BRAHMAKUMARIS DAILY MAHAVAKYA 5 DECEMBER 2018 – Aaj Ka Purusharth

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Om Shanti
05.12.2018

★【 आज का पुरूषार्थ】★

इन कर्मन्द्रियों से प्राप्त सुख अल्पकालिक है, अर्थात् विनाशी है … और जब तक आप बच्चों को इनसे प्राप्तियों का रस अनुभव होगा, तब तक आप अविनाशी सुख और शान्ति का अनुभव सदाकाल नहीं कर सकते…!

जैसेकि; 
किसी भी सुन्दर चीज़ को देखकर खुश होना…, सुख-सुविधा के साधनों से प्राप्ति का अनुभव होना…, अर्थात् महीनता से checking करो कि मन को कहाँ-कहाँ से सुख की प्राप्ति हो रही है…?

यदि इस देह और देह की दुनिया से ही सुख की प्राप्ति होती रही, जोकि अभी-अभी सुख और अभी-अभी दुःख देने वाली है … तब आप सदाकाल के लिए अतिन्द्रिय सुख का अनुभव नहीं कर सकते…।

ऊँच पद की प्राप्ति करनी है तो checking भी महीनता से करनी पड़ेगी…।

यह त्याग, सुखों का त्याग नहीं दुःखों का त्याग है, क्योंकि कुछ ही समय में यह पाँच तत्वों से बना संसार अत्यधिक दुःख में परिवर्तन होने वाला है।

बस, सबकुछ करते भी अपनी मन-बुद्धि सब चीज़ों से निकाल, एक बाप में लगा लो … अर्थात् स्वयं को विशेष आत्मा समझ परमात्मा के प्यार में खो जाओ, क्योंकि परमात्म प्यार से प्राप्त सुख ही अविनाशी सुख है।

यह मत सोचो कि इसका भी त्याग करना है…, इसका भी त्याग करना है…, नहीं…। 
केवल आपको इन सब चीज़ों का ज्ञान होना चाहिए … परन्तु संकल्पों द्वारा, परमात्मा द्वारा प्राप्त खुशी, सुख अर्थात् बेहद और अविनाशी प्राप्तियों में रमण करो…।

इसके लिए केवल संकल्पों के direction को change करो, क्योंकि परमात्म सुख ही हमारी संगमयुग की प्रालब्ध और भविष्य की प्रालब्ध बनाता है।

जब त्याग-त्याग करते हो, तो भारी हो जाते हो … और जब प्राप्त हुई प्राप्तियों और प्राप्त होने वाले सुख के बारे में सोचते हो तो automatically उमंग-उत्साह में आ आगे से आगे बढ़ने लग जाते हो…।

कोई भी त्याग हठ-पूर्वक नहीं बल्कि ज्ञानी तू आत्मा बन परमात्म प्यार से करना है … फिर वो त्याग, त्याग नहीं रहेगा बल्कि ऊँचा भाग्य बनाने का साधन बन जायेगा।

यही सच्चा परमात्म प्यार आप बच्चों को ज्ञान स्वरूप, गुण स्वरूप और शक्ति स्वरूप बना देगा…।

आप सब बच्चों को बस बाबा (निराकार शिव) के साथ बैठ अपने original स्वरूप और original कर्तव्य की स्मृति में रहना है।

अतिन्द्रिय सुख आत्मा और परमात्मा के मिलन में है, ना कि इन पाँच तत्वों से बनी देह और देह की दुनिया में है…! 
इसलिए इससे सम्पूर्ण रीति वैराग्य लाओ…। यह बहुत सहज है, क्योंकि इस समय बाबा का full सहयोग है।

बस संकल्पों द्वारा इसे बिल्कुल सहज समझकर करो…।

देखो, यह अतिन्द्रिय सुख आप पूरे कल्प में केवल इसी समय अनुभव करते हो और तो आप हमेशा कर्मन्द्रियों के सुख में ही रमण करते हो…! 
इसलिए, इस समय इन कर्मन्द्रियों के सुख से न्यारा होना सहज नहीं लगता…!

आप बच्चों को इन सब चीज़ों के बीच में रहते अपनी मन-बुद्धि को इन सबसे न्यारा करना है अर्थात् आपको कोई खींच ना हो, केवल एक ही लगन हो कि मुझे स्वयं को अनुभव कर, बाप को अनुभव करना है और बाप के कर्तव्य को पूरा करना ही अपनी ज़िम्मेवारी समझना है।

इसलिए, उमंग-उत्साह से सम्पन्न संकल्पों को अपने साथ रखो … वैसे भी जब बाबा साथ है, तो हुआ ही पड़ा है ना…।

अच्छा। ओम् शान्ति।

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