रजापिता बुद्ध….. यह सब धर्म की स्थापना करने वाले हैं। सन्यासियों का शंकराचार्य उनको भी पिता कहेंगे। वह गुरू कहते हैं। कहेंगे हमारा गुरू शंकराचार्य था तो यह जो डाल के आदि में खड़े हैं, यह फिर जन्म लेते-लेते अन्त में आते हैं। अभी सब तमोप्रधान स्टेज में हैं। यह भी आकर समझेंगे। पिछाड़ी में सलाम करने आयेंगे जरूर। उन्हों को भी कहेंगे बेहद के बाप को याद करो। बेहद का बाप सबके लिए कहते हैं देह सहित देह के सब सम्बन्धों को छोड़ो। यह ज्ञान हर एक धर्म वाले के लिए है। सब देह के धर्म छोड़ अपने को अशरीरी समझ, बाप को याद करो। जितना याद करेंगे, ज्ञान की धारणा करेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। कल्प पहले जिसने जितना ज्ञान लिया होगा, उतना जरूर आकर लेंगे।

तुम बच्चों को कितना फ़खुर रहना चाहिए – हम विश्व के रचयिता बाप के बच्चे हैं, बाप हमको विश्व का मालिक बनाते हैं, राजयोग सिखला रहे हैं! कितनी सहज बात है। परन्तु चलते-चलते थोड़ी-सी बात में संशय आ जाता है, इसको ही माया का तूफान वा परीक्षा कहा जाता है। यह तो बाप कहते ही हैं कि गृहस्थ व्यवहार में रहना है। सबको घरबार छुड़ा दूँ तो सब यहाँ बैठ जायें। व्यवहार में भी पास करना है। फिर समय पर सर्विस में लग जायेंगे। जिन्होंने धन्धे आदि को छोड़ा है उन्हों को फिर सर्विस में लगाते हैं। तो कोई बिगड़ पड़ते हैं। कोई तो समझते हैं श्रीमत में कल्याण है। श्रीमत पर जरूर चलना ही है। डायरेक्शन मिला, उसमें फिर आनाकानी नहीं करनी चाहिए। बाप हर बात में कल्याणकारी है। माया बड़ी चंचल है। बहुत हैं जो समझते हैं ऐसे रहने से तो कोई धन्धा आदि करें, कोई समझते हैं शादी करें। बुद्धि चक्र खाती रहती है। फिर पढ़ाई को छोड़ देते हैं। कोई तो बाप से गारन्टी करते हैं हम श्रीमत पर जरूर चलेंगे। वह है आसुरी मत, यह है ईश्वरीय मत। आसुरी मत पर चलने से बहुत कड़ी सजायें खाते हैं। उन्होंने फिर गरूड़ पुराण में डराने की रोचक बातें लिख दी हैं, जिससे जास्ती पाप न करें। परन्तु फिर भी सुधरते थोड़ेही हैं। यह सब बाप समझाते हैं। ज्ञान का सागर कोई मनुष्य नहीं हो सकता। ज्ञान का सागर, नॉलेजफुल बाप समझा रहे हैं। जो समझते हैं वह फिर समझाते हैं, कहते हैं यह ठीक बात है, हम फिर आयेंगे। बस, प्रदर्शनी से बाहर निकले और ख़लास। हाँ, कोई 2-3 भी निकलें तो भी अच्छा है, प्रजा तो बहुत बनती रहती है। वर्सा पाने लायक कोई मुश्किल निकलते हैं। राजा-रानी के एक-दो बच्चे होंगे। उनको राजकुल का कहेंगे। प्रजा तो कितनी ढेर होती है। प्रजा तो झट बनती है। राजायें थोड़ेही बनते हैं। 16108 त्रेता के अन्त में जाकर बनते हैं। प्रजा तो करोड़ों की अन्दाज में होगी। यह समझने की बड़ी विशाल बुद्धि चाहिए। हम पारलौकिक बाप से वर्सा ले रहे हैं। बाप का फ़रमान है मुझे याद करो और वर्से को याद करो। मनमनाभव और मध्याजी भव। स्वर्ग है विष्णुपुरी और यह रावणपुरी। शान्तिधाम, सुखधाम और दु:खधाम – यह बाप समझाते हैं। बाप को याद करने से अन्त मति सो गति हो जायेगी। भक्ति मार्ग में समझो कृष्ण को याद करते हैं परन्तु ऐसे नहीं कि कृष्णपुरी में पहुँच जायेंगे। नहीं, करके कृष्णपुरी में जाकर ध्यान में रास आदि करके लौटेंगे। वह है नौधा भक्ति का प्रभाव, जिससे उनको साक्षात्कार हो जाता है, मनोकामना पूरी होती है। बाकी सतयुग तो सतयुग है। वहाँ जाने लिए फिर नौधा पढ़ाई चाहिए, नौधा भक्ति नहीं। पढ़ते रहो, मुरली जरूर पढ़नी चाहिए। सेन्टर में जरूर जाना है। नहीं तो मुरली लेकर घर में जरूर पढ़ो। कोई को कहा जाता है सेन्टर जाओ, हरेक के लिए अलग-अलग है। सबके लिए एक बात नहीं हो सकती। ऐसे नहीं बाबा कहते हैं दृष्टि देकर खाओ तो बस, परन्तु बाबा कहते हैं लाचारी हालत में और कुछ नहीं कर सकते तो दृष्टि देकर खाओ। बाकी सबके लिए थोड़ेही बाबा कहेंगे। जैसे बाबा कोई को कहते हैं बाइसकोप में भले जाओ। परन्तु यह सबके लिए नहीं है। कोई के साथ जाना पड़ता है तो उन्हें भी नॉलेज देनी है। यह हद का नाटक है, यह बेहद का नाटक है। तो सर्विस करनी पड़े। ऐसे नहीं सिर्फ देखने के लिए जाना है। शमशान में भी जाकर सर्विस करना है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप की हर बात में कल्याण है यह समझ निश्चयबुद्धि होकर चलना है, कभी भी संशय में नहीं आना है। श्रीमत को यथार्थ रीति समझना है।

2) आत्म-अभिमानी रहने का अभ्यास करना है। ड्रामा में हर एक्टर का अनादि पार्ट है इसलिए साक्षी हो देखने का अभ्यास करना है।

वरदान:- हर एक की विशेषता को देखते उन्हें सेवा में लगाने वाले दुआओं के पात्र भव
जैसे बापदादा का हर एक बच्चे की विशेषता से प्यार है और हर एक में कोई न कोई विशेषता है इसलिए सबसे प्यार है। तो आप भी हर एक की विशेषता को देखो। जैसे हंस रत्न चुगता है, पत्थर नहीं ऐसे आप होलीहंस हो, आपका काम है हरेक की विशेषता को देखना और उनकी विशेषता को सेवा में लगाना। उन्हें विशेषता के उमंग में लाकर, उन द्वारा उनकी विशेषता सेवा में लगाओ तो उनकी दुआयें आपको मिलेंगी। और वह जो सेवा करेगा उसका शेयर भी आपको मिलेगा।
स्लोगन:- बापदादा के साथ ऐसे कम्बाइन्ड रहो जो आप द्वारा दूसरों को बाप की याद आ जाए।

BRAHMA KUMARIS MURLI 10 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 10 December 2018

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10-12-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – सर्विस की वृद्धि के नये-नये तरीके निकालो, गांव-गांव में जाकर सर्विस करो, सर्विस करने के लिए ज्ञान की पराकाष्ठा चाहिए”
प्रश्नः- बुद्धि से पुरानी दुनिया भूलती जाए – इसकी सहज युक्ति क्या है?
उत्तर:- घर को घड़ी-घड़ी याद करो। बुद्धि में रहे – अब मृत्युलोक से हिसाब-किताब चुक्तु कर अमरलोक जाना है। देह से भी बेगर, यह देह भी अपनी नहीं – ऐसा अभ्यास हो तो पुरानी दुनिया भूल जायेगी। इस पुरानी दुनिया में रहते अपनी परिपक्व अवस्था बनानी है। एकरस अवस्था के लिए मेहनत करनी है।
गीत:- माता ओ माता…….. 

ओम् शान्ति। जगत अम्बा की महिमा भारत में बहुत है। जगत-अम्बा को भारतवासियों के सिवाए कोई भी जानते नहीं। नाम सुना है जिसको ईव अर्थात् बीबी भी कहते हैं। अब तुम बच्चों की बुद्धि में है कि बीबी और मालिक के सिवाए रचना तो रची नहीं जा सकती। जरूर जगत अम्बा को प्रकट होना पड़े। जरूर थी तब तो गायन करते हैं। भारत की महिमा बहुत है। स्वर्ग भी कहते हैं और यह भी जानते हैं कि भारत ही प्राचीन था इसलिए जरूर हेविन होना चाहिए। यह तुम ईश्वरीय सन्तान बिगर कोई समझ न सके। जिन्होंने कल्प पहले समझा है वही आते रहेंगे। प्रदर्शनी चलती है। समझते हैं कल्प पहले भी की होगी। सबको समझाने के लिए अक्षर बहुत अच्छे हैं। पवित्र आत्मा, पवित्रता से तुम लाइट का ताज पाते हो। दूसरा पुण्य आत्मा उसको कहा जाता है जो दान-पुण्य करते हैं। उसको अंग्रेजी में फ्लैन्थ्रोफिस्ट भी कहा जाता है। पवित्र को वाइसलेस कहेंगे। अलग-अलग अक्षर हैं। भारत में दान-पुण्य होता तो बहुत है परन्तु अक्सर करके दान करते हैं गुरूओं को। अब उन्हें पवित्र आत्मा तो भल कहें परन्तु पुण्य आत्मा नहीं कह सकते। वह दान-पुण्य नहीं करते हैं वह तो दान-पुण्य लेते हैं। तो इन सबसे बुद्धियोग टूटकर बाप से जुट जाए, इसके लिए बाप को समझाना पड़ता है कि यह ठीक नहीं है। इन सबका उद्धार करने मैं आता हूँ। तुम ज्ञान सागर से निकली हुई ज्ञान गंगायें हो। वास्तव में गंगा अक्षर राइट नहीं है परन्तु गायन चला आता है इसलिए भेंट की जाती है। बाप आकर पुरानी दुनिया की पुरानी सब चीज़ों को नया बनाते हैं। स्वर्ग नई चीज़ है। नई चीज़ का समाचार बाप ही जानते हैं, दुनिया नहीं जानती।

भगवानुवाच है परन्तु गीता में कृष्ण का नाम डालने से सबका बुद्धियोग टूट गया है इसलिए सर्वव्यापी कह दिया है। कृष्ण के साथ बहुतों का बुद्धियोग है, जहाँ भी गीता का मान है तो जैसे कृष्ण का मान है। वास्तव में बाप के महिमा की टोपी बच्चे के ऊपर आ गई है। यह भी ड्रामा में नूँध है। यह बाप आकर समझाते हैं।

बाबा बार-बार समझाते हैं – जब कोई आते हैं तो हर एक का आक्यूपेशन पूछो इससे तुम्हारा क्या सम्बन्ध है? बाबा ने प्रश्नावली अच्छी बनाई है। सर्विस तो बहुत अच्छी हो सकती है। सर्विस तो जगत अम्बा के मन्दिर में बहुत अच्छी हो सकती है, वहाँ जाकर समझाओ कि यह है जगत अम्बा सृष्टि को रचने वाली माता। कौन-सी दुनिया रचती है? जरूर नई रचना रचेगी। अच्छा, इस माता का पिता कौन है? इनको जन्म किसने दिया? मनुष्य तो मुख वंशावली का अर्थ भी नहीं समझते हैं। तुम जानते हो इनको परमपिता परमात्मा ने जन्म दिया है। तुम बच्चों को ही समझाना पड़े। जगत अम्बा मुख वंशावली है परन्तु कैसे? परमपिता परमात्मा तो निराकार है, समझाया जाता है ब्रह्मा तन से। परमपिता परमात्मा ने आकर जैसे इस ब्रह्मा को एडाप्ट किया, वैसे बच्ची को भी किया। यह बातें सबकी बुद्धि में स्थाई नहीं ठहरती। घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। बच्चे सर्विस तो बहुत कर सकते हैं। जगत अम्बा के मन्दिर में परिचय देना चाहिए। तो उन्हों का भी बुद्धियोग बाप से जुटे। जगत अम्बा भी उनसे योग लगाती है तो हम भी उनसे योग लगायें। नीचे जगत अम्बा तपस्या में बैठी है, उनका मन्दिर ऊपर है। नीचे राजयोग की तपस्या कर रहे हैं फिर राज-राजेश्वरी स्वर्ग की मालिक बनी सतयुग में। अभी है कलियुग। फिर से जब तपस्या में बैठे तब तो स्वर्ग के मालिक बने ना। तुम्हारी बुद्धि में यह सारा ज्ञान रहना चाहिए। यह सच्ची राय मनुष्यों को दी जाती है। तुम हर एक का परिचय देते हो। परन्तु सबकी बुद्धि में कोई जल्दी थोड़ेही बैठ सकता है। बैठे तब जब सर्विस में लग जायें। चित्र भी बहुत अच्छे बने हुए हैं। लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में जाकर समझा सकते हो। बाबा कहते हैं – मेरे भक्तों को सुनाओ। भक्त जरूर मन्दिर में ही मिलेंगे। उनको प्यार से समझाओ यह जो लक्ष्मी-नारायण के चित्र हैं, इनके लिए सभी कहेंगे यह स्वर्ग के मालिक थे। अच्छा, अब क्या है? जरूर कहेंगे कलियुग। कलियुग में दु:ख ही दु:ख है फिर इनको बादशाही कैसे मिली? तुम जानते हो तो सबको सुना सकते हो। एक को समझायेंगे तो सतसंग इकट्ठा हो जायेगा। फिर सब कहेंगे – हमारे पास आओ। मन्दिर में बड़ा मेला लगता है। राम के भी मन्दिर में जाकर उनका आक्यूपेशन बता सकते हो। आहिस्ते-आहिस्ते युक्ति से समझाना चाहिए। कई बच्चे लिखते भी हैं – बाबा, हमने ऐसे-ऐसे समझाया। एक को समझाने से फिर दूसरे निमंत्रण देते हैं। हमारे घर में भी सात रोज़ भाषण चले तो अच्छा है फिर वहाँ से और कोई निकलेगा। कोई भी निमंत्रण दे उनको ऐसा समझाना चाहिए जो छोड़े नहीं। भाषण करने से आस-पास वाले मित्र सम्बन्धी आदि भी इकट्ठे होंगे। ऐसे ही वृद्धि होती है। सेन्टर पर इतने नहीं आ सकते हैं। यह अच्छी युक्ति है। ऐसी मेहनत करनी चाहिए। मेहनत करने का ढंग मुश्किल किसको आता है। ज्ञान की पराकाष्ठा चाहिए। बाबा कितनी दूर से हमको सिखाने आया है। अगर सर्विस नहीं करेंगे तो ऊंच पद कैसे पायेंगे? स्कूल में बच्चे बहुत अच्छे चमत्कारी होते हैं, उछलते रहते हैं। यह भी पढ़ाई है, यह वन्डरफुल पढ़ाई है – इसमें बूढ़े, जवान, बच्चे सब पढ़ते हैं। गरीबों को और ही अच्छा चांस है। सन्यासी भी वास्तव में गरीब हैं। कितने बड़े-बड़े धनवान मनुष्य अपने पास बुलाते हैं। सन्यासियों ने घरबार छोड़ा बेगर हुए। कुछ भी उन्हों के पास नहीं है। तुम भी अभी बेगर हो फिर प्रिन्स बनते हो। वह भी बेगर हैं। इसमें पवित्रता की बात है। तुम्हारे पास और कुछ नहीं है। तुम देह को भी भूल जाते हो। देह सहित सब कुछ त्याग कर एक बाप के बनते हो। जितना एक बाप को याद करेंगे उतनी धारणा होगी। एकरस धारणा हो जाए उसके लिए मेहनत चाहिए। हमको बाबा के पास जाना है तो इस पुरानी दुनिया का ख्याल क्या रखें। जब तक परिपक्व अवस्था हो तब तक रहना इस पुरानी दुनिया, पुराने शरीर में है।

अब तुम्हें गृहस्थ व्यवहार में रहकर पवित्र बनना है। इस मृत्युलोक से हिसाब-किताब चुक्तू होता है। अब अमरलोक जाना है। घर को घड़ी-घड़ी याद करने से पुरानी दुनिया भूलती जायेगी। बोलो, गीता में बाबा ने क्या कहा है? भगवान् को बाबा कहा जाता है। निराकार बाबा कहते हैं – मामेकम् याद करो। योग अग्नि से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। कृष्ण ऐसे नहीं कह सकते हैं। यह भगवान् के महावाक्य हैं कि इस पुरानी दुनिया और पुरानी देह को भी छोड़ो। देही-अभिमानी बनकर निरन्तर बाबा को याद करो। भगवान् है निराकार। आत्मा शरीर लेकर टॉकी बनती है। बाबा तो गर्भ से जन्म नहीं लेते। उनका नाम एक ही शिव है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर की आत्मायें हैं, उन्हें अपना सूक्ष्म शरीर है। यह है ही निराकार परमपिता परमात्मा। फिर उनका नाम है शिव। वही ज्ञान का सागर है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को रचता नहीं कहेंगे। रचयिता एक ही निराकार को कहा जाता है। वह फिर साकारी रचना कैसे रचे? तो ब्रह्मा द्वारा आकर समझाते हैं। कृष्ण तो हो न सके। ब्रह्मा के हाथ में ही वेद-शास्त्र दिखाते हैं। गाया भी हुआ है ब्रह्मा द्वारा स्थापना, ब्रह्मा द्वारा सभी शास्त्रों का सार सुनाते हैं। निराकार सुनाते हैं साकार द्वारा। यह बातें अच्छी रीति धारण करनी पड़े। भगवानुवाच – मैं राजयोग सिखलाता हूँ। विनाश के पहले स्थापना भी जरूर चाहिए। पहले-पहले है स्थापना। बड़ा ही क्लीयर लिखते रहते हैं। ब्रह्मा द्वारा सूर्यवंशी घराने की स्थापना। लिखत में बड़ा अच्छा राज़ है परन्तु जबकि कोई मेहनत कर और सर्विस में लग जाए। सर्विस में लग जाने से फिर मजा आयेगा। मम्मा-बाबा को भी सर्विस में मजा आता है। बच्चों को भी सर्विस करनी है, मम्मा को तो मन्दिर में नहीं ले जायेंगे। मम्मा की तो बड़ी महिमा है, बच्चों को तो जाना ही पड़े। बाबा कहते हैं वानप्रस्थियों के पास जाकर उन्हों से प्रश्न पूछो फिर समझाओ कि कभी गीता अध्ययन की है? गीता का भगवान् कौन है? भगवान् तो एक ही निराकार होता है। साकार को भगवान् नहीं कहेंगे। भगवान् एक है। इसमें सर्विस का बहुत विचार सागर मंथन चलना चाहिए। प्रैक्टिस करनी है तो बाहर जाकर ट्रायल करनी चाहिए। जगत अम्बा का दर्शन करने रोज़ आते हैं। त्रिवेणी पर भी मनुष्य बहुत जाते हैं। वहाँ भी जाकर सर्विस करे, भाषण करे तो ढेर आकर इकट्ठे होंगे। निमंत्रण देते रहेंगे – हमारे पास आकर सतसंग करो। बाबा-मम्मा तो कहाँ जा नहीं सकते, बच्चे जा सकते हैं। बंगाल में काली का मन्दिर है वहाँ भी बहुत सर्विस कर सकते हो। काली कौन है? इस पर भाषण करो। परन्तु हिम्मत चाहिए। बाबा जानते हैं कौन समझा सकते हैं? जिनमें देह-अभिमान है वह क्या सर्विस कर सकेंगे? सर्विस का सबूत नहीं देते। सर्विस अगर पूरी नहीं की तो नाम बदनाम करेंगे। योगी में बल बड़ा अच्छा रहता है। समझाने के लिए प्वाइन्ट्स बहुत देते रहते हैं। परन्तु अच्छे-अच्छे महारथी भी भूल जाते हैं। सर्विस तो बहुत है, इसको कहा जाता है बेहद की सर्विस फिर वह मान भी बहुत पाते हैं। मुख्य है पवित्रता की बात। चलते-चलते टूट पड़ते हैं। लौकिक बाप से कभी किसको भी निश्चय नहीं टूटता। यहाँ बाबा के पास जन्म लेते हैं। ऐसे बाप को फिर घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं क्योकि विचित्र है ऐसे बाप का चित्र नहीं है। बाप कहते हैं मुझे याद करो और तुम पवित्र बनो तो मेरे पास आ जायेंगे। आत्मा समझती है – हमने ही 84 जन्मों का पार्ट बजाया है। आत्मा में पार्ट नूंधा हुआ है। शरीर में थोड़ेही पार्ट है। इतनी छोटी सी आत्मा में कितना भारी पार्ट है! यह बुद्धि में कितना नशा रहना चाहिए, व्यवहार के साथ-साथ यह सर्विस भी कर सकते हैं। माँ-बाप तो कहाँ भी नहीं जायेंगे। बच्चे कहाँ भी जाकर सर्विस कर सकते हैं। बच्चों को ही लकी स्टार्स कहा जाता है। अच्छा!

मीठे-मीठे ज्ञान लकी सितारों को मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) देह-अभिमान छोड़ सर्विस करनी है। विचार सागर मंथन कर बेहद की सर्विस का सबूत देना है।

2) इस मृत्युलोक से पुराने सब हिसाब-किताब चुक्तू करने हैं। पुरानी देह और पुरानी दुनिया को बुद्धि से भूलते जाना है।

वरदान:- कर्म करते शक्तिशाली स्टेज पर स्थित हो रूहानी पर्सनैलिटी का अनुभव कराने वाले कर्मयोगी भव
आप बच्चे सिर्फ कर्मकर्ता नहीं हो लेकिन योगयुक्त होकर कर्म करने वाले कर्मयोगी हो। तो आप द्वारा हर एक को यह अनुभव हो कि यह काम तो हाथ से कर रहे हैं लेकिन काम करते भी अपनी शक्तिशाली स्टेज पर स्थित हैं। चाहे साधारण रीति से चल रहे हैं, खड़े हैं लेकिन रूहानी पर्सनैलिटी का दूर से ही अनुभव हो। जैसे दुनियावी पर्सनैलिटी आकर्षित करती है, ऐसे आपकी रूहानी पर्सनैलिटी, प्योरिटी की पर्सनैलिटी, ज्ञानी वा योगी तू आत्मा की पर्सनैलिटी स्वत: आकर्षित करेगी।
स्लोगन:- सही राह पर चलने वाले तथा सबको सही राह दिखाने वाले सच्चे-सच्चे लाइट हाउस हैं।

BRAHMA KUMARIS MURLI 9 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 9 December 2018

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09-12-18
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 07-03-84 मधुबन

कर्मातीत, वनाप्रस्थी आत्मायें ही तीव्रगति की सेवा के निमित्त

मधुबन वरदान भूमि, समर्थ भूमि, श्रेष्ठ संग की भूमि, सहज परिवर्तन भूमि, सर्व प्राप्तियों के अनुभव कराने वाली भूमि है। ऐसी भूमि पर आकर सभी स्वयं को सम्पन्न अर्थात् सब बातों से भरपूर अनुभव करते हो? कोई अप्राप्ति तो नहीं है? जो सर्व खजाने मिले हैं उन्हों को सदाकाल के लिए धारण किया है? ऐसे समझते हो कि यहाँ से सेवा स्थान पर जाकर महादानी बन यही शक्तियाँ, सर्व प्राप्तियाँ सर्व को देने के निमित्त बनेंगे? सदा के लिए स्वयं को विघ्न-विनाशक, समाधान स्वरूप अनुभव किया है? स्व की समस्या तो अलग रही लेकिन अन्य आत्माओं के समस्याओं का भी समाधान स्वरूप।

समय के प्रमाण अब ब्राह्मण आत्मायें समस्याओं के वश हो जाएं, इससे अभी पार हो गये। समस्याओं के वश होना – यह बाल अवस्था है। अब ब्राह्मण आत्माओं की बाल अवस्था का समय समाप्त हो चुका। युवा अवस्था में मायाजीत बनने की विधि से महावीर बने, सेवा में चक्रवर्ती बने, अनेक आत्माओं के वरदानी महादानी बने, अनेक प्रकार के अनुभव कर महारथी बने, अब कर्मातीत वानप्रस्थ स्थिति में जाने का समय पहुँच गया है। कर्मातीत वानप्रस्थ स्थिति द्वारा ही विश्व की सर्व आत्माओं को आधाकल्प के लिए कर्म बन्धनों से मुक्त कराए मुक्ति में भेजेंगे। मुक्त आत्मायें ही सेकण्ड में मुक्ति का वर्सा बाप से दिला सकती हैं। मैजारिटी आत्मायें मुक्ति की भीख मांगने के लिए आप कर्मातीत वानप्रस्थ महादानी वरदानी बच्चों के पास आयेंगी। जैसे अभी आपके जड़ चित्रों के आगे, कोई मन्दिरों में जाकर प्रार्थना कर सुख शान्ति मांगते हैं। कोई तीर्थ स्थानों पर जाकर मांगते हैं। कोई घर बैठे मांगते हैं। जिसकी जहाँ तक शक्ति होती वहाँ तक पहुँचते हैं, लेकिन यथाशक्ति, यथाफल की प्राप्ति करते हैं। कोई दूरे बैठे भी दिल से करते हैं और कोई मूर्ति के सामने तीर्थ स्थान वा मन्दिरों में जाकर भी दिखावे मात्र करते हैं। स्वार्थ वश करते हैं। उन सब हिसाब अनुसार जैसा कर्म, जैसी भावना वैसा फल मिलता है। ऐसे अब समय प्रमाण आप चैतन्य महादानी वरदानी मूर्तियों के आगे प्रार्थना करेंगे। कोई सेवा स्थान रूपी मन्दिरों में पहुँचेंगे। कोई महान तीर्थ मधुबन तक पहुँचेंगे और कोई घर बैठे साक्षात्कार करते दिव्य बुद्धि द्वारा प्रत्यक्षता का अनुभव करेंगे। सम्मुख न आते भी स्नेह और दृढ़ संकल्प से प्रार्थना करेंगे। मन्सा में आप चैतन्य फरिश्तों का आह्वान कर मुक्ति के वर्से की अंचली मांगेंगे। थोड़े समय में सर्व आत्माओं को वर्सा दिलाने का कार्य तीव्रगति से करना होगा। जैसे विनाश के साधन रिफाइन होने के कारण तीव्रगति से समाप्ति के निमित्त बनेंगे, ऐसे आप वरदानी महादानी आत्मायें, अपने कर्मातीत फरिश्ते स्वरूप के सम्पूर्ण शक्तिशाली स्वरूप द्वारा, सर्व की प्रार्थना का रेसपान्ड मुक्ति का वर्सा दिलायेगी। तीव्रगति के इस कार्य के लिए मास्टर सर्व शक्तिवान, शक्तियों के भण्डार, ज्ञान के भण्डार, याद स्वरूप तैयार हो? विनाश की मिशनरी और वरदान की मशीनरी दोनों तीव्रगति से साथ-साथ चलेंगी।

बहुतकाल से अर्थात् अब से भी एवररेडी। तीव्र-गति वाले कर्मातीत, समाधान स्वरूप सदा रहने का अभ्यास नहीं करेंगे तो तीव्रगति के समय देने वाले बनने के बजाए देखने वाले बनना पड़े। तीव्र पुरुषार्थी बहुत काल वाले तीव्र-गति की सेवा निमित्त बन सकेंगे। यह है वानप्रस्थ अर्थात् सर्व बन्धन-मुक्त, न्यारे और बाप के साथ-साथ तीव्रगति के सेवा की प्यारी अवस्था। तो अब देने वाले बनने का समय है, ना कि अब भी स्वयं प्रति, समस्याओं प्रति लेने वाले बनने का समय है। स्व की समस्याओं में उलझना – अब वह समय गया। समस्या भी एक अपनी कमजोरी की रचना है। कोई द्वारा वा कोई सरकमस्टांस द्वारा आई हुई समस्या वास्तव में अपनी कमजोरी का ही कारण है। जहाँ कमजोरी है वहाँ व्यक्ति द्वारा वा सरकमस्टांस द्वारा समस्या वार करती है। अगर कमजोरी नहीं तो समस्या का वार नहीं। आई हुई समस्या, समस्या के बजाए समाधान रूप में अनुभवी बनायेगी। यह अपनी कमजोरी के उत्पन्न हुए मिक्की माउस हैं। अभी तो सब हॅस रहे हैं और जिस समय आती है उस समय क्या करते हैं? खुद भी मिक्की माउस बन जाते हैं। इससे खेलो न कि घबराओ। लेकिन यह भी बचपन का खेल है। न रचना करो, न समय गंवाओ। इससे परे स्थिति में वानप्रस्थी बन जाओ। समझा!

समय क्या कहता? बाप क्या कहता? अब भी खिलौनों से खेलना अच्छा लगता है क्या? जैसे कलियुग की मानव रचना भी क्या बन गई है? मुरली में सुनते हो ना। बिच्छु-टिण्डन हो गये हैं। तो यह कमजोर समस्याओं की रचना भी बिच्छू टिण्डन के समान स्वयं को काटती है, शक्तिहीन बना देती है। इसलिए सभी मधुबन से सम्पन्न बन यह दृढ़ संकल्प करके जाना कि अब से स्वयं की समस्या को तो समाप्त किया लेकिन और किसके लिए भी समस्या स्वरूप नहीं बनेंगे। स्व प्रति, सर्व के प्रति सदा समाधान स्वरूप रहेंगे। समझा!

इतना खर्चा करके मेहनत करके आते हो तो मेहनत का फल इस दृढ़ संकल्प द्वारा सहज सदा मिलता रहेगा। जैसे मुख्य बात पवित्रता के लिए दृढ़ संकल्प किया है ना कि मर जायेंगे, सहन करेंगे लेकिन इस व्रत को कायम रखेंगे। स्वप्न में वा संकल्प में भी अगर ज़रा भी हलचल होती है तो पाप समझते हो ना। ऐसे समस्या स्वरूप बनना या समस्या के वश हो जाना – यह भी पाप का खाता है। पाप की परिभाषा है, पहचान है, जहाँ पाप होगा वहाँ बाप याद नहीं होगा, साथ नहीं होगा। पाप और बाप, दिन और रात जैसे हैं। तो जब समस्या आती है उस समय बाप याद आता है? किनारा हो जाता है ना? फिर जब परेशान होते हो तब बाप याद आता है। और वह भी भक्त के रूप में याद करते हो, अधिकारी के रूप में नहीं। शक्ति दे दो, सहारा दे दो। पार लगा दो। अधिकारी के रूप में, साथी के रूप में, समान बनकर याद नहीं करते हो। तो समझा, अब कया करना है। समाप्ति समारोह मनाना है ना। समस्याओं का समाप्ति समारोह मनायेंगे ना! या सिर्फ डान्स करेंगे? अच्छे-अच्छे ड्रामा करते हो ना! अभी यह फंक्शन करना क्योंकि अभी सेवा में समय बहुत चाहिए। वहाँ पुकार रहे हैं और यहाँ हिल रहे हैं, यह तो अच्छा नहीं है ना! वह वरदानी, महादानी कह याद कर रहे हैं और आप मूड आफ में रो रहे हैं तो फल कैसे देंगे! उनके पास भी आपके गर्म आंसू पहुँच जायेंगे। वह भी घबराते रहेंगे। अभी याद रखो कि हम ब्रह्मा बाप के साथ-इष्ट देव पूज्य आत्मायें हैं। अच्छा!

सदा बहुतकाल के तीव्र पुरुषार्थी, तीव्रगति की सेवा के एवररेडी बच्चों को सदा विश्व परिवर्तन सो समस्या परिवर्तक, समाधान स्वरूप बच्चों को, सदा रहमदिल बन भक्त आत्माओं और ब्राह्मण आत्माओं के स्नेही और सहयोगी रहने वाली श्रेष्ठ आत्मायें, सदा समस्याओं से परे रहने वाले, कर्मातीत वानप्रस्थ स्थिति में रहने वाले सम्पन्न स्वरूप बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

न्यूयार्क पार्टी से:- सभी अपने को बाप की विशेष आत्मायें अनुभव करते हो? सदा यही खुशी रहती है कि जैसे बाप सदा श्रेष्ठ है वैसे हम बच्चे भी बाप समान श्रेष्ठ हैं? इसी स्मृति से सदा हर कर्म स्वत: ही श्रेष्ठ हो जायेगा। जैसा संकल्प होगा वैसे कर्म होंगे। तो सदा स्मृति द्वारा श्रेष्ठ स्थिति में स्थित रहने वाली विशेष आत्मायें हो। सदा अपने इस श्रेष्ठ जन्म की खुशियां मनाते रहो। ऐसा श्रेष्ठ जन्म जो भगवान के बच्चे बन जायें – ऐसा सारे कल्प में नहीं होता। पांच हजार वर्ष के अन्दर सिर्फ इस समय यह अलौकिक जन्म होता है। सतयुग में भी आत्माओं के परिवार में आयेंगे लेकिन अब परमात्म सन्तान हो। तो इसी विशेषता को सदा याद रखो। सदा मैं ब्राह्मण ऊंचे ते ऊंचे धर्म, कर्म और परिवार का हूँ। इसी स्मृति द्वारा हर कदम में आगे बढ़ते चलो। पुरुषार्थ की गति सदा तेज हो। उड़ती कला सदा ही मायाजीत और निर्बन्धन बना देगी। जब बाप को अपना बना दिया तो और रहा ही क्या। एक ही रह गया ना। एक में ही सब समाया हुआ है। एक की याद में, एकरस स्थिति में स्थित होने से शान्ति, शक्ति और सुख की अनुभूति होती रहेगी। जहाँ एक है वहाँ एक नम्बर है। तो सभी नम्बरवन हो ना! एक को याद करना सहज है या बहुतों को? बाप सिर्फ यही अभ्यास कराते हैं और कुछ नहीं। दस चीज़ें उठाना सहज है या एक चीज़ उठाना सहज है? तो बुद्धि द्वारा एक की याद धारण करना बहुत सहज है। लक्ष्य सबका बहुत अच्छा है। लक्ष्य अच्छा है तो लक्षण अच्छे होते ही जायेंगे। अच्छा!

अव्यक्त महावाक्य – संकल्प शक्ति को कन्ट्रोल करो

समय प्रमाण शीतलता की शक्ति द्वारा हर परिस्थिति में अपने संकल्पों की गति को, बोल को शीतल और धैर्यवत बनाओ। यदि संकल्प की स्पीड फास्ट होगी तो बहुत समय व्यर्थ जायेगा, कन्ट्रोल नहीं कर सकेंगे इसलिए शीतलता की शक्ति धारण कर लो तो व्यर्थ से वा एक्सीडेंट से बच जायेंगे। यह क्यों, क्या, ऐसा नहीं वैसा, इस व्यर्थ की फास्ट गति से छूट जायेंगे। कोई-कोई बच्चे कभी-कभी बड़ा खेल दिखाते हैं। व्यर्थ संकल्प इतना फोर्स से आते जो कन्ट्रोल नहीं कर पाते। फिर उस समय कहते क्या करें हो गया ना! रोक नहीं सकते। जो आया वह कर लिया लेकिन व्यर्थ के लिए कन्ट्रोलिंग पावर चाहिए। जैसे एक समर्थ संकल्प का फल पदमगुणा मिलता है। ऐसे ही एक व्यर्थ संकल्प का हिसाब-किताब – उदास होना, दिलशिकस्त होना वा खुशी गायब होना-यह भी एक का बहुत गुणा के हिसाब से अनुभव होता है। रोज़ अपनी दरबार लगाओ और अपने सभी कार्यकर्ता कर्मचारियों से हालचाल पूछो। आपकी जो सूक्ष्म शक्तियां मंत्री वा महामंत्री हैं, उन्हें अपने आर्डर प्रमाण चलाओ। यदि अभी से राज्य दरबार ठीक होगा तो धर्मराज की दरबार में नहीं जायेगे। धर्मराज भी स्वागत करेगा। लेकिन यदि कन्ट्रोलिंग पावर नहीं होगी तो फाइनल रिज़ल्ट में फाइन भरने के लिए धर्मराज पुरी में जाना पड़ेगा। यह सजायें फाइन हैं। रिफाइन बन जाओ तो फाइन नहीं भरना पड़ेगा।

वर्तमान, भविष्य का दर्पण है। वर्तमान की स्टेज अर्थात् दर्पण द्वारा अपना भविष्य स्पष्ट देख सकते हो। भविष्य राज्यअधिकारी बनने के लिए चेक करो कि वर्तमान मेरे में रूलिंग पावर कहाँ तक है? पहले सूक्ष्म शक्तियाँ, जो विशेष कार्यकर्ता हैं – संकल्प शक्ति के ऊपर, बुद्धि के ऊपर और संस्कारों के ऊपर पूरा अधिकार हो। यह विशेष तीन शक्तियाँ राज्य की कारोबार चलाने वाले मुख्य सहयोगी कार्यकर्ता हैं। अगर यह तीनों कार्यकर्ता आप आत्मा अर्थात् राज्य-अधिकारी राजा के इशारे पर चलते हैं तो सदा वह राज्य यथार्थ रीति से चलेगा। जैसे राजा स्वयं कोई कार्य नहीं करता, कराता है। करने वाले राज्य कारोबारी अलग होते हैं। अगर राज्य कारोबारी ठीक नहीं होते तो राज्य डगमग हो जाता है। ऐसे आत्मा भी करावनहार है, करनहार ये विशेष त्रिमूर्ति शक्तियाँ हैं। पहले इनके ऊपर रूलिंग पावर हो तो यह साकार कर्मेन्द्रियाँ उनके आधार पर स्वत: ही सही रास्ते पर चलेंगी। जैसे सतयुगी सृष्टि के लिए कहते हैं एक राज्य एक धर्म है। ऐसे ही अब स्वराज्य में भी एक राज्य अर्थात् स्व के इशारे पर सर्व चलने वाले हों। मन अपनी मनमत पर न चलावे, बुद्धि अपनी निर्णय शक्ति की हलचल न करे। संस्कार आत्मा को नाच नचाने वाले न हो तब कहेंगे एक धर्म, एक राज्य। तो ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर धारण करो।

पास विद आनर बनने अथवा राज्य अधिकारी बनने के लिए मन जो सूक्ष्म शक्ति है वह कन्ट्रोल में हो अर्थात् आर्डर प्रमाण कार्य करे। जो सोचो वह आर्डर में हो। स्टॉप कहो तो स्टॉप हो जाए, सेवा का सोचो तो सेवा में लग जाए। परमधाम का सोचो तो परमधाम में पहुंच जाए। ऐसी कन्ट्रोलिंग पावर अभी बढ़ाओ। छोटे-छोटे संस्कारों में, युद्ध में समय नहीं गंवाओ। कन्ट्रोंलिग पावर धारण कर लो तो कर्मातीत अवस्था के समीप पहुंच जायेंगे। जब और सब संकल्प शान्त हो जाते हैं, बस एक बाप और आप – इस मिलन की अनुभूति का संकल्प रहता है तब पावरफुल योग कहा जाता है। इसके लिए समाने वा समेटने की शक्ति चाहिए। स्टॉप कहते ही संकल्प स्टॉप हो जाएं। फुल ब्रेक लगे, ढीली नहीं। पावरफुल ब्रेक हो। कन्ट्रोलिंग पावर हो। अगर एक सेकण्ड के सिवाए ज्यादा समय लग जाता है तो समाने की शक्ति कमजोर है। लास्ट में फाइनल पेपर का क्वेश्चन होगा-सेकण्ड में फुल स्टॉप, इसी में ही नम्बर मिलेंगे। सेकेण्ड से ज्यादा हो गया तो फेल हो जायेंगे। एक बाप और मैं, तीसरी कोई बात न आये। ऐसे नहीं यह कर लूं, यह देख लूं…यह हुआ, नहीं हुआ। यह क्यों हुआ, यह क्या हुआ-कोई भी बात आई तो फेल। कोई भी बात में क्यों, क्या की क्यू लगा दी तो उस क्यू को समाप्त करने में बहुत समय जायेगा। जब रचना रच ली तो पालना करनी पड़ेगी, पालना से बच नहीं सकते। समय, एनर्जी देनी ही पड़ेगी, इसलिए इस व्यर्थ रचना का बर्थ कन्ट्रोल करो।

जो अपनी सूक्ष्म शक्तियों को हैंडिल कर सकता है, वह दूसरों को भी हैंडिल कर सकता है। तो स्व के ऊपर कन्ट्रोलिंग पावर, रूलिंग पावर सर्व के लिए यथार्थ हैंडलिंग पावर बन जाती है। चाहे अज्ञानी आत्माओं को सेवा द्वारा हैंडिल करो, चाहे ब्राह्मण-परिवार में स्नेह सम्पन्न, सन्तुष्टता सम्पन्न व्यवहार करो – दोनों में सफल हो जायेंगे।

वरदान:- मन्सा और वाचा के मेल द्वारा जादूमंत्र करने वाले नवीनता और विशेषता सम्पन्न भव 
मन्सा और वाचा दोनों का मिलन जादूमंत्र का काम करता है, इससे संगठन की छोटी-छोटी बातें ऐसे समाप्त हो जायेंगी जो आप सोचेंगे कि यह तो जादू हो गया। मन्सा शुभ भावना वा शुभ दुआयें देने में बिजी हो तो मन की हलचल समाप्त हो जायेगी, पुरुषार्थ से कभी दिलशिकस्त नहीं होंगे। संगठन में कभी घबरायेंगे नहीं। मन्सा-वाचा की सम्मिलित सेवा से विहंग मार्ग की सेवा का प्रभाव देखेंगे। अब सेवा में इसी नवीनता और विशेषता से सम्पन्न बनो तो 9 लाख प्रजा सहज तैयार हो जायेगी।
स्लोगन:- बुद्धि यथार्थ निर्णय तब देगी जब पूरे-पूरे वाइसलेस बनेंगे।

BRAHMA KUMARIS MURLI 8 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 8 December 2018

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08-12-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – आत्मा और परमात्मा का मिलन ही सच्चा-सच्चा संगम अथवा कुम्भ है, इसी मिलन से तुम पावन बनते हो, यादगार में फिर वह मेला मनाते हैं”
प्रश्नः- तुम बच्चों में किस बात की बहुत-बहुत सयानप चाहिए?
उत्तर:- ज्ञान की जो नाज़ुक बातें हैं, उन्हें समझाने की बहुत सयानप चाहिए। युक्ति से ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग को सिद्ध करना है। ऐसे समझाना है जैसे चूहा फूँक भी देता है और काट भी लेता है तो सर्विस की युक्तियाँ रचनी है। कुम्भ मेले पर प्रदर्शनी लगाकर अनेक आत्माओं का कल्याण करना है। पतित से पावन होने की युक्ति बतानी है।
गीत:- इस पाप की दुनिया से…….. 

ओम् शान्ति। बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं पाप की दुनिया को कलियुगी, पतित, भ्रष्टाचारी दुनिया कहा जाता है और फिर पुण्य की दुनिया को सतयुगी, पावन, श्रेष्ठाचारी दुनिया कहा जाता है। परम आत्मा ही आकर पुण्यात्मा, पवित्रात्मा अथवा पुण्य की दुनिया बनाते हैं। मनुष्य पुकारते हैं – पतित-पावन बाप को क्योंकि खुद पावन नहीं हैं। अगर समझते पतित-पावनी गंगा है वा त्रिवेणी है फिर पुकारते क्यों हैं कि हे पतित-पावन आओ? गंगा वा त्रिवेणी तो है ही, उनके होते हुए भी पुकारते रहते हैं। बुद्धि फिर भी परमात्मा की तरफ जाती है। परमपिता परमात्मा जो ज्ञान सागर है, उनको आना है। सिर्फ आत्मा नहीं लेकिन पवित्र जीवात्मा कहा जायेगा। अभी पावन जीवात्मा तो कोई है नहीं। पतित-पावन बाप आते ही तब हैं जब सतयुगी पावन दुनिया की स्थापना करनी है और कलियुगी दुनिया का विनाश करना है। जरूर संगमयुग पर ही आयेंगे। संगम को कुम्भ भी कहते हैं। त्रिवेणी का संगम है, उसका नाम रख दिया है कुम्भ। कहते हैं तीनों नदियां आपस में मिलती हैं। वास्तव में हैं दो नदियां। तीसरी नदी को गुप्त कह देते हैं। तो क्या इस कुम्भ के मेले में पतित से पावन होंगे? पतित-पावन को तो जरूर आना है। ज्ञान का सागर वह है। पतित दुनिया को पावन बनाना, कलियुग को सतयुग बनाना – यह तो परमपिता परमात्मा का ही काम है, न कि मनुष्यों का। यह तो सब ब्लाइन्डफेथ है। अब अन्धों को लाठी चाहिए। तुम अब लाठी बने हो नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। लाठियां भी किस्म-किस्म की होती हैं। कोई लाठी सौ रूपये की और कोई दो रूपये की भी मिलती है। यहाँ भी सब नम्बरवार हैं। कोई तो बहुत सर्विसएबुल हैं। जब बीमार होते हैं तब सर्जन को बुलाना पड़ता है। अब यह है ही पतित दुनिया। तुम पावन बन रहे हो। कहा जाता है आत्मा-परमात्मा अलग रहे बहुकाल फिर जब परमपिता परमात्मा अनेक आत्माओं के बीच आते हैं तो उसको कहा जाता है संगम का कुम्भ।

मनुष्य कुम्भ के मेले पर बहुत दान करते हैं। वह कमाई होगी साधू-सन्तों को और गवर्मेन्ट को। यहाँ तुमको तन-मन-धन सहित सब कुछ दान करना होता है पतित-पावन बाप को। वह फिर तुमको भविष्य में स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। वह नाम लेते हैं त्रिवेणी का और दान देते हैं साधू-सन्तों को। वास्तव में संगम उसको कहेंगे जहाँ सब नदियां आकर सागर में मिलें। वहाँ सागर तो है नहीं। यह तो नदियां आपस में मिलती हैं। नदियां और सागर के मिलन को ही सच्चा-सच्चा मेला कहा जाता है। लेकिन यह भी ड्रामा में नूँध है। इसमें गवर्मेन्ट को भी रेल, मोटर-गाड़ी, जमीन आदि से बहुत कमाई होती है। तो यह कमाई का मेला लगता है। इन बातों को तुम बच्चे जज कर सकते हो क्योंकि तुम हो ईश्वरीय मत पर। तो कुम्भ के मेले का अर्थ निकालना चाहिए। बाबा एसे (निबन्ध) देते हैं। जो सेन्सीबुल बच्चे हैं उनको उठाना चाहिए। नम्बरवन सबसे सेन्सीबल तो है मम्मा फिर दूसरा है संजय। जिसको फिर बांटने के लिए पर्चे बनाने पड़ें। यह त्रिवेणी पतित-पावनी नहीं है। पतित-पावन तो सर्व का सद्गति दाता एक शिवबाबा है। त्रिवेणी को तो सद्गति दाता नहीं कहेंगे। यह नदियां तो हैं ही। आने की बात नहीं। गाते हैं पतितपावन आओ, आकर पावन बनाओ तो यह पर्चे निकालने चाहिए – बहनों-भाइयों, क्या पतित-पावन ज्ञान सागर परमपिता परमात्मा है या यह नदियां? यह तो सदैव हैं। परमात्मा को तो पुकारा जाता है आने के लिए। वास्तव में पतित-पावन तो एक परमात्मा है, आत्मायें और परमात्मा अलग रहे बहुकाल…….. वही सतगुरू आकर सबको सद्गति दे वापिस ले जाते हैं। ज्ञान स्नान तो वास्तव में परमपिता परमात्मा से करना चाहिए। पावन दुनिया की स्थापना परमपिता परमात्मा कराते हैं। तुम उसे जानते नहीं हो। भारत जब श्रेष्ठाचारी था तब उसमें देही-अभिमानी देवतायें रहते थे। उसे शिवालय कहा जाता है। अब कुम्भ पर जाकर बच्चों को प्रदर्शनी लगानी चाहिए समझाने के लिए। समझाना है पतित-पावन एक बाप है, वह कहते हैं मैं आता ही तब हूँ जब पतित से पावन बनाना होता है। तो प्रतिज्ञा करनी पड़े। रक्षा बन्धन भगवान् से तैलक (संबंध) रखता है, न कि साधू सन्तों से। प्रतिज्ञा परमपिता परमात्मा से की जाती है, न कि त्रिवेणी से। हे बाबा, हम आपकी श्रीमत से पावन बनने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं। बाप भी कहते हैं मैं तुमको पावन दुनिया का मालिक बनाऊंगा। यह हैं बाबा के इशारे। इसमें सर्विस करने वाले बहुत तीखे चाहिए। चित्र भी और बनाने पड़ें। इसके लिए अच्छा मण्डप लेना पड़े। तुम्हारे दुश्मन भी बहुत निकलेंगे, कोई समय आग भी लगाने में देरी नहीं करेंगे। किसको झगड़ा करना होता है तो गाली देने लग पड़ते हैं। तुमको तो निरहंकारी बन साइलेन्स में रहना पड़े। ब्रह्माकुमारियां मशहूर तो हो गई हैं। पर्चे आदि जरूर बांटने हैं। कुम्भ के मेले का खास महत्व रखते हैं। वास्तव में महत्व अभी का है, यह भी ड्रामा का खेल है। वहाँ से भी कोई का कल्याण हो सकता है। परन्तु मेहनत लगती है। कांटों को फूल बनाने में मेहनत लगती है। कुम्भ के मेले में प्रदर्शनी करने में भी हिम्मत चाहिए, जान-पहचान चाहिए जो कोई विघ्न न पड़े। तुमको सिद्ध करना है कि पतित-पावन कौन है? मनुष्य पावन दुनिया स्वर्ग को याद भी करते हैं। कोई मरता है तो कहेंगे फलाना स्वर्गवासी हुआ। वहाँ तो बहुत मालठाल होते हैं, वहाँ से फिर यहाँ बुलाकर खिलाते क्यों हो? तुम श्रीनाथ के मन्दिर में देखेंगे – कितने माल बनते हैं। अब श्रीनाथ पुरी और जगन्नाथ पुरी, वास्तव में है एक ही बात परन्तु वहाँ श्रीनाथ द्वारे में देखेंगे तो बहुत वैभव बनते हैं और जगन्नाथ पुरी में सिर्फ फीके चावल का भोग लगता है। घी आदि कुछ नहीं पड़ता। यह फ़र्क बताते हैं – गोरा है तो ऐसे माल और सांवरा है तो यह सूखा चावल। राज़ बड़ा अच्छा है। यह बाप बैठ समझाते हैं। श्रीनाथ द्वारे में इतना भोग लगाते हैं तो फिर पुजारी लोग दुकान में बेचते भी हैं। उन्हों की कमाई का आधार भी उस पर है। मिलता मुफ्त में है फिर कमाते हैं। तो देखो कितनी अन्धश्रद्धा की बातें हैं। यह है भक्ति मार्ग। ज्ञान मार्ग सद्गति मार्ग है, गंगा स्नान से थोड़ेही सद्गति होती है। बड़ा युक्ति से समझाना है। जैसे चूहा फूंक देकर काटता है। बड़ी ही सयानप चाहिए समझने और फिर समझाने की। कितनी नाज़ुक बातें हैं। मनुष्य कहते हैं कि हे परमपिता परमात्मा तुम्हारी गत-मत तुम ही जानो। इसका अर्थ तो समझते ही नहीं। तुम्हारी श्रीमत से जो सद्गति मिलती है वह तुम ही कर सकते हो और कोई कर न सके। सर्व का सद्गति दाता एक है। सर्व अक्षर जरूर डालना है। समझाया बहुत जाता है। परन्तु समझने वाले तो बहुत थोड़े निकलते हैं। प्रजा तो बहुत बनती रहती है।

मनुष्य खुदा के नाम पर बहुत दान-पुण्य करते हैं तो एक जन्म के लिए फल मिल जाता है। यहाँ तो 21 जन्म के लिए मिलता है। ईश्वर अर्थ दान करने से ताकत मिलती है। यह ईश्वर को जानते ही नहीं तो ताकत ही नहीं रही है। हिन्दुओं के गुरू गोसाई तो ढेर हैं। क्रिश्चियन का देखेंगे तो एक है। एक का कितना रिगार्ड है। रिलीजन इज माइट कहा जाता है। अभी तुमने रिलीजन को समझा है तो कितनी ताकत मिलती है। बाबा कहते हैं – बच्चे, सबको यही वशीकरण मंत्र दो। बच्चों को बाप कहते हैं – तुम जहाँ से आये हो उसे याद करो तो अन्त मति सो गति हो जायेगी। बाप को याद करने से ही पावन बन सकते हो। पाप दग्ध होंगे। बाप और वर्से को याद करना है, जिससे सारा चक्र बुद्धि में आ जाता है। गृहस्थ व्यवहार में रहते देह के सर्व सम्बन्धों से बुद्धि निकाल बाप के साथ जोड़ने का पुरूषार्थ करना है। जो फिर अन्त समय भी वही याद पड़े। और कोई की याद पड़ी तो सजा खानी पड़ेगी और पद भी कम हो जायेगा। तो वास्तव में कुम्भ कल्प के संगम को कहा जाता है, जब आत्मायें और परमात्मा मिलते हैं। परमात्मा ही आकर राजयोग सिखाते हैं। वह है पुनर्जन्म रहित। परन्तु बच्चे भी समझते नहीं हैं। श्रीमत पर चलते नहीं तो बेड़ा पार कैसे हो? बेड़ा पार होना माना राजाई पद पाना। श्रीमत से ही राजाई मिलती है। श्रीमत पर नहीं चलते तो आखरीन ख़त्म हो जाते हैं। सजनियां साथ में वह चलेंगी जिसका दीपक जगा हुआ होगा। जिनके दीवे बुझे हुए हैं वह साथ में थोड़ेही चलेंगे। अनन्य बच्चे ही चलेंगे। बाकी तो नम्बरवार पिछाड़ी में आयेंगे लेकिन पवित्र तो सब बनेंगे। सब आत्मायें भी एक जैसी ताकत वाली नहीं हो सकती। हर एक आत्मा का पार्ट अपना-अपना है। एक जैसा पद नहीं मिल सकता। अन्त में सबका पार्ट क्लीयर हो जायेगा। झाड़ कितना बड़ा है, कितने मनुष्य हैं! मुख्य तो जो बड़े-बड़े टाल टालियां हैं वह देखने में आयेंगे। मुख्य है फाउन्डेशन। बाकी तो बाद में आते हैं, उनमें ताकत कम होती है। स्वर्ग में सभी नहीं आ सकते हैं। भारत ही हेविन था। ऐसे नहीं कि भारत के बदले जापान खण्ड हेविन हो जायेगा। ऐसे हो नहीं सकता। अच्छा!

मीठे-मीठे बापदादा वा मात-पिता के लाडले सिकीलधे ज्ञान सितारे बच्चों को याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

रात्रि क्लास – 24-4-68

बच्चों को समझाया गया है और धर्म स्थापक कोई सभी का कल्याण नहीं कर सकते हैं। वह आते हैं सभी को ले आते हैं। जो लिबरेट कर गाइड करते हैं उनका ही गायन है। वह भारत में ही आते हैं। तो भारत सभी से ऊंच देश ठहरा। भारत की बहुत महिमा करनी है। बाप ही आकर सर्व की सद्गति करते हैं, तब ही शान्ति होती है। विश्व में शान्ति थी सृष्टि के आदि में, स्वर्ग में एक धर्म था। अभी अनेक धर्म हैं। बाप ही आकर शान्ति स्थापन करते हैं। कल्प पहले मिसल करते हैं। तुम बच्चों को ज्ञान मिला है तो विचार सागर मंथन चलता है। और तो कोई का चलता ही नहीं है। यह भी तुम समझते हो। देह-अभिमान के कारण देह को ही पूजते हैं। आत्मा पुनर्जन्म तो जरूर यहाँ ही लेगी ना। अभी तुम समझते हो – पावन तो एक ही है। बाप ही गुप्त ज्ञान देते हैं जिससे सभी की सद्गति हो जाती है। बाकी हनुमान वा गणेश आदि जैसे कोई होते ही नहीं। इन सभी को कहा जाता है पुजारी। अच्छा!

रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बाप व दादा का याद प्यार गुडनाईट। रूहानी बच्चों को रूहानी बाप की नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सजाओं से बचने के लिए देह के सर्व सम्बन्धों से बुद्धियोग निकाल एक बाप से बुद्धियोग जोड़ना है। अन्त समय में बाप के सिवाए कोई याद न आये।

2) निरहंकारी बन साइलेन्स में रह कांटों को फूल बनाने की मेहनत करनी है। श्रीमत पर अन्धों की लाठी बनना है। पावन बन पावन बनाना है।

वरदान:- वाचा के साथ मन्सा द्वारा शक्तिशाली सेवा करने वाले सहज सफलता मूर्त भव
जैसे वाचा की सेवा में सदा बिजी रहने के अनुभवी हो गये हो, ऐसे हर समय वाणी के साथ-साथ मन्सा सेवा स्वत: होनी चाहिए। मन्सा सेवा अर्थात् हर समय हर आत्मा के प्रति स्वत: शुभ भावना और शुभ कामना के शुद्ध वायब्रेशन अपने को और दूसरों को अनुभव हों, मन से हर समय सर्व आत्माओं के प्रति दुआयें निकलती रहें। तो मन्सा सेवा करने से वाणी की एनर्जी जमा होगी और यह मन्सा की शक्तिशाली सेवा सहज सफलतामूर्त बना देगी।
स्लोगन:- अपनी हर चलन से बाप का नाम बाला करने वाले ही सच्चे-सच्चे खुदाई खिदमतगार हैं।

BRAHMA KUMARIS MURLI 7 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 7 December 2018

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07-12-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – अविनाशी सर्जन से कुछ भी छिपाना नहीं है, अवज्ञा हो तो क्षमा लेनी है, नहीं तो बोझ चढ़ता जायेगा, निंदक बन पड़ेंगे”
प्रश्नः- सच्ची कमाई का आधार क्या है? उन्नति में विघ्न क्यों पड़ते हैं?
उत्तर:- सच्ची कमाई का आधार पढ़ाई है। अगर पढ़ाई ठीक नहीं तो सच्ची कमाई कर नहीं सकते। उन्नति में विघ्न तब ही पड़ता जब संग ठीक नहीं। कहा भी जाता है संग तारे कुसंग बोरे। संग खराब होगा तो पढ़ेंगे नहीं, नापास हो जायेंगे। संग ही एक-दो को रसातल में पहुँचा देता है, इसलिए संगदोष से तुम बच्चों को बहुत ही सम्भाल करनी है।
गीत:- तू प्यार का सागर है…….. 

ओम् शान्ति। बेहद के बाप की महिमा बच्चे करते हैं। यह है भक्ति मार्ग की महिमा। तुम सपूत बच्चे अभी सम्मुख में बाप की महिमा करते हो। समझते हो बेहद का बाप आकर हमको ज्ञान दे स्वर्ग का मालिक बना रहे हैं क्योंकि ज्ञान का सागर वही है। गॉड में नॉलेज है। उसको कहते हैं गॉडली नॉलेज। परमपिता परमात्मा नॉलेज देने वाला है। किसको? बच्चों को। जैसे तुम्हारी मम्मा पर गॉडेज आफ नॉलेज नाम रखा हुआ है। तो जब वह जगत अम्बा गॉडेज आफ नॉलेज है तो उनके बच्चों में भी वही नॉलेज होगी। गॉडेज आफ नॉलेज सरस्वती को गॉड नॉलेज देते हैं। परन्तु किस द्वारा देते हैं? यह बड़ी ही समझने की बातें हैं। दुनिया नहीं जानती है कि जगत अम्बा कौन है? यह तो बच्चे जानते हैं जगत अम्बा तो एक ही होगी। नाम बहुत दे दिये हैं। मनुष्य तो यह जानते नहीं कि यह प्रजापिता ब्रह्मा की मुख वंशावली सरस्वती है। उनको नॉलेज देने वाला गॉड फादर है। सृष्टि चक्र कैसे फिरता है – यह नॉलेज गॉड फादर देते हैं। बाप ने नॉलेज दी बच्चों को। सरस्वती को कैसे मिली? जरूर प्रजापिता ब्रह्मा की मुख वंशावली है तो परमपिता परमात्मा जो ज्ञान का सागर है, उसने इस मुख द्वारा सरस्वती को ज्ञान दिया होगा। वही ज्ञान फिर औरों को भी दिया होगा। गॉड फादर पढ़ाते हैं तो जरूर गॉड फादर के बच्चे मास्टर गॉड हुए ना इसलिए नाम रखा हुआ है गॉडेज आफ नॉलेज। बच्चे यह जानते हैं कि हम और हमारी मम्मा नॉलेज ले रही है ज्ञान सागर के द्वारा, जिसको ही गीता का भगवान् कहा जाता है। भगवान् तो एक है। कोई देवता या मनुष्य भगवान नहीं हो सकता। अब गॉडेज आफ नॉलेज है तो कौन-सी नॉलेज होगी? राजयोग की। इस सहज राजयोग की नॉलेज से गॉडेज आफ नॉलेज सरस्वती ही फिर गॉडेज आफ लक्ष्मी बनती है। गॉडेज आफ नॉलेज की महिमा है तो जरूर बच्चों की भी है। प्रजापिता की सब सन्तान ठहरे। मम्मा की सन्तान नहीं कहेंगे। प्रजापिता ब्रह्मा के मुख कमल की यह हैं सन्तान। तुम सब ईश्वरीय सन्तान निश्चय करते हो। ईश्वर बाप कहते हैं मैं बच्चों के ही सम्मुख होता हूँ। वो ही मुझे जानते हैं। तो जगत अम्बा है गॉडेज आफ नॉलेज। यह सहज राजयोग की नॉलेज है, न कि शास्त्रों की। गॉड ने इनको नॉलेज दी और यह गॉडेज कहलाई। जगत अम्बा तो माता ठहरी। फिर दूसरे जन्म में गॉडेज आफ वेल्थ, लक्ष्मी बनती है, जिससे मनुष्य भीख मांगते हैं। तो सिद्ध हुआ बाप द्वारा जगत अम्बा को राजयोग का वर्सा मिलता है। उनको गॉडेज आफ नॉलेज कहा जाता है। नॉलेज सोर्स आफ इनकम है। यह है सच्ची कमाई जो सच्चे बाप द्वारा होती है। तुम अब नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार सच्ची कमाई कर रहे हो। अगर पढ़ाई नहीं करते तो उनकी सच्ची कमाई नहीं होती। संग ठीक नहीं होगा तो पढ़ नहीं सकेंगे, उन्नति नहीं होगी। संग तारे कुसंग बोरे (डुबोये) संग खराब होगा, पढ़ेंगे नहीं, तो नापास हो पिछाड़ी में बैठे रहेंगे। टीचर जानता है इनका क्या कारण है। बाप नहीं जानता है। हाँ, इतना बाप जरूर समझेगा कि पढ़ाई कम की है, जरूर खराब संग है जिसके कारण नापास हो पड़ते हैं। समझो आपस में प्यार है, दोनों नहीं पढ़ते हैं तो एक-दो को रसातल में पहुँचा देंगे। बाप समझते हैं कि यह पढ़ते नहीं, इनको अलग करना चाहिए। पढ़ाई बिगर मनुष्य को कहा जाता है बेसमझ। पढ़ते हैं तो कहेंगे समझदार। भगवान् की मत पर नहीं चलते तो कहा जायेगा यह सौतेला बच्चा है। परन्तु वह अर्थ को नहीं जानते हैं। तुम जानते हो – कोई नहीं पढ़ते हैं तो फिर पतित के पतित ही रह जायेंगे, नापास हो भागन्ती हो जायेंगे। बाप कहते हैं – अहो रावण, तुम हमारे बच्चों को भी हप कर जाते हो। कितना शक्तिशाली हो। बच्चे शैतान की मत पर चल पड़ते हैं। श्रीमत पर नहीं चलते हैं। अपने साथ प्रण करना चाहिए – कदम-कदम हम बाबा की मत पर चलेंगे। जो श्रीमत पर नहीं चलते उनको आसुरी मत वाला कहेंगे। बाबा समझ जाते हैं यह इतना ऊंच पद पा नहीं सकेगा, किसको समझा नहीं सकेगा तो कहेंगे रावण के वश है। योग नहीं है जो बुद्धि शुद्ध हो जाए। बुद्धि का योग भी चाहिए। ईश्वरीय बच्चों की चलन बड़ी रॉयल होनी चाहिए। जमते जाम (जन्म लेते ही होशियार राजा) तो कोई हो नहीं सकता। इस कारण बाबा कहते हैं 5 विकार रूपी रावण पर जीत पानी है, श्रीमत पर। जो श्रीमत पर नहीं चलते तो बाबा कह देते यह आसुरी मत पर हैं। फिर उसमें कोई 5 परसेन्ट श्रीमत पर चलते, कोई 10 परसेन्ट चलते। वह भी हिसाब है।

तो जगत अम्बा एक ही है। जगत अम्बा है ब्रह्मा मुख वंशावली सरस्वती, यह उनका पूरा नाम है। सरस्वती को ही सितार देते हैं। यह है गॉडेज आफ नॉलेज, जरूर उनकी सन्तान भी होंगे। उनको भी तंबूरा होना चाहिए। देखो, झाड़ में यह सरस्वती बैठी है, राजयोग सीख रही है फिर यह जाकर लक्ष्मी बनती है, गॉडेज आफ वेल्थ। इसमें हेल्थ, वेल्थ, हैपीनेस सब आ जाती है। यह तो सिवाए परमपिता परमात्मा के कोई दे न सके। हेविनली गॉड फादर वह है। अब देखो, मम्मा सर्विस कर रही है। समझो, कहाँ मम्मा को निमंत्रण दें तो पहले मम्मा के आक्यूपेशन को जानें। पहले नॉलेज चाहिए – यह कौन है? दुनिया तो नहीं जानती। कहते हैं कृष्ण को गाली मिली। परन्तु यह तो हो नहीं सकता, इम्पासिबुल है। सबसे जास्ती गाली खाने वाला है शिवबाबा, सेकेण्ड नम्बर में गाली खाने वाला है ब्रह्मा। कृष्ण और ब्रह्मा। परन्तु कृष्ण को गाली दे न सकें। मनुष्यों को यह पता नहीं कि सरस्वती गॉडेज आफ नॉलेज भविष्य में राधे बनती है। स्वयंवर बाद लक्ष्मी बनती है, गॉडेज आफ वेल्थ। उनमें हेल्थ, वेल्थ, हैप्पी सब आ जाता है। तुमको समझाने का बड़ा नशा चाहिए। मम्मा कौन है – यह समझाना पड़े ना। यह है सरस्वती, ब्रह्मा की बेटी मुख वंशावली। भारतवासी कुछ भी जानते नहीं। नॉलेज है नहीं। अन्धश्रद्धा बहुत है। ब्लाइन्ड फेथ में भारतवासी बहुत हैं। पूजा किसकी करते हैं, यह भी नहीं जानते। क्रिश्चियन अपने क्राइस्ट को जानते हैं। सिक्ख लोग जानते हैं कि गुरूनानक ने सिक्ख धर्म स्थापन किया। अपने धर्म स्थापक को जानते हैं। सिर्फ भारतवासी हिन्दू नहीं जानते। अन्धश्रद्धा से पूजा करते रहते हैं, आक्यूपेशन का कुछ भी पता नहीं है। कल्प की आयु बड़ी करने से कुछ भी समझते नहीं। इस्लामी, बौद्धी आदि बाद में आये हैं। उन्हों के आगे जरूर यह देवतायें होंगे। उन्हों का भी इतना समय होगा। इतने और सब धर्मों को आधाकल्प लगता है तो इस एक धर्म को भी आधाकल्प देना पड़े। लाखों वर्ष तो कह नहीं सकते। तुम जगत अम्बा के मन्दिर में जाकर समझायेंगे – इस गॉडेज आफ नॉलेज को यह नॉलेज किसने दी? ऐसे तो नहीं कहेंगे कृष्ण ने जगत अम्बा को नॉलेज दी। परन्तु यह भी समझा वह सकेंगे जिनकी प्रैक्टिस अच्छी है। कोई-कोई को तो देह-अभि-मान बहुत है। कोई न कोई मित्र सम्बन्धी आदि याद पड़ते रहते हैं। बाप कहते हैं औरों को याद करेंगे तो मेरी याद भूल जायेंगे। तुम गाते भी हो और संग तोड़ एक संग जोड़ेंगे। वह तो अब यहाँ बैठे हैं। बाबा हम आपके हैं, आपकी मत पर चलेंगे। ऐसा कोई कर्म नहीं करेंगे जिसमें नाम बदनाम हो। बहुत बच्चे ऐसे-ऐसे काम करते हैं, जिससे नाम बदनाम होता है। जब तक कोई समझे तब तक गाली देते रहते हैं। नाम भी तो बाला हुआ है। अहो, प्रभू तेरी लीला गाई है ना। परन्तु बच्चे समझ सकते हैं, और कोई जानते नहीं। बाप कहते हैं – बच्चे, मैं तो निष्काम सेवा करता हूँ। अपकारियों पर भी उपकार करता हूँ। भारत को ही सोने की चिड़िया बनाता हूँ। नम्बरवन उपकार करने वाला हूँ। परन्तु मनुष्य मुझे सर्वव्यापी कह बहुत गाली देते हैं। मैं तो तुम बच्चों को नॉलेज देता हूँ। तो इस ज्ञान यज्ञ में आसुरी सम्प्रदाय के विघ्न बहुत पड़ते हैं। बाप तो समझाते हैं जो बच्चे अच्छी तरह नहीं समझते हैं उनके कारण ही किचड़ा पड़ता है। ग्लानी कराते हैं। कई बच्चे तो बहुत अच्छी सर्विस करते हैं, कई डिससर्विस भी करते हैं। एक तरफ कई कन्स्ट्रक्शन करते हैं तो एक तरफ फिर डिस्ट्रक्शन भी करते हैं क्योंकि ज्ञान नहीं है। यह सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी राजधानी स्थापन हो रही है। जो पूरी रीति नहीं समझते हैं उनको समझाना है। तरस तो पड़ता है ना। बाप का बनकर और वर्सा नहीं लिया तो वह क्या काम का रहा। बाप मिला है तो पूरा पुरूषार्थ कर वर्सा लेना चाहिए, श्रीमत पर चलना चाहिए। ऐसा कर्तव्य नहीं करना है जिससे बाप की ग्लानी हो। बाप जानते हैं काम, क्रोध यह महाशत्रु हैं। यह नाक-कान से पकड़ते रहते हैं। यह तो होगा। उनसे पार जाना है। कोई तो नाम-रूप में फंस पड़ते हैं। सब बच्चे तो एक जैसे नहीं होते। बाप फिर भी सावधान करते हैं – खबरदार रहना! ऐसे अकर्तव्य कार्य कर अगर निंदा करायेंगे तो पद भ्रष्ट हो पड़ेंगे। रूस्तम के साथ माया भी रूस्तम हो लड़ती है। बाप को याद करते-करते माया का तूफान कहाँ ले जाता है। बच्चे कोई सच बताते नहीं है। राय भी नहीं लेते हैं। अविनाशी सर्जन से कुछ भी छिपाना नहीं है। अगर बताते नहीं हैं तो और ही गन्दे हो जाते हैं। ऐसे नहीं, बाबा जानी जाननहार है, सब समझते हैं। नहीं, तुम जो अवज्ञा करते हो वह आकर बताओ – शिवबाबा मेरे से यह भूल हुई है, क्षमा चाहता हूँ। क्षमा नहीं लेते तो भूलें होती रहेंगी। गोया अपने सिर पर पाप चढ़ाते रहते हो। बाप तो समझाते हैं कल्प-कल्पान्तर के लिए अपने पद को भ्रष्ट न करो। अगर अभी ऊंच पद नहीं बनायेंगे तो कल्प-कल्पान्तर ऐसा हाल होगा। यह नॉलेज है। बाबा जानता है कल्प पहले मुआफ़िक राजाई स्थापन हो रही है। बापदादा जास्ती समझ सकते हैं। यह फिर भी मुरब्बी बच्चा है। माताओं की महिमा बढ़ानी है, माताओं को आगे रखा जाता है। गोपों को समझाते हैं उनको आगे ले आओ। गोप भी बहुत सर्विस कर सकते हैं। चित्र लेकर समझाओ – ऊंच ते ऊंच यह भगवान् है। फिर है त्रिमूर्ति – ब्रहमा-विष्णु-शंकर। उनमें भी ऊंच कौन है, किसका नाम है? सब कहेंगे प्रजापिता ब्रह्मा, जिसके द्वारा वर्सा मिलता है। शंकर वा विष्णु को पिता नहीं कहेंगे। उनसे कोई वर्सा नहीं मिलता है। प्रजापिता ब्रह्मा उनको कहा जाता है। उनसे क्या वर्सा मिलता है? ब्रह्मा है शिवबाबा का बच्चा। शिवबाबा है ज्ञान का सागर, हेविन स्थापन करने वाला। तो जरूर हेविन के लिए शिक्षा मिलती है। यह राजयोग के लिए मत है। ब्रह्मा द्वारा बाप श्रीमत देते हैं। यह है देवता बनने के लिए। ब्रह्माकुमारी सो श्री लक्ष्मी गॉडेज आफ वेल्थ। वह ब्राह्मण, वह देवी-देवता। निराकारी दुनिया में सब आत्मायें हैं। बच्चों को समझाते तो बहुत हैं, परन्तु समझने वाले कोई समझें। मनुष्य तो ब्लाइन्ड फेथ से सन्यासी गुरू के फालोअर्स बनते हैं। उनसे क्या मिलेगा, यह भी नहीं जानते हैं। टीचर तो फिर भी जानते हैं कि पदवी पायेंगे। बाकी जिसके फालोअर्स बनते हैं उनसे क्या प्राप्ति है, कुछ भी नहीं जानते। यह है अन्धश्रद्धा, फालोअर्स तो है ही नहीं। न वह बनाते और न तुम उनके जैसा बनते हो। एम आब्जेक्ट क्या है – कुछ भी नहीं जानते। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) संग दोष से सदा बचे रहना है। सच्ची पढ़ाई पढ़कर सच्ची कमाई का स्टॉक जमा करना है।

2) कदम-कदम पर बाबा की श्रीमत पर चलेंगे – यह अपने साथ प्रण करना है।

वरदान:- एकव्रता के राज़ को जान वरदाता को राज़ी करने वाले सर्व सिद्धि स्वरूप भव
वरदाता बाप के पास अखुट वरदान हैं जो जितना लेने चाहे खुला भण्डार है। ऐसे खुले भण्डार से कई बच्चे सम्पन्न बनते हैं और कोई यथा-शक्ति सम्पन्न बनते हैं। सबसे ज्यादा झोली भरकर देने में भोलानाथ वरदाता रूप ही है, सिर्फ उसको राज़ी करने की विधि को जान लो तो सर्व सिद्धियां प्राप्त हो जायेंगी। वरदाता को एक शब्द सबसे प्रिय लगता है – एक-व्रता। संकल्प, स्वप्न में भी दूजा-व्रता न हो। वृत्ति में रहे मेरा तो एक दूसरा न कोई, जिसने इस राज़ को जाना, उसकी झोली वरदानों से भरपूर रहती है।
स्लोगन:- मन्सा और वाचा दोनों सेवायें साथ-साथ करो तो डबल फल प्राप्त होता रहेगा।

BRAHMA KUMARIS MURLI 6 DECEMBER 2018 : AAJ KI MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 6 December 2018

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06-12-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

”मीठे बच्चे – अपना सौभाग्य बनाना है तो ईश्वरीय सेवा में लग जाओ, माताओं-कन्याओं को बाप पर कुर्बान जाने की उछल आनी चाहिए, शिव शक्तियाँ बाप का नाम बाला कर सकती हैं”
प्रश्नः- सभी कन्याओं को बाप कौन-सी शुभ राय देते हैं?
उत्तर:- हे कन्यायें – तुम अब कमाल करके दिखाओ। तुम्हें मम्मा के समान बनना है। अब तुम लोक-लाज छोड़ो। नष्टोमोहा बनो। अगर अधर कन्या बनी तो दाग़ लग जायेगा। तुम्हें रंग-बिरंगी माया से बचकर रहना है। तुम ईश्वरीय सेवा करो तो हज़ारों आकर तुम्हारे चरणों पर पड़ेंगे।

ओम् शान्ति। तुम शिव शक्तियां हो उछल मारने वाली। बाप के ऊपर कुर्बान जाने की उछल आनी चाहिए। इसको ही कहा जाता है मौलाई मस्ती। बाप को सामने देखना होता है कि कौन-कौन बैठे हैं। वास्तव में क्लास की बैठक ऐसी होनी चाहिए जो टीचर की हरेक के ऊपर नज़र पड़े। यह जैसे सतसंग हो जाता है। परन्तु क्या करें ड्रामा की भावी ऐसी है। क्लास में नम्बरवार बिठा नहीं सकते। बच्चे मुखड़ा देखने के प्यासे होते हैं ना, वैसे बाप भी प्यासे रहते हैं। बच्चों के सिवाए घर में अन्धियारा समझते हैं। तुम बच्चे सोझरा करने वाले हो। भारत में तो क्या सारी दुनिया में सोझरा करने वाले हो।

गीत:- माता ओ माता तू है सबकी भाग्य विधाता…..

ओम् शान्ति। यह गीत भी तुम्हारे शास्त्र हैं। सर्व शास्त्रमई शिरोमणी गीता है और सभी शास्त्र महाभारत, रामायण, शिवपुराण, वेद, उपनिषद आदि इसमें से ही निकले हैं। वन्डर है ना। मनुष्य कहते हैं नाटक के रिकार्ड बजाते हैं। शास्त्र तो कोई इनके पास हैं नहीं। हम कहते हैं इन रिकॉर्ड से जो अर्थ निकलता है, उनसे सब वेद ग्रंथ आदि का सार निकल आता है। (गीत बजा) यह है मम्मा की महिमा। मातायें तो ढेर हैं। परन्तु मुख्य है जगत अम्बा। यही जगदम्बा स्वर्ग का द्वार खोलती है। फिर पहले वह खुद ही जगत का मालिक बनती है तो जरूर माँ के साथ तुम बच्चे भी हो। उनका ही गायन है तुम मात-पिता…। शिवबाबा को ही मात-पिता कहा जाता है। भारत में जगदम्बा भी है और जगतपिता भी है। परन्तु ब्रह्मा का इतना नाम वा मन्दिर आदि नहीं है। सिर्फ अजमेर में ब्रह्मा का मन्दिर नामीग्रामी है, वहाँ ब्राह्मण भी रहते हैं। ब्राह्मण दो प्रकार के होते हैं – सारसिद्ध और पुष्करणी। पुष्कर में रहने वालों को पुष्करणी कहा जाता है। परन्तु उन ब्राह्मणों को यह थोड़ेही पता है। कहेंगे हम ब्रह्मा मुखवंशावली हैं। जगत अम्बा का नाम तो बहुत बाला है। ब्रह्मा को इतना नहीं जानते। किसको धन बहुत मिलता है तो समझते हैं साधू-सन्तों की कृपा है। ईश्वर की कृपा नहीं समझते। बाप कहते हैं सिवाए मेरे और कोई भी कृपा कर नहीं सकते। हम तो सन्यासियों की महिमा भी करते हैं। अगर यह सन्यासी पवित्र न होते तो भारत जल मरता। परन्तु सद्गति दाता तो एक बाप ही है। मनुष्य, मनुष्य की सद्गति कर नहीं सकते।

बाबा ने समझाया है कि तुम सब सीतायें हो शोक वाटिका में। दु:ख में शोक तो होता है ना। बीमारी आदि होती है तो क्या दु:ख नहीं होगा। बीमार पड़ेंगे तो जरूर ख्याल चलेगा – कब अच्छे होंगे? ऐसे तो नहीं कहेंगे कि बीमार पड़े रहें। पुरूषार्थ करते हैं अच्छे हो जाएं। नहीं तो दवाई आदि क्यों करते? अब बाप कहते हैं मैं तुम बच्चों को इन दु:खों, बीमारियों आदि से छुड़ाकर इज़ाफा देता हूँ। माया रावण ने तुमको दु:ख दिया है। मुझे तो कहते हैं सृष्टि का रचयिता। सब कहते हैं भगवान् ने दु:ख देने लिए सृष्टि रची है क्या! स्वर्ग में ऐसे थोड़ेही कहेंगे।। यहाँ दु:ख है तब मनुष्य कहते हैं कि भगवान् को क्या पड़ी थी जो दु:ख के सृष्टि की रचना की, और कोई काम ही नहीं था? परन्तु बाप कहते हैं यह सुख-दु:ख, हार-जीत का खेल बना हुआ है। भारत पर ही खेल है – राम और रावण का। भारत की रावण से हारे हार है फिर रावण पर जीत पहन राम के बनते हैं। राम कहा जाता है शिवबाबा को। राम का भी, तो शिव का भी नाम लेना पड़ता है समझाने के लिए। शिवबाबा बच्चों का मालिक अथवा नाथ है। वह तुमको स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। बाप का वर्सा है ही स्वर्ग की प्राप्ति फिर उनमें है पद। स्वर्ग में तो देवतायें ही रहते हैं। अच्छा स्वर्ग बनाने वाले की महिमा सुनो।

(गीत) भारत की सौभाग्य विधाता यह जगदम्बा ही है। उनको कोई जानते ही नहीं। अम्बाजी पर तो बहुत मनुष्य जाते होंगे। यह बाबा भी बहुत बार गया है। बबुरनाथ के मन्दिर में, लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर मे अनेक बार गये होंगे। परन्तु कुछ भी पता नहीं था। कितना बेसमझ थे। अब मैंने इनको कितना समझदार बनाया है। जगदम्बा का टाइटिल कितना बड़ा है – भारत की सौभाग्य विधाता। अब तुमको अम्बाजी के मन्दिर में जाकर सर्विस करनी चाहिए। जगत अम्बा के 84 जन्मों की कहानी बतानी चाहिए। ऐसे तो मन्दिर बहुत हैं। मम्मा के इस चित्र को तो मानेंगे नहीं। अच्छा, उस अम्बा की मूर्ति पर ही समझाओ और साथ में यह गीत ले जाओ। यह गीत ही तुम्हारी सच्ची गीता हैं। सर्विस तो बहुत है ना। परन्तु सर्विस करने वाले बच्चों में भी सच्चाई चाहिए। तुम यह गीत जगत अम्बा के मन्दिर में ले जाकर समझाओ। जगदम्बा भी कन्या है, ब्राह्मणी है। जगदम्बा को इतनी भुजायें क्यों दी हैं? क्योंकि उनके मददगार बच्चे बहुत हैं। शक्ति सेना है ना। तो चित्रों में फिर अनेक बाहें दिखा दी हैं। शरीर कैसे दिखलाते? बाहें निशानी सहज हैं, शोभती हैं। टांगे दें तो पता नहीं कैसी शक्ल हो जाए। ब्रह्मा को भी भुजायें दिखाते हैं। तुम सब उनके बच्चे हो परन्तु इतनी बाहें तो दे न सकें। तो तुम कन्याओं-माताओं को सर्विस में लग जाना चाहिए। अपना सौभाग्य बना लो। अम्बा के मन्दिर में तुम इस गीत पर जाकर महिमा करो तो ढेर आ जायेंगे। तुम इतना नाम निकालेंगी जो पुरानी ब्रह्माकुमारियां भी नहीं निकालती। यह छोटी-छोटी कन्यायें कमाल कर सकती हैं। बाबा सिर्फ एक को नहीं, सब कन्याओं को कहते हैं। हज़ारों आकर तुम्हारे चरणों पर गिरेंगे। उनके आगे इतने नहीं गिरेंगे जितने तुम्हारे आगे गिरेंगे। हाँ, इसमें लोकलाज को छोड़ना है। बिल्कुल ही नष्टोमोहा होना है। कहेंगी मुझे तो सगाई करनी ही नहीं है, हम तो पवित्र रहकर भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा करेंगी। अधर कुमारी को तो फिर भी दाग़ लग जाता है। कुमारी ने सगाई की और दाग़ लगने शुरू हो जाते हैं। रंग-बिंरगी माया लग जाती है। इस जन्म में मनुष्य क्या से क्या हो सकता है। मम्मा भी इस जन्म में हुई है। उन्हों को मर्तबा मिला है अल्पकाल के लिए। मम्मा को मिलता है 21 जन्मों के लिए। तुम भी नर से नारायण, नारी से लक्ष्मी बन रही हो। सम्पूर्ण पास हो जायेंगे तो फिर दैवी जन्म मिलेगा। उन्हों को तो है अल्पकाल का सुख, उसमें भी कितनी फिक्र रहती है। हम तो हैं गुप्त। हमको बाहर में कुछ शो नहीं करना है। वह शो करते हैं। यह राज्य तो रूण्य के पानी मिसल (मृगतृष्णा समान) है। शास्त्रों में भी है द्रोपदी ने कहा – अन्धे की औलाद अन्धे, यह जिसको राज्य समझते हो यह तो अभी खत्म हुआ कि हुआ। रक्त की नदियां बहनी हैं। पाकिस्तान का जब बंटवारा हुआ तो घर-घर में कितनी मारपीट करते थे। अभी तो चलते-फिरते रास्तों पर मारपीट होगी। कितना खून बहता है, क्या इसको स्वर्ग कहेंगे? क्या यही नई देहली, नया भारत है? नया भारत तो परिस्तान था। अभी तो विकारों की प्रवेशता है, बड़े दुश्मन हैं। राम-रावण का जन्म भारत में ही दिखाते हैं। शिव जयन्ती विलायत में नहीं मनाते हैं, यहाँ ही मनाते हैं। तुम जानते हो रावण कब आता है? जब दिन पूरा हो रात हुई तो रावण आ गया। जिसको वाम मार्ग कहा जाता है। दिखाते भी हैं वाम मार्ग में जाने से देवताओं की क्या हालत हो जाती है।

बच्चों को सर्विस करनी चाहिए। जो खुद जागृत होगा वही जागृत कर सकेंगे। बाबा तो शुभ चिन्तक है। कहेंगे कहीं इनको माया का थप्पड़ न लगे। बीमार होंगे तो सर्विस नहीं कर सकेंगे। जगत अम्बा को ही ज्ञान का कलष मिलता है, लक्ष्मी को नहीं। लक्ष्मी को धन दिया, जिससे दान कर सकती है। लेकिन वहाँ तो दान आदि होता नहीं। दान हमेशा गरीबों को किया जाता है। तो कन्यायें ऐसे-ऐसे मन्दिरों में जाकर सर्विस करें तो बहुत आयेंगे। शाबासी देंगे, पांव पड़ेंगे। माताओं का रिगॉर्ड भी है। मातायें सुनने से प्रफुल्लित भी होंगी। पुरूषों को फिर अपना नशा रहता है ना।

बाबा ने समझाया है – यह साकार है बाहरयामी। इनके अन्दर जो लॉर्ड रहता है, वह है लॉर्ड ऑफ लॉर्ड। कृष्ण को लॉर्ड कृष्णा कहते हैं ना। हम तो कहते हैं कृष्ण का भी लॉर्ड ऑफ लॉर्ड वह परमात्मा है। उनको यह मकान दिया गया है। तो यह लैण्डलेडी और लैण्ड लॉर्ड दोनों है। यह मेल भी है तो फीमेल भी है। वन्डर है ना।

भोग लग रहा है। अच्छा, बाबा को सभी का याद-प्यार देना। खुशी से सलाम भेजते हैं बड़े उस्ताद को। यह एक रस्म-रिवाज है। जैसे शुरू में साक्षात्कार होते थे, ऐसे अन्त में भी बाबा बहुत बहलायेंगे। आबू में बहुत बच्चे आयेंगे। जो होंगे सो देखेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

रात्रि क्लास – 8-4-68

यह ईश्वरीय मिशन चल रही है। जो अपने देवी-देवता धर्म के होंगे वही आ जायेंगे। जैसे उन्हों की मिशन है क्रिश्चियन बनाने की। जो क्रिश्चियन बनते हैं उनको क्रिश्चियन डिनायस्टी में सुख मिलता है। वेतन अच्छा मिलता है, इसलिये क्रिश्चियन बहुत हो गये हैं। भारतवासी इतना वेतन आदि नहीं दे सकते। यहाँ करप्शन बहुत है। बीच में रिश्वत न लें तो नौकरी से ही जवाब। बच्चे बाप से पूछते हैं इस हालत में क्या करें? कहेंगे युक्ति से काम करो फिर शुभ कार्य में लगा देना।

यहाँ सभी बाप को पुकारते हैं कि आकर हम पतितों को पावन बनाओ, लिबरेट करो, घर ले जाओ। बाप जरूर घर ले जायेंगे ना। घर जाने लिये ही इतनी भक्ति आदि करते हैं। परन्तु जब बाप आये तब ही ले जाये। भगवान है ही एक। ऐसे नहीं सभी में भगवान आकर बोलते हैं। उनका आना ही संगम पर होता है। अभी तुम ऐसी-ऐसी बातें नहीं मानेंगे। आगे मानते थे। अभी तुम भक्ति नहीं करते हो। तुम कहते हो हम पहले पूजा करते थे। अब बाप आया है हमको पूज्य देवता बनाने लिये। सिक्खों को भी तुम समझाओ। गायन है ना मनुष्य से देवता….। देवताओं की महिमा है ना। देवतायें रहते ही हैं सतयुग में। अभी है कलियुग। बाप भी संगमयुग पर पुरुषोत्तम बनने की शिक्षा देते हैं। देवतायें हैं सभी से उत्तम, तब तो इतना पूजते हैं। जिसकी पूजा करते हैं वह जरूर कभी थे, अभी नहीं हैं। समझते हैं यह राजधानी पास्ट हो गई है। अभी तुम हो गुप्त। कोई जानते थोड़ेही हैं कि हम विश्व के मालिक बनने वाले हैं। तुम जानते हो हम पढ़कर यह बनते हैं। तो पढ़ाई पर पूरा अटेन्शन देना है। बाप को बहुत प्यार से याद करना है। बाबा हमको विश्व का मालिक बनाते हैं तो क्यों नहीं याद करेंगे। फिर दैवीगुण भी चाहिए। अच्छा!

रूहानी बच्चों को रूहानी बाप व दादा का याद प्यार गुडनाईट और नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस दुनिया में अपना बाहरी शो नहीं करना है। सम्पूर्ण पास होने के लिए गुप्त पुरूषार्थ करते रहना है।

2) इस रंग-बिरंगी दुनिया में फंसना नहीं है। नष्टोमोहा बन बाप का नाम बाला करने की सेवा करनी है। सबका सौभाग्य जगाना है।

वरदान:- सदा खुशी की खुराक खाने और खिलाने वाले खुशहाल, खुशनसीब भव
आप बच्चों के पास सच्चा अविनाशी धन है इसलिए सबसे साहूकार आप हो। चाहे सूखी रोटी भी खाते हो लेकिन खुशी की खुराक उस सूखी रोटी में भरी हुई है, उसके आगे कोई खुराक नहीं। सबसे अच्छी खुराक खाने वाले, सुख की रोटी खाने वाले आप हो इसलिए सदा खुशहाल हो। तो ऐसे खुशहाल रहो जो और भी देखकर खुशहाल हो जाएं तब कहेंगे खुशनसीब आत्मायें।
स्लोगन:- नॉलेजफुल वह है जिसका एक भी संकल्प वा बोल व्यर्थ न जाये।
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