Brahmakumaris Daily Mahavakya 18 September 2017

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18.09.2017
Peace Of Mind TV

ओम शान्ति।

बच्चे, इस रंगमंच पर कर्मों का बहुत सूक्ष्म खेल चलता है, जिसे हर आत्मा पूरी तरह समझ नहीं पाती, और जिस कारण वह अपना हिसाब-किताब बना लेती है। जिसे फिर उसे ही चुक्तू करना पड़ता है।

जब आप किसी भी कर्मन्द्रिय को यूज़ करते हो अर्थात् आँख द्वारा कुदृष्टि होती है, तो वो भी पाप कर्म बन जाता है। जबकि यह संकल्पों द्वारा किया गया पाप कर्म है जोकि योग द्वारा चुक्तू किया जा सकता है। दूसरा है वाचा द्वारा, अर्थात् जब आप किसी भी विकारों में फँसी हुई कमज़ोर, परवश आत्मा को कुछ ऐसी बात बोलते हो जो उसे चुब जाए अर्थात् वह दुःखी हो जाए तो वह आपका हिसाब-किताब बनता है, जिसको आपको शरीर द्वारा चुक्तू करना पड़ता है।

इसलिए बच्चे, अब मुख द्वारा बोलना बन्द करो। अब ज़रूरत का ही बोलो।

देखो, कमज़ोर आत्मा तो पहले से ही अपने संस्कारों से परेशान है और वह उसे खत्म करना चाहती है और यदि आप भी सभी के बीच उसे हल्की-सी भी कोई चुबने वाली बात बोल देते हो तो वह दुःखी हो जाती है जोकि फिर आपका हिसाब-किताब बन जाता है।

इसलिए अगर किसी आत्मा के शुभचिन्तक बन समझानी देनी भी हैं तो अकेले में बस एक ही बार दो। फिर उसे बाप हवाले कर दो अन्यथा आप छोटा-छोटा सा हिसाब-किताब बना लेते हो जो फिर चुक्तू भी तो करना पड़ेगा…!

बच्चे, अब जो समय जा रहा है वह केवल कमाई का है इसलिए अब नया हिसाब-किताब बनाना बन्द करो और हर आत्मा के प्रति रहम, प्रेम और कल्याण की भावना रख मन्सा सेवा करो। इससे आपका दुआओं का खाता जमा होगा और आप जल्दी ही अपनी मंज़िल पर पहुँच जाओंगे।

जब कोई भी पाप कर्म संकल्पों द्वारा होता है तो वह योग द्वारा चुक्तू हो जाता है और यदि कर्मणा में आ जाता है तो शरीर द्वारा, और सम्बन्ध-सम्पर्क द्वारा चुक्तू करना पड़ता है।

अच्छा । ओम् शान्ति ।

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