Hindi Murli

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 6 MARCH 2021 : AAJ KI MURLI

06-03-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – पुण्य आत्मा बनना है तो एक बाप को याद करो, याद से ही खाद निकलेगी, आत्मा पावन बनेगी”
प्रश्नः- कौन सी स्मृति रहे तो कभी भी किसी बात में मूँझ नहीं सकते?
उत्तर:- ड्रामा की। बनी बनाई बन रही, अब कुछ बननी नाहि… यह अनादि ड्रामा चलता ही रहता है। इसमें किसी बात में मूँझने की दरकार नहीं। कई बच्चे कहते हैं पता नहीं यह हमारा अन्तिम 84 वाँ जन्म है या नहीं, मूंझ जाते हैं। बाबा कहते मूंझो नहीं, मनुष्य से देवता बनने का पुरूषार्थ करो।

ओम् शान्ति। बच्चों को ओम् शान्ति के अर्थ का तो पता है कि मैं आत्मा हूँ और मुझ आत्मा का स्वधर्म है शान्ति। मैं आत्मा शान्त स्वरूप, शान्तिधाम की रहने वाली हूँ। यह लेसन पक्का करते जाओ। यह कौन समझाते हैं? शिवबाबा। याद भी करना है शिवबाबा को। उनको अपना रथ नहीं है इसलिए उनको बैल दे देते हैं। मन्दिर में भी बैल रख दिया है। इसको कहा जाता है पूरा अज्ञान। बाप समझाते हैं बच्चों को अथवा रूहों को। यह है रूहों का बाप शिव, इनके नाम तो बहुत हैं। परन्तु बहुत नाम से मूंझ पड़े हैं। वास्तव में इसका नाम है शिव। शिव जयन्ती भी भारत में मनाई जाती है। वह निराकार बाबा है, आकर पतितों को पावन बनाते हैं। कोई ने भागीरथ, कोई ने नंदीगण कह दिया है। बाप ही बताते हैं कि मैं कौन से भाग्यशाली रथ में आता हूँ। मैं ब्रह्मा के तन में प्रवेश करता हूँ। ब्रह्मा द्वारा भारत को स्वर्ग बनाता हूँ। तुम सब भारतवासी जानते हो ना कि लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। तुम सब भारतवासी बच्चे आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले थे। स्वर्गवासी थे। 5 हजार वर्ष पहले जब मैं आया था तो सभी को सतोप्रधान स्वर्ग का मालिक बनाया था। फिर पुनर्जन्म जरूर लेना पड़े। बाप कितना सीधा बताते हैं। अब जयन्ती मनाते हो, (इस 2021 में लिखेंगे 85 वीं शिवजयन्ती), बाबा की पधरामणी हुए अभी 85 वर्ष हुए। फिर साथ-साथ ब्रह्मा विष्णु शंकर की भी पधरामणी है। त्रिमूर्ति ब्रह्मा की जयन्ती कोई दिखाते नहीं हैं, दिखाना जरूरी है क्योंकि बाबा कहता है मैं ब्रह्मा द्वारा स्थापना फिर से करता हूँ। ब्राह्मण बनाता जाता हूँ। तो ब्रह्मा और ब्राह्मण वंशियों का भी जन्म हुआ। फिर दिखाता हूँ कि तुम सो विष्णुपुरी के मालिक बनेंगे। बाप की याद से ही तुम्हारी खाद निकलेगी। भल भारत का प्राचीन योग मशहूर है परन्तु वह किसने सिखाया था, यह कोई नहीं जानते। खुद कहते हैं हे बच्चे तुम अपने बाप को याद करो। वर्सा तुमको मेरे से मिलता है। मैं तुम्हारा बाप हूँ। मैं कल्प-कल्प आता हूँ, आकर तुमको मनुष्य से देवता बनाता हूँ क्योंकि तुम देवी-देवता थे फिर 84 जन्म लेते-लेते आकर पतित बने हो। रावण की मत पर चल रहे हो। ईश्वरीय मत से तुम स्वर्ग के मालिक बनते हो।

बाप कहते हैं मैं कल्प पहले भी आया था। जो कुछ पास होता है, वह कल्प-कल्प होता ही रहेगा। बाप फिर भी आकर इनमें प्रवेश करेंगे, इस दादा को छुड़ायेंगे। फिर इन सबकी परवरिश करायेंगे। तुम जानते हो कि हम ही सतयुग में थे। हम भारतवासियों को ही 84 जन्म लेना पड़े। पहले-पहले तुम सर्वगुण सम्पन्न 16 कला सम्पूर्ण थे। यथा राजा रानी तथा प्रजा नम्बरवार। सब तो राजा नहीं बन सकते। तो बाप समझाते हैं सतयुग में तुम्हारे 8 जन्म, त्रेता में 12 जन्म… ऐसे ही अपने को समझो कि हमने यह पार्ट बजाया है। पहले सूर्यवंशी राजधानी में पार्ट बजाया फिर चन्द्रवंशी में फिर नीचे उतरते वाम मार्ग में आये। फिर हमने 63 जन्म लिए। भारतवासियों ने ही पूरे 84 जन्म लिए हैं और कोई धर्म वाले इतने जन्म नहीं लेते हैं। गुरूनानक को 500 वर्ष हुए, करीब उनके 12-14 जन्म होंगे। यह हिसाब निकाला जाता है। क्रिश्चियन ने 2 हजार वर्ष में 60 पुनर्जन्म लिये होंगे, वृद्धि होती जाती है। पुनर्जन्म लेते जाते हैं। बुद्धि में यह विचार करो तो हमने ही 84 जन्म भोगे हैं, फिर सतोप्रधान बनना है। जो कुछ पास हुआ ड्रामा। जो ड्रामा बना हुआ है वह फिर रिपीट होगा। बेहद की हिस्ट्री में तुमको ले जाते हैं। तुम पुनर्जन्म लेते आये हो। अब तुमने 84 जन्म पूरे किये हैं। अब फिर बाप ने याद दिलाई कि तुम्हारा घर है शान्तिधाम। आत्मा का रूप क्या है? बिन्दी। वहाँ जैसे बिन्दियों का झाड़ है। आत्माओं का भी नम्बरवार झाड़ है। नम्बरवार नीचे आना होता है। परमात्मा भी बिन्दी है। ऐसे नहीं कि इतना बड़ा लिंग है। बाप कहते हैं कि तुम हमारे बच्चे बनते हो तो मैं तुमको स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ, पहले तुम हमारे बने फिर मैं तुमको पढ़ाता हूँ। कहते हो बाबा हम तुम्हारे हैं। साथ-साथ पढ़ना भी है। हमारे बने और तुम्हारी पढ़ाई शुरू हो गई।

बाबा कहते कि यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है, कमल फूल समान पवित्र बनो। बच्चे वायदा करते हैं बाबा हम आपसे वर्सा लेने लिए कभी पतित नहीं बनेंगे। 63 जन्म तो पतित बने हैं। यह 84 जन्मों की कहानी है। बाबा आकर सहज कर बताते हैं। जैसे लौकिक बाप बताते हैं ना। तो यह है बेहद का बाप। वह आकर रूहों से बच्चे-बच्चे कह बात करते हैं। शिवरात्रि भी मनाते हैं ना। यह है आधाकल्प का दिन और आधाकल्प की रात। अभी है रात का अन्त और दिन के आदि का संगम। भारत सतयुग था तो दिन था। सतयुग त्रेता को ब्रह्मा का दिन कहा जाता है। तुम ब्राह्मण हो ना। तुम ब्राह्मण जानते हो कि हमारी अब रात्रि है। तमोप्रधान भक्ति है। दर दर धक्के खाते रहते हैं, सबकी पूजा करते रहते हैं। टिवाटे की भी पूजा करते हैं। मनुष्य के शरीर की भी पूजा करते हैं। संन्यासी लोग अपने को शिवोहम् कह बैठ जाते हैं फिर मातायें जाकर उनकी पूजा करती हैं। बाबा बहुत अनुभवी है। बाबा कहते हमने भी बहुत पूजा की है। परन्तु उस समय ज्ञान तो था नहीं। फल चढ़ाते थे, लोटी चढ़ाते थे मनुष्य पर। यह भी ठगी हुई ना। परन्तु यह सब फिर भी होगा। भक्तों का रक्षक है भगवान क्योंकि सभी दु:खी हैं ना। बाप समझाते हैं कि द्वापर से लेकर तुम गुरू करते आये हो और भक्ति मार्ग में उतरते आये हो। अभी तक भी साधू लोग तो साधना करते हैं। बाप कहते हैं कि उन्हों का भी मैं उद्धार करता हूँ। संगम पर तुम्हारी सद्गति हो जाती है फिर तुम 84 जन्म लेते हो। बाप को कहा जाता है ज्ञान का सागर, मनुष्य सृष्टि का बीजरूप। सत् चित् आनन्द स्वरूप है। वो कब विनाश नहीं होता, उनमें ज्ञान है। ज्ञान का सागर, प्यार का सागर है, जरूर उनसे वर्सा मिलना चाहिए। अभी तुम बच्चों को वर्सा मिल रहा है। शिवबाबा है ना। वह भी बाबा है, यह भी तुम्हारा बाप है फिर शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा तुमको पढ़ाते हैं इसलिए प्रजापिता ब्रह्माकुमार कुमारियां कहा जाता है। कितने ढेर बी.के. हैं। कहते हैं कि हमको डाडे से वर्सा मिलता है। बच्चे कहते हैं बाबा हमको नर्कवासी से स्वर्गवासी बनाते हैं। कहते हैं हे बच्चे – मामेकम् याद करो तो तुम्हारे सिर पर जो पापों का बोझा है वह भस्म हो जायेगा। फिर तुम सतोप्रधान बन जायेंगे। तुम सच्चा सोना, सच्चे जेवर थे। आत्मा और शरीर दोनों सतोप्रधान थे। आत्मा फिर सतो रजो तमो होती है तो शरीर भी ऐसा तमोगुणी मिलता है। बाप तुमको राय देते हैं कि बच्चे मुझे याद करो। मुझे बुलाते हो ना कि हे पतित-पावन आओ। भारत का प्राचीन राजयोग मशहूर है। वह अब तुमको सिखला रहा हूँ कि मेरे साथ योग रखो तो इससे तुम्हारी खाद जल जायेगी। जितना याद करेंगे उतनी खाद निकलती जायेगी। याद की ही मुख्य बात है। नॉलेज तो बाप ने दी है – सतयुग में यथा राजा रानी तथा प्रजा सब पवित्र थे, अभी सब पतित हैं। बाप कहते हैं कि इनके बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में मैं प्रवेश करता हूँ। इसको कहा जाता है भाग्यशाली रथ। यह पढ़कर फिर पहले नम्बर में जाते हैं। नम्बरवार तो बनते हैं ना। मुख्य एक नाम होता है। बाप ने बच्चों को 84 जन्मों का राज़ अच्छी रीति समझाया है। तुम आदि सनातन देवी देवता धर्म के हो, न कि हिन्दू धर्म के। तुम कर्म श्रेष्ठ, धर्म श्रेष्ठ थे। फिर रावण के प्रवेश होने से धर्म-कर्म भ्रष्ट हो गये हो। अपने को देवी-देवता कहलाने में लज्जा आती है इसलिए हिन्दू नाम रख दिया है। वास्तव में आदि सनातन देवी-देवता धर्म के थे। तुमने 84 जन्म लिए हैं फिर पतित बन गये हो। 84 का चक्र भारतवासियों के लिए है। वापिस जाना तो सबको है। पहले तुम जायेंगे। जैसे बारात जाती है ना। शिवबाबा को साजन भी कहते हैं। तुम सजनियाँ इस समय छी-छी तमोप्रधान हो, उनको गुल-गुल बनाकर ले जायेंगे। आत्माओं को पावन बनाकर ले जायेंगे। इसको लिबरेटर, गाइड कहा गया है। बेहद का बाप ले जाता है। उनका नाम क्या है? शिवबाबा। नाम शरीर पर पड़ता है परन्तु परमात्मा का शिव ही नाम है। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का तो सूक्ष्म शरीर है। शिवबाबा का तो कोई शरीर है नहीं। उनको शिवबाबा ही कहते हैं। बच्चे कहते हैं, हे मात-पिता हम आपके बालक बने हैं। दूसरे तो पुकारते रहते हैं क्योंकि उन्हों को पता नहीं है। अगर सबको पता पड़ जाए तो मालूम नहीं क्या हो जाए। दैवी झाड़ का अभी सैपलिंग लगता है। हीरे से कौड़ी बनने में 84 जन्म लगते हैं। फिर नये सिरे से शुरू होगा। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होगी। बाप समझाते हैं कि तुमने पूरे 84 जन्म लिए हैं। 84 लाख तो हो न सके। यह बड़ी भूल है। 84 लाख जन्म समझने कारण कल्प की आयु लाखों वर्ष कह दी है। यह है बिल्कुल झूठ। भारत अब झूठखण्ड है, सचखण्ड में तुम सदा सुखी थे। इस समय तुम 21 जन्म का वर्सा लेते हो। सारा तुम्हारे पुरूषार्थ पर है। राजधानी में जो चाहो वह पद लो, इसमें जादू आदि की कोई बात नहीं है। हाँ मनुष्य से देवता जरूर बनते हैं। यह तो अच्छा जादू है ना। तुम सेकेण्ड में जान लेते हो कि हम बाबा के बच्चे बने हैं। कल्प-कल्प बाबा हमको स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। आधाकल्प भटकते आये हो, स्वर्गवासी तो कोई भी हुआ नहीं। बाप आकर तुम बच्चों को लायक बनाते हैं। बरोबर यहाँ महाभारत लड़ाई लगी थी और राजयोग सिखाया था। शिवबाबा कहते हैं कि मैं ही आकर तुमको सिखाता हूँ, न कि क्राइस्ट। अभी तुम्हारा बहुत जन्मों के अन्त का जन्म है, मूँझो नहीं। तुम भारतवासी हो। तुम्हारा धर्म बहुत सुख देने वाला है और धर्म वाले तो बैकुण्ठ में आ नहीं सकते। यह भी ड्रामा अनादि चलता रहता है। कब बना, यह कह नहीं सकते। इसकी नो एण्ड। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होती है। यह है संगमयुग, छोटा युग। चोटी है ब्राह्मणों की। बाप तुम ब्राह्मणों को देवता बना रहे हैं। तो ब्रह्मा के बच्चे जरूर बनना पड़े। तुमको वर्सा मिलता है डाडे से। जब तक अपने को बी.के. नहीं समझें तब तक वर्सा कैसे मिले। फिर भी कोई कुछ न कुछ ज्ञान सुनते हैं तो साधारण प्रजा में आ जायेंगे। आना तो जरूर है। शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय धर्म की स्थापना करते हैं। सिवाए गीता के दूसरा कोई भी शास्त्र है नहीं। गीता है ही सर्वोत्तम दैवी धर्म का शास्त्र जिससे 3 धर्म स्थापन होते हैं। ब्राह्मण भी यहाँ बनना है। देवता भी यहाँ ही बनेंगे। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) हर एक के निश्चित पार्ट को जान सदा निश्चिंत रहना है। बनी बनाई बन रही……ड्रामा पर अडोल रहना है।

2) इस छोटे से संगमयुग पर बाप से पूरा वर्सा लेना है। याद के बल से खाद निकाल स्वयं को कौड़ी से हीरे जैसा बनाना है। मीठे झाड के सैपलिंग में चलने के लिए लायक बनना है।

वरदान:- आश्चर्यजनक दृश्य देखते हुए पहाड़ को राई बनाने वाले साक्षीदृष्टा भव
सम्पन्न बनने में अनेक नये-नये वा आश्चर्यजनक दृश्य सामने आयेंगे, लेकिन वह दृश्य साक्षीदृष्टा बनावें, हिलायें नहीं। साक्षी दृष्टा के स्थिति की सीट पर बैठकर देखने वा निर्णय करने से बहुत मजा आता है। भय नहीं लगता। जैसेकि अनेक बार देखी हुई सीन फिर से देख रहे हैं। वह राजयुक्त, योगयुक्त बन वायुमण्डल को डबल लाइट बनायेंगे। उन्हें पहाड़ समान पेपर भी राई के समान अनुभव होगा।
स्लोगन:- परिस्थितियों में आकर्षित होने के बजाए उन्हें साक्षी होकर खेल के रूप में देखो।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 5 MARCH 2021 : AAJ KI MURLI

05-03-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – जैसे बाप-दादा दोनों निरहंकारी हैं, देही-अभिमानी हैं, ऐसे फॉलो फादर करो, तो सदा उन्नति होती रहेगी”
प्रश्नः- ऊंच पद की प्राप्ति के लिए कौन सी खबरदारी रखना जरूरी है?
उत्तर:- ऊंच पद पाना है तो खबरदारी रखो कि मन्सा से भी किसी को मेरे द्वारा दु:ख न हो, 2- किसी भी परिस्थिति में क्रोध न आये, 3- बाप का बनकर बाप के कार्य में, इस रूद्र यज्ञ में विघ्न रूप न बनें। अगर कोई मुख से बाबा-बाबा कहे और चलन रॉयल न हो तो ऊंच पद नहीं मिल सकता।

ओम् शान्ति। बच्चे अच्छी तरह से जानते हैं कि बाप से वर्सा पाना है जरूर। कैसे? श्रीमत पर। बाप ने समझाया है एक ही गीता शास्त्र है जिसमें श्रीमत भगवानुवाच है। भगवान तो सबका बाप है। श्रीमत भगवानुवाच। तो जरूर भगवान ने आकर श्रेष्ठ बनाया होगा, तब तो उसकी महिमा है। श्रीमत भगवत गीता अर्थात् श्रीमत भगवानुवाच। भगवान तो जरूर ऊंच ते ऊंच ठहरा। श्रीमत भी उस ही एक शास्त्र में गाई हुई है और कोई शास्त्र में श्रीमत भगवानुवाच नहीं है। श्रीमत किसकी होनी चाहिए, वह लिखने वाले भी समझ न सकें। उसमें भूल क्यों हुई है? वह भी बाप आकर समझाते हैं। रावण राज्य शुरू होने से ही रावण मत पर चल पड़ते हैं। पहले कड़े ते कड़ी भूल इन रावण मत वालों ने की है। रावण की चमाट लगती है। जैसे कहा जाता है शंकर प्रेरक है, बॉम्बस आदि बनवाये हैं। वैसे 5 विकारों रूपी रावण प्रेरक है मनुष्य को पतित बनाने का, तब तो पुकारते हैं पतित-पावन आओ। तो पतित-पावन एक ही ठहरा ना। इससे सिद्ध है कि पतित बनाने वाला और है, पावन बनाने वाला और है। दोनों एक हो नहीं सकते। यह बातें तुम ही समझते हो – नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। ऐसे मत समझना कि सभी को निश्चय है। नम्बरवार हैं। जितना निश्चय है उतनी खुशी बढ़ती है। बाप की मत पर चलना होता है। श्रीमत पर हमको यह स्वराज्य पद पाना है। मनुष्य से देवता बनने में देरी नहीं लगती है। तुम पुरूषार्थ करते हो। मम्मा बाबा को फॉलो करते हो। जैसे वह आप समान बनाने की सर्विस कर रहे हैं, तुम भी समझते हो हम क्या सर्विस कर रहे हैं और मम्मा बाबा क्या सर्विस कर रहे हैं। बाबा ने समझाया था कि शिवबाबा और ब्रह्मा दादा दोनों इकट्ठे हैं। तो समझना चाहिए कि सबसे नजदीक हैं। इनका ही सम्पूर्ण रूप सूक्ष्मवतन में देखते हैं तो जरूर यह तीखा होगा। परन्तु जैसे बाप निरहंकारी है, देही-अभिमानी है वैसे यह दादा भी निरहंकारी है। कहते हैं कि शिवबाबा ही समझाते रहते हैं। जब मुरली चलती है तो बाबा खुद कहते हैं कि समझो कि शिवबाबा इन द्वारा सुना रहे हैं। यह ब्रह्मा भी जरूर सुनता होगा। यह न सुने और न सुनाये तो ऊंच पद कैसे पाये। परन्तु अपना देह-अभिमान छोड़ कहते हैं कि ऐसे समझो कि शिवबाबा ही सुनाते हैं। हम पुरूषार्थ करते रहते हैं। शिवबाबा ही समझाते हैं। इसने तो पतित-पना पास किया हुआ है। मम्मा तो कुमारी थी। तो मम्मा ऊंच चली गई। तुम भी कुमारियाँ मम्मा को फॉलो करो। गृहस्थियों को बाबा को फॉलो करना चाहिए। हर एक को समझना है कि मैं पतित हूँ, मुझे पावन बनना है। मुख्य बात बाप ने याद के यात्रा की सिखलाई है। इसमें देह-अभिमान नहीं रहना चाहिए। अच्छा कोई मुरली नहीं सुना सकते तो याद की यात्रा पर रहो। यात्रा पर रहते मुरली चला सकते हैं। परन्तु यात्रा भूल जाते हैं तो भी हर्जा नहीं। मुरली चलाकर फिर यात्रा पर लग जाओ क्योंकि वह वाणी से परे वानप्रस्थ अवस्था है। मूल बात है देही-अभिमानी हो बाप को याद करते रहें और चक्र को याद करते रहें। किसी को दु:ख न दें। यही समझाते रहें बाप को याद करो। यह है यात्रा। मनुष्य जब मरते हैं तो कहते हैं – स्वर्ग पधारा। अज्ञान काल में कोई स्वर्ग को याद नहीं करते हैं। स्वर्ग को याद करना माना यहाँ से मरना। ऐसे तो कोई याद नहीं करते। अभी तुम बच्चे जानते हो हमको वापिस जाना है। बाप कहते हैं – जितना तुम याद करेंगे उतना खुशी का पारा चढ़ेगा, वर्सा याद रहेगा। जितना बाप को याद करेंगे उतना हर्षित भी रहेंगे। बाप को याद न करने से मूँझते हैं। घुटका खाते रहते हैं। तुम इतना समय याद कर नहीं सकते। बाबा ने आशिक माशूक का मिसाल बताया है। वह भल धंधा करते हैं और वह भल चर्खा चलाती रहती तो भी उसके सामने माशूक आकर खड़ा हो जाता। आशिक माशूक को याद करते, माशूक फिर आशिक को याद करते। यहाँ तो सिर्फ तुमको एक बाप को याद करना है। बाप को तो तुमको याद नहीं करना है। बाप सबका माशूक है। तुम बच्चे लिखते हो कि बाबा आप हमको याद करते हो? अरे जो सबका माशूक है वह फिर तुम आशिकों को याद कैसे कर सकेंगे? हो नहीं सकता। वह है ही माशूक। आशिक बन नही सकता। तुमको ही याद करना है। तुम हर एक को आशिक बनना है, उस एक माशूक का। अगर वह आशिक बने तो कितने को याद करे। यह तो हो नहीं सकता। कहता है कि मेरे ऊपर पापों का बोझ थोड़ेही है जो किसको याद करूं। तुम्हारे ऊपर बोझा है। बाप को याद नहीं करेंगे तो पापों का बोझा नहीं उतरेगा। बाकी मुझे क्यों किसको याद करना पड़े। याद करना है तुम आत्माओं को। जितना याद करेंगे उतना पुण्य आत्मा बनेंगे, पाप कटते जायेंगे। बड़ी मंजिल है। देही-अभिमानी बनने में ही मेहनत है। यह नॉलेज सारी तुमको मिल रही है। तुम त्रिकालदर्शी बने हो, नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। सारा चक्र तुम्हारी बुद्धि में रहना चाहिए। बाप समझाते हैं तुम लाईट हाउस हो ना। हर एक को रास्ता बताने वाले हो, शान्तिधाम और सुखधाम का। यह सब नई बातें तुम सुनते हो। जानते हो कि बरोबर हम आत्मायें शान्तिधाम के रहवासी हैं। यहाँ पार्ट बजाने आते हैं। हम एक्टर हैं। यही चिंतन बुद्धि में चलता रहे तो मस्ती चढ़ जाये। बाप ने समझाया है आदि से लेकर अन्त तक तुम्हारा पार्ट है। अभी कर्मातीत अवस्था में जरूर जाना है फिर गोल्डन एज़ में आना है। इस धुन में रहते अपना कल्याण करना है। सिर्फ पण्डित नहीं बनना है। दूसरे को सिखाते रहेंगे, खुद उस अवस्था में नहीं रहेंगे तो असर पड़ेगा नहीं। अपना भी पुरूषार्थ करना है। बाप भी बताते हैं कि हम भी याद करने की कोशिश करता हूँ। कभी माया का तूफान ऐसा आता है जो बुद्धि का योग तोड़ देते हैं। बहुत बच्चे चार्ट भेज देते हैं। वन्डर खाता हूँ कि यह तो हमसे भी तीखे जाते हैं। शायद वेग आता है तो चार्ट लिखने में लग जाते हैं परन्तु ऐसी अगर तीखी दौड़ी पहनें तो नम्बरवन में चले जायें। परन्तु नहीं वह सिर्फ चार्ट लिखने तक है। ऐसे नहीं लिखते कि बाबा इतनों को आप समान बनाया। और वह भी लिखे बाबा हमको इसने यह रास्ता बताया है। ऐसा समाचार नहीं आता है। तो बाबा क्या समझेंगे? सिर्फ चार्ट भेजने से काम नहीं चलता। आप समान भी बनाना है। रूप और बसन्त दोनों बनना है। नहीं तो बाप समान नहीं ठहरे। रूप भी बसन्त भी एक्यूरेट बनना है, इसमें ही मेहनत है। देह-अभिमान मार डालता है। रावण ने देह-अभिमानी बनाया है। अभी तुम देही-अभिमानी बनते हो। फिर आधाकल्प के बाद माया रावण देह-अभिमानी बनाती है। देही-अभिमानी तो बहुत मीठा बन जाते हैं। सम्पूर्ण तो अभी कोई भी बना नहीं है इसलिए बाबा हमेशा कहते हैं कि किसी के भी दिल को रंज नहीं करना है, दु:ख नहीं देना है। सबको बाप का परिचय दो। बोलने करने की भी बड़ी रॉयल्टी चाहिए। ईश्वरीय सन्तान के मुख से सदैव रत्न निकलने चाहिए। तुम मनुष्यों को जीयदान देते हो। रास्ता बताना है और समझाना है। तुम परमात्मा के बच्चे हो ना। उनसे तुमको स्वर्ग की राजाई मिलनी चाहिए। फिर अब वह क्यों नहीं है। याद करो बरोबर बाप से वर्सा मिला था ना। तुम भारतवासी देवी देवतायें थे, तुमने ही 84 जन्म लिए। तुम समझो कि हम ही लक्ष्मी नारायण के कुल के थे। अपने को कम क्यों समझते हो। अगर कहते कि बाबा सब थोड़ेही बनेंगे। तो बाबा समझ जाता कि यह इस कुल का नहीं। अभी से ही थिरकने लग पड़ा है। तुमने 84 जन्म लिए हैं। बाप ने 21 जन्मों की प्रालब्ध जमा कराई वह खाया फिर ना (समाप्त) होना शुरू हो गई। कट चढ़ते-चढ़ते तमोप्रधान कौड़ी मिसल बन पड़े हो। भारत ही 100 प्रतिशत सॉलवेन्ट था। इन्हों को यह वर्सा कहाँ से मिला? एक्टर्स ही बता सकेंगे ना। मनुष्य ही एक्टर हैं। उनको यह पता होना चाहिए कि इन लक्ष्मी-नारायण को बादशाही मिली कहाँ से? कितनी अच्छी-अच्छी प्वाईट्स हैं। जरूर आगे जन्म में ही यह राज्य भाग्य पाया होगा।

बाप ही पतित-पावन है। बाप कहते हैं कि मैं तुमको कर्म, अकर्म और विकर्म की गति समझाता हूँ। रावण राज्य में मनुष्य के कर्म विकर्म हो जाते हैं। वहाँ तुम्हारे कर्म अकर्म होते हैं। वह है दैवी सृष्टि। मैं रचता हूँ तो जरूर मुझे संगम पर आना पड़े। यह है रावण राज्य। वह है ईश्वरीय राज्य। ईश्वर अब स्थापना करा रहे हैं। तुम सब ईश्वर के बच्चे हो, तुमको वर्सा मिल रहा है। भारतवासी ही सॉलवेन्ट थे, अब इनसॉलवेन्ट बन गये हैं। यह बना बनाया ड्रामा है, इसमें फ़र्क नहीं हो सकता। सबका झाड़ अपना-अपना है। वैराइटी झाड़ है ना। देवता धर्म वाले ही फिर देवता धर्म में आयेंगे। क्रिश्चियन धर्म वाले अपने धर्म में खुश हैं औरों को भी अपने धर्म में खींच लिया है। भारतवासी अपने धर्म को भूलने के कारण वह धर्म अच्छा समझ चले जाते हैं। विलायत में नौकरी के लिए कितने जाते हैं क्योंकि वहाँ कमाई बहुत है। ड्रामा बड़ा वण्डरफुल बना हुआ है। इसको समझने की अच्छी बुद्धि चाहिए। विचार सागर मंथन करने से सब कुछ समझ में आ जाता है। यह बना बनाया अनादि ड्रामा है। तो तुम बच्चों को आपसमान सदा सुखी बनाना है। यह तुम्हारा धन्धा है पतितों से पावन बनाना। जैसे बाप का धंधा वैसे तुम्हारा। तुम्हारा मुखड़ा सदैव देवताओं जैसा हर्षित होना चाहिए खुशी में। तुम जानते हो हम विश्व के मालिक बनते हैं। तुम हो लवली चिल्ड्रेन। क्रोध पर बड़ी खबरदारी रखनी है। बाप आये हैं बच्चों को सुख का वर्सा देने। स्वर्ग का रास्ता सबको बताना है। बाप सुख कर्ता, दु:ख हर्ता है। तो तुमको भी सुख कर्ता बनना है। किसको दु:ख नहीं देना है। दु:ख देंगे तो तुम्हारी सज़ा 100 गुणा बढ़ जायेगी। कोई भी सजा से बच नहीं सकता। बच्चों के लिए तो खास ट्रिब्युनल बैठती है। बाप कहते कि तुम विघ्न डालेंगे तो बहुत सजा खायेंगे। कल्प-कल्पान्तर तुम साक्षात्कार करेंगे कि फलाने यह बनेंगे। आगे जब देखते थे तो बाबा मना करते थे कि न सुनाओ। अन्त में तो एक्यूरेट मालूम पड़ता जायेगा। आगे चलकर जोर से साक्षात्कार होंगे। वृद्धि तो होती जायेगी। आबू तक क्यू लग जायेगी। बाबा से कोई भी मिल नहीं सकेंगे। कहेंगे अहो प्रभू तेरी लीला। यह भी गाया हुआ तो है ना। विद्वान, पण्डित आदि भी पीछे आयेंगे। उन्हों के सिंहासन भी हिलेंगे। तुम बच्चे तो बहुत खुशी में रहेंगे। अच्छा !

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार। ऐसी यादप्यार एक ही बार मिलती है। जितना तुम याद करते हो उतना तुम प्यार पाते हो। विकर्म विनाश होते हैं और धारणा भी होती है। बच्चों को खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए। जो भी आये उनको रास्ता बतायें। बेहद का वर्सा बेहद के बाप से पाना है। कम बात है क्या? ऐसा पुरूषार्थ करना चाहिए। अच्छा !

मीठे-मीठे सिकीलधे रूहानी बच्चों प्रति रूहानी बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बोलने चलने में बहुत रॉयल बनना है। मुख से सदैव रत्न निकालने हैं। आप समान बनाने की सेवा करनी है। किसी की दिल को रंज नहीं करना है।

2) क्रोध पर बड़ी खबरदारी रखनी है। मुखड़ा सदैव देवताओं जैसा हर्षित रखना है। स्वयं को ज्ञान योगबल से देवता बनाना है।

वरदान:- सदा पश्चाताप से परे, प्राप्ति स्वरूप स्थिति का अनुभव करने वाले सद्-बुद्धिवान भव
जो बच्चे बाप को अपने जीवन की नैया देकर मैं पन को मिटा देते हैं। श्रीमत में मनमत मिक्स नहीं करते वह सदा पश्चाताप से परे प्राप्ति स्वरूप स्थिति का अनुभव करते हैं। उन्हें ही सद्-बुद्धिवान कहा जाता है। ऐसे सद्-बुद्धि वाले तूफानों को तोफा समझ, स्वभाव-संस्कार की टक्कर को आगे बढ़ने का आधार समझ, सदा बाप को साथी बनाते हुए, साक्षी हो हर पार्ट देखते सदा हर्षित होकर चलते हैं।
स्लोगन:- जो सुखदाता बाप के सुखदाई बच्चे हैं उनके पास दु:ख की लहर आ नहीं सकती।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 4 MARCH 2021 : AAJ KI MURLI

04-03-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे-मीठे सर्विसएबुल बच्चे – ऐसा कोई भी काम नहीं करना जिससे सर्विस में कोई भी विघ्न पड़े”
प्रश्नः- संगमयुग पर तुम बच्चों को बिल्कुल एक्यूरेट बनना है, एक्यूरेट कौन बन सकते हैं?
उत्तर:- जो सच्चे बाप के साथ सदा सच्चे रहते हैं, अन्दर एक, बाहर दूसरा – ऐसा न हो। 2- जो शिवबाबा के सिवाए और बातों में नहीं जाते हैं। 3- हर कदम श्रीमत पर चलते हैं, कोई भी ग़फलत नहीं करते, वही एक्यूरेट बनते हैं।
गीत:- बचपन के दिन भुला न देना……

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों ने गीत के दो अक्षर सुने यह तो निश्चय करते हो – बेहद का बाप अभी बेहद सुख का वर्सा दे रहे हैं। ऐसे बाप के हम आकर बच्चे बने हैं तो बाप की श्रीमत पर भी चलना है। नहीं तो क्या होगा! अभी-अभी हंसते हो, कहते हो हम महाराजा महारानी बनेंगे और अगर हाथ छोड़ दिया तो फिर जाकर साधारण प्रजा बनेंगे। स्वर्ग में तो जरूर आयेंगे। ऐसे भी नहीं सब स्वर्ग में आने वाले हैं। जो सतयुग त्रेता में आने वाले होंगे, वही आयेंगे। सतयुग और त्रेता दोनों को मिलाकर स्वर्ग कहा जाता है। फिर भी जो पहले-पहले नई दुनिया में आते हैं वह अच्छा सुख पाते हैं बाकी जो बाद में आने वाले हैं वह कोई आकर ज्ञान नहीं लेंगे। ज्ञान लेने वाले सतयुग त्रेता में आयेंगे। बाकी आते ही हैं रावण राज्य में। वह थोड़ा सा सुख पा सकेंगे। सतयुग त्रेता में तो बहुत सुख है ना इसलिए पुरूषार्थ करके बाप से बेहद सुख का वर्सा पाना चाहिए और यह महान खुशखबरी लिखो – कार्डस जो छपवाते हैं उसमें भी यह लिखना चाहिए – ऊंच ते ऊंच बेहद के बाप की खुशखबरी। प्रदर्शनी में तुम दिखाते हो नई दुनिया कैसे स्थापन होती है। तो यह क्लीयर और बड़े अक्षरों में लिखना चाहिए। बेहद का बाप ज्ञान का सागर, पतित-पावन, सद्गति दाता गीता का भगवान शिव कैसे ब्रह्माकुमार कुमारियों द्वारा फिर से कलियुगी सम्पूर्ण विकारी, भ्रष्टाचारी पतित दुनिया को सतयुगी सम्पूर्ण निर्विकारी पावन श्रेष्ठाचारी दुनिया बना रहे हैं। वह खुशखबरी आकर सुनो अथवा समझो। गवर्नमेन्ट से भी तुम्हारी यह प्रतिज्ञा है कि हम भारत में फिर से सतयुगी श्रेष्ठाचारी 100 प्रतिशत पवित्रता सुख-शान्ति का दैवी स्वराज्य कैसे स्थापन कर रहे हैं और इस विकारी दुनिया का विनाश कैसे होगा सो आकर समझो। ऐसा क्लीयर लिखना चाहिए। कार्ड में ऐसे लिखो जो मनुष्य अच्छी रीति समझ सकें। यह प्रजापिता ब्रह्माकुमार कुमारियाँ कल्प पहले मिसल ड्रामा प्लैन अनुसार परमपिता परमात्मा शिव की श्रीमत पर सहज राजयोग और पवित्रता के बल से, अपने तन-मन-धन से भारत को ऐसा श्रेष्ठाचारी पावन कैसे बना रहे हैं, सो आकर समझो। क्लीयर करके कार्ड में छपाना चाहिए, जो कोई भी समझ जाए। यह बी.के. शिवबाबा की मत पर रामराज्य स्थापन कर रहे हैं, जो गांधी जी की चाहना थी। अखबार में भी ऐसा फुल निमन्त्रण पड़ जाए। यह जरूर समझाना है कि प्रजापिता ब्रह्माकुमार कुमारियाँ अपने तन-मन-धन से यह कर रहे हैं। तो मनुष्य ऐसा कभी न समझें कि यह कोई भीख वा डोनेशन आदि मांगते हैं। दुनिया में तो सब डोनेशन पर ही चलते हैं। यहाँ तुम कहते हो कि हम बी.के. अपने तन-मन-धन से कर रहे हैं। वह खुद ही स्वराज्य लेते हैं तो जरूर अपना ही खर्चा करेंगे। जो मेहनत करते हैं उनको ही 21 जन्मों के लिए वर्सा मिलता है। भारतवासी ही 21 जन्मों के लिए श्रेष्ठाचारी डबल सिरताज बनते हैं। यह लक्ष्मी-नारायण डबल सिरताज हैं ना। अभी तो कोई ताज नहीं रहा है। तो यह अच्छी रीति समझाना पड़े। बाप समझाते हैं ऐसे-ऐसे लिखो तो बिचारों को मालूम पड़े कि बी.के. क्या कर रहे हैं। बड़ों का आवाज होगा तो फिर गरीबों का भी सुनेंगे। नहीं तो गरीब की कोई बात नहीं सुनते। साहूकार का आवाज झट होता है। तुम सिद्धकर बतलाते हो हम खास भारत को स्वर्ग बनाते हैं। बाकी सबको शान्तिधाम में भेज देंगे। समझाना भी ऐसे है। भारत 5 हजार वर्ष पहले ऐसा स्वर्ग था। अभी तो कलियुग है, वह सतयुग था। अब बताओ सतयुग में कितने आदमी थे। अभी कलियुग का अन्त है। यह वही महाभारत महाभारी लड़ाई है। और कोई समय तो ऐसी लड़ाई लगी ही नहीं है। यह भी थर्ड वार पिछाड़ी को हुई है। ट्राई करते हैं ना। अब तो एटॉमिक बॉम्बस बनाते रहते हैं। किसकी भी सुनते नहीं हैं। वह कहते हैं जो बॉम्बस बनाये हुए हैं वह सब समुद्र में डाल दो तो हम भी नहीं बनायें। तुम रखो और हम न बनायें यह कैसे हो सकता। परन्तु तुम बच्चे जानते हो यह तो भावी बनी हुई है। कितना भी उन्हों को मत दें, समझेंगे नहीं। विनाश न हो तो राज्य कैसे करेंगे। तुम बच्चों को तो निश्चय है ना। संशय बुद्धि जो हैं वह भागन्ती हो जाते हैं, ट्रेटर बन जाते हैं। बाप का बनकर फिर ट्रेटर नहीं बनना है। तुमको तो याद करना है शिवबाबा को और बातों से क्या फायदा। सच्चे बाप के साथ सच्चा बनना है। अन्दर एक बाहर में दूसरी रखेंगे तो अपना पद भ्रष्ट कर देंगे। अपना ही नुकसान करेंगे। कल्प – कल्पान्तर के लिए कभी भी ऊंच पद पा नहीं सकेंगे इसलिए इस समय बहुत एक्यूरेट बनना है। कोई ग़फलत नहीं करनी चाहिए। जितना हो सके श्रीमत पर रहना है। निरन्तर याद तो पिछाड़ी में रहेगी। सिवाए एक बाप के और कोई की याद न रहे। गाया हुआ भी है अन्तकाल जो स्त्री सिमरे… जिसमें मोह होगा तो वह याद आ पड़ेगी। आगे चल जितना तुम नज़दीक आते जायेंगे, साक्षात्कार होता जायेगा। बाबा हर एक को दिखायेंगे तुमने ऐसा-ऐसा काम किया है। शुरू-शुरू में भी तुमने साक्षात्कार किये हैं। सज़ायें जो भोगते थे वो बहुत ही चिल्लाते थे। बाबा कहते हैं तुमको दिखलाने के लिए इनकी सौगुणी सज़ायें कटवा दी। तो ऐसा काम नहीं करना है जो बाबा की सर्विस में विघ्न पड़े। पिछाड़ी में भी सब तुमको साक्षात्कार होंगे। ऐसे-ऐसे तुमने बाप की सर्विस में विघ्न बहुत डाल नुकसान किया है। आसुरी सम्प्रदाय हैं ना। जिन्होंने विघ्न डाले हैं उनको बहुत सजा मिलती है। शिवबाबा की बहुत बड़ी दरबार है। राइटहैण्ड में धर्मराज भी है। वह हैं हद की सजायें। यहाँ तो 21 जन्म का घाटा पड़ जाता है, पद भ्रष्ट हो जाता है। हर बात में बाप समझाते रहते हैं। तो ऐसे कोई न कहे कि हमको पता नहीं था इसलिए बाबा सब सावधानी देते रहते हैं। देखते हैं हर एक सेन्टर में कितने भागन्ती होते हैं। तंग करते हैं। विकारी बन जाते हैं। स्कूल में तो पूरी रीति पढ़ना चाहिए। नहीं तो क्या पद पायेंगे। पद का बहुत फर्क पड़ जाता है। जैसे यहाँ दु:खधाम में कोई प्रेजीडेंट है, कोई साहूकार है, कोई गरीब है वैसे वहाँ सुखधाम में भी पद तो नम्बरवार होंगे। जो रॉयल बुद्धिवान बच्चे होंगे, वह बाप से पूरा वर्सा लेने की कोशिश करेंगे। माया की बाक्सिंग है ना। माया बहुत प्रबल है हार जीत होती रहती है। कितने आते हैं फिर ट्रेटर बन चले जाते हैं। चलते-चलते फेल हो जाते हैं। बहुत कहते हैं यह हो कैसे सकता। यह तो कभी नहीं सुना कि गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र रह सकते हैं। अरे भगवानुवाच है ना – काम महाशत्रु है। गीता में भी यह अक्षर है ना। तुम जानते हो सतयुग में हैं दैवीगुणों वाले मनुष्य और कलियुग में हैं आसुरी अवगुणों वाले। आसुरी गुणों वाले दैवी गुण वालों की महिमा गाते हैं। कितना फ़र्क है। अभी तुम समझते हो हम क्या थे, क्या बन रहे हैं। यहाँ तुमको सब गुण धारण करने हैं। खान-पान आदि भी सतोगुणी खाना है। देखना है देवताओं को क्या खिलाते हैं। श्रीनाथ द्वारे में जाकर देखो – कितने माल अथवा शुद्ध भोजन बनता है। वहाँ हैं ही वैष्णव। और वहाँ जगन्नाथ पुरी में देखो क्या मिलता है? चावल। वहाँ है वाम मार्ग के बहुत गन्दे चित्र। जब राजाई थी तो 36 प्रकार के भोजन मिलते थे। तो श्रीनाथ द्वारे में बहुत माल बनते हैं। पुरी और श्रीनाथ का अलग-अलग है। पुरी के मन्दिर में बहुत गन्दे चित्र हैं, देवताओं की ड्रेस में। तो भोग भी विशेष चावल का लगता है। उसमें घी भी नहीं डालते। यह फ़र्क दिखाते हैं। भारत क्या था फिर क्या बन गया। अभी तो देखो क्या हालत है। पूरा अन्न भी नहीं मिलता है। उन्हों के प्लैन और शिवबाबा के प्लैन में रात दिन का फ़र्क है। वह सब प्लैन मिट्टी में मिल जायेंगे। नेचुरल कैलेमिटीज होगी। अनाज आदि कुछ नहीं मिलेगा, बरसात कहाँ देखो तो बहुत पड़ती। कहाँ बिल्कुल पड़ती नहीं। कितना नुकसान कर देती है। इस समय तत्व भी तमोप्रधान हैं तो बरसात भी उल्टे सुल्टे टाईम पर पड़ती रहती है। तूफान भी तमोप्रधान, सूर्य भी तपत ऐसी करेंगे जो बात मत पूछो। यह नेचुरल कैलेमिटीज ड्रामा में नूँध हैं। उन्हों की है विनाश काले विप्रीत बुद्धि। तुम्हारी है बाप के साथ प्रीत बुद्धि। अज्ञान काल में भी सपूत बच्चों पर माँ बाप का प्यार रहता है इसलिए बाबा कहते भी हैं नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार यादप्यार…जितना-जितना सर्विस करेंगे…खिद्मत तो करनी है ना। भारत की खास और दुनिया की आम, भारत को स्वर्ग बनाना है। बाकी सबको भेज देना है शान्तिधाम। भारत को स्वर्ग का वर्सा मिलता है, बाकी सबको मुक्ति का वर्सा मिलता है। सब चले जायेंगे। हाहाकार के बाद जयजयकार हो जायेगा। कितना हाहाकार मचेगा। यह है ही खूने नाहेक खेल। नेचुरल कैलेमिटीज़ भी आयेंगी। मौत तो सबका होना ही है।

बाप बच्चों को समझाते हैं पूरा पुरूषार्थ कर लो। बाप के साथ सदैव फरमानबरदार, वफादार बनना है। सर्विसएबुल बनना है। जिन्होंने कल्प पहले जैसी सेवा की है, उनका साक्षात्कार होता रहेगा। तुम साक्षी हो देखते रहेंगे। तुम अभी स्वदर्शन चक्रधारी बने हो। सदैव बुद्धि में स्वदर्शन चक्र फिरता रहना चाहिए। हमने 84 जन्म ऐसे-ऐसे लिए हैं। अभी हम वापिस घर जाते हैं। बाप भी याद रहे, घर भी याद रहे, सतयुग भी याद रहे। सारा दिन बुद्धि में यही चिंतन करना है। अभी हम विश्व का महाराजकुमार बनेंगे। हम श्री लक्ष्मी वा श्री नारायण बनेंगे। नशा चढ़ना चाहिए ना। बाबा को नशा रहता है। बाबा रोज़ इस (लक्ष्मी-नारायण के) चित्र को देखते हैं, अन्दर में नशा रहता है ना। बस कल हम जाकर यह श्रीकृष्ण बनेंगे। फिर स्वयंवर बाद श्रीनारायण बनेंगे। तत्त्वम्। तुम भी तो बनेंगे ना। यह है ही राजयोग। प्रजा योग है नहीं। आत्माओं को फिर से अपना राज्य भाग्य मिलता है। बच्चों ने राज्य गँवाया था। अब फिर राज्य ले रहे हैं। बाबा यह चित्र आदि बनाते ही इसलिए हैं कि तुम बच्चों को देखकर खुशी हो। 21 जन्म के लिए हम स्वर्ग का राज्य भाग्य पा रहे हैं। कितना सहज है। यह शिवबाबा, यह प्रजापिता ब्रह्मा इन द्वारा यह राजयोग सिखलाते हैं। फिर हम यह जाकर बनेंगे। देखने से ही खुशी का पारा चढ़ जाता है। हम बाप की याद में रहने से विश्व का राजकुमार बनेंगे। कितनी खुशी रहनी चाहिए। हम भी पढ़ रहे हैं, तुम भी पढ़ रहे हो। इस पढ़ाई के बाद हम जाकर यह बनेंगे। सारा मदार पढ़ाई पर है। जितना पढ़ेंगे उतना कमाई होगी ना। बाबा ने बतलाया है कोई सर्जन तो इतने होशियार होते हैं जो लाख रूपया भी एक केस पर कमाते हैं। बैरिस्टर्स में भी ऐसे होते हैं। कोई तो बहुत कमाते हैं, कोई को देखो तो कोट भी फटा हुआ पड़ा होगा। यह भी ऐसे है इसलिए बाबा बार-बार कहते हैं बच्चे, कोई भी ग़फलत नहीं करो। सदैव श्रीमत पर चलो। श्री श्री शिवबाबा से तुम श्रेष्ठ बनते हो। तुम बच्चों ने बाप से अनेक बार वर्सा लिया है और गँवाया है। 21 जन्मों का वर्सा आधाकल्प के लिए मिलता है। आधाकल्प 2500 वर्ष सुख पाते हो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) अन्दर बाहर सच्चा रहना है। पढ़ाई में कभी भी ग़फलत नहीं करना है। कभी भी संशय बुद्धि बन पढ़ाई नहीं छोड़नी है। सर्विस में विघ्न रूप नहीं बनना है।

2) सबको यही खुशखबरी सुनाओ कि हम पवित्रता के बल से, श्रीमत पर अपने तन-मन-धन के सहयोग से 21 जन्मों के लिए भारत को श्रेष्ठाचारी डबल सिरताज बनाने की सेवा कर रहे हैं।

वरदान:- सेकण्ड में संकल्पों को स्टॉप कर अपने फाउन्डेशन को मजबूत बनाने वाले पास विद आनर भव
कोई भी पेपर परिपक्व बनाने के लिए, फाउण्डेशन को मजबूत करने के लिए आते हैं, उसमें घबराओ नहीं। बाहर की हलचल में एक सेकेण्ड में स्टॉप करने का अभ्यास करो, कितना भी विस्तार हो एक सकेण्ड में समेट लो। भूख प्यास, सर्दी गर्मी सब कुछ होते हुए संस्कार प्रकट न हों, समेटने की शक्ति द्वारा स्टॉप लगा दो। यही बहुत समय का अभ्यास पास विद आनर बना देगा।
स्लोगन:- अपने सुख शान्ति के वायब्रेशन से लोगों को सुख चैन की अनुभूति कराना ही सच्ची सेवा है।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 3 MARCH 2021 : AAJ KI MURLI

03-03-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम सच्चे-सच्चे सत्य बाप से सत्य कथा सुनकर नर से नारायण बनते हो, तुम्हें 21 जन्म के लिए बेहद के बाप से वर्सा मिल जाता है”
प्रश्नः- बाप की किस आज्ञा को पालन करने वाले बच्चे ही पारसबुद्धि बनते हैं?
उत्तर:- बाप की आज्ञा है – देह के सब सम्बन्धों को भूलकर बाप को और राजाई को याद करो। यही सद्गति के लिए सतगुरू की श्रीमत है। जो इस श्रीमत को पालन करते अर्थात् देही-अभिमानी बनते हैं वही पारसबुद्धि बनते हैं।
गीत:- आज अन्धेंरे में हम इन्सान …

ओम् शान्ति। यह कलियुगी दुनिया है। सब अन्धेरे में हैं, यही भारत सोझरे में था। जब यह भारत स्वर्ग था। यही भारतवासी जो अब अपने को हिन्दू कहलाते हैं, यह असुल देवी देवतायें थे। भारतवासी स्वर्गवासी थे। जब कोई धर्म नहीं था, एक ही धर्म था। स्वर्ग, बैकुण्ठ, बहिश्त, हेविन यह सब भारत के नाम थे। भारत प्राचीन पवित्र बहुत-बहुत धनवान था। अभी तो भारत कंगाल है क्योंकि अब कलियुगी है। वह सतयुग था। तुम सब भारतवासी हो। तुम जानते हो हम अन्धियारे में हैं जब स्वर्ग में थे तो सोझरे में थे। स्वर्ग के राज राजेश्वर, राज-राजेश्वरी लक्ष्मी-नारायण थे। उनको सुखधाम कहा जाता है। नये-नये आते हैं तो बाप फिर समझाते हैं। बाप से ही तुमको स्वर्ग का वर्सा लेना है, जिसको जीवनमुक्ति कहा जाता है। अभी सब जीवनबन्ध में हैं। खास भारत आम दुनिया, रावण की जेल शोक वाटिका में हैं। ऐसे नहीं कि रावण सिर्फ लंका में था और राम भारत में था और उसने आकर सीता चुराई। यह सब हैं दन्त कथायें। गीता है मुख्य, सर्व शास्त्रों में शिरोमणी श्रीमत अर्थात् भगवान की सुनाई हुई गीता। मनुष्य तो कोई की सद्गति कर नहीं सकते। सतयुग में थे जीवनमुक्त देवी देवतायें, जिन्होंने यह वर्सा कलियुग अन्त में पाया था। भारत को यह पता नहीं था, न कोई शास्त्र में है। शास्त्र तो सब हैं भक्ति मार्ग के लिए। वह सब भक्ति मार्ग का ज्ञान है। सद्गति मार्ग का ज्ञान मनुष्य मात्र में है नहीं। बाप कहते हैं कि मनुष्य, मनुष्य के गुरू बन नहीं सकते। गुरू कोई सद्गति दे नहीं सकते। वह गुरू कहेंगे भक्ति करो, दान पुण्य करो। भक्ति द्वापर से चली आई है। सतयुग त्रेता में है ज्ञान की प्रालब्ध। ऐसे नहीं वहाँ यह ज्ञान चला आता है। यह जो वर्सा भारत को था, यह बाप से संगम पर ही मिला था। जो फिर अभी तुमको मिल रहा है। भारतवासी, नर्कवासी महान दु:खी बन जाते हैं तब पुकारते हैं हे पतित-पावन दु:ख हर्ता सुख कर्ता, किसका? सर्व का क्योंकि खास भारत दुनिया आम में 5 विकार हैं ही हैं। बाप है पतित-पावन। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प, कल्प के संगम पर आता हूँ और सर्व का सद्गति दाता बनता हूँ। अबलाओं, अहिल्याओं, गणिकाओं और गुरू लोग जो हैं उनका भी उद्धार मुझे करना है क्योंकि यह तो है ही पतित दुनिया। पावन दुनिया सतयुग को कहा जाता है। भारत में इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। यह भारतवासी नहीं जानते कि यह स्वर्ग के मालिक थे। पतित खण्ड माना झूठ खण्ड, पावन खण्ड माना सचखण्ड। भारत पावन खण्ड था। इन लक्ष्मी-नारायण की सूर्यवंशी डिनायस्टी थी। यह भारत है अविनाशी खण्ड, जो कभी विनाश नहीं होता। जब इनका राज्य था तो और कोई खण्ड था नहीं। वह सब बाद में आते हैं। शास्त्रों में सबसे बड़ी भूल तो यह की है जो कल्प लाखों वर्ष का लिख दिया है। बाप कहते हैं कि न तो कल्प लाखों वर्ष का होता, न सतयुग लाखों वर्ष का होता। कल्प की आयु 5 हजार वर्ष है। यह फिर कह देते कि मनुष्य 84 लाख जन्म लेते। मनुष्य को कुत्ता-बिल्ली आदि बना दिया है। परन्तु उनका जन्म अलग है। 84 लाख वैराइटी है। मनुष्यों की वैराइटी एक है, उनके ही 84 जन्म हैं।

बाप कहते हैं बच्चे तुम आदि सनातन देवी देवता धर्म के थे। भारतवासी अपने धर्म को ड्रामा प्लैन अनुसार भूल गये हैं। कलियुग अन्त में बिल्कुल पतित बन पड़े हैं। फिर बाप आकर संगम पर पावन बनाते हैं, इनको कहा जाता है दु:खधाम। फिर पार्ट सुखधाम में होगा। बाप कहते हैं – हे बच्चों तुम भारतवासी ही स्वर्गवासी थे। फिर तुम 84 जन्मों की सीढ़ी उतरते हो। सतो से रजो, तमो में जरूर आना है। तुम देवताओं जितना धनवान एवरहैपी, एवरहेल्दी कोई नहीं होता। भारत कितना साहूकार था। हीरे जवाहरात तो बड़े-बड़े पत्थरों मिसल थे, कितने तो टूट गये हैं। बाप तुम बच्चों को स्मृति दिलाते हैं कि तुमको कितना साहूकार बनाया था। तुम सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण थे। यथा राजा रानी….. इन्हों को भगवान भगवती भी कह सकते हैं। परन्तु बाप ने समझाया है कि भगवान एक है, वह बाप है। सिर्फ ईश्वर वा प्रभू कहने से भी याद नहीं आता कि वो सभी आत्माओं का बाप है। यह तो है बेहद का बाप। वह समझाते हैं कि भारतवासी तुम जयन्ती मनाते हो परन्तु असुल में बाप कब आये थे, वह कोई भी नहीं जानते हैं। हैं ही आइरन एजेड, पत्थरबुद्धि। पारसनाथ थे, इस समय पत्थरनाथ हैं। नाथ भी नहीं कहेंगे क्योंकि राजा रानी तो हैं नहीं। पहले यहाँ दैवी राजस्थान था फिर आसुरी राज्य बन जाता है। यह खेल है। वह है हद का ड्रामा। यह है बेहद का ड्रामा। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी आदि से अन्त तक तुम अभी जानते हो और कोई भी नहीं जानते। भारत में जब देवी देवता थे तो सारी सृष्टि के मालिक थे और भारत में ही थे। बाप भारतवासियों को स्मृति दिलाते हैं। सतयुग में आदि सनातन देवी देवता, इन्हों का श्रेष्ठ धर्म, श्रेष्ठ कर्म था फिर 84 जन्मों में उतरना पड़े। यह बाप बैठ कहानी सुनाते हैं कि अब तुम्हारे बहुत जन्मों के अन्त का जन्म है। एक की बात नहीं। न युद्ध का मैदान आदि ही है। भारतवासी यह भी भूल गये हैं कि इन्हों का (लक्ष्मी-नारायण का) राज्य था। सतयुग की आयु लम्बी करने से बहुत दूर ले गये हैं।

बाप समझाते हैं कि मनुष्य को भगवान नहीं कह सकते। मनुष्य, मनुष्य की सद्गति नहीं कर सकते। कहावत है कि सर्व का सद्गति दाता पतितों को पावन कर्ता एक है। यह है झूठ खण्ड। सच्चा बाबा सचखण्ड स्थापन करने वाला है। भक्त पूजा करते हैं परन्तु भक्ति मार्ग में जिसकी भी पूजा करते आये हैं, एक की भी बायोग्राफी नहीं जानते हैं। शिव जयन्ती तो मनाते हैं। बाप है नई दुनिया का रचयिता। हेविनली गाड फादर। बेहद सुख देने वाला। सतयुग में सुख था। वह कैसे और किसने स्थापन किया? नर्कवासियों को स्वर्गवासी बनाया। भ्रष्टाचारियों को श्रेष्ठाचारी देवता बनाया। यह तो बाप का ही काम है। तुम बच्चों को पावन बनाता हूँ। तुम स्वर्ग के मालिक बनते हो। फिर तुमको पतित कौन बनाते हैं? यह रावण। मनुष्य कह देते हैं – सुख दु:ख ईश्वर देते हैं। बाप कहते हैं मैं तो सबको सुख देता हूँ। आधाकल्प फिर तुम बाप का सिमरण नहीं करेंगे फिर जब रावण राज्य होता है तो सबकी पूजा करने लग पड़ते हैं। यह तुम्हारा बहुत जन्मों के अन्त का जन्म है। कहते हैं बाबा हमने कितने जन्म लिए हैं? बाप कहते बच्चे, तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो। तुमने पूरे 84 जन्म लिए हैं। तुम 21 जन्म लिए बेहद के बाप से वर्सा लेने आये हो अर्थात् सच्चे-सच्चे सत्य बाबा से सत्य कथा, नर से नारायण बनने का ज्ञान सुनते हो। यह है ज्ञान, वह है भक्ति। यह स्प्रीचुअल नॉलेज सुप्रीम रूह आकर देते हैं। बच्चों को देही-अभिमानी बनना पड़े। अपने को आत्मा निश्चय कर मामेकम् याद करो। शिवबाबा तो सभी आत्माओं का बाप है। आत्मायें सब परमधाम से पार्ट बजाने आती हैं, शरीर में। इसको कर्मक्षेत्र कहा जाता है। बड़ा भारी खेल है। आत्मा में बुरे वा अच्छे संस्कार रहते हैं। जिस अनुसार ही मनुष्य को जन्म मिलता है अच्छा वा बुरा। यह जो पावन था, अभी पतित है, ततत्वम्। मुझ बाप को इस पराये रावण की दुनिया, पतित शरीर में आना पड़ता है। आना भी उसमें है जो पहले नम्बर में जाना है। सूर्यवंशी ही पूरे 84 जन्म लेते हैं। यह है ब्रह्मा और ब्राह्मण। बाप समझाते हैं रोज़, लेकिन पत्थरबुद्धि को पारसबुद्धि बनाना मासी का घर नहीं हैं। हे आत्मायें अब देही-अभिमानी बनो, हे आत्मायें एक बाप को याद करो और राजाई को याद करो। देह के संबंधों को छोड़ो तो पारसबुद्धि बन जायेंगी। मरना तो सबको है। सबकी अब वानप्रस्थ अवस्था है। एक सतगुरू बिगर सर्व का सद्गति दाता कोई हो नहीं सकता। बाप कहते हैं हे भारतवासी बच्चों तुम पहले पारसबुद्धि थे। गाया हुआ है कि आत्मा परमात्मा अलग रहे… तो पहले-पहले तुम भारतवासी देवी-देवता धर्म वाले आये हो और धर्म वाले पीछे आये हैं तो उन्हों के जन्म भी थोड़े होते हैं। सारा सृष्टि का झाड़ कैसे फिरता है वह बाप बैठ समझाते हैं। जो धारणा कर सकते हैं, उनके लिए बहुत सहज है। आत्मा धारण करती है। पुण्य आत्मा और पाप आत्मा तो आत्मा बनती है। तुम्हारा अन्तिम 84 वाँ जन्म है। तुम वानप्रस्थ अवस्था में हो। वानप्रस्थ अवस्था वाले गुरू करते हैं – मन्त्र लेने लिए। तुमको अब बाहर का मनुष्य गुरू करना नहीं है। तुम सभी का मैं बाप टीचर सतगुरू हूँ। मुझे कहते ही हैं – हे पतित-पावन शिवबाबा। अभी स्मृति आई है, सभी आत्माओं का यह बाप है। आत्मा सत्य है, चैतन्य है क्योंकि अमर है। सभी आत्माओं में पार्ट भरा हुआ है। बाप भी सत्य चैतन्य है। वह मनुष्य सृष्टि का बीजरूप होने कारण कहते हैं कि मैं सारे झाड़ के आदि-मध्य-अन्त को जानता हूँ, इसलिए मुझे नॉलेजफुल कहा जाता है। तुमको भी सारी नॉलेज है कि बीज से झाड़ कैसे निकलता है। झाड़ बढ़ने में तो टाइम लगता है। बाप कहते हैं कि मैं बीजरूप हूँ। अन्त में सारा झाड़ जड़जड़ीभूत अवस्था को पाता है। अभी देखो देवी देवता धर्म का फाउण्डेशन है नहीं। प्राय:लोप है। जब देवी-देवता धर्म गुम हो जाता है तब बाप को आना पड़े। एक धर्म की स्थापना कर बाकी सबका विनाश करा देते हैं। प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा बाप स्थापना करा रहे हैं आदि सनातन देवी देवता धर्म की। तुम आये हो भ्रष्टाचारी से श्रेष्ठाचारी देवता बनने। यह ड्रामा बना हुआ है, इनकी एन्ड नहीं होती। बाप आते हैं। आत्मायें सब ब्रदर्स हैं, मूलवतन में रहने वाली। जो उस एक बाप को सब याद करते हैं। दु:ख में सिमरण सब करें … रावण राज्य में दु:ख है। यहाँ सिमरण करते हैं तो बाप सर्व का सद्गति दाता एक है। उनकी महिमा है। बाप न आये तो पावन कौन बनाये। क्रिश्चियन, इस्लामी आदि जो भी मनुष्य हैं इस समय सब तमोप्रधान हैं। सभी को पुनर्जन्म जरूर लेना है। अभी पुनर्जन्म मिलता है नर्क में। ऐसे नहीं कि सुख में चले जाते हैं। जैसे हिन्दू धर्म वाले कहते हैं कि स्वर्गवासी हुआ तो जरूर नर्क में था ना। अभी स्वर्ग में गया, तुम्हारे मुख में गुलाब। जब स्वर्गवासी हुआ फिर उसको नर्क के आसुरी वैभव क्यों खिलाते हो! पित्र खिलाते हैं ना। बंगाल में मछली, अण्डे आदि खिलाते हैं। अरे, उनको यह सब खाने की दरकार क्या है! वापिस कोई जा नहीं सकता। जबकि पहले नम्बर वालों को 84 जन्म लेना पड़ता है। इस ज्ञान में कोई तकलीफ नहीं है। भक्ति मार्ग में कितनी मेहनत है। राम-राम जपते रोमांच खड़े हो जाते हैं। यह सब है भक्ति मार्ग। यह सूर्य चाँद आदि रोशनी करने वाले हैं, यह देवता थोड़ेही हैं। वास्तव में ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा और ज्ञान सितारे यहाँ की महिमा है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) इस अन्तिम 84 वें जन्म में कोई भी पाप कर्म (विकर्म) नहीं करना है। पुण्य आत्मा बनने का पूरा-पूरा पुरूषार्थ करना है। सम्पूर्ण पावन बनना है।

2) अपनी बुद्धि को पारसबुद्धि बनाने के लिए देह के सब सम्बन्धों को भूल देही-अभिमानी बनने का अभ्यास करना है।

वरदान:- कम्पन्नी और कम्पैनियन को समझकर साथ निभाने वाले श्रेष्ठ भाग्यवान भव
ड्रामा के भाग्य प्रमाण आप थोड़ी सी आत्मायें हो जिन्हें सर्व प्राप्ति कराने वाली श्रेष्ठ ब्राह्मणों की कम्पनी मिली है। सच्चे ब्राह्मणों की कम्पनी चढ़ती कला वाली होती है, वे कभी ऐसी कम्पनी (संग) नहीं करेंगे जो हरती कला में ले जाए। जो सदा श्रेष्ठ कम्पन्नी में रहते और एक बाप को अपना कम्पैनियन बनाकर उनसे ही प्रीति की रीति निभाते हैं वही श्रेष्ठ भाग्यवान हैं।
स्लोगन:- मन और बुद्धि को एक ही पावरफुल स्थिति में स्थित करना यही एकान्तवासी बनना है।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 2 MARCH 2021 : AAJ KI MURLI

02-03-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम्हें सद्गति की सबसे न्यारी मत मिली है कि देह के सब धर्म त्याग आत्म अभिमानी भव, मामेकम् याद करो”
प्रश्नः- जो परमात्मा को नाम रूप से न्यारा कहते हैं, उनसे तुम कौन सा प्रश्न पूछ सकते हो?
उत्तर:- उनसे पूछो – गीता में जो दिखाते हैं अर्जुन को अखण्ड ज्योति स्वरूप का साक्षात्कार हुआ, बोला बस करो हम सहन नहीं कर सकते। तो फिर नाम रूप से न्यारा कैसे कहते हो। बाबा कहते हैं मैं तो तुम्हारा बाप हूँ। बाप का रूप देखकर बच्चा खुश होगा, वह कैसे कहेगा मैं सहन नहीं कर सकता।
गीत:- तेरे द्वार खड़ा…

ओम् शान्ति। भक्त कहते हैं हम बहुत कंगाल बन गये हैं। हे बाबा हम सबकी झोली भर दो। भगत गाते रहते हैं जन्म बाई जन्म। सतयुग में भक्ति होती नहीं। वहाँ पावन देवी देवता होते हैं। भक्तों को कभी देवता नहीं कहा जाता। जो स्वर्गवासी देवी देवता होते हैं वह फिर पुनर्जन्म लेते-लेते नर्कवासी, पुजारी, भगत, कंगाल बनते हैं। बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं। बाप को एक भी मनुष्य नहीं जानते। बाप जब आये तब आकर अपना परिचय देवे। भगवान को ही बाबा कहा जाता है। सब भक्तों का है एक भगवान। बाकी सब हैं भगत। चर्च आदि में जाते हैं तो जरूर भक्त ठहरे ना। इस समय सब पतित तमोप्रधान हैं, इसलिए सब पुकारते हैं हे पतितों को पावन बनाने वाले आओ। हे बाबा हम भक्तों की झोली भर दो। भक्त भगवान से धन मांगते हैं। तुम बच्चे क्या मांगते हो? तुम कहते हो बाबा हमको स्वर्ग का मालिक बनाओ। वहाँ तो अथाह धन होता है। हीरे जवाहरात के महल होते हैं। अभी तुम जानते हो हम भगवान द्वारा राजाई का वर्सा पा रहे हैं। यह सच्ची गीता है। वह गीता नहीं। वह तो पुस्तक आदि भक्तिमार्ग के लिए बनाये हैं। उनको भगवान ने ज्ञान नहीं दिया। भगवान तो इस समय नर से नारायण बनाने के लिए राजयोग सिखाते हैं। राजा के साथ प्रजा भी जरूर होगी। सिर्फ लक्ष्मी-नारायण तो नहीं बनेंगे। सारी राजधानी बनती है। अब तुम बच्चे जानते हो कि भगवान कौन है और कोई भी मनुष्य मात्र नहीं जानते। बाप कहते हैं तुम कहते हो ओ गॉड फादर, तो बताओ तुम्हारे गॉड फादर का नाम, रूप, देश, काल क्या है? न भगवान को जानते हैं, न उनकी रचना को जानते हैं। बाप आकर कहते हैं कल्प-कल्प के संगम पर आता हूँ। सारी रचना के आदि-मध्य-अन्त का राज़ मैं “रचता” ही आकर समझाता हूँ। कई तो कहते हैं – वह नाम रूप से न्यारा है, वह आ नहीं सकता। तुम जानते हो बाप आया है। शिव जयन्ती भी निराकार की गाई जाती है तो कृष्ण जयन्ती भी गाई जाती है। अब शिव जयन्ती कब होती है, वह मालूम होना चाहिए ना। जैसे क्रिश्चियन को मालूम है कि क्राइस्ट का जन्म कब हुआ, क्रिश्चियन धर्म कब स्थापन हुआ। यह तो है भारत की बात। भगवान भारत की झोली कब भरते हैं? भगत पुकारते हैं हे भगवान झोली भर दो। सद्गति में ले जाओ क्योंकि हम दुर्गति में पड़े हैं, तमोप्रधान हैं। आत्मा ही शरीर के साथ भोगती है। कई मनुष्य साधु सन्त आदि कहते हैं कि आत्मा निर्लेप है। कहते भी हैं कि अच्छे वा बुरे संस्कार आत्मा में रहते हैं। उस आधार पर आत्मा जन्म लेती है। फिर कहते आत्मा तो निर्लेप है। कोई भी बुद्धिवान मनुष्य नहीं जो समझाये। इसमें भी अनेक मत हैं। जो घर से रूठते वह शास्त्र बना देते। श्रीमत भगवत गीता है एक। व्यास ने जो श्लोक आदि बनाये वह कोई भगवान ने नहीं गाये हैं। भगवान निराकार जो ज्ञान का सागर है, वह बैठ बच्चों को समझाते हैं कि भगवान एक है। भारतवासियों को यह पता नहीं है। गाते भी हैं ईश्वर की गत मत न्यारी है। अच्छा कौन सी गत मत न्यारी है? ईश्वर की गत मत न्यारी है यह किसने कहा? आत्मा कहती है, उसकी सद्गति के लिए जो मत है, उसको श्रीमत कहा जाता है। कल्प-कल्प तुमको आकर समझाता हूँ – मनमनाभव। देह के सब धर्म त्याग आत्म-अभिमानी भव। मामेकम् याद करो। अभी तुम मनुष्य से देवता बन रहे हो। इस राजयोग की एम आब्जेक्ट है ही लक्ष्मी-नारायण बनना। पढ़ाई से कोई राजा बनते नहीं हैं। ऐसा कोई स्कूल नहीं है। गीता में ही है, तुम बच्चों को राजयोग सिखाता हूँ। आता भी तब हूँ जबकि कोई भी राजा का राज्य नहीं रहता। मुझे एक भी मनुष्य बिल्कुल नहीं जानते। बाबा कहते हैं कि तुम बच्चों ने इतना बड़ा लिंग जो बनाया है, वह मेरा कोई यह रूप नहीं है। मनुष्य कह देते कि अखण्ड ज्योति रूप परमात्मा, तेजोमय है। अर्जुन ने देखकर कहा बस करो, मैं सहन नहीं कर सकता हूँ। अरे बच्चा बाप का रूप देख सहन न कर सके, यह कैसे हो सकता है। बच्चा तो बाप को देख खुश होगा ना। बाप कहते हैं कि मेरा कोई ऐसा रूप थोड़ेही है। मैं हूँ ही परमपिता अर्थात् परे ते परे रहने वाला परम आत्मा माना परमात्मा। फिर गाते हैं परमात्मा मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। उनकी भगत महिमा करते हैं। सतयुग त्रेता में कोई महिमा नहीं करते क्योंकि वहाँ तो है सुख। गाते भी हैं दु:ख में सिमरण सब करें, सुख में करे न कोई। इनका भी अर्थ नहीं समझते हैं। तोते मुआफिक सब कहते रहते हैं। सुख कब होता है, दु:ख कब होता है। भारत की ही तो बात है ना। 5 हजार वर्ष पहले स्वर्ग था फिर त्रेता में दो कला कम हुई। सतयुग त्रेता में दु:ख का नाम नहीं रहता। है ही सुखधाम। स्वर्ग कहने से मुख मीठा होता है। हेविन में फिर दु:ख कहाँ से आया। कहते हैं कि वहाँ भी कंस जरासन्धी आदि थे, परन्तु यह हो नहीं सकता।

भक्त समझते हैं कि हम नौधा भक्ति करते हैं तो दीदार होता है। दीदार होना गोया हमको भगवान मिला। लक्ष्मी की पूजा की, उनका दर्शन हुआ बस हम तो पार हो गये, इसमें ही खुश हो जाते हैं। परन्तु है कुछ भी नहीं। अल्पकाल के लिए सुख मिलता है। दर्शन हुआ खलास। ऐसे तो नहीं मुक्ति जीवनमुक्ति को पा लिया, कुछ भी नहीं। बाबा ने सीढ़ी पर भी समझाया है – भारत ऊंच ते ऊंच था। भगवान भी ऊंच ते ऊंच है। भारत में ऊंच ते ऊंच वर्सा है इन लक्ष्मी-नारायण का। जब स्वर्ग था, सतोप्रधान थे फिर कलियुग अन्त में सब तमोप्रधान होते हैं। पुकारते हैं हम बिल्कुल पतित हो गये हैं। बाप कहते हैं कि मैं कल्प के संगमयुग पर आता हूँ, तुमको राजयोग सिखाने। मैं जो हूँ जैसा हूँ मुझे यथार्थ रीति कोई नहीं जानते। तुम्हारे में भी नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार जानते हैं। सीढ़ी वाला चित्र दिखाना है। यह भारत की सीढ़ी है। सतयुग में देवी देवता थे। 5 हजार वर्ष पहले भारत ऐसा था। शास्त्रों में लाखों वर्ष का कल्प लिख दिया है। बाप कहते हैं कि लाखों वर्ष का नहीं, कल्प 5 हजार वर्ष का है। सतयुग त्रेता नई दुनिया, द्वापर कलियुग पुरानी दुनिया। आधा-आधा होता है ना। नई दुनिया में तुम भारतवासी थे। बाप समझाते हैं मीठे बच्चे अभी तुम अपने जन्मों को जानते हो बाकी कोई रथ आदि की बात नहीं है। कृष्ण तो सतयुग का प्रिन्स है। कृष्ण का वह रूप सिवाए दिव्य दृष्टि के देखा नहीं जाता। यह चैतन्य रूप से तो सतयुग में थे फिर कब वह रूप मिल नहीं सकता। फिर तो नाम रूप देश काल बदल जाता है। 84 जन्म लेते हैं। 84 जन्मों में 84 माँ बाप मिलते हैं। भिन्न-भिन्न नाम रूप आक्यूपेशन होता है। अब यह भारत की ही सीढ़ी है। तुम हो अभी ब्राह्मण कुल भूषण। बाप ने कल्प पहले भी आकर तुमको देवी देवता बनाया था। वहाँ तुम सर्वोत्तम कर्म करते थे। तुम सदा सुखी थे 21 जन्म। फिर तुमको इस दुर्गति में किसने पहुंचाया? मैंने कल्प पहले तुमको सद्गति दी थी फिर 84 जन्म लेते जरूर उतरना पड़े। सूर्यवंशी में 8 जन्म, चन्द्रवंशी में 12 जन्म फिर ऐसे उतरते आये हो। तुम ही सो पूज्य देवता थे, तुम ही पुजारी पतित बने हो। भारत अब कंगाल है। भगवानुवाच, तुम जो 100 प्रतिशत पवित्र और सालवेन्ट, एवरहेल्दी, एवरवेल्दी थे। कोई रोग दु:ख की बात नहीं थी, सुखधाम था। उनको कहते हैं गॉर्डन आफ अल्लाह। अल्लाह ने बगीचा स्थापन किया। जो देवी-देवता थे वह अब कांटे बने हैं। अब जंगल बन गया है। जंगल में कांटे लगते हैं। बाप कहते हैं काम महाशत्रु है, इन पर जीत पहनो। इसने आदि-मध्य-अन्त तुमको दु:ख दिया है। एक दो पर काम कटारी चलाना यह सबसे बड़ा पाप है। बाप बैठ अपना परिचय देते हैं कि मैं परमधाम में रहने वाला परम आत्मा हूँ। मुझे कहते हैं मैं सृष्टि का बीजरूप परम आत्मा, मैं सबका बाप हूँ। सभी आत्मायें बाप को पुकारती हैं कि हे परमपिता परमात्मा। जैसे तुम्हारी आत्मा स्टार मिसल है, बाबा भी परम आत्मा स्टार है। छोटा बड़ा नहीं है। बाप कहते हैं मैं अंगुष्ठे मिसल भी नहीं हूँ। मैं परम आत्मा हूँ। तुम सबका बाप हूँ। उसको कहा जाता है सुप्रीम सोल, नॉलेजफुल। बाप समझाते हैं मैं नॉलेजफुल, मनुष्य सृष्टि के झाड का बीजरूप हूँ। मुझे भक्त लोग कहते हैं कि परमात्मा सत् चित् आनंद स्वरूप है, वह ज्ञान का सागर है, सुख का सागर है। महिमा कितनी है। अगर नाम रूप देश काल नहीं तो पुकारेंगे किसको। साधू सन्त आदि सब तुमको भक्ति मार्ग के शास्त्र सुनाते हैं। मैं तुमको आकर राजयोग सिखाता हूँ।

बाप समझाते हैं कि तुम पतित-पावन मुझ ज्ञान सागर बाप को कहते हो। तुम भी मास्टर ज्ञान सागर बनते हो। ज्ञान से सद्गति मिल जाती है। भारत को सद्गति बाप ही देंगे। सर्व का सद्गति दाता एक है। सर्व की दुर्गति फिर कौन करता है? रावण। अब तुमको यह कौन समझा रहे हैं? यह है परम आत्मा। आत्मा तो एक स्टार मिसल अति सूक्ष्म है। परमात्मा भी ड्रामा में पार्ट बजाता है। क्रियेटर, डायरेक्टर, मुख्य एक्टर है। बाप समझाते हैं कि ऊंच ते ऊंच पार्टधारी कौन है? ऊंच ते ऊंच भगवान। जिसके साथ तुम आत्मायें बच्चे सब रहते हो। कहते भी हैं कि परमात्मा सबको भेजने वाला है। यह भी समझने की बात है। ड्रामा तो अनादि बना हुआ है। बाप कहते हैं कि मुझे तुम कहते हो ज्ञान का सागर, सारी सृष्टि के आदि मध्य अन्त को जानने वाला। अभी यह जो शास्त्र आदि पढ़ते हैं, इनको बाप जानते हैं। बाप कहते हैं कि मैं प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा सभी शास्त्रों का सार आकर बताता हूँ। दिखाते हैं कि विष्णु की नाभी से ब्रह्मा निकला। तो कहाँ निकला? मनुष्य तो जरूर यहाँ ही होंगे ना। इनकी नाभी से ब्रह्मा निकला फिर भगवान ने बैठ इनके द्वारा सभी वेदों शास्त्रों का सार सुनाया। अपना भी नाम रूप देश काल समझाया है। मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है ना। इस वृक्ष की उत्पत्ति, पालना, विनाश कैसे होता है, वह कोई भी नहीं जानते। इसको वैराइटी झाड़ कहा जाता है। सभी नम्बरवार अपने समय पर आते हैं। पहले नम्बर में देवी देवता धर्म की स्थापना कराता हूँ जबकि वह धर्म नहीं है। बाप कहते हैं कि कितने तुच्छ बुद्धि हो गये हैं। देवताओं की, लक्ष्मी-नारायण की पूजा करते हैं परन्तु उन्हों का राज्य सृष्टि पर कब था वह कुछ नहीं जानते हैं। अभी भारत का वह देवता धर्म ही नहीं है, सिर्फ चित्र रह गये हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों का नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) मास्टर ज्ञान सागर बन पतित से पावन बनाने की सेवा करनी है। बाप ने जो सब शास्त्रों का सार सुनाया है वह बुद्धि में रख सदा हर्षित रहना है।

2) एक बाप की श्रीमत हर पल पालन करना है। देह के सब धर्म त्याग आत्म-अभिमानी बनने की मेहनत करनी है।

वरदान:- अपने दिव्य, अलौकिक जन्म की स्मृति द्वारा मर्यादा की लकीर के अन्दर रहने वाले मर्यादा पुरूषोत्तम भव
जैसे हर कुल के मर्यादा की लकीर होती है ऐसे ब्राह्मण कुल के मर्यादाओं की लकीर है, ब्राह्मण अर्थात् दिव्य और अलौकिक जन्म वाले मर्यादा पुरूषोत्तम। वे संकल्प में भी किसी आकर्षण वश मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं कर सकते। जो मर्यादा की लकीर का संकल्प में भी उल्लंघन करते हैं वो बाप के सहारे का अनुभव नहीं कर पाते। बच्चे के बजाए मांगने वाले भक्त बन जाते हैं। ब्राह्मण अर्थात् पुकारना, मांगना बंद, कभी भी प्रकृति वा माया के मोहताज नहीं, वे सदा बाप के सिरताज रहते हैं।
स्लोगन:- शान्ति दूत बन अपनी तपस्या द्वारा विश्व में शान्ति की किरणें फैलाओ।

BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 1 MARCH 2021 : AAJ KI MURLI

01-03-2021
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन
“मीठे बच्चे – तुम्हें आपस में बहुत-बहुत रूहानी स्नेह से रहना है, कभी भी मतभेद में नहीं आना है”
प्रश्नः- हर एक ब्राह्मण बच्चे को अपनी दिल से कौन सी बात पूछनी चाहिए?
उत्तर:- अपनी दिल से पूछो -1- मैं ईश्वर की दिल पर चढ़ा हुआ हूँ! 2- मेरे में दैवी गुणों की धारणा कहाँ तक है? 3- मैं ब्राह्मण ईश्वरीय सर्विस में बाधा तो नहीं डालता! 4- सदा क्षीरखण्ड रहता हूँ! हमारी आपस में एकमत है? 5- मैं सदा श्रीमत का पालन करता हूँ?
गीत:- भोलेनाथ से निराला…….

ओम् शान्ति। तुम बच्चे हो ईश्वरीय सम्प्रदाय। आगे थे आसुरी सम्प्रदाय। आसुरी सम्प्रदाय को यह पता नहीं है कि भोलानाथ किसको कहा जाता है। यह भी नहीं जानते कि शिव शंकर अलग-अलग हैं। वह शंकर देवता है, शिव बाप है। कुछ भी नहीं जानते हैं। अब तुम हो ईश्वरीय सम्प्रदाय अथवा ईश्वरीय फैमिली। वह है आसुरी फैमिली रावण की। कितना फ़र्क है। अभी तुम ईश्वरीय फैमिली में ईश्वर द्वारा सीख रहे हो कि एक दो में रूहानी प्यार कैसा होना चाहिए। एक दो में ब्राह्मण कुल में यह रूहानी प्यार यहाँ से भरना है। जिनका पूरा प्यार नहीं होगा तो पूरा पद भी नहीं पायेंगे। वहाँ तो है ही एक धर्म, एक राज्य। आपस में कोई झगड़ा नहीं होता। यहाँ तो राजाई है नहीं। ब्राह्मणों में भी देह-अभिमान होने कारण मतभेद में आ जाते हैं। ऐसे मतभेद में आने वाले सजायें खाकर फिर पास होंगे। फिर वहाँ एक धर्म में रहते हैं, तो वहाँ शान्ति रहती है। अब उस तरफ है आसुरी सम्प्रदाय वा आसुरी फैमिली-टाइप। यहाँ है ईश्वरीय फैमिली टाइप। भविष्य के लिए दैवीगुण धारण कर रहे हैं। बाप सर्वगुण सम्पन्न बनाते हैं। सब तो नहीं बनते हैं। जो श्रीमत पर चलते हैं वही विजय माला का दाना बनते हैं। जो नहीं बनेंगे वह प्रजा में आ जाते हैं। वहाँ तो डीटी गवर्मेन्ट है। 100 परसेन्ट प्योरिटी, पीस, प्रासपर्टी रहती है। इस ब्राह्मण कुल में अभी दैवीगुण धारण करने हैं। कोई तो अच्छी रीति दैवीगुण धारण करते, दूसरों को कराते रहते हैं। ईश्वरीय कुल का आपस में रूहानी स्नेह भी तब होगा जब देही-अभिमानी होंगे, इसलिए पुरूषार्थ करते रहते हैं। अन्त में भी सबकी अवस्था एकरस, एक जैसी तो नहीं हो सकती है। फिर सजायें खाकर पद भ्रष्ट हो पड़ेंगे। कम पद पा लेंगे। ब्राह्मणों में भी अगर कोई आपस में क्षीरखण्ड होकर नहीं रहते हैं, आपस में लूनपानी हो रहते हैं, दैवीगुण धारण नहीं करते हैं तो ऊंच पद कैसे पा सकेंगे। लूनपानी होने के कारण कहाँ ईश्वरीय सर्विस में भी बाधा डालते रहते हैं। जिसका नतीजा क्या होता है वह इतना ऊंच पद नहीं पा सकते। एक तरफ पुरूषार्थ करते हैं क्षीरखण्ड होने का। दूसरी तरफ माया लूनपानी बना देती है, जिस कारण सर्विस बदले डिससर्विस करते हैं। बाप बैठ समझाते हैं तुम हो ईश्वरीय फैमिली। ईश्वर के साथ रहते भी हो। कोई साथ रहते हैं, कोई दूसरे-दूसरे गाँव में रहते हैं परन्तु हो तो इकट्ठे ना। बाप भी भारत में आते हैं। मनुष्य यह नहीं जानते, शिवबाबा कब आते हैं, क्या आकर करते हैं? तुमको बाप द्वारा अभी परिचय मिला है। रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त को अब तुम जानते हो। दुनिया को पता नहीं कि यह चक्र कैसे फिरता है, अभी कौन सा समय है, बिल्कुल घोर अन्धियारे में हैं।

तुम बच्चों को रचता बाप ने आकर सारा समाचार सुनाया है। साथ-साथ समझाते हैं कि हे सालिग्रामों मुझे याद करो। यह शिवबाबा कहते हैं अपने बच्चों को। तुम पावन बनने चाहते हो ना। पुकारते आये हो। अभी मैं आया हूँ। शिवबाबा आते ही हैं – भारत को फिर से शिवालय बनाने, रावण ने वेश्यालय बनाया है। खुद ही गाते हैं कि हम पतित विशश हैं। भारत सतयुग में सम्पूर्ण निर्विकारी था। निर्विकारी देवताओं को विकारी मनुष्य पूजते हैं। फिर निर्विकारी ही विकारी बनते हैं। यह किसको पता नहीं है। पूज्य तो निर्विकारी थे फिर पुजारी विकारी बने हैं तब तो बुलाते हैं हे पतित-पावन आओ, आकर निर्विकारी बनाओ। बाप कहते हैं यह अन्तिम जन्म तुम पवित्र बनो। मामेकम् याद करो तो तुम्हारे पाप कट जायेंगे और तुम तमोप्रधान से सतोप्रधान देवता बन जायेंगे फिर चन्द्रवंशी क्षत्रिय फैमिली-टाइप में आयेंगे। इस समय हो ईश्वरीय फैमिली – टाइप फिर दैवी फैमिली में 21जन्म रहेंगे। इस ईश्वरीय फैमिली में तुम अन्तिम जन्म पास करते हो। इसमें तुमको पुरूषार्थ कर फिर सर्वगुण सम्पन्न बनना है। तुम पूज्य थे – बरोबर राज्य करते थे फिर पुजारी बने हो। यह समझाना पड़े ना। भगवान है बाप। हम उनके बच्चे हैं तो फैमिली हुई ना। गाते भी हैं तुम मात पिता हम बालक तेरे…तो फैमिली ठहरे ना। अब बाप से सुख घनेरे मिलते हैं। बाप कहते हैं तुम हमारी फैमिली बेशक हो। परन्तु ड्रामा प्लैन अनुसार रावण राज्य में आने के बाद फिर तुम दु:ख में आते हो तो पुकारते हो। इस समय तुम एक्यूरेट फैमिली हो। फिर तुमको भविष्य 21 जन्म लिए वर्सा देता हूँ। यह वर्सा फिर दैवी फैमिली में 21 जन्म कायम रहेगा। दैवी फैमिली सतयुग त्रेता तक चलती है। फिर रावण राज्य होने से भूल जाते हैं कि हम दैवी फैमिली के हैं। वाम मार्ग में जाने से आसुरी फैमिली हो जाती है। 63 जन्म सीढ़ी गिरते आये हो। यह सारी नॉलेज तुम्हारी बुद्धि में है। किसको भी तुम समझा सकते हो। असुल तुम देवी देवता धर्म के हो। सतयुग के आगे था कलियुग। संगम पर तुमको मनुष्य से देवता बनाया जाता है। बीच में है यह संगम। तुमको ब्राह्मण धर्म से फिर दैवी धर्म में ले आते हैं। समझाया जाता है लक्ष्मी-नारायण ने यह राज्य कैसे लिया। उनसे पहले आसुरी राज्य था फिर दैवी राज्य कब और कैसे हुआ। बाप कहते हैं कल्प-कल्प संगम पर आकर तुमको ब्राह्मण देवता क्षत्रिय धर्म में ले आते हैं। यह है भगवान की फैमिली। सब कहते हैं गॉड फादर। परन्तु बाप को न जानने के कारण निधन के बन गये हैं इसलिए बाप आते हैं घोर अन्धियारे से सोझरा करने। अब स्वर्ग स्थापन हो रहा है। तुम बच्चे पढ़ रहे हो, दैवीगुण धारण कर रहे हो। यह भी मालूम होना चाहिए – शिव जयन्ती मनाते हैं, शिव जयन्ती के बाद फिर क्या होगा? जरूर दैवी राज्य की जयन्ती हुई होगी ना। हेविनली गॉड फादर हेविन की स्थापना करने हेविन में तो नहीं आयेंगे। कहते हैं मैं हेल और हेविन के बीच में संगम पर आता हूँ। शिवरात्रि कहते हैं ना। तो रात में मैं आता हूँ। यह तुम बच्चे समझ सकते हो। जो समझते हैं वह औरों को भी धारण कराते हैं। दिल पर भी वह चढ़ते हैं जो मन्सा-वाचा-कर्मणा सर्विस पर तत्पर रहते हैं। जैसी-जैसी सर्विस उतना दिल पर चढ़ते हैं। कोई आलराउन्ड वर्कर्स होते हैं। सब काम सीखना चाहिए। खाना पकाना, रोटी पकाना, बर्तन माँजना…यह भी सर्विस है ना। बाप की याद है फर्स्ट। उनकी याद से ही विकर्म विनाश होते हैं। यहाँ का वर्सा मिला हुआ है। वहाँ सर्वगुण सम्पन्न रहते हैं। यथा राजा रानी तथा प्रजा। दु:ख की बात नहीं होती। इस समय सब नर्कवासी हैं। सबकी उतरती कला है। फिर अभी चढ़ती कला होगी। बाप सबको दु:ख से छुड़ाए सुख में ले जाते हैं, इसलिए बाप को लिबरेटर कहा जाता है। यहाँ तुमको नशा रहता है हम बाप से वर्सा ले रहे हैं, लायक बन रहे हैं। लायक तो उनको कहेंगे जो औरों को राजाई पद पाने लायक बनाते हैं। यह भी बाबा ने समझाया है पढ़ने वाले तो बहुत आयेंगे। ऐसे नहीं कि सब 84 जन्म लेंगे। जो थोड़ा पढ़ेंगे वह देरी से आयेंगे, तो जन्म भी कम होंगे ना। कोई 80, कोई 82, कौन जल्दी आते, कौन पीछे आते…सारा मदार पढ़ाई पर है। साधारण प्रजा पीछे आयेगी। उन्हों के 84 जन्म हो न सके। पीछे आते रहते हैं। जो बिल्कुल लास्ट में होगा वह त्रेता अन्त में आकर जन्म लेगा। फिर वाममार्ग में जाते हैं। उतरना शुरू हो जाता है। भारतवासियों ने कैसे 84 जन्म लिए हैं, उनकी यह सीढ़ी है। यह गोला है ड्रामा के रूप में। जो पावन थे वही अब पतित बने हैं फिर पावन देवता बनते हैं। बाप जब आते हैं तो सबका कल्याण होता है, इसलिए इसको आस्पीशियस युग कहा जाता है। बलिहारी बाप की है जो सबका कल्याण करते हैं। सतयुग में सबका कल्याण था, कोई दु:ख नहीं था, यह तो समझाना पड़े कि हम ईश्वरीय फैमिली-टाइप के हैं। ईश्वर सबका बाप है। यहाँ ही तुम मात-पिता गाते हो। वहाँ तो सिर्फ फादर कहा जाता है। यहाँ तुम बच्चों को माँ बाप मिलते हैं। यहाँ तुम बच्चों को एडाप्ट किया जाता है। फादर क्रियेटर है तो मदर भी होगी। नहीं तो क्रियेशन कैसे होगी। हेविनली गॉड फादर कैसे हेविन स्थापन करते हैं, यह न भारतवासी जानते हैं, न विलायत वाले ही जानते हैं। अभी तुम जानते हो नई दुनिया की स्थापना और पुरानी दुनिया का विनाश, तो जरूर संगम पर ही होगा। अभी तुम संगम पर हो। अभी बाप समझाते हैं मामेकम् याद करो। आत्मा को याद करना है – परमपिता परमात्मा को। आत्मायें और परमात्मा अलग रहे बहुकाल…सुन्दर मेला कहाँ होगा! सुन्दर मेला जरूर यहाँ ही होगा। परमात्मा बाप यहाँ आते हैं, इसको कहा जाता है कल्याणकारी सुन्दर मेला। जीवनमुक्ति का वर्सा सबको देते हैं। जीवनबन्ध से छूट जाते हैं। शान्तिधाम तो सब जायेंगे – फिर जब आते हैं तो सतोप्रधान रहते हैं। धर्म स्थापन अर्थ आते हैं। नीचे जब उनकी जनसंख्या बढ़े तब राजाई के लिए पुरूषार्थ करें तब तक कोई झगड़ा आदि नहीं रहता। सतोप्रधान से रजो में जब आते हैं तब लड़ाई झगड़ा शुरू करते हैं। पहले सुख फिर दु:ख। अब बिल्कुल ही दुर्गति को पाये हुए हैं। इस कलियुगी दुनिया का विनाश फिर सतयुगी दुनिया की स्थापना होनी है। विष्णुपुरी की स्थापना कर रहे हैं ब्रह्मा द्वारा। जो जैसा पुरूषार्थ करते हैं उस अनुसार विष्णुपुरी में आकर प्रालब्ध पाते हैं। यह समझने की बहुत अच्छी-अच्छी बातें हैं। इस समय तुम बच्चों को बहुत खुशी होनी चाहिए कि हम ईश्वर से भविष्य 21 जन्मों का वर्सा पा रहे हैं। जितना पुरूषार्थ कर अपने को एक्यूरेट बनायेंगे…तुम्हें एक्यूरेट बनना है। घड़ी भी लीवर और सलेन्डर होती है ना। लीवर बहुत एक्यूरेट होती है। बच्चों में कई एक्यूरेट बन जाते हैं। कई अनएक्यूरेट हो जाते हैं तो कम पद हो जाता है। पुरूषार्थ करके एक्यूरेट बनना चाहिए। अभी सब एक्यूरेट नहीं चलते। तदबीर कराने वाला तो एक ही बाप है। तकदीर बनाने के पुरूषार्थ में कमी है इसलिए पद कम पाते हैं। श्रीमत पर न चलने के कारण आसुरी गुण न छोड़ने कारण, योग में न रहने कारण यह सब होता है। योग में नहीं हैं तो फिर जैसे पण्डित। योग कम है इसलिए शिवबाबा तरफ लव नहीं रहता। धारणा भी कम होती है, वह खुशी नहीं रहती। शक्ल ही जैसे मुर्दो मिसल रहती है। तुम्हारे फीचर्स तो सदैव हर्षित रहने चाहिए। जैसे देवताओं के होते हैं। बाप तुमको कितना वर्सा देते हैं। कोई गरीब का बच्चा साहूकार के पास जाये तो उनको कितनी खुशी होगी। तुम बहुत गरीब थे। अब बाप ने एडाप्ट किया है तो खुशी होनी चाहिए। हम ईश्वरीय सम्प्रदाय के बने हैं। परन्तु तकदीर में नहीं है तो क्या किया जा सकता है। पद भ्रष्ट हो जाता है। पटरानी बनते नहीं। बाप आते ही हैं पटरानी बनाने। तुम बच्चे किसको भी समझा सकते हो कि ब्रह्मा विष्णु शंकर तीनों हैं शिव के बच्चे। भारत को फिर से स्वर्ग बनाते हैं ब्रह्मा द्वारा। शंकर द्वारा पुरानी दुनिया का विनाश होता है, भारत में ही बाकी थोड़े बचते हैं। प्रलय तो होती नहीं, परन्तु बहुत खलास हो जाते हैं तो जैसेकि प्रलय हो जाती है। रात दिन का फ़र्क पड़ जाता है। वह सब मुक्तिधाम में चले जायेंगे। यह पतित-पावन बाप का ही काम है। बाप कहते हैं देही-अभिमानी बनो। नहीं तो पुराने संबंधी याद पड़ते रहते हैं। छोड़ा भी है फिर भी बुद्धि जाती रहती है। नष्टोमोहा हैं नहीं, इसको व्यभिचारी याद कहा जाता है। सद्गति को पा न सकें क्योंकि दुर्गति वालों को याद करते रहते हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बापदादा की दिल पर चढ़ने के लिए मन्सा-वाचा-कर्मणा सेवा करनी है। एक्यूरेट और आलराउन्डर बनना है।

2) ऐसा देही-अभिमानी बनना है जो कोई भी पुराने संबंधी याद न आयें। आपस में बहुत-बहुत रूहानी प्यार से रहना है, लूनपानी नहीं होना है।

वरदान:- सदा साथ के अनुभव द्वारा मेहनत की अविद्या करने वाले अतीन्द्रिय सुख वा आनंद स्वरूप भव
जैसे बच्चा अगर बाप की गोदी में है तो उसे थकावट नहीं होती। अपने पांव से चले तो थकेगा भी, रोयेगा भी। यहाँ भी आप बच्चे बाप की गोदी में बैठे हुए चल रहे हो। जरा भी मेहनत वा मुश्किल का अनुभव नहीं। संगमयुग पर जो ऐसे सदा साथ रहने वाली आत्मायें हैं उनके लिए मेहनत अविद्या मात्रम् होती है। पुरूषार्थ भी एक नेचरल कर्म हो जाता है, इसलिए सदा अतीन्द्रिय सुख वा आनंद स्वरूप स्वत: बन जाते हैं।
स्लोगन:- रूहे गुलाब बन अपनी रूहानी वृत्ति से वायुमण्डल में रूहानियत की खुशबू फैलाओ।
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