BRAHMAKUMARIS DAILY MAHAVAKYA 27 OCTOBER 2018 – Aaj Ka Purusharth

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Om Shanti
27.10.2018

★【 आज का पुरूषार्थ】★

देखो बच्चे, बाबा ने आकर बहुत महीनता से आपको विजयी माला का दाना बनने के लिए सार रूप में सारी पढ़ाई पढ़ा दी है। अब तो केवल आपके उमंग-उत्साह के लिए वो ही पढ़ाई repeat कर रहा है।

बाबा तो आपका उमंग-उत्साह बढ़ा रहा है, परन्तु हिम्मत तो आप बच्चों को ही रखनी पड़ेगी…।

बाबा के द्वारा पढ़ाई गई पढ़ाई को पढ़, उमंग-उत्साह में आते हो, लेकिन बस थोड़े से समय के लिए…! फिर दिनचर्या में आते ही हिम्मतहीन हो जाते हो और कहते हो क्या करें, कैसे करें, समझ नहीं आता…!

अभी तक यह question mark आपको शोभा नहीं देता…! जिन्हें भगवान् … सर्वशक्तिमान् स्वयं आकर पढ़ा रहा हो उन बच्चों के बोल भी ऐसे होने चाहिए क्या…?

देखो, बाप का तो घर जाने का समय हो गया है, वो तो केवल कुछ बच्चों के लिए extra रूका हुआ है, फिर भी आखिर कब तक…?

बाप की पढ़ाई बाप-समान बनाने की है अर्थात् मास्टर सर्वशक्तिवान् बनाने की है, विजय माला का दाना बनाने की है … जिसमें हिम्मतहीन अर्थात् कमज़ोर बच्चे नहीं आ सकेंगे…!

इसलिए खुद ही सोच-विचार कर लो अब हमें क्या करना है…? बार-बार सोचकर भारी हो जाना है या बाप समान हल्के रह बाप के संग जाना है…।

भारी होना अर्थात् संकल्पों द्वारा व्यर्थ सोचते रहना और जिस सोच का कोई result भी नहीं निकलता…! 
कभी अपनी परिस्थितियों के बारे में सोचते हो और कभी अपने ही संस्कारों वश की गई गलती के बारे में…।

एक गलती तो संस्कार वश हो गई, दूसरी गलती उस गलती को सोच-सोच कर भारी होने की करते हो…! बिन्दी लगानी नहीं आती, फिर बिन्दु रूप भी नहीं बन पाओगे…! और ना ही बाप के संग घर ही जा पाओगे…!

जो बच्चे दृढ़तापूर्वक हिम्मत रख बाप की श्रीमत को अपना 100% दे, follow कर रहे हैं अर्थात् paper तो उन बच्चों के पास भी आते हैं परन्तु बार-बार वो अपना सब कुछ बाप को समर्पण कर आगे बढ़ रहे हैं और उन्हें बाप (परमात्मा पिता) की भी पूरी-पूरी मदद मिल रही है।

बाप तो बच्चों को ऊँचे से ऊँचे स्वमान की स्मृति दिलाता है … कि आप तो मास्टर सर्वशक्तिमान् हो, कल्प-कल्प के विजयी हो अर्थात् विजयी रत्न हो और कहता है कि इस ऊँच स्वमान में स्थित रहो … परन्तु बच्चे क्या कहते…? 
कि… 
मैं कमज़ोर हूँ, मुझसे हो नहीं पा रहा है…, क्या करूँ, कैसे करूँ…? 
ऐसे कमज़ोर स्वमान में स्थित रहते हैं, ना ही हिम्मत रखते हैं और ना ही दृढ़ता … फिर ऊँच पद कैसे पायेंगे…?

अच्छा। ओम् शान्ति।

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