BRAHMA KUMARIS MURLI TODAY 23 FEBRUARY 2019 : AAJ KI MURLI

Daily Murli Brahma Kumaris Hindi – Today Murli 23 February 2019

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23-02-2019
प्रात:मुरली
ओम् शान्ति
“बापदादा”‘
मधुबन

 

“मीठे बच्चे – शिव जयन्ती पर तुम खूब धूमधाम से निराकार बाप की बायोग्राफी सबको सुनाओ, यह शिव जयन्ती ही हीरे तुल्य है”
प्रश्नः- तुम ब्राह्मणों की सच्ची दीवाली कब है और कैसे?
उत्तर:- वास्तव में शिव जयन्ती ही तुम्हारे लिए सच्ची-सच्ची दीवाली है क्योंकि शिवबाबा आकर तुम आत्मा रूपी दीपक को जगाते हैं। हरेक के घर का दीप जलता है अर्थात् आत्मा की ज्योति जगती है। वह स्थूल दीपक जगाते लेकिन तुम्हारा सच्चा दीपक शिव बाप के आने से जगता है इसलिए तुम खूब धूमधाम से शिव जयन्ती मनाओ।

ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चे शिव की जयन्ती मनाते हैं और भारत में तो शिव जयन्ती मनाते ही हैं। जयन्ती एक की मनाई जाती है। उसको फिर सर्वव्यापी कह देते हैं। अब सर्व की जयन्ती तो हो न सके। जयन्ती कब मनाई जाती है? जब गर्भ से बाहर आते हैं। शिवजयन्ती मनाते तो जरूर हैं। आर्य समाजी भी मनाते हैं। अब तुम मनाते हो 83वीं जयन्ती, गोया 83 वर्ष हुआ जयन्ती को। जन्म दिन तो सबको याद रहता है, फलाने दिन यह गर्भ से बाहर आया। अब शिवबाबा की तुम 83वीं जयन्ती मनाते हो। वह तो है निराकार, उनकी जयन्ती कैसे हो सकती है? इतने बड़े-बड़े मनुष्यों को निमंत्रण कार्ड जाते हैं। कोई को पूछना तो चाहिए – जयन्ती कैसे मनाते हो? उसने जन्म कब और कैसे लिया? फिर उसके शरीर का नाम क्या रखा? परन्तु ऐसे पत्थरबुद्धि हैं जो कभी पूछते नहीं हैं। तुम उनको बता सकते हो – वह है निराकार, उनका नाम है शिव। तुम सालिग्राम बच्चे हो। जानते हो इस शरीर में सालिग्राम हैं। नाम शरीर का पड़ता है। वह है परम आत्मा शिव। अब तुम कितना धूम-धाम से प्रोग्राम रखते हो। दिन-प्रतिदिन तुम धूमधाम से समझाते रहते हो कि जब शिवबाबा की ब्रह्मा के तन में प्रवेशता होती है, वही उनकी जयन्ती गाई जाती है। उनकी तिथि तारीख कोई होती नहीं। कहते हैं मैं साधारण तन में प्रवेश करता हूँ। परन्तु कब, किस घड़ी वह नहीं बताते। तिथि-तारीख, दिन आदि बतायें तो कहें कि फलानी तारीख। जन्म पत्री आदि तो इनकी होती नहीं। वास्तव में जन्म पत्री तो सबसे ऊंची इनकी है। कर्तव्य भी इनका सबसे ऊंचा है। कहते हैं प्रभु तेरी महिमा अपरमअपार है। तो जरूर कुछ करते होंगे। महिमा तो बहुतों की गाई जाती है। नेहरू, गांधी आदि सबकी महिमा गाते हैं। इनकी महिमा कोई बता न सके। तुम समझाते हो वह ज्ञान का सागर, शान्ति का सागर है। वह तो एक ठहरा ना। फिर उनको सर्वव्यापी कैसे कह सकते। परन्तु कुछ भी समझते नहीं हैं। और तुम मनाते हो तो कोई पूछने का साहस भी नहीं करते हैं। नहीं तो पूछना चाहिए शिव जयन्ती मनाई जाती है, महिमा गाई जाती है तो जरूर कोई होकर गये हैं। बहुत भक्त लोग हैं। अगर गवर्मेन्ट न माने तो भक्तों, साधुओं, गुरूओं की स्टैम्प भी न बनाये। जैसी है गवर्मेन्ट, ऐसी है रैयत (प्रजा)। अभी तुम बच्चों को बाप की बायोग्राफी का भी अच्छी तरह मालूम पड़ा है। तुमको जितना फ़खुर रहता है उतना और कोई को नहीं रह सकता। तुम ही कहते हो शिव जयन्ती हीरे तुल्य है, बाकी सब जयन्तियाँ कौड़ी मिसल हैं। बाप ही आकर कौड़ी को हीरे तुल्य बनाते हैं। श्रीकृष्ण भी बाप द्वारा इतना ऊंच बना इसलिए उनका जन्म हीरे तुल्य गाया जाता है। पहले कौड़ी तुल्य होगा फिर हीरे तुल्य बाबा ने बनाया। यह बातें मनुष्य नहीं जानते। उनको ऐसा वर्ल्ड का प्रिन्स किसने बनाया? तो यह भी समझाना चाहिए – कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं। बच्चा तो माता के गर्भ से ही बाहर निकला। उनको टोकरी में ले गये। अब कृष्ण तो वर्ल्ड प्रिन्स था फिर उनको डर काहे का? वहाँ कंस आदि कहाँ से आया? यह सब बातें शास्त्रों में लिख दी हैं। अब तुमको अच्छी रीति समझाना चाहिए। समझाने की युक्तियाँ बहुत अच्छी चाहिए। सब एक जैसा नहीं पढ़ा सकते। युक्तियुक्त न समझाने से और ही डिससर्विस होती है।

अब शिव जयन्ती मनाई जाती है तो जरूर शिव की ही महिमा करेंगे। गांधी जयन्ती पर गांधी की ही महिमा करेंगे। और कुछ सूझेगा नहीं। अब शिवजयन्ती तुम मनाते हो तो जरूर उनकी महिमा, उनकी बायोग्राफी वा जीवन चरित्र भी होगा। तुम उस दिन उनका ही जीवन चरित्र बैठ सुनाओ। जैसे बाप कहते हैं मनुष्य कोई पूछते भी नहीं हैं कि शिव जयन्ती कैसे शुरू हुई। उसका कुछ भी वर्णन है नहीं। उनकी महिमा तो अपरम्पार गाई जाती है। शिवबाबा को भोलानाथ कह बहुत महिमा करते हैं। वह तो भोला भण्डारी है। वह लोग शिव-शंकर कह देते हैं। शंकर को भोलानाथ समझ लेते हैं। वास्तव में भोलानाथ शंकर तो नहीं लगता। उनके लिए तो कहते हैं आंख खोली तो विनाश हुआ, धतूरा खाते उनको फिर भोलानाथ कैसे कह सकते हैं। महिमा तो एक की ही होती है। तुमको शिव के मन्दिर में जाकर समझाना चाहिए। वहाँ बहुत लोग आते हैं तो शिव का जीवन चरित्र सुनाना है। कहते हैं भोला भण्डारी शिवबाबा। अब शिव और शंकर का भेद भी तुमने ही बताया है। शिव की पूजा होती है शिव के मन्दिर में। तो वहाँ जाकर तुमको शिव की जीवन कहानी बतानी है। जीवन कहानी अक्षर सुनकर कोई का माथा ही चक्रित हो जायेगा कि शिव की जीवन कहानी कैसे सुनायेंगे? तो मनुष्य वन्डरफुल बात समझ बहुत आयेंगे। बोलो, निमंत्रण पर जो आयेंगे उनको हम निराकार परमपिता परमात्मा की जीवन कहानी बतायेंगे। गांधी आदि की भी बायोग्राफी सुनते हैं ना। अभी तुम महिमा करेंगे शिव की तो मनुष्यों की बुद्धि से सर्वव्यापी की बात उड़ जायेगी। एक की महिमा फिर दूसरे से मिल न सके। यह जो मण्डप बनाते हैं वा प्रदर्शनी करते हैं, वह कोई शिव का मन्दिर तो है नहीं। तुम जानते हो सच्चा-सच्चा शिव का मन्दिर वास्तव में यह है, जहाँ रचता खुद बैठ रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं। तुम लिख सकते हो रचता की जीवन कहानी और रचना के आदि-मध्य-अन्त का राज़ अथवा हिस्ट्री सुनायेंगे। हिन्दी-अंग्रेजी में लिखत हो। बड़े-बड़े के पास जायेंगे तो वन्डर खायेंगे कि यह कौन हैं जो परमपिता परमात्मा की बायोग्राफी बताते हैं। सिर्फ रचना के लिए तुम कहेंगे तो समझेंगे प्रलय हुई फिर नई रचना रची। परन्तु नहीं, तुमको तो समझाना है बाप पतितों को आकर पावन बनाते हैं तो मनुष्य वन्डर खायेंगे। शिव के मन्दिर में भी बहुत आयेंगे। हाल वा मण्डप बड़ा होना चाहिए। भल तुम प्रभात फेरी निकालते हो, उसमें भी यह लक्ष्मी-नारायण का राज्य किसने स्थापन किया, उन्हों को यह समझाना है। निराकार शिवबाबा जो सभी आत्माओं का बाप है वो ही आकर राजयोग सिखाते हैं। ऐसे-ऐसे विचार सागर मंथन करना चाहिए कि कैसे शिव के मन्दिर में जाकर सर्विस करनी चाहिए। शिव के मन्दिर में सवेरे पूजा करते हैं, घण्टे आदि भी सवेरे बजते हैं। शिवबाबा भी प्रभात के समय आते हैं। आधी रात नहीं कहेंगे। उस समय तुम ज्ञान भी नहीं सुना सकते हो क्योंकि मनुष्य सोये रहते हैं। रात को फिर भी मनुष्यों को फुर्सत होती है। बत्तियाँ आदि भी जलती हैं। रोशनी भी अच्छी करनी चाहिए। शिवबाबा आकर तुम आत्माओं को जगाते हैं। सच्ची दीपावली तो यह है, हरेक के घर का दीप जलता है यानी आत्मा की ज्योति जगती है। वह तो घर में स्थूल दीपक जलाते हैं। परन्तु दीपावली का वास्तव में अर्थ यह है। कोई-कोई का दीपक तो बिल्कुल जगता नहीं। तुम जानते हो हमारा दीपक कैसे जगता है? कोई मरता है तो दीवा जलाते हैं कि अन्धियारा न हो। परन्तु पहले तो आत्मा का दीपक जगे तब अन्धियारा न हो। नहीं तो मनुष्य घोर अन्धियारे में हैं। आत्मा तो सेकण्ड में एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। अन्धियारे आदि की इसमें बात ही नहीं। यह भक्ति मार्ग की रस्म है। घृत ख़लास होने से दीवा बुझ जाता है। अन्धियारे का भी अर्थ कुछ समझते नहीं हैं। पित्र आदि खिलाने का भी अर्थ नहीं समझते हैं। आगे आत्माओं को बुलाते थे, कुछ पूछते थे। अभी इतना नहीं चलता है। यहाँ भी आते हैं। कोई-कोई समय कुछ बोल देते हैं। बोलो तुम सुखी हो? तो कहेंगे हाँ जी। सो तो जरूर यहाँ से जो जायेंगे अच्छे घर में ही जन्म लेंगे। जन्म जरूर अज्ञानी के घर में लेंगे। ज्ञानी के घर में तो जन्म ले नहीं सकते क्योंकि ज्ञानी ब्राह्मण तो विकार में जा नहीं सकता। वह तो पवित्र है। बाकी हाँ, अच्छे सुखी घर में जाकर जन्म लेंगे। विवेक भी कहता है – जैसी अवस्था, वैसा जन्म। फिर वहाँ अपना जलवा दिखाते हैं। भल शरीर छोटा है इसलिए बोल न सकें। थोड़ा बड़ा होने से ज्ञान का जलवा दिखायेंगे जरूर। जैसे कोई-कोई शास्त्रों के संस्कार ले जाते हैं तो छोटेपन में ही उसमें लग जाते हैं, यहाँ से भी नॉलेज ले जाते हैं तो जरूर महिमा निकलेगी।

तुम शिव जयन्ती मनाते हो। वह लोग कुछ अर्थ नहीं समझ सकते हैं। पूछना चाहिए – अगर वह सर्वव्यापी है तो जयन्ती कैसे मनायेंगे? अब तुम बच्चे पढ़ रहे हो। तुम जानते हो वह बाप भी है, टीचर भी है, सतगुरू भी है। बाबा ने समझाया है सिक्ख लोग भी कहते हैं सत श्री अकाल है। अब वास्तव में अकाल मूर्त तो सब आत्मायें हैं परन्तु एक शरीर छोड़ दूसरा लेते हैं इसलिए जन्म-मरण कहा जाता है। आत्मा तो वही है। आत्मा 84 जन्म लेती है। कल्प जब पूरा होता है तो खुद ही आकर बताते हैं कि मैं कौन हूँ? मैं कैसे इनमें प्रवेश करता हूँ? जिससे तुम आपेही समझ जाते हो। पहले नहीं समझते थे। हाँ, परमात्मा की प्रवेशता है परन्तु कैसे, कब हुई, कुछ भी समझते थोड़ेही थे। दिन-प्रतिदिन तुम्हारी बुद्धि में यह बातें आती रहती हैं। नई-नई बातें तुम सुनते रहते हो। आगे थोड़ेही दो बाप का राज़ समझाते थे। आगे तो जैसे बेबियां थी। अभी भी बहुत कहते हैं – बाबा, हम दो दिन का आपका बच्चा हूँ। इतने दिन का बच्चा हूँ। समझते हैं जो कुछ होता है कल्प पहले मिसल। इसमें बड़ी नॉलेज है। समझने में भी समय लगता है। जन्म ले फिर मर भी पड़ते हैं। दो मास, 8 मास का हो मर भी पड़ते हैं। तुम्हारे पास आते हैं कहते हैं यह राइट है। वह हमारा बाप है, हम उनकी सन्तान हैं। हाँ-हाँ कहते हैं। बच्चे लिखते भी हैं – बहुत प्रभावित हो जाते हैं। फिर बाहर गया ख़लास, मर पड़ा। फिर आते ही नहीं हैं तो क्या होगा? या तो पिछाड़ी में आकर रिफ्रेश होगा या तो प्रजा में आ जायेगा। यह सब बातें समझानी हैं। हम शिव जयन्ती कैसे मनाते हैं? शिवबाबा कैसे सद्गति करते हैं? शिवबाबा स्वर्ग की सौगात ले आते हैं। खुद कहते हैं मैं तुमको राजयोग सिखाता हूँ। विश्व का मालिक बनाता हूँ। बाप तो है ही हेविन का रचयिता तो जरूर हेविन का ही मालिक बनायेंगे। हम उनकी बायोग्राफी बताते हैं। कैसे स्वर्ग की स्थापना करते हैं, कैसे राजयोग सिखाते हैं, आकर सीखो। जैसे बाप समझाते हैं, वैसे बच्चे नहीं समझा सकते हैं क्या? इसमें बहुत अच्छा समझाने वाला चाहिए। शिव के मन्दिर में बहुत अच्छा मनाते होंगे, वहाँ जाकर समझाना चाहिए। लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में अगर शिव की जीवन कहानी सुनायेंगे तो किसको जंचेगी नहीं। ख्याल में नहीं आयेगा। फिर उन्हों को अच्छी रीति बुद्धि में बिठाना पड़े। लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में बहुत आते हैं। उन्हों को लक्ष्मी-नारायण, राधे कृष्ण का राज़ समझा सकते हो। उनका अलग-अलग मन्दिर होना नहीं चाहिए। कृष्ण जयन्ती पर तुम कृष्ण के मन्दिर में जाकर समझायेंगे – कृष्ण ही गोरा, कृष्ण ही सांवरा क्यों गाया जाता है? कहते हैं गांवड़े का छोरा। गांवड़े में तो गायें-बकरियां चराते होंगे ना। बाबा फील करता है हम भी गांवड़े के थे। न टोपी, न जुत्ती। अब स्मृति आती है हम क्या थे फिर बाबा ने आकर प्रवेश किया है। तो यह बाप का लक्ष्य सबको मिले कि शिवबाबा को याद करो वो ही सद्गति दाता है। तुम रामचन्द्र की भी जीवन कहानी बता सकते हो। कब से उनका राज्य शुरू हुआ, कितना वर्ष हुआ। ऐसे-ऐसे ख्यालात आने चाहिए। शिव के मन्दिर में शिव की बायोग्राफी सुनानी पड़े। लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में लक्ष्मी-नारायण की महिमा करनी पड़े। राम के मन्दिर में जायेंगे तो राम की जीवन कहानी सुनायेंगे। अब तुम पुरूषार्थ कर रहे हो देवी-देवता धर्म स्थापन करने का। हिन्दू धर्म तो कोई ने स्थापन नहीं किया है। बाकी हिन्दू कोई धर्म नहीं है – यह सीधा कहने से बिगड़ेंगे। समझते हैं यह कोई ईसाई हैं। तुम बोलो हम आदि सनातन देवी-देवता धर्म के हैं जिसको आजकल हिन्दू कह दिया है। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) शिवजयन्ती धूमधाम से मनाओ। शिवबाबा के मन्दिर में शिव की और लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में लक्ष्मी-नारायण वा राधे-कृष्ण की बायोग्राफी सुनाओ। सबको युक्तियुक्त समझानी दो।

2) अज्ञान अन्धियारे से बचने के लिए आत्मा रूपी दीपक को ज्ञान घृत से सदा प्रज्जवलित रखना है। दूसरों को भी अज्ञान अन्धियारे से निकालना है।

वरदान:- श्रेष्ठ स्मृति द्वारा श्रेष्ठ स्थिति और श्रेष्ठ वायुमण्डल बनाने वाले सर्व के सहयोगी भव
योग का अर्थ है श्रेष्ठ स्मृति में रहना। मैं श्रेष्ठ आत्मा श्रेष्ठ बाप की सन्तान हूँ, जब ऐसी स्मृति रहती है तो स्थिति श्रेष्ठ हो जाती है। श्रेष्ठ स्थिति से श्रेष्ठ वायुमण्डल स्वत: बनता है जो अनेक आत्माओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। जहाँ भी आप आत्मायें योग में रहकर कर्म करती हो वहाँ का वातावरण, वायुमण्डल औरों को भी सहयोग देता है। ऐसी सहयोगी आत्मायें बाप को और विश्व को प्रिय हो जाती हैं।
स्लोगन:- अचल स्थिति के आसन पर बैठने से ही राज्य का सिंहासन मिलेगा।

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