Hindi Murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 13 MAY 2021 : AAJ KI MURLI

13-05-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण हो, तुम्हें ही बाप द्वारा ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है, तुम अभी ईश्वरीय गोद में हो”
प्रश्नः- अद्वैत राज्य, जहाँ दूसरा कोई धर्म नहीं, उस राज्य की स्थापना का आधार क्या है?
उत्तर:- योगबल। बाहुबल से कभी भी अद्वैत राज्य की स्थापना हो नहीं सकती। वैसे क्रिश्चियन के पास इतनी शक्ति है जो अगर आपस में मिल जाएं तो सारे विश्व पर राज्य कर सकते हैं, परन्तु यह लॉ नहीं कहता। विश्व पर एक राज्य की स्थापना करना बाप का ही काम है।
गीत:- छोड़ भी दे आकाश सिंहासन…

ओम् शान्ति। बच्चों को ओम् शान्ति का अर्थ तो बहुत ही बार समझाया है। ओम् यानी मैं कौन? मैं आत्मा। यह शरीर हमारे आरगन्स हैं। मैं आत्मा परमधाम की रहने वाली हूँ। भारतवासी पुकारते हैं कि हे दूर देश के रहने वाले आओ क्योंकि भारत में अभी बहुत धर्म ग्लानि, दु:ख हो पड़ा है। आप फिर से आकर गीता का उपदेश सुनाओ। गीता के लिए ही कहते हैं – शिवबाबा आइये क्योंकि वह सबका बाप है। कहते हैं भारतवासियों पर फिर से परछाया पड़ा है, माया रूपी रावण का, इसलिए सब दु:खी पतित हैं। पुकारते हैं – रूप बदलकर आइये अर्थात् मनुष्य के रूप में आइये। तो मनुष्य रूप में आता हूँ। मेरा आना दिव्य अलौकिक है। मैं गर्भ में नहीं आता हूँ, मैं आता ही हूँ साधारण बूढ़े तन में।

तुम बच्चे जानते हो – मैं कल्प-कल्प अपना निराकारी रूप बदलकर आता हूँ। ज्ञान का सागर तो परमपिता परमात्मा ही है। कृष्ण को कभी भी नहीं कहेंगे। बाप कहते हैं मैं इस साधारण तन में आकर तुमको फिर से सहज राजयोग सिखा रहा हूँ। जब दुनिया पतित बन जाती है तब मुझे आना पड़ता है। कलियुग से सतयुग बनाने मैं आता हूँ। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का चित्र भी है। ब्रह्मा द्वारा स्थापना, शंकर द्वारा विनाश और फिर विष्णु द्वारा पालना। यह लक्ष्मी-नारायण, विष्णु के दो रूप हैं। यह तुम बच्चे जानते हो। बाबा फिर से रूप बदलकर आया है। वह हमारा सुप्रीम बाप भी है, सुप्रीम टीचर भी है, सुप्रीम गुरू भी है और गुरू लोगों को सुप्रीम नहीं कहा जाता है। यह तो बाप, टीचर, गुरू तीनों हैं। लौकिक बाप तो बच्चे की पालना कर फिर उनको स्कूल में भेज देते हैं। कोई बिरला होगा जो बाप टीचर भी होगा। यह कोई कह न सके। सब आत्मायें मुझे पुकारती हैं, गॉड फादर कहती हैं तो वह आत्मा का फादर हो गया। यह गीत भी भक्ति मार्ग का है। सतयुग में तो माया होती ही नहीं, जो पुकारना पड़े। वहाँ तो सुख ही सुख है। तुम जानते हो 5 हजार वर्ष का चक्र है। आधाकल्प सतयुग-त्रेता दिन, आधाकल्प द्वापर-कलियुग रात। तुम ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण हो। ब्रह्मा का अथवा तुम ब्राह्मणों का ही रात-दिन गाया जाता है। दिन और रात का ज्ञान भी तुम बच्चों को है। लक्ष्मी-नारायण को यह ज्ञान नहीं। अभी तुम संगम पर हो, जानते हो अभी भक्ति मार्ग पूरा हो, दिन उदय होता है। यह ज्ञान अभी तुमको बाप द्वारा मिला है। कलियुग में वा सतयुग में यह ज्ञान किसको भी होता नहीं, इसलिए गाया जाता है – ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात। तुम अभी सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी राज्य पाने का पुरूषार्थ कर रहे हो। फिर आधाकल्प के बाद तुम राज्य गँवाते हो। यह ज्ञान तुम ब्राह्मणों के सिवाए कोई को नहीं है। तुम देवतायें बन जायेंगे फिर यह ज्ञान रहेगा नहीं। अभी है रात्रि। शिव रात्रि भी गाई जाती है। कृष्ण की भी रात्रि कहते हैं परन्तु उसका अर्थ नहीं समझते। शिव की जयन्ती अर्थात् शिव का रीइनकारनेशन होता है। ऐसे बाप का दिवस कम से कम एक मास मनाना चाहिए। जो सारी सृष्टि को पतित से पावन बनाते हैं, उनका हॉली डे भी नहीं मनाते हैं। बाप कहते हैं मैं सबका लिब्रेटर हूँ, गाइड बन सबको ले जाता हूँ।

अभी तुम पुरूषार्थ करते हो – राजयोग सीखने का। बाप तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र दे रहे हैं। आत्मा का रूप क्या है – यह भी किसको पता नहीं है। बाप कहते हैं तुम आत्मा न अंगुष्ठे मिसल हो, न अखण्ड ज्योति मिसल हो। तुम तो स्टार हो, बिन्दी मिसल। मैं भी आत्मा बिन्दी हूँ, परन्तु मैं पुनर्जन्म में नहीं आता हूँ। मेरी महिमा ही अलग है, मैं सुप्रीम होने के कारण जन्म-मरण के चक्र में नहीं आता हूँ। तुम आत्मायें शरीर में आती हो। तो 84 जन्म लेती हो, मैं इस शरीर में प्रवेश करता हूँ। यह लोन लिया हुआ है। बाप समझाते हैं- तुम भी आत्मा हो। परन्तु तुम अपने को रियलाइज़ नहीं करते हो कि हम आत्मा हैं, आत्मा ही बाप को याद करती है। दु:ख में हमेशा याद करते हैं, हे भगवान, हे रहमदिल बाबा रहम करो। रहम माँगते हो क्योंकि वह बाप ही नॉलेजफुल, ब्लिसफुल, प्योरिटी फुल है। ज्ञान में भी फुल है। ज्ञान का सागर है। मनुष्य को यह महिमा दे नहीं सकते हैं। सारी दुनिया पर ब्लिस करना, यह बाप का ही काम है। वह है रचयिता, बाकी सब हैं रचना। क्रियेटर रचना को क्रियेट करते हैं। पहले स्त्री को एडाप्ट करते हैं, फिर उनके द्वारा रचना रचते हैं, फिर उनकी पालना भी करते हैं, विनाश नहीं करते। यह बेहद का बाप आकर स्थापना-पालना-विनाश कराते हैं। आदि सनातन देवी-देवता धर्म की पालना कराते हैं। सतयुग आदि में फट से राजधानी स्थापन हो जाती है और धर्म वाले तो सिर्फ अपना-अपना धर्म स्थापन करते है फिर जब लाखों, करोड़ों की अन्दाज में वृद्धि हो जाती है, तब राजाई होती है। अभी तुम राजधानी स्थापन कर रहे हो। योगबल से तुम सारे विश्व के मालिक बनते हो, बाहुबल से कभी कोई विश्व पर राजाई कर नहीं सकता। बाबा ने समझाया है, क्रिश्चियन में इतनी ताकत है, वह आपस में मिल जाएं तो सारे विश्व पर राज्य कर सकते हैं। परन्तु बाहुबल से विश्व पर राज्य पायें, यह लॉ नहीं कहता। ड्रामा में यह कायदा नहीं है, जो बाहुबल वाले विश्व के मालिक बनें।

बाप समझाते हैं – विश्व की बादशाही योगबल से मेरे द्वारा ही मिल सकती है। वहाँ कोई पार्टीशन नहीं है। धरती, आकाश सब तुम्हारे होंगे। तुमको कोई टच नहीं कर सकता। उनको कहा जाता है अद्वैत राज्य। यहाँ हैं अनेक राज्य। बाप समझाते हैं – 5 हजार वर्ष बाद तुम बच्चों को यह राजयोग सिखाता हूँ। कृष्ण की आत्मा अब सीख रही है। कृष्ण पहला नम्बर प्रिन्स था। वह इस समय 84 जन्म के अन्त में आकर ब्रह्मा बने हैं। यह बच्चों को समझाया है, सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है। बाप फिर से स्वर्ग की स्थापना कर रहे हैं। अनेक धर्म विनाश होने हैं जरूर। एक धर्म की स्थापना हो जायेगी। भारत ही 100 परसेन्ट सालवेन्ट, धर्म श्रेष्ठ था। देवताओं के कर्म भी श्रेष्ठ थे। उन्हों की ही महिमा गाई हुई है – सर्वगुण सम्पन्न…पहले-पहले पवित्र थे, अभी पतित बने हैं फिर बाप आकर स्त्री-पुरूष दोनों को पवित्र बनाते हैं। रक्षाबन्धन का उत्सव इतना क्यों मनाते हैं – यह कोई को पता नहीं है। बाप ने ही आकर प्रतिज्ञा ली थी कि अन्तिम जन्म में तुम दोनों पवित्र रहो। संन्यासियों का तो धर्म ही अलग है। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य – यह तुम्हारे लिए है। तुमने देखा होगा – पादरी लोग चलते हैं तो ऑखे एक तरफ रहती हैं और किसी की तरफ देखते नहीं। नन्स होती हैं ना। अब वह तो क्राइस्ट को याद करती हैं। कहते हैं- क्राइस्ट गॉड का बच्चा था। तुम्हारा कोई सफेद कपड़े आदि से कनेक्शन नहीं है। तुम तो आत्मा हो। नन बट वन, एक को ही याद करना है। सच्ची नन्स तो तुम हो, तुमको वर्सा उस बाबा से मिलना है, उनको याद करेंगे तब ही विकर्म विनाश होंगे इसलिए बाप का फरमान है – मामेकम् याद करो। आत्मा का निश्चय न होने कारण नन्स फिर क्राइस्ट को याद करती हैं। गॉड कौन है – यह नहीं जानते हैं। भारतवासी जो पहले-पहले आते हैं, वही नहीं जानते हैं। लक्ष्मी-नारायण को यह सृष्टि का ज्ञान थोड़ेही है, न वह त्रिकालदर्शी हैं। त्रिकालदर्शी तुम ब्राह्मण बनते हो। तुमको कौड़ी से बदल हीरे जैसा बाप बनाते हैं। अब तुम ईश्वरीय गोद में हो। तुम्हारा यह अन्तिम जन्म बहुत अमूल्य है। भारत की खास, दुनिया की आम तुम रूहानी सेवा करते हो। बाकी वह तो हैं जिस्मानी सोशल वर्कर्स, तुम हो रूहानी। तुमको सिखाने वाला सुप्रीम रूह है। हर एक आत्मा को बोलो – बाप को याद करो। बाप को ही पतित-पावन गाया जाता है। तुमको गिरने में 84 जन्म लगते हैं, फिर चढ़ने में एक सेकेण्ड लगता है। यह तुम्हारा इस मृत्युलोक का अन्तिम जन्म है, मृत्युलोक मुर्दाबाद, अमरलोक जिंदाबाद होना है। इसको अमर कथा कहा जाता है। अमर बाबा आकर तुम अमर आत्माओं को अमर युग में ले चलने के लिए अमर कथा सुनाते हैं। बाप कहते हैं- अच्छा और बातें भूल जाते हो तो सिर्फ अपने को आत्मा निश्चय कर मुझ एक बाप को याद करो। बुद्धि का योग मेरे साथ लगाओ तो तुम्हारे पाप भस्म हों और तुम पुण्य-आत्मा बन जायेंगे। तुम मनुष्य से देवता बनते हो, यह नई बात नहीं है। 5 हजार वर्ष बाद बाप आकर तुमको वर्सा देते हैं, रावण फिर श्राप देते हैं – यह है खेल। भारत की ही कहानी है। यह बातें बाप ही समझाते हैं, कोई भी वेद-शास्त्र आदि में नहीं हैं इसलिए गॉड फादर को ही नॉलेजफुल, पीसफुल, ब्लिसफुल कहा जाता है। तुमको भी आप समान बनाते हैं। तुम भी पूज्य थे फिर पुजारी बनते हो, आपेही पूज्य, आपेही पुजारी। यह भगवान के लिए नहीं है। तुम भारतवासियों की बात है, तुम पहले सिर्फ एक शिव की भक्ति करते थे। अव्यभिचारी भक्ति की फिर देवताओं की भक्ति शुरू की, फिर नीचे उतरते आये। अब फिर से तुम देवी-देवता बन रहे हो, जो थोड़ा पढ़ते हैं वह प्रजा में चले जायेंगे। जो अच्छी रीति पढ़ते-पढ़ाते हैं, वह राजाई में आयेंगे। प्रजा तो ढेर बनती है। एक महाराजा की लाखों करोड़ों के अन्दाज में प्रजा होगी। तुम पुरूषार्थ करते ही हो कल्प पहले मुआफिक। पुरूषार्थ से पता पड़ जाता है कि माला में कौन-कौन आने वाले हैं। प्रजा में भी कोई गरीब, कोई साहूकार बनते हैं। भक्ति मार्ग में ईश्वर अर्थ दान करते हैं। क्यों ईश्वर के पास नहीं है क्या? या तो कहते हैं, कृष्ण अर्पणम्। परन्तु वास्तव में होता है ईश्वर अर्पणम्, मनुष्य जो कुछ करते हैं उनका फल दूसरे जन्म में मिलता है। एक जन्म के लिए मिल जाता है। अब बाप कहते हैं- मैं आया हूँ, तुमको 21 जन्म का वर्सा देने। मेरे अर्थ डायरेक्ट कुछ भी करते हो तो 21 जन्म के लिए उसकी प्राप्ति तुमको हो जाती है। इनडायरेक्ट करते हो तो एक जन्म के लिए अल्पकाल का सुख मिल जाता है। बाप समझाते हैं यह तुम्हारा सब मिट्टी में मिल जाना है, इसलिए इसको सफल कर लो। तुम यह रूहानी हॉस्पिटल कम युनिवर्सिटी खोलते जाओ, जहाँ से सब एवरहेल्दी, एवरवेल्दी बनेंगे, इनसे बहुत इनकम होती है। योग से हेल्थ और चक्र को जानने से वेल्थ। तो घर-घर में ऐसी युनिवर्सिटी कम हॉस्पिटल खोलते जाओ। बड़ा आदमी है तो बड़ा खोले, जहाँ बहुत आ सकें। बोर्ड पर लिख दो। जैसे नेचर-क्योर वाले लिखते हैं। बाप सारी दुनिया की नेचर बदल प्योर बना देते हैं। इस समय सभी इमप्योर हैं। सारी दुनिया को एवरहेल्दी, एवरवेल्दी बनाने वाला बाप है, जो अब तुम बच्चों को पढ़ा रहे हैं। तुम हो मोस्ट स्वीट चिल्ड्रेन। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अपनी इस अमूल्य जीवन को रूहानी सेवा में लगाना है। खास भारत, आम सारी दुनिया की सेवा करनी है।

2) अपना सब कुछ सफल करने के लिए डायरेक्ट ईश्वर अर्थ अर्पण करना है। रूहानी हॉस्पिटल और युनिवर्सिटी खोलनी है।

वरदान:- सम्पूर्ण समर्पण की विधि द्वारा सर्वगुण सम्पन्न बनने के पुरुषार्थ में सदा विजयी भव
सम्पूर्ण समर्पण उसे कहा जाता है जिसके संकल्प में भी बॉडी कानसेस न हो। अपने देह का भान भी अर्पण कर देना, मैं फलानी हूँ – यह संकल्प भी अर्पण कर सम्पूर्ण समर्पण होने वाले सर्वगुणों में सम्पन्न बनते हैं। उनमें कोई भी गुण की कमी नहीं रहती। जो सर्व समर्पण कर सर्वगुण सम्पन्न वा सम्पूर्ण बनने का लक्ष्य रखते हैं तो ऐसे पुरुषार्थियों को बापदादा सदा विजयी भव का वरदान देते हैं।
स्लोगन:- मन को वश में करने वाला ही मनमनाभव रह सकता है।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 12 MAY 2021 : AAJ KI MURLI

12-05-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – जब तुम सम्पूर्ण पावन बनोगे तब ही बाप तुम्हारी बलिहारी स्वीकार करेंगे, अपनी दिल से पूछो हम कितना पावन बने हैं!”
प्रश्नः- तुम बच्चे अभी खुशी-खुशी से बाप पर बलि चढ़ते हो – क्यों?
उत्तर:- क्योंकि तुम जानते हो, अभी हम बलिहार जाते हैं तो बाप 21 जन्मों के लिए बलिहार जाते हैं। तुम बच्चों को यह भी मालूम है कि अब इस अविनाशी रूद्र ज्ञान यज्ञ में सब मनुष्य-मात्र को स्वाहा होना ही है इसलिए तुम पहले ही खुशी-खुशी से अपना तन-मन-धन सब कुछ स्वाहा कर सफल कर लेते हो।
गीत:- मुखड़ा देख ले प्राणी…

ओम् शान्ति। शिव भगवानुवाच। जरूर अपने बच्चों प्रति ही नॉलेज सिखाते हैं वा श्रीमत देते हैं – हे बच्चों वा हे प्राणी, शरीर से प्राण निकल जाते हैं वा आत्मा निकल जाती है, एक ही बात है। हे प्राणी अथवा हे बच्चे, तुमने देखा कि मेरे जीवन में कितना पाप था और कितना पुण्य था! हिसाब तो बता दिया है – तुम्हारे जीवन में आधाकल्प पुण्य, आधाकल्प पाप होते हैं। पुण्य का वर्सा बाप से मिलता है, जिसको राम कहते हैं। राम, निराकार को कहा जाता है, न कि सीता वाला राम। तो अब तुम बच्चे जो आकर के ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण बने हो, तुम्हारी बुद्धि में आया है बरोबर आधाकल्प हम पुण्य-आत्मा ही थे फिर आधाकल्प पाप-आत्मा बने। अभी पुण्य-आत्मा बनना है। कितना पुण्य-आत्मा बने हैं, वह हर एक अपनी दिल से पूछे। पाप-आत्मा से पुण्य-आत्मा कैसे बनेंगे…. वह भी बाप ने समझाया है। यज्ञ, तप आदि से तुम पुण्य-आत्मा नहीं बनेंगे, वह है भक्ति मार्ग, इससे कोई भी मनुष्य पुण्य-आत्मा नहीं बनते हैं। अभी तुम बच्चे समझते हो, हम पुण्य-आत्मा बन रहे हैं। आसुरी मत से पाप-आत्मा बनते-बनते सीढ़ी उतरते ही आये हैं। कितना समय हम पुण्य-आत्मा बनते हैं वा सुख का वर्सा लेते हैं – यह किसको पता नहीं है। उस बाप को याद तो सभी मनुष्य करते हैं, उनको ही परमपिता परमात्मा कहते हैं। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को परमात्मा नहीं कहेंगे और किसको परमात्मा नहीं कह सकते हैं। भल इस समय तुम प्रजापिता ब्रह्मा कहते हो परन्तु प्रजापिता को कभी भक्तिमार्ग में याद नहीं करते हैं। याद सभी फिर भी निराकार बाप को ही करते हैं – ओ गॉड फादर, ओ भगवान अक्षर ही निकलते हैं। एक को ही याद करते हैं। मनुष्य अपने को गॉड फादर कह न सकें। ना ही ब्रह्मा-विष्णु-शंकर अपने को गॉड फादर कह सकते हैं। उनके शरीर का नाम तो है ना। एक ही गॉड फादर है, उनको अपना शरीर नहीं है। भक्ति मार्ग में भी शिव की बहुत पूजा करते हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो – शिवबाबा इस शरीर द्वारा हमसे बात करते हैं – हे बच्चों, कितना प्यार से कहते हैं समझते हैं, मैं सर्व का पतित-पावन, सद्गति दाता हूँ। मनुष्य बाप की महिमा करते हैं ना लेकिन उनको यह पता नहीं है कि 5 हजार वर्ष बाद आते हैं। जरूर जब कलियुग का अन्त होगा तब ही तो आयेंगे। अभी कलियुग का अन्त है तो जरूर अब आया हुआ है। तुमको कृष्ण नहीं पढ़ाते हैं। श्रीमत मिलती है, श्रीमत कोई कृष्ण की नहीं है। कृष्ण की आत्मा भी श्रीमत से सो देवता बनी थी फिर 84 जन्म लेते अब तुम आसुरी मत के बने हो। बाप कहते हैं- मैं आता ही तब हूँ जब तुम्हारा चक्र पूरा होता है। तुम जो शुरू में आये थे, अब जड़जड़ीभूत अवस्था में हो। झाड़ पुराना जड़जड़ीभूत होता है तो सारा झाड़ ऐसा हो जाता है। बाप समझाते हैं – तुम्हारे तमोप्रधान बनने से सब तमोप्रधान बन गये हैं। यह मनुष्य सृष्टि का, वैरायटी धर्मों का झाड़ है, इसको उल्टा झाड़ कहते हैं, इसका बीज ऊपर में है। उस बीज से ही सारा झाड़ निकलता है। मनुष्य कहते भी हैं “गॉड फादर”। आत्मा कहती है, आत्मा का नाम आत्मा ही है। आत्मा शरीर में आती है तो शरीर का नाम रखा जाता है, खेल चलता है। आत्माओं की दुनिया में खेल नहीं चलता। खेल की जगह ही यह है। नाटक में रोशनी आदि सब होती है। बाकी जहाँ आत्मायें रहती हैं, वहाँ सूर्य चांद नहीं हैं, ड्रामा का खेल नहीं चलता है। रात-दिन यहाँ होते हैं। सूक्ष्मवतन वा मूलवतन में रात-दिन नहीं होते, कर्मक्षेत्र यह है। इसमें मनुष्य अच्छे कर्म भी करते हैं, बुरे कर्म भी करते हैं। सतयुग-त्रेता में अच्छे कर्म होते हैं क्योंकि वहाँ 5 विकार रूपी रावण का राज्य ही नहीं। बाप बैठ कर्म, अकर्म, विकर्म का राज़ बताते हैं। कर्म तो करना ही है, यह कर्मक्षेत्र है। सतयुग में जो मनुष्य कर्म करते हैं वह अकर्म हो जाता है। वहाँ रावणराज्य ही नहीं, उनको हेविन कहा जाता है। इस समय हेविन है नहीं। सतयुग में एक ही भारत था और कोई खण्ड नहीं था। हेविनली गॉड फादर कहते हैं तो बाप जरूर हेविन ही रचेंगे। यह सब नेशन वाले जानते हैं कि भारत प्राचीन देश है। पहले-पहले सिर्फ भारत ही था, यह कोई नहीं जानते हैं। अभी तो नहीं है ना। यह है ही 5 हजार वर्ष की बात। कहते भी हैं क्राइस्ट से 3 हजार वर्ष पहले भारत हेविन था। रचयिता जरूर रचना रचेंगे। तमोप्रधान बुद्धि होने कारण इतना भी नहीं समझते। भारत तो सबसे ऊंच खण्ड है। पहली बिरादरी है, मनुष्य सृष्टि की। यह भी ड्रामा बना हुआ है। साहूकार गरीबों को मदद करते हैं, यह भी चला आता है। भक्ति मार्ग में भी साहूकार गरीबों को दान करते हैं। परन्तु यह है ही पतित दुनिया। तो जो, जो कुछ भी दान पुण्य करते हैं, पतित ही करते हैं, जिसको दान करते हैं वह भी पतित हैं। पतित, पतित को दान करेंगे, उनका फल क्या पायेंगे। भल कितना भी दान-पुण्य करते आये हैं, फिर भी गिरते आये हैं। भारत जैसा दानी खण्ड और कोई नहीं होता। इस समय तुम्हारा जो भी तन, मन, धन है, सब इसमें स्वाहा करते हो, इनको कहा जाता है राजस्व अश्वमेध अविनाशी ज्ञान यज्ञ। आत्मा कहती है – यह जो पुराना शरीर है, इनको भी यहाँ स्वाहा करना है क्योंकि तुम जानते हो – सारी दुनिया के मनुष्य-मात्र इसमें स्वाहा होते हैं, इसलिए हम क्यों नहीं खुशी से बाबा पर बलि चढ़ जायें। आत्मा जानती है – हम बाप को याद करते हैं। कहते भी आये हैं, बाबा आप जब आयेंगे तो हम बलिहार जायेंगे क्योंकि अब हमारे बलिहार जाने से आप फिर 21 जन्म के लिए बलिहार जायेंगे। यह सौदागरी है। हम आप पर बलिहार जाते हैं तो आप भी तो 21 बार बलिहार जाते हैं। बाप कहते हैं- जब तक तुम्हारी आत्मा पवित्र नहीं बनी है तब तक हम बलिहारी स्वीकार नहीं करते हैं।

बाप कहते हैं – मामेकम् याद करो तो आत्मा प्योर बन जायेगी। बाप को भूलने से तुम कितने पतित दु:खी हुए हो। मनुष्य दु:खी होते हैं तो फिर शरणागति लेते हैं। अभी तुम 63 जन्म रावण से बहुत दु:खी हुए हो। एक सीता की बात नहीं, सब सीतायें हैं, जो भी मनुष्य मात्र हैं। रामायण में तो कहानी लिख दी है। सीता को रावण ने शोक वाटिका में डाला। वास्तव में बात सारी इस समय की है। सभी रावण अर्थात् 5 विकारों की जेल में हैं इसलिए दु:खी हो पुकारते हैं – हमको इनसे छुड़ाओ। एक की बात नहीं। बाप समझाते हैं सारी दुनिया रावण की जेल में है। रावण राज्य है ना। कहते भी हैं – रामराज्य चाहिए। गांधी ने भी कहा, संन्यासी कभी ऐसे नहीं कहेंगे कि रामराज्य चाहिए। भारतवासी ही कहेंगे। इस समय आदि सनातन देवी-देवता धर्म है नहीं और ब्रान्चेज हैं, सतयुग था। एक ही आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। अभी वह नाम ही बदला हुआ है। अपने धर्म को भूल फिर और-और धर्म में कनवर्ट होते जाते हैं। मुसलमान आये कितने हिन्दुओं को अपने धर्म में कनवर्ट कर लिया। क्रिश्चियन धर्म में भी बहुत कनवर्ट हुए हैं इसलिए भारतवासियों की जनसंख्या कम हो गई है। नहीं तो भारतवासियों की जनसंख्या सबसे जास्ती होनी चाहिए। अनेक धर्मों में कनवर्ट हो गये हैं। बाप कहते हैं- तुम्हारा जो आदि सनातन देवी-देवता धर्म है, वह सबसे ऊंच है। सतोप्रधान थे, अब वही बदलकर फिर तमोप्रधान बने हैं। अब तुम बच्चे समझते हो- ज्ञान सागर, पतित-पावन जिसको बुलाते हैं, वही सम्मुख पढ़ा रहे हैं। वह ज्ञान का सागर, प्रेम का सागर है। क्राइस्ट की ऐसी महिमा नहीं करेंगे। कृष्ण को ज्ञान का सागर, पतित-पावन नहीं कहा जाता है। सागर एक होता है। चारों तरफ आलराउन्ड सागर ही सागर है। दो सागर नहीं होते हैं। यह मनुष्य सृष्टि का नाटक है, इसमें सबका अलग-अलग पार्ट है। बाप कहते हैं मेरा कर्तव्य सबसे अलग है, मैं ज्ञान का सागर हूँ। मुझे ही तुम पुकारते हो हे पतित-पावन, फिर कहते हो लिबरेटर। लिबरेट किससे करते हैं? यह भी कोई नहीं जानते। तुम जानते हो, हम सतयुग-त्रेता में बहुत सुखी थे, उसको स्वर्ग कहा जाता है। अभी तो है ही नर्क इसलिए पुकारते हैं – दु:ख से लिबरेट कर सुखधाम ले चलो। संन्यासी कभी नहीं कहेंगे कि फलाना स्वर्गवासी हुआ, वह फिर कहते हैं पार निर्वाण गया। विलायत में भी कहते हैं लेफ्ट फार हेविनली अबोड। समझते हैं, गॉड फादर पास गये। हेविनली गॉड फादर कहते हैं, बरोबर हेविन था। अब नहीं है। हेल के बाद हेविन चाहिए। गॉड फादर को यहाँ आकर हेविन स्थापन करना है। सूक्ष्मवतन, मूलवतन में कोई हेविन नहीं होता है। जरूर बाप को ही आना पड़ता है।

बाप कहते हैं – मैं आकर प्रकृति का आधार लेता हूँ, मेरा जन्म मनुष्यों मुआफिक नहीं है। मैं गर्भ में नहीं आता हूँ, तुम सभी गर्भ में आते हो। सतयुग में गर्भ महल होता है क्योंकि वहाँ कोई विकर्म होता नहीं जो सजा भोगें इसलिए उसको गर्भ महल कहा जाता है। यहाँ विकर्म करते, जिसकी सजा भोगनी पड़ती है, इसलिये गर्भ जेल कहा जाता है। यहाँ रावण राज्य में मनुष्य पाप करते रहते हैं। यह है ही पाप आत्माओं की दुनिया। वह है पुण्य आत्माओं की दुनिया – स्वर्ग, इसलिए कहते हैं पीपल के पत्ते पर कृष्ण आया। यह कृष्ण की महिमा दिखाते हैं। सतयुग में गर्भ में दु:ख नहीं होता है। बाप कर्म-अकर्म-विकर्म की गति समझाते हैं जिसका फिर शास्त्र गीता बनाया है। परन्तु उसमें शिव भगवानुवाच के बदले कृष्ण का नाम डाल दिया है। अब तुम जानते हो, हम बेहद के बाप से बेहद सुख का वर्सा लेते हैं। अभी भारत रावण से श्रापित है इसलिए दुर्गति हो गई है। यह बड़ा श्राप भी ड्रामा में नूँधा हुआ है। बाप आकर वर देते हैं – आयुश्वान भव, पुत्रवान भव, सम्पत्तिवान भव….. सभी सुख का वर्सा देते हैं। तुमको आकर पढ़ाते हैं, जिस पढ़ाई से तुम देवता बनते हो। यह नई रचना हो रही है। ब्रह्मा द्वारा तुमको बाप अपना बनाते हैं। गाया भी जाता है प्रजापिता ब्रह्मा। तुम उनके बच्चे ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ बने हो। दादे से वर्सा बाप द्वारा लेते हो। आगे भी लिया था। अब फिर बाप आया है। बाप के बच्चे तो फिर बाप के पास जाने चाहिए। परन्तु गाया हुआ है, प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा मनुष्य सृष्टि की स्थापना होती है। तो यहाँ होगी ना। आत्मा के सम्बन्ध में कहेंगे हम भाई-भाई हैं। प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान बनने से तुम भाई-बहिन बनते हो। इस समय तुम सब भाई-बहिन हो, तुमने बाप से वर्सा लिया था। अब भी बाप से वर्सा ले रहे हो। शिवबाबा कहते हैं- मुझे याद करो। तुम आत्मा को शिवबाबा को याद करना है। याद करने से ही तुम पावन बनेंगे और कोई उपाय नहीं है। पावन बनने सिवाए तुम मुक्तिधाम में जा भी नहीं सकते हो। जीवनमुक्तिधाम में पहले-पहले आदि सनातन देवी-देवता धर्म था फिर नम्बरवार और-और धर्म आये। बाप अन्त में आकर सबको दु:खों से मुक्त करते हैं। उनको कहा भी जाता है लिबरेटर। बाप कहते हैं – तुम सिर्फ मुझे याद करो तो तुम्हारे पाप भस्म हो जायेंगे। बुलाते भी हो बाबा आओ – हमको पतित से पावन बनाओ। टीचर तो पढ़ाते हैं, इसमें चरित्र करते हैं क्या? यह भी पढ़ाई है। बाप ज्ञान का सागर ही आकर ज्ञान देते हैं। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों का नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कर्म, अकर्म और विकर्म की गति को जान अब कोई विकर्म नहीं करना है। कर्मक्षेत्र पर कर्म करते हुए विकारों का त्याग करना ही विकर्म से बचना है।

2) ऐसा पावन बनना है जो हमारी बलिहारी बाप स्वीकार कर ले। पावन बनकर पावन दुनिया में जाना है। तन-मन-धन इस यज्ञ में स्वाहा कर सफल करना है।

वरदान:- आलस्य के भिन्न-भिन्न रूपों को समाप्त कर सदा हुल्लास में रहने वाले तीव्र पुरूषार्थी भव
वर्तमान समय माया का वार आलस्य के रूप में भिन्न-भिन्न तरीके से होता है। ये आलस्य भी विशेष विकार है, इसे खत्म करने के लिए सदा हुल्लास में रहो। जब कमाई करने का हुल्लास होता है तो आलस्य खत्म हो जाता है इसलिए कभी भी हुल्लास को कम नहीं करना। सोचेंगे, करेंगे, कर ही लेंगे, हो जायेगा…यह सब आलस्य की निशानी है। ऐसे आलस्य वाले निर्बल संकल्पों को समाप्त कर यही सोचो कि जो करना है, जितना करना है अभी करना है – तब कहेंगे तीव्र पुरुषार्थी।
स्लोगन:- सच्चे सेवाधारी वह हैं जिनका सोचना और कहना समान हो।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 11 MAY 2021 : AAJ KI MURLI

11-05-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – सुख-शान्ति का वरदान एक बाप से ही मिलता है, कोई देहधारी से नहीं, बाबा आये हैं – तुम्हें मुक्ति-जीवनमुक्ति की राह दिखाने”
प्रश्नः- बाप के साथ जाने और सतयुग आदि में आने का पुरुषार्थ क्या है?
उत्तर:- बाप के साथ जाना है तो पूरा पवित्र बनना है। सतयुग आदि में आने के लिए और संग बुद्धियोग तोड़ एक बाप की याद में रहना है। आत्म-अभिमानी जरूर बनना है। एक बाप की मत पर चलेंगे तो ऊंच पद का अधिकार मिल जायेगा।
गीत:- नयन हीन को राह दिखाओ….

ओम् शान्ति। यह गीत किसने गाया? बच्चों ने क्योंकि बाप तो एक ही है, उसको ही रचयिता कहा जाता है। रचना, रचयिता को पुकारती है। बाबा ने समझाया है – भक्ति मार्ग में तो तुमको दो बाप हैं। एक लौकिक, दूसरा है पारलौकिक। सभी आत्माओं का बाप एक ही है। एक बाप होने से सभी आत्मायें अपने को ब्रदर्स कहते हैं। उस बाप को पुकारते हैं ओ गॉड फादर, ओ परमपिता रहम करो, क्षमा करो। भक्तों का रक्षक एक भगवान ही है। पहले-पहले तो यह समझाना चाहिए कि हमको दो बाप हैं। अब पारलौकिक बाप तो सभी का एक है। बाकी लौकिक बाप हर एक का अलग-अलग है। अब लौकिक बाप बड़ा वा पारलौकिक बाप बड़ा? लौकिक बाप को तो कभी भगवान वा परमपिता नहीं कहेंगे। आत्मा का बाप एक ही परमपिता परमात्मा है। आत्मा का नाम कभी बदलता नहीं है। शरीर का नाम बदलता है। आत्मा भिन्न-भिन्न शरीर ले पार्ट बजाती है अर्थात् पुनर्जन्म लेती है। आखिर भी कितने जन्म मिलते हैं। सो बाप ही आकर समझाते हैं। बच्चे तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो। बाप आते ही भारत में हैं, उनका नाम शिव है। समझते भी हैं शिव परमात्मा है। शिव जयन्ती वा शिवरात्रि भी मनाते हैं। वह निराकार है। जैसे आत्मा भी निराकार है, निराकार से साकार में आते हैं पार्ट बजाने। अब निराकार शिव तो शरीर बिगर पार्ट बजा न सके। मनुष्य इन बातों को कुछ भी नहीं समझते हैं, नयन हीन हैं। यह शरीर के दो नेत्र तो सबको हैं। तीसरा ज्ञान का नेत्र आत्मा को नहीं है, जिसको दिव्य-चक्षु भी कहते हैं। आत्मा अपने बाप को भूल गई है, इसलिए पुकारते हैं नयन हीन को राह बताओ। कहाँ की राह? शान्तिधाम और सुखधाम की। सर्व का सद्गति दाता, सतगुरू एक ही है। मनुष्य, मनुष्य का गुरू बन सद्गति दे नहीं सकता। न खुद सद्गति पाते हैं, न औरों को देते हैं। एक बाप ही सर्व को सद्गति देते हैं। उस अल्फ बाप को ही याद करना है। बाप समझाते हैं – कोई भी मनुष्य-मात्र मुक्ति-जीवनमुक्ति, शान्ति और सुख सदाकाल के लिए दे नहीं सकते। सुख-शान्ति का वरदान तो एक बाप ही दे सकते हैं। मनुष्य, मनुष्य को नहीं दे सकते। भारतवासी सतोप्रधान थे तो सतयुगी स्वर्गवासी थे। आत्मा पवित्र थी। भारत को स्वर्ग कहा जाता है जबकि आत्मायें पवित्र, सतोप्रधान थीं।

तुम जानते हो, बरोबर आज से 5 हजार वर्ष पहले भारत स्वर्ग, सतोप्रधान था। इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। अभी कलियुग का भी अन्त है, इसको नर्क कहा जाता है। यही भारत स्वर्ग था तो बहुत धनवान था। हीरे-जवाहरों के महल थे। बाप बच्चों को याद दिलाते हैं। सतयुग आदि में इन लक्ष्मी-नारायण की राजधानी थी। उसको स्वर्ग बैकुण्ठ कहा जाता है। अभी तो स्वर्ग है नहीं, यह बाप समझाते हैं। बाबा भारत में ही आते हैं। निराकार शिव की जयन्ती भी मनाते हैं, परन्तु वह क्या करते हैं, यह कोई नहीं जानते। हम आत्माओं का बाप शिव है, उनकी हम जयन्ती मनाते हैं। बाप की बायोग्राफी को भी नहीं जानते। गाया भी जाता है – दु:ख में सिमरण सब करें। पुकारते हैं ओ गॉड फादर रहम करो। हम बहुत दु:खी हैं क्योंकि यह रावण राज्य है। वर्ष-वर्ष रावण को जलाते हैं ना। परन्तु यह किसको पता नहीं कि 10 शीश वाला रावण क्या चीज़ है। हम उनको जलाते क्यों हैं, यह कौन सा दुश्मन है जो उनकी एफीज़ी बनाए जलाते हैं। भारतवासी बिल्कुल नहीं जानते क्योंकि ज्ञान का तीसरा नेत्र नहीं है तब तो रामराज्य माँगते हैं। 5 विकार स्त्री में, 5 विकार पुरूष में हैं इसलिए इनको रावण सम्प्रदाय कहा जाता है। यह रावण 5 विकार ही बड़े से बड़ा दुश्मन है, जिसका एफीजी बनाए जलाते हैं। भारतवासियों को यह पता नहीं पड़ता कि रावण है कौन, जिसको जलाते हैं। यह रावण राज्य कब से शुरू हुआ, यह भी किसको पता नहीं हैं। बाप समझाते हैं – रामराज्य – सतयुग, त्रेता। रावण राज्य – द्वापर, कलियुग। सतयुग में इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था, इन्हों को यह राज्य कहाँ से, कैसे मिला, यह कोई नहीं जानते। यह समझने की बातें है। इसमें अटेन्शन देना पड़ता है। मोस्ट बिलवेड बाप है तब तो उनको भक्ति मार्ग में भी पुकारते हैं। भारत में जब इन्हों का (लक्ष्मी-नारायण का) राज्य था तो दु:ख का नाम नहीं था। अभी दु:खधाम है, कितने अनेक धर्म हैं। सतयुग में एक धर्म था, इतनी सब आत्मायें कहाँ चली जायेंगी, किसको पता नहीं है क्योंकि नयनहीन हैं। शास्त्रों से ज्ञान का तीसरा नेत्र किसको नहीं मिलता है। ज्ञान नेत्र ज्ञान सागर परमपिता परमात्मा ही देते हैं। आत्मा को तीसरा नेत्र मिलता है। आत्मा भूल गई कि हमने कितने जन्म लिए हैं। सतयुग में जो देवी-देवताओं का राज्य था, वह कहाँ गया? गाते भी हैं मनुष्य 84 जन्म लेते हैं। 84 का चक्र कहते हैं। परन्तु कौन सी आत्मा 84 जन्म लेती है? जो पहले भारत में आते हैं वह थे देवी-देवता। फिर 84 जन्म भोग अन्त में पतित बन जाते हैं। गाते भी हैं – हे पतित-पावन, तो सिद्ध करते हैं हम पतित हैं इसलिए पुकारते हैं, हे पतित-पावन हमें पावन बनाने आओ। जो खुद ही पतित हैं वह फिर औरों को पावन कैसे बनायेंगे। बाप समझाते हैं आधाकल्प भक्ति मार्ग में रावण राज्य, 5 विकार होने कारण भारत ने इतना दु:ख को पाया है। 84 जन्म तो लेते ही हैं। उनका भी हिसाब समझाना चाहिए। पहले-पहले सतयुग में हैं सतोप्रधान, फिर त्रेता में हैं सतो….आत्मा में खाद पड़ती है। बाप आते ही भारत में हैं। शिव जयन्ती है ना। और सभी आत्मायें तो गर्भ में जन्म लेती हैं। बाप कहते हैं – मैं साधारण बूढ़े तन में प्रवेश करता हूँ, जिनका यह बहुत जन्मों के अन्त का जन्म है। यह समझानी कोई एक को नहीं दी जाती। यह गीता पाठशाला है। मनुष्य को देवता बनाने के लिए यह राजयोग सिखाया जाता है। तुम यहाँ आये हो स्वर्ग की बादशाही प्राप्त करने जो बाप ही दे सकते हैं। गीता पढ़ने से कोई राजा बनते नहीं हैं और ही रंक बनते जाते हैं। बाप गीता का ज्ञान सुनाए राजा बनाते हैं, औरों द्वारा गीता सुनने से रंक बन गये हैं। भारत में जब इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था तो प्योरिटी-पीस-प्रासपर्टी थी, पवित्र गृहस्थ आश्रम था। वहाँ हिंसा का नाम नहीं था फिर द्वापर से लेकर हिंसा शुरू हुई है। काम कटारी चलाते-चलाते तुम्हारी यह हालत आकर हुई है। सतयुग में 100 परसेन्ट सालवेन्ट थे, सतोप्रधान थे। यह राज़ कोई भी मनुष्य अथवा साधू-सन्त आदि नहीं जानते। बाप जो ज्ञान का सागर, पतित-पावन है वही आकर सतोप्रधान बनने की युक्ति बताते हैं। रावण की मत पर मनुष्यों का देखो क्या हाल हो गया है। राजे लोग भी, वह जो पवित्र राजायें होकर गये हैं उन्हों के चरणों में जाकर पड़ते हैं और महिमा गाते हैं – आप सर्वगुण सम्पन्न, हम नींच पापी हैं। हमारे में कोई गुण नहीं हैं फिर कहते हैं, आपेही तरस परोई। हमको आकर मन्दिर लायक बनाओ। किसकी भी समझ में नहीं आता कि बाप कैसे आकर फिर से देवी-देवता धर्म की स्थापना कराते हैं। अब तुम समझते हो हम सो देवी-देवता धर्म के थे। हम सो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बनें, इतने जन्म लिए अब 84 जन्म पूरे हुए हैं। फिर दुनिया का चक्र फिरना चाहिए इसलिए फिर तुमको पावन यहाँ बनना है। पतित तो सुखधाम, शान्तिधाम में नहीं जा सकते। बाप समझाते हैं तुम जो सतोप्रधान थे वह तमोप्रधान बने हो। गोल्डन एज़ से फिर आइरन एज़ में आये हो फिर गोल्डन एज़ेड बनना है तब मुक्तिधाम, सुखधाम में जा सकेंगे। भारत सुखधाम था। अब दु:खधाम है। गीत में भी सुना – हम नयन हीन को राह बताओ…. हम अपने शान्तिधाम में कैसे जायें। वो लोग तो कह देते हैं – परमात्मा सर्वव्यापी है, फलाना अवतार है, परशुराम अवतार है। अब बाप परशुराम बन किसको मारते होंगे क्या? हो नहीं सकता। बाप समझाते हैं तुमने इस चक्र में कैसे 84 जन्म लिए हैं। अब मुझ अल्फ़ को याद करो। हे आत्मायें देही-अभिमानी बनो। देह-अभिमानी बन तुम बिल्कुल ही दु:खी कंगाल, नर्कवासी बन पड़े हो। अगर स्वर्गवासी बनना है तो आत्म-अभिमानी जरूर बनना है। आत्मा ही एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। अब 84 जन्म पूरे हुए हैं फिर सतयुग आदि में जाना है। अब मुझे याद करो और संग बुद्धियोग तोड़ो। रहो भल गृहस्थ व्यवहार में, अपने को आत्मा निश्चय करो। आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। अब देही-अभिमानी बनना है, मुझे याद करो तो खाद सब जल जायेगी। तुम पवित्र बन जायेंगे फिर मैं सब बच्चों को ले जाऊंगा। अगर मेरी मत पर नहीं चलेंगे तो इतना ऊंच पद नहीं पायेंगे। इन लक्ष्मी-नारायण का ऊंच पद है। जब इन्हों का राज्य था तो और कोई धर्म नहीं था। द्वापर से फिर और धर्म आते हैं। सतयुग में मनुष्य भी थोड़े होते हैं। अब तो बहुत धर्म होने के कारण कितने दु:खी हो गये हैं। वही देवता धर्म वाले अब फिर पतित होने से अपने को देवता कहते नहीं हैं। हिन्दू नाम रख दिया है। हिन्दू तो कोई धर्म नहीं है। बाप समझाते हैं रावण ने तुमको ऐसा बना दिया है। तुम जब लायक देवी-देवता थे तब सारे विश्व पर राज्य था, सब सुखी थे। अब दु:खी बन पड़े हैं। भारत हेविन था वो अब हेल बन गया है फिर हेल को हेविन बाप बिगर कोई बना न सके। देवताओं को सम्पूर्ण निर्विकारी कहा जाता है। यहाँ के मनुष्य तो सम्पूर्ण विकारी हैं, इनको कहा जाता है पतित। भारत शिवालय था, शिवबाबा की स्थापना की हुई थी। बाप स्वर्ग बनाते हैं फिर रावण नर्क बनाते हैं। रावण श्राप देते हैं, बाप 21 जन्म के लिए वर्सा देते हैं। अब तुम हर एक बाप को ही याद करो, कोई भी देहधारी को नहीं। देहधारी को भगवान नहीं कहा जाता। भगवान तो एक ही है। बाप तो बेहद का वर्सा देते हैं फिर रावण श्रापित बना देते हैं। इस समय भारत श्रापित है, बहुत दु:खी है। अब इस रावण पर जीत पानी है। गाया भी जाता है दे दान तो छूटे ग्रहण। वो ग्रहण जो लगता है वह तो पृथ्वी का परछाया है। अब बाप कहते हैं तुम्हारे ऊपर 5 विकारों रूपी रावण का ग्रहण है। यह 5 विकार दान में दे देने हैं। पहला तो दान दो कि हम कभी विकार में नहीं जायेंगे। यह काम-कटारी ही मनुष्य को पतित बनाती है। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप जो नॉलेज देते हैं उसे पूरा अटेन्शन देकर पढ़ना है। ज्ञान के तीसरे नेत्र से अपने 84 जन्मों को जान अब अन्तिम जन्म में पावन बनना है।

2) रावण के श्राप से बचने के लिए एक बाप की याद में रहना है। 5 विकारों का दान दे देना है। एक बाप की मत पर चलना है।

वरदान:- अपनी स्मृति, वृत्ति और दृष्टि को अलौकिक बनाने वाले सर्व आकर्षणों से मुक्त भव
कहा जाता है -“जैसे संकल्प वैसी सृष्टि” जो नई सृष्टि रचने के निमित्त विशेष आत्मायें हैं उनका एक-एक संकल्प श्रेष्ठ अर्थात् अलौकिक होना चाहिए। जब स्मृति-वृत्ति और दृष्टि सब अलौकिक हो जाती है तो इस लोक का कोई भी व्यक्ति वा कोई भी वस्तु अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकती। अगर आकर्षित करती है तो जरूर अलौकिकता में कमी है। अलौकिक आत्मायें सर्व आकर्षणों से मुक्त होंगी।
स्लोगन:- दिल में परमात्म प्यार वा शक्तियां समाई हुई हों तो मन में उलझन आ नहीं सकती।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 10 MAY 2021 : AAJ KI MURLI

10-05-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – सदा इसी खुशी में रहो कि स्वयं भगवान हमें टीचर बनकर पढ़ाते हैं, हम उनसे राजयोग सीख रहे हैं, प्रजा योग नहीं”
प्रश्नः- इस पढ़ाई की खूबी कौन सी है? तुम्हें कब तक पुरुषार्थ करना है?
उत्तर:- यह पढ़ाई जो बहुत समय से करते आ रहे हैं, उनसे नये बच्चे तीखे चले जाते हैं। यह भी खूबी है जो 3 मास के तीखी बुद्धि वाले (तीव्र पुरुषार्थी) नये बच्चे पुरानों से भी आगे जा सकते हैं। तुम्हें पुरुषार्थ तब तक करना है जब तक पूरे पास न हो, कर्मातीत अवस्था न हो, सब हिसाब-किताब छूट न जायें।

ओम् शान्ति। बच्चे कहाँ बैठे हैं? बेहद के बाप के स्कूल में। बहुत ही ऊंचा नशा होना चाहिए बच्चों को। किसके बच्चों को? बेहद के बाप के बच्चों को अथवा रूहानी बच्चों को। बाप रूहों को ही पढ़ाते हैं। गुजराती वा मराठी को नहीं पढ़ाते हैं। वह तो नाम-रूप हो गया। बाप पढ़ाते ही हैं रूहों को। तुम बच्चे भी समझते हो हमारा बेहद का बाप वही है, जिसको भगवान कहते हैं। भगवानुवाच भी है जरूर परन्तु भगवान किसको कहा जाता है – यह समझते नहीं हैं। कहते भी हैं शिव परमात्मा नम:। परमात्मा तो एक ही है। वह है ऊंच ते ऊंच निराकार। तुमको कृष्ण भगवान नहीं पढ़ाते। न पढ़ाया था। तुम जानते हो हम आत्माओं का बाबा हमको पढ़ा रहे हैं। भगवान तो निराकार ही ठहरा। शिव के मन्दिर मे जाते हैं, उनकी पूजा भी करते हैं तो जरूर कोई चीज़ है। नाम-रूप से न्यारी कोई चीज़ थोड़ेही होती है। यह भी तुम अब समझते हो। सारी दुनिया में कोई भी नहीं जानते हैं। तुम भी अभी जानने लग पड़े हो। बहुत समय से जानते आये हो। ऐसे भी नहीं बहुत समय से आने वालों से नये तीखे नहीं जा सकते हैं। यह भी खूबी है। 3 मास के नये बच्चे भी बहुत तीखे हो सकते हैं। कहते हैं, बाबा इस आत्मा की बुद्धि बहुत तीखी है। नये जब सुनते हैं तो बड़े गद-गद होते हैं। हैं तो सब गॉडली स्टूडेन्ट। निराकार बाप ज्ञान का सागर पढ़ा रहे हैं। भगवानुवाच भी गाया हुआ है। परन्तु कब? वह भूल गये हैं।

अभी तुम बच्चे जानते हो – ऐसे भी कोई होते हैं, जिनका बाप टीचर होता है। परन्तु वह सिर्फ एक ही सब्जेक्ट पढ़ायेंगे, दूसरी सब्जेक्ट लिए दूसरा टीचर पढ़ायेंगे। यहाँ तो बाप सब बच्चों का टीचर है। यह वन्डरफुल बात है। ढेर बच्चे हैं, जिनको निश्चय है शिवबाबा हमको पढ़ाते हैं। श्रीकृष्ण को बाबा कह नहीं सकते। कृष्ण को ऐसे टीचर, गुरू भी नहीं समझते। यह तो प्रैक्टिकल पढ़ा रहे हैं। तुम भिन्न-भिन्न प्रकार के स्टूडेन्ट्स बैठे हो। बाबा टीचर पढ़ाते हैं, जब तक तुम पास हो जाओ। कर्मातीत अवस्था को पा लो तब तक पुरूषार्थ करना है। कर्मो के हिसाब-किताब से छूटना है। तुम्हें अन्दर में बड़ी खुशी होनी चाहिए – बाबा हमको ऐसी दुनिया में ले जाते हैं और कोई ऐसे स्कूल होते नहीं जो बच्चे बैठे हों और समझें परमधाम निवासी बाबा आकर हमें पढ़ायेंगे। अभी तुम यहाँ बैठते हो तो समझते हो हमारा बेहद का बाबा हमको पढ़ाने के लिए आते हैं। तो अन्दर में बड़ी खुशी होनी चाहिए। बाबा हमको राजयोग सिखा रहे हैं। यह प्रजा योग नहीं, यह है राजयोग। इस याद से ही बच्चों को खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। कितना बड़ा इम्तहान है और तुम बैठे कितने साधारण हो। जैसे मुसलमान लोग बच्चों को दरी पर बैठ पढ़ाते हैं। तुम इस निश्चय से यहाँ आते हो। अब बाप के सम्मुख बैठे हो। बाबा भी कहते हैं मैं ज्ञान का सागर हूँ। मैं कल्प-कल्प आकर राजयोग सिखाता हूँ। कृष्ण के 84 जन्म कहो वा ब्रह्मा के 84 जन्म कहो, बात एक ही है। ब्रह्मा सो श्रीकृष्ण है। यह बुद्धि में अच्छी रीति धारण करना है। बाप के साथ बड़ा लव रहना चाहिए। हम आत्मायें उस बाप के बच्चे हैं, परमपिता परमात्मा आकर हमको पढ़ाते हैं। कृष्ण तो हो न सके। ऐसे थोड़ेही कृष्ण ने पढ़ाया होगा। ताज आदि उतार कर आया होगा। अब पढ़ाने वाला तो बुजुर्ग चाहिए। बाप कहते हैं मैंने बुजुर्ग तन लिया है, यह फिक्स है। शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा ही पढ़ाते हैं। कहते भी हैं बरोबर परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा स्थापना करते हैं। अब ब्रह्मा कहाँ से आया, यह समझते नहीं हैं। बाप बैठ घड़ी-घड़ी बच्चों को सुजाग करते हैं। माया फिर सुला देती है। अब तुम सम्मुख बैठे हो, समझते हो कि मैं तुम्हारा रूहानी बाप हूँ। मुझे जानते हो ना। गाते भी हैं परमपिता परमात्मा ज्ञान के सागर हैं, पतित-पावन, दु:ख हर्ता, सुख कर्ता हैं। कृष्ण के लिए यह कभी नहीं कहेंगे। सबको इकट्ठा तो पढ़ा नहीं सकते। मधुबन में मुरली चलती है, वह फिर सब सेन्टर्स पर जाती है। तुम अभी सम्मुख हो। जानते हो कल्प पहले भी बाबा ने ऐसे पढ़ाया था। यही समय था जो पास्ट हो गया। वह फिर अभी प्रेजेन्ट होना है। भक्तिमार्ग की बातें तो अब छोड़ देनी हैं। अभी तुम्हारी ज्ञान से प्रीत, पढ़ाने वाले से प्रीत है। कोई-कोई जब टीचर से पढ़ते हैं तो उनको सौगात देते हैं। यह बाबा तो खुद ही सौगात देते हैं। यहाँ आकर साकार में बच्चों को देखते हैं, यह हमारे बच्चे हैं। यह भी बच्चों को ज्ञान है – सब 84 जन्म नहीं लेते हैं। कोई का एक जन्म तो भी उसमें सुख-दु:ख पास करेंगे। अभी तुम इन सब बातों को समझ गये हो। यह मनुष्य सृष्टि का सिजरा है। पहले नम्बर में हैं ब्रह्मा-सरस्वती, आदि देव, आदि देवी। पीछे फिर अनेक धर्म होते जाते हैं। वह है सर्व आत्माओं का बीज। बाकी सब हैं पत्ते। प्रजापिता ब्रह्मा सबका बाप है। इस समय प्रजापिता हाज़िर है। यह बैठ शूद्र से कनवर्ट कर ब्राह्मण बनाते हैं। ऐसे कोई कर न सके। बाप ही तुमको शूद्र से ब्राह्मण बनाए फिर देवता बनाने लिए पढ़ा रहे हैं। यह है ही सहज राजयोग की पढ़ाई। राजा जनक ने भी सेकण्ड में जीवनमुक्ति को पाया अर्थात् स्वर्गवासी बन गया। मनुष्य गाते तो रहते हैं परन्तु फिर भी समझा नहीं सकते। अब बाप कहते हैं बच्चे देही-अभिमानी बनो। तुम अशरीरी आये थे, फिर शरीर लेकर पार्ट बजाया। बरोबर 84 जन्म लिए हैं। बाप जो ट्रूथ है, वह सत्य ही बतायेंगे। राजधानी हुई ना। राजयोग एक थोड़ेही सीखेंगे। तुम सब अभी कांटों से फूल बन रहे हो। कांटा और फूल किसको कहते हैं – यह भी अब तुम समझ रहे हो। यह है ही छी-छी कांटों की दुनिया। हम 84 जन्मों का चक्र लगाए नर्कवासी हुए हैं। फिर से वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट करेंगे। हम फिर से जरूर स्वर्गवासी बनेंगे। कल्प-कल्प हम बनते हैं। घड़ी-घड़ी यह याद करना है और नॉलेज समझानी है। यह लक्ष्मी-नारायण सूर्यवंशी थे। क्राइस्ट आया उनके पहले बहुत थोड़े थे, राजधानी नहीं थी। अब बाप आकर सतयुगी राजधानी स्थापन करते हैं। स्थापना होती ही है संगम पर। अभी तुम्हारी बुद्धि में है कि यह है – सच्चा-सच्चा कुम्भ का मेला। आत्मायें अनेक हैं, परमात्मा एक है। परमात्मा बाप बच्चों के पास आते हैं पावन बनाने। इसको ही संगमयुग का, कुम्भ का मेला कहा जाता है। अभी तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। बाप आकर स्वर्गवासी बनाते हैं फिर नर्क पुरानी दुनिया का विनाश जरूर होना चाहिए। कल्प-कल्प विनाश होता ही है। नई सो पुरानी, पुरानी सो नई होती है। यह तो जरूर होगा। नई को स्वर्ग, पुरानी को नर्क कहा जाता है। अभी तो कितनी मनुष्यों की वृद्धि होती जाती है। अनाज नहीं मिलता है तो समझते हैं हम बहुत अनाज पैदा करेंगे, परन्तु बच्चे कितने पैदा होते रहते हैं। अनाज कहाँ से लायेंगे।

अभी तुम बच्चों को यह खातिरी है कि ये सारी पुरानी दुनिया खत्म होनी है। मनुष्यों को यह ज्ञान अच्छा भी लगता है परन्तु बुद्धि में कुछ भी बैठता नहीं है। तुम्हारी बुद्धि में है नर्क के बाद स्वर्ग आयेगा। सतयुग के देवी-देवता होकर गये हैं। यह लक्ष्मी-नारायण भारत के मालिक थे, चित्र हैं। सतयुग में है आदि सनातन देवी-देवता धर्म। अभी अपने को देवता धर्म के कहलाते नहीं हैं, उसके बदले हिन्दू कह देते हैं। बच्चे अच्छी तरह जानते हैं कि हम यह (देवी-देवता) बन रहे हैं। बाबा हमको पढ़ा रहे हैं, इन आरगन्स द्वारा। बाबा कहते हैं – नहीं तो मैं तुमको पढ़ाऊं कैसे। आत्माओं को ही पढ़ाते हैं क्योंकि आत्मा में ही खाद पड़ती है। अभी तुमको सच्चा सोना बनना है, गोल्डन एज़ से सिलवर एज में आये अर्थात् चाँदी की खाद पड़ने से तुम चन्द्रवंशी बन जाते हो। सतयुग में गोल्डन एज में थे, वही फिर नीचे उतरते हैं फिर वृद्धि भी हो जाती है। अभी तुम्हारी बुद्धि में है – हम गोल्डन, सिलवर, कॉपर, आइरन में 84 का चक्र लगाकर आये हैं। अनेक बार यह पार्ट बजाया है, इस पार्ट से कोई भी छूट नहीं सकता है। वो कहते हैं, हमको मोक्ष चाहिए लेकिन वास्तव में तंग तो तुमको होना चाहिए। 84 का चक्र तो तुमने लगाया है। मनुष्य तो समझते हैं आना और जाना होता ही रहता है, इनसे क्यों न हम छूटें। परन्तु यह तो हो न सके। गुरू लोग भी कह देते हैं – तुम मोक्ष को पायेंगे। ब्रह्म को याद करो तो ब्रह्म में लीन हो जायेंगे। अनेक मत-मतान्तर भारत में ही हैं और कोई खण्ड में इतने नहीं हैं। ढेर की ढेर मत हैं, एक न मिले दूसरे से। रिद्धि-सिद्धि भी बहुत सीखते हैं। कोई केसर निकालते, कोई क्या… इसमें मनुष्य बहुत खुश होते हैं। यह तो है स्प्रीचुअल नॉलेज। तुम जानते हो – स्प्रीचुअल फादर है, हम आत्माओं का बाप। रूहानी बाबा रूहों से बात करते हैं। सत्य नारायण की कथा आकर सुनाते हैं वा अमरकथा सुनाते हैं, जिससे अमरलोक का मालिक बनाते हैं, नर से नारायण बनाते हैं। फिर कौड़ी मिसल बन पड़ते हैं। अभी तुमको हीरे जैसा अनमोल जन्म मिला है फिर कौड़ियों पिछाड़ी क्यों गँवाते हो। यह दुनिया ही बाकी कितने वर्ष होगी! कितने लड़ाई-झगड़े होते रहते हैं, सब खत्म हो जायेंगे। मौत सामने खड़ा है फिर इतने लाख, करोड़ कौन बैठ खायेंगे। क्यों नहीं इनको सफल करना चाहिए! यह रूहानी कॉलेज खोलने से मनुष्य एवरहेल्दी, वेल्दी, हैपी बन जाते हैं। सो भी यह कम्बाइन्ड है – हॉस्पिटल और युनिवर्सिटी। हेल्थ, वेल्थ, हैपीनेस तो है ही। बरोबर योग से आयु भी बड़ी मिलती है। कितने तुम हेल्दी बनते हो, फिर कारून का खजाना भी मिलता है। अल्लाह अवलदीन का नाटक दिखाते हैं ना। तुम जानते हो अल्लाह जो आदि सनातन देवी-देवता धर्म स्थापन करते हैं, उसमें बहुत सुख है। नाम ही है स्वर्ग। तुम शान्तिधाम के रहवासी थे फिर तुम पहले-पहले सुखधाम में आये फिर 84 जन्म लेते नीचे गिरते आये हो। कल्प-कल्प हम तुम बच्चों को ऐसे बैठ समझाते हैं। तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो, मैं तुमको बताता हूँ। तुमने 84 जन्म लिए हैं, यह चोला पतित है। आत्मा भी तमोप्रधान हो गई है। बाबा राइट कहते हैं। बाबा कभी रांग कहेंगे नहीं। वह है ही ट्रूथ। सतयुग है ही वाइसलेस वर्ल्ड, राइटियस दुनिया। फिर रावण अनराइटियस बनाते हैं। यह है ही झूठ खण्ड। गाते भी हैं झूठी माया, झूठी काया… कौन सा संसार? यह सारा पुराना संसार झूठा है। सतयुग में सच्चा संसार था। दुनिया एक ही है, दो दुनिया नहीं हैं। नई दुनिया से फिर पुरानी होती है। नये मकान, पुराने मकान में फ़र्क तो होता है। नया बनकर तैयार होता है तो समझते हैं नये में बैठेंगे। यहाँ भी बच्चों के लिए नया मकान बनाते हैं, बहुत बच्चे होते जायेंगे। तुम बच्चों को तो बहुत खुशी होनी चाहिए। बाप कहते हैं मुझ ज्ञान सागर के बच्चे सब काम-चिता पर बैठ बिचारे एकदम जल गये हैं। अब फिर उनको ज्ञान चिता पर बिठाते हैं। ज्ञान-चिता पर बिठाए स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। काम-चिता पर बैठने से बिल्कुल ही काले बन गये हैं। कृष्ण को श्याम-सुन्दर नाम दिया है। परन्तु अर्थ कोई समझ नहीं सकते। अब तुम क्या से क्या बनते हो! बाप कौड़ी से हीरे मिसल बनाते हैं तो फिर इतना अटेन्शन देना चाहिए। बाप को याद करना चाहिए। याद से ही तुम स्वर्ग के मालिक बनेंगे। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस हीरे तुल्य अनमोल जीवन को कौड़ियों के पीछे नहीं गँवाना है। मौत सामने खड़ा है इसलिए अपना सब कुछ रूहानी सेवा में सफल करना है।

2) पढ़ाई और पढ़ाने वाले से सच्ची प्रीत रखनी है। भगवान हमको पढ़ाने आते हैं, इस खुशी में रहना है।

वरदान:- अधिकारीपन की स्मृति द्वारा सर्व शक्तियों का अनुभव करने वाले प्राप्ति स्वरूप भव
यदि बुद्धि का संबंध सदा एक बाप से लगा हुआ रहे तो सर्व शक्तियों का वर्सा अधिकार के रूप में प्राप्त होता है। जो अधिकारी समझकर हर कर्म करते हैं उन्हें कहने वा संकल्प में भी मांगने की आवश्यकता नहीं रहती। यह अधिकारी पन की स्मृति ही सर्व शक्तियों के प्राप्ति का अनुभव कराती है। तो नशा रहे कि सर्व शक्तियां हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार हैं। अधिकारी बन करके चलो तो अधीनता समाप्त हो जायेगी।
स्लोगन:- स्वयं के साथ-साथ प्रकृति को भी पावन बनाना है तो सम्पूर्ण लगाव मुक्त बनो।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 9 MAY 2021 : AAJ KI MURLI

09-05-21
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
”अव्यक्त-बापदादा”
रिवाइज: 27-12-87 मधुबन

निश्चय बुद्धि विजयी रत्नों की निशानियाँ

आज बापदादा अपने चारों ओर के निश्चयबुद्धि विजयी बच्चों को देख रहे हैं। हर एक बच्चे के निश्चय की निशानियाँ देख रहे हैं। निश्चय की विशेष निशानियाँ – (1) जैसा निश्चय वैसा कर्म, वाणी में हर समय चेहरे पर रूहानी नशा दिखाई देगा। (2) हर कर्म, संकल्प में विजय सहज प्रत्यक्षफल के रूप में अनुभव होगी। मेहनत के रूप में नहीं, लेकिन प्रत्यक्षफल वा अधिकार के रूप में विजय अनुभव होगी। (3) अपने श्रेष्ठ भाग्य, श्रेष्ठ जीवन वा बाप और परिवार के सम्बन्ध-सम्पर्क द्वारा एक परसेन्ट भी संशय संकल्पमात्र भी नहीं होगा। (4) क्वेश्चन मार्क समाप्त, हर बात में बिन्दु बन बिन्दु लगाने वाले होंगे। (5) निश्चयबुद्धि हर समय अपने को बेफिकर बादशाह सहज स्वत: अनुभव करेंगे अर्थात् बार-बार स्मृति लाने की मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। मैं बादशाह हूँ, यह कहने की मेहनत नहीं करनी पड़ेगी लेकिन सदा स्थिति के श्रेष्ठ आसन वा सिंहासन पर स्थित हैं ही। जैसे लौकिक जीवन में कोई भी परिस्थिति प्रमाण स्थिति बनती है। चाहे दु:ख की, चाहे सुख की, उस स्थिति की अनुभूति में स्वत: ही रहते हैं, बार-बार मेहनत नहीं करते – मैं सुखी हूँ वा मैं दु:खी हूँ। बेफिकर बादशाह की स्थिति का अनुभव स्वत: सहज होता है। अज्ञानी जीवन में परिस्थितियों प्रमाण स्थिति बनती है लेकिन शक्तिशाली अलौकिक ब्राह्मण जीवन में परिस्थिति प्रमाण स्थिति नहीं बनती लेकिन बेफिकर बादशाह की स्थिति वा श्रेष्ठ स्थिति बापदादा द्वारा प्राप्त हुई नॉलेज की लाइट-माइट द्वारा, याद की शक्ति द्वारा जिसको कहेंगे ज्ञान और योग की शक्तियों का वर्सा बाप द्वारा मिलता है। तो ब्राह्मण जीवन में बाप के वर्से द्वारा वा सतगुरू के वरदान द्वारा वा भाग्यविधाता द्वारा प्राप्त हुए श्रेष्ठ भाग्य द्वारा स्थिति प्राप्त होती है। अगर परिस्थिति के आधार पर स्थिति है तो शक्तिशाली कौन हुआ? परिस्थिति पॉवरफुल हो जायेगी ना। और परिस्थिति के आधार पर स्थिति बनाने वाला कभी भी अचल, अडोल नहीं रह सकता। जैसे अज्ञानी जीवन में अभी-अभी देखो बहुत खुशी में नाच रहे हैं और अभी-अभी उल्टे सोये हुए हैं। तो अलौकिक जीवन में ऐसी हलचल वाली स्थिति नहीं होती। परिस्थिति के आधार पर नहीं लेकिन अपने वर्से और वरदान के आधार पर वा अपनी श्रेष्ठ स्थिति के आधार पर परिस्थिति को परिवर्तन करने वाला होगा। तो निश्चय बुद्धि इस कारण सदा बेफिकर बादशाह है क्योंकि फिकर होता है कोई अप्राप्ति वा कमी होने के कारण। अगर सर्व प्राप्तिस्वरूप है, मास्टर सर्वशक्तिवान है तो फिकर किस बात का रहा?

(6) निश्चयबुद्धि अर्थात् सदा बाप पर बलिहार जाने वाले। बलिहार अर्थात् सर्वन्श समर्पित। सर्व वंश सहित समर्पित। चाहे देह भान में लाने वाले विकारों का वंश, चाहे देह के सम्बन्ध का वंश, चाहे देह के विनाशी पदार्थों की इच्छाओं का वंश। सर्व वंश में यह सब आ जाता है। सर्वन्श समर्पित वा सर्वन्श त्यागी एक ही बात है। समर्पित होना इसको नहीं कहा जाता कि मधुबन में बैठ गये वा सेवाकेन्द्रों पर बैठ गये। यह भी एक सीढ़ी है जो सेवा अर्थ अपने को अर्पण करते हैं लेकिन ‘सर्वन्श अर्पित’ – यह सीढ़ी की मंजिल है। एक सीढ़ी चढ़ गये लेकिन मंजिल पर पहुँचने वाले निश्चय बुद्धि की निशानी है – तीनों ही वंश सहित अर्पित। तीनों ही बातें स्पष्ट जान गये ना। वंश तब समाप्त होता है जब स्वप्न वा संकल्प में भी अंश मात्र नहीं। अगर अंश है तो वंश पैदा हो ही जायेगा इसलिए सर्वन्श त्यागी की परिभाषा अति गुह्य है। यह भी कभी सुनायेंगे।

(7) निश्चयबुद्धि सदा बेफिकर, निश्चिन्त होगा। हर बात में विजय प्राप्त होने के नशे में निश्चित अनुभव करेगा। तो निश्चय, निश्चिन्त और निश्चित – यह हर समय अनुभव करायेगा।

(8) वह सदा स्वयं भी नशे में रहेंगे और उनके नशे को देख दूसरों को भी यह रूहानी नशा अनुभव होगा। औरों को भी रूहानी नशे में बाप की मदद से स्वयं की स्थिति से अनुभव करायेगा।

निश्चयबुद्धि की वा रूहानी नशे में रहने वाले के जीवन की विशेषतायें क्या होंगी? पहली बात – जितना ही श्रेष्ठ नशा उतना ही निमित्त भाव हर जीवन के चरित्र में होगा। निमित्त भाव की विशेषता के कारण निर्माण बुद्धि। बुद्धि पर ध्यान देना – जितनी निर्मान बुद्धि होगी उतना निर्माण करते रहेंगे, नव निर्माण कहते हो ना। तो नव निर्माण करने वाली बुद्धि होगी। तो निर्मान भी होंगे, नव-निर्मान भी करेंगे। जहाँ यह विशेषतायें हैं उसको ही कहा जाता है – निश्चयबुद्धि विजयी। निमित्त, निर्मान और निर्माण। निश्चयबुद्धि की भाषा क्या होगी? निश्चयबुद्धि की भाषा में सदा मधुरता तो कॉमन बात है लेकिन उदारता होगी। उदारता का अर्थ है सर्व आत्माओं के प्रति आगे बढ़ाने की उदारता होगी। ‘पहले आप’, ‘मैं-मैं’ नहीं। उदारता अर्थात् दूसरे को आगे रखना। जैसे ब्रह्मा बाप ने सदैव पहले जगत अम्बा वा बच्चों को रखा – मेरे से भी तीखी जगदम्बा है, मेरे से भी तीखे यह बच्चे हैं। यह उदारता की भाषा है। और जहाँ उदारता है, स्वयं के प्रति आगे रहने की इच्छा नहीं है, वहाँ ड्रामा अनुसार स्वत: ही मनइच्छित फल प्राप्त हो ही जाता है। जितना स्वयं इच्छा मात्रम् अविद्या की स्थिति में रहते, उतना बाप और परिवार अच्छा, योग्य समझ उसको ही पहले रखते हैं। तो पहले आप मन से कहने वाले पीछे रह नहीं सकते। वह मन से पहले आप कहता तो सर्व द्वारा पहले आप हो ही जाता है। लेकिन इच्छा वाला नहीं। तो निश्चयबुद्धि की भाषा सदा उदारता वाली भाषा, सन्तुष्टता की भाषा, सर्व के कल्याण की भाषा। ऐसी भाषा वाले को कहेंगे निश्चयबुद्धि विजयी। निश्चयबुद्धि तो सभी हो ना? क्योंकि निश्चय ही फाउन्डेशन है।

लेकिन जब परिस्थितियों का, माया का, संस्कारों का, भिन्न-भिन्न स्वभावों का तूफान आता है तब मालूम पड़ता है निश्चय का फाउन्डेशन कितना मजबूत है। जैसे इस पुरानी दुनिया में भिन्न-भिन्न प्रकार के तूफान आते हैं ना। कभी वायु का, कभी समुद्र का… ऐसे यहाँ भी भिन्न-भिन्न प्रकार के तूफान आते हैं। तूफान क्या करता है? पहले उड़ाता है फिर फेंकता है। तो यह तूफान भी पहले तो अपनी तरफ मौज में उड़ाते हैं। अल्पकाल के नशे में ऊंचे ले जाते हैं क्योंकि माया भी जान गई है कि बिना प्राप्ति यह मेरी तरफ होने वाले नहीं है। तो पहले आर्टीफीशल प्राप्ति में ऊपर उड़ाती है। फिर नीचे गिरती कला में ले आती है। चतुर है। तो निश्चयबुद्धि की नज़र त्रिनेत्री होती है, तीसरे नेत्र से तीनों कालों को देख लेते हें, इसलिए कभी धोखा नहीं खा सकते। तो निश्चय की परख तूफान के समय होती है। जैसे तूफान बड़े-बड़े पुराने वृक्ष के फाउन्डेशन को उखाड़ लेते हैं। तो यह माया के तूफान भी निश्चय के फाउन्डेशन को उखेड़ने की कोशिश करते हैं। लेकिन रिजल्ट में उखड़ते कम हैं, हिलते ज्यादा हैं। हिलने से भी फाउन्डेशन कच्चा हो जाता है। तो ऐसे समय पर अपने निश्चय के फाउन्डेशन को चेक करो। वैसे कोई से भी पूछेंगे – निश्चय पक्का है? तो क्या कहेंगे? बहुत अच्छा भाषण करेंगे। अच्छा भी है निश्चय में रहना। लेकिन समय पर अगर निश्चय हिलता भी है तो निश्चय का हिलना अर्थात् जन्म-जन्म की प्रालब्ध से हिलना इसलिए तूफानों के समय चेक करो – कोई हद का मान-शान न दे वा व्यर्थ संकल्पों के रूप में माया का तूफान आये, जो चाहना रखते हो वह चाहना अर्थात् इच्छा पूर्ण न हो, ऐसे टाइम पर जो निश्चय है कि मैं समर्थ बाप की समर्थ आत्मा हूँ – वह याद रहता है वा व्यर्थ समर्थ के ऊपर विजयी हो जाता है? अगर व्यर्थ विजय प्राप्त कर लेता है तो निश्चय का फाउन्डेशन हिलेगा ना। समर्थ के बजाए अपने को कमजोर आत्मा अनुभव करेगा। दिलशिकस्त हो जायेंगे इसलिए कहते हैं कि तूफान के समय चेक करो। हद का मान-शान, मैं-पन रूहानी शान से नीचे ले आता है। हद की कोई भी इच्छा, इच्छा मात्रम् अविद्या के निश्चय से नीचे ले आती है। तो निश्चय का अर्थ यह नहीं है कि मैं शरीर नहीं, मैं आत्मा हूँ। लेकिन कौनसी आत्मा हूँ! वह नशा, वह स्वमान समय पर अनुभव हो, इसको कहते हैं निश्चयबुद्धि विजयी। कोई पेपर है ही नहीं और कहे – मैं तो पास विद् ऑनर हो गया, तो कोई उसको मानेगा? सर्टीफिकेट चाहिए ना। कितना भी कोई पास हो जाए, डिग्री ले लेवे लेकिन जब तक सर्टीफिकेट नहीं मिलता है तो वैल्यू नहीं होती। पेपर के समय पेपर दे पास हो सर्टीफिकेट ले – बाप से, परिवार से, तब उसको कहेंगे निश्चयबुद्धि विजयी। समझा? तो फाउन्डेशन को भी चेक करते रहो। निश्चयबुद्धि की विशेषता सुनी ना। जैसा समय वैसे रूहानी नशा जीवन में दिखाई दे। सिर्फ अपना मन खुश न हो लेकिन लोग भी खुश हों। सभी अनुभव करें कि हाँ यह नशे में रहने वाली आत्मा है। सिर्फ मनपसन्द नहीं लेकिन लोकपसन्द, बाप पसन्द। इसको कहते हैं विजयी। अच्छा!

सर्व निश्चयबुद्धि विजयी रत्नों को, सर्व निश्चिन्त, बेफिकर बच्चों को, सर्व निश्चित विजय के नशे में रहने वाले रूहानी आत्माओं को, सर्व तूफानों को पार कर तोफा अनुभव करने वाले विशेष आत्माओं को, सदा अचल, अडोल, एकरस स्थिति में स्थित रहने वाले निश्चयबुद्धि बच्चों को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।

विदेशी भाई बहिनों से बापदादा की मुलाकात :- अपने को समीप रत्न अनुभव करते हो? समीप रत्न की निशानी क्या है? वह सदा, सहज और स्वत: ज्ञानी तू आत्मा, योगी तू आत्मा, गुणमूर्त सेवाधारी अनुभव करेंगे। समीप रत्न के हर कदम में यह चार ही विशेषतायें सहज अनुभव होंगी, एक भी कम नहीं होगी। ज्ञान में कम हो, योग में तेज हो या दिव्यगुणों की धारणा में कमजोर हो, वह सबमें सदा ही सहज अनुभव करेगा। समीप रत्न किसी भी बात में मेहनत नहीं अनुभव करेंगे लेकिन सहज सफलता अनुभव करेंगे क्योंकि बापदादा बच्चों को संगमयुग पर मेहनत से ही छुड़ाते हैं। 63 जन्म मेहनत की है ना। चाहे शरीर की मेहनत की, चाहे मन की मेहनत की। बाप को प्राप्त करने के लिए भिन्न-भिन्न साधन अपनाते रहे। तो यह मन की मेहनत की। और धन की भी देखो, जो सर्विस करते हो, जिसको बापदादा नौकरी कहते, उसमें भी देखो कितनी मेहनत करते हो! उसमें भी तो मेहनत लगती है ना। और अभी आधाकल्प के लिए यह नौकरी नहीं करेंगे, इससे भी छूट जायेंगे। न लौकिक नौकरी करेंगे, न भक्ति करेंगे – दोनों से मुक्ति मिल जायेगी। अभी भी देखो, चाहे लौकिक कार्य करते भी हो लेकिन ब्राह्मण जीवन में आने से लौकिक कार्य करते हुए भी अन्तर लगता है ना। अभी यह लौकिक कार्य करते भी डबल लाइट रहते हो, क्यों? क्योंकि लौकिक कार्य करते भी यह खुशी रहती है कि यह कार्य अलौकिक सेवा के निमित्त कर रहे हैं। अपने मन की तो इच्छायें नहीं हैं ना। तो जहाँ इच्छा होती है वहाँ मेहनत लगती है। अभी निमित्त मात्र करते हो क्योंकि मालूम है कि तन, मन, धन – तीनों लगाने से एक का पद्मगुणा अविनाशी बैंक में जमा हो रहा है। फिर जमा किया हुआ खाते रहना। पुरूषार्थ से – योग लगाने का, ज्ञान सुनने-सुनाने का, इस मेहनत से भी छूट जायेंगे। कभी-कभी क्लासेज सुनकर थक जाते हैं ना। वहाँ तो लौकिक राजनीतिक पढ़ाई भी जो होगी ना, वह भी खेल-खेल में होगी, इतने किताब नहीं याद करने पड़ेंगे। सब मेहनत से छूट जायेंगे। कइयों को पढ़ाई का भी बोझ होता है। संगमयुग पर मेहनत से छूटने के संस्कार भरते हो। चाहे माया के तूफान आते भी हैं, लेकिन यह माया से विजय प्राप्त करना भी एक खेल समझते हो, मेहनत नहीं। खेल में भी क्या होता है? जीत प्राप्त करना होता है ना। तो माया से भी विजय प्राप्त करने का खेल करते हो। खेल लगता है या बड़ी बात लगती है? जब मास्टर सर्वशक्तिवान स्टेज पर स्थित होते हो तो खेल लगेगा। और ही चैलेन्ज करते हो कि आधाकल्प के लिए विदाई लेकर जाओ। तो विदाई समारोह मनाने आती है, लड़ने नहीं आती है। विजयी रत्न हर समय, हर कार्य में विजयी हैं। विजयी हो ना? (हाँ जी) तो वहाँ जाकर भी ‘हाँ जी करना’। फिर भी अच्छे बहादुर हो गये हैं। पहले थोड़े जल्दी घबरा जाते थे, अभी बहादुर हो गये हैं। अभी अनुभवी हो गये हैं। तो अनुभव की अथॉरिटी वाले हो गये, परखने की भी शक्ति आ गई है, इसलिए घबराते नहीं हैं। अनेक बार के विजयी थे, हैं और रहेंगे – यही स्मृति सदा रखना। अच्छा!

विदाई के समय दादियों से (दादी जानकी बम्बई से 3-4 दिन का चक्र लगाकर आई है) अभी से ही चक्रवर्ती बन गई। अच्छा है, यहाँ भी सेवा है, वहाँ भी सेवा की। यहाँ रहते भी सेवा करते और जहाँ जाते वहाँ भी सेवा हो जाती। सेवा का ठेका बहुत बड़ा लिया है। बड़े ठेकेदार हो ना। छोटे-छोटे ठेकेदार तो बहुत हैं लेकिन बड़े ठेकेदार को बड़ा काम करना पड़ता है। (बाबा आज मुरली सुनते बहुत मजा आया) है ही मजा। अच्छा है, आप लोग कैच करके औरों को क्लीयर कर सकते हो। सभी तो एक जैसे कैच कर नहीं सकते। जैसे जगदम्बा मुरली सुनकर क्लीयर करके, सहज करके सभी को धारण कराती रही, ऐसे अभी आप निमित्त हो। कई नये-नये तो समझ भी नहीं सकते हैं। लेकिन बापदादा सिर्फ सामने वालों को नहीं देखते। जो बैठे हैं सभा में, उन्हें ही नहीं देखते, सभी को सामने रखते हैं। फिर भी सामने अनन्य होते हैं तो उन्हों के प्रति निकलता है। आप लोग तो पढ़कर भी कैच कर सकते हो। अच्छा!

वरदान:- व्यर्थ की लीकेज को समाप्त कर समर्थ बनने वाले कम खर्च बालानशीन भव
संगमयुग पर बापदादा द्वारा जो भी खजाने मिले हैं उन सर्व खजानों को व्यर्थ जाने से बचाओ तो कम खर्च बालानशीन बन जायेंगे। व्यर्थ से बचाव करना अर्थात् समर्थ बनना। जहाँ समर्थी है वहाँ व्यर्थ जाये – यह हो नहीं सकता। अगर व्यर्थ की लीकेज है तो कितना भी पुरुषार्थ करो, मेहनत करो लेकिन शक्तिशाली बन नहीं सकते इसलिए लीकेज़ को चेक कर समाप्त करो तो व्यर्थ से समर्थ हो जायेंगे।
स्लोगन:- प्रवृत्ति में रहते सम्पूर्ण पवित्र रहना – यही योगी व ज्ञानी तू आत्मा की चैलेन्ज है।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 8 MAY 2021 : AAJ KI MURLI

08-05-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – अपने आपसे पूछो कि मैं कर्मेन्द्रिय-जीत बना हूँ, कोई भी कर्मेन्द्रिय मुझे धोखा तो नहीं देती हैं!”
प्रश्नः- कर्मातीत बनने के लिए तुम बच्चों को अपने आपसे कौन सा वायदा करना है?
उत्तर:- अपने से वायदा करो कि कोई भी कर्मेन्द्रिय कभी भी चलायमान हो नहीं सकती। मुझे अपनी कर्मेन्द्रियाँ वश में करनी हैं। बाबा ने जो भी डायरेक्शन दिये हैं, उन्हें अमल में लाना ही है। बाबा कहे – मीठे बच्चे, कर्मातीत बनना है तो कोई भी कर्मेन्द्रिय से विकर्म मत करो। माया बड़ी प्रबल है। ऑखें धोखेबाज हैं इसलिए अपनी सम्भाल करो।

ओम् शान्ति। बच्चे आत्म-अभिमानी होकर बैठे हो? अपने आपसे पूछो, हर एक बात अपने आपसे पूछनी पड़ती है। बाप युक्ति बताते हैं कि अपने से पूछो आत्म-अभिमानी हो बैठे हैं? बाप को याद करते हैं? क्योंकि यह है तुम्हारी रूहानी सेना। उस सेना में तो हमेशा जवान ही भरती होते हैं। इस सेना में जवान 14-15 वर्ष के भी हैं तो 90 वर्ष के बूढ़े भी हैं, तो छोटे बच्चे भी हैं। यह सेना है माया पर जीत पाने के लिए। हर एक को माया पर जीत पहन बाप से बेहद का वर्सा पाना है क्योंकि माया बहुत दुश्तर है। बच्चे स्वयं भी जानते हैं कि माया बड़ी प्रबल है। हर एक कर्मेन्द्रिय धोखा बहुत देती है। सबसे पहले जास्ती धोखा देने वाली कौन सी कर्मेन्द्रिय है? ऑखे ही सबसे जास्ती धोखा देती हैं। अपनी स्त्री होते हुए भी दूसरी कोई खूबसूरत देखेंगे तो झट वह खीचेगी। ऑखे बड़ा धोखा देती हैं। दिल होती है उनको हाथ लगायें। बच्चों को समझाया जाता है – सदैव बुद्धि से यह समझो कि हम ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ भाई-बहिन हैं, इसमें माया बहुत गुप्त धोखा देती है इसलिए यह चार्ट में भी लिखना चाहिए कि आज सारे दिन में कौन-कौनसी कर्मेन्द्रिय ने हमको धोखा दिया? सबसे जास्ती दुश्मन हैं यह ऑखें। तो यह लिखना चाहिए – फलानी को देखा, हमारी दृष्टि गई। सूरदास का भी मिसाल है ना। अपनी ऑखे निकाल दी। अपनी जांच करेंगे तो ऑखे धोखा जास्ती देती हैं। अपनी स्त्री को भी छोड़ कोई अच्छी देखी तो उस पर फिदा हो जाते हैं। कोई गायन में होशियार होगी, श्रृंगार अच्छा होगा तो ऑखे झट चलायमान हो जायेंगी इसलिए बाबा कहते हैं यह ऑखें बहुत धोखा देती हैं। भल सर्विस भी करते हैं परन्तु ऑखे बहुत धोखा देती हैं। इस दुश्मन की पूरी जाँच रखनी है। नहीं तो समझो हम अपने पद को भ्रष्ट कर लेंगे। जो समझदार बच्चे हैं उनको अपने पास डायरी में नोट करना चाहिए – फलानी को देखा तो हमारी दृष्टि गई फिर अपने को आपेही सज़ा दो। भक्ति मार्ग में भी पूजा के टाइम बुद्धि और-और तरफ भागती है, तो अपने को चूटी (चुटकी) से काटते हैं। तो जब ऐसी कोई स्त्री आदि सामने आती है तो किनारा कर लेना चाहिए। खड़े होकर देखना नहीं चाहिए। ऑखे बहुत धोखा देने वाली हैं इसलिए संन्यासी लोग ऑखे बन्द कर बैठते हैं। स्त्री को पिछाड़ी में, पुरूष को आगे में बिठाते हैं। कई ऐसे भी होते हैं जो स्त्री को बिल्कुल देखते नहीं हैं। तुम बच्चों को तो बहुत मेहनत करनी है। विश्व का राज्य भाग्य लेना कोई कम बात थोड़ेही है। वो लोग तो करके 10, 12, 20 हजार, एक-दो, लाख-करोड़ इकट्ठा करेंगे और खलास हो जायेंगे। तुम बच्चों को तो अविनाशी वर्सा मिलता है। सब कुछ प्राप्ति हो जाती है। ऐसी कोई चीज़ नहीं रहती जिसकी प्राप्ति के लिए माथा मारना पड़े। कलियुग अन्त और सतयुग आदि में रात-दिन का फ़र्क है। यहाँ तो कुछ भी नहीं है।

अभी तुम्हारा यह है पुरूषोत्तम संगमयुग। पुरूषोत्तम अक्षर जरूर लिखना है। मनुष्य से देवता किये…तुम अभी ब्राह्मण बने हो। मनुष्य तो बिल्कुल घोर अन्धियारे में हैं। बहुत हैं जो स्वर्ग को देख न सकें। बाप कहते हैं – बच्चे, तुम्हारा धर्म बहुत सुख देने वाला है। मनुष्यों को थोड़ेही कुछ पता है। भारतवासी भी भूल गये हैं कि हेविन क्या चीज़ है। क्रिश्चियन लोग भी खुद कहते हैं हेविन था। इन लक्ष्मी-नारायण को गॉड-गॉडेज कहते हैं ना। तो जरूर गॉड ही ऐसा बनायेंगे। तो बाप समझाते हैं – मेहनत बहुत करनी है। रोज़ अपना पोतामेल देखो। कौन सी कर्मेन्द्रिय ने हमको धोखा दिया? मुख भी बहुत धोखा देता है। आगे कचहरी होती थी। सब अपनी भूल बताते थे। हमने फलानी चीज़ छिपाकर खा ली। अच्छे-अच्छे बड़े घर की बच्चियाँ बतला देती हैं, ऐसे-ऐसे माया वार करती है। छिपाकर खाना भी चोरी है। सो भी शिवबाबा के यज्ञ की चोरी – यह तो बहुत खराब है। कख का चोर सो लख का चोर। माया एकदम नाक से पकड़ती है। यह आदत बहुत बुरी है। बुरी आदत होगी तो हम क्या बनेंगे! स्वर्ग में जाना कोई बड़ी बात नहीं है। परन्तु उसमें फिर मर्तबा भी तो है ना। कहाँ राजा कहाँ प्रजा। कितना फर्क है। तो कर्मेन्द्रियाँ भी बहुत धोखा देने वाली हैं। उनकी सम्भाल करना चाहिए। ऊंच पद पाना है तो बाप के डायरेक्शन पर पूरा चलना है। बाप डायरेक्शन देंगे माया फिर बीच में आकर विघ्न डालेगी। बाप कहते हैं – भूलो मत, नहीं तो अन्त में बहुत पछतायेंगे। नापास होने का फिर साक्षात्कार भी होगा। अभी तुम कहते हो हम नर से नारायण बनेंगे। परन्तु अपने से पूछो, अपना पोतामेल निकालो। बहुत हैं, जो मुश्किल समझकर अमल में लाते हैं। परन्तु बाबा कहते हैं इससे तुम्हारी उन्नति बहुत होगी। सारे दिन का पोतामेल निकालना चाहिए। यह ऑखे बहुत धोखा देती हैं। कोई को देखेंगे तो ख्याल आयेगा, यह तो बहुत अच्छी है फिर बात करेंगे। दिल होगी – उनको कुछ सौगात दूँ, यह खिलाऊं, वही चिंतन चलता रहेगा। बच्चे समझते हैं इसमें मेहनत बहुत बड़ी है। कर्मेन्द्रियाँ बहुत धोखा देती हैं। रावण राज्य है ना। बाप कहते हैं – वहाँ चिंता की कोई बात नहीं होती है क्योंकि रावण राज्य ही नहीं। चिंता की बात ही नहीं। वहाँ भी चिंता हो तो फिर नर्क और स्वर्ग में फ़र्क ही क्या रहे? तुम बच्चे बहुत-बहुत ऊंच पद पाने के लिए भगवान से पढ़ते हो। बाप समझाते हैं – माया निंदा कराती है। तुमने अपकार किया, मैं उपकार करता हूँ। बच्चे, तुम अगर कुदृष्टि रखेंगे तो अपना ही नुकसान करेंगे। बहुत बड़ी मंजिल है इसलिए बाबा कहते हैं – अपना पोतामेल देखो। कोई विकर्म तो नहीं किया? किसको धोखा तो नहीं दिया? अब विकर्माजीत बनना है। विकर्माजीत के संवत का किसको पता नहीं है सिवाए तुम बच्चों के। बाप ने समझाया है – विकर्माजीत को 5 हजार वर्ष हुए, फिर विकर्म करते हैं तो वाम मार्ग में जाते हैं। कर्म, अकर्म, विकर्म अक्षर तो हैं ना। माया के राज्य में मनुष्य जो भी कर्म करते हैं, वह विकर्म ही बनता है। सतयुग में विकार होते नहीं। तो विकर्म भी कोई बनता नहीं। यह भी तुम जानते हो – क्योंकि तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। तुम त्रिनेत्री बने हो। तो त्रिकालदर्शी, त्रिनेत्री बनाने वाला है बाप। तुम आस्तिक बने हो तब त्रिकालदर्शी बने हो। सारे ड्रामा का राज़ बुद्धि में है। मूलवतन, सूक्ष्मवतन, स्थूलवतन, 84 का चक्र फिर और धर्म वृद्धि को पाते हैं। वह कोई सद्गति नहीं कर सकते। उनको गुरू भी नहीं कह सकते हैं। सर्व की सद्गति करने वाला एक ही बाप है। अभी सबकी सद्गति होनी है। वह धर्म स्थापक कहे जाते हैं, गुरू नहीं। धर्म स्थापक धर्म स्थापन करने के निमित्त बने हैं। बाकी सद्गति थोड़ेही करते हैं। उनको याद करने से कोई सद्गति नहीं हो सकती। विकर्म विनाश नहीं हो सकते। वह सब है भक्ति। तो बाप समझाते हैं माया बड़ी दुश्तर है, इस पर ही लड़ाई होती है। तुम हो शिव शक्ति पाण्डव सेना। तुम सब पण्डे हो। शान्तिधाम, सुखधाम का रास्ता बताते हो। गाइड्स तुम हो। कहते हो – बाप को याद करो तो विकर्म विनाश होंगे और फिर दूसरे तरफ अगर कोई पाप कर्म करेंगे तो सौ गुणा पाप लग जायेगा। जितना हो सके कोई विकर्म नहीं करना चाहिए। कर्मेन्द्रियाँ धोखा बहुत देती हैं। बाप हर एक की चलन से समझ जाते हैं। बच्चों को माया के तूफान आते हैं। स्त्री-पुरुष समझने से ही तूफान आते हैं। तो इन ऑखों पर कितना कब्जा (अधिकार) रखना चाहिए। हम तो शिव-बाबा के बच्चे हैं। बाप से अन्जाम कर राखी भी बांधते फिर भी माया धोखा दे देती है, फिर छूट नहीं सकते हैं। कर्मेन्द्रियाँ जब वश हो तब कर्मातीत अवस्था हो सके। कहना तो सहज है कि हम लक्ष्मी-नारायण बनेंगे परन्तु समझ भी चाहिए ना। बाप कहते हैं डायरेक्शन पर अमल करो। बाबा-बाबा करते रहो। बाबा से हम पूरा वर्सा लेंगे। ऐसा टीचर कभी भी कहाँ भी नहीं मिलेगा। इन सब बातों को देवतायें भी नहीं जानते तो पिछाड़ी के धर्म वाले फिर कैसे जान सकते हैं। बाबा कहते हैं मैं कुछ कहूँ तो भी समझो – यह शिवबाबा कहते हैं। ऐसे मत समझो कि यह दादा कहते हैं। यह तो मेरा रथ है, यह क्या करता, तुम बच्चों को राजाई मैं देता हूँ। यह रथ थोड़ेही देता है। यह तो बिल्कुल बेगर है। यह भी बाबा से वर्सा लेता है। जैसे तुम पुरूषार्थ करते हो वैसे यह भी करता है। यह भी स्टूडेन्ट लाइफ में है। यह रथ लोन पर लिया हुआ है, तमोप्रधान है। तुम पूज्य देवता बनने के लिए, मनुष्य से देवता बनने के लिए पढ़ते हो। कोई की तकदीर में नहीं है तो कहते हैं मुझे तो संशय है, शिवबाबा कैसे आकर पढ़ाते हैं। मुझे तो समझ में नहीं आता है। बाप की याद बिगर विकर्म विनाश हो न सकें। पूरी सजा खानी पड़ेगी। यह राजाई स्थापन हो रही है। राजाओं को कितनी दासियाँ होती हैं। बाबा तो राजाओं के कनेक्शन में आया हुआ है। दासियाँ दहेज में देते हैं। यहाँ ही इतनी दासियाँ हैं तो सतयुग में कितनी होंगी। यह भी राजधानी स्थापन हो रही है। बाबा जानते हैं क्या-क्या कर रहे हैं। हर एक के पोतामेल से बाबा बता सकते हैं। इस समय मर जाएं तो क्या बनेंगे! कर्मातीत अवस्था को पिछाड़ी में सब नम्बरवार पाते हैं। तो यह कमाई है। कमाई में मनुष्य कितना बिज़ी रहते हैं। खाना खाते रहेंगे, टेलीफोन कान पर होगा। ऐसे आदमी तो ज्ञान उठा न सकें। यहाँ गरीब साधारण ही आते हैं। साहूकार लोग तो कहेंगे, फुर्सत कहाँ। अरे, सिर्फ बाप को याद करो तो विकर्म विनाश हो जाएं। तो बाबा मीठे-मीठे बच्चों को बार-बार समझाते हैं। हर एक को यह पैगाम देना है जो ऐसा कोई न कहे कि हमको क्या पता शिवबाबा आया हुआ है। बस सारा दिन बाबा-बाबा ही कहते रहो। कई बच्चियाँ बहुत याद करती हैं। शिवबाबा कहने से ही कई बच्चों को प्रेम के ऑसू आ जाते हैं। कब जाकर मिलेंगे! देखा नहीं है तो भी तड़फती रहती हैं और देखे हुए फिर मानते नहीं। वह दूर बैठे ऑसू बहाती रहती हैं। वन्डर है ना। ब्रह्मा का भी बहुतों को साक्षात्कार होता है। आगे चल बहुतों को साक्षात्कार होगा। मनुष्य को मरने समय सब आकर कहते हैं भगवान को याद करो। तुम भी शिवबाबा को याद करो। बाप कहते हैं – बच्चे, पुरूषार्थ में मेकप करते रहो। मौका मिलता है तो मेकप करो। कमाई कितनी भारी है। कोई-कोई तो ऐसे हैं जो कितना भी समझाओ, तो भी बुद्धि में नहीं बैठता। बाप कहते हैं ऐसे नहीं बनना है। अपना कल्याण करो। बाप की श्रीमत पर चलो। तुमको बाप पुरूषों में उत्तम बनाते हैं। यह है एम आब्जेक्ट। बाबा सर्विस के लिए कितनी युक्तियाँ बताते रहते हैं। सन्देश तो सबको देना है। जो समझें यह तो बरोबर सच कहते हैं। इस लड़ाई से ही खास भारत में, आम सारे विश्व में सुख-शान्ति होती है। ऐसे-ऐसे पर्चे सभी भाषाओं में छपाने पड़े। भारत कितना बड़ा है। हर एक को पता होना चाहिए – जो ऐसे कोई न कहे कि हमको पता ही नहीं पड़ा। तुम कहेंगे अरे, एरोप्लेन से पर्चे गिराये, अखबार में डाला, तुम जागे नहीं। यह भी दिखाया हुआ है। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) स्वयं में जो भी बुरी आदतें हैं – उनकी जांच कर उन्हें निकालने के लिए मेहनत करनी है। अपना सच्चा-सच्चा पोतामेल रखना है। बाप के डायरेक्शन पर चलना है।

2) ऐसा कोई कर्म नहीं करना है, जिससे बाप का नाम बदनाम हो। अपनी उन्नति का ख्याल रखना है। जरा भी कुदृष्टि नहीं रखनी है।

वरदान:- देह-अभिमान के त्याग द्वारा श्रेष्ठ भाग्य बनाने वाले सर्व सिद्धि स्वरूप भव
देह-अभिमान का त्याग करने अर्थात् देही-अभिमानी बनने से बाप के सर्व संबंध का, सर्व शक्तियों का अनुभव होता है, यह अनुभव ही संगमयुग का सर्वश्रेष्ठ भाग्य है। विधाता द्वारा मिली हुई इस विधि को अपनाने से वृद्धि भी होगी और सर्व सिद्धियां भी प्राप्त होंगी। देहधारी के संबंध वा स्नेह में तो अपना ताज, तख्त और अपना असली स्वरूप सब छोड़ दिया तो क्या बाप के स्नेह में देह-अभिमान का त्याग नहीं कर सकते! इसी एक त्याग से सर्व भाग्य प्राप्त हो जायेंगे।
स्लोगन:- क्रोध मुक्त बनना है तो स्वार्थ के बजाए निस्वार्थ बनो, इच्छाओं के रूप का परिवर्तन करो।
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