BRAHMAKUMARIS DAILY MAHAVAKYA 11 OCTOBER 2018 – Aaj Ka Purusharth

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Om Shanti
11.10.2018

★【 आज का पुरूषार्थ】★

तुम्हारे चार ही subjects हैं – ज्ञान, योग, धारणा और सेवा…।

• पहला *‘ज्ञान’*… 
ज्ञान सिर्फ यह नहीं कि मैं आत्मा परमात्मा की सन्तान हूँ, बल्कि मैं आत्मा सर्व गुण और शक्ति सम्पन्न हूँ और मेरे सब सम्बन्ध परमात्मा से हैं…।

• दूसरा *‘योग’*… 
योग अर्थात् आत्मा और परमात्मा का प्यार भरा सम्बन्ध और बाप द्वारा सर्व गुणों और शक्तियों की प्राप्ति…।

• तीसरा *‘धारणा’*… 
सिर्फ स्थूल धारणा ही नहीं बल्कि गुण और शक्ति स्वरूप बन कर्मक्षेत्र में आना…।

• चौथा *‘सेवा’*… 
सेवा द्वारा सिर्फ ज्ञान देना या बाबा का परिचय देना ही नहीं है बल्कि अपने स्वरूप द्वारा अपने गुणों और शक्तियों का दान देना है…।

आपको इस तरफ ज्यादा attention देना है। अपने सभी गुणों और शक्तियों का अनुभव करना है, हर गुण का मनन करना है।

‘‘मैं एक शान्त स्वरूप आत्मा हूँ … और बाबा मुझे शान्ति की शक्ति से भरपूर कर रहा है … अब मुझे कोई भी आत्मा अशान्त नहीं कर सकती…।’’ 
ऐसे ही प्रेम, पवित्रता, आनन्द और सुख – इन सब गुणों को मनन कर अनुभव करना है…।

चलते-फिरते, कार्य करते इन गुणों में समा जाना है। 
जितना-जितना आपका मनन और अनुभव बढ़ता जायेगा उतना ही आप गुण स्वरूप और शक्ति स्वरूप बनते जाओगे … और योग में भी गुणों और शक्तियों को बढ़ाना है, यही बाप (परमात्मा पिता) के खज़ाने हैं…।

आप बच्चों को विशेष ध्यान रखना है कि चाहे योग के लिए, चाहे धारणा के लिए अपने मूल स्वरूप एवं स्थिति से नीचे नहीं आना है…।

चारों ही subjects का result जो हैं, वह गुण स्वरूप और शक्ति स्वरूप बन seat पर set होना है। इसलिए आप बच्चों को इस तरफ विशेष attention देना है।

सबकुछ बहुत हल्का होकर करना है और दिलशिकस्त नहीं होना है, क्योंकि संस्कार पुराने हैं और मन को भी बँधने की आदत नहीं है … परन्तु धीरे-धीरे प्राप्ति बढ़ती जायेगी तो सहज ही परिवर्तन हो जायेगा।

अब आप बच्चों को बाप के प्यार का return देना है। अभी आपका कर्मणा में ठीक हुआ है, बोल और संकल्पों में अभी भी थोड़ी हलचल हो जाती है। इसलिए अभी कोशिश करो कि हर बोल और संकल्प बाप-समान हो…।

देखो, स्व-पुरूषार्थ का यही limited समय है, चाहे दुनिया वालों के लिए अभी थोड़ा-सा समय है, पर आप लोगों का जल्दी ही वरदाता का part शुरू हो जायेगा…।

समय limited होने के कारण और रास्ता अभी बाकी होने के कारण पीछे मुड़कर नहीं देखना है और ना ही थकना और रूकना है, नहीं तो माया पीछे की तरफ ले जायेगी…। 
इसलिए आगे-ही-आगे उड़ते जाना है…।

अच्छा। ओम् शान्ति।

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