BRAHMA KUMARIS MURLI 2 APRIL 2018 : DAILY MURLI (HINDI)

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 2 April 2018

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02-04-2018
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – श्रेष्ठ बनने के लिए सदा श्रीमत पर चलते रहो, लक्ष्मी-नारायण भी श्रीमत से इतने श्रेष्ठ बने हैं”
प्रश्नः- भक्ति में गऊमुख का यादगार क्यों बनाया है?
उत्तर:- क्योंकि संगम पर बाप ने ज्ञान का कलष माताओं के ऊपर रखा है। तुम माताओं के मुख से ज्ञान अमृत निकलता है जिससे सब पावन बन जाते हैं इसलिए भक्ति में गऊमुख का यादगार बना दिया है। तुम गऊ मातायें हो, तुम ही सबकी मनोकामनायें पूर्ण करती हो इसलिए यादगार बने हुए हैं।
गीत:- नयन हीन को राह बताओ…

ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना। भक्ति मार्ग वाले बच्चे बाप को पुकारते हैं कि हम जो नयनहीन बुद्धिहीन बन गये हैं, हमें राह बताओ। हे प्रभू जी, याद करते हैं अपने बाप को। उनको परमपिता परमात्मा कहा जाता है। सभी जीव की आत्मायें बाप को याद करती हैं। हम इस पतित दुनिया में बहुत दु:खी हैं। दर-दर धक्के खाते रहते हैं। जहाँ भी जाते हैं उनके आक्यूपेशन का कुछ भी पता नहीं कि हम किसके पास जाते हैं? शिव के मन्दिर में जाते हैं परन्तु उनको पता नहीं है कि शिव कौन है? जहाँ भी जायेंगे जाकर माथा टेकेंगे। जानते नहीं कि वह कौन हैं, कब आये थे। लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में भी जाते हैं लेकिन जानते नहीं कि यह कब आये, कैसे राज्य लिया, कुछ भी पता नहीं। देलवाड़ा मन्दिर में जाते हैं वहाँ आदि देव बैठा है परन्तु जानते नहीं यह कौन हैं। जगत अम्बा के पास जाते हैं परन्तु वह कब आई, क्या किया, कुछ नहीं जानते सिर्फ जाकर माथा टेकते हैं। प्रार्थना करते हैं – बच्चा दो, यह दो, वह दो। जानते कुछ भी नहीं। गऊमुख पर जाते हैं, कितनी मेहनत करके सीढ़ी उतरते चढ़ते हैं, पता कुछ भी नहीं कि वहाँ क्या रखा है? एक पत्थर का गऊ का मुख बनाया है, कहते हैं गऊ के मुख से गंगा जल निकलता है। अब जानवर के मुख से अमृत थोड़ेही निकलता। तीर्थों पर जाते हैं, किसके भी आक्यूपेशन को नहीं जानते हैं कि यह कब आये, क्या आकर किया? हम क्यों पूजते हैं? बुद्धिहीन होने कारण पुकारते हैं – हे प्रभू, हे बाबा क्योंकि वह सबका बाप है। मनुष्य के तीन बाप कहे जाते – एक है आत्माओं का बाप शिव, दूसरा सारे मनुष्य सृष्टि अथवा मनुष्य सिजरे का रचता प्रजापिता ब्रह्मा, तीसरा फिर लौकिक बाप। भक्त भी एक भगवान को याद करते हैं कि नयनहीन को आकर राह दिखाओ, जो हम सदा ऐसे बनें। यह कलियुग तो है ही दु:खधाम। सतयुग है सुखधाम और जहाँ से हम आत्मायें पार्ट बजाने आती हैं उनको शान्तिधाम कहा जाता है। आत्मा को यह शरीर रूपी बाजा अथवा यह कर्मेन्द्रियां यहाँ मिलती हैं, जिससे आत्मा कर्म करती है। आत्मा तो है अविनाशी, शरीर है विनाशी। आत्मा है पारलौकिक परमपिता परमात्मा की सन्तान। शरीर है लौकिक बाप की सन्तान। आत्मा का बाप एक ही है, उनको याद करने से वर्सा मिलता है। बेहद के शान्ति और सुख का वर्सा कोई मनुष्य मात्र से मिल नहीं सकता है। चाहे कोई भी हो, ब्रह्मा विष्णु शंकर को भी देवता कहा जाता, परमात्मा एक शिव है। शिव परमात्माए नम:, ब्रह्मा परमात्माए नम: नहीं कहेंगे। तो यह भी जो मन्दिर आदि हैं उनके आक्यूपेशन को कोई नहीं जानते। ऊंच ते ऊंच परमपिता परमात्मा शिव है फिर रचना रचते हैं ब्रह्मा-विष्णु-शंकर की। शिव निराकार अलग है, शंकर आकारी देवता है। परमात्मा एक है, यह पहेली अच्छी रीति समझाना चाहिए। पहले-पहले तो बाप को जानना चाहिए जो बाप स्वर्ग का रचता है। मनुष्य तो भक्ति में धक्के खाते रहते हैं। लक्ष्मी-नारायण तो हैं स्वर्ग के मालिक, वहाँ तो सदैव सुख ही सुख है। यहाँ सभी दु:खी हैं। यह दुनिया ही पतित है। सतयुग में भारत पवित्र गृहस्थ आश्रम था यथा राजा रानी तथा प्रजा सब पावन थे। पतित को पावन बनाने वाला एक ही परमपिता परमात्मा है। राधे कृष्ण सतयुग के प्रिन्स प्रिन्सेज हैं जो स्वयंवर बाद लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। स्वर्ग को कहा जाता है शिवालय। अब बाप सबको पावन बना रहे हैं इन भारत माताओं द्वारा, जिन्हों पर ही ज्ञान का कलष रखा जाता है। भारत में पवित्र राज्य था, अभी है अपवित्र राज्य। गृहस्थ धर्म के बदले गृहस्थ अधर्म हो गया है फिर बाप आकर पावन बनाते हैं। बाप आत्माओं से बात करते हैं मैं परमपिता परमात्मा आया हूँ। आत्मा परमात्मा अलग रहे बहुकाल…. तुम बहुत समय के बिछुड़े हुए हो। अब बिल्कुल रोगी, पतित, कौड़ी तुल्य बन गये हो फिर तुमको अगर मेरे जैसा बनना है तो पुरुषार्थ करो। यह भारत माता शक्ति अवतार हैं। यह शिवबाबा को अपना बाप मानती हैं। उनसे योग लगाने से शक्ति मिलती है जिससे 5 विकारों पर जीत पाकर माया जीते जगतजीत बनते हैं। यह हार-जीत का खेल है। यह वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझने से तुम चक्रवर्ती राजा बन सकते हो। बाप ही स्वर्ग के लिए पवित्रता-सुख-शान्ति का वर्सा देते हैं। यह राजयोग है, हठयोगी राजयोग सिखा न सकें।

अभी तुम बच्चों को श्रीमत मिलती है जिससे तुम श्रेष्ठ बन रहे हो। रावण की मत से तुम भ्रष्ट बने हो। भारत अब रावण की मत पर चलने से इतना दु:खी कंगाल बना है। जगदम्बा सबकी मनोकामनायें पूर्ण करने वाली थी, वह भी माता थी। जगदम्बा ने श्रीमत पर भारत को स्वर्ग बनाया था इसलिए उनकी इतनी महिमा गाई जाती है। पवित्रता के बिगर तुम पवित्र दुनिया का मालिक बन नहीं सकेंगे। आधाकल्प भक्ति मार्ग चलता है। अब बाप कहते हैं फिर पावन दुनिया का मालिक बनना है तो आकर समझो। अब श्रीमत मिलती है तो उन पर चलना है। मेरा तो एक शिवबाबा, दूसरा न कोई…. मनुष्य तो 84 जन्म लेते हैं। तुम शक्तियां हो। शिवबाबा से योग लगाने से तुमको शक्ति मिलेगी। नहीं तो कभी स्वर्ग के मालिक बन ही नहीं सकेंगे। पारलौकिक बाप से 21 जन्मों का वर्सा मिलता ही है संगम पर, इसलिए पुरुषार्थ करना है। बच्चों का भी कल्याण करना है। फिर स्वर्ग के मालिक बन जायेंगे। यह राजयोग की पाठशाला है। भगवानुवाच – बच्चे, मैं तुमको राजयोग सिखलाता हूँ जिससे तुम राजाओं का राजा स्वर्ग के मालिक बनेंगे। सिर्फ बाप को याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी। बाप सुखधाम में भेज देंगे। बाप कहते हैं मैं ही आकर सबको शान्तिधाम, सुखधाम में ले जाता हूँ। सतयुग त्रेता में यह भक्ति आदि होती नहीं। वहाँ तो 21 जन्म अथाह सुख हैं। अब बाप कहते हैं इस रावण पर जीत पहनो, विकार के लिए शादी करना अपनी बरबादी करना है। परमपिता परमात्मा ने आर्डीनेन्स निकाला है कि पवित्र बनो तो जगत का मालिक बनेंगे। इस दु:खधाम से शान्तिधाम, सुखधाम में चलना चाहते हो तो यह बातें समझो।

तुम जानते हो सिवाए बाप के कोई भी मनुष्य को भगवान कहना रांग है। भगवान है ही एक। अभी तुम बच्चे शिव परमात्मा की, ब्रह्मा विष्णु शंकर की, लक्ष्मी-नारायण आदि सबकी बायोग्राफी जानते हो। अब तुम श्रीमत से ऐसे लक्ष्मी-नारायण समान श्रेष्ठ बन सकते हो। पवित्र तो जरूर बनना है। परमपिता परमात्मा की श्रीमत पर एक बाप को याद करते रहेंगे और पवित्र बनेंगे तो 21 जन्म का राज्य भाग्य मिलेगा। कितनी सहज बात है! यह समझने से तुम भक्ति के धक्कों से, रोने पीटने से 21 जन्म छूट सकते हो। समझाना है सतयुग की स्थापना कैसे होती है फिर यह चक्र कैसे फिरता है? सारे वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी को समझो। यह तो मनुष्य ही समझेंगे। एक बाप की श्रीमत पर चलना है। सर्व पर दया तो एक बाप ही करते हैं। वह ज्ञान का सागर, सुख का सागर है। वही इन माताओं को ज्ञान का कलष देते हैं जिससे यह सबको पावन बना सकती हैं। बाकी पानी की गंगा पावन नहीं बना सकती है। यह गऊ मातायें हैं। जिन्हों को ज्ञान का कलष मिलता है। यहाँ तो पढ़ाई है, पढ़कर देवता बनना है। ब्राह्मण देवता, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र – यह वर्ण हैं। ऐसे यह 84 जन्मों का चक्र फिरता रहता है। इस चक्र को जानने से तुम चक्रवर्ती राजा रानी बन सकते हो। अच्छा!

बापदादा और मीठी-मीठी जगदम्बा माँ का सिकीलधे बच्चों प्रति यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) पवित्रता के बल से, श्रीमत पर चल भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा करनी है। सबको एक बाप का आर्डीनेंस सुनाना है कि पवित्र बनो तो पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे।

2) हर एक को तीन बाप का परिचय दे, दु:खधाम से शान्तिधाम और सुखधाम में चलने की राह दिखानी है। भटकने से छुड़ाना है।

वरदान:- सर्वशक्तिमान के साथ की अनुभूति द्वारा सर्व प्राप्तियों का अनुभव करने वाले तृप्त आत्मा भव 
जहाँ सर्वशक्तिमान बाप है वहाँ सर्व प्राप्तियों का अनुभव स्वत: होता है। जैसे बीज है तो झाड समाया हुआ है। ऐसे सर्वशक्तिमान बाप का साथ है तो सदा मालामाल, सदा तृप्त, सदा सम्पन्न होंगे। कभी किसी बात में कमजोर नहीं होंगे, कभी कोई कम्पलेन्ट नहीं करेंगे, सदा कम्पलीट। क्या करें, कैसे करें…यह कम्पलेन्ट नहीं। क्यों की क्यू समाप्त। जो सदा साथ रहते हैं वह चलेंगे भी साथ।
स्लोगन:- नयनों में जैसे नूर समाया हुआ है ऐसे बुद्धि में शिव पिता की याद समाई हो।

मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य

1) “ज्ञान दाता द्वारा मिले हुए नये ज्ञान की मुख्य प्वाइन्टस”

हम मनुष्य आत्माओं को पहले पहले कौनसी मुख्य प्वाइन्ट बुद्धि में रखनी है, जिस पर खूब अटेन्शन रखना है। पहले-पहले तो अपने को यह पक्का निश्चय रखना है कि हमको पढ़ाने वाला कौन है? दूसरी प्वाइन्ट है, हम सभी मनुष्य आत्मायें हैं और परमात्मा हमारा पिता है। हम आत्मा बच्चे और परमात्मा बाप दोनों अलग-अलग चीज़ है। तीसरी प्वाइन्ट ईश्वर बेअंत भी नहीं है, ईश्वर सर्वत्र भी नहीं है, अब यही नॉलेज बुद्धि में रखनी है इसलिए अपनी नॉलेज औरों से न्यारी है, भले दुनियावी मनुष्य समझते हैं हमको परमात्मा का ज्ञान है, अब उनसे पूछो आप में कौनसा ज्ञान है? तो कहेंगे ईश्वर सर्वव्यापी है। अब परमात्मा तो कहता है मेरा ज्ञान मेरे द्वारा ही मिलता है, जैसे बैरिस्टर द्वारा बैरिस्ट्री, डॉ. द्वारा डॉक्टरी सीखी जाती है, भल वहाँ बैरिस्टर भी अनेक होते हैं, एक बैरिस्टर से न पढ़ा तो दूसरा पढ़ायेगा। एक डॉक्टर से न पढ़ा तो दूसरा डॉक्टर पढ़ायेगा, मगर यह ईश्वरीय नॉलेज सिवाए एक परमात्मा बिगर कोई भी मनुष्य आत्मा चाहे साधू, संत, महात्मा हो वो भी नहीं पढ़ा सकेगा। तो हम कैसे समझें कि इन्हों में कोई परमात्मा का ज्ञान है और चौथी प्वाइन्ट परमात्मा युगे युगे नहीं आता बल्कि परमात्मा कल्प कल्प एक ही बार इस संगमयुग पर अर्थात् कलियुग के अन्त और सतयुग के आदि संगम समय पर आता है, और अनेक अधर्मों का विनाश कराए एक आदि सनातन सतधर्म की स्थापना कराता है। अब लोग कैसे कहते हैं कि परमात्मा युगे युगे आता है और ऐसे भी कहते हैं गीता का भगवान श्रीकृष्ण, वो द्वापर में आया है। अब इन सभी बातों को सिद्ध करना है, गीता का भगवान श्रीकृष्ण नहीं है, शिव परमात्मा है और वो भी द्वापर में नहीं आता संगम समय पर आया है। पाँचवी प्वाइन्ट गुरु बिगर घोर अन्धियारा कैसे हुआ है, वो गुरु कौन है? मनुष्य सृष्टि उल्टा झाड़ कैसे है और हमको अपने पाँच विकारों पर जीत कैसे पहननी है? छटवीं प्वाइन्ट हम वही पाण्डव यौद्धे हैं, जिसके साथ साक्षात् परमात्मा है उसी तरफ ही जीत है और सातवीं प्वाइन्ट परमात्मा खुद सर्वशक्तिवान है तो जिन्होंने परमात्मा का पूरा साथ लिया है, उन्हों को ही परमात्मा द्वारा लाइट माइट दोनों ताज मिलते हैं। अब यह सभी बातें बुद्धि में रखना इसको ही ज्ञान कहा जाता है।

2) “बदनसीब और खुशनसीब बनने का फाउण्डेशन क्या है?” बदनसीबी और खुदनसीबी अब यह दो शब्दों का मदार किस पर चलता है? यह तो हम जानते हैं कि खुशनसीब बनाने वाला परमात्मा और बदनसीब बनाने वाला खुद ही मनुष्य है। जब मनुष्य सर्वदा सुखी है तो उन्हों की अच्छी किस्मत कहते हैं और जब मनुष्य अपने को दु:खी समझते हैं तो वो अपने को बदनसीब समझते हैं। हम ऐसे नहीं कहेंगे कि बदनसीबी वा खुशनसीबी कोई परमात्मा द्वारा मिलती है, नहीं। यह समझना बड़ी मूर्खता है। परमात्मा तो हमें खुशनसीब बनाता है परन्तु तकदीर को बिगाड़ना वा बनाना यह सब कर्मों के ऊपर ही मदार है। यह सब मनुष्यों के संस्कारों के ऊपर ही है। फिर जैसे पाप और पुण्य का संस्कार भरता है वैसे तकदीर बनती है परन्तु मनुष्य इस राज़ न जानने के कारण परमात्मा के ऊपर दोष रखते हैं। अब देखो मनुष्य अपने को सुखी रखने के लिये कितनी माया के तरीके निकालते हैं फिर उस ही माया से कोई अपने को सुखी समझते हैं और कोई फिर उस ही माया का सन्यास कर माया को छोड़ने से अपने को सुखी समझते हैं, मतलब तो कई प्रकार के प्रयत्न करते हैं परन्तु इतने तरीके करते भी रिजल्ट दु:ख के तरफ जा रही है। जब सृष्टि पर भारी दु:ख होता है तब उसी समय स्वयं परमात्मा आए गुप्त रूप में अपने ईश्वरीय योग पॉवर से दैवी सृष्टि की स्थापना कराए सभी मनुष्य आत्माओं को खुशकिस्मत बनाते हैं। अच्छा – ओम् शान्ति।

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